लीथियम, पर्यावरणऔर राष्ट्रों के बीच संघर्ष

र्ष 2015 में, सभी देशों ने पेरिस समझौते (Paris agreement ) को स्वीकारा था, जिसका लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) बढ़ाना, इलेक्ट्रिक परिवहन को अपनाना और तकनीक के ज़रिए संसाधनों की खपत घटाना था। यह समाधान लगता आसान था, लेकिन इसे लागू करना उतना आसान साबित नहीं हुआ।

इस संदर्भ में राजनीति वैज्ञानिक थीआ रियोफ्रांकोस ने अपनी किताब एक्सट्रैक्शन (Extraction) में इस बदलाव के एक अहम पहलू लीथियम (lithium mining) पर ध्यान दिया है। बैटरियों और कई नवीकरणीय तकनीकों के लिए ज़रूरी लीथियम ग्रीन अर्थव्यवस्था (green economy) का केंद्र है। रियोफ्रांकोस के अनुसार इस धातु की वैश्विक होड़़ ने नैतिक और सामाजिक समस्याएं पैदा की हैं। केवल उत्सर्जन घटाने पर ध्यान देने से देशों और कंपनियों ने खनन से जुड़ी मानव और पर्यावरणीय लागत को नज़रअंदाज़ कर दिया है, जिससे ‘कार्बन रहित पूंजीवाद’ की भ्रामक धारणा बनी।

रियोफ्रांकोस ने व्यापक फील्डवर्क में स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर लीथियम खनन के प्रभावों को देखा है। उदाहरण के तौर पर चिली का अटाकामा रेगिस्तान (Atacama desert) लीथियम से भरपूर है और 12,000 साल से लोग यहां रहते आए हैं। सदियों तक यहां के लोग समृद्ध व्यापार नेटवर्क बनाए रखते थे, लेकिन उपनिवेशीकरण और बाद में औद्योगिक कंपनियों ने इसे बंजर ज़मीन दिखाकर खनन को सही ठहराया। आज भी बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्थानीय अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण (Environmental protection) के नियमों को चुनौती देती हैं।

रियोफ्रांकोस की खोजों से पता चलता है कि केवल कार्बन उत्सर्जन घटाने पर ध्यान देना खतरनाक हो सकता है। रियोफ्रांकोस का मानना है कि ‘नेट-ज़ीरो’ (net zero goals) पर सिर्फ एक तरह से काम करने के बजाय कई उपाय अपनाए जाएं – जैसे बेहतर सार्वजनिक परिवहन (public transport), पैदल और साइकिल से चलने वालों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, अधिक घनी आबादी वाले शहर, कम कारें और अधिक रिसायक्लिंग (recycling)। इन उपायों से जलवायु लक्ष्यों के साथ सामाजिक समता और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन बनाए रखा जा सकता है।

वैश्विक स्तर पर, लीथियम की दौड़ भू-राजनीति को भी प्रभावित करती है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV market) और नवीकरणीय ऊर्जा में चीन (china supply chain) की तेज़ बढ़त ने अमेरिका और युरोप को अपनी सप्लाई चेन को बदलने पर मजबूर किया है, ताकि वे ज़रूरी खनिजों पर नियंत्रण पा सकें। इस प्रतिस्पर्धा से तनाव बढ़ता है, वैश्विक सहयोग प्रभावित होता है, और संसाधन-समृद्ध क्षेत्र नए शोषण (resource exploitation) के केंद्र बन सकते हैं।

रियोफ्रांकोस चेतावनी देती हैं कि हरित ऊर्जा की ओर बदलाव अपने आप में न्यायसंगत नहीं है। कार्बन उत्सर्जन घटाना (Carbon Reduction) केवल एक हिस्सा है; न्याय सुनिश्चित करना, आदिवासी अधिकारों (indigenous rights) की रक्षा करना और पारिस्थितिकी की सुरक्षा (ecology protection) करना भी उतना ही ज़रूरी है। इन बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए, जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर जाना असमानता और पर्यावरणीय नुकसान को दोहरा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इरावती कर्वे: एक असाधारण जीवन की कहानी

जय निंबकर और वर्षा केलकर-माने

रावती: यह नाम जितना अनोखा है, उतना ही असाधारण उनका जीवन भी था। 1905 में बर्मा (Burma) में जन्मी इरावती का नाम वहां बहने वाली इरावती नदी (Irrawaddy river) पर रखा गया था। उनके पिता हरि गणेश करमाकर वहां इंजीनियर थे। सात साल की उम्र में उन्हें पढ़ाई के लिए पुणे स्थित हुज़ूर पागा बोर्डिंग स्कूल भेजा गया, जो महाराष्ट्र में लड़कियों के पहले-पहले स्कूलों (girls’ schools) में से एक था।

वहां उनकी दोस्ती शकुंतला परांजपे से हुई जो एक साईस (अश्वपाल) आर. पी. परांजपे की बेटी थी। शकुंतला की मां ने इरावती को अपने परिवार के साथ रहने के लिए आमंत्रित किया। इसने इरावती के जीवन की दिशा ही बदल दी। इस परिवार के बौद्धिक, कलात्मक माहौल (intellectual environment) ने इरावती को किताबों और लोगों से जोड़ा। उनमें से एक थे न्यायाधीश बालकराम। न्यायाधीश बालकराम ने उनमें मानवशास्त्र (anthropology) के प्रति रुचि जगाई; आगे चलकर वे इसी विषय में काम करके अपनी छाप छोड़ने वाली थीं। यहीं उनकी मुलाकात दिनकर कर्वे से हुई, जो फर्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर थे। वे महर्षि धोंडो केशव कर्वे के बेटे थे जिन्होंने देश में महिला शिक्षा (women education) व विधवा पुनर्विवाह (widow remarriage) के कार्य में अग्रणि भूमिका निभाई थी। बाद में इरावती ने दिनकर कर्वे से विवाह किया।

फर्ग्यूसन कॉलेज से बीए करने के बाद इरावती ने बॉम्बे विश्वविद्यालय (University of Bombay) में समाजशास्त्र विभाग के संस्थापक डॉ. जी. एस. घुर्ये, के मार्गदर्शन में समाजशास्त्र में एम.ए. किया। उनके पति ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और सुझाव दिया कि वे विदेश जाकर अपनी संभावनाओं को साकार करें। इस उद्देश्य से उन्होंने बर्लिन जाकर मानवशास्त्र में पीएच.डी. के लिए दाखिला लिया। वहां कैसर विल्हेम इंस्टीट्यूट फॉर एंथ्रोपोलॉजी, यूजीनिक्स एंड ह्यूमन हेरेडिटी (Kaiser Wilhelm Institute for Anthropology, Eugenics and Human Heredity) के निदेशक प्रोफेसर यूजेन फिशर के मार्गदर्शन में पीएच.डी. करने के बाद वे 1930 में भारत लौटीं।

भारत लौटने के बाद इरावती ने पुणे के एस.एन.डी.टी. कॉलेज (SNDT College) में कुछ समय के लिए रजिस्ट्रार के रूप में काम किया। लेकिन उनका असली रुझान प्रशासनिक कामों में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध और शिक्षा के क्षेत्र में था। उन्होंने बाद में डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट रिसर्च इंस्टीट्यूट (Deccan College Post-Graduate Research Institute) में एक पद स्वीकार किया और अपना पूरा पेशेवर जीवन इसी संस्थान में अपने चुने हुए क्षेत्र में काम करते हुए बिताया।

उनके शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना था: “हम भारतीय कौन हैं और हम जैसे हैं, वैसे क्यों हैं?” उन्होंने जो लक्ष्य तय किए थे वे मानवशास्त्र के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप थे। उन्होंने जिन विशिष्ट सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की इनमें कुछ मुख्य सवाल इस प्रकार थे: 

1. क्या भारत में लोगों के ऐतिहासिक (historical) और प्रागैतिहासिक (prehistoric) आवागमन के आधार पर अधिक विस्तृत सांस्कृतिक और भौतिक बनावट की पहचान की जा सकती है?

2. जिन लोगों ने समूचे भारत के ऐतिहासिक और प्रागैतिहासिक स्थलों (historical sites) का निर्माण किया, उनके शारीरिक गुणधर्म क्या थे? जाति क्या है?

