चींटियों को गिनना रात में तारे गिनने जैसा काम है। लेकिन छह शोधकर्ताओं ने यह काम कर दिखाया है। और उनके आंकड़ों के मुताबिक पूरी पृथ्वी पर तकरीबन 20 क्वाड्रिलियन (20,000,000,000,000,000) चींटियां हैं। अधिकांश लोगों के लिए यह संख्या कल्पना से परे होगी लेकिन हिंदी में कहें तो 1 क्वाड्रिलियन का मतलब होता है 1 करोड़ शंख या 1 पद्म (नाम तो सुना ही होगा)। इतनी चींटियों का बायोमास 1.2 करोड़ टन के करीब है। यह सभी जंगली पक्षियों और स्तनधारियों के मिले-जुले वज़न से अधिक है। इस संख्या का मतलब यह भी है कि पृथ्वी पर हर मनुष्य के लिए 25 लाख चींटियां हैं।
चींटियां हमारे पारिस्थितिक तंत्र की महत्वपूर्ण इंजीनियर हैं। वे मिट्टी को यहां-वहां करती हैं, बीजों को फैलाती हैं, जैविक पदार्थों का पुनर्चक्रण (री-सायकल) करती हैं। दुनिया भर में चींटियां किस तरह से फैली हैं यह समझने के लिए कुछ शोध हुए हैं, लेकिन पृथ्वी पर कुल कितनी चीटियां रहती हैं इसका कोई ठीक-ठीक अनुमान नहीं था।
इसलिए शोधकर्ताओं ने विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध तकरीबन 12,000 रिपोर्ट्स को खंगाला (इनमें बल्गेरियाई और इन्डोनेशियाई जैसी भाषाएं भी शामिल थीं)। इसमें से उन्होंने उन 489 अध्ययनों का डैटा लिया जो चींटियों को इकट्ठा करके गिनने के गहन तरीकों पर केन्द्रित थे।
विश्लेषण के उपरांत शोधकर्ता आश्चर्यचकित रह गए कि चींटियां उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सर्वाधिक संख्या में रहती हैं। खास तौर से सवाना और नमी वाले जंगलों में इनकी बहुलता थी।
प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में शोधकर्ता बताते हैं कि ये अनुमान पूर्व में लगाए गए अनुमानों से दो से 20 गुना अधिक है। और इस अनुमान के सटीक होने की संभावना अधिक है, क्योंकि इसकी गणना दुनिया भर में पकड़ी गई चींटियों की वास्तविक संख्या के आधार पर की गई है। इसके पूर्व के अनुमान इस मान्यता के आधार पर लगाए गए थे कि पृथ्वी पर चीटियों की संख्या कुल कीटों की एक प्रतिशत है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस अध्ययन की एक सीमा यह रही कि उनके पास हर जगह का समान रूप से वितरित डैटा नहीं था। अधिकतर डैटा भूमि की ऊपरी सतह का डैटा था; पेड़-पौधों पर बसने वाली, और ज़मीन में गहराई पर रहने वाली चीटियों का डैटा कम था। (स्रोत फीचर्स)
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वैज्ञानिक इस बात से तो सहमत हैं कि ऊंट का दूध मनुष्य तथा गाय के दूध से किसी मामले में कम नहीं है। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि ऊंट के दूध में एंटी-डायबेटिक, एंटी-हाइपरटेंसिव, एंटी-माइक्रोबियल व एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं।
देखा गया है कि मधुमेह रोगियों द्वारा ऊंट के दूध का लंबी अवधि तक सेवन इंसुलिन की ज़रूरत कम करने में सहायक होता है। ऊंटनी का दूध ऐतिहासिक रूप से अपने औषधीय और अन्य गुणों के लिए जाना जाता है। इन गुणों को लेकर कई अनुसंधान पत्र प्रकाशित हुए हैं। शोध बताते हैं कि यह मधुमेह और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकारों से सम्बंधित बीमारियों के लिए अत्यंत लाभकारी पाया गया है। हाल के एक अनुसंधान से पता चला है कि ऊंट का दूध जीवाणुरोधी, एंटीवायरल, एंटीऑक्सिडेंट, कैंसर-रोधी तथा हाइपोएलर्जेनिक गुणों से संपन्न है।
इसके अलावा, ऊंट के दूध ने लैक्टोज़ टॉलरेंस के कारण लोगों के लिए एक वैकल्पिक डेयरी उत्पाद के रूप में लोकप्रियता हासिल की है। एक नई शोध समीक्षा के अनुसार ऊंट के दूध को गाय के दूध से बेहतर माना गया है क्योंकि इसमें लैक्टोज़, संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल कम होते हैं। इसमें असंतृप्त वसीय अम्ल भी अधिक होते हैं तथा 10 गुना अधिक लौह और 3 गुना अधिक विटामिन सी होता है।
वैसे तमाम वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ आम तौर पर कई उच्च जोखिम के कारण सामान्य रूप से कच्चे दूध का सेवन करने की सलाह नहीं देते हैं। कच्चे दूध का सेवन संक्रमण, गुर्दे की निष्क्रियता और यहां तक कि आक्रामक संक्रमण से मौत का कारण बन सकता है। विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली आबादी, गर्भवती महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, वयस्कों में प्रतिरक्षा सम्बंधी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। अध्ययनों से पता चला है कि ऊंट के दूध में ऐसे जीवाणु पाए गए हैं जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं। इसलिए गंभीर संक्रमण की घटनाएं तब पाई जाती हैं जब ऊंट के दूध का सेवन बिना पाश्चरीकरण के किया जाता है।
हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात में ऊंटनी के दूध की खपत के पैटर्न और वयस्कों के बीच कथित लाभों और उसके नुकसान सम्बंधी कुछ महत्वपूर्ण अध्ययन किए गए थे। इस अध्ययन के तहत एक प्रश्नावली के माध्यम से 852 वयस्कों से जानकारी ली गई। प्रश्नावली में सामाजिक-जनसांख्यिकीय विशेषताओं से लेकर ऊंट के दूध की खपत के पैटर्न और कच्चे ऊंट के दूध के लाभों और जोखिमों के कथित ज्ञान की जांच की गई। पता चला कि 60 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ऊंटनी का दूध आज़माया है, लेकिन मात्र एक चौथाई ही नियमित रूप से सेवन करते थे। अध्ययन में दूध के बाद सबसे ज़्यादा खपत ऊंट के दही और विशेष स्वाद तथा महक वाले वाले दूध की रही। ऊंट के दूध की उपभोग परीक्षण में शहद, हल्दी और चीनी के साथ मिलाकर सेवन करने वालों का प्रतिशत अधिक था। अधिकांश उपभोक्ता (57 प्रतिशत) रोज़ाना एक कप से कम ऊंटनी के दूध का सेवन करते हैं। 64 प्रतिशत लोग ऊंट के दूध को उसकी पौष्टिकता के कारण, जबकि 40 प्रतिशत चिकित्सकीय गुणों के कारण पसंद करते थे।
