परिवर्तनशील रोबोट नए हुनर सीखते हैं

क्कीसवीं सदी के कारखानों से लेकर शल्य क्रिया कक्ष तक छोटे-बड़े, हर आकार-प्रकार के रोबोट्स से भरते जा रहे हैं। कई रोबोट्स मशीन लर्निंग के ज़रिए गलती कर-करके नए कौशल सीख लेते हैं। लेकिन हालिया दिनों में एक नई विधि ने अलग-अलग तरह के रोबोट्स में इस तरह के कौशल स्थानांतरित करने में काफी मदद की है। इस तकनीक से उनको हर कार्य शुरू से सिखाने की आवश्यकता नहीं होती है। कॉर्नेजी मेलन युनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक और इस अध्ययन के प्रमुख ज़िन्गयू ल्यू ने इसे इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन मशीन लर्निंग में प्रस्तुत किया है।

रोबोट्स के बीच कौशल स्थानांतरण को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपके पास एक रोबोटिक हाथ है जो हू-ब-हू मानव हाथ के समान है। आपने इसे पांचों अंगुलियों से हथौड़ा पकड़ने और कील ठोकने के लिए प्रशिक्षित किया है। अब आप इसी काम को दो-उंगलियों वाली पकड़ से करवाना चाहते हैं। इसके लिए वैज्ञानिकों ने इन दो हाथों के बीच क्रमिक रूप से बदलते रोबोट्स की एक शृंखला बनाई जो धीरे-धीरे मूल स्वरूप से अंतिम रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। प्रत्येक मध्यवर्ती रोबोट निर्दिष्ट कार्य का अभ्यास करता है जो एक कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क को सक्रिय कर देता है जब तक कि सफलता का एक स्तर हासिल नहीं हो जाता। अगले रोबोट में नियंत्रक कोड भेजा जाता है।

वर्चुअल स्रोत से लक्षित रोबोट में स्थानांतरण के लिए टीम ने एक ‘गति वृक्ष’ तैयार किया। जिसमें नोड्स भुजाओं के द्योतक हैं और उनके बीच की कड़ियां जोड़ों को दर्शाती हैं। हथौड़ा मारने के कौशल को दो-उंगली की पकड़ में स्थानांतरित करने के लिए टीम ने तीन उंगलियों के नोड्स के वज़न और आकार को शून्य कर दिया। इस तरह प्रत्येक मध्यवर्ती रोबोट की उंगलियों का आकार और वज़न थोड़ा छोटा होता गया और उनको नियंत्रित करने वाले नेटवर्क को समायोजित करना सीखना पड़ा। शोधकर्ताओं ने प्रशिक्षण पद्धति में ऐसे परिवर्तन किए कि सीखने की प्रक्रिया में रोबोट्स के बीच अंतर बहुत ज़्यादा या बहुत कम न हों।

वैज्ञानिकों ने इस सिस्टम को रिवॉल्वर (Robot-Evolve-Robot) नाम दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चंद्रमा पर पहुंचने की दौड़ में निजी क्षेत्र

जापानी कंपनी आईस्पेस द्वारा निर्मित एम1 लैंडर शायद चांद पर उतरने वाला पहला निजी यान होगा। इसे शीघ्र ही फ्लोरिडा स्थित केप कार्निवल से प्रक्षेपित किया जाएगा। इस लैंडर में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और जापानी स्पेस एजेंसी JAXA के मून रोवर्स सहित अन्य पेलोड भेजने की योजना है। मिशन सफल रहा तो ये दोनों देश अमेरिका, चीन और सोवियत संघ के साथ चंद्रमा पर उतरने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे।

एम1 को एक अन्य निजी कंपनी स्पेस-एक्स के रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। चंद्रमा तक पहुंचने के लिए यह एक घुमावदार मार्ग अपनाते हुए मार्च-अप्रैल 2023 में चांद पर उतरेगा।

इसके अलावा, टेक्सास स्थित इंट्यूटिव मशीन्स नामक यूएस फर्म के नोवा-सी मिशन को मार्च 2023 में प्रक्षेपित करने की योजना है। यह चंद्रमा तक पहुंचने के लिए सीधा रास्ता अपनाएगा और केवल 6 दिन का समय लेगा।      

एम1 वास्तव में पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करते हुए चंद्रमा तक पहुंचेगा इस तकनीक से कम ईंधन की आवश्यकता होगी और एम1 कम लागत में अधिक भारी पेलोड ले जा पाएगा।  

चंद्रमा के नज़दीक पहुंचने के बाद लैंडर चंद्रमा की परिक्रमा बढ़ते दीर्घवृत्ताकार पथ पर करेगा और फिर सीधे उर्ध्वाधर लैंडिंग करेगा। यह सबसे जोखिम भरा हिस्सा है। लैंडर को चंद्रमा के एटलस क्रेटर के निकट उतारने का लक्ष्य है। इस स्थल का चुनाव इसलिए किया गया है क्योंकि यह समतल है और बोल्डर-मुक्त है। लेकिन चंद्रमा से सम्बंधित डैटा की कमी के चलते नए स्थान पर लैंडर को उतारना काफी रोमांचक हो सकता है।

इस रॉकेट के माध्यम से मोहम्मद बिन राशिद स्पेस सेंटर द्वारा निर्मित राशिद रोवर भेजा जा रहा है। यूएई सरकार द्वारा निर्धारित 2024 की समय सीमा से काफी पहले राशिद रोवर रवाना हो रहा है। यह रोवर मात्र 50 सेंटीमीटर लंबा और 10 किलोग्राम वज़नी है। मिशन राशिद केवल एक चंद्र दिवस के लिए चलेगा जो पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर होता है। यह रोवर एआई एल्गोरिदम द्वारा निर्देशित होगा और इलाके की विशेषताओं की पहचान करेगा।  

रोवर के उपकरणों में चार लांगम्यूर प्रोब हैं जो चंद्रमा की सतह पर धूल की गति को प्रभावित करने वाले आवेशित कणों के तापमान और घनत्व की गणना करेंगे। राशिद में चार कैमरे भी लगाए गए हैं जिनमें से दो कैमरे पर्यावरण का निरीक्षण करेंगे, रेगोलिथ नामक एक माइक्रोस्कोपिक कैमरा चंद्रमा की मिट्टी का अध्ययन करेगा और एक थर्मल इमेजर कैमरा लैंडिंग साइट की भूगर्भीय विशेषताओं का अध्ययन करेगा। इसके अलावा ग्रैफीन आधारित कम्पोज़िट सामग्रियों के नमूने भी रोवर के पहियों में चिपकाए जाएंगे ताकि चंद्रमा के कठोर वातावरण में उनका परीक्षण किया जा सके। राशिद रोवर के प्रोजेक्ट मैनेजर हमद अल मर्ज़ूकी के अनुसार राशिद से प्राप्त डैटा भावी खोज में और रोवर तथा रोबोट के विकास को बेहतर बनाने में मददगार होगा।  

एम1 में एक दो पहिया JAXA रोबोट भी शामिल है जो केवल कुछ घंटों के लिए काम करेगा। एजेंसी के अनुसार यह रोवर चंद्रमा की सतह के चारों ओर चक्कर लगाकर डैटा एकत्रित करेगा जिसका उपयोग भविष्य के मानवयुक्त रोवर डिज़ाइन करने में किया जाएगा। इसके अलावा एम1 में एक 360-डिग्री कैमरा भी शामिल है जो जापानी फर्म एनजीके स्पार्क प्लग द्वारा निर्मित एक सॉलिड स्टेट बैटरी का परीक्षण करेगा।

