हमारा
मस्तिष्क अलग-अलग किस्म की स्मृतियों को मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में सहेजता है। जैसे दृश्य सम्बंधी स्मृतियां
मस्तिष्क के दाएं हिस्से में सुरक्षित रहती हैं तो शब्दिक स्मृतियां मस्तिष्क के
बाएं हिस्से में। ऐसा ही स्मृति विभाजन हमें सॉन्ग बर्ड्स और ज़ेब्रा फिश में भी
देखने को मिलता है। और अब प्रोसिडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित
अध्ययन बताता है कि चींटियों का नन्हा-सा मस्तिष्क भी अलग-अलग तरह की स्मृतियां अलग-अलग
हिस्सों में सहेजता है। इस प्रक्रिया को पार्श्वीकरण कहते हैं।
यह
जानने के लिए कि क्या चींटियों का मस्तिष्क दृश्य स्मृतियों को मस्तिष्क के अलग
हिस्से में सहेजता है,
पहले तो शोधकर्ताओं ने जंगली चींटियों (फॉर्मिका रूफा) को ठीक उस तरह
प्रशिक्षित किया जैसे इवान पावलॉव ने कुत्तों को प्रशिक्षित किया था। उन्हें एक
संकेत दिया जाता और फिर उसके साथ भोजन मिलता था।
उन्होंने
दर्जनों चींटियों के साथ यह प्रयोग किया। प्रयोग यह था कि जब भी चींटियां नीले रंग
की वस्तु देखें तो या तो उनके दाएं एंटीना पर, या बाएं एंटीना पर, या दोनों एंटीना पर
मीठे पानी की एक बूंद लगाई गई। इस तरह उन्होंने चींटियों में नीले रंग की वस्तु से
प्यास का सम्बंध बनाया।
इसके
बाद शोधकर्ताओं ने 10 मिनट, 1 घंटे और 24 घंटे बाद उनकी स्मृति का परीक्षण किया। वे देखना चाहते थे
कि नीली वस्तु दिखाने पर क्या चींटियां मीठे पानी के लिए अपना मुंह खोलती हैं जो
प्यास का द्योतक होगा।
शोधकर्ताओं
ने पाया कि जिन चींटियों का दायां एंटीना छूकर प्रशिक्षित गया था उन्होंने 10 मिनट बाद के परीक्षण में मीठे पानी के लिए तुरंत
प्रतिक्रिया दी,
1 घंटे के बाद सुस्त प्रतिक्रिया दी लेकिन
उसके बाद कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। और जिन चींटियों का बायां एंटीना छूकर
प्रशिक्षित किया गया था उन चींटियों ने 10 मिनट
और 1 घंटे बाद तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन
24 घंटे बाद प्यास की प्रतिक्रिया दी। इससे तो
लगता है कि चींटियों के मस्तिष्क का एक हिस्सा अल्पकालीन स्मृतियों को और दूसरा
हिस्सा दीर्घकालीन स्मृतियों को सहेजता है।
कीटों में यह पहली बार देखा गया है कि अल्प और दीर्घकालीन दृश्य स्मृतियां मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से में सहेजी जाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है यह कीटों की एक ऐसी विशेषता हो सकती है जो उन्हें ऊर्जा और स्मृति सहेजने की क्षमता की बचत करने में मदद करती हो।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencealert.com/images/2020-05/processed/woodant_1024.jpg
रोएंदार
पूंछ और पूंछ पर काले-भूरे
छल्लों की खासियत वाले लीमर अपने नर प्रतिद्वंदी को दूर रखने के लिए पूंछ झटकने की
अजीबो-गरीब
आदत के लिए जाने जाते हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक ताज़ा अध्ययन
बताता है कि प्रजनन काल में नर लीमर पूंछ झटककर अपनी संभावित मादा साथी को आमंत्रण
देने के लिए गंध फैलाते हैं।
वैसे
तो अधिकांश कीट मादा को रिझाने या आकर्षित करने के लिए गंध युक्त रसायन स्रावित
करते हैं जिन्हें फेरोमोन कहते हैं। ऐसा ही व्यवहार चूहों में भी देखा गया है।
लेकिन टोक्यो युनिवर्सिटी के बायोकेमिस्ट काज़ुशिगे तोहारा जानना चाहते थे कि क्या
प्राइमेट्स (जिसमें
मनुष्य भी शामिल हैं) भी
ऐसा ही व्यवहार करते हैं?
मैडागास्कर
में पाए जाने वाले लीमर (Lemur catta) अन्य प्राइमेट्स से
थोड़े भिन्न होते हैं। नर लीमर की कलाई पर ग्रंथियां पाई जाती हैं जो फेरोमोन की
तरह गंधयुक्त रसायन स्रावित करती हैं। ये रसायन हवा के संपर्क में आने पर वाष्प बन
कर उड़ जाते हैं। गंध के वाष्प बन कर उड़ने के पहले ही लीमर अपनी पूंछ को कलाई से
रगड़ लेते हैं और फिर पूंछ झटककर अपनी गंध फैलाते हैं। साल के अधिकांश समय तो लीमर
कड़वी व चमड़े जैसी गंध वाले रसायन स्रावित करते हैं ताकि अन्य नर इनसे दूर रहें।
लेकिन प्रजनन काल में ये एक मीठी-सी महक छोड़ते हैं।
अपने
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने लीमर्स की कलाई की ग्रंथियों से स्रावित रसायन को
एकत्रित किया और उसमें मौजूद घटकों का पता लगाया। विश्लेषण में उन्होंने पाया कि स्रावित
रसायन में मादा को आकर्षित करने के लिए तीन घटक ज़िम्मेदार हैं और तीनों ही घटक
एल्डिहाइड हैं, जो कई तरह की गंध के
लिए ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें से एक घटक कीटों द्वारा मादा को आमंत्रित करने के
लिए स्रावित किया जाने वाला फेरोमोन है और दूसरे घटक की गंध नाशपाती जैसी है।
शोधकर्ताओं
ने यह भी पाया कि मादाएं सिर्फ प्रजनन काल में और तीनों रसायन के उपस्थित होने पर
ही इन गंध के स्थान को सूंघती या चाटती हैं। जिससे लगता है कि यह गंध प्रजनन काल
में लीमर को साथी ढूंढने में मदद करती है। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने देखा कि जिस
नर में जितना अधिक टेस्टोस्टेरोन होता है, गंध
उतनी अधिक मीठी होती है।
युनिवर्सिटी
ऑफ विस्कॉन्सिन के मनोवैज्ञानिक चार्ल्स स्नोडाउन बताते हैं कि इसमें खास बात यह
है कि अधिकतर फेरोमोन में एक ही रसायन होता है जबकि लीमर्स द्वारा उत्सर्जित
फेरोमोन में तीन तरह के रसायन मौजूद हैं और महत्व तीनों के मिश्रण का है।
हालांकि
यह अध्ययन बहुत सीमित समूह पर किया