वैश्विक स्तर पर केन्या सालाना 11.65 लाख टन ऊंट के दूध का उत्पादन कर अव्वल है। इसके बाद सोमालिया 9.58 लाख टन और माली 2.71 लाख टन उत्पादन करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि केन्या के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में जनजातियां लगभग 47.22 लाख ऊंट पालती हैं जो विश्व की ऊंट आबादी का लगभग 80 प्रतिशत है। वर्ष 2020 में गल्फ कॉर्पोरेट काउंसिल (जीसीसी) ने ऊंट के दूध के व्यवसाय से 50.23 लाख अमेरिकी डॉलर की कमाई की और वर्ष 2026 तक 7.1 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है। संयुक्त अरब अमीरात में ऊंट के दूध के कई उत्पाद बाजार में हैं – जैसे ताज़ा दूध, सुगंधित दूध, दूध पाउडर, घी, दही, छाछ आदि।
भारत समेत विभिन्न देश ऊंट के दूध का उत्पादन और विपणन करने के नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। हमारे देश में ऊंट के दूध का उत्पादन एवं बिक्री करने के लिए अमूल, आदविक जैसे कई बड़े दुग्ध उत्पादक सामने आए हैं। भारत में ऊंटनी के दूध का बाज़ार अभी धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की कुल वार्षिक आपूर्ति में गाय का दूध 85 प्रतिशत, भैंस का दूध 11 प्रतिशत, बकरी का दूध 3.4 प्रतिशत, भेड़ का दूध 1.4 प्रतिशत और ऊंट का दूध मात्र 0.2 प्रतिशत ही है।
गौरतलब है कि भारत में ऊंटों की आबादी में लगातार गिरावट आ रही है क्योंकि अब परिवहन या खेती के लिए इनकी आवश्यकता नहीं है। इतना ही नहीं, खेती तथा अन्य व्यवसाय के लिए खरीदकर मांस के लिए इनका उपयोग किया जाता है। 20वीं पशुधन गणना (2019) के अनुसार ऊंटों की आबादी में 37.5 प्रतिशत की गिरावट आई है।
अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के लोग सदियों से दूध के लिए ऊंटों पर निर्भर हैं। अब, संयुक्त राज्य अमेरिका में ऊंट के दूध की खपत बढ़ रही है और मांग आपूर्ति से आगे निकल चुकी है।
2012 में अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने ऊंट के दूध की बिक्री की अनुमति दी। लेकिन बिक्री के लिए कानूनी निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। ऊंट के दूध को निश्चित तौर पर पाश्चरीकृत होना चाहिए।
डेयरी उद्योग के एक जानकार के अनुसार ऊंट के दूध बाज़ार में वर्ष 2022-2027 के दौरान 3.1 प्रतिशत वृद्धि की आशा है और 2027 के अंत तक 8.6 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
अगर देखा जाए तो आज भारत में ऊंटों के नस्ल संरक्षण और संवर्धन की नई राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है। इस नियम में अवैध परिवहन और वध पर प्रतिबंध का प्रावधान किया जाना चाहिए। साथ ही साथ, ऊंटों के लिए चारागाह की व्यवस्था ज़रूरी है। ऊंट के दूध के वितरण के लिए स्थापित डेयरी उद्योग के विकास की नीति ज़रूर शामिल करनी चाहिए। इस संदर्भ में राजस्थान में ऊंट दूध कोऑपरेटिव प्रणाली वर्ष 2010 में आरंभ की गई थी। (स्रोत फीचर्स)
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दीपावली पर आतिशबाज़ी में अंधाधुंध पटाखे जलाए जाते है जिससे हमारे पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान होता है। यही वजह है कि दीपावली के दौरान और इसके बाद वातावरण में प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।
पटाखों में मुख्य रूप से सल्फर के यौगिक मौजूद होते हैं। इसके अतिरिक्त भी पटाखों में कई प्रकार के बाइंडर्स, स्टेबलाइज़र्स, ऑक्सीडाइज़र, रिड्यूसिंग एजेंट और रंग मौजूद होते हैं। रंग-बिरंगी रोशनी पैदा करने के लिए एंटीमनी सल्फाइड, बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमीनियम, तांबा, लीथियम, स्ट्रॉन्शियम वगैरह मिलाए जाते हैं।
दीपावली का त्योहार अक्टूबर/नवंबर में आता है और इस समय भारत में कोहरे का मौसम रहता है। इस वजह से यह पटाखों से निकलने वाले धुएं के साथ मिलकर प्रदूषण के स्तर को और भी ज़्यादा बढ़ा देता है। पटाखों से निकलने वाले रसायन अल्ज़ाइमर तथा फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां का कारण बन सकते हैं। प्रदूषण का प्रभाव बड़ों की तुलना में बच्चों पर शीघ्र और ज़्यादा पड़ता है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक वायु प्रदूषण शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंचा सकता है।
पटाखों में विभिन्न रंगों की रोशनी के लिए अलग-अलग रसायन मिलाए जाते हैं जो पर्यावरण व समस्त जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचाते है।
एल्युमिनियम का प्रदूषण त्वचा सम्बंधी रोग का कारण बनता है। सोडियम, मैग्नीशियम और ज़िंक का प्रदूषण मांशपेशियों को कमज़ोर करता है। कैडमियम रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है, एनीमिया की संभावना बढ़ाता है। स्ट्रॉन्शियम कैल्शियम की कमी पैदा करके हड्डियों को कमज़ोर करता है। सल्फर सांस की तकलीफ पैदा करता है। और तांबा श्वसन नली में परेशानी पैदा करता है।
पटाखा
जलाने का समय(मिनट में)
PM 2.5 की मात्रा(माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर)
फुलझड़ी
2
10,390
सांप की गोली
3
64,500
हंटर बम
3
28,950
अनार
3
4,860
चकरी
5
9,490
लड़ (1000 बम वाली)
6
38,450
