जब हम खतरनाक जीवों की बात करते हैं तो आम तौर पर शेर, सांप या शार्क का नाम आता है। लेकिन असली खतरा तो एक छोटे-से मच्छर (mosquito) से है – एडीज़एजिप्टी (Aedes aegypti)। इसे येलो फीवर मच्छर (yellow fever mosquito) भी कहते हैं। यह बेहद छोटा कीट डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका और पीत ज्वर जैसी 50 से अधिक बीमारियां फैला सकता है। आज भी लगभग चार अरब लोगों पर इन बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है।
शुरुआत में यह मच्छर अफ्रीकी जंगलों में पाया जाता था। वहां यह प्राकृतिक जलस्रोतों (water sources) में प्रजनन और अलग-अलग जीवों पर रक्तभोज करता था। लेकिन जैसे ही यह अफ्रीका से बाहर फैला, इसकी आदतें बदल गईं। अब यह शहरों और गांवों में पुराने टायर, प्लास्टिक की बाल्टियों और घरों के पास जमा पानी में पनपने लगा और सबसे खतरनाक बदलाव यह हुआ कि इसने लगभग पूरी तरह इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया। यही वजह है कि यह आज घातक बीमारियों का सबसे बड़ा वाहक (vector) बन गया है। वैज्ञानिक इस प्रजाति को दो किस्मों में बांटते हैं: Aedes aegypti formosus – अफ्रीकी जंगलों में पाया जाने वाला मच्छर, जो अलग-अलग जीवों का खून पीता है। Aedes aegypti aegypti – शहरों में पनपने वाला मच्छर, जो लगभग केवल इंसानों को काटता है। भले ही इन दोनों की आदतों और जीन्स में अंतर हैं, लेकिन ये आपस में प्रजनन कर सकते हैं।
गौरतलब है कि 5000 वर्ष पूर्व जब सहारा मरुस्थल फैलने लगा और पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे तो इंसानों ने बर्तनों और कंटेनरों (containers) में पानी जमा करना शुरू किया। ऐसे में कुछ मच्छर इन कृत्रिम जलस्रोतों में पनपने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने इंसानों का खून पीना पसंद किया।
सदियों बाद, गुलामों को अफ्रीका से अमेरिका भेजे जाने वाले जहाज़ों (slave ships) पर चुपके से लदकर ये मच्छर अमेरिका पहुंच गए। यहीं से उनके वैश्विक फैलाव की शुरुआत हुई। लेकिन वैज्ञानिक लंबे समय तक यह नहीं समझ पाए कि ये मच्छर इंसानों के लिए पहले से अनुकूलित थे या फिर अमेरिका पहुंचने के बाद उनमें नए गुण विकसित हुए।
इस रहस्य को समझने के लिए 9 देशों के वैज्ञानिकों ने विश्व के 73 स्थानों से 1206 मच्छरों के जीनोम का अध्ययन (genome study) किया। साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में एडीज़एजिप्टी मच्छर के फैलाव और उसमें आए परिवर्तनों पर चर्चा की गई है।
अध्ययन से प्राप्त नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। अर्जेंटीना में मिले मच्छरों का जीनोम सेनेगल और अंगोला के मच्छरों के जीनोम से मेल खाता पाया गया। यानी, केवल अटलांटिक सफर ने ही उन्हें नहीं बदला, बल्कि अमेरिका की कठिन परिस्थितियों ने भी उनमें नए बदलाव (genetic changes) पैदा किए। अफ्रीका में उन्हें कई स्थानीय प्रजातियों से मुकाबला करना पड़ता था, लेकिन अमेरिका में उनके लिए जीवित रहने का एकमात्र तरीका इंसानों के पास रहना और उन्हीं पर निर्भर होना था। धीरे-धीरे ये मच्छर लगभग पूरी तरह इंसानों पर निर्भर हो गए।
मच्छरों का यह बदलाव सुनने में मामूली लग सकता है, लेकिन यह एक बड़ी क्रांति थी। सोचिए, एक कीट जो कभी जंगलों में रहता था, अब शहरों की भीड़-भाड़ में पुराने टायरों या प्लास्टिक की बाल्टियों (plastic containers) में पनप रहा है। कुछ छोटे जेनेटिक बदलावों (genetic evolution) ने इनके जीवन और व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। इंसानों के साथ यह नज़दीकी, तेज़ी से बढ़ते शहरों (urbanization) और वैश्विक व्यापार (global trade) ने एडीज़एजिप्टी मच्छरों को फैलने का मौका दिया।
अध्ययन में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया: अमेरिका में कीटनाशकों (insecticides) के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता वाले मच्छर वैश्विक व्यापार के ज़रिए अब वापस अफ्रीका पहुंच गए हैं। और वहां डेंगू व अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ा रहे हैं।
देखा जाए तो एडीज़एजिप्टी की कहानी सिर्फ मच्छर (mosquito species) की कहानी नहीं है। इससे यह सपष्ट होता है कि पर्यावरण, इंसानी आदतों और वैश्विक आवाजाही (human mobility) में छोटे बदलाव कैसे प्रकृति को बदल सकते हैं।(स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zjlk2ba/full/_20250918_on_aedis_mosquito-1758228473107.jpg
आम तौर पर किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिमों (health risks) का अनुमान उसके स्वास्थ्य-सम्बंधी अतीत, वर्तमान जीवनशैली (lifestyle) वगैरह के आधार पर लगाया जाता है। अब वैज्ञानिकों ने Delphi-2M नाम का एक नया एआई टूल तैयार किया है जो इस काम को ज़्यादा विश्वसनीयता और सटीकता अंजाम दे सकता है। यह टूल कैंसर, त्वचा रोग और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी गड़बड़ियों जैसी हज़ार से ज़्यादा बीमारियों का खतरा भांप सकता है।
नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह खोज स्वास्थ्य सेवाओं (healthcare system) में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। अभी तक मौजूद एआई टूल्स (AI tools) केवल किसी एक बीमारी की संभावना बताते हैं, जैसे दिल की बीमारी या कैंसर। पूरी तस्वीर पाने के लिए डॉक्टरों को कई मॉडल इस्तेमाल करने पड़ते हैं। लेकिन Delphi-2M एक ही जगह पर सभी बीमारियों की पूरी जानकारी दे देता है।
यह टूल वैज्ञानिकों ने चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे चैटबॉट्स को चलाने वाले एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल में परिवर्तन कर बनाया है। जहां लार्ज लैंग्वेज मॉडल वाक्य में अगले शब्द का अनुमान लगाता है, वहीं Delphi-2M इंसान के स्वास्थ्य पर आने वाला खतरों (disease prediction) का अनुमान लगाता है। इसमें उम्र, लिंग, बॉडी मॉस इंडेक्स, धूम्रपान व शराब की आदतें, मेडिकल इतिहास और जीवनशैली जैसी जानकारियां डाली जाती हैं।