इन सवालों के जवाब खोजने के लिए उन्होंने एक एथ्नो-ऐतिहासिक दृष्टिकोण (ethno-historical approach) अपनाया, जो संभवत: बर्लिन में मिली उनकी ट्रेनिंग का नतीजा था। उन्होंने चार बहुविषयी क्षेत्रों में एक साथ काम शुरू किया: पुरा-मानवशास्त्र (पैलियो-एंथ्रोपोलॉजी – (paleo-anthropology)), भारत अध्ययन (इंडोलॉजिकल स्टडीज़ – Indological studies), महाकाव्य और मौखिक परंपराएं(epics and oral traditions), विभिन्न क्षेत्रों में व्यवस्थित भौतिक मानवशास्त्रीय (physical anthropology) और भाषाई क्षेत्रों में विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन(sociological study)।

इरावती कर्वे का मानना था कि पूरे भारत में बेतरतीब ढंग से लोगों के आंकड़े इकट्ठा करने की बजाय, किसी एक सीमित क्षेत्र के लोगों का व्यवस्थित अध्ययन (systematic study) करना अधिक उपयोगी होगा और किसी सांस्कृतिक क्षेत्र की नस्लीय संरचना (racial structure) को समझा जा सकेगा। वे आदिम समूहों या जनजातीय समूहों के सामान्य माप लेने के पक्ष में नहीं थीं। उदाहरण के लिए, उनका कहना था कि महाराष्ट्र के 100 ब्राह्मणों का नमूना, 12 अंतर्विवाही उपजातियों (सब-कास्ट – sub-casts) के जीन पूल (gene pool) का सही अंदाज़ा नहीं दे सकता।

उन्होंने यह भी बताया कि ब्राह्मणों की दो प्रमुख उपजातियां, चितपावन और देशस्थ ऋग्वेदी, काफी अलग-अलग हैं, और देशस्थ ऋग्वेदी मराठों (Marathas) के अधिक करीब हैं। इसी कारण उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय आबादी का नमूना जाति स्तर पर लिया जाना चाहिए, न कि जाति समूह स्तर पर। जाति को अध्ययन की एक इकाई और शोध के उपकरण के रूप में उपयोग करने की उनकी इस सोच ने भारतीय मानवशास्त्र (Indian anthropology) में एक क्रांति ला दी। 

डॉ. कर्वे ने ऋग्वेद, अथर्ववेद और महाभारत (Mahabharata) में पारिवारिक संगठन (family organization) और सम्बंधों का भी अध्ययन किया। उन्होंने गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, केरल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश से आंकड़े एकत्र किए। इन अध्ययनों को उन्होंने अपनी किताब ‘किनशिप ऑर्गेनाइज़ेशन इन इंडिया’ (1953) (Kinship Organization in India) में संकलित किया है। यह किताब, जिसे तीन भागों में प्रकाशित किया गया था, सांस्कृतिक मानवशास्त्र में एक क्लासिक मानी जाती है और इस क्षेत्र में काम करने वाले विद्वानों के लिए एक मूल स्रोत है।

उनके काम ने उन्हें देश-विदेश में पहचान दिलाई। 1947 में, उन्हें भारतीय विज्ञान कांग्रेस (Indian Science Congress) के मानवशास्त्र विभाग की अध्यक्ष चुना गया और लंदन विश्वविद्यालय (University of London) के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ (School of Oriental and African Studies) में व्याख्याता पद स्वीकार करने का प्रस्ताव मिला। 

उनके महत्वपूर्ण योगदान में कई किताबें शामिल हैं, जैसे हिंदू सोसाइटी: एन इंटरप्रिटेशन (Hindu Society: An Interpretation), जिसमें उन्होंने जाति संरचना पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, किनशिप ऑर्गेनाइज़ेशन इन इंडिया और महाराष्ट्र: लैंड एंड पीपुल (Maharashtra: Land and People)। उन्होंने मराठी में महाभारत पर आधारित आलोचनात्मक किताब युगांत भी लिखी, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (Sahitya Akademi Award) मिला। उनके गैर-परंपरागत दृष्टिकोण ने कुछ परंपरावादियों की भावनाओं को आहत किया, लेकिन इसके बावजूद यह किताब काफी लोकप्रिय हुई। इसे कई भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में अनुदित किया गया है और 1970 में उनकी मृत्यु के तीस साल बाद भी इसके नए संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं।

इरावती कर्वे का निधन 11 अगस्त 1970 को 65 वर्ष की आयु में नींद के दौरान हो गया। उन्होंने अपनी विद्वता में बौद्धिक ईमानदारी (intellectual honesty), ज़बरदस्त मानसिक ऊर्जा (mental energy)  और विभिन्न प्रकार के लोगों से जुड़ने की क्षमता को जोड़ा और आधुनिक भारत के ज्ञान और साहित्य पर एक स्थायी छाप छोड़ी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इगनोबेल पुरस्कार: मज़े-मज़े में विज्ञान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

हालिया सुर्खियां बताती हैं कि दो भारतीय वैज्ञानिकों (Indian scientists) को इंजीनियरिंग डिज़ाइन (design) श्रेणी में 2025 का इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार दिया गया है। हम सब नोबेल पुरस्कारों के बारे में तो जानते हैं, लेकिन क्या इगनोबेल पुरस्कार के बारे में जानते हैं?

साइंस पत्रिका (science magazine) की एक रिपोर्ट के अनुसार, इगनोबेल पुरस्कार ऐसा हल्का-फुल्का आयोजन है जो पुरस्कार पर एक प्रहसन-सा है। ‘इग (Ig)’ उपसर्ग का मतलब होता है गैर-सम्माननीय या निम्न दर्जे का। यहां पुरस्कार का नाम (Ig Nobel) दरअसल ‘ignoble’ शब्द पर एक तंज है। ज्ञानवर्धी (संजीदा) विज्ञान (science), प्रौद्योगिकी (technology), साहित्य (literature), शांति (peace) और अर्थशास्त्र (economics) में दिए जाने वाले वास्तविक नोबेल पुरस्कारों (Nobel Prizes) के विपरीत इगनोबेल पुरस्कार हास्य (humor) का पुट देते हैं।

इगनोबेल पुरस्कार वर्ष 1991 से हर साल दिए जा रहे हैं; मकसद है वैज्ञानिक अनुसंधान (scientific research) के साथ आम लोगों (general public) के जुड़ाव को बढ़ावा देना। ये ऐसे अनुसंधान के लिए दिए जाते हैं जो पहले-पहल तो लोगों को हंसाते हैं लेकिन फिर उन्हें सोचने पर मजबूर करते हैं। प्रत्येक विजेता को 10 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर (Zimbabwe dollar) का एक बैंकनोट मिलता है, जिसकी कीमत इसके चलन के समय 40 अमेरिकी सेंट थी लेकिन अब यह विमुद्रीकृत कर दिया गया है और अब ये प्रचलन में नहीं हैं। इसके विपरीत, प्रत्येक नोबेल पुरस्कार (Nobel prize) विजेता को एक स्वर्ण पदक (जिस पर पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की तस्वीर उकेरी होती है) और लगभग 1.1 करोड़ स्वीडिश क्रोनर मिलते हैं, जिसे अधिकतम तीन विजेताओं के बीच साझा किया जा सकता है।

प्रत्येक नोबेल विजेता को हर साल दिसंबर में स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Swedish Academy of Sciences) में एक समारोह में अपना व्याख्यान देने का अवसर भी मिलता है। इसके विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार बोस्टन, मैसाचुसेट्स में आयोजित एक समारोह में दिए जाते हैं और प्रत्येक विजेता को अपनी उपलब्धियां प्रस्तुत करने के लिए केवल एक मिनट का समय दिया जाता है।

2025 के इगनोबेल विजेता

इगनोबेल पुरस्कारों (Ig Nobel awards) का चयन एनल्स ऑफ इम्प्रॉबेबल रिसर्च (Annals of Improbable Research) पत्रिका द्वारा किया जाता है। उनकी वेबसाइट के अनुसार, 2025 के इगनोबेल पुरस्कार विजेता ये हैं:

  • जीव विज्ञान (biology) के लिए तोमोकी कोजिमा और उनके साथी, जिन्होंने अपने प्रयोगों के ज़रिए दिखाया है कि गायों पर ज़ेबरा जैसी काली-सफेद धारियां पोतने से मक्खियां उन्हें कम काटती हैं।
  • इंजीनियरिंग डिज़ाइन (engineering design)  या एर्गोनॉमिक्स (ergonomics) में उत्तर प्रदेश के विकास कुमार और सार्थक मित्तलऐ, जिन्होंने बताया कि यदि जूते बदबूदार हों तो कैसे लोग उन्हें शू-रैक में रखने से कतराते हैं।
  • साहित्य (literature) में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय (Columbia University) के चिकित्सा इतिहासकार और इंटर्निस्ट प्रोफेसर विलियम बीन, जिन्होंने अपने नाखूनों के बढ़ने का दस्तावेज़ीकरण किया; (गौरतलब है कि प्रोफेसर बीन का 2020 में निधन हो गया था और यह पुरस्कार उनके बेटे ने लिया।
  • मनोविज्ञान (psychology) में पोलैंड के मार्सिन ज़ाजेनकोव्स्की और ऑस्ट्रेलिया के गाइल्स गिग्नैक, जिन्होंने दिखाया कि जो लोग आत्ममुग्ध (narcissistic) होते हैं उन्हें यदि कहा जाए कि वे बुद्धिमान (intelligent) हैं तो उनका आत्म-सम्मान बढ़ जाता है।
  • पोषण (nutrition) में नाइजीरिया, टोगो, इटली और फ्रांस के शोधकर्ता, जिन्होंने दिखाया कि इंद्रधनुषी छिपकलियां (rainbow lizards) कुछ प्रकार के पिज्ज़ा का स्वाद पसंद करती हैं।
  • बालरोग (pediatrics)  में अमेरिका की जूली मेनेला और गोरी बोचैम्प, जिन्होंने बताया कि स्तनपान (breastfeeding) कराने वाली माताएं यदि लहसुन खाती हैं तो उनके शिशु अधिक दूध पीते हैं।
  • रसायन विज्ञान (chemistry) में अमेरिका के रोटेम नफ्तालोविक, डैनियल नफ्तालोविक और फ्रैंक ग्रीनवे की टीम, जिन्होंने बताया कि खाने के साथ टेफ्लॉन (Teflon) (जिसका इस्तेमाल नॉन-स्टिक कलई चढ़ाने के लिए किया जाता है) का सेवन कैलोरी की मात्रा बढ़ाए बिना भरपेट भोजन और तृप्ति पूरी करने का एक अच्छा तरीका है।
  • शांति (peace) में नीदरलैंड, यूके और जर्मनी के शोधकर्ता, जिन्होंने यह दिखाया कि कैसे थोड़ी मात्रा में शराब पीने से विदेशी (नई) भाषा (foreign language) बोलने की क्षमता बेहतर हो सकती है।