वर्ष 2016 में पुणे के चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन द्वारा अलग-अलग पटाखों से कितना प्रदूषण होता है इसका अध्ययन किया गया था। इसमें पाया गया था विभिन्न पटाखों को जलाने पर अलग-अलग मात्रा में 2.5 माइक्रॉन के कण (PM 2.5) उत्पन्न होते हैं। यह जानकारी तालिका में देखें।
जले हुए पटाखों के टुकड़ों से भूमि प्रदूषण की भी समस्या उत्पन्न होती है। पटाखों के कई टुकड़े बायोडीग्रेडेबल नहीं होते, जिस वजह से इनका निस्तारण आसानी से नहीं होता तथा समय बीतने पर ये और भी अधिक विषैले होते जाते हैं और भूमि को प्रदूषित करते हैं।
दिल्ली में हर वर्ष सितंबर महीने के आखिर से दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता खराब होने लगती है क्योंकि इस समय हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसान पराली जलाते हैं। साथ ही यह समय आतिशबाज़ी का होता है। इसलिए दिल्ली सरकार ने पटाखों के उत्पादन, भंडारण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा दी है। राजधानी दिल्ली में पिछले साल भी पटाखों की बिक्री और आतिशबाज़ी पर प्रतिबंध था किंतु उसके बावजूद लोगों ने पटाखे फोड़े थे। पिछले साल यानी वर्ष 2021 में दिवाली के अगले दिन दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 462 था जो कि पिछले 5 साल में सबसे बुरा था। एयर क्वालिटी इंडेक्स के 462 होने का मतलब है कि दिल्ली में हवा गंभीर से अधिक खतरनाक स्तर पर प्रदूषित थी।
प्रदूषण की समस्या को कम करने के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) द्वारा हरित पटाखे बनाए गए हैं। हरित पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण कम होता है। अलबत्ता, लोगों में हरित पटाखों को लेकर भ्रम है कि ये पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं, लेकिन अगर लोग हरित पटाखे अधिक जलाते हैं तो निश्चित ही त्योहारों के बाद प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के अनुसार सरकार को सभी परिवारों के लिए पटाखे खरीदने की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए ताकि लोग एक तय सीमा से अधिक इन पटाखों का इस्तेमाल ना कर सकें। यह विडंबना है कि लोग पटाखों से होने वाले दुष्प्रभावों को जानने के बाद भी इनका उपयोग करते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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गिबन छोटे शरीर और लंबी बाहों वाले, पेड़ों पर छलांग लगाने वाले कपि हैं जो उत्तरपूर्वी भारत, पूर्वी बांग्लादेश और दक्षिणपूर्वी चीन से लेकर इण्डोनेशिया के कई द्वीपों में पाए जाते हैं। लेकिन इनके उद्विकास की कहानी को समझना वैज्ञानिकों के लिए मुश्किल रहा है। अब, दक्षिण-पश्चिमी चीन के एक गांव के पास मिले एक जीवाश्म से बात कुछ पकड़ में आई है। इस जीवाश्म में ऊपरी जबड़े का हिस्सा और सात अलग-अलग दांत हैं। इससे इस पूर्व निष्कर्ष की पुष्टि हुई है कि सबसे पहले ज्ञात गिबन लगभग 70 से 80 लाख साल पहले इस इलाके में रहते थे।
चीन के कुनमिंग नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम ऑफ ज़ुऑलॉजी के पुरा-मानवविज्ञानी ज़्युपिंग जी और उनके साथियों का कहना है कि यह जीवाश्म और इस क्षेत्र व इसके पास के क्षेत्र से मिले 14 दांत युआनमोपिथेकस शाओयुआन नामक एक प्राचीन हाइलोबैटिड प्रजाति के हैं। हाइलोबैटिड्स कपियों का एक कुल है जिसमें वर्तमान गिबन्स की लगभग 20 प्रजातियां और पूर्वोत्तर भारत से इण्डोनेशिया तक के उष्णकटिबंधीय जंगलों में पाए जाने वाले सियामांग गिबन शामिल हैं।
2006 में वाई. शाओयुआन के बारे में पता चलने के बाद जी और उनके दल का मानना था कि यह एक प्राचीन गिबन है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए अतिरिक्त जीवाश्मों की आवश्यकता थी।
लगभग एक दशक पूर्व एक स्थानीय निवासी को वाई. शाओयुआन का ऊपरी जबड़े का हिस्सा मिला था। इस जबड़े में चार दांत और दाढ़ का कुछ हिस्सा था। इसकी मदद से शोधकर्ता यह समझ सके थे कि यह एक शिशु गिबन का जबड़ा है जो 2 वर्ष की उम्र के पूर्व ही मर गया था।
आधुनिक कपियों और प्राचीन प्राइमेट्स के जीवाश्मों की तुलना करने पर पाया गया कि वाई. शाओयुआन सबसे प्राचीन ज्ञात गिबन है। ये नतीजे दो साल पूर्व की एक रिपोर्ट को झुठलाते हैं जो कहती है कि उत्तरी भारत में हाइलोबैडिट कुल की लगभग 1.3 करोड़ वर्ष पुरानी दाढ़ मिली थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में मिला जीवाश्म कैपी रगनेगेरेंसिस प्रजाति का है जो दक्षिण एशियाई प्राइमेट्स के विलुप्त हो चुके समूह का है, और वह वर्तमान कपियों का करीबी सम्बंधी नहीं था।
वर्तमान प्राइमेट्स के पूर्व में किए गए डीएनए विश्लेषण से पता चलता है कि हाइलोबैटिड्स अफ्रीका में अन्य कपियों से लगभग 2.2 करोड़ से 1.7 करोड़ वर्ष पूर्व अलग हो गए थे। लेकिन यह अभी एक रहस्य ही है गिबन के पूर्वज युरेशिया कब पहुंचे। एशिया में वाई. शाओयुआन के साक्ष्य मिलने और अफ्रीका या उसके आसपास के क्षेत्रों में हाइलोबैडिट्स की उत्पत्ति के बीच लगभग एक करोड़ वर्ष का अंतर है।
आनुवंशिक साक्ष्य यह भी इंगित करते हैं कि वर्तमान गिबन प्रजातियों के साझा पूर्वज लगभग 80 लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर रहते थे, इसी समय वाई. शाओयुआन भी पृथ्वी पर निवास करते थे। तो हो सकता है कि इसके बाद के सभी गिबन्स के पूर्वज वाई. शाओयुआन हों, या यह भी हो सकता है कि आधुनिक गिबन के पूर्वज और वाई. शाओयुआन निकट सम्बंधी हों।