इस टूल को यूके बायोबैंक (UK Biobank) के चार लाख लोगों के स्वास्थ्य डैटा से प्रशिक्षित किया गया है। इसके परीक्षण में पाया गया कि Delphi-2M के अनुमान एकल बीमारी वाले मौजूदा मॉडलों जितने ही सटीक हैं, बल्कि कई बार उनसे बेहतर भी निकले। यहां तक कि यह एक अन्य उन्नत एआई टूल से भी आगे निकल गया, जो खून में उपस्थित जैविक संकेतकों से बीमारियां पहचानता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ कई बीमारियों का अनुमान लगाने की क्षमता इसे काफी अनोखा बनाती है। यदि यह ब्रिटेन के बाहर अलग-अलग आबादी (global population) में भी सफल होता है तो यह डॉक्टरों को ज़्यादा खतरे में रहने वाले मरीज़ों को पहले ही पहचानने में मदद करेगा। इससे समय पर बचाव, जीवनशैली में सुधार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य योजनाएं (health plans) बनाना आसान हो जाएगा जो लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों से बचा सकती हैं। लेकिन एक स्वाभाविक सा सवाल उठता है। भारत जैसे देश में, जहां बीमारी हो जाने के बाद भी इलाज (treatment access) नहीं मिलता, वहां 10 साल बाद की भविष्यवाणी व्यक्ति को चिंता के अलावा और क्या दे पाएगी?(स्रोतफीचर्स)
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धान (rice crop) विश्व की सबसे महत्वपूर्ण फसल है। अत: बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह भरपूर प्रयास कर रही हैं कि उनके नियंत्रण वाली जीएम (GM crops) व जीन परिवर्तित फसलें चावल में भी चल निकलें। दूसरी ओर, किसानों के हित में यह है कि यहां की देशी विविधता भरी धान की किस्मों को खेतों में उगाया जाए। यह भारत के संदर्भ में तो और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में धान की जैव-विविधता (rice biodiversity) का विशाल भंडार है। इन्हें हमारे पूर्वज किसानों ने एकत्र किया परंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनसे मुनाफा कमाना चाहती हैं।
भारत के विख्यात धान वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया 1960-70 के दशक में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान (Central Rice Research Institute) कटक के निदेशक रहे। यहां उन्होंने देशी विविधता भरी किस्मों पर आधारित महान धान विकास कार्यक्रम तैयार किया था। लेकिन इससे पहले कि वे इसे कार्यान्वित कर पाते विदेशी किस्मों को बाहर से लाद दिया गया व डॉ. रिछारिया को अपना पद छोड़ना पड़ा। फिर भी उनके अति विशिष्ट योगदानों को देखते हुए सरकार ने बार-बार उनका परामर्श लेने की ज़रूरत समझी।
1960-70 के दशक के मध्य में विदेशी सहायता संस्थाओं और अनुसंधान केंद्रों के दबाव में भारतीय सरकार ने चावल की बौनी व रासायनिक खाद का अधिक उपयोग करने वाली किस्मों के प्रसार का निर्णय लिया। इन्हें चावल की ‘अधिक उत्पादक किस्में’ (हाई यील्डिंग वेरायटी – एच.वाय.वी.) (high yielding varieties – HYV) कहा गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इतनी ही या इससे अधिक उत्पादकता देने वाली देशी किस्मों को अधिक उत्पादक किस्मों की सरकारी सूची में सम्मिलित नहीं किया गया, और विदेशी किस्मों को अधिक उत्पादकता का एकमात्र स्रोत मान लिया गया। इन्हें देश के अनेक भागों मे ‘हरित क्रांति किस्में’ (Green Revolution rice) कहा जाता है।
नीचे प्रस्तुत तालिका से स्पष्ट है कि अपेक्षाकृत कम रासायनिक खाद व अन्य खर्च के बावजूद धान उत्पादकता (paddy yield) में वृद्धि दर हरित क्रांति या विदेशी किस्मों के प्रसार से पहले अधिक थी।
विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों की इस विफलता के क्या कारण हैं? फरवरी 1979 में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक में डॉ. रिछारिया की अध्यक्षता में हुई धान प्रजनन के ख्यात विशेषज्ञों की बैठक में इस विफलता के कुछ कारण बताए गए थे – विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों का भारत के अधिकतर धान उत्पादन क्षेत्र के लिए अनुकूल न होना व बीमारियों व कीड़ों आदि के प्रति अधिक संवेदनशील होना। कहा गया कि
“अधिकतर एच.वाय.वी. टी.एन.(1) या आई.आर.(8) से व्युत्पादित है व इस कारण उनमें बौना करने का डी.जी.ओ.वू. जेन का जीन है। इस संकीर्ण आनुवंशिक आधार से भयप्रद एकरूपता उत्पन्न हो गई है, इसी कारण विनाशक जंतुओं (कीट आदि) व बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ी है। प्रसारित की गई अधिकतर किस्में प्रारूपी उच्च भूमि व निम्न भूमि (टिपिकल अपलैंड्स एंड लोलैंड्स), जो देश में कुल चावल क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा है, के लिए अनुकूल नहीं है। इन स्थितियों में सफलता के लिए हमें अपने अनुसंधान कार्यक्रमों व रणनीतियों को पुन:उन्मुख करने की आवश्यकता है।” एक अन्य स्थान पर इसी टास्क फोर्स (task force) ने कहा है, “भारत में जारी की गई विभिन्न धान की किस्मों की वंशावली को सरसरी निगाह से देखने से ही स्पष्ट हो जाता है कि जनन द्रव्य का आधार बहुत संकीर्ण है।”
नई किस्मों की विनाशक जंतुओं (पेस्ट) के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता के विषय में टास्क फोर्स ने कहा है, “एच.वाय.वी. के आगमन से गालमिज, भूरे फुदके (ब्राऊन प्लांटहॉपर), पत्ती मोड़ने वाले कीड़े (लीफ फोल्डर) वोर्ल मैगट जैसे विनाशक कीटों की स्थिति में उल्लेखनीय तब्दीली आई है। चूंकि अब तक जारी की गई अधिकतर एच.वा.वी. मुख्य विनाशक जंतुओं के प्रति संवेदनशील है, 30 से 100 प्रतिशत तक फसल की हानि होने की संभावना रहती है। उत्पादकता को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अंतर्निहित प्रतिरोध (बिल्ट इन रज़िस्टेंस) (built in resistance) वाली किस्मों का विकास अति आवश्यक हो गया है।” किंतु प्रतिरोधक किस्मों के विकास का पिछला रिकार्ड तो कतई उत्साहवर्द्धक नहीं रहा है, जैसा कि टास्क फोर्स ने स्वीकार किया, “कीट प्रतिरोधक प्रजनन कार्यक्रम के परिणाम अभी तक उत्साहपूर्वक नहीं रहे हैं। हालांकि विनाशक जंतुओं की प्रतिरोधी कुछ किस्में जारी की गई हैं लेकिन रत्न के अलावा इनमें से किसी का भी अच्छा प्रसार नहीं हुआ है। रत्न का भी अच्छा प्रसार वेधकों के प्रति इसकी सहनशील प्रकृति के कारण नहीं अपितु इसके अच्छे दाने, तैयार होने की कम अवधि व व्यापक अनुकूलनशीलता के कारण हुआ है।”
