भारत की आनुवंशिक विविधता पर सबसे बड़ा अध्ययन

भारत (India) ने अपनी आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। GenomeIndia Project के तहत वैज्ञानिकों ने देश के लोगों में लाखों ऐसे आनुवंशिक बदलाव खोजे हैं, जिनकी जानकारी पहले दुनिया के बड़े वैज्ञानिक डैटाबेस (Database) में मौजूद नहीं थी। इसके लिए 83 अलग-अलग आबादियों के लगभग 9800 स्वस्थ लोगों के पूरे जीनोम का अध्ययन किया गया और करीब 4.4 करोड़ नए आनुवंशिक बदलाव पहचाने गए।

शोध से पता चलता है कि अब तक दुनिया के अधिकतर आनुवंशिक अध्ययन युरोपीय मूल के लोगों पर आधारित थे, जिनमें भारतीय और दक्षिण एशियाई (South Asian) आबादी को कम महत्व मिला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में बीमारियों की पहचान, लोगों की वंशावली समझने, व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा और दवाइयों के असर सम्बंधी बेहतर समझ बनाने में मददगार होगी।

इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिक इतने बड़े स्तर पर नए आनुवंशिक बदलाव देखकर हैरान रह गए। बहुत दुर्लभ बदलावों को हटाने के बाद भी कुल बदलावों में से 10 प्रतिशत से ज़्यादा ऐसे थे, जो पहले किसी वैज्ञानिक डैटाबेस में दर्ज नहीं थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की आनुवंशिक विविधता का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। इसकी वजह देश में हज़ारों अलग-अलग समुदायों (communities) का लंबे समय तक अलग-अलग रहना, प्रवासन और अपने ही सामाजिक समूहों में विवाह करना है।

भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से वित्तीय सहायता प्राप्त इस परियोजना में देश भर के 20 शोध संस्थानों ने मिलकर काम किया है। अभी करीब 10,000 लोगों के जीनोम (Genome) का अध्ययन किया गया है, लेकिन भविष्य में इसे बढ़ाकर 10 लाख जीनोम तक ले जाने की योजना है, जिसमें अलग-अलग बीमारियों से जुड़े समूह भी शामिल होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना बड़ा डैटा बेस भारतीय लोगों के लिए अधिक सटीक चिकित्सा प्रणाली (Perfect Medical System) बनाने में मदद करेगा।

अध्ययन में सबसे खास बात कुछ अलग-थलग रहने वाले आदिवासी समुदायों (Tribal Communities) से जुड़ी थी। इन समुदायों में आनुवंशिक एकरूपता (Gentic Uniformity) बहुत ज़्यादा पाई गई, जिसे होमोज़ायगोसिटी (Homozygosity) कहते हैं। जब छोटे समुदायों में पीढ़ियों तक अंदर ही अंदर ही विवाह होते रहते हैं, तो कुछ हानिकारक जीन ज़्यादा सामान्य हो सकते हैं, क्योंकि बच्चों को माता-पिता दोनों से एक जैसे खराब जीन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

शोध में पाया गया कि 29 में से 27 आदिवासी समूहों में बीमारी पैदा करने वाले आनुवंशिक बदलाव महत्वपूर्ण स्तर पर मौजूद थे। दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय में वैज्ञानिकों ने HGD जीन में एक हानिकारक बदलाव खोजा, जो अल्केप्टोनयूरिया ((Alkaptonuria) नाम की दुर्लभ बीमारी से जुड़ा है। यह बीमारी शरीर के जोड़ों और अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है। खास बात यह थी कि यह बदलाव अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिक डैटाबेस में मौजूद नहीं था; यानी सामान्य जांच में यह बीमारी आसानी से छूट सकती थी।

वैज्ञानिकों ने 7000 से ज़्यादा जीन्स में 15,000 से अधिक ऐसे आनुवंशिक बदलाव (Gentic Changes) भी खोजे, जो कुछ जीन्स की गतिविधि को मंद या बंद कर सकते हैं। इनमें से कुछ बदलाव बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि कुछ, शरीर को कुछ बीमारियों से बचाने में मदद भी कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इनमें से कुछ खोजों का उपयोग नई RNA आधारित चिकित्सा (RNA based Treatment) विकसित करने में किया जा सकता है, जो खराब जीन के असर को ठीक करने की कोशिश करती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज के रूप में इस्तेमाल करने से पहले अभी और प्रयोगशाला परीक्षणों की ज़रूरत है।

अध्ययन में यह भी पता चला कि भारतीय लोगों पर दवाओं का असर अलग-अलग हो सकता है। एक ऐसा आनुवंशिक बदलाव मिला, जो एनेस्थीसिया (निश्चेतन) के दौरान होने वाली जटिलताओं से जुड़ा है और पहले की सोच से कहीं अधिक लोगों में पाया गया। पहले माना जाता था कि यह सिर्फ एक खास समुदाय तक सीमित है, लेकिन नए अध्ययन में यह कई अलग-अलग समूहों में मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इससे बेहोशी की दवाएं देने के तरीके में बदलाव आ  सकता है।

वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक बदलाव भी खोजे, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद (Depression), दर्द, कैंसर (Cancer) और खून से जुड़ी बीमारियों की दवाओं का किस तरह इस्तेमाल करता है। कुछ आदिवासी समुदायों में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति में ऐसे बदलाव पाए गए, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद-रोधी या तेज़ दर्द निवारक दवाओं को कैसे प्रोसेस करता है। भविष्य में ऐसी जानकारी डॉक्टरों को अलग-अलग लोगों के लिए ज़्यादा सुरक्षित और असरदार इलाज चुनने में मदद कर सकती है।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में जीन के आधार पर इलाज तय करने वाली सटीक चिकित्सा अभी शुरुआती चरण में है। दवाओं पर जीन के असर को समझने वाले परीक्षण मौजूद तो हैं, लेकिन अभी इतने सबूत नहीं हैं कि डॉक्टर हर इलाज का फैसला पूरी तरह इन पर भरोसा करके कर सकें, खासकर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़ी दवाओं में। इसे अस्पतालों में नियमित रूप से इस्तेमाल करने से पहले और बड़े क्लीनिकल अध्ययनों की ज़रूरत होगी।

इस शोध से यह भी पता चला कि अभी इस्तेमाल होने वाले आनुवंशिक जोखिम अनुमान मॉडल भारतीय लोगों के लिए पूरी तरह सही नहीं हैं। ज़्यादातर मॉडल युरोपीय आबादी के डैटा पर आधारित हैं, इसलिए वे भारतीय समुदायों पर ठीक से काम नहीं करते। इसी वजह से GenomeIndia टीम ने भारतीय लोगों के लिए एक नया संदर्भ डैटाबेस तैयार किया है, ताकि आनुवंशिक जानकारी को ज़्यादा सही तरीके से समझा जा सके।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी बड़ी खोज के बावजूद मानव जीनोम (Human Genome) का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। अभी तक का शोध मुख्य रूप से उन जीन्स पर केंद्रित रहा है, जो प्रोटीन बनाते हैं, जबकि वे पूरे डीएनए का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा हैं। बाकी 98 प्रतिशत हिस्सा, जिसे डार्क जीनोम (Drak Genome) कहा जाता है, जीन्स को नियंत्रित करने और कई बीमारियों से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव छिपाए हो सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर इस हिस्से को बेहतर तरीके से समझ लिया जाए, तो GenomeIndia Project सिर्फ जीन बदलावों की सूची न रहकर भविष्य में व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा का शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। फिलहाल यह परियोजना भारत की आनुवंशिक विविधता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वास्थ्य: मात्र सुविधाओं, व्यवस्थाओं से आगे

ग्लोरजियो विंस्टन गौड़ा

रवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।

मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।

ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।

हम अक्सरसमुदायआधारित तरीकोंके बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।

ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी

ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।

यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।

स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।

मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।

फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।

मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।

अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।

हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।

प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।

भौगोलिक परिस्थितियां

कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।

मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार  आंगनवाड़ी  कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।

मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”

यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।

मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।

बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।

इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्हें ध्यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमकदमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।

ज़मीनी स्तर पर कार्य

गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।

मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सौर तूफानों पर नज़र रखेगा SMILE मिशन

यूरोप और चीन एक संयुक्त मिशन शुरू कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की चुंबकीय ढाल (Magnetic field) को बेहतर तरीके से समझना है। स्माइल (SMILE) नामक अंतरिक्ष यान (spacecraft) यह अध्ययन करेगा कि सूर्य से आने वाले खतरनाक विकिरण (solar radiation) से पृथ्वी की ,सुरक्षा कैसे होती है। उम्मीद है कि इससे उपग्रहों, संचार व्यवस्था, जीपीएस और बिजली नेटवर्क का बेहतर संचालन संभव हो सकेगा।

पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) है। यह सूर्य से आने वाले अधिकांश आवेशित कणों को रोक देता है। लेकिन जब सूर्य पर बड़े विस्फोट – जैसे सौर तूफान – होते हैं, तो यह सुरक्षा ढाल प्रभावित हो सकती है और उपग्रहों, जीपीएस (GPS), रेडियो संचार (Radio communication) और बिजली व्यवस्था (Electricity) में गड़बड़ी पैदा हो सकती है।

वैज्ञानिक कई दशकों से अंतरिक्ष यानों की मदद से मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere) का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन अब तक वे सिर्फ छोटे-छोटे हिस्सों को ही देख पाते थे। SMILE मिशन सूर्य और पृथ्वी के बीच होने वाली पूरी प्रक्रिया की बड़ी तस्वीर दिखाएगा।

