एक हालिया अध्ययन के अनुसार वर्ष 2020 से 2050 के बीच कैंसर पर 25 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने की संभावना है। यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद पर 0.55 प्रतिशत के वार्षिक कर के बराबर है। इस विश्लेषण में 29 प्रकार के कैंसर से बीमार होने या मरने वाले लोगों द्वारा उपचार की लागत और आर्थिक उत्पादकता की हानि का अनुमान लगाया गया है। सबसे महंगे कैंसर में फेफड़े, आंत, स्तन और लीवर शामिल हैं जिनका वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रकोप होता है। जामा ऑन्कोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कैंसर की जांच, निदान और उपचार पर खर्च में वृद्धि से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पर्याप्त स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ मिलता है। 75 प्रतिशत कैंसर के मामले इन देशों में रिकॉर्ड किए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में शोधकर्ताओं ने एक वैकल्पिक ईंधन मिश्रण का रिएक्टर में संलयन किया है। इस तकनीक से संलयन आधारित बिजली संयंत्रों को, पारंपरिक ईंधन इस्तेमाल करने वाले संलयन संयंत्रों की तुलना में अधिक सुरक्षित और संचालन में आसान बनाया सकता है।
गौरतलब है कि अधिकांश प्रायोगिक संलयन रिएक्टर हाइड्रोजन के समस्थानिकों (ड्यूटेरियम और ट्रिटियम) का उपयोग करते हैं। लेकिन ट्रिटियम दुर्लभ है, और इस ईंधन सम्मिश्र का उपयोग करने से उच्च-ऊर्जायुक्त न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं जो मनुष्यों के लिए खतरनाक हैं और रिएक्टर की दीवारों और अवयवों को नुकसान पहुंचाते हैं।
इसकी बजाय प्रोटॉन और बोरॉन से बना वैकल्पिक ईंधन मिश्रण कोई न्यूट्रॉन उत्पन्न नहीं करता है और केवल हानिरहित हीलियम पैदा करता है। लेकिन इसको जलने के लिए 3 अरब डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है जो सूर्य के केंद्रीय भाग के ताप से 200 गुना अधिक है।
नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में जापान में एक पारंपरिक संलयन रिएक्टर में अपेक्षाकृत कम तापमान पर संलयन की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है। इस प्रक्रिया में कणों के एक शक्तिशाली पुंज की मदद से प्रोटॉन्स को गति देकर अभिक्रिया शुरू करवाई गई। वैसे अभी यह व्यावहारिक होने से कोसों दूर है। (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में 60 से अधिक प्रमुख जलवायु वैज्ञानिकों ने सौर भू-इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। आम तौर पर पृथ्वी को अधिक परावर्तक बनाकर कृत्रिम रूप से ठंडा करने के प्रस्ताव को लेकर काफी अगर-मगर रहे हैं। कई जलवायु कार्यकर्ता और वैज्ञानिक जियोइंजीनियरिंग का अध्ययन करने का विरोध इसलिए भी करते हैं कि यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती की आवश्यकता से ध्यान भटकाता है। लेकिन जलवायु वैज्ञानिकों के खुले पत्र में कहा गया है कि आने वाले दशकों में जियोइंजीनियरिंग योजनाओं को लागू करने के फैसले लिए जाने की संभावना है। लिहाज़ा, योजनाओं की प्रभावशीलता और जोखिमों को समझने के लिए सिमुलेशन