एक शैवाल का नेत्रबिंदु बना चिकित्सा नोबेल का आधार

दौलतसिंग सिंह तंवर

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल मानव मस्तिष्क को समझने की जिस खोज के लिए मिला है, उसकी शुरुआत किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि पोखर के एक नन्हे शैवाल से हुई थी। यह पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों, कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागल को दिया गया। उन्हें ‘प्रकाश से खुलने व बंद होने वाले आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों’ के लिए सम्मानित किया गया है। यह कहानी एक ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल से शुरू होती है, जिसे हम सामान्यतः किसी ठहरे हुए पानी में हरे रंग की परत के रूप में देखकर आगे बढ़ जाते हैं; उस शैवाल का नाम है क्लैमायडोमोनास।

समिति ने कहा है कि इस कार्य ने तंत्रिका विज्ञान के एक नए युग की आधारशिला रखी है।

मस्तिष्क की पुरानी पहेली

इस खोज का महत्व समझने के लिए पहले मस्तिष्क की मूल समस्या को समझना होगा। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं। हर न्यूरॉन हज़ारों अन्य न्यूरॉन्स से जुड़ा होता है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के सहारे आपस में संवाद करती हैं; हमारा सोचना, याद रखना, डरना, प्रेम करना, चलना और सोना, सब इसी संवाद का परिणाम है।

समस्या यह थी कि इन कोशिकाओं के संवाद को समझा कैसे जाए? वैज्ञानिक पहले इलेक्ट्रोड डालकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापते थे। इससे यह तो पता चलता था कि कोई गतिविधि हो रही है, लेकिन इलेक्ट्रोड से उद्दीपन देने पर आसपास की सैकड़ों किस्म की कोशिकाएं एक साथ प्रभावित हो जाती थीं। ऐसे में किसी विशिष्ट न्यूरॉन की सक्रियता को देख पाना मुश्किल था।

नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक ने 1979 में ही इस चुनौती की ओर संकेत किया था कि तंत्रिका विज्ञान की सबसे बड़ी आवश्यकता बाकी सबको अछूता छोड़कर किसी एक विशेष प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करने की विधि है। उन्होंने यह अनुमान भी लगाया था कि इसके लिए शायद प्रकाश एक उपयोगी साधन बन सकता है। परंतु उस समय किसी को नहीं पता था कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए। उत्तर बीस वर्ष से अधिक बाद आया और वह भी पादप और शैवाल विज्ञान की जिज्ञासा से।

एक–कोशिकीय हरित शैवाल

क्लैमायडोमोनास वंश की सबसे प्रसिद्ध प्रजाति क्लैमायडोमोनास राइनहार्टी का उपयोग एक मॉडल जीव के रूप में उपयोग होता रहा है। इस एक-कोशिकीय जीव की लंबाई मनुष्य के बाल की मोटाई की आधे से भी कम होती है। इसकी कोशिका में प्याले के आकार का एक हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) होता है जिसमें क्लरोफिल पाया जाता है। यह जीव अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण से बनाता है।

इसके अग्र-भाग में दो चाबुक जैसी पतली पूंछें (कशाभिकाएं – फ्लैजेला) होती हैं जिनकी मदद से यह जीव पानी में तैरता है। इसके जीवन का संघर्ष सीधा है, धूप बहुत कम हो तो भोजन नहीं बनेगा और बहुत तेज़ हो तो क्लोरोफिल को क्षति पहुंचेगी; इसलिए यह जीव प्रकाश की तीव्रता को परखकर कभी उसकी ओर बढ़ता है, तो कभी उससे दूर भागता है। इस व्यवहार को प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।

इस काम के लिए क्लैमायडोमोनास की कोशिका में एक छोटा-सा नारंगी-लाल धब्बा (नेत्रबिंदु) होता है, यह हरितलवक के भीतर स्थित कई वर्णकों की परतों से बनी एक संरचना है। नेत्रबिंदु यह पहचानने में मदद करता है कि प्रकाश किस दिशा से आ रहा है।

वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न यह था कि यह एक-कोशिकीय जीव प्रकाश को भांपकर अपनी कशाभिकाओं को आदेश कैसे देता है। इस प्रश्न के पीछे कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। यह तो मूलभूत जिज्ञासा थी।

नेत्रबिंदु का रहस्य और पीटर हेगेमान

1980 के दशक में यह संकेत मिला कि क्लैमायडोमोनास में प्रकाश भांपने वाला अणु रोडॉप्सिन परिवार का कोई प्रोटीन हो सकता है। रोडॉप्सिन ही हमारी आंख के रेटिना में प्रकाश को भांपता है।

उस समय मैक्स प्लांक जैव रसायन संस्थान में कार्यरत जर्मन वैज्ञानिक पीटर हेगेमान और उनके सहयोगियों ने 1990 के दशक के आरंभ में दिखाया कि नेत्रबिंदु पर प्रकाश पड़ने के कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर कोशिका में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यह गति असाधारण थी। यदि कोई लंबी रासायनिक शृंखला होती, तो प्रतिक्रिया इतनी त्वरित नहीं होती। यानी प्रकाश-ग्राही प्रोटीन सीधे विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।

हेगेमान ने पाया कि नेत्रबिंदु में एक विशेष प्रोटीन है, जो नीले प्रकाश को विद्युत संकेत में बदल देता है। यह विद्युत संकेत जीव को प्रकाश की ओर तैरने के लिए प्रेरित करता है। पर प्रोटीन की सही पहचान, उसके जीन को खोजना, उसे पृथक करना और यह सिद्ध करना कि वही प्रकाश से विद्युत धारा बनाता है, यह सब आसान नहीं था।

जॉर्ज नागल – चैनल–रोडॉप्सिन की खोज

जॉर्ज नागल, उन दिनों फ्रैंकफर्ट के मैक्स प्लांक जैव-भौतिकी संस्थान में कार्यरत थे और आज वुर्त्सबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। नागल कोशिका झिल्ली में आयनों (सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे आयनों) के आवागमन के अध्येता थे। जहां हेगेमान शैवाल और प्रकाश-संवेदन के

विशेषज्ञ थे वहीं नागल के पास थी आयन चैनलों के विद्युतीय अध्ययन

की पद्धति पर महारत। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में क्लैमायडोमोनास के जीन अनुक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने के   साथ उन्होंने ऐसे जीन खोजे जो रोडॉप्सिन से मिलते-जुलते प्रोटीन बनाते थे।

2002 में उन्होंने पहले प्रोटीन चैनल-रोडॉप्सिन-1 का वर्णन किया। अगले वर्ष, 2003 में, दूसरे प्रोटीन, चैनल-रोडॉप्सिन-2, की विशेषताएं सामने आईं। यह प्रोटीन अधिक उपयोगी निकला। जब इस प्रोटीन्स के जीन को मेंढक के अंडाणुओं और मानव भ्रूणीय वृक्क कोशिकाओं में डालकर इन कोशिकाओं पर नीला प्रकाश डाiला गया, तो झिल्ली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगी। प्रकाश हटाते ही धारा रुक गई।

इस खोज की मूल बात यह थी कि यह प्रोटीन दो काम एक साथ करता है। वह प्रकाश का ग्राही भी है और आयन चैनल भी।

इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी जटिल रासायनिक शृंखला की आवश्यकता नहीं थी। यह एक ही प्रोटीन, एक ही स्विच था। यही कारण है कि इसकी गति इतनी तेज़ थी, क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं भी मिलीसेकंड की गति से काम करती हैं। यह प्रोटीन किसी भी कोशिका को प्रकाश से खोलने की संभावना लेकर आया।

कार्ल डाइसरॉथ – तंत्रिका विज्ञान का प्रवेश

अब तक की खोज वनस्पति विज्ञान और जैव भौतिकी की थी। इसे तंत्रिका विज्ञान और चिकित्सा तक पहुंचाने का श्रेय बहुत हद तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जैव-अभियांत्रिकी और मनोचिकित्सा के प्रोफेसर कार्ल डाइसरॉथ को जाता है। उनको लगता था कि अवसाद, दुश्चिंता और सामाजिक व्यवहार जैसे विकारों के पीछे के तंत्रिका परिपथों को हम कितना कम जानते हैं। मनोचिकित्सा की अधिकांश दवाइयां पूरे मस्तिष्क पर असर डालती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में किन कोशिकाओं पर क्या असर होता है।

2000 के दशक के मध्य में डाइसरॉथ और उनके साथियों ने सोचा कि यदि चैनल-रोडॉप्सिन को किसी जीवित जंतु के विशेष न्यूरॉन्स में पहुंचा दिया जाए, तो उन्हीं न्यूरॉनों को प्रकाश से सक्रिय किया जा सकता है। वर्ष 2005 में उनकी प्रयोगशाला ने प्रदर्शित किया कि चूहे के न्यूरॉन्स में चैनल-रोडॉप्सिन-2 को अभिव्यक्त कराने पर नीले प्रकाश की एक चमक से न्यूरॉन मिलीसेकंड की सटीकता से विद्युत आवेग उत्पन्न करने लगते हैं।

इसके बाद के वर्षों में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने इस तकनीक को बहुत आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसे प्रकाशीय तंतु विकसित किए जिन्हें चूहे के मस्तिष्क में गहराई तक पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने चैनल-रोडॉप्सिन के साथ-साथ ऐसे प्रोटीन भी शामिल किए जो प्रकाश पड़ने पर कोशिका को शांत कर देते हैं। इससे वैज्ञानिक अब किसी न्यूरॉन को चालू भी कर सकते थे और बंद भी। इसी पूरी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स नाम मिला।

ऑप्टोजेनेटिक्स काम कैसे करता है इसे सरल भाषा में तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण – चैनल-रोडॉप्सिन का जीन किसी हानिरहित वायरस में रखते हैं और उसे जंतु के मस्तिष्क के किसी निश्चित क्षेत्र में पहुंचाते हैं। वायरस जीन को न्यूरॉन्स के भीतर पहुंचा देता है।

दूसरा चरण – कोशिका का चयन। वैज्ञानिक ऐसी आनुवंशिक युक्तियां लगाते हैं कि चैनल-रोडॉप्सिन केवल चुनिंदा कोशिकाओं में बने, बाकी कोशिकाओं में यह प्रोटीन बनता ही नहीं।

