भारत की सूखती नदियां – प्रमोद भार्गव

मेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई है। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं।

हिमनद पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है। गुतारेस ने यह वक्तव्य इंटरनेशनल ईयर ऑफ ग्लेशियर प्रिज़र्वेशन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिया। इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा।   

गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं।

पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। यह समस्या भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में सबसे ज़्यादा है। सीएसई की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 में पानी की ज़रूरत जहां 1100 अरब घन मीटर थी, वह बढ़कर 2050 में 1447 घन मीटर हो जाएगी। खेती के लिए 200 घन मीटर अतिरिक्त पानी की ज़रूरत होगी। सीएसई रिपोर्ट के मुताबिक गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदी प्रणाली का जलग्रहण क्षेत्र कुल नदी जलग्रहण क्षेत्र का 43 प्रतिशत है। इनमें पानी का कम होना देश में बड़ा जल संकट पैदा कर सकता है। भारत में दुनिया की 17.74 प्रतिशत आबादी है, जबकि उसके पास मीठे पानी के स्रोत केवल 4.5 प्रतिशत ही हैं। तो, नदियां सूखने के संकेत चिंताजनक हैं। 

हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी इसलिए सच लगती है, क्योंकि कनाडा की स्लिम्स नदी के सूखने का घटनाक्रम एवं नाटकीय बदलाव एक ठोस सच्चाई के रूप में छह साल पहले सामने आ चुका है। इस घटना को भू-विज्ञानियों ने ‘नदी के चोरी हो जाने’ की उपमा दी थी। ऐसा इसलिए कहा गया, क्योंकि नदियों के सूखने अथवा मार्ग बदलने में हज़ारों साल लगते हैं, जबकि यह नदी चार दिन के भीतर ही सूख गई थी। नदी के विलुप्त हो जाने का कारण जलवायु परिवर्तन माना गया था। तापमान बढ़ा और कास्कावुल्श नामक हिमनद जो इस नदी का उद्गम स्रोत है, वह तेज़ी से पिघलने लगा। नतीजतन सदियों पुरानी स्लिम्स नदी 26 से 29 मई 2016 के बीच सूख गई। जबकि इस नदी का जलभराव क्षेत्र 150 मीटर चौड़ा था।

आधुनिक इतिहास में इस तरह से नदी का सूखना विश्व में पहला मामला था। प्राकृतिक संपदा के दोहन के बूते औद्योगिक विकास में लगे मनुष्य को यह चेतावनी भी है कि यदि विकास का स्वरूप नहीं बदला गया तो मनुष्य समेत संपूर्ण जीव जगत का संकट में आना तय है।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के भू-गर्भशास्त्री डेनियल शुगर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं का एक दल स्लिम्स नदी की पड़ताल करने मौके पर पहुंचा था। लेकिन उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अब वहां कोई नदी रह ही नहीं गई थी। न केवल नदी का पानी गायब हुआ था, बल्कि भौगोलिक परिस्थिति भी पूरी तरह बदल गई थी। इन विशेषज्ञों ने नदी के विलुप्त होने की यह रिपोर्ट ‘रिवर पायरेसी’ शीर्षक से नेचर में प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादा गर्मी की वजह से कास्कावुल्श हिमनद की बर्फ तेज़ी से पिघलने लगी और इस कारण पानी का बहाव काफी तेज़ हो गया। जल के इस तेज़ प्रवाह ने हज़ारों साल से बह रही स्लिम्स नदी के पारंपरिक रास्तों से दूर अपना अलग रास्ता बना लिया। अब नई स्लिम्स नदी विपरीत दिशा में अलास्का की खाड़ी की ओर बह रही है जबकि पहले यह नदी प्रशांत महासागर में जाकर गिरती थी।

जिस तरह से स्लिम्स नदी सूखी है, उसी तरह से हमारे यहां सरस्वती नदी के विलुप्त होने की कहानी संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में दर्ज है। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के द्वार खुलने के बाद जो ताज़ा रिपोर्ट सामने आई है, उससे पता चला है कि गंगोत्री का जिस हिमखंड से उद्गम स्रोत है, उसका आगे का 50 मीटर व्यास का हिस्सा भागीरथी के मुहाने पर गिरा हुआ है। हालांकि गोमुख पर तापमान कम होने के कारण यह हिमखंड अभी पिघलना शुरू नहीं हुआ है। यही वह गंगोत्री का गोमुख है, जहां से गंगा निकलती है। 2526 कि.मी. लंबी गंगा नदी देश की सबसे प्रमुख नदियों में से एक है। अनेक राज्यों के करीब 40 करोड़ लोग इस पर निर्भर हैं। इसे गंगोत्री हिमनद से पानी मिलता है। परंतु 87 साल से 30 कि.मी. लंबे हिमखंड से पौने दो कि.मी. हिस्सा पिघल चुका है।

भारतीय हिमालय क्षेत्र में 9575 हिमनद हैं। इनमें से 968 हिमनद सिर्फ उत्तराखंड में हैं। यदि ये हिमनद तेज़ी से पिघलते हैं तो भारत, पाकिस्तान और चीन में भयावह बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।

इसी तरह अंटार्कटिका में हर साल औसतन 150 अरब टन बर्फ पिघल रही है, जबकि ग्रीनलैंड की बर्फ और भी तेज़ी से पिघल रही है। वहां हर साल 270 अरब टन बर्फ पिघलने के आंकड़े दर्ज किए गए हैं। यदि यही हालात बने रहे तो समुद्र में बढ़ता जलस्तर और खारे पानी का नदियों के जलभराव क्षेत्र में प्रवेश इन विशाल डेल्टाओं के बड़े हिस्से को नष्ट कर देगा।                                         

