संस्थानों द्वारा शोध अधिकार अपने पास रखना ज़रूरी – एस. सी. लखोटिया

शोध परिणामों का समकक्ष-समीक्षित पत्रिकाओं में प्रकाशन अनिवार्य है। इनके व्यापक प्रसारण के लिए ये सभी शोधकर्ताओं और इच्छुक पाठकों को मुफ्त और सुलभता से उपलब्ध होने चाहिए। पिछले कुछ दशकों में शोध प्रकाशन तंत्र में काफी परिवर्तन आए हैं। व्यावसायिक प्रकाशकों ने व्यापक स्तर पर अकादमिक संस्थानों और विद्वत सभाओं से जर्नल प्रकाशन का काम अपने हाथों में ले लिया है। इसके साथ ही आज के डिजिटल युग ने ऑनलाइन प्रकाशन को भी बढ़ावा दिया है। इन दोनों परिवर्तनों से उम्मीद थी कि वैश्विक स्तर पर शोध परिणामों तक पहुंच आसान हो जाएगी।

इसके विपरीत तथ्य यह है कि व्यावसायिक प्रकाशकों ने अपने व्यापारिक हितों के लिए शोध प्रकाशनों को भुगतान के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। अतः लेखकों/वित्तपोषकों या पाठकों को शोध-पत्र प्रोसेसिंग फीस या ओपन एक्सेस शुल्क के रूप में भारी रकम का भुगतान करना पड़ता है। हालांकि सभी पत्रिकाएं इस तरह का शुल्क नहीं लगाती हैं, अधिकांश ‘प्रतिष्ठित’ या ‘उच्च प्रभाव’ पत्रिकाएं शोध पत्रों के प्रकाशन या प्रकाशित सामग्री को पढ़ने के लिए शुल्क की मांग करती हैं। डिजिटल-पूर्व युग में प्रकाशित सामग्री या तो पुस्तकालय/व्यक्तिगत सदस्यता से या फिर संस्थानों के बीच पत्रिकाओं के आदान-प्रदान या लेखकों द्वारा बिना किसी शुल्क के साझा की जाती थीं। वर्तमान में अकादमिक संस्थानों के बीच शोध पत्रिकाओं का आदान-प्रदान लगभग खत्म हो गया है। यहां तक कि अधिकांश लेखक कॉपीराइट अनुबंध उल्लंघन की गलत समझ के कारण अपने प्रकाशित शोध पत्रों की सॉफ्ट कॉपी तक अपने साथियों के साथ साझा करने में संकोच करते हैं।

डिजिटल ऑनलाइन सामग्री के ओपन या ‘ग्रीन’ एक्सेस का मतलब ऐसे शोध पत्रों से है जो निशुल्क हों और लगभग सभी कॉपीराइट और लाइसेंसिंग प्रतिबंधों से मुक्त हों। कई चर्चाओं और घोषणाओं के बाद भी ओपन या ‘ग्रीन’ एक्सेस की उम्मीद कम ही नज़र आती है क्योंकि हाल के दशकों में शोध उत्पादों पर व्यावसायिक प्रकाशकों की गिरफ्त काफी मज़बूत हो गई है। अधिकांश मामलों में कॉपीराइट अनुबंध में शर्त होती है कि लेखक पूर्ण कॉपीराइट अधिकार प्रकाशक को सौंपें। एकतरफा रूप से तैयार किए गए कॉपीराइट समझौतों के परिणामस्वरूप शोध उत्पाद आंशिक या पूर्ण रूप से तब तक प्रकाशक के स्वामित्व में रहते हैं जब तक लेखकों/वित्तपोषकों द्वारा भारी प्रकाशन शुल्क का भुगतान नहीं किया जाता। ऐसे में लेखक प्रतिबंधित अवधि (6-24 माह या अधिक) के दौरान ओपन या ग्रीन एक्सेस के तहत व्यक्तिगत या संस्थागत वेबसाइट पर शोध पत्र के प्रकाशित संस्करण को पोस्ट नहीं कर सकते और न ही उन्हें इसे अपने काम के लिए फिर से उपयोग करने की स्वतंत्रता होती है। और तो और, प्रकाशक को भुगतान किए बिना उन्हें अपने ही लेख को अनुवाद करने की भी अनुमति नहीं होती। दूसरी ओर, व्यावसायिक प्रकाशक लेखकों या पाठकों पर ओपन एक्सेस शुल्क लगाकर, लेखकों की अनुमति के बिना अन्य प्रकाशकों को री-पैकेजिंग/सब-लायसेंस देकर खूब मुनाफा कमा सकते हैं।

ओपन साइंस पर अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद की रिपोर्ट में इस दुष्चक्र को सटीकता से प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार ‘कॉर्पोरेट प्रकाशक नियमित रूप से प्रकाशित करने की शर्त के रूप में उन्हें कॉपीराइट सौंपने की मांग करते हैं। ऐसा करते हुए, शोधकर्ता स्वयं अपनी इच्छा से और प्रकाशक द्वारा बिना किसी खर्चे के एक सार्वजनिक सामग्री का निजीकरण करने में सहायता करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में प्रकाशकों की पहली ज़िम्मेदारी उनके शेयरधारकों के प्रति होती है, न कि विज्ञान के प्रति। कॉर्पोरेट वैज्ञानिक प्रकाशन कंपनियों का यह मॉडल घोर असंतुलित है जिसमें वैज्ञानिक अपना काम उन्हें तोहफे में दे देते हैं और फिर इसी काम को बढ़ी हुई कीमतों पर वापस खरीदते हैं – चाहे व्यक्तिगत रूप से या विश्वविद्यालयों/सरकारी संस्थाओं द्वारा भुगतान के ज़रिए।

प्रकाशकों के हाथों में तुरुप का इक्का यह है कि उन्होंने उच्च प्रभाव वाली पत्रिकाओं के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया है और फिर वे जो कुछ प्रकाशित करते हैं, उसके पाठकों की संख्या तथा उद्धरण (साइटेशन) को बढ़ावा देते हैं तथा प्रभाव गुणांक में वृद्धि करते रहते हैं। उधर विश्वविद्यालय प्रभाव गुणांक और उद्धरण संख्या का उपयोग अपनी अकादमिक उन्नति के मानदंड के रूप में करते हैं। इस तरह के परस्पर सुदृढीकरण की वजह से शोधकर्ताओं और उनके संस्थानों को लगता है कि किसी उतनी ही गुणवत्ता वाले जर्नल में कम भुगतान करके प्रकाशन करने की बजाय बेहतर होगा कि किसी विशेष पत्रिका में प्रकाशन के लिए ज़्यादा भुगतान किया जाए। यह स्थिति सीमित संसाधनों वाले शोधकर्ताओं के लिए घोर अन्याय है। यह इस सामान्य सोच के भी विपरीत है कि सार्वजनिक धन का उपयोग मुख्य रूप से अनुसंधान और उसके परिणामों के प्रसार में किया जाना चाहिए, न कि व्यावसायिकता को बढ़ावा देने के लिए।

