एक घोंघे में विचित्र लिंग निर्धारण

म तौर पर किसी भी प्रजाति में लिंग निर्धारण की एक ही विधि पाई जाती है – कुछ प्रजातियों में नर और मादा लिंग अलग-अलग होते हैं, कुछ में सारे जीव उभयलिंगी होते हैं जबकि कुछ प्रजातियों में जीव अपना लिंग बदल सकते हैं। उभयलिंगी होने का मतलब है कि प्रत्येक जीव नर और मादा दोनों भूमिकाएं निभा सकता है। लेकिन करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक हालिया शोध पत्र में ब्लैडर स्नेल में लिंग निर्धारण की जो विधि रिपोर्ट की गई है वह विविधता का एक नया आयाम दर्शाती है।

ब्लैडर स्नेल (Physa acuta) उभयलिंगी होते हैं। लेकिन सीएनआरएस, फ्रांस के शोधकर्ता पेट्रिस डेविड ने अपने अध्ययन के दौरान देखा कि इनमें से कुछ घोंघों में नर क्रिया पूरी तरह ठप हो गई थी जबकि सारे घोंघों का डीएनए एक जैसा था।

दरअसल डेविड और उनके साथी किसी अन्य वजह से घोंघों की आबादी में आणविक विविधता का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि कुछ प्रजातियों में माइटोकॉण्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए में बहुत अधिक विविधता है। माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाओं का एक उपांग होता है जो ऑक्सी-श्वसन में भूमिका निभाता है। गौरतलब है कि कोशिका के केंद्रक में उपस्थित डीएनए के अलावा माइटोकॉण्ड्रिया का अपना स्वतंत्र डीएनए होता है। माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए में फर्क के चलते फायसा एक्यूटा प्रजाति के कुछ सदस्य नर भूमिका निभाने में पूरी तरह असमर्थ थे।

केंद्रक के डीएनए की बजाय कोशिका द्रव्य में अन्यत्र उपस्थित डीएनए द्वारा लिंग निर्धारण को कोशिकाद्रव्य नर वंध्यता (सायटोप्लाज़्मिक मेल स्टेरिलिटी, सीएमए) कहते हैं और पौधों में इसकी खोज अट्ठारवीं सदी की शुरुआत में की जा चुकी थी। लेकिन जंतुओं में अब इसे पहली बार देखा गया है। और शोधकर्ताओं का ख्याल है कि ऐसा माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए के दम पर होता है।

डेविड और उनके साथी ब्लैडर स्नेल के एक जीन (COI) की मदद से उनमें विविध जीनोटाइप का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि इनमें से 15 प्रतिशत स्नेल में COI का एक भिन्न रूप पाया जाता है। इन घोंघों में उपस्थित जीन अन्य सदस्यों की अपेक्षा पूरा 26 प्रतिशत भिन्न था। इसे उन्होंने मायटोटाइप-डी कहा। टीम को लगा कि इतनी विविधता थोड़ी अचंभे की बात है और इसकी ज़रूर कोई भूमिका होगी।

शोधकर्ताओं ने मायटोटाइप-डी के सदस्यों का प्रजनन सामान्य घोंघों से करवाया, यह देखने के लिए कि क्या वे आपस में संतानोत्पत्ति कर सकते हैं। वैसे तो प्रजनन के दौरान उभयलिंगी जीव नर या मादा कोई भी भूमिका अपना सकते हैं लेकिन इस मामले में उन्होंने देखा कि कुछ मायटोटाइप-डी सदस्य नर भूमिका अपनाने में पूर्णत: अक्षम थे। वे दूसरे घोंघों पर चढ़ते नहीं थे, जबकि उन्हें अपने ऊपर आने देते थे। और तो और, इनमें शुक्राणु का उत्पादन बिलकुल भी नहीं होता था या सामान्य घोंघों की तुलना में बहुत कम होता था। यहां माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए में फर्क होने से नर वंध्यता पैदा हो रही है, जो जंतुओं में सायटोप्लाज़्मिक मेल स्टेरिलिटी का पहला उदाहरण है।

फिलहाल इसकी आणविक क्रियाविधि का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन शोधकर्ताओं को लगता है कि मायटोटाइप-डी में यह उत्परिवर्तन किसी तरह से नर भूमिका को बाधित कर देता है ताकि मादा कार्य के लिए ज़्यादा गुंजाइश बन सके। मज़ेदार बात यह है कि किसी जंतु में माइटोकॉण्ड्रिया और उसके जीन्स शुद्धत: मां का योगदान होते हैं। अर्थात ऐसे जीन्स का होना सदस्य को मात्र मादा के रूप में प्रजनन करने को तैयार करता है। यह तो केंद्रकीय जीन्स के साथ टकराव की स्थिति है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जंतुओं में इसकी और तलाश की जानी चाहिए। हो सकता है यह काफी आम हो और शोध व टेक्नॉलॉजी की दृष्टि से उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉकरोच का नया करतब

नुसंधान बताता है कि कॉकरोचों ने मीठे के प्रति नफरत पैदा कर ली है और इसके चलते हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कई कीटनाशक नुस्खे नाकाम साबित होने लगे हैं।

जब भी कोई नर कॉकरोच किसी मादा से संभोग करना चाहता है तो वह अपना पिछला भाग उसकी तरफ करके अपने पंख खोलता है और पंखों के नीचे छिपा मीठा भोजन उसे पेश कर देता है। यह भोजन एक रस होता है जिसे नर की टर्गल ग्रंथि स्रावित करती है। मादा जब इस भोजन को चट करने में व्यस्त होती है, उस दौरान नर उसे अपने एक शिश्न से पकड़े रखता है और दूसरे से अपने शुक्राणु उसके शरीर में पहुंचा देता है। इसमें लगभग 90 मिनट का समय लगता है।

लेकिन वर्ष 1993 में नॉर्थ कैरोलिना स्टेट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पता लगाया था कि जर्मन कॉकरोच में ग्लूकोज़ नामक शर्करा के लिए कोई लगाव नहीं होता। यह थोड़ा अजीब था क्योंकि ग्लूकोज़ इन जंतुओं के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। तो सवाल उठा कि ऐसे कॉकरोच क्यों और कहां से पैदा हुए।

ऐसा लगता है कि हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मीठे पावडरों और द्रवों ने यह असर किया है। इन मीठे पदार्थों में विष मिलाकर कॉकरोच पर नियंत्रण के प्रयास होते हैं। मिठास से आकर्षित होकर कॉकरोच इसका सेवन करते हैं और मारे जाते हैं। लेकिन कुछ कॉकरोच कुदरती रूप से ग्लूकोज़ के प्रति इतने लालायित नहीं थे; वे जीवित रहे, संतानोत्पत्ति करते रहे और यह गुण अगली पीढ़ी को सौंपते रहे।

अब कहानी में नया मोड़ आया है। नॉर्थ कैरोलिना स्टेट विश्वविद्यालय की कीट विज्ञानी आयको वाडा-कात्सुमाता ने कम्यूनिकेशंस बायोलॉजी में बताया है कि जो गुणधर्म मादा कॉकरोच को मीठे ज़हर से दूर रहने को उकसाता है, वही उसे सामान्य कॉकरोच नर के साथ संभोग करने से भी रोकता है।

कारण यह है कि कॉकरोच की लार नर के रस में उपस्थित जटिल शर्कराओं को तोड़कर उन्हें ग्लूकोज़ जैसी सरल शर्कराओं में बदल देती है। जैसे ही ग्लूकोज़ से नफरत करने वाली मादा कॉकरोच इस तोहफे का पहला निवाला लेती है, वह उसके मुंह में कड़वा हो जाता है और वह मैथुन से पहले ही भाग निकलती है।

