देश को गर्मी से सुरक्षित कैसे करें

वैसे तो अभी जाड़े का मौसम आने वाला है लेकिन गर्मियां भी दूर नहीं हैं। और भारत की चिलचिलाती गर्मी नागरिकों के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। बढ़ती गर्मी न सिर्फ असुविधा पैदा कर रही है बल्कि जानलेवा भी साबित हो रही है। निरंतर बढ़ते तापमान और अत्यधिक आर्द्रता के परिणामस्वरूप हीट स्ट्रोक (लू लगने) से मृत्यु की घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

पिछले वर्ष दी लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2000-04 और 2017-21 के बीच गर्मी से मरने वाले लोगों की संख्या में 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका सबसे अधिक प्रभाव शहरी क्षेत्रों पर हो रहा है जहां टार और कांक्रीट जैसी गर्मी सोखने वाली निर्माण सामग्री का भरपूर उपयोग हो रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग और तेज़ी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों के चलते यह जोखिम बढ़ने की संभावना है। अनुमान है कि 2025 तक भारत की आधी से अधिक आबादी शहरों में निवास करेगी। इसका सबसे अधिक प्रभाव शहरी गरीबों पर होगा जो न एयर कंडीशनिंग का खर्च उठा सकते हैं और बाहर खुले में काम करते हैं। इस स्थिति को देखते हुए शोधकर्ता और नीति निर्माता अब इस बढ़ते संकट को समझने और इसके प्रभाव को कम करने के लिए विभिन्न रणनीतियां विकसित कर रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से भारत में आपदा नियोजन प्रयास चक्रवातों और बाढ़ से निपटने पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन वर्ष 2015 से राष्ट्रीय स्तर पर ग्रीष्म लहरों को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल किया गया है। कुछ शहरों में शोधकर्ता आपातकालीन योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए अधिकारियों के साथ ग्रीष्म-लहर की चेतावनी जारी करने और शीतलता केंद्र खोलने पर विचार कर रहे हैं। कुछ शोधकर्ता तो घरों को ठंडा बनाने के लिए सस्ते तरीके भी आज़मा रहे हैं। कुछ अन्य शोधकर्ता कोशिश कर रहे हैं कि आसपास के तापमान पर भूमि उपयोग और वास्तुकला का प्रभाव समझकर शहरों के विस्तार के लिए समुचित डैटा जुटा सकें।

इसी तरह का एक प्रयास नागपुर में अर्बन हीट रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत शोधकर्ताओं द्वारा किया गया; 30 लाख की आबादी वाला यह शहर भारत के सबसे गर्म शहरों में से एक है।

तापमान के दैनिक पैटर्न से मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई अध्ययन दर्शाते हैं कि गर्म दिनों के साथ रातें भी गर्म रहें तो स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं क्योंकि ऐसा होने पर शरीर को गर्मी से कभी राहत नहीं मिलती है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि भारत में लगातार गर्म दिन और गर्म रातें आम बात होती जा रही हैं।

इसके साथ ही सामाजिक-आर्थिक कारकों और गर्मी के प्रति संवेदनशीलता के सम्बंध को भी समझने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए गरीब लोग घर को ठंडा रखने के उपकरण खरीदने में सक्षम नहीं होते। यह भी संभव है कि बुज़ुर्गों को ऐसी बीमारियां होती हों जो उन्हें गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं। कुछ क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति या स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है जो गर्मी से सम्बंधित बीमारी से निपटने में मदद कर सकते हैं। जैसे नागपुर के बाहरी इलाकों में लोगों के पास स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम है।

टीम ने गर्मी के बारे में लोगों की समझ को भी महत्वपूर्ण माना है। पिछले साल ग्रीष्म लहर के दौरान शोधकर्ताओं ने पैदल लोगों से बातचीत की। 45 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी अधिकांश लोगों ने कम ही चिंता व्यक्त की क्योंकि उनके लिए इसमें कुछ नया नहीं है, मौसम तो हमेशा से ऐसा ही रहा है। यह काफी चिंताजनक है क्योंकि आम जनता को गर्मी से होने वाले जोखिमों के बारे में पर्याप्त समझ नहीं है। संभव है कि वे ग्रीष्म लहर से सम्बंधित चेतावनियों पर भी ध्यान नहीं देंगे। इस स्थिति में हीट एक्शन प्लान (एचएपी) तैयार करना और भी ज़रूरी हो जाता है।

मुख्य तौर पर एचएपी का उद्देश्य अधिकारियों को ग्रीष्म-लहर की चेतावनी जारी करने के लिए तैयार करने और अस्पतालों एवं अन्य संस्थानों को सचेत करना है। इसके तहत अस्पतालों को गर्मी के मौसम में लू के रोगियों के इलाज के लिए कोल्ड वार्ड बनाने और बिल्डरों को अत्यधिक गर्म दिनों में मज़दूरों को छुट्टी देने का सुझाव दिया गया है।

एचएपी सबसे पहले 2013 में अहमदाबाद में स्थानीय वैज्ञानिक संस्थानों और गैर-मुनाफा संस्था नेचुरल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी) द्वारा शुरू किया गया था। 2018 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस योजना के तहत कम से कम 1190 लोगों की जान बचाई गई। आपदा प्रबंधन एजेंसी अब देश के 28 में से 23 राज्यों में एचएपी विकसित करने के लिए काम कर रही है।

अलबत्ता, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा एचएपी का कार्यान्वयन असमान रहा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस योजना में पर्याप्त धन की कमी है। इसके अलावा योजना के तहत निर्धारित सीमाएं स्थानीय जलवायु के अनुरूप नहीं हैं। कुछ क्षेत्रों में तो केवल दिन का उच्चतम तापमान ही अलर्ट के लिए पर्याप्त माना गया है। उदाहरण के लिए अहमदाबाद में प्रारंभिक अलर्ट के लिए सीमा 41 डिग्री सेल्सियस निर्धारित की गई है। लेकिन कई अन्य स्थानों पर, रात का तापमान या आर्द्रता भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि दिन का तापमान लेकिन इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है।

जैसे, मुंबई में अप्रैल माह में देर सुबह और बिना किसी छाया के आयोजित एक समारोह में 11 लोगों की लू से हुई मौतों ने अधिक सूक्ष्म और स्थान-आधारित चेतावनियों की आवश्यकता को रेखांकित किया है। उस दिन का अधिकतम तापमान 36 डिग्री सेल्सियस था, जो राष्ट्रीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा तटीय शहरों के लिए निर्धारित अलर्ट सीमा से 1 डिग्री सेल्सियस कम था। लेकिन गर्मी का प्रभाव आर्द्रता के कारण अधिक बढ़ गया था जिसे गर्मी चेतावनी प्रणालियों में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। विडंबना यह है कि मुंबई सहित महाराष्ट्र में इस त्रासदी से सिर्फ 2 महीने पहले एचएपी अपनाया गया था। इसमें गर्म दिनों में बाहरी कार्यक्रमों को अलसुबह करने की सलाह दी गई थी।

एचएपी को बेहतर बनाने में मदद के लिए शोधकर्ता एक मॉडल योजना पर काम कर रहे है जिसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सके। साथ ही सभी शहरों की अधिक जोखिम वाली आबादी पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक जोखिम मानचित्र का भी सुझाव दिया गया है।

ऐसा मानचित्र बड़ी आसानी से बनाया जा सकता है। इसमें  अधिक बुजुर्ग आबादी वाले या अनौपचारिक आवासों वाले इलाकों को चिंहित किया जा सकता है ताकि उन्हें विशेष चेतावनी मिल सके या पर्याप्त शीतलन केंद्रों की व्यवस्था की जा सके। नागपुर परियोजना के तहत एक जोखिम मानचित्र तैयार किया गया है जो यह बता सकता है कि ग्रीष्म लहर की स्थिति में किन इलाकों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