क्रिएटिव कॉमन्स एट्रिब्यूशन लायसेंस (CC-BY) या इसी तरह के ओपन लायसेंस के लिए ज़रूरी है कि सभी बौद्धिक-संपदा अधिकार लेखकों के पास रहे और केवल गैर-एक्सक्लूसिव प्रकाशन अधिकार ही प्रकाशकों को हस्तांतरित किए जाएं। यदि वित्तपोषक ओपन एक्सेस का दाम न चुका पाएं, तो लेखकों द्वारा प्रकाशकों को लगभग सभी कॉपीराइट अधिकार प्रकाशक को सौंप दिया जाना अन्यायपूर्ण है। प्रकाशकों द्वारा भुगतान की दीवार खड़ी कर देने के कारण विश्व भर में प्रकाशित अधिकांश शोध पत्र शोधकर्ताओं और अन्य पाठकों की पहुंच से दूर हो जाते हैं। इस प्रणाली के कारण विकासशील देशों और कम संसाधन वाली संस्थाओं के शोधकर्ताओं को कई तरह से नुकसान होता है। चूंकि प्रकाशन/ओपन एक्सेस की यह कीमत आम तौर पर पत्रिका के ‘प्रभाव गुणांक’ (इम्पैक्ट फैक्टर, आईएफ) के समानुपाती होती है, कम संसाधनों वाले शोधकर्ता ऐसी पत्रिकाओं की तलाश करते हैं जो कम या फिर कोई शुल्क नहीं लेती हैं। ऐसी कम ‘प्रतिष्ठित’ पत्रिकाओं को समकक्ष शोधकर्ताओं द्वारा पूरी तरह अनदेखा किया जाता है, भले ही शोध कार्य उच्च स्तरीय हो। आईएफ के उपयोग के खिलाफ कई दलीलों और सैन फ्रांसिस्को घोषणा पत्र में इसकी निंदा के बावजूद, जर्नल के आईएफ को शोध मूल्यांकन मानदंड के रूप में उपयोग किया जाना जारी है। उच्च आईएफ पत्रिकाओं में प्रकाशन नहीं होने से लेखक और संस्थान की रैंकिंग कम होती है जिसका प्रभाव उनके भावी शोध संसाधनों पर भी पड़ता है।        

कॉपीराइट अधिकार को अपने पास रखने की संस्थागत अधिकार प्रतिधारण नीति अथवा राइट्स रिटेंशन पॉलिसी (आरआरपी) को अपनाने से किसी संस्थान के शोध परिणाम पढ़ने के इच्छुक पाठकों को अबाधित मुफ्त पहुंच मिलती है क्योंकि –

(1) इस नीति से स्वीकृत लेखकीय पांडुलिपि (एएएम– प्रकाशक द्वारा अतिरिक्त संपादकीय प्रक्रियाएं न की गई समकक्ष समीक्षित और स्वीकृत संस्करण) पर लेखक के पास अपने शोध पत्र को, बिना प्रकाशक की अनुमति की आवश्यकता के, पुनः उपयोग करने का अधिकार होता है।

(2) विश्वविद्यालय अपने सदस्यों के शोध पत्रों तक सभी को मुफ्त पहुंच प्रदान करता है। आरआरपी नीति के अंतर्गत सदस्यों के लिए अपने शोध पत्रों के एएएम संस्करणों की सॉफ्टकॉपी संस्था के सर्वर पर उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

विश्व के कई शैक्षणिक संस्थानों ने आरआरपी को अपनाया है। इस नीति के तहत शोध पत्रों के सार्वजनिक रूप से सुलभ संस्थागत संग्रहण की आवश्यकता होती है जहां संस्थान के सदस्यों को अपने शोध पत्रों के एएएम संस्करणों को खुले लायसेंस के तहत जमा करना होता है। लेखक अपने संस्थान को लायसेंस प्रदान करता है कि वह लेख से सम्बंधित सभी अधिकारों का उपयोग कर सके और अन्य सह-लेखकों को भी ऐसा करने के लिए अधिकृत कर सके। इस प्रक्रिया में लेखकों को कॉपीराइट का अधिकार मिल जाता है जिससे उन्हें प्रकाशन के बाद अपने स्वयं के काम को फिर से उपयोग करने की स्वतंत्रता मिलती है। आरआरपी के तहत यह आवश्यक है कि पांडुलिपि की पहली प्रस्तुति के दौरान उसके साथ एक शपथ पत्र हो जिसमें लेखक द्वारा ओपन एक्सेस की घोषणा की गई हो। यह अग्रिम रूप से संपादक और प्रकाशक को मेज़बान संस्थान/वित्तपोषक के आरआरपी के अस्तित्व की सूचना देता है। बाहरी शर्तों की बजाय संस्थागत नीतियों की प्राथमिकता  होती है। इससे भविष्य में किसी भी कानूनी समस्या से सुरक्षा मिलती है।

संस्थागत आरआरपी नीति व्यावसायिक प्रकाशकों के उस अनुचित एकाधिकार को खत्म करती है जो उन्हें शोध उत्पाद के अधिकार छीनने की अनुमति देता है। अकादमिक संस्थानों द्वारा आरआरपी अपनाने से एक डर यह बताया जाता है कि इससे संस्थान के सदस्यों के शोध के उच्च प्रभाव गुणांक पत्रिकाओं में प्रकाशन पर असर पड़ता है। इस दावे का खंडन किया जा चुका है। आरआरपी के तहत कुछ विशेष मामलों में लेखक को ओपन एक्सेस से छूट का प्रावधान रखा जा सकता है लेकिन यह छूट रिपॉज़िटरी में जमा करने से नहीं होनी चाहिए। विश्व के कई विश्वविद्यालयों के अनुभव बताते हैं कि जिन संस्थानों ने संस्थागत आरआरपी नीति को अपनाया है, वहां ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी प्रकाशक ने आरआरपी के कारण स्वीकृत पांडुलिपि को प्रकाशित करने से मना किया हो।

भारत सरकार ‘वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन’ (ओएनओएस) नीति पर विचार कर रही है ताकि भारतीय पाठकों के लिए निर्धारित प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित लेखों की पहुंच ग्रीन ओपन एक्सेस के तहत सुनिश्चित की जा सके। अगर यह नीति सफल भी हो जाती है, तब भी भारत के बाहर रहने वाले पाठकों के लिए भारत में प्रकाशित शोध लेखों का ग्रीन ओपन एक्सेस नहीं मिल पाएगा और भारतीयों की भी उन पत्रिकाओं तक पहुंच नहीं हो पाएगी जो ओएनओएस के दायरे के बाहर हैं। लेकिन यदि देश के संस्थानों द्वारा आरआरपी को अपनाया जाता है तो पूरे विश्व में देश के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित शोध उत्पाद तक मुफ्त पहुंच संभव होगी। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान एवं टेक्नॉलॉजी विभागों की ‘ओपन साइंस पॉलिसी (2014)’ के तहत डीबीटी/डीएसटी द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित अनुसंधान परियोजनाओं से जारी होने वाली अंतिम स्वीकृत पांडुलिपियों को संस्थागत रिपॉज़िटरी या इंटरऑपरेबल इंस्टीट्यूशनल ओपन एक्सेस रिपॉजि़टरी या सेंट्रल हार्वेस्टर में जमा करना अनिवार्य है। इस नीति के सख्ती से क्रियान्वयन और देश के विभिन्न शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों द्वारा आरआरपी को अपनाने से अपेक्षित ओपन साइंस के द्वार खुल जाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

इस आलेख का  मूल अंग्रेज़ी संस्करण 25 फरवरी 2023 को करंट साइंस में प्रकाशित हुआ है और इसका हिंदी अनुवाद लेखक की अनुमति के साथ यहां प्रकशित किया गया है।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बहुमूल्य डायनासौर जीवाश्म की घर वापसी