और फील्ड प्रयोगों की ज़रूरत स्पष्ट है। इस पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं में सेवानिवृत्त नासा वैज्ञानिक और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों की चेतावनी देने वाले जेम्स हैनसेन और हारवर्ड विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक डेविड कीथ भी हैं, जिन्होंने वर्षों से छोटे पैमाने पर जियोइंजीनियरिंग प्रयोग करने की अनुमति प्राप्त करने के प्रयास किए हैं। (स्रोत फीचर्स)
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मानव भ्रूण के जीन संपादन मामले में चीनी जैव-भौतिकविद ही जियानकुई को वर्ष 2019 में अनैतिक चिकित्सा पद्धति के जुर्म में तीन वर्ष कैद की सज़ा सुनाई गई थी। सज़ा समाप्ति के बाद उन्हें गत माह हांगकांग का वीज़ा दिया गया जिसे केवल 10 दिन बाद रद्द कर दिया गया। जियानकुई को 2-वर्षीय टॉप टैलेंट वीज़ा दिया गया था जिसका उद्देश्य “समृद्ध कार्य अनुभव और अच्छी शैक्षणिक योग्यता वाले” लोगों को आकर्षित करना है। लेकिन हांगकांग के अधिकारियों ने पुनर्विचार करके वीज़ा रद्द कर दिया। अधिकारियों को जियानकुई के आवेदन पत्र में गलत तथ्य देने की आशंका है। अब आवेदन के फॉर्म में संशोधन करके आपराधिक मामले उजागर करने की शर्त जोड़ी जा सकती है।
अप्रैल 2022 में जेल से रिहा होने के बाद, जियानकुई ने बीजिंग में एक प्रयोगशाला स्थापित की थी और दुर्लभ बीमारियों के लिए जीन थेरपी पर शोध अध्ययन करने का विचार किया था। इसके लिए उन्होंने कई लोगों से शोध में वित्तीय सहायता की भी मांग की है। उन्होंने अभी तक यह खुलासा नहीं किया है कि क्या उन्हें कोई समर्थक मिला है। (स्रोत फीचर्स)
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अमेरिका स्थित बंदरों की आयातक और बंदर अनुसंधान आपूर्तिकर्ता संस्था चार्ल्स रिवर लेबोरेटरीज़ ने हाल ही में कंबोडिया से बंदरों के आयात पर रोक लगा दी है। यह निर्णय यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस द्वारा जारी किए गए समन के बाद लिया गया है जिसमें कंबोडिया के एक तस्कर गिरोह को दोषी ठहराया गया है। एजेंसी का दावा है कि कंबोडिया के जंगलों से बड़ी संख्या में साइनोमोगलस मैकाक (प्रयोग में प्रयुक्त जंतु) को अवैध रूप से पकड़कर निर्यात किया जा रहा था जबकि कहा जा रहा था कि ये बंदी अवस्था में प्रजनन से पैदा हुए हैं। चार्ल्स रिवर संस्था के अनुसार यह समन कंबोडियाई आपूर्तिकर्ता से प्राप्त कई शिपमेंट से सम्बंधित है। गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया भर में जानवरों का सबसे बड़ा आयातक है; ज़्यादातर औषधि और जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा अनुसंधान के लिए इनको अमेरिका लाया जाता है। अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार, साइनोमोगलस मैकाक, जो एक लुप्तप्राय जीव है, वर्ष 2022 में देश में आयात किए गए लगभग 33,000 प्रायमेट्स का 96 प्रतिशत है। तथ्य यह है कि अमेरिका में लगभग दो-तिहाई साइनोमोगलस जंतु कंबोडिया से ही आयात किए जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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कौन