दौलतसिंग सिंह तंवर

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल मानव मस्तिष्क को समझने की जिस खोज के लिए मिला है, उसकी शुरुआत किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि पोखर के एक नन्हे शैवाल से हुई थी। यह पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों, कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागल को दिया गया। उन्हें ‘प्रकाश से खुलने व बंद होने वाले आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों’ के लिए सम्मानित किया गया है। यह कहानी एक ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल से शुरू होती है, जिसे हम सामान्यतः किसी ठहरे हुए पानी में हरे रंग की परत के रूप में देखकर आगे बढ़ जाते हैं; उस शैवाल का नाम है क्लैमायडोमोनास।
समिति ने कहा है कि इस कार्य ने तंत्रिका विज्ञान के एक नए युग की आधारशिला रखी है।
मस्तिष्क की पुरानी पहेली

इस खोज का महत्व समझने के लिए पहले मस्तिष्क की मूल समस्या को समझना होगा। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं। हर न्यूरॉन हज़ारों अन्य न्यूरॉन्स से जुड़ा होता है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के सहारे आपस में संवाद करती हैं; हमारा सोचना, याद रखना, डरना, प्रेम करना, चलना और सोना, सब इसी संवाद का परिणाम है।
समस्या यह थी कि इन कोशिकाओं के संवाद को समझा कैसे जाए? वैज्ञानिक पहले इलेक्ट्रोड डालकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापते थे। इससे यह तो पता चलता था कि कोई गतिविधि हो रही है, लेकिन इलेक्ट्रोड से उद्दीपन देने पर आसपास की सैकड़ों किस्म की कोशिकाएं एक साथ प्रभावित हो जाती थीं। ऐसे में किसी विशिष्ट न्यूरॉन की सक्रियता को देख पाना मुश्किल था।
नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक ने 1979 में ही इस चुनौती की ओर संकेत किया था कि तंत्रिका विज्ञान की सबसे बड़ी आवश्यकता बाकी सबको अछूता छोड़कर किसी एक विशेष प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करने की विधि है। उन्होंने यह अनुमान भी लगाया था कि इसके लिए शायद प्रकाश एक उपयोगी साधन बन सकता है। परंतु उस समय किसी को नहीं पता था कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए। उत्तर बीस वर्ष से अधिक बाद आया और वह भी पादप और शैवाल विज्ञान की जिज्ञासा से।
एक–कोशिकीय हरित शैवाल
क्लैमायडोमोनास वंश की सबसे प्रसिद्ध प्रजाति क्लैमायडोमोनास राइनहार्टी का उपयोग एक मॉडल जीव के रूप में उपयोग होता रहा है। इस एक-कोशिकीय जीव की लंबाई मनुष्य के बाल की मोटाई की आधे से भी कम होती है। इसकी कोशिका में प्याले के आकार का एक हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) होता है जिसमें क्लरोफिल पाया जाता है। यह जीव अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण से बनाता है।
इसके अग्र-भाग में दो चाबुक जैसी पतली पूंछें (कशाभिकाएं – फ्लैजेला) होती हैं जिनकी मदद से यह जीव पानी में तैरता है। इसके जीवन का संघर्ष सीधा है, धूप बहुत कम हो तो भोजन नहीं बनेगा और बहुत तेज़ हो तो क्लोरोफिल को क्षति पहुंचेगी; इसलिए यह जीव प्रकाश की तीव्रता को परखकर कभी उसकी ओर बढ़ता है, तो कभी उससे दूर भागता है। इस व्यवहार को प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।
इस काम के लिए क्लैमायडोमोनास की कोशिका में एक छोटा-सा नारंगी-लाल धब्बा (नेत्रबिंदु) होता है, यह हरितलवक के भीतर स्थित कई वर्णकों की परतों से बनी एक संरचना है। नेत्रबिंदु यह पहचानने में मदद करता है कि प्रकाश किस दिशा से आ रहा है।
वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न यह था कि यह एक-कोशिकीय जीव प्रकाश को भांपकर अपनी कशाभिकाओं को आदेश कैसे देता है। इस प्रश्न के पीछे कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। यह तो मूलभूत जिज्ञासा थी।
नेत्रबिंदु का रहस्य और पीटर हेगेमान
1980 के दशक में यह संकेत मिला कि क्लैमायडोमोनास में प्रकाश भांपने वाला अणु रोडॉप्सिन परिवार का कोई प्रोटीन हो सकता है। रोडॉप्सिन ही हमारी आंख के रेटिना में प्रकाश को भांपता है।
उस समय मैक्स प्लांक जैव रसायन संस्थान में कार्यरत जर्मन वैज्ञानिक पीटर हेगेमान और उनके सहयोगियों ने 1990 के दशक के आरंभ में दिखाया कि नेत्रबिंदु पर प्रकाश पड़ने के कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर कोशिका में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यह गति असाधारण थी। यदि कोई लंबी रासायनिक शृंखला होती, तो प्रतिक्रिया इतनी त्वरित नहीं होती। यानी प्रकाश-ग्राही प्रोटीन सीधे विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।
हेगेमान ने पाया कि नेत्रबिंदु में एक विशेष प्रोटीन है, जो नीले प्रकाश को विद्युत संकेत में बदल देता है। यह विद्युत संकेत जीव को प्रकाश की ओर तैरने के लिए प्रेरित करता है। पर प्रोटीन की सही पहचान, उसके जीन को खोजना, उसे पृथक करना और यह सिद्ध करना कि वही प्रकाश से विद्युत धारा बनाता है, यह सब आसान नहीं था।

