महामारियों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय संधि

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में एक संधि का मसौदा जारी किया है। इस संधि में ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि भविष्य में कोई महामारी सामने आए तो टीके, दवाइयां, निदान के परीक्षण वगैरह का पूरी दुनिया में समतामूलक वितरण संभव हो सके। उम्मीद की जा रही है कि अनुमोदन के बाद यह संधि कानूनी रूप से बंधनकारी होगी।

मसौदा देखने के बाद कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि मसौदा अत्यंत महत्वाकांक्षी है और यह कोविड-19 महामारी के दौरान देखे गए असंतुलन को संबोधित करता है। लेकिन विशेषज्ञों को चिंता इस बात की है कि जो देश इसका पालन नहीं करेंगे उन्हें कैसे बाध्य किया जाएगा और दंडित करने की व्यवस्था क्या होगी।

इतना तो सभी मानते हैं कि पिछली महामारी में कई तरह के असंतुलन देखे गए थे। उदाहरण के लिए, उच्च आमदनी वाले देशों में 73 प्रतिशत लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिली थी लेकिन निम्न आमदनी वाले देशों में मात्र 31 प्रतिशत लोगों को ही एक खुराक मिल पाई थी।

बहरहाल, अब इस मसौदे पर चर्चा शुरू होगी और जैसा कि होता आया है चर्चा के दौरान काफी वाद-विवाद चलेंगे, संशोधन होंगे। कोशिश यह है कि इस संधि को 2024 में पारित करके लागू कर दिया जाए।

मसौदे का प्रमुख सरोकार समता से है। संधि के अनुच्छेदों में व्यवस्था है कि औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले घटकों की आपूर्ति और वितरण के लिए एक वैश्विक नेटवर्क स्थापित किया जाए। साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि टीकों व औषधियों के विकास व अनुसंधान को सुदृढ़ किया जाए और जानकारी को पूरी दुनिया के साथ खुले रूप से साझा किया जाए।

मसौदे में सभी पक्षों से आव्हान है कि वे महामारी के दौरान बौद्धिक संपदा को कुछ समय के लिए मुक्त रखें ताकि टीकों, चिकित्सा उपकरणों, मास्कों, निदान परीक्षणों और दवाइयों का त्वरित उत्पादन हो सके। यदि अगली महामारी से पहले इन शर्तों पर स्वीकृति हो जाती है तो हम कोविड-19 महामारी के दौरान देखी गई कई दिक्कतों से बच सकेंगे। 2020 में दक्षिण अफ्रीका और भारत ने सुझाव दिया था कुछ समय के लिए टीकों, दवाइयों और नैदानिक परीक्षणों से सम्बंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों को मुल्तवी रखा जाए, लेकिन इस प्रस्ताव को विश्व व्यापार संगठन ने निरस्त कर दिया था हालांकि 60 देशों ने इसका समर्थन किया था।

संधि में रोगजनकों और जीनोम्स सम्बंधी जानकारी साझा करने पर भी काफी ज़ोर दिया गया है। इस संदर्भ में कम आमदनी वाले देश चाहते हैं कि इस तरह की जीव वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर विकसित उत्पाद उन्हें किफायती दामों पर मिलें। संधि में प्रस्ताव है कि सारे हस्ताक्षरकर्ता पक्ष अपने पास उपलब्ध रोगजनक विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रयोगशाला को उनकी खोज के चंद घंटों के अंदर उपलब्ध कराएंगे। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि जीनोम सम्बंधी जानकारी को सार्वजनिक स्थल पर अपलोड कर दिया जाएगा। दूसरी ओर, देश उनके द्वारा उत्पादित 20 प्रतिशत टीके, नैदानिक परीक्षण और दवाइयां विश्व स्वास्थ्य संगठन को मुहैया करवाएंगे – आधे दान के रूप में और आधे किफायती दामों पर।

संधि के मसौदे की एक शर्त यह है कि सारे पक्षों को अपने सालाना स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा महामारी की रोकथाम व निपटान के लिए आवंटित करना होगा। इसके अलावा एक निश्चित राशि विकासशील देशों को महामारी की तैयारी में मदद देने के लिए भी रखना होगी।

अलबत्ता, विशेषज्ञों को लगता है कि यदि देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं, तो इसे लागू करवाने की व्यवस्था इस मसौदे में काफी कमज़ोर है। जैसे कानूनी रूप से बंधनकारी संधि में ‘करेंगे’ की बजाय ‘प्रोत्साहित’ किया जाएगा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। यानी पूरा मामला अभी भी स्वैच्छिक अनुपालन पर टिका है। उम्मीद है कि वार्ताओं में मसले को सुलझा लिया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इमोजी कैसे बनती और मंज़ूर होती है

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इमोजी का बहुत इस्तेमाल होता है। और तो और, इमोजी का इस्तेमाल विज्ञान संवाद में भी खूब होने लगा है। हर साल 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस पर नए इमोजी लॉन्च होते हैं। 2018 में, डीएनए, सूक्ष्मजीव, प्रयोगशाला कोट और पेट्री डिश सहित कई विज्ञान इमोजी फोन कीबोर्ड में शामिल हुई थीं। फिर 2019 में स्टेथोस्कोप, खून की बूंद और प्लास्टर की इमोजी शामिल हुई थी। 2020 में हृदय, और 2021 में एक्स-रे स्कैन की इमोजी शामिल हुई थी।

जुलाई 2022 में, रोचेस्टर विश्वविद्यालय के एंड्र्यू व्हाइट ने प्रोटीन इमोजी शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। उनका यह प्रस्ताव तो मंज़ूर नहीं हुआ लेकिन उनके प्रयास से इमोजी के बारे में कुछ रोचक बातें ज़रूर निकलीं।

इमोजी की शुरुआत कब हुई?