गभग दो वर्ष लंबी बातचीत के बाद एक जीवाश्म घर लौटने को है। 11 करोड़ वर्ष पुराना यह जीवाश्म दक्षिण अमेरिका में पाए गए पंख जैसी संरचनाओं वाले पहले गैर-पक्षी डायनासौर का है और फिलहाल जर्मनी स्थित स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में है। संभवत: जून तक यह वापस ब्राज़ील आ जाएगा।

दिसंबर 2020 में जर्मनी, मेक्सिको और यू.के. के जीवाश्म-विज्ञानियों ने क्रेटेशियस रिसर्च नामक जर्नल में इस डायनासौर (उबिराजारा जुबैटस) का वर्णन किया था। तब से यह जीवाश्म ब्राज़ील और जर्मन अधिकारियों के बीच विवाद का विषय बन गया। 1990 के दशक में जीवाश्म को ब्राज़ील के अरारीप बेसिन से जर्मनी लाया गया था।    

1942 में पारित कानून के अनुसार ब्राज़ील में पाया गया हर जीवाश्म राष्ट्रीय संपत्ति है जिसे बिना अनुमति देश की सीमा से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। वैसे शोधकर्ताओं का दावा है कि ब्राज़ील के एक खनन अधिकारी से उन्हें परमिट प्राप्त हुआ था। लेकिन ब्राज़ील के सरकारी वकील राफेल रयोल के अनुसार इस परमिट में जीवाश्म को दान करने की कोई स्पष्ट अनुमति नहीं दी गई थी। संभव है कि उबिराजारा का जीवाश्म किसी बक्से में था और उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था।

क्रेटेशियस रिसर्च में प्रकाशन के बाद उपनिवेशवादी मानसिकता का हवाला देते हुए एक ऑनलाइन अभियान (#UbirajaraBelongsToBrazil) के माध्यम से नमूने की वापसी का सफर शुरू हुआ। ऐसा कई बार हुआ है जब धनी देशों के वैज्ञानिकों द्वारा निम्न और मध्यम आय वाले देशों के जीवाश्मों पर कब्ज़ा किया गया है। यह जीवाश्म किसी नई प्रजाति का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कसौटी है। ऐसे जीवाश्म को होलोटाइप कहते हैं और इनके निर्यात पर प्रतिबंध है। विवाद के चलते क्रेटेशियस रिसर्च ने इस पेपर को वापस ले लिया है।

सितंबर 2021 में जर्मन संग्रहालय द्वारा जीवाश्म लौटाने से मना करने के बाद ब्राज़ील ने आधिकारिक अनुरोध प्रस्तुत किया जिसे ठुकरा दिया गया। अंतत: जुलाई 2022 जीवाश्म को वापस करने का फैसला लिया गया। इसे संभवत: जून में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय को सौंप दिया जाएगा।

ब्राज़ील के वैज्ञानिक समुदाय को उम्मीद है कि इस मामले के बाद जीवाश्म विज्ञान के क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू होगा। जीवाश्म का ब्राज़ील वापस आना एक महत्वपूर्ण संदेश है और इससे भविष्य में जीवाश्मों को अपने मूल देशों में वापस लाने का रास्ता खुल जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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सी. आर. राव को गणित का नोबेल पुरस्कार – मनीष श्रीवास्तव

भारतीय—अमेरिकी गणितज्ञ और सांख्यिकीविद सी. आर. राव (कल्यामपुडी राधाकृष्ण राव) को वर्ष 2023 के अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। इसे गणित का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। पुरस्कार के लिए उनके नाम की घोषणा करते हुए इंटरनेशनल प्राइज़ इन स्टैटिस्टिक्स फाउंडेशन द्वारा कहा गया कि “वे गणित विज्ञान की दुनिया के लेजेंड है। उन्होंने लगभग 75 वर्ष पहले अपने काम के ज़रिए सांख्यिकी के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी।” यह पुरस्कार हर दो साल में पांच प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से प्रदान किया जाता है।

आज उन्हीं राव को जुलाई माह में कनाडा के ओटावा शहर में आयोजित होने वाली विश्व सांख्यिकी कांग्रेस में पुरस्कार सहित 80 हज़ार अमेरिकी डॉलर की सम्मान राशि से सम्मानित किया जाएगा। आइए, सी. आर. राव से परिचय करें।

सी. आर. राव का जन्म कर्नाटक की हदगली नाम की जगह पर एक तेलुगु परिवार में 10 सितंबर 1920 को हुआ था। राव ने अपनी आरंभिक और उच्च शिक्षा आंध्रप्रदेश के गुदुर, नंदीगामा और विशाखापट्टनम में प्राप्त की। अध्ययन में गहरी रुचि रखने वाले राव ने गणित में एमएससी की और इसके बाद विशेष रूप से गणित की एक शाखा सांख्यिकी में एम.ए. किया। सांख्यिकी उनका प्रिय विषय रहा और इसी ने अंतत: उन्हें गणित का नोबेल सम्मान दिलाया।

भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी वे गंभीरता से अध्ययन करते रहे और इंग्लैण्ड जाकर कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी के किंग्स कॉलेज से पीएच. डी. तथा बाद में कैम्ब्रिज से ही डीएससी की उपाधि प्राप्त की। इस तरह वे अपने ज्ञान के स्तर को उच्चतर आयाम तक लेकर गए और गणित विज्ञान के क्षेत्र में बेहद सम्मान पाया।

ज्ञानार्जन करते हुए राव ने समय—समय पर विविध संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और फिर मानव विज्ञान संग्रहालय (कैम्ब्रिज) में सेवाएं दीं। इसके बाद अध्यापन करते हुए पिट्सबर्ग युनिवर्सिटी में प्रोफेसर और एबर्ली प्रोफेसर रहने के साथ ही अमेरिका के पेनसिल्वेनिया राज्य के एक एनालिसिस सेंटर के निदेशक पद पर रहकर कार्य किया। फिलहाल वे पेनसिल्वेनिया स्टेट युनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर सेवाएं दे रहे थे।

राव ने कम उम्र में ही अपने ज्ञान के उच्चतर स्तर से सभी को चकित कर दिया था। उन्होंने अध्ययन करते समय मात्र 25 वर्ष की आयु में ही महत्वपूर्ण शोध पत्र कलकत्ता मेथेमेटिकल सोसायटी के बुलेटिन में Information and accuracy attainable in the estimation of statistical parameters (सांख्यिकीय मापदंडों के अनुमान में पाने योग्य सूचना व सटीकता) प्रकाशित किया था। इस पेपर के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे स्टैटिस्टिक्स की महत्वपूर्ण पुस्तक ब्रेकथ्रूस इन स्टैटिस्टिक्स 1890—1990 में शामिल किया गया था। उनके इस शोध ने आधुनिक सांख्यिकी की स्थापना में विशेष योगदान दिया। उनकी महत्वपूर्ण खोजों ने न सिर्फ सांख्यिकी को प्रभावित किया बल्कि भू-गर्भविज्ञान, चिकित्सा, जैवमिति सहित उन सभी क्षेत्रों को लाभ पहुंचाया, जिनमें किसी न किसी तरह से सांख्यिकी का उपयोग होता है।