अल्मोड़ा स्थित पंडित गोविंद वल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमखंड का जो अगला हिस्सा टूटकर गिरा है, उसमें 2014 से बदलाव नज़र आ रहे थे। वैज्ञानिक इसका मुख्य कारण चतुरंगी और रक्तवर्ण हिमखंड का गोमुख हिमखंड पर बढ़ता दबाव मान रहे हैं। यह संस्था वर्ष 2000 से गोमुख हिमखंड का अध्ययन कर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार 28 कि.मी. लंबा और 2 से 4 कि.मी. चौड़ा गोमुख हिमखंड 3 अन्य हिमखंडों से घिरा है। इसके दाईं ओर कीर्ति तथा बाईं ओर चतुरंगी व रक्तवर्णी हिमखंड हैं। इस संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कीर्ति कुमार ने बताया है कि हिमखंड की जो ताज़ा तस्वीरें और वीडियो देखने में आए हैं, उनसे पता चलता है कि गोमुख हिमखंड के दाईं ओर का हिस्सा आगे से टूटकर गिर पड़ा है। इसके कारण गोमुख की आकृति वाला हिस्सा दब गया है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण भी हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर से भी हिमखंड टूटकर गिरते रहते हैं।

साफ है, इस तरह से यदि गंगा के उद्गम स्रोतों के हिमखंडों के टूटने का सिलसिला बना रहता है तो कालांतर में गंगा की अविरलता तो प्रभावित होगी ही, गंगा की विलुप्ति का खतरा भी बढ़ता चला जाएगा।

गंगा का संकट टूटते हिमखंड का ही नहीं हैं, बल्कि औद्योगिक विकास का भी है। कुछ समय पूर्व अखिल भारतीय किसान मज़दूर संगठन की तरफ से बुलाई गई जल संसद में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ज़रिए जलस्रोतों के दुरूपयोग और इसकी छूट दिए जाने का भी विरोध किया था। कानपुर में गंगा के लिए चमड़ा, जूट और निजी बॉटलिंग प्लांट संकट बने हुए हैं। टिहरी बांध बना तो सिंचाई के लिए था, लेकिन इसका पानी दिल्ली जैसे महानगरों में पेयजल आपूर्ति के लिए कंपनियों को दिया जा रहा है। गंगा के जलभराव क्षेत्र में खेतों के बीचों-बीच पेप्सी व कोक जैसी निजी कंपनियां बोतलबंद पानी के लिए बड़े-बड़े नलकूपों से पानी खींचकर एक ओर तो मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं खेतों में खड़ी फसल सुखाने का काम कर रही हैं। यमुना नदी से जेपी समूह के दो ताप बिजली घर प्रति घंटा 97 लाख लीटर पानी खींच रहे है। इससे जहां दिल्ली में जमुना पार इलाके के 10 लाख लोगों का जीवन प्रभावित होने का अंदेशा है, वहीं यमुना का जलभराव क्षेत्र तेज़ी से छीज रहा है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुमाकर की किताब स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल 1973 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने बड़े उद्योगों की बजाय छोटे उद्योग लगाने की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा था। उनका सुझाव था कि प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग और ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन होना चाहिए। शुमाकर का मानना था कि प्रदूषण को झेलने की प्रकृति की भी एक सीमा होती है। सत्तर के दशक में उनकी इस चेतावनी का मज़ाक उड़ाया गया था। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले सरकारी और गैर-सरकारी संगठन शुमाकर की चेतावनी को स्वीकार रहे हैं। वैश्विक मौसम जिस तरह से करवट ले रहा है, उसका असर अब पूरी दुनिया पर दिखाई देने लगा है। भविष्य में इसका सबसे ज़्यादा खतरा एशियाई देशों पर पड़ेगा। एशिया में गरम दिन बढ़ सकते हैं या फिर सर्दी के दिनों की संख्या बढ़ सकती है। एकाएक भारी बारिश की घटनाएं हो सकती हैं या फिर अचानक बादल फटने की घटनाएं घट सकती हैं। न्यूनतम और अधिकतम दोनों तरह के तापमानों में खासा परिवर्तन देखने में आ सकता है। इसका असर परिस्थितिक तंत्र पर तो पड़ेगा ही, मानव समेत तमाम जंतुओं और पेड़-पौधों की ज़िंदगी पर भी पड़ेगा। लिहाज़ा, समय रहते चेतने की ज़रूरत है। स्लिम्स नदी का लुप्त होना और 10 हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दर्पण में कौन है? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

बंदरों को जब पहली बार दर्पण दिखाया जाता है तो वे उसमें दिख रहे प्रतिबिंब को देखकर ऐसी मुद्रा बनाते हैं जैसे किसी के प्रति शत्रुता दिखा रहे हों – वे अपने दांत दिखाते हैं और लड़ने जैसी मुद्रा बना लेते हैं। हम मनुष्य दर्पण में अपने प्रतिबंब को इस रूप में पहचानते हैं कि यह तो ‘मैं’ ही हूं। वैसे, यह क्षमता सिर्फ मनुष्यों का विशिष्ट गुण नहीं है। चिम्पैंज़ी, डॉल्फिन, हाथी, कुछ पक्षी और यहां तक कि कुछ मछलियां भी ‘मिरर टेस्ट’ (दर्पण परीक्षण) में उत्तीर्ण रही हैं।

छवि (या प्रतिबिंब) को स्वयं के रूप में पहचानने का परीक्षण काफी सरल है। चुपके से व्यक्ति (या जंतु) के चेहरे पर किसी ऐसी जगह एक चिन्ह (मसलन, एक बड़ा लाल बिंदु) बना दिया जाता है कि वह चिन्ह उसे दिखाई न दे। जब किसी शिशु या छोटे बच्चे के माथे पर लाल बिंदी बनाई जाती है तो दर्पण में यह बच्चे का ध्यान खींचती ही है। लगभग 18 महीने तक की उम्र तक बच्चे आईने के प्रतिबिंब में इस अपरिचित बिंदी को दर्पण में छूने की कोशिश करते हैं। 18 महीने की उम्र के बाद बच्चों की दर्पण प्रतिबिंब पर प्रतिक्रिया यह होती है कि वे खुद अपने माथे पर उस बिंदी को छूने की कोशिश करते हैं। लगता है कि जैसे वे खुद से पूछ रहे हों, “यह बिंदी मेरे चेहरे पर कैसे आ गई?”