पहली बार इमोजी 1990 के दशक के अंत में जापानी मोबाइल फोन पर दिखाई दी थी। 2022 में बांसुरी, जेलीफिश, गधा जैसी 31 नई इमोजी लॉन्च होने के साथ वर्तमान में स्वीकृत इमोजी की संख्या 3600 से अधिक हो गई है। 2015 में, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ‘फेस विद टीयर्स ऑफ जॉय’ इमोजी को पहली बार एक शब्द के तौर पर शामिल किया था।

इमोजी में रुचि कैसे बनी?

लगभग डेढ़ साल पहले, लोगों को ट्विटर पर इमोजी के साथ अंकगणित करते देखना दिलचस्प लगा था। जैसे, लघुगणक (लॉग) के गुण दर्शाने के लिए इमोजी का इस तरह इस्तेमाल:

log (😅) = 💧log (😄)

लोग सोशल मीडिया पर इमोजी का नए-नए तरह से उपयोग कर रहे थे। फिर एक पेपर आया, जिसमें बताया गया था कि इमोजी को वेक्टर के रूप में कैसे दर्शाएं।

इसके बाद कुछ मज़ेदार समीकरण बनाए गए। जैसे यदि ‘राजा’ की इमोजी से ‘पुरुष’ इमोजी घटा दें और इसमें ‘महिला’ इमोजी को जोड़ दें तो ‘रानी’ इमोजी बनेगी। इमोजी की मदद से तत्वों की एक आवर्त सारणी भी बनाई गई, और फिर एक प्रोग्राम भी लिखा गया जो इमोजी के साथ आणविक संरचनाएं बनाता है।

प्रोटीन की इमोजी क्यों?

हुआ यूं कि करीब एक साल पहले एंड्र्यू व्हाइट की एक सहयोगी क्रिस्टीन लिंडोर्फ-लार्सन ने इस ओर उनका ध्यान दिलाया कि इंटरनेट के प्रमुख सर्च इंजनों पर ‘प्रोटीन’ खोजने पर या तो मांस की या पोषक तत्वों की तस्वीर या चित्र ही मिलते हैं। लेकिन प्रोटीन मात्र इतना तो नहीं है।

डीएनए की पहचान जीवन को कूटबद्ध करने वाली भाषा के रूप में है, लेकिन प्रोटीन जीवन के वास्तविक कार्यकारी हैं। इसलिए लगा कि एक प्रोटीन इमोजी होना विज्ञान संचार के लिए उपयोगी साबित होगा, ठीक डीएनए इमोजी की तरह।

टीम कैसे बनी?

जब एंड्र्यू व्हाइट इमोजी के बारे में पढ़ रहे थे, तब पता चला कि कोई भी एक नई इमोजी के लिए प्रस्ताव भेज सकता है। फिर व्हाइट और क्रिस्टीन ने रोचेस्टर विश्वविद्यालय के ग्राफिक डिज़ाइनर माइकल ओसाडिव को अपनी टीम में शामिल किया, और उन्होंने प्रोटीन इमोजी ग्राफिक डिज़ाइन किया था।

मार्च 2022 में ट्विटर पर एक सर्वेक्षण करके पता किया गया कि प्रोटीन की इमोजी कैसी दिखना चाहिए। सर्वेक्षण में 800 से अधिक लोगों ने प्रतिक्रिया दी; इनमें से 70 प्रतिशत लोगों के सुझावों के आधार पर डिज़ाइन तैयार की गई। अंतत: जुलाई 2022 में प्रस्ताव इमोजी समिति को भेज दिया गया।

प्रक्रिया क्या है?

यूनिकोड कंसॉर्शियम की एक इमोजी उपसमिति है जिसमें ऐप्पल, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसी प्रतिनिधि कंपनियां और इमोजीपीडिया शामिल हैं। ये मिलकर तय करते हैं कि कौन से इमोजी प्रस्ताव उपयुक्त हैं। हालांकि, यह बहुत स्पष्ट नहीं है कि प्रस्ताव चुनने के उनके मानदंड क्या हैं।

लेकिन इमोजी के लिए प्रस्ताव भेजने का कोई शुल्क नहीं है। और आम तौर पर पांच से दस पेज लंबा प्रस्ताव भेजना होता है जिसमें यह बताना होता है कि इस इमोजी की ज़रूरत क्यों है, इसके लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द कितना उपयोग होता है, और यह भी बताना होता है कि इसका डिज़ाइन कैसा हो। समिति द्वारा समीक्षा करने में लगभग चार महीने लग जाते हैं।

जब इमोजी का प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो ऐप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां डिज़ाइनर से इमोजी बनवाती हैं, जिन्हें विश्व इमोजी दिवस पर रिलीज़ किया जाता है। यदि किसी इमोजी का प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाता है, तो दोबारा प्रस्ताव भेजने के लिए दो साल का इंतज़ार करना पड़ता है। वैसे, दोबारा प्रस्ताव भेजने पर इसके स्वीकृत होने की संभावना कम ही होती है।

मज़ेदार बात यह है कि प्रोटीन इमोजी का प्रस्ताव स्वीकृत न होने पर व्हाइट की टीम निराश थी, लेकिन उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान बहुत कुछ सीखने को मिला – इमोजी का इतिहास और कई मज़ेदार तथ्य। जैसे एक बात यह पता चली कि इमोजी की शुरुआत जापान से हुई, यही कारण है कि जापानी कांजी लिपि के कई अक्षर इमोजी में दिखते हैं, हालांकि अब नियम है कि इमोजी में शब्द या अक्षर नहीं होंगे।

आप भी चाहें तो इमोजी के लिए प्रस्ताव भेज सकते हैं। युनिकोड वेबसाइट पर नई इमोजी के लिए प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए गए हैं। गैर-लाभकारी संगठन इमोजीनेशन पर मुफ्त प्रस्ताव टेम्पलेट्स भी उपलब्ध हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भौंरे भी नवाचारी होते हैं