गणित का नोबेल सम्मान मिलने से पहले ही राव कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1968 में पद्म भूषण और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। वे शांति स्वरूप भटनागर विज्ञान और प्रौद्योगिकी पुरस्कार (1963), नेशनल मेडल ऑफ साइंस सम्मान (2002) प्राप्त करने के साथ ही रॉयल सोसायटी के फेलो (1967) भी रह चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया उन्हें 10 महान भारतीय वैज्ञानिकों में शुमार कर चुका है। आज उनकी उम्र 100 वर्ष से ज़्यादा है और आज भी वे सामाजिक जीवन में  सक्रिय हैं। अपनी ऊर्जा और विशिष्ट कार्यों के चलते वे वैश्विक प्रेरणास्रोत बन गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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पश्चिमी घाट का पालक्कड़ (पालघाट) दर्रा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

श्चिमी घाट का एक अहम विभाजक कहा जाने वाला पालक्कड़ दर्रा लगभग 40 किलोमीटर चौड़ा है। इसके दोनों ओर समुद्र तल से 2000 मीटर तक ऊंचे, एकदम खड़ी ढलान वाले नीलगिरी और अन्नामलाई पर्वत हैं।

ऐतिहासिक रूप से पालक्कड़ दर्रा केरल राज्य में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण रहा है। यहां से कोयम्बटूर को पालक्कड़ से जोड़ने वाले सड़क और रेल मार्ग गुज़रते हैं। इसके बीच से भरतप्पुझा नदी बहती है। पश्चिमी घाट के ऊष्णकटिबंधीय वर्षावनों के विपरीत, पालक्कड़ दर्रे की वनस्पति शुष्क सदाबहार वन की श्रेणी में आती है। यह दर्रा पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली वनस्पतियों और जंतुओं का विभाजक भी है। उदाहरण के लिए, मेंढकों की कई प्रजातियां दर्रे के केवल एक तरफ पाई जाती हैं।

भूवैज्ञानिक उथल-पुथल

यह दर्रा एक भूवैज्ञानिक अपरूपण क्षेत्र है जो पूर्व-पश्चिम की ओर खुलता है। अपरूपण क्षेत्र पृथ्वी की भूपर्पटी के कमज़ोर क्षेत्र होते हैं – यही कारण है कि कोयम्बटूर क्षेत्र में कभी-कभी भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं।

माना जाता है कि पालक्कड़ दर्रे का निर्माण ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के गोंडवाना भूभाग से टूटकर अलग होने के बाद महाद्वीपीय जलमग्न तटों के बहाव की वजह से हुआ है।

भारत और मेडागास्कर तब तक एक ही भूभाग का हिस्सा थे जब तक कि बड़े पैमाने पर हुई ज्वालामुखीय गतिविधि ने दोनों को विभाजित नहीं कर दिया था; यह विभाजन वहां हुआ था जहां पालक्कड़ दर्रा है – यह दर्रा बिलकुल मेडागास्कर के पूर्वी ओर स्थित रेनोत्सरा दर्रे का दर्पण प्रतिबंब है। दर्रा कितना पहले बना था? मेडागास्कर लगभग 10 करोड़ साल पहले अलग हो गया था, और दर्रा इससे पहले बन गया था; लेकिन कितने पहले बना था इस पर अभी सोच-विचार जारी है।

यह अनुमान है कि दर्रे के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों में अंतर का एक कारण प्राचीन नदी या सुदूर अतीत में समुद्र की घुसपैठ हो सकता है।

नीलगिरी पर्वत पर पाए जाने वाले हाथियों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अन्नामलाई पर्वत और पेरियार अभयारण्यों में पाए जाने वाले हाथियों से भिन्न होते हैं।

आईआईएससी बैंगलोर द्वारा किए गए एक अध्ययन में पेट पर सफेद धारी वाले शॉर्टविंग पक्षी के डीएनए अनुक्रम के विस्तृत डैटा का विश्लेषण किया गया है। शॉर्टविंग एक स्थानिक और संकटग्रस्त पक्षी है। ऊटी और बाबा बुदान के आसपास पाए जाने वाले पक्षियों को नीलगिरी ब्लू रॉबिन कहा जाता है; अन्नामलाई पर पाए जाने वाले पक्षी दिखने में थोड़े अलग होते हैं, और इन्हें व्हाइट-बेलीड ब्लू रॉबिन कहा जाता है।

दर्रे का दक्षिणी भाग

किसी भी क्षेत्र की जैव विविधता दो तरीकों से व्यक्त की जाती है। एक, प्रजातियों की प्रचुरता से। यानी किसी पारिस्थितिकी तंत्र में कितनी प्रजातियां पाई जाती हैं। और दूसरा, फाइलोजेनेटिक विविधता से। फाइलोजेनेटिक विविधता में देखा जाता है कि वहां उपस्थित प्रजातियों के बीच जैव विकास की दृष्टि से कितनी दूरी है।

हैदराबाद स्थित सीसीएमबी और अन्य संस्थानों के शोधदल द्वारा प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार पालक्कड़ दर्रे के दक्षिणी पश्चिमी घाट में ये दोनों विविधताएं प्रचुर मात्रा में हैं। मैग्नोलिया चंपका (चंपा) सहित यहां पेड़ों की 450 से अधिक प्रजातियां हैं, जो यहां लगभग 13 करोड़ वर्षों से अधिक समय से हैं।

भूमध्य रेखा से करीब होने के कारण गर्म मौसम और नम हवा के कारण दक्षिणी पश्चिमी घाट में बहुत बारिश होती है। इसलिए यह क्षेत्र जीवन के सभी रूपों के लिए एक आश्रय की तरह रहा है, भले ही बार-बार आते हिमयुगों और सूखे के चक्र ने आसपास के क्षेत्रों में जैव विविधता कम कर दी हो। देखा जाए तो पालक्कड़ दर्रे के उत्तर की ओर सालाना अधिक बारिश होती है, लेकिन दक्षिणी हिस्से में साल भर समान रूप से बारिश होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पहला उभयचर परागणकर्ता

मिल्क ट्री के मलाईदार फल और मकरंद से भरपूर फूल ब्राज़ील के मूल निवासी मेंढक ज़िनोहायला ट्रंकेटा (Xenohyla truncata) के प्रिय हैं। गर्म रातों में, इनके फलों को खाने और मकरंद के लिए भूरे रंग के ये मेंढक बड़ी संख्या में इन पौधों पर टूट पड़ते हैं। फूलों का मकरंद पीते हुए ये एकदम फूल के अंदर चले जाते हैं, सिर्फ इनके पिछले पैरों वाला हिस्सा बाहर से दिखाई देता है। इस दौरान चिपचिपे परागकण इनके शरीर से चिपक जाते हैं।

फूड वेब्स पत्रिका में शोधकर्ताओं ने संभावना जताई है कि इस तरह ये मेंढक जाने-अनजाने इन पौधों को परागित भी कर देते होंगे। युनिवर्सिटी ऑफ कैम्पिनास के लुईस फिलिप टोलेडो और उनके साथियों ने बताया है कि पहली बार किसी मेंढक को, या यू कहें कि किसी उभयचर को, किसी पौधे का परागण करते देखा गया है। आम तौर पर केवल कीटों और पक्षियों को ही परागणकर्ता के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले कुछ अध्ययनों में कुछ सरीसृप और स्तनधारी भी यह काम करते देखे गए हैं। और अब इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने परागणकर्ता के रूप में उभयचर की संभावना जताई है। इसकी पुष्टि के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