बड़े बच्चों की हरकत यकीनन स्वयं को पहचानने का संकेत है। लेकिन क्या यह आत्म-भान होने का भी संकेत है? आखिरकार, वयस्क लोग तक दर्पण के प्रति तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देते हैं। कुछ लोग दर्पण दिखने पर उसके सामने ठहरे बिना मानते नहीं, और कुछ लोग उस पर ध्यान दिए बिना सामने से गुज़र जाते हैं।

आत्म-पहचान

हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में जापानी शोधकर्ताओं ने दर्पण में स्वयं को पहचानने को लेकर कुछ नए निष्कर्ष प्रकाशित किए हैं। उन्होंने ये नतीजे ब्लूस्ट्रीक क्लीनर रासे मछली पर अध्ययन कर निकाले हैं; यह दर्पण में स्वयं को पहचानने के लिए जानी जाती है। उष्णकटिबंधीय महासागरों में इस छोटी मछली का बड़ी मछलियों से एक परस्पर सम्बंध होता है। इनका भोजन बड़ी मछली के शरीर पर चिपके परजीवी होते हैं। क्लीनर मछलियां नियत स्थानों पर बड़ी मछलियों का इंतज़ार करती हैं, और परजीवी-ग्रस्त मछलियां परजीवियों को हटवाने के लिए उनके पास जाती हैं। यहां तक कि परजीवी-ग्रस्त मछलियां अपने शरीर की अजीब-अजीब मुद्राएं बनाती हैं ताकि क्लीनर मछलियां परजीवियों तक पहुंच सकें। यह कुछ वैसे ही दिखता है जैसे किसी हज्जाम की दुकान पर दाढ़ी या बगलों की हजामत करवाने बैठा व्यक्ति ठोढ़ी या बांह ऊपर करके बैठा होता है ताकि हज्जाम अपना काम कर सके।

अध्ययन में एक्वैरियम में, एक बार में एक क्लीनर मछली के साथ प्रयोग किए गए। पहले पानी में एक दर्पण रखा गया, या स्क्रीन पर मछली की तस्वीर दिखाई गई। शुरुआती कुछ दफा जब मछली ने दर्पण में अपनी छवि या तस्वीर देखी तो उनकी प्रतिक्रिया आक्रामक रही। लेकिन समय के साथ उनमें स्वयं की छवि की पहचान आ गई, और इन मछलियों ने दर्पण-टेस्ट पास कर लिया। अब वे केवल अजनबी की छवियों के प्रति आक्रामक थीं। और तो और, वे अपने शरीर पर बनाए गए चमकीले निशानों को भी पहचानने लगीं और पास की किसी भी सतह पर रगड़कर उन्हें मिटाने की कोशिश करने लगीं।

और जब तस्वीर में फेरबदल करके, उनका चेहरा किसी अन्य मछली के शरीर पर लगाकर, तस्वीर दिखाई गई तो भी मछलियों ने आक्रामक व्यवहार नहीं दर्शाया। लेकिन जब मछली के स्वयं के शरीर पर किसी अजनबी मछली के चेहरे वाली तस्वीर दिखाई गई तो उन्होंने शत्रुता का व्यवहार दर्शाया। इससे ऐसा लगता है कि क्लीनर मछली अपने चेहरे की याद रखती है।

मनुष्यों के बच्चों की बात पर वापिस आते हैं, हमने देखा है कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े होने लगते हैं उनमें आत्म-भान आने लगता है। दर्पण में प्रतिबिंब को देखकर पूरी तरह से ये ‘मैं’ हूं की समझ 18 महीने की उम्र में आती है। यह वह उम्र भी है जिस पर बच्चे अपने बारे में बात करना शुरू करते हैं, और पिछली घटनाओं को याद करते हैं, जैसे “मैंने इसे खा लिया”)। क्या इसे आत्म-भान कहा जा सकता है? (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सामान्य स्वीटनर प्रतिरक्षा प्रणाली में टांग अड़ाता है

म तौर पर मधुमेह के रोगियों को चीनी की बजाय सुक्रेलोज़ जैसे कृत्रिम स्वीटनर का उपयोग करते देखा जाता है। इनके बारे में आम मान्यता है कि ये केवल जीभ को मिठास का एहसास कराते हैं, परन्तु शरीर पर इनका कोई अन्य प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन एक हालिया अध्ययन ने दर्शाया है कि स्वीटनर का स्वाद से परे जैविक प्रभाव होता है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में सुक्रेलोज़ की उच्च खुराक से चूहों की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पर गंभीर प्रभाव देखे गए हैं। सुक्रेलोज़ सामान्य शकर (सुक्रोज़) से 600 गुना अधिक मीठा होता है। वैसे शोधकर्ताओं ने मनुष्यों पर इसके प्रभावों का अध्ययन नहीं किया है लेकिन लगता है कि सुक्रेलोज़ की सामान्य खपत शरीर के लिए हानिकारक नहीं होगी।

गौरतलब है कि शकर के विकल्पों (शुगर सब्स्टिट्यूट) को आंत के सूक्ष्मजीवों में परिवर्तन जैसे जैविक प्रभाव दिखने के बाद इन पर विशेष अध्ययन किए जा रहे हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली पर सुक्रेलोज़ के प्रभाव को समझने के लिए लंदन स्थित फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के आणविक जीवविज्ञानी फैबियो ज़ानी और साथियों ने मनुष्यों और चूहों से प्राप्त टी-कोशिकाओं (एक प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका) का संपर्क कृत्रिम स्वीटनर से करवाकर जांच की। उन्होंने पाया कि सुक्रेलोज़ ने टी-कोशिकाओं की प्रतिलिपि बनाने और विशिष्टिकरण की क्षमता को कम कर दिया था।

इसके बाद चूहों को सुक्रेलोज़ की निर्धारित अधिकतम सुरक्षित मात्रा दी गई। इन सभी चूहों में पहले से ही कोई संक्रमण या ट्यूमर था जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली की सक्रियता को आंका जा सकता था। पाया गया कि कंट्रोल समूह के चूहों की तुलना में सुक्रेलोज़ का सेवन करने वाले चूहों में टी-कोशिका प्रतिक्रिया कमज़ोर रही। सुक्रेलोज़ देना बंद करने पर उनकी टी-कोशिका प्रतिक्रियाएं बहाल होने लगीं।    

