हरित ऊर्जा में 350 अरब के निवेश का प्रस्ताव

र्ष 2023-24 के बजट में अर्थव्यवस्था को हरित-ऊर्जा की ओर ले जाने के संकेत हैं। इसके लिए सरकार ने 350 अरब रुपए के निवेश का प्रस्ताव रखा है। जलवायु नीति वैज्ञानिकों ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए दीर्घावधि प्रतिबद्धता की ज़रूरत भी बताई है।

गौरतलब है कि विश्व के तीसरे सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक के रूप में भारत ने 2021 के ग्लासगो सम्मेलन में 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने का संकल्प लिया था। लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं था कि इस लक्ष्य को हासिल कैसे किया जाएगा। हालिया बजट वैश्विक तापमान कम करने के प्रति भारत की गंभीरता दर्शाता है।

बैंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के जलवायु वैज्ञानिक जयरामन श्रीनिवासन का कहना है कि कोयला, तेल और गैस से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर स्थानांतरण के लिए दशकों तक सुसंगत नीति की ज़रूरत होगी। कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार सरकार का यह कदम भारत में भविष्य के शोध की दिशा को भी निर्धारित करेगा।

1 फरवरी को बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार ऊर्जा, कृषि व विनिर्माण सहित कई उद्योगों में डीकार्बनीकरण के कार्यक्रम लागू कर रही है। बजट में भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए 19.7 अरब रुपए का निवेश प्रस्तवित है। इसका प्रमुख उद्देश्य भविष्य में सीमेंट और इस्पात उत्पादन जैसे कार्बन-बहुल उद्योगों में जीवाश्म ईंधन की बजाय हरित हाइड्रोजन का उपयोग बढ़ाना है। इसके लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को 10.22 अरब रुपए की राशि आवंटित की गई है, जो पिछले बजट की तुलना में 48 प्रतिशत अधिक है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन और उसके प्रभावों को कम करने सम्बंधी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का संचालन करने वाले पर्यावरण, वन और जलवायु मंत्रालय के आवंटन में खास वृद्धि नहीं की गई है और वह 30 अरब रुपए के आसपास ही है।  

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में हरित हाइड्रोजन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नीति निर्माण, उद्योग और शोध के बीच तालमेल आवश्यक है। और साथ ही अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों का लाभ उठाने के लिए ऊर्जा-भंडारण की क्षमता बढ़ाना भी ज़रूरी है। सौर और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत चौबीसों घंटे या पूरे साल उपलब्ध नहीं होते। इसलिए इनकी ऊर्जा के भंडारण पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।     

गौरतलब है कि भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव काफी अधिक दिख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन सम्बंधी प्रथम राष्ट्रीय मूल्यांकन में पता चला था कि 1901 से 2018 के बीच औसत तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार 2022 में पर्यावरण सम्बंधी कोई न कोई चरम घटना लगभग रोज़ाना दर्ज हुई है। भारी वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं सबसे अधिक देखी गई हैं। पानी की कमी की संभावना तो है ही। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दवा कारखाने के रूप में पालतू बकरी – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारत और कई विकासशील देशों के गांवों में पालतू बकरी (कैपरा हिर्कस) मिलना आम है। पालतू बनाए जाने के समय (लगभग 10,000 साल पहले) से ही बकरियों ने मानव समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाई है। यह भी कहा गया है कि मनुष्यों का शिकारी-संग्राहक जीवन शैली से कृषि आधारित बस्तियों में बसने में बकरियों का पालतूकरण एक महत्वपूर्ण कदम था।

खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का अनुमान है कि दुनिया में लगभग 1000 नस्लों की 83 करोड़ बकरियां हैं। भारत में 20 से अधिक प्रमुख नस्लों की 15 करोड़ बकरियां हैं। राजस्थान में बकरियों की संख्या सबसे अधिक है – यहां पाई जाने वाली मारवाड़ी बकरी सख्तजान है और रेगिस्तानी जलवायु के अनुकूल है। एक और सख्तजान नस्ल है उस्मानाबादी जो महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।

उत्तरी केरल की मलाबारी बकरी (जिसे टेलिचेरी भी कहा जाता है) एक ऐसी नस्ल है जिसके मांस में वसा कम होती है और वह खूब संतानें पैदा करती है। ऐसे ही गुण पंजाब की बीटल बकरी में भी होते हैं। पूर्वी भारतीय ब्लैक बंगाल बकरी बांग्लादेश के ग्रामीण गरीबों की आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान देती है। ये 2 करोड़ वर्ग फुट से अधिक चमड़ा प्रदान करती हैं जिसका उपयोग अग्निशामकों के लिए दस्ताने बनाने से लेकर फैशनेबल हैंडबैग और चमड़े के अन्य सामान बनाने में होता है। चूंकि कई किसानों के पास मवेशी पालने के लिए जगह या धन की कमी है, इसलिए बकरियों को ‘गरीब आदमी की गाय’ उचित ही कहा जाता है।

भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली बकरियों की बहुत कम आबादी है, जिनसे पालतू बकरियां या भेड़ें विकसित हुई हैं। इनमें मार्खोर और हिमालयी और नीलगिरी ताहर शामिल हैं।

समुद्री यात्राओं के स्वर्ण युग में इन यात्राओं के ज़रिए भारतीय बकरियों के जीन दुनिया के सभी इलाकों में फैले। भारत से युरोप जाने वाले जहाजों पर लदी बकरियां महीने भर लंबी यात्रा के दौरान लोगों के लिए दूध और मांस उपलब्ध कराती थीं। उत्तर प्रदेश की जमुनापारी बकरियों को पसंद किया गया क्योंकि वे आठ महीने के स्तनपान काल के दौरान 300 किलोग्राम दूध देती हैं। इंग्लैंड में कभी, उच्च वसा वाला दूध देने वाली बकरियों की नस्ल, एंग्लो-न्युबियन, विकसित करने के लिए जमुनापारी बकरियों का वहां की स्थानीय नस्ल के साथ संकरण कराया गया था।

औषधि का निर्माण

बकरियां लगभग दो साल में प्रजनन शुरू कर देती हैं और भरपूर दूध देती हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि बकरियों ने चिकित्सकीय प्रोटीन उत्पादन के लिए जैव प्रोद्योगिकी कंपनियों का ध्यान आकर्षित किया है।

इसमें पहली सफलता एट्रीन (ATryn) के साथ मिली है – यह बकरी से उत्पादित एंटीथ्रॉम्बिन-III अणु का व्यावसायिक नाम है। एंटीथ्रॉम्बिन रक्त को थक्का बनने से मुक्त रखता है, और इस प्रोटीन की कमी (जो आम तौर पर वंशानुगत होती है) से पल्मोनरी एम्बोलिज़्म जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इससे पीड़ित व्यक्तियों को सप्ताह में दो बार एंटीथ्रॉम्बिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है, जो आम तौर पर दान किए गए रक्त से निकाला जाता है।

ट्रांसजेनिक बकरियों, जिनमें मानव एंटीथ्रॉम्बिन जीन की एक प्रति रोपी जाती है, की स्तन ग्रंथियों की कोशिकाएं दूध में यह प्रोटीन स्रावित करती हैं। ऐसा दावा है कि एक बकरी उतना एंटीथ्रॉम्बिन बना सकती है जितना 90,000 युनिट मानव रक्त से प्राप्त होता है।

हाल ही में एफडीए द्वारा अनुमोदित सेटुक्सिमैब नामक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी औषधि का निर्माण क्लोन बकरियों में किया गया है। इसे बड़ी मात्रा में (प्रति लीटर दूध से 10 ग्राम) बनाया जा सकता है। फिलहाल यह मालूम नहीं है कि यह ‘औषधि’ सुरक्षा और प्रभावकारिता सम्बंधी नियामक बाधाओं को पार कर पाएगी या नहीं। अब देखना यह है कि क्या अन्य मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के अधिक मात्रा में उत्पादन के लिए बकरियों का इस्तेमाल दवा कारखानों के रूप में किया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चूहों में बुढ़ापे को पलटा गया

क दशक पूर्व जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के शिन्या यामानाका को ऐसे प्रोटीन्स की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था जिनकी मदद से वयस्क कोशिकाओं को वापिस उनकी प्रारंभिक स्थिति (स्टेम कोशिकाओं) में तबदील किया जा सकता है। अब दो शोधकर्ता दलों ने दावा किया है कि ये प्रोटीन्स सिर्फ कोशिकाओं को नहीं बल्कि पूरे जीव को उसकी प्रारंभिक स्थिति में ला सकते हैं – यानी बुढ़ापे को पलट सकते हैं। .