आप शायद सोच रहे होंगे कि यह तो अच्छी बात है। कॉकरोच की आबादी स्वत: कम होती जाएगी। लेकिन ग्लूकोज़ से चिढ़ने वाले ये कॉकरोच प्रजनन का जुगाड़ जमा ही लेते हैं।

प्रयोगों के दौरान वाडा-कात्सुमाता ने देखा कि जंगली कॉकरोच के मुकाबले ग्लूकोज़ से दूर भागने वाले मादा कॉकरोच नर कॉकरोच से दूर रहना पसंद करते हैं। लेकिन साथ ही यह भी देखा गया कि ऐसे नर कॉकरोच अपने शुक्राणु कम समय में मादा को देने में माहिर हो गए हैं। और तो और, इन आबादियों में नर द्वारा मादा को पेश की जाने वाली पोषक सामग्री के रासायनिक संघटन में भी बदलाव आया है।

स्पष्ट है कि मनुष्य जंतुओं के विकास पर महत्वपूर्ण असर डालते हैं। और जंतु इस तरह के दबाव से निपटने की नई-नई रणनीतियां भी विकसित करते रहते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन का जंगली फफूंद पर असर

क्रोएशिया के कुछ हिस्सों में ट्रफल (खाने योग्य फफूंद) काफी महत्वपूर्ण हैं। इनकी कीमत लगभग 4,00,000 रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है। ट्रफल उद्योग और इससे सम्बंधित पर्यटन रोज़गार प्रदान करता है, अतिरिक्त आय देता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।

तीस साल पहले इस्त्रिया में वर्ष भर में होने वाली बारिश का पूर्वानुमान किया जा सकता था। लेकिन अब, जलवायु बदल गई है और सूखा भी पड़ने लगा है। ट्रफल्स को बढ़ने के लिए एक विशिष्ट मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। और अपेक्षाकृत गर्म जाड़ों के कारण जंगली सूअरों की आबादी बढ़ गई है, जो मिट्टी को नुकसान पहुंचाते हैं और ट्रफल खा जाते हैं। जिस कारण ट्रफल्स मिलना मुश्किल होता जा रहा है।

फफूंद वैज्ञानिक ज़ेल्को ज़्ग्रेबिक काले ट्रफल्स के प्लांटेशन की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें वे उनके बीजाणुओं को पेड़ों पर रोपने के विभिन्न तरीकों को आज़मा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने इस फफूंद के जीवन चक्र, पारिस्थितिकी और पूरे क्रोएशिया में कवक के भौगोलिक वितरण सम्बंधी डैटा और नमूने एकत्रित किए।

उनके अनुसार ट्रफल प्लांटेशन प्राकृतिक आवासों पर दबाव को कम कर सकता है। इसमें, मिट्टी में पानी की मात्रा नियंत्रित की जा सकती है, उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि विधियों का उपयोग किया जा सकता है और सूअरों को बाहर रखा जा सकता है।

वे मिट्टी में कवक की पहचान करने के लिए डीएनए बारकोडिंग का उपयोग कर रहे हैं ताकि संरक्षित क्षेत्रों में उनके बीजाणुओं और कवक-तंतुओं (मायसेलियम) की मदद से कवक की पहचान की जा सके। ज़्ग्रेबिक का कहना है कि प्रजातियों की संख्या अनुमान से कहीं अधिक है।

इसके अलावा, ट्रफल वाले इलाकों और ट्रफल-रहित इलाकों की तुलना करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि वे कुछ क्षेत्रों में क्यों पनपते हैं। इस काम से ब्रिजुनी नेशनल पार्क के एड्रियाटिक द्वीप जैसे स्थानों में जैव विविधता का महत्व भी स्पष्ट हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

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विकलांग अधिकार आंदोलन: समान अवसर, पूर्ण भागीदारी – सुबोध जोशी

विकलांगता की बात आते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं। पहली है यूएसए, अन्य विकसित पश्चिमी देशों और जापान जैसे गैर-पश्चिमी विकसित देशों की तस्वीर, जहां विकलांगजन को अवसर, सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है, जिनका उपयोग करते हुए वे गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने में समर्थ हैं। दूसरी तस्वीर है भारत सहित विकासशील और पिछड़े देशों की, जहां संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न पहलों के बावजूद विकलांगजन घोर दुर्दशापूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

विकलांगजन के हितों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1981 को विश्व विकलांगजन वर्ष घोषित किया गया था और 1983 से 1992 के दशक को संयुक्त राष्ट्र विकलांगजन दशक। संयुक्त राष्ट्र की ही पहल पर 1992 से 3 दिसंबर प्रति वर्ष विश्व विकलांगजन दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। उसकी इन पहलों से पहले भी दुनिया के विकसित देशों में, विशेष रूप से यूएसए में, विकलांगजन के लिए उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वहां डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट काफी ज़ोर पकड़ चुका था। डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट का खासा असर रहा और इससे इतना दबाव बना कि संयुक्त राष्ट्र संघ और दुनिया भर के देशों की सरकारों को सबसे उपेक्षित वर्ग यानी विकलांग वर्ग के लिए पहल करने पर मजबूर होना पड़ा।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट इसलिए अधिक प्रभावशाली हुआ क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में वे सैनिक शामिल थे जो विश्व युद्ध में विकलांग हो गए थे। चूंकि वे युद्ध के नायक थे और जनता उनके साथ थी इसलिए उनकी बातों या मांगों को नज़रअंदाज़ करना सरकार और संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए आसान नहीं था। इसके बावजूद परिणाम सामने आने में दो-तीन दशकों का वक्त लगा और ‘समान अवसर एवं पूर्ण भागीदारी’ पर आधारित कानून और नीतियां सामने आने लगी। ‘समान अवसर एवं पूर्ण भागीदारी’ विकलांगजन का ऐसा अधिकार है जो पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि किसी देश का संपूर्ण तंत्र, सरकार, संस्थाएं और गैर-विकलांग समुदाय विकलांगजन के प्रति अपना दायित्व किस प्रकार निभाते हैं।

भारत की ही मिसाल ले लीजिए जहां संविधान के निर्माताओं को यह एहसास तक नहीं हुआ कि उनसे विकलांग वर्ग की पूर्ण उपेक्षा हो रही है। भारत में विकलांगजन के लिए कानून बनाने का अधिकार केंद्रीय सूची या समवर्ती सूची में न रखते हुए उन्होंने यह काम पूरी तरह राज्यों पर छोड़ दिया। संवेदनशीलता की कमी का नतीजा यह हुआ कि राज्यों द्वारा आधी सदी बीत जाने तक कोई प्रभावी कानून बनाए जाने की जानकारी नहीं है। विकलांगता सम्बंधी अंतर्राष्ट्रीय संधियों या घोषणा पत्रों पर हस्ताक्षर करने के बाद ही संविधान के विशेष प्रावधान का उपयोग करते हुए विकलांगजन के लिए 1995 और 2016 के केंद्रीय कानून लाए गए। लेकिन फिर भी विकलांगजन के लिए कानून बनाने का मुद्दा केंद्रीय या समवर्ती सूची में नहीं जोड़ा गया।

डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट एक अत्यंत महत्वपूर्ण आंदोलन रहा है और इस पर निगाह डालना उचित होगा। यूएसए और अन्य विकसित देशों में यह विशेष रूप से प्रभावी रहा है और इसी का नतीजा है कि भारत सहित विकासशील और पिछड़े देशों में भी विकलांगजन के अधिकारों और कल्याण की बात हो रही है। डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट एक विश्वव्यापी सामाजिक आंदोलन है लेकिन मुख्य रूप से यह यूएसए में जन्मा और पनपा और फिर दुनिया भर में फैल गया। इसका मुख्य लक्ष्य विकलांगजन को जबरन दरकिनार करने के विरुद्ध लड़ाई लड़ना है।

विकलांगजन के अधिकारों के लिए लड़ाई यूएसए में 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में शुरू हो चुकी थी और इसने धीरे-धीरे आकार लिया। लुई ब्रेल और उनके बाद हेलेन केलर ने इस दिशा में व्यक्तिगत तौर पर उल्लेखनीय कार्य किया। धीरे-धीरे स्थानीय और राज्य स्तरीय संगठन अस्तित्व में आए और पहला राष्ट्रीय संगठन – दी नेशनल एसोसिएशन ऑफ दी डेफ (बधिरों के राष्ट्रीय संगठन) – 1880 में स्थापित किया गया। 1930 के दशक में दी सोशल सिक्योरिटी एक्ट (सामाजिक सुरक्षा कानून) में दृष्टिबाधितों और विकलांग बच्चों की सहायता के लिए राज्यों को धनराशि उपलब्ध कराई गई। 1940 के दशक में नेशनल मेंटल हेल्थ एक्ट (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कानून) के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ स्थापित करने की बात कही गई थी और विकलांगजन के अधिकारों के लिए दी अमेरिकन फेडरेशन ऑफ दी फिज़िकली हैंडीकैप्ड (शारीरिक रूप से विकलांगजन संगठन) प्रथम बहु-विकलांगता संगठन के रूप में उभरा।

1950 के दशक में ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के फलस्वरूप डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट ने गति पकड़ी और 1964 के दी सिविल राइट्स एक्ट (नागरिक अधिकार कानून) से इस आंदोलन को नई दिशा मिली। 1970 के दशक में यह मांग भी उठी कि 1972 के रिहैबिलिटेशन एक्ट (पुनर्वास कानून) में विकलांगजन के नागरिक अधिकार शामिल किए जाएं। 1973 में पारित रिहैबिलिटेशन एक्ट में यह मांग पूरी की गई। इस तरह इतिहास में पहली बार विकलांगजन के नागरिक अधिकार कानूनन संरक्षित किए गए। तत्पश्चात सभी विकलांग बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच समान रूप से सुनिश्चित करने के लिए 1975 में दी एजुकेशन फॉर ऑल चिल्ड्रन एक्ट पारित हुआ  (बाद में इसे इंडिविजुअल्स विथ डिसेबिलिटिज़ एजुकेशन एक्ट कहा गया)। एक कदम और आगे बढ़ते हुए 1980 के दशक में यह मांग रखी गई कि अलग-अलग कानूनों/हिस्सों में बंटे हुए प्रावधानों को एकल कानून का रूप दिया जाए। 1990 में अमेरिकंस विद डिसेबिलिटिज़ एक्ट पारित किया गया जिसका उद्देश्य विकलांगता के आधार पर भेदभाव को रोकना है।

भारत के संदर्भ में देखें तो विकलांगजन के अधिकारों को लेकर आंदोलन इतना मज़बूत नहीं रहा है और उनके लिए कानून भी आंदोलन के परिणामस्वरूप और कानून-निर्माताओं की स्वयं की सोच और संवेदनशीलता के कारण नहीं बने। दुर्भाग्यवश बहुत से अन्य देशों की तरह भारत में भी विकलांगजन को अनुपयोगी, अनुत्पादक और बोझ समझा जाता है। भारत में विकलांगजन के अधिकारों के लिए पहला कानून एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकलांगजनों की समानता और पूर्ण भागीदारी की घोषणा के आधार पर बना – नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995। इसका स्थान लेने वाला अगला कानून विकलांगजन के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (सं.रा. विकलांगजन अधिकार संधि – UNCRPD) के आधार पर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के रूप में सामने आया। ये दोनों कानून अंतर्राष्ट्रीय संधि या घोषणा पत्र के पालन के लिए संविधान के अनुच्छेद 253 का उपयोग करते हुए बनाए गए थे। इन दोनों के बीच ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, मेंटल रिटार्डेशन और मल्टीपल डिसेबिलिटी से प्रभावित व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 पारित किया गया।

भारत में डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट की शुरुआत 1970 के दशक से मानी जा सकती है लेकिन आवाज़ उठाने वाले व्यक्ति और संगठन बिखरे हुए थे। उनकी आवाज़ मज़बूत नहीं थी और कमोबेश यही स्थिति आज भी कायम है। 1986 में रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना एक रजिस्टर्ड सोसाइटी के रूप में की गई और एक कानून के ज़रिए 1993 में इसे वैधानिक निकाय का दर्जा दिया गया। लेकिन विकलांगजन के कल्याण और पुनर्वास के लिए तब तक भी कानून का अभाव था। इस बीच मेंटल हेल्थ एक्ट 1987 पारित किया गया, जिसका स्थान मेंटल हेल्थ एक्ट 2017 ने लिया। विकलांगजन के प्रति संवेदनशीलता की कमी इस सच्चाई से भी समझी जा सकती है कि स्वतंत्र भारत में उन्हें शुरू से एक श्रेणी के रूप में राष्ट्रीय जनगणना से बाहर रखा गया। अत्यधिक दबाव पड़ने पर 2001 की जनगणना में उन्हें अलग स्थान दिया गया। तब तक सैंपल सर्वे के माध्यम से उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता रहा।

भारत में 2006 में विकलांगता सम्बंधी राष्ट्रीय नीति लागू की गई। अगली कड़ी के रूप में 2011 में तैयार किए गए विकलांगजन अधिकार विधेयक का उद्देश्य राष्ट्र संघ संधि के तहत भारत के दायित्वों को कानून का रूप देना था। इसे अमली जामा पहनाते हुए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 पारित किया गया। इसमें पूर्ववर्ती कानून में शामिल 7 विकलांगताओं के स्थान पर 21 विकलांगताएं शामिल की गईं।

एक मत यह भी है कि भारत में डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। कुछ व्यक्तियों और संगठनों द्वारा विकलांगजन के लिए अच्छे प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं, लेकिन वे विकलांगजन की वास्तविक आबादी के मान से बहुत ही कम हैं। ग्रामीण इलाके और छोटे कस्बे सेवाओं से पूरी तरह वंचित हैं।

पुनः अमेरिका की बात करें तो पुराने समय में लुई ब्रेल और हेलेन केलर ने जिस जुझारूपन का परिचय दिया, उसी राह पर वहां के आधुनिक समय के कुछ विकलांग भी चल रहे हैं। वे न सिर्फ डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट को नए संदर्भों में आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि विकलांगजन का जीवन आसान और बेहतर बनाने के उल्लेखनीय प्रयास भी कर रहे हैं। इनमें एसिड हमले में अपनी दृष्टि गंवा चुके युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के छात्र रह चुके जोशुआ मिली हैं जो मैकआर्थर ‘जीनियस ग्रांट’ विजेता हैं और अमेज़न जैसी कंपनी में एडाप्टिव टेक्नॉलॉजी विकसित करते हैं ताकि दृष्टिबाधिता और अन्य विकलांगताओं से प्रभावित व्यक्तियों के लिए उपभोक्ता उपकरण उपयोग में लाना सुगम हो जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि विकलांग-अनुकूल उत्पाद उपलब्ध कराने की उम्मीद अब व्यापक स्तर पर सभी उद्योगों से की जाने लगी है। यहीं के एक और छात्र मार्क सटन की कहानी भी इसी तरह प्रेरणादायक है। अपनी दृष्टिबाधिता के कारण उन्हें कंप्यूटर साइंस और वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई में घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ा, लेकिन वे आज एप्पल कंपनी में कार्य करते हुए सॉफ्टवेयर में ऐसे बदलाव लाने और ऐसे समाधान खोजने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं जिनसे दृष्टिबाधितों के लिए कंप्यूटर और मोबाइल फोन जैसे उपकरण वापरना सुगम हो जाए। इन प्रेरक प्रसंगों का परिणाम यह हुआ कि युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के छात्रों का एक नेटवर्क बन गया। इस नेटवर्क के सदस्य अपने-अपने क्षेत्र में अग्रणि रहे हैं और डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट को आगे बढ़ा रहे हैं।