सा थलीय जंगली स्तनधारी जंतु पृथ्वी पर सबसे ‘वज़नी’ योगदान देता है? डील-डौल के चलते हाथी का नाम दिमाग में आता है। पृथ्वी पर स्तनधारियों के कुल द्रव्यमान का हालिया वैश्विक अनुमान कहता है कि ये हाथी तो नहीं हैं। अत्यधिक संख्या के बावजूद जंगली चूहे भी इसमें अव्वल नहीं हैं। अनुमान के अनुसार सबसे अधिक योगदान उत्तर और दक्षिण अमेरिका के घास के मैदानों और जंगलों का वासी सफेद पूंछ वाला हिरण देता है। थलीय जंगली स्तनधारियों के कुल बायोमास में इसका योगदान लगभग 10 प्रतिशत है।
प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि पृथ्वी पर वर्तमान में जीवित थलीय जंगली स्तनधारियों का कुल बायोमास 2.2 करोड़ टन है, और समुद्री स्तनधारियों का कुल बायोमास 4 करोड़ टन है।
वैसे, इनका भार अपेक्षाकृत कम ही है। एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर सिर्फ चींटियों का बायोमास योगदान 8 करोड़ टन है। और मनुष्यों से इन आंकड़ों की तुलना करें तब तो यह और भी कम लगता है। मनुष्यों का योगदान 39 करोड़ टन का है, और पालतू जानवरों और मनुष्य के आसपास रहने वाले जंतु 63 करोड़ टन का अतिरिक्त योगदान करते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये नतीजे एक अलार्म की तरह हैं, प्राकृतिक विश्व सिकुड़ रहा है। हमें जंगली स्तनधारियों के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास करने की ज़रूरत है।
2018 में, वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जीव विज्ञानी और इस अध्ययन के प्रमुख रॉन मिलो ने पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीवन के वज़न का अनुमान लगाया था। फिर उन्होंने जंगली स्तनधारियों के वज़न का अनुमान लगाया था जो कि महज़ 5 करोड़ टन निकला। तब से, शोधकर्ता जंगली स्तनधारियों के वज़न के अनुमान को सटीक करने में लगे हैं।
अनुमान को सटीक बनाने के लिए मिलो और उनके दल ने 392 जंगली स्तनधारी प्रजातियों की वैश्विक संख्या, उनके शरीर के वज़न, फैलाव और अन्य मापकों का विस्तृत डैटा निकाला। यह डैटा उनके कुल बायोमास की गणना करने के लिए पर्याप्त था। कम अध्ययन किए गए जंगली स्तनधारी जीवों के कुल बायोमास का अनुमान लगाने के लिए 392 प्रजातियों में से आधी प्रजातियों के ज्ञात डैटा से मशीन लर्निंग सिस्टम को प्रशिक्षित किया ताकि वह सटीक अनुमान लगा सके। इसकी मदद से उन्होंने मॉडल में 4400 अन्य स्तनधारी प्रजातियों के बायोमास की गणना की।
उन्होंने पाया कि भूमि पर अधिकांश बायोमास सूअर, हाथी, कंगारू और हिरण जैसे विशाल जंगली स्तनधारी प्रजातियों का है। थलीय जंगली स्तनधारी प्रजातियों के कुल बायोमास में शीर्ष 10 प्रजातियों का योगदान लगभग 9 करोड़ टन (कुल बायोमास का 40 प्रतिशत) है। मानव-सम्बंधित चूहे-छछूंदर हटा कर बाकी सभी कृन्तक इस बायोमास में 16 प्रतिशत का योगदान देते हैं, और मांसाहारी जंतु 3 प्रतिशत का।
समुद्री स्तनधारियों में, लगभग आधा योगदान बेलीन व्हेल का है। संख्या के हिसाब से जंगली स्तनधारियों में चमगादड़ बाज़ी मार लेते हैं: पृथ्वी पर दो-तिहाई जंगली स्तनधारी यही हैं, लेकिन कुल बायोमास में ये सिर्फ 7 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
