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रानी घोंघा अपनी आकर्षक खोल (शंख) और स्वादिष्ट मांस के लिए प्रसिद्ध है। सदियों से इन्हें इनके मांस के लिए पकड़ा जा रहा है। इनके मांस की सबसे अधिक खपत संयुक्त राज्य अमेरिका में होती है। अमरीकी सरकार के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि इस आपूर्ति के लिए इनका अतिदोहन रानी घोंघो को विलुप्ति की ओर धकेल सकता है।
इस अध्ययन पर सार्वजनिक राय लेने के बाद अब इस बात पर विचार किया जा रहा है कि इन कैरेबियाई प्रजातियों को संकटग्रस्त प्रजाति अधिनियम के तहत जोखिमग्रस्त जीवों की सूची में शामिल किया जाए या नहीं।
इस कदम का कई देशों के मछुआरे विरोध कर रहे हैं – उनकी चिंता है कि इस तरह सूचीबद्ध करने से यूएस को घोंघे का मांस निर्यात करना मुश्किल हो जाएगा, जो उनका सबसे बड़ा बाज़ार है।
अध्ययन पर अंतर-सरकारी संगठन, कैरेबियन रीजनल फिशरीज़ मैकेनिज़्म, की मत्स्य विज्ञानी मैरेन हेडली का कहना है कि हमें नहीं लगता है कि इस समय संकटग्रस्त प्रजाति अधिनियम के तहत इन प्रजातियों को सूचीबद्ध करना उचित है, या इनकी रक्षा के लिए यही सर्वोत्तम विकल्प है। प्रजातियों को जोखिमग्रस्त सूची में शामिल करने से पड़ने वाले संभावित आर्थिक प्रभाव का हवाला देते हुए उनका कहना है कि हमारा उद्देश्य मत्स्य-संसाधनों का बेहतर प्रबंधन होना चाहिए।
ये घोंघे समूचे कैरबियाई सागर में समुद्री घास के झुरमुटों में रहते हैं। बहामास के तट पर पकड़े गए घोंघों की खोल का विशाल ढेर इनके अतिदोहन का गवाह है। ये तो गनीमत है कि इनमें से कुछ प्रजातियां अपनी कुछ खासियत की वजह से कभी-कभी शिकारी गोताखोरों से बच जाती हैं। कुछ घोंघे दुर्गम समुद्री इलाकों में या बहुत गहराई में रहने की वजह से सुरक्षित बच जाते हैं। वहीं वयोवृद्ध घोंघे, जो 35 सेंटीमीटर तक लंबे हो जाते है, उम्र के साथ उनकी खोल पर उगने वाले शैवाल या प्रवाल की वजह से शिकारियों से ओझल रहते हैं।
इनके अतिदोहन के कारण 1975 में फ्लोरिडा में घोंघे पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इनकी घटती आबादी के कारण अन्य देशों ने भी इस पर प्रतिबंध लगाने का कदम उठाया। और 1992 में वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की संधि (CITES) द्वारा घोंघों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित किया गया। घोंघे के निरंतर अतिदोहन से चिंतित CITES ने 2003 में होंडुरास, हैती और डोमिनिकन गणराज्य से घोंघे के आयात पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी।
यूएस के नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) द्वारा की गई समीक्षा के अनुसार, वर्तमान में हर जगह इनकी संख्या कम है, और शेष स्थानीय आबादी में जीन प्रवाह बनाए रखने के लिए लार्वा पर्याप्त रूप से नहीं फैल रहे हैं। हालांकि बहामास, जमैका और कुछ अन्य स्थानों में घोंघे अभी फल-फूल रहे हैं, लेकिन आने वाले सालों में होने वाला दोहन इन्हें विलुप्ति की ओर ले जा सकता है। इन्हें संकटग्रस्त की सूची में डालने से भविष्य में अन्य देशों में इनके आयात पर प्रतिबंध को उचित ठहराया जा सकेगा, और घोंघा पालन के बेहतर प्रबंधन की राह आसान हो जाएगी। 2018 में अमेरिका ने 3.3 करोड़ डॉलर के घोंघे का मांस का आयात किया था। इसलिए इन्हें संकटग्रस्त सूचीबद्ध करना एक स्पष्ट संदेश देगा कि यह प्रजाति खतरे में है।
लेकिन इससे सभी सहमत नहीं है। प्यूर्टो रिको विश्वविद्यालय के मत्स्य जीवविज्ञानी रिचर्ड एपलडॉर्न का कहना है कि उन्हें घोंघों की स्थिति उतनी भयानक नहीं लगती। जैसे, उनका कहना है कि उपरोक्त अध्ययन में इस बात का ध्यान नहीं रखा गया है कि घोंघे प्रजनन से पहले इकट्ठे होते हैं, इसलिए आबादी का फैलाव और घनत्व भ्रामक दिख सकता है। उनके अनुसार, घोंघे पकड़ने वाले समुदायों के ज्ञान को शामिल करने से बेहतर सर्वेक्षण हो सकता है। ऐसा ज़रूरी नहीं कि कुशल वैज्ञानिक घोंघे गिनने में भी माहिर हों।
कुछ देशों का कहना है कि वे घोंघों के शिकार का प्रबंधन करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। बेलीज़ मत्स्य विभाग के मौरो गोंगोरा ने बताया कि उनके देश में 15,000 लोग घोंघों से लाभान्वित होते हैं, खासकर तटवर्ती छोटे गांवों के मछुआरे, और यहां की घोंघो की आबादी अच्छी तरह से प्रजनन कर रही है। चूंकि हम घोंघों के महत्व को पहचानते हैं इसलिए हम इनके बेहतर प्रबंधन के भरसक प्रयास कर रहे हैं।
लेकिन इस पर एनओएए का कहना है कि कई कैरेबियाई देशों में संरक्षण सम्बंधी नियम-कायदों की कमी है। इनकी आबादी में गिरावट को रोकने के लिए अधिक कदम उठाने की ज़रूरत है।
जमैका के मत्स्य पालन निदेशक स्टीफन स्मिकले का कहना है कि घोंघों के अवैध और अनियंत्रित शिकार से निपटने के लिए अमेरिकी सरकार के अधिक समर्थन की ज़रूरत है। इन्हें संकटग्रस्त सूचीबद्ध करने से वित्तीय मदद को बढ़ावा मिल सकता है। और इससे त्वरित संरक्षण और आबादी सुधार प्राथमिकता बन जाएगी।
अधिक वित्तीय सहयोग से कृत्रिम परिवेश में अंडों को सेकर घोंघों के उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा करना एक बहुत गंभीर घाव की महज़ मलहम-पट्टी करने जैसा होगा। प्राकृतिक प्रजनन के माध्यम से घोंघो की आबादी में सुधार करना ही एकमात्र स्थायी तरीका है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://en.wikipedia.org/wiki/Aliger_gigas#/media/File:Strombus_gigas_Duclos_in_Chenu_1844_pl_1.jpg
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा से प्राप्त जानकारी के अनुसार इनसाइट मिशन का अंत हो गया है। यह मार्स लैंडर चार वर्षों से अधिक समय तक मंगल ग्रह पर होने वाले भूकंपों (मंगल-कंपों) की जानकारी देता रहा जिससे ग्रह की आंतरिक संरचना को समझने में काफी मदद मिली। लैंडर से आखिरी बार 15 दिसंबर, 2022 को संपर्क हुआ। दो बार संपर्क का प्रयास करने के बाद एजेंसी का ऐसा मानना है कि लैंडर की बैटरी खत्म हो गई होगी और धूल से ढंके सौर-पैनल बिजली पैदा नहीं कर पा रहे होंगे।
83 करोड़ डॉलर की लागत वाले इस मिशन का उद्देश्य मंगल के छोटे मंगलकंपों की कंपन तरंगों को रिकॉर्ड करना था। ये तरंगें ग्रह की गहराई में सीमाओं से टकराकर लैंडर पर स्थित कंपनमापी तक पहुंचती हैं। शोधकर्ताओं ने इन तरंगों के आगमन के समय में अंतर का उपयोग करते हुए ग्रह की आंतरिक तस्वीर तैयार करने की कोशिश की है।
टीम ने पाया कि मंगल ग्रह एक पतली पर्पटी, एक ठंडे मेंटल और एक बड़े कोर से निर्मित है। ग्रह के कोर में एक पिघली हुई बाहरी परत भी है।
वैसे इस मिशन में कुछ दिक्कतें भी रहीं। लैंडर में उपस्थित हीट प्रोब ग्रह की लौंदेदार मिट्टी में घुसकर अपना बिल नहीं बना पाया। लेकिन अपने पूरे जीवनकाल में लैंडर ने क्षुद्रग्रह की टक्करों सहित 1319 मंगलकंपों का पता लगाया। पिछले वर्ष मई में इसने 4.7 तीव्रता वाले सबसे विशाल मंगलकंप का पता लगाया जिसने मंगल की ऊपरी सतह को 10 घंटों तक कंपाया।
इस ज़ोरदार मंगलकंप के ठीक बाद इस मिशन ने अंत की तैयारी शुरू कर दी। बैटरी की शक्ति को बचाने के लिए लैंडर के विभिन्न हिस्सों को बंद करते हुए केवल कंपनमापी को चालू रखा गया ताकि वह लंबे समय तक चलता रहे। मिशन का अंत तो हो गया लेकिन इसने मंगल ग्रह का अंदरूनी नक्शा बनाने में बहुत मदद की है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adg4237/abs/_20221222_on_mars_insight.jpg