हालांकि सुक्रेलोज़ की कम खुराक का परीक्षण नहीं किया लेकिन लगता है कि खुराक कम करने पर प्रभाव जाता रहेगा। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि स्वीटनर अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रभावित नहीं करता। एक पिछले अध्ययन में यह भी बताया गया था कि सुक्रेलोज़ कोशिका झिल्ली की तरलता को प्रभावित करता है जिससे टी-कोशिकाओं की परस्पर संवाद क्षमता प्रभावित हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सुक्रेलोज़ का प्रभाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। उनका मत है कि निकट भविष्य में सुक्रेलोज़ का उपयोग ऑटो-इम्यून समस्याओं के इलाज के लिए किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने टाइप-1 मधुमेह से ग्रसित चूहों पर परीक्षण किया। यह एक ऑटो-इम्यून समस्या है जिसमें टी-कोशिकाएं इंसुलिन निर्माता पैंक्रियास कोशिकाओं पर हमला करती हैं। लगभग 30 सप्ताह बाद स्वीटनर दिए गए मात्र एक-तिहाई चूहों में मधुमेह विकसित हुआ जबकि सामान्य पानी पीने वाले सारे चूहों में मधुमेह विकसित हो गया। मनुष्यों में यदि ऐसा ही प्रभाव देखा जाता है तो इसका उपयोग अन्य प्रतिरक्षा दमन करने वाली औषधियों के साथ करके उनकी खुराक कम की जा सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

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रोगाणुओं के अध्ययन की उच्च-सुरक्षा प्रयोगशालाओं में वृद्धि

पिछले कुछ वर्षों में घातक रोगाणुओं का अध्ययन करने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। ऐसे में इबोला और निपाह जैसे जानलेवा रोगाणुओं के लैब से लीक होने या दुरूपयोग का जोखिम बढ़ गया है। ग्लोबल बायोलैब्स प्रोजेक्ट की संस्थापक किंग्स कॉलेज लंदन की जैव सुरक्षा विशेषज्ञ फिलिपा लेंटज़ोस ने बढ़ते जोखिम पर चिंता व्यक्त की है। सबसे अधिक जैव-सुरक्षा प्रयोगशालाएं अकेले युरोप में हैं जिनमें से तीन-चैथाई तो शहरी क्षेत्रों में हैं।

ग्लोबल बायोलैब्स रिपोर्ट 2023 के अनुसार विश्व स्तर पर 27 देशों में 51 बीएसएल-4 प्रयोगशालाएं हैं। इन सभी प्रयोगशालाओं में उच्च स्तरीय सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है। एक दशक पूर्व इन प्रयोगशालाओं की संख्या लगभग आधी थी। बीएसएल-4 प्रयोगशालाएं 2001 में एंथ्रेक्स और 2003 में सार्स के प्रकोप के बाद स्थापित की गई थीं। तीन-चौथाई बीएसएल-4 प्रयोगशालाओं का शहरी क्षेत्रों में होने का मतलब है कि ये एक बड़ी आबादी के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। निकट भविष्य में 18 नई बीएसएल-4 प्रयोगशालाएं शुरू होने की संभावना है जो अधिकांशत: भारत, फिलीपींस वगैरह अधिकांश एशियाई देशों में होंगी। इस रिपोर्ट में 57 बीएसएल-3 प्लस अन्य प्रयोगशालाओं का भी ज़िक्र है जिनमें बीएसएल-3 से अधिक सुरक्षा उपायों का पालन किया जाता है। इनमें से अधिकांश युरोप में हैं जहां एच5एन1 इन्फ्लुएंज़ा जैसे रोगाणुओं का अध्ययन किया जा रहा है। एशिया में भी कई ऐसी प्रयोगशालाएं हैं जहां खतरनाक रोगाणुओं का अध्ययन किया जा रहा है। हालिया सार्स-कोव-2 के बाद से तो बीएसएल-4 प्रयोगशालाओं में काफी तेज़ी से वृद्धि हुई है और ऐसी संभावना है कि जल्द ही यह संख्या दुगनी हो जाएगी। ऐसे में वायरस के प्रयोगशाला से लीक होने की आशंका बनी रहती है।

गौरतलब है कि कई देशों में बीएसएल-4 प्रयोगशालाओं की निगरानी के लिए पर्याप्त नीतियों और तरीकों का हमेशा से अभाव रहा है। केवल कनाडा ही एक ऐसा देश है जहां रोगाणुओं पर होने वाले गैर-सरकारी अनुसंधान की निगरानी के लिए भी कानून बनाए गए हैं। इनमें विशेष रूप से उन प्रयोगों को शामिल किया गया है जिनके दोहरे उपयोग की संभावना हो सकती है। उक्त रिपोर्ट में आग्रह किया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सशक्त मार्गदर्शन और बाहरी विशेषज्ञों द्वारा ऑडिट के लिए सभी देशों की सहमति बनवाने की ज़रूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रयोगशालाएं अंतर्राष्ट्रीय मानकों को पूरा करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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नई मच्छरदानी दोहरी सुरक्षा देगी

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने नए कीटनाशक मिश्रण से उपचारित मच्छरदानी के उपयोग का अनुमोदन किया है। इस नई मच्छरदानी में ऐसे दो रसायनों का उपयोग किया गया है जो मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को अधिक प्रभावी ढंग से खत्म करने में सक्षम हैं। जल्दी ही यह उपचारित मच्छरदानी उप-सहारा अफ्रीका में व्यापक रूप से उपलब्ध हो जाएगी जहां पिछले वर्ष मलेरिया से 6 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

कीटनाशक उपचारित मच्छरदानी का डबल फायदा है। इसके अंदर सोता व्यक्ति तो सुरक्षित रहता ही है, इस पर बैठने वाले मच्छरों का भी खात्मा हो जाता है। 2000 से 2015 के बीच मलेरिया के प्रकोप में 40 प्रतिशत गिरावट का श्रेय उपचारित मच्छरदानियों को जाता है।

