समुद्रों में परागण

भूमि पर तो परागण का काम मधुमक्खियां और पक्षी करते हैं। लेकिन समुद्र के अंदर परागण की यह महत्वपूर्ण क्रिया कौन सम्पन्न करता है? आम तौर पर समुद्र में पौधों में परागण जीवों की मदद के बगैर होता है। नर और मादा पौधे अपने शुक्राणु और अंडाणु पानी में छोड़ देते हैं और पानी की हिलोरों से अंडाणु और शुक्राणु संयोग से मिल जाते हैं।

अपवादस्वरूप, पूर्व में छोटे जलीय कृमि और क्रस्टेशियन को समुद्री घास के परागणकर्ता के रूप में पहचाना गया था। और अब एक नया परागणकर्ता मिला है: लाल शैवाल के बीच तैरने वाला लगभग 4 से.मी. लंबा क्रस्टेशियन जिसे आइसोपॉड कहते हैं। लाल शैवाल के शुक्राणु आइसोपॉड के शरीर पर चिपक जाते हैं। यह जब भोजन के लिए किसी अन्य पौधे पर जाता है तो निषेचन भी हो जाता है।

दरअसल फ्रांस की राष्ट्रीय शोध एजेंसी में मिरियम वेलेरो युरोप में लहरों के पानी से बने पोखरों में पनपने वाली लाल शैवाल ग्रेसिलेरिया ग्रैसिलिस की आनुवंशिकी का अध्ययन कर रही हैं। ग्रेसिलेरिया में मादा शैवाल अपने अंडाणु पानी में नहीं छोड़ती, बल्कि उन्हें कीप के आकार के तंतुओं के अंदर रखती है। और नर शुक्राणु किसी तरह उन तक पहुंचते हैं जबकि शुक्राणुओं में तैरने में सहायक पूंछ भी नहीं पाई जाती।

वेलेरो ने देखा कि शैवाल पर अक्सर आइसोपोड्स (इडोटिया बाल्थिका) रेंगते रहते हैं। उनका अनुमान था कि ये ही लाल शैवाल का परागण करते होंगे। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर आइसोपॉड के शरीर पर शुक्राणु चिपके भी दिखे।

अपने अनुमान की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने अपरागित मादा शैवाल लीं और इन्हें पानी से भरी टंकियों में नर शैवाल के साथ रखा। फिर कुछ टंकियों में आइसोपॉड छोड़े। पाया गया कि आइसोपॉड्स वाले लाल शैवाल प्रजनन में लगभग 20 गुना अधिक सफल रहे। ये नतीजे साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

वेलेरो का अनुमान है कि इससे दोनों को ही लाभ पहुंचता होगा। अधिकांश इडोटिया रंग में लाल शैवाल जैसे होते हैं। तो आइसोपोड्स को शिकारियों से छिपने में मदद मिलती होगी। दूसरी ओर आइसोपॉड्स शैवाल पर उगने वाले एक-कोशिकीय शैवाल को खाते हैं। देखा गया है कि आइसोपॉड्स द्वारा ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल के भक्षण से लाल शैवाल स्वच्छ रहती है और तेज़ी से वृद्धि करती है।

लेकिन सवाल है कि समुद्र में जीवों द्वारा परागण इतना दुर्लभ क्यों है? संभवत: यह पानी की भौतिकी के कारण है – पानी हवा से बहुत अधिक सघन है। ज़ाहिर है, मकरंद से जो ऊर्जा मिलेगी, वह एक फूल से दूसरे फूल तक यात्रा करने में लगने वाली ऊर्जा से अधिक नहीं होगी।

अन्य शोधकर्ता चेताते हैं कि उक्त अध्ययन सिर्फ यह बताता है कि आइसोपोड प्रयोगशाला में शैवाल को परागित कर सकते हैं; इससे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति में भी वे इसे इतनी ही कुशलता से कर पाते हैं। हो सकता है शैवाल के शुक्राणु को फैलाने में लहरें ही अधिक प्रभावी हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जीवों में तापमान नियंत्रण काफी देर से अस्तित्व में आया

नियततापी (एंडोथर्म) जीव उन्हें कहते हैं जो अपने शरीर का तापमान आंतरिक प्रक्रियाओं के द्वारा नियंत्रित करते हैं। यह स्तनधारियों, पक्षियों के अलावा कुछ विलुप्त डायनासौर की खासियत है। इस तरह तापमान का नियमन करने के लिए उन्हें अधिक ऊर्जा लगती है, लेकिन यह विशेषता उन्हें जाड़ों और रात के समय भी सक्रिय रहने में मदद करती है। इसके विपरीत, एक्सोथर्मिक (बाह्यतापीय) जीव ऐसा नहीं कर सकते; इनके शरीर का तापमान वातावरण के तापमान के अनुसार बदलता रहता है। जीवाश्म विज्ञानी इस बात से तो सहमत हैं कि प्रारंभिक कशेरुकी जीव बाह्यतापीय थे। लेकिन संशय इस बात पर है कि जीवों में तापमान नियमन की क्षमता कब विकसित हुई।

आम तौर पर देखा गया है कि नियततापी जीवों में हड्डियां तेज़ी से बढ़ती हैं और उनके शरीर पर बाल या पिच्छ (फेदर) पाए जाते हैं। इसलिए नियततापिता का निर्धारण करने के लिए जीव वैज्ञानिक इन्हीं गुणधर्मों का अध्ययन करते आए हैं। लेकिन ये गुणधर्म नियततापिता के सटीक संकेतक नहीं हैं और संभवत: इनका प्रादुर्भाव अन्य कारणों से हुआ था।

अब शोधकर्ताओं के एक दल ने इसी काम के लिए एक सर्वथा नई विधि का उपयोग किया है। यह है आंतरिक कान में पाई जाने वाली अर्धवृत्ताकार नलिकाएं (सेमीसर्कुलर कैनाल्स)। ये तीन नलिकाएं होती हैं जो जीव को अपनी स्थिति भांपने तथा संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। जीवाश्म वैज्ञानिक इनकी मदद से प्राचीन जीवों में विचरण के पैटर्न का अनुमान लगाते आए हैं।

नेशनल म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के जीवाश्म विज्ञानी रोमन डेविड के दल ने इनकी मदद से नियततापिता के निर्धारण का प्रयास किया है। जीवाश्म नमूनों के अध्ययन के दौरान डेविड का ध्यान अर्धवृत्ताकार नलिकाओं की साइज़ और संरचना में विविधता  पर पड़ा। खास तौर से उनका ध्यान इस बात पर गया कि शरीर के आकार के हिसाब से अन्य कशेरुकियों की तुलना में स्तनधारियों की अर्धवृत्ताकार नलिकाएं छोटी होती हैं। जैसे, व्हेल (एक स्तनधारी) आकार में व्हेल-शार्क (एक मछली) से बड़ी होती है लेकिन अर्धवृत्ताकार नलिकाओं के मामले में व्हेल-शार्क बाज़ी मार लेती है। दरअसल जीव जगत में सबसे बड़ी अर्धवृत्ताकार नलिकाएं व्हेल-शार्क की होती हैं।

इसके अलावा उनका ध्यान नलिकाओं के अंदर भरे तरल (एंडोलिम्फ) पर भी गया। एंडोलिम्फ का गाढ़ापन तापमान के साथ बदलता है। जैसे तेल गरम होने पर पतला और ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। डेविड का अनुमान था कि एंडोलिम्फ के गाढ़ेपन और अर्धवृत्ताकार नलिका के आकार के बीच कोई सम्बंध है, और दोनों नियततापिता का संकेत दे सकते हैं।

इस परिकल्पना को जांचने के लिए डेविड और उनकी टीम ने अल्पाका, टर्की और छिपकली समेत 277 जीवित प्रजातियों की कान की अर्धवृत्ताकार नलिकाओं का अध्ययन किया। देखा गया कि नियततापी जीवों का एंडोलिम्फ पतला था और उनकी अर्धवृत्ताकार नलिकाएं छोटी और पतली थी। दूसरी ओर, बाह्यतापीय जीवों का एंडोलिम्फ गाढ़ा था और अर्धवृत्ताकार नलिकाएं बड़ी और मोटी थी।