आईस्पेस 2024 में एम2 को प्रक्षेपित करने की योजना भी बना रहा है। देखा जाए तो पिछले कुछ समय में कई राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियों और निजी कंपनियों के लिए चंद्रमा एक लोकप्रिय गंतव्य बन गया है। आईस्पेस के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी रयो उजी आईस्पेस और इसी तरह के अन्य कार्यक्रमों को चंद्रमा पर एक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए काफी महत्वपूर्ण मानते हैं। यह चंद्रमा पर जल दोहन की दिशा में एक कदम है। कुछ कंपनियों को उम्मीद है कि चंद्रमा पर उपस्थित पानी का उपयोग रॉकेट ईंधन के रूप में किया जा सकता है जिससे सौर मंडल की खोज को काफी सस्ता बनाया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मतदान में विकलांगजन की भागीदारी – सुबोध जोशी

लोकतांत्रिक प्रणाली का आधार चुनाव है और मतदान का अधिकार लोकतंत्र का एक मौलिक अधिकार है। हालांकि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों में इसे स्थान नहीं दिया गया है लेकिन यह वयस्क नागरिकों का एक अघोषित मौलिक अधिकार है।

लेकिन भारत में अधिकांश विकलांगजन अपने मताधिकार का उपयोग करने और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी करने से वंचित रह जाते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि वे मतदान करना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि अनेक प्रकार की बाधाएं उन्हें मतदान करने से दूर रखती हैं। हालांकि संविधान और विकलांगजन कानून उन्हें समानता प्रदान करते हैं और विकलांगजन कानून प्रत्येक दृष्टि से उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बाधामुक्त वातावरण विकसित करने की बात भी करता है।

दुर्भाग्यवश ज़मीनी स्तर पर सच्चाई बिलकुल विपरीत है। आज़ादी के 75 सालों बाद और 1995 में विकलांगजन के लिए पहला कानून आने से लेकर 2016 में नया कानून आ जाने के बावजूद गिने-चुने अपवादों को छोड़कर बाधामुक्त वातावरण आज भी भारत में एक दिवास्वप्न ही है। इस स्थिति के चलते विकलांगजन अपने विभिन्न अधिकारों का उपयोग करने और शिक्षा, रोज़गार, समाज की विभिन्न गतिविधियों आदि में भागीदारी करने से वंचित हैं। चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी से वंचित रहना उन्हीं में से एक है। जब हम भारत की बात करते हैं तो हमें ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों को मुख्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए जहां गैर-विकलांग व्यक्ति भी अनेक बाधाओं और कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। विकलांगजन तो और अधिक मुश्किलों का सामना करते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में सितंबर 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयोग ने पंजीकृत विकलांग मतदाताओं की संख्या 77.4 लाख बताई थी जबकि वर्ष 2019 में लोक सभा चुनाव के लिए पंजीकृत विकलाग मतदाताओं की संख्या 62.6 लाख थी। 2019 के लोक सभा निर्वाचन में मतदान केंद्रों पर दी गई सुविधाओं का असर कर्नाटक व हिमाचल प्रदेश में उल्लेखनीय रहा था। कर्नाटक में कुल 4.2 लाख पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से 80.12 प्रतिशत ने और हिमाचल प्रदेश में 74 प्रतिशत ने मताधिकार का उपयोग किया था। इसी प्रकार से, हाल ही में सम्पन्न विधान  सभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश के 56 हज़ार से ज़्यादा पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से लगभग 50 हज़ार ने मतदान किया।

चुनाव प्रक्रिया के संदर्भ में स्थिति यह है कि अधिकांश विकलांगजन मतदान केन्द्रों तक जा नहीं पाते हैं और वहां उनके अनुकूल इंतज़ाम भी नहीं होते हैं। उनकी अनेक व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। इनके कारण वे चाहकर भी अपने मताधिकार का उपयोग करने नहीं जा पाते हैं। बाधामुक्त वातावरण का अभाव उनके संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के हनन का कारण बनता है।

विकलांगजन के लिए घर से मतदान केंद्र तक जाकर मतदान करने का निर्णय लेना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए उन्हें अपनी विशिष्ट व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सुविधाओं के बारे में सोच-विचार करना पड़ता है। संभव है, ज़रूरी सुविधाएं जुटाने में वे मतदान के दिन सफल न हों। यहां तक कि अगर वे किसी तरह से जाकर मतदान करने का फैसला करते भी हैं तो उन्हें और उनके सहायकों को असहनीय मानसिक पीड़ा, अपमान और प्रक्रिया सम्बंधी कठिनाइयों से गुज़रना पड़ता है। इस वजह से उनमें से बहुत से लोग मतदान करने के लिए नहीं जाते हैं, हालांकि वे मतदान करना चाहते हैं। चुनाव आयोग द्वारा उन्हें मतदान केंद्र तक ले जाने की सुविधा और व्हीलचेयर प्रदान करना एक स्वागत योग्य पहल है और संभव है इससे कई विकलांग मतदाताओं को मदद मिलेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह की व्यवस्था या सुविधा प्रत्येक विकलांग मतदाता के लिए सुविधाजनक होगी और वह आसानी से मतदान कर सकेगा। वास्तव में कई विकलांग व्यक्ति अनजान सहायक की मदद से बाहर नहीं जा सकते और यह ज़रूरी नहीं है कि मतदान के दिन प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सहायक के साथ या प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वाहन और व्हीलचेयर में वे सहज महसूस करें।

आज जब भारत तेज़ी से टेक्नॉलॉजी इस्तेमाल की दिशा में कदम बढ़ा रहा है और डिजिटल इंडिया अभियान के ज़रिए अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा रहे हैं, तब टेक्नॉलॉजी के सहारे बहुत ही आसानी से विकलांगजन के लिए मतदान सुगम और संभव बनाया जा सकता है।

जैसे, मतदान के दिन विकलांग मतदाताओं को कहीं से भी मोबाइल या कम्प्यूटर के जरिए ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा प्रदान करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। जब डिजिटल आर्थिक लेन-देन सुरक्षित ढंग से किए जा सकते हैं, तो मतदान क्यों नहीं?

विकलांग मतदाताओं की सुविधा के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

1. विकलांगजन को अपने घर या जहां कहीं भी वे हों वहां से कंप्यूटर या मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। BHIM App की तरह यह सेवा बिना इंटरनेट काम करे, तो और बेहतर होगा। डिजिटल टेक्नॉलॉजी के कारण यह अत्यंत सरल और सुरक्षित व्यवस्था साबित होगी। अनेक विकलांगों के फिंगर प्रिंट बायोमेट्रिक मशीन पर नहीं आ पाते हैं, अतः इस तरह की अनिवार्यताएं ऑनलाइन वोटिंग में नहीं रखी जानी चाहिए। आधार कार्ड से सम्बंधित प्रक्रियाओं में देखी गई ऐसी अनेक कठिनाइयां मार्गदर्शक हो सकती हैं। 

2. विकलांगजन को डाक द्वारा मतदान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जो ड्यूटी पर तैनात शासकीय कर्मचारियों और सैनिकों को पहले से प्राप्त एक मान्य सुविधा है ।

3. विकलांगजन के साथ अति-वृद्धजन और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को भी इस तरह की सुगम मतदान सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

4. ऑनलाइन वोटिंग और डाक द्वारा मतदान की सुविधा दिए जाने के बावजूद बाधामुक्त वातावरण विकसित करने का कार्य तेज़ी से किया जाना चाहिए ताकि विकलांग मतदाता मतदान केंद्रों पर जाकर मतदान करने का विकल्प भी चुन सकें।