वैज्ञानिकों के अनुसार एक समय ऐसा भी था जब मंगल ग्रह वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग था। घाटियों से निकलती हुई नदियां और झीलें मौजूद थीं और विशेष रूप से चुंबकीय क्षेत्र ने अंतरिक्ष विकिरण से ग्रह को सुरक्षित रखा था। कुछ प्रमुख सिद्धांतों के अनुसार ग्रह के आंतरिक भाग के ठंडे होकर ठोस बनने के कारण चुंबकीय क्षेत्र खत्म हो गया जिससे ग्रह का वातावरण असुरक्षित हो गया और नमी और गर्मी का युग समाप्त हो गया। अलबत्ता, वैज्ञानिकों के बीच इस घटना के समय को लेकर मतभेद हैं।
हाल ही में मंगल ग्रह के सुप्रसिद्ध उल्कापिंड ALH84001, जो यह उल्का पिंड 1984 में अंटार्कटिका के एलन हिल्स नामक स्थान पर मिला था, का नए प्रकार के क्वांटम सूक्ष्मदर्शी से अध्ययन करने पर इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र 3.9 अरब वर्ष पूर्व तक मौजूद था। यह समय वर्तमान के सबसे स्वीकार्य समय से करोड़ों वर्ष पहले का है। मंगल ग्रह से पृथ्वी तक पहुंचने वाले इस छोटे से उल्कापिंड की मदद से मंगल पर जीवन के संकेतों का पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा यह अध्ययन पृथ्वी के समान मंगल के चुंबकीय ध्रुवों के पलटने के विचार का भी समर्थन करता है। इसकी मदद से ग्रह के बाहरी कोर में तरल डायनमो की जानकारी मिल सकती है जो एक समय में चुंबकीय क्षेत्र को ऊर्जा प्रदान करता था।
वास्तव में जब लौह-युक्त खनिज पिघली हुई चट्टानों से क्रिस्टलीकृत होते हैं तो उन क्रिस्टल के चुंबकीय क्षेत्र ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की लाइन में जम जाते हैं। और ये मूल चुंबकीय क्षेत्र की दिशा की छाप के रूप में संरक्षित हो जाते हैं। इसके बाद कोई चट्टान ग्रह के किसी स्थान पर टकराई तो वहां के कुछ हिस्से गर्म होकर पिघलते हैं और एक नया चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है।
गौरतलब है कि मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाले ऑर्बाइटर्स ने मंगल की सतह पर चुंबकीय अवशेषों की पहचान की है। लेकिन मंगल पर क्षुद्रग्रहों की टक्कर से बनने वाले सबसे प्राचीन गड्ढों – हेलास, अर्जायर और इसिडिस क्रेटर्स – में चुंबकीय चट्टानें नहीं मिली हैं।
अधिकांश शोधकर्ताओं का मत है कि लगभग 4.1 अरब वर्ष पूर्व इन क्रेटर्स के बनने तक चुंबकीय डायनमो कमज़ोर हो गया होगा जिसके कारण इसका प्रभाव देखने को नहीं मिला है। फिर भी ऑर्बाइटर्स को मंगल ग्रह के कुछ अन्य हिस्सों, जो उक्त क्रेटर्स से कई लाख वर्षों बाद के हैं, के लावा में चुंबकीय निशान प्राप्त हुए। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुंबकीय क्षेत्र काफी समय बाद भी मौजूद रहा था।
इसी संदर्भ में हारवर्ड युनिवर्सिटी की सारा स्टील ने उल्कापिंड एलन हिल्स 84001 का अध्ययन करने का विचार किया। 1990 के दशक में इस उल्कापिंड के बारे में दावा किया गया था कि इसमें बैक्टीरिया के जीवाश्म मौजूद हैं। हालांकि इस दावे को खारिज कर दिया गया था और इसके चलते 2 किलोग्राम की यह चट्टान काफी बदनाम हो गई थी। बहरहाल, यह उल्कापिंड 4.1 अरब वर्ष पुराना है इसलिए मंगल के उस समय के इतिहास का अध्ययन करने के लिए यह उपयुक्त नमूना है।
चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए स्टील और हारवर्ड प्लेनेटरी वैज्ञानिक रॉजर फू ने क्वांटम डायमंड माइक्रोस्कोप से एलन हिल्स के 0.6 ग्राम के टुकड़े के तीन पतले स्लाइस की इमेजिंग की। यह माइक्रोस्कोप हीरे में उपस्थित परमाणु स्तर की अशुद्धियों पर निर्भर करता है जो चुंबकीय क्षेत्र में मामूली परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील होती हैं। इस उच्च क्षमता वाले माइक्रोस्कोप से नमूने में तीन अलग-अलग स्थानों पर आयरन-सल्फाइड के साक्ष्य प्राप्त हुए। इनमें से दो स्थान अलग-अलग दिशाओं में शक्तिशाली रूप से चुंबकित थे जबकि एक में उल्लेखनीय चुंबकीय चिंह का अभाव था।
स्टील और फू का कहना है कि इन तीन स्थानों का चुंबकत्व तीन अलग-अलग घटनाओं से उत्पन्न हुआ जिनकी समयरेखा 4 अरब, 3.9 अरब और 1.1 अरब वर्ष पहले की पाई गई हैं। फू के अनुसार दो अत्यधिक चुंबकीय स्थान इस ओर संकेत देते हैं कि पूरे ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र 3.9 अरब वर्ष पहले तक उपस्थित रहा होगा। यह चुंबकीय क्षेत्र काफी शक्तिशाली रहा होगा: लगभग 17 माइक्रोटेस्ला जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई है। कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार यह चुंबकीय क्षेत्र हानिकारक कॉस्मिक किरणों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त था। इसके अलावा यह मंगल के वायुमंडल को सौर हवाओं से भी सुरक्षा प्रदान करता था। हालांकि, कुछ वैज्ञानिक इस निष्कर्ष के विरुद्ध चेता रहे हैं। जैसे युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्लेनेटरी वैज्ञानिक रॉब लिलिस के अनुसार हो सकता है कि इस चुंबकीय क्षेत्र ने सौर हवाओं के प्रवाह को ध्रुवों की ओर बढ़ा दिया हो जिससे वायुमंडल को अधिक तेज़ी से नुकसान पहुंचा होगा।
उल्कापिंडों से प्राप्त खनिजों में ग्रह की आंतरिक गतिविधियों के साक्ष्य भी उपस्थित रहते हैं। नमूनों में उपस्थित दो चुंबकीय क्षेत्र लगभग विपरीत दिशा में हैं। शोधकर्ताओं को लगता है कि मंगल पर चुंबकीय उत्तर-दक्षिण ध्रुवों की अदला-बदली हुई थी, जैसा पृथ्वी पर कई लाख वर्षों में होता रहता है। कंप्यूटर सिमुलेशन से पता चलता है कि किसी ग्रह के तरल डायनमो में परिवर्तन बाहरी कोर में संवहन धाराओं की कुछ विशेष परिस्थितियों में ही होता है। इसके आधार पर मंगल ग्रह की आंतरिक स्थिति को समझने और समय-सीमाएं निर्धारित करने में भी मदद मिलेगी। ध्रुवों के पलटने के आधार पर यह भी समझने में मदद मिलेगी कि कई प्राचीन क्रेटर्स में चुंबकीय चिंह अनुपस्थित क्यों है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adg3928/abs/_20221223nid_mars.jpg
इन दिनों आसमान में परिंदों के अलावा पंतगें भी उड़ती नज़र आती हैं। कुछ जगहों पर तो मकर संक्रांति पर खास पतंगबाज़ी होती है। लेकिन पंतगबाज़ी के इस मौसम के साथ नायलोन मांझे से होने वाली दुर्घटनाओं की खबरें भी आ रही हैं। इसे बोलचाल में चायना मांझा भी कहते हैं, हालांकि इसका चीन से कोई सम्बंध नहीं है। इससे होने वाली दुर्घटनाओं के मद्देनज़र वर्ष 2017 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
इसके नियमानुसार “नायलोन, प्लास्टिक या किसी भी अन्य सिंथेटिक सामग्री से बने पतंग के मांझे, जिसमें चाइनीज़ या चीनी मांझा के नाम से मिलने वाला मांझा भी शामिल है, तथा कांच, धातु या किसी अन्य धारदार सामग्री का लेप करके तेज़ किए गए पतंग उड़ाने की डोर की बिक्री, उत्पादन, भंडारण, आपूर्ति, आयात और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध होगा।” पतंगबाज़ी की अनुमति केवल सूती धागे से होगी, जो धागे को तेज़ करने वाली किसी भी धारदार, धातु की या कांच की सामग्री या चिपकने वाली सामाग्री से मुक्त हो।
लेकिन फिर भी लोगों के बीच चाइनीज़ मांझा लोकप्रिय है। इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण इसकी कम कीमत है। यह कपास के मांझे से एक तिहाई सस्ता और कई गुना अधिक मज़बूत होता है (जो पंतग कटने से बचा देता है)।
चाइनीज़ मांझा पॉलीमर को पिघलाकर एकल-तंतु तार के रूप में बनाया जाता है। एकल-तंतु तार घातक होते हैं और इन्हें तोड़ना काफी मुश्किल होता है। धागे में पैनापन लाने के लिए इस पर कांच का लेप चढ़ाया जाता है। यदि तनी हुई स्थिति में हो तो इस तरह तैयार धारदार मांझा मनुष्यों और जानवरों को घायल कर सकता है और किया भी है।
