गेइया परिकल्पना के प्रवर्तक जेम्स लवलॉक का निधन – ज़ुबैर सिद्दिकी

त 26 जुलाई को जेम्स लवलॉक का 103 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक स्वतंत्र वैज्ञानिक और पर्यावरणविद के रूप में लवलॉक ने मानव जाति के वैश्विक प्रभाव पर हमारी समझ और धरती से अन्यत्र जीवन की खोज को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। लेखन और भाषण में उत्कृष्ट क्षमताओं के चलते वे हरित आंदोलन के नायकों में से रहे जबकि वे इसके कट्टर आलोचक भी थे। वे आजीवन नए-नए विचार प्रस्तुत करते रहे। उन्हें मुख्यत: विवादास्पद गेइया परिकल्पना के लिए जाना जाता है।    

लवलॉक ने 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं पर अध्ययन किए। इन अध्ययनों में मुख्य रूप से औद्योगिक प्रदूषकों का जीवजगत में प्रसार, ओज़ोन परत का ह्रास, और वैश्विक तापमान वृद्धि से होने वाले संभावित खतरे शामिल हैं। उन्होंने परमाणु उर्जा और रासायनिक उद्योगों की पैरवी भी की। उनकी चेतावनियां अक्सर विनाश का नज़ारा दिखाती थीं। बढ़ते वैश्विक तापमान पर चिंता जताते हुए लवलॉक ने कहा था कि हम काफी तेज़ी से 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व की गर्म अवस्था में पहुंच सकते हैं और यदि ऐसा हुआ तो हम और हमारे अधिकांश वंशज मारे जाएंगे।

26 जुलाई, 1919 को हर्टफोर्डशायर में जन्मे लवलॉक की परवरिश ब्रिक्सटन (दक्षिण लंदन) में हुई। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान एक सार्वजनिक पुस्तकालय ने उनमें विज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा किया और उन्हें इतना प्रभावित किया कि स्कूल में पढ़ाए जाने वाले विज्ञान के पाठ उन्हें नीरस लगने लगे। पुस्तकालय में उन्होंने खगोल विज्ञान, प्राकृतिक इतिहास, जीव विज्ञान, भौतिकी और रसायन विज्ञान की जानकारियां हासिल कीं। लवलॉक ने अपने इस ज्ञान को व्यावहारिक रूप भी दिया। उन्होंने अपने स्कूल के दिनों में एक पवन-गति सूचक तैयार किया था जिसका इस्तेमाल वे ट्रेन यात्रा के दौरान किया करते थे।

कमज़ोर आर्थिक स्थिति के चलते पढ़ाई के लिए वे एक कंपनी में तकनीशियन का काम करते थे और शाम को बी.एससी. की पढ़ाई के लिए कक्षाओं में जाते थे। 1940 में उन्होंने मिल हिल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल रिसर्च (एनआईएमआर) में काम करना शुरू किया और 20 अगले वर्ष तक यहीं काम करते रहे।           

एनआईएमआर में काम करते हुए उन्होंने बायोमेडिकल साइंस में पीएच.डी. हासिल की और इलेक्ट्रॉन कैप्चर डिटेक्टर का आविष्कार किया। यह एक माचिस की डिबिया के आकार का उपकरण था जो विषैले रसायनों का पता लगाने और उनका मापन करने में सक्षम था।

लवलॉक के कार्य में एक बड़ा परिवर्तन 1961 में आया जब उन्होंने एनआईएमआर छोड़कर नासा के लिए काम करना शुरू किया। नासा में उन्हें मानव रहित अंतरिक्ष यान ‘सर्वेयर सीरीज़’ के प्रयोगों को डिज़ाइन करने के लिए आमंत्रित किया गया था ताकि मनुष्य के चंद्रमा पर उतरने से पूर्व चंद्रमा की सतह की जांच की जा सके। इस परियोजना के बाद लवलॉक ने मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश के लिए जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी (जेपीएल) में अंतरग्रही खोजी टीम के साथ काम करना शुरू किया। इस परियोजना में काम करते हुए उन्होंने पाया कि मंगल ग्रह के जैविक पहलुओं पर अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की ओर से बहुत कम सुझाव आए थे।      

लवलॉक का विचार था कि इसका कारण आणविक जीव विज्ञान और जेनेटिक उद्विकास के प्रति वह जुनून है जो फ्रांसिस क्रिक और जेम्स वाटसन द्वारा डीएनए की रचना की खोज के बाद पैदा हुआ था। वे काफी निराश थे कि जीव विज्ञान में अनुसंधान का फोकस व्यापक तस्वीर की बजाय छोटे-छोटे हिस्सों पर हो गया है – जीवन का अध्ययन सम्पूर्ण जीव की बजाय अणुओं और परमाणुओं के अध्ययन पर अधिक केंद्रित है।

मंगल ग्रह पर जीवन के संकेतों को समझने के लिए लवलॉक के प्रयोग काफी अलग ढंग से डिज़ाइन किए गए थे जिनमें अलग-अलग घटकों की बजाय संपूर्ण जीव पर ध्यान देना निहित था। गेइया परिकल्पना को स्थापित करने में यह दृष्टिकोण काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ।      

शुरुआत में नासा ने धरती से परे जीवन का पता लगाने के लिए पृथ्वी के पड़ोसी ग्रह शुक्र और मंगल को चुना था। इन दोनों ग्रहों के वायुमंडल के रासायनिक संघटन के आधार पर लवलॉक का अनुमान था कि दोनों ही जीवन-रहित होंगे।

फिर थोड़ा विचार करने के बाद वे यह सोचने लगे कि किसी बाहरी बुद्धिमान जीव को पृथ्वी कैसी दिखेगी। अपने सहयोगी डियान हिचकॉक के साथ वार्तालाप में उन्होंने यह समझने का प्रयास किया कि पृथ्वी, मंगल और शुक्र ग्रह के वातावरण में इतना अंतर क्यों है। इस विषय पर काम करते हुए विवादास्पद गेइया परिकल्पना का जन्म हुआ। 

नया नज़रिया

तथ्य यह है कि मंगल और शुक्र के वायुमंडलों में 95% कार्बन डाईऑक्साइड और कम मात्रा में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और अन्य गैसें हैं। दूसरी ओर, पृथ्वी के वायुमंडल में 77% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन और मामूली मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड व अन्य गैसें हैं। यह समझना ज़रूरी है कि अन्य ग्रहों की तुलना में पृथ्वी इतनी अलग और अद्वितीय क्यों है।

एक विचारणीय बात यह भी है कि पिछले 3.5 अरब वर्षों में सूर्य की ऊर्जा में 30 प्रतिशत की वृद्धि होने के बाद भी पृथ्वी का तापमान स्थिर कैसे बना हुआ है। भौतिकी के अनुसार इस तापमान पर तो हमारे ग्रह की सतह को उबल जाना चाहिए था लेकिन पृथ्वी काफी ठंडी बनी हुई है।

इसका एकमात्र स्पष्टीकरण पृथ्वी का स्व-नियमन तंत्र है जिसने संतुलन बनाए रखने का एक तरीका खोज निकाला है और यहां रहने वाले जीवों ने इसके वातावरण को स्थिर बनाए रखने में योगदान दिया है। लवलॉक के अनुसार पृथ्वी का वायुमंडल जीवित और सांस लेने वाले जीवों के कारण गैसों में लगातार होते परिवर्तन को संतुलित रखे हुए हैं जबकि मंगल ग्रह का वातावरण अचर है।