नियततापिता कब विकसित हुई यह जानने के लिए उन्होंने इस जानकारी को जीवाश्मित नमूनों पर लागू किया। चूंकि ये नलिकाएं नरम ऊतकों से बनी होती हैं, इसलिए अक्सर ये जीवाश्मित नहीं हो पाती; लेकिन ये जिस खोखली हड्डी के अंदर होती हैं वे जीवाश्मित हो जाती हैं। और इन खोखली हड्डियों की मदद से नलिकाओं के आकार-आकृति का अनुमान लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने 64 विलुप्त प्रजातियों की जांच की। इनमें स्तनधारी, 23 करोड़ वर्ष पूर्व के स्तनधारी-समान पूर्वज और उसके भी पूर्व के गैर-स्तनधारी पूर्वज शामिल थे।

नेचर में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ट्राएसिक काल के अंत में, लगभग 23 करोड़ वर्ष पूर्व, छोटी और पतली अर्धवृत्ताकार नलिकाओं वाले जीव अस्तित्व में आए थे, इसी समय गैर-स्तनधारी पूर्वज से स्तनधारी-समान पूर्वज विकसित हुए थे। और यह परिवर्तन अपेक्षाकृत रूप से अचानक, 10 लाख से भी कम वर्षों में, हुआ था। अर्थात यदि छोटी व पतली अर्धवृत्ताकार नलिकाओं को नियततापिता का लक्षण माना जाए तो यह सबसे पहले स्तनधारी जीवों में लगभग 23 करोड़ वर्ष नज़र आई होगी। यह पूर्व में लगाए गए अनुमान से 2 करोड़ वर्ष बाद का समय है। वैसे एक बात पर ध्यान देना ज़रूरी है – यह नहीं कहा जा रहा है कि अर्धवृत्ताकार नलिकाएं नियततापिता या तापमान नियंत्रण में कोई भूमिका निभाती हैं। आशय सिर्फ यह है कि ये पतली-छोटी नलिकाएं और नियततापिता साथ-साथ प्रकट होते हैं और छोटी नलिकाओं को नियततापी जीवों का द्योतक माना जा सकता है।

अन्य शोधकर्ताओं के मुताबिक क्रमिक विकास की बजाय ऐसे अचानक परिवर्तन की बात को साबित करने के लिए अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। बहरहाल नियततापिता के भावी अध्ययनों में अर्धवृत्ताकर नलिका का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्री ज्वालामुखी विस्फोट से पानी पहुंचा वायुमंडल में

नवरी में दक्षिणी प्रशांत महासागर में टोंगा द्वीप के नज़दीक समुद्र के नीचे स्थित टोंगा-हुंगा हाआपाई ज्वालामुखी में ज़ोरदार विस्फोट हुआ। इस विस्फोट ने दक्षिण प्रशांत क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था, दुनिया भर में सुनामी की तरंगें दौड़ गईं। यह अब तक का सबसे शक्तिशाली विस्फोट था जिसका मलबा वायुमंडल में लगभग 50 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई तक गया था।

एक नया अध्ययन बताता है कि विस्फोट से निकलने वाली राख और गैसों के साथ अरबों किलोग्राम पानी भी वायुमंडल में गया है। यह संभवतः वर्षों तक वायुमंडल में बना रहकर ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाएगा और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करेगा।

यह अध्ययन नासा के ऑरा सैटेलाइट में लगे माइक्रोवेव लिम्ब साउंडर (MLS) उपकरण की मदद से संभव हुआ है। MLS पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 100 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर मौजूद विभिन्न यौगिकों को मापता है। वैज्ञानिकों की विशेष रुचि विस्फोट से वायुमंडल में पहुंचे सल्फर डाईऑक्साइड और पानी में थी, क्योंकि ये जलवायु को प्रभावित कर सकते हैं। MLS के आंकड़ों की मदद से शोधकर्ता ज्वालामुखी का गुबार, इसमें पानी की मात्रा, और गुबार की वृद्धि को देख पाए।

जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में नासा की जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी के लुइस मिलन के दल ने बताया है कि इस गुबार ने पृथ्वी के समताप मंडल (स्ट्रेटोस्फीयर) में लगभग 146 अरब किलोग्राम पानी फेंका है। समताप मंडल समुद्र सतह से कई किलोमीटर ऊपर होता है और प्राय: शुष्क रहता है। पानी इतना था कि इससे तकरीबन 58,000 ओलंपिक स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं, और यह समताप मंडल में मौजूद संपूर्ण नमी का लगभग 10 प्रतिशत है।

शोधकर्ता बताते हैं कि अन्य ज्वालामुखी विस्फोट भी वायुमंडल में पानी फेंकते हैं, लेकिन इस विस्फोट ने अभूतपूर्व मात्रा में पानी फेंका है। यह पानी समताप मंडल में संभवत: पांच वर्ष या उससे अधिक समय तक रहेगा।

बड़े ज्वालामुखी विस्फोट अक्सर जलवायु को ठंडा करते हैं, क्योंकि इनमें निकलने वाली सल्फर डाईऑक्साइड वायुमंडल में जाकर ऐसे यौगिक बनाती है जो सूरज से आने वाली ऊष्मा को परावर्तित करते हैं। लेकिन साथ में इतनी अधिक जलवाष्प वायुमंडल में पहुंची है तो प्रभाव अलग हो सकता है। पानी एक ग्रीनहाउस गैस की तरह काम करेगा और पृथ्वी पर गर्मी बढ़ाएगा। विस्फोट से छाई सल्फर डाईऑक्साइड तो जल्दी ही समाप्त हो जाएगी, जबकि पानी 5 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक वायुमंडल में टिका रहेगा।

अन्य वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु पर विस्फोट के वास्तविक प्रभावों का आकलन करने में समय लगेगा। संभव है कि वायुमंडल में गया यह पानी अन्य रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करके ओज़ोन परत को भी नुकसान पहुंचाए, और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने वाली पवन धाराओं के प्रवाह को भी बदल दे। (स्रोत फीचर्स)

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मधुमक्खियों को दर्द होता है

धुमक्खियों के डंक से बचने के लिए हम कई बार उन्हें मारने-भगाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या ऐसा करने पर उनको दर्द महसूस होता है? जब हमारे शरीर पर कहीं चोट लगती है तो शरीर की तंत्रिका कोशिकाएं हमारे मस्तिष्क को संदेश भेजती हैं जिससे हमारा मस्तिष्क हमें दर्द का एहसास कराता है। कीटों में इस तरह का कोई जटिल तंत्र नहीं है जिससे उनको दर्द का एहसास हो सके। लेकिन एक हालिया अध्ययन से मधुमक्खियों और अन्य कीटों में भावनाओं के प्रति चेतना के साक्ष्य मिले हैं।

पूर्व में किए गए अध्ययन बताते हैं कि मधुमक्खियां और भौंरे काफी बुद्धिमान एवं चतुर प्राणी हैं। वे शून्य की अवधारणा को समझते हैं, सरल हिसाब-किताब कर सकते हैं और अलग-अलग मनुष्यों (और शायद मधुमक्खियों) के बीच अंतर भी कर सकते हैं।

ये प्राणी भोजन की तलाश के मामले में आम तौर पर काफी आशावादी होते हैं लेकिन किसी शिकारी मकड़ी के जाल में ज़रा भी फंसने पर ये परेशान हो जाते हैं। यहां तक कि बच निकलने के बाद भी कई दिनों तक उनका व्यवहार बदला-बदला रहता है और वे फूलों के पास जाने से डरते हैं। क्वींस मैरी युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के प्रमुख लार्स चिटका के अनुसार मधुमक्खियां भी भावनात्मक अवस्था का अनुभव करती हैं।