“गालमिज के लिए हालांकि बहुत सारे प्रतिरोधक दाता मिले हैं, पर अभी तक देश में जारी की गई अधिकतर प्रतिरोधक किस्में या तो कम उत्पादक हैं अथवा विभिन्न स्थानों पर उगाये जाने पर, प्रतिरोध में एकरूपता नहीं दिखाती हैं। यहां भी ऊंची उत्पादकता (high yeild) व अधिक स्थायी प्रतिरोध के मिलन को प्राप्त नहीं किया जा सका है।”
टास्क फोर्स के इन उद्धरणों में हम इतना ही जोड़ना चाहेंगे कि एच.वाय.वी. की ये समस्यायें अभी तक बनी हुई हैं। इसके साथ यह भी जोड़ देना उचित है कि कम साधनों वाले छोटे किसानों के लिए ये किस्में विशेष रूप से समस्याप्रद है। इन किस्मों के आगमन के बाद धान उत्पादन का अधिक बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत समृद्ध क्षेत्रों व अपेक्षाकृत समृद्ध किसानों के खेतों से प्राप्त होने लगा है, क्षेत्रीय व व्यक्तिगत विषमताएं बढ़ी है।
जब धान के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति (green revolution in india) की विफलता सामने आने लगी और रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिद्ध होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित इस महान कृषि वैज्ञानिक की याद आई। तब वर्ष 1983 में श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने उन्हें धान उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने ऐसी कार्य योजना तैयार की, पर श्रीमती इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद यह दस्तावेज भी उपेक्षित रह गया।
डॉ. रिछारिया की कार्य योजना के शब्दों में, “मुख्य समस्या अनचाही नई चावल किस्मों को जल्दबाज़ी में जारी करना है। हमने देसी ऊंची उत्पादकता की किस्मों को नकार कर बौनी (विदेशी) एच.वाय.वी. किस्मों के आधार पर अपनी रणनीति निर्धारित की। हम सूखे की स्थिति को भी भूल गए, जब इन विदेशी एच.वाय.वी. में उत्पादकता गिरती है। अधिक सिंचाई व पानी में उगाई जाने पर ये किस्में बीमारियों व नाशक जीवों के प्रति संवेदनशील रहती हैं, जिनका नियंत्रण आसान नहीं है व इस कारण भी उत्पादकता घटती है।” निष्कर्ष में डॉ. रिछारिया कहते हैं, कि जब नींव ही कमज़ोर है (विदेशी जनन द्रव्य) तो इस पर बना भवन ढहेगा ही।
योजना में एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है, “धान में विफलता का सबसे महत्वपूर्ण व नज़दीकी कारण किसी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक तौर पर धान की किस्मों का बार-बार (या जल्दी-जल्दी) बदलना है। यह इस कारण है क्योंकि पर्यावरण में पहले के जनन द्रव्य के संदर्भ में जो कृषि पारिस्थितकी संतुलन शताब्दियों तक अनुभवजन्य प्रजनन व चयन की प्राकृतिक प्रक्रिया में बन गया था, वह अस्त-व्यस्त हो जाता है।”
सौभाग्यवश, देसी (indigenous varieties) अधिक उत्पादकता की किस्में, जो स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हैं, देश में उपलब्ध हैं। 1971-74 के दौरान मध्य प्रदेश में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि देसी किस्मों में से 8 प्रतिशत अधिक उत्पादकता की किस्में हैं अथवा उनकी उत्पादकता 3705 किलोग्राम धान प्रति हैक्टर से अधिक है।
इसे ध्यान में रखते हुए एच.वाय.वी. को पुन: परिभाषित करना आवश्यक है, क्योंकि अब तक सरकारी स्तर पर उनकी पहचान विदेशी, बौनी, अधिक रासायनिक खाद की खपत करने वाली किस्मों के संदर्भ में ही की गई है।
अनुसंधान व प्रसार दोनों क्षेत्रों में डॉ. रिछारिया अधिकाधिक विकेंद्रीकरण (decentralized research) को महत्व देते हैं। यह धान के पौधों की अपनी विशिष्टताओं के कारण भी अनिवार्य है। उनके शब्दों में, “करोड़ों को भोजन देने वाले चावल के पौधों की यदि सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बतानी हो तो यह इसकी (भारत व अन्य चावल उत्पादक क्षेत्रों में फैली) हज़ारों किस्मों में ज़ाहिर विविधता है।” अत: उन्होंने धान उगाने वाले पूरे क्षेत्र में ‘अनुकूलन धान केंद्रों’ का एक जाल-सा बिछा देने का सुझाव दिया। “अनुकूलन धान केंद्र अपने क्षेत्र से एकत्र सभी स्थानीय धान की किस्मों के अभिरक्षक होंगे। भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उन्हें अपने प्राकृतिक माहौल में ही जीवित रखा जाएगा।” इन केंद्रों के कार्य ये होंगे : (क) चावल के विकसित जेनेटिक संसाधनों को भविष्य के अध्ययनों के लिए उपलब्ध कराना – इसे इसके मूल रूप में भारत या बाहर के किसी केंद्रीय स्थान पर सुरक्षित रखना तो लगभग असंभव है। इसे इसके मूल रूप में तो किसानों के सहयोग से इसके प्राकृतिक माहौल में ही सुरक्षित रखा जा सकता है।
(ख) युवा किसानों को अपनी आनुवंशिक सम्पदा के मूल्य व महत्व के विषय में शिक्षित/जागरूक करना व उनमें किस्मों का पता लगाने, एकत्र करने के प्रति रुचि जागृत करना।
अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर डॉ. रिछारिया बताते हैं कि धान क्षेत्रों में मुझे ऐसे किसान मिलते ही रहे हैं जो धान की अपनी स्थानीय किस्मों में गहन रुचि लेते हैं व अलग-अलग किस्मों की उपयोगिता, यहां तक कि उसका इतिहास बता सकते है। इन केंद्रों की ज़िम्मेदारी ऐसे चुने हुए, प्रतिबद्ध किसानों को सौंपी जाएगी। हज़ारों किस्मों की पहचान करने, उन्हें सुरक्षित रखने की उनकी जन्मजात प्रतिभा का लाभ वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाना चाहिए।