शोधकर्ताओं का मानना है कि एचएपी में केवल अल्पकालिक आपातकालीन सेवाओं के अलावा मध्यम से दीर्घकालिक उपायों पर भी काम किया जाना चाहिए। जैसे छाया प्रदान करने के लिए पेड़ लगाने के स्थान तय करना। एचएपी के तहत घरों के पुनर्निर्माण या भवन निर्माण नियमों में बदलाव के प्रयासों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। शहरों को ठंडा रखने के लिए उनके निर्माण के तरीके बदलना होंगे। नागपुर की टीम ने शहर की ऐसी इमारतों के उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। लेकिन ऐसे घरों के निर्माण के लिए पर्याप्त ज़मीन नहीं है और इनके रख-रखाव का खर्च भी बहुत ज़्यादा होता है।

हाल के वर्षों में, आवास मंत्रालय ने जलवायु अनुकूल इमारतों के निर्माण के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार किए हैं। इसमें पारंपरिक वास्तुकला के कुछ सिद्धांत शामिल किए गए हैं। लेकिन ये दिशानिर्देश ज़्यादातर कागज़ों पर ही हैं। बिल्डर और स्थानीय सरकारें अपने तौर-तरीकों को बदलने में धीमी या अनिच्छुक लगते हैं।

वैसे, शहरों में रहने वाले कम आय वाले कई परिवारों के लिए नवनिर्मित, जलवायु-अनुकूल निवास में जाने की संभावना बहुत कम है। इसलिए मौजूदा घरों में ही कुछ परिवर्तन किया जा सकता है। सबसे सस्ता और जांचा-परखा तरीका छतों को सफेद परावर्तक पेंट से ढंकना है। एचएपी के तहत इस तकनीक का सबसे पहला उपयोग 2017 में अहमदाबाद में किया गया था। एक अध्ययन के अनुसार पेंट की हुई टीन की छत वाले घर बिना पेंट वाली छतों की तुलना में 1 डिग्री सेल्सियस ठंडे रहते हैं जबकि अधिक महंगी तकनीक का उपयोग करके घरों को 4.5 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जा सकता है।

2020 में, 15,000 कम आय वाले घरों तक कूल रूफ कार्यक्रम का विस्तार किया गया था। इस साल, जोधपुर ने इसी तरह की पहल की है। इसी तरह तेलंगाना ने 2028 तक 300 वर्ग किलोमीटर ठंडी छतें बनाने का संकल्प लिया है। मुंबई और अन्य शहरों में, सीबैलेंस नामक एक निजी फर्म गरीब परिवारों के लिए कम लागत वाली शीतलन तकनीकों का परीक्षण कर रही है।

इस तकनीक में घर को ठंडा रखने के लिए टीन की छत को एल्यूमीनियम पन्नी से ढंककर गर्मी से इन्सुलेशन दिया जाएगा। इन घरों में एक बड़ा परिवर्तन छत के थोड़ा ऊपर पुनर्चक्रित प्लास्टिक कचरे के पैनलों से निर्मित दूसरी छत बनाना है। रसोई की खिड़की के लिए सुबह के समय पैनलों को बंद करने की व्यवस्था होगी जिससे धूप को रोका जा सकेगा और रात में उन्हें फिर से खोलकर गर्मी को बाहर किया जा सकेगा।

फिलहाल तो एक गैर-सरकारी परोपकारी संस्था ने इन परिवर्तनों के लिए धन प्रदान किया है। लेकिन भारत में शीतलन संसाधनों के भुगतान के लिए पैसा एकत्रित करना एक चुनौती है। विशेष पेंट काफी महंगा है। पैसे बचाने के लिए कुछ लोगों ने अपनी छतों को साधारण सफेद पेंट से रंगने की कोशिश की है। लेकिन यह तापमान को उतना कम नहीं करता है।

वैसे कई अन्य समस्याएं भी हैं। जैसे मुंबई की बस्तियों में बेतरतीब बिजली के तारों से कुछ छतों पर शेडिंग पैनल स्थापित नहीं किए जा सकते। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि छत पर किए जाने वाले परिवर्तनों से वॉटरप्रूफिंग को नुकसान न पहुंचे। इन चुनौतियों के बावजूद, शोधकर्ता और इंजीनियर भारत के शहरों और उसमें भी सबसे कमज़ोर नागरिकों के लिए कूलिंग समाधान खोजने के लिए प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों में कूलिंग कोई सुविधा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का मामला बन गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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यह कीट खानपान में नखरे नहीं करता

क्षिणी इटली में जैतून के लहलहाते पेड़ों के लिए मिडो स्पिटलबग (Philaenus spumarius) एक बड़ी मुसीबत है। यह साधारण-सा कीट ज़ायलेला फास्टिडिओसा बैक्टीरिया का वाहक है जो धीरे-धीरे फसलों को नष्ट कर देता है। हाल ही में प्लॉस वन में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार पौधों के मामले में मिडो स्पिटलबग, कीट जगत में सबसे कम चुनावपसंद कीट है जो 1300 से अधिक पादप प्रजातियों का रस चूसता है।

यह अध्ययन उन किसानों के लिए काफी महत्वपूर्ण है जो अपनी आजीविका के लिए विभिन्न पादप प्रजातियों पर निर्भर हैं। यह सही है कि मीडो स्पिटलबग द्वारा खाए गए सभी पौधे ज़ायलेला के प्रति संवेदनशील नहीं हैं लेकिन ये ‘सुरक्षित’ प्रजातियां ज़ायलेला के भंडार के रूप में कार्य कर सकती हैं। इस स्थिति में जैतून और ज़ायलेला के प्रति कमज़ोर अन्य प्रजातियों की रक्षा करना मुश्किल हो जाता है।

दरअसल, मिडो स्पिटलबग फ्रॉगहॉपर नामक कीट की अपरिपक्व अवस्था है। इन्हें यह नाम पौधों के तनों पर दिखाई देने वाली थूक जैसी छोटी-छोटी बुलबुलेनुमा संरचना पर पड़ा है। यह पदार्थ स्पिटलबग मूत्र के साथ उत्सर्जित करते हैं।

आम तौर पर रस चूसने वाले कीट पौधों के फ्लोएम नामक ऊतक में छेद करते हैं, जो पोषण से सराबोर होता है। लेकिन स्पिटलबग ज़ाइलम में उपस्थित अधिक पतला रस निकालने में माहिर होते हैं। विभिन्न प्रजातियों के बीच इस रस में ज़्यादा अंतर नहीं होता, इसलिए शोधकर्ताओं को लगता था कि मिडो स्पिटलबग और उसके जैसे कीट पौधों के बीच कोई भेद नहीं करते होंगे।

मिडो स्पिटलबग की आहार सम्बंधी आदतों की व्यापक जांच लगभग एक दशक पहले की गई थी जब इसकी पहचान जैतून के पेड़ों में ज़ायलेला जीवाणु के वाहक के रूप में हुई। इस कीट की आहार सम्बंधी बहुमुखी प्रतिभा का खुलासा तब हुआ जब आम लोगों के सहयोग से इसे 1311 पादप प्रजातियों पर पनपता हुआ देखा गया। ये प्रजातियां 631 वंशों (जीनस) और 117 कुलों में बिखरी हैं। इस सूची में न केवल डेज़ी और गुलाब जैसी परिचित वनस्पतियां, बल्कि फर्न, घास, झाड़ियां और यहां तक कि कई पेड़ भी शामिल हैं। और तो और, हाल ही में इसे स्पेनिश बादाम के पेड़ों को प्रभावित करने वाले एक नए ज़ायलेला प्रकोप के लिए ज़िम्मेदार पाया गया है।

स्पष्ट है कि यह कीट कृषि और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण और तेज़ी से बढ़ता हुआ खतरा बन गया है। यह शोध मिडो स्पिटलबग और उसमें पाए जाने वाले जीवाणु द्वारा उत्पन्न जोखिमों की व्यापक समझ और सक्रिय उपायों की तत्काल आवश्यकता का संकेत देता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आदित्य मिशन से लेकर इगनोबल तक – चक्रेश जैन