मधुमक्खियों में दर्द संवेदना का पता लगाने के लिए चिटका ने जाना-माना तरीका अपनाया – लाभ-हानि के बीच संतुलन का तरीका। जैसे दांतों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए लोग दंत चिकित्सक की ड्रिल के दर्द को सहन करने को तैयार हो जाते हैं। इसी तरह हर्मिट केंकड़े बिजली के ज़ोरदार झटकों से बचने के लिए अपनी पसंदीदा खोल को त्याग देते हैं लेकिन तभी जब झटका ज़ोरदार हो।

इसी तरीके को आधार बनाकर चिटका और उनके सहयोगियों ने 41 भवरों (बॉम्बस टेरेस्ट्रिस) को 40 प्रतिशत चीनी के घोल वाले दो फीडर और कम चीनी वाले दो फीडर का विकल्प दिया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने इन फीडरों को गुलाबी और पीले हीटिंग पैड पर रखा। शुरुआत में तो सभी हीटिंग पैड्स को सामान्य तापमान पर रखा गया और मधुमक्खियों को अपना पसंदीदा फीडर चुनने का मौका दिया गया। अपेक्षा के अनुरूप सभी मधुमक्खियों ने अधिक चीनी वाले फीडर को चुना।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने अधिक चीनी वाले फीडरों के नीचे वाले पीले पैड्स को 55 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जबकि गुलाबी पैड्स को सामान्य तापमान पर ही रखा। यानी पीले पैड्स पर उतरना किसी गर्म तवे को छूने जैसा था लेकिन इसके बदले अधिक मीठा शरबत भी मिल रहा था। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जब चीनी से भरपूर गर्म फीडर और कम चीनी वाले ठंडे फीडरों के बीच विकल्प दिया गया तो मधुमक्खियों ने गर्म और अधिक मात्रा में चीनी वाले फीडर को ही चुना।

चीनी की मात्रा बढ़ा दिए जाने पर मधुमक्खियां और अधिक दर्द सहने को तैयार थीं। इससे लगता है कि अधिक चीनी उनके लिए एक बड़ा प्रलोभन था। फिर जब वैज्ञानिकों ने गर्म और ठंडे दोनों पैड्स वाले फीडरों में समान मात्रा में चीनी वाला शरबत रखा तो मधुमक्खियों ने पीले पैड्स पर जाने से परहेज़ किया, जिसके गर्म होने की आशंका थी। इससे स्पष्ट होता है कि वे पूर्व अनुभवों को याद रखती हैं और उनके आधार पर निर्णय भी करती हैं।

अध्ययन दर्शाता है कि क्रस्टेशियंस के अलावा कीटों और मकड़ियों में भी इस तरह की संवेदना होती है। इस अध्ययन को मानव उपभोग के लिए कीटों की खेती में बढ़ती रुचि और शोध अध्ययनों में कीटों की खैरियत के मामले में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि मधुमक्खियां भी वैसा ही दर्द महसूस करती हैं जैसा मनुष्य करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अध्ययन इस क्षमता का कोई औपचारिक प्रमाण प्रदान नहीं करता है। दरअसल, कीटों में दर्द संवेदना का पता लगाना थोड़ा मुश्किल काम है। पूर्व में हुए अध्ययन फल मक्खियों के तंत्रिका तंत्र में जीर्ण दर्द के अनुभव के संकेत देते हैं लेकिन कीटों में दर्द सम्बंधी तंत्रिका तंत्र होने को लेकर संदेह है।     

कुल जीवों में से कम से कम 60 प्रतिशत कीट हैं। ऐसे में इन्हें अनदेखा करना उचित नहीं है। आधुनिक विज्ञान मूलत: मानव-केंद्रित है जो अकशेरुकी जीवों को अनदेखा करता आया है। उम्मीद है कि इस अध्ययन से रवैया बदलेगा। (स्रोत फीचर्स)

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ऊर्जा दक्षता के लिए नीतिगत परिवर्तन की आवश्यकता – आदित्य चुनेकर, श्वेता कुलकर्णी

भारत के ऊर्जा संरक्षण अधिनियम को 20 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में ऊर्जा के कुशल उपयोग और संरक्षण को संभव बनाना था। इसके तहत ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) को केंद्रीय एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। तब से कुछ कार्यक्रम और नियम लागू किए गए हैं। इनमें से कई कार्यक्रम सफल रहे हैं लेकिन ऊर्जा दक्षता की सम्पूर्ण क्षमता का उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि भारत में ऊर्जा दक्षता उपायों को अपनाने से वर्ष 2040 तक ऊर्जा की मांग को 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। बॉटम-अप एनर्जी मॉडलिंग पर आधारित हमारे अपने विश्लेषण से पता चलता है कि उपकरणों के उपयोग में कुछ मामूली परिवर्तन से 2030 तक आवासीय बिजली की मांग को 25 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

इस बचत से भारत में जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाले उत्सर्जन को कम करने के साथ-साथ उपभोक्ताओं के बिजली बिल को कम किया जा सकता है और ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ की जा सकती है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा को भी बढ़ावा मिल सकता है।

लेकिन भारत में ऊर्जा परिवर्तन सम्बंधी नीतिगत चर्चाओं में ऊर्जा दक्षता का विषय अभी तक हाशिए पर ही रहा है। यहां तक कि ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के कुछ प्रावधानों को तो अभी तक लागू भी नहीं किया गया है। वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनज़र इस अधिनियम में आमूल परिवर्तनों की आवश्यकता है लेकिन इसमें अभी तक मामूली कामकाजी संशोधन ही किए गए हैं। धन की भी कमी रही है। वर्ष 2021-22 में विद्युत मंत्रालय, भारत सरकार के लिए निर्धारित 15,000 करोड़ के वार्षिक बजट में से केवल 200 करोड़ रुपए ऊर्जा दक्षता योजनाओं के लिए आवंटित किए गए। तुलना के लिए देखें कि नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) का वार्षिक बजट 5000 करोड़ रुपए है। तो सवाल है कि भारत के ऊर्जा दक्षता के प्रयासों में किस प्रकार की बाधाएं हैं और इनसे कैसे निपटा जा सकता है?

बाज़ार में ऊर्जा कुशल प्रौद्योगिकियों के मार्ग में कई बाधाएं होती हैं: जैसे शुरुआती ऊंची लागत, जागरूकता की कमी, उद्योग स्तर पर उन्नयन के लिए सीमित वित्तीय विकल्प वगैरह। इन बाधाओं को दूर करने के लिए ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में कई नीतिगत हस्तक्षेप किए गए हैं लेकिन इनका प्रभाव सीमित ही रहा है। इसके मुख्यत: चार कारण रहे हैं।

पहला, बहुत कम संसाधन होने के बावजूद बीईई बहुत सारे काम करने के प्रयास करता रहा। इसके कारण प्रमुख कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन बाधित होते रहे और कई पायलट स्तर कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर नहीं ले जाया जा सका। उदाहरण के लिए, बीईई का एक प्रमुख कार्यक्रम मानक और लेबलिंग (एसएंडएल) कार्यक्रम है जिसके तहत उपकरणों के लिए न्यूनतम ऊर्जा दक्षता मानक और तुलनात्मक ऊर्जा प्रदर्शन निर्धारित किए जाते हैं। इसमें 28 उपकरणों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक बाज़ार-आधारित व्यवस्था है – प्रदर्शन, उपलब्धि और खरीद-फरोख्त (पीएटी) योजना जिसके तहत उद्योग अपने ऊर्जा बचत प्रमाण पत्रों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं। इसके तहत 13 क्षेत्रों के 1073 उपभोक्ताओं को शामिल किया गया है। इन योजनाओं में मानकों के निर्धारण, उनके नियमित रूप से संशोधन और अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण आंतरिक तकनीकी विशेषज्ञता, बाज़ार की स्थिति की निगरानी और प्रत्येक क्षेत्र/उपकरण की जांच की आवश्यकता होती है। ऐसे में सीमित संसाधनों के कारण इन कार्यक्रमों में कम-महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारण, मानकों के संशोधन में विलंब और परीक्षण प्रक्रियाओं के कमज़ोर क्रियांवयन जैसी कई दिक्कतें आती हैं जिससे उनकी प्रभाविता कम हो जाती है।