ऊपर बताए गए रास्ते को अपनाने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि डॉ. रिछारिया ने यह चेतावनी भी दी थी कि जिस तरह विदेशी बौनी किस्मों (foreign rice hybrids) को फैलाने व स्थानीय किस्मों को गायब करने के प्रयास चल रहे है उसके चलते शायद हमारी यह विरासत भी भविष्य में हमें उपलब्ध न रहे। (स्रोतफीचर्स)
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कार्मेलो विकारियो एवं उनके साथियों ने फ्रंटियर्सइनसाइकोलॉजी पत्रिका (Frontiers in Psychology) के जुलाई 2025 के अंक में एक शोधपत्र प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था ‘Timing Matters! Academic assessment changes throughout the day’ (समय मायने रखता है! शैक्षणिक मूल्यांकन दिन भर बदलता रहता है)।
इस अध्ययन में उन्होंने संपूर्ण इटली के 1,04,552 विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन का विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो कहता है कि परीक्षा का समय मायने रखता है। अध्ययन में पाया गया कि सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच आयोजित परीक्षाओं के परिणाम (exam results) बहुत अच्छे आए थे, और उनमें मध्यान्ह (12 बजे) के आसपास आयोजित परीक्षाएं सबसे अच्छी रहीं। जबकि सुबह 8 से 9 बजे के बीच और दोपहर 2 से 5 बजे के बीच आयोजित परीक्षाओं के परिणाम खराब रहे।
यानी नतीजों पर इस बात का असर पड़ता है कि महत्वपूर्ण निर्णय दिन के किस समय लिए गए हैं। ग्राफ पर परीक्षा में सफलता दर (success rate) घंटाकार वक्र रेखा के रूप में प्रदर्शित हुई थी, जिसके शिखर पर मध्यान्ह (12 बजे) का समय था। अर्थात, यदि सुबह 11 बजे या दोपहर 1 बजे परीक्षा हो तो उत्तीर्ण होने की संभावना में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन यदि परीक्षा सुबह 8-9 बजे या दोपहर 3-4 बजे ली जाती है तो उत्तीर्ण होने की संभावना अपेक्षाकृत कम हो जाएगी। उत्तीर्ण होने की संभावना सुबह और देर दोपहर में बराबर थी।
इस अध्ययन के एक सह लेखक बोलोग्ना विश्वविद्यालय के प्रोफसर एलेसियो एवेनंती का कहना है कि “इन निष्कर्षों के व्यापक निहितार्थ हैं। ये नतीजे इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि कैसे जैविक लय (biological rhythms) महत्वपूर्ण मूल्यांकन परिणाम (assessment results) को सूक्ष्म रूप से लेकिन काफी प्रभावित कर सकती है जबकि इस बात को अक्सर निर्णय लेने के संदर्भ में अनदेखा कर दिया जाता है।”
हालांकि अध्ययन में इस पैटर्न के पीछे के क्रियाविधि का खुलासा नहीं किया गया है; लेकिन दोपहर के समय उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों की संख्या में अधिकता इस बात के प्रमाण के समान है कि संज्ञानात्मक प्रदर्शन (cognitive performance) सुबह के दौरान बेहतर होने लगता है और दोपहर के दौरान कम होता जाता है। देर-दोपहर में विद्यार्थियों के ऊर्जा स्तर में गिरावट के कारण उनकी एकाग्रता कम हो सकती है, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। प्रोफेसर/शिक्षक भी (जांच के दौरान) निर्णय लेने में थकान का अनुभव कर सकते हैं, जिसके कारण उत्तरों मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है।
वहीं, सुबह के समय में खराब परिणाम क्रोनोटाइप (chronotype) या जैविक घड़ी की विविधता के कारण हो सकते हैं। 20 की उम्र के लोग आम तौर पर रात में जागने वाले होते हैं, जबकि 40 या उससे ज़्यादा उम्र के लोग सुबह जल्दी उठने वाले होते हैं। यानी जब प्रोफेसर/शिक्षक सबसे ज़्यादा चेतन/फुर्तीले हैं तब विद्यार्थी उनींदे से होते हैं: नतीजा होता है संज्ञानात्मक प्रदर्शन में गिरावट।
इटली के मेसिना विश्वविद्यालय के डॉ. विकारियो का सुझाव है कि दिन के समय के प्रभावों (time of day effect) का मुकाबला करने के लिए, विद्यार्थियों को अच्छी नींद लेना चाहिए, दिन के जिस समय वे खुद को सबसे कम ऊर्जावान महसूस करते हैं उस दौरान महत्वपूर्ण परीक्षाओं/साक्षात्कार रखने से बचना चाहिए, परीक्षा से पहले दिमाग को आराम देने जैसी रणनीतियां अपनाना चाहिए; और संस्थानों द्वारा सत्र देर-सुबह शुरू करने या प्रमुख मूल्यांकन देर-सुबह रखने से परिणाम में सुधार हो सकता है।
लेकिन शैक्षणिक प्रदर्शन (student performance) पर दिन के समय के प्रभाव को पूरी तरह से समझने और वाजिब मूल्यांकन सुनिश्चित करने के तरीके विकसित करने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है।
शोध पत्र के वरिष्ठ लेखक मेस्सिना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मासिमो मुच्चियार्डी का कहना है कि अध्ययन में “हम अन्य कारकों को पूरी तरह से शामिल नहीं कर पाए हैं। जैसे हम विद्यार्थियों या परीक्षकों के विस्तृत डैटा (जैसे सोने-जागने की आदतें, तनाव या जैविक लय सम्बंधी जानकारी) (student data) नहीं हासिल कर पाए। यही कारण है कि हम अंतर्निहित तंत्रों को उजागर करने के लिए शारीरिक या व्यवहारिक कारकों को शामिल कर आगे के अध्ययनों का सुझाव देते हैं।”
हालांकि यह शोध इटली में हुआ है, लेकिन इसके निष्कर्ष भारत (India study relevance) में भी भलीभांति लागू हो सकते हैं। भारत में भी कई प्रवेश परीक्षाएं आम तौर पर सुबह और दोपहर के समय में आयोजित की जाती हैं। उदाहरण के लिए, कॉमन युनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET exam) दो स्लॉट में आयोजित किया जाता है – सुबह 9-12 बजे और दोपहर 3-6 बजे। यदि हम उपरोक्त इतालवी अध्ययन को देखें, तो स्लॉट सुबह 9-11 बजे और दोपहर 12-2 बजे के बीच रखना बेहतर परिणाम दे सकता है। (स्रोतफीचर्स)
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यह तो हम जानते हैं कि भाषा (Language), संस्कृति (Culture), अनुभव (Experience) और वर्णांधता (Color Blindness) के चलते विभिन्न लोग रंगों को अलग तरह से देखते-समझते हैं। हरियाली से घिरे परिवेश में रहने वालों के पास शायद हरे की हर छटा के लिए अलग-अलग नाम हों, लेकिन किसी और के पास सभी हरे के लिए सिर्फ एक ही नाम हो – हरा। लेकिन क्या सभी के मस्तिष्क रंगों को अलग-अलग तरह से प्रोसेस करते हैं, या एक ही तरह से?