भौंरों के मस्तिष्क भले ही छोटे होते हैं लेकिन आविष्कार करने के मामले में वे किसी से कम नहीं। हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि ये नन्हें कीट जटिल समस्याओं को हल करने के नए-नए तरीके निकाल सकते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि यह क्षमता भौंरों को मानव जनित पर्यावरण परिवर्तनों से निपटने में उपयोगी साबित हो सकती है।

पूर्व अध्ययनों से भौंरों में जटिल दिशाज्ञान कौशल, अल्पविकसित संस्कृति और भावनाओं के संकेत मिल चुके हैं। वे तरह-तरह के औज़ारों का उपयोग करते हैं और दूसरे भौंरों को कोई कार्य करते देखकर सीख जाते हैं। कुछ कार्य ऐसे भी हैं जो वे अमूमन नहीं करते लेकिन इनाम के लालच में सीख लेते हैं।

हाल में क्वींस मैरी युनिवर्सिटी की व्यवहार पारिस्थिकीविद ओली लाउकोला और उनके सहयोगियों ने भौंरों के साथ एक रोचक अध्ययन किया। इसमें वैज्ञानिकों ने सबसे पहले भौंरों को प्रशिक्षित किया जिसमें उन्हें एक गेंद को एक लक्षित स्थान तक पहुंचाना था। जिसके इनामस्वरूप उन्हें मीठा शरबत दिया जाता था। यह काम वे प्राकृतिक परिस्थितियों में नहीं करते हैं। इसके बाद प्रत्येक भौंरे को लक्ष्य से अलग-अलग दूरी पर रखी तीन पीली गेंदें दिखाई गईं। कुछ भौरों ने पहले से प्रशिक्षित भौरों को लक्ष्य से सबसे दूर रखी गेंद को लक्ष्य तक ले जाते देखा जिसके इनाम स्वरूप उन्हें मीठा शरबत मिला। कुछ भौरों को मेज़ के नीचे एक चुंबक की मदद से सबसे दूर रखी गेंद को लक्ष्य तक पहुंचते दिखाया गया। भौंरों के तीसरे समूह को किसी प्रकार का कोई प्रदर्शन नहीं दिखाया गया। उन्होंने तो गेंद को इनाम के साथ लक्ष्य पर देखा।

इसके बाद प्रत्येक भौंरे को पांच मिनट के भीतर गेंद को लक्ष्य तक पहुंचाने का कार्य दिया गया। वे भौंरे सबसे सफल रहे जिन्होंने प्रशिक्षित भौरों को लक्ष्य तक गेंद ले जाते हुए देखा था। इन भौरों के काम करने की गति अन्य दो समूहों से तेज़ थी। जबकि कुछ भौंरे तो कार्य को पूरी तरह अपने दम पर करने में सक्षम पाए गए। इसके अलावा कुछ ही समय में भौंरों ने गेंद को घसीटने का एक बेहतर तरीका खोज निकाला था। जिन भौंरों ने प्रशिक्षित भौंरों को लक्ष्य तक गेंद धकेलते देखा था, वे बाद में गेंद को पीछे की ओर धकेलते हुए ले जा रहे थे। वैज्ञानिकों ने इसे एक अप्रत्याशित और अभिनव परिवर्तन के रूप में देखा और पाया कि वे अपने कार्यों को पूरा करने के लिए नई-नई तकनीक अपनाने में भी माहिर हैं।

अध्ययन में भौंरों ने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग गेंदों का चुनाव भी किया। हालांकि प्रशिक्षित भौरों ने सबसे दूर रखी गेंद को लक्ष्य तक पहुंचाया था लेकिन प्रेक्षक भौंरों ने लक्ष्य के निकट रखी गेंदों को भी चुना। गेंदों का रंग बदलने पर भी भौंरों ने इनाम के लालच में काली गेंदों को भी लक्ष्य तक पहुंचाया। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे कार्य के सामान्य सिद्धांत को समझने की भी क्षमता रखते हैं और किसी भी समस्या को प्रभावी ढंग से हल करने में माहिर हैं।

भौंरों का यह लचीलापन इनकी आबादी में हो रही कमी की समस्या से निपटने में सहायक हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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पारदर्शी मछली की इंद्रधनुषी छटा

घोस्ट कैटफिश या ग्लास कैटफिश (Kryptopterus vitreolus) मूलत: थाइलैंड की नदियों में पाई जाती है। लेकिन ये पिद्दी-सी घोस्ट कैटफिश एक्वैरियम में रखने के लिए लोकप्रिय हैं। कारण है कि इनका शरीर लगभग पारदर्शी होता है। लेकिन जब इनके ऊपर रोशनी पड़ती है तो ये इंद्रधनुषी रंग बिखेरती हैं। अब, शोधकर्ताओं ने इस रंग-बिरंगी चमक के कारण का पता लगा लिया है। उनमें यह चमक उनकी भीतरी संरचना के कारण आती है।

वैसे तो कई जीव ऐसे होते हैं जो हिलने-डुलने या चलने पर अलग रंगों में दिखने लगते हैं। लेकिन आम तौर पर उनमें ये रंग उनकी बाहरी चमकीली त्वचा के कारण दिखाई देते हैं। जैसे हमिंगबर्ड या तितली के पंखों के रंग। लेकिन कैटफिश में शल्क नहीं होते हैं। बल्कि इनकी मांसपेशियों में सघन संरचनाएं होती हैं, जिनसे टकराकर प्रकाश बदलते रंगों में बिखर जाता है।