यदि ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध करा दी जाए तो विकलांग मतदाताओं के साथ-साथ अति-वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार मतदाता अपने मताधिकार का सरलता से उपयोग कर सकेंगे और लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। निकट भविष्य में कुछ महत्वपूर्ण विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इस दिशा में शीघ्र कदम उठाना मुनासिब होगा। (स्रोत फीचर्स)

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स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है पर्याप्त निद्रा – डॉ. आर. बी. चौधरी

साइंस डेली में छपे एक अध्ययन के अनुसार 5 घंटे से कम सोने से शरीर में कई बीमारी पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। दी न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, 50 साल की उम्र के आसपास पांच घंटे या उससे कम सोने वालों को सात घंटे सोने वालों की तुलना में कहीं अधिक बीमारियों घेर लेती हैं।

एक अध्ययन में पाया गया कि 50 प्रतिशत से कम नींद किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा खतरा हो सकती है। ब्रेन कम्यूनिकेशंस के अनुसार नींद की कमी से अल्ज़ाइमर विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार, वाशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भी बताया गया है कि नींद की गुणवत्ता का सीधा प्रभाव महिलाओं के मूड, उनकी महत्वाकांक्षा और करियर आगे बढ़ने पर पड़ता है। इसके विपरीत, नींद की गुणवत्ता पुरुषों की भावनाओं पर ज़्यादा असरकारी नहीं पाई गई।

कई सर्वेक्षणों में स्पष्ट हुआ है कि कोरोना की महामारी ने हमारे सोने के पैटर्न को गड़बड़ा दिया है। सोशल मीडिया कम्यूनिटी प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि अध्ययन में शामिल 52 प्रतिशत भारतीयों ने यह स्वीकार किया कि महामारी के बाद उनकी नींद के पैटर्न में बदलाव आया है।

प्रत्येक 2 भारतीयों में से 1 ने कहा कि उसे हर रात 6 घंटे से भी कम नींद आती है जबकि 4 में से 1 व्यक्ति 4 घंटे से कम सो रहा है। कोविड से प्रभावित लोग मानसिक और शारीरिक रूप से तनावग्रस्त होते हैं। यह काफी हद तक नींद के पैटर्न को प्रभावित करता है। मन में भय पैदा हो जाता है और ऐसे लोग अलग-थलग पड़ जाते हैं और सामान्य दिनचर्या नहीं व्यतीत कर पाते हैं। यह सब बहुत अधिक मानसिक दबाव के कारण होता है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि अगर कोई ठीक से नहीं सोता है तो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और मस्तिष्क की संज्ञानात्मक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अच्छी नींद तंदुरुस्ती बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। जिसके लिए रात का खाना समय पर लेना चाहिए और सोने तथा अंतिम भोजन के बीच कम से कम 2 घंटे का अंतराल होना चाहिए। सोने से कम से कम 1 घंटे पहले से मोबाइल फोन, लैपटॉप का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जिस बिस्तर पर सोते हैं उसे केवल सोने के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए; कार्यालय के काम के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दिन के दौरान झपकी से बचना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार रोज़ाना व्यायाम ज़रूरी है तथा हल्का भोजन करना चाहिए। अच्छी नींद के लिए शराब और कैफीन का सेवन नहीं करना चाहिए। ये सामाजिक सम्बंधों को प्रभावित कर सकते हैं और कार्डियोवैस्कुलर और चयापचय सम्बंधी जटिलताओं और बीमारियों में वृद्धि का कारण बन सकते हैं। इनसे शरीर में कमज़ोरी आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार घटती जाती है।

दिन का करीब एक तिहाई हिस्सा सोने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। 1950 के दशक से पहले, ज़्यादातर लोगों का मानना था कि नींद एक ऐसी अवस्था है जिसके दौरान शरीर क्रिया और मस्तिष्क निष्क्रिय रहता है। इस दौरान मस्तिष्क कई प्रक्रियाओं से गुज़रता है और मस्तिष्क में होने वाली गतिविधियों का सीधा सम्बंध हमारी दिनचर्या से होता है। शोधकर्ता इन प्रक्रियाओं के बारे में अधिक जानने की कोशिश कर रहे हैं ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। नींद पर अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सोते समय मस्तिष्क दो अलग-अलग प्रकार की निद्राओं के माध्यम से मस्तिष्क की प्रक्रिया के कई चक्रों को पूरा करता है। इसमें रैपिड-आई मूवमेंट (आरईएम) नींद और गैर-आरईएम नींद को प्रमुख माना जाता है।

इस चक्र का पहला भाग गैर-आरईएम नींद है, जो चार चरणों से बना है। पहला चरण जागने और सो जाने के बीच आता है। दूसरा है हल्की नींद, जब हृदय गति और श्वास नियंत्रित होते हैं और शरीर का तापमान गिर जाता है। तीसरा और चौथा चरण है गहरी नींद। हालांकि आरईएम नींद को पहले सीखने और स्मृति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता था, नए आंकड़ों से पता चलता है कि इन कार्यों के लिए गैर-आरईएम नींद अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही अधिक आरामदायक नींद और पुनर्स्थापना चरण की नींद भी शामिल है। जैसे ही कोई व्यक्ति नींद में जाता है तो आंखें बंद होने लगती हैं और आंखों की पुतलियां पलकों के पीछे तेज़ी से गति करती हैं। हालांकि, मस्तिष्क तरंगें जागृत अवस्था के समान होती हैं। जब कोई व्यक्ति सपना देखता है तो सांस की गति बढ़ जाती है और शरीर अस्थायी रूप से शून्य जैसी अवस्था में चला जाता है। यह चक्र कई बार दोहराया जाता है। इस प्रकार सामान्यत: रात में चार या पांच चक्र होते हैं।

अमेरिका की जॉन्स हापकिंस युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2014 में फ्रूट फ्लाई पर किए गए प्रयोगों के माध्यम यह पता लगाया था कि न सो पाने वाली फ्रूट फ्लाई के अंदर एक खास उत्परिवर्ती जीन नींद का नियंत्रण करता है। इस जीन को उन्होंने वाइड अवेक नाम दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह उत्परिवर्ती वाइड अवेक जीन जैविक घड़ी को अनियमित करके नींद उड़ाने का काम करता है। उन्होंने पाया था कि यह सामान्य वाइड अवेक जीन एक प्रोटीन बनाता है जो रात में नींद के लिए ज़िम्मेदार होता है और नींद के चक्र को नियंत्रित करता है।

इसी क्रम में यह भी पाया गया कि मनुष्यों और चूहों में भी ऐसा ही निद्रा जीन मौजूद होता है। हमारे अंदर एक जैविक घड़ी होती है जिसके द्वारा मस्तिष्क को समय की सूचना मिलती है। इसका काफी सम्बंध हमें मिलने वाले प्रकाश से होता है जैसे भोजन के बिना हमें भूख लगती है और उसकी आपूर्ति ज़रूरी हो जाती है, उसी प्रकार से नींद की कमी की दशा में पूरे दिन नींद की इच्छा बनी रहती है और हमें सोने की ज़रूरत महसूस होती है। अलबत्ता, नींद और भूख के बीच एक अंतर भी है। भूख लगने पर हमारा शरीर भोजन के लिए सीमा से परे मजबूर नहीं कर सकता है। लेकिन थका व्यक्ति सोने को बाध्य हो जाता है। आंखें अपने आप बंद होने लगती हैं। भले ही आंखें खुली हो लेकिन नींद पूरी न होने की दशा में कुछ मिनट के लिए झपकी मजबूरन आ जाती है। पर्याप्त नींद स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। (स्रोत फीचर्स)