बर्कले ही वह स्थान है जहां डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट की शुरुआत हुई थी। नेशनल फेडरेशन ऑफ दी ब्लाइंड का जन्म भी बर्कले में ही हुआ और नागरिक अधिकार कानून तथा ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन के मुकदमे के लिए आधार भी बर्कले में कानून के एक प्रोफेसर के विश्लेषण से प्राप्त हुआ। संभव है संयुक्त राष्ट्र संघ की पहलों और संयुक्त राष्ट्र संधि के लिए आधार भी अमेरिका और उसके जैसे संवेदनशील और अग्रणि देशों द्वारा विकलांगजन के लिए किए गए कार्यों से मिला हो।

इससे यह बात समझ आती है कि भारत में विकलांगजन को अपने अधिकार तब ही मिलेंगे जब वे और उनके परिजन एकजुट होकर अपनी आवाज़ उठाकर दबाव बनाने में कामयाब होंगे। गौरतलब है कि भारतीय संविधान में संशोधन की भी ज़रूरत है ताकि अंतर्राष्ट्रीय संधियों/घोषणा पत्रों के बगैर भी केंद्रीय स्तर पर विकलांगजन के लिए स्वप्रेरित राष्ट्रीय कानून बनाने का मार्ग खुल जाए। संपूर्ण तंत्र, सरकार, संस्थाओं और गैर-विकलांग समुदाय को विकलांगजन की विशेष आवश्यकताओं के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाना होगा। ऐसी कल्याणकारी योजनाएं बनानी होंगी जो विकलांगजन के लिए वास्तव में लाभकारी हों और उनका पैमाना बढ़ती लागत के साथ बढ़ना चाहिए। राष्ट्र संघ संधि और कानून में काफी कुछ लिखा है, लेकिन संवेदनशीलता और ईमानदारी से क्रियान्वयन होने पर ही उसका लाभ मिलना संभव है। अशिक्षा और गरीबी का उन्मूलन होना चाहिए क्योंकि दोनों एक-दूसरे के कारण और परिणाम हैं। शिक्षित विकलांगजन अधिक जागरूक होकर अधिक प्रभावी ढंग से अपनी आवाज़ उठाने में सक्षम होंगे और शिक्षित समाज विकलांगजन के प्रति अपना दायित्व बेहतर ढंग से समझकर संवेदनशीलता के साथ निभा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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कम बीफ खाने से जंगल बच सकते हैं

हाल ही में हुए एक मॉडलिंग अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगले 30 वर्षों में सिर्फ 20 प्रतिशत बीफ की जगह मांस के विकल्प का उपयोग करने से वनों की कटाई और इससे जुड़े कार्बन उत्सर्जन को आधा किया जा सकता है। ये नतीजे नेचर पत्रिका प्रकाशित हुए हैं।

बीफ के लिए मवेशियों को पालना वनों की कटाई का प्रमुख कारण है। मवेशी मीथेन उत्सर्जन का भी प्रमुख स्रोत हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि बीफ के बदले मांस के विकल्प अपनाने से खाद्य उत्पादन के कारण होने वाला उत्सर्जन कुछ कम हो सकता है, लेकिन यह कोई रामबाण इलाज नहीं है।

पूर्व अध्ययनों में देखा गया था कि बीफ की जगह गैर-मांस विकल्प ‘मायकोप्रोटीन’ अपनाने से पर्यावरण पर लाभकारी प्रभाव पड़ सकते हैं। मायकोप्रोटीन मिट्टी में पाई जाने वाली फफूंद के किण्वन से बनाया जाता है। 1980 के दशक में यू.के. में यह क्वार्न ब्रांड नाम से बिकना शुरू हुआ और अब यह कई देशों में आसानी से उपलब्ध है।

यह अध्ययन बीफ की जगह मायकोप्रोटीन अपनाने से पर्यावरणीय प्रभावों का अनुमान लगाता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एक गणितीय मॉडल का इस्तेमाल किया, जिसमें 2020 से 2050 के बीच जनसंख्या वृद्धि, आय और मवेशियों की मांग में वृद्धि को शामिल किया गया। यदि सब कुछ आज जैसा ही चलता रहा, तो बीफ की खपत में वैश्विक वृद्धि से चराई के लिए चारागाह और मवेशियों के आहार उत्पादन के लिए कृषि भूमि में विस्तार की आवश्यकता होगी। इससे वनों की कटाई की वार्षिक दर दुगनी हो जाएगी। मीथेन उत्सर्जन और कृषि कार्यों के लिए जल उपयोग भी बढ़ जाएगा।

दूसरी ओर, यदि वर्ष 2050 तक 20 प्रतिशत बीफ की जगह मायकोप्रोटीन लें तो मीथेन उत्सर्जन में 11 प्रतिशत कमी आएगी और साल भर में होने वाली वनों की कटाई और उससे सम्बंधित उत्सर्जन आधा रह जाएगा। बीफ की खपत का आधा हिस्सा मायकोप्रोटीन से बदलने पर वनों की कटाई में 80 प्रतिशत की कमी और 80 प्रतिशत तक बदलने से 90 प्रतिशत तक की कमी आएगी।

वैसे बीफ की जगह मांस विकल्प अपनाने से जल उपयोग में मामूली बदलाव ही दिखेंगे क्योंकि जो पानी मवेशियों के आहार उगाने में लगता था अब अन्य फसल उगाने में लगेगा।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसे अध्ययन खाद्य उत्पादन के बेहतर तरीके पता करने में मददगार हो सकते हैं लेकिन यह भी हो सकता है कि मायकोप्रोटीन उत्पादन में अधिक बिजली लगे, इसलिए अतिरिक्त बिजली उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभावों पर भी विचार करना होगा। इसके अलावा बीफ की जगह मायकोप्रोटीन अपनाने का मतलब है कि पशुपालन से मिलने वाले सह-उत्पाद (चमड़ा और दूध) भी वैकल्पिक तरीकों से प्राप्त करना होंगे। ये वैकल्पिक तरीके भी पर्यावरण पर प्रभाव डालेंगे।

सुझाव है कि बीफ को मांस के अन्य विकल्प जैसे प्रयोगशाला में बनाए गए मांस या वनस्पति-आधारित विकल्प से बदलने पर पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को जांचना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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ओज़ोन का ह्रास करने वाला रसायन बढ़ रहा है

हाल की एक रिपोर्ट में स्तब्ध कर देने वाले नतीजे सामने आए हैं। वर्ष 2012 से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले रसायन HCFC-141b के स्तर में वृद्धि देखी गई है जबकि इसका घोषित उत्पादन कम हुआ है।