इनमें से एक दल एक बायोटेक कंपनी में कार्यरत है और उसने तथाकथित यामानाका फैक्टर को जीन-उपचार की तकनीक से बूढ़े चूहों में प्रविष्ट कराया और उनके जीवनकाल को थोड़ा लंबा करने में सफलता पाई। दूसरे दल ने जेनेटिक इंजीनियरिग की मदद से चूहे विकसित किए और बुढ़ापे के लक्षणों को पलटा।

दोनों ही मामलों में लगता है कि यामानाका फैक्टर्स ने चूहों के एपिजीनोम को बदल दिया। एपिजीनोम डीएनए और प्रोटीन्स में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों को कहते हैं जो जीन्स की अभिव्यक्ति को बदल देते हैं – उसे ज़्यादा युवावस्था जैसा बना देते हैं। गौरतलब है कि इस प्रक्रिया में डीएनए के क्षारों में या उनके क्रम में परिवर्तन नहीं होता।

इससे पहले भी कई समूहों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से ऐसे चूहे तैयार किए हैं जो वयस्क होने पर खुद यामानाका फैक्टर्स बनाने लगते हैं और बुढ़ापे के कुछ लक्षणों को पलटने में सक्षम होते हैं। अब जो प्रयोग किए गए हैं उनका मकसद मनुष्यों के लिए कुछ उपचार खोजना है।

इसी संदर्भ में रीजुविनेट बायो नामक कंपनी के शोधकर्ताओं ने उक्त यामानाका फैक्टर्स के जीन्स से युक्त एक वायरस को चूहों में इंजेक्ट किया। देखा गया कि इसके बाद ये चूहे 18 सप्ताह तक जीवित रहे जबकि शेष चूहे मात्र 9 सप्ताह। शोधकर्ताओं ने बायोआर्काइव्स में बताया है कि इन चूहों में डीएनए मिथायलेशन का पैटर्न अपेक्षाकृत युवा चूहों जैसा हो गया था। डीएनए मिथायलेशन एपिजेनेटिक परिवर्तन का एक प्रकार है। वैसे कुछ अन्य अध्ययनों में पाया गया था कि यामानाका फैक्टर्स कैंसर को बढ़ावा देते हैं लेकिन इस अध्ययन में ऐसा कुछ नहीं देखा गया।

दूसरा अध्ययन हारवर्ड मेडिकल स्कूल के डेविड सिन्क्लेयर के दल द्वारा सेल में प्रकाशित किया गया है। कहते हैं कि सिन्क्लेयर पिछले दो दशकों में कई वृद्धावस्था रोधी विवादास्पद हस्तक्षेपों के प्रणेता रहे हैं। सिन्क्लेयर का दल वृद्धावस्था के सूचना सिद्धांत के आधार पर काम कर रहा था। इस सिद्धांत में कहा जाता है कि हम बूढ़े इसलिए होते हैं क्योंकि समय के साथ एपिजेनेटिक चिंह खत्म होते जाते हैं। सिन्क्लेयर का मत है कि हमारी कोशिकाओं में डीएनए मरम्मत की व्यवस्था ही इसके लिए ज़िम्मेदार होती है।

तो इस दल ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से ऐसे चूहे विकसित किए जिनमें यह गुण था कि उन्हें एक विशिष्ट औषधि देने पर वे एक एंज़ाइम बनाते थे जो उनके जीनोम को 20 जगह काट देता है। इन्हें फिर उक्त व्यवस्था द्वारा निष्ठापूर्वक दुरुस्त कर दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि कोशिका के डीएनए मिथायलेशन और जीन अभिव्यक्ति में व्यापक परिवर्तन होते हैं। इन चूहों में जो एपिजेनेटिक पैटर्न था वह अपेक्षाकृत बुज़ुर्ग चूहों का था और उनकी सेहत भी बिगड़ गई – उनके बाल झड़ गए, रंग उड़ गया और उनमें दुर्बलता के कई लक्षण नज़र आने लगे।

अब शोधकर्ता देखना चाहते थे कि क्या एपिजेनेटिक बदहाली के इन लक्षणों को पलटाया जा सकता है। उन्होंने एक वायरस के साथ यामानाका फैक्टर्स दिए और देखा कि बुढ़ाते चूहों की दृष्टि सुधर गई थी। कई अन्य मामलों में यामानाका फैक्टर्स ने एपिजेनेटिक सुधार किए थे। इसके आधार पर सिन्क्लेयर का मत है कि बुढ़ापे को आगे-पीछे कर सकते हैं और कुछ इलाज उभर सकता है।

बहरहाल, जैसा कि हमेशा होता है, पूरे मामले में कई अगर-मगर हैं। एक तो यही कि जो एपिजेनेटिक परिवर्तन किए गए थे वे कुदरती नहीं थे। पता नहीं कुदरती परिवर्तन किस तरह होते हैं और उनका क्या असर होता है। दूसरा कि चूहे और मनुष्य बहुत अलग-अलग हैं। तीसरा कि बुढ़ाना एक पेचीदा प्रक्रिया है और ये प्रयोग उसका सरलीकरण करते हैं। इन सारे अगर-मगर के बावजूद शोधकर्ता आगे बढ़कर मनुष्यों पर प्रयोग करने को उत्सुक हैं। बंदरों पर जांच तो शुरू भी हो चुकी है। (स्रोत फीचर्स)

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मनुष्यों का बड़ा दिमाग फालतू डीएनए का नतीजा है

ह तो बरसों से पता रहा है कि प्रोटीन बनाने वाले नए-नए जीन्स मौजूदा जीन्स में दोहराव या परिवर्तन की वजह से बन सकते हैं। लेकिन कुछ प्रोटीन-निर्माता जीन्स डीएनए के ऐसे खंडों से भी बन सकते हैं जो पहले लक्ष्यहीन आरएनए बनाया करते थे। गौरतलब है कि जब डीएनए के किसी हिस्से से सम्बंधित प्रोटीन बनवाना होता है तो उसकी एक प्रतिलिपि आरएनए के रूप में बनती है जो केंद्रक से बाहर जाकर प्रोटीन निर्माण करवाती है।

जब कोई डीएनए ऐसा आरएनए बनाए जिसका उपयोग प्रोटीन निर्माण में न हो सके तो वह फालतू ही हुआ ना? लेकिन इस तरीके से नए जीन्स बन जाएं, यह समझ से परे था।