यही गेइया परिकल्पना है जिसे लवलॉक ने 1960 के दशक में प्रस्तावित किया था और 1970 के दशक में अमेरिकी जीव विज्ञानी लिन मार्गुलिस के साथ विकसित किया था। इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी केवल एक चट्टान का टुकड़ा नहीं है बल्कि पौधों और जीवों की लाखों प्रजातियों की मेज़बानी करती है जो खुद को इस पर्यावरण के अनुकूल कर पाए हैं। गेइया के अनुसार इन अनगिनत प्रजातियों ने न सिर्फ जद्दोजहद के ज़रिए खुद को अनुकूलित किया बल्कि एक ऐसा वातावरण बनाए रखने में भी सहयोग किया जिससे पृथ्वी पर जीवन को कायम रखा जा सके। सह-विकास इस स्व-नियमन का एक उदाहरण है। लवलॉक का यह सिद्धांत रिचर्ड डॉकिंस जैसे कई विद्वानों को रास नहीं आता था। वे इस सिद्धांत को चार्ल्स डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के विरुद्ध मानते थे।   

लवलॉक के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के इस नियामक तंत्र की शुरुआत तब हुई जब प्राचीन महासागरों में शुरुआती जीवन ने वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन मुक्त करना शुरू किया। कई अरब वर्षों तक जारी इस प्रक्रिया से पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी होती गई और वातावरण ऑक्सीजन पर निर्भर जीवों के पक्ष में होता गया। लवलॉक और उनके सहयोगियों का मत था कि पृथ्वी के जैव-मंडल को एक स्व-विकास और स्व-नियमन करने वाला तंत्र माना जा सकता है जो स्वयं के लाभ के लिए वायुमंडल, पानी और चट्टानों में परिवर्तन करता है।

गेइया परिकल्पना के उदाहरण के रूप में लवलॉक ने डेज़ीवर्ल्ड मॉडल विकसित किया। डेज़ीवर्ल्ड में काले और सफेद डेज़ी फूलों का एक खेत है। यदि तापमान में वृद्धि होती है तो सफेद फूल की तुलना में काले फूल अधिक गर्मी को अवशोषित करते हैं और मुरझा जाते हैं जबकि सफेद डेज़ी अच्छे से पनपते हैं। अंततः सफेद डेज़ी अधिक गर्मी को अंतरिक्ष में परावर्तित करते हैं और ग्रह को फिर से ठंडा करते हैं ताकि काले डेज़ी एक बार फिर से पनप सकें। 

गेइया सिद्धांत ने हरित आंदोलन को काफी प्रभावित किया लेकिन लवलॉक कभी भी पूर्ण रूप से पर्यावरणवाद के समर्थक नहीं रहे। यहां तक कि कई पर्यावरणविदों के विपरीत वे हमेशा परमाणु ऊर्जा के समर्थक रहे। गेइया परिकल्पना को वैज्ञानिक समुदाय में मान्यता मिलने में काफी समय लगा। 1988 में सैन डिएगो में आयोजित अमेरिकन जियोफिज़िकल यूनियन की एक बैठक में गेइया के साक्ष्यों पर प्रमुख जीव विज्ञानियों, भौतिकविदों और जलवायु विज्ञानियों को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया गया। अंतत: वर्ष 2001 में 1000 से अधिक वैज्ञानिकों ने यह माना कि हमारा ग्रह भौतिक, रासायनिक, जैविक और मानव घटकों से युक्त एकीकृत स्व-नियमन तंत्र के रूप में व्यवहार करता है। हालांकि, इसकी बारीकियों पर चर्चा अभी भी बाकी थी लेकिन इस सिद्धांत को मोटे तौर पर स्वीकार कर लिया गया था।       

गेइया सिद्धांत से हटकर लवलॉक ने अपने शुरुआती कार्यकाल में कई नई-नई तकनीकों का भी आविष्कार किया। उन्होंने कोशिका ऊतकों और यहां तक कि हैमस्टर जैसे पूरे जीव को फ्रीज़ करने और उसे पुन: जीवित करने की तकनीक भी विकसित की। 1954 में उन्होंने सिर्फ मज़े के लिए मैग्नेट्रान से निकले माइक्रोवेव विकिरण से आलू पकाया। 

उन्होंने लियो मैककर्न और जोन ग्रीनवुड जैसे अभिनेताओं के साथ भी हाथ आज़माया।

लवलॉक ने ऐसे असाधारण संवेदी उपकरण बनाए जो गैसों में मानव निर्मित रसायनों की छोटी से छोटी मात्रा का पता लगा सकते थे। जब इन उपकरणों का उपयोग वायुमंडल के रासायनिक संघटन के अध्ययन में किया गया तो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की उपस्थिति उजागर हुई जो ओज़ोन के ह्रास के लिए ज़िम्मेदार है। इसी तरह उन्होंने सभी प्राणियों के ऊतकों से लेकर युरोप एवं अमेरिका में स्त्रियों के दूध में कीटनाशकों की उपस्थिति का खुलासा किया। लंदन स्थित विज्ञान संग्रहालय के निदेशक रहते हुए उन्होंने एक ऐसी तकनीक का प्रस्ताव दिया जिसके द्वारा महासागरों में शैवाल के विकास के लिए योजना तैयार की जा सकती है, वायुमंडल से अतिरिक्त कार्बन डाईऑक्साइड को हटाया जा सकता है और साथ ही सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने वाले बादलों के निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है ताकि वैश्विक तापमान को कम किया जा सके।       

उन्होंने 40 पेटेंट दायर किए, 200 से अधिक शोध पत्र लिखे और गेइया सिद्धांत पर कई किताबें लिखीं। उन्हें कई वैज्ञानिक पदकों से सम्मानित किया गया और ब्रिटिश एवं अन्य विश्वविद्यालयों से कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार और मानद डॉक्टरेट से नवाज़ा गया। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या सपनों को रिकॉर्ड कर सकते हैं? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

पिछली एक सदी में मानव जीव विज्ञान पर हमारी समझ काफी बढ़ी है। अलबत्ता, सपनों को समझने में प्रगति काफी धीमी रही है। सपनों की जैविक प्रणाली हमारे लिए अस्पष्ट सी है; एकमात्र निश्चित बात यह है कि अधिकांश मनुष्य सपने देखते हैं।

नींद की जो अवस्था यादगार सपने देखने से जुड़ी है, उसे रैपिड आई मूवमेंट (REM) नींद कहा जाता है। इस चरण में व्यक्ति की आंखें तेज़ी से हरकत करती रहती हैं। नींद के इस चरण में जाग जाएं, तो लोग अक्सर बताते हैं कि वे इस वक्त सपना देख रहे थे। शोधकर्ताओं के लिए REM एक पहेली है क्योंकि इसे मापना मुश्किल है।

साइंस में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट इस महत्वपूर्ण सवाल को संबोधित करती है: सपने में जो कुछ घटता है क्या REM का उससे कुछ सम्बंध है? क्या आंखों की गति में सपने के बारे में कोई जानकारी होती है जिसका विश्लेषण करके अर्थ निकाला जा सके?

लेकिन उस सवाल में जाने से पहले सपनों के अर्थ निर्धारण पर कुछ बात कर ली जाए। बीसवीं सदी की शुरुआत में सिग्मंड फ्रॉयड के सिद्धांत हावी थे, जो सपनों में दिखने वाली छवियों के प्रतीकात्मक अर्थ निकालने पर केंद्रित थे। 1952 में REM नींद की खोज हुई और इसने सपनों को मनोविश्लेषण से अलग दिशा में आगे बढ़ाया।

REM नींद में मस्तिष्क उतना ही सक्रिय पाया गया जितना कि पूरी तरह से जागृत अवस्था में होता है। लेकिन शरीर निष्क्रिय था, सो रहा था। REM नींद सभी स्तनधारियों और पक्षियों में देखी गई है। मिशेल जौवे ने दर्शाया है कि बिल्ली के ब्रेन स्टेम में क्षति पहुंचाने से वह स्वप्नावस्था की शारीरिक गतिहीनता से मुक्त हो जाती है। सपने में तो वह बिल्ली अन्य बिल्लियों के साथ आवाज़ें निकालते हुए लड़ती-भिड़ती है, लेकिन जागने पर लड़ना बंद कर देती है।

मस्तिष्क तरंगों की रिकॉर्डिंग (ईईजी) से इस बारे में नई समझ मिली है। इन रिकॉर्डिंग ने बताया है कि REM नींद और जागृत अवस्था के बीच बहुत कम अंतर है। एक दिलचस्प प्रयोग में तंत्रिका वैज्ञानिक मैथ्यू विल्सन ने भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढते हुए एक जागृत चूहे के मस्तिष्क की गतिविधि को रिकॉर्ड किया। कुछ ही समय बाद जब चूहा REM नींद में था तब उन्हें उसके मस्तिष्क में उसी तरह की मस्तिष्क तंरगें दिखीं – तो क्या वह सपने में भी भूलभुलैया से निकलने का रास्ता खोज रहा था?