यह अंतरिक्ष यान एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमेगा और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से लगभग 1,21,000 किलोमीटर दूर तक जाएगा। वहां से इसका एक्स-रे कैमरा मैग्नेटोस्फीयर के उस हिस्से को देखेगा, जो सूर्य की तरफ होता है। सूर्य से आने वाले कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से टकराकर एक्स-रे (X-Ray) उत्सर्जित करते हैं। इस उत्सर्जन के अवलोकन की मदद से समझा जा सकेगा कि पृथ्वी की चुंबकीय ढाल का आकार कैसे बदल रहा है।

उम्मीद है कि इस मिशन से सौर तूफानों की बेहतर समझ और अंतरिक्ष मौसम (space weather) की ज़्यादा सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी। यह जानकारी उपग्रह (satellite), संचार नेटवर्क और बिजली व्यवस्था जैसी तकनीकी प्रणालियों को सौर तूफानों से होने वाले नुकसान से बचाने में मददगार होगी।

यह मिशन ध्रुवीय ज्योति (ऑरोरा) (aurora) का भी अध्ययन करेगा। ये तब बनती हैं जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण मैग्नेटोस्फीयर के ज़रिए ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचकर गैस अणुओं (Gseous Atoms) से टकराकर रोशनी पैदा करते हैं। अधिकांश रोशनी अल्ट्रावायलेट (Ultraviolet) होती है, जिसे इंसानी आंखें नहीं देख सकतीं। SMILE का खास कैमरा इन अदृश्य गतिविधियों को देखकर यह समझने में मदद करेगा कि सौर कण पृथ्वी के वायुमंडल (atmosphere) में कैसे प्रवेश करते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों तरह की जानकारी को साथ मिलाकर यह बेहतर समझा जा सकेगा कि सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण में कैसे यात्रा करती है। इससे अंतरिक्ष मौसम से जुड़े कई सवालों के जवाब मिलने के अलावा, पृथ्वी की चुंबकीय सुरक्षा प्रणाली को बेहतर समझने में और तकनीक पर निर्भर दुनिया को सौर तूफानों (solar storms) के खतरों से बचाव को बेहतर बनाने में  भी मदद मिलेगी।

एक और खास बात है कि यह मिशन युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और चायनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ का पहला संयुक्त मिशन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान में देशों के बीच सहयोग और मज़बूत हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सुपर एल नीनो की संभावनाएं

हा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।

मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।

सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।

यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।

एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।

इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।

एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।

युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।

एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बाढ़ और सूखे का कारण है एल नीनो

दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।

एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।

एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में  बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।

दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एल नीनो

सुशील जोशी

ने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?

एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।

परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।

यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।

इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।

दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही  मौसम की भविष्यवाणी। 

इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।

ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।

एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया। 

1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।

इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)

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नर्मदा की लड़ाई के वरिष्ठ साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे

र्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ लेखक, शोधकर्ता और पर्यावरण चिंतक रमेश बिल्लौरे का रविवार 10 मई के दिन दोपहर इंदौर में निधन हो गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने उन्हें नर्मदा संघर्ष का ‘चलता-फिरता दस्तावेज’, ‘घुमक्कड़ बुद्धिजीवी’ और ‘नर्मदा का सच्चा पुत्र’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

रमेश बिल्लौरे नर्मदा घाटी के सवालों पर उस दौर से काम कर रहे थे, जब नर्मदा बचाओ आंदोलन औपचारिक रूप से आकार भी नहीं ले पाया था। बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों को लेकर उन्होंने शुरुआती दौर में ही गंभीर अध्ययन शुरू कर दिया था और लगातार सवाल उठाए। बाद में यही चिंतन नर्मदा संघर्ष की वैचारिक ज़मीन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

बांधों की राजनीति और विकास के मॉडल पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत मानी जाती है पुस्तक डेमिंग दी नर्मदा: इंडियाज़ ग्रेटेस्‍ट प्‍लांड डिसास्‍टर जिसे उन्होंने पर्यावरण चिंतक क्‍लॉड अल्‍वारिस के साथ मिलकर तैयार किया था। 1988 में प्रकाशित यह अध्ययन नर्मदा परियोजना की शुरुआती तथ्यपरक आलोचनाओं में गिना जाता है। इसे नर्मदा आंदोलन के शुरुआती दस्तावेज़ों में एक महत्वपूर्ण कृति माना गया है।

रमेश बिल्लौरे का नर्मदा से रिश्ता केवल विचार या आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह जीवन का रिश्ता था। नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथी बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नर्मदा घाटी, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण न्याय और जनसंघर्षों के सवालों को समर्पित कर दी।

वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे; वे अनेक विषयों के गंभीर अध्येता, लेखक और संवेदनशील साहित्यकर्मी भी थे। बांधों, विकास और विस्थापन पर उन्होंने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे। सामाजिक प्रश्नों के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, लोकजीवन और राजनीति पर भी उनकी पकड़ थी।