लेकिन मच्छर इनमें प्रयुक्त पाएरेथ्रॉइड नामक कीटनाशक के प्रतिरोधी हो चले थे। नई अनुमोदित मच्छरदानी में पाएरेथ्रॉइड के साथ क्लोरफेनापिर का उपयोग किया गया है। क्लोरफेनापिर मच्छरों के माइटोकॉन्ड्रिया को निशाना बनाता है जिसके चलते मांसपेशियों में मरोड़ पैदा होती है और मच्छर हिलडुल या उड़ नहीं पाते हैं।

वैसे पिछले वर्ष भी WHO ने एक नए प्रकार की मच्छरदानी को सीमित स्वीकृति प्रदान की थी। इस मच्छरदानी में पाएरेथ्रॉइड के साथ पीबीओ का उपयोग किया गया था जो मच्छरों की पाइरेथ्रॉइड का विघटन करने की क्षमता को खत्म करता है। ये केवल-पाइरेथ्रॉइड मच्छरदानी की तुलना में काफी महंगी थीं और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि इनके उपयोग से मलेरिया के प्रकोप में कमी से जितना फायदा होता है वह इनकी लागत के हिसाब से कम है।

क्लोरफेनापिर ने इस समस्या को दूर कर दिया है। तंज़ानिया और बेनिन में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि नई मच्छरदानियों के उपयोग से बच्चों में मलेरिया का प्रकोप लगभग आधा रह गया। अर्थात इन मच्छरदानी के उपयोग में होना वाला खर्च मलेरिया उपचार की लागत से काफी कम साबित हुआ जो WHO द्वारा अनुमोदन के लिए पर्याप्त कारण था।                  

गौरतलब है कि क्लोरफेनापिर का उपयोग सबसे पहले अमेरिका में वर्ष 2001 में गैर-खाद्य फसलों के लिए ग्रीनहाउसों में किया गया था। पक्षियों और जलीय जीवों में विषाक्तता के कारण खेतों पर इसके छिड़काव पर प्रतिबंध है। चूंकि इस मच्छरदानी का उपयोग घर के अंदर किया जा रहा है और व्यापक पर्यावरण से इसका सीमित संपर्क है इसलिए पर्यावरण की दृष्टि से इसे सुरक्षित माना जा रहा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी है कि देर सबेर मच्छरों में क्लोरफेनापिर के खिलाफ भी प्रतिरोध उभरना तय है। इसलिए प्रतिरोध पैदा होने की रफ्तार को धीमा करने की तकनीकें विकसित करना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए नई मच्छरदानियों के साथ-साथ घरों में अंदर कीटनाशक छिड़काव या कुछ वर्षों के लिए पाइरेथ्रॉइड-पीबीओ मच्छरदानियों का उपयोग भी करते रहना ठीक होगा। (स्रोत फीचर्स)

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रसोई गैस का विकल्प तलाशने की आवश्यकता – अली खान

पको यह जानकर हैरानी होगी कि रसोई गैस हमारी सेहत के लिए बेहद जोखिमभरी है। यह बात ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स युनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में सामने आई है। आज अधिकतर घरों में लोग खाना पकाने के लिए एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अब एलपीजी गैस का विकल्प तलाशने का समय आ गया है।

अब तक यही कहा जाता था कि कोयला और लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर इनसे निकलने वाला धुआं सांस सम्बंधी बीमारियों को न्यौता है। इसके बनिस्बत एलपीजी धुआं नहीं छोड़ती और हवा को प्रदूषित नहीं करती है। लेकिन अध्ययन के अनुसार एलपीजी गैस पर भी खाना बनाना न सिर्फ हमारी सेहत के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है।

जब हम गैस जलाते हैं तो ज़हरीले यौगिक बनते हैं तथा नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर ज़हरीले नाइट्रोजन ऑक्साइड बनते हैं। इससे दमा व अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा ये रक्तप्रवाह में भी मिल सकते हैं। जो हृदय रोग, कैंसर और अल्ज़ाइमर वगैरह का खतरा पैदा कर सकते हैं।

जब हम गैस चूल्हा जलाते हैं तो असल में हम जीवाश्म ईंधन ही जला रहे होते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और फारमेल्डीहाइड भी बन सकते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड के उत्सर्जन से हवा में ऑक्सीजन कम होती है और खून में भी ऑक्सीजन नष्ट होती है। इससे हमें सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

रसोई गैस हमारी सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह है। इसका अंदाज़ा इससे बखूबी लगाया जा सकता है कि एंवायरमेंट साइंस एंड टेक्नॉलॉजी जर्नल में छपे अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका में बच्चों में दमा के 12.7 फीसदी मामले, यानी हर आठ में से एक मामले में वजह रसोई गैस से हुआ उत्सर्जन है। वहीं, 2022 में हुए एक अध्ययन में कहा गया था कि अमेरिका में रसोई गैस से कुल जितना कार्बन उत्सर्जन होता है वह पांच लाख कारों से होने वाले उत्सर्जन के बराबर है।

भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश है। यहां 2021 तक करीब 28 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे। इनमें हर साल 15 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, 2040 तक एलपीजी उपभोग बढ़कर 4.06 करोड़ टन हो जाएगा। बता दें कि भारत में एलपीजी में प्रोपेन गैस का प्रयोग होता है। इसके जलने से खतरनाक बेंज़ीन गैस निकलती है। लिहाज़ा, हमें ऐसे विकल्प तलाशने की ज़रूरत है जो अधिक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हूबहू जुड़वां के फिंगरप्रिंट अलग-अलग क्यों?