जर्नल ऑफ ह्यूमन इवॉल्यूशन में शोधकर्ता बताते हैं कि दांत की चबाने वाली सतह पर बने उभार और गढ्डों के निशान और दांतों व जबड़े की अन्य विशेषताएं काफी हद तक वर्तमान गिबन की तरह हैं। इसके अलावा वाई. शाओयुआन के अश्मीभूत दांत की कुछ विशेषताएं आधुनिक गिबन के दांतों की विशेषताओं की पूर्ववर्ती लगती हैं।
दाढ़ के आकार के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वाई. शाओयुआन का वज़न लगभग छह किलोग्राम था, यह भी आधुनिक गिबन्स के समान है। इनके दाढ़ की संरचना इंगित करती है कि यह भी वर्तमान गिबन की तरह मुख्यत: फल खाता था।
बहरहाल के. रगनेगेरेंसिस के विकास की कहानी अभी अस्पष्ट ही है क्योंकि इसका केवल एक ही दांत मिला है, जिसके आधार पर पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल है। (स्रोत फीचर्स)
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केकड़ों से लेकर इल्लियों तक कई सारे जीव अपने शिकारियों से बचने के लिए छद्मावरण (या छलावरण) की रणनीति अपनाते हैं। अब, एक नवीन अध्ययन में पाया गया है कि शिकारियों से इस लुका-छिपी में कुछ छद्मावरण अधिक प्रभावी होते हैं।
युनिवर्सिटी ऑफ कैंपिनास के व्यवहार और संवेदना पारिस्थितिकीविद जोआओ विटोर डी अलकैंतारा वियाना विभिन्न छद्मावरण रणनीतियों की तुलना करना चाह रहे थे। लेकिन इस विषय पर बहुत साहित्य उपलब्ध नहीं था। इसलिए उन्होंने और उनके दल ने वर्ष 1900 से लेकर जुलाई 2022 तक इस विषय पर प्रकाशित वैज्ञानिक शोधपत्रों को तलाशा। शोधकर्ताओं ने इनमें से 84 ऐसे अध्ययनों को चुना जिनमें कम से कम एक छद्मावरण रणनीति की बात की गई थी और यह देखा गया था कि शिकारी को छद्मावरणधारी शिकार को खोजने में कितना समय लगा, या छद्मावरणधारी शिकार पर शिकारियों ने कितनी बार हमला किया। टीम ने अपना विश्लेषण उन अध्ययनों तक सीमित रखा जिनमें छद्मावरणधारी शिकार की तुलना गैर-छद्मावरणधारी शिकार से की गई थी। ऐसे गैर-छद्मावरणधारी शिकार कृत्रिम थे।
इसके बाद, शोधकर्ताओं ने शिकार और शिकारियों के प्रकार और विभिन्न तरह की छद्मावरण रणनीतियों के आधार पर समूह बनाए। मसलन, किसी शिकार जीव के शरीर का रंग या पैटर्न पृष्ठभूमि से मेल खाए, या वह किसी ऐसी चीज़ जैसा नज़र आए जिसमें शिकारी की कोई रुचि न हो (जैसे किसी टहनी, या पत्ते, पक्षी की बीट या किसी मकड़ी की छोड़ी हुई त्वचा जैसा दिखना)। इस दूसरी रणनीति को स्वांग रचना कहा जाता है।
प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बी में शोधकर्ता बताते हैं कि छद्मावरण आम तौर पर शिकारियों के लिए अपने शिकार को ढूंढना मुश्किल बना देता है। इससे शिकारी द्वारा शिकार को ढूंढने में लगा समय लगभग 62 प्रतिशत तक बढ़ जाता है, और शिकारी द्वारा हमले की संभावना 27 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि शिकार कैसा है। उदाहरण के लिए, छद्मावरण से इल्लियों को उनके पंखों वाले वयस्क रूप (तितली या पतंगा) की तुलना में अधिक लाभ मिलता है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पतंगे और तितलियां उड़ सकती हैं और उनके पास अपने शिकारी से बचने के अन्य अनुकूलन हैं।
ब्रिमस्टोन मॉथ का टहनी जैसा दिखता कैटरपिलर
स्वांग रचने की रणनीति शिकार के शिकारी से बच निकलने में विशेष प्रभावी दिखी, इस रणनीति की मदद से शिकारी द्वारा शिकार खोजने के समय में लगभग 300 प्रतिशत की वृद्धि दिखी। इसका एक उम्दा उदाहरण है ब्रिमस्टोन मॉथ (ओपिस्टोग्रैप्टिस ल्यूटोलाटा) का कैटरपिलर, जो टहनी जैसा दिखता है। इस कैटरपिलर और मुर्गियों पर हुए एक अध्ययन में पता चला था कि यदि किसी मुर्गी का सामना हाल ही में किसी टहनी से हुआ हो तो उसे स्वांगधारी कैटरपिलर को ढूंढने में ज़्यादा समय लगता है।
लेकिन अन्य वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पर बारीकी से पड़ताल की ज़रूरत है कि स्वांग सबसे प्रभावी रणनीति है। यदि वास्तव में यही बात है तो अन्य अड़चनों – जैसे आकार, सरकने या चलने की ज़रूरत – की जांच करके देखना दिलचस्प होगा क्योंकि सभी जीवों में यह रणनीति विकसित नहीं होती। शोधकर्ताओं का कहना है कि स्वांग रचने की रणनीति विकसित होने की संभावना उन जीवों में अधिक है जहां शिकार जीव और जिसकी उसे नकल करना है दोनों का आकार बराबर हो। यह रणनीति हमेशा कारगर नहीं होगी।
एक दिक्कत यह है कि विभिन्न अध्ययनों में नियंत्रण के तौर पर लिए गए गैर-छद्मावरणधारी जीव बहुत अलग-अलग तरह के थे। इसलिए उन पर शिकारियों की प्रतिक्रिया कम-ज़्यादा हो सकती है। इसके अलावा, अध्ययन में अधिकतर डैटा उत्तरी गोलार्ध के अध्ययनों से था। दक्षिणी गोलार्ध के जीवों की छद्मावरण रणनीतियों की समझ के बिना हमारी समझ अधूरी है।
फिलहाल शोधकर्ता इसी अध्ययन को एक अलग तरह से करना चाहते हैं – वे देखना चाहते हैं यदि शिकारी छद्मावरण करें तो उन्हें कितना फायदा होता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5b/Opisthograptis_luteolata_9163.jpg/757px-Opisthograptis_luteolata_9163.jpg
कई भोज्य पदार्थों को हम बंद आंखों से सूंघ कर भी पहचान जाते हैं। हमारे शरीर से भी लगातार नाना प्रकार की गंध निकलती हैं। जब मादा मच्छर किसी मनुष्य की तलाश में होती है तो वह मनुष्य के शरीर से निकलने वाली गंध के एक अनोखे मिश्रण को सूंघती हैं। गंध मच्छरों के स्पर्शक (एंटीना) में उपस्थित ग्राहियों को उत्तेजित करती है और मच्छर हमें अंधेरे में भी खोज लेते हैं। यदि मच्छरों में गंध के ग्राही ही न रहें तो क्या मच्छर इंसानों की गंध को नहीं सूंघ पाएंगे? तब क्या हमें मच्छरों और उनसे होने वाले रोगों से निजात मिल पाएगी?