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ठंडक के लिए कुकुरमुत्ते

हाल ही में पता लगा है कि कुकुरमुत्ते (मशरूम) और अन्य फफूंदें अपने परिवेश के तापमान की तुलना में अधिक ठंडे बने रहते हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के अनुसार इसका कारण उनमें भरपूर मात्रा में पानी की उपस्थिति है। लगभग हमारे पसीने की तरह यह पानी धीरे-धीरे वातावरण में वाष्पित होता रहता है, और तापमान कम करता है।

मशरूम तथा अन्य फफूंदों की इस विशेषता के बारे में तब पता चला जब जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के सूक्ष्मजीव विज्ञानी रैडामेस कॉर्डेरो अपनी प्रयोगशाला के नए थर्मल कैमरे का परीक्षण कर रहे थे। यह कैमरा इन्फ्रारेड-ऊष्मा को छवि के रूप में रिकॉर्ड कर सकता है। कॉर्डेरो और उनके सहयोगी आर्टुरो कैसाडेवल ने कैमरे से यह पता लगाने का प्रयास किया कि कुछ कवक के गहरे रंग के रंजक उनकी सतह के तापमान को कैसे प्रभावित करते हैं। अध्ययन में उन्होंने लगभग 20 प्रकार के जंगली मशरूम की छवियां तैयार की जो अपने परिवेश की तुलना में काफी ठंडे थे।

प्रयोगशाला जांच में उन्होंने पाया कि ब्राउन अमेरिकन स्टार-फूटेड एमेनाइटा जैसी कुछ प्रजातियों का तापमान अपने परिवेश की तुलना में एक या दो डिग्री कम था जबकि ओइस्टर मशरूम का तापमान अपने परिवेश से लगभग छह डिग्री सेल्सियस कम था। शराब बनाने वाली खमीर सहित 19 प्रकार के फफूंदों में इसी तरह के पैटर्न दिखाई दिए। यहां तक कि ठंडे मौसम में भी इनकी कॉलोनियों का तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस कम था। एक-कोशिकीय कवकों के तापमान में इस तरह के पैटर्न काफी आश्चर्यजनक हैं। कॉलोनी के रूप में भी देखा जाए तो मशरूम की तुलना में इन कवकों का सतह-क्षेत्र प्रति आयतन बहुत कम होता है। ऐसे में सतह से गर्मी विकिरित होकर तापमान को कम करना आश्चर्यजनक है।

शीतलन क्षमता के मापन से पता चला है कि शीतलन प्रभाव कवक से वाष्पित होने वाले पानी के कारण होता है जो एक गर्म दिन में हमारे शरीर से निकलने वाले पसीने जैसा काम करता है। मशरूम के नीचे की गलफड़ेनुमा बनावट सतह क्षेत्र में वृद्धि करती हैं। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस विशेषता से मशरूम को क्या फायदा होता है।

बहरहाल इन मशरूमों की ठंडक का इस्तेमाल तो किया ही जा सकता है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने लगभग आधा-किलोग्राम बटन मशरूम को एक छोटे स्टायरोफोम पैकिंग बॉक्स में रखा। इसमें हवा के लिए दो छेद रखे। हवा खींचने के लिए एक छेद में एक कंप्यूटर एग्ज़ॉस्ट फैन लगाया और बॉक्स को एक बड़े स्टायरोफोम कंटेनर में रख दिया। पंखा चालू होने के 40 मिनट के अंदर बड़े कंटेनर का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया और आधे घंटे तक कम ही बना रहा। इस व्यवस्था से बर्फ तो नहीं जमेगा लेकिन यदि आपका पिकनिक का कोई प्रोग्राम है तो खाना ठंडा रखने के लिए मशरूम एक अच्छा विकल्प है। और तो और, बाद में आप इसे खा भी सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हृदय रुक जाने के बाद भी मस्तिष्क में गतिविधियां

मौत के करीब से गुज़रे कई लोग बताते हैं कि उनकी नज़रों के सामने से उनका जीवन गुज़रने लगता है। जीवन के यादगार क्षण दोहराने लगते हैं और यह सब कुछ वे शरीर के बाहर से अनुभव करते हैं जैसे खुद को कहीं बाहर से देख रहे हों। हाल ही में चार मरणासन्न लोगों पर किए गए एक अध्ययन से लगता है कि इसकी व्याख्या की जा सकती है। पता चला है कि मृत्यु के दौरान दिल की धड़कन बंद होने के बाद भी दिमाग में हलचल जारी रहती है।

चिकित्सकीय रूप से मृत्यु उस स्थिति को कहा जाता है जब हृदय हमेशा के लिए धड़कना बंद कर देता है। लेकिन हालिया अध्ययनों से पता चला है कि हृदय गति रुकने के बाद भी कुछ सेकंड से लेकर घंटों तक मस्तिष्क में हलचल जारी रह सकती है। वर्ष 2013 में चूहों पर हुए एक अध्ययन में चूहों के मस्तिष्क में मरने के 30 सेकंड बाद तक चेतना के लक्षण देखे गए थे।

अब एक नए अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की न्यूरोलॉजिस्ट जिमो बोर्जिगिन की टीम ने कोमा या लाइफ सपोर्ट वाले चार ऐसे रोगियों के सिर पर ईईजी टोपियां लगाईं जिनके जीने की संभावनाएं काफी कम थीं।  

ये टोपियां मस्तिष्क की सतह के विद्युत संकेतों की निगरानी के लिए लगाई गई थीं। चिकित्सकों द्वारा वेंटीलेटर हटाए जाने पर दो रोगियों के दिल की धड़कन बंद होने के बाद दिमाग में गामा तरंग नामक उच्च-आवृत्ति वाले तंत्रिका पैटर्न देखे गए। एक स्वस्थ व्यक्ति में ऐसे पैटर्न तब बनते हैं जब वह कुछ सीख रहा हो, या कोई स्मृति या सपना याद कर रहा हो। कई तंत्रिका वैज्ञानिक इसे चेतना से जोड़ते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गामा तरंगें इस बात का संकेत देती हैं कि मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र एक साथ काम कर रहे थे, जैसे – हम किसी वस्तु को समझने के लिए दृष्टि, गंध और ध्वनि को एक साथ महसूस करते हैं। हालांकि यह अभी भी एक रहस्य है कि मस्तिष्क यह सब कैसे करता है लेकिन मरने वाले लोगों में गामा तरंगें देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने अंतिम क्षणों में यादगार घटनाएं याद कर रहे थे।

टीम ने मस्तिष्क के उस क्षेत्र की विद्युत गतिविधियों में वृद्धि देखी, जिसकी चेतना में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है और यह क्षेत्र सपनों, दिमागी दौरे और मतिभ्रम के दौरान सक्रिय होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार मस्तिष्क की गतिविधि में अचानक वृद्धि होना उसके जीवित रहने की कोशिश का हिस्सा है – ऑक्सीजन से वंचित होने पर मस्तिष्क इस मोड में चला जाता है। मस्तिष्क-मृत्यु से गुज़रते जीवों के अध्ययन में पाया गया है कि उनका मस्तिष्क कई संकेतक अणु छोड़ने लगता है और खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने के लिए असामान्य ब्रेनवेव पैटर्न बनाता है। ऐसा करते हुए वह चेतना के बाहरी संकेतों को बंद कर देता है।