वैसे, चाइनीज़ मांझा नाम सुनकर लगता है कि यह चीन से मंगाया जाता होगा। लेकिन वास्तव में चाइनीज़ मांझा स्वदेशी उत्पाद है। चाइनीज़ मांझा उत्तरप्रदेश के बरेली और उसके आसपास के गांवों और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में बनाया जाता है, जहां से इसे अधिकतर ऑनलाइन बेचा जाता है।
लेकिन इसके उपयोग से कई हादसों की खबरें आई हैं। इसलिए, कानून हो या न हो, सुरक्षित सूती मांझे का उपयोग करें, खुद सुरक्षित रहें, दूसरों को सुरक्षित रखें। इस मामले में कानून से ज़्यादा जागरूकता ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.tnn.in/photo/msid-93342526/93342526.jpg
इन दिनों सरसों की जीएम फसल पर निर्णय को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है। इससे पहले भी कभी बैंगन, कभी सरसों तो कभी कपास की जीएम फसलों पर तीखे विवाद होते रहे हैं। विशेषकर जीएम खाद्य फसलों का विरोध विश्व में बड़े स्तर पर हुआ है। विश्व स्तर पर देखें तो जीएम फसल व खाद्य काफी विवादों में घिरे रहे हैं और बहुत से देशों ने इन्हें प्रतिबंधित भी किया हुआ है।
जेनेटिक इंजीनियरिंग से प्राप्त फसलों को संक्षेप में जीएम (जेनेटिकली मॉडीफाइड) फसल कहते हैं। सामान्यत: एक ही प्रजाति की विभिन्न किस्मों से नई किस्में तैयार की जाती रही हैं। जैसे गेंहू की दो किस्मों से एक नई किस्म तैयार कर ली जाए। इन्हें संकर किस्में कहते हैं।
परंतु जेनेटिक इंजीनियरिंग में किसी भी पौधे या जंतु के जीन या आनुवंशिक गुण का प्रवेश किसी असम्बंधित पौधे या जीव में करवाया जाता है। जैसे आलू के जीन का प्रवेश टमाटर में करवाना या सूअर के जीन का प्रवेश टमाटर में करवाना या मछली के जीन का प्रवेश सोयाबीन में करवाना या मनुष्य के जीन का प्रवेश सूअर में करवाना आदि।
जीएम फसलों के विरोध का एक मुख्य आधार यह रहा है कि ये फसलें स्वास्थ्य व पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं। इसके अलावा, यह असर जेनेटिक प्रदूषण के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों व पौधों में फैल सकता है। इस विचार को इंडिपेंडेंट साइन्स पैनल (स्वतंत्र विज्ञान मंच) ने बहुत सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया है।
इस पैनल में शामिल विश्व के कई देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने जीएम फसलों पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तैयार किया है जिसके निष्कर्ष में उन्होंने कहा है, “जीएम फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था वे प्राप्त नहीं हुए हैं तथा ये फसलें खेतों में बढ़ती समस्याएं उपस्थित कर रही हैं। अब इस बारे में व्यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर ट्रान्सजेनिक प्रदूषण से बचा नहीं जा सकता है। अत: जीएम फसलों व गैर जीएम फसलों का सह अस्तित्व नहीं हो सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जीएम फसलों की सुरक्षा या सेफ्टी प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत, ऐसे पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके हैं जिनसे इन फसलों की सेफ्टी या सुरक्षा सम्बंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी (खतरों की) उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य व पर्यावरण की अपूरणीय क्षति होगी, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता है। जीएम फसलों को अब दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर देना चाहिए।”
इन फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे उन पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा और घातक दुष्परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी मरम्मत नहीं कर पाएंगे। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु प्रदूषण व जल प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर उनके कारणों का पता लगाकर उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, पर जेनेटिक प्रदूषण जो पर्यावरण में चला गया वह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है।
विवाद का एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह बन रहा है कि वैज्ञानिकों के जो विचार सही बहस के लिए सामने आने चाहिए थे उन्हें दबाया गया है। प्राय: जीएम फसलों के समर्थकों द्वारा यह कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जो अनेक जीएम फसलों को स्वीकृति मिली, वह काफी सोच-समझकर ही दी गई होगी। लेकिन हाल में ऐसे प्रमाण सामने आए हैं कि यह स्वीकृति बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में दी गई थी तथा इनके लिए सरकारी तंत्र द्वारा अपने वैज्ञानिकों की जीएम फसलों सम्बंधी चेतावनियों को दबाया गया था।
इस विषय पर एक बहुत चर्चित पुस्तक है जैफ्री एम. स्मिथ की जेनेटिक रुले। कई प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इस पुस्तक को अति मूल्यवान बताया है। इस पुस्तक में स्मिथ ने बताया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के खाद्य व औषधि प्रशासन के लिए जो तकनीकी विशेषज्ञ व वैज्ञानिक कार्य करते रहे हैं, वे वर्षों से जीएम उत्पादों से सम्बंधित विभिन्न गंभीर संभावित खतरों के बारे में चेतावनी देते रहे थे और इसके लिए ज़रूरी अनुसंधान करवाने की ज़रूरत बताते रहे थे। यह काफी देर बाद पता चला कि जीएम उत्पादों पर इस तरह की जो प्रतिकूल राय होती थी, उसे यह सरकारी एजेंसी प्राय: दबा देती थी।
जब वर्ष 1992 में खाद्य व औषधि प्रशासन ने जीएम उत्पादों के पक्ष में नीति बनाई तो इस प्रतिकूल वैज्ञानिक राय को गोपनीय रखा गया। पर सात वर्ष बाद जब इस सरकारी एजेंसी के गोपनीय रिकार्ड को एक अदालती मुकदमे के कारण खुला करना पड़ा व 44,000 पृष्ठों में फैली नई जानकारी सामने आई तो पता चला कि वैज्ञानिकों की जो राय जीएम फसलों व उत्पादों के विरुद्ध होती थी, उसे वैज्ञानिकों के विरोध के बावजूद नीतिगत दस्तावेज़ों से हटा दिया जाता था। इन दस्तावेज़ों से यह भी पता चला कि खाद्य व औषधि प्रशासन को राष्ट्रपति के कार्यालय से आदेश थे कि जीएम फसलों को आगे बढ़ाया जाए।
इसी पुस्तक में जैफ्री स्मिथ ने ब्रिटेन का भी एक उदाहरण दिया है जहां वैज्ञानिकों के अनुसंधान से पता चला था कि विकसित किए जा रहे एक जीएम आलू की किस्म के प्रयोगों के दौरान चूहों के स्वास्थ्य को व्यापक क्षति देखी गई थी। जब यह परिणाम बताया जाने लगा तो सरकार ने यह प्रोजेक्ट ही बंद कर दिया, उसके प्रमुख वैज्ञानिक की छुट्टी कर दी व उसकी अनुसंधान टीम छिन्न-भिन्न कर दी गई।
ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जहां प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों को केवल इस कारण परेशान किया गया या उनका अनुसंधान बाधित किया गया क्योंकि उनके अनुसंधान से जीएम फसलों के खतरे पता चलने लगे थे। इन कुप्रयासों के बावजूद निष्ठावान वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से जीएम फसलों के गंभीर खतरों को बताने वाले दर्जनों अध्ययन उपलब्ध हैं। जैफरी एम. स्मिथ की पुस्तक के 300 से अधिक पृष्ठों में ऐसे दर्जनों अध्ययनों का सार-संक्षेप या परिचय उपलब्ध है। इनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में पेट, लिवर, आंतों जैसे विभिन्न अंगों के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की चर्चा है। जीएम फसल या उत्पाद खाने वाले पशु-पक्षियों के मरने या बीमार होने का उल्लेख है तथा जेनेटिक उत्पादों से मनुष्यों में भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का वर्णन है।