अब एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह करिश्मा कैसे होता है कि डीएनए की फालतू शृंखला से बनने वाले आरएनए में ऐसी निपुणता पैदा हो जाती है कि वह केंद्रक से बाहर निकल जाता है। आरएनए का केंद्रक से बाहर निकलना उसके द्वारा प्रोटीन संश्लेषण की दिशा में पहला कदम होता है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने ऐसे 74 मानव प्रोटीन-निर्माता जीन्स उजागर किए हैं जो मनुष्य के चिम्पैंज़ी से अलग होने के बाद अस्तित्व में आए हैं। इनमें से कुछ जीन्स ने हमें ज़्यादा बड़े और जटिल मस्तिष्क प्रदान किए हैं। नेचर इकॉलॉजी एंड इवोल्यूशन पत्रिका में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जब ये जीन्स चूहों वगैरह जैसे कृन्तक जीवों में जोड़े गए तो उनके मस्तिष्क अपेक्षाकृत बड़े और मानव-सदृश हो गए।

देखा जाए तो जीन्स द्वारा बनाए गए आरएनए में से कुछ तो स्वयं कुछ नियामक भूमिका निभाते हैं। ये केंद्रक से बाहर नहीं जाते। दूसरी और प्रोटीन का संश्लेषण करवाने वाले आरएनए (संदेशवाहक आरएनए) केंद्रक से निकलकर कोशिका द्रव्य में पहुंचते हैं और राइबोसोम की मदद से प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं।

मामले की शुरुआत पेकिंग विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक चुआन-युन ली की इस खोज के साथ हुई थी कि मनुष्यों में कुछ प्रोटीन-निर्माता जीन्स रीसस बंदरों में पाए जाने वाले गैर-प्रोटीन निर्माता डीएनए खंडों से बहुत मिलते-जुलते होते हैं। तो सवाल उठा कि रीसस बंदरों के ये लगभग लक्ष्यविहीन डीएनए खंड मनुष्यों में प्रोटीन-निर्माता जीन्स कैसे बन गए?

फिर उन्हीं के छात्र ने ऐसे कुछ गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए को केंद्रक से बाहर निकलते देखा। इस खोज के बाद इन शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर की मदद से यह पता लगाया कि ऐसे गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए जो केंद्रक से बाहर नहीं निकलते और जो केंद्रक से बाहर निकल पाते हैं, उनके बीच क्या अंतर हैं।

पूरी कवायद से पता चला कि अंतर डीएनए के उन खंडों में हैं जिन्हें U1 तत्व कहते हैं। जब ये U1 तत्व आरएनए में जुड़ जाते हैं तो वह आरएनए केंद्रक से बाहर निकलने सक्षम नहीं रह जाता। दूसरी ओर, प्रोटीन-निर्माता जीन्स के U1 तत्वों में ऐसे उत्परिवर्तन पाए जाते हैं कि वे आरएनए की केंद्रक से बाहर निकलने की क्षमता को प्रभावित नहीं करते। ये आरएनए बाहर कोशिका द्रव्य में पहुंचकर राइबोसोम की मदद से प्रोटीन बना देते हैं।

आगे खोजबीन के लिए ली के दल ने मनुष्य व चिम्पैंज़ी के ऐसे नवीन प्रोटीन-निर्माता जीन्स की तलाश की जो रीसस बंदरों में गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए के रूप में मौजूद थे। इसके अलावा उन्होंने U1 तत्व में वह उत्परिवर्तन भी खोज निकाला जो केंद्रक से बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है। अंतत: उन्हें 45 मानव जीन्स और 29 मानव तथा चिम्पैंज़ी के साझा जीन्स मिले जो इस शर्त को पूरा करते हैं।

इतना होने के बाद उन्होंने इनमें से उन नौ जीन्स पर ध्यान केंद्रित किया जो मानव मस्तिष्क में सक्रिय होते हैं। वे देखना चाहते थे कि ये जीन्स क्या भूमिका निभाते हैं। उन्होंने इन जीन्स सहित और इनसे रहित कृत्रिम मस्तिष्क ऊतक (ऑर्गेनॉइड) विकसित किए। इसके आधार पर उन्होंने दो जीन्स पहचाने हैं जो मस्तिष्क को सामान्य से थोड़ा बड़ा बनाने में मदद करते हैं।

उन्होंने इनमें से एक जीन को चूहों में भी डालकर देखा और पाया कि उन चूहों का दिमाग सामान्य चूहों की अपेक्षा बड़ा हो गया। और तो और, उनमें कॉर्टेक्स भी बड़ा बना जो तर्क व भाषा के लिए ज़िम्मेदार होता है। एक अन्य जीन का भी ऐसा ही असर रहा और इस जीन से लैस चूहों का याददाश्त के परीक्षण में प्रदर्शन बेहतर रहा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि मानव मस्तिष्क के विकास में कुछ सर्वथा नए जीन्स की भूमिका रही है जो प्रोटीन-निर्माता जीन्स में उत्परिवर्तनों से नहीं बल्कि गैर-प्रोटीन जीन्स के कारण बने हैं। इस ताज़ा खोज से नए जीन्स बनने की क्रियाविधि समझने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

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माया कैलेंडर शायद 3000 साल से भी पुराना है

कैलेंडर का निर्माण लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं ने किया है। कारण स्पष्ट है कि दिन और वर्ष का ठीक-ठाक हिसाब-किताब रखना कृषि, पशुपालन, यात्राओं वगैरह की दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण रहा है। इसी सिलसिले में वैज्ञानिकों को यह पता चला है कि प्राचीन माया सभ्यता में कैलेंडर का निर्माण कम से कम 3000 साल पहले किया गया था।

वैज्ञानिकों को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि माया लोगों का एक समूह (माया किचे) लगभग 1100 ईसा पूर्व से समय का हिसाब-किताब रखता आया है। कैलेंडर को वे लोग चोल्किज (यानी दिनों का क्रम) कहते थे और उनका वर्ष 260 दिनों का होता था। यह माया सभ्यता के मेक्सिको व मध्य अमेरिकी इलाके में ही मिला है। प्रमाण बताते हैं कि समय की गणना 13 संख्याओं और 20 प्रतीकों के आधार पर की जाती थी और ये एक निश्चित क्रम में आते थे (जैसे इस कालगणना में 6 जनवरी 2023 ‘6 रैबिट’ होगा)। अब यह ज्ञात हो चुका है कि कैलेंडर के दिन तारों, इमारतों के स्थापत्य और कुदरती लैंडमार्क्स के संरेखन से मेल खाते थे।

ऐसा माना जा रहा है कि इस तरह की कालगणना से खेती-बाड़ी, धार्मिक अनुष्ठानों, राजनीति वगैरह में मार्गदर्शन मिलता होगा। वैसे माया लोग एक अन्य कैलेंडर (हाब) का उपयोग भी करते थे जिसमें वर्ष 365 दिन का था और यह सौर चक्र से जुड़ा था।

पूर्व में इस कैलेंडर का प्रमाण एक भित्ती चित्र (म्यूरल) के रूप में मिला था। यह म्यूरल ग्वाटेमाला में मिला था और इसका समय करीब 300 ईसा पूर्व निर्धारित हुआ था। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे लिखित रिकॉर्ड मुश्किल से मिलते हैं क्योंकि माया लोग जिन सामग्रियों का उपयोग करते थे वे विघटनशील हुआ करती थीं।

इसी रिकॉर्ड को पूरा करने की दृष्टि से स्लोवेनिया के इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपोलॉजिकल एंड स्पेशियल स्टडीज़ के इवान स्प्राक ने लिडार नामक एक तकनीक का सहारा लिया जिसकी मदद से घने जंगलों में ओझल प्राचीन संरचनाओं को उजागर किया जा सकता है।