शंघाई जिआओ टोंग युनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञानी किबिन झाओ ने जब प्रयोगशाला में इनके शरीर पर विभिन्न तरह का प्रकाश डाला तो पाया कि तैरते समय घोस्ट कैटफिश की मांसपेशियां क्रमिक रूप से सिकुड़ती और फैलती हैं, जिसकी वजह से चमकीले रंग निकलते हैं। ये नतीजे प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इंद्रधनुषी छटा दिखने के लिए उनकी त्वचा पारदर्शी होना आवश्यक है; यह लगभग 90 प्रतिशत प्रकाश को आर-पार गुज़रने देती है। यदि मछली की त्वचा इतनी पारदर्शी नहीं होगी तो रंग नहीं दिखेंगे।

वैसे तो कई जीव अपने टिमटिमाते रंगो का उपयोग अपने साथियों को रिझाने के लिए या शिकारियों को चेतावनी का संकेत देने के लिए करते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि घोस्ट कैटफिश किस उद्देश्य से चमक बिखेरती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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रुद्राक्ष के चमत्कार: क्या कहता है विज्ञान? – डॉ. किशोर पंवार

जकल एक गुठली की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है। इसके चमत्कारी प्रभाव का लाभ लेने के लिए इसे अभिमंत्रित कर मुफ्त में बांटा जा रहा है ताकि आमजन को विभिन्न व्याधियों से मुफ्त में मुक्ति दिलाई जा सके। आप समझ गए होंगे कि बात रुद्राक्ष की हो रही है।

इसी संदर्भ में हाल ही में रुद्राक्ष के औषधि महत्व पर आज तक जो शोध विभिन्न लोगों ने किए हैं उसका एक समीक्षा पर्चा मुझे पढ़ने में आया है। यह पंजाब युनिवर्सिटी विज्ञान शोध पत्रिका में 2018 में छपा था। यह महत्वपूर्ण सामयिक कार्य डी. वी. राय, शिव शर्मा और मनीषा रस्तोगी ने किया है। तीनों शोभित युनिवर्सिटी (मेरठ) में कार्यरत हैं।

क्या है रुद्राक्ष?

इसके चमत्कारिक औषधि प्रभाव के बारे में बात करने के पहले जरा यह जान लें कि रुद्राक्ष है क्या। रुद्राक्ष एक पेड़ (विज्ञान की भाषा में एलियोकार्पस गैनिट्र्स) का बीज है। इसके पेड़ 10 से 20 मीटर तक ऊंचे होते हैं और हिमालय की तलहटी में गंगा के मैदानों से लेकर चीन, दक्षिण पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों और हवाई तक पाए जाते हैं। रुद्राक्ष नेपाल से लेकर जावा और सुमात्रा के पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते हैं।

दुनिया भर में एलियोकार्पस की 350 से ज़्यादा प्रजातियां पाई गई हैं। इनमें से 33 भारत में मिलती हैं। भारतीय अध्यात्म में रुद्राक्ष को पृथ्वी और सूर्य के बीच एक कड़ी के रूप में देखा जाता है।

रुद्राक्ष इस पेड़ के पके फलों (जिन्हें ब्लूबेरी कहा जाता है) की गुठली है। बीजों का अध्ययन बताता है कि इसके बीज की मध्य आंतरिक भित्ती नारियल की तरह कठोर होती है। इसके भीतर नारियल जैसा ही एक भ्रूणपोष (खोपरा) होता है जिसमें कैल्शियम ऑक्सलेट के ढेर सारे रवे पाए जाते हैं। रुद्राक्ष का फल बेर जैसा ही होता है। इसका गूदा नरम और उसके अंदर एक गुठली और गुठली के अंदर बीज। जिसे हम रुद्राक्ष का बीज कहते हैं वह तो इसकी गुठली ही है, ठीक वैसे ही जैसे बेर की गुठली।

रुद्राक्ष के फलों से गुठली प्राप्त करने के लिए इसे कई दिनों तक पानी में गला कर रखा जाता है। फिर गूदा साफ करके इन्हें चमका कर रोज़री अर्थात मालाएं बनाई जाती है। इन मनकों पर जो दरारें नजर आती हैं वे इसके अंडाशय में पाए जाने वाले प्रकोष्ठों की संख्या से जुड़ी हुई है। ये सामान्यत: पांच होती हैं परंतु एक से लेकर 21 तक भी देखी गई हैं। इन खड़ी लाइनों को ही मुख कहा जाता है। ज़्यादा मुखी होने पर उसका महत्व/कीमत बढ़ जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि असामान्य गुठलियों में ज़्यादा जादुई शक्ति होती है। इनकी गुठलियों का रंग सफेद, लाल, बादामी, पीला या गहरा काला भी हो सकता है। बादामी रुद्राक्ष सबसे आम है।

रुद्राक्ष के फलों का बाहरी छिलका नीला होता है इसलिए इन्हें ब्लूबेरी कहा जाता है। यह नीला रंग किसी रंजक की वजह से नहीं बल्कि इसके छिलकों की बनावट की वजह से होता। यानी रंग नज़र तो आता है किंतु मसलने पर हाथ नहीं आएगा।

पौराणिक उत्पत्ति

एक पौराणिक कथा के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई थी। इसलिए इसे पवित्र माना जाता है और शिव भक्तों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। देवी भागवत पुराण के अनुसार त्रिपुरासुर का वध करने के लिए जब देवताओं ने शिव से आग्रह किया तो उन्होंने अपने नेत्र योग मुद्रा में बंद कर लिए और जब थोड़ी देर बाद आंखें खोली तो उनकी आंखों से आंसू टपके। मान्यता है कि जहां-जहां धरती पर उनके आंसू टपके वहां-वहां रुद्राक्ष के पेड़ उत्पन्न हुए।

अब बात करते हैं उस महत्वपूर्ण समीक्षा पर्चे की जिसमें अब तक प्रकाशित विभिन्न शोध पत्रों का पुनरावलोकन किया गया है। इन शोध पत्रों में रुद्राक्ष का उपयोग कई विकारों, जैसे तनाव, चिंता, अवसाद, घबराहट, तंत्रिका विकार, माइग्रेन, एकाग्रता की कमी, दमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गठिया, यकृत रोग और कैंसर आदि तक में करने की बात कही गई है। इन सबका सार पढ़कर तो लगेगा कि लाख दुखों की एक दवा है रुद्राक्ष। तो क्यों न आज़माएं?