फिंगरप्रिंट, नाम तो सुना ही होगा। मनुष्यों और पेड़ों पर चढ़ने वाले कुछ जंतुओं की उंगलियों के सिरों पर जो धारियां पाई जाती हैं, उन्हीं के विन्यास को फिंगरप्रिंट कहते हैं। ये फिंगरप्रिंट किसी चीज़ पर पकड़ को बेहतर बनाते हैं और चीज़ों के चिकने-खुरदरेपन को भांपने में भी मदद करते हैं।

यह तो आम जानकारी है कि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट एक समान नहीं होते। लेकिन यह बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि हूबहू एक-समान जुड़वां व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट भी अलग-अलग होते हैं। तो ऐसा क्यों है? सवाल का जवाब इस सवाल में छिपा है कि फिंगरप्रिंट बनते कैसे हैं।

एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि तीन प्रकार के संकेतक अणु और उंगलियों की आकृतियों में और त्वचा की वृद्धि में बारीक अंतर मिलकर इस विशिष्ट पैटर्न को पैदा करते हैं।

फिंगरप्रिंट का निर्माण भ्रूणावस्था में काफी जल्दी (गर्भ ठहरने के करीब तेरहवें हफ्ते में) शुरू हो जाता है। सबसे पहले उंगली के सिरे पर धसानें बनती हैं। ये धसानें ही आगे चलकर तीन मुख्य पैटर्न का रूप ले लेती हैं – चक्र, शंख, और मेहराब।

वैज्ञानिकों ने कई जीन्स की पहचान की है जो पैटर्न निर्माण को प्रभावित करते हैं। लेकिन यह रहस्य ही रहा है कि ये जीन किसी तरह की जैव-रासायनिक क्रियाओं के ज़रिए इस पैटर्न का निर्धारण करते हैं। और अब इसे समझने की कोशिश में एडिनबरा विश्वविद्यालय के डेनिस हेडन ने मनुष्य की भ्रूणीय उंगली के सिरों की कोशिकाओं के केंद्रकों में उपस्थित आरएनए का अनुक्रमण किया है। वे जानना चाहते थे कि विकास के दौरान वहां कौन-से जीन्स अभिव्यक्त होते हैं। इन जीन्स ने तीन संकेत क्रियापथ उजागर किए। संकेत क्रियापथ उन प्रोटीन्स को कहते हैं जो कोशिकाओं के बीच निर्देशों को लाते-ले जाते हैं। ये तीन क्रियापथ उंगली के छोरों पर त्वचा के विकास का निर्धारण करते हैं।

इनमें से दो संकेत क्रियापथों के लिए ज़िम्मेदार जीन्स – WNT और BMP – विकसित हो रहे उंगली के सिरों पर एकांतर पट्टियों में अभिव्यक्त होते हैं। यही पट्टियां अंतत: धसान और उभार में तबदील हो जाती हैं। तीसरा क्रियापथ – EDAR – विकासमान धसानों में बाकी दो के साथ ही अभिव्यक्त होता है।

उपरोक्त जानकारी तो मानव ऊतकों के अध्ययन से मिली थी। गौरतलब है कि ये ऊतक स्वेच्छा से गर्भपात किए गए भ्रूणों से प्राप्त किए गए थे। लेकिन वैज्ञानिक इस जानकारी की पुष्टि किसी जंतु मॉडल पर करना चाहते थे।

चूहों में भी उंगली के छोरों पर धारियों का सरल पैटर्न पाया जाता है। जब वैज्ञानिकों ने संकेत क्रियापथों का कृत्रिम रूप से दमन किया तो पता चला कि WNT और BMP क्रियापथ परस्पर विपरीत ढंग से काम करते हैं। WNT क्रियापथ कोशिका वृद्धि को बढ़ावा देता है जिसके चलते त्वचा की ऊपरी परत में उभार बनते हैं। दूसरी ओर, BMP कोशिका वृद्धि को रोकता है और इसकी वजह से नालियां बन जाती हैं। तो तीसरा क्रियापथ EDAR क्या करता है? यह क्रियापथ उभारों की साइज़ और उनके बीच की दूरी का निर्धारण करता है।

जब शोधकर्ताओं ने WNT क्रियापथ का दमन कर दिया तो उन चूहों की उंगलियों पर उभार बने ही नहीं जबकि BMP क्रियापथ को दबाने से उभार अधिक चौड़े बने। और जब EDAR को ठप कर दिया गया तो उभार व नालियां तो बनी लेकिन पट्टियों के रूप में नहीं बल्कि थेगलों के रूप में।

तो सवाल वहीं का वहीं है। हूबहू समान जुड़वां में तो जीन्स एक जैसे होते हैं। फिर पैटर्न अलग-अलग क्यों। इस संदर्भ में ट्यूरिंग पैटर्न को समझना ज़रूरी है। उक्त शोध के प्रमुख हेडन का कहना है कि परस्पर व्याप्त (ओवरलैपिंग), अलग-अलग रासायनिक क्रियाएं पेचीदा पैटर्न पैदा करती हैं। इन्हें ट्यूरिग पैटर्न कहते हैं – ऐसे पैटर्न प्रकृति में कई जगह देखने को मिलते हैं। जैसे बाघ के फर पर अलग-अलग रंग की पट्टियां, चीतों के शरीर पर धब्बे वगैरह। फिंगरप्रिंट के पैटर्न भी ट्यूरिंग पैटर्न हैं। गौरतलब है कि इन पैटर्न्स के बनने की क्रियाविधि का प्रस्ताव मशहूर कंप्यूटर वैज्ञानिक एलन ट्यूरिंग द्वारा दिया गया था।

लेकिन फिंगरप्रिंट में एक पेंच और है। हेडन की टीम ने पाया कि धारियों के विशिष्ट पैटर्न उंगलियों के आकारों में बारीक अंतरों पर भी निर्भर करते हैं। मानव भ्रूण के उतकों में उन्होंने देखा कि प्राथमिक उभार तीन स्थलों पर बनना शुरू होते हैं। भ्रूणीय उंगली की उभरी हुई मुलायम गद्दी के केंद्र में, उंगली के नाखून के नीचे वाले सिरे पर और उंगली के जोड़ पर। धारियां इन तीन स्थलों से बाहर की ओर तरंगों के रूप में फैलती हैं। हर धारी अपने से अगली धारी की स्थिति निर्धारित कर देती है।

आगे सब कुछ उंगली की रचना पर निर्भर करता है। यदि गद्दियां चौड़ी और सममित हैं और धारियां वहां पहले बनने लगें तो चक्र प्रकट होता है। लेकिन यदि गद्दियां लंबी और असममित हों, तो शंख बनेगा। तीसरी स्थिति यह हो सकती है कि गद्दी पर धारियां न बनें या देर से बनना शुरू हों तो नाखून वाले सिरे और जोड़ के किनारे से धारियां बढ़ते-बढ़ते गद्दी के मध्य में आकर मिलेंगी और मेहराब का निर्माण हो जाएगा।