सपनों का डैटाबेस

सपनों का अध्ययन करने का एक अन्य तरीका रहा सपनों का वृहत डैटाबेस संकलित करना। सपनों के संग्राहक केल्विन हॉल ने 50,000 सपनों के विश्लेषण से निष्कर्ष निकाला था कि अधिकांश सपने सरिएलिस्ट (असंगत-यथार्थवादी) पेंटिंग जैसे नहीं होते, और उनका काफी हद तक पूर्वानुमान किया जा सकता है। हो सकता है कि सपने देखते समय बच्चे मुस्कराएं क्योंकि बच्चों के सपनों में जानवरों को देखने की अधिक संभावना होती है, लेकिन वयस्कों के सपने बहुत सुखद नहीं होते और अक्सर उनमें चिंता के क्षण होते हैं।

हम महत्वपूर्ण चीज़ों के बारे में चिंतित होते हैं; ऐसी चीज़ें जिन्हें सुलझाना है। फ्रांसिस क्रिक और ग्रेम मिचिसन द्वारा प्रस्तावित एक सिद्धांत के अनुसार सपने देखना घर की साफ-सफाई-व्यवस्थित करने जैसा काम है – दिन भर की घटनाओं की छंटाई। छंटाई करते समय कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं (चिंता के संभावित स्रोत) को यादों के रूप में सहेजा जाता है, और बाकी को रद्दी मानकर छोड़ दिया जाता है।

क्या चलते हुए सपनों से कुछ आउटपुट मिल सकता है जिसे रिकॉर्ड किया जा सके? जवाब परस्पर विरोधी हैं। कुछ अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि आंखों की गति या दिशा या आवृत्ति सपने में दोहराई गई मानसिक प्रक्रिया से मेल खाती है। इलेक्ट्रोऑक्युलोग्राफ की मदद से सोते हुए प्रतिभागियों की आंखों की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया गया, जिसमें यह दर्ज किया गया कि आंखों की गति मुख्य रूप से या तो खड़ी (ऊपर-नीचे) या आड़ी (दाएं-बाएं) होती है। जिन प्रतिभागियों ने बताया कि वे अपने सपने में ऊपर की ओर देख रहे थे उनकी आंखों की गति ऊपर-नीचे वाली देखी गई। दूसरी ओर, अन्य अध्ययनों ने REM का श्रेय मस्तिष्क की बेतरतीब गतिविधियों को दिया है।

अभ्यास रणनीतियां

जागते समय आंखों की गति आवश्यक है। खुले मैदान में चूहा अक्सर अपनी आंखों को ऊपर की ओर घुमाता है, और आसमान से शिकारी पक्षियों के खतरे को भांपता है। पैदल चलने वाले लोग आने-जाने वाली गाड़ियों को देखने के लिए दाएं-बाएं देखते हैं। इन दोनों स्थितियों में आंखें उसी दिशा में घूमती हैं जिसमें सिर घूमता है। मस्तिष्क निगरानी रखता है कि आपका सिर किस दिशा की ओर है। इसके लिए वह हेड डायरेक्शन (HD) तंत्रिका कोशिकाओं का उपयोग करता है। चूहों की हेड डायरेक्शन कोशिका में इलेक्ट्रोड लगाकर यह दर्शाया गया है कि जब सिर गति कर रहा होता है तो ये कोशिकाएं सक्रिय होती हैं।

मैसिमो स्कैनज़िएनी ने सोते हुए चूहों में REM और HD कोशिका गतिविधि दोनों को रिकॉर्ड किया। उल्लेखनीय रूप से, उन्होंने दिखाया कि REM नींद में चूहों की आंखों की गति दिन में आसमान पर नज़र रखने के समान ऊपर-नीचे थी। HD कोशिकाओं ने भी इसी गति के संकेत दिए, हालांकि सोते समय सिर नहीं हिल रहे थे। ऐसा लगता है कि सपना किसी शिकारी पक्षी से बचने के बारे में था। क्या इन अध्ययनों का उपयोग मनुष्यों के लाभ के लिए किया जा सकता है? जिन लोगों ने अचानक, तीव्र आघात का अनुभव किया हो वे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित होते हैं। कोई सैनिक जो अपने पीछे हथगोला फटने से दहल गया हो, भले ही उस विस्फोट से वह चोटिल न हुआ हो, उसे बार-बार ऐसे ही बुरे सपने आ सकते हैं और वर्षों तक चिंता सता सकती है। वह हर रात सपने में क्या ‘देखता’ है, इसकी बेहतर समझ उसे इससे उबारने की बेहतर रणनीतियां दे सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कीटों को भ्रमित कर फसलों की सुरक्षा

र वर्ष विश्व की 20 प्रतिशत फसलों को कीट चट कर जाते हैं। आम तौर पर इन फसलों की रक्षा के लिए कीटनाशकों का और कीटों के व्यवहार को प्रभावित करने वाले रसायनों (फेरोमोन्स) का उपयोग किया जाता है। फेरोमोन्स कीटों को भ्रमित करते हैं और वे प्रजनन साथी खोज नहीं पाते। लेकिन महंगे होने के कारण इनका ज़्यादा उपयोग नहीं होता। अब शोधकर्ताओं ने सस्ता फेरोमोन बना लिया है।

विश्व भर में प्रति वर्ष 4 लाख टन से अधिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। ये कीटनाशक खेतिहर मज़दूरों को नुकसान तो पहुंचाते ही हैं साथ ही परागणकर्ताओं और अन्य वन्यजीवों के लिए भी हानिकारक हैं। इसके अलावा कीटों में कीटनाशकों के विरुद्ध प्रतिरोध विकसित होने पर किसानों को इनका अधिक उपयोग करना पड़ रहा है। तो फेरोमोन एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

मादा कीट नर को आकर्षित करने के लिए फेरोमोन्स का स्राव करती हैं। यदि विशिष्ट कीटों को आकर्षित करने वाले कृत्रिम फेरोमोन का उपयोग किया जाए तो नर चकमा खा जाएंगे और प्रजनन को रोका जा सकता है। तब मादा अनिषेचित अंडे देगी जिनमें से भुक्खड़ इल्लियां पैदा नहीं होंगी।

वैसे तो कीटों द्वारा उत्पन्न फेरोमोन कई यौगिकों का मिश्रण होता है। किसी प्रजाति विशेष के कीटों को आकर्षित करने के लिए कृत्रिम फेरोमोन में यौगिकों का सही मिश्रण होना चाहिए। लेकिन संभोग की प्रक्रिया को रोकने के लिए एक मोटा-मोटा मिश्रण चलेगा क्योंकि कई प्रजातियां एक से यौगिकों का इस्तेमाल करती हैं। फिर भी इस तरह का मिश्रण बनाना कोई आसान काम नहीं है। 1 किलोग्राम कृत्रिम फेरोमोन बनाने के लिए लगभग 1000 डॉलर (80 हज़ार रुपए) से 3500 डॉलर (2.7 लाख रुपए) तक का खर्च आता है। इसे खेतों में प्रसारित करने के लिए 3200 से 32,000 रुपए प्रति हैक्टर और लगते हैं तथा कुशल श्रमिकों की ज़रूरत होती है। इन्हीं कारणों से कृत्रिम फेरोमोन का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक मुनाफा देने वाली फसलों में किया जाता है।