पालतू स्तनधारियों में गायों का वज़न 42 करोड़ टन है और कुत्तों का वज़न समस्त थलीय जंगली स्तनधारियों के वज़न के बराबर है। घरेलू बिल्लियों का बायोमास अफ्रीकी हाथियों से दुगुना और मूस के वज़न से चार गुना अधिक है।
इन आंकड़ों से बनती तस्वीर देखें तो पूरी पृथ्वी पर मनुष्य और उनके पालतू जानवर छाए दिखते हैं। छोटे हों या बड़े हर तरह के जंगली जानवर सीमित रह गए हैं। कहना न होगा कि इसमें मानव और उसकी गतिविधियों का योगदान है। इसलिए हमें ही इनके संरक्षण के बारे में संजीदा प्रयास करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)
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हाल के दशक में कीटनाशकों के उपयोग, कीटों के आवास स्थलों के विनाश जैसी मानव गतिविधियों के कारण कीटों की संख्या में काफी गिरावट हुई है। लेकिन एक अध्ययन में पाया गया है कि कुछ मधुमक्खियों और तितलियों की संख्या में कमी उन जगहों पर भी हुई है, जो सीधे तौर पर इन्सानों से अछूती हैं।
देखा गया है कि पिछले 15 सालों में, दक्षिण-पूर्वी यूएस के एक जंगल में मधुमक्खियों की आबादी में 62.5 प्रतिशत की और तितलियों की आबादी में 57.6 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अलावा, मधुमक्खियों की प्रजातियों की संख्या (विविधता) में भी 39 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है।
करंट बायोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ओकोनी राष्ट्रीय वन के तीन जंगलों में वर्ष 2007 से 2022 के बीच पांच बार कीटों का सर्वेक्षण किया था। इन जंगलों में मनुष्यों की आवाजाही अपेक्षाकृत कम थी और यहां चीनी प्रिवेट जैसे घुसपैठिए पौधे भी नहीं थे।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन यहां मधुमक्खियों और तितलियों के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन और गर्माती धरती के पीछे भी मनुष्य का ही हाथ है। इसके अलावा, एक संदेह घुसपैठिए कीटों पर भी है, खासकर स्माल कारपेंटर मधुमक्खियों और पत्तियां कुतरने वाली मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट के लिए ये कीट ज़िम्मेदार हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यही प्रजातियां सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं। इसका संभावित कारण हो सकता है कि या तो लकड़ी पर छत्ता बनाने वाली और पत्ती कुतरने वाली घुसपैठी मधुमक्खियों ने इन मधुमक्खियों को उनकी जगह से खदेड़ दिया होगा, या उनके छत्ते उन्हें बढ़ते तापमान से बचा नहीं पाए होंगे। बहरहाल, कारण जो भी हो, स्थिति चिंताजनक है। (स्रोत फीचर्स)
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पृथ्वी पर अतीत में अंतरिक्ष पिंडों की टक्कर और तबाही से वैज्ञानिकों को हमेशा ये चिंता रही थी कि कहीं कोई क्षुदग्रह फिर आकर न टकरा जाए। भविष्य में ऐसी कोई घटना न हो इसलिए उनकी योजना है कि पृथ्वी की ओर आते हुए पिंड को टक्कर मारकर उसकी दिशा बदल दी जाए। बीते सितंबर ऐसे ही एक परीक्षण में नासा के डबल एस्टेरॉयड रीडायरेक्शन टेस्ट (DART) अंतरिक्ष यान द्वारा एक क्षुदग्रह को टक्कर मारकर उसका मार्ग बदल दिया गया था। अब, वैज्ञानिकों ने इस टक्कर और उसके प्रभाव का विश्लेषण करके देखा है कि वास्तव में यह टक्कर कितनी सफल रही।
परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने डायमॉर्फोस नामक जिस क्षुद्रग्रह को चुना था वह स्वयं डायडिमॉस नामक एक बड़े क्षुदग्रह की परिक्रमा करता है। गौरतलब है कि यह क्षुदग्रह पृथ्वी के लिए न तो खतरा था, और न होगा।
पाया गया कि इस टक्कर से डायमॉर्फोस का परिक्रमा पथ छोटा हो गया है, और यह पहले की तुलना में 33 मिनट कम समय में परिक्रमा पूरी कर लेता है। इससे लगता है कि भविष्य में कोई क्षुद्रग्रह पृथ्वी की ओर आते हुए दिखा, तो वैज्ञानिक इसका रास्ता बदलने में सक्षम होंगे।
वैसे तो DART की सफलता की खबर पहले भी आ चुकी है; लेकिन अब, नेचर पत्रिका में प्रकाशित पांच अध्ययन इस घटना के आखिरी पलों का विस्तार से वर्णन करते हैं और बताते हैं कि इसने क्षुद्रग्रह को कैसे प्रभावित किया। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि यह परीक्षण इतना सफल क्यों रहा।
इनमें से एक अध्ययन में टक्कर से ठीक पहले अंतरिक्ष यान के रास्ते का डैटा और क्षुद्रग्रह की सतह की तस्वीरों का विश्लेषण किया गया है। टक्कर के पहले DART द्वारा ली गई छवियों में डायमॉर्फोस खुरदुरी चट्टानी खोल में लिपटे अंडे की तरह दिख रहा था। और भुरभुरा सा लग रहा था – टक्कर पर टूट जाए ऐसा।
6 किलोमीटर प्रति सेकंड से अधिक की रफ्तार से डायमॉर्फोस की ओर बढ़ते हुए DART यान का सौर पैनल वाला हिस्सा सबसे पहले टकराया – क्षुद्र ग्रह की एक 6.5-मीटर-चौड़ी चट्टान से। इसके चंद माइक्रोसेकंड बाद DART यान का मुख्य भाग टकराया। इस टक्कर में DART भी टुकड़े-टुकड़े हो गया।
इस टक्कर से 4.3 अरब किलोग्राम वज़नी डायमॉर्फोस से कम से कम दस लाख किलोग्राम हिस्सा टूटकर अलग हो गया था। इससे निकला मलबा क्षुदग्रह की पूंछ बनाता हुआ हज़ारों किलोमीटर दूर तक फैला था। कई दूरबीनों द्वारा मलबे की इस पूंछ गति और विकास पर नज़र रखी गई; हबल टेलीस्कॉप से तो इसकी एक अन्य पूंछ भी दिखी जो 18 दिन बाद गायब हुई।
इसके सफल होने के पीछे एक कारक यह है कि DART यान क्षुद्रग्रह के केंद्र से लगभग 25 मीटर दूरी पर टकराया था, जिससे अधिकतम प्रभाव पड़ा। दूसरा यह है कि टक्कर से निकला अधिकतर मलबा क्षुद्रग्रह से बाहर की ओर उड़ा। जिसकी प्रतिक्रिया के चलते क्षुद्रग्रह अपने परिक्रमा पथ से काफी भटक गया। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस मलबे के धक्के से डायमॉर्फोस को DART यान की टक्कर से मिले संवेग की तुलना में 4 गुना अधिक संवेग मिला।
उम्मीद है कि भविष्य में यदि खतरा मंडराता है तो इस तकनीक को उन पर लागू किया जा सकेगा।
इसके अलावा, टक्कर से पहले, उसके दौरान और बाद में किए गए दूरबीन निरीक्षण में देखा गया कि अंतरिक्ष यान के टकराने के तुरंत बाद पिंड काफी लाल हो गया था। इसके बाद इसका रंग नीला हो गया था। यह संभवत: इसलिए हुआ होगा कि डायमॉर्फोस का काफी सारा पदार्थ बाहर फेंका गया होगा जिसके चलते उसकी अंदरूनी सतह उजागर हो गई होगी।