दूसरा, अघोषित रूप से यह माना गया कि बाज़ार में ऊर्जा कुशल प्रौद्योगिकियों की ओर परिवर्तन के लिए थोक खरीद एक जादू की छड़ी है जिसमें प्रत्यक्ष वित्तीय प्रलोभन की आवश्यकता भी नहीं होती। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज़ लिमिटेड (ईईएसएल) ने इस मॉडल का बहुत अच्छी तरह से उपयोग करते हुए अत्यधिक ऊर्जाक्षम एलईडी लाइटिंग के माध्यम से बाज़ार को तेज़ी से परिवर्तित किया। हालांकि, यह मॉडल अन्य उपकरणों के लिए वैसी ही सफलता हासिल नहीं कर पाया। लेकिन अभी भी ऊर्जा कुशल उपकरणों के लिए कोई वित्तीय प्रोत्साहन कार्यक्रम नहीं है और न ही इनके लिए कर में कोई रियायत दी गई है। इसके साथ ही बीईई के अति कुशल उपकरण कार्यक्रम (एसईईपी) के तहत निर्माण की बढ़ती लागतों की पूर्ति के लिए निर्माताओं को समयबद्ध वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव पिछले पांच वर्षों से धूल खा रहा है। जबकि इसी दौरान इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर रूफटॉप पैनलों को केंद्र सरकार के साथ-साथ कुछ राज्य सरकारों से भी सब्सिडी प्राप्त हो रही है। ऊर्जा दक्षता योजनाओं के सम्बंध में राज्य और स्थानीय सरकारों की भागीदारी काफी कम रही है।

तीसरा, ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं का संचालन करने वाली ऊर्जा सेवा कंपनियों (ईएससीओ) के लिए बाज़ार अभी भी प्रारंभिक चरण में है। वर्तमान में बीईई द्वारा केवल 150 ईएससीओ को सूचीबद्ध किया गया है और वर्तमान में 1.5 लाख करोड़ बाज़ार के केवल 5 प्रतिशत भाग का ही दोहन हो पाया है। हालांकि, बीईई ने क्षमता निर्माण, आंशिक जोखिम गारंटी योजना जैसे कई कदम उठाए लेकिन ये सभी प्रयास छोटे स्तर पर किए गए जिनका कोई संचयी प्रभाव देखने को नहीं मिला। ईईएसएल को एक सुपर ईएससीओ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव था ताकि एक मज़बूत ऊर्जा सेवा बाज़ार विकसित करने के लिए अनुकूल माहौल बन सके, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका।

चौथा, ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने में ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका न्यूनतम रही है। बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की आमदनी उनकी बिक्री से जुड़ी है, जिसके चलते, ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों को लागू करने का कोई प्रलोभन नहीं है। इसके अलावा, अक्षय ऊर्जा की अनिवार्य खरीद सम्बंधी कोई नियामक आदेश भी जारी नहीं किया गया है। ऐसे में भले ही सभी राज्यों ने मांग पक्ष प्रबंधन (डीएसएम) नियम अधिसूचित किए हों और कई बिजली वितरण कंपनियों ने भी मांग पक्ष प्रबंधन प्रकोष्ठ स्थापित कर दिए हों, लेकिन कार्यक्रमों पर होने वाला कुल खर्च और इसके नतीजे में होने वाली बचत डिस्कॉम की वार्षिक बिक्री का एक छोटा अंश भर है।

आगे बढ़ते हुए, भारत को तत्काल प्रभाव से ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। शुरुआत के तौर पर, क्षेत्रवार महत्वाकांक्षी ऊर्जा दक्षता लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। लक्ष्य उपयोगी होते हैं, जिससे नीतिगत कार्यवाही के साथ-साथ सभी स्तरों पर निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में समय-समय पर लक्ष्य में संशोधन इसका एक अच्छा उदाहरण है। लेकिन ऊर्जा दक्षता के लाभ सौर पैनल की तरह नज़र नहीं आते। इसलिए ज़रूरी है कि सभी लक्ष्य स्पष्ट तरीके और पर्याप्त डैटा के आधार पर मापन योग्य हों। ज़ाहिर है, केवल लक्ष्य निर्धारित करने से कुछ हासिल नहीं होगा। एक केंद्रीय एजेंसी के तौर पर बीईई की भूमिका मज़बूत करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही बीईई के बजट आवंटन में वृद्धि की भी आवश्यकता है। बीईई इस राशि का उपयोग क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करने के लिए कर सकता है ताकि अपने विभिन्न कार्यक्रमों के लिए राज्य सरकारों और एजेंसियों के साथ बेहतर समन्वय बना सके। इसके अलावा बीईई लंबे समय से लंबित कार्यक्रमों, जैसे एसईईपी का संचालन भी शुरू कर पाएगा और कई अन्य परियोजनाओं को बड़े पैमाने पर ले जा पाएगा।

इसके साथ ही जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। कई सर्वेक्षणों से पता चला है कि बीईई के प्रयासों के बावजूद स्टार लेबल्स की जागरूकता सीमित ही है; खास तौर से छोटे उपकरणों को लेकर और ग्रामीण क्षेत्रों में। अंत में, अनुपालन सुनिश्चित करने और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए बीईई इस धन का उपयोग अपने परीक्षण तंत्र को मज़बूत करने के लिए भी कर सकता है।

बीईई से आगे जाकर, ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं द्वारा ऊर्जा दक्षता को संभव बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए अभिनव व्यवसाय और नियामक मॉडल की आवश्यकता होगी। नीतिगत संकेतों, बजटीय आवंटन में वृद्धि और अनुदान के साथ-साथ सस्ते वित्तपोषण के रूप में वित्तीय सहायता कमज़ोर ईएससीओ उद्योग को बढ़ावा दे सकता है। इसका गुणात्मक प्रभाव ठीक उसी तरह होगा जैसा इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा में देखा जा रहा है।

ऊर्जा संरक्षण अधिनियम उपरोक्त सुझावों को शामिल करने का अच्छा स्थान हो सकता है। यदि अधिनियम में तत्काल कोई परिवर्तन नहीं किए गए तो हम ऊर्जा दक्षता का सिर्फ दिखावा करते रहेंगे और भारत में उपलब्ध ऊर्जा के सबसे स्वच्छ और सस्ते स्रोत को बर्बाद करते रहेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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‘गीले कचरे’ से वेस्टलैंड का कायाकल्प – सुबोध जोशी

जिस तेज़ी से औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से भूमि को बेकार बनाया जा रहा है वह चिंता का विषय है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व में भूमि एक सीमित संसाधन है यानी भूमि बढ़ाई नहीं जा सकती। सीमित होते हुए भी भूमि को वेस्टलैंड बनने देना या बेकार पड़े रहने देना गंभीर लापरवाही है।

वर्ष 2004 में आधिकारिक तौर पर हमारे देश के कुल क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत से अधिक (करीब 6.3 करोड़ हैक्टर) क्षेत्र वेस्टलैंड के रूप चिंहित किया गया था। संभव है अब यह आंकड़ा बढ़ गया हो। वेस्टलैंड पर न तो खेती हो सकती है और न ही प्राकृतिक रूप से जंगल और वन्य जीव पनप पाते हैं। और न ही कोई अन्य उपयोगी कार्य हो पाता।

वेस्टलैंड अनेक कारणों से अस्तित्व में आती है। जिसमें प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों कारण शामिल हैं। उदाहरण के लिए बंजर भूमि, खनन उद्योग के कारण जंगलों का विनाश एवं परित्यक्त उबड़-खाबड़ खदानें, अकुशल या अनुचित ढंग से सिंचाई, अत्यधिक कृषि, जलभराव, खारा जल, मरुस्थल और रेत के टीलों का स्थान परिवर्तन, पर्वतीय ढलान, घाटियां, चारागाह का अत्यधिक उपयोग एवं विनाश, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, औद्योगिक कचरे एवं मल निकासी का जमाव, मिट्टी का क्षरण, जंगलों का विनाश वगैरह।