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आठ अरब के आगे क्या?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार गत 15 नवंबर को दुनिया की आबादी 8 अरब हो गई है, और वृद्धि जारी है। वैसे, जनसंख्या वृद्धि के संदर्भ में अलग-अलग देशों की स्थिति अलग-अलग है। नाइजीरिया जैसे कुछ देशों में आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि जापान जैसे देशों में घट रही है। चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

गौरतलब है कि होमो सेपियन्स के उद्भव से लेकर वर्ष 1804 तक पृथ्वी की कुल आबादी एक अरब होने में लगभग 3,00,000 वर्षों का समय लगा था। दूसरी ओर, पृथ्वी की आबादी में एक अरब का इज़ाफा मात्र पिछले 12 साल में हुआ है।

यह कहना तो मुश्किल है कि हम 8 अरब की संख्या पर ठीक कब पहुंचे क्योंकि दुनिया के कुछ हिस्सों में जनगणना के आंकड़े दशकों पुराने हैं। कोविड-19 के समय में कुछ देशों के लिए हर एक मौत को दर्ज करना लगभग असंभव था। उत्कृष्ट कंप्यूटर मॉडल भी एक साल या उससे अधिक समय तक बंद रहे होंगे।

बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, साफ पेयजल और स्वच्छता में सुधार की बदौलत पृथ्वी पर हर जगह मनुष्यों की औसत आयु बढ़ी है। उर्वरकों और सिंचाई से फसल की पैदावार में वृद्धि हुई है जिससे पोषण में सुधार हुआ है। कई देशों में जन्म दर बढ़ रही है और मृत्यु दर कम हो रही है।

लेकिन इस रफ्तार से बढ़ती आबादी के कारण हम कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण और अत्यधिक मत्स्याखेट से महासागर प्रभावित हो रहे हैं। विकास, कृषि और पेड़ों से बने उत्पादों के लिए वनों की कटाई और कृषि हेतु वन भूमि की सफाई से वन्य जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। जीवाश्व ईंधनों के कारण जलवायु प्रभावित हो रही है, और जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा तथा पानी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

बढ़ती आबादी के मद्देनज़र पृथ्वी और हमारा अपना कल्याण इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम जलवायु परिवर्तन से कैसे निपटते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामला विभाग के पैट्रिक गेरलैंड का कहना है कि अब भी कुछ हद तक मानव जीवन पर पड़ने वाले भावी प्रभावों को सटीक ढंग से निर्धारित किया जाना बाकी है। इतिहास को देखें तो दुनिया अपनी समस्याओं के हल खोजने और अपनाने में सफल रही है। हमें आशावादी होने की ज़रूरत है। लेकिन कुछ न करना इसका हल नहीं हो सकता। हम मानें या न मानें, जलवायु परिवर्तन तो हो रहे हैं, और ये अपने आप नहीं निपट जाएंगे।

इसी दौरान, विभिन्न देशों की अलग-अलग स्थितियों के बावजूद कुल मिलाकर जनसंख्या बढ़ रही है। और दुनिया के शीर्ष जनसांख्यिकीविद इस पर एकमत नहीं हैं कि हमारी आबादी यहां से आगे कहां पहुंचेगी। एक ही समय में कहीं जनसंख्या में भारी वृद्धि हो रही है और कहीं तेज़ी से कमी हो रही है।

इस साल पहली बार चीन सबसे अधिक आबादी वाला देश नहीं रहेगा, भारत उससे आगे निकल जाएगा। चीन में 1980 में एक-बच्चा नीति लागू होने के पहले से ही जन्म दर घटने लगी थी, जो अब भी लगातार घट रही है। 1970 के दशक में ही उसकी जन्म दर घटकर आधी रह गई थी। बेहतर शिक्षा और करियर के बढ़ते अवसरों से अधिकतर महिलाओं ने प्रसव को टाला है। महामारी के दौरान जन्म दर और घटी। 2015 की तुलना में वर्ष 2020 में 45 प्रतिशत कम बच्चे पैदा हुए थे।

यहां तक कि किसी भी देश के मुकाबले सबसे लंबी जीवन प्रत्याशा, 85 वर्ष, के साथ चीन की 1.4 अरब की आबादी जल्द ही घटने की उम्मीद है – हो सकता है घटना शुरू भी हो गई हो। नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अगली चौथाई शताब्दी में चीन में 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 30 करोड़ लोग होंगे औैर इसका दबाव सार्वजनिक संसाधनों पर होगा।

वहीं दूसरी ओर, अफ्रीका में रुझान विपरीत दिशा में हैं। सहेल में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। नाइजीरिया की आयु का मध्य मूल्य (मीडियन) सिर्फ 17 वर्ष है, जो चीन के आधे से भी कम है। मध्य मूल्य या माध्यिका से यह पता चलता है कि यदि आबादी को 17 वर्ष से कम और 17 वर्ष से अधिक के समूहों में बांटा जाए तो दोनों समूहों में बराबर लोग होंगे। नाइजीरिया में भी जन्म दर गिर तो रही है, लेकिन चीन की तुलना में अब भी 20 गुना अधिक है।

यहां खाद्य सुरक्षा पहले ही एक चिंता का विषय है। देश की एक तिहाई से अधिक आबादी अत्यधिक गरीब है। हर तीसरे परिवार के एक सदस्य को कभी-कभी दिन के एक समय का भोजन छोड़ना पड़ता है ताकि बाकी लोगों को भोजन मिल सके। नाइजीरिया की वर्तमान आबादी 21.6 करोड़ है और अनुमान है कि सदी के अंत तक यह चौगुनी हो जाएगी। तब इसमें चीन की जनसंख्या से भी अधिक लोग होंगे, जबकि चीन के पास 10 गुना अधिक ज़मीन है। लेकिन वास्तविक स्थिति क्या बनेगी यह जन्म दर में कमी सहित कई बातों पर निर्भर करेगा।

जन्म दर में कमी लाने का सबसे बड़ा कारक है शिक्षा, खासकर लड़कियों की शिक्षा। एक दशक पहले, शोधकर्ताओं ने बताया था कि शिक्षा तक बढ़ती पहुंच से सदी के मध्य तक वैश्विक जनसंख्या की वृद्धि में एक अरब तक की कमी आ सकती है। लेकिन आने वाले सालों में शिक्षा कितनी तेज़ी से और कितने व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचेगी, यह एक अनुत्तरित सवाल है।

अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले पच्चीस सालों में विश्व की जनसंख्या 9 अरब से अधिक हो जाएगी।

उसके बाद अनुमान बहुत अलग-अलग हो जाते हैं। कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया था कि 2100 तक दुनिया की आबादी 11 अरब हो जाएगी। लेकिन अब प्रति परिवार में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में कमी को देखते हुए, उसने अपने अनुमानों को घटाकर लगभग 10.4 अरब कर दिया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस के शोधकर्ताओं ने 2018 में अनुमान लगाया था कि जनसंख्या 2070 में बढ़कर 9.7 अरब हो सकती है और फिर सदी के अंत तक गिरकर लगभग 9 अरब हो जाएगी। सिएटल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स के अनुसार 2064 में जनसंख्या लगभग 9.7 अरब तक बढ़ेगी, लेकिन सदी के अंत तक यह गिरकर 8.8 अरब हो सकती है। बुल्गारिया और स्पेन सहित लगभग दो दर्जन देशों में जनसंख्या आधी हो सकती है। अनुमानों में ये अंतर अनुमान लगाने की विधि सहित कई कारणों से हैं।