इन शोध पत्रों के मुताबिक इन गुठलियों में कई औषधीय महत्व के रसायन भी पाए गए हैं जैसे अल्केलॉइड्स, फ्लेवोनॉइड्स, स्टेराड्स, कार्डिएक ग्लाइकोसाइड्स आदि। कहना न होगा कि किसी भी पेड़, बीज, गुठली का विश्लेषण करने पर कम-ज़्यादा मात्रा में इसी तरह के रसायन मिलने की उम्मीद की जा सकती है। रुद्राक्ष के संघटन की तुलना किसी अन्य से नहीं की गई है। 

कुछ शोधार्थियों ने रुद्राक्ष की गुठलियों के विद्युत-चुंबकीय गुणों का अध्ययन किया है और बताया है कि इन मनकों का विद्युत-चुंबकीय गुण कई असाध्य रोगों (जैसे उच्च रक्तचाप, हृदय की गति, मधुमेह, स्त्री रोग, तंत्रिका सम्बंधी गड़बड़ी, नींद ना आना, गठिया) आदि को ठीक करता है। कहा गया है कि ये गुण इसकी माला धारण करने के असर का ‘वैज्ञानिक’ आधार हैं। लेकिन एक अहम बात यह देखने में आती है कि चुंबकीय गुणों के सारे परीक्षण रुद्राक्ष गुठली के चूर्ण पर किए गए हैं, साबुत गुठली पर नहीं।

इस संदर्भ में शिव शर्मा, डी. वी. राय और मनीषा रस्तोगी के एक पर्चे (इंटरनेशन जर्नल ऑफ साइन्टिफिक एंड टेक्नॉलॉजी रिसर्च) में रुद्राक्ष चूर्ण के तमाम मापन के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं – जैसे कोएर्सिविटी, रिटेंटिविटी, रेमनेंस, मैग्नेटाइज़ेशन और चुंबकीय गुणों की तापमान पर निर्भरता। कई ग्राफ और तालिकाएं भी दी गई हैं। एक्सरे फ्लोरेसेंस के परिणाम प्रस्तुत किए गए हैं। लेकिन आईसर, पुणे के वैज्ञानिक डॉ. भास बापट के अनुसार, “यह तीन नमूनों के साथ विभिन्न तकनीकों से प्राप्त विविध चुंबकीय गुणधर्मों की सूची है और कोई कोशिश नहीं की गई है कि इन गुणों का आकलन जैविक या औषधीय प्रभावों की दृष्टि से किया जाए।” और तो और, जैसा कि ऊपर कहा गया है, ये सारे मापन चूर्ण के साथ किए गए हैं।

एस. त्रिपाठी व अन्य के शोध पत्र (2016) में बताया गया है कि दो तांबे के सिक्कों के बीच रुद्राक्ष का घूमना इसके विद्युत-चुंबकीय गुणों का स्पष्ट प्रमाण है परंतु समीक्षा पर्चे में इस पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि इस क्रिया के सत्यापन की ज़रूरत है; अर्थात यह संदिग्ध है।

इसी तरह एस. प्रजापति और अन्य (2016) के प्रयोगों को भी वनस्पति विज्ञान के शोधकर्ताओं द्वारा परखा जाना चाहिए। उन्होंने ड्रेसिना के कुछ पौधों को रुद्राक्ष माला पहनाकर और कुछ को ऐसी माला पहनाए बगैर उनका विद्युत विभव तने और पत्तियों के बीच नापा। इस प्रयोग के आधार पर उनका निष्कर्ष था कि रुद्राक्ष में केपेसिटिव, रेज़िस्टिव और इंडक्टिव गुण होते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि शोधकर्ताओं ने यह प्रयोग कोई अन्य माला पहनाकर किया था या नहीं। वैसे भी उन्होंने पौधों को दो भागों में बांट दिया था – धनात्मक तना और ऋणात्मक पत्ती। यह सच है कि तने से पत्ती की ओर कई धनात्मक आयनों का प्रवाह पानी के माध्यम से होता है किंतु इस आधार पर उन्हें धनात्मक और ऋणात्मक क्षेत्रों में बांटने की बात बेमानी है। पत्तियों में तो सबसे ज़्यादा जैव रासायनिक क्रियाएं होती रहती है। अतः उसे ऋणात्मक मानना उचित नहीं होगा।

इसी तरह त्रिपाठी व साथियों (2016) ने रुद्राक्ष के बीजों के इम्यूनिटी सम्बंधी गुणों का अध्ययन किया। उन्होंने 15 लोगों को रुद्राक्ष की माला पहनाई और 15 को नहीं। उन्होंने पाया कि जो लोग नियमित रूप से रुद्राक्ष माला पहनते थे वे स्वस्थ थे। उनका सीबीसी व मूत्र परीक्षण किया गया तो उनका हिमोग्लोबिन, आरबीसी, डीएलसी अधिक था। सवाल यह है कि क्या उन दोनों समूहों का पूर्व परीक्षण किया गया था इन्हीं पैरामीटर्स के लिए। माला कितने दिनों तक पहनाई गई और क्या दोनों समूह को भोजन एक-सा दिया गया था और उनकी दिनचर्या भी क्या एक समान थी। ये सभी सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि छद्म विज्ञान और सच्चे विज्ञान में यही अंतर है। ऐसे ही एक अन्य अध्ययन (कुमावत व अन्य, 2022) में रुद्राक्ष की खुराक के साथ-साथ तमाम परहेज भी करवाए गए थे और तुलना के लिए कोई समूह नहीं था। तुलना का प्रावधान अर्थात कंट्रोल वैज्ञानिक प्रयोगों में एक महत्वपूर्ण घटक होता है जो प्रयोगों की सत्यता को प्रमाणित करता है।