हाल ही में वैज्ञानिकों ने मच्छरों पर ऐसे ही कुछ प्रयोग किए। उन्होंने मच्छरों के जीनोम (डीएनए) में से गंध संवेदी ग्राहियों के लिए ज़िम्मेदार पूरे जीन समूह को ही निकाल दिया। किंतु अनुमान के विपरीत पाया गया कि गंध संवेदी ग्राहियों के अभाव के बावजूद मच्छर हमें ढूंढकर काटने का तरीका ढूंढ लेते हैं। मानव शरीर की गर्मी भी उन्हें आकर्षित करती है।
अधिकांश जंतुओं के घ्राण (गंध संवेदना) तंत्र की एक तंत्रिका कोशिका केवल एक प्रकार की गंध का पता लगा सकती हैं। लेकिन एडीज एजिप्टी मच्छरों की केवल एक तंत्रिका कोशिका भी अनेक गंधों का पता लगा सकती है। इसका मतलब है कि यदि मच्छर की कोई तंत्रिका कोशिका मनुष्य-गंध का पता लगाने की क्षमता खो देती है, तब भी मच्छर मानव की अन्य गंधों को पहचानने की क्षमता से उन्हें खोज सकते हैं। हाल ही में शोधकर्ताओं के एक दल ने 18 अगस्त को सेल नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि यदि मच्छर में मानव गंध का पता लगाने वाले कुछ जीन काम करना बंद भी कर दें तो भी मच्छर हमें सूंघ सकते हैं। अतः ज़रूरत हमें किसी ऐसी गंध की है जिसे मच्छर सूंघना पसंद नहीं करते हैं।
प्रभावी विकर्षक (रेपलेंट) मच्छरों को डेंगू और ज़ीका जैसे रोग पैदा करने वाले विषाणुओं को प्रसारित करने से रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। किसी भी अन्य जंतु की तुलना में मच्छर इंसानी मौतों के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेदार हैं। जितना बेहतर हम मच्छरों को समझेंगे उतना ही बेहतर उनसे बचने के उपाय खोज सकेंगे।
मच्छर जैसे कीट अपने स्पर्शक और मुखांगों से सूंघते हैं। वे अपनी घ्राण तंत्रिका की कोशिकाओं में स्थित तीन प्रकार के सेंसर का उपयोग करके सांस से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड तथा अन्य रसायनों से मनुष्य का पता लगा लेते हैं।
पूर्व के शोधकर्ताओं ने सोचा था कि मच्छर के गंध ग्राही को अवरुद्ध करने से उनके मस्तिष्क को भेजे जाने वाले गंध संदेश बाधित हो जाएंगे और मच्छर मानव को गंध से नहीं खोज पाएंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ग्राही से वंचित मच्छर फिर भी लोगों को सूंघ सकते हैं और काटते हैं।
यह जानने के लिए रॉकफेलर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एडीज़ इजिप्टी नामक मच्छर की तंत्रिका कोशिकाओं में फ्लोरोसेंट लेबल जोड़े ताकि गंध को पहचानने की क्रियाविधि को समझा जा सके। हैरान करने वाली बात यह थी कि एक-एक घ्राण तंत्रिका कोशिका में कई प्रकार के सेंसर होते हैं और वे संवेदी केंद्रों के समान कार्य कर रहे थे।
वैज्ञानिकों ने मनुष्यों में पाए जाने वाले तथा मच्छरों को आकर्षित करने वाले विभिन्न रसायनों (ऑक्टेनॉल, ट्राइथाइल अमीन) के उपयोग से तंत्रिका कोशिका में विद्युत संकेत उत्पन्न किए जो एक-दूसरे से भिन्न थे।
यह स्पष्ट नहीं है कि लोगों की गंध का पता लगाने के लिए क्यों मच्छर अतिरिक्त तरीकों का उपयोग करते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति की गंध दूसरे से अलग होती है। शायद इसलिए मानव की गंध को भांपने के लिए मच्छरों में यह तरीका विकसित हुआ है। (स्रोत फीचर्स)
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कोई पारिस्थितिक आवास यानी निशे पर्यावरणीय परिस्थितियों का उपयुक्त समूह होता है जिसमें कोई जंतु या पौधा फलता-फूलता है। एक पारिस्थितिक तंत्र के भीतर कई प्रकार के पारिस्थितिक आवास हो सकते हैं। जैव विविधता ऐसे ही आवासों का परिणाम है जिनमें वही प्रजातियां बसती हैं जो एकदम उनके अनुकूल हैं। उदाहरण के लिए, मरुस्थलीय पौधे शुष्क पारिस्थितिक आवास के लिए अनुकूल होते हैं क्योंकि उनमें अपनी पत्तियों में पानी जमा करके रखने की क्षमता होती है।
जब दुनिया की जलवायु बदलती है, तो मौजूदा प्रजातियों की अपने जैव-भौगोलिक आवासों में टिके रहने की क्षमता बदल सकती है। इस बात का कृषि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि हो सकता है कि सदियों से उम्दा परिणाम देने वाले तरीके और फसलें बदली परिस्थितियों के लिए उपयुक्त न रहें।
इस तरह के परिवर्तनों से कई चीज़ें बदलती हैं। जैसे, भोजन और पोषक तत्वों की उपलब्धता, शिकारियों और प्रतिस्पर्धी प्रजातियों की उपस्थिति वगैरह। अजैविक कारक भी पारिस्थितिक आवास को प्रभावित करते हैं। इनमें तापमान, उपलब्ध प्रकाश की मात्रा, मिट्टी की नमी आदि शामिल हैं।
मॉडलिंग
पारिस्थितिकी विज्ञानी ऐसी जानकारी का उपयोग संरक्षण प्रयासों के साथ-साथ भावी विकास के लिए करते हैं। अलबत्ता, संभव है कि पारिस्थितिक मापदंड आर्थिक वास्तविकताओं के साथ पूरी तरह मेल न खाएं। इन दो नज़रियों यानी पारिस्थितिकी और अर्थशास्त्र को जोड़ने के लिए, पारिस्थितिक आवास मॉडलिंग का उपयोग बदलते पारिस्थितिक परिदृश्यों के संदर्भ में आर्थिक व्यवहार्यता की जांच के लिए किया जा सकता है।