ये नतीजे पूर्व में उपयोग किए गए इस तरह के रसायनों से छुटकारा पाने की चुनौतियों को रेखांकित करते हैं: भले ही इन रसायनों का उत्पादन थम गया हो लेकिन उपकरणों में ये दशकों तक टिके रह सकते हैं। नतीजे यह भी दर्शाते हैं कि कैसे विभिन्न महाद्वीपों में लगे सेंसर्स के असमान वितरण से उत्सर्जन के स्रोतों को पहचानने में कठिनाई होती है।

HCFC-141b का उपयोग मुख्यत: रेफ्रिजरेटर वगैरह में फोम इन्सुलेशन बनाने में किया जाता था। फ्लोरोकार्बन रसायन ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं। 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत इन रसायनों के उपयोग को धीरे-धीरे बंद करने के प्रयास शुरू किए गए थे। 2000 के दशक की शुरुआत से ओज़ोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों में लगातार कमी आई, और ध्रुवों के ऊपर बना ओज़ोन ‘छिद्र’ भरने लगा।

फिर 2018 में पता चला कि प्रतिबंधित रसायन CFC-11 का स्तर वर्ष 2012 से बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय पैनल का मत था कि यह वृद्धि संभवत: CFC-11 के अवैध उत्पादन के कारण है। अवैध उत्पादन का कारण शायद यह है कि तब CFC-11 के विकल्प HCFC-141b, जो  ओज़ोन को कम नुकसान पहुंचाता है, की आपूर्ति बहुत कम थी। 2019 में एक बार फिर CFC-11 का स्तर गिरने लगा।

चूंकि 2030 तक HCFC-141b के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध के प्रयास 2013 में शुरू हो गए थे, इसलिए अब तक HCFC-141b के उत्पादन में भी गिरावट दिखनी चाहिए थी। अब HCFC-141b की जगह ऐसे रसायनों का उपयोग किया जा रहा है जो ओज़ोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते।

लेकिन वायुमण्डल में तो HCFC-141b का स्तर बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह वृद्धि 2017 से 2021 के बीच हुई है। एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिज़िक्स में ऑनलाइन प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2020 तक HCFC-141b की मात्रा में कुल 3000 टन की वृद्धि हुई है।

नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रशन के स्टीफन मोंट्ज़्का का कहना है कि HCFC-141b में वृद्धि उत्तरी गोलार्ध में कहीं से हो रही है।

एक संभावना यह है कि HCFC-141b का अवैध उत्पादन न हो रहा हो और कबाड़ हो चुके उपकरणों के फोम के विघटन से HCFC-141b निकल रही हो।

दुनिया के विभिन्न इलाकों में वायु सेंसर्स के असमान वितरण के कारण उत्सर्जन का वास्तविक स्रोत पकड़ में नहीं आ रहा है। इस वजह से भारत, रूस, मध्य-पूर्व, अधिकांश अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की स्थिति को लेकर वैज्ञानिक अनभिज्ञ हैं। उम्मीद है कि आने वाले सालों में चीज़ें ज़्यादा स्पष्ट होंगी। CFC-11 में वृद्धि के बाद से युरोपीय संघ द्वारा वित्तपोषित पहल के तहत अधिक सेंसर लगाए जा रहे हैं और सेंसर के असमान वितरण को कम किया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स) 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भीषण गर्मी की चपेट में उत्तरी भारत

मानव गतिविधियों की वजह से हो रहे ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो या अन्यथा, फिलहाल मुद्दा यह है कि उत्तरी भारत औसतन 45 डिग्री सेल्सियस के दैनिक तापमान के साथ भीषण गर्मी की चपेट में है।

ऐसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के वैश्विक पैटर्न में परिवर्तन आएगा और भारत को और अधिक भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार ग्रीष्म लहर (लू) उस स्थिति को कहते हैं जब किसी दिन का तापमान लंबे समय के औसत तापमान से 4.5 से 6.4 डिग्री अधिक होता है (या मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक और तटीय क्षेत्रों में 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो)।

उदाहरण के लिए, दिल्ली में 1981 से 2010 के दौरान मई का औसत उच्च तापमान 39.5 डिग्री सेल्सियस रहा करता था लेकिन वर्तमान में 28 अप्रैल से प्रतिदिन का तापमान 44 डिग्री सेल्सियस है (औसत अधिकतम तापमान से 4.5 डिग्री सेल्सियस अधिक)। ये महज आंकड़े नहीं हैं बल्कि इनका सम्बंध मानव शरीर, जन स्वास्थ्य और जलवायु संकट के इस दौर में शासन व्यवस्था से जुड़ा है।

इस संदर्भ में वेट-बल्ब तापमान महत्वपूर्ण है। वेट-बल्ब तापमान वह न्यूनतम तापमान है जो कोई वस्तु गर्म वातावरण में हासिल कर सकती है जब साथ-साथ उसे पानी के वाष्पन से ठंडा किया जा रहा हो। जब आसपास का वातावरण गर्म हो और वस्तु की सतह से पानी वाष्पित हो रहा हो तो उनके बीच एक साम्य स्थापित होता है और वस्तु के तापमान में कमी आती है। अपनी त्वचा का उदाहरण लीजिए। किसी गर्म दिन में जब आपकी त्वचा की सतह से पसीना वाष्पीकृत होता है तब आपकी त्वचा कम-से-कम जितने तापमान तक ठंडी हो सकती है उसे वेट-बल्ब तापमान कहा जाता है। यह तापमान सिर्फ साधारण तापमापी से नापा गया तापमान नहीं बल्कि वाष्पन की वजह से आई या आ सकने वाली गिरावट को दर्शाता है।

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है। किसी सतह से पानी का वाष्पन सिर्फ तापमान पर निर्भर नहीं करता बल्कि आसपास की हवा में मौजूद नमी की मात्रा पर भी निर्भर करता है। यदि आसपास की हवा बहुत अधिक नम है, तो सतह से पानी का वाष्पन कम होगा और उस वस्तु के तापमान में उतनी कमी नहीं आ पाएगी जितनी शुष्क हवा में आती।

मौसम का अध्ययन करने वाले एक संस्थान मेटियोलॉजिक्स के अनुसार 26 अप्रैल 2022 को सुबह साढ़े आठ बजे दक्षिण दिल्ली का वेट-बल्ब तापमान लगभग 19.5 डिग्री सेल्सियस था जो 29 अप्रैल को बढ़कर 22 डिग्री सेल्सियस हो गया। ये दोनों ही तापमान फिलहाल सुरक्षित सीमा में हैं। लेकिन 32 डिग्री सेल्सियस के वेट-बल्ब तापमान में थोड़ी देर भी बाहर रहना हानिकारक हो सकता है। वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो, तो पर्याप्त पानी पीने और कोई शारीरिक कार्य किए बगैर भी कुछ घंटे बाहर छाया में गुज़ारना तक जानलेवा हो सकता है।

एशिया के मौसम मानचित्र में दिखेगा कि वेट-बल्ब तापमान भूमध्य रेखा की ओर जाने पर काफी तेज़ी से बढ़ता है और साथ ही भारत के पश्चिमी तट की तुलना में पूर्वी तट पर अधिक होता है। यह मुख्य रूप से नमी के कारण होता है। वातावरण में जितनी अधिक नमी होगी, उतना ही कम पसीना वाष्पित हो पाएगा और शरीर भी उतना ही कम ठंडा हो पाएगा। इसलिए किसी क्षेत्र में मात्र हवा का तापमान जानना पर्याप्त नहीं होता बल्कि आर्द्रता और वेट-बल्ब की रीडिंग भी महत्वपूर्ण है।