जीएम फसलों के अनेक खतरों के बढ़ते उदाहरणों को देखते हुए इन फसलों के समर्थक बस एक बात पर अड़ जाते हैं कि इनसे उत्पादकता बढ़ेगी। जीएम फसलों का सबसे अधिक प्रसार संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ है और यहां फ्रेंड्स ऑफ अर्थ के एक विस्तृत अध्ययन ने बता दिया है कि जीएम फसलों को उत्पादकता बढ़ाने में कोई सफलता नहीं मिली है। इसी तरह भारत में बीटी कॉटन फसलों के कुछ अध्ययनों से भी यही बात सामने आई है। बीटी कॉटन का कीटनाशक उपयोग कम करने का दावा ज़मीनी अनुभव से मेल नहीं खाता है।
कैंटरबरी विश्वविद्यालय (न्यूज़ीलैंड) के इस विषय के विशेषज्ञ डॉ. जैक हनीमैन ने लिखा है कि कुछ बड़ी कंपनियों ने ऊंची उत्पादकता वाले बीजों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है व इन बीजों को जीएम रूप में ही उपलब्ध करवाती हैं। ऊंची उत्पादकता मिलती है तो यह इन बीजों के अपने गुणों के कारण मिलती है, इन पर हुई जेनेटिक इंजीनियरिंग के कारण नहीं। भारत में जीएम फसलों के विस्तृत अध्ययनों से जुड़े रहे पी. वी. सतीश ने हाल ही में लिखा कि आंध्र प्रदेश में उनके अध्ययनों से बीटी कॉटन की विभिन्न स्तरों पर विफलता की जानकारी मिली। सैकड़ों भेड़ें बीटी कॉटन खेतों में चरने के बाद मर गईं। लेकिन बीज का केंद्रीकरण करके ऐसी स्थिति बना दी गई है जिसमें ऐसा संकरित बीज बाज़ार में मिलना कठिन हो गया है जो जेनेटिक इंजीनियरिंग से न बना हो।
जेनेटिक फसलों के प्रसार से खरपतवार तेज़ी से फैल सकते हैं और सामान्य फसलों में जेनेटिक प्रदूषण का बहुत प्रतिकूल असर हो सकता है। दुनिया के कई देश ऐसे खाद्य चाहते हैं जो जेनेटिक इंजीनियरिंग के असर से मुक्त हों। यदि हमारे यहां जीएम फसलों का प्रसार होगा तो इन देशों के बाज़ार हमसे छिन जाएंगे।
कृषि व खाद्य क्षेत्र में जेनेटिक इंजीनियरिंग की टेक्नॉलॉजी मात्र लगभग छ-सात बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथों में केंद्रित है। इन कंपनियों का मूल आधार पश्चिमी देशों व विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में है। इनका उद्देश्य जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से विश्व कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है जैसा विश्व इतिहास में आज तक संभव नहीं हुआ है।
इस षड्यंत्र के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में भी लंबी लड़ाई लड़ी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने जैव प्रौद्योगिकी के ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक प्रो. पुष्प भार्गव (अब नहीं रहे) को जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी के कार्य पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया था। पुष्प भार्गव सेन्टर फार सेल्यूलर एंड मालीक्यूलर बॉयोलॉजी, हैदराबाद के पूर्व निदेशक व नेशनल नॉलेज कमीशन के उपाध्यक्ष रहे थे।
ट्रिब्यून में प्रकाशित अपने बयान में विश्व ख्याति प्राप्त इस वैज्ञानिक ने देश को चेतावनी दी थी कि चंद शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा अपने व बहुराष्ट्रीय कंपनियों (विशेषकर अमेरिकी) के हितों को जेनेटिक रूप से परिवर्तित फसलों के माध्यम से आगे बढ़ाने के प्रयासों से सावधान रहें। उन्होंने इस चेतावनी में आगे कहा था कि इस प्रयास का अंतिम लक्ष्य भारतीय कृषि व खाद्य उत्पादन पर नियंत्रण प्राप्त करना है।
हिंदुस्तान टाइम्स के एक लेख में प्रो. भार्गव ने लिखा था कि लगभग 500 शोध पत्रों ने मनुष्यों, अन्य जीव-जंतुओं व पौधों के स्वास्थ्य पर जीएम फसलों के हानिकारक असर को स्थापित किया है और ये सभी शोध पत्र ऐसे वैज्ञानिकों के हैं जिनकी ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठा है। उन्होंने आगे लिखा था कि दूसरी ओर जीएम फसलों का समर्थन करने वाले लगभग सभी पेपर या प्रकाशन उन वैज्ञानिकों के हैं जिन्होंने हितों का टकराव स्वीकार किया है या जिनकी विश्वसनीयता व ईमानदारी के बारे में सवाल उठ सकते हैं।
प्राय: जीएम फसलों के समर्थक कहते हैं कि वैज्ञानिकों का अधिक समर्थन जीएम फसलों को मिला है पर प्रो. भार्गव ने इस विषय पर समस्त अनुसंधान का आकलन कर यह स्पष्ट बता दिया कि अधिकतम निष्पक्ष वैज्ञानिकों ने जीएम फसलों का विरोध ही किया है। साथ में उन्होंने यह भी बताया कि जिन वैज्ञानिकों ने समर्थन दिया है उनमें से अनेक किसी न किसी स्तर पर जीएम बीज बेचने वाली कंपनियों या इस तरह के निहित स्वार्थों से जुड़े रहे हैं या प्रभावित रहे हैं।
जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रचार कई बार इस तरह किया जाता है कि किसी विशिष्ट गुण वाले जीन का ठीक-ठीक पता लगा लिया गया है व इसे दूसरे जीव में पंहुचा कर उसमें वही गुण लाया जा सकता है। किंतु हकीकत इससे अलग व कहीं अधिक पेचीदा है।
कोई भी जीन केवल अपने स्तर पर या अलग से कार्य नहीं करता है अपितु बहुत से जीनों के एक जटिल समूह के एक हिस्से के रूप में कार्य करता है। इन असंख्य अन्य जीन्स से मिलकर व उनकी परस्पर निर्भरता में ही जीन के कार्य को देखना-समझना चाहिए, अलग-थलग नहीं। एक ही जीन का अलग-अलग जीवों में काफी भिन्न असर होगा, क्योंकि उनमें जो अन्य जीन हैं वे भिन्न हैं। विशेषकर जब एक जीव के जीन को काफी अलग तरह के जीव में पंहुचाया जाएगा, जैसे मनुष्य के जीन को सूअर में, तो इसके काफी नए व अप्रत्याशित परिणाम होने की संभावना है।
इतना ही नहीं, जीन समूह का किसी जीव की अन्य शारीरिक रचना व बाहरी पर्यावरण से भी सम्बंध होता है। जिन जीवों में वैज्ञानिक विशेष जीन पहुंचाना चाह रहे हैं, उनसे अन्य जीवों में भी इन जीन्स के पंहुचने की संभावना रहती है जिसके अनेक अप्रत्याशित परिणाम व खतरे हो सकते हैं। बाहरी पर्यावरण जीन के असर को बदल सकता है व जीन बाहरी पर्यावरण को इस तरह प्रभावित कर सकता है जिसकी संभावना जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग करने वालों को नहीं थी। एक जीव के जीन दूसरे जीव में पंहुचाने के लिए वैज्ञानिक जिन तरीकों का उपयोग करते हैं उनसे ऐसे खतरों की आशंका और बढ़ जाती है।
जेनेटिक इंजीनियरिंग के अधिकांश महत्वपूर्ण उत्पादों के पेटेंट बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं तथा वे अपने मुनाफे को अधिकतम करने के लिए इस तकनीक का जैसा उपयोग करती हैं, उससे इस तकनीक के खतरे और बढ़ जाते हैं।
अत: जीएम फसलों, विशेषकर खाद्य फसलों व उनसे प्राप्त खाद्यों, का प्रवेश उचित नहीं है; इन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
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अगर आप सोचते हैं कि निएंडरथल मानव कच्चा मांस और फल-बेरियां ही खाते थे, तो हालिया अध्ययन आपको फिर से सोचने को मजबूर कर सकता है। उत्तरी इराक की एक गुफा में विश्व के सबसे प्राचीन पके हुए भोजन के जले हुए अवशेष मिले हैं, जिनके विश्लेषण से लगता है कि निएंडरथल मानव खाने के शौकीन थे।
लीवरपूल जॉन मूर्स युनिवर्सिटी के सांस्कृतिक जीवाश्म विज्ञानी क्रिस हंट का कहना है कि ये नतीजे निएंडरथल मानवों में खाना पकाने के जटिल कार्य और खाद्य संस्कृति का पहला ठोस संकेत हैं।