प्रसंगवश, अब तक केवल एक वैज्ञानिक ऐसे हैं जिन्होंने इगनोबेल और नोबेल दोनों पुरस्कार जीते हैं। वे हैं मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (University of Manchester) के भौतिक विज्ञानी आंद्रे जेम। आंद्रे जेम और माइकल बेरी को वर्ष 2000 में, एक मेंढक को उसके आंतरिक चुंबकत्व का उपयोग करके एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में हवा में उड़ा देने के लिए भौतिकी श्रेणी में इगनोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2010 में, प्रो. जेम और कॉन्स्टेंटिन नोवोसेलोव (Konstantin Novoselov) को द्वि-आयामी पदार्थ ग्रैफीन से सम्बंधित अभूतपूर्व प्रयोगों के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। (स्रोत फीचर्स)

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एआई की मदद से टेलीपैथिक बातचीत

सोचिए, कैसा हो कि आप गूगल (Google) से बिना कुछ बोले मौसम की जानकारी ले सकें या फिर कोई रिमाइंडर सेट कर सकें। हाल ही में AlterEgo नामक एक नए पहनने योग्य डिवाइस (wearable device) ने कुछ ऐसा ही दावा किया है। इसमें आप मन में ‘बोलते’ हैं और एआई (AI) उसे समझ लेता है।

AlterEgo के निर्माता और प्रमुख अर्नव कपूर ने बताया कि इसे कान (ear) पर आराम से लगाया जा सकता है। यह एलन मस्क के Neuralink के समान मस्तिष्कीय संकेतों को नहीं पकड़ता बल्कि चेहरे और गले की मांसपेशियों (facial muscles) में बोलते समय (या बिना आवाज़ निकाले होंठ हिलाने पर) बनने वाले छोटे-छोटे विद्युत संकेतों को पकड़ता है। एआई इन संकेतों को शब्दों में बदल देता है और जवाब बोन कंडक्शन हेडफोन (bone conduction headphones) के ज़रिए पहनने वाले को सुनाई देता है।

कपूर के अनुसार यह आपको टेलीपैथी (telepathy) की ताकत देता है, लेकिन सिर्फ उन्हीं विचारों के लिए जिन्हें आप साझा करना चाहते हैं।

इस उपकरण की विशेष बात यह है कि इसे लगाने के लिए किसी ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं होती। यह बिल्कुल सुरक्षित है जो सिर्फ चेहरे और गले की नसों (nerves) से प्राप्त वाले संकेतों का इस्तेमाल करता है। इसी कारण इसे अपनाना बहुत आसान है।

यह सिस्टम 2018 में एमआईटी मीडिया लैब (MIT Media Lab) में एक भारी-भरकम प्रोटोटाइप (prototype) के रूप में शुरू हुआ था। क्योंकि उस समय एआई की स्पीच पहचान (speech recognition) तकनीक सीमित थी, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ साधारण कामों जैसे वेब सर्च करना या खाना ऑर्डर करने तक सीमित था। लेकिन अब एआई में हुई प्रगति से यह उपकरण एक आधुनिक और बाज़ार में उतरने लायक उत्पाद बन गया है।

सुविधा से परे, AlterEgo का असल फायदा स्वास्थ्य (healthcare) क्षेत्र में है। इसे ऐसे मरीज़ों पर आज़माया जा रहा है जिन्हें मोटर न्यूरॉन डिसीज़ (motor neuron disease) या मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियां हैं, जिनमें समय के साथ बोलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मरीज़ जो पूरी तरह से ‘लॉक-इन’ नहीं हैं लेकिन बोलने में संघर्ष करते हैं, उनके लिए यह उपकरण परिवार, डॉक्टर और देखभाल करने वाले के साथ संवाद का एक अहम साधन बन सकता है।

बहरहाल, विशेषज्ञ अभी सतर्क हैं। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी (Washington University) के इंजीनियर हावर्ड चिज़ेक का मानना है कि यह तकनीक बहुत स्मार्ट (smart technology) है और प्राइवेसी के लिए अमेज़न एलेक्सा (Amazon Alexa) जैसे उपकरणों से भी सुरक्षित है जो हमेशा सुनते रहते हैं। लेकिन एक मुख्य सवाल आम लोगों तक इसकी पहुंच का है क्योंकि इसका इस्तेमाल काफी हद तक चेहरे की मांसपेशियों पर उपयोगकर्ता के नियंत्रण (user control) पर निर्भर करता है। (स्रोत फीचर्स)

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कीट जीवाश्मों के झरोखे से प्राचीन जीवन में ताक-झांक

जीवाश्म (fossils) हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए अतीत में झांकने की खिड़की रहे हैं। ये अतीत में दुनिया कैसी थी, कौन-सी वनस्पतियां थीं, कौन-से जीव थे, विकास (evolution) किस तरह से हुआ वगैरह समझने का एक मौका देते हैं। अब, दक्षिण अमेरिका में मिले एम्बर भंडार और उनमें कैद कीटों ने 11.2 करोड़ वर्ष पूर्व के गोंडवाना महाद्वीप के पारिस्थितिक तंत्र की एक झलक दिखलाई है।

दरअसल, मध्य इक्वाडोर (Ecuador) में खनन के दौरान प्राचीन एम्बर का भंडार मिला है, और उनमें से कई एम्बर में कीट भी कैद मिले हैं। गौरतलब है कि पेड़ों से रिसती राल (रेज़िन) में छोटे-छोटे कीट, वनस्पति अवशेष आदि फंस जाते हैं और उनके अंदर सुरक्षित हो जाते हैं।

सम्भालकर निकाले गए 60 एम्बर (amber specimens) में से 21 में कई तरह के जीव कैद थे: मक्खियां, गुबरैला, चींटियां, ततैया, यहां तक कि मकड़ी के जाले का टुकड़ा भी।

एम्बर (amber) का रासायनिक विश्लेषण (chemical analysis) करने पर पता चला कि यह रेज़िन विशाल, नुकीले शंकुधारी वृक्षों, (जैसे मंकी पज़ल वृक्ष – Monkey Puzzle Tree) से रिसा था। चूंकि एम्बर में जो प्रजातियां कैद हैं उनके लार्वा पानी में फलते-फूलते हैं, इसलिए शोधकर्ताओं (researchers) को लगता है कि तब आसपास की जलवायु आर्द्र रही होगी। आसपास की चट्टानों में पाए गए बीजाणुओं (spores) और पराग के आधार पर लगता है कि दक्षिण अमेरिका के क्रेटेशियस वनों में उस समय ऊंचे शंकुधारी वृक्ष, फर्न का फैलाव और विविध तरह के कीट रहे होंगे। ये नतीजे कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट (Communications Earth & Environment) में प्रकाशित हुए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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दीमक भी खेती-किसानी करती हैं

हुत पहले, जब मनुष्य ने खेती (farming) करना सीखा भी नहीं था, तब कुछ दीमक प्रजातियां खेती (termite farming) में माहिर हो चुकी थीं। लगभग 5 करोड़ साल पहले दीमकों ने अपने भूमिगत बिलों में एक खास फफूंद (Termitomyces) उगाना शुरू किया था, जो उनका मुख्य भोजन बना। लेकिन खेती में इन्हें भी वही समस्या पेश आती थी – ‘खरपतवार’ यानी ऐसी फफूंद (weed fungus) पनपने की जो उनकी फसल को बर्बाद कर दे।

हालिया शोध (research) से पता चला है कि दीमक अपने खेतों को सुरक्षित रखने के लिए एक खास तरीका अपनाती हैं। जब उनकी फसल में खरपतवार फफूंद लग जाती है तो वे उतने हिस्से को ऐसी मिट्टी से ढंक देती हैं जिसमें प्राकृतिक फफूंदरोधी सूक्ष्मजीव (antifungal microbes) मौजूद होते हैं।

यह अध्ययन दीमक की प्रजाति Odontotermes obesus पर किया गया, जो दक्षिण एशिया में पाई जाती है। ये सूखी पत्तियों को चबा-चबाकर उनका कचूमर बिल के खास कक्षों में भर देती हैं। इन कक्षों का तापमान व नमी फफूंद (fungus growth) के पनपने के लिए एकदम सही रहती है। धीरे-धीरे पत्तियों के कचूमर (कॉम्ब) पर पनपती फफूंद को दीमक खा लेती हैं।

लेकिन जब कोई बाहरी हानिकारक फफूंद, जैसे Pseudoxylaria, हमला करती है तो दीमक तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। प्रयोगशाला (laboratory) अध्ययनों में देखा गया कि दीमक संक्रमित हिस्से को मिट्टी में दबा देती हैं, जबकि स्वस्थ हिस्सों को नहीं। यह भी पता चला कि साधारण कीटाणुविहीन (स्टरलाइज़्ड – sterilized) मिट्टी हानिकारक फफूंद को नहीं रोक पाती। लेकिन दीमक के टीलों से ली गई मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक फफूंदरोधी सूक्ष्मजीव हमलावर फफूंद को पूरी तरह रोक देते हैं।