जर्मनी के ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय में संज्ञान तंत्रिका विज्ञानी (Neuroscientist) एंड्रियास बार्टेल्स और उनके साथी माइकल बैनर्ट यह जानना चाहते थे कि मस्तिष्क के दृष्टि से सम्बंधित हिस्सों में विभिन्न रंग कैसे निरूपित होते हैं, और लोगों के बीच इसमें कितनी एकरूपता है।
इसके लिए उन्होंने 15 प्रतिभागियों को विभिन्न रंग दिखाए और उस समय उनकी मस्तिष्क गतिविधि को फंक्शनल मैग्नेटिक रिज़ोनेन्स इमेज़िंग (fMRI) की मदद से रिकॉर्ड किया। फिर उन्होंने मस्तिष्क गतिविधि का एक नक्शा बनाया, जिसे देखकर अंदाज़ा मिलता था कि प्रत्येक रंग देखने पर मस्तिष्क के कौन से हिस्से सक्रिय होते हैं। इन आंकड़ों से उन्होंने मशीन-लर्निंग मॉडल (Machine Learning Model) को प्रशिक्षित किया, और इसकी मदद से उन्होंने एक अन्य समूह की मस्तिष्क गतिविधि के रिकॉर्ड देखकर अनुमान लगाया कि प्रतिभागियों ने कौन से रंग देखे होंगे।
अधिकांश अनुमान सही निकले। देखा गया कि दृश्य से जुड़े अलग-अलग रंगों को मस्तिष्क के एक ही क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में प्रोसेस किया जाता हैं, और विभिन्न रंगों के लिए अलग-अलग मस्तिष्क कोशिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं। लेकिन मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा और कौन-सी कोशिकाएं किस रंग के लिए सक्रिय होंगी इसके नतीजे सभी प्रतिभागियों में एकसमान थे। अर्थात अलग-अलग लोगों में रंगों की प्रोसेसिंग एक ही तरह से होती है। शोधकर्ताओं ने अपने ये नतीजे जर्नलऑफन्यूरोसाइंस (Journal of Neuroscience) में प्रकाशित किए हैं।
इस अध्ययन से विभिन्न रंगों के प्रोसेसिंग और नामकरण (Color Perception) को देखने का एक नया नज़रिया मिलता है। अलबत्ता पूरी बात समझने के लिए और अध्ययन (Scientific Research) की ज़रूरत होगी। (स्रोतफीचर्स)
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कई वर्षों से वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इंसानी गतिविधियां तूफान (Storms), सूखा (Drought) और ग्रीष्म लहर (Heatwave) जैसी चरम घटनाओं को बढ़ा रही हैं। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में वर्ष 2000 से 2023 के बीच दुनिया भर में दर्ज हुई कई ग्रीष्म लहरों का सीधा सम्बंध बड़ी जीवाश्म ईंधन कंपनियों से पाया गया है।
शोध के अनुसार, इस अवधि की लगभग एक-चौथाई ग्रीष्म लहरें कोयला (Coal), तेल (Oil) और गैस उत्पादन करने वाली बड़ी ऊर्जा कंपनियों के उत्सर्जन से जुड़ी हैं। वैज्ञानिक यान क्विलकाइल का मानना है कि ये बड़े कार्बन उत्सर्जक (Carbon Emitters) न केवल ग्रीष्म लहर की घटनाओं को बढ़ा रहे हैं बल्कि उन्हें और अधिक खतरनाक बना रहे हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि 2000 से 2023 के बीच दर्ज की गई 213 ग्रीष्म लहरों में से एक-चौथाई से ज़्यादा होती ही नहीं यदि मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) न हुआ होता। और भी चौंकाने वाली बात यह है कि इन कंपनियों के उत्सर्जन ने 53 ग्रीष्म लहरों की संभावना को 10,000 गुना तक बढ़ा दिया।
इस अध्ययन की खासियत यह है कि इसने जलवायु आपदाओं (Global Warming) को सीधे कुछ बड़ी कंपनियों से जोड़ा है, जैसे सऊदी अरामको (Saudi Aramco), गज़प्रोम (Gazprom) और भारत-चीन के बड़े कोयला व सीमेंट उत्पादक। ऐसी कुल 180 ‘कार्बन मेजर’ कंपनियों (Carbon Major Companies) को अब तक के लगभग 57 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार पाया गया है। अन्य बड़े प्रदूषकों में सोवियत संघ के पुराने उद्योग, एक्सॉन मोबिल (ExxonMobil), शेवरॉन (Chevron), ईरान की राष्ट्रीय तेल कंपनी, ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) और शेल (Shell) शामिल हैं।
शोधकर्ताओं ने जलवायु मॉडल (Climate Model) का उपयोग करके यह भी बताया है कि दुनिया ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ और बिना कैसी दिखती। इसके बाद उन्होंने कंपनियों के उत्सर्जन को दर्ज ग्रीष्म लहर की घटनाओं से जोड़ा।
कानूनी विशेषज्ञों (Legal Experts) का मानना है कि यह अध्ययन अदालतों में सबूत के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। मसलन, अमेरिका के ओरेगन राज्य (Oregon State) ने 2021 की ग्रीष्म लहर के लिए जीवाश्म ईंधन कंपनियों पर 52 अरब डॉलर का मुकदमा दायर किया है जहां इस तरह के अध्ययन साक्ष्य बन सकते हैं। ऐसे अध्ययन यह दिखाते हैं कि ज़िम्मेदारी को महज ‘सामूहिक दोष’ मानने की बजाय कंपनियों को दोषी (Corporate Accountability) ठहराया जा सकता है।(स्रोतफीचर्स)
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वैज्ञानिकों ने हाल ही में मस्तिष्क (Brain) में एक खास ‘ब्रेन डायल’ (Brain Dial) खोजा है, जो खाने की इच्छा (Food Craving) को जगा या शांत कर सकता है – कम से कम चूहों में। यह छोटा-सा दिमागी हिस्सा जीवों को पेट भरा होने पर भी खाने के लिए मजबूर कर सकता है।