तो सवाल है कि क्या वेस्टलैंड को उपजाऊ बनाया जा सकता है? इसका जवाब मध्य अमेरिका में कैरेबियाई क्षेत्र के एक देश कोस्टा रिका में हुए एक बहुत ही आसान किंतु अनोखे ‘प्रयोग’ के नतीजे में देखा जा सकता है। वास्तव में यह बीच में छोड़ दिया गया एक अधूरा प्रयोग था। इसके बावजूद लगभग दो दशकों बाद प्रयोग स्थल का दृश्य पूर्णतः बदल चुका था।

दरअसल वर्ष 1997 में दो शोधकर्ताओं के मन में एक विचार उपजा और उन्होंने एक जूस कंपनी से संपर्क कर उसके सामने एक प्रायोगिक परियोजना का प्रस्ताव रखा। इसके तहत एक नेशनल पार्क से सटे क्षेत्र की बेकार पड़ी भूमि पर कंपनी को संतरे के अनुपयोगी छिलके फेंकने थे और वह भी बिना किसी लागत के। कंपनी इस बंजर भूमि पर 12,000 टन बेकार छिलके डालने के लिए सहर्ष तैयार हो गई। उसने वहां 1000 ट्रक संतरे के छिलके डाल भी दिए। जल्द ही इसके नतीजे दिखाई देने लगे। संतरे के छिलके छः माह में काली मिट्टी में बदलने लगे। बंजर भूमि उपजाऊ बनने लगी। वहां जीवन पनपने लगा।

इस बीच एक प्रतियोगी जूस कंपनी ने आपत्ति उठाते हुए अदालत में मुकदमा दायर कर दिया – कहना था कि छिलके डालकर वह कंपनी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है। अदालत ने इस तर्क को स्वीकर करके जो फैसला सुनाया उसके कारण यह प्रायोगिक परियोजना बीच में ही रोकनी पड़ी। इसके बाद वहां और छिलके नहीं डाले जा सके। अगले 15 साल डाले जा चुके छिलके और यह स्थान एक भूले-बिसरे स्थान के रूप में पड़ा रहा।

फिर 2013 में जब एक अन्य शोधकर्ता अपने किसी अन्य शोध के सिलसिले में कोस्टा रिका गए तब उन्होंने इस स्थल के मूल्यांकन का भी निर्णय लिया। घोर आश्चर्य! वे दो बार वहां गए लेकिन बहुत खोजने पर भी उन्हें वहां वेस्टलैंड जैसी कोई चीज़ नहीं मिली। कभी बंजर रहा वह भू-क्षेत्र घने जंगल में तबदील हो चुका था और उसे पहचान पाना असंभव था।

इसके बाद, आसपास के क्षेत्र और उस नव-विकसित वन क्षेत्र का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चला कि उस नव-विकसित वन क्षेत्र की मिट्टी कहीं अधिक समृद्ध थी और वृक्षों का बायोमास भी अधिक था। इतना ही नहीं, वहां वृक्षों की प्रजातियां भी अधिक थी। गुणवत्ता का यह अंतर एक ही उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है कि वहां अंजीर के एक पेड़ का घेरा इतना बड़ा था कि तीन व्यक्ति मिलकर हाथ से उसे बमुश्किल घेर पाते थे। और इतना सब कुछ जैविक कचरे की बदौलत सिर्फ 15-20 सालों में अपने आप हुआ था!

सोचने वाली बात है कि जब यह अधूरा प्रयास ही इतना कुछ कर गया तो यदि नियोजित ढंग से किया जाए तो अगले 25 सालों में कितनी वेस्टलैंड को सुधार कर प्रकृति, पारिस्थितिकी, पर्यावरण आदि को सेहतमंद बनाए रखने की दिशा में कार्य किया जा सकता है। जैविक कचरा (जिसे गीला कचरा कहते हैं) एक बेकार चीज़ न रहकर उपयोगी संसाधन हो जाएगा, विशाल मात्रा में उसका सतत निपटान संभव हो जाएगा, मिट्टी उपजाऊ होगी और वेस्टलैंड का सतत सुधार होता जाएगा। प्राकृतिक रूप से बेहतर गुणवत्तापूर्ण, जैव-विविधता समृद्ध घने जंगल पनपने लगेंगे। वन्य जीव भी ऐसी जगह पनप ही जाएंगे। वायु की गुणवत्ता सुधरना और वातावरण का तापमान घटना लाज़मी है। घने जंगल वर्षा को आकर्षित करेंगे। भू-जल भंडार और भूमि की सतह पर जल स्रोत समृद्ध होंगे। कुल मिलाकर पर्यावरण समृद्ध होगा।

चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है, यहां बड़े पैमाने पर अनाजों, दालों, सब्ज़ियों और फलों की पैदावार और खपत होती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए घरों, खेतों, उद्योगों आदि से गीला कचरा प्रतिदिन भारी मात्रा में निकलता है जिसका इस्तेमाल वेस्टलैंड पुनरुत्थान में किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्यों कुछ जानवर स्वजाति भक्षी बन जाते हैं?

किसी को इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि कैलिफोर्निया में कपास के खेतों को माहू (एफिड्स) के हमले से बचाने का एक प्रयास स्वजातिभक्षण विस्फोट का रूप ले लेगा। दरअसल हरे रंग के भुक्खड़ छोटे माहू पौधों से रस चूसकर उन पर फफूंदयुक्त अपशिष्ट और घातक विषाणु छोड़ जाते हैं। इससे फसल तबाह हो जाती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानी जे रोसेनहाइम की टीम ने कपास की फसल को इनके प्रकोप से बचाने के लिए उन पर स्थानीय माहू छोड़े जिन्हें बिग आइड एफिड्स कहते हैं।

कुछ समय के लिए तो सब ठीक-ठाक चला, हरे माहू पर नियंत्रण भी हुआ। लेकिन फिर, जैसे ही पौधों पर जगह कम पड़ने लगी तब कुछ अप्रत्याशित घटा: बिग आइड माहुओं ने हरे माहुओं पर हमला करना बंद कर दिया और एक-दूसरे का शिकार करने लगे, यहां तक कि वे अपने ही अंडों को भी खा गए।

इकॉलॉजी में प्रकाशित अपनी समीक्षा में शोधकर्ता बताते हैं कि जीव जगत में, एक-कोशिकीय अमीबा से लेकर सैलेमेण्डर तक में, स्वजाति भक्षण यानी अपने जैसे जीवों का भक्षण देखा जाता है। लेकिन यह इतना भी आम नहीं है; शोधकर्ताओं ने इसका कारण भी स्पष्ट किया है।

पहला तो स्वजाति भक्षण जोखिम भरा है। यदि किसी जानवर के पास पैने पंजे और दांत हैं, तो ज़ाहिर है कि उसके बंधुओं और साथियों के पास भी पैने पंजे और दांत होंगे। उदाहरण के लिए, मादा मेंटिस संभोग के दौरान अपने से छोटे कद-काठी के नर का सरकलम करने के लिए कुख्यात है, लेकिन कभी-कभी प्रतिस्पर्धा समान कद-काठी वाली अन्य मादा के साथ हो जाती है। जब एक मादा दूसरी की टांग को चबा डालती है तो दूसरी किसी भी तरह अपनी प्रतिद्वंद्वी मादा को मार डालती है।