दरअसल शोधकर्ता बगदाद से आठ सौ किलोमीटर उत्तर में निएंडरथल खुदाई स्थल की एक गुफा शनिदार गुफा की खुदाई कर रहे थे। खुदाई में उन्हें गुफा में बने एक चूल्हे में जले हुए भोजन के अवशेष मिले, जो अब तक पाए गए पके भोजन के अवशेष में से सबसे प्राचीन (लगभग 70,000 साल पुराने) थे।
शोधकर्ताओं ने पास की गुफाओं से इकट्ठा किए गए बीजों से इन व्यंजनों में से एक व्यंजन को प्रयोगशाला में बनाने की कोशिश की। यह रोटी जैसी, पिज़्ज़ा के बेस सरीखी चपटी थी जो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट थी।
टीम ने दक्षिणी यूनान में फ्रैंचथी गुफा, जिनमें लगभग 12,000 साल पहले आधुनिक मनुष्य रहते थे, से मिले प्राचीन जले हुए भोजन के अवशेषों का भी स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से विश्लेषण किया।
दोनों जानकारियों को साथ में देखने से पता चलता है कि पाषाणयुगीन आहार में विविधता थी और प्रागैतिहासिक पाक कला काफी जटिल थी, जिसमें खाना पकाने के लिए कई चरण की तैयारियां शामिल होती थीं।
शोधकर्ताओं को पहली बार दोनों स्थलों पर निएंडरथल और शुरुआती आधुनिक मनुष्यों (होमो सेपिएन्स) द्वारा दाल भिगोने और दलहन दलने के साक्ष्य मिले हैं।
शोधकर्ताओं को भोजन में अलग-अलग तरह के बीजों को मिलाकर बनाने के प्रमाण भी मिले हैं। उनका कहना है कि ये लोग कुछ खास पौधों के ज़ायके को प्राथमिकता देते थे।
एंटीक्विटी में प्रकाशित यह शोध बताता है कि शुरुआती आधुनिक मनुष्य और निएंडरथल दोनों ही मांस के अलावा वनस्पतियां भी खाते थे। जंगली फलों और घास को अक्सर मसूर की दाल और जंगली सरसों के साथ पकाया जाता था। और चूंकि निएंडरथल लोगों के पास बर्तन नहीं थे इसलिए अनुमान है कि वे बीजों को किसी जानवर की खाल में बांधकर भिगोते होंगे।
हालांकि, ऐसा लगता है कि आधुनिक रसोइयों के विपरीत निएंडरथल बीजों का बाहरी आवरण नहीं हटाते थे। छिलका हटाने से कड़वापन खत्म हो जाता है। लगता है कि वे कड़वेपन को कम तो करना चाहते थे लेकिन दालों के प्राकृतिक स्वाद को खत्म भी नहीं करना चाहते थे।
अनुमान है कि वे स्थानीय पत्थरों की मदद से बीजों को कूटते या दलते होंगे इसलिए दालों में थोड़ी किरकिरी आ जाती होगी। और शायद इसलिए निएंडरथल मनुयों के दांत इतनी खराब स्थिति में थे। (स्रोत फीचर्स)
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एक जापानी कीटविज्ञानी मिसाकी त्सूजी को जब एक नर ततैया ने डंक मारा तो वे हैरान रह गईं। क्योंकि माना जाता है कि सिर्फ मादा ततैया और मधुमक्खियां ही दर्दनाक डंक मार सकती हैं। दरअसल वे जिस अंग से डंक मारती हैं वह अंडे देने के अंग (ओविपॉज़िटर) का परिवर्तित रूप होता है। इसलिए आम तौर पर माना जाता है कि नर डंक नहीं मार सकते।
इस अनुभव के बाद जिस ततैया, एंटरहाइंचियम गिबिफ्रॉन्स, ने डंक मारा था त्सूजी ने उसका बारीकी से अवलोकन किया। करंट बायोलॉजी में वे बताती हैं कि ततैया ने डंक मारने के लिए अपने नुकीले, दो कांटों वाले जननांग का उपयोग किया था।
यह जानने के लिए कि क्या नर ततैया के छद्म डंक उन्हें उनके शिकारियों से बचाते हैं, शोधकर्ताओं ने ए. गिबिफ्रॉन्स नर ततैया को उनके शिकारी (वृक्ष मेंढक) के साथ रखा। जब-जब मेंढक ने ततैया पर हमला किया ततैया ने अपने पैने शिश्न से पलटवार किया। नतीजतन मेंढक ने लगभग एक तिहाई दफा ततैया को बाहर थूक दिया। तुलना के तौर पर जिन नर ततैया के छद्म डंक हटा दिए गए थे वे मेंढक का भोजन बन गए थे।
जीव जगत में ऐसा पहली बार देखा गया है जब नर जननांग द्वारा रक्षात्मक भूमिका निभाई जा रही हो। शोधकर्ताओं को लगता है कि इसी तरह की रणनीति अन्य ततैया में भी पाई जाती होगी। शोधकर्ता आगे इसी का अध्ययन की तैयारी में हैं। (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में बरपे सूखे ने दुनिया के सबसे लोकप्रिय कॉफी बीज कॉफी अरेबिका की कीमत को दुगना कर दिया है। बढ़ता वैश्विक तापमान जल्द ही कई प्लांटेशन के लिए उनके मनचाहे पौधे उगाना अव्यावहारिक बना सकता है। इसलिए अफ्रीका के कॉफी उत्पादकों ने लंबे समय से विस्मृत कॉफी की एक किस्म, कॉफी लिबरिका, को फिर से लगाना शुरू कर दिया है।
क्यू स्थित रॉयल बॉटेनिक गार्डन के वनस्पतिशास्त्रियों ने नेचर प्लांट्स पत्रिका में बताया है कि 1870 के दशक में सी. लिबरिका को बड़े पैमाने पर उगाया जाता था। लेकिन इसके कठोर आवरण वाले बड़े फल प्रोसेस करना कठिन था। इनकी तुलना में अन्य किस्मों के छोटे फलों को प्रोसेस करना आसान था। 20वीं सदी आते-आते सी. लिबरिका उगाना बंद हो गया था।
हाल के वर्षों में युगांडा के किसान सी. लिबरिका (लोकप्रिय नाम एक्सेल्सा) उप-प्रजाति की खेती अधिक करने लगे हैं। एक्सेल्सा बीमारियों और मुरझाने की प्रतिरोधी है। इस दमदार और मीठी कॉफी की वृद्धि के लिए बहुत ठंड भी ज़रूरी नहीं होती।
तो शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस तरह एक्सेल्सा और अन्य कम उगाई जाने वाली कॉफी किस्में गर्म हो रही पृथ्वी पर गर्मागर्म कॉफी के प्याले भरने में मदद करती रह सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)
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उत्तरी युरेशिया में मिले लगभग 8000 साल पुराने टूटे और जले हुए भोजन अवशेष लगे मिट्टी के बर्तन चीनी मिट्टी के बर्तनों जैसे तो नहीं लगते लेकिन मांस और तरकारी रखने और पकाने की यह टिकाऊ तकनीक इस क्षेत्र में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के लिए एक बड़ा कदम था। और हालिया शोध बताता है कि यह तकनीक उन्होंने खुद विकसित की थी।
दरअसल वैज्ञानिक मानते आए थे कि युरोप में मिट्टी के बर्तनों का आगमन लगभग 9000 साल पहले कृषि और जानवरों के पालतूकरण के प्रसार के साथ हुआ था। उत्तरी युरोप में मिले लगभग इसी काल के बर्तनों के आधार पर माना जाता था कि यह तकनीक शिकारी-संग्रहकर्ताओं ने अपने अधिक प्रगतिशील किसान पड़ोसियों से सीखी था।
लेकिन नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित एक अध्ययन बिलकुल अलग कहानी कहता है। लगभग 20,000 साल पहले, सुदूर पूर्वी इलाकों में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के समूहों के बीच मिट्टी के बर्तन बनाने और उपयोग करने के ज्ञान का प्रसार हो चुका था। ये बर्तन तब उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले चमड़े के बर्तनों से अधिक टिकाऊ थे, और पकाने में उपयोग किए जाने वाले लकड़ी के बर्तनों की तरह आग में जलते नहीं थे। लगभग 7900 साल पहले तक यूराल पर्वत से लेकर दक्षिणी स्कैंडिनेविया तक मिट्टी के बर्तनों का उपयोग आम हो चुका था।
मिट्टी के बर्तनों का फैलाव देखने के लिए नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ऑयरलैंड के पुरातत्वविद रोवन मैकलॉफ्लिन और उनके साथियों ने बाल्टिक सागर और भूतपूर्व सोवियत संघ के युरोपीय हिस्से के 156 पुरातात्विक स्थलों से इकट्ठा किए गए मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों का विश्लेषण किया। इनमें से कई अवशेष वर्तमान रूस और यूक्रेन के संग्रहालयों में संग्रहित थे। बर्तनों में चिपके रह गए जले हुए भोजन का रेडियोकार्बन काल-निर्धारण करके शोधकर्ता इनकी समयरेखा पता कर पाए।
चिपके हुए वसा अवशेषों से पता चला कि वे या तो जुगाली करने वाले जानवरों (जैसे हिरण या मवेशियों) का मांस पकाते थे, या मछली, सूअर या सब्ज़ी-भाजी उबालते थे। इसके अलावा, बर्तनों पर की गई कलाकारी और बर्तनों के आकार की तुलना करके शोधकर्ता पता लगा सके कि मिट्टी के बर्तनों का प्रसार एक से दूसरे समुदाय में कैसे हुआ।