यह ब्रेन डायल मस्तिष्क के बेड न्यूक्लियस ऑफ स्ट्रिआ टर्मिनेलिस (Bed Nucleus of the Stria Terminalis, BNST) नामक हिस्से में पाया गया है। यह हिस्सा शरीर की तंत्रिकाओं से कई तरह की जानकारियां प्राप्त करके उनका समन्वय करता है – जैसे भूख का स्तर (Hunger Level), विशिष्ट पोषक तत्वों की कमी और भोजन के बारे में निर्णय करना कि वह खाने योग्य है या नहीं। यह एक तरह का कंट्रोल सेंटर (Brain Control Center) है, जो भूख, पोषण और स्वाद से जुड़ी जानकारियों से लेकर खाने के व्यवहार को नियंत्रित करता है। पहले वैज्ञानिकों को शक था कि BNST भूख में भूमिका निभाता है, लेकिन सेल पत्रिका (Cell Journal) में प्रकाशित इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यह खाने की आदतों को दोनों दिशाओं में नियंत्रित कर सकता है।
अध्ययन में कोलंबिया युनिवर्सिटी (Columbia University) के तंत्रिका वैज्ञानिक चार्ल्स ज़ुकर की टीम ने चूहों में स्वाद से जुड़े मस्तिष्कीय परिपथों का नक्शा तैयार किया। उन्होंने पाया कि केंद्रीय एमिग्डेला (Amygdala) और हायपोथैलेमस (Hypothalamus) की तंत्रिकाएं मीठा स्वाद पहचानती हैं और सीधे BNST न्यूरॉन्स से जुड़ी होती हैं। जब BNST तंत्रिकाओं को बाधित किया गया तब भूख होते हुए भी चूहों ने मीठा खाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन जब इन्हें सक्रिय किया गया तो पेट भरे चूहों ने सामने आने वाली हर चीज़ खाना शुरू कर दिया जैसे नमक, कड़वी चीज़ें, वसा, पानी, यहां तक कि प्लास्टिक की टिकलियां भी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह शोध इसलिए अहम है क्योंकि इसमें भूख और स्वाद (Hunger and Taste) के असर को अलग-अलग समझकर दिखाया गया है, और यह भी बताया गया है कि दोनों का सम्बंध एक ही दिमागी हिस्से से है।
हालांकि ये प्रयोग चूहों पर हुए हैं, लेकिन इंसानों (Humans) के लिए भी इनके बड़े मायने हो सकते हैं। अगर वैज्ञानिक इस ब्रेन डायल को सुरक्षित रूप से नियंत्रित (Brain Dial Control) करना सीख जाते हैं, तो एक दिन यह मोटापा (Obesity), ज़्यादा खाना और खाने से जुड़ी बीमारियों (Eating Disorders) से निपटने में मदद कर सकता है। बहरहाल, इसे इंसानों पर लागू करने से पहले काफी अध्ययन की ज़रूरत होगी।(स्रोतफीचर्स)
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भारतीय रेल्वे (Indian Railways) ने हाल ही में घोषणा की है कि हाइड्रोजन से चलने वाली एक ट्रेन (Hydrogen Train India) ने सभी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं; यह ट्रेन चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्टरी में विकसित की गई है। यह कदम राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen Mission) की प्रगति का एक अच्छा संकेत है। इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में प्रति वर्ष कम से कम पचास लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करना है, जो 2070 तक देश में शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net Zero Emission) के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
यह ट्रेन जल्द ही हरियाणा में जींद और सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर लंबे मार्ग दौड़ेगी। यह ट्रेन जींद में स्थित 1 मेगावाट के पॉलीमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइज़र (PEM Electrolyzer) द्वारा उत्पादित हाइड्रोजन पर निर्भर है, जहां प्रतिदिन 430 किलोग्राम हाइड्रोजन का उत्पादन होता है। ट्रेन के ईंधन टैंक में हाइड्रोजन भरी जाएगी, ईंधन सेल (Fuel Cell Technology) हाइड्रोजन को बिजली में बदलेगा जिससे ट्रेन की इलेक्ट्रिक मोटरें चलेंगी।
हाइड्रोजन बनाने का सिद्धांत (Hydrogen Production Process) काफी सरल है। विद्युत-अपघटक पानी के अणु को ऑक्सीजन, हाइड्रोजन आयन और इलेक्ट्रॉन में तोड़ता है। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया में ऋणात्मक इलेक्ट्रोड (एनोड – (Anode)) पर आणविक ऑक्सीजन मुक्त होती है, और मुक्त इलेक्ट्रॉन एक बाहरी परिपथ के माध्यम से धनात्मक इलेक्ट्रोड (कैथोड- (Cathode)) तक पहुंचते हैं। कैथोड और एनोड के बीच छन्ने के रूप में एक बहुलक विद्युत अपघटक झिल्ली होती है, जो केवल हाइड्रोजन आयन को कैथोड तक जाने देती है, जहां वे इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलकर हाइड्रोजन अणु बनाते हैं। ये अणु गैस के रूप में ऊपर आते हैं। फिर इस गैस को संपीड़ित करके संग्रहित कर लिया जाता है। छन्ने के तौर पर इस्तेमाल झिल्ली आम तौर पर एक फ्लोरोपॉलीमर, जैसे नैफिऑन (टेफ्लॉन से सम्बंधित) (Nafion Membrane), से बनी होती है। यह झिल्ली विद्युत की उम्दा कुचालक होती है, जो अपने में से इलेक्ट्रॉन्स को गुज़रने नहीं देती। उत्पादित हाइड्रोजन और ऑक्सीजन एकदम अलग-अलग जगह बनते हैं।
हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों (Hydrogen Vehicles) में हाइड्रोजन ईंधन सेल में उपरोक्त अभिक्रिया विपरीत दिशा में होती है। हाइड्रोजन को एनोड तक लाया जाता है, जहां उत्प्रेरक (Catalyst) की उपस्थिति में प्रत्येक हाइड्रोजन अणु टूटकर दो हाइड्रोजन आयन और दो इलेक्ट्रॉन बनाता है। हाइड्रोजन आयन झिल्ली से होकर कैथोड तक जाते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन इस झिल्ली को पार नहीं कर पाते और एक बाहरी परिपथ (External Circuit) के ज़रिए कैथोड तक पहुंचते हैं। कैथोड पर हाइड्रोजन आयन का संपर्क हवा में मौजूद ऑक्सीजन और एनोड तक बाहरी परिपथ के माध्यम से लाए गए इलेक्ट्रॉनों से होता है। इस प्रकार पानी बनता है। बाहरी परिपथ से प्रवाहित इलेक्ट्रॉन विद्युत धारा पैदा करते हैं जो वाहन को शक्ति प्रदान करती है।