लुंड युनिवर्सिटी के केमिकल इकोलॉजिस्ट क्रिस्टर लोफस्टेड और उनके सहयोगी पिछले एक दशक से फेरोमोन संश्लेषण के आवश्यक रसायन बनाने के लिए पौधों को संशोधित कर रहे हैं। उन्होंने अपने अध्ययन के लिए कैमेलीना नामक पौधे को चुना है जिसके बीजों में भरपूर मात्रा में वसीय अम्ल होते हैं। ये वसीय अम्ल पौधों में फेरोमोन निर्माण के कच्चे माल के प्रमुख घटक हैं।

शोधकर्ताओं ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से नैवल ऑरेंजवर्म का जीन कैमेलीना में जोड़ा। इसे जोड़ने पर कैमेलीना के बीज में (ज़ेड)-11-हेक्साडेकेनोइक अम्ल का उत्पादन होने लगता है। कीटों में यह वसीय अम्ल फेरोमोन का पूर्ववर्ती होता है। उन पौधों को चुना गया जो अम्ल का सबसे अधिक मात्रा में उत्पादन करते थे।

तीन पीढ़ियों बाद इन बीजों में फेरोमोन के उत्पादन के लिए पर्याप्त (ज़ेड)-11-हेक्साडेकेनोइक अम्ल था। इसकी मदद से शोधकर्ताओं ने एक तरल फेरोमोन मिश्रण तैयार किया जो डायमंडबैक पतंगे (प्लूटेला ज़ाइलोस्टेला) नामक कीट को आकर्षित करता था।

वर्ष 2017 में टीम ने चीन में इस फेरोमोन मिश्रण का परीक्षण किया। नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह अन्य उपलब्ध कृत्रिम फेरोमोन के बराबर कारगर रहा। ब्राज़ील में किए गए एक अन्य परीक्षण में इस फेरोमोन ने कॉटन बोलवर्म (हेलिकोवर्पा अर्मिगेरा) के संभोग पैटर्न में ठीक उसी तरह का परिवर्तन किया जैसा महंगा कृत्रिम फेरोमोन करता है।

इस शोध में शामिल कंपनी आईएससीए ने इस रसायन की कीमत 70-125 डॉलर (5600-10,000 रुपए) के बीच रखी है जो लगभग कीटनाशकों के बराबर है। एक समस्या यह है कि यह तरीका बड़े खेतों में ही लाभदायक साबित होता है। विकासशील देशों में खेत छोटे-छोटे होते हैं। इसके लिए अलग रणनीति की ज़रूरत होगी। बहरहाल, अन्य कीटों के लिए भी फेरोमोन्स निर्माण के प्रयास जारी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पाकिस्तान में सदी की सबसे भीषण बाढ़

स वर्ष पाकिस्तान सदी की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। देश का एक-तिहाई हिस्सा जलमग्न हो गया है। बाढ़ ने लगभग 3.3 करोड़ लोगों को विस्थापित किया और 1200 से अधिक लोग मारे गए। कई ऐतिहासिक इमारतों को भी काफी नुकसान पहुंचा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार इस तबाही की शुरुआत इस वर्ष भीषण ग्रीष्म लहर से हुई। अप्रैल और मई माह के दौरान कई स्थानों पर काफी लंबे समय तक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। जैकबाबाद शहर में तो तापमान 51 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहा। पाकिस्तान के कुछ स्थान विश्व के सबसे गर्म स्थानों में रहे।

गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है। लिहाज़ा गर्म मौसम को देखते हुए कई मौसम विज्ञानियों ने इस वर्ष की शुरुआत में ही जुलाई से सितंबर के बीच देश में सामान्य से अधिक वर्षा होने की चेतवानी दी थी।

जलवायु वैज्ञानिक अतहर हुसैन के अनुसार भीषण गर्मी से हिमनदों के पिघलने से सिंधु की सहायक नदियों में जल-प्रवाह बढ़ा जो अंततः सिंधु नदी में पहुंचा। सिंधु नदी पाकिस्तान की सबसे बड़ी नदी है जो देश के उत्तरी क्षेत्र से शुरू होकर दक्षिण तक बहती है। इस नदी से कई शहरों और कृषि की ज़रूरतें पूरी होती हैं। जुलाई माह में हिमाच्छादित क्षेत्रों का दौरा करने पर सिंधु की सहायक हुनज़ा नदी में भारी प्रवाह और कीचड़ भरा पानी देखा गया। कीचड़ वाला पानी इस बात का संकेत था कि हिमनद काफी तेज़ी से पिघल रहे हैं और तेज़ी से बहता पानी अपने साथ तलछट लेकर बह रहा है। इसके अलावा कई झीलों की बर्फीली मेड़ें फूट गईं और उनका पानी सिंधु में पहुंचा।

ग्रीष्म लहर के साथ ही एक और बात हुई – अरब सागर में कम दबाव का सिस्टम बना जिसकी वजह से जून की शुरुआत में ही पाकिस्तान के तटीय प्रांतों में भारी बारिश हुई। इस तरह का सिस्टम बनना काफी असामान्य था। इस वर्ष पाकिस्तान के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से तीन गुना और दक्षिण पाकिस्तान स्थित सिंध और बलूचिस्तान में औसत से पांच गुना वर्षा हुई। एक बार ज़मीन पर आने के बाद इस पानी को जाने के लिए कोई जगह नहीं थी, सो इसने तबाही मचा दी।

कुछ मौसम एजेंसियों ने ला-नीना जलवायु घटना की भी भविष्यवाणी की थी जिसका सम्बंध भारत और पाकिस्तान में भारी मानसून से देखा गया है। संभवत: ला-नीना प्रभाव इस वर्ष के अंत तक जारी रहेगा।

शायद मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग ने भी वर्षा को तेज़ किया होगा। इस संदर्भ में 1986 से 2015 के बीच पाकिस्तान के तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की वृद्धि हुई है जो वैश्विक औसत से अधिक है।

तबाही को बढ़ाने में कमज़ोर चेतावनी प्रणाली, खराब आपदा प्रबंधन, राजनीतिक अस्थिरता और बेतरतीब शहरी विकास सहित अन्य कारकों की भी भूमिका रही है। जल निकासी और जल भंडारण के बुनियादी ढांचे की कमी के साथ-साथ बाढ़ संभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। (स्रोत फीचर्स)
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चांद पर दोबारा उतरने की कवायद – प्रदीप

आर्टेमिस मिशन के ज़रिए नासा इंसानों को एक बार फिर चांद पर उतारने की योजना बना रहा है। हाल ही में अपोलो-11 चंद्र लैंडिंग की 53वीं वर्षगांठ के अवसर पर नासा के एक्सप्लोरेशन सिस्टम डेवलपमेंट मिशन निदेशालय के सह-प्रशासक जिम फ्री ने बताया है कि आर्टेमिस-I मेगा मून रॉकेट जल्द ही लांच किया जा सकता है। आर्टेमिस-I एक मानव रहित मिशन होगा। यह मिशन आर्टेमिस कार्यक्रम के प्रारंभिक परीक्षण के तौर पर चांद पर जाएगा और फिर वापस धरती पर लौट आएगा। आर्टेमिस मिशन के ज़रिए नासा 2025 तक इंसानों को एक बार फिर चांद पर उतारने के अपने लक्ष्य को पूरा करना चाहता है। इस मिशन के तहत एक महिला भी चांद पर जाएगी, जो चांद पर जाने वाली विश्व की पहली महिला बनेगी।

आर्टेमिस मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करेगा। नासा का कहना है कि भले ही यह मिशन चांद से शुरू होगा पर यह निकट भविष्य के मंगल अभियानों के लिए भी वरदान सिद्ध होगा क्योंकि चांद पर जाना, मंगल पर पहुंचने से पहले आने वाला एक बेहद अहम पड़ाव है। दरअसल, नासा चांद को मंगल पर जाने के लिए एक लांच पैड की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।