सरो द्वारा प्रक्षेपित सूर्य मिशन आदित्य एल-1 ने सेल्फी ली और पृथ्वी तथा चंद्रमा की तस्वीरें भेजीं। चार महीनों बाद अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला आदित्य एल-1 मौसम की उत्त्पति के कारणों का अध्ययन करेगा। उसने सम्बंधित आंकड़े जुटाना शुरू कर दिया है। इसमें एक विशेष दूरबीन लगाई गई है, जिससे सूर्य पर होने वाले परिवर्तनों की जानकारी मिल सकेगी। इससे ओज़ोन परत पर पराबैंगनी किरणों के असर के बारे में भी नई जानकारियां उपलब्ध हो सकेंगी।

इसरो प्रमुख द्वारा आदित्य एल-1 को यात्रा पर विदा करने के पहले पूजा-अर्चना करने पर इस बार भी कुछ टेलीविज़न चैनलों पर यह मुद्दा उठा कि विज्ञान जगत में तर्क और तथ्यों का स्थान है। अतः वैज्ञानिकों को सफलताओं के लिए मंदिरों अथवा धार्मिक स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। पीछे मुड़कर देखें तो इसके प्रथम निदेशक विक्रम साराभाई और द्वितीय निदेशक सतीश धवन ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया था।

चंद्रयान-1 से मिले डैटा का विश्लेषण कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि पृथ्वी के उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन चंद्रमा पर पानी बना रहे हैं। चंद्रमा पर पानी की सांद्रता को जानना, इसके बनने और विकास को समझने के लिए अहम है और मानव सहित मिशन्स के लिए पानी उपलब्ध कराने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

नए विज्ञान पुरस्कार

भारत सरकार ने 14 सितंबर को पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। इसके साथ ही विभिन्न विज्ञान विभागों द्वारा दिए जा रहे लगभग 300 पुरस्कारों को रद्द कर दिया गया है। राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कारों को चार श्रेणियों में रखा गया है। 1) विज्ञान रत्न पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जीवन पर्यन्त उपलब्धियों के लिए। 2) विज्ञानश्री पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए। 3) विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए 45 वर्ष की आयु तक के युवा वैज्ञानिकों को। और 4) विज्ञान टीम पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक टीम के रूप असाधारण योगदान देने वाली तीन या अधिक की टीम को।

शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार

भारत का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार की घोषणा हर साल 26 सितंबर को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर की जाती है। लेकिन इस बार कुछ दिनों पहले ही 12 वैज्ञानिकों के नामों की घोषणा कर दी गई। चिंताजनक बात यह है कि इस सूची में एक भी महिला वैज्ञानिक नहीं है। आज तक सम्मानित 600 वैज्ञानिकों  में सिर्फ 19 महिला वैज्ञानिक हैं।

संसद में अंतरिक्ष विज्ञान

संसद के विशेष सत्र में सांसदों ने अंतरिक्ष विज्ञान की ताज़ा उपलब्धियों पर वैज्ञानिकों को बधाई दी। राज्य सभा में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने बताया कि 2020 में श्रीहरिकोटा के द्वार आम जनता के लिए खोल दिए गए। उन्होंने बताया कि 2023-24 में अंतरिक्ष विभाग का बजट बढ़ाकर बारह हज़ार करोड़ रुपए किया गया है।

निपाह वायरस

केरल में चौथी बार निपाह वायरस का संक्रमण फैला और लगभग 1500 लोग इसकी चपेट में आ गए। यह रोग जानवरों (इस मामले में चमगादड़ों) से मनुष्य में फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे कोविड की तुलना में अधिक खतरनाक बताया है। इसके लक्षणों में सिरदर्द, खांसी, बुखार, सांस लेने में कठिनाई, चक्कर, मस्तिष्क में सूजन आदि शामिल हैं। अभी तक इसके लिए कोई वैक्सीन नहीं है।

नदी जोड़ो योजना जल संकट बढ़ा सकती है

मुंबई के आईआईटी, पुणे के आईआईटीएम व कई संस्थानों द्वारा किए गए एक अध्ययन (विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित) के अनुसार सूखे और बाढ़ का स्थायी हल खोजने के लिए प्रस्तावित ‘नदी जोड़ो योजना’ जल संकट बढ़ा सकती है। और तो और, इससे देश में बारिश का रुझान भी बदल सकता है।

जी-20 में विज्ञान

जी-20 अपनी स्थापना के बाद आर्थिक सहयोग के एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है। भारत की अध्यक्षता में साइंस-20 की बैठकें पुडुचेरी, अगरतला, बेंगलूरू और भोपाल में हो चुकी हैं जहां स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धि, क्वाटंम कम्प्यूटिंग, मशीन लर्निंग से जुड़े मुद्दों पर विचार किया गया।

जी-20 के झण्डे तले साइंस-20 एंगेजमेंट ग्रुप की स्थापना 2017 में की गई थी। इस वर्ष भारत की अध्यक्षता में हुई साइंस-20 बैठक की थीम चुनी गई थी- ‘डिसरप्टिव साइंस फॉर इनोवेटिव एंड सस्टेनेएबल डेवलपमेंट गोल्स’।

इगनोबल पुरस्कार 2023

14 सितंबर को 33वें इगनोबल पुरस्कारों की घोषणा की गई, जिसमें दस उपलब्धियों के लिए विजेताओं को सम्मानित किया गया। दरअसल यह बिलकुल भिन्न प्रकार का पुरस्कार है, जो पहले हंसाता है और बाद में विचार मंथन के लिए प्रेरित करता है।

मृत मकड़ियों को ग्रिपिंग औज़ारों के रूप में इस्तेमाल करने, चट्टानों को चाटने (सूखी सतह के बजाय गीली सतह पर खनिज बेहतर दिखते हैं, इसलिए खनिज पहचान करने में मदद मिलती है),‘स्मार्ट’ शौचालय का निर्माण (जो व्यक्तियों के मल-मूत्र की निगरानी और विश्लेषण कर उनके स्वास्थ्य के बारे में बताता है), नासिका में बालों की संख्या गिनने (एलोपेशिया से ग्रसित लोगों के लिए उपचार तलाशना), साहित्य में ‘देजा वु’ के विपरीत ‘जमाइ वु’ ( जिसमें कोई परिचित चीज़ (या शब्द) बार-बार दोहराने से अपरिचित लगने लगते हैं) पर शोध के लिए दिए गए।


रैफ्लेसिया पुष्प खतरे में

प्लांट्स पीपुल प्लेनेट जर्नल में प्रकाशित ताज़ा जानकारी के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े पुष्प रैफ्लेसिया का अस्तित्व खतरे में है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी 42 प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें से साठ प्रतिशत पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। रैफ्लेसिया पुष्प का वजन 6.8 किलोग्राम तक होता है और यह तीन फुट तक का हो सकता है।


नोबेल पुरस्कार राशि में वृद्धि

नोबेल पुरस्कार फाउंडेशन ने पुरस्कार राशि बढ़ाने का फैसला किया है। पुरस्कार राशि एक करोड़ क्रोनर (9,00,000 अमेरिकी डॉलर) से बढ़ाकर 1 करोड़ 10 लाख क्रोनर (9,86,270 अमेरिकी डॉलर) कर दी गई है।

दसवां भोपाल विज्ञान मेला

इस महीने भोपाल में दसवां भोपाल विज्ञान मेला आयोजित किया गया, लेकिन बारिश ने मज़ा फीका कर दिया। मेले में नवाचारी विद्यार्थियों ने अपने नवाचारी मॉडल प्रदर्शित किए। आम लोगों तक विज्ञान की बातें पहुंचाने के लिए विज्ञान मेलों की ज़रूरत है लेकिन देखा गया है कि ऐसे आयोजनों में वैज्ञानिक सोच का मुद्दा हाशिए पर ही चला जाता है।


.प्र. का प्रथम बायोटेक पार्क

मध्यप्रदेश का प्रथम बायोटेक पार्क नीमच ज़िले की जावद तहसील में 39 हैक्टर भूमि पर 50 करोड़ की लागत से स्थापित किया जाएगा। यह देश का दसवां और मध्यप्रदेश का प्रथम बायोटेक पार्क है। (स्रोत फीचर्स)