इससे 2 वर्ष पहले एरिज़ोना विश्वविद्यालय के ताकेशी इनोमाटा ने मेक्सिको खाड़ी के तट का लिडार सर्वेक्षण किया था जिसमें लगभग 500 प्राचीन खंडहरों का पता चला था। स्प्राक और इनोमाटा ने मिलकर इनमें से 415 संकुलों का अध्ययन यह जानने के लिए किया कि किस तरह से इनकी सीध सूर्य, चंद्रमा, शुक्र व अन्य आकाशीय पिंडों से बैठती है।

पता चला कि अधिकांश संकुल पूर्व-पश्चिम सीध में थे और 90 प्रतिशत संकुलों में ऐसे स्थापत्य सम्बंधी लक्षण थे जो विशिष्ट तारीखों पर सूर्योदय की सीध में होते थे। अधिकांशत: इस तरह के सूर्योदय वर्तमान कैलेंडर के 11 फरवरी और 29 अक्टूबर के थे। और इनके बीच 265 दिनों का अंतर है। इन संकुलों में सबसे प्राचीन करीब 1100 ईसा पूर्व का है। इससे लगता है कि 265 दिन के वर्ष वाला कैलेंडर कम से कम इतना पुराना तो है।

अन्य स्मारकों में ऐसे सूर्योदयों के बीच अंतर 130 दिनों का है जो आधी कैलेंडर अवधि के बराबर है। कुछ स्मारकों में सूर्योदयों के बीच 13 या 20 दिन के गुणज का अंतर है। इससे पता चलता है कि कैलेंडर प्रणाली में 13 संख्याओं और 20 प्रतीकों का उपयोग होता था और ये दो अयनांतों तथा दो विषुव (समपातों) से मेल खाते थे। कुछ संकुलों का मिलान शुक्र और चंद्र के चक्र से भी देखा गया। वैसे, कई संकुलों में ऐसा कोई तालमेल नज़र नहीं आया।

अलबत्ता, ऐसा माना जा रहा है कि इतने बड़े नमूने के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष काफी सटीक हैं। एक बात यह भी कही गई है कि इस अध्ययन में कैलेंडर का जो सबसे पुराना प्रमाण मिला है वह उस समय का है जब ये लोग शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली से निकलकर खेती की शुरुआत कर रहे थे। (स्रोत फीचर्स)

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क्या खब्बू होना विरासत में मिलता है – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

यदि किसी व्यक्ति की मां खब्बू यानी बाएं हाथ से काम करने वाली हो, तो ज़्यादा संभावना होती है कि वह भी खब्बू हो।

म इन्सान दो पैरों पर चलते हैं यानी दोपाए हैं और अपने दो हाथों का उपयोग करते हैं। दोपाएपन का विकास हमारे पूर्वजों – प्रायमेट्स –  में लगभग 40 लाख पहले शुरू हो गया था। प्रायमेट जीवों ने न सिर्फ हमें हमारे रक्त समूह की सौगात दी, बल्कि दो पैर और दो हाथ भी दिए हैं। प्रायमेट्स में कई ऐसे लक्षण पाए जाते हैं जो उन्हें कम विकसित स्तनधारियों से अलग करते हैं। जैसे पेड़ों पर रहने (जैसा कि बंदर करते हैं) के लिए हुए अनुकूलन, बड़े मस्तिष्क, बेहतर दृष्टि संवेदना, उंगलियों के सामने आ जाने वाला (सम्मुख) अंगूठा जिसके चलते चीज़ों पर पकड़ बेहतर बनती है, और कंधों की ज़्यादा लचीली गतियां।

चार हाथों से दो तक

जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के डॉ. तेत्सुरो मात्सुज़ावा लिखते हैं कि प्रायमेट्स के साझा पूर्वज पेड़ों पर चढ़े और उन्होंने अपने ज़मीनी पूर्वजों के चार पैरों से चार हाथ विकसित किए। यह वृक्ष-आधारित जीवन के लिए एक अनुकूलन था। इससे उन्हें पेड़ के तने और शाखाओं पर बढ़िया पकड़ बनाने में मदद मिलती थी। इसके बाद किसी समय प्रारंभिक मानव पूर्वज पेड़ों से उतरे और ज़मीन पर दो पैरों से लंबी-लंबी दूरियां तय करने लगे। इस तरह हमने अपने प्रायमेट पूर्वजों से विकास के दौरान चार हाथों से दो पैर और दो हाथ बना लिए।

यूएस के मिसौरी विश्वविद्यालय के मानव वैज्ञानिक कैरोल वार्ड बताते हैं कि कैसे हम मनुष्य इस दुनिया में जिस ढंग से विचरते हैं, वह किसी भी अन्य प्राणि से भिन्न है। हम ज़मीन पर दो पैरों पर सीधे खड़े होकर चलते हैं लेकिन एकदम अनोखे ढंग से: पहले एक पैर, फिर दूसरा पैर, अपने शरीर को एकदम सीधा रखकर गतियों के एक विशिष्ट क्रम में। लिहाज़ा, यह समझना एक बड़ी बात है कि हम इसी तरह क्यों चलते हैं और हमारा वंश (होमो) अपने वानर-सदृश पूर्वजों से इतना दूर कैसे निकल गया।

मानव मस्तिष्क हमारे सबसे निकट सम्बंधी – चिम्पैंज़ी – से लगभग तीन गुना बड़ा है। इसके अलावा हमारे मस्तिष्क के सेरेब्रल कॉर्टेक्स नामक हिस्से में चिम्पैंज़ी के उसी हिस्से के मुकाबले कोशिकाओं की संख्या दुगनी है। गौरतलब है कि सेरेब्रल कॉर्टेक्स याददाश्त, एकाग्रता और सोच-विचार में प्रमुख भूमिका निभाता है। यानी हम वनमानुषों से ज़्यादा स्मार्ट हैं।

तो क्या यह जीन्स में है

अब सवाल आता है हाथों के इस्तेमाल में वरीयता यानी हैंडेडनेस का। लगभग 10 प्रतिशत लोग वामहस्त (खब्बू) हैं। यह कैसे हुआ? यह आज भी गर्मागरम बहस का मुद्दा है। हो सकता है कि इसमें कुछ जेनेटिक अंश हो: आपके खब्बू होने की संभावना आपकी मां के खब्बू होने से ज़्यादा जुड़ी होती है बनिस्बत आपके पिता की स्थिति से। यदि आपके माता-पिता दोनों खब्बू हों तो आपके खब्बू होने की संभावना 50 प्रतिशत हो जाती है। पाकिस्तान के सरगोधा विश्वविद्यालय के एक दल ने जरनल ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ एप्लाइड सायकोलॉजी (JIAAP) में बताया है कि खब्बू सहभागी दाहिने हाथ वाले (दक्षिणहस्त) सहभागियों की तुलना में अधिक बुद्धिमान होते हैं।

लंदन विश्वविद्यालय के डॉ. क्रिस मैकमेनस ने 2019 में एक विद्वत्तापूर्ण लेख प्रकाशित किया था: ‘हाफ ए सेंचुरी ऑफ हैंडेडनेस रिसर्च: मिथ्स, ट्रुथ्स, फिक्शन्स, फैक्ट्स; बैकवर्ड्स बट मोस्टली फॉरवर्ड्स’। यह लेख ब्रेन एंड न्यूरोसाइंस एडवांसेज़ नामक जरनल में प्रकाशित हुआ था। उन्हें उम्मीद है कि जीन अनुक्रमण और मस्तिष्क स्कैनिंग तकनीकों में हर तरक्की के साथ हम आने वाले वर्षों में हैंडेडनेस के बारे में और अधिक जान पाएंगे।