बहरहाल, सभी शोधकर्ता इस बात से सहमत हैं कि अब तक भविष्य के जनसंख्या अनुमानों में जलवायु परिवर्तन को शामिल करने के प्रयास अपर्याप्त रहे हैं। आंशिक रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि संभावित प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम कितनी जल्दी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करते हैं। लेकिन एक कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने को लेकर भी है। अत्यधिक गर्मी मध्य पूर्व, उप-सहारा अफ्रीका और भारत के कुछ हिस्सों को रहने के अयोग्य बना सकती है। तूफान खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों में लोग तेज़ी से बढ़ते समुद्र स्तर पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे।

वैश्विक जनसंख्या अनुमानों के अलावा, जलवायु परिवर्तन और राजनीति भी संभावित रूप से देशों के बीच प्रवासन को बहुत प्रभावित करेगी। अमेरिका और पश्चिमी युरोप काफी हद तक आप्रवासियों पर निर्भर हैं, लेकिन यह एक तल्ख राजनीतिक मुद्दा बन गया है। घटती आबादी वाले जापान जैसे अन्य देश भी आप्रवासियों को अपने यहां नहीं आने देना चाहते। फिर भी कहीं घटती कहीं बढ़ती आबादी निश्चित रूप से लगभग हर जगह प्रवासन का दबाव बढ़ाएगी। और इस जनसांख्यिकीय असंतुलन से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है – सुप्रबंधित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चीन ने बनाई विश्व की सबसे बड़ी सौर दूरबीन

हाल ही में चीन ने तिब्बती पठार पर विश्व की सबसे विशाल सौर दूरबीन स्थापित की है। डाओचेंग सोलर रेडियो टेलिस्कोप (डीएसआरटी) नामक यह दूरबीन 300 से अधिक तश्तरी के आकार के एंटीनाओं का समूह है जो 3 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। इसको स्थापित करने का कार्य 13 नवंबर को पूरा हुआ और इसका परीक्षण जून में शुरू किया जाएगा। इस वेधशाला से सौर विस्फोटों का अध्ययन करने और पृथ्वी पर इनके प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी। आने वाले कुछ वर्षों में सूर्य अत्यधिक सक्रिय चरण में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में डीएसआरटी द्वारा एकत्र रेडियो-आवृत्ति डैटा अन्य आवृत्ति बैंड में काम कर रही दूरबीनों के डैटा का पूरक होगा।

पिछले कुछ वर्षों में सौर अध्ययन के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। 2018 में नासा द्वारा पार्कर सोलर प्रोब और 2020 में युरोपियन स्पेस एजेंसी द्वारा सोलर ऑर्बाइटर प्रक्षेपित किए गए थे। चीन ने भी पिछले दो वर्षों में अंतरिक्ष सौर वेधशाला सहित सूर्य का अध्ययन करने वाले चार उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है। ये उपग्रह पराबैंगनी और एक्स-रे आवृत्तियों पर सूर्य का अध्ययन कर रहे हैं। चीन स्थित वेधशालाएं सौर गतिविधियों से सम्बंधित महत्वपूर्ण डैटा प्रदान करेंगी जो अन्य टाइम ज़ोन की दूरबीनों द्वारा देख पाना संभव नहीं है।

डीएसआईटी जैसी रेडियो दूरबीन सूर्य के ऊपरी वायुमंडल (कोरोना या आभामंडल) में होने वाली गतिविधियों (जैसे सौर लपटों और सूर्य से पदार्थों का फेंका जाना यानी कोरोनल मास इजेक्शन, सीएमई) का अध्ययन करने में काफी उपयोगी होंगी। आम तौर पर सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होने पर सौर लपटों या सीएमई जैसे विशाल विस्फोट होते हैं। सीएमई के दौरान उत्सर्जित उच्च-ऊर्जा कण कृत्रिम उपग्रहों को नुकसान पहुंचाते हैं और पॉवर ग्रिड को तहस-नहस कर सकते हैं। इस वर्ष फरवरी में एक कमज़ोर सीएमई ने स्पेसएक्स द्वारा प्रक्षेपित 40 स्टारलिंक संचार उपग्रहों को नष्ट कर दिया था। अंतरिक्ष में उपग्रहों की बढ़ती संख्या के चलते अंतरिक्ष मौसम के बेहतर पूर्वानुमान की भी आवश्यकता है।

अंतरिक्ष मौसम का अनुमान लगाना काफी चुनौतीपूर्ण है। डीएसआरटी के प्रमुख इंजीनियर जिनग्ये यान के अनुसार डीएसआरटी सूर्य की डिस्क से कम से कम 36 गुना अधिक क्षेत्र में नज़र रख सकता है। यह सीएमई को ट्रैक करने और अंतरिक्ष में उच्च-ऊर्जा कणों के प्रसार की प्रक्रिया को समझने में काफी उपयोगी होगा। इससे प्राप्त जानकारी की मदद से वैज्ञानिक सीएमई उत्सर्जन और इसके पृथ्वी तक पहुंचने का अनुमान लगा सकते हैं।

यान के अनुसार डीएसआरटी से प्राप्त डैटा अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं को भी उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा, भविष्य में डीएसआरटी का उपयोग रात के समय में पल्सर अनुसंधान वगैरह हेतु करने की भी योजना है। इसके अलावा चीन ने तिब्बती पठार में सिनचुआन पर एक नई दूरबीन स्थापित करने की भी योजना बनाई है जिसके 2026 तक पूरी होने की उम्मीद है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान/प्रौद्योगिकी के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मान – मनीष श्रीवास्तव

क नोबेल पुरस्कार को छोड़ दें, तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्राप्त होने वाले सम्मानों की चर्चा कम ही होती है। इस वजह से कई बार युवाओं की रुचि इस क्षेत्र में कम हो जाती है। आइए कुछ सम्मानों/पुरस्कारों पर नज़र डालते हैं।

राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान

मध्यप्रदेश सरकार विज्ञान और प्रौद्यागिकी में उत्कृष्ट काम के लिए राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय सम्मान प्रदान करती है। सन 1982 में स्थापित ये पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर आधारभूत विज्ञान, तकनीकी विकास और इंजीनियरिंग हेतु जवाहर लाल नेहरू तथा राज्य स्तर पर अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी में योगदान के लिए डॉ. कैलाश नाथ काटजू तथा डॉ. लज्जा शंकर झा, समाज विज्ञान में योगदान हेतु डॉ. हरिसिंह गौर के नाम पर प्रदान किए जाते हैं।

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों हेतु हर साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (28 फरवरी) के अवसर पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करती है।

इन पुरस्कारों का उद्देश्य विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, आमजन में वैज्ञानिक अभिरुचि जगाने तथा संचार क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले लोगों और संस्थाओं को प्रोत्साहित करने तथा उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों को वित्तीय रूप से सहयोग देना होता है। इसके अंतर्गत निम्न श्रेणियों में सम्मान दिया जाता है: 

1. प्रिंट मीडिया के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार।

2. बच्चों के बीच विज्ञान और प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाना।

3. लोकप्रिय विज्ञान और प्रौद्योगिकी साहित्य का अनुवाद।

4. नवीन और पारंपरिक तरीकों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार।

5. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार।

विज्ञान फिल्म महोत्सव पुरस्कार

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को अब प्रिंट माध्यम के अलावा कई अन्य माध्यमों से प्रचारित किया जाता है। इसी श्रेणी में इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के अंतर्गत फिल्में आती हैं। आजकल डॉक्यूमेंट्री तथा लघु फिल्मों के माध्यम से बड़े पैमाने पर यह कार्य किया जा रहा है। भारत सरकार की संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ द्वारा प्रति वर्ष विज्ञान फिल्मों को लेकर एक राष्ट्रीय महोत्सव आयोजित किया जाता है और विविध श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इसके अंतर्गत डॉक्यूमेंट्री, डॉक्यू-ड्रामा और साइंस फिक्शन फिल्मों की श्रेणियां होती हैं।

विज्ञान परिषद

देश में वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार हेतु 1913 में स्थापित सबसे पुरानी संस्था विज्ञान परिषद, प्रयाग 100 सालों से भी अधिक समय से विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रही है। संस्था द्वारा अपने कामों को आमजन तक पहुंचाने और विज्ञान जागरूकता लाने के लिए विज्ञान नामक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया जाता है। इसी क्रम में परिषद द्वारा कई पुरस्कारों की भी स्थापना की गई है। परिषद द्वारा हर साल विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत शताब्दी सम्मान, लेखन-संपादन सम्मान, विज्ञान वाचस्पति सम्मान, डॉ. गोरख प्रसाद विज्ञान लेखन पुरस्कार, व्हिटेकर विज्ञान लेखन पुरस्कार, डॉ. रत्नकुमारी स्मृति पदक, प्रवीण शर्मा स्मृति सूचना प्रौद्योगिकी पुरस्कार, विज्ञान रत्न लक्ष्मण प्रसाद आविष्कार लेखन पुरस्कार, तुरशन पाल पाठक स्मृति बाल विज्ञान लेखन पुरस्कार, देवेन्द्र पाल वार्ष्णेय कृषि विज्ञान लेखन पुरस्कार, मोहम्मद खलील बाल विज्ञान लेखन पुरस्कार आदि प्रदान किए जाते हैं।

भारतीय विज्ञान कांग्रेस

कलकत्ता स्थित भारतीय विज्ञान कांग्रेस संस्था द्वारा सन 1965 से ही श्रेष्ठ भारतीय वैज्ञानिकों को सम्मानित किया जा रहा है। विविध प्रभागों के अंतर्गत ये पुरस्कार शतवार्षिक, स्मारक और व्याख्यान श्रेणी में दिए जाते हैं। विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने हेतु इसमें 32 साल तक के युवा वैज्ञानिकों को ही अवसर प्रदान किया जाता है।

शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के सर्वोच्च सम्मानों में गिना जाने वाला पुरस्कार है शांति स्वरूप भटनागर सम्मान। विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च संस्था वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा उल्लेखनीय एवं असाधारण अनुसंधान के लिए विभिन्न विषयों में ये सम्मान प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार का उद्देश्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय एवं असाधारण भारतीय प्रतिभा को सम्मानित करना रहता है। सीएसआईआर के संस्थापक निदेशक सर शांति स्वरूप भटनागर की स्मृति में ये पुरस्कार सन 1958 से प्रदान किए जा रहे हैं।

घनश्याम दास बिड़ला वैज्ञानिक शोध पुरस्कार

गैर-सरकारी स्तर पर देश के सबसे बड़े फाउंडेशन में से एक के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा घनश्याम दास बिड़ला की स्मृति में वैज्ञानिक शोधों के लिए पुरस्कार दिया जाता है। इसकी स्थापना सन 1991 में की गई थी। भारत में ही उत्कृष्ट शोध करने वालों को ये पुरस्कार वार्षिक रूप से प्रदान किए जाते हैं।

कलिंग पुरस्कार

विज्ञान संचार के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले पुरस्कारों में सर्वाधिक लोकप्रिय पुरस्कारों में से एक है कलिंग पुरस्कार। यह पुरस्कार उड़ीसा सरकार द्वारा युनेस्को को 1952 में उपलब्ध कराई गई एक बड़ी धनराशि से स्थापित कलिंग फाउण्डेशन ट्रस्ट द्वारा दिया जाता है। इसमें एक नया बिंदु जोड़ते हुए विजेता को अब रुचिराम साहनी पीठ भी प्रदान की जाने लगी है। हर दो वर्ष में यह पुरस्कार विश्व विज्ञान दिवस (10 नवंबर) के अवसर पर दिया जाता है।

ब्रेकथ्रू पुरस्कार

ब्रेकथ्रू सम्मान गूगल के सह संस्थापक सर्गेई ब्रिन, फेसबुक के सी.ई.ओ. मार्क जुकरबर्ग सहित कुछ अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा साझा रूप से प्रदान किया जाता है। गणित (4 वर्ष में एक बार), भौतिकी (प्रति वर्ष) और लाइफ साइंस (प्रति वर्ष) के क्षेत्र में दुनिया भर में श्रेष्ठ काम करने वाले वैज्ञानिकों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इसे ‘विज्ञान का आॅस्कर’ नाम से भी जाना जाता है।

नोबेल पुरस्कार

विज्ञान में अप्रतिम योगदान के लिए दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कार को कौन नहीं जानता। सन 1901 से दिए जा रहे इन पुरस्कारों की स्थापना डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल द्वारा की गई थी। आज यह सम्मान उनकी स्मृति में निर्मित नोबेल फाउण्डेशन द्वारा दिए जाते हैं।

इन पुरस्कारों द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाले खोजियों, संचारकों और शोधार्थियों को सम्मानों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाता है। उम्मीद है इन सम्मानों के बारे में जानकर और अधिक युवा विज्ञान और प्रौद्योगिकी की ओर अग्रसर होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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वन्य जीवों की घटती आबादी – सुदर्शन सोलंकी

वैश्विक स्तर पर 1970 से 2018 के बीच 48 वर्षों में वन्य जीवों की आबादी में 69 फीसदी की कमी हुई है। यह जानकारी विश्व प्रकृति निधि (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा जारी लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट 2022 से पता चली है। इस रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्रों में वन्य जीव आबादी में सबसे बड़ी गिरावट हुई है; यहां पिछले पांच दशकों में करीब 94 फीसदी की गिरावट हुई। दक्षिण अफ्रीका में करीब 66 फीसदी व एशिया-प्रशांत में 55 फीसदी की कमी दर्ज की गई। चिंताजनक और चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया भर में नदियों में पाए जाने वाले जीवों की आबादी में करीब 83 फीसदी की कमी आई है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ यह रिपोर्ट हर दो वर्ष में प्रकाशित करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी। इसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के ग्लैंड में है। निधि का मुख्य उद्देश्य प्रकृति का संरक्षण करना और पृथ्वी पर विविधता को होने वाले खतरों को कम करना है। लिविंग प्लेनेट इंडेक्स (एलपीआई) पिछले 50 वर्षों से स्तनधारी जीवों, पक्षियों, सरीसृपों, मछलियों और उभयचरों की आबादी की निगरानी कर रहा है। दुनिया भर में 5230 प्रजातियों की 31,821 आबादियों के निरीक्षण के आधार पर निष्कर्ष मिला है कि खास तौर से ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कशेरुकी प्राणियों की आबादी में तेज़ी से गिरावट दर्ज हुई है। धरती की 70 फीसदी और ताज़े पानी की 50 फीसदी जैव विविधता खतरे में है।