तीसरा चरण – मस्तिष्क में एक बारीक प्रकाशीय तंतु प्रविष्ट कराया जाता है। प्रकाश का स्विच दबाते ही केवल वे विशेष न्यूरॉन सक्रिय होते हैं जिनमें चैनल-रोडॉप्सिन मौजूद है। प्रकाश हटाते ही वे शांत हो जाते हैं।

यानी अब उन कोशिकाओं को सक्रिय करके देखा जा सकता है कि क्या कोई व्यवहार सचमुच उन्हीं से उत्पन्न होता है।

प्रयोगशाला से मिली नई समझ

ऑप्टोजेनेटिक्स ने पिछले डेढ़ दशक में तंत्रिका विज्ञान को बदल दिया। कुछ उदाहरण इसकी व्यापकता दिखाते हैं। स्मृति के अध्ययन में चूहों पर ऐसे प्रयोग हुए जिनमें किसी विशेष याद से जुड़ी कोशिकाओं को चिन्हित किया गया और बाद में प्रकाश डालकर उन्हीं को सक्रिय किया गया। परिणामस्वरूप जंतु ने वह भय-स्मृति पुनः जी ली, जबकि वह उस स्थान पर था ही नहीं। इससे यह धारणा पुष्ट हुई कि स्मृतियां कोशिकाओं के विशिष्ट समूहों में अंकित होती हैं। पार्किंसन रोग के अध्ययन में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने मस्तिष्क के उन विशेष मार्गों को पहचाना जिनके उद्दीपन से जंतु की गति में सुधार होता है। यह जानकारी कई उपचार विधियों को बेहतर बनाने में उपयोगी रही। 

स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक रोगियों के काम आ सकती है। हालांकि इस तकनीक के चिकित्सकीय उपयोग की दिशा में कुछ आरंभिक प्रयास हुए हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। सबसे उल्लेखनीय प्रयास दृष्टि लौटाने से जुड़ा है। कुछ आनुवंशिक रोगों, जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में, आंख के रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति पूरी तरह दृष्टिहीन हो जाता है। पर रेटिना की भीतरी परतों की कुछ कोशिकाएं फिर भी बची रहती हैं। विचार यह है कि इन बची हुई कोशिकाओं में प्रकाश-संवेदी प्रोटीन का जीन पहुंचाकर उन्हें ही नया प्रकाश-ग्राही बना दिया जाए। 2021 में एक मरीज़ के उपचार की रिपोर्ट आई थी।

चिकित्सा क्षेत्र में सीमाएं

हर नई तकनीक की तरह ऑप्टोजेनेटिक्स की भी सीमाएं हैं; पहली सीमा यह है कि इसमें जीन उपचार की आवश्यकता होती है। मनुष्य की कोशिकाओं में विदेशी जीन पहुंचाना सुरक्षा और नैतिकता, दोनों दृष्टियों से गंभीर विषय है। दूसरी सीमा प्रकाश की पहुंच की है। मस्तिष्क के गहरे हिस्सों तक प्रकाश पहुंचाने के लिए तंतु डालने पड़ते हैं, जो शल्य क्रिया की मांग करते हैं। तीसरी सीमा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया की है, क्योंकि शरीर शैवाल के प्रोटीन को विदेशी मानकर उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है। चौथी सीमा यह है कि चूहों में जो परिपथ किसी व्यवहार को नियंत्रित करता दिखता है, वह मनुष्य में भी ठीक उसी तरह काम करे, ऐसा आवश्यक नहीं क्योंकि मानव मस्तिष्क कहीं अधिक जटिल है।

मूलभूत शोध का महत्व

इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सीख शायद मूलभूत शोध के महत्व में निहित है। जब हेगेमान एक शैवाल के प्रकाशानुवर्तन का रहस्य खोज रहे थे, तब उनके सामने कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। कोई यह नहीं कह सकता था कि इससे अंधेपन का इलाज होगा या मस्तिष्क के नक्शे बनेंगे। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि एक नन्हा जीव प्रकाश को कैसे महसूस करता है। विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। जीवाणुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पर शोध से जीन संपादन की तकनीक निकली। गर्म पानी के सोतों में रहने वाले जीवाणुओं से वह एंज़ाइम मिला जिस पर आज की डीएनए जांच टिकी है और अब तालाब की एक काई से मस्तिष्क को समझने का नया औज़ार मिला है। कौन जाने, हर प्रजाति के भीतर हज़ारों वर्षों के विकास से तैयार हुए ऐसे अणु और तंत्र हैं, जो शायद भविष्य की किसी चिकित्सा की कुंजी हों। (स्रोत फीचर्स)

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भौतिकी का नोबेल

इस साल का भौतिकी नोबेल पुरस्कार विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के फ्रांसिस हाल्ज़ेन को न्यूट्रिनो कणों सम्बंधी शोध कार्य तथा आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके निर्णायक योगदान व नेतृत्व के लिए दिया गया है।

सामान्य लोगों के लिए न्यूट्रिनो का महत्व स्वत: स्पष्ट नहीं है। दरअसल, न्यूट्रिनो की उपस्थिति का सुझाव सबसे पहले वोल्फगैंग पौली ने 1930 में दिया था। उन्होंने यह सुझाव रेडियोसक्रिय तत्वों के विघटन के वर्णक्रम के एक विशेष पहलू की व्याख्या के लिए दिया था। यह प्रस्ताव कतिपय गणनाओं पर आधारित था, न्यूट्रिनो को एक वास्तविक कण के रूप में खोजना ज़रूरी था। न्यूट्रिनो का पहला प्रायोगिक प्रमाण वर्ष 1956 में सी. कोवान और एफ. राइन्स ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने नाभिकीय रिएक्टर का उपयोग एंटी-इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो के स्रोत के तौर पर किया था। 1995 में राइन्स को अकेले ही ‘न्यूट्रिनो को ताड़ने’ के लिए नोबेल सम्मान दिया गया क्योंकि तब तक कोवान का निधन हो चुका था।

इसके बाद न्यूट्रिनो अनुसंधान के लिए कई नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। राइन्स व कोवान द्वारा खोजे जाने के बाद फौरन यह समझ बन गई थी कि ये कण ब्रह्मांड से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए आदर्श हैं। सबसे बड़ी बात तो यह पता चली थी कि न्यूट्रिनो विद्युतीय दृष्टि से उदासीन होते हैं। लिहाज़ा, ये मात्र दुर्बल नाभिकीय अथवा गुरुत्वीय अंतर्क्रिया में शामिल होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोत से निकलकर ये पृथ्वी तक बगैर किसी व्यवधान या विचलन के पहुंचते हैं। इस संदर्भ में 2002 में आर. डेविस जूनियर और एम. कोशिबा को ब्रहमांडीय न्यूट्रॉन के डिटेक्शन के लिए नोबेल से नवाज़ा गया था। उन्होंने सूरज से आने वाले और डेढ़ लाख वर्ष पूर्व घटित एक सुपरनोवा से पृथ्वी पर पहुंचने वाले मेगाइलेक्ट्रॉनवोल्ट न्यूट्रिनो का अवलोकन किया था।

फ्रांसिस हाल्ज़ेन का योगदान यह रहा कि उन्होंने यह पहचाना कि दणिक्षी ध्रुव के बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। वैसे तो न्यूट्रिनो हर जगह होते हैं लेकिन वे अन्य कणों या बलों से इतनी कम अंतर्क्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। वे पृथ्वी में से या हमारे शरीर में से होकर गुज़र जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता।

बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से अंतर्क्रिया करता है। इस क्षण यदि कोई व्यक्ति सही जगह पर सही उपकरणों के साथ मौजूद हो तो इसे भांपा जा सकता है।

यह बात तो वैज्ञानिकों को एक अरसे से पता रही है कि ब्रह्मांड में कुदरती पार्टिकल एक्सलरेटर मौजूद हैं जो हमारे द्वारा निर्मित एक्सलरेटर की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जावान कण छोड़ते रहते हैं। लेकिन इन स्रोतों के बारे में हम बहुत कम जान पाए थे। वैसे तो न्यूट्रिनो भी उन्हीं परिवेशों

में उत्पन्न होते हैं, जहां अन्य कण बनते हैं लेकिन ये अपनी ऊर्जा गंवाए बगैर और दिशा बदले बगैर पृथ्वी तक पहुंचते हैं। अर्थात ये उन स्रोतों के सम्बंध में अनोखी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

हाल्ज़ेन ने दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो को ताड़ने व उनका अध्ययन करने का विचार 1988 में पेश किया था। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से अंतर्क्रिया करता है तो प्रकाश की एक चमक पैदा होती है जिसे दक्षिणी ध्रुव के स्वच्छ बर्फ में पकड़ा जा सकता है। दक्षिणी ध्रुव के कई फायदे हैं – जैसे यह तमाम किस्म के व्यवधानों से मुक्त है और भूकंपों के अभाव के चलते भौगोलिक दृष्टि से स्थिर है। हाल्ज़ेन के विचार को कई शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और बर्फ में सेंसर्स स्थापित करने का शुरुआती परीक्षण किया गया।

वैसे, अत्यंत ऊर्जावान ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त संख्या में न्यूट्रिनो और परमाणु नाभिकों की टक्करों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में बर्फ की ज़रूरत थी। लिहाज़ा, पूरे 1 घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला का निर्माण 2011 में पूरा हुआ था। इस बर्फ का वज़न होगा 1 अरब मीट्रिक टन।

इस वेधशाला की मदद से ऐसे न्यूट्रिनो की खोज की गई जो हमारे सौर मंडल के बाहर उत्पन्न हुए थे। हाल्ज़ेन के नेतृत्व में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने एक अनोखा उपकरण उपलब्ध कराया है जो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के एक नए युग का आगाज़ करेगा। (स्रोत फीचर्स)

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सांप का भ्रूण कुंडली मारकर क्यों विकसित होता है

अधिकांश सांप अंडे देते हैं, हालांकि कुछ सांप हैं जो बच्चे भी पैदा करते हैं। लेकिन यहां बात करेंगे सांपों के भ्रूण के विकास की एक खूबी की।

देखा गया है कि विकास के दौरान जब सांप के भ्रूण की लंबाई बढ़ती है तो वह सीधा नहीं बढ़ता बल्कि कुंडली मार लेता है। आम तौर पर यह कुंडली क्लॉकवाइस (यानी घड़ी की सुई घूमने की दिशा में) घूमती है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में इन दोनों चीज़ों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है – कुंडली क्यों बनती है और एक ही दिशा में क्यों घूमती है?