वैसे तो मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए कच्चा माल हर जगह उपलब्ध था, लेकिन उन्हें आकार देने और पकाने जैसा तकनीकी ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित हुआ होगा। और साथ ही खाना पकाने की नई तकनीक भी सीखी गई होगी।
सारे डैटा को एक साथ रखने पर टीम ने पाया कि उत्तरी युरेशिया के कुछ हिस्सों में मिट्टी के बर्तन तेज़ी से फैले थे। कुछ ही शताब्दियों में यह तकनीक कैस्पियन सागर से उत्तरी और पश्चिमी हिस्से में फैल गई थी।
जिस तेज़ी से इस क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन बनाने का ज्ञान फैला, उससे लगता है कि यह ज्ञान लोगों के प्रवास के साथ आगे नहीं बढ़ा बल्कि एक समूह से दूसरे समूह में हस्तांतरित हुआ। ऐसा लगता है एक जगह से दूसरी जगह तक सफर ज्ञान ने किया, लोगों ने नहीं।
यदि ऐसा है, तो ये नतीजे हाल ही में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से विपरीत हैं जो बताता है कि एनातोलिया में यह तकनीक किस तरह से फैली। हालिया जेनेटिक साक्ष्य बताते हैं कि लगभग इसी समय एनातोलिया से दक्षिणी युरोप आए किसान अपने साथ मिट्टी के बर्तन बनाने के तरीके और परंपराएं लाए थे।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पर अधिक शोध यह जानने में मदद कर सकता है कि वास्तव में यह ज्ञान कैसे फैला। जैसे यदि शिकारी-संग्रहकर्ता समाज पितृस्थानिक थे (जहां महिलाएं शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं) तो मिट्टी के बर्तन बनाना महिलाओं द्वारा किया जाने वाला कार्य हो सकता है जो विवाह सम्बंधों के माध्यम से एक गांव से दूसरे गांव तक फैला होगा।
बहरहाल, अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हम जितना समझते थे शिकारी-संग्रहकर्ता उससे कहीं अधिक नवाचारी थे। प्रागैतिहासिक जापान से बाल्टिक सागर के किनारों तक घूमने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता लोगों ने अपनी घुमंतु जीवन शैली को छोड़े बिना नई तकनीकों को गढ़ा और अपनाया था: वे किसानों का अनुसरण नहीं कर रहे थे बल्कि सर्वथा अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। इस मायने में देखा जाए तो शिकारी-संग्रहकर्ता समाज आविष्कारी समाज था।
हालांकि रूस के वैज्ञानिक इस बारे में पहले से जानते थे और इसके अधिकतर साक्ष्य रूसी भाषा में प्रकाशित हुए थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युरोप में खिंच गई अदृश्य दीवार के चलते इस जानकारी से बाकी लोग अनभिज्ञ रहे और बर्तनों का उपयोग किसानों और पशुपालकों की तकनीक माना जाता रहा। 1990 से यह अदृश्य दीवार ढहने लगी थी; पश्चिमी युरोप और रूस, यूक्रेन व बाल्टिक क्षेत्र के शोधकर्ता संयुक्त अध्ययनों में शामिल होने लगे थे। हालिया अध्ययन भी इसी सहयोग की मिसाल है। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इस दीवार को फिर ऊंचा कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)
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साल 2022 की अहम वैज्ञानिक घटनाओं और अनुसंधानों को मिलाकर देखें तो लगता है पूरा साल विज्ञान जगत में अभिनव प्रयोगों, अन्वेषणों और उपलब्धियों का रहा। विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने सुर्खियों के लिए अलग-अलग घटनाओं का चयन किया है। अधिकांश विज्ञान पत्र-पत्रिकाओं ने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को सुखिर्यों में विशेष स्थान दिया है। विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस ने जहां एक ओर वर्ष की दस प्रमुख उपलब्धियों (ब्रेकथ्रू) में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को प्रथम स्थान पर रखा है, वहीं दूसरी ओर इस वर्ष की विफलताओं (ब्रेकडाउन) की सूची में ‘ज़ीरो कोविड नीति’ को प्रमुखता से शामिल किया है।
बीते वर्ष 12 जुलाई को जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से ली गई ब्रह्मांड की पहली पूर्ण रंगीन तस्वीर जारी की गई। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से लिए गए चित्रों से ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति की जड़ों को तलाशने में मदद मिलेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस मौके पर कहा था कि यह टेलीस्कोप मानवता की महान इंजीनियरिंग उपलब्धियों में से एक है। दस अरब डॉलर की लागत से तैयार इस टेलीस्कोप को साल 2021 में क्रिसमस उत्सव के मौके पर लॉन्च किया गया था। इसे हबल टेलीस्कोप का उत्तराधिकारी कहा जा सकता है। इस टेलीस्कोप में लगे विशाल प्रमुख दर्पण की मदद से अंतरिक्ष में किसी भी अन्य टेलीस्कोप की तुलना में अधिक दूरी तक देखा जा सकता है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने ब्रह्मांड में सबसे दूरस्थ और प्राचीनतम निहारिकाओं के चित्र भेजे हैं। इस नए दमदार टेलीस्कोप से पहली बार ब्रह्मांड के शुरुआत की झलक सामने आई, जिसमें निहारिकाओं के नृत्य और तारों की मृत्यु की तस्वीरें शामिल हैं।
विदा हो चुके साल 2022 में चंद्रमा पर पहुंचने की दौड़ जारी रही। निजी क्षेत्र भी मैदान में सक्रिय दिखाई दिया। अमेरिका, रूस, चीन, जापान, भारत और कोरिया ने पिछले वर्ष ही अपना भावी कार्यक्रम घोषित कर दिया था। 1972 में अपोलो-17 मिशन के साथ ही चंद्रमा पर मानव सहित यान भेजने का अभियान थम गया था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पांच दशकों बाद फिर से चंद्रमा पर मानव अवतरण का अभियान शुरू किया है। इसे ‘आर्टेमिस मिशन’ नाम दिया गया है। इसी वर्ष नवंबर में आर्टेमिस-1 के ज़रिए ओरायन अंतरिक्ष यान भेजा गया, जिसने चंद्रमा की सतह से नब्बे किलोमीटर ऊपर विभिन्न प्रयोग किए। इस अभियान की सफलता ने आर्टेमिस-2 और आर्टेमिस-3 को भेजने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। वैज्ञानिकों ने इस दशक के अंत तक चंद्रमा पर मनुष्य को बसाने का दावा भी किया है।
युरोपीय स्पेस एजेंसी ने अपने भावी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए 22,500 आवेदकों में से 17 व्यक्तियों का चुनाव किया है। इनमें ब्रिटेन के जॉन मैकफाल भी हैं। उन्होंने 2008 में एक पैर नहीं होने के बावजूद पैरालिंपिक में कांस्य पदक जीता था। यह पहला अवसर है, जब किसी विकलांग को अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया है।
सितंबर में नासा ने एक नए प्रयोग को अंजाम दिया, जिसका उद्देश्य पृथ्वी से टकरा सकने वाले छोटे ग्रहों से बचाव की तैयारी है। इसका नाम है डबल एस्टेरॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट (डार्ट) मिशन। नासा ने नवंबर 2021 में डॉर्ट मिशन अंतरिक्ष में भेजा था। दस महीने के सफर के बाद डार्ट अपने अभीष्ट निशाने के पास तक पहुंचा और अपूर्व कार्य संपन्न किया। इस मिशन के अंतर्गत पृथ्वी के लिए खतरा पैदा करने वाले क्षुद्र ग्रहों अथवा एस्टोरॉयड की दिशा को बदला जा सकेगा। यह प्रक्रिया अंतरिक्ष यान के ज़रिए की जा सकेगी। जानकारों के मुताबिक आने वाले वर्षों में इस दिशा में बहुत से प्रयोग होंगे।