शोधकर्ताओं को सबसे अधिक प्रभावित दीमकों के लचीले व्यवहार ने किया। जब संक्रमण सीमित होता है तो वे सिर्फ संक्रमित हिस्से को साफ कर हटाती हैं। लेकिन अगर संक्रमण ज़्यादा फैल जाता है तो पूरे ‘कॉम्ब’ को दफना देती हैं ताकि बाकी बस्ती सुरक्षित रहे। एक और प्रयोग में, जब स्वस्थ हिस्सा संक्रमित हिस्से से जोड़ा गया तो दीमकों ने बहुत सावधानी से बीमार हिस्से को काटकर मिट्टी में दबा दिया और स्वस्थ फसल (healthy crop) को बढ़ने दिया।

IISER मोहाली के जीवविज्ञानी ऋत्विक रायचौधरी और उनकी टीम के अनुसार यह छोटे-छोटे जीवों की निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है। कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के माइकल पॉल्सन का कहना है कि दीमकों की यह कुशलता उनके पारिस्थितिक महत्व (ecological importance) को दर्शाती है। अपनी भूमिगत खेती (underground farming) संभालकर दीमक न केवल खुद का भोजन तैयार करती हैं, बल्कि पौधों के अवशेषों को उपजाऊ मिट्टी में बदलकर प्राकृतिक संतुलन (natural balance) में भी मदद करती हैं। शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि दीमक खेती के तरीके कैसे तय करती हैं और सूक्ष्मजीवों (microbes) द्वारा हानिकारक फफूंद रोकने की क्रियाविधि क्या है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मिठास, मीठे की पसंद और उसे दबाने के प्रयास

डॉ. सुशील जोशी

भोजन का स्वाद (taste) इस बात को तय करने में अहम भूमिका निभाता है कि हम क्या खाएं और कितना खाएं। वैसे तो मीठे खाद्य पदार्थ (खासकर शकर) कैलोरी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। अत्यधिक शकर (sugar) के सेवन के स्वास्थ्य सम्बंधी प्रतिकूल प्रभाव भी होते हैं। शर्कराएं समस्त कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों में पाई जाती है – जैसे फल-सब्ज़ियां, अनाज, डेयरी उत्पाद वगैरह। इन सभी को प्राकृतिक शर्करा स्रोत कह सकते हैं और इनमें शकर के अलावा कई अन्य पोषक तत्व होते हैं। समस्या खाद्य पदार्थों में ऊपर से डाली गई शकर के सेवन से होती है।

अत्यधिक शकर के सेवन से हृदय रोग (heart disease) की संभावना बढ़ती है, शरीर इंसुलिन का प्रतिरोधी हो जाता है, जिसकी वज़ह से डायबिटीज़ (diabetes) का खतरा पैदा होता है, वज़न बढ़ता है और मोटापे की स्थिति बन जाती है जो स्वयं कई अन्य रोगों का कारण बनती है। लीवर में वसा का संग्रह होने लगता है जो फैटी लीवर रोग (fatty liver disease) को जन्म देता है। रक्तचाप भी बढ़ता है। और ये सारी स्थितियां परस्पर सम्बंधित हैं।

इस तरह के स्वास्थ्य जोखिमों (health risks) के चलते स्वास्थ्य विशेषज्ञ शकर का सेवन कम करने की सलाह देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिश है कि रोज़ाना के कुल कैलोरी उपभोग में 10 प्रतिशत से अधिक फ्री शुगर न हो जबकि आदर्श स्थिति में तो इसे 5 प्रतिशत से कम रखना ठीक होगा। इसका मतलब है कि यदि एक वयस्क की दैनिक ऊर्जा खपत 2000 कैलोरी है तो उसे रोज़ाना 50 ग्राम से ज़्यादा शकर नहीं खानी चाहिए। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (American Heart Association) का मत है कि दैनिक कैलोरी खपत में 6 प्रतिशत से अधिक ऊपर से डाली गई शकर न हो।

भारत में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के मुताबिक दैनिक भोजन में 25-30 ग्राम से अधिक शकर नहीं होनी चाहिए। इस अनुशंसित मात्रा में भोजन तथा पेय पदार्थों (beverages) में डाली गई शकर शामिल है।

भारत में शकर का सेवन पहले से ही बहुत अधिक रहा है और अब बढ़ता जा रहा है। 2014 में न्यूट्रिएंट्स नामक शोध पत्रिका (Nutrients journal) में प्रकाशित सीमा गुलाटी व अनूप मिश्रा के एक लेख में बताया गया है कि दरअसल, शकर का आविष्कार (invention of sugar) भारत में ही हुआ था। यहां हर अवसर पर मिठाई की उपस्थिति अनिवार्य सी ही है। मुंह मीठा कराना तो एक जानी-मानी रस्म है।

जहां स्वास्थ्य विशेषज्ञ (health experts) शकर के अत्यधिक सेवन को स्वास्थ्य के लिए एक जोखिम बताते हैं और इसे कम करने की सलाह देते हैं, वहीं इसके प्रति लगाव शकर के सेवन को थामने में एक बड़ी बाधा है।

ऐसा बताते हैं कि मीठे खाद्य पदार्थों (sweet food products) के प्रति आकर्षण स्तनधारियों में काफी पहले विकसित हो गया था। इस आकर्षण का मुख्य आधार यह है कि मीठा खाने के बाद व्यक्ति एक तृप्ति व आनंद का अनुभव करता है। इस तरह के आकर्षण के विकसित होने का कारण यह बताया जाता है कि मीठे पदार्थ अमूमन कैलोरी की उपलब्धता को दर्शाते हैं।

इस संवेदना और आकर्षण का नियमन दो तंत्रों द्वारा किया जाता है। एक का नाम है T1R आश्रित तंत्र और दूसरे को T1R से स्वतंत्र व्यवस्था कहते हैं। जहां T1R से स्वतंत्र मार्ग ग्लूकोज़ तथा अन्य मोनो-सेकेराइड के लिए विशिष्ट होता है वहीं T1R आश्रित मार्ग अधिकांश मीठे पदार्थों (sweet products) की उपस्थिति से सक्रिय हो जाता है। इस मार्ग के संचालक मुंह में उपस्थिति स्वाद कलिकाओं के अलावा आहारनाल के अस्तर में भी पाए जाते हैं। इन कलिकाओं से तंत्रिका संकेत मस्तिष्क तक पहुंचकर आनंद की अनुभूति पैदा करते हैं और खाने की इच्छा को भी नियंत्रित करते हैं। खास तौर से मीठे के प्रति आकर्षण और मस्तिष्क में पारितोषिक का एहसास इन्हीं तंत्रिका संकेतों का परिणाम होता है। इस तरह से मिठास भोजन के आकर्षण को बढ़ाती है और खाने की इच्छा को भी।

कई शोधकर्ताओं ने इन स्वाद-ग्राहियों को अपने अनुसंधान का लक्ष्य बनाया है ताकि मोटापे और खानपान से सम्बंधित समस्याओं से निपटने की नई रणनीति विकसित की जा सके।

यह देखा गया है कि भोजन के उपभोग की मात्रा से जुड़ा मोटापा (obesity) और खाने की लत, इन दोनों में ही शकर के प्रति पसंद में वृद्धि देखी जाती है। इसीलिए मीठे स्वाद के प्रति संवेदना में कमी और भोजन सम्बंधी व्यवहार के बीच सम्बंध को लेकर काफी शोध हो रहे हैं। अलबत्ता, इनसे प्राप्त नतीजों में काफी अंतर और मतभेद हैं।

उदाहरण के लिए, कुछ अध्ययनों में देखा गया है कि मिठास की घटी हुई अनुभूति के चलते जल्दी पेट भरने का एहसास हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कम खाएगा/खाएगी और वज़न में कमी आएगी।

इन अध्ययनों में मिठास की संवेदना को दबाने के लिए पेड़-पौधों के सत या उनसे प्राप्त रसायनों का उपयोग किया गया है। जैसे गुड़मार (Gymnema sylvestre) नामक पौधे का रस मीठे की संवेदना को दबा देता है। देखा गया है कि सामान्य संवेदना वाले लोगों की तुलना में गुड़मार (Gymnema sylvestre) के रस से दमित मीठा संवेदना वाले लोगों ने कुल कैलोरी (total calories) और मीठी कैलोरी का कम उपभोग किया। लेकिन कुछ अध्ययनों में परिणाम इसके विपरीत भी रहे। पता चला कि दमित मीठे स्वाद के बाद खुराक बढ़ गई और वज़न भी बढ़ा (weight gain)। शायद मीठे स्वाद से मिलने वाली तृप्ति न मिलने पर खाने की इच्छा और बढ़ गई हो। डायबिटीज़ व मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों पर हुए कुछ अध्ययनों में भी स्वाद परिवर्तन और वज़न में वृद्धि के ऐसे ही सम्बंध देखे गए हैं।