रुद्राक्ष के प्रतिरक्षा तंत्र को प्रभावित करने की क्रिया पर भी कई लोगों ने कार्य किए हैं। यहां जयश्री और अन्य (2016) का ज़िक्र लाज़मी है। उन्होंने पत्ती, छाल तथा बीज के जलीय और एसीटोन निष्कर्ष की जांच की और पाया कि बीजों को पानी में  रखकर उसका पानी पीना उतना उपयोगी नहीं है जितना कि अन्य रसायनों में बनाए गए आसव।

कुछ परीक्षण जीवों पर भी किए गए हैं। जैसे चूहों पर उच्च-रक्तचाप रोधी गुणों का पता लगाने के लिए बीजों को पीसकर उनका चूर्ण विभिन्न मात्रा में खिलाया गया। पता चला कि चूहों का रक्तचाप कम हुआ। इसी तरह अल्कोहल निष्कर्षण बीजों में अवसाद रोधी प्रभाव पाए गए हैं। चूहों के अलावा जैन और अन्य द्वारा 2016 एवं 2017 में खरगोश पर भी इसी तरह के प्रयोग किए गए हैं। जिनसे पता चला कि बीजों का अल्कोहल आसव उनके खून में कोलेस्ट्रॉल स्तर कम करने में सहायक पाया गया है। किडनी रोगों में भी प्रभावी पाया गया है।

राय व साथी अपने समीक्षा पर्चे के निष्कर्ष के तौर पर यही कहते हैं कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली में विविध विकारों के उपचार में रुद्राक्ष मनकों को जो महत्व दिया गया है, उसे देखते हुए, यही कहा जा सकता है कि मानक पद्धतियों से प्राप्त निष्कर्ष और इसकी कार्यविधि सम्बंधी नतीजे निहायत अपर्याप्त हैं। विभिन्न जीर्ण रोगों के कुप्रभावों से निपटने में एक समग्र तरीके के तौर पर इसकी प्रभाविता, लागत-क्षमता, उपयोगकर्ता के लिए सुविधा, आसानी से उपलब्धता और सुरक्षा को साबित करने के लिए गहन शोध अध्ययनों की ज़रूरत है ताकि सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे भवंतु निरामया के सूत्र के आधार पर समस्त मानव जाति को इसके चमत्कारिक विभिन्न स्वास्थ्य लाभों से वंचित ना रहना पड़े।

ऐसे अनुसंधान से कोई लाभ नहीं होगा जो पहले से मान लिए गए सत्य को प्रमाणित करने के लिए किया जाए। अनुसंधान तो सत्य के अन्वेषण के लिए होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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प्लास्टिकोसिस की जद में पक्षियों का जीवन – अली खान

हालिया अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि प्लास्टिक के कारण समुद्री पक्षियों का पाचन तंत्र खराब हो रहा है। बता दें कि यह पहली बार प्लास्टिक से होने वाली बीमारी का पता चला है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम प्लास्टिकोसिस रखा है। फिलहाल यह बीमारी समुद्री पक्षियों को हो रही है। लेकिन आशंका है कि भविष्य में यह कई प्रजातियों में फैल सकती है।

प्लास्टिकोसिस उन पक्षियों को हो रहा है जो समुद्र में अपना शिकार ढूंढते हैं। शिकार के साथ ही उनके शरीर में छोटे और बड़े आकार के प्लास्टिक चले जाते हैं जिनसे उनके शरीर को नुकसान होने लगता है। धीरे-धीरे वे बीमार होकर मर जाते हैं। वैज्ञानिकों ने प्लास्टिकोसिस की वजह से शरीर पर पड़ने वाले असर को भी रिकॉर्ड किया है।

इस शोध की रिपोर्ट हैज़ार्डस मटेरियल्स जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोध के मुताबिक प्लास्टिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि विभिन्न उम्र के पक्षियों में प्लास्टिक की उपस्थिति के संकेत पाए गए हैं। शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया में शीयरवाटर्स पक्षी का अध्ययन करने के बाद यह जानकारी दी है। अध्ययन में बताया गया है कि पक्षियों की आहार नाल के प्रोवेन्ट्रिकुलस नामक अंग की ग्रंथियों के क्रमिक क्षय के कारण यह रोग होता है। इन ग्रंथियों की कमी से पक्षी संक्रमण और परजीवियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ये भोजन को पचाने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

हकीकत यही है कि रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक थैलियों, बर्तनों व अन्य प्लास्टिक से उपजा प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक एक ऐसा नॉन-बायोडीग्रेडबल पदार्थ है जो जल और भूमि में विघटित नहीं होता है। यह लंबे समय तक हवा, मिट्टी व पानी के संपर्क में रहने पर हानिकारक विषैले पदार्थ उत्सर्जित करने लगता है। ये विषैले पदार्थ घुलकर पानी के स्रोतों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में यह लोगों में विभिन्न प्रकार की बीमारियां फैलाने का काम करता है। एक शोध से पता चला है कि प्लास्टिक के ज़्यादा संपर्क में रहने से खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है जिससे गर्भ में शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है। प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनाल रसायन शरीर में मधुमेह और यकृत एंज़ाइम को असंतुलित कर देता है। इसके अलावा प्लास्टिक कचरा जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे श्वसन, त्वचा और आंखों से सम्बंधित बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है।

सवाल है कि प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम कैसे हो? सर्वप्रथम तो प्लास्टिक के खतरों के प्रति आम लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। साथ ही सरकारी प्रयासों को गति दी जानी चाहिए। इसमें आम लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी है। इसके बिना प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनों की कटाई के दुष्प्रभाव – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1990 के बाद से सदी के अंत तक, 11 अरब मनुष्यों का पेट भरने की खातिर 42 करोड़ हैक्टर वन अन्य भूमि उपयोगों (जैसे कृषि, औद्योगिक और जैव ईंधन वगैरह) में तबदील करके गंवा दिए गए हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत, चीन और अफ्रीका जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों पर होगा।