फिंगरप्रिंट निर्माण का अध्ययन करते-करते शोधकर्ताओं ने पाया कि यही तीन रासायनिक संकेत – WNT, BMP, EDAR – शरीर के शेष भागों की त्वचा पर विभिन्न रचनाएं बनाने के लिए ज़िम्मेदार हैं, जिनमें बाल वगैरह भी शामिल हैं। (स्रोत फीचर्स) (स्रोत फीचर्स)

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कृषि/पशुपालन में एंटीबायोटिक्स का उपयोग

क अनुमान के मुताबिक 2020 से 2030 के बीच कृषि में एंटीबायोटिक औषधियों का उपयोग 8 प्रतिशत बढ़ जाएगा जबकि इसे कम करने के उपाय जारी हैं। कृषि में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल मनुष्यों को संक्रमित करने वाले बैक्टीरिया में प्रतिरोध पैदा होने का एक प्रमुख कारण माना जाता है।

यह सही है कि पशुओं में संक्रमण के उपचार के लिए एंटीबायोटिक आवश्यक हैं लेकिन देखा जा रहा है कि इनका उपयोग पशुओं की वृद्धि को तेज़ करने तथा भीड़-भाड़ वाले और अस्वच्छ दड़बों में उन्हें संक्रामक रोगों से बचाने के लिए भी किया जाता है।

इस संदर्भ में कई देशों में सरकारों ने एंटीबायोटिक उपयोग को कम करने के लिए नियम भी बनाए हैं। जैसे यूएस व युरोप में वृद्धि को गति देने के लिए एंटीबायोटिक का उपयोग वर्जित है लेकिन दिक्कत यह है कि कंपनियां इन्हें बीमारियों की रोकथाम के लिए बेचती रह सकती हैं।

शोधकर्ताओं के लिए अलग-अलग देशों में कृषि सम्बंधी एंटीबायोटिक उपयोग का अनुमान लगाना मुश्किल रहा है क्योंकि अधिकांश देश ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं करते हैं। कई देश अपने आंकड़े विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) को देते हैं। यह संगठन इन आंकड़ों को महाद्वीप के स्तर तक जोड़ देता है। इसके अलावा, 40 प्रतिशत देश तो इस संगठन को भी आंकड़े नहीं देते।

लिहाज़ा 229 देशों के राष्ट्र-स्तरीय अनुमान लगाने के लिए स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के थॉमस फान बेकेल, रान्या मूलचंदानी व अन्य ने अलग-अलग सरकारों, खेत सर्वेक्षणों और वैज्ञानिक प्रकाशनों से आंकड़े जुटाए। इन आंकड़ों के साथ उन्होंने दुनिया भर के खेतिहर पशुओं की संख्या को रखा और 42 देशों के एंटीबोयोटिक बिक्री के आंकड़ों को रखा। इसके आधार पर उन्होंने शेष 187 देशों के आंकड़ों की गणना की।

टीम की गणना बताती है कि अफ्रीका में एंटीबायोटिक का उपयोग WOAH द्वारा दी गई रिपोर्ट से दुगना है और एशिया में 50 प्रतिशत अधिक है। कुल मिलाकर अध्ययन दल का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक दुनिया भर में प्रति वर्ष पशुओं के लिए 1 लाख 7 हज़ार 5 सौ टन एंटीबायोटिक्स का उपयोग होगा जबकि 2020 में यह आंकड़ा 1 लाख टन से कम था।

वैसे शोधकर्ताओं ने चेताया है कि जो 42 देश अपने आंकड़े साझा करते हैं, उनमें से अधिकांश उच्च आमदनी वाले देश हैं। लिहाज़ा उनके द्वारा एंटीबायोटिक का उपयोग तथा उपयोग का मकसद दुनिया के सारे देशों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।

पिछले नवंबर में सूक्ष्मजीवी प्रतिरोध को लेकर 39 देशों का एक सम्मेलन ओमान (मस्कट) में आयोजित किया गया था। इसमें रूस और भारत जैसे प्रमुख कृषि उत्पादक शामिल थे। मंत्री स्तर के इस सम्मेलन में उपस्थित देशों ने संकल्प लिया कि वर्ष 2030 तक वे सूक्ष्मजीव-रोधी दवाइयों का खेतिहर उपयोग 30-50 प्रतिशत तक कम करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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पक्षी भी योजना बनाते हैं

इंडोनेशिया में पाया जाने वाला एक तोता है तनिम्बार कोरेला जिसे गोफिन्स कॉकेटू भी कहते हैं (जीव वैज्ञानिक नाम है Cacatua goffiniana)। एकदम सफेद रंग का यह तोता सचमुच एक कारीगर है। यह अपने पसंदीदा फलों को फोड़कर खाने के लिए तमाम किस्म के औज़ार भी बनाता है। और अब पता चला है कि यह अपने काम की योजना भी बनाता है और उस हिसाब से औज़ार साथ लेकर चलता है। इससे पहले मनुष्य के अलावा मात्र एक और जंतु में ऐसा व्यवहार देखा गया है – कॉन्गो घाटी में चिम्पैंज़ियों की एक आबादी में।

सफेद तोते में यह खोज विएना के पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने इस सफेद तोते को उसके प्रिय भोजन काजू का ललचावा दिया। उन्होंने एक पारदर्शी डिब्बे में एक काजू (साबुत, छिलके सहित) एक प्लेटफॉर्म पर रख दिए। फिर एक पर्दा लगाकर उसे ओझल कर दिया। 10 तोतों को वह डिब्बा दिखाया गया और उन्हें दो में से एक औज़ार चुनने का विकल्प दिया गया – एक छोटी नुकीली छड़ और एक अपेक्षाकृत लंबी लचीली स्ट्रॉ।