खब्बू फायदे में

खेलकूद में हम देख ही सकते हैं कि खब्बू खिलाड़ी दाहिने हाथ वालों पर हावी हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में लगभग 20 प्रतिशत उच्च स्तरीय बल्लेबाज़ खब्बू हैं। और ओपन-एरा विंबलडन प्रतियोगिता में 23 प्रतिशत बढ़िया खिलाड़ी खब्बू हैं। क्रिकेट में गौतम गंभीर और सौरभ गांगुली, टेनिस में राफेल नडाल और मार्टिना नवरातिलोवा, फुटबॉल में लियोनल मेसी। कहना न होगा कि महात्मा गांधी दोनों हाथों में निपुण (एम्बीडेक्स्ट्रस) थे, और आइज़ेक न्यूटन भी। इस फेहरिस्त में आप भी कई नाम जोड़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चैट-जीपीटी – अजूबा या धोखेबाज़ी का नया औज़ार? – लाल्टू

मैं जिस संस्थान में काम करता हूं, पिछले ढाई महीनों से वहां कई अध्यापक ईमेल पर ‘चैट-जीपीटी’ पर चर्चा कर रहे हैं। दरअसल पूरी दुनिया में तालीम और अध्यापन से जुड़े लोगों में बड़ी संजीदगी से यह चर्चा चल रही है। खास तौर पर मौलिक लेखन को लेकर एक संकट सा फैलता दिख रहा है। तो चैट-जीपीटी क्या है?

कृत्रिम बुद्धि में मील का पत्थर – चैट-जीपीटी

हाल में कंप्यूटर साइंस और सूचना टेक्नॉलॉजी में जो तरक्की हुई है, उसी की एक कड़ी एआई यानी कृत्रिम बुद्धि में हुए शोध की है। इसके कई पहलुओं में रोबोटिक्स, भाषा की प्रोसेसिंग या नैचुरल लैंग्वेज़ प्रोसेसिंग (एन.एल.पी.) आदि हैं। चैट-जीपीटी ओपन-एआई नामक एक कंपनी द्वारा बनाया ऐसा सॉफ्टवेयर है, जिससे कोई पहले से प्रशिक्षित (प्री-ट्रेन्ड) कंप्यूटर, किसी विषय को समझ कर उसके बारे में नए लेख ‘उत्पन्न’ यानी अपनी ओर से पेश कर सकता है। इसके और भी कई चमत्कार हैं, जैसे कलाकृतियां या गीत आदि पेश करना, परंतु ज़्यादा शंकाएं इसकी लेखन-महारत को लेकर हैं।

लार्ज लैंग्वेज़ मॉडल –  चैटबॉट

नवंबर 2022 के आखरी दिन बाज़ार में आया यह सॉफ्टवेयर दरअसल लंबे समय से चले आ रहे शोध की एक कड़ी है। पूर्व के ऐसे मॉडल GPT-3 शृंखला के लार्ज लैंग्वेज़ मॉडल (LLM) या चैट-बॉट (chatbot) कहलाते थे। बॉट शब्द रोबोट से आया है। ‘चैट’ यानी गुफ्तगू। तो चैटबॉट हुआ कंप्यूटर से गुफ्तगू। जब इंटरनेट पर मौजूद किसी सॉफ्टवेयर-प्रोग्राम से बार-बार खास किस्म का काम करवाया जा सके (भला या बुरा कुछ भी), तो उसे बॉट कहा जाता है। चैट-जीपीटी भी चैट-बॉट ही है; इसकी खासियत पूर्व मॉडल्स की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर समझ और उसके मुताबिक लेख तैयार करने में है।

शंकाएं

कमाल इस बात का है कि हालांकि चैट-जीपीटी से तैयार किए गए लेख पूरी तरह सही नहीं होते, और ध्यान से पढ़ने पर उनमें गलतियां दिख जाती हैं, फिर भी हर किस्म के लेखन की दुनिया में इसे लेकर बड़ी चिंता जताई जा रही है। नेचर समेत विज्ञान की नामी शोध पत्रिकाओं में आम पाठकों और वैज्ञानिक समुदाय को इसके गलत इस्तेमाल पर सचेत करते हुए आलेख छपे हैं। यह आशंका जताई गई है कि आधुनिक विज्ञान की जटिलता की वजह से चैट-जीपीटी की मदद से तैयार जाली लेख के सार पढ़कर विषय के माहिर यह ताड़ नहीं पाएंगे कि लेख जाली है और उसे छापने की रज़ामंदी दे देंगे।

न्यूरॉन-तंत्र से प्रेरित सॉफ्टवेयर

चैट-बॉट को समझने का एक आसान तरीका गूगल-ट्रांसलेशन हो सकता है। अगर आप गूगल कंपनी की इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, तो आप जानते होंगे कि बार-बार इस्तेमाल करने से तर्जुमे की गुणवत्ता बेहतर होती जाती है: पहली कोशिश में जो गलतियां होती हैं और हम उन्हें सुधारते हैं तो कंप्यूटर उस सुधार को समझ लेता है और अगली कोशिश में वह संशोधित शब्द या वाक्य ही सामने लाता है। चैट-बॉट में इसे और भी ऊंचे स्तर तक ले जाया गया है। कृत्रिम बुद्धि के शोध में इसे मशीन-लर्निंग (मशीन का सीखना) कहा जाता है। जैविक न्यूरॉन-तंत्र से प्रेरित जटिल सॉफ्टवेयर तैयार किए गए हैं, जिनमें जैविक-तंत्र की तरह ही सूचना की प्रोसेसिंग होती है, और जैसे हमारा ज़हन किसी प्राप्त जानकारी के प्रति कोई प्रतिक्रिया पेश करता है, उसी तरह कंप्यूटर भी दी गई जानकारी को सीख कर किसी कहे मुताबिक एक प्रतिक्रिया पेश करता है।

इसी तरह के शोध की सबसे अगली कड़ी में चैट-बॉट होते हैं। इनका इस्तेमाल दरअसल लेखन को बेहतर बनाने के लिए यानी गलतियों को कम करने के लिए ही किया जाना चाहिए। इसका फायदा उठाते हुए कई लोगों ने शोध के आंकड़ों को चैट-बॉट में दर्ज करके बेहतरीन पर्चे तैयार किए हैं। जाहिर है, पूरी तरह चैट-बॉट का लिखा पर्चा सही नहीं हो सकता, क्योंकि मशीन आखिर मशीन है और उससे सौ फीसदी सही नतीजा नहीं आ सकता।

फिर भी गड़बड़ी की आशंका बेवजह नहीं है – जैसे किसी विशेषज्ञ की किसी बिलकुल नए शोध पर भरपूर महारत ना होना, या व्यस्तता के कारण सामने आए लेख को सरसरी निगाह से देखना जैसी कई वजहों से, अक्सर पूरी तरह सही ना होते हुए भी लेख छप जाते हैं। इसी तरह अध्यापक अगर बड़ी तादाद में छात्रों की कॉपियां जांचते हैं तो अक्सर किसी का लिखा पूरा पढ़ पाना मुमकिन नहीं होता; तब तजुर्बे के आधार पर जितना हो सके पढ़कर जांच का नतीजा तय हो जाता है – यहीं पर चैट-जीपीटी जैसे ताकतवर सॉफ्टवेयर से खतरा पेश आता है।