पारिस्थितिक आवास मॉडलिंग नई संभावनाओं की पहचान करने का एक साधन है – किसी मौजूदा प्राकृतवास के लिए संभावित नए निवासियों की पहचान के लिए, या ऐसे नए भौगोलिक स्थानों की तलाश के लिए जो वांछनीय वनस्पतियों के विकास के लिए उपयुक्त हों। मॉडलिंग में कंप्यूटर एल्गोरिदम की मदद से पर्यावरणीय डैटा की तुलना की जाती है और इस बारे में पूर्वानुमान लगाए जाते हैं कि किसी दिए गए पारिस्थितिक आवास के लिए आदर्श क्या होगा।
भौगोलिक रूप से दूर-दूर स्थित दो स्थानों की तुलना कीजिए। जैसे कर्नाटक के कूर्ग का मदिकेरी क्षेत्र और सिक्किम का गंगटोक। दोनों पहाड़ी इलाके हैं। मदिकेरी समुद्र तल से 1200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और गंगटोक 1600 मीटर की ऊंचाई पर। सालाना औसत वर्षा क्रमशः 321 से.मी. और 349 से.मी. होती है। शाम 5:30 बजे इन दो स्थानों की औसत सापेक्षिक आर्द्रता क्रमशः 76 प्रतिशत और 83 प्रतिशत रहती है। इन दोनों क्षेत्रों में कई और समानताएं भी हैं।
क्या, कहां उगाएं
अमित कुमार और उनके साथियों द्वारा साइंटिफिक रिपोर्ट्स में हाल ही में प्रकाशित पेपर में दर्शाया गया है कि भारत के भौगोलिक और कृषि अर्थशास्त्र के संदर्भ में पारिस्थितिक आवास मॉडलिंग का उपयोग किस तरह किया जा सकता है। पालमपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण उत्पाद केसर पर विचार करने के लिए मॉडलिंग रणनीतियों का इस्तेमाल किया है।
केसर का पौधा (क्रोकस सैटाइवस) भूमिगत तनों के माध्यम से लगाया जाता है जिन्हें घनकंद कहते हैं। माना जाता है कि यह यूनानी मूल का पौधा है, और भूमध्यसागरीय जलवायु परिस्थितियों में सबसे बेहतर फलता-फूलता है। वर्तमान में, ईरान विश्व के लगभग 90 प्रतिशत केसर का उत्पादन करता है। केसर के पौधे के फूल में चटख लाल रंग की तीन वर्तिकाएं होती हैं, जिन्हें परिपक्व होने पर तोड़ (चुन) लिया जाता है। व्यावसायिक केसर बनाने के लिए इन्हें सावधानीपूर्वक सुखाया जाता है। खाने में स्वाद बढ़ाने के अलावा केसर के और भी कई उपयोग हैं। प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथों में तंत्रिका तंत्र के विकारों से निपटने के लिए इसके उपयोग की सलाह दी गई है। और, हाल ही में टोथ व उनके साथियों द्वारा किए गए क्लीनिकल परीक्षणों में पता चला है कि हर दिन 30 मिलीग्राम केसर का सेवन अवसाद-रोधी का काम करता है (प्लांटा मेडिका, 2019)। इसके कुछ रासायनिक घटकों में कैंसर-रोधी गुण भी पाए गए हैं।
भारत विश्व का 5 प्रतिशत केसर उत्पादन करता है। ऐतिहासिक रूप से, दुनिया के कुछ सबसे बेशकीमती केसर काश्मीर की प्राचीन झीलों के पेंदे में उगाए जाते थे। जम्मू-काश्मीर केसर की खेती के लिए कई तरह से अनुकूल है – समशीतोष्ण जलवायु, उच्च पीएच (6.3-8.3) वाली शुष्क मिट्टी, गर्मियों में (जब फूल खिलते हैं) लगभग 25 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान व मिट्टी में पोषक तत्वों की अच्छी उपलब्धता।
अधिक डैटा का उपयोग
अधिक डैटा के लिए भारतीय शोधकर्ताओं ने विश्व स्तर पर उपलब्ध सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किया है। जम्मू-काश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में केसर की खेती वाले क्षेत्रों की तुलना दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केसर की खेती करने वाले 449 स्थानों से की गई जो ग्लोबल बायोडायवर्सिटी इफॉर्मेशन फेसिलिटी में दर्ज हैं। पर्यावरण सम्बंधी डैटा WorldClim पोर्टल से लिया गया, जो धूप से लेकर हवा की गति समेत 103 कारकों का डैटा उपलब्ध कराता है। भू-आकृति सम्बंधी डैटा (जैसे ढलान, रुख और ऊंचाई) स्पेस शटल रडार टोपोग्राफी मिशन के डिजिटल एलिवेशन मॉडल से लिया गया। इनके विश्लेषण के आधार पर भारत में केसर उगाने के लिए संभावित उपयुक्त क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है।
अध्ययन में कुल 4200 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र केसर की खेती के लिए उपयुक्त पाया गया, जो जम्मू-काश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी सिक्किम, इम्फाल, मणिपुर और तमिलनाडु के उडगमंडलम में है। इनमें से कुछ जगहों पर दो मौसमों में परीक्षण के तौर पर केसर उगाने पर तकरीबन राष्ट्रीय औसत उपज (प्रति हैक्टर 2.6 किलोग्राम) के बराबर केसर उत्पादन हुआ। तो क्या इन नए क्षेत्रों में केसर नियमित रूप से उगाई जा सकेगी? आर्थिक दृष्टि से तो जवाब हां ही होगा। (स्रोत फीचर्स)