रणनीतिक और सामरिक महत्व के चलते चांद पर जाने की होड़ एक नए सिरे से शुरू हो चुकी है। जो भी देश चांद पर सबसे पहले कब्जा करेगा उसका अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दबदबा बढ़ेगा। चंद्रमा की दुर्लभ खनिज संपदा, खासकर हीलियम-3, ने भी इसे सबका चहेता बना दिया है। अमेरिका के अलावा रूस, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत भी 2022-23 में अपने चंद्र अन्वेषण यान भेजने वाले हैं। यही नहीं, कई निजी कंपनियां चांद पर सामान व उपकरण पहुंचाने और प्रयोगों को गति देने के उद्देश्य से सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों के ठेके हासिल करने की कतार में खड़ी हैं।

भारत के चंद्रयान-2 मिशन के विफल होने के बाद, भारत 2023 की पहली तिमाही में चंद्रयान-3 मिशन के तहत दोबारा लैंडर और रोवर चांद पर भेजने की योजना बना रहा है। चंद्रयान-2 मिशन के सबक के आधार पर चंद्रयान-3 मिशन की तैयारी की गई है। चंद्रयान-2 के दौरान लांच किए गए ऑर्बाइटर का उपयोग भी किया जाएगा।

चांद पर जाने की तैयारी में विभिन्न देशों की सरकारी और निजी स्पेस एजेंसियां पूरे दमखम के साथ जुटी हैं। दक्षिणी कोरिया अगले महीने अपना पहला ‘कोरिया पाथफाइंडर ल्यूनर ऑर्बाइटर मिशन’ भेजेगा। यह ऑर्बाइटर चंद्रमा की भौगोलिक और रासायनिक संरचना का अध्ययन करेगा। इसी साल रूस भी अपने लैंडर लूना-25 को चांद की सतह पर उतारने की तैयारियों में जुटा हुआ है। गौरतलब है कि पिछले 45 वर्षों में यह चांद की ओर रूस का पहला मिशन होगा। इनके अलावा जापान भी अगले साल अप्रैल में चांद पर अपना स्मार्ट लैंडर उतारने की तैयारी कर रहा है। दुनिया भर के देशों में चांद को लेकर एक होड़-सी लगी दिखती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत की खोज में जंतुओं ने समंदर लांघा था – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

हॉलीवुड की एनिमेशन फिल्मों में नाचते, गाते, शरारत करते लीमर ज़रूर दिखेंगे। ये सिर्फ मैडागास्कर द्वीप पर ही पाए जाते हैं जो प्रकृतिविदों के लिए हमेशा से दिलचस्प जंतुओं का आवास स्थल रहा है।

मैडागास्कर में पाए जाने वाले कई जंतुओं का सम्बंध दूरस्थ भारत (दूरी 3800 कि.मी.) में पाए जाने वाले वंशों से दिखता है, बनिस्बत अफ्रीका के जंतुओं से जबकि अफ्रीका यहां से महज 413 कि.मी. दूर है। यह प्रकृतिविदों के लिए एक ‘अबूझ पहेली’ रही है।

प्राणि वैज्ञानिक फिलिप स्क्लेटर हैरान थे कि लीमर और सम्बंधित जंतु व उनके जीवाश्म मैडागास्कर और भारत में तो पाए जाते हैं लेकिन मैडागास्कर के निकट स्थित अफ्रीका या मध्य पूर्व में अनुपस्थित हैं। 1860 के दशक में उन्होंने प्रस्तावित किया था कि किसी समय भारत और मैडागास्कर के बीच एक बड़ा द्वीप या महाद्वीप मौजूद रहा होगा, जो दोनों स्थानों के बीच सेतु का कार्य करता था। समय के साथ यह द्वीप डूब गया। इस प्रस्तावित जलमग्न द्वीप को उन्होंने लेमुरिया नाम दिया था।

स्क्लेटर की इस परिकल्पना ने हेलेना ब्लावात्स्की जैसे तांत्रिकों को आकर्षित किया, जिनका यह मानना था कि यही वह स्थान होना चाहिए जहां मनुष्यों की उत्पत्ति हुई थी।

देवनेया पवनर जैसे तमिल धार्मिक पुनरुत्थानवादियों ने भी इस विचार को अपनाया और इसे एक तमिल सभ्यता की संज्ञा दी। साहित्य और पांडियन दंतकथाओं में यह समुद्र में जलगग्न सभ्यता के रूप में वर्णित है। वे इस जलमग्न महाद्वीप को कुमारी कंदम कहते थे।

महाद्वीपों का खिसकना

स्क्लेटर के विचारों ने तब समर्थन खो दिया जब एक अन्य ‘हैरतअंगेज़’ सिद्धांत – महाद्वीपीय खिसकाव या विस्थापन – ने स्वीकृति प्राप्त करना शुरू किया। प्लेट टेक्टोनिक्स नामक इस सिद्धांत के अनुसार बड़ी-बड़ी प्लेट्स – जिन पर हम खड़े हुए हैं (या चलते-फिरते हैं, रहते हैं) – पिघली हुई भूमिगत चट्टानों पर तैरती हैं और एक-दूसरे के सापेक्ष ये प्रति वर्ष 2-15 से.मी. खिसकती हैं। तकरीबन 16.5 करोड़ वर्ष पहले गोंडवाना नामक विशाल भूखंड दो हिस्सों में बंट गया था – इसके एक टुकड़े में वर्तमान के अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका थे और दूसरे टुकड़े में भारत, मैडागास्कर, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका थे।

फिर लगभग 11.5 करोड़ साल पूर्व मैडागास्कर और भारत एक साथ इससे टूटकर अलग हो गए थे। लगभग 8.8 करोड़ साल पहले, भारत उत्तर की ओर बढ़ने लगा और इसने रास्ते में कुछ छोटे-छोटे भू-भाग (द्वीप) छोड़ दिए जिससे सेशेल्स बना। यह टूटा हुआ हिस्सा लगभग 5 करोड़ साल पहले युरेशियन भू-भाग से टकराया जिससे हिमालय और दक्षिण एशिया बने।

लगभग 11.5 करोड़ साल पहले डायनासौर का राज था। इस समय तक कई जीव रूपों का विकास भी नहीं हुआ था। भारत और मैडागास्कर में पाए जाने वाले डायनासौर के जीवाश्म काफी एक जैसे हैं, और ये अफ्रीका और एशिया में पाई जाने वाली डायनासौर प्रजातियों के समान नहीं हैं जो गोंडवाना के टूटने का समर्थन करता है। भारत और मैडागास्कर दोनों जगहों पर लैप्लेटोसॉरस मेडागास्करेन्सिस के अवशेष पाए गए हैं।

आणविक घड़ियां

आणविक घड़ी एक शक्तिशाली तकनीक है जिसका उपयोग यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि जैव विकास के दौरान कोई दो जीव एक-दूसरे से कब अलग हुए थे। यह तकनीक इस अवलोकन पर आधारित है कि आरएनए या प्रोटीन अणु की शृंखला में वैकासिक परिवर्तन काफी निश्चित दर पर होते हैं। जैसे दो जीवों के हीमोग्लोबिन जैसे प्रोटीन में अमीनो एसिड में अंतर आपको यह बता सकता है कि उनके पूर्वज कितने वर्ष पहले अलग हो गए थे। आणविक घड़ियां अन्य साक्ष्यों (जैसे जीवाश्म रिकॉर्ड) से काफी मेल खाती हैं।