साल 2022 ‘अंतर्राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान वर्ष’ के रूप में मनाया गया। 2017 में माइकल स्पाइरो ने युनेस्को द्वारा आयोजित वैज्ञानिक बोर्ड की बैठक में वर्ष 2022 को अंतर्राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान वर्ष के रूप में मनाने का विचार रखा था। प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय घटनाओं की व्याख्या में मूलभूत विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। कोरोना वायरस की संरचना को समझने और उससे फैले संक्रमण का सामना करने के लिए टीकों के निर्माण में मूलभूत विज्ञान का योगदान रहा है। यही नहीं अंतरिक्ष के क्षेत्र में मिली तमाम उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में मूलभूत विज्ञान का बहुत बड़ा हाथ है। सच तो यह है कि पृथ्वी ग्रह का सतत और समावेशी विकास मूलभूत विज्ञान में अनुसंधान की अनदेखी करके नहीं हो सकता।
बीते वर्ष जीव विज्ञान के अनुसंधानकर्ताओं ने कैरेबिया के मैन्ग्रोव वनों में एक नया बैक्टीरिया खोजा जिसे देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की ज़रूरत नहीं होती। वैज्ञानिकों ने नए बैक्टीरिया को थियोमार्गरिटा मैग्नीफिका नाम दिया है। यह बैक्टीरिया अपने बड़े आकार के कारण कोशिका विज्ञान के अध्ययनकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय रहा। इसमें कई विशेषताएं हैं। इसका जीनोम एक झिल्ली में कैद होता है, जबकि सामान्य बैक्टीरिया की जेनेटिक सामग्री झिल्ली में नहीं होती है। इस बैक्टीरिया के बड़े आकार और झिल्लीयुक्त जीनोम को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह जटिल कोशिकाओं के उद्भव को समझने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। साइंस के संपादकों ने दस प्रमुख खोजों की सूची में नए बैक्टीरिया की खोज को स्थान दिया है।
विज्ञान जगत की एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ने इस साल की दस प्रमुख घटनाओं में मंकीपॉक्स वायरस को भी शामिल किया है। मई में युरोप और अमेरिका में इस वायरस के हमले का पता चला। लगभग 100 से अधिक देश इसकी चपेट में आ गए। यह वायरस भी कोरोना वायरस की तरह खतरनाक है, जो जंतुओं से मनुष्यों में फैलता है। इससे संक्रमित व्यक्ति में चेचक जैसे लक्षण दिखते हैं। मंकीपॉक्स वायरस पाक्सविरिडी कुल का सदस्य है। इस वायरस की खोज 1958 में हुई थी। अध्ययनकर्ताओं को बंदरों की कॉलोनी में चेचक जैसा रोग मिला, इसलिए इसका नाम मंकीपॉक्स रख दिया गया। इससे संक्रमित लोग बिना उपचार के अपने आप स्वस्थ हो जाते हैं। वर्तमान में इसके लिए कोई स्वीकृत एंटी वायरस नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसका नाम मंकीपॉक्स से बदल कर ‘एमपॉक्स’ कर दिया है। वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि भविष्य में यह वायरस म्युटेशन की चपेट में आ सकता है।
गुज़रे साल वैज्ञानिकों ने ग्रीनलैंड में सबसे प्राचीन डीएनए को खोजने में बड़ी सफलता प्राप्त की। प्राचीन डीएनए बीस लाख साल पुराना है। लगभग चालीस अनुसंधानकर्ता सोलह वर्षों तक प्राचीन डीएनए के रहस्य का पता लगाने में जुटे रहे। इस खोज ने उस इतिहास में झांकने का अवसर प्रदान किया, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। अमेरिकी एसोसिएशन फॉर दी एडवांसमेंट ऑफ साइन्स के जर्नल ने इसे ‘टॉप टेन इन साइंस’ की सूची में सम्मिलित किया है।
वर्ष 2022 में पूर्वी और मध्य पनामा के वनों में मेंढक की नई प्रजाति मिली। पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के योगदान को रेखांकित और सम्मानित करने के लिए इसका नाम उन्हीं के नाम पर Pristimantis gretathunbergae रखा गया है।
साल की शुरुआत में 15 जनवरी को दक्षिणी प्रशांत महासागर में टोंगा ज्वालामुखी फट पड़ा। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि पिछले 100 सालों में यह सबसे भयानक ज्वालामुखी विस्फोट था, जिसने धरती को दो बार हिला दिया।
गुज़रे साल वैज्ञानिकों ने मनुष्य द्वारा मोबाइल फोन, लेपटॉप और अन्य उपकरणों का अधिक और लगातार उपयोग करने से शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों का एक मॉडल तैयार किया है। इस मॉडल से 800 वर्षों में मनुष्य की शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों की झलक मिलती है। वैज्ञानिकों ने थ्री डिज़ायनर से तैयार मॉडल के आधार पर बताया कि वर्ष 3000 तक पीठ में कुबड़ निकल आएगी, गर्दन मोटी हो जाएगी, हाथ के पंजे मुड़े हुए होंगे और आंखों में एक और झिल्ली उग आयेगी।
खगोल विज्ञान के अध्ययनकर्ताओं की टीम ने जीजे-1002 तारे के आसपास पृथ्वी जैसे दो ग्रहों की खोज की। लाल रंग का यह बौना तारा सौर मंडल से अधिक दूर नहीं है (मात्र 16 प्रकाश वर्ष दूर!)। इन दो ग्रहों की खोज के साथ ही अब हम सूर्य के समीप सौर मंडलों में मौजूद सात ऐसे ग्रहों के बारे में जानते हैं, जो पृथ्वी से मिलते-जुलते हैं।
साल 2022 में वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के कारण विभिन्न प्रजातियों के विलुप्त होने की वास्तविक स्थिति के आकलन के लिए ‘वर्चुअल अर्थ’ का विकास किया। इस मॉडल के अनुसार इस सदी के अंत तक पृथ्वी से जीव-जंतुओं की 27 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।
वर्ष 2022 में अमेरिका को नाभिकीय संलयन प्रक्रिया से स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त करने में बड़ी सफलता मिली। कैलिर्फोनिया स्थित लारेंस लीवरमोर नेशनल लेबोरेटरी के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार नाभिकीय संलयन से खर्च से अधिक ऊर्जा प्राप्त की। नाभिकीय संलयन में दो परमाणु जुड़कर एक भारी परमाणु बनाते हैं। सूर्य में भी इसी प्रक्रिया से ऊर्जा उत्पन्न होती है। जानकारों का कहना है कि इस उपलब्धि से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी।
विज्ञान जगत की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस साल की 22 अद्भुत अनुसंधानों की चयन सूची में माइक्रोप्लास्टिक को सम्मिलित किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक मनुष्य की प्रजनन क्षमता पर असर डालता है। माइक्रोप्लास्टिक का आकार पांच मिलीमीटर से कम होता है। यह खिलौनों, कार के पुराने टायर आदि में पाया जाता है। यह हमारे पास से होते हुए समुद्र में पहुंच रहा है। प्लास्टिक के कण नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि आम आदमी को इसके बारे में जानकारी नहीं होती। वैज्ञानिकों ने 2021 में माइक्रोप्लास्टिक के असर पर अनुसंधान में पाया कि मनुष्य प्रतिदिन लगभग सात हज़ार माइक्रोप्लास्टिक के टुकड़े सांस के ज़रिए लेता है।
दिसंबर में मॉन्ट्रियल में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन कॉप-15 में 190 से अधिक देशों ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के लिए ऐतिहासिक जैव विविधता संधि को मंज़ूरी दे दी। ये देश सन 2030 तक पृथ्वी के तीस प्रतिशत हिस्से के संरक्षण पर सहमत हुए हैं। बायोलॉजिकल कंज़र्वेशन में प्रकाशित शोध के अनुसार पिछले डेढ़ सौ वर्षों में कीटों की पांच से दस प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।