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हाथी की हरफनमौला सूंड

हाथी अपनी सूंड से लकड़ी के भारी लट्ठे से लेकर कुरकुरी आलू चिप्स बिना मसले उठा सकते हैं। उनकी सूंड की जटिल मांसल संरचना इस कोमल और मज़बूत दोनों तरह की पकड़ को संभव बनाती है। अब, शोधकर्ताओं ने एक शिशु हाथी की सूंड की विस्तृत पड़ताल कर इस उपांग की मांसपेशियों की गणना कर ली है और उन्हें चित्रित किया है। करंट बायोलॉजी में प्रस्तुत उनकी रिपोर्ट के अनुसार हाथियों की सूंड को (चीज़ों के अनुसार) पकड़ में लचीलापन मांसपेशी तंतुओं के लगभग 90,000 सूक्ष्म गुच्छों से मिलता है। इस खोज से रोबोट के उपांगों में लचीलापन लाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

गौरतलब है कि हाथी की सूंड उपांग के उन चंद उदाहरणों में से हैं जिनमें हड्डियां नहीं होती, लेकिन फिर भी ये स्वयं से घूम-मुड़ सकते हैं; जैसे हमारी जीभ। प्रमुख रूप से, सूंड के दोनों तरफ आठ मुख्य पेशियां होती हैं, साथ ही दोनों नासिका छिद्रों के बीच सूंड के शुरू से आखिर तक एक लंबी पेशी होती हैं। लेकिन सूंड को विशिष्टता इन पेशियों की सूक्ष्म बनावट से मिलती है।

पेशियां तंतुओं के गुच्छों से बनी होती हैं। इन गुच्छों को फैसिकल कहते हैं और इनकी जमावट ही पेशियों के विभिन्न कार्यों के लिए ज़िम्मेदार है। पूर्व अध्ययनों में सूंड का विच्छेदन करके अनुमान लगाया गया था कि सूंड में तकरीबन 30,000 से 1,50,000 के बीच फैसिकल्स हो सकते हैं। सटीक गणना के लिए हम्बोल्ट विश्वविद्यालय के तंत्रिका वैज्ञानिक माइकल ब्रेख्त की टीम ने 6 दिन की उम्र में मृत एक शिशु हाथी की सूंड को उच्च विभेदन वाले सीटी स्कैनर से स्कैन किया और एक सॉफ्टवेयर की मदद से सूंड के चार प्रतिनिधि भागों में पेशियों के फैसिकल्स की पहचान की। इस तरह उन्होंने पता लगाया कि पूरी सूंड में 89,000 से भी अधिक फैसिकल्स होते हैं। सूंड के पकड़ बनाने वाले सिरे पर सबसे अधिक, लगभग 8000, नन्हें फैसिकल्स होते हैं। सिरे पर इन फैसिकल्स की लंबाई महज 2 मिलीमीटर होती है और औसत व्यास मानव बाल (औसतन 75 माइक्रोमीटर) के बराबर होता है। तुलना के लिए देख सकते हैं कि मानव हाथ के फैसिकल्स करीब 60 मिलीमीटर लंबे होते हैं।

इसके अलावा सूंड के सिरे पर फैसिकल्स की जमावट रेडियल रूप में (कतार में केन्द्र से बाहर की ओर) होती है, जो पकड़ में बारीक नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है। इस तरह यह सूंड के सिरे को चुन्नट डालकर सिकुड़ने और फैलने में मदद करती है।

स्कैन से यह भी पता चला कि मुख्य सूंड में सिरे की तुलना में फैसिकल्स काफी बड़े होते हैं, और दो तरह से जमे होते हैं। लंबाई में जमे फैसिकल्स पूरी सूंड को ऊपर-नीचे और अगल-बगल ले जाने में मदद करते हैं जबकि आड़े में जमे फैसिकल्स सूंड में मरोड़ पैदा करने में सहायता करते हैं। सूंड के ऊपरी हिस्से में ज़्यादा पेशियां आड़े में जमी होती हैं जबकि नीचे की ओर लंबाई में जमी पेशियां ज़्यादा होती हैं। यही कारण है कि सूंड बाहर की तुलना में अंदर की ओर ज़्यादा मुड़ सकती है।

इस जानकारी का इस्तेमाल अधिक लचीले और नियंत्रित रोबोटिक अंग बनाने में किया जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खेती-बाड़ी में केंचुओं का अद्भुत योगदान

ह तो जानी-मानी बात है कि केंचुए मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और खेती को फायदा पहुंचाते हैं। लेकिन वास्तव में केंचुए खेती में कितना फायदा पहुंचाते हैं? अपने तरह के प्रथम अध्ययन में इसकी गणना करके बताया गया है कि केंचुओं की बदौलत हर साल 14 करोड़ टन अधिक अनाज पैदा होता है।

पैदावार में इस योगदान की गणना करने के लिए कोलोरेडो स्टेट युनिवर्सिटी के मृदा और कृषि-पारिस्थितिकीविद स्टीवन फोंटे और उनके सहयोगियों ने पूरे विश्व में केंचुओं का वितरण और अलग-अलग स्थानों पर उनकी प्रचुरता देखी और उसे हर जगह की कृषि उपज से जोड़ा। विश्लेषण करते हुए स्वयं पौधों में आई उत्पादकता में वृद्धि के कारक को भी ध्यान में रखा गया।

उन्होंने पाया कि विश्व स्तर पर धान, गेहूं और मक्का जैसी फसलों में केंचुए लगभग 7 प्रतिशत का योगदान देते हैं। दूसरी ओर, सोयाबीन, दाल वगैरह जैसी फलीदार फसलों की उपज वृद्धि में इनका योगदान थोड़ा कम है – लगभग 2 प्रतिशत। फलीदार फसलों में कम योगदान का कारण है कि ये फसलें सूक्ष्मजीवों के सहयोग से स्वयं नाइट्रोजन प्राप्त कर सकती हैं; इसलिए पोषक तत्वों के लिए कृमियों पर कम निर्भर होती हैं।

नेचर कम्युनिकेशंस में शोधकर्ता बताते हैं कि ग्लोबल साउथ के कई हिस्सों में केंचुओं से लाभ और भी अधिक है। मसलन उप-सहारा अफ्रीका में, जहां अधिकांश मिट्टी बंजर या अनुपजाऊ हो गई है और उर्वरक उनकी पहुंच में नहीं हैं, वहां केंचुए पैदावार को 10 प्रतिशत तक बढ़ा देते हैं। लेकिन अनुमानों में सावधानी की ज़रूरत है क्योंकि केंचुओं के वितरण सम्बंधी अधिकांश अध्ययन उत्तरी समशीतोष्ण देशों से थे।

उम्मीद की जा रही है कि यह अध्ययन नीति निर्माताओं और भूमि प्रबंधकों को मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने वाले और मिट्टी को स्वस्थ बनाने वाले जीवों की भूमिका पर अधिक ध्यान देने को प्रोत्साहित करेगा। उनकी सलाह है कि मिट्टी में केंचुओं के अनुकूल वातावरण रखने के लिए किसान कम जुताई करें। सघन जुताई या ट्रैक्टर से जुताई में ये कट-पिट जाते हैं।

हालांकि तथ्य तो यह भी है कि केंचुओं की सलामती के अनुकूल मिट्टी बनाने और जुताई न करने की सलाह देना जितना आसान है उतना ही मुश्किल उस पर अमल करना है। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जहां मिट्टी अक्सर अनुपजाऊ हो जाती है वहां के गरीब किसान केंचुओं की आबादी बढ़ाने के जाने-माने तरीकों, जैसे मिट्टी की नमी बढ़ाने या जैविक पदार्थ डालने, का खर्च वहन नहीं कर पाते। इसके अलावा, जुताई न करने से खरपतवार की समस्या भी बनी रहती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो केंचुओं से लाभ लेना एक बड़ी चुनौती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक विचित्र समुद्री जीव