2020 में कोलंबिया युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि पृथ्वी की सतह के कई हिस्सों में गर्मी और आर्द्रता के कारण स्थिति जानलेवा बन चुकी है जबकि पहले ऐसा माना जा रहा था कि यह स्थिति सदी के अंत में आएगी। शोधकर्ताओं द्वारा 1979 से 2017 तक एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार पूर्वी तटवर्ती और उत्तर-पश्चिमी भारत पर सबसे अधिक वेट-बल्ब तापमान होने की संभावना है।

ज़्यादा व्यापक स्तर पर देखें तो मध्य अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका, मध्य-पूर्व, उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी भारत तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में अधिकतम वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक 2010 में ही पहुंच चुका है।     

ग्लोबल वार्मिंग से न सिर्फ तापमान में बढ़ोतरी हो रही है बल्कि समुद्र स्तर में भी वृद्धि हो रही है। इन दोनों समस्याओं के चलते भारत के कई क्षेत्र रहने योग्य नही रह जाएंगे। कब और कौन-से क्षेत्र निर्जन होंगे यह कई कारकों पर निर्भर करता है।   

गौरतलब है कि भारत के प्रभावित क्षेत्र में कई ऐसे राज्य शामिल हैं जहां जन स्वास्थ्य व्यवस्था कमज़ोर और अपर्याप्त है, तथा चिकित्सा कर्मियों की कमी है। इन राज्यों की आय भी बहुत कम है और अधिकांश निवासी बाहरी काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर हैं और बहुत कम सुविधाओं के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। इन गर्म हवाओं के दौरान बाहर काम करना उनके लिए काफी जोखिम भरा होगा। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जलवायु परिवर्तन में जिस समूह का समसे कम योगदान हैं उसे इसका सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।      

इस समस्या के समाधान के लिए ‘हीट एक्शन प्लान’ तैयार किया गया है जिसको सबसे पहले 2013 में अहमदाबाद में अपनाया गया था। तब से लेकर अब तक 30-40 शहर इस योजना को अपना चुके हैं जिसमें जागरूकता अभियान, चेतावनी प्रणाली और शीतलन व्यवस्था की स्थापना तथा कमज़ोर वर्गों में गर्मी के जोखिम को कम करने के प्रयास किए गए हैं। देखा जाए तो गर्मी के शहरी टापू जैसे प्रभाव के कारण शहरी क्षेत्रों की गर्म हवाएं और भी घातक हो गई हैं। ये प्रयास सराहनीय हैं लेकिन पर्याप्त नहीं हैं। गर्म हवाओं की बात करते हुए आर्द्रता को शामिल करना अनिवार्य है क्योंकि वह वेट-बल्ब तापमान में वृद्धि करती है।  

फिलहाल, आईपीसीसी के अनुसार भारत में वेट-बल्ब तापमान शायद ही 30 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा है लेकिन इसमें जल्द ही परिवर्तन की संभावना है। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे दूर स्थित मंदाकिनी की खोज – प्रदीप

ब्रह्मांड की गुत्थियों को सुलझाने में जुटे खगोल शास्त्रियों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने हाल ही में अब तक की सबसे दूर स्थित मंदाकिनी को खोजने का दावा किया है। धरती से तकरीबन 13.5 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित इस मंदाकिनी को खोजकर्ताओं ने एचडी1 नाम दिया है। यह अब तक खोजी गई सबसे दूर स्थित मंदाकिनी जीएन-ज़ेड11 से भी 10 करोड़ प्रकाश वर्ष ज़्यादा दूर है। इस खोज के नतीजे दी एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं।

इस मंदाकिनी से हम तक पहुंचने वाला प्रकाश तब निकला था जब ब्रह्मांड महज 30 करोड़ साल पुराना था। यह 13.8 अरब वर्ष पहले हुए बिग बैंग के बाद अस्तित्व में आने वाली शुरुआती मंदाकिनियों में से एक है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति व विकास को लेकर हमारी मौजूदा समझ को भी बदल सकती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक एचडी1 मंदाकिनी इतनी पुरानी और दूर है कि इसमें सिर्फ धूल और गैस के गुबार ही दिखाई देते हैं। शुरुआती ब्रह्मांड में चारों ओर धूल और गैस ही बिखरी हुई थी। बिग बैंग के कुछ करोड़ सालों के बाद ही ब्रह्मांड की शुरुआती मंदाकिनियां बनी थीं। ये मंदाकिनियां आकार-प्रकार में हमारी मंदाकिनी (आकाशगंगा) से हज़ारों गुना ज़्यादा विशाल थीं। इन शुरुआती मंदाकिनियों का मूल काम आज की मंदाकिनियों के निर्माण का था। इसलिए आज ब्रह्मांड में मौजूद समस्त मंदाकिनियां इन्हीं शुरुआती मंदाकिनियों से बनी हुई हैं और हमारी आकाशगंगा भी संभवत: इन्हीं से बनी हुई हो।

हारवर्ड एंड स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिज़िक्स के वरिष्ठ खगोल-भौतिकविद फैबियो पैकूची के मुताबिक एचडी1 पराबैंगनी प्रकाश में बेहद चमकीली दिखाई देती है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां कुछ ऊर्जावान प्रक्रियाएं हो रही हैं या फिर अरबों साल पहले हो चुकी हैं।

शुरू में खगोलशास्त्रियों को लगा कि एचडी1 बेहद अधिक रफ्तार से तारों का निर्माण कर रही स्टारबर्स्ट मंदाकिनी है। गणना करने पर पता चला कि एचडी1 हर साल 100 से ज़्यादा तारों का निर्माण कर रही थी। यह सामान्य स्टारबर्स्ट मंदाकिनियों की तुलना में भी 10 गुना अधिक है। तब खगोल शास्त्रियों की टीम को संदेह हुआ कि एचडी1 रोज़ाना सामान्य रूप से तारों का निर्माण नहीं कर रही है। एचडी1 से हम तक आने वाला प्रकाश भी दुविधा में डालने वाला है।

खगोल शास्त्रियों की टीम ने इस खोज को लेकर दो संभावनाएं प्रस्तुत की हैं। पहला यह कि संभवत: एचडी1 आश्चर्यजनक दर से तारों का निर्माण कर रही है और हो सकता है कि ये ब्रह्मांड के उन शुरुआती तारों में से हो, जिन्हें अब तक नहीं देखा गया था। दूसरा यह कि एचडी1 के अंदर सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 10 करोड़ गुना बड़ा अतिविशाल ब्लैक होल हो सकता है। लेकिन, अगर इस मंदाकिनी में ब्लैक होल हुआ तो यह ब्रह्मांड के उन मॉडल्स के लिए चुनौती वाली जानकारी होगी जो ब्लैक होल के निर्माण और विकास की व्याख्या करते हैं। क्योंकि उनकी व्याख्या के उलट इस अतिविशाल ब्लैक होल का निर्माण व विकास ब्रह्मांड के विकास के इतिहास में बहुत ही जल्दी हो गया होगा। बिग बैंग के तुरंत बाद इतने विशाल ब्लैक होल का बनना ब्रह्मांड सम्बंधी हमारे वर्तमान मॉडल के लिए एक चुनौती है।

हालांकि अगर हम यह मान लें कि एचडी1 ब्रह्मांड में बनने वाले शुरुआती तारों या ‘पॉपुलेशन 3’ के वर्ग का है तो इसके गुणों को ज़्यादा आसानी से समझाया जा सकता है। ब्रह्मांड में बनने वाले तारों की पहली आबादी वर्तमान तारों की तुलना में अधिक विशाल, अधिक चमकदार और गर्म थी। वास्तव में पॉपुलेशन 3 के तारे सामान्य तारों की तुलना में अधिक प्रकाश उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। हो सकता है कि इसी वजह से एचडी1 पराबैंगनी प्रकाश में ज़्यादा तेज़ी से चमक रही हो।