रोगों की दृष्टि से भी स्वजाति भक्षण जोखिम पूर्ण लगता है। कई रोगजनक मेजबान विशिष्ट होते हैं, इसलिए यदि कोई स्वजाति भक्षी अपने किसी संक्रमित साथी को खाता है तो उस साथी का संक्रमण मिलने की भी संभावना होती है। कुछ मानव समुदायों या समूहों को इसके कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है कुरु नामक दुर्लभ और घातक मस्तिष्क रोग का प्रसार। इसने 1950 के दशक में न्यू गिनी के फोर लोगों को तबाह कर दिया था। कुरु रोग समुदाय के एक अंत्येष्टि अनुष्ठान के माध्यम से पूरे फोर समुदाय में फैला था। इसमें मृतक का परिवार मृतक का मांस (मस्तिष्क सहित) पका कर खाते हैं। जब फोर समुदाय ने इस अनुष्ठान को बंद कर दिया तो उनमें कुरु का प्रसार रुक गया था।

अंत में स्वजाति भक्षण किसी जीन को हस्तांतरित करने का सबसे बुरा तरीका है। जैव विकास के दृष्टिकोण से अंतिम चीज़ है अपनी संतान को खाना। यही एक कारण है कि बड़ी आंखों वाले एफिड अपनी संतानों को खाकर अपनी आबादी को सीमित रखते हैं। यदि वे संख्या में बहुत अधिक हो जाते हैं – जैसा कि एफिड प्रयोग के मामले में हुआ – तो सभी जगह उनके अंडे होते हैं। और चूंकि वे अपने अंडों को नहीं पहचान पाते तो वे स्वयं के अंडे भी खा जाते हैं।

हालांकि स्वजातिभक्षण कोई वांछनीय चीज़ नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियां इस जोखिम पूर्ण व्यवहार को उपयुक्त बना देती हैं। यदि कोई जीव भूख से मरने वाला है तो अपने किसी सगे या वारिस को खाकर वह अपना अस्तित्व तो बचा ही रहा है। देखा गया है कि भूख कभी-कभी सैलेमेण्डर के लार्वा को अपने साथी को कुतरने या खाने के लिए उकसाती है।

अपनी समीक्षा में शोधकर्ता बताते हैं कि विशिष्ट हार्मोन – अकशेरुकियों में ऑक्टोपामाइन और कशेरुकी जीवों में एपिनेफ्रिन – स्वजाति भक्षण में वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार हैं। जैसे-जैसे प्रजाति की आबादी अधिक होने लगती है और भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है तो इन हार्मोन की मात्रा बढ़ने लगती है। और भूख से त्रस्त जीव जो भी सामने आता है उसे झपटने लगते हैं।

अध्ययन यह भी बताता है कि कैसे कुछ परिस्थितियां कुछ युवा उभयचरों जैसे टाइगर सेलेमैण्डर और कुदाल जैसे पैर वाले मेंढक को महास्वजातिभक्षी बना देते हैं। जब किसी तालाब में बहुत सारे लार्वा होते हैं तो कुछ टैडपोल स्वजातिभक्षी रूप धारण कर लेते हैं। इनमें जबड़े बड़े हो जाते हैं और नकली दांत निकल आते हैं। इसी तरह का स्वजाति भक्षण घुन, मछली और यहां तक कि फल मक्खियों में भी पनपता है। फल मक्खियों में तो ऐसे जीव अपने साथियों की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक दांतों से लैस हो जाते हैं।

अन्य जीव जैसे खूंखार केन टोड इसका विपरीत तरीका अपनाते हैं। यदि भूखे स्वजाति भक्षी केन टोड आसपास होते हैं तो अन्य टैडपोल का विकास तेज़ हो जाता है और वे इतने बड़े हो जाते हैं कि उन्हें निगलना असंभव हो जाता है।

रोसेनहाइम के मुताबिक स्वजाति भक्षण का परिणाम सकारात्मक होता है: इसके चलते कम संख्या वाली, स्वस्थ आबादी विकसित होती है। इसी कारण वे इसे बर्बर कहने से कतराते हैं। उनके मुताबिक मनुष्यों की बात हो तो अच्छी नहीं लगती लेकिन प्रकृति में संतुलन लाने में स्वजातिभक्षण का काफी योगदान है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विलुप्ति का खतरा सबसे अनोखे पक्षियों पर है

वैसे ही दुख की बात है कि आने वाले समय में पृथ्वी से हर वर्ष हज़ारों प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। लेकिन उससे भी ज़्यादा दुख की बात है कि हाल ही में किए गए दो स्वतंत्र अध्ययनों से पता चला है कि विलुप्ति का सबसे अधिक खतरा उन पक्षियों पर है जो अपने पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिनका स्थान शायद कोई और नहीं ले सकता।

एक अध्ययन के मुताबिक आकर्षक चोंच वाले टूकन पक्षी दक्षिण अमेरिका के वर्षा वनों में उन बड़े-बड़े बीजों और फलों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो अन्य पक्षियों के लिए संभव नहीं है। दुर्भाग्यवश, टूकन के साथ-साथ गिद्ध, आईबेसिस और अन्य अनोखी प्रजातियों की विलुप्ति की आशंका सबसे अधिक है। ऐसा हुआ तो आबादियां अधिक एकरूप होने लगेंगी।

एक अन्य अध्ययन का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रजातियां ठंडे क्षेत्रों की ओर प्रवास करेंगी जिसके चलते एक जैसी प्रजातियों की संख्या में वृद्धि होने की संभावना बढ़ सकती है। युनिवर्सिटी ऑफ मोंटाना के पारिस्थितिकीविद जेडेडिया ब्रॉडी इस संकट के लिए मानव क्रियाकलापों को ज़िम्मेदार मानते हैं।

प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र विभिन्न भूमिकाएं निभाने वाले अनेकों जीवों पर निर्भर होता है। पक्षियों का उदाहरण लिया जाए तो हम देखेंगे कि कुछ पक्षी बीजों को फैलाने में मददगार होते हैं तो कुछ मृत जीवों को खाकर पुनर्चक्रण में सहायक होते हैं। पक्षियों में लंबी और नुकीली चोंच, लंबे पैर आदि विशेषताएं विभिन्न प्रकार की भूमिकाओं को अंजाम देने में सहायक होती हैं। ऐसे में एक पारिस्थितिकी तंत्र में यदि एक ही तरह की प्रजातियां हों तो वे विभिन्न भूमिकाओं को अंजाम नहीं दे पाएंगी।

कुछ पक्षियों में प्रमुख विशेषताओं के गायब होने का पता लगाने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड की एमा ह्यूजेस ने कई वर्षों तक लगभग 8500 पक्षियों की चोंच के आकार, निचले पंजों और पंख की लंबाई, और संग्रहालय में रखे शरीर के नमूनों के आकार का मापन किया और प्रजातियों के बीच समानताओं और अंतरों को समझने के लिए सांख्यिकी तकनीकों का उपयोग किया। इस अध्ययन में सॉन्गबर्ड जैसे पक्षी आकार के आधार पर एक ही समूह में आ गए। दूसरी ओर एल्बेट्रास जैसे विशाल पक्षी, छोटे हमिंगबर्ड और आईबेसिस अपनी लंबी गर्दन तथा घुमावदार चोंच के चलते थोड़े अलग से दिखे।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने उन प्रजातियों को अपनी सूची में से अलग किया जिनके विलुप्त होने की संभावना इंटरनेशनल युनियन फॉर कंज़रवेशन की रेड लिस्ट के अनुसार ज़्यादा थी। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार सबसे जोखिमग्रस्त प्रजातियां वे हैं जो शरीर के आकार और पारिस्थितिकी भूमिका में अनोखी हैं। जब शोधकर्ताओं ने सबसे अधिक से सबसे कम जोखिमग्रस्त प्रजातियों को सूचीबद्ध करना शुरू किया तो सबसे पहले टूकन, हॉर्नबिल, हमिंगबर्ड और अन्य अनोखी प्रजातियां बाहर हुईं जबकि एक जैसे पक्षी (फिंचेस, स्टारलिंग्स वगैरह) लिस्ट में बने रहे।