आम तौर पर नकल या जाली काम पकड़ने के लिए प्लेजिएरिज़्म यानी नकल-पकड़ चेकर (plagiarism checker)  सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल होता है। ऐसा पाया गया है कि अक्सर चैट-बॉट से तैयार लेखों के सार इस तरह की जांच से बच निकलते हैं। इससे वैज्ञानिक लेखन की नैतिकता को लेकर बड़े सवाल सामने आए हैं और नेचर पत्रिका और ए-आई के मशहूर सम्मेलनों में आने वाले पर्चों के लिए चैट-जीपीटी के इस्तेमाल की मनाही हो गई है। दुनिया भर में तालीम के संस्थान चैट-जीपीटी पर नई नीतियां तय कर रहे हैं; मसलन न्यूयॉर्क शहर में सभी स्कूलों में चैट-जीपीटी के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई है, यानी इन स्कूलों में मौजूद किसी भी कंप्यूटर पर और इंटरनेट के जरिए उपलब्ध संसाधनों में चैट-जीपीटी पर रोक लगा दी गई है। यह रोक मिल रही जानकारी की प्रामाणिकता को लेकर शंकाओं की वजह से लगाई गई है। कई विषयों में सामान्य जानकारियां सुनकर चैट-बॉट बेहतरीन निबंध तैयार कर सकता है। इससे छात्रों को अभ्यास के लिए दी गई सामग्री की जांच के नतीजे सही ना हो पाने की आशंका बढ़ गई और ऐसा लगने लगा कि चैट-बॉट की मदद से जाली काम और नकल को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिका के कई दूसरे शहरों में भी इस तरह के प्रतिबंध पर सोचा जा रहा है।

रोक हल नहीं है

ऐसी शंकाएं पहले तब भी जताई जा चुकी हैं, जब चैट-बॉट जैसे ताकतवर सॉफ्टवेयर नहीं होते थे और कंप्यूटर या ए-आई टेक्नॉलॉजी में कोई विलक्षण तरक्की नहीं हुई थी। इसलिए कई माहिरों का कहना है कि रोक लगाने से समस्या का निदान नहीं होता है। दूसरी ओर, चैट-जीपीटी से जो फायदे होने हैं, रोक के चलते छात्र उनसे वंचित रह जाएंगे। बेहतर यह है कि अभ्यास के लिए कैसा काम दिया जाए, इस पर सोचा जाए। जैसे हाल में मिली जानकारियों पर आधारित काम दिए जा सकते हैं, जिन पर चैट-जीपीटी के तंत्र में जानकारी नहीं होगी।

ऐसा भी किया सकता है कि छात्रों से सचेत रूप से चैट-जीपीटी का इस्तेमाल करने को कहा जाए और इससे मिले आउटपुट पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने को कहा जाए, ताकि यह पता चल सके कि छात्र को वाकई विषय की कितनी समझ है। या क्लास में उनसे सवाल पूछे जाएं, जिससे उनकी काबिलियत का सही अंदाज़ा हो सके।

मूल समस्या पूंजीवादी व्यवस्था

मूल समस्या यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कम लागत में ज़्यादा से ज़्यादा काम लेने की कोशिश की वजह से ये सारे उपाय नाकामयाब रह जाते हैं; अक्सर अध्यापकों के पास इतना वक्त नहीं होता कि वे जांच के लिए ज़रूरी भरपूर ध्यान दें। साथ ही जहां समाज में गैर-बराबरी है, अगर चैट-जीपीटी का कोई फायदा है तो बस उनके लिए है जो इसके इस्तेमाल का खर्चा उठा पाएंगे।

विज्ञान लेखन में नैतिकता

नैतिकता को ध्यान में रखकर, कई वैज्ञानिक तो चैटबॉट का इस्तेमाल करने पर लेखकों की सूची में चैट-जीपीटी को भी शामिल कर रहे हैं, पर ज़्यादातर वैज्ञानिक इसके खिलाफ हैं। यह मुमकिन है चैट-जीपीटी को लेखक कहना एक मज़ाक हो – पालतू जानवरों और नकली नामों को शामिल करने के ऐसे मज़ाक पहले भी होते रहे हैं। पर ऐसा भी हो सकता है कि शोध की जानकारियों को गलत ढंग से लिखने या जाली बातें लिख कर पकड़े जाने से बचने के लिए भी कोई चैट-जीपीटी को लेखकों में शामिल करे। इसलिए प्रकाशन-संस्थाएं इस बात को संजीदगी से ले रही हैं और लेखकों को अपने लिखे की पूरी ज़िम्मेदारी लेने के लिए कह रही हैं। वैज्ञानिक पर्चों में एक से ज़्यादा लेखकों का होना आम बात है: शोध के काम में कोई मूल सवालों पर सोचता है, कोई प्रयोग करता है आदि, और इस वजह से अलग-अलग किस्म की भागीदारी होती है, जिसका सही श्रेय मिलना लाज़मी है। 

टेक्नॉलॉजी बनाम इंसान

सूचना टेक्नॉलॉजी की बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने ओपेन-आई कंपनी में दस अरब डॉलर लगाना तय किया है। माइक्रोसॉफ्ट ने पहले ही तीन अरब डॉलर ओपेन-आई में लगाए हैं। ज़ाहिर है, बड़ी टेक-कंपनियों ने चैट-जीपीटी की कामयाबी को बड़ी संजीदगी से लिया है। पर इससे एक और खतरा सामने आता दिखता है। हाल में ही माइक्रोसॉफ्ट समेत कई कंपनियों ने बड़ी तादाद में कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा की है। जैसे-जैसे मशीनों की काबिलियत बढ़ेगी, इंसान की मेहनत गैर-ज़रूरी होती जाएगी। इससे बेरोज़गारी बढ़ेगी और समाज में तनाव बढ़ेंगे। माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य प्रबंधन प्रभारी सत्य नडेला ने कहा है कि दस हज़ार लोगों की छंटनी के बाद कंपनी ए-आई के शोध पर ज़्यादा फोकस कर पाएगी।

जैसा अक्सर होता है, ओपेन-आई कंपनी की शुरुआत मुनाफा न कमा कर शोध कार्य करने के लिए हुई थी, पर वक्त के साथ शोध के लिए पैसे जुटाने हेतु कंपनी में तैयार सॉफ्टवेयर को बेचा जाने लगा और आज यह चैटबॉट बनाने वाली सबसे कामयाब मुनाफादायक कंपनी बन चुकी है।

रोचक बात यह है कि टेक्नॉलॉजी से आई बीमारियों का इलाज टेक्नॉलॉजी में ही ढूंढा जाता है। बेशक जहां पर्याप्त सुविधा हो, ए-आई का इस्तेमाल बढ़ता चलेगा। इसे खारिज करना आसान नहीं है, पर सावधानी और गलत इस्तेमाल के रोकथाम की गुंजाइश रहेगी। आखिर कौन नहीं चाहता कि कोई धोखेबाज हमें उल्लू न बनाए! चैट-जीपीटी के गलत इस्तेमाल को पकड़ने के लिए कई सॉफ्टवेयर तैयार हो चुके हैं, जिनमें  ओपेन-आई-डिटेक्टर, जी-एल-टी-आर, जीपीटी-ज़ीरो आदि मुख्य हैं। इनकी मदद से अध्यापक यह पकड़ सकते हैं कि किसी छात्र ने खुद अभ्यास का काम न करके चैटबॉट की मदद से किया है। जहां इम्तिहानों में छूट दी जाती है कि छात्र घर बैठकर भी सवाल हल कर सकें, वहां भी इन चैट-जीपीटी प्रतिरोधी ऐप आदि से पकड़ना आसान हो गया है कि किसी ने मौलिक काम किया है या नहीं। इस दिशा में बहुत सारा शोध जारी है और उम्मीद यही है कि चैट-जीपीटी से जितना खतरा आंका गया है, आखिर में ऐसा न होकर इसका बेहतर इस्तेमाल ही होता रहेगा।  फिलहाल यही कहा जा सकता है कि आिखरी जीत इंसान की समझ और इल्म की ही होगी और टेक्नॉलॉजी एक हद तक ही हमें मात दे पाएगी। (स्रोत फीचर्स)