बहरहाल, डायमॉर्फोस और डायडिमॉस दोनों की भौतिकी, रसायन विज्ञान और भूविज्ञान के बारे में अधिक जानने के लिए शोधकर्ता DART यान के डैटा के विश्लेषण का काम जारी रखे हैं। इसमें कई शौकिया खगोलशास्त्रियों की मदद ली जा रही है। 2026 में युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का हेरा यान डायमॉर्फोस पर पहुंचेगा। तब और भी बारीक प्रभाव देखने को मिलेंगे। इस बीच कई अन्य अध्ययनों के नतीजों का इन्तज़ार है। (स्रोत फीचर्स)
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हर किसी की तमन्ना होती है कि लंबा जीए लेकिन शरीर जवां और तंदुरुस्त बना रहे। अब यह तमन्ना सेनोलिटिक्स औषधियों से पूरी होने का दावा किया जा रहा है।
जीर्णता (या सेनेसेंस) उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। जीर्ण पड़ चुकी कोशिकाएं हमारे शरीर में घूमती रहती हैं और ऐसे पदार्थ स्रावित करती हैं जो स्वस्थ कोशिकाओं को भी जीर्ण कर सकते हैं; कुछ उसी तरह जैसे एक सड़ा हुआ फल बाकी फलों को भी सड़ाना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में अवरोध पैदा करने वाले पदार्थों को कहते हैं सेनोलिटिक्स – वृद्धावस्था-रोधी।
सेनोलिटिक्स में (कृत्रिम या प्राकृतिक) सेनोलिटिक एंजेट की मदद से जीर्ण कोशिकाओं को हटाया जा सकता है, और इस तरह स्वस्थ कोशिकाओं पर जीर्ण कोशिकाओं के प्रभावों को रोककर वृद्धावस्था को टाला जा सकता है।
वर्तमान में शोधकर्ताओं ने सेनोलिटिक्स की मदद से वृद्ध हो रहे अलग-अलग अंगों की बहाली या तंदुरुस्ती लौटाने में सफलता पा ली है। जैसे मेयो क्लिनिक में एक ही परिस्थिति में एक ही उम्र के दो कृन्तकों पर अध्ययन किया गया था। देखा गया कि जो कृन्तक स्वाभाविक रूप से वृद्ध हो रहा था वह दुबला और बूढ़ा दिख रहा था, जबकि सेनोलिटिक उपचार वाला दूसरा कृन्तक स्फूर्तिभरा था।
अन्य शोधों में पाया गया है कि सेनोलिटिक्स के साथ उपचार से रक्त में इतना बदलाव हो जाता है कि ऐसे चूहों का रक्त प्राप्त करने वाले करीब दो साल के चूहे आठ महीने के चूहे लगने लगते हैं। इसके अलावा, दृष्टि बहाल करने से लेकर मेरुदंड में डिस्क ठीक से बिठाने तक के प्रयास सेनोलिटिक्स की मदद से किए जा रहे हैं।
यहां तक कि हृदय के मामले में सेनोलिटिक्स कारगर लगते हैं। पूरे शरीर में कुशलतापूर्वक रक्त पहुंचाने के लिए हृदय की रक्त पम्प करने वाले ऊतकों को सटीक लयबद्धता से काम करना पड़ता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और इनकी कोशिकाएं बूढ़ी होती जाती हैं, यह लय गड़बड़ा सकती है। नतीजतन शरीर बीमारियों का घर बन सकता है। एक अध्ययन में देखा गया है कि अन्य उपयोगों के लिए स्वीकृत दो औषधियां हृदय को फिर तंदुरुस्त बना देती हैं। दोनों औषधियों का मिश्रण पुरानी पड़ चुकी कोशिकाओं को हटा देता है, जिससे उनकी पड़ोसी कोशिकाएं सामान्य तरह से कार्य करने लगती हैं।
लेकिन समग्र बुढ़ापे को पलटना यानी उम्र बढ़ाने का मामला थोड़ा पेचीदा है। बुढ़ापे का अंतिम पड़ाव है मृत्यु। किसी भी उपचार का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं को ऐसे पड़ाव या बिंदु की ज़रूरत होती है जिन पर वे उपचार की सफलता या विफलता तय कर सकें। लेकिन शोधकर्ता किसी व्यक्ति की मृत्यु का समय नहीं माप सकते, क्योंकि यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उपचार से कोई कितना जीया और बिना उपचार के कितना जीता। बड़ी आबादी पर अध्ययन करके ही जाना जा सकेगा कि क्या अपनाए गए उपचार ने वास्तव में मृत्यु को टाला। कुछ संभव सेनोलिटिक उपचारों को 2026 के आसपास एफडीए से मंज़ूरी मिलने की संभावना है। (स्रोत फीचर्स)