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 34 प्रजातियों के सांपों के विकसित होते भ्रूणों का अवलोकन किया। पाया गया कि कुल मिलाकर 65 प्रतिशत भ्रूणों में कुंडली क्लॉकवाइस बनी थी। यह भी देखा गया कि शुरुआती अवस्था में क्लॉकवाइस कुंडली ज़्यादा आम थी।

फिर शोधकर्ताओं ने केप हाउस स्नेक (Boaedon capensis) का ज़्यादा बारीकी से अध्ययन किया। देखा गया कि सारे 146 भ्रूणों में कुंडलियां क्लॉकवाइस थीं। दूसरी ओर, अन्य ऐसी ही गैर-सर्प नलिकाकार प्रजातियों में कुंडलियां क्लॉकवाइस और एंटीक्लॉकवाइस दोनों लगभग बराबर थीं।

सांप के भ्रूण की कुंडलियों के राज़ का खुलासा तब हुआ जब शोधकर्ताओं ने भ्रूण की आंतरिक त्री-विमीय संरचना को देखा। इसके लिए उन्होंने एक्स-रे चित्रण की एक विशेष तकनीक  माइक्रो-सीटी स्कैनिंग का उपयोग किया। पता चला कि सांप के बढ़ते भ्रूण में शरीर की लंबाई तो तेज़ी से बढ़ती है और वह उसकी आहार नाल की वृद्धि को पीछे छोड़ देती है। अब छोटी रह गई आहार नाल बढ़ते शरीर को पीछे खींचती है। इस खींचतान का परिणाम होता है कि शरीर में ऐंठन आ जाती है – वह कुंडली का आकार ग्रहण कर लेता है।

दूसरा सवाल था कि इस कुंडली के घुमाव की दिशा क्लॉकवाइस ही क्यों होती है। इसका सम्बंध भ्रूण में योक थैली की स्थिति से है। सांप के भ्रूण में यह थैली भ्रूण के बाईं ओर स्थित होती है, तो शरीर इसके विपरीत दिशा में घूम जाता है।

यह शोध वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल द्वारा किया गया था। शोध पत्र की प्रमुख लेखक ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एलेक्ज़ेंड्रा वेबर ने कहा है कि प्रकृति में कई कुंडलियां पाई जाती हैं (जैसे घोंघों की खोल या हमारी अपनी आंत) और यह अध्ययन इन्हें समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

रसायन शास्त्र का नोबेल

इस वर्ष का रसायन नोबेल पुरस्कार एक पुरानी गुत्थी को सुलझाने के लिए पैरिस विश्वविद्यालय-दक्षिण के हेनरी बी. कागन और टोकियो विज्ञान विश्वविद्यालय के केन्सो सोई को प्रदान किया गया है।

प्रकृति में पाए जाने वाले कई ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनके अणुसूत्र और परमाणुओं की जमावट तो एक जैसी होती है लेकिन उनकी त्रि-विमीय संरचना में अंतर होता है। अमीनो अम्ल, शर्कराएं व कई अन्य अणुओं में यह विशेषता होती है। होता यह है कि त्रिविमीय संरचना में अंतर के कारण ऐसे पदार्थ दो रूपों में पाए जाते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं – जैसे हमारे दो हाथ। इन्हें इनेन्शियोमर कहते हैं और ऐसे अणुओं को कायरल कहा जाता है। रसायन शास्त्र में इन्हें D तथा L इनेन्शियोमर के चिंह से सुशोभित किया जाता है।

मज़ेदार बात यह है कि जैविक तंत्रों में बड़े अणुओं के संश्लेषण के दौरान इनमें से एक (या तो D या L) का उपयोग होता है। लिहाज़ा, सजीवों में दोनों इनेन्शियोमर नहीं पाए जाते, कोई एक ही पाया जाता है। जैसे प्राय: अमीनो एसिड के L इनेन्शियोमर तथा शर्कराओं के D इनेन्शियोमर पाए जाते हैं। अब यह तो जानी-मानी बात है कि अमीनो अम्लों की शृंखलाओं से प्रोटीन बनते हैं और शर्कराओं की शृंखलाएं पॉलीसेकराइड बनाती हैं।

वैज्ञानिकों के लिए यह एक पहेली रही है कि सजीवों में ऐसी क्या खास बात है कि उनमें किसी एक ही इनेन्शियोमर का संश्लेषण होता है और वे इसी इनेन्शियोमर का इस्तेमाल प्रोटीन जैसे अणुओं के निर्माण में करते हैं। यानी रसायन शास्त्र की भाषा में हम कहेंगे जैविक तंत्रों में ये अणु होमो-कायरल होते हैं।

लेकिन प्रयोगशाला में हम जब भी अमीनो अम्ल या शर्करा जैसे इन यौगिकों का संश्लेषण करते हैं तो दोनों इनेन्शियोमर बराबर मात्रा में बनते हैं। समस्या यह है कि यदि आप ऐसे यौगिकों का उपयोग जैविक कार्यों के लिए करना चाहते हैं तो आपको एक ही इनेन्शियोमर चाहिए।

यही थी गुत्थी कि सजीवों में कैसे इनेन्शियोमर्स में से एक का ही चुनकर संश्लेषण होता है। हेनरी कागन और केन्सो सोई ने इसी समस्या को सुलझाया है कि होमो-कायरेलिटी कैसे स्वत: प्रकट हो जाती है। उन्होंने इसके लिए अद्भुत रासायनिक अभिक्रियाएं विकसित की हैं।

दरअसल, इस संदर्भ में पहला अहम कदम कागन ने 1986 में उठाया था और एक तरीका खोजा था जिसके द्वारा रासायनिक अभिक्रियाओं के साथ छेड़खानी की जा सकती थी। इसकी मदद से वे कोई एक इनेन्शियोमर शुद्ध रूप में तो नहीं बना सके लेकिन एक इनेन्शियोमर का निर्माण काफी ज़्यादा अनुपात में कर पाए।

अगला कदम केन्सो सोई ने उठाया था और उन्होंने वह अभिक्रिया विकसित कर ली जिसमें होमोकायरल यौगिक बनाने की संभावना थी।

यहां ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री फ्रेडरिक चार्ल्स फ्रैंक के योगदान का ज़िक्र मुनासिब है।

फ्रैंक ने 1953 में एक गणितीय मॉडल पेश किया था जिससे यह समझने में मदद मिलती थी कि यदि मिश्रण में दो इनेन्शियोमर्स में से एक की भी थोड़ी अतिरिक्त मात्रा हो, तो होमोकायरेलिटी कैसे हासिल की जा सकती है। वैसे उन्होंने यह मॉडल जैविक तंत्रों में होमोकायरेलिटी की व्याख्या के लिए प्रस्तुत किया था लेकिन उसका उपयोग आगे सफलतापूर्वक प्रयोगशाला में भी किया गया।

फ्रैंक के मॉडल का आधार यह था कि ऐसी अभिक्रिया में एक ऐसा यौगिक होगा जो स्वयं के निर्माण का उत्प्रेरक हो (यानी ऑटो-केटालिस्ट हो) और दूसरे इनेन्शियोमर के संश्लेषण का प्रति-उत्प्रेरक (एंटी-कैटालिस्ट) हो। ऐसे स्व-उत्प्रेरण के कई उदाहरण मिलते हैं। ऑटो-कैटालिस्ट वे यौगिक होते हैं, जो किसी अभिक्रिया के दौरान बनते हैं और फिर अपने जैसे यौगिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

फ्रैंक ने दूसरी शर्त यह रखी थी कि कोई ऐसा उत्प्रेरक होना चाहिए जो किसी एक इनेन्शियोमर  उत्पादन करवाए यानी असममित उत्प्रेरक हो। इस तरह के उत्प्रेरकों पर भी काफी अनुसंधान हुआ है और इस संदर्भ में 2001 तथा 2021 में नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।

तीसरी शर्त प्रति-उत्प्रेरण और स्व-उत्प्रेरण व असममित उत्प्रेरण के एक साथ मिलने की थी।   

अंतत: 2003 में सफलता हाथ लगी। कागन और सोई ने एक ऐसी रासायनिक अभिक्रिया प्रस्तुत की जिसमें दो में से एक इनेन्शियोमर ही बनेगा। यहां उसके विस्तार में जाना तो संभव नहीं है लेकिन साफ है कि यह कदम रसायन शास्त्र की हमारी समझ और जीव विज्ञान और चिकित्सा की दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

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एक पुरातन वायरस मध्ययुगीन ग्रंथ में छिपा मिला

प्राचीन रोम में भेड़ों को एक रोग हुआ करता था – इसमें भेड़ों के शरीर पर फफोले बन जाते थे। यह शीपपॉक्स का एक सामान्य लक्षण है। यह रोग बहुत घातक है और भेड़ों के पूरे के पूरे झुंड का सफाया कर सकता है। इस रोग की उत्पत्ति एक पहेली ही रही है।

अब, साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन में युनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के जेनेटिक विज्ञानी केविन डैली के नेतृत्व में एक शोध समूह ने इस पहेली का आश्चर्यजनक खुलासा किया है। इस रोगजनक का पता मध्य युग की पुस्तकों और कानूनी दस्तावेज़ों की खोजबीन से मिला है। ये पुस्तकें और दस्तावेज़ पार्चमेंट पर लिखे गए थे। गौरतलब है कि पार्चमेंट जानवरों की खाल को विशेष रूप से उपचारित करके बनाया जाता है। एक समय था जब इसका इस्तेमाल कागज़ के तौर पर होता था।

दरअसल, ये शोधकर्ता मध्ययुगीन पांडुलिपियों की उत्पत्ति का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने कुछ पन्नों को इरेज़र से रगड़ा और इस तरह निकले बुरादे में से डीएनए निकाला। गौरतलब है कि डीएनए आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसका उपयोग सजीवों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