बढ़ते तापमान के कारण

खाद्य व कृषि संगठन द्वारा प्रकाशित वैश्विक वन संसाधन आकलन बताता है कि पृथ्वी पर 31 प्रतिशत भूमि वन से ढंकी है। जब पेड़ काटे जाते हैं तो वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड जमा होने लगती है, नतीजतन वैश्विक तापमान बढ़ता है।

वनों की कटाई के कारण ग्रीनहाउस गैसों (CO2, CH4, N2O, SO2 व CFCs) का वैश्विक उत्सर्जन 11 प्रतिशत बढ़ा है।

इस संदर्भ में हारवर्ड युनिवर्सिटी पब्लिक हेल्थ ग्रुप आगे बताता है कि वनों की कटाई के कारण डेंगू-मलेरिया जैसे रोगों के लिए ज़िम्मेदार कीटाणु बढ़ते हैं, जो मनुष्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

एनवॉयरमेंटल सोसाइटी ऑफ इंडिया के डॉ. एस. बी. कद्रेकर बताते हैं कि सिर्फ पेड़ ही नहीं बल्कि मिट्टी और पानी को भी बचाना होगा। वनों की कटाई में एक प्रतिशत की वृद्धि होने से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में 0.93 प्रतिशत की कमी आती है, जो पेयजल के लिए कुओं और छोटे नदी-नालों पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वाष्पोत्सर्जन से पेड़ वायुमंडल में पानी छोड़ते हैं, जो वर्षा के रूप में वापस ज़मीन पर गिरता है। इस तरह, वनों की कटाई के कारण दोहरी मार पड़ती है। पृथ्वी का लगभग 31 प्रतिशत थल क्षेत्र (3.9 अरब हैक्टर) वन से ढंका है। लेकिन कई देशों में खाद्य आपूर्ति, विकास और प्रौद्योगिकी के नाम पर वनों की अत्यधिक कटाई होती है।

भारत में स्थिति

भारत में कुल वनाच्छादन लगभग 8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 22 प्रतिशत है। इनमें से अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का 87 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है।

डॉ. पंकज सक्सेरिया बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने लकड़ी निर्यात करने के लिए वहां एक बंदरगाह स्थापित किया था। वर्तमान सरकार की नज़र इन द्वीपों पर अपनी नौसेना का विस्तार करने के लिए और लोगों को यहां न सिर्फ सैर-सपाटा करने बल्कि बसने के लिए आकर्षित के लिए है। इसलिए इन द्वीपों को बचाने के लिए काफी कुछ करने की ज़रूरत है।

जम्मू और काश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में क्रमशः 21,000, 24,000 और 16,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। भारत सरकार ने इन क्षेत्रों में अंडरपास और ओवरपास राजमार्ग बनाने के लिए वनों का काफी बड़ा हिस्सा काट दिया है।

इसी तरह, गोवा में लगभग 2219 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। यहां की सरकार मुंबई और गोवा को फोर-लेन राजमार्ग से जोड़ने के लिए यहां अनगिनत पेड़ काट रही है। स्थानीय अधिकारियों द्वारा लगभग 31,000 पेड़ काटे जा चुके हैं।

इसी तरह, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) NH163 पर 45 किलोमीटर लंबी टू-लेन को फोर-लेन करने के लिए तैयार है। ऐसा करने के लिए वे तेलंगाना के चेवेल्ला मंडल में 9000 बरगद के पेड़ों को काटने के लिए तैयार हैं।

ये विशाल बरगद के पेड़ सदियों पुराने हैं, जिन्हें निज़ाम और अन्य वन-प्रेमी समूहों ने लगाया था।

निष्कर्षत:, ये वनों की कटाई के कुछ बुरे प्रभाव हैं और हमें इसका विरोध करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक इकोसिस्टम की बहाली के प्रयास

मानव गतिविधियों से न जाने कितने प्राकृतिक स्थलों की दुर्दशा हो गई है। इन्हीं में से एक है इटली की बेगनोली खाड़ी, जिसमें समुद्री जीवन लगभग शून्य हो चुका है। ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बेगनोली खाड़ी की तलछट में बचे रह गए पर्यावरणीय डीएनए (तलछटी डीएनए) की मदद से 200 साल पीछे तक का जैविक इतिहास खंगाला और इस पारिस्थितिक तंत्र के तबाह होने की क्रमिक तस्वीर निर्मित की। ऐसी जानकारी बेगनोली खाड़ी और अन्य खस्ताहाल पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली में मददगार हो सकती है।

दरअसल औद्योगिक क्रांति से पहले, लगभग 1827 तक बेगनोली खाड़ी स्वस्थ और सुंदर हुआ करती थी। इसमें नेपच्यून घास उगा करती थी और यह कृमियों, समुद्री स्क्वर्ट्स, स्पॉन्ज और छोटे प्लवकों जैसे जीवों का घर हुआ करती थी। लेकिन 20वीं शताब्दी के आरंभ तक, स्टील और एस्बेस्टस संयंत्र बनने के साथ खाड़ी के बीच मौजूद द्वीप को मुख्य ज़मीन से जोड़ने के लिए पुल बने। इन गतिविधियों ने इसकी समुद्री घास को तबाह कर दिया था, जिससे इस पर निर्भर जीवन भी प्रभावित हुआ। नतीजतन खाड़ी प्रदूषित होती गई और इसका पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाता गया।