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आपका सूक्ष्मजीव संसार और आसपास के लोग

क ही घर में रहने वाले लोग सिर्फ एक छत साझा नहीं करते। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि आप अपने परिवार या साथ रहने वालों के साथ सूक्ष्मजीव भी साझा करते हैं। जितना लंबा समय आप उनके साथ रहते हैं सूक्ष्मजीव उतने ही अधिक समान होते जाते हैं।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित विश्व भर के हज़ारों लोगों के आंत और मुंह में उपस्थित सूक्ष्मजीव संसार को लेकर इस अध्ययन से इस संभावना का संकेत मिलता है कि सूक्ष्मजीव संसार की गड़बड़ियों से सम्बंधित बीमारियां (जैसे कैंसर, मधुमेह और मोटापा) कुछ हद तक संक्रामक हो सकती हैं। व्यक्ति को उसका सूक्ष्मजीव संसार कैसे प्राप्त होता है, इसे लेकर अधिकांश अध्ययनों में व्यक्ति के सूक्ष्मजीवों से प्रथम संपर्क (जो मां के ज़रिए होता है) पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। लेकिन इस सूक्ष्मजीव संसार का संघटन आजीवन बदलता रहता है। इस परिवर्तन को समझने के लिए मौजूदा अध्ययन में इटली के ट्रेंटो विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मिरिया वैलेस कोलोमर और निकोला सेगाटा ने यह जानने का प्रयास किया कि एक व्यक्ति के जीवन में इस सूक्ष्मजीव संसार में कब और कैसे परिवर्तन आता है। उन्होंने दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों से एकत्रित विष्ठा और लार के लगभग 10,000 नमूनों से प्राप्त डीएनए का विश्लेषण किया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने परिवार के सदस्यों, जीवनसाथियों, साथ रहने वालों और अन्य सामाजिक संपर्क में आए लोगों की आंत और मुंह के नमूनों मे सूक्ष्मजीव संघटन का मिलान करके देखा।

अध्ययन में मां और बच्चों के सूक्ष्मजीव संसार में एक मज़बूत सम्बंध दिखा जो बच्चे के शुरुआती जीवन में सबसे अधिक था। शिशु के जीवन के पहले वर्ष के दौरान उसकी आंतों के आधे सूक्ष्मजीव मां के समान थे। उम्र बढ़ने के साथ सूक्ष्मजीवों में समानता कम होती गई लेकिन कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 50-85 वर्ष आयु तक भी व्यक्ति और मां की आंतों में समान सूक्ष्मजीव पाए गए।   

इसके अलावा परिवार के अन्य सदस्यों की आंत के सूक्ष्मजीव भी एक महत्वपूर्ण स्रोत थे। 4 वर्ष की आयु से बड़े बच्चों के सूक्ष्मजीव अपने पिता के साथ उतने ही समान थे जितने मां के साथ। दूर-दूर रहने वाले जुड़वां जितना समय दूर रहे उतने ही कम सूक्ष्मजीव साझा किए। ग्रामीण क्षेत्रों में अलग-अलग परिवारों के बीच भी सूक्ष्मजीवों की साझेदारी देखी गई।

यह भी देखा गया कि मां से प्राप्त सूक्ष्मजीव संसार का प्रभाव आंत के सूक्ष्मजीवों की अपेक्षा मुंह के सूक्ष्मजीवों में कम था। एक साथ रहने वाले गैर-रिश्तेदारों के मुंह में भी एक ही प्रकार के सूक्ष्मजीव पाए गए और जितने लंबे समय तक वे साथ रहे उतनी ही अधिक समानता देखी गई। पति-पत्नी अपने बच्चों और माता-पिता की तुलना में अधिक सूक्ष्मजीव साझा करते हैं।

विशेषज्ञ इस अध्ययन को काफी महत्वपूर्ण मानते हैं जिसकी मदद से यह देखा जा सकेगा कि गैर-रोगजनक माने जाने वाले सूक्ष्मजीव कैसे फैलते हैं और रोग उत्पन्न करने में क्या भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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लेज़र की मदद से तड़ित पर नियंत्रण

स्विट्ज़रलैंड के कुछ भौतिकविदों ने शक्तिशाली लेज़र की मदद से वज्रपात को नियंत्रित करने का दावा किया है। दावा है कि इस तकनीक का उपयोग हवाई अड्डों, रॉकेट लॉन्चपैड और अन्य संवेदनशील इमारतों की सुरक्षा हेतु किया जा सकेगा। वैसे, यह स्पष्ट नहीं है कि यह अत्यधिक महंगी तकनीक अपेक्षाकृत सस्ते तड़ित चालक से बेहतर काम कर सकती है या नहीं।

जब आकाशीय विद्युत रास्ता बनाते हुए धरती पर किसी वस्तु से टकराती है तब बादलों से धरती तक 30,000 एम्पियर का करंट बहता है। इस ज़ोरदार करंट से इमारतों की दीवारें टूट सकती है या आग लग सकती है।        

वर्तमान में तड़ित से होने वाली क्षति से सुरक्षा के लिए तड़ित चालक का उपयोग किया जाता है जिसका आविष्कार 1752 में बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था। तड़ित चालक इमारत की छत पर धातु की एक नुकीली रॉड होती है और उसे एक तार या धातु की पट्टी से ज़मीन से जोड़ दिया जाता है। छड़ एक मज़बूत विद्युत क्षेत्र बनाती है जो तड़ित को इमारत से दूर रखता है। यदि बिजली इस छड़ से टकरा जाए तो धरती से जुड़ा तार करंट को सुरक्षित रूप से धरती में पहुंचा देता है।

1960 के दशक में लेज़र के आविष्कार के बाद से ही वैज्ञानिक इसका उपयोग एक तड़ित चालक के रूप में करने पर विचार करते रहे हैं – लेज़र पुंज आयनित हवा का एक सीधा मार्ग बनाएगा जिससे विद्युत धारा आसानी से प्रवाहित हो जाएगी। लेकिन शक्तिशाली लेज़र के साथ किए गए शुरुआती प्रयास विफल रहे थे क्योंकि थोड़ी दूरी के भीतर ही आयनित हवा ने लेज़र के प्रकाश को अवशोषित कर लिया जिससे आयनित वायु मार्ग बहुत उबड़-खाबड़ हो गया।        

1990 के दशक में फेम्टोसेकंड पल्स वाला लेज़र तैयार हुआ। यह एक सुचालक चैनल बनाने में काफी प्रभावी साबित हुआ। लेज़र प्रकाश कुछ हवा को आयनित कर देता है जो एक लेंस की तरह काम करती है जो प्रकाश को एक महीन लंबे फिलामेंट में केंद्रित कर देता है। इस पतले पुंज ने हवा को गर्म किया जिससे एक कम घनत्व वाली हवा का चैनल तैयार हुआ जो बिजली का बेहतर चालक होता है। प्रयोगशाला सफलता के बावजूद प्राकृतिक तड़ित को नियंत्रित करने के प्रयास विफल रहे।      

हाल ही में जेनेवा विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञानी लेज़र पुंज की मदद से तड़ित को नियंत्रित करने में सफल रहे। उन्होंने 124 मीटर ऊंचे एक दूरसंचार टॉवर के पास एक फेम्टोसेकंड लेज़र स्थापित किया। इस टॉवर पर साल में 100 से अधिक बार बिजली गिरती है।       

प्रयोग के दौरान टॉवर पर कम से कम 15 बार बिजली टकराई जिसमें से चार बार लेज़र प्रणाली चालू थी। नेचर फोटोनिक्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जिस समय लेज़र प्रणाली चालू थी तब बिजली गिरने की 4 घटनाओं में बिजली ने लेज़र पुंज के मार्ग का अनुसरण किया।