सबसे पहली हैरत की बात तो यह थी कि पार्चमेंट में से डीएनए निकाला जा सका क्योंकि किताबों के पन्ने बनने से पहले गाय, बकरी या भेड़ों की खाल को कई दिनों तक चूने से भरे गड्ढे में रखा जाता है। चूना काफी शक्तिशाली रसायन है। इसके बाद इन खालों को निकालकर खुरचा जाता है और हाथों से ताना जाता है। इसके अलावा, लिखित पांडुलिपियां सदियों पुरानी हैं और उनकी तरह-तरह से उठा-पटक हुई होगी। यानी पार्चमेंट को विघटित होने का पर्याप्त समय मिला है। फिर भी यह अचरज की बात रही कि संग्रहालयों और मठों की अलमारियों में सजी पांडुलिपियों में पर्याप्त साबुत डीएनए था और साथ ही उन वायरसों तथा अन्य रोगजनकों के डीएनए भी मिले जिन्होंने उन जानवरों को संक्रमित किया था। इनमें शीप-पॉक्स के वायरस की एक विलुप्त किस्म का डीएनए भी मिल गया। यानी प्राचीन रोगजनकों का एक नया स्रोत हाथ लगा है।

इसके पीछे एक कारण तो यह है कि एक-एक किताब बनाने के लिए जितने जानवरों की ज़रूरत होती है वह लगभग एक पूरी आबादी के बराबर होती है। कहने का मतलब है कि जब आप उस समय की एक किताब उठाते हैं तो आप भेड़ों या अन्य जानवरों के एक पूरे झुंड को हाथ में ले लेते हैं।

शोधकर्ताओं ने एक काम और किया। 700 ईस्वी से 1450 ईस्वी के बीच की पांडुलिपियों का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इन सब नमूनों का एक साझा पूर्वज था जो भेड़-विशिष्ट बीमारी के वाहक के रूप में करीब पांच हज़ार साल पहले विकसित हुआ था।

आम तौर पर पुस्तकों और पांडुलिपियों को दार्शनिक/साहित्यिक ज्ञान का भंडार माना जाता है। लेकिन इस अध्ययन ने दर्शाया है कि वे जीव वैज्ञानिक सूचना का स्रोत भी हो सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग – 1

डॉ. सुशील जोशी

थियोडोर एशरिश ने जब एशरीशिया कोली (ई. कोली)बैक्टीरिया की खोज की थी तब उन्होंने ज़रा भी नहीं सोचा था कि साधारण-सा दिखने वाला यह बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतने अहम योगदान देगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा। तीन भागों में प्रस्तुत इस लेख शृंखला में हम ई. कोली के इन योगदान और यात्रा पर बात करेंगे। तो, चलिए चलते हैं ई. कोली के सफर पर…

सन 1885 में एक जर्मन-ऑस्ट्रियन शिशुरोग विशेषज्ञ, थियोडोर एशरिश (Theodor Escherich) ने नवजात बच्चों की आंतों में से कुछ बैक्टीरिया प्राप्त किए थे। ये बैक्टीरिया ग्राम नेगेटिव थे, थोड़ी चहलकदमी करते थे और सबसे बड़ी बात थी कि ये कई उपलब्ध कृत्रिम पोषक माध्यमों पर भलीभांति वृद्धि करते थे। एशरिश ने इन्हें नाम दिया था बैक्टीरियम कोली कम्यून (Bacterium coli commune)। आगे चलकर 1919 में इसे खोजकर्ता के नाम पर एशरीशिया कोली (Escherichia coli – ई. कोली) नाम मिला।

खोजकर्ता को तनिक भी आभास नहीं था कि सूक्ष्मदर्शी में यह साधारण-सा दिखने वाला बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतना नाम कमाएगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा।

नेचर में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे के अनुसार ई. कोली कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है। इसी बैक्टीरिया पर अनुसंधान के लिए 12 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं (अनुसंधान और नोबेल पुरस्कारों की जानकारी अगले पन्ने पर)।

फिर 1907 में रुडोल्फ मैसिनी (Rudolf Massini) ने एक सूक्ष्मजीव का विवरण प्रस्तुत किया – बैक्टीरियम कोली म्यूटेबाइल (Bacterium coli mutabile)। इसे Escherichia coli-mutabile भी कहते हैं और यह ई. कोली का एक उत्परिवर्तित संस्करण है। मैसिनी ने जब इसे प्राप्त किया तो शुरुआत में यह लैक्टोस पाचन में अक्षम (लैक्टोस नेगेटिव) था, लेकिन आगे चलकर इसमें कुछ उभार विकसित हो गए जो लैक्टोस का किण्वन कर सकते थे। यह खोज थी जिसने ई. कोली  पर आगे अध्ययन की प्रेरणा दी जिनकी बदौलत आणविक जीव विज्ञान का सूत्रपात हुआ।

1940 के दशक में एम. डेलब्रुक (M. Delbrück) और एस. ई. लूरिया (S. E. Luria) ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज या फेज) पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन स्वत: स्फूर्त होते हैं। हर्शे (A. D. Hershey) और चेज़ (M. Chase) यह भी दिखा पाए कि वायरस का जो हिस्सा बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, वह प्रोटीन नहीं बल्कि डीएनए होता है।

ग्राम और ग्राम नेगेटिवग्राम अभिरंजन (staining) की एक विधि है, जिसका विकास हांस क्रिश्चियन ग्राम नाम के वैज्ञानिक ने 1884 में किया था। ग्राम नेगेटिव का मतलब होता है कि ये बैक्टीरिया इस विधि से अभिरंजित नहीं होते। 

लगभग इसी समय एस. बेंज़र (Seymour Benzer) ने आनुवंशिकी की कामकाजी इकाई को परिभाषित किया और जे. लेडरबर्ड (J. Lederberg) और ई. टेटम (E. Tatum) ने

यह खोज की कि बैक्टीरिया में लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। कुछ वर्षों के बाद लेडरबर्ग ने गुणसूत्रों के बाहर कुछ जेनेटिक कणों (DNA fragments) की खोज की और बैक्टीरियोफेज के ज़रिए जेनेटिक हस्तांतरण का तरीका खोजा। इसे ट्रांसडक्शन कहते हैं।

1949 में पैरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में ए. ल्वॉफ (A. Lwoff) ने लायसोजेनी की विधि का खुलासा किया। (लायसोजेनी वह प्रक्रिया होती है जिसमें कोई वायरस अपना जीनोम संक्रमित बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़ देता है।) इसके बाद जल्दी ही एफ. जेकब (F. Jacob) और ई. वोलमैन (E. Wollman) ने ई. कोली

की लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्रों की वृत्ताकार संरचना को स्थापित किया।

फिर 1960 के दशक में जे. मोनोड (J. Monod) और एफ. जेकब ने ई. कोली के लैक्टोस तंत्र का विश्लेषण करके जीन नियमन का ऑपेरॉन मॉडल प्रस्तावित किया और मेसेंजर आरएनए (messenger RNA) की अवधारणा प्रस्तुत की।

आगे चलकर ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरसों की मदद से पुनर्संयोजित डीएनए (recombinant DNA) तकनीक का विकास हुआ।

ये थे ई. कोली पर हुए अनुसंधानों के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव। लेख के अगले भाग में हम चलेंगे आणविक जीव विज्ञान के एक लंबे सफर पर। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

Photo credit- https://en.wikipedia.org/wiki/Escherichia_coli

एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग 2 – अनुसंधान

डॉ. सुशील जोशी

लेख के इस भाग में हम ई. कोली की खूबियों और उस पर हुए अनुसंधानों के बारे में विस्तार से बात करेंगें।

मॉडल जीव के रूप में खूबियां

एशरीशिया कोली छड़ आकार का बैक्टीरिया है जो लगभग 2 से 5 माइक्रोमीटर लंबा और 0.5 से 1 माइक्रोमीटर चौड़ा होता है। यह इतना बड़ा होता है कि प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन किया जा सके। एक मॉडल जीव के रूप में ई. कोली में कई विशेषताएं हैं। यह तेज़ी से संख्या-वृद्धि करता है, इसमें जेनेटिक फेरबदल के लिए कई आणविक तकनीकें हैं। एक खास बात यह है कि ई. कोली प्रमुखत: अलैंगिक रूप से अपनी प्रतिलिपियां बनाता है – अर्थात किसी एक बैक्टीरिया के जीनोम में किए गए परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं और इनके असर का अध्ययन लगातार किया जा सकता है।

इन्हीं सब खूबियों के चलते ई. कोली का उपयोग करके आणविक जीव विज्ञान और आणविक आनुवांशिकी के क्षेत्र में कई प्रमुख खोजें की गई हैं। इनमें जेनेटिक कोड को समझना, डीएनए के प्रतिलिपिकरण की प्रक्रिया की समझ, जीन नियमन की ऑपेरॉन प्रणाली की खोज, और जेनेटिक रूप से परिवर्तित जीव बनाना शामिल हैं।

ई. कोली का जीनोम

ई. कोली के कई स्ट्रेन (प्रभेद) होते हैं जो आनुवंशिक रूप से थोड़े-थोड़े भिन्न समूह के द्योतक हैं। इनकी रोगजनक क्षमता अलग-अलग होती है। कुछ स्ट्रेन हैं जो गंभीर संक्रमण पैदा करते हैं – जैसे O157:H7 स्ट्रेन। जबकि कुछ अन्य स्ट्रेन रोगजनक नहीं होते। उनकी यह विविधता उनके जीनोम में नज़र आती है। प्रयोगों से पता चला है कि ई. कोली के K-12 स्ट्रेन (जिसे प्रयोगशाला में पाला जाता है और रोगजनक नहीं है) और O157:H7 तथा CFT073 स्ट्रेन (ये दोनों स्ट्रेन रोगजनक हैं) के जीनोम्स के बीच मात्र 39 प्रतिशत समानता है।

ई. कोली के सारे स्ट्रेन्स के जीनोम में कुल मिलाकर 16,000 जीन्स होते हैं जिसे पैन-जीनोम (pan-genome) कहते हैं लेकिन इस पैन-जीनोम का एक अंश ही किसी स्ट्रेन विशेष में पाया जाता है – लगभग 20 प्रतिशत। यानी शेष 80 प्रतिशत जीनोम परिवर्तनशील होता है। ये जीन्स बाहर से हासिल किए जा सकते हैं और ये ई. कोली को चयापचय में काफी लचीलापन देते हैं। परिवर्तनशील जीनोम में नए-नए घटक शामिल करने की इस खूबी के चलते ई. कोली एक बढ़िया मॉडल बन सका है। 1997 में ई. कोली उन पहले-पहले जीवों में से था जिनके पूरे जीनोम के डीएनए अनुक्रम का खुलासा हो गया था।