ईंधन सेल (Hydrogen Fuel Cell) और विद्युत अपघटक में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक अभिक्रिया स्वतःस्फूर्त होती है। दूसरी ओर, पानी अपने आप इन दो तत्वों में नहीं टूटता। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया को ऊर्जा देने के लिए विद्युत आपूर्ति आवश्यक होती है।
और, हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen Production) बनाने के लिए विद्युत-अपघटक को बिजली नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों से मिलनी चाहिए; जैसे, सौर (Solar Energy) या पवन ऊर्जा (Wind Energy)। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के नए स्रोतों की ज़रूरत होगी। सूक्ष्मजीवों की इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाओं (Microbial Electrolysis Cell) में हाइड्रोजन का उत्पादन करने के रोमांचक प्रयास भी चल रहे हैं। इसमें विद्युत-रासायनिक रूप से सक्रिय सूक्ष्मजीव एनोड पर फलते-फूलते हैं और कृषि अवशेषों, अपशिष्ट जल जैसे कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण करते हैं, और इस प्रक्रिया में उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को एनोड तक पहुंचाया जाता है।
उत्प्रेरक (Hydrogen Catalyst) के तौर पर इसमें प्लैटिनम, इरिडियम जैसे महंगे पदार्थ चाहिए होते हैं। वर्तमान शोध का उद्देश्य महंगे तत्वों को निकल, कोबाल्ट, या लोहे जैसे सस्ते तत्वों से प्रतिस्थापित करना है। सस्ते हाइड्रोजन उत्पादन (Low-cost Hydrogen) के शुरुआती कार्य में जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (J.N.C.A.S.R.) के सी.एन.आर. राव के समूह ने प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के बराबर जल-अपघटन क्षमता वाले निकल-निकल हाइड्रॉक्साइड-ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड डिज़ाइन किए हैं। ऐसे शोध कार्यों को सौर ऊर्जा (Solar Hydrogen) और सूक्ष्मजीव-चालित प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर एक ऐसा ईंधन तैयार किया जा सकता है जो पर्यावरण के अनुकूल भी हो और सस्ता भी। (स्रोतफीचर्स)
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कल्पना कीजिए एक धातु की चादर (metal sheet) की जो मात्र प्रकाश की शक्ति (light energy) से उड़ती जा रही है। कल्पना की उड़ान थोड़ी ज़्यादा ही लगती है लेकिन वैज्ञानिकों ने हथेली की साइज़ की एक छिद्रमय झिल्ली बनाई है जो ऊपरी वायुमंडल (upper atmosphere) में लगातार उड़ती रह सकती है। इसकी उड़ान का राज़ है इसकी दोनों सतहों पर तापमान का अंतर। इसका खुलासा नेचर के हालिया अंक में किया गया है।
दरअसल, हारवर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) के मटेरियल्स इंजीनियर बेन शेफर ऐसे उपकरण की तलाश में थे जो पृथ्वी के वायुमंडल के 50 से 80 किलोमीटर ऊंचाई वाले हिस्से की तहकीकात कर सके। इस परत को मीसोस्फीयर (मध्यमंडल – (mesosphere)) कहते हैं। मीसोस्फीयर में वायुमंडल इतना घना है कि वहां कृत्रिम उपग्रह (artificial satellites) नहीं रह सकते लेकिन इतना घना भी नहीं है कि हवाई जहाज़ उड़ सकें।
कुछ साल पहले पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय (Pennsylvania University) के इंजीनियर आइगॉर बार्गेटिन के दल ने इस समस्या के समाधान के लिए एक विचार प्रस्तुत किया था। इसमें फोटोफोरेसिस (photophoresis) नामक एक भौतिक प्रभाव के उपयोग की बात थी। पोटोफोरेसिस का मतलब होता है प्रकाश-प्रेरित गति (light induced motion)। इसका सबसे बढ़िया प्रदर्शन क्रुक्स रेडियोमीटर (Crookes radiometer) में दिखता है (देखने के लिए: https://en.wikipedia.org/wiki/Crookes_radiometer#/media/File:Radiometer_9965_Nevit.gif)। कांच के एक खोखले गोले में लगभग निर्वात की स्थिति पैदा की जाती है और अंदर एक चकरी लगी होती है, जिसकी चारों भुजाओं पर एक पतली चादर लगी होती है। इनके आसपास प्रकाश के ज़रिए तापमान में फर्क पैदा करने पर चकरी को घुमाने के लिए पर्याप्त बल मिल जाता है। बार्गेटिन ने बताया था कि उन्होंने ऐसे फोटोफोरेटिक उड़ान में समर्थ एक छोटा-सा यंत्र बना लिया है। लेकिन वह बहुत ही छोटा था।
शेफर की टीम ने जो यंत्र (device) बनाया है उसमें एल्युमिनियम ऑक्साइड (aluminium oxide) की दो छिद्रित चादरों को बीच में खूंटे लगाकर आपस में जोड़ दिया गया है। ये दोहरी चादरें एक ओर प्रकाश अवशोषित करती हैं जबकि दूसरी सतह से उसे उत्सर्जित कर देती हैं। इसके चलते तापमान में जो अंतर पैदा होता है वह ऊपरी वायुमंडल में विरल हवा में धाराएं उत्पन्न कर सकता है और यंत्र तैरता रहता है। लगता है कि मीसोस्फीयर इसकी उड़ान (flight experiment) के लिए अनुकूल है; वहां सूर्य की रोशनी पर्याप्त होती है तथा हवा भी एकदम सही मात्रा में है।