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कहावत है कि भूखे पेट भजन न होए गोपाला! लेकिन हालिया अध्ययन में देखा गया है कि चूहों को ‘उल्लू’ बनाया जा सकता है कि वे हल्की-फुल्की भूख होने पर भी भोजन की बजाय विपरीत लिंग के साथ मेलजोल को प्राथमिकता देने लगें।
यह तो मालूम था कि लेप्टिन नामक हार्मोन मस्तिष्क में तंत्रिकाओं के एक समूह को सक्रिय कर भूख के एहसास को दबाता है। कोलोन विश्वविद्यालय की न्यूरोसाइंटिस्ट ऐनी पेटज़ोल्ड और उनके साथी यह देखना चाह रहे थे कि भोजन या साथी के बीच चुनाव करने में लेप्टिन की क्या भूमिका है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने कुछ नर चूहों को लेप्टिन दिया और उनका अवलोकन किया। अध्ययन के दौरान, पूरे दिन के भूखे चूहे भी खाने से भरे कटोरे की ओर नहीं गए (जैसी कि अपेक्षा थी) लेकिन साथ ही वे चुहियाओं के साथ मेलजोल बढ़ाते भी दिखे।
सेल मेटाबॉलिज़्म में प्रकाशित ये नतीजे सामाजिक व्यवहार में लेप्टिन की एक नई व आश्चर्यजनक भूमिका दर्शाते हैं और वैज्ञानिकों को तंत्रिका विज्ञान के एक अहम सवाल के जवाब की ओर एक कदम आगे बढ़ाते हैं – कि कैसे जीव अपनी मौजूदा ज़रूरतों के सामने विभिन्न व्यवहारों को प्राथमिकता देते हैं।
शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के तथाकथित भूख केंद्र (पार्श्व हाइपोथैलेमस) की तंत्रिकाओं की जांच की। टीम ने देखा कि लेप्टिन के प्रति संवेदी तंत्रिकाएं तब सक्रिय हुईं जब चूहे विपरीत लिंग के चूहों से मिले। ऑप्टोजेनेटिक्स नामक तकनीक की मदद से इन तंत्रिकाओं को सक्रिय करने से भी इस बात की संभावना बढ़ गई कि चूहे विपरीत लिंग के चूहों के पास जाएंगे। ये दोनों परिणाम बताते हैं कि लेप्टिन नामक हार्मोन सामाजिक व्यवहार को बढ़ावा देने में भी भूमिका निभाता है।
लेकिन जब चूहों को पांच दिन तक सीमित भोजन दिया गया तब उन्होंने साथी की बजाय भोजन को प्राथमिकता दी। अर्थात लंबी भूख ने अन्य प्रणालियों को सक्रिय कर दिया और भोजन को वरीयता मिलने लगी। लेप्टिन आम तौर पर तब पैदा होता है जब जंतु की ऊर्जा ज़रूरतों की पूर्ति हो गई हो। तब वह अपनी अन्य ज़रूरतों पर ध्यान दे सकता है, अपने व्यवहार की प्राथमिकताएं बदल सकता है।
शोधकर्ताओं ने उन तंत्रिकाओं का भी अध्ययन किया जो न्यूरोटेंसिन नामक हार्मोन बनाती हैं – यह हार्मोन प्यास से सम्बंधित है। देखा गया कि इन तंत्रिकाओं की सक्रियता ने भोजन या सामाजिक व्यवहार की बजाय प्यास बुझाने को तवज्जो दी।
चूहों में लेप्टिन और सामाजिक व्यवहारों के बीच सम्बंध समझकर इस बारे में समझा जा सकता है कि क्यों ऑटिज़्म से ग्रस्त कुछ लोग खाने की विचित्र प्रकृति दर्शाते हैं, या बुलीमिया से ग्रस्त कुछ लोगों में सामाजिक भय (सोशल फोबिया) दिखता है। (स्रोत फीचर्स)
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