फेज ग्रुप

आणविक जीव विज्ञान के विकास की शुरुआत मैक्स डेलब्रुक (Max Delbrück) और साल्वेडोर ई. लुरिया (Salvador E. Luria) द्वारा 1940 में ‘फेज ग्रुप’ के गठन के साथ मानी जा सकती है, जिसमें आगे चलकर अल्फ्रेड डी. हर्शे (Alfred D. Hershey) भी जुड़ गए थे। इसी के साथ ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरस (बैक्टीरियोफेज) आणविक जीव विज्ञान अध्ययन की बुनियादी सामग्री बन गए।

मज़ेदार बात यह है कि डेलब्रुक एक क्वांटम भौतिक शास्त्री थे। वे जर्मनी से यू.एस. पहुंचे थे और एमरी हिल्स के साथ बैक्टीरियोफेज पर काम करने लगे थे। 1939 में इन दोनों ने मिलकर बैक्टीरियोफेज (फेज) की संख्या वृद्धि का एक संख्यात्मक पर्चा प्रस्तुत किया था। दूसरी ओर, लुरिया एक इतालवी डॉक्टर थे और वे भी यू.एस. पहुंचकर डेलब्रुक के साथ काम करने लगे।

ई. कोली से प्रमुख खोजें

बैक्टीरिया में वायरस प्रतिरोध

डेलब्रुक और लुरिया ने बैक्टीरिया में वायरस-प्रतिरोध पर काम करना तय किया। वे जानना चाहते थे कि बैक्टीरिया में वायरस के विरुद्ध प्रतिरोध क्या बेतरतीब उत्परिवर्तनों में से चयन के ज़रिए होता है या क्या यह वायरस से संपर्क से जनित अनुकूलन का परिणाम होता है। इसके लिए उन्होंने ई. कोली-बी  स्ट्रेन पर प्रयोग किए। उन्होंने कुछ बैक्टीरिया को अलग-अलग संवर्धन नलिका (कल्चर ट्यूब) में पनपाया। कुछ समय बाद इन अलग-अलग कल्चर्स में से बराबर-बराबर आयतन लिए और उन्हें टी-1 नामक फेज से युक्त पैट्रीप्लेट्स में डाल दिया। यह माना गया था कि यदि वायरस के खिलाफ प्रतिरोध संपर्क के बाद पैदा होता है तो सारी प्लेट्स में लगभग बराबर-बराबर प्रतिरोधी बैक्टीरिया मिलने चाहिए। प्रयोग में देखा गया कि विभिन्न प्लेट्स में प्रतिरोधी बैक्टीरिया की औसत संख्या में बहुत अंतर हैं। निष्कर्ष यह था कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध बेतरतीब उत्परिवर्तनों की वजह से पैदा होता है और यह वायरस की उपस्थिति से स्वतंत्र है। इस प्रयोग को आधुनिक बैक्टीरियल जेनेटिक्स की शुरुआत माना जाता है। इस प्रयोग में उत्परिवर्तन की दर का निर्धारण भी किया जा सका था।

जैव विकास का लंबा प्रयोग

रिचर्ड लेंस्की (Richard Lenski) ने 1988 में ई. कोली के साथ जैव विकास का एक प्रयोग शुरू किया था। इस प्रयोग में उन्होंने ई. कोली की 12 समांतर आबादियों की 80,000 पीढ़ियों का अवलोकन किया था। इस प्रयोग में ई. कोली की 12 अलग-अलग आबादियों को ग्लूकोज़-सीमित पोषक माध्यम में पनपने दिया गया था और ग्लूकोज़ की सांद्रता प्रतिदिन कम-ज़्यादा की जाती थी। हर 500वीं पीढ़ी के बाद बैक्टीरिया के नमूने शून्य से 80 डिग्री नीचे तापमान पर फ्रीज़ कर दिए जाते थे ताकि बाद में प्रत्येक पीढ़ी की तुलना उससे पहले वाली पीढ़ी से की जा सके।

प्रयोग से पता चला कि बैक्टीरिया तेज़ी से अपनी फिटनेस (वृद्धि दर) में सुधार करते हैं लेकिन समय के साथ सुधार की दर घटती जाती है। लगभग 30,000 पीढ़ियों (करीब 15 वर्ष) के बाद एक आबादी में साइट्रेट को ऑक्सीजनयुक्त पर्यावरण में पचाने की क्षमता आ गई थी।

बैक्टीरिया जीन्स का पुनर्संयोजन

इसी दौरान हर्शे भी इस ‘फेज ग्रुप’ में शामिल हो गए। वे पहले ही ई. कोली को संक्रमित करने वाले वायरसों पर शोध कर दर्शा चुके थे कि जब एक ही कोशिका में एक से अधिक वायरस हों, तो उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हो जाता है। इसके लिए उन्होंने एक ही ई. कोली कोशिका को वायरस के दो प्रभेदों से संक्रमित किया। इनसे जो वायरस संतति प्राप्त हुई उनमें मूल वायरस जैसी जेनेटिक संरचना वाले वायरस तो थे ही, साथ में कुछ ऐसे वायरस भी थे जिनमें जीन्स का लेन-देन हो चुका था।

आनुवंशिकी पदार्थ की पहचान

बहरहाल, हर्शे को शोहरत मिली मार्था चेज़ (Martha Chase) के साथ किए गए प्रयोगों से। हर्शे और चेज़ ने टी-2 फेज के डीएनए को रेडियोसक्रिय फॉस्फेट (32P) से चिन्हित कर दिया, और उन्हें ई. कोली कोशिकाओं को संक्रमित करने दिया। गौरतलब है कि फॉस्फोरस डीएनए में ही पाया जाता है, प्रोटीन में नहीं। इन संक्रमित कोशिकाओं से फेज का प्रोटीन आवरण हटा दिया और फिर संक्रमित कोशिकाओं तथा वायरस के आवरणों को अलग-अलग कर लिया। देखा गया कि रेडियोसक्रियता सिर्फ नीचे बैठी बैक्टीरिया कोशिकाओं में थी जबकि ऊपर के द्रव (जिसमें प्रोटीन आवरण थे) में नहीं थी। यानी डीएनए ही बैक्टीरिया कोशिका में प्रवेश कर गया था।

इसी तरह के एक अन्य प्रयोग में उन्होंने फेज को रेडियोसक्रिय सल्फेट से चिन्हित कर दिया, चूंकि सल्फर प्रोटीन में पाया जाता है, डीएनए में नहीं। अलग-अलग करने पर रोडियोसक्रियता सिर्फ प्रोटीन आवरण में मिली, संक्रमित बैक्टीरिया में नहीं।

इन परिणामों से हर्शे और चेज़ ने निष्कर्ष निकाला कि आनुवंशिक पदार्थ डीएनए है, प्रोटीन नहीं। यह प्रयोग आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आनुवंशिक जानकारी का वहन डीएनए करता है, प्रोटीन नहीं।

डेलब्रुक, लुरिया और चेज़ को प्रतिलिपिकरण तथा वायरस की जेनेटिक संरचना सम्बंधी खोजों के लिए 1969 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

इसके बाद ग्रुप ने तय किया कि वे कई अन्य टी-फेज पर काम करेंगे जो ई. कोली के बी स्ट्रेन के विरुद्ध सक्रिय होते हैं। इनमें से एक फेज (टी-4) का शानदार उपयोग सीमोर बेंज़र (Seymour Benzer) ने किया। यहां बताना लाज़मी है कि बेंज़र ने अपना करियर एक सॉलिड स्टेट भौतिक शास्त्री के रूप में शुरू किया था लेकिन इर्विन श्रोडिंगर (Erwin Schrodinger) की प्रभावशाली पुस्तक व्हाट इज़ लाइफ? (What Is Life?) से प्रभावित होकर वे टी-4 के एक खास प्रकार (rII) की ओर मुड़ गए। प्रयोगों से उन्होंने साबित किया कि न्यूक्लियोटाइड्स की एक न्यूनतम लंबाई ही जेनेटिक इकाई होती है, जिसे उन्होंने सिस्ट्रॉन नाम दिया था।

जेनेटिक लेन–देन

द्वितीय विश्व युद्ध की रुकावट के बाद शोध परिणामों का आदान-प्रदान फिर शुरू हुआ। एक तो डेलब्रुक और हर्शे ने फेज वायरसों में जेनेटिक पुनर्संयोजन की अपनी खोज प्रस्तुत की और इसी के साथ जोशुआ लेडरबर्ग ने ई. कोली (स्ट्रेन के-12) पर अपने प्रयोगों के आधार पर दर्शाया कि बैक्टीरिया के बीच लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। आगे बैक्टीरियल जेनेटिक्स पर लगभग सारा अनुसंधान इसी स्ट्रेन पर हुआ। यह खोज इस मायने में महत्वपूर्ण थी कि इससे पता चला था बैक्टीरिया में परस्पर जेनेटिक सूचना का लेन-देन हो सकता है जो उन्हें नए गुणधर्म प्रदान कर सकता है। यह खोज बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध के तेज़ी से प्रसार को समझने में मददगार है।

लेडरबर्ग ने ही गुणसूत्र के बाहर जेनेटिक कणों (प्लास्मिड) की खोज की थी। यह खोज उन्होंने अपनी पत्नी एस्थर मिरियम लेडरबर्ग, एन.डी. ज़िन्डर और एम.एल. मोर्स के साथ की थी। इसके बाद उन्होंने बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक लेन-देन की एक नवीन विधि की खोज की थी जो बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज) के ज़रिए संपन्न होती है। यह खोज आगे चलकर जेनेटिक पुनर्संयोजन का आधार बनी।