अभी तो टीम ने इसे प्रयोगशाला (laboratory test) में मीसोस्फीयर जैसा वातावरण तैयार करके आज़माया है। अभी उनके यंत्र का व्यास करीब 6 से.मी. है। टीम का कहना है कि उनका यंत्र ध्रुवीय अक्षांशों पर तो दिन-रात काम कर सकता है लेकिन भूमध्य रेखा के आसपास सिर्फ दिन में। फिलहाल यह यंत्र मात्र 10 मिलीग्राम का वज़न ढो सकता है। फिर भी बताते हैं कि यह लघु दूरसंचार व्यवस्था (telecommunication system), जलवायु संवेदी यंत्रों और छोटे सौर पैनल (solar panel) के लिए पर्याप्त होगा। हज़ारों ऐसे यंत्र उड़ाए जाएं तो मौसम भविष्यवाणी (weather prediction) में सहायक हो सकते हैं। विचार तो इन्हें मंगल (Mars mission) के अवलोकन के लिए भेजने का भी है। (स्रोतफीचर्स)
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हम मन ही मन कई बातें सोचते हैं लेकिन वे किसी को सुनाई नहीं पड़ती। क्या हो यदि मन की इन बातों को बाहर सुना जा सके? और हाल ही में सेल पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में इसी करिश्मे का उल्लेख किया गया है। इसमें शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क (brain) में लगाए गए इम्प्लांट्स और डैटा विश्लेषण (data analysis) की मदद से चार लोगों की मन की बातों से सम्बंधित तंत्रिका संकेतों को अलग करने की जुगाड़ जमाई है। ये चारों व्यक्ति गति सम्बंधी दिक्कतों से पीड़ित थे जो उनकी बोलने की क्षमता को बाधित कर रही थी। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस (brain computer interface) स्थापित किया जो उनके मन की बातों को वाणी दे सकता है। आप देख ही सकते हैं कि इसकी अपनी समस्याएं हैं – यह तकनीक किसी व्यक्ति के ऐसे विचारों को भी मुखर कर सकती है जो वह मन में ही रखना चाहे।
दरअसल शोध पत्र में इस बात को समझने की कोशिश हुई है कि आंतरिक वाणी (inner speech) कैसे निर्मित होती है। पिछले कुछ दशकों में इंजीनियर्स ऐसे लोगों के लिए कंप्यूटर सिस्टम्स बनाने में सफल हुए हैं जो लकवाग्रस्त (paralyzed) होने की वजह से बोल नहीं पाते। इन सिस्टम्स में यह क्षमता है कि वे मस्तिष्क में चल रही गतिविधियों से शब्द निर्मित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ महीने पहले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक यंत्र प्रस्तुत किया था जो एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS disease) से पीड़ित एक व्यक्ति के दिमाग के मोटर कॉर्टेक्स में लगे इलेक्ट्रोड्स के संकेतों से शब्दों का सटीक व त्वरित पुनर्निर्माण कर सकता था।
इस मशीन को गति देने के लिए उस व्यक्ति को अपने मुंह से उन शब्दों को बोलने की भरसक कोशिश करनी होती थी – यानी उसे बोलने का प्रयास होता है। इस गतिविधि के संकेतों को यंत्र पकड़ सकता है। लेकिन सहभागियों का कहना था कि बोलने की कोशिश करना काफी थकाने वाला होता है।
हालांकि, अंदरुनी वाणी (internal speech) उत्पन्न करना कम थकाने वाले होता है लेकिन उसके संकेतों से शोधकर्ता बहुत थोड़े से शब्द पकड़ पाए थे। शोधकर्ताओं ने कोशिश जारी रखी। स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के एरिन कुंज़ ने सबसे पहले तो गति-बाधित लोगों के मस्तिष्क में लगे इलेक्ट्रोड्स का विश्लेषण किया। ये इलेक्ट्रोड मोटर कॉर्टेक्स के उस हिस्से में लगे थे जिसका सम्बंध बोलने के प्रयास से है। शोधकर्ताओं ने दो स्थितियों के रिकॉर्डिंग की तुलना की – एक तब जब सहभागी शब्दों को ज़ोर से बोलने का प्रयास कर रहे थे और दूसरी तब जब वे मन ही मन वे शब्द सोच रहे थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन दोनों स्थितियों (बोलने का प्रयास और मन में सोचना यानी अंदरुनी वाणी) में इसी क्षेत्र की तंत्रिकाएं सक्रिय हुईं।
अंदरुनी वार्तालाप (internal conversation) पर ध्यान केंद्रित करके कुंज़ व साथियों ने एक एल्गोरिद्म (algorithm) विकसित किया जो इन संकेतों को ध्वनि में बदल सकता था। अब बारी आई इस मॉडल को प्रशिक्षित करने की। टीम ने सहभागियों से कहा कि वे सवा लाख शब्दों की एक सूची के शब्दों को मन ही मन बोलें और उनकी तंत्रिका गतिविधि को रिकॉर्ड कर लिया। फिर सहभागियों से कहा गया कि वे उन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कुछ पूरे-पूरे वाक्य बोलने की कल्पना करें।
परिणाम यह रहा कि उनका मॉडल अंदरुनी वार्तालाप को तत्काल वाक्यों में बदल सका। इसमें गलती होने की दर 26 से 54 प्रतिशत रही जो आज तक के प्रयासों में सबसे बेहतर है।
हालांकि गलती की दर काफी अधिक है, लेकिन यह अध्ययन मनोगत वार्तालाप (thought decoding) की अच्छी छानबीन है। वैसे इस तरह के अध्ययनों के साथ एक समस्या निजता (privacy issue) सम्बंधी भी है। कहीं ऐसा न हो कि वाणी-बाधित लोगों के सारे विचार खुलकर उजागर होने लगें। एक विचार तो यह है कि सारे मनोगत विचारों को नहीं बल्कि सिर्फ उन विचारों को एल्गोरिद्म तक पहुंचने दिया जाए, जिन्हें बोलने की कोशिश वह व्यक्ति कर रहा हो। दूसरा विचार है कि कोई ऐसा पासवर्ड (password) हो जो वह व्यक्ति सोचे तभी विचारों को ध्वनि में तबदील किया जाए। एक व्यक्ति के मामले में यह पासवर्ड वाली व्यवस्था 99 प्रतिशत बार कारगर रही।
मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI technology) के विकास के साथ ऐसी व्यवस्थाएं निजता को सुरक्षित रखने के लिए अधिकाधिक ज़रूरी होती जा रही हैं। (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images.news18.com/ibnlive/uploads/2025/01/language-decode-2025-01-fee6690b0af4bec92faa684602ce9b69.png