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पूर्वी बोर्नियो के घने जंगल में स्थित लियांग टेबो नामक गुफा की खुदाई में मिले लगभग 31,000 साल पुराने कंकाल ने शोधकर्ताओं को थोड़ा हैरत में डाल दिया था। हैरानी की वजह थी कि यह पूरा का पूरा कंकाल साबु त था लेकिन इसका सिर्फ बाएं पैर का निचला हिस्सा गायब था। पड़ताल करने पर शोधकर्ताओं ने इसे शल्य क्रिया द्वारा किया गया अंग-विच्छेद पाया। यह 31,000 साल पहले तब किया गया था जब आधुनिक समय के समान शल्य चिकित्सा उपकरण, एंटीबायोटिक या दर्द निवारक दवाएं नहीं थीं। इससे पता चलता है कि उस समय के दक्षिण पूर्वी एशिया में रहने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता चिकित्सा विशेषज्ञता के तो धनी थे ही उनमें अपने साथियों के प्रति हमदर्दी भी हुआ करती थी।
ईस्ट कालीमंतन कल्चरल हेरिटेज प्रिज़र्वेशन सेंटर की पुरातत्वविद एंडिका आरिफ द्राजत प्रियत्नो और उनके साथियों ने 2020 में गुफा के फर्श की खुदाई करना शुरू किया तो उन्हें एक मानव कंकाल मिला। इसे पारंपरिक रीति से दफन किया गया था जिसमें दाएं घुटने को मोड़कर सीने से सटा दिया जाता है और बाईं टांग को सीधा रखा जाता है। उसके सिर और हाथ के ऊपर पत्थर इस तरह रखे थे जैसे कि वे कब्र की निशानी हों। कंकाल का लिंग तो निर्धारित नहीं किया जा सका लेकिन जिस समय उसकी मृत्यु हुई थी उस समय उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष रही होगी। उसके सिर के पास थोड़ी-सी गेरू मिट्टी भी दफन थी। इससे लगता है कि गुफा की दीवारों पर बने भित्ति चित्र उसी कबीले के लोगों ने बनाए होंगे।
कंकाल को पूरी तरह निकालने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि कंकाल में सिर्फ बाएं पैर की पिंडली से नीचे का हिस्सा गायब था, लेकिन बाकी कंकाल साबुत था। पिंडली में दो हड्डियां होती हैं और उस कंकाल में ये दोनों नीचे की ओर जुड़ी हुई थीं। और टांग सपाट तरीके से कटी हुई थी। ऐसा नहीं लगता था कि वह हिस्सा कुचला गया था या चकनाचूर हो गया था – अर्थात पैर का वह हिस्सा कोई चट्टान गिरने या किसी जानवर के काटने से नहीं कटा था बल्कि किसी धारदार औज़ार से सफाई से काटा गया था। दूसरे शब्दों में इस हिस्से की सर्जरी की गई थी।
कब्र के ठीक ऊपर और नीचे की तलछट परतों में चारकोल की रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि यह कब्र लगभग 31,000 साल पुरानी है। एक अन्य तकनीक – इलेक्ट्रॉन स्पिन रेज़ोनेंस डेटिंग – से कंकाल का काल निर्धारण करने पर वह भी इतने ही पुराने होने की पुष्टि करता है।
इन साक्ष्यों के आधार पर नेचर में शोधकर्ता बताते हैं कि सफल अंग-विच्छेद का यह अब तक का सबसे प्राचीन मामला है। इसके पहले, वर्तमान फ्रांस में शल्य-क्रिया द्वारा अंग-विच्छेद (कंधे के नीचे की बांह काटने) का लगभग 7000 साल पूर्व का मामला मिला था।
शोधकर्ता यह तो ठीक-ठीक नहीं बता सके हैं कि वास्तव में अंग काटने की ज़रूरत क्यों पड़ी थी – किसी बीमारी या संक्रमण की वजह से या अचानक किसी तेज़ आघात की वजह से। लेकिन पिंडली की हड्डियों के जुड़े होने की दशा के आधार पर उनका कहना है कि शल्य-क्रिया के बाद वह मनुष्य 6 से 9 साल और जीवित रहा होगा/होगी। जिस क्षेत्र में यह कंकाल पाया गया है वह उष्णकटिबंधीय क्षेत्र है; घाव या चोट पर संक्रमण तेज़ी से फैलता है, बिना एंटीसेप्टिक के उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। शोधकर्ताओं का कहना है ऐसे वातावरण में सफल शल्य क्रिया का मतलब है कि उन लोगों के पास शल्य-क्रिया और उसके उपरांत आने वाली समस्याओं से निपटने का ज्ञान था। और, बोर्नियो की समृद्ध जैव विविधता में चिकित्सकीय गुणों वाली वनस्पतियां भरपूर हैं। वे लोग इस क्षेत्र में हजारों सालों से रहते आए थे, तो संभावना है कि वे स्थानीय पौधों के औषधीय गुणों से परिचित रहे होंगे। (स्रोत फीचर्स)
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तिब्बत के पठारों की ऊंचाई पर अधिकतर लोगों को सांस लेने में दिक्कत होती है, सिरदर्द होता है, लेकिन भारी भरकम याक वहां दौड़ भी लगा ले तो उसे कोई परेशानी नहीं होती। अब, शोधकर्ताओं ने याक में एक ऐसी नई कोशिका खोजी है जो इन बैलनुमा प्राणियों को ठंडी और कम ऑक्सीजन वाली जगहों पर भी इतना फुर्तीला रहने में मदद करती है।
काफी समय से वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि याक, कुछ मनुष्यों और कुत्तों में कुछ ऐसे आनुवंशिक अनुकूलन होते हैं जो उन्हें बहुत अधिक ऊंचाई पर मज़े से जीवित रहने में मदद करते हैं। लेकिन नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हालिया अध्ययन में बताया गया है कि याक के फेफड़ों में कुछ विशेष कोशिकाएं भी होती हैं जो उन्हें अधिक ऊंचाई पर अतिरिक्त फुर्ती देती हैं।