पैकूची के अनुसार इतनी दूर स्थित स्रोत की प्रकृति के सवालों का सही जवाब देना चुनौतीपूर्ण काम है। यहां तक कि अत्यधिक चमकीले पिंड क्वासर्स का प्रकाश भी इतनी लंबी यात्रा के बाद इतना धुंधला हो जाता है कि हमारी शक्तिशाली दूरबीनों को भी उस पकड़ने में बहुत कठिनाई होती है। शुरुआती ब्रह्मांड के पिंडों की पड़ताल करना बहुत ही मुश्किल काम है।

एचडी1 को सुबारू दूरबीन, विस्टा दूरबीन, यूके इन्फ्रारेड दूरबीन और स्पिट्ज़र अंतरिक्ष दूरबीन का इस्‍तेमाल करके लगभग 1200 घंटे के अवलोकनों के बाद खोजा गया। खगोल शास्त्रियों का कहना है कि सात लाख खगोलीय पिंडों के बीच में एचडी1 की खोज करना बहुत चुनौतीपूर्ण काम था। जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन का इस्तेमाल करते हुए खगोलशास्त्रियों की टीम जल्दी ही एक बार फिर से धरती से दूरी की पुष्टि करने के लिए एचडी1 का अवलोकन करेगी। अगर मौजूदा गणना सही साबित होती है, तो एचडी1 अब तक रिकॉर्ड की गई सबसे दूर स्थित और सबसे पुरानी मंदाकिनी होगी। (स्रोत फीचर्स)

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गाजर घास के लाभकारी नवाचारी उपयोग – डॉ. खुशाल सिंह पुरोहित

पिछले दिनों इंदौर के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार पाटीदार ने गाजर घास से बायोप्लास्टिक बनाने में सफलता प्राप्त की है। 

इंदौर के महाराजा रणजीत सिंह कॉलेज ऑफ प्रोफेशनल साइंसेज़ के बायोसाइंस विभाग के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार पाटीदार ने जुलाई 2020 में गाजर घास से बायोप्लास्टिक बनाने की कार्ययोजना पर काम शुरू किया था। इस कार्य में उन्हें भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान इंदौर की प्राध्यापक अपूर्वा दास और शोधार्थी शाश्वत निगम का भी सहयोग मिला। गाजर घास के रेशों से बायोप्लास्टिक बनाया गया, जो सामान्य प्लास्टिक जैसा ही मज़बूत हैं। डॉ. पाटीदार के अनुसार पर्यावरण पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा और 45 दिनों में यह 80 प्रतिशत तक नष्ट भी हो जाएगा। बाज़ार में वर्तमान में उपलब्ध बायोप्लास्टिक से इसका मूल्य भी कम होगा।  

बरसात का मौसम शुरू होते ही गाजर जैसी पत्तियों वाली एक वनस्पति काफी तेज़ी से फैलने लगती है। सम्पूर्ण संसार में पांव पसारने वाला कम्पोज़िटी कुल का यह सदस्य वनस्पति विज्ञान में पार्थेनियम हिस्ट्रोफोरस के नाम से जाना जाता है और वास्तव में घास नहीं है। इसकी बीस प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं। यह वर्तमान में विश्व के सात सर्वाधिक हानिकारक पौधों में से एक है, जो मानव, कृषि एवं पालतू जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ सम्पूर्ण पर्यावरण के लिये अत्यधिक हानिकारक है।

कहा जाता है कि अर्जेन्टीना, ब्राज़ील, मेक्सिको एवं अमरीका में बहुतायत से पाए जाने वाले इस पौधे का भारत में 1950 के पूर्व कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसा माना जाता है कि इस ‘घास’ के बीज 1950 में पी.एल.480 योजना के तहत अमरीकी संकर गेहूं के साथ भारत आए। आज यह ‘घास’ देश में लगभग सभी क्षेत्रों में फैलती जा रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, म.प्र. एवं महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्यों के विशाल क्षेत्र में यह ‘घास’ फैल चुकी है।

तीन से चार फुट तक लंबी इस गाजर घास का तना धारदार तथा पत्तियां बड़ी और कटावदार होती है। इस पर फूल जल्दी आ जाते हैं तथा 6 से 8 महीने तक रहते हैं। इसके छोटे-छोटे सफेद फूल होते हैं, जिनके अंदर काले रंग के वज़न में हल्के बीज होते हैं। इसकी पत्तियों के काले छोटे-छोटे रोमों में पाया जाने वाला रासायनिक पदार्थ पार्थेनिन मनुष्यों में एलर्जी का मुख्य कारण है। दमा, खांसी, बुखार व त्वचा के रोगों का कारण भी मुख्य रूप से यही पदार्थ है। गाजर घास के परागकण का सांस की बीमारी से भी सम्बंध हैं।

पशुओं के लिए भी यह घास अत्यन्त हानिकारक है। इसकी हरियाली के प्रति लालायित होकर खाने के लिए पशु इसके करीब तो आते हैं, लेकिन इसकी तीव्र गंध से निराश होकर लौट जाते हैं।

गाजर घास के पौधों में प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है। जब यह एक स्थान पर जम जाती है, तो अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को विकसित नहीं होने देती है। वनस्पति जगत में यह ‘घास’ एक शोषक के रूप में उभर रही है। गाजर घास के परागकण वायु को दूषित करते हैं तथा जड़ो से स्रावित रासायनिक पदार्थ इक्यूडेर मिट्टी को दूषित करता है। भूमि-प्रदूषण फैलाने वाला यह पौधा स्वयं तो मिट्टी को बांधता नहीं है, दूसरा इसकी उपस्थिति में अन्य प्रजाति के पौधे भी शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।

गाजर घास का उपयोग अनेक प्रकार के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और खरपतवार नाशक दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। इसकी लुगदी से विभिन्न प्रकार के कागज़ तैयार किए जाते हैं। बायोगैस उत्पादन में भी इसको गोबर के साथ मिलाया जाता है। पलवार के रूप में इसका ज़मीन पर आवरण बनाकर प्रयोग करने से दूसरे खरपतवार की वृद्धि में कमी आती है, साथ ही मिट्टी में अपरदन एवं पोषक तत्व खत्म होने को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जैव-रसायन  विभाग के डॉ. के. पांडे ने इस पर अध्ययन के बाद बताया कि गाजर घास में औषधीय गुण भी हैं। इससे बनी दवाइयां बैक्टीरिया और वायरस से होने वाले विभिन्न रोगों के इलाज में कारगर हो सकती हैं।

पिछले वर्षों में गाजर घास का एक अन्य उपयोग वैज्ञानिकों ने खोजा है जिससे अब गाजर घास का उपयोग खेती के लिए विशिष्ट कम्पोस्ट खाद निर्माण में किया जा रहा है। इससे एक ओर, गाजर घास का उपयोग हो सकेगा वहीं दूसरी ओर किसानों को प्राकृतिक

पोषक तत्व (प्रतिशत में)गाजर घास खादकेंचुआ खादगोबर खाद
नाइट्रोजन1.051.610.45
फॉस्फोरस10.840.680.30
पोटेशियम1.111.310.54
कैल्शियम0.900.650.59
मैग्नीशियम0.550.430.28