बोर्जिगिन मरणासन्न मरीज़ों में मस्तिष्क गतिविधि का अध्ययन करने के लिए अन्य चिकित्सा केंद्रों के साथ सहयोग की उम्मीद करती हैं ताकि निष्कर्षों की पुष्टि हो सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूख का नियंत्रण करते सात हार्मोन

हने को तो यह बड़ी सरल-सी बात है कि हमें जब भूख लगती है तो हम खाना खा लेते हैं, और पेट भरने का एहसास होने पर खाना बंद कर देते हैं। लेकिन वास्तव में यह काफी जटिल मामला है। आपको भूख लगने और पेट भरने का एहसास दिलाने के लिए कई हार्मोन मिल-जुल कर काम करते हैं ताकि न खाने या अत्यधिक खाने के कारण शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित न हो।

यहां भूख नियमन में लिप्त सात प्रमुख हार्मोन पर बात की जा रही है। इनमें कुछ हार्मोन जेनेटिक कारकों से प्रभावित होते हैं जबकि कुछ अन्य हार्मोंन हमारी जीवन शैली, सेहत की हालत और/या शरीर के वज़न में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। कुछ हार्मोन भोजन सेवन का अल्पकालिक नियमन करते हैं ताकि हम अत्यधिक भोजन करने से बच जाएं, वहीं अन्य हार्मोन शरीर में सामान्य ऊर्जा भंडार को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक भूमिका निभाते हैं।

लेप्टिन: लेप्टिन हार्मोन हमारे शरीर के वसा ऊतकों द्वारा बनाया जाता है। वसा कोशिकाएं तृप्ति (पेट भरने) का संकेत देने के लिए पूरे शरीर में लेप्टिन स्रावित करती हैं, जिससे भूख शांत होने का एहसास होता है और भोजन सेवन रोक दिया जाता है। 1994 में लेप्टिन के बारे में पता चलने से पहले हमें यह नहीं पता था कि शरीर के वसा भंडार मस्तिष्क के साथ कैसे संवाद करते हैं।

जो लोग मोटापे का शिकार होते हैं उनमें लेप्टिन का स्तर अधिक होता है क्योंकि या तो उनके शरीर में अधिक वसा कोशिकाएं होती हैं या उनका शरीर हार्मोन के प्रति प्रतिरोधी होता है। दूसरी ओर, यदि आप भोजन में कैलोरी की मात्रा घटाते हैं और शरीर की चर्बी घटाते हैं तो शरीर में लेप्टिन का स्तर कम हो जाता है। लेप्टिन भूखे मरने और शरीर के वसा भंडार को घटने से बचाने की कोशिश करता है। एक मायने में यह वज़न को संतुलित बनाए रखने वाला हार्मोन है।

ग्रेलीन: ग्रेलीन आमाशय में बनता है, और इसे अक्सर ‘भूख का हार्मोन’ कहा जाता है। खाने से ठीक पहले ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, और भोजन करने के बाद कम हो जाता है।

यदि आप वज़न कम करने की कोशिश में कम कैलोरी लेते हैं, तो ग्रेलीन अपने सामान्य स्तर से बढ़ा रहेगा। इससे वज़न कम करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि सामान्य से अधिक समय तक भूख का एहसास बना रहेगा या बार-बार भूख लगेगी। 2017 में ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि ग्रेलीन के सामान्य से अधिक स्तर ने लोगों में खाने की लालसा बढ़ा दी थी – खासकर तले-भुने, मसालेदार या मीठे पदार्थों के लिए, और छह महीने में ही उनका वज़न काफी बढ़ गया था।

कोलेसिस्टोकायनीन (CCK): यह तृप्ति के एहसास से जुड़ा हार्मोन है। यह खाना खाने के बाद आंत में बनता है और पेट भरे होने का एहसास दिलाता है। यह आमाशय से भोजन के गुज़रने की गति को मंद करके पाचन बेहतर करता है जिससे देर तक पेट भरे होने का एहसास होता है। इसके चलते अग्न्याशय से वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का चयापचय करने वाले और अधिक द्रव और एंज़ाइम स्रावित होते हैं।

इंसुलिन: रक्तप्रवाह में शर्करा का स्तर बढ़ जाने पर अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं द्वारा इंसुलिन स्रावित किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अधिक सेवन से अधिक इंसुलिन उत्पन्न होता है जो ज़्यादा ग्लूकोज़ को ऊर्जा के लिए कोशिकाओं में भेजने का काम करता है। यह हार्मोन भी तृप्ति का एहसास कराता है।

कॉर्टिसोल: इसे तनाव हार्मोन के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि शरीर में इसका स्तर तब उच्च होता है जब आप तनाव में होते हैं। वास्तव में, कॉर्टिसोल के कई अलग-अलग कार्य होते हैं – इनमें से एक है चयापचय को नियंत्रित करना। कॉर्टिसोल का उच्च स्तर इंसुलिन के काम में बाधा डालता है और वसा भंडारण बढ़ाता है। देखा गया है कि जीर्ण तनाव की स्थिति में, कॉर्टिसोल के उच्च स्तर से भूख बढ़ जाती है खासकर मीठा, नमकीन-मसालेदार, या वसायुक्त भोजन की भूख तथा रक्त में शर्करा और इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है। न्यूरोइमेज क्लीनिकल पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि कॉर्टिसोल का अधिक स्तर भूख को उकसाता है और मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में रक्त प्रवाह को कम कर देता है जो भोजन सेवन का नियंत्रण करते हैं।

ग्लूकागोन लाइक पेप्टाइड-1 (GLP-1): GLP-1 खाना खाने के बाद आंत में मुक्त होता है। यह मस्तिष्क में रिसेप्टर्स के साथ संवाद करता है और तृप्ति का एहसास पैदा करता है। यह पाचन और आंत से भोजन गुज़रने की गति को धीमा कर देता है, जिसके कारण लंबे समय तक पेट भरे होने का एहसास होता रहता है।

ग्लूकोज़ डिपेंडेंट इंसुलिनोट्रॉपिक पॉलीपेप्टाइड (GIP): यह हार्मोन खाना खाने के बाद छोटी आंत द्वारा बनाया जाता है। यह इंसुलिन के स्तर को बढ़ाता है जो ग्लायकोजन और वसा अम्लों के निर्माण को उकसाते हैं, और वसा को टूटने को रोकते हैं। GIP की भूमिका को पूरी तरह समझना बाकी है।

ये तो हुई भूख नियंत्रण में जुड़े हार्मोन्स की भूमिकाओं की बात। इनमें गड़बड़ी भूख नियंत्रण प्रणाली को गड़बड़ा देती है, नतीजतन शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि कुछ उपचार और जीवनशैली में कुछ बदलाव मदद कर सकते हैं। इनमें से कुछ की चर्चा यहां की जा रही है।

भरपूर नींद: भूख से जुड़े कई हार्मोन के सुचारू कामकाज के लिए पर्याप्त नींद ज़रूरी है। नींद की कमी से शरीर में कॉर्टिसोल और ग्रेलीन का स्तर बढ़ा रहता है, और लेप्टिन कम हो जाता है। ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि रात में नींद की कमी से पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लेप्टिन का स्तर अधिक कम हुआ था। और जो लोग मोटापे से ग्रस्त थे उनमें नींद की कमी के कारण ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ था।