ऐसा नहीं था कि खाड़ी की बहाली के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे थे। यह अध्ययन बहाली के इन्हीं प्रयासों के चलते किया गया था। दरअसल बहाली के लिए उठाए गए कदमों से खाड़ी का प्रदूषण तो काफी हद तक कम हो गया था, लेकिन इसके पारिस्थितिक तंत्र में कोई खास सुधार नहीं हो सका था।

पारिस्थितिक तंत्र की बहाली के लिए यह पता होना ज़रूरी है कि मानव दखल या औद्योगिक क्रांति से पहले आखिर यह था कैसा? इसमें कौन से जीव, प्रजातियां, पौधे वगैरह वापस लाए जाएं और किस हिसाब से वापस लाए जाएं।

इसके लिए दो समुद्री पारिस्थितिकीविदों एंटॉन डॉर्न ज़ुऑलॉजिकल इंस्टीट्यूट की लॉरेना रोमेरो और अर्बिनो युनिवर्सिटी के मार्को कैवलियरे ने सोचा कि इसकी तलछट में मौजूद डीएनए इसकी पूर्वस्थिति के सुराग दे सकते हैं।

तलछटी डीएनए के अध्ययन से शोधकर्ता न सिर्फ मानव दखल से पहले और बाद की खाड़ी की तस्वीर बना पाए बल्कि वे यह भी पता कर पाए कि समय के साथ धीरे-धीरे खाड़ी किस तरह बदहाल होती गई। तलछटी डीएनए के अध्ययन का फायदा यह है कि तलछट परत-दर-परत जमा होती है, और हर परत में मौजूद डीएनए उस काल विशेष के जीवन के बारे में बता सकते हैं। खाड़ी की परतों के नमूनों में शोधकर्ताओं को कुछ अनजानी प्रजातियों के डीएनए भी मिले।

इस लिहाज से तलछटी डीएनए का अध्ययन किसी पारिस्थितिक तंत्र की बहाली के लिए एक उम्दा तरीका लगता है लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। मसलन, डीएनए समय के साथ क्षतिग्रस्त होते जाते हैं। संभावना है कि इसमें कई प्रजातियां छूट जाएं। इसलिए इसे पारिस्थितिकी पता करने के कई तरीकों में से एक तरीके के तौर पर देखा जाना चाहिए न कि एकमात्र तरीके के तौर पर। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक कलहंसों को मिला नया प्रजनन स्थल

निरंतर हो रहे जलवायु परिवर्तन से गुलाबी पैरों वाले कुछ गीस (कलहंसों) ने उत्तरी रूस में एक ठिकाना बना लिया है। यह स्थान उनके पारंपरिक ग्रीष्मकालीन प्रजनन क्षेत्र से लगभग 1000 किलोमीटर उत्तर पूर्व में है। विशेषज्ञों के अनुसार यह घटना इस तथ्य की ओर संकेत देती हैं कि कुछ प्रजातियां, थोड़े समय के लिए ही सही, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ अनुकूलन कर सकती हैं। गौरतलब है कि प्रत्येक वसंत ऋतु में लगभग 80,000 कलहंस (एन्सेर ब्रैचिरिन्चस) नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीपसमूह में प्रजनन के लिए डेनमार्क, नेदरलैंड और बेल्जियम से उत्तर की ओर प्रवास करते हैं। स्वीडन और फिनलैंड में कुछ हज़ार पक्षियों के देखे जाने के बाद वैज्ञानिकों ने 21 पक्षियों को जीपीएस ट्रैकर लगाए। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ट्रैकर लगे आधे पक्षी उत्तरी रूस के एक द्वीपसमूह नोवाया ज़ेमल्या के उत्तर-पूर्व की ओर उड़ गए। इस क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने नई प्रजनन आबादी पाई जिसमें लगभग 3-4 हज़ार पक्षी शामिल हो सकते हैं। नोवाया ज़ेमल्या का वर्तमान वसंत तापमान अब स्वालबार्ड के दशकों पहले रहे तापमान के समान है। ऐसी संभावना है कि पक्षियों ने अपने नए प्रजनन क्षेत्र चुन लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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व्हेल की त्वचा में उनकी यात्राओं का रिकॉर्ड

क हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के कारण बैलीन व्हेल के प्रवास को समझने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने व्हेल की त्वचा के छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल किया है। यह तकनीक व्हेल के संरक्षण में मददगार साबित हो सकती है जो अभी शिकार से तो सुरक्षित हैं लेकिन संकटग्रस्त हैं। वास्तव में व्हेल की इस प्रजाति (Eubalaena australis) को ट्रैक करना मुश्किल है लेकिन शोधकर्ताओं ने व्हेल की त्वचा के कुछ नमूने तटीय प्रजनन क्षेत्रों से उनकी त्वचा के सूक्ष्म हिस्से को भेदकर प्राप्त किए।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने इस नमूने में कार्बन और नाइट्रोजन समस्थानिकों का विश्लेषण किया और इसका मिलान पिछले 30 वर्षों में दक्षिणी महासागर में मैप किए गए समस्थानिक अनुपात से किया। व्हेल जो क्रिल और कोपेपोड खाती हैं उनमें यही समस्थानिक होते हैं। ये लगभग 6 महीने बाद व्हेल की नवीन त्वचा में पहुंच जाते हैं। त्वचा में समस्थनिकों के अनुपात में व्हेल की पिछली यात्राएं रिकॉर्ड हो जाती हैं। टीम ने पाया कि समुद्र का मध्य अक्षांश व्हेल के लिए भोजन का एक महत्वपूर्ण इलाका रहा है। ऐसा लगता है कि दक्षिणी महासागर के कुछ हिस्सों में, व्हेल भोजन के लिए दक्षिण की ओर प्रवास कम कर रही हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन ने अंटार्कटिका के आसपास के इलाकों में क्रिल की आबादी कम कर दी है जिसके चलते उस ओर व्हेल का प्रवास भी कम हो गया है। (स्रोत फीचर्स)

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