दक्षिण भारत और श्रीलंका में मीठे पानी और खारे पानी की मछलियों के सिक्लिड परिवार के केवल दो वंश हैं – एट्रोप्लस (जो केरल की एक खाद्य मछली है, जहां इसे पल्लती कहा जाता है) और स्यूडेट्रोप्लस। आणविक तुलना से पता चलता है कि एट्रोप्लस के निकटतम सम्बंधी मैडागास्कर में पाए जाते हैं, और इनके साझा पूर्वज 16 करोड़ वर्ष पहले अफ्रीकी सिक्लिड्स से अलग हो गए थे। चौथे तरह के सिक्लिड दक्षिण अमेरिका में पाए जाते हैं, इस प्रकार ये गोंडवाना के छिन्न-भिन्न होने का समर्थन करते हैं।

एशिया, मैडागास्कर और अफ्रीका में जीवों के वितरण में भारत एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गोंडवाना के जीव भारत से निकलकर फैले। कुछ अन्य जीव यहां आकर बस गए। उदाहरण के लिए, मीठे पानी के एशियाई केंकड़े (जेकार्सिन्यूसिडी कुल)अब समूचे दक्षिण पूर्व एशिया में पाए जाते हैं लेकिन उनके सबसे हालिया साझा पूर्वज भारत में विकसित हुए थे। सूग्लोसिडे नामक मेंढक कुल सिर्फ भारत और सेशेल्स में पाया जाता है।

गढ़वाल के एचएनबी विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय और जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने गुजरात की वस्तान लिग्नाइट खदान से प्राप्त जीवाश्म में प्रारंभिक भारतीय स्तनधारी – चमगादड़ की एक प्रजाति, और प्रारंभिक युप्राइमेट – एक आदिम लीमर की पहचान की है। ये लगभग 5.3 करोड़ वर्ष पूर्व के जीवाश्म हैं, जो भारत-युरेशियन प्लेट्स के टकराने (या उससे ठीक पहले) का समय है।

लीमर्स के बारे में क्या? मैडागास्कर बहुत बड़ा द्वीप है, यहां विविध तरह की जलवायु परिस्थितियां हैं। साक्ष्य बताते हैं कि अफ्रीका से समुद्र पार करके एक पूर्वज प्राइमेट यहां आया था। कोई बंदर, वानर या बड़े शिकारी इसे पार नहीं कर सके थे, इसलिए यहां दर्जनों लीमर प्रजातियां फली-फूलीं।

भारत में लोरिस पाए जाते हैं, जो लीमर के निकटतम सम्बंधी हैं। ये शर्मीले, बड़ी और आकर्षक आंखों वाले निशाचर वनवासी हैं। माना जाता है कि ये भी समुद्री रास्ते से अफ्रीका से यहां की यात्रा में जीवित बच गए। सुस्त लोरिस ज़्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते हैं, और छरहरे लोरिस कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के सीमावर्ती क्षेत्र में पाए जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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साल भर सूखा रहे तो क्या होगा?

दुनिया के कई हिस्से भयानक सूखे की मार झेल रहे हैं। और सूखे की परिस्थितियों में वनस्पतियों की प्रतिक्रिया जानने को लेकर किया गया हालिया अध्ययन बताता है कि सूखे की स्थिति जलवायु परिवर्तन को और बुरी तरह प्रभावित सकती है।

साल भर सूखे की हालत रहे तो वनस्पतियों की वृद्धि 80 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जिसके चलते इनकी कार्बन डाईऑक्साइड सोखने की क्षमता बहुत कम हो जाएगी। और घास के मैदानों में पौधों की कुल वृद्धि 36 प्रतिशत तक कम हो सकती है। वैसे लगभग 20 प्रतिशत अध्ययन क्षेत्रों की वनस्पति सूखे के बावजूद फलती-फूलती रही।

दरअसल तीन पारिस्थितिकीविद जानना चाहते थे कि शुष्क मौसम पौधों की उत्पादकता को कैसे प्रभावित करता है, खास कर घास के मैदानों और झाड़ियों वाले स्थानों पर क्योंकि ज़मीन के 40 प्रतिशत हिस्से पर तो यही हैं। इसके लिए उन्होंने एक प्रयोग – अंतर्राष्ट्रीय सूखा प्रयोग (आईडीई) – डिज़ाइन किया, जिसमें उन्होंने 139 अध्ययन स्थलों पर कृत्रिम सूखा पैदा किया और वनस्पतियों की वृद्धि को मापा। इनमें से कुछ अध्ययन स्थल ईरान और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में थे। अधिकतर अध्ययन क्षेत्र झाड़ी और घास के मैदानों में थे, जहां वर्षा को कृत्रिम रूप से रोकना आसान था।

इसके लिए उन्होंने 1 वर्ग मीटर के क्षेत्र को प्लास्टिक की शीट से ढंक कर वर्षा को अवरुद्ध किया; कितनी वृष्टि की ज़रूरत है, उसके अनुसार उन्होंने प्लास्टिक शीट के बीच जगह छोड़ी। औसतन वहां होने वाली सामान्य से आधे से भी कम वर्षा मिली। कंट्रोल के तौर पर हर अध्ययन स्थल एक वर्ग मीटर के क्षेत्र को खुला छोड़ा गया।

प्रत्येक स्थल पर दोनों भूखंडों में पौधों के प्रकार और संख्या का हिसाब रखा। एक साल तक सूखे की स्थिति बनाए रखने के बाद शोधकर्ताओं ने फिर से पौधों का सर्वेक्षण किया, दोनों तरह के भूखंडों के पौधों को काटा, सुखाया और तौला।

100 अध्ययन स्थल से प्राप्त परिणामों में देखा गया कि कुछ क्षेत्रों के छोटी घास के मैदानों को कृत्रिम सूखे से भारी क्षति पहुंची थी। पानी की कमी वाले क्षेत्र में पौधों की उत्पादकता में 88 प्रतिशत की कमी देखी गई।

इसके विपरीत, जर्मनी के एक समशीतोष्ण घास के मैदान में कृत्रिम सूखे से कोई खास फर्क नहीं पड़ा था (जर्मनी के अध्ययन स्थलों की जलवायु नम होती है और कम गंभीर सूखा पड़ता है)। कुल मिलाकर नम जलवायु वाले पौधों का प्रदर्शन बेहतर रहा, और झाड़ी वाले भूखंडों ने घास वाले भूखंडों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। घास वाले भूखंडों की उत्पादकता में औसतन 36 प्रतिशत की कमी देखी गई — यह पूर्व अध्ययनों में देखी गई कमी से लगभग दुगनी है।

कई शोधकर्ता इस प्रयोग को चार या उससे अधिक वर्षों तक जारी रखना चाहते हैं। यह अतिरिक्त डैटा जलवायु मॉडल के अनुमानों को बेहतर करने में मदद कर सकता है, जो यह बता सकते हैं कि सूखा पड़ने पर झाड़ी और घास के मैदान कितनी कम कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करेंगे। ये नतीजे पारिस्थितिकीविदों को यह अनुमान लगाने में भी मदद कर सकते हैं कि सूखे के दौरान कौन से पारिस्थितिक तंत्र सबसे अधिक जोखिम में होंगे। कम वनस्पति का मतलब होगा उन्हें खाने वाले वाले जानवरों के लिए कम भोजन, और इससे चलते इनके शिकारियों के लिए कम भोजन। कई पारिस्थितिक तंत्रों का स्वास्थ्य और उनकी जैव विविधता पौधों के उत्पादन पर निर्भर करती है। (स्रोत फीचर्स)

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सौर मंडल से बाहर के ग्रह में कार्बन डाईऑक्साइड

जेम्स वेब दूरबीन की मदद से सौर मंडल से बाहर के एक ग्रह के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के साक्ष्य मिले हैं। शनि के आकार का यह ग्रह पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर है। यह पहली बार है कि किसी बाह्य ग्रह में इस गैस के साक्ष्य मिले हैं। किसी ग्रह पर कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति से उस ग्रह की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण सुराग मिलते हैं। खगोलविदों का विश्वास है कि जल्द ही जेम्स वेब दूरबीन से मीथेन और अमोनिया जैसी गैसों की पहचान भी की जा सकेगी जो किसी ग्रह पर जीवन की उपस्थिति का अंदाज़ देंगी।