15 बार किए गए परीक्षणों में अधिकांश पक्षियों ने दोनों औज़ारों का इस्तेमाल किया। उन्होंने नुकीली छड़ को अपनी चोंच में पकड़ा ओर डिब्बे में उपस्थित एक सुराख में से उसे अंदर डालकर पर्दे में छेद किया। लेकिन वह छड़ छोटी थी और काजू तक नहीं पहुंच सकती थी। तो पक्षियों ने उसे छोड़कर लंबी वाली स्ट्रॉ उठा ली जिसकी मदद से उन्होंने काजू को प्लेटफॉर्म से गिराकर उस ट्रे में लुढ़का दिया जहां से वे उसे पा सकते थे।

अब शोधकर्ता यह देखना चाहते थे कि क्या ये पक्षी समझते हैं कि उन्हें इस काम को अंजाम देने के लिए दोनों औज़ारों की ज़रूरत पड़ेगी। इसके लिए शोधकर्ताओं ने डिब्बे को एक सीढ़ी के ऊपर या एक उठे हुए प्लेटफॉर्म पर रख दिया। अब इस तक पहुंचने के लिए तोतों को वे औज़ार साथ लेकर जाना पड़ता – चाहे तो उड़कर या चाहे तो सीढ़ियां चढ़कर।

तोतों को अपना काम पूरा करने के लिए दो बार सीढ़ी चढ़ना नहीं रास आया। हालांकि कुछ ने ऐसा ही किया लेकिन कई पक्षियों ने अन्य युक्तियां खोज निकालीं। जैसे एक तोते ने जल्दी ही ताड़ लिया कि वह नुकीली छड़ को स्ट्रॉ के अंदर पिरोकर दोनों को एक साथ लेकर जा सकता है और डिब्बे पर पहुंचकर उन्हें वापिस अलग-अलग करके इस्तेमाल कर सकता है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि अंतत: चार पक्षियों ने यह तरीका खोज निकाला। विभिन्न कारणों से अन्य पक्षी कामयाब नहीं रहे।

कुल मिलाकर इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि ये पक्षी भावी कार्य की एक मानसिक छवि बना लेते हैं जिसके बारे में माना जाता था कि ऐसा करना उनके लिए असंभव है। (स्रोत फीचर्स)

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किलर व्हेल पुत्रों की खातिर संतान पैदा करना टालती हैं

किलर व्हेल के पुत्र मां के लाड़ले होते हैं। ये पुत्र काफी बड़े होने के बाद भी मां के पिछलग्गू बने रहते हैं जबकि पुत्रियां बड़ी होकर खुद संतानें पैदा करने लगती हैं। ऐसा क्यों है और किलर व्हेल मांएं इसकी क्या कीमत चुकाती हैं?

यह अवलोकन पहली बार किया गया है। यह तो पता रहा है कि किलर व्हेल मांएं अपने पुत्रों की बढ़िया देखभाल करती हैं लेकिन हाल के अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि मां इसकी क्या कीमत चुकाती हैं।

युनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर और सेंटर फॉर व्हेल रिसर्च के पारिस्थितिकीविद माइकल वाइस ने किलर व्हेल में मां-बेटे के सम्बंध के प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर बताया है कि ये प्राणि दशकों तक जीते हैं लेकिन पूर्ण विकसित नर भी ऐसे व्यवहार करते हैं मानो वे छोटे बच्चे हों।

वाइस जानना चाहते थे कि गहन देखभाल में पल रहे इन बेटों की मां क्या कीमत चुकाती हैं – क्या ये उनकी और संतान पैदा करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं? इसके लिए वाइस के दल ने प्रशांत महासागर के तीन व्हेल समूहों के पिछले 40 वर्षों के आंकड़े खंगाले। इन समूहों को पॉड कहते हैं और इनमें प्राय: दो दर्जन तक सदस्य होते हैं। ये सभी मातृवंशीय होते हैं, साथ-साथ घूमते और शिकार करते हैं।

करंट बायोलॉजी में प्रकाशित शोध के मुताबिक इसका गहरा असर होता है। किसी भी वर्ष में बेटों की मांओं द्वारा एक और संतान पैदा करने की संभावना निसंतान मांओं और सिर्फ बेटियों की मांओं की तुलना में आधी होती है। आश्चर्यजनक बात यह रही कि संभावना में यह गिरावट पुत्रों की उम्र से स्वतंत्र थी। कहने का आशय यह है कि तीन साल का बेटा और 18 साल का बेटा मां की आगे संतानोत्पत्ति की संभावना में बराबर कमी लाता है।

शोधकर्ताओं का मत है कि मां द्वारा बेटों को तरजीह दिया जाना इनकी पॉड संरचना से सम्बंधित है। जब कोई मादा किलर व्हेल बच्चे जनती है और अपनी मां के समूह में बनी रहती है, तो वह और उसके बच्चे भोजन और ध्यान के लिए शेष बच्चों से होड़ करते हैं। दूसरी ओर, बेटे उस पॉड में और खाने वाले नहीं लाते। बेटे तो पास से गुज़रते समूहों की मादाओं के साथ समागम करते हैं जिसके फलस्वरूप बच्चे उन समूहों में पैदा होते हैं। यानी बेटों के बच्चे किसी और की ज़िम्मेदारी होते हैं। शोधकर्ताओं का मत है कि यदि मां चाहती है कि उसके अधिक से अधिक पोते-पोतियां हों तो उसके लिए बेटे में निवेश करना ज़्यादा फायदे का सौदा है।

यह अभी एक परिकल्पना है क्योंकि वाइस की टीम ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि बेटे मां के प्रजनन में व्यवधान कैसे कैसे डालते हैं। लेकिन उन्हें यदि अपने बच्चों की भोजन की ज़रूरतें पूरी करना पड़े तो उनकी प्रजनन क्षमता कमज़ोर पड़ ही जाएगी। वैसे अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि शायद यह मात्र उन पॉड्स की समस्या हो जिनका अवलोकन वाइस ने किया है। एक मत यह भी है कि व्हेल उन चंद प्रजातियों में से है जिनमें रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) होती है। यह भी संभव है कि ये बेटे बड़ा शिकार पकड़ने में मदद करते हों। इस संदर्भ में किलर व्हेल की अन्य प्रजातियों का अध्ययन मददगार होगा। (स्रोत फीचर्स)

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