रमेश बिल्लौरे की पहचान एक घुमक्कड़, आत्मीय और बेहद जीवंत इंसान के रूप में थी। उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था—दोस्तों के घर, आंदोलन के मोर्चे, गांवों की चौपालें और संघर्ष के मैदान ही उनका घर थे। वे छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं और जीवन के अनुभवों को इतने रोचक अंदाज़ में सुनाते थे कि कठिन संघर्षों के बीच भी हंसी और ऊर्जा का माहौल बन जाता था। (स्रोत फीचर्स)

पीछे मुड़कर देखा जो मैंने
फुरसत के समय
पीछे मुड़कर जो देखा
हुआ अवाक्
देख वह राह
चला जिस पर
हुआ विस्मय
देख उन मोड़ों को
मुड़ा जिन पर
लगा जैसे मैं देख रहा जो
पीछे मुड़ वो मेरी नहीं
किसी और की थी ज़िन्दगी
जो बीत गयी
जिसमें सब कुछ
अनियोजित
अव्यवस्थित
अनिश्चित!
हर बार जब मैं चौराहे पर ठहरा
तय करने के लिए कि
आगे जाना किधर
जाने-अनजाने
मैंने वही राह ली जो औरों ने नहीं ली
जो थी अपरिचित
मगर मुझे ज़रा भी नहीं हुआ अफ़सोस इस पर
आखिर अनजानी ही सही
मैं पहुंचा वहीं
जहां मुझे जाना था
और देख पाया तो कुल मिलाकर खूबसूरत ही रहा सफ़र!
रमेश बिल्लौरे
(29 सितंबर 2005)

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भारत के मेडिकल कॉलेजों में कमज़ोर होती समग्र देखभाल

रॉयसन डिसूज़ा

85 साल के एक बुज़ुर्ग को उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) के लिए गांव के एक द्वितीयक (सेकंडरी) स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। कथित तौर पर आत्महत्या के इरादे से कीटनाशक खाने के बाद उनके बाएं हाथ में गैंग्रीन (रक्त संचार रुकने से ऊतकों का मरना) हो गया था। वे ऐसे क्षेत्र के रहवासी हैं जहां बहुतायत में हाथी पाए जाते हैं और उनके यहां से नज़दीकी तृतीयक (टर्शियरी) स्वास्थ्य केंद्र 5 घंटे की दूरी पर है।

चूंकि आत्महत्या के मामलों को मेडिको-लीगल केस माना जाता है और स्वास्थ्य कार्यकर्ता इनमें हाथ डालने से घबराते हैं, इसलिए उन्हें एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से दूसरे उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया जाता रहा; अंत में उन्हें मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। तब तक कीटनाशक उनके शरीर में फैलकर अवशोषित हो चुका था, और उसके बुरे असर की शुरुआत हो चुकी थी। इस वजह से उन्हें गहन देखभाल इकाई (ICU) में रखने की ज़रूरत पड़ी।

इलाज के दौरान, उनके बाएं हाथ में खून पहुंचाने वाली एक मुख्य धमनी में रक्त का थक्का जम गया था, जिसकी वजह से उन्हें बहुत दर्द हो रहा था और हाथ का रंग बदल गया था। इस स्थिति को तुरंत संभाला गया और थक्का हटाने के लिए सर्जरी की गई। हालांकि, हाथ को जो नुकसान पहले ही हो चुका था उसे ठीक नहीं किया जा सकता था, और इससे हाथ में पूरी तरह से गैंग्रीन हो गया था। वे मेडिकल कॉलेज में कुछ और दिन भर्ती रहे, इस दौरान कई विभागों से उनके लिए परामर्श लेकर टेस्ट करवाए गए और फिर उन्हें मेडिकल कॉलेज से छुट्टी देकर रुलर पैलिएटिव केयर सेंटर में भेज दिया गया।

जब इस मरीज़ की देखभाल कर रहे डॉक्टरों ने सर्जिकल परामर्श के लिए मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि शायद गैंग्रीन के बारे में बात करने हेतु किया होगा। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि यह संपर्क उस दर्द के लिए था जिसकी शिकायत मरीज़ अपने गुदा नाल (एनल कैनाल) में कर रहा था। मरीज़ को देखने और उसकी जांच करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेडिकल कॉलेज ने मुख्य समस्या पर तो ध्यान ही नहीं दिया था और इससे मरीज़ की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी और बाकी सभी जटिलताएं हुई थीं। मरीज़ ने कीटनाशक इसलिए खाया था क्योंकि उसे गुदा नाल में बहुत ज़्यादा दर्द और रक्तस्राव हो रहा था। जितने दिन वे भर्ती रहे किसी ने इस बारे में पूछने का सोचा तक नहीं। बस एक साधारण सी गुदा (रेक्टल) जांच से पता चल गया कि इसका असली कारण रेक्टल कैंसर था जो बहुत बढ़ चुका था और जिससे बहुत ज़्यादा दर्द और मल त्यागने में दिक्कत हो रही थी।