बात को और समझने के लिए रासायनिक संवेदना में गड़बड़ी सम्बंधी कुछ अध्ययन किए गए हैं। कुछ अध्ययनों में देखा गया कि जब मरीज़ शुरुआत में स्वाद-हीनता महसूस करते हैं तो वे आनंद और तृप्ति की वही अनुभूति हासिल करने के लिए नाना प्रकार के खाद्य पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि इस गड़बड़ी के शुरू होने के बाद कुछ समय तक उनका वज़न बढ़ता है। लेकिन एक बार समझ में आने पर वे उपभोग कम कर देते हैं और वज़न घटने लगता है। खास तौर से देखा गया कि स्वाद-हीनता यदि क्रमिक रूप से शुरू हो तो परिणाम वज़न में वृद्धि के रूप में सामने आता है जबकि एकाएक यही स्थिति प्रकट हो जाए, तो वज़न कम होना ज़्यादा लोगों में देखा जाता है।

ऐसा लगता है कि मीठे स्वाद के दमन का एक स्तर है। इस स्तर से अधिक दमन हो तो भोजन का उपभोग घटता है जबकि दमन इससे कम हो तो उपभोग बढ़ता है।

इस परिकल्पना की जांच कई अध्ययनों में की गई है। कुछ अध्ययनों में मीठे स्वाद की अनुभूति को अलग-अलग स्तर पर दबाया गया और भोजन सम्बंधी व्यवहार को देखा गया। मीठा-रोधी रसायनों का मीठे की अनुभूति पर असर तथा भोजन सम्बंधी व्यवहार को अलग-अलग जांचा गया।

ऐसे अध्ययनों की संख्या तो सैकड़ों में है। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में इनमें से 33 अध्ययनों का विश्लेषण प्रस्तुत हुआ है। इनमें सबसे ज़्यादा अध्ययनों (16) में गुड़मार के सत या उससे प्राप्त सक्रिय पदार्थों का उपयोग किया गया था। अन्य पादप रसायनों में बेर (Ziziphus jujuba), मुनक्का (Hovenia dulcis), स्टेफेनोटिस लुचुएंसिस, जिम्नेमा आल्टरनिफोलियम और स्टारेक्स जेपोनिका से मिले रसायनों का इस्तेमाल किया गया।

स्वाद की संवेदना (taste sensitivity) में आए अंतर को कैसे नापा जाए, यह खासा मुश्किल मसला है क्योंकि कोई मानक पैमाना तो है नहीं। उपरोक्त सारे अध्ययनों में विविध परीक्षणों का सहारा लिया गया था। सामान्यत: परिमाण का आधार स्वयं व्यक्ति द्वारा किया गया आकलन था। जैसे स्वाद की पहचान कर पाना, स्वाद पता चलने के लिए मीठे पदार्थ की न्यूनतम ज़रूरी मात्रा, या कई बार तो व्यक्ति द्वारा स्वाद की तीव्रता के आकलन को आधार बनाया गया। जांच के लिए कुछ अध्ययनों में स्वाद-दमन के बाद एक अकेले मीठे पदार्थ की जांच की गई जबकि कुछ अध्ययनों में मीठे मिश्रण (जैसे फलों के रस) पर असर देखा गया।

सभी मामलों में भोजन के उपरांत स्वाद-दमनकर्ता देने पर मीठे स्वाद का दमन देखा गया। गुड़मार के मामले में एक खास बात यह रिपोर्ट हुई है कि वह मीठे स्वाद को दबा देता है, जबकि खट्टे, नमकीन या कड़वे स्वाद का दमन नहीं करता। ज़िज़िफस जुजुबा और होवेनिया डल्सिस में भी यही देखा गया, हालांकि इनके मामले में कुछ मीठे पदार्थों की संवेदना पर कोई असर नहीं पड़ा।

लेकिन शोधकर्ताओं (researchers) के सामने एक सवाल तो यह था कि मीठे स्वाद के साथ जो आनंद की अनुभूति (pleasure) होती है, उस पर क्या असर होता है क्योंकि उसका सम्बंध भोजन के उपभोग की मात्रा से होता है।

तो, अध्ययनों से संकेत मिलता है कि गुड़मार व्यक्ति में मीठे उद्दीपन (sweet stimulus) के प्रति लगाव को कम करता है। एक प्लेसिबो (placebo) कंट्रोल्ड अध्ययन में देखा गया कि गुड़मार उपचार के बाद सहभागियों में पहला चॉकलेट खाने से मिलने वाली खुशी में 31 प्रतिशत की कमी आई। इसी प्रकार के परिणाम एक अन्य अध्ययन में भी मिले, जिसमें सहभागियों को जिम्नेमा युक्त गोली खाने को दी गई थी। इनमें दूसरा चॉकलेट खाते समय आनंद में कमी देखी गई।

ऐसे विभिन्न उपचारों का असर लगभग 15-30 सेकंड बाद दिखना शुरू होता है। और असर की अवधि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उपचार कितनी अवधि के लिए दिया गया। इस बात की भी जांच की गई कि स्वाद दमन से बहाली कितनी देर में हो जाती है यानी स्वाद उन व्यक्तियों के समान हो जाता है जिन्हें प्लेसिबो उपचार दिया गया था। एक तो यह पता चला है कि ज़िज़िफिन तथा होल्डुसिन के मुकाबले जिम्नेमिक एसिड का असर ज़्यादा देर तक बना रहता है। जिम्नेमिक एसिड उपचार के बाद स्वाद बहाली में 20 मिनट से लेकर घंटों तक लग जाते हैं। इसके विपरीत ज़िज़िफिन के मामले में 5-10 मिनट तथा होल्डुसिन के लिए बहाली अवधि 1-4 मिनट देखी गई है।

कुछ अध्ययनों में एक मज़ेदार बात देखी गई है। मिठास-दमन परीक्षण के बाद जब स्वाद बहाल हुआ तो मिठास की अनुभूति परीक्षण-पूर्व स्तर से भी ज़्यादा हो गई और आनंद की अनुभूति भी।

बहरहाल, ये सारे अध्ययन व्यक्तियों के अपने बयानों या मीठे की पसंद में परिवर्तन के उनके अपने अनुमानों पर आधारित थे। लेकिन कम से कम तीन अध्ययन ऐसे थे जिनमें मनुष्यों की स्वाद सम्बंधी प्रतिक्रियाओं का विद्युत-कार्यिकीय अध्ययन (electrophysiology) किया गया था। इनमें से दो में ऐसे मरीज़ों का अध्ययन किया गया जो कान की सर्जरी करवा रहे थे। इनमें स्वाद सम्बंधी गतिविधि के रिकॉर्ड कॉर्डा टिम्पेनी तंत्रिका के ज़रिए प्राप्त किए गए थे। कॉर्डा टिम्पेनी तंत्रिका चेहरे की तंत्रिका (कपाल तंत्रिका VII) की एक शाखा है। विशेष रूप से, यह जीभ के आगे के दो-तिहाई भाग से स्वाद की अनुभूति प्रदान करती है। तीसरे अध्ययन में स्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन एमआरआई तकनीक से किया गया था।

दोनों विद्युत-कार्यिकीय अध्ययनों में देखा गया कि गुड़मार सत जीभ पर लगाने के 1-2 मिनट के अंदर कॉर्डा टिम्पेनिक तंत्रिका की स्वीटनर्स के प्रति संवेदना पूरी तरह बाधित हो गई थी हालांकि अन्य स्वाद रसायनों के साथ ऐसा नहीं हुआ था। दूसरी ओर, एमआरआई अध्ययन में देखा गया कि जिम्नेमिक एसिड युक्त गोली चूसने के बाद न सिर्फ उच्च-शर्करा युक्त खाद्य पदार्थों ने मस्तिष्क में आनंद वाले क्षेत्र को मंद कर दिया बल्कि ऐसे खाद्य पदार्थों से अपेक्षित आनंद के एहसास को भी घटा दिया।

भोजन उपभोग पर असर

खुराक, ज़्यादा खाने की इच्छा या भोजन के अधिक संभावित उपभोग का भी मापन किया गया था। आप देख ही सकते हैं कि ऐसी चीज़ों का मापन कठिन होगा। शोधकर्ताओं ने इसके लिए व्यक्ति के एहसासों या प्रतिक्रियाओं को एक पैमाने पर रखा। जैसे यह देखा गया कि उपचार के बाद कितने सहभागी पहली टॉफी खाने का निर्णय लेते हैं। कुछ शोध पत्रों में कुल भोजन की खपत या अनुमानित खपत के आंकड़े भी शामिल किए गए थे।

खाने की इच्छा को लेकर परिणामों में काफी विविधता रही। जैसे दो शोध पत्रों में बताया गया था कि सहभागियों में मीठे पदार्थ खाने की इच्छा में कमी आई थी, जबकि एक अन्य शोध पत्र में देखा गया कि मीठा खाने से मिलने वाले आनंद में गिरावट के बावजूद खाने की इच्छा में कोई कमी नहीं आई थी। एक अध्ययन में तो यह भी देखा गया कि मीठा-दमन के तुरंत बाद मीठा खाने की इच्छा में काफी वृद्धि हुई और तृप्ति में कमी देखी गई।