र्ष 2018 में एक पेशेवर फोटोग्राफर ने एक विचित्र से दिखने वाले तैरते समुद्री जीव की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी – यह भूरी-नारंगी गोल गेंदनुमा जीव दिख रहा था जिसके चपटे वाले गोलार्ध पर बालों या जटाओं की तरह संरचनाएं निकली हुई दिख रही थीं। यह कोई कीट, मोलस्क या क्रस्टेशियन नहीं था, लेकिन किसी को मालूम नहीं था कि यह है कौन-सा जीव।

अब, केरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैकासिक तंत्रिका वैज्ञानिक इगोर एडेमेयको ने करंट बायोलॉजी में बताया है कि उन्होंने इसके कुल की पहचान कर ली है, और यह चपटे कृमियों के एक समूह डाइजेनियन फ्लूक का एक परजीवी सदस्य है।

एडेमेयको जब मटर के दाने जितने बड़े इस जीव का ध्यानपूर्वक विच्छेदन कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि इस जीव को (तैरकर) आगे बढ़ने में मदद करने वाले जटानुमा उपांग गेंदनुमा संरचना के जिस ऊपरी हिस्से से जुड़े थे वो चपटा था। बारीकी से अवलोकन करने पर उन्होंने पाया कि यह कोई एक प्राणी नहीं है, बल्कि आपस में गुत्थमगुत्था बहुत सारे जीव हैं, और मुख्यत: दो तरह के जीव हैं।

एक तरह के जीव गोल संरचना के ऊपरी ओर बाहर लहराते हुए दिख रहे थे जिनकी कुल संख्या करीब 20 थी, ये गोले को तैरने या आगे बढ़ने में मदद कर रहे थे – इन्हें एडमेयको ने ‘नाविक’ की संज्ञा दी है। इनके सिर पर दो बिंदुनुमा आंखें थी, जिससे इनके सिर सांप के फन की तरह दिखाई दे रहे थे।

दूसरी तरह के जीव, गोले के दूसरे (या निचले) भाग के चारों ओर हज़ारों की तादाद में मौजूद थे। ये दिखने में शुक्राणु जैसे दिख रहे थे, जिनके सिर पेंसिल की तरह नुकीले थे और पूंछ बाल से भी पतली थीं। ये सभी जीव गोले के बीच में पूंछ की ओर से एक-दूसरे के साथ गुत्थमगुत्था थे और सभी के सिर गोले के बाहर की ओर निकले हुए थे। इन जीवों को शोधकर्ताओं ने ‘यात्रियों’ की संज्ञा दी है।

विच्छेदन से जीव की बनावट तो समझ आ गई थी लेकिन इसकी पहचान नहीं हो पाई। इसे पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने एंटीबॉडी की मदद से कोशिकाओं के पैटर्न देखे। इसके आधार पर लगा कि ये जीव लोफोट्रोकोज़ोअन नामक एक समूह से सम्बंधित होंगे, जिसमें मोलस्क, ब्रायोज़ोआन, ब्रेकिओपोड और चपटा कृमि जैसे जीव आते हैं। उन्हें यह भी संदेह था कि जीवों का यह झुंड कोई परजीवी होगा।

इसके बाद, शोधकर्ताओं ने इसका डीएनए विश्लेषण किया। अंतत: वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह परजीवी चपटा कृमि कुल डायजेनियन फ्लूक का सदस्य है। और यह इसका लार्वा रूप है।

इस नए डायजेनियन परजीवी की दिलचस्प बात यह है कि इसमें दो तरह के लार्वा होते हैं जो आपस में सहयोग करते हैं। ‘यात्री’ लार्वा मछली वगैरह जैसे मेज़बानों की आंत में संक्रमण फैलाते हैं, और खुले वातावरण में वे सिर्फ अपने मेज़बान में प्रवेश करने के इंतज़ार में रहते हैं। वहीं, ‘नाविक’ लार्वा तैरकर लार्वाओं के इस पूरे गोले को यहां-वहां पहुंचाते हैं ताकि नए मेज़बान तक पहुंच सकें – लेकिन ऐसा करने के लिए वे अपना प्रजनन अवसर त्याग देते हैं ताकि अन्य को प्रजनन अवसर सुलभ हो सके। यानी ये लार्वा सहोदर चयन की एक और मिसाल हैं।

शरीर के बाहर मुक्त वातावरण में किसी परजीवी लार्वा का अध्ययन नई बात है। इस अध्ययन से पता चलता है कि मुक्त लार्वा के स्तर पर भी इस तरह का श्रम विभाजन होता है।

शोधकर्ता ऐसे और लार्वा की तलाश में हैं ताकि जान सकें कि झुंड में यह निर्णय कैसे होता है कि कौन ‘नाविक’ बनेगा और कौन ‘यात्री’? और इस गोले की गति का नियंत्रण कैसे होता है? शायद नाविकों के सिर पर मौजूद दो बिंदुनुमा आंखों की इसमें कुछ भूमिका हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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रसायन शास्त्र का नोबेल: दिलचस्प और उपयोगी खोज

र्ष 2023 का रसायन नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को दिया गया है – एलेक्साई एकिमोव (पूर्व सोवियत संघ), लुई ब्रुस (यूएस) और मौंगी बावेंडी (यूएस)। इन तीनों ने मिलकर एक ऐसे प्रभाव की खोज की है जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स व संचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। लोग इसके उपयोग से तो परिचित हैं लेकिन इसके चौंकाने वाले वैज्ञानिक धरातल से अपरिचित हैं।

इस वर्ष के रसायन नोबेल का कथानक क्वांटम यांत्रिकी से जुड़ा है। जहां एकिमोव और ब्रुस ने इस प्रभाव का अवलोकन करके इसे पहचाना, वहीं बावेंडी का प्रमुख योगदान इसे उत्पन्न करने की विधियों पर केंद्रित रहा।

यह प्रभाव साइज़ के अनुसार पदार्थों के बदलते गुणधर्मों को दर्शाता है। खास तौर से नैनो साइज़ पर यह प्रभाव बढ़-चढ़कर नज़र आने लगता है। तीनों शोधकर्ताओं ने इस बात की खोज की है कि जब हम मिलीमीटर के लाखवें-करोड़वें साइज़ के कणों के साथ काम करते हैं तो विचित्र घटनाएं होने लगती है। ऐसे कणों को क्वांटम बिंदु कहते हैं।

दरअसल, इस तरह के विचित्र प्रभाव की भविष्यवाणी काफी पहले 1930 के दशक में हरबर्ट फ्रोलिश नामक भौतिक शास्त्री कर चुके थे। फ्रोलिश ने क्वांटम यांत्रिकी की मशहूर श्रॉडिंजर समीकरण के सैद्धांतिक निहितार्थ की पड़ताल करते हुए दर्शाया था कि जब कण अत्यंत छोटे हो जाएंगे तो उनमें इलेक्ट्रॉन के लिए कम जगह रह जाएगी। परिणाम यह होगा कि इलेक्ट्रॉन (जो क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार कण भी होते हैं और तरंगें भी) पास-पास ठस जाएंगे। फ्रोलिश का मत था कि इसका पदार्थ के गुणधर्मों पर बहुत ज़्यादा असर होगा। इसे क्वांटम प्रभाव कहते हैं जो बहुत कम साइज़ों पर नज़र आता है।

भविष्यवाणी दिलचस्प थी और वैज्ञानिक गण इसे यथार्थ में साकार करने के प्रयासों में जुट गए हालांकि बहुत कम वैज्ञानिकों को लगता था कि इस क्वांटम प्रभाव का कोई व्यावहारिक उपयोग होगा।

खैर, 1970 के दशक में शोधकर्ता इस तरह की नैनो-संरचना बनाने में कामयाब हो गए। उन्होंने एक आणविक पुंज का उपयोग करते हुए एक मोटी सतह के ऊपर एक अत्यंत महीन (नैनो मोटी) परत बना दी। और इसके ज़रिए वे यह दिखा पाए कि इस महीन परत के प्रकाशीय गुणधर्म इसकी मोटाई के अनुसार बदलते हैं – यह प्रयोग क्वांटम यांत्रिकी की भविष्यवाणी से मेल खाता था। प्रायोगिक तौर पर क्वांटम प्रभाव को दर्शाना एक बड़ी बात थी लेकिन इस व्यवस्था को बनाने के लिए लगभग परम शून्य तापमान और अत्यंत गहन निर्वात की ज़रूरत थी।