नियमित व्यायाम: देखा गया है कि एरोबिक व्यायाम कुछ समय के लिए भूख को शांत कर देते हैं, ग्रेलीन का स्तर कम कर देते हैं और GLP-1 के स्तर को बढ़ा देते हैं। और सघन व्यायाम स्वस्थ लोगों में ग्रेलीन के स्तर को अधिक प्रभावी तरीके से कम करते हैं। लगता है कि नियमित व्यायाम इन हार्मोन को आपके पक्ष में करेंगे, और इंसुलिन को शरीर में बेहतर तरीके से काम करने में मदद करेंगे।

तनाव भगाना: जीवन एकदम ही तनावमुक्त हो, ऐसा होना तो ज़रा मुश्किल है। लेकिन खुद को तनावमुक्त रखने के उपाय करके आप भूख सम्बंधी हार्मोन्स को संतुलित रख सकते हैं।

अध्ययनों में पाया गया है कि अत्यधिक तनाव भूख घटाता है, लेकिन जीर्ण या लंबे समय के तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ता है। नतीजतन खाने की इच्छा बढ़ती है – खास कर उच्च कैलोरी वाली चीज़ों को खाने की।

तनाव और कॉर्टिसोल के स्तर को कम करने में सांस सम्बंधी या शारीरिक व्यायाम कारगर पाए गए हैं। बिहेवियोरल साइंसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि मानसिक शांति के लिए किए गए 12 मिनट के सत्र, सांस सम्बंधी व्यायाम सहित, से लार के कॉर्टिसोल स्तर में कमी आई।

इसके अलावा खान-पान का ध्यान रखना (जैसे प्रोसेस्ड खाद्य का कम सेवन, भोजन में साबुत अनाज, फल, सब्ज़ियां शामिल करना) फायदेमंद होगा।

बहरहाल कभी-कभी हार्मोन का संतुलन रखने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप की ज़रूरत भी पड़ती है। मोटापे और डायबिटीज़ के इलाज के लिए GLP-1 और GIP हार्मोन पर लक्षित उपचार इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई दवाएं मोटापा घटाने और रक्त शर्करा नियंत्रित करने में कारगर हैं। लेकिन इनका उपयोग चिकित्सकीय सलाह पर आहार, जीवनशैली में परिवर्तन और व्यायाम के साथ किया जाना चाहिए। आखिर आप पूरी तरह दवाओं पर निर्भर तो नहीं रह सकते – वे संपूर्ण समाधान नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एलीफैंट सील गोता लगाने के दौरान झपकी लेते हैं

भी स्तनधारी प्राणियों के लिए पर्याप्त नींद स्वास्थ्य और विकास के लिए आवश्यक है। कई जीव तो दिन में 20 घंटे तक सोते हैं। अलबत्ता, अफ्रीकी हाथी के लिए केवल दो घंटे की नींद पर्याप्त है। लेकिन अब इस थलीय प्राणि को एक समुद्री स्तनधारी ने टक्कर दी है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी एलीफैंट सील के लिए भी दो घंटे की नींद पर्याप्त है। भूमि की तुलना में ये समुद्र में बहुत कम समय के लिए सोते हैं और इस दौरान वे सैकड़ों फीट की गहराई तक पहुंच जाते हैं।

अमेरिका के पश्चिमी तट पर पाए जाने वाले एलीफैंट सील गोता लगाने में माहिर होते हैं और 2500 फीट गहरा गोता लगाकर लगभग दो घंटे तक वहां रह भी सकते हैं। इनका वज़न एक कार जितना होता है और लंबाई लगभग 13 फीट होती है। अपने भारी-भरकम शरीर को बनाए रखने के लिए ये हर साल लगभग 7 महीने समुद्र में शिकार करते हैं। इनका मुख्य आहार मछली और स्क्विड हैं।

इन गहरे समुद्रों में आम तौर पर व्हाइट शार्क और किलर व्हेल शिकारी की भूमिका में होते हैं। इनसे बचने के लिए डॉल्फिन और फर सील जैसे कई स्तनधारी समुद्री जीव एक समय में अपने आधे मस्तिष्क को आराम देते हैं और उनका आधा मस्तिष्क सक्रिय रहता है। इस तरह की निद्रा को एकल-गोलार्ध निद्रा कहा जाता है जिसमें जंतु की एक आंख खुली रहती है। इसके उलट, एलीफैंट सील बिलकुल मनुष्य के समान सोते हैं और उनका मस्तिष्क पूरी तरह आराम कर रहा होता है।

सैन डिएगो स्थित स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनोग्राफी की जेसिका कैंडल-बार ने उत्तरी एलीफैंट सील की निद्रा, शिकार और शिकार होने से बचाव के पैटर्न को समझने का प्रयास किया। कैंडल-बार और उनके सहयोगियों ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया जो सील की मस्तिष्क तरंगों, हृदय गति, गोते की गहराई और गतियों की निगरानी कर सके। उपकरण एक टोपी की तरह सील के सिर के ऊपर आसानी से फिट हो जाता है। इन उपकरणों को कई एलीफैंट सील के सिर पर लगाकर पांच दिनों तक उनकी दिनचर्या का अध्ययन किया गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि गोता लगाने के बाद वे तैरना बंद कर देते हैं और ग्लाइड करने लगते है। जैसे-जैसे वे गहराई में जाते हैं उनके मस्तिष्क की गतिविधि मंद पड़ने लगती है। जल्द ही वे गहरी नींद में सो जाते हैं और उलटे होकर एक गिरती हुई पत्ती के समान लहराते हुए समुद्र के पेंदे की ओर जाने लगते हैं। लगभग 10 मिनट लंबी नींद के बाद वे अचानक जाग जाते हैं और सतह पर वापस आ जाते हैं। इस दौरान कुछ सील 1000 फीट से भी अधिक गहराई तक चले जाते हैं और कभी-कभी तो वे समुद्र के पेंदे तक पहुंच जाते हैं।

एलीफैंट सील दिन में कई बार इस तरह के गोते लगाते हैं जिससे उन्हें लगभग दो घंटे की नींद मिलती है। सील जब भूमि पर प्रजनन करने के लिए आते हैं तो दिन में 10 घंटे से अधिक सोते हैं। इस दौरान वे कुछ खाते नहीं हैं जिससे अतिरिक्त नींद की आवश्यकता समझ आती है।

इस अध्ययन के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एलीफैंट सील अधिकतम भोजन करने के लिए समुद्र में सोने का समय तो सीमित करते ही हैं साथ ही खुद के शिकार होने के समय को भी कम करते हैं।

जीव जगत में एलीफैंट सील की नींद की अवधि में एक अनोखा लचीलापन दिखता है। लगभग 200 से अधिक दिनों के लिए दिन में दो घंटे की नींद से लेकर बाकी दिनों में 10.8 घंटे प्रतिदिन की नींद का पैटर्न किसी अन्य स्तनधारी में नहीं देखा गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक समुद्री स्तनधारी जीवों के नींद के पैटर्न के बारे में अधिक जानकारी उनके प्राकृतवास प्रबंधन को सुधारने में मदद करेगी। (स्रोत फीचर्स)

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पतझड़ के बाद पेड़ों को पानी कैसे मिलता है? – डॉ. किशोर पंवार