इस संदर्भ में कौन-से क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे, इसका पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने 14 प्रमुख प्राकृतवासों या बायोम (जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र) में रहने वाले पक्षियों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि प्रजातियों का एकरूपीकरण 14 में से 12 क्षेत्रों को प्रभावित करेगा और इसका सबसे अधिक प्रभाव जलमग्न घास के मैदानों और उष्णकटिबंधीय जंगलों में होगा। सबसे अधिक संकटग्रस्त क्षेत्रों में वियतनाम, कंबोडिया और हिमालय की तराई के साथ-साथ हवाई जैसे द्वीप भी शामिल हैं। ब्रॉडी के अनुसार कुछ मामलों में इन प्रजातियों द्वारा निभाई जाने वाली अद्वितीय पारिस्थितिक भूमिकाओं को निभाने में सक्षम कोई और नहीं है।

सेन्केनबर्ग बायोडाइवर्सिटी एंड क्लाइमेट रिसर्च सेंटर की पारिस्थितिकीविद एल्के वोस्केम्प द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में एकरूपीकरण के एक और चालक की पहचान की गई है: जलवायु परिवर्तन के कारण पक्षियों के इलाकों में परिवर्तन। वोस्केम्प और उनकी टीम ने 9882 पक्षियों के वर्तमान इलाकों का पता लगाया। इसके बाद उन्होंने जलवायु मॉडल का उपयोग करते हुए यह अनुमान लगाया कि वर्ष 2080 तक इन प्रजातियों का मुख्य आवास कहां होगा। अंत में टीम ने यह पता लगाया कि यह परिवर्तित वितरण पक्षियों के समुदायों को कैसे बदलेगा।

जैसा कि शोधकताओं का अनुमान था, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सबसे अधिक प्रजातियों के गायब होने की संभावना है – वे या तो विलुप्त हो जाएंगी या अन्य इलाकों में चली जाएंगी। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इन इलाकों में कुछ बाहरी पक्षियों का आगमन भी अवश्य होगा लेकिन अधिक संभावना यही है कि अधिकांश पक्षी निकटता से सम्बंधित होंगे और उनमें उस इलाके में रहने के लिए ज़रूरी गुण पाए जाएंगे।     

उत्तरी अमेरिका और युरेशिया में पक्षी प्रजातियों में वृद्धि होगी क्योंकि पक्षी गर्म से ठंडे इलाकों की तरफ प्रवास करेंगे। लेकिन इन इलाकों में भी नए पक्षी मौजूदा प्रजातियों से निकटता से सम्बंधित होंगे।

उपरोक्त दोनों ही अध्ययन संकेत देते हैं कि विश्व में पक्षियों में एकरूपता आएगी जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा झटका होगा। पूर्व में किए गए कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है ऐसा समरूपीकरण उभयचरों और स्तनधारियों में भी हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विरोधाभास: स्वच्छ हवा से बढ़ता है तापमान

ह तो सर्वविदित है कि कोयला या पेट्रोल के दहन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जो धरती का तापमान बढ़ाती हैं। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि प्रदूषण के कण सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर कुछ हद तक पृथ्वी को ठंडा रखने में योगदान देते हैं। प्रदूषण-नियंत्रण प्रौद्योगिकियों में प्रगति से इस प्रदूषण से निर्मित विषैले बादल और उनसे संयोगवश मिलने वाला यह लाभ कम होने लगा है।

उपग्रहों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वैश्विक वायु प्रदूषण का पर्यावरणीय असर वर्ष 2000 की तुलना में 30 प्रतिशत तक कम हो गया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक अच्छी खबर है क्योंकि वायुवाहित सूक्ष्मकण या एयरोसोल से प्रति वर्ष कई लाख लोग मारे जाते हैं। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के लिहाज़ से देखा जाए तो यह एक बुरी खबर है। लीपज़िग युनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक जोहानेस क्वास के अनुसार स्वच्छ हवा ने उत्सर्जित कार्बन डाईऑक्साइड से होने वाली कुल वार्मिंग को 15 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। यानी वायु प्रदूषण कम होने से तापमान में और अधिक वृद्धि हो रही है।  

ब्लैक कार्बन या कालिख जैसे एयरोसोल गर्मी को अवशोषित करते हैं। दूसरी ओर, परावर्तक सल्फेट और नाइट्रेट कण ठंडक पैदा करते हैं। ये गाड़ियों के एक्ज़ॉस्ट, जहाज़ों के धुएं और ऊर्जा संयंत्रों की चिमनियों से निकलने वाली प्रदूषक गैसों में पाए जाते हैं। इन प्रदूषकों को कम या खत्म करने के लिए उत्तरी अमेरिका और युरोप से लेकर विकासशील देशों में प्रौद्योगिकियां विकसित हुई हैं। इसके नतीजे में पहली बार वर्ष 2010 में चीन में वायु प्रदूषण में गिरावट शुरू हुई। इसके अलावा, हाल के वर्षों में सल्फर उत्सर्जित करने वाले जहाज़ों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध भी लगा है।

एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिज़िक्स प्रीप्रिंट में प्रकाशित पर्चे में उत्तरी अमेरिका और युरोप में एयरोसोल में गिरावट के संकेत दिए गए हैं लेकिन वैश्विक स्थिति नहीं उभरी है। क्वास और सहयोगियों का विचार था कि इस काम में नासा के उपग्रह टेरा और एक्वा सहायक सिद्ध हो सकते हैं। ये दोनों उपग्रह पृथ्वी पर आने वाले और बाहर जाने वाले विकिरण का हिसाब रखते हैं। इसकी सहायता से कई शोध समूहों को ग्रीनहाउस गैसों द्वारा अवरक्त ऊष्मा को कैद करने में वृद्धि की जानकारी प्राप्त हुई है। लेकिन एक्वा और टेरा पर लगे एक उपकरण ने परावर्तित प्रकाश में गिरावट दर्शाई। कुछ विशेषज्ञ परावर्तन में इस कमी के लिए कुछ हद तक एयरोसोल में कमी को ज़िम्मेदार मानते हैं।  

क्वास और उनके सहयोगियों ने इस अध्ययन में टेरा और एक्वा पर लगे उपकरणों का उपयोग करते हुए एक और अध्ययन किया। उन्होंने आकाश में कुहरीलेपन को रिकॉर्ड किया जो एयरोसोल की मात्रा को दर्शाता है। क्वास के अनुसार वर्ष 2000 से लेकर 2019 तक उत्तरी अमेरिका, युरोप और पूर्वी एशिया पर कुहरीलेपन में काफी कमी आई जबकि कोयले पर निर्भर भारत में यह बढ़ता रहा। गौरतलब है कि एयरोसोल न केवल स्वयं प्रकाश को परावर्तित करते हैं बल्कि बादलों में भी परिवर्तन कर सकते हैं। ये कण नाभिक के रूप में कार्य करते हैं जिस पर जलवाष्प संघनित होती है। प्रदूषण के कण बादल की बूंदों के आकार को छोटा करते हैं और उनकी संख्या में वृद्धि करते हैं जिससे बादल अधिक परावर्तक बन जाते हैं। ऐसे में यदि प्रदूषण को कम किया जाता है तो यह प्रभाव उलट जाता है। टीम ने पाया कि बादल की बूंदों की सांद्रता में कमी उन्हीं क्षेत्रों में आई है जहां एयरोसोल की मात्रा में गिरावट हुई है।    

कुछ अन्य अध्ययनकर्ताओं के अनुसार अभी सटीकता से नहीं बताया जा सकता कि एयरोसोल में कमी से ग्लोबल वार्मिंग में कितनी वृद्धि हुई है क्योंकि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में विविधता इतनी अधिक है।

ज़ाहिर है कि समस्या का हल यह नहीं है कि वायु प्रदूषण को बढ़ावा दिया जाए। वायु प्रदूषण से हर वर्ष कई लोगों की जान जाती है। बल्कि आवश्यकता इस बात है कि वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के प्रयासों को गति दी जाए।