इस प्रभाव को ज़्यादा साधारण अवस्था में देखने में मदद एक अनपेक्षित दिशा से मिली। रंगीन कांच बनाने की कला ने इस क्वांटम असर के अध्ययन में बहुत मदद की। प्राचीन समय से ही कारीगर लोग विभिन्न रंगों के कांच बनाते आए थे। वे कांच बनाते समय उसमें चांदी, सोना, कैडमियम जैसे पदार्थ मिलाते थे और फिर उसे अलग-अलग तापमान पर तपाकर विभिन्न रंग पैदा कर लेते थे।

भौतिक शास्त्रियों के लिए रंगीन कांच महत्वपूर्ण साधन साबित हुए थे। इनकी मदद से वे प्रकाश में से कुछ रंगों को (यानी कुछ तरंग दैर्घ्यों को) छानकर अलग कर सकते थे। इसके चलते शोधकर्ता खुद रंगीन कांच बनाने लगे। ऐसा करते हुए उन्होंने देखा कि एक ही पदार्थ मिलाने पर कांच में कई अलग-अलग रंग पैदा किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, कैडमियम सेलेनाइड और कैडमियम सल्फाइड का मिश्रण कांच में मिलाया जाए, तो वह पीला बन सकता है या लाल भी बन सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पिघले कांच को कितना तपाया गया था और किस तरह ठंडा किया गया था। है ना आश्चर्य की बात? शोधकर्ता यह भी दर्शा पाए कि कांच में रंग उसके अंदर बनने वाले कणों से पैदा होता है और कणों की साइज़ पर निर्भर करता है।

इस वर्ष के एक नोबल विजेता, एलेक्साई एकिमोव, ने इसी बात को आगे बढ़ाया। उन्हें यह बात थोड़ी बेतुकी लगी कि एक ही पदार्थ कांच में अलग-अलग रंग पैदा कर सकता है। लेकिन खुशकिस्मती से एकिमोव प्रकाशीय अध्ययनों से वाकिफ थे। लिहाज़ा, 1970 दशक में उन्होंने इनकी मदद से रंगीन कांचों की तहकीकात शुरू कर दी। उन्होंने व्यवस्थित रूप से कॉपर क्लोराइड से रंजित कांचों का निर्माण किया और पिघले हुए कांच को 500 से 700 डिग्री सेल्सियस पर अलग-अलग अवधियों (1 से लेकर 96 घंटे) तक तपाया। एक्सरे विश्लेषण से पता चला कि निर्माण की प्रक्रिया का असर कॉपर क्लोराइड के कणों की साइज़ पर हुआ था – कुछ नमूनों में ये कण मात्र 2 नैनोमीटर के थे जबकि कुछ नमूनों में इनकी साइज़ 30 नैनोमीटर तक थी।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इन कणों की साइज़ का असर कांच द्वारा सोखे गए प्रकाश पर पड़ रहा था – बड़े कण तो प्रकाश को उसी तरह सोख रहे थे जैसे कॉपर क्लोराइड सामान्यत: सोखता है लेकिन कण की साइज़ जितनी कम होती थी, वे उतना ही अधिक नीला प्रकाश सोखते थे।

भौतिक शास्त्री होने के नाते एकिमोव क्वांटम यांत्रिकी के नियमों से परिचित थे और फौरन समझ गए कि वे जिस चीज़ का अवलोकन कर रहे हैं, वह साइज़-आधारित क्वांटम प्रभाव है। यह पहली बार था कि किसी ने जानबूझकर क्वांटम बिंदु निर्मित किए थे। क्वांटम बिंदु यानी ऐसे नैनो-कण जो साइज़-आधारित प्रभाव उत्पन्न करें।

दिक्कत यह हुई कि एकिमोव ने अपनी खोज के परिणाम एक सोवियत शोध पत्रिका में प्रकाशित किए। शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ से बाहर इस शोध पत्र पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।

सो, इस वर्ष के दूसरे नोबेल विजेता लुई ब्रुस ने 1983 में यह खोज दोबारा की। दरअसल, ब्रुस तो कोशिश कर रहे थे कि सौर ऊर्जा की मदद से रासायनिक क्रियाओं को गति दे सकें। उन्होंने कैडमियम सल्फाइड के अत्यंत छोटे कण एक घोल में बनाए। छोटे कण बनाने का मकसद था कि उनकी सतह का क्षेत्रफल अधिकतम रहे। लेकिन ऐसा करते हुए ब्रुस ने एक अजीब-सा अवलोकन किया – जब वे इन कणों को प्रयोगशाला की बेंच पर कुछ समय के लिए छोड़ देते थे, तो उनके गुणधर्म बदल जाते थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि शायद ऐसा इसलिए हो रहा होगा क्योंकि रखे-रखे वे कण बड़े हो जाते होंगे। अपने अनुमान की पुष्टि के लिए उन्होंने कैडमियम सल्फाइड के लगभग 4.5 नैनोमीटर के कण बनाए और इनके प्रकाशीय गुणधर्मों की तुलना 12.5 नैनोमीटर के कणों से की। निष्कर्ष यह निकला कि बड़े कण तो उसी तरंग दैर्घ्य का प्रकाश अवशोषित करते हैं जो कैडमियम सल्फाइड सामान्य रूप से करता है लेकिन छोटे कणों के मामले में अवशोषण थोड़ा नीले रंग की ओर सरक जाता है। ब्रुस भी समझ गए कि उन्होंने साइज़-आधारित क्वांटम प्रभाव का अवलोकन किया है। 1983 में अपने परिणाम प्रकाशित करने के बाद उन्होंने कई पदार्थों के साथ प्रयोग करके पाया कि जितने छोटे कण होते हैं, अवशोषण नीली तरंग दैर्घ्यों की ओर खिसकता जाता है।

अब सवाल उठता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है। जवाब है कि यदि एक ही पदार्थ के कणों की साइज़ बदलने से उसका प्रकाश अवशोषण बदल जाता है, तो इसका मतलब हुआ कि उसमें कुछ तो बुनियादी रूप से बदल गया है। किसी भी पदार्थ के प्रकाशीय गुण उसके इलेक्ट्रॉन पर निर्भर करते हैं और उसके रासायनिक गुण भी। यानी किसी पदार्थ के रासायनिक गुण सिर्फ इलेक्ट्रॉन कक्षकों की संख्या और सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या से तय नहीं होते बल्कि नैनो पैमाने पर साइज़ पर भी निर्भर करते हैं।

धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया कि क्वांटम बिंदु के कई व्यावहारिक उपयोग हैं। ये आज क्वांटम बिंदु नैनो-टेक्नॉलॉजी का एक महत्वपूर्ण औज़ार हैं और तमाम उत्पादों में नज़र आते हैं। इनका सबसे अधिक उपयोग रंगीन प्रकाश पैदा करने में किया गया है। यदि क्वांटम बिंदुओं पर नीला प्रकाश डाला जाए तो ये उसे सोख लेते हैं और किसी अन्य रंग का प्रकाश छोड़ते हैं। उत्सर्जित प्रकाश का रंग क्वांटम बिंदु की साइज़ पर निर्भर करता है। इस तरह नीले प्रकाश को अलग-अलग रंगों में बदलकर तीन प्राथमिक रंग (नीला, लाल और हरा) बनाए जा सकते हैं। इनकी मदद से एलईडी लैम्प के प्रकाश का रंग व तीव्रता भी नियंत्रित किए जा सकते हैं।

क्वांटम बिंदुओं का उपयोग जैव-रसायन और चिकित्सा में भी किया जा सकता है। जैसे क्वांटम बिंदुओं को जैविक अणुओं से जोड़कर कोशिकाओं तथा अंगों का अध्ययन किया जा सकता है। और तो और, शरीर में ट्यूमर ऊतकों पर नज़र रखने में भी क्वांटम बिंदुओं के उपयोग पर काम शुरू हुआ है। माना जा रहा है कि भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में ये निहायत उपयोगी साबित होने जा रहे हैं।