और सस्ती खाद उपलब्ध हो सकेगी। उदयपुर के सहायक प्राध्यापक डॉ. सतीश कुमार आमेटा ने गाजर घास से विशिष्ट कम्पोस्ट खाद का निर्माण किया है। इस तकनीक से बनी खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम की मात्रा साधारण खाद से तीन गुना अधिक होती है, जो कृषि के लिए एक वरदान है। मेवाड़ युनिवर्सिटी गंगरार चित्तौड़गढ़ में कार्यरत डॉ. आमेटा के अनुसार इस नवाचार से गाजर घास के उन्मूलन में सहायता मिलेगी और किसानों को जैविक खाद की प्राप्ति सुगम हो सकेगी।

जैविक खाद बनाने की इस तकनीक में व्यर्थ कार्बनिक पदार्थों, जैसे गोबर, सूखी पत्तियां, फसलों के अवशेष, राख, लकड़ी का बुरादा आदि का एक भाग एवं चार भाग गाजर घास को मिलाकर बड़ी टंकी या टांके में भरा जाता है। इसके चारों ओर छेद किए जाते हैं, ताकि हवा का प्रवाह समुचित बना रहे और गाजर घास का खाद के रूप में अपघटन शीघ्रता से हो सके। इसमें रॉक फॉस्फेट एवं ट्राइकोडर्मा कवक का उपयोग करके खाद में पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। निरंतर पानी का छिडकाव कर एवं मिश्रण को निश्चित अंतराल में पलट कर हवा उपलब्ध कराने पर मात्र 2 महीने में जैविक खाद का निर्माण किया जा सकता है।

गाजर घास से बनी कम्पोस्ट में मुख्य पोषक तत्वों की मात्रा गोबर खाद से दुगनी होती है। गाजर घास की खाद, केंचुआ खाद और गोबर खाद की तुलना तालिका में देखें। स्पष्ट है कि तत्वों की मात्रा गाजर घास से बने खाद में अधिक होती है। गाजर घास कम्पोस्ट एक ऐसी जैविक खाद है, जिसके उपयोग से फसलों, मनुष्यों व पशुओं पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन से वायरल प्रकोपों में वृद्धि की संभावना

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से अगले 50 वर्षों में स्तनधारी जीवों के बीच वायरस संचरण के 15,000 से अधिक नए मामले सामने आ सकते हैं। ऐसा अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग से वन्यजीवों के प्राकृतवासों में परिवर्तन होगा जिससे रोगजनकों की अदला-बदली करने में सक्षम प्रजातियों के आपस में संपर्क की संभावना बढ़ेगी और वायरस संचरण के मामलों में वृद्धि होगी। इस अध्ययन से यह भी देखा जा सकेगा कि कोई वायरस विभिन्न प्रजातियों के बीच संभवतः कितनी बार छलांग लगा सकता है।

गौरतलब है कि कोविड-19 महामारी की शुरुआत एक कोरोनावायरस के किसी जंगली जीव से मनुष्यों में प्रवेश के साथ हुई थी। प्रजातियों के बीच ऐसे संक्रमणों को ज़ुओनॉटिक संचरण कहते हैं। यदि प्रजातियों के बीच संपर्क बढ़ता है तो ऐसे ज़ुओनॉटिक संचरणों में भी वृद्धि होगी जो मनुष्यों व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा होगा। ऐसे में सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को रोगजनकों की निगरानी और स्वास्थ्य-सेवा के बुनियादी ढांचे में सुधार करना ज़रूरी है।

अध्ययन का अनुमान है कि नए वायरस के संचरण की संभावना सबसे अधिक तब होगी जब बढ़ते तापमान के कारण जीवों का प्रवास ठंडे क्षेत्रों की ओर होगा और वे स्थानीय जीवों के संपर्क में आएंगे। यह संभावना ऊंचाई वाले क्षेत्रों और विभिन्न प्रजातियों से समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्रों में सबसे अधिक होगी। ऐसे क्षेत्र विशेष रूप से अफ्रीका और एशिया में पाए जाते हैं जिनमें मुख्य रूप से सहेल, भारत और इंडोनेशिया जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र शामिल हैं। कुछ जलवायु विशेषज्ञों का मत है कि यदि पृथ्वी का तापमान पूर्व-औद्योगिक तापमान से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा तो प्रजातियों के बीच प्रथम संपर्क की घटनाएं वर्ष 2070 तक दुगनी हो जाएंगी। ऐसे क्षेत्र वायरस संक्रमण के हॉटस्पॉट बन जाएंगे।

इस अध्ययन के लिए जॉर्जटाउन युनिवर्सिटी के रोग विशेषज्ञ ग्रेगोरी अल्बेरी और उनके सहयोगियों ने एक मॉडल विकसित किया और लगभग 5 वर्षों तक कई अनुकृतियों के साथ परीक्षण किए। जलवायु-परिवर्तन के विभिन्न परिदृश्यों में वायरस संचरण और प्रजाति-वितरण के मॉडल्स को जोड़कर देखा। प्रजाति-वितरण मॉडल की मदद से यह बताया जा सकता है कि पृथ्वी के गर्म होने की स्थिति में स्तनधारी जीव किस क्षेत्र में प्रवास कर सकते हैं। दूसरी ओर, वायरस-संचरण मॉडल से यह देखा जा सकता कि प्रथम संपर्क होने पर प्रजातियों के बीच वायरस के छलांग लगाने की क्या संभावना होगी।

गौरतलब है कि इस तरह के पूर्वानुमान लगाने के लिए कभी-कभी अवास्तविक अनुमानों को शामिल करना होता है। जैसे एक अनुमान यह भी लगाना पड़ा कि जलवायु परिवर्तन के चलते प्रजातियां कितनी दूर तक फैल सकती हैं। लेकिन यह अनुमान लगाना मुश्किल था कि स्तनधारी जीव अपने मूल आवास के साथ कितना अनुकूलित हो जाएंगे या उन्हें भौगोलिक बाधाएं पार करने में कितनी मुश्किल होगी। ये दोनों बातें प्रवास को प्रभावित करेंगी।

इस अध्ययन में चमगादड़ों पर विशेष ध्यान दिया गया। चमगादड़ वायरसों के भंडार के रूप में जाने जाते हैं और कुल स्तनधारियों में लगभग 20 प्रतिशत चमगादड़ हैं। इसके अलावा चमगादड़ उड़ने में भी सक्षम होते हैं इसलिए उन्हें प्रवास में कम बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

हालांकि कई विशेषज्ञों ने इस अध्ययन की सराहना की है लेकिन साथ ही उन्होंने इसके आधार पर मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों का निष्कर्ष निकालने को लेकर चेतावनी भी दी है। स्तनधारी जीवों से मनुष्यों में वायरस की छलांग थोड़ा पेचीदा मसला है क्योंकि यह एक जटिल पारिस्थितिकी और सामाजिक-आर्थिक वातावरण में होता है। इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवा में सुधार या किसी वजह से वायरस द्वारा मनुष्यों के संक्रमित न कर पाना जैसे कारक मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले जोखिम को कम कर सकते हैं। फिर भी शोधकर्ता इस विषय में जल्द से जल्द ठोस कार्रवाई के पक्ष में हैं। देखा जाए तो पृथ्वी पहले से ही पूर्व-औद्योगिक तापमान से 1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है जिसके नतीजे में विभिन्न प्रजाति के जीवों में प्रवास और रोगाणुओं की अदला-बदली जारी है। सुझाव है कि खासकर दक्षिण पूर्वी एशिया के जंगली जीवों और ज़ुओनॉटिक रोगों की निगरानी की प्रक्रिया को तेज़ करना चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार लाना भी आवश्यक है। (स्रोत फीचर्स) 

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