चार अध्ययनों में देखा गया कि जिन लोगों को गुड़मार स्वाद-मारक दिया गया था, उन्होंने सामान्य संवेदना वाले लोगों की तुलना में लघु-अवधि (यानी परीक्षण सत्र के दौरान) में कुल कम कैलोरी और कम मीठी कैलोरी खाई। खपत में 5 से 52 प्रतिशत तक की कमी दिखी। लेकिन इस मामले में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच काफी अंतर देखे गए थे। एक अध्ययन में तो बताया गया है कि अपेक्षा के विपरीत कई लोगों ने उपचार-उपरांत उच्च शर्करा वाले पदार्थ ज़्यादा खाए। इसकी व्याख्या के लिए कुछ अपुष्ट परिकल्पनाएं प्रस्तुत हुई है। एक का सम्बंध ‘जिज्ञासा’ (curiosity) से बताया गया है – चूंकि सहभागी शकर के स्वाद के दमन प्रभाव से अनभिज्ञ थे, इसलिए वे इसे कई बार महसूस करना चाहते थे। दूसरी परिकल्पना के अनुसार स्वाद-ग्राही पुन: सक्रिय स्थिति में लौट आता है और ज़्यादा आनंददायक एहसास प्रदान करने लगता है।

लेकिन ये सारे अध्ययन तो इसलिए शुरू किए गए थे कि मीठा स्वाद दबाकर उपभोग पर नियंत्रण किया जा सकेगा। लेकिन जिन 33 शोध पत्रों को समीक्षा में शामिल किया गया था, उनमें से मात्र तीन में इन दोनों बातों (मीठा-स्वाद-दमन और खानपान व्यवहार में परिवर्तन) के आंकड़े साथ-साथ प्रस्तुत किए गए हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि सहभागियों में पहले परीक्षण में 20 पॉइंट के पैमाने पर मिठास का एहसास 6±1 कम हुआ। इसके अलावा जिस समूह ने जिम्नेमिक एसिड का सेवन किया था उन्होंने औसतन 501±237 कैलोरी का उपभोग किया जबकि प्लेसिबो समूह (जिन्हें चाय का कुल्ला करवाया गया था) के मामले में यह आंकड़ा औसतन 638±333 कैलोरी रहा। यानी लगभग 20 प्रतिशत की कमी आई।

एक अन्य अध्ययन में प्लेसिबो समूह के 74 प्रतिशत सहभागियों ने दूसरी टॉफी खाई जबकि जिम्नेमिक एसिड उपचारित लोगों में से मात्र 51 प्रतिशत ने ही दूसरी टॉफी खाई। यानी 23 प्रतिशत कम और इतनी ही गिरावट आनंद के एहसास में देखी गई।

विभिन्न प्रकाशित अध्ययनों के विश्लेषण से इतना तो पता चलता है कि 7 पौधों (Gymnema sylvestre, Hovenia dulcis, Ziziphus jujuba, Gymnema alternifolium, Stephanotis lutchuensis और Styrax japonica) तथा उनके कुछ अवयवों के असर से मीठे स्वाद की अनुभूति में परिवर्तन होता है। खास तौर पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जिम्नेमा सिलवेस्टर के सत ने मीठे की मनोशारीरिक व आनंद की अनुभूति को कम किया और तंत्रिका संवेदना तथा मीठे पदार्थों के सेवन को भी कम किया। यह भी दिखता है कि इस उपचार का असर अन्य स्वादों पर नहीं होता। लेकिन इन मीठा-रोधी रसायनों के प्रेरणात्मक कारकों (खाने की इच्छा समेत) पर असर का निश्चित प्रमाण नहीं मिला है।

वैसे, गौरतलब बात यह है कि कई अन्य कारक भी हैं जो मीठे स्वाद ग्राही के कामकाज को कम कर सकते हैं। इनमें जेनेटिक्स, पोषण (जैसे ज़िंक की कमी), जीव-वैज्ञानिक (जैसे उम्र), बाह्य कारक (जैसे धूम्रपान, शराब का सेवन) और कोविड-19 जैसी वायरल बीमारियां शामिल हैं। इन परिस्थितियों में प्राय: भोजन उपभोग कम हो जाता है और खानपान की आदतों में बदलाव भी होते हैं। लेकिन इन परिस्थितियों में यह पक्का नहीं है कि मीठे स्वाद के दमन की वजह से भोजन उपभोग पर असर होता है। उदाहरण के लिए T1R2-T1R3 स्वाद ग्राही संकुल के जीन में एक न्यूक्लियोटाइड के परिवर्तन से मीठे स्वाद पर ऐसा ही असर होता है। इसके द्वारा शकर के स्वाद और शकर के उपभोग पर असर होता है।

चिकित्सकीय उपयोग

इस समीक्षा पर्चे से एक बात तो स्पष्ट है – मोटापे या खानपान की गड़बड़ियों वाले व्यक्तियों के लिए मीठे स्वाद के दमन की तकनीक को लागू करने को लेकर कई अगर-मगर हैं।

पहला तो यह अस्पष्ट है कि क्या मीठे स्वाद को दमनकारी पदार्थों से दबाकर गैर-मीठे (हालांकि उच्च वसा वाले) भोजन का उपभोग बढ़ता है। खास तौर पर जब दोनों तरह के भोजन एक साथ परोसे जाएं।

दूसरा, यह तो देखा गया है कि मीठा-शामक पदार्थों का अन्य स्वादों (खट्टे, कड़वे और नमकीन) पर कोई असर नहीं होता लेकिन क्या इनका असर उमामी स्वाद (जैसे अजीनो मोटो यानी मोनो सोडियम ग्लूटामेट) पर भी नहीं होता क्योंकि वह भी मीठे ग्राही की उप-इकाई (T1R3) के ज़रिए ही पहचाना जाता है।

तीसरा, हो सकता है कि मीठा-शामक मीठा खाने की इच्छा और उत्साह को थाम सकता है लेकिन यह भी देखा गया है कि इसका एक पलटवार भी होता है जिसमें आनंददायक अनुभूति के तीव्र दमन की वजह से मीठा खाने की इच्छा और बलवती हो सकती है क्योंकि शायद व्यक्ति मीठे स्वाद की तलाश में हो और उसे वह स्वाद न मिल रहा हो।

चौथा, ऐसा लगता है कि जिन लोगों को खुद को मीठा खाने से रोकने में दिक्कत होती है, उनके मामले में शायद यह तरीका काम कर सकता है। लेकिन एक अध्ययन में पता चला कि मीठे के प्रति आसक्ति और व्यक्ति के वर्तमान वज़न के बीच कोई सम्बंध नहीं है।

कहना न होगा कि इन विभिन्न स्वाद-रोधियों के साइड प्रभावों का विस्तृत अध्ययन ज़रूरी है, क्योकि इनका सेवन लंबे समय तक होता है। जैसे, डायबिटीज़ के मरीज़ों के उपचार के लिए जिम्नेमा सिल्वेस्टर के उपयोग का सम्बंध हेपेटाइटिस, लीवर क्षति से देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

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कैसे एक छोटा सा जीव दुनिया पर छा गया

ब हम खतरनाक जीवों की बात करते हैं तो आम तौर पर शेर, सांप या शार्क का नाम आता है। लेकिन असली खतरा तो एक छोटे-से मच्छर (mosquito) से है – एडीज़ एजिप्टी (Aedes aegypti)। इसे येलो फीवर मच्छर (yellow fever mosquito) भी कहते हैं। यह बेहद छोटा कीट डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका और पीत ज्वर जैसी 50 से अधिक बीमारियां फैला सकता है। आज भी लगभग चार अरब लोगों पर इन बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है।

शुरुआत में यह मच्छर अफ्रीकी जंगलों में पाया जाता था। वहां यह प्राकृतिक जलस्रोतों (water sources) में प्रजनन और अलग-अलग जीवों पर रक्तभोज करता था। लेकिन जैसे ही यह अफ्रीका से बाहर फैला, इसकी आदतें बदल गईं। अब यह शहरों और गांवों में पुराने टायर, प्लास्टिक की बाल्टियों और घरों के पास जमा पानी में पनपने लगा और सबसे खतरनाक बदलाव यह हुआ कि इसने लगभग पूरी तरह इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया। यही वजह है कि यह आज घातक बीमारियों का सबसे बड़ा वाहक (vector) बन गया है। वैज्ञानिक इस प्रजाति को दो किस्मों में बांटते हैं: Aedes aegypti formosus – अफ्रीकी जंगलों में पाया जाने वाला मच्छर, जो अलग-अलग जीवों का खून पीता है। Aedes aegypti aegypti – शहरों में पनपने वाला मच्छर, जो लगभग केवल इंसानों को काटता है। भले ही इन दोनों की आदतों और जीन्स में अंतर हैं, लेकिन ये आपस में प्रजनन कर सकते हैं।

गौरतलब है कि 5000 वर्ष पूर्व जब सहारा मरुस्थल फैलने लगा और पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे तो इंसानों ने बर्तनों और कंटेनरों (containers) में पानी जमा करना शुरू किया। ऐसे में कुछ मच्छर इन कृत्रिम जलस्रोतों में पनपने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने इंसानों का खून पीना पसंद किया।

सदियों बाद, गुलामों को अफ्रीका से अमेरिका भेजे जाने वाले जहाज़ों (slave ships) पर चुपके से लदकर ये मच्छर अमेरिका पहुंच गए। यहीं से उनके वैश्विक फैलाव की शुरुआत हुई। लेकिन वैज्ञानिक लंबे समय तक यह नहीं समझ पाए कि ये मच्छर इंसानों के लिए पहले से अनुकूलित थे या फिर अमेरिका पहुंचने के बाद उनमें नए गुण विकसित हुए।