इस हादसे ने मुझे एक अत्यंत परेशानीजनक सवाल पर सोचने को मजबूर कर दिया कि हमारे मेडिकल संस्थानों में ‘समग्र देखभाल’ (कॉम्प्रिहेंसिव केयर) से हमारा क्या मतलब है – खासकर मेडिकल कॉलेज, जिन्हें गर्व होता है कि वे समग्र देखभाल और उपचार देते हैं।

समग्र देखभाल का महत्व

लंबे समय से भारत में मेडिकल कॉलेजों को हर मुमकिन चिकित्सकीय अवस्था की समग्र/तफसील से पड़ताल और प्रबंधन का केंद्र माना जाता रहा है। ये हर उस मरीज़ के लिए एक भरोसेमंद आखरी सहारा/उम्मीद होते हैं जिन्हें अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों द्वारा (जब मामला उनके वश में नहीं रहता तब) यहां रेफर किया गया होता है।

मेडिकल कॉलेज में, मरीज़ को अलग-अलग स्तर के कई डॉक्टर देखते हैं। यह अक्सर मरीज़ के लिए परेशानी का सबब होता है, क्योंकि उसे एक ही जानकारी कई बार देनी पड़ती है और हरेक के हिसाब से जांच करानी पड़ती है। जिस मेडिकल कॉलेज में मैंने ट्रेनिंग ली, वहां अगर किसी मरीज़ का कोई (पूर्व) नियोजित ऑपरेशन होना होता था तो उसकी कम से कम पांच स्तरों पर जांच होती थी – पहले बाह्य मरीज़ क्लिनिक में प्रशिक्षु/कंसल्टेंट द्वारा, उसके बाद इंटर्न, जूनियर रेसिडेंट, सीनियर रेसिडेंट, कंसल्टेंट, और आखिर में एडमिशन के बाद यूनिट के हेड द्वारा।

यह व्यवस्था मुख्य रूप से जूनियर डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए बनाई गई थी, लेकिन इससे भी ऊपर यह कारण था कि यह व्यवस्था मरीज़ का सही निदान करने और सबसे सही इलाज देने में एक असरदार प्रक्रिया के तौर पर काम करती है। उदाहरण के लिए, हर्निया के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए एक मरीज़ में आंत के कैंसर का पता इसलिए चला था क्योंकि एक प्रशिक्षु ने उसकी समग्र जांच की थी। वैसे, यह भी आम प्रथा है कि सर्जरी के मरीज़ों की डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, दिल की बीमारी, या थायरॉइड जैसी कई अन्य मेडिकल स्थितियों की (संपूर्ण) जांच हो क्योंकि सर्जरी के समय इन स्थितियों के बारे में पता होना ज़रूरी होता है।

एक और उदाहरण देता हूं। मेरी रेसिडेंसी के दौरान एक मरीज़ को कोलेक्टोमी (कैंसर उपचार के लिए बड़ी आंत का हिस्सा निकालना) के लिए भर्ती किया गया था। इस ऑपरेशन में एक बड़ी दुविधा की स्थिति यह थी कि कहीं कैंसर दूसरे अंगों में फैला न हो। यदि फैल चुका है तो ऐसे में सर्जरी से इलाज/फायदा नहीं होगा। ऐसे में मरीज़ के लिए कीमोथेरेपी सही रहेगी।

कभी-कभी उन्नत किस्म के स्कैन भी लसिका ग्रंथियों जैसे छोटे अंगों में कैंसर के फैलाव को पकड़ नहीं पाते। मरीज़ की जांच की प्रक्रिया में टीम के सबसे जूनियर सदस्य ने लसिका ग्रंथि में कुछ संकेत देखे और कहा कि शायद कैंसर फैल रहा है। यह सही निकला, और मरीज़ को गैर-ज़रूरी सर्जरी से बचा लिया गया और उसे आगे यथोचित इलाज के लिए भेजा गया।

इससे सिर्फ 10 साल आगे चलें तो ऐसा लगता है कि मेडिकल कॉलेजों की समग्र जांच की बात पूरी तरह खत्म हो गई है। मरीज़ को समय देना, उनकी हिस्ट्री (बीमारी और उससे जुड़ी अन्य जानकारियां) लेना और जांच करना निहायत ज़रूरी है, जिसे कम करके नहीं आंका जा सकता। कई तरह के परीक्षण और स्कैन आ जाने के बावजूद, मरीज़ की हालत पता लगाने में एक अच्छी हिस्ट्री और जांच-पड़ताल करना बहुत ज़रूरी होता है।

शुरुआती उदाहरण में, अगर मरीज़ की पूरी हिस्ट्री ली गई होती, तो कोई भी यह बता देता कि उसकी समस्या मल त्यागने से जुड़ी थी, जिसमें रेक्टल जांच करनी पड़ती और बीमारी आसानी से पता चल जाती। मरीज़ को कई अलग-अलग विशेषज्ञ विभागों ने देखा, लेकिन किसी ने भी सबसे ज़रूरी बात जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि असल में उसने अपनी जान लेने जैसा इतना बड़ा कदम उठाया क्यों?