संयुक्त राष्ट्र का दो हफ्ते चला सालाना जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन सीओपी-27 मिस्त्र के शर्म-अल-शेख में आयोजित किया गया, जिसमें दुनिया भर के प्रतिनिधियों ने जलवायु संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए अपने विचार साझा किए। सम्मेलन में मुख्य मुद्दे इस बार भी नहीं सुलझे। सम्मेलन में दुनिया के आठ अरब लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए कृषि और अनुकूलन के मुद्दों पर मंथन हुआ। अंत में वार्ताकारों के बीच ‘जलवायु आपदा कोश’ बनाने पर सहमति बनी। इसका उपयोग जलवायु आपदा से प्रभावित देशों के लिए किया जाएगा।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसंधानकर्ताओं ने सात जनवरी को जेनेटिक रूप से परिवर्तित सुअर का दिल मनुष्य के शरीर में सफलतापूर्वक लगाया। यह प्रत्यारोपण बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था, जिसने भविष्य में ज़ीनोट्रांसप्लांटेशन की राह खोल दी है। प्रत्यारोपण टीम के मार्दगर्शक सर्जन मोहम्मद मोइउद्दीन हैं, जिन्हें पत्रिका नेचर ने वर्ष 2022 के टॉप टेन व्यक्तियों की सूची में सम्मिलित किया है।
यह वही साल था, जब रोबोट की भूमिका का एक और नया आयाम सामने आया। एआई-डीए नाम के इस रोबोट ने पहली बार ब्रिटेन की संसद को संबोधित किया। ब्रिटिश सांसदों ने रोबोट से कलात्मक कृतियां बनाने के बारे में सवाल भी किए। इस रोबोट का विकास ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया है।
साल के उत्तरार्द्ध में चीन ने तिब्बती पठार पर दुनिया की सबसे बड़ी सौर दूरबीन स्थापित की। डीएसआरटी नाम की इस दूरबीन से सौर विस्फोटों को समझने में मदद मिलेगी। इससे प्राप्त जानकारियां अन्य देशों के अनुसंधानकर्ताओं को भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
विदा हो चुके साल में दस करोड़ साल पुराना बड़ी आंखों वाला कॉकरोच जीवाश्म मिला। अब यह प्रजाति पृथ्वी पर नहीं है। इसका वैज्ञानिक नाम हुआब्लाटुला हुई (Huablattula hui) है। यह करोड़ों वर्षों से अंबर में कैद है। अंबर में कोई भी वस्तु जीवाश्म के तौर पर करोड़ों साल तक सुरक्षित रहती है।
नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने शिशु चूहों में मनुष्य के दिमाग की कोशिकाओं को सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया। इस अनुसंधान से मनुष्य में तंत्रिका सम्बंधी विकारों को समझने और इलाज का मार्ग प्रशस्त हो गया है। कुछ विज्ञान पत्रिकाओं ने इस प्रयोग को साल के दस प्रमुख अनुसंधानों में स्थान दिया है।
वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने कॉकरोच और मशीनों को मिलाकर साइबोर्ग कॉकरोच बनाया है। ये कॉकरोच सौर पैनल से जुड़ी बैटरी से लैस हैं। साइबोर्ग कॉकरोच पर्यावरण की निगरानी और प्राकृतिक आपदा के बाद बचाव मिशन में सहायता करेंगे। इससे पहले वैज्ञानिक रोबोटिक चूहे बना चुके हैं।
इसी वर्ष हिग्ज़ बोसान की खोज के दस साल पूरे हुए। 4 जुलाई 2012 को वैज्ञानिकों ने नए उप-परमाणविक कण के अस्तित्व की विधिवत घोषणा की थी। इस कण को ‘गॉड पार्टिकल’ भी कहा गया है, परंतु सच पूछा जाए तो इस कण का ‘गॉड’ अथवा ‘ईश्वर’ से कोई लेना-देना नहीं है। बीते एक दशक में इस महाप्रयोग के परिणामों ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बंधी हमारी समझ का विस्तार किया है और इसमें कण भौतिकी की अहम भूमिका सामने आई है। वैज्ञानिकों का विचार है कि हिग्ज़ बोसॉन अनुसंधान से आने वाले दिनों में कम्प्यूटिंग और मेडिकल साइंस के क्षेत्र में नई संभावनाओं की राह खुलेगी।
इस वर्ष ‘ब्रेकथ्रू’ प्राइज़ फाउंडेशन ने साल 2023 के ‘ब्रेकथ्रू’ पुरस्कारों की घोषणा की। यह विज्ञान का अति प्रतिष्ठित और नोबेल पुरस्कार की टक्कर का पुरस्कार है, जिसकी स्थापना मार्क ज़ुकरबर्ग, सर्गेई ब्रिन और कुछ अति धनाढ्य विज्ञानप्रेमी लोगों ने मिलकर की है। इसकी पहचान ‘आस्कर ऑफ साइंस’ के रूप में है। यह पुरस्कार हर साल गणित, मूलभूत भौतिकी और जीव विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। वर्ष 2023 के लिए गणित के क्षेत्र में डेनियल ए. स्पीलमन को सम्मानित किया गया है। मूलभूत भौतिकी के क्षेत्र में इस बार पुरस्कार चार्ल्स एच. बेनेट, गाइल्स ब्रासार्ड, डेविड डॉच और पीटर शोर को दिया गया है। जीव विज्ञान में डेमिस हैसाबिस, जॉन जम्पर, एंथनी ए. हायमन, क्लिफोर्ड ब्रैंगनाइन, इमैनुएल मिग्नाट और मसाशी यानागिसावा को कृत्रिम बुद्धि के उपयोग से प्रोटीन की संरचना की भविष्यवाणी के लिए पुरस्कृत किया गया है।
वर्ष 2022 का गणित का प्रतिष्ठित एबेल पुरस्कार अमेरिकी गणितज्ञ डॉ. डेनस पी. सुलिवान को दिया गया है। एबेल पुरस्कार को गणित का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। इसकी स्थापना 2002 में की गई थी।
अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई। इस बार विज्ञान के विभिन्न विषयों के नोबेल पुरस्कार सात वैज्ञानिकों को दिए गए। चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार स्वीडन के आनुवंशिकी वैज्ञानिक स्वांते पाबो को दिया गया है। उन्हें विलुप्त पूर्वजों से आधुनिक युग के मानव का विकास विषय पर शोध के लिए पुरस्कृत किया गया। भौतिकशास्त्र का नोबेल पुरस्कार एलेन ऑस्पेक्ट, जॉन क्लाज़र और एंटोन जेलिंगर को संयुक्त रूप से क्वांटम मेकेनिक्स में विशेष योगदान के लिए दिया गया। रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान कैरोलिन बर्टोजी, मोर्टन मेल्डल और बैरी शार्पलेस को प्रदान किया गया। बैरी और मोर्टन ने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ की नींव रखी, जबकि कैरोलिन ने ‘बायोआर्थोगोनल केमिस्ट्री’ को नया आयाम दिया।
यह वही वर्ष है जब जीवाणु वैज्ञानिक डॉ. टेड्रोस अधानोम गेब्रेसियस को दूसरी बार विश्व स्वास्थ्य संगठन का महानिदेशक चुना गया। उन्होंने 2017 में यह पद संभाला था। इसके पहले गेब्रेसियस 2005 से 2012 तक इथोपिया के स्वास्थ्य मंत्री और 2012 से 2016 तक विदेश मंत्री रह चुके हैं।
15 मार्च को विख्यात भौतिकशास्त्री यूजिन पार्कर का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने पचास के दशक में सौर पवन के अस्तित्व का विचार रखा था। उन्हें 2003 में क्योटो और 2020 में क्रॉफोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 3 जुलाई को फुलेरीन अणु के खोजकर्ता राबर्ट एफ. कर्ल जूनियर का 88 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उन्हें 1996 में कार्बन के नए अपररूप फुलेरीन की खोज के लिए रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान मिला था।
साल के अंत में ओमिक्रॉन वायरस के नए सब वेरिएंट बीएफ.7 की चपेट में चीन और कुछ देश आ गए। दरअसल ओमिक्रॉन वायरस बहुरूपिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ छोटे-मोटे बदलावों को छोड़कर इसकी मुख्य संरचना ओमिक्रॉन वायरस जैसी ही होती है। नया वायरस इम्युनिटी को चकमा देने में माहिर है।
विज्ञान जगत के समीक्षकों और विश्लेषणकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश देशों में अंतर्राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान वर्ष एक रस्म अदायगी की तरह संपन्न हुआ, कोई बड़ी पहल नहीं हुई। रूस और यूक्रेन युद्ध का असर वैज्ञानिक रिश्तों और वैज्ञानिक परियोजनाओं पर पड़ा। चीन सहित कई देश ‘ज़ीरो कोविड नीति’ का सख्ती से पालन कराने में विफल रहे। वातानुकूलित सभागारों में जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन और जैव विविधता सम्मेलन में अहम मुद्दों को उठाने के साथ विचारोत्तेजक चर्चाएं हुईं। लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो कोई सार्थक नतीजा सामने नहीं आया। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/4/44/NASA%E2%80%99s_Webb_Reveals_Cosmic_Cliffs%2C_Glittering_Landscape_of_Star_Birth.jpg/1024px-NASA%E2%80%99s_Webb_Reveals_Cosmic_Cliffs%2C_Glittering_Landscape_of_Star_Birth.jpg