भारत में करीब 12 फीसदी स्तनधारी वन्य जीव समाप्ति की कगार पर है। वहीं पिछले 25 वर्षों में मधुमक्खियों की करीब 40 फीसदी आबादी खत्म हो चुकी है।

वैश्विक स्तर पर वन्य जीवों की तेज़ी से घटती आबादी के लिए उनके आवासों की कमी, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और विभिन्न बीमारियां प्रमुख कारण हैं।

जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी सेवाओं सम्बंधी अंतरसरकारी मंच (आईपीबीईएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार विकसित और विकासशील देशों में रहने वाले अधिकांश लोग भोजन, दवा, ऊर्जा, मनोरंजन और मानव कल्याण से सम्बंधित कार्यों में लगभग 50 हज़ार वन्य जीव प्रजातियों का हर दिन उपयोग करते हैं।

दुनिया भर में जंगल वातावरण से 7.6 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड सोखते हैं जो मनुष्य द्वारा पैदा हुई कार्बन डाईऑक्साइड का 18 फीसदी है। इस तरह जंगल धरती को 0.5 डिग्री सेल्सियस ठंडा रखते हैं। यह विडंबना ही है कि इसके बावजूद प्रति वर्ष हम 1 करोड़ हैक्टर जंगल नष्ट कर रहे हैं।

यदि वन व वन्य जीव नहीं होंगे तो जल, वायु व मृदा से मिलने वाले संसाधन नष्ट हो जाएंगे और इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हाल के दशकों में मानव ने अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप बड़े-बड़े जंगल खत्म होने की कगार पर है। कुछ वन्य प्राणियों की प्रजातियां विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्ति की कगार पर हैं। वनों को काटकर हम न सिर्फ वन्य जीवों के आवास खत्म कर रहे हैं बल्कि वनों से मिलने वाली विविध संपदा भी खो रहे हैं।

मानव गतिविधियों के कारण भूमि पर पाए जाने वाले वन्य जीवों के अलावा जलीय जीवों के प्राकृतवास पर भी खतरा उत्पन्न हुआ है। जहाज़, स्टीमर आदि से ईंधन के रिसाव, विनाशकारी मत्स्याखेट, गहरे ट्रालरों का उपयोग एवं मूंगा चट्टानों के दोहन से समुद्र का पारिस्थितिकी तंत्र तबाह हो गया है।

स्पष्ट है मानवीय गतिविधियों के कारण पूरी दुनिया में वन्य जीवों की संख्या कम हो रही है। प्रकृति में जितने भी विनाशकारी परिवर्तन हो रहे हैं, वे सभी मनुष्य की ही देन हैं। तापमान का चरम पर जाना, चक्रवाती तूफान एवं कहीं सूखा तो कहीं मूसलाधार बारिशें, जिसके कारण बाढ़ जैसी विपदाओं का आना इत्यादि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो रहा है जो वनों व वन्य जीवों की घटती आबादी का कारण है।

लुप्तप्राय पौधों और जानवरों की प्रजातियों की उनके प्राकृतिक निवास स्थान के साथ रक्षा करना ज़रूरी है। सबसे प्रमुख चिंता का विषय यह है कि वन्य जीवों के निवास स्थान की सुरक्षा किस प्रकार की जाए जिससे वन्य जीव और मनुष्य के बीच एक संतुलित तालमेल बना रहे, जीवन फलता-फूलता रहे। (स्रोत फीचर्स)

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दृष्टिबाधितों के लिए नोट पहचानने की समस्याएं – सुबोध जोशी

ज हम वस्तुएं और सेवाएं पाने के लिए मुद्रा यानी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं। मुद्रा का आविष्कार लगभग 5000 साल पहले हुआ था। इससे पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी।

मुद्रा नोटों और सिक्कों के रूप में होती है जिन्हें पहचान कर इस्तेमाल करना किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत ही आसान होता है। उन पर अंकों और अक्षरों में मूल्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखा रहता है। सिक्कों के इस्तेमाल से जुड़ी दिक्कतों की वजह से नोटों का इस्तेमाल ज़्यादा पसंद किया जाता है।

यह इतना आसान इसलिए है क्योंकि हम अपनी आंखों से देख सकते हैं। लेकिन दृष्टिहीनता, अल्पदृष्टि या वर्णान्धता (किसी एक या एक से अधिक रंगों का बोध नहीं हो पाना) से ग्रस्त व्यक्ति मुद्रा कैसे पहचानते हैं? क्या यह उनके लिए भी इतना ही आसान है?

दृष्टिबाधितों को भी मुद्रा के इस्तेमाल की ज़रूरत अन्य व्यक्तियों के समान ही होती है लेकिन मुद्रा को पहचानना उनके लिए आसान नहीं होता है। उनकी सुविधा के लिए सबसे आसान तरीका तो यह है कि कोई अन्य व्यक्ति उनकी मदद कर दे। लेकिन इसमें आत्मनिर्भरता और विश्वसनीयता के सवाल पैदा होते हैं। इसलिए दुनिया भर के देश उनकी सुविधा के लिए कई तरीके अपनाते हैं ताकि लेन-देन में वे मुद्रा की पहचान शीघ्रता और सुरक्षित ढंग से कर सकें। इन तरीकों में सुधार लाने और नए तरीके खोजने की कोशिशें भी जारी हैं।

एक तरीका यह है कि अलग-अलग मूल्य के नोट अलग-अलग आकार में जारी किए जाएं। भारत सहित कुछ देशों में मूल्य के अनुसार नोटों की लंबाई-चौड़ाई अलग-अलग है। इसके साथ ही, नेत्रहीन व्यक्ति नोटों को शीघ्र मापकर उनमें अंतर कर सके इसके लिए पहचान करने वाला एक छोटा कार्ड इस्तेमाल किया जा सकता है। इस कार्ड पर नोटों की लंबाई के अनुसार उनके मूल्य उभरे हुए अंकों में अंकित रहते हैं। कार्ड पर नोट रखकर उसका मूल्य स्पर्श द्वारा पहचाना जा सकता है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की मुद्रा के इस्तेमाल में दृष्टिबाधितों को सबसे ज़्यादा मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि वहां विभिन्न मूल्यों के नोटों के आकार और रंग एक समान होते हैं।

दूसरा तरीका है नोटों पर कोने में या निश्चित स्थान पर ब्रेल डॉट्स के माध्यम से मूल्य अंकित करना जिन्हें नेत्रहीन व्यक्ति स्पर्श द्वारा पढ़ सकें। इसके लिए ब्रेल लिपि का ज्ञान होना आवश्यक है। कनाडा में यह तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है।

तीसरा तरीका है ब्रेल डॉट्स की बजाय नोटों पर स्पर्श द्वारा पहचाने जाने योग्य चिन्ह अंकित करना। सबसे पहले नेदरलैंड द्वारा आज़माया गया यह तरीका ब्राज़ील और बहरीन ने भी अपनाया है। भारत में नए जारी किए गए 2000 के नोट पर एक आयत और सात उभरी हुई लकीरें, 500 के नोट पर एक गोला और पांच उभरी हुई लकीरें और 100 के नोट पर एक त्रिकोण और चार उभरी हुई लकीरें बनी हुई हैं। नए जारी किए गए 50 और 200 रुपए के नोटों पर नेत्रहीन व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसी कोई लकीरें या चिन्ह नहीं हैं, जबकि पुरानी सीरीज़ के 50 के नोट में बाईं तरफ प्रतीक चिन्ह के ऊपर एक चौकोर चिन्ह बना हुआ था।