हाल के दिनों में क्या बदला

मौजूदा चिकित्सा शिक्षा तंत्र लगातार जांच के दायरे में रहा है। (अधिक जानने के लिए निवारण की वेबसाइट पर ‘The Pathophysiology of Declining Medical Education in India/भारत में घटती मेडिकल शिक्षा की पैथोफिज़ियोलॉजी’ लेख पढ़ें – https://nivarana.org/reality-check/the-pathophysiology-of-declining-medical-education-in-india)

कई कारण हैं जिनमें से एक पर आम तौर पर बहस होती है: क्लीनिकल पोस्टिंग के दौरान मरीज़ों के साथ तफसील से समय बिताने पर ज़ोर न होना। एमबीबीएस के पाठ्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों पर केंद्रित पढ़ाई का है, जिसे क्लीनिक्स कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को मरीज़ों से बात करने, उनकी जांच करने और एक अनुमानित निदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। फिर सीनियर डॉक्टर विद्यार्थियों के साथ मरीज़ के विवरण पर बात करते हैं, उन्हें हिस्ट्री लेने, जांच करने और सही निदान करने के लिए ज़रूरी जांचों का महत्व सिखाते हैं। इस आकलन में एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों से बात करने और उनकी जांच-पड़ताल करने का होता है, और परीक्षण इसका सिर्फ एक सीमित हिस्सा होते हैं।

लेकिन आज की प्रैक्टिस में ऐसा लगता है मरीज़-केंद्रित आकलन/जांच पीछे छूट गई है, और प्रबंधन पूरी तरह से परीक्षण-आधारित हो गया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में, व्यस्त दिनचर्या, ओपीडी और आकस्मिक चिकित्सा विभाग में भीड़भाड़, और बिस्तरों की कमी सर्वांगीण/संपूर्ण निदान (आकलन) को मुश्किल बना देती है, और अक्सर मरीज़ों के लक्षण नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। इसके विपरीत, प्राइवेट अस्पताल सबसे गैर-ज़रूरी लक्षणों को बहुत अधिक तवज्जो देते हैं जिससे मरीज़ों को बेवजह बड़ी-बड़ी जांचें और सर्जरी करवानी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, एक बिलकुल स्वस्थ अधेड़ आदमी फुंसी (फोड़ा) के साथ एक प्राइवेट क्लीनिक जाता है। सर्जन उसे बताता है कि यह जानलेवा हो सकता है और उसे तुरंत भर्ती करके, ऑपरेशन से इसे हटाने की ज़रूरत है। इसके बाद कुछ और दिनों तक भर्ती रहना होगा क्योंकि एंटीबायोटिक्स और ड्रेसिंग करने की ज़रूरत होगी।

सिस्टम में लापरवाह सरकारी स्वास्थ्य तंत्र और अति-सतर्क निजी स्वास्थ्य तंत्र के बीच सही संतुलन की कमी है।

एमबीबीएस पाठ्यक्रम मरीज़-केंद्रित होना चाहिए, न कि NEET सुपर स्पेशिलिटी-केंद्रित। युवा डॉक्टरों को मरीज़ों के टेस्ट-परीक्षण-स्कैन जैसी जांचों को कराने के लिए आतुर होने की बजाय उनका सर्वांगीण आकलन करने और ‘उनकी बात सुनने’ का महत्व सिखाया जाना चाहिए। आज मरीज़ों की सबसे आम शिकायत यह है कि डॉक्टर उनकी बात नहीं सुनते, या उन्हें बोलने का मौका नहीं देते। अक्सर, डॉक्टर की 80 प्रतिशत बातचीत मरीज़ की स्वास्थ्य रिपोर्टों को दिखाने वाली कंप्यूटर स्क्रीन को देखते हुए होती है। मरीज़ अभी भी एक और सिर्फ एक चीज़ चाहते हैं कि एक सहृदय/हमदर्द डॉक्टर उनका इलाज करे।

फैमिली डॉक्टर की कमी

30 या उससे ज़्यादा उम्र के ज़्यादातर लोग ऐसे डॉक्टर के आस-पास बड़े हुए हैं जो हमारी स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखते थे – जिन्हें हम अपना ‘फैमिली डॉक्टर’ कहते थे। वायरल बुखार, फूड पॉइज़निंग, डायरिया, पेट दर्द, त्वचा के संक्रमण, सिरदर्द, गैस्ट्राइटिस, या सीने में दर्द – ऐसा लगता था कि उनके पास सभी इलाज हैं। बहुत लंबे समय तक मुझे नहीं पता था कि हमारे फैमिली डॉक्टर असल में एक त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं, क्योंकि वे हर एक मेडिकल स्थिति को बहुत अच्छी तरह से जानते थे और उनमें से ज़्यादातर का इलाज कर सकते थे। ट्रेनिंग का मकसद डॉक्टरों को हर काम/इलाज का जानकार बनाना है, भले ही वे किसी एक के विशेषज्ञ न हों।