वेब दूरबीन अवरक्त तरंगों के प्रति संवेदनशील है जिन्हें पृथ्वी का वायुमंडल अवरुद्ध करता है। जब कोई ग्रह कक्षा में चक्कर लगाते हुए अपने तारे के सामने से गुज़रता है तो तारे का प्रकाश ग्रह के वायुमंडल से होकर गुज़रता है। वायुमंडल से गुज़रने के दौरान प्रकाश में जो परिवर्तन होते हैं वे ग्रह के वायुमंडल के संघटन का सुराग देते हैं क्योंकि वायुमंडल में उपस्थित गैसें विभिन्न तरंग लंबाई के प्रकाश का अवशोषण करती हैं। हमारी रुचि की अधिकांश गैसें अवरक्त प्रकाश का अवशोषण करती हैं।          

हालिया अध्ययन के लिए खगोलविदों ने वैस्प-39बी नामक गैसीय गर्म विशाल ग्रह को चुना जो हर 4 दिनों में अपने तारे की परिक्रमा करता है। इस ग्रह के अवशोषण स्पेक्ट्रम में वेब टीम ने कार्बन डाईऑक्साइड गैस की यकीनी उपस्थिति देखी। वैसे इसी डैटा से कार्बन डाईऑक्साइड के अलावा एक और गैस का पता चला है लेकिन अभी तक टीम ने इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। जल्द ही परिणाम नेचर पत्रिका में प्रकाशित किए जाएंगे जिसमें इस ग्रह पर उपस्थित सभी रसायनों की जानकारी होगी।   

किसी भी ग्रह पर कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति से उस ग्रह की ‘धात्विकता’ का पता चलता है। ‘धात्विकता’ का अर्थ है कि किसी ग्रह पर हाइड्रोजन व हीलियम तथा अन्य तत्वों का अनुपात क्या है। गौरतलब है कि बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम का निर्माण हुआ था। आगे चलकर इन दो तत्वों से अधिक भारी तत्वों का निर्माण तारों में हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार भारी तत्वों ने विशाल ग्रहों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब किसी नए तारे के इर्द-गिर्द सामग्री के डिस्क से ग्रह का निर्माण होता है तब भारी तत्व ठोस पत्थरों और चट्टानों को जोड़कर कोर का निर्माण करते हैं जो अंततः अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण से गैसों को अपनी ओर खींचते हैं और एक विशाल ग्रह का रूप ले लेते हैं।         

वैस्प-39बी से मिले कार्बन डाईऑक्साइड के साक्ष्यों से वेब टीम का अनुमान है कि इस ग्रह की धात्विकता लगभग शनि ग्रह के समान है। उम्मीद है कि वेब दूरबीन कई आश्चर्यजनक परिणाम देगी। शायद हमें कोई ऐसा ग्रह मिल जाए जो जीवन के योग्य हो। (स्रोत फीचर्स)

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प्राचीन कांसा उत्पादन के नुस्खे की नई व्याख्या

1976 में की गई खुदाई में शांग राजवंश के एक चीनी सेनापति फू हाओ के तीन हज़ार साल पुराने मकबरे से 1.5 टन से अधिक कांसा निकला था। खुदाई में प्राप्त वस्तुओं की तादाद से पता चलता है कि तत्कालीन चीन में कांस्य उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। और दिलचस्प बात यह रही है कि कांसे की कई पुरातात्विक वस्तुओं में काफी मात्रा में सीसा (लेड) पाया गया है। यह एक रहस्य रहा है कि कांसे में इतना सीसा क्यों है।

हाल ही में शोधकर्ताओं ने 2300 साल पुराने एक ग्रंथ में वर्णित कांस्य वस्तुएं बनाने के नुस्खे को नए ढंग से समझने की कोशिश की है। उनका निष्कर्ष है कि चीन के प्राचीन ढलाईघरों में कांसे की वस्तुएं बनाने के लिए पहले से तैयार मिश्र धातुओं का उपयोग किया जाता था। इससे पता चलता है कि – चीन का कांस्य उद्योग अनुमान से अधिक जटिल था।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद और अध्ययन के लेखक मार्क पोलार्ड बताते हैं कि किसी समय चीन प्रति वर्ष सैकड़ों टन कांसे का उत्पादन करता था।

वैसे दशकों से पुरातत्वविद काओगोंग जी नामक प्राचीन ग्रंथ को समझने की कोशिश करते आए हैं। काओगोंग जी 2500 साल पुराना एक तकनीकी विश्वकोश सरीखा ग्रंथ है। इसमें गाड़ी बनाने, वाद्ययंत्र बनाने से लेकर शहर बनाने तक के निर्देश-नियम दिए गए हैं। इसमें कांसे की वस्तुओं जैसे कुल्हाड़ी, तलवार और अनुष्ठानों में उपयोग होने वाले पात्रों को ढालने की भी छह विधियां बताई गई हैं। ये तरीके दो प्रमुख पदार्थों पर आधारित हैं: शिन और शाय। पूर्व विश्लेषणों में वैज्ञानिकों ने बताया था कि शिन और शाय कांसे के घटक (तांबा और टिन) हैं। लेकिन फिर भारी मात्रा में सीसा कहां से आया?

तो वास्तव में शिन और शाय क्या होंगे, इसे बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने प्राचीन कांस्य सिक्कों के रासायनिक विश्लेषणों को फिर से देखा। उनके अनुसार इनमें से अधिकांश सिक्के संभवत: दो खास मिश्र धातुओं को मिलाकर बनाए गए थे – पहली तांबा, टिन व सीसा की मिश्र धातु, और दूसरी तांबा व सीसा की मिश्र धातु।

एंटीक्विटी में प्रकाशित में नतीजों के अनुसार शिन और शाय तांबा और टिन नहीं इन दो मिश्र धातुओं के द्योतक हैं। ऐसा लगता है कि मिश्र धातुओं की सिल्लियां किसी अन्य जगह तैयार होती थीं, फिर इन्हें ढलाईघर पहुंचाया जाता था। इन सिल्लियों का उपयोग प्राचीन चीन में धातुओं के उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति के जटिल नेटवर्क का अंदाज़ा देता है। संभवत: यह नेटवर्क अनुमान से कहीं बड़ा था।

कुछ वैज्ञानिकों को लगता है कि इस बात के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं कि शिन और शाय शुद्ध तांबा और टिन नहीं बल्कि पहले से तैयार मिश्र धातु हैं। हो सकता है कि काओगोंग जी वास्तविक निर्माताओं द्वारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लिखा गया था। तो हो सकता है कि उन्होंने प्रमुख सामग्री – तांबा और टिन – का ही उल्लेख किया हो, अन्य का नहीं।

बहरहाल कांस्य वस्तुओं के निर्माण की तकनीक से उनसे जुड़ी सभ्यताओं को समझने में मदद मिलती है। (स्रोत फीचर्स)

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कमाल का संसार कुकुरमुत्तों का – डॉ. ओ. पी. जोशी

रसात के दिनों में सड़ी-गली वस्तुओं पर पैदा होकर जल्द ही गायब होने वाले सुंदर, नाज़ुक एवं रंग-बिरंगे कुकुरमुत्ते हमेशा ही ध्यान आकर्षित करते हैं। प्राचीन समय में मनुष्य इस दुविधा में था कि ये पौधे हैं या फिर जंतु। अलबत्ता, प्रसिद्ध वैज्ञानिक थियोफ्रेस्टस (371–287 ईसा पूर्व) का मत था कि ये एक प्रकार की वनस्पति हैं।