इस रहस्य को समझने के लिए 9 देशों के वैज्ञानिकों ने विश्व के 73 स्थानों से 1206 मच्छरों के जीनोम का अध्ययन (genome study) किया। साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में एडीज़ एजिप्टी मच्छर के फैलाव और उसमें आए परिवर्तनों पर चर्चा की गई है।

अध्ययन से प्राप्त नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। अर्जेंटीना में मिले मच्छरों का जीनोम सेनेगल और अंगोला के मच्छरों के जीनोम से मेल खाता पाया गया। यानी, केवल अटलांटिक सफर ने ही उन्हें नहीं बदला, बल्कि अमेरिका की कठिन परिस्थितियों ने भी उनमें नए बदलाव (genetic changes) पैदा किए। अफ्रीका में उन्हें कई स्थानीय प्रजातियों से मुकाबला करना पड़ता था, लेकिन अमेरिका में उनके लिए जीवित रहने का एकमात्र तरीका इंसानों के पास रहना और उन्हीं पर निर्भर होना था। धीरे-धीरे ये मच्छर लगभग पूरी तरह इंसानों पर निर्भर हो गए।

मच्छरों का यह बदलाव सुनने में मामूली लग सकता है, लेकिन यह एक बड़ी क्रांति थी। सोचिए, एक कीट जो कभी जंगलों में रहता था, अब शहरों की भीड़-भाड़ में पुराने टायरों या प्लास्टिक की बाल्टियों (plastic containers) में पनप रहा है। कुछ छोटे जेनेटिक बदलावों (genetic evolution) ने इनके जीवन और व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। इंसानों के साथ यह नज़दीकी, तेज़ी से बढ़ते शहरों (urbanization) और वैश्विक व्यापार (global trade) ने एडीज़ एजिप्टी मच्छरों को फैलने का मौका दिया।

अध्ययन में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया: अमेरिका में कीटनाशकों (insecticides) के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता वाले मच्छर वैश्विक व्यापार के ज़रिए अब वापस अफ्रीका पहुंच गए हैं। और वहां डेंगू व अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ा रहे हैं।

देखा जाए तो एडीज़ एजिप्टी की कहानी सिर्फ मच्छर (mosquito species) की कहानी नहीं है। इससे यह सपष्ट होता है कि पर्यावरण, इंसानी आदतों और वैश्विक आवाजाही (human mobility) में छोटे बदलाव कैसे प्रकृति को बदल सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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क्या कृत्रिम बुद्धि बता सकती है आपकी सेहत का भविष्य?

म तौर पर किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिमों (health risks) का अनुमान उसके स्वास्थ्य-सम्बंधी अतीत, वर्तमान जीवनशैली (lifestyle) वगैरह के आधार पर लगाया जाता है। अब वैज्ञानिकों ने Delphi-2M नाम का एक नया एआई टूल तैयार किया है जो इस काम को ज़्यादा विश्वसनीयता और सटीकता अंजाम दे सकता है। यह टूल कैंसर, त्वचा रोग और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी गड़बड़ियों जैसी हज़ार से ज़्यादा बीमारियों का खतरा भांप सकता है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह खोज स्वास्थ्य सेवाओं (healthcare system) में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। अभी तक मौजूद एआई टूल्स (AI tools) केवल किसी एक बीमारी की संभावना बताते हैं, जैसे दिल की बीमारी या कैंसर। पूरी तस्वीर पाने के लिए डॉक्टरों को कई मॉडल इस्तेमाल करने पड़ते हैं। लेकिन Delphi-2M एक ही जगह पर सभी बीमारियों की पूरी जानकारी दे देता है।

यह टूल वैज्ञानिकों ने चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे चैटबॉट्स को चलाने वाले एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल में परिवर्तन कर बनाया है। जहां लार्ज लैंग्वेज मॉडल वाक्य में अगले शब्द का अनुमान लगाता है, वहीं Delphi-2M इंसान के स्वास्थ्य पर आने वाला खतरों (disease prediction) का अनुमान लगाता है। इसमें उम्र, लिंग, बॉडी मॉस इंडेक्स, धूम्रपान व शराब की आदतें, मेडिकल इतिहास और जीवनशैली जैसी जानकारियां डाली जाती हैं।

इस टूल को यूके बायोबैंक (UK Biobank) के चार लाख लोगों के स्वास्थ्य डैटा से प्रशिक्षित किया गया है। इसके परीक्षण में पाया गया कि Delphi-2M के अनुमान एकल बीमारी वाले मौजूदा मॉडलों जितने ही सटीक हैं, बल्कि कई बार उनसे बेहतर भी निकले। यहां तक कि यह एक अन्य उन्नत एआई टूल से भी आगे निकल गया, जो खून में उपस्थित जैविक संकेतकों से बीमारियां पहचानता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ कई बीमारियों का अनुमान लगाने की क्षमता इसे काफी अनोखा बनाती है। यदि यह ब्रिटेन के बाहर अलग-अलग आबादी (global population) में भी सफल होता है तो यह डॉक्टरों को ज़्यादा खतरे में रहने वाले मरीज़ों को पहले ही पहचानने में मदद करेगा। इससे समय पर बचाव, जीवनशैली में सुधार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य योजनाएं (health plans) बनाना आसान हो जाएगा जो लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों से बचा सकती हैं। लेकिन एक स्वाभाविक सा सवाल उठता है। भारत जैसे देश में, जहां बीमारी हो जाने के बाद भी इलाज (treatment access) नहीं मिलता, वहां 10 साल बाद की भविष्यवाणी व्यक्ति को चिंता के अलावा और क्या दे पाएगी? (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्थानीय जैव-विविधता से धान का सर्वोत्तम विकास

भारत डोगरा

धान (rice crop) विश्व की सबसे महत्वपूर्ण फसल है। अत: बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह भरपूर प्रयास कर रही हैं कि उनके नियंत्रण वाली जीएम (GM crops) व जीन परिवर्तित फसलें चावल में भी चल निकलें। दूसरी ओर, किसानों के हित में यह है कि यहां की देशी विविधता भरी धान की किस्मों को खेतों में उगाया जाए। यह भारत के संदर्भ में तो और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में धान की जैव-विविधता (rice biodiversity) का विशाल भंडार है। इन्हें हमारे पूर्वज किसानों ने एकत्र किया परंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनसे मुनाफा कमाना चाहती हैं।

भारत के विख्यात धान वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया 1960-70 के दशक में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान (Central Rice Research Institute) कटक के निदेशक रहे। यहां उन्होंने देशी विविधता भरी किस्मों पर आधारित महान धान विकास कार्यक्रम तैयार किया था। लेकिन इससे पहले कि वे इसे कार्यान्वित कर पाते विदेशी किस्मों को बाहर से लाद दिया गया व डॉ. रिछारिया को अपना पद छोड़ना पड़ा। फिर भी उनके अति विशिष्ट योगदानों को देखते हुए सरकार ने बार-बार उनका परामर्श लेने की ज़रूरत समझी।

1960-70 के दशक के मध्य में विदेशी सहायता संस्थाओं और अनुसंधान केंद्रों के दबाव में भारतीय सरकार ने चावल की बौनी व रासायनिक खाद का अधिक उपयोग करने वाली किस्मों के प्रसार का निर्णय लिया। इन्हें चावल की ‘अधिक उत्पादक किस्में’ (हाई यील्डिंग वेरायटी – एच.वाय.वी.) (high yielding varieties – HYV) कहा गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इतनी ही या इससे अधिक उत्पादकता देने वाली देशी किस्मों को अधिक उत्पादक किस्मों की सरकारी सूची में सम्मिलित नहीं किया गया, और विदेशी किस्मों को अधिक उत्पादकता का एकमात्र स्रोत मान लिया गया। इन्हें देश के अनेक भागों मे ‘हरित क्रांति किस्में’ (Green Revolution rice) कहा जाता है। Text Box: धान उत्पादकता की औसत वार्षिक वृद्धि दर प्रति हैक्टर
हरित क्रांति से पूर्व	हरित क्रांति के बाद	
(1951-52 से 1967-68) 	(1968-69 से 1980-81)
	3.2 प्रतिशत	2.7 प्रतिशत
(स्रोत - 12वीं पंचवर्षीय योजना)

नीचे प्रस्तुत तालिका से स्पष्ट है कि अपेक्षाकृत कम रासायनिक खाद व अन्य खर्च के बावजूद धान उत्पादकता (paddy yield) में वृद्धि दर हरित क्रांति या विदेशी किस्मों के प्रसार से पहले अधिक थी।

विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों की इस विफलता के क्या कारण हैं? फरवरी 1979 में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक में डॉ. रिछारिया की अध्यक्षता में हुई धान प्रजनन के ख्यात विशेषज्ञों की बैठक में इस विफलता के कुछ कारण बताए गए थे – विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों का भारत के अधिकतर धान उत्पादन क्षेत्र के लिए अनुकूल न होना व बीमारियों व कीड़ों आदि के प्रति अधिक संवेदनशील होना। कहा गया कि