एक मरीज़ का कई विभागों में, कई परामर्श सत्रों से गुज़रना और फिर भी मुख्य तकलीफ पता न चलना, एक नाकाम तंत्र का द्योतक है। हमारे जैसे देश में, फैमिली डॉक्टर एक अहम कड़ी है – आम बीमारियों को संभालने और स्पेशलिटी क्लीनिक और टर्शियरी केयर में रुकावट को कम करने के बीच।

इससे टेंशन वाले सामान्य सिरदर्द के लिए न्यूरोसर्जन, आम गैस्ट्राइटिस और फूड पॉइज़निंग को संभालने के लिए मेडिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, और छोटे-मोटे यूरीन इंफेक्शन को संभालने के लिए यूरोलॉजिस्ट की ज़रूरत कम हो जाएगी। लगभग हर एमबीबीएस सुपर स्पेशलिटी और सब-स्पेशलिटी की तलाश में है, इसलिए देश में जल्द ही ऐसे ऑलराउंडर की कमी महसूस होने लगेगी जो मरीज़ों के लक्षणों का पता लगा सकें, ज़्यादातर बीमारियों का इलाज कर सकें, और ज़रूरी मामलों को विशेषज्ञ के पास भेज सकें।

भारत में अभी पारिवारिक चिकित्सा का पोस्टग्रेजुएट कोर्स होता है, लेकिन होना तो यह चाहिए कि मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करके निकलने वाला हर डॉक्टर एक काबिल पारिवारिक चिकित्सक हो। पारिवारिक चिकित्सा में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा जैसे कोर्स को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो मरीज़ों पर ध्यान देने को अहमियत देते हैं। रूरल सेंसिटाइज़ेशन प्रोग्राम, रूरल हेल्थ फेलोशिप, ट्रैवल फेलोशिप और NIRMAN जैसे मौकों को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाया जाना चाहिए ताकि युवा डॉक्टरों को समाज में ज़्यादा बड़ी और सार्थक भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

समग्र देखभाल की बहाली

यदि मेडिकल कॉलेजों में ‘समग्र देखभाल’ के विचार को फिर से हासिल करना है, तो इसका हल ज़्यादा प्रोटोकॉल, ज़्यादा स्कैन या ज़्यादा सब-स्पेशलिटीज़ में नहीं हो सकता। इसकी शुरुआत क्लीनिकल मेडिसिन – मरीज़ की हिस्ट्री लेना, शारीरिक जांच करना और सतत देखभाल – की प्राथमिकता को एक ऐसी ज़रूरी काबिलियत के तौर पर फिर से स्थापित करने से होनी चाहिए, जिस पर कोई समझौता न हो।

सबसे पहले, चिकित्सा शिक्षा को इस तरह से डिज़ाइन किया जाना चाहिए कि मरीज़ों के साथ बिताए गए समय को महत्व दिया जाए। क्लीनिकल पोस्टिंग को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित होने से बचाया जाना चाहिए। बेडसाइड टीचिंग, देखरेख में हिस्ट्री लेना और संपूर्ण शारीरिक जांच को उतनी ही गंभीरता से परखा जाना चाहिए, जितना प्रवेश परीक्षा और परीक्षा के अंकों को जांचा जाता है। ज़ाहिर है, जिस चीज़ का मूल्यांकन नहीं होता, उसकी कभी कद्र नहीं होती।

दूसरा, मेडिकल कॉलेजों को सिर्फ प्रक्रियाओं के नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारी की सही पहचान (नैदानिक पूर्णता) के लिए भी जवाबदेह होना चाहिए। अगर कोई मरीज़ बिना किसी एक पक्की पहचान/निदान हुए कई विभागों से गुज़रता है, तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए – इसे सिर्फ ‘जटिलता’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। नियमित रूप से अलग-अलग विभागों के बीच ऑडिट और बातचीत होनी चाहिए, जिसमें यह पूछा जाए कि क्या छूटा, क्यों छूटा और पहला सवाल पूछने की ज़िम्मेदारी किसकी थी – इससे उपरोक्त गलतियों को दोबारा होने से रोका जा सकता है।

तीसरा, पारिवारिक चिकित्सा और जनरल डॉक्टर की ट्रेनिंग को केंद्र में रखा जाना चाहिए, न कि हाशिए पर। हर एमबीबीएस ग्रेजुएट को मेडिकल कॉलेज से इतना काबिल होकर निकलना चाहिए कि वह एक सक्षम फैमिली डॉक्टर के तौर पर काम कर सके – जो मरीज़ की बात सुन सके, जांच कर सके, प्राथमिकताओं को तय कर सके और ज़रूरत पड़ने पर सही जगह रेफर कर सके। पारिवारिक चिकित्सा के रास्तों, ग्रामीण फेलोशिप और समुदाय-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम को बढ़ाना और मान्यता देना, स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत बनाने का एक अहम हिस्सा है।