कुकुरमुत्ते मृतोपजीवी (सेप्रोफाइट) हैं, जो सड़े गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते है। जीवजगत के आधुनिक वर्गीकरण में इन्हें कवक (फंजाई) समुदाय में रखा गया है। अंग्रेज़ी में इन्हें मशरूम तथा हिंदी में कई नामों से जाना जाता है, जैसे खुंभ, खुंभी, गुच्छी, धींगरी तथा भींगरी। इनकी ज़्यादातर प्रजातियां छतरी समान होने के कारण इन्हें छत्रक भी कहा जाता है। इनका ऊपर का छतरी समान भाग (पायलियस) एक ठंडल समान रचना (स्टेप) से जुड़ा रहता है। इस रचना के ज़मीन से सटे भाग से जड़ों के समान धागे जैसी रचनाएं (माइसीलियम) निकलकर पोषक पदार्थों का अवशोषण करती हैं। छतरी समान रचना में कई छोटे-छोटे खांचे (गिल्स) होते हैं जहां बीजाणु (स्पोर्स) बनते हैं। इनका प्रसार धागेनुमा रचना एवं बीजाणु दोनों से होता है। कुछ कुकुरमुत्ते पूरी तरह भूमिगत होते हैं जिन्हें ट्रफल कहा जाता है।

कुकुरमुत्तों का वर्णन कई देशों के प्राचीन साहित्य में मिलता है। बेबीलोन, यूनान एवं रोम सभ्यता के पुराने धार्मिक ग्रंथों में इनके विविध उपयोगों का ज़िक्र है। चीन की पुरानी पुस्तकों में इनको उगाने की विधि बताई गई है। हमारे देश के प्राचीन ग्रंथ चरक संहिता में इन्हें तीन प्रकार का बताया गया है – खाने योग्य, विषैले एवं औषधीय। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि प्राचीन काल में प्रचलित सोमरस भी एमेनिटा मस्केरिया नामक कुकुरमुत्ते से बनाया जाता था जो फ्लाय-एगेरिक के नाम से मशहूर है।

प्राचीन युरोप एवं रोम की मान्यता के अनुसार कुकुरमुत्ते बादलों में कड़कती बिजली के कारण धरती पर पैदा होते है। मेक्सिको में प्राचीन समय में इन्हें दैवी शक्ति मानकर पूजा की जाती थी। यूनानवासी एक समय मूर्ख लोगों को कुकुरमुत्ता कहते थे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने 19वीं सदी में दक्षिण अमेरिका के एक द्वीप पर वहां के निवासियों को मांस-मछली के साथ कुकुरमुत्ते एवं स्ट्रॉबेरी खाते देखा था। इन कुकुरमुत्तों को बाद में सायटेरिया डार्विनाई कहा गया। जूलियस सीज़र के समय एक ताकत देने वाला कुकुरमुत्ता (एगेरिकस प्रजाति) सैनिकों को खिलाया जाता था।

कुकुरमुत्तों को उगाने या खेती करने का इतिहास भी काफी पुराना है। चीन एवं जापान के लोग लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व पेड़ों के तनों के टुकड़ों पर अपनी पसंद के कुकुरमुत्ते उगाते थे। 17वीं सदी में पेरिस के निर्माण के लिए खोदी गई चूना पत्थर की बेकार पड़ी खदानों में घोड़े की लीद पर फ्रांसीसियों ने इनकी खेती की। यहां से इनकी खेती का चलन पूरे युरोप, अमेरिका एवं अन्य देशों में फैला। वर्तमान में इनकी खेती में कम्पोस्ट खाद एवं भूसी का उपयोग किया जाता है। यदि गर्मियों में ठंडक तथा जाड़ों गर्म रखने की व्यवस्था हो तो कुकुरमुत्तों की खेती वर्ष भर की जा सकती है। हमारे देश में इनकी खेती 1962 में प्रारम्भ हुई।

कुछ प्रजातियों के कुकुरमुत्तों का आकार छतरी से भिन्न भी होता है – जैसे अंडाकार (पोडेक्सिस एवं क्लेवेरिया), सीप समान (प्लूटियस), कुप्पी (फनल) के समान (क्लाइटोसाइब) एवं चिड़ियों के घोसले में रखे अंडों के समान (साएथस)। कुछ कुकुरमुत्ते (प्लूरोटस तथा आर्मेलेरिया प्रजातियां) रात में जंगलों में ऐसे चमकते हैं मानों छोटे-छोटे बिजली के बल्ब लगे हों।

कुकुरमुत्ते खाद्य तथा चिकित्सा के क्षेत्र में काफी उपयोगी पाए गए हैं। वैसे तो दुनिया भर में कई प्रकार के कुकुरमुत्ते उगाए एवं खाए जाते हैं परंतु तीन प्रमुख हैं – बटन खुंभी (एगेरिकस प्रजातियां), धान पुआल खुंभी (वॉल्वेरिया प्रजातियां) एवं ढोंगरी (प्लूरोटस प्रजातियां)।

पोषण वैज्ञानिकों के मुताबिक 100 ग्राम ताज़े कुकुरमुत्ते में औसतन 5 ग्राम ऐसा प्रोटीन होता है जो शरीर में पूरी तरह पच जाता है। इसके अलावा कार्बोहायड्रेट, विटामिन्स, वसा, रेशे एवं खनिज पदार्थ भी पाए जाते हैं। वसा एवं कार्बोहायड्रेट की मात्रा कम होने से मोटापा के प्रति चिंतित लोगों में कुकुरमुत्तों के खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय हैं। मधुमेह एवं हृदय रोगियों के लिए भी इनका भोजन आदर्श बताया गया है। जलवायु बदलाव से भविष्य में खाद्यान्न पैदावार में कमी की संभावना के मद्देनज़र भोजन में कुकुरमुत्तों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

चिकित्सा के क्षेत्र में भी ये काफी उपयोगी पाए गए हैं। होम्योपैथी की कई दवाइयों में एगेरिक का उपयोग किया जाता है। लायकोपरडॉन का उपयोग ड्रेसिंग के लिए मुलायम पट्टियां बनाने में किया जाता है। कई प्रजातियों से क्रमश: हृदय रोग एवं रक्तचाप नियंत्रण की दवाई बनाने के प्रयास जारी हैं। अमेरिका तथा जापान के राष्ट्रीय कैंसर शोध संस्थाओं ने ग्रिफोला-फानड्रोसा तथा एक अन्य प्रजाति में कैंसर-रोधी गुणों की खोज की है। यह संभावना भी व्यक्त की गई है कि गेनोडर्मा से एड्स, कैंसर एवं मधुमेह का उपचार संभव है। त्रिसुर (केरल) के अमाला कैंसर शोध संस्थान ने पाया कि गेनोडर्मा से बनाई दवा कीमोथेरेपी के साइड प्रभावों को कम कर देती है। उत्तर कोरिया के वैज्ञानिकों ने कुकुरमुत्तों की कुछ प्रजातियों से एक ऐसा पेय पदार्थ तैयार किया है जिसका सेवन खिलाड़ियों की थकावट को दूर कर तरोताज़ा बना देता है। पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसा पेय तैयार किया है जिसका सेवन लोगों को अवसाद से उबारकर स्फूर्ति प्रदान करता है। सोलन स्थित राष्ट्रीय मशरूम अनुसंधान केन्द्र में इसे सफलता पूर्वक उगाया गया है।

कुकुरमुत्तों का सेवन नशे के लिए किए जाने के भी प्रमाण मिले हैं। मेक्सिको के लोग एमेनिटा को खाकर आनंद की अनुभूति करते थे। एक अन्य कुकुरमुत्ते में मौजूद एल्केलाइड भी नशा पैदा करता है। कुकुरमुत्तों को देखकर, छूकर, सूंघकर या रंग देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि ये विषैले हैं या विषहीन। एक मान्यता है कि रंगीन विशेषकर बैंगनी कुकुरमुत्ते विषैले होते हैं। दूध का फटना भी विषैले कुकुरमुत्तों की एक पहचान बताई गई है।

और तो और, डिज़ाइनर व वास्तुकार फिलिप रॉस ने इनकी मायसीलियम से मज़बूत ईंट का निर्माण किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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