अलबत्ता सही मनचाही साइज़ के क्वांटम बिंदु बनाना टेढ़ी खीर थी। जब तक उम्दा गुणवत्ता के क्वांटम बिंदु बनाने का कोई आसान तरीका सामने नहीं आता तब तक इनका उपयोग करना असंभव था। और यहीं तीसरे नोबेल विजेता मौंगी बावेंडी के योगदान को सम्मान दिया गया है। उन्होंने वह टेक्नॉलॉजी विकसित जिसकी मदद से नियंत्रित ढंग से क्वांटम बिंदुओं का निर्माण करना संभव हुआ। (स्रोत फीचर्स)

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विचित्र खोजों के लिए इगनोबल पुरस्कार

र वर्ष की तरह इगनोबल पुरस्कार विचित्र खोजों के लिए दिए गए हैं। पिछले 33 वर्षों से इगनोबल पुरस्कार ऐसे सवालों के जवाब खोजने के लिए दिए जाते रहे हैं जो पहली नज़र में तो हास्यास्पद लगते हैं लेकिन हमें सोचने को मजबूर कर देते हैं।

पहला पुरस्कार इस सवाल का जवाब खोजने के लिए दिया गया: भूगर्भ वैज्ञानिक चट्टानों को क्यों चाटते हैं? लाइसेस्टर विश्वविद्यालय के भूगर्भ वैज्ञानिक यान ज़लासिविक्ज़ के मुताबिक इस सवाल का जवाब बहुत आसान है – चट्टानों में उपस्थित खनिज कण सूखी चट्टान की अपेक्षा गीली सतह पर बेहतर नज़र आते हैं। लिहाज़ा, गीला करने पर मैदानी परिस्थिति में चट्टानों की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।

और तो और, ज़लासिविक्ज़ याद करते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भूगर्भ वैज्ञानिक चट्टानों को सिर्फ चाटते नहीं थे बल्कि वे उन्हें पकाते थे और कभी-कभी तो उन्हें खा भी लेते थे। इस संदर्भ में उन्होंने 2017 में पैलिऑन्टोलॉजिल एसोसिएशन के न्यूज़लेटर में लिखा भी था, “हमने चखकर चट्टानों को पहचानने की कला गंवा दी है।”

इसी सिलसिले में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मूत्र विशेषज्ञ (यूरोलॉजिस्ट) सेउंगमिन पार्क को एक ‘स्मार्ट लैटरीन’ के आविष्कार के लिए पुरस्कृत किया गया है। पार्क इसे स्टैनफोर्ड टॉयलेट कहते हैं और इसकी विशेषता है कि यह व्यक्ति के मल व मूत्र की जांच करके उसकी सेहत का विश्लेषण कर सकती है। जिस तरह से आप जो कुछ खाते-पीते हैं, उसकी तहकीकात कर सकते हैं, उसी तरह से आप अपने उत्सर्जित पदार्थों की भी निगरानी कर सकते हैं। पेशाब में एक डिपस्टिक परीक्षण संक्रमण, मधुमेह या अन्य रोगों का संकेत दे देगा। इस लैट्रीन में एक कंप्यूटर दृष्टि तंत्र लगा है जो पेशाब की मात्रा और उसके त्याग की रफ्तार का हिसाब रखेगा; और एक सेंसर व्यक्ति के गुदा द्वार के विशिष्ट गुणधर्मों के आधार पर उसकी पहचान करता है। यह लगभग फिंगरप्रिंट की तरह काम करता है।

साहित्य के क्षेत्र में इस वर्ष का इगनोबल पुरस्कार उन शोधकर्ताओं के मिला है जिन्होंने एक अजीबोगरीब परिघटना की तहकीकात की है। यह परिघटना सामान्य देजावु (जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वर्तमान में वह जो देख-सुन रहा है, वह पहले भी हो चुका है) के विपरीत है – जमाइ वु। इसमें व्यक्ति को जानी-पहचानी चीज़ें भी अपरिचित लगने लगती हैं। इसके शोधकर्ता दल के अकीरा ओकोनोर ने बताया है कि इस स्थिति को प्रयोगशाला में निर्मित किया जा सकता है – व्यक्तियों को एक ही शब्द बार-बार, बार-बार, इतनी बार दोहराने को कहा जाए कि वह शब्द अनजाना सा लगने लगे।

अब कुछ मज़ेदार अनुसंधान पर गौर फरमाइए। उदाहरण के लिए चिकित्सा में जिस टीम को इगनोबल पुरस्कार मिला उसने मानव शवों की नाक में ताक-झांक करके यह देखने की कोशिश की है कि क्या दोनों नथुनों में बालों की संख्या बराबर होती है। इस टीम का नेतृत्व कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इर्विन की त्वचा विशेषज्ञ नताशा मेसिंकोव्स्का ने किया। उन्होंने बताया है कि उक्त जानकारी शारीरिकी की पाठ्य पुस्तकों में उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उन्हें यह काम हाथ में लेना पड़ा।

यह अध्ययन बाल गंवा रहे लोगों (एलोपेशिया से पीड़ित लोगों) के उपचार में मदद करेगा। मेसिंकोव्स्का का मत है कि एलोपेशिया से पीड़ित लोगों में प्राय: नथुने के बाल झड़ जाते हैं और वे एलर्जी और संक्रमण के प्रति दुर्बल हो जाते हैं। यह अध्ययन थोड़ा असामान्य लग सकता है लेकिन इसकी ज़रूरत का मूल यह समझने में था कि ये बाल श्वसन तंत्र की प्रथम रक्षा पंक्ति के तौर पर क्या भूमिका निभाते हैं।

एक और पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया है जिसमें मृत मकड़ियों को पुनर्जीवित करने (ज़ॉम्बी मकड़ियों के निर्माण) का प्रयास किया गया था। मंशा यह थी कि इन मृत मकड़ियों का उपयोग चीज़ों को पकड़ने के औज़ार के रूप में किया जा सके। शोध के इस क्षेत्र को ‘नेक्रोबोटिक्स’ कहते हैं और इसमें जीवित सामग्री (या सही शब्दों में पूर्व-जीवित सामग्री) का उपयोग रोबोट बनाने में किया जाता है।

एक अन्य पुरस्कृत अध्ययन इस बाबत था कि मानव मस्तिष्क कैसे शब्दों का निर्माण करने वाली विभिन्न ध्वनियों को पहचानना सीखता है। इसे समझने के लिए टीम ने उन लोगों की मस्तिष्क गतिविधियों का अध्ययन किया जो उल्टा बोल सकते हैं – जैसे ‘कमल का फूल’ को ‘लफू का लमक’।

मज़ेदार बात यह रही कि सारे विजेताओं को 10 खरब ज़िम्बाब्वे मुद्रा का एक नकली नोट दिया गया और 6 पन्ने का एक पीडीएफ चित्र भेंट किया गया। इस तस्वीर का प्रिंटआउट लेकर फोल्ड करके ट्रॉफी बनाई जा सकती है। गौरतलब है कि यह पुरस्कार वैज्ञानिक हास्य पत्रिका एनल्स ऑफ इम्प्रॉबेबल रिसर्च द्वारा प्रदान किया जाता है। (स्रोत फीचर्स)

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भारत में हरित क्रांति के पुरौधा स्वामिनाथन नहीं रहे

त 28 सितंबर के दिन मशहूर कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामिनाथन का निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। उन्होंने भारत में हरित क्रांति की बुनियाद रखी थी जिसकी बदौलत किसी समय खाद्यान्न के अभाव से पीड़ित देश न सिर्फ आत्मनिर्भर बना बल्कि निर्यातक भी बन गया।

वे सात दशकों तक कृषि अनुसंधान, नियोजन और प्रशासन के अलावा किसानों को नई तकनीकें अपनाने के लिए प्रशिक्षित करने में भी सक्रिय रहे।