जेनेटिक पुनर्संयोजन/हस्तांतरण

लेडरबर्ग और टैटम ने काफी परिष्कृत प्रयोगों की मदद से ई. कोली में जेनेटिक हस्तांतरण की खोज की थी (1946)। पुनर्संयोजन सम्बंधी प्रयोगों के लिए लेडरबर्ग ने टेटम द्वारा विकसित पोषण बाधित दोहरे उत्परिवर्तियों का उपयोग किया था। अलबत्ता, उस समय वे नहीं जानते थे कि यह ई. कोली स्ट्रेन (k-12) उन बिरले स्ट्रेन्स में से है जिनमें एफ-प्लास्मिड पाया जाता है। एफ-प्लास्मिड को फर्टिलिटी फैक्टर भी कहते हैं और यह बैक्टीरिया के संयुग्मन में भूमिका निभाता है। प्लास्मिड की खोज का श्रेय भी ई. कोली की मदद से लेडरबर्ग को ही जाता है। उनके समूह ने यह भी बताया था कि प्लास्मिड ही नर व मादा बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक गुणधर्मों के हस्तांतरण का साधन होता है। आम तौर पर यह जानकारी है कि कोशिकाओं में जेनेटिक जानकारी गुणसूत्रों में सहेजी होती है। लेडरबर्ग व अन्य ने स्पष्ट किया था कि बैक्टीरिया व कुछ अन्य जीवों में गुणसूत्र से अलग जेनेटिक सामग्री वृत्ताकार अणुओं के रूप में पाई जाती है, जिन्हें प्लास्मिड कहते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्रयोग के लिए ई. कोली के ऐसे स्ट्रेन्स चुने थे जो उत्परिवर्तनों के कारण कतिपय ज़रूरी वृद्धि कारक बनाने में अक्षम थे। इन दोनों स्ट्रेन्स को एक ऐसे माध्यम में रखा गया जिसमें बैक्टीरिया वृद्धि के कुछ विशिष्ट पोषक तत्व नहीं थे। यानी ये दोनों ही अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी के कारण उस माध्यम में नहीं पनप सकते थे।

तर्क था कि यदि ये स्ट्रेन्स जेनेटिक पदार्थों का लेन-देन नहीं करेंगें, तो दोनों ही पनप नहीं पाएंगे। लेकिन यदि जेनेटिक पदार्थ का लेन-देन हो जाता है तो दोनों स्ट्रेन्स में से कुछ बैक्टीरिया तो पनपेंगे। इस माध्यम को बैक्टीरिया वृद्धि के लिए सही तापमान वगैरह दिया, कुछ समय बाद देखा गया कि इस अभावग्रस्त माध्यम में भी बैक्टीरिया की कुछ कॉलोनियां विकसित हो गईं। यानी कुछ बैक्टीरिया ने दूसरे स्ट्रेन से जेनेटिक सामग्री प्राप्त कर ली थी। अर्थात उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हुआ था।

लेकिन इस प्रयोग से यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि क्या इस तरह के लेन-देन के लिए बैक्टीरिया का संपर्क में आना ज़रूरी है। वह प्रमाण बर्नार्ड डेविस ने एक सुंदर प्रयोग से मिला।

बर्नार्ड डेविस का U-tube प्रयोग

उन्होंने एक U आकार की नली ली जिसमें पेंदे पर एक फिल्टर लगा था। फिल्टर ऐसा था कि उसमें से पोषक माध्यम के पदार्थ तो आ-जा सकते थे लेकिन बैक्टीरिया की कोशिकाएं नहीं। दोनों तरफ की नलियों में संवर्धन माध्यम भर दिया गया और दोनों तरफ अलग-अलग स्ट्रेन के बैक्टीरिया (जिनकी पोषक तत्वों की ज़रूरतें अलग-अलग थीं) डाले गए। एक पंप की मदद से नली के एक हिस्से से दूसरे में लगातार पोषक माध्यम की आवाजाही चलती रही।

कुछ समय बाद जब इन बैक्टीरिया को एक पेट्रीप्लेट में डाला गया, जहां ऐसा पोषक माध्यम था जिसमें किसी विशेष पोषक पदार्थ की कमी थी, ऐसी स्थिति में एक भी कॉलोनी विकसित नहीं हुई। यानी जेनेटिक लेन-देन नहीं हुआ था। इस प्रयोग के आधार पर डेविस यह दिखा पाए कि जेनेटिक लेन-देन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं का सीधे संपर्क ज़रूरी है।

इस खोज का बैक्टीरियल जेनेटिक्स में तो खासा असर रहा ही, इसने आगे चलकर क्षैतिज जेनेटिक स्थानांतरण (horizontal genetic transfer) को समझने का रास्ता भी खोला। यानी बैक्टीरिया आपस में जेनेटिक सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि जेनेटिक सूचनाओं में फेरबदल मात्र लैंगिक प्रजनन या उत्परिवर्तनों के द्वारा नहीं होता।

लेडरबर्ग ने ई. कोली पर प्रयोगों के आधार पर बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक हस्तांतरण की एक नवीन विधि भी खोजी थी, जो बैक्टीरियोफेज के मार्फत होती है। इसे उन्होंने ट्रांसडक्शन की संज्ञा दी थी। 1958 में लेडरबर्ग, जॉर्ज बीडल और ई. टेटम को संयुक्त रूप से नोबेल से सम्मानित किया गया था। लेडरबर्ग को यह पुरस्कार बैक्टीरिया में जेनेटिक सामग्री के संगठन तथा पुनर्संयोजन सम्बंधी खोज के लिए दिया गया था, जो ई. कोली पर हुए प्रयोगों से संभव हुई थीं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

(जारी…)

एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग 3 – अनुसंधान

डॉ. सुशील जोशी  

लेख के इस भाग में हम कुछ और महत्वपूर्ण अनुसंधानों पर बात करेंगे।

ट्रांसडक्शन

दरअसल, बैक्टीरिया में जेनेटिक फेरबदल की दो विधियां तो ज्ञात थीं – एक थी उत्परिवर्तन (mutation) यानी बैक्टीरिया की जेनेटिक संरचना में स्वतः परिवर्तन और दूसरी थी संयुग्मन (conjugation)। लेडरबर्ग और ज़िंडर ने एक तीसरी विधि की खोज की थी। इसकी खोज उन्होंने साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के एक प्रतिरोधी स्ट्रेन के साथ प्रयोग करके की थी।

वे देखना चाहते थे कि क्या उनके प्रयोग वास्तव में जेनेटिक पुनर्संयोजन को दर्शाते हैं। उन्होंने एक U आकार की नली लेकर उसके निचले मोड़ पर एक अत्यंत महीन कांच का फिल्टर फिट कर दिया। इसमें उन्होंने एक पोषक माध्यम भर दिया जिसमें उनके द्वारा चुने गए साल्मोनेला उत्परिवर्तित रूपों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व नहीं थे।

फिर उन्होंने एक-एक उत्परिवर्ती स्ट्रेन को नली की दोनों भुजाओं में डाल दिया और माध्यम को एक पंप की मदद से दोनों तरफ बहाते रहे। उम्मीद थी कि कोई पुनर्संयोजन नहीं होगा क्योंकि बर्नार्ड डेविस ऐसे ही एक प्रयोग में दर्शा चुके थे कि पुनर्संयोजन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं के बीच सीधे संपर्क ज़रूरी है।

लेकिन आश्चर्जनक रूप से, कई बैक्टीरिया पनपे और संख्यावृद्धि भी करते दिखे। यानी पुनर्संयोजन हुआ था। और इसने दोनों उत्परिवर्तियों को अपनी-अपनी पोषण की कमी की भरपाई करने में मदद की थी।

इसका मतलब था कि ऐसा कोई एजेंट था जो उस महीन फिल्टर में से आ-जा सकता था। जब उन्होंने उस एजेंट का शुद्धिकरण किया तो पाया कि वह न तो शुद्ध डीएनए से बना था और न ही आरएनए से क्योंकि इन्हें तोड़ने वाले एंज़ाइम का उस पर कोई असर नहीं हुआ। दरअसल, यह एजेंट एक बैक्टीरियोफेज निकला।

हुआ यह था कि लेडरबर्ग और ज़िंडर ने जिस साल्मोनेला का उपयोग किया था वह काफी पहले एक लायसोजेनिक वायरस से संक्रमित था, जिसका डीएनए साल्मोनेला के जीनोम में जुड़ गया था और बैक्टीरिया के प्रजनन के साथ वायरस डीएनए की प्रतिलिपियां भी आगे बढ़ती गई थीं। प्रयोग के दौरान वह वायरस डीएनए से अलग हो गया, खुद की प्रतिलिपियां बनाने लगा और फिर बैक्टीरिया कोशिका फट गई और वायरस बाहर रखे माध्यम में जा पहुंचा। बैक्टीरिया जीनोम से अलग होने से पहले वह वायरस अपने साथ बैक्टीरिया के डीएनए के कुछ खंड भी लेता गया। फिल्टर वायरसों की आवाजाही के लिए ठीक था। तो वायरसों के साथ बैक्टीरिया के जीन्स भी नली की दूसरी भुजा में पहुंचे, वहां उन्होंने उस भुजा के बैक्टीरिया को संक्रमित किया और उनके जीनोम्स में फिट हो गए। लेडरबर्ग और ज़िंडर का निष्कर्ष था कि नए-नए संक्रमित बैक्टीरिया में वे जीन पहुंच गए जो उनके पोषण सम्बंधी अभाव की भरपाई करते थे।

यहां यह स्पष्ट कर देना लाज़मी है कि वायरस किसी बैक्टीरिया को संक्रमित करने के बाद दो रास्ते अपना सकता है – लायसोजेनिक और लायसिस। लायसोजेनिक मार्ग में होता यह है कि वायरस अपना पूरा जीनोम बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़कर सुप्त हो जाता है। फिर बैक्टीरिया की कोशिका के विभाजन के साथ वायरस के जीनोम की भी प्रतिलिपि बनती रहती है। मौका आने पर वायरस का जीनोम अलग होकर स्वयं की प्रतिलिपियां बनाने लगता है (यानी नए वायरस बनने लगते हैं) जो बैक्टीरिया कोशिका को फोड़कर बाहर निकल आते हैं। लायसिस की प्रक्रिया में वायरस संक्रमण के तत्काल बाद अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और कोशिका के विनाश कारण बन जाता है। कतिपय तनाव की परिस्थितियों में (जैसे पराबैंगनी विकिरण) वायरस का जीनोम मेज़बान के गुणसूत्र से अलग होकर अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और मेज़बान कोशिका को फोड़कर सारे वायरस बाहर निकल जाते हैं। लायसोजेनी की क्रियाविधि का खुलासा आंद्रे ल्वॉफ ने ई. कोली पर काम करते हुए किया था।

यह सही हैं कि ट्रांसडक्शन प्रक्रिया की खोज साल्मोनेला में हुई, लेकिन इसे मनचाहा जीन हस्तांतरण की विधि के रूप ई. कोली में ही विकसित किया गया।