सतपुड़ा, विंध्याचल या अरावली पर्वत शृंखलाओं के जंगलों में कभी फरवरी-मार्च के महीनों में पैदल चल कर देखिए; सूखे पत्तों की चरचराहट की आवाज़ साफ सुनाई देगी। मानो पत्ते कह रहे हों कि जनाब आप पतझड़ी जंगल में विचर रहे हैं। इन जंगलों में कहीं-कहीं पर तो सूखे पत्तों की यह चादर एक फीट तक मोटी होती है जो सेमल, पलाश, अमलतास, सागौन वगैरह के पत्तों के गिरने से बनी होती है।

अप्रैल-मई के महीनों में जब तेज़ गर्म हवाएं चल रही होती हैं, हवा भी सूखी होती है, धरती का कंठ भी सूखने लगता है। उस समय देखने में आता है कि इन पतझड़ी पेड़ों के ठूठ हरे होने लगते हैं। पलाश, अमलतास, सुनहरी टेबेबुइया और पांगरा फूलने लगते हैं।

लेकिन बिना पानी के यह कैसे संभव होता है? हमारे बाग-बगीचों की तरह जंगल में तो कोई पानी देने भी नहीं जाता। तब पेड़ों पर फूटने वाली नई कोपलों और फूलों के लिए भोजन-पानी कहां से आता है? जबकि ये पेड़ अपनी पाक शालाएं (पत्तियां) तो दो महीने पहले ही झड़ा चुके थे।

इस सवाल का जवाब एक शब्द ‘सुप्तावस्था’ में छुपा हुआ है। दरअसल ये पेड़-पौधे आने वाले सूखे गर्म दिनों को भांप लेते हैं। अत: आने वाली गर्मियों (या ठंडे देशों में जाड़े) के मुश्किल दिनों को टालने के लिए ये पेड़ दो-तीन महीनों की विश्राम की अवस्था में चले जाते हैं, लेकिन पूरी तैयारी के साथ। जब तैयारी पूरी हो जाती है तब सूचना पटल के रूप में पेड़ों की ये लाल-पीली पत्तियां इन पेड़ों की टहनियों पर टंगी नज़र आती है कि अब दुकान बंद हो गई है। फिर कुछ ही दिनों में हवा के झोंकों से ये पत्तियां भी गिर जाती हैं।

इन पतझड़ी पेड़ों की ही तरह ठंडे देशों में ग्रिज़ली बेयर यानी भूरा भालू और डोरमाइस, जो कि एक प्रकार का चूहे जैसा रात्रिचर जीव है, सुप्तावस्था (या शीतनिद्रा) में चले जाते हैं। ग्रिज़ली भालू जाड़ा पड़ने के पहले खा-खाकर अपने शरीर में वसा की इतनी मोटी परत चढ़ा लेता है कि पूरी सर्दियों जीवित रह सके।

पतझड़ी पेड़ भी सुप्तावस्था की तैयारी बिल्कुल ऐसे ही करते हैं। सूर्य की ऊर्जा से वे शर्करा और अन्य पदार्थ बनाते हैं जिन्हें वे अपनी त्वचा के नीचे भंडारित करके रखते हैं। पेड़ों की त्वचा यानी उनकी मोटी छाल ऊपर से तो मरी-मरी लगती है पर अंदर से जीवित होती है। एक निश्चित बिंदु पर आकर पेड़ों का पेट भर जाता है; इस स्थिति में पेड़ थोड़े मोटे भी लगने लगते हैं। ठंडे देशों के चेरी कुल के जंगली पेड़ों की पत्तियां अक्टूबर के पहले ही लाल होने लगती हैं और इसका सीधा अर्थ यह होता है कि उनकी छाल और जड़ों में भोजन संग्रह करने वाले स्थान भर चुके हैं, और यदि वे और शर्करा बनाते हैं तो उसे भंडारित करने के लिए अब उनके पास कोई जगह नहीं बची है।

ठंडे देशों में पहली ज़ोरदार बर्फबारी होने तक उन्हें अपनी सभी गतिविधियां बंद करनी होती हैं। इसका एक महत्वपूर्ण कारण पानी है; सजीवों के उपयोग हेतु इसे तरल अवस्था में होना ज़रूरी होता है। परंतु लगता है कुछ पेड़ अभी जाड़े के मूड में नहीं हैं।

ऐसा दो कारणों से होता है पहला कि वे अंतिम गर्म दिनों का उपयोग ऊर्जा संग्रह के लिए करते रहते हैं, और दूसरा अधिकांश प्रजातियां पत्तियों से ऊर्जा संग्रह कर अपने तनों और जड़ों में भोजन भेजने में लगी होती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि उन्हें अपने हरे रंग के क्लोरोफिल को उसके घटकों में तोड़कर उन घटकों को संग्रह करना होता है ताकि आने वाले बसंत में नई पत्तियों में क्लोरोफिल के निर्माण में इनका उपयोग हो सके।।

गर्म देशों के हों या ठंडे देशों के, पतझड़ी पेड़ों के लिए बासी पत्तियों को खिराना एक प्रभावी सुरक्षा योजना होती है। यह पेड़ों के लिए अपने व्यर्थ या अवांछित पदार्थों को त्यागने का एक अवसर भी होता है। व्यर्थ पदार्थ ज़मीन पर इधर-उधर उनकी त्यागी हुई पत्तियों के रूप में उड़ते रहते हैं। जब पत्तियों में भंडारित ऊर्जा वापस शाखाओं और जड़ों में अवशोषित कर ली जाती है, तब पेड़ों की कोशिकाओं में एक विलगन परत बनती है जो पत्तियों और शाखाओं के बीच का संपर्क बंद कर देती है। ऐसे में हल्की हवा का झोंका लगते ही पत्तियां ज़मीन पर आ जाती है।

यह तो हुई ऊर्जा की बात। पानी की व्यवस्था के लिए जब पानी उपलब्ध होता है तब जड़ें उसे तनों की छाल में व स्वयं अपने आप में संग्रह करती रहती हैं। पौधों का एक नाम पादप भी है अर्थात पांव से पानी पीने वाले जीव। पांव (जड़ों) से पीकर पानी को तने और जड़ों में संग्रह कर लिया जाता है।

मई-जून के महीनों में इन मृतप्राय पेड़ों में नई पत्तियां और फूलों के खिलने के लिए जो ऊर्जा और पानी लगते हैं, वे शाखाओं और जड़ों के इसी संग्रह से मिलते हैं। किंतु अब बहाव की दिशा उल्टी है।

पानी का परिवहन

वनस्पति विज्ञान की किताबें कहती हैं कि सौ से डेढ़ सौ फीट ऊंचे पेड़ों में पानी को ज़मीन से खींचकर शीर्ष तक पहुंचाने में पत्तियों में होने वाली वाष्प उत्सर्जन क्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस सिद्धांत को वाष्पोत्सर्जन खिंचाव बल नाम दिया गया है। पर यह सवाल गर्मियों के दिन में बड़ा रोचक हो जाता है – जब पेड़ों पर पानी खींचने वाले छोटे-छोटे पंप अर्थात पत्तियां नहीं हैं, तो फिर पत्ती विहीन पेड़ों के शीर्ष पर फूटने वाली नई कोपल और कलियों को पानी कौन और कैसे पहुंचाता है। अत: लगता है मामला कुछ और भी है जो हम अभी तक नहीं जानते। सचमुच प्रकृति के क्रियाकलाप अद्भुत हैं और जानने को आज भी बहुत कुछ है। (स्रोत फीचर्स)

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