चौथा, स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों को उस कानूनी डर से बचाना चाहिए, जिसकी वजह से वे देखभाल करने की बजाय मरीज़ों को दूसरे डॉक्टरों के पास भेज देते हैं। आत्महत्या की कोशिशों, पैलिएटिव देखभाल के मामलों और जटिल सामाजिक स्थितियों में कानूनी डर की बजाय नैतिक साहस की ज़रूरत होती है। कानूनी ढांचों और संस्थागत नेतृत्व को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि मरीज़ की देखभाल करना, उसे दूसरे डॉक्टर के पास भेजने से ज़्यादा सुरक्षित लगे।

आखिर में, हमें एक कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा: टेक्नॉलॉजी ने सोचने-समझने की क्षमता की जगह ले ली है। टेस्ट-स्कैन जैसी जांच-पड़ताल हमेशा क्लीनिकल तर्क के आधार पर होनी चाहिए – न कि उसकी जगह ले लेनी चाहिए। गुदा की जांच कोई महंगी नहीं है, इसमें किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती, फिर भी यह एक बुज़ुर्ग को अपना हाथ, अपनी गरिमा और अपनी बची हुई ज़िंदगी खोने से बचा सकती थी। किसी मेडिकल कॉलेज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसमें कितने विभाग हैं या उसके कितने आईसीयू कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से होती है कि जब कोई मरीज़ वहां आता है, तो क्या वह कॉलेज सबसे बुनियादी सवाल का जवाब दे पाता है: “समस्या क्या है?” और “अभी आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या है?” जब तक हम ऐसी व्यवस्थाएं फिर से नहीं बनाते जो इस सवाल को पूछने की अनुमति दें और इसकी मांग भी करें तब तक ‘संपूर्ण देखभाल’ अस्पताल की दीवारों पर लिखा एक खोखला वादा ही बनकर रह जाएगा, जो मरीज़ के लिए कभी पूरा नहीं होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु सम्बंधित निर्णयों में वैज्ञानिकों की भूमिका

हाल ही में सान्टा मार्टा में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में 50 से अधिक देश शामिल हुए। यह एक अलग तरह का जलवायु सम्मेलन था, जिसमें फैसलों में वैज्ञानिकों को ज़्यादा महत्व दिया गया, न कि सिर्फ राजनीति को। Transitioning Away from Fossil Fuels नाम का यह सम्मेलन इस ओर इशारा करता है कि कुछ देश अब प्रदूषण कम करने के नए तरीके अपनाना चाहते हैं।

आम तौर पर COP30 जैसी बैठकों में वैज्ञानिकों की बात राजनीतिक चर्चाओं के बीच कमज़ोर पड़ जाती है। लेकिन इस बैठक में वैज्ञानिकों को सीधे निर्णय लेने वालों से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसी दौरान एक समूह बनाया गया, जो सरकारों को स्वतंत्र और वैज्ञानिक स्तर पर सलाह देगा, ताकि वे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सकें।

पूर्व में आयोजित वैश्विक बैठकों में कई तेल उत्पादक देशों ने जीवाश्म ईंधन को कम करने के स्पष्ट कदमों का विरोध किया, जिससे निराशा बढ़ी। इसी वजह से कोलंबिया और नीदरलैंड जैसे देशों ने एक अलग बैठक आयोजित की, जिसमें सिर्फ उन्हीं देशों को बुलाया गया जो बदलाव के लिए तैयार थे।

इस बैठक में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट और काम करने लायक सुझाव दिए। यह रिपोर्ट लंबी-चौड़ी बातों की बजाय सीधे लागू होने वाली नीतियों पर केंद्रित थी। इसमें मुख्य सुझाव थे—नए फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाना, इन पर मिलने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना, और सौर व पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।

इस प्रक्रिया में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सम्मेलन को एक खास मौका बताया, जहां वे सीधे उन नीति-निर्माताओं से बात कर सके जो वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर फैसले लेना चाहते हैं। उनका मानना है कि इस तरीके से ज़्यादा साफ और असरदार नीतियां बन सकती हैं, क्योंकि इसमें वे समझौते कम होते हैं जो अक्सर अंतर्राष्ट्रीय संधियों को कमज़ोर कर देते हैं।

इस सम्मेलन की अहमियत सिर्फ इसके सुझावों में ही नहीं, बल्कि इसके तरीके में भी है। इसमें विज्ञान को प्राथमिकता दी गई, जो ऐसे समय में ज़रूरी है जब दुनिया में प्रदूषण अभी भी काफी अधिक है। भले ही इसमें कम देश शामिल हुए, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर आगे चलकर बड़े पैमाने पर दिख सकता है। इस बैठक से यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि मज़बूत वैज्ञानिक समझ भी ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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