ट्रांसडक्शन की खोज और आगे का विकास बुनियादी महत्व का साबित हुआ। एक तो इससे स्पष्ट हुआ कि प्रोकेरियोट्स (जिनमें एक सुपरिभाषित केंद्रक नहीं होता) में ज़रूरी नहीं कि दो जीवों की पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का पुनर्संयोजन हो। उनमें आपस में डीएनए के छोटे-छोटे खंड का लेन-देन भी होता है। दूसरी ओर केंद्रक युक्त (यूकेरियोट्स) कोशिकाओं में पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का मिलन ज़रूरी होता है। प्रोकेरियोट्स और यूकेरियोट्स के बीच विभेद का यह मापदंड आणविक जीव विज्ञान की एक बुनियादी अवधारणा है।

बहरहाल, ट्रांसडक्शन ने चिकित्सा और जैव-टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में भी भारी योगदान दिया है। इसने बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के त्वरित प्रसार की एक नई प्रक्रिया का खुलासा किया।

ट्रांसडक्शन जेनेटिक इंजीनियरिंग में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। इसकी मदद से जीन्स का हस्तांतरण करवाया जा सकता है। 1970 के दशक में वैज्ञानिक डीएनए के मनचाहे खंडों को बैक्टीरियोफेज में जोड़कर उसे किसी अन्य बैक्टीरिया में पहुंचाना सीख गए थे। फिर 1990 के दशक में किसी वायरस-वाही की मदद से किसी गड़बड़ जीन के स्थान पर स्वस्थ जीन पहुंचाना जीन थेरपी का आधार बना।

मनचाहे रसायनों का उत्पादन

ट्रांसडक्शन ने ई. कोली के जीनोम में फेरबदल करने की तकनीक उपलब्ध कराई। लिहाज़ा, ई. कोली के जीनोम में परिवर्तन करके उससे मनचाहे रसायन बनवाए जा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, फिनाइलप्रोपेनॉइड यौगिकों को लेते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड समूह के पदार्थ पौधों को विभिन्न तरह से सुरक्षा प्रदान करते हैं। जैसे पौधों की कोशिका भित्ती को दृढ़ता प्रदान करने वाला लिग्निन फिनाइलप्रोपेनॉइड से बनता है। ये पदार्थ पौधों को सूक्ष्मजीवों और पराबैंगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। फूलों व फलों को रंगत देने वाले फ्लेवोनॉइड तथा एंथोसायनीन भी फिनाइलप्रोपेनॉइड से ही बनते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड्स खाद्य परिरक्षण व पैकेजिंग, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन तथा जैव ईंधन जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण हैं।

कोशिश यह है कि फिनाइलप्रोपेनॉइड्स का उत्पादन ई. कोली से करवाया जाए। इसके लिए पौधों के फिनाइलप्रोपेनॉइड बनाने वाले जीन्स को ई. कोली  के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ई. कोली ऐसे पदार्थों को सहन नहीं कर सकता। इसलिए ज़रूरी है कि ई. कोली से फिनाइलप्रोपेनॉइड्स बनवाने के लिए पौधों से इन पदार्थों के निर्माण व सहिष्णुता के जीन्स भी बैक्टीरिया में जोड़े जाएं। और कुछ मामलों में यह सफलतापूर्वक किया भी गया है।

एक महत्वपूर्ण तकनीक

ई. कोली पर काम करते हुए लेडरबर्ग और एस्थर ने रेप्लिका प्लेटिंग नामक एक तकनीक का विकास किया जो बैक्टीरिया की छंटाई की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। इसका उपयोग करके यह पता लगाया जा सकता था कि कौन-से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के या संक्रामक वायरस के प्रतिरोधी हैं। इसमें किया यह जाता है कि एक तश्तरी (मास्टर प्लेट) में बैक्टीरिया कॉलोनियों को पनपने दिया जाता है। फिर इस तश्तरी से इन बैक्टीरियल कॉलोनी की छाप को एक अन्य बैक्टीरियाविहीन तश्तरी पर आरोपित कर दिया जाता है। यह मास्टर तश्तरी की प्रतिकृति होती है। इसके बाद एंटीबायोटिक या संक्रामक वायरस को उस दूसरी तश्तरी पर छिड़का जाता है। तब सिर्फ वही कॉलोनी विकसित होंगी जो प्रतिरोधी है। इस तरह से मास्टर तश्तरी पर प्रतिरोधी कॉलोनियों की स्थिति पता चल जाती है।

रेप्लिका प्लेटिंग के प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध उत्परिवर्तनों का परिणाम है, न कि चयनकारी वातावरण के प्रति किसी अनुकूलन का।

जीन नियमन

जीन नियमन का अध्ययन पेरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में शुरू हुआ था। जीन नियमन के विकास में तीन लोगों का योगदान प्रमुख रहा – आंद्रे ल्वॉफ, जेकेस मोनोड और फ्रांस्वा जेकब। यहां बताया जा सकता है कि ये तीनों ही नाज़ी अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष में गहराई से जुड़े थे।

1941 में जैकेस मोनोड ने ई. कोली तथा बैसिलस सब्टिलिस पर काम करते हुए डाइऑक्सी (Diauxie) की खोज की थी। डाइऑक्सिक प्रयोग (Diauxic experiment) एक ऐसा प्रयोग है जिसमें एक जीव को दो अलग-अलग शर्कराओं (जैसे ग्लूकोज़ और लैक्टोज़) के मिश्रण वाले माध्यम में पनपाया जाता है। इस प्रयोग में, जीव पहले एक शर्करा (प्राय: ग्लूकोज़) का उपयोग करता है। इस दौरान, जीव तेज़ी से बढ़ता है। जब ग्लूकोज़ समाप्त हो जाता है, तो जीव को लैक्टोज़ का उपयोग करने के लिए अनुकूलित होने में कुछ समय लगता है। इस दौरान, जीव की वृद्धि धीमी हो जाती है। इसके बाद जीव लैक्टोज़ का उपयोग करना शुरू कर देता है। वृद्धि का यह दूसरा चरण पहले चरण की तुलना में धीमा होता है।

यह प्रयोग जीवों द्वारा शर्करा के चयापचय और एंज़ाइम संश्लेषण की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है और जीन नियमन के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह प्रयोग विभिन्न प्रकार के जीवों में चयापचय अनुकूलन का अध्ययन करने के लिए भी उपयोगी है। मोनोड ने इसे एंज़ाइम अवरोध या एंज़ाइमों के दमन का परिणाम बताया। मोनोड की प्रारंभिक व्याख्या इस विचार पर केंद्रित थी कि लैक्टोज़ चयापचय के लिए आवश्यक एंज़ाइम ग्लूकोज़ की उपस्थिति में बाधित या दबा दिए जाते हैं।  

मोनोड ने आगे बढ़कर ई. कोली में लैक्टोज़ तंत्र का जेनेटिक विश्लेषण किया। उन्होंने स्थापित किया कि ई. कोली में बीटा-गैलेक्टोसाइडेज़ एंज़ाइम का संश्लेषण तीन जीन्स पर निर्भर होता है। इसके उत्पादन को विशिष्ट उद्दीपनों पर शुरू करवाया जाता है। ऐसा एक उद्दीपन होता है लैक्टोज़ की उपस्थिति।

कई सारे प्रयोगों के बाद जेकब और मोनोड ने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था।

जीन नियमन का मॉडल

जेकब और मोनोड ने ई. कोली मॉडल में जीन नियमन की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया था। इसी दौरान उन्होंने संदेशवाहक यानी मेसेंजर आरएनए (एम-आऱएनए) की खोज की थी। एम-आरएनए ही डीएनए पर उपस्थित जेनेटिक सूचना को राइबोसोम तक ले जाने का काम करता है। इसके बाद उन्होंने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था। इस मॉडल के अनुसार किसी एक प्रक्रिया के लिए ज़िम्मेदार जीन्स ऑपेरॉन नामक समूह में एकीकृत होते हैं। यह भी कहा गया था कि एक ही एम-आरएनए एकाधिक सम्बंधित प्रोटीन्स का वाहक हो सकता है। इस मॉडल से यह समझने में मदद मिली कि कोशिका में विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में प्रोटीन उत्पादन का समन्वय कैसे किया जाता है। जेकब और मोनोड ने ई. कोली में लैक ऑपेरॉन (lac operon) के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया था।

यह ऑपेरॉन ई. कोली में लैक्टोज़ नामक शर्करा के पाचन के लिए ज़रूरी एंज़ाइम के निर्माण का नियमन करता है। जेकब और मोनोड यह दर्शाने में सफल रहे थे कि इस ऑपेरॉन की अभिव्यक्ति एक दमनकारी (repressor) जीन से संचालित होती है जो लैक्टोज़ की अनुपस्थिति में डीएनए के एक हिस्से से जुड़ जाता है और उसकी अभिव्यक्ति को बाधित कर देता है। जब लैक्टोज़ उपस्थित होता है तो वह (लैक्टोज़) जाकर इस दमनकारी जीन से जुड़कर उसकी क्रिया को रोक देता है और डीएनए से एम-आरएनए का निर्माण (प्रतिलेखन) शुरू हो जाता है। इस मॉडल ने न सिर्फ एम-आरएनए की उपस्थिति प्रमाणित की बल्कि यह जटिल जीवों में जीन नियमन को समझने का मॉडल बना।

इस पूरी प्रक्रिया को कदम-दर-कदम समझने और एक संपूर्ण चित्र तैयार करने में कई वैज्ञानिकों, कई सूक्ष्म जीवों की भूमिका रही है, जिनमें ई. कोली ने भी हाथ बंटाया है। और जीन नियमन की प्रक्रिया का खुलासा करने के लिए जेकब और मोनोड (साथ में आंद्रे ल्वॉफ) को 1965 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

डीएनए से प्रोटीन का सफर

वैज्ञानिकों के शोध कार्य से यह तो स्पष्ट हो गया था कि डीएनए में न्यूक्लियोटाइड के क्रम से ही यह तय होता है कि कौन-से प्रोटीन बनेंगे। लेकिन यह प्रक्रिया कैसे काम करती है, इसे लेकर कई सारे विचार थे।

एक विचार यह था कि डीएनए के अणु पर ही प्रोटीन का संश्लेषण होता है (जॉर्ज गैमोव)। दूसरी ओर, यह विचार भी था कि प्रोटीन का संश्लेषण डीएनए के अणु पर नहीं बल्कि कोशिका द्रव्य में होता है और इसके लिए आरएनए की ज़रूरत होती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि यह प्रक्रिया होती कैसे है और इसमें आरएनए की क्या भूमिका है?