जॉर्ज नागल – चैनल–रोडॉप्सिन की खोज
जॉर्ज नागल, उन दिनों फ्रैंकफर्ट के मैक्स प्लांक जैव-भौतिकी संस्थान में कार्यरत थे और आज वुर्त्सबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। नागल कोशिका झिल्ली में आयनों (सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे आयनों) के आवागमन के अध्येता थे। जहां हेगेमान शैवाल और प्रकाश-संवेदन के

विशेषज्ञ थे वहीं नागल के पास थी आयन चैनलों के विद्युतीय अध्ययन

की पद्धति पर महारत। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में क्लैमायडोमोनास के जीन अनुक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने के साथ उन्होंने ऐसे जीन खोजे जो रोडॉप्सिन से मिलते-जुलते प्रोटीन बनाते थे।
2002 में उन्होंने पहले प्रोटीन चैनल-रोडॉप्सिन-1 का वर्णन किया। अगले वर्ष, 2003 में, दूसरे प्रोटीन, चैनल-रोडॉप्सिन-2, की विशेषताएं सामने आईं। यह प्रोटीन अधिक उपयोगी निकला। जब इस प्रोटीन्स के जीन को मेंढक के अंडाणुओं और मानव भ्रूणीय वृक्क कोशिकाओं में डालकर इन कोशिकाओं पर नीला प्रकाश डाiला गया, तो झिल्ली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगी। प्रकाश हटाते ही धारा रुक गई।
इस खोज की मूल बात यह थी कि यह प्रोटीन दो काम एक साथ करता है। वह प्रकाश का ग्राही भी है और आयन चैनल भी।
इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी जटिल रासायनिक शृंखला की आवश्यकता नहीं थी। यह एक ही प्रोटीन, एक ही स्विच था। यही कारण है कि इसकी गति इतनी तेज़ थी, क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं भी मिलीसेकंड की गति से काम करती हैं। यह प्रोटीन किसी भी कोशिका को प्रकाश से खोलने की संभावना लेकर आया।
कार्ल डाइसरॉथ – तंत्रिका विज्ञान का प्रवेश
अब तक की खोज वनस्पति विज्ञान और जैव भौतिकी की थी। इसे तंत्रिका विज्ञान और चिकित्सा तक पहुंचाने का श्रेय बहुत हद तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जैव-अभियांत्रिकी और मनोचिकित्सा के प्रोफेसर कार्ल डाइसरॉथ को जाता है। उनको लगता था कि अवसाद, दुश्चिंता और सामाजिक व्यवहार जैसे विकारों के पीछे के तंत्रिका परिपथों को हम कितना कम जानते हैं। मनोचिकित्सा की अधिकांश दवाइयां पूरे मस्तिष्क पर असर डालती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में किन कोशिकाओं पर क्या असर होता है।