1925 में तमिलनाडु के एक छोटे कस्बे में जन्मे डॉ. स्वामिनाथन ने आलू संवर्धन में विशेषज्ञता हासिल की थी और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में इसी विषय पर पोस्ट-डॉक्टरल अनुसंधान किया था। यूएस में ही आगे काम करते रहने का अवसर मिलने के बावजूद वे 1954 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में काम करने को भारत लौट आए थे।

1979 से 1982 तक वे कृषि एवं सिंचाई मंत्रालय में प्रमुख सचिव रहे। डॉ. स्वामिनाथन योजना आयोग के सदस्य और मंत्रिमंडल की विज्ञान सलाहकार समिति के अध्यक्ष भी रहे। 1982 में उन्हें इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (फिलिपाइन्स) का महानिदेशक नियुक्त किया गया और 1988 तक वे इस पद पर रहे। भारत लौटकर वे पर्यावरण नीति व भूजल नीति सम्बंधी समितियों के अध्यक्ष रहे और राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में पादप आनुवंशिकीविद के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने देखा कि मेक्सिको में नॉर्मन बोरलॉग द्वारा विकसित गेहूं की नई किस्में परीक्षण के दौरान अद्भुत पैदावार दे रही हैं। स्वामिनाथन और बोरलॉग के बीच एक लाभदायक साझेदारी विकसित हुई और स्वामिनाथन ने बोरलॉग द्वारा विकसित किस्मों का संकरण मेक्सिको व जापान की अन्य किस्मों से करवाकर बेहतर गेहूं पैदा करने में सफलता हासिल की। गेहूं के ये नए पौधे ज़्यादा मज़बूत थे और दाना सुनहरा था।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक के नाते उन्होंने सरकार को राज़ी किया कि मेक्सिको से 18,000 टन गेहूं के बीज का आयात किया जाए। असर यह हुआ कि 1974 तक भारत गेहूं व धान के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका था।

डॉ. स्वामिनाथन को 1987 में प्रथम विश्व खाद्य पुरस्कार दिया गया; उन्होंने इस पुरस्कार के साथ प्राप्त 2 लाख डॉलर का उपयोग एम. एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना हेतु किया जो आज भी देश में एक अग्रणी नवाचार संस्थान है। (स्रोत फीचर्स)

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स्तनपान की पौष्टिकता – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

र्ष 2016 के दी लैसेंट की स्तनपान शृंखला में सीज़र विक्टोरा और उनके साथियों ने लिखा था: “नवजात शिशुओं के लिए स्तनपान न सिर्फ बखूबी संतुलित पोषण आपूर्ति है, बल्कि संभवत: यह उसे मिलने वाली सबसे विशिष्ट वैयक्तिकृत औषधि है, जो ऐसे समय उसे मिलती है जब जीवन के लिए उसकी जीन अभिव्यक्ति बेहतर तालमेल बैठा रही होती है।”

अब मानव दूध की इस ध्यानपूर्वक संरचित समृद्धि के बारे में आई नई खोज ने मायो-इनोसिटॉल के महत्व पर प्रकाश डाला है। मायो-इनोसिटॉल एक चक्रीय शर्करा अल्कोहल है। स्तनपान के पहले दो हफ्तों में मायो-इनोसिटॉल का स्तर उच्च होता है फिर कुछ महीनों की अवधि में धीरे-धीरे इसका स्तर कम होता जाता है। शुरुआती चरणों में, नवजात शिशु के मस्तिष्क में तेज़ी से नए-नए सायनेप्स (तंत्रिकाओं के संगम बिंदु) बनकर ‘तार’ जुड़ रहे होते हैं (या ‘वायरिंग’ हो रही होती है)। प्रारंभिक विकास के दौरान उचित सायनेप्स बनना संज्ञानात्मक विकास की नींव रखते हैं; अपर्याप्त सायनेप्स निर्माण से मस्तिष्क के विकास में कठिनाई आती है।

येल विश्वविद्यालय के थॉमस बाइडरर के शोध दल द्वारा PNAS में प्रकाशित निष्कर्ष भी उपरोक्त निष्कर्ष से मेल खाते हैं – परखनली में संवर्धित चूहे की तंत्रिकाओं में मायो-इनोसिटॉल देने पर उनकी तंत्रिकाओं के बीच प्रचुर मात्रा में सायनेप्स बने थे।

मायो-इनोसिटॉल एक चक्रीय शर्करा-अल्कोहल है, जो चीनी से लगभग आधा मीठा होता है। यह मस्तिष्क में प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है, जहां यह कई हार्मोनों की क्रियाओं में मध्यस्थता करता है। हमारे शरीर को कोशिका झिल्ली बनाने के लिए इनोसिटॉल की आवश्यकता होती है। हमारा शरीर ग्लूकोज़ से मायो-इनोसिटॉल बनाता है और यह प्रक्रिया अधिकांशत: किडनी में होती है। कॉफी और चीनी के सेवन से, और मधुमेह जैसी स्थितियों में हमारे शरीर की इनोसिटॉल ज़रूरत बढ़ जाती है। अनाज और बीजों के चोकर (ऊपरी छिलके) में इनोसिटॉल के निर्माण में शामिल घटक, फायटिक एसिड, होता है। बादाम, मटर और खरबूजे भी इसके समृद्ध स्रोत हैं।

मधुमेह से ग्रसित जंतु मॉडल में, इनोसिटॉल से वंचित चूहों के आहार में मायो-इनोसिटॉल पुन: शामिल करने से उनमें मोतियाबिंद और मधुमेह से जुड़ी अन्य समस्याओं को रोकने में मदद मिली।

मानव दूध के अन्य घटक भी विशिष्ट पोषकों से परिपूर्ण होते हैं। मेक्सिको स्थित मीड जॉनसन पीडियाट्रिक न्यूट्रिशन इंस्टीट्यूट के डॉ. शे फिलिप्स और उनके साथियों ने मानव दूध के संघटन को प्रभावित करने वाले कई कारकों का विश्लेषण किया है। वे बताते हैं कि एक आवश्यक पोषक तत्व, ओमेगा-3 वसा अम्ल (डाइकोसा-हेक्सेनोइक एसिड या डीएचए) की मात्रा गर्भवती स्त्री द्वारा लिए गए भोजन के आधार पर बदलती है। स्तनपान कराने वाली मां के दूध में डीएचए का स्तर विभिन्न देशों में अलग-अलग होता है – चीन की महिलाओं के दूध में 2.8 प्रतिशत, जापान की महिलाओं में 1 प्रतिशत, युरोप और अमेरिका की महिलाओं में लगभग 0.4-0.2 प्रतिशत और कई विकासशील देशों की महिलाओं के दूध में महज़ 0.1 प्रतिशत। डीएचए विकासशील मस्तिष्क और रेटिना के लिए महत्वपूर्ण होता है।

नेक्रोटाइज़िंग एंटरोकोलाइटिस (एनईसी) पाचन तंत्र की एक गंभीर तकलीफ है जो समय-पूर्व जन्मे या बेहद कम वज़न वाले शिशुओं को प्रभावित करती है। लक्षण हैं: पर्याप्त दूध न पीना, पेट में सूजन, अंगों की गड़बड़। यह जानलेवा हो सकती है। बोतल से दूध पिलाना, समय-पूर्व जन्म और जन्म के समय कम वज़न (<1.5 किलोग्राम) इसके होने का जोखिम बढ़ाते हैं। यह स्थिति खराब रक्त संचार और आंतों के संक्रमण के मिले-जुले असर से उत्पन्न होती है। स्तनपान और प्रोबायोटिक्स के उपयोग से एनईसी को होने से रोका जा सकता है। समय-पूर्व जन्मे लगभग 10 प्रतिशत शिशु एनईसी से ग्रसित हो जाते हैं, और प्रभावित शिशुओं में से एक चौथाई इस बीमारी के कारण दम तोड़ देते हैं। समय-पूर्व जन्मे बच्चों की आंतें पर्याप्त मात्रा में इंटरल्यूकिन-22 नामक पदार्थ नहीं बना पातीं जो हमें संक्रमण से बचाने में सहायक होता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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