इस बार सफलता का एक कारण यह रहा कि लेज़र को प्रति सेकंड 1000 बार फायर किया गया था जबकि पूर्व में प्रति सेकंड 10 बार फायर किया जाता था। शोधकर्ताओं के अनुसार निरंतर फायर करने से उथल-पुथल भरे वातावरण में भी एक स्थिर प्रवाही चैनल बना रहा। इसके अलावा उन्होंने स्थान भी ऐसा चुना था जहां बिजली हमेशा एक ही बिंदु पर गिरती है।  

पांच वर्ष में तैयार किए गए इस लेज़र उपकरण की लागत लगभग 36 करोड़ रुपए है। उपयोग करने से पहले इसके विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग करके पहाड़ी पर ले जाया गया, वहां उन्हें जोड़ा गया और इसे रखने के लिए भवन निर्माण हेतु एक विशाल हेलीकाप्टर की मदद ली गई। इसकी कुशलता को साबित करने के लिए प्रयोग तो चलते रहेंगे लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि क्या 36 करोड़ रुपए की लागत वाला लेज़र सस्ते तड़ित चालक का मुकाबला कर पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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जोशीमठ: सुरंगों से हिमालय में हुई तबाही का नतीजा – प्रमोद भार्गव

मूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से जल विद्युत संयंत्रों और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के तहत हिमालय क्षेत्र में रेल यातायात और कई छोटी हिमालयी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस अनियोजित आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय दरकने लगा है जहां मानव बसाहटें जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहने वाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करती चली आ रही थीं। हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट किया और उसे विकास का नाम दे दिया। जोशीमठ संकट इसी ‘विकास’ का नतीजा है।

उत्तराखंड के चमोली ज़िले में स्थित जोशीमठ शहर ने कई अप्रिय कारणों से नीति-नियंताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों ने जोशीमठ के बारह दिनों में 5.4 सेंटीमीटर धंस जाने की जानकारी दी है। धंसती धरती की इस सच्चाई को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उत्तराखंड सरकार ने इसरो समेत कई सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे मीडिया के साथ जानकारी साझा न करें। नतीजतन इसरो की बेवसाइट से ये चित्र हटा दिए गए हैं। सरकार का यह उपाय भूलों से सबक लेने की बजाय उन पर धूल डालने जैसा है।

भारत सरकार और राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद हठपूर्वक पर्यावरण के प्रतिकूल जिन विकास योजनाओं को चुना है, उनके चलते यदि लोग अपने गांव और आजीविका के साधनों से हाथ धो रहे हैं, तो सवाल है कि ये परियोजनाएं किसलिए और किसके लिए हैं?

नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन  तथा रेल और बिजली के विकास से जुड़ी तमाम कंपनियों का दावा है कि धरती धंसने में निर्माणाधीन परियोजनाओं की कोई भूमिका नहीं है।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर एक लाख तीस हज़ार करोड़ की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है और नदियों पर बांध निर्माण के लिए नींव हेतु गहरे गड्ढे खोदकर खंभे व दीवारें खड़े किए जा रहे हैं। कई जगह सुरंगें बनाकर पानी की धार को संयंत्र के टर्बाइन पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन तेज़ बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडों के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ रही हैं। यही नहीं, कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए किए जा रहे भीषण विस्फोट भी हिमालय को थर्रा रहे हैं।

हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन हैं। सबसे बड़ी रेल परियोजना के कारण उत्तराखंड के चार ज़िलों (टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) के तीस से ज़्यादा गांवों को विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हज़ार परिवार विस्थापन की चपेट में आ गए हैं। रुद्रप्रयाग ज़िले के मरोड़ा गांव के सभी घर दरक गए हैं। रेल विभाग ने इनके विस्थापन की तैयारी कर ली है। यदि ये विकास इसी तरह जारी रहते हैं तो बर्बादी का नक्शा बहुत विस्तृत होगा। दरअसल ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना 125 किमी लंबी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो 14.8 कि.मी. लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बाकी 15 सुरंगों में ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ की बजाय अब पीपलकोठी तक होगा। भू-गर्भीय सर्वेक्षण के बाद रेल विकास निगम ने जोशीमठ क्षेत्र की भौगोलिक संरचना को परियोजना के अनुकूल नहीं पाया था। अच्छी बात है कि अब इस परियोजना का अंतिम पड़ाव पीपलकोठी कर दिया है। हिमालय की ठोस व कठोर अंदरूनी सतहों में ये विस्फोट दरारें पैदा करके पेड़ों की जड़ें भी हिला रहे हैं। कई अन्य ज़िलों के गांवों के नीचे से सुरंगें निकाली जा रही हैं। इनके धमाकों से घरों में दरारें आ गई हैं। वैसे भी पहाड़ी राज्यों में घर ढलानयुक्त ज़मीन पर ऊंची नींव देकर बनाए जाते हैं जो निर्माण के लिहाज से ही कमज़ोर होते हैं। ऐसे में विस्फोट इन घरों को और कमज़ोर कर रहे हैं। हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी ज़्यादा संवेदनशील है। रेल परियोजनाएं इसी नदी से सटे पहाड़ों के नीचे और ऊपर निर्माणाधीन हैं। 

दरअसल उत्तराखंड का भूगोल बीते डेढ़ दशक में तेज़ी से बदला है। चौबीस हज़ार करोड़ रुपए की ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना ने विकास और बदलाव की ऊंची छलांग तो लगाई है, लेकिन इन योजनाओं ने खतरों की नई सुरंगें भी खोल दी हैं। उत्तराखंड के सबसे बड़े पहाड़ी शहर श्रीनगर के नीचे से भी सुरंग निकल रही है। नतीजतन धमाकों के चलते 150 से ज़्यादा घरों में दरारें आ गई हैं। पौड़ी जिले के मलेथा, लक्ष्मोली, स्वोत और डेवली में 771 घरों में दरारें आ चुकी है।

रेल परियोजनाओं के अलावा यहां बारह हज़ार करोड़ रुपए की लागत से बारहमासी मार्ग निर्माणाधीन हैं। इन मार्गों पर पुलों के निर्माण के लिए भी कहीं सुरंगें बनाई जा रही हैं, तो कहीं घाटियों के बीच पुल बनाने के लिए मज़बूत आधार स्तंभ बनाए जा रहे हैं।

उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। यदि यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेषता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं, एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन‘ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिस सुरंग से होकर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों एवं नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा जाएगा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। बांधों के निर्माण हिमालय के लिए पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भू-स्खलन और केदारनाथ जैसी प्रलय की आपदा का कारण बन चुके हैं।

उत्तराखंड भूकंप के सबसे खतरनाक ज़ोन-5 में आता है। कम तीव्रता के भूकंप यहां निरंतर आते रहते हैं। मानसून में हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी ज़िलों में भू-स्खलन, बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। पहाड़ों के दरकने के साथ छोटे-छोटे भूकंप भी देखने में आ रहे हैं। उत्तराखंड और हिमाचल में बीते सात सालों में 130 से ज़्यादा छोटे भूकंप आए हैं। हिमाचल और उत्तराखंड में जल विद्युत और रेल परियोजनाओं ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है। टिहरी पर बने बांध को रोकने के लिए तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक भी हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई तो गंगा तो अस्तित्व खोएगी ही, हिमालय की अन्य नदियां भी अस्तित्व के संकट से जुझेंगी। अतएव जोशीमठ का जो भयावह मानचित्र आज दिखाई दे रहा है, वह और-और विस्तृत होता चला जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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