“अधिकतर एच.वाय.वी. टी.एन.(1) या आई.आर.(8) से व्युत्पादित है व इस कारण उनमें बौना करने का डी.जी.ओ.वू. जेन का जीन है। इस संकीर्ण आनुवंशिक आधार से भयप्रद एकरूपता उत्पन्न हो गई है, इसी कारण विनाशक जंतुओं (कीट आदि) व बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ी है। प्रसारित की गई अधिकतर किस्में प्रारूपी उच्च भूमि व निम्न भूमि (टिपिकल अपलैंड्स एंड लोलैंड्स), जो देश में कुल चावल क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा है, के लिए अनुकूल नहीं है। इन स्थितियों में सफलता के लिए हमें अपने अनुसंधान कार्यक्रमों व रणनीतियों को पुन:उन्मुख करने की आवश्यकता है।” एक अन्य स्थान पर इसी टास्क फोर्स (task force) ने कहा है, “भारत में जारी की गई विभिन्न धान की किस्मों की वंशावली को सरसरी निगाह से देखने से ही स्पष्ट हो जाता है कि जनन द्रव्य का आधार बहुत संकीर्ण है।”

नई किस्मों की विनाशक जंतुओं (पेस्ट) के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता के विषय में टास्क फोर्स ने कहा है, “एच.वाय.वी. के आगमन से गालमिज, भूरे फुदके (ब्राऊन प्लांटहॉपर), पत्ती मोड़ने वाले कीड़े (लीफ फोल्डर) वोर्ल मैगट जैसे विनाशक कीटों की स्थिति में उल्लेखनीय तब्दीली आई है। चूंकि अब तक जारी की गई अधिकतर एच.वा.वी. मुख्य विनाशक जंतुओं के प्रति संवेदनशील है, 30 से 100 प्रतिशत तक फसल की हानि होने की संभावना रहती है। उत्पादकता को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अंतर्निहित प्रतिरोध (बिल्ट इन रज़िस्टेंस) (built in resistance) वाली किस्मों का विकास अति आवश्यक हो गया है।” किंतु प्रतिरोधक किस्मों के विकास का पिछला रिकार्ड तो कतई उत्साहवर्द्धक नहीं रहा है, जैसा कि टास्क फोर्स ने स्वीकार किया, “कीट प्रतिरोधक प्रजनन कार्यक्रम के परिणाम अभी तक उत्साहपूर्वक नहीं रहे हैं। हालांकि विनाशक जंतुओं की प्रतिरोधी कुछ किस्में जारी की गई हैं लेकिन रत्न के अलावा इनमें से किसी का भी अच्छा प्रसार नहीं हुआ है। रत्न का भी अच्छा प्रसार वेधकों के प्रति इसकी सहनशील प्रकृति के कारण नहीं अपितु इसके अच्छे दाने, तैयार होने की कम अवधि व व्यापक अनुकूलनशीलता के कारण हुआ है।”

“गालमिज के लिए हालांकि बहुत सारे प्रतिरोधक दाता मिले हैं, पर अभी तक देश में जारी की गई अधिकतर प्रतिरोधक किस्में या तो कम उत्पादक हैं अथवा विभिन्न स्थानों पर उगाये जाने पर, प्रतिरोध में एकरूपता नहीं दिखाती हैं। यहां भी ऊंची उत्पादकता (high yeild) व अधिक स्थायी प्रतिरोध के मिलन को प्राप्त नहीं किया जा सका है।”

टास्क फोर्स के इन उद्धरणों में हम इतना ही जोड़ना चाहेंगे कि एच.वाय.वी. की ये समस्यायें अभी तक बनी हुई हैं। इसके साथ यह भी जोड़ देना उचित है कि कम साधनों वाले छोटे किसानों के लिए ये किस्में विशेष रूप से समस्याप्रद है। इन किस्मों के आगमन के बाद धान उत्पादन का अधिक बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत समृद्ध क्षेत्रों व अपेक्षाकृत समृद्ध किसानों के खेतों से प्राप्त होने लगा है, क्षेत्रीय व व्यक्तिगत विषमताएं बढ़ी है।

जब धान के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति (green revolution in india) की विफलता सामने आने लगी और रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिद्ध होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित इस महान कृषि वैज्ञानिक की याद आई। तब वर्ष 1983 में श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने उन्हें धान उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने ऐसी कार्य योजना तैयार की, पर श्रीमती इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद यह दस्तावेज भी उपेक्षित रह गया।

डॉ. रिछारिया की कार्य योजना के शब्दों में, “मुख्य समस्या अनचाही नई चावल किस्मों को जल्दबाज़ी में जारी करना है। हमने देसी ऊंची उत्पादकता की किस्मों को नकार कर बौनी (विदेशी) एच.वाय.वी. किस्मों के आधार पर अपनी रणनीति निर्धारित की। हम सूखे की स्थिति को भी भूल गए, जब इन विदेशी एच.वाय.वी. में उत्पादकता गिरती है। अधिक सिंचाई व पानी में उगाई जाने पर ये किस्में बीमारियों व नाशक जीवों के प्रति संवेदनशील रहती हैं, जिनका नियंत्रण आसान नहीं है व इस कारण भी उत्पादकता घटती है।” निष्कर्ष में डॉ. रिछारिया कहते हैं, कि जब नींव ही कमज़ोर है (विदेशी जनन द्रव्य) तो इस पर बना भवन ढहेगा ही।

योजना में एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है, “धान में विफलता का सबसे महत्वपूर्ण व नज़दीकी कारण किसी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक तौर पर धान की किस्मों का बार-बार (या जल्दी-जल्दी) बदलना है। यह इस कारण है क्योंकि पर्यावरण में पहले के जनन द्रव्य के संदर्भ में जो कृषि पारिस्थितकी संतुलन शताब्दियों तक अनुभवजन्य प्रजनन व चयन की प्राकृतिक प्रक्रिया में बन गया था, वह अस्त-व्यस्त हो जाता है।”

सौभाग्यवश, देसी (indigenous varieties) अधिक उत्पादकता की किस्में, जो स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हैं, देश में उपलब्ध हैं। 1971-74 के दौरान मध्य प्रदेश में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि देसी किस्मों में से 8 प्रतिशत अधिक उत्पादकता की किस्में हैं अथवा उनकी उत्पादकता 3705 किलोग्राम धान प्रति हैक्टर से अधिक है।

इसे ध्यान में रखते हुए एच.वाय.वी. को पुन: परिभाषित करना आवश्यक है, क्योंकि अब तक सरकारी स्तर पर उनकी पहचान विदेशी, बौनी, अधिक रासायनिक खाद की खपत करने वाली किस्मों के संदर्भ में ही की गई है।

अनुसंधान व प्रसार दोनों क्षेत्रों में डॉ. रिछारिया अधिकाधिक विकेंद्रीकरण (decentralized research) को महत्व देते हैं। यह धान के पौधों की अपनी विशिष्टताओं के कारण भी अनिवार्य है। उनके शब्दों में, “करोड़ों को भोजन देने वाले चावल के पौधों की यदि सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बतानी हो तो यह इसकी (भारत व अन्य चावल उत्पादक क्षेत्रों में फैली) हज़ारों किस्मों में ज़ाहिर विविधता है।” अत: उन्होंने धान उगाने वाले पूरे क्षेत्र में ‘अनुकूलन धान केंद्रों’ का एक जाल-सा बिछा देने का सुझाव दिया। “अनुकूलन धान केंद्र अपने क्षेत्र से एकत्र सभी स्थानीय धान की किस्मों के अभिरक्षक होंगे। भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उन्हें अपने प्राकृतिक माहौल में ही जीवित रखा जाएगा।” इन केंद्रों के कार्य ये होंगे : ()   चावल के विकसित जेनेटिक संसाधनों को भविष्य के अध्ययनों के लिए उपलब्ध कराना – इसे इसके मूल रूप में भारत या बाहर के किसी केंद्रीय स्थान पर सुरक्षित रखना तो लगभग असंभव है। इसे इसके मूल रूप में तो किसानों के सहयोग से इसके प्राकृतिक माहौल में ही सुरक्षित रखा जा सकता है।

() युवा किसानों को अपनी आनुवंशिक सम्पदा के मूल्य व महत्व के विषय में शिक्षित/जागरूक करना व उनमें किस्मों का पता लगाने, एकत्र करने के प्रति रुचि जागृत करना।

अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर डॉ. रिछारिया बताते हैं कि धान क्षेत्रों में मुझे ऐसे किसान मिलते ही रहे हैं जो धान की अपनी स्थानीय किस्मों में गहन रुचि लेते हैं व अलग-अलग किस्मों की उपयोगिता, यहां तक कि उसका इतिहास बता सकते है। इन केंद्रों की ज़िम्मेदारी ऐसे चुने हुए, प्रतिबद्ध किसानों को सौंपी जाएगी। हज़ारों किस्मों की पहचान करने, उन्हें सुरक्षित रखने की उनकी जन्मजात प्रतिभा का लाभ वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाना चाहिए।

ऊपर बताए गए रास्ते को अपनाने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि डॉ. रिछारिया ने यह चेतावनी भी दी थी कि जिस तरह विदेशी बौनी किस्मों (foreign rice hybrids) को फैलाने व स्थानीय किस्मों को गायब करने के प्रयास चल रहे है उसके चलते शायद हमारी यह विरासत भी भविष्य में हमें उपलब्ध न रहे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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