पूर्व-औद्योगिक समय की तुलना में पृथ्वी वर्तमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो चुकी है और 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करने के लिए उत्सर्जन में तेज़ी से कटौती की उम्मीद काफी कम है। इसलिए समाधान के रूप में कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि सोलर जियोइंजीनियरिंग के माध्यम से सल्फेट कणों को समताप मंडल में फैलाया जाए ताकि एक वैश्विक परावर्तक कुहरीलापन निर्मित हो जाए। इस विचार को लेकर काफी विवाद है लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि इसे एक अंतरिम उपाय के रूप में देखा जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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नए उपचारों के लिए प्रकृति का सहारा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यम, सुशील चंदानी

चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के लिए ऐसी नई-नई औषधियों की आवश्यकता होती है जिनमें वांछित जैविक गुणधर्म हों। आशावादी सोच यह है कि विभिन्न तकनीकी मोर्चों पर तीव्र प्रगति के चलते नई दवाइयों की खोज और निर्माण आसान होता जाएगा।

आणविक स्तर पर रोग प्रक्रियाओं की बढ़ती समझ ने औषधियों के संभावित लक्ष्यों की एक लंबी सूची उपलब्ध कराई है। कंप्यूटर की मदद से ‘तर्कसंगत ड्रग डिज़ाइन’, कार्बनिक रसायन शास्त्रियों द्वारा इन कंप्यूटर-जनित औषधियों को बनाया जाना, और फिर त्वरित गति से इनकी जांच – जिसमें औषधियों के परीक्षण के लिए ऑटोमेशन का उपयोग किया जाता है – ने नई खोजों में सहायता की है। फिर भी, नई दवाइयों का वास्तविक चिकित्सकीय उपयोग करने की गति अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।

प्राकृतिक उत्पाद

हमारे आसपास की प्राकृतिक दुनिया नए उपचारों का एक जांचा-परखा स्रोत रही है – पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली हमेशा से प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थी। प्राकृतिक उत्पाद ऐसे रसायन होते हैं जो मिट्टी और पानी में पनपने वाले पौधों और सूक्ष्मजीवों में पाए जाते हैं।

1946 में हुए कैंसर-रोधी दवा के पहले क्लीनिकल परीक्षण से लेकर 2019 तक के सभी स्वीकृत कैंसर-रोधी औषधीय अणुओं में से 40 प्रतिशत अणु या तो प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थ हैं, या प्राकृतिक उत्पादों से प्राप्त किए गए हैं। इसी प्रकार से, 1981-2019 के दौरान की 162 नए एंटीबायोटिक उपचारों में से आधे या तो शुद्ध प्राकृतिक उत्पाद हैं या प्रकृति-व्युत्पन्न हैं यानी कि वे प्रयोगशालाओं में डिज़ाइन किए गए हैं लेकिन प्रकृति में पाए जाने वाले अणुओं के लगभग समान हैं (न्यूमैन व क्रैग, जर्नल ऑफ नेचुरल प्रोडक्ट्स, 2020)।

मसलन एज़िथ्रोमाइसिन नामक एंटीबायोटिक। इसे पहली बार क्रोएशिया स्थित ज़ग्रेब के रसायनज्ञों द्वारा संश्लेषित किया गया था। उन्होंने बड़ी चतुराई से प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली और आम तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक एरिथ्रोमाइसिन-ए के अणु में एक अतिरिक्त नाइट्रोजन परमाणु जोड़ा था। एरिथ्रोमाइसिन के साइड प्रभावों की तुलना में इस संश्लेषित दवा के साइड प्रभाव कम थे, और आज यह चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली सबसे आम एंटीबायोटिक दवाओं में से एक है। इसके विपरीत, 1981 से 2019 के बीच अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन को नए रासायनिक पदार्थों के रूप में प्रस्तुत सभी 14 हिस्टामाइन-रोधी दवाइयां (जैसे सिट्रेज़िन) शुद्धत: संश्लेषित आविष्कार हैं।

कई शक्तिशाली प्राकृतिक उत्पाद अपने मूल स्रोत में अत्यल्प मात्रा में मौजूद होते हैं, जिसके चलते प्रयोगशाला में जांच के लिए इनकी पर्याप्त मात्रा एकत्र करना मुश्किल हो जाता है। ये दर्जनों अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ पाए जाते हैं, इसलिए वांछित अणु को ढूंढ निकालना सहज-सरल नहीं होता। इसके लिए श्रमसाध्य पृथक्करण प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। एक तरीका है कि प्रारंभिक परिणामों के आशाजनक होने के बाद वांछित अणु का अधिक मात्रा में संश्लेषण किया जाए।

पुरानी दवाओं का नया रूप

पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त दवा से एक नई संभावित दवा तैयार करने का उदाहरण हाल ही में स्क्रिप्स रिसर्च के स्टोन वू और रयान शेनवी द्वारा नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। दक्षिण प्रशांत में पापुआ न्यू गिनी द्वीप पर गलबुलिमिमा पेड़ की छाल का उपयोग लंबे समय तक दर्द और बुखार के इलाज में किया जाता था। चूंकि यह भ्रांतिजनक भी है, इसका उपयोग अनुष्ठानों में भी किया जाता है। जब इसे होमालोमेना झाड़ी की पत्तियों के साथ लिया जाता है तो यह मदहोशी पैदा करता है, एक शांत स्वप्न जैसी अवस्था को लाता है जिसके बाद सुखद नींद आती है। होमलोमेना (हिंदी में सुगंधमंत्री) भारत में पाई जाती है, और पारंपरिक रूप से कई बीमारियों में इसका उपयोग किया जाता रहा है। गलबुलिमिमा ने दशकों से औषधीय रसायनज्ञों को आकर्षित किया है। इस पेड़ के अर्क में 40 अद्वितीय अल्केलॉइड पहचाने गए हैं। अल्केलॉइड कुनैन और निकोटीन जैसे नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक हैं जो कई पौधों में पाए जाते हैं।

वू और शेनवी ने जटिल ज्यामितीय संरचना वाले अल्केलॉइड GB18 के संश्लेषण करने का एक कार्यक्षम तरीका खोज निकाला है। उनकी विधि से GB18 का कुछ ग्राम में उत्पादन किया जा सकता है। छाल में इसकी उपस्थिति मात्र अंश प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है। परीक्षणों में पता चला है कि यह ओपिऑइड (अफीमी औषधि) ग्राहियों का रोधी है।

मानव शरीर में ओपिऑइड ग्राही तंत्रिका तंत्र और पाचन तंत्र में पाए जाते हैं। हमारे शरीर में एंडॉर्फिन जैसे ओपिऑइड बनते हैं, जो इन ग्राहियों से जुड़ जाते हैं और दर्द संकेतों के संचरण को कम करते हैं। एंडॉर्फिन में मॉर्फिन जैसे दर्दनाशक गुण होते हैं। एंडॉर्फिन आनंद की अनुभूति भी कराते हैं। इन दोनों बातों से समझ में आता है कि ओपिऑइड ग्राहियों को सक्रिय करने वाले पदार्थों की लत क्यों लगती है।

GB18 दर्द की अनुभूति को प्रभावित नहीं करता है लेकिन इसका संज्ञानात्मक प्रभाव पड़ता है – चूहे अपने बालों और मूंछों को संवारने जैसे व्यवहारों में कम समय व्यतीत करने लगते हैं।

ओपिऑइड ग्राहियों का अंतिम रोधी नाल्ट्रेक्सोन था जिसे 35 साल पहले खोजा गया था। भारत में यह नोडिक्ट और नलटिमा जैसे ब्रांड नामों से बिकता है और इसका उपयोग अफीमी दवाओं के साथ-साथ शराब की लत के प्रबंधन में किया जाता है। और चूंकि अफीमी औषधियों के ग्राही पाचन तंत्र में पाए जाते हैं, नाल्ट्रेक्सोन मोटे लोगों में वज़न घटाने में भी मदद करता है।

GB18 और इससे निर्मित कई संभावित अणुओं के उपयोग क्या होंगे? आगे बहुत काम किया जाना बाकी है, और कई रोमांचक चिकित्सकीय संभावनाएं नज़र आ रही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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