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने याक के डीएनए की तुलना उनके उन करीबी सम्बंधी मवेशियों के डीएनए से की जो कम ऑक्सीजन वाले स्थानों के लिए अनुकूलित नहीं थे। तुलना में उन्हें डीएनए के ऐसे हिस्से मिले जहां से उद्विकास के दौरान ये प्राणि अलग-अलग राह पर निकल गए थे। ये अंतर किसी जीन के कार्य में ऐसे फेरबदल की ओर इशारा करते हैं जिसने याक को उसके अल्प-ऑक्सीजन पर्यावरण के अनुकूल होने में मदद की।
जब शोधकर्ताओं ने याक के फेफड़ों की प्रत्येक कोशिका में जीन के कार्य का अध्ययन किया तो उन्हें रक्त वाहिनियों के अस्तर में एक बिल्कुल ही अलग तरह की कोशिका मिली। फेफड़ों की अन्य कोशिकाओं से तुलना करने पर देखा गया कि इन कोशिकाओं में दो परिवर्तित जीन बहुत अधिक सक्रिय थे। शोधकर्ताओं को लगता है कि याक के फेफड़ों की ये कोशिकाएं उनकी रक्त वाहिनियों को मज़बूत और अधिक तंतुमय बनाती है, जो हवा में अपेक्षाकृत कम ऑक्सीजन में भी सांस लेने को सुगम बनाता है।
शोधकर्ताओं को लगता है कि इसी तरह की विशिष्ट कोशिकाएं ऊंचाई पर पाए जाने वाले एंटीलोप और हिरणों में भी पाई जाएंगी। लेकिन ये कोशिकाएं मनुष्यों में मिलना संभव नहीं है; क्योंकि याक, एंटीलोप और हिरण लाखों वर्षों से अत्यधिक ऊंचाई पर रह रहे हैं और वहीं विकसित हुए हैं, जबकि मनुष्य तो महज़ 30,000 वर्षों की छोटी-सी अवधि से वहां रह रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)
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यह तो पता रहा है कि स्तनधारियों का मस्तिष्क हमेशा पूरी तरह जागृत या सुप्त नहीं होता है। जैसे, हो सकता है कि डॉल्फिन का आधा मस्तिष्क सो रहा हो जबकि बाकी आधा जागा हो। नींद से वंचित चूहों में कुछ तंत्रिकाएं सुप्त हो सकती हैं जबकि वे जागे होते हैं। मनुष्यों में इस तथाकथित ‘स्थानीय नींद’ का अध्ययन करना मुश्किल रहा है, क्योंकि अन्य स्तनधारियों की तरह मनुष्यों में इसके अध्ययन के लिए घुसपैठी तरीकों का उपयोग नहीं किया जा सकता।
अब PNAS में प्रकाशित एक अध्ययन ने इसे आसान कर दिया है। इसमें शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग तकनीकों का एक साथ उपयोग करके मानव मस्तिष्क संकेतों को देखा और स्थानीय स्तर पर तंत्रिकाओं के जागने या सोने की स्थिति पता की। इस तरह वे पहचान सके कि मस्तिष्क के कौन से क्षेत्र सबसे पहले सो जाते हैं और कौन से सबसे पहले जाग जाते हैं।
वैसे, मनुष्यों में नींद का अध्ययन इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (ईईजी) से किया जाता है। ईईजी तीव्र परिवर्तनों को मापने का अच्छा साधन है, लेकिन स्थान विशेष का सूक्ष्मता से अध्ययन करने में यह अच्छे परिणाम नहीं दे पाता। इसलिए कार्डिफ युनिवर्सिटी की चेन सोंग और उनके साथियों ने ईईजी के साथ fMRI (फंक्शनल मैग्नेटिक रेज़ोनेन्स इमेजिंग) का उपयोग किया। fMRI में तंत्रिकाओं की गतिविधि को रक्त प्रवाह के आधार पर नापा जाता है। fMRI छोटे और तीव्र परिवर्तनों को तो नहीं पकड़ पाता लेकिन मस्तिष्क की स्थानीय गतिविधियों को बारीकी से अलग-अलग देखने में मदद कर सकता है। शोधकर्ताओं ने देखा कि क्या ईईजी में दिखने वाले नींद के तंत्रिका संकेत fMRI से प्राप्त पैटर्न से मेल खाते हैं?
शोधकर्ताओं ने 36 लोगों की मस्तिष्क गतिविधि का विश्लेषण किया। इन्हें एक घंटे के लिए fMRI स्कैनर के अंदर ईईजी कैप पहनाकर सुलाया गया था। इस अवलोकन की तुलना ईईजी डैटा के साथ करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के विशिष्ट विद्युतीय पैटर्न fMRI से प्राप्त पैटर्न से मेल खाते हैं।
यह भी देखा गया कि पूरे मस्तिष्क में अलग-अलग स्थान और समय पर रक्त प्रवाह के अलग-अलग पैटर्न थे, जिससे लगता है कि कुछ हिस्से दूसरे हिस्सों की तुलना में पहले नींद में चले जाते हैं। उदाहरण के लिए, सबसे पहले थैलेमस वाले हिस्से में नींद से जुड़े रक्त प्रवाह पैटर्न दिखे। यह ईईजी डैटा के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों से मेल खाता है कि सोने की प्रक्रिया में थैलेमस वाला हिस्सा अन्य हिस्सों की तुलना में पहले सोता है।
प्रतिभागियों के जागने के दौरान मस्तिष्क की गतिविधि के अलग पैटर्न मिले। मसलन, संभवत: कॉर्टेक्स का अग्रभाग सबसे पहले जागता है। यह पूर्व निष्कर्षों से भिन्न है जो मूलत: जंतु अध्ययनों और सैद्धांतिक आधार पर निकाले गए थे। वैसे, सोंग स्वीकारती हैं कि fMRI स्कैनर के अंदर सोना अस्वाभाविक है और संभव है कि लोगों को बहुत हल्की नींद लगी हो जिसके कारण ऐसे अवलोकन मिले हैं। बहरहाल, नींद सम्बंधी विकारों पर हमारी समझ बनाने में fMRI तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। (स्रोत फीचर्स)
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