चौथा तरीका यह है कि नेत्रहीन व्यक्ति अपने किसी भरोसेमंद व्यक्ति की सहायता से मूल्य के अनुसार नोटों को अलग-अलग ढंग से मोड़कर अपने पास रखें। उदाहरण के लिए, 5 का नोट बिना मोड़े, 10 का नोट चौड़ाई में और 20 का नोट लंबाई में मोड़कर रखा जा सकता है। बड़े मूल्य के नोट लंबाई और चौड़ाई मिलाकर और अन्य अलग-अलग ढंग से मोड़े जा सकते हैं। अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर मोड़ने के तरीके जटिल हो सकते हैं या मोड़ने के तरीके कम भी पड़ सकते हैं।

पांचवे तरीके के रूप में कुछ खंडों वाले बटुए का उपयोग किया जा सकता है; प्रत्येक मूल्य के नोट एक अलग खंड में रखना नेत्रहीन व्यक्तियों की मदद कर सकता है। यह तरीका ज़्यादातर कारगर रहता है। लेकिन अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर नोट मोड़कर रखने वाले तरीके की तरह इस तरीके की भी जटिलताएं या सीमाएं प्रकट हो सकती हैं।

ऐसे कई ऐप विकसित किए गए हैं जिनकी मदद से नेत्रहीन व्यक्ति अपने मोबाइल फोन पर मुद्रा पहचान सकते हैं। यह ऐप कैमरे की मदद से मुद्रा की पहचान कर नोट का मूल्य बोलकर बताते हैं। कोई ऐप कितना कारगर होगा यह उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

मुद्रा पहचानने वाले उपकरण भी विकसित किए जा रहे हैं। इनमें एक खास तरह से नोट रखने पर यह उसके बारे में या तो बोलकर या बीप और कंपन के मिश्रण से जानकारी प्रदान कर सकते हैं। लेकिन इसके माध्यम से खराब गुणवत्ता वाले नोटों की पहचान करना मुश्किल होता है। ऐसे उपकरण का एक उदाहरण आईबिल बैंकनोट आइडेंटिफायर है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी मोबाइल ऐडेड नोट आइडेंटिफायर (MANI) आरंभ किया है जो बिना इंटरनेट काम करता है। नोट के बारे में यह बोलकर जानकारी देता है और जो देख और सुन नहीं सकते उन्हें गैर-ध्वनिक तरीके (जैसे कंपन) से भी जानकारी देता है।

सबसे अच्छा यह होगा कि नोट को छूते ही उसे पहचाना जा सके। इससे मुद्रा पहचानने का काम बहुत तेज़ी से और अधिक सुरक्षित ढंग से करना संभव हो सकेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन को बढ़ावा मिलने से नकद रूप में मुद्रा का इस्तेमाल घट रहा है। इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन का तरीका दृष्टिबाधितों के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है बशर्ते उसमें उनकी विशेष आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाए। (स्रोत फीचर्स)

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जल संचयन की मदद से भूजल का पुनर्भरण – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

ए घर की तलाश करते समय जिस एक चीज़ पर ध्यान देना हम कभी नहीं भूलते, वह है “उस जगह भूजल स्तर कितनी गहराई पर है।” भूजल स्तर बताता है कि कितनी गहराई पर चट्टानों की दरारें और छिद्र पानी से भरे हैं। भूमि के अंदर संचित इस पानी को भूजल और जिन चट्टानों में यह पानी भरा होता है उन्हें एक्वीफर्स कहते हैं।

दुनिया की एक चौथाई आबादी के लिए पानी का प्रमुख स्रोत भूजल ही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है; वर्ष 2017 में लगभग 250 घन किलोमीटर पानी का ज़मीन से दोहन किया गया था। इसमें से लगभग 90 प्रतिशत पानी सिंचाई के लिए और शेष पानी शहरों और गांवों में इस्तेमाल किया गया था।

सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों (उत्तरी मैदानी क्षेत्रों) की कृषि अर्थव्यवस्था भूजल पर टिकी है। लेकिन ऐसी आशंका है कि जल्द ही सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र के एक्वीफर्स इतने व्यापक पैमाने पर सिंचाई के लिए पानी देने में सक्षम नहीं रहेंगे। जर्नल ऑफ हायड्रोलॉजी में पिछले वर्ष आईआईटी कानपुर के एस. के. जोशी व साथियों द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार यह स्थिति पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में तो दिखने भी लगी है। हरित क्रांति नलकूपों पर टिकी रही है। गिरता भूजल स्तर किसानों को उच्च शक्ति वाले सबमर्सिबल पंप उपयोग करने को मजबूर कर रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।

उपग्रह गुरुत्व मापन ने खतरनाक दर से गिरते भूजल स्तर के ठोस प्रमाण दिए हैं। इस डैटा को स्थानीय स्तर पर कुओं में भूजल स्तर के मापन से पुष्ट किया जाता है। इस शताब्दी में, भारत के उपरोक्त क्षेत्र में भूजल स्तर में गिरावट की औसत दर 1.4 से.मी. प्रति वर्ष रही है। अलबत्ता, उन क्षेत्रों में भूजल स्तर में कमी इतनी तेज़ी से नहीं हो रही है जहां भूजल खारा है।

भूजल स्तर में वृद्धि के उपाय

वर्षा और नदियों के पानी से एक्वीफर्स रिचार्ज हो जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने पानी के वितरण के लिए नहरों के निर्माण में वृद्धि की है। इन नहरों से रिसता पानी भी भूजल स्तर को बढ़ाता है।

हमारे देश के कुछ क्षेत्रों के कुछ स्वस्थ एक्वीफर्स के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक है भूजल रिचार्ज के लिए समुदाय आधारित अभियान। इसका सबसे अच्छा उदाहरण सौराष्ट्र के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में देखा जा सकता है। यहां मौसमी नदियों और नालों पर हज़ारों छोटे-बड़े चेक डैम बनाए गए हैं। ये पानी के प्रवाह को धीमा करते हैं और भूजल रिचार्ज में योगदान देते हैं और साथ ही मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। गांवों में, बोरियों में रेत भरकर बारिश के बहते पानी के रास्ते में बोरी-बंधान बनाए जाते हैं।

क्या इन छोटे पैमानों पर किए गए जल संचयन के उपायों से कोई फर्क पड़ा है? सौराष्ट्र के भूजल स्तर और इसी तरह की जलवायु वाले मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों के तुलनात्मक अध्ययनों में इन उपायों के सकारात्मक प्रभाव दिखे हैं। सुखद बात है कि पिछले एक दशक में महाराष्ट्र के इन क्षेत्रों ने भी भूजल रिचार्ज करने के अपने प्रबंधित कार्यक्रम शुरू किए हैं, जैसे जलयुक्त शिवार।

देश में तमिलनाडु-कर्नाटक के सीमांत क्षेत्र भी भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट का सामना कर रहे हैं। यहां भूजल क्रिस्टलीय चट्टानों में पाया जाता है। ये चट्टाने छिद्रयुक्त नहीं होतीं, इसलिए इनमें पानी केवल बीच की दरारों और टूटन में पाया जाता है। इन परिस्थितियों में, पोखर और तालाब भूजल रिचार्ज में ज़्यादा मददगार नहीं होते।

यहां ज़्यादातर रिचार्ज वर्षा और सिंचाई के पानी के पुनर्चक्रण से होता है। विडंबना देखिए कि बेंगलुरु जैसे शहरी क्षेत्र में भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत जल आपूर्ति के पाइपों से होने वाला रिसाव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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