2000 के दशक के मध्य में डाइसरॉथ और उनके साथियों ने सोचा कि यदि चैनल-रोडॉप्सिन को किसी जीवित जंतु के विशेष न्यूरॉन्स में पहुंचा दिया जाए, तो उन्हीं न्यूरॉनों को प्रकाश से सक्रिय किया जा सकता है। वर्ष 2005 में उनकी प्रयोगशाला ने प्रदर्शित किया कि चूहे के न्यूरॉन्स में चैनल-रोडॉप्सिन-2 को अभिव्यक्त कराने पर नीले प्रकाश की एक चमक से न्यूरॉन मिलीसेकंड की सटीकता से विद्युत आवेग उत्पन्न करने लगते हैं।
इसके बाद के वर्षों में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने इस तकनीक को बहुत आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसे प्रकाशीय तंतु विकसित किए जिन्हें चूहे के मस्तिष्क में गहराई तक पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने चैनल-रोडॉप्सिन के साथ-साथ ऐसे प्रोटीन भी शामिल किए जो प्रकाश पड़ने पर कोशिका को शांत कर देते हैं। इससे वैज्ञानिक अब किसी न्यूरॉन को चालू भी कर सकते थे और बंद भी। इसी पूरी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स नाम मिला।
ऑप्टोजेनेटिक्स काम कैसे करता है इसे सरल भाषा में तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण – चैनल-रोडॉप्सिन का जीन किसी हानिरहित वायरस में रखते हैं और उसे जंतु के मस्तिष्क के किसी निश्चित क्षेत्र में पहुंचाते हैं। वायरस जीन को न्यूरॉन्स के भीतर पहुंचा देता है।
दूसरा चरण – कोशिका का चयन। वैज्ञानिक ऐसी आनुवंशिक युक्तियां लगाते हैं कि चैनल-रोडॉप्सिन केवल चुनिंदा कोशिकाओं में बने, बाकी कोशिकाओं में यह प्रोटीन बनता ही नहीं।
तीसरा चरण – मस्तिष्क में एक बारीक प्रकाशीय तंतु प्रविष्ट कराया जाता है। प्रकाश का स्विच दबाते ही केवल वे विशेष न्यूरॉन सक्रिय होते हैं जिनमें चैनल-रोडॉप्सिन मौजूद है। प्रकाश हटाते ही वे शांत हो जाते हैं।
यानी अब उन कोशिकाओं को सक्रिय करके देखा जा सकता है कि क्या कोई व्यवहार सचमुच उन्हीं से उत्पन्न होता है।
प्रयोगशाला से मिली नई समझ
ऑप्टोजेनेटिक्स ने पिछले डेढ़ दशक में तंत्रिका विज्ञान को बदल दिया। कुछ उदाहरण इसकी व्यापकता दिखाते हैं। स्मृति के अध्ययन में चूहों पर ऐसे प्रयोग हुए जिनमें किसी विशेष याद से जुड़ी कोशिकाओं को चिन्हित किया गया और बाद में प्रकाश डालकर उन्हीं को सक्रिय किया गया। परिणामस्वरूप जंतु ने वह भय-स्मृति पुनः जी ली, जबकि वह उस स्थान पर था ही नहीं। इससे यह धारणा पुष्ट हुई कि स्मृतियां कोशिकाओं के विशिष्ट समूहों में अंकित होती हैं। पार्किंसन रोग के अध्ययन में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने मस्तिष्क के उन विशेष मार्गों को पहचाना जिनके उद्दीपन से जंतु की गति में सुधार होता है। यह जानकारी कई उपचार विधियों को बेहतर बनाने में उपयोगी रही।
स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक रोगियों के काम आ सकती है। हालांकि इस तकनीक के चिकित्सकीय उपयोग की दिशा में कुछ आरंभिक प्रयास हुए हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। सबसे उल्लेखनीय प्रयास दृष्टि लौटाने से जुड़ा है। कुछ आनुवंशिक रोगों, जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में, आंख के रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति पूरी तरह दृष्टिहीन हो जाता है। पर रेटिना की भीतरी परतों की कुछ कोशिकाएं फिर भी बची रहती हैं। विचार यह है कि इन बची हुई कोशिकाओं में प्रकाश-संवेदी प्रोटीन का जीन पहुंचाकर उन्हें ही नया प्रकाश-ग्राही बना दिया जाए। 2021 में एक मरीज़ के उपचार की रिपोर्ट आई थी।
चिकित्सा क्षेत्र में सीमाएं
हर नई तकनीक की तरह ऑप्टोजेनेटिक्स की भी सीमाएं हैं; पहली सीमा यह है कि इसमें जीन उपचार की आवश्यकता होती है। मनुष्य की कोशिकाओं में विदेशी जीन पहुंचाना सुरक्षा और नैतिकता, दोनों दृष्टियों से गंभीर विषय है। दूसरी सीमा प्रकाश की पहुंच की है। मस्तिष्क के गहरे हिस्सों तक प्रकाश पहुंचाने के लिए तंतु डालने पड़ते हैं, जो शल्य क्रिया की मांग करते हैं। तीसरी सीमा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया की है, क्योंकि शरीर शैवाल के प्रोटीन को विदेशी मानकर उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है। चौथी सीमा यह है कि चूहों में जो परिपथ किसी व्यवहार को नियंत्रित करता दिखता है, वह मनुष्य में भी ठीक उसी तरह काम करे, ऐसा आवश्यक नहीं क्योंकि मानव मस्तिष्क कहीं अधिक जटिल है।
मूलभूत शोध का महत्व
इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सीख शायद मूलभूत शोध के महत्व में निहित है। जब हेगेमान एक शैवाल के प्रकाशानुवर्तन का रहस्य खोज रहे थे, तब उनके सामने कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। कोई यह नहीं कह सकता था कि इससे अंधेपन का इलाज होगा या मस्तिष्क के नक्शे बनेंगे। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि एक नन्हा जीव प्रकाश को कैसे महसूस करता है। विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। जीवाणुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पर शोध से जीन संपादन की तकनीक निकली। गर्म पानी के सोतों में रहने वाले जीवाणुओं से वह एंज़ाइम मिला जिस पर आज की डीएनए जांच टिकी है और अब तालाब की एक काई से मस्तिष्क को समझने का नया औज़ार मिला है। कौन जाने, हर प्रजाति के भीतर हज़ारों वर्षों के विकास से तैयार हुए ऐसे अणु और तंत्र हैं, जो शायद भविष्य की किसी चिकित्सा की कुंजी हों। (स्रोत फीचर्स)
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