फिर 1940 के दशक में ज़्यां ब्रेश और टॉरब्योर्न कैस्परसन (Jean Brachet, Torbjörn Caspersson) ने ई. कोली व अन्य जीवों पर काम करके बताया कि आरएनए ज़्यादातर कोशिका द्रव्य में पाया जाता है और जिस कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण तेज़ गति से हो रहा हो उसमें आरएनए की मात्रा भी अधिक होती है। इससे लगा कि प्रोटीन संश्लेषण और आरएनए के बीच कुछ सम्बंध है।

आरएनए की भूमिका की पहली परिकल्पना आंद्रे बोइविन (André Boivin) के वर्ष 1947 के शोध पत्र में सामने आई थी। यह शोध पत्र फ्रेंच भाषा में लिखा गया था, लेकिन अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए संपादकीय में पर्चे का सार इन शब्दों में व्यक्त किया गया था: “डीएनए नामक विशाल अणु एक अन्य विशाल अणु आरएनए के निर्माण का संचालन करता है और ये आरएनए अणु कोशिका द्रव्य में प्रोटीन निर्माण का नियंत्रण करते हैं।”

इसके बाद 1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने ई. कोली के कोशिका द्रव्य का विश्लेषण करके आरएनए प्रचुर संरचनाएं खोजीं जिन्हें उस समय माइक्रोसोमल पार्टिकल कहा गया। आगे चलकर इनका नाम राइबोसोम हुआ और यह पहचाना गया कि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का प्रमुख पात्र है। राइबोसोम पर उपस्थित आरएनए के आधार पर यह विचार बना कि राइबोसोम ही प्रोटीन संश्लेषण की स्थली है।

धीरे-धीरे डीएनए से प्रोटीन तक की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हुई। डीएनए से संदेशवाहक आरएनए बनता है जो जाकर राइबोसोम से जुड़ जाता है। यहां छोटे-छोटे आरएनए अणु (ट्रांसफर आरएनए – tRNA) बनते हैं जो कोशिका द्रव्य में से एक-एक अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक लाते हैं जिन्हें जोड़कर प्रोटीन बनता है।

इन खोजों ने न सिर्फ जीव विज्ञान में समझ को आगे बढ़ाया बल्कि इसने आजकल हो रहे जीव वैज्ञानिक नवाचारों का मार्ग भी प्रशस्त किया। एम-आरएनए की खोज ने चिकित्सा के क्षेत्र में नए विचारों को जन्म दिया।

बैक्टीरिया में लैंगिक प्रजनन

एफ. जेकब और ई. वोलमैन ने बैक्टीरिया में लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्र की वृत्ताकार बनावट को उजागर किया था। इसके लिए उन्होंने एक अन्य प्रयोगशाला में पृथक किए गए ई. कोली के एक स्ट्रेन की मदद ली थी।

रीकॉम्बिनेन्ट टेक्नॉलॉजी

ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरस रिकॉम्बिनेंट डीएनए टेक्नॉलॉजी के विकास में प्रमुख रहे हैं। यह टेक्नॉलॉजी डब्ल्यू. आर्बर (Werner Arber) द्वारा रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज पर आधारित थी।

रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज भी ई. कोली और बैक्टीरियोफेज पर किए गए प्रयोगों से ही संभव हुई थी। सबसे पहले तो यह देखा गया कि कुछ फेज किसी एक बैक्टीरिया स्ट्रेन पर विकसित होने के लिए अनुकूलित होते हैं लेकिन किसी अन्य स्ट्रेन पर नहीं। इसका मतलब है कि बैक्टीरिया में बाहरी डीएनए के विरुद्ध कुछ प्रतिरोधक प्रक्रिया होती है।

इस अवलोकन ने स्टुअर्ट लिन (Stuart Linn) और आर्बर को ई. कोली में से दो तरह के एंज़ाइम पृथक करने को प्रेरित किया – रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम तथा मॉडिफिकेशन एंज़ाइम। आगे चलकर हैमिल्टन स्मिथ (Hamilton Othanel Smith) ने एक बैक्टीरिया हीमोफिलस इंफ्लुएंज़े में से एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम शुद्ध रूप में प्राप्त भी किया। लिन और आर्बर ने एक मॉडिफिकेशन एंज़ाइम (मिथायलेज़) प्राप्त किया जो डीएनए पर सुरक्षात्मक मिथाइल समूह जोड़ता है और एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम मिथाइल समूह रहित सारे डीएनए को तोड़ देता है। यानी स्वयं बैक्टीरिया का डीएनए मिथाइल समूह युक्त होने के चलते बच जाएगा जबकि बाहर से आया डीएनए नष्ट कर दिया जाएगा।

इस खोज का महत्व स्वत: स्पष्ट है – इसने हमें डीएनए के साथ खिलवाड़ का एक महत्वपूर्ण औज़ार उपलब्ध कराया है।

यह थी कुछ महत्वपूर्ण अध्ययनों पर बात। लेकिन, जैसा कि शुरू में भी कहा था, ई. कोली  कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है और इसके ज़रिए कई खुलासे हुए हैं, भविष्य में भी शोध होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

Photo credit – https://www.news-medical.net/life-sciences/What-is-Viral-Transduction.aspx

डॉल्फिन की रणनीति: खदेड़ो, उल्टी करवाओ, खाओ

जलचर स्तनधारियों को सिटेशियन कहते हैं। इनमें व्हेल, डॉल्फिन तथा पॉरपॉइज़ शामिल हैं। और इनमें भी वैज्ञानिक देखते आए हैं कि डॉल्फिन का भोजन हासिल करने का तरीका बहुत विचित्र है। आम तौर पर डॉल्फिन करती यह है कि किसी मछली का पीछा करेंगी। वे उस मछली को खाएंगी नहीं बल्कि उसने जो शिकार पकड़ा है उसे छीनकर खा जाएंगी? इसे चोर-परजीविता या क्लेप्टोपैरासिटिज़्म कहते हैं। 2015 में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के समुद्री जीव वैज्ञानिक जेनेट मैन ने बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की शार्क बे में उन्होंने देखा है कि एक डॉल्फिन ने तीन पनकौओं की चोंच से मछली छीन ली। लेकिन समुद्री जीवों में यह व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है।

और अब तो इन्तहा हो गई है। एक डॉल्फिन विशेष (जिसे स्थानीय लोग बबल्स कहते हैं) ने अजीब व्यवहार का प्रदर्शन किया है। बबल्स किसी मछली का पीछा करेगी और फिर वह उसकी कै को चट कर जाएगी। सनशाइन कोस्ट विश्वविद्यालय की समुद्री जीव वैज्ञानिक एशिया आर्मस्ट्रॉन्ग को बबल्स के बारे में जानकारी 2017 में दक्षिणी ग्रेट बैरियर रीफ के लेडी एलियट द्वीप के नज़दीक बनाए गए एक वीडियो से मिली थी। यह एक बॉटलनोज़ डॉल्फिन (टर्सिओप्स ट्रन्केटस – Tursiops truncatus) थी। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम ने आगे खोजबीन की।

जून 2021 से अक्टूबर 2025 के बीच इस टीम ने बिगआई ट्रेवेली मछली (Caranx sexfasciatus) के झुंड में शिकार करती बबल्स की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया। हालांकि डॉल्फिन कभी-कभार मछलियां खाती हैं लेकिन यहां सारी मछलियों को छोड़कर डॉल्फिन एक के पीछे पड़ गई। उसने ट्रेवेली का काफी नज़दीक से तब तक पीछा किया किया जब तक कि वह उल्टी करके भाग नहीं गई। तब उस डॉल्फिन ने वह कै खा डाली। और तो और, इस डॉल्फिन ने अगले तीस मिनट में यही वारदात 10 अन्य ट्रेवेली मछलियों के साथ दोहराई।

उसने मछली को खाने की बजाय उसके उल्टी करने का इन्तज़ार क्यों किया, इस मामले में आर्मस्ट्रॉन्ग ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की है। हो सकता है कि अतीत में बबल्स उस ट्रेवेली को खाने के इरादे से ही झपटती रही होंगी लेकिन जब उसका पचा-पचाया भोजन (वमन) मिल गया तो उन्होंने रास्ता बदल लिया। वैसे भी ट्रेवेली काफी बड़ी होती है और उसे चबाने, हजम करने में समय और मेहनत लगती होगी। उसके मुकाबले उल्टी को संभालना ज़्यादा आसान साबित हुआ होगा।

अलबत्ता, इस चोर-परजीविता में भी बबल्स ने मेहनत तो की थी। ट्रेवेली समूह से उलझने से पहले बबल्स ने अपने सिर को दाएं-बाएं करते हुए क्लिक की ध्वनि उत्पन्न की। उसके बाद एक अकेली ट्रेवेली का पीछा करते वक्त उसने बार-बार क्लिकिंग ध्वनि निकाली और कई सारी निम्न आवृत्ति की ध्वनियां भी पैदा कीं। डॉल्फिन अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि की मदद से मछली के आकार, आकृति और संघटन में बारीक फर्क का अंदाज़ा लेती हैं। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम को लगता है कि सिर को दाएं-बाएं झटके देकर बबल्स को यह पता करने में मदद मिलती होगी कि किस ट्रेवेली ने अभी-अभी किसी शिकार को चट किया है। दूसरी ओर पीछा करने को दौरान उत्पन्न क्लिक ध्वनियां ट्रेवेली को उल्टी करने को उकसाती होंगी। वैसे शोधकर्ताओं को अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्लिक की आवाज़ें ट्रेवेली से उल्टी कैसे करवाती हैं। यह भी हो सकता है कि मछली डॉल्फिन से पीछा छुड़ाने के लिए वैसे ही उल्टी कर देती हो। बहरहाल, डॉल्फिन को तो भोजन मिल ही जाता है। (स्रोत फीचर्स)

इस वारदात के वीडियो के लिए लिंक्स

https://www.smithsonianmag.com/smart-news/meet-bubbles-a-dolphin-in-australia-that-chases-fish-until-they-barf-then-eats-their-upchucked-meals-180989547/ https://www.facebook.com/AustTraveller/videos/bubbles-has-figured-out-the-ultimate-seafood-hack-%EF%B8%8Fthis-very-cheeky-dolphin-has-/2322327231671387/

Picture credit – https://www.indiatoday.in/science/story/bottlenose-dolphin-forces-fish-to-vomit-then-eats-it-australia-study-30

बीजों की सुप्तावस्था के जैविक स्विच की खोज

अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।

जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।

आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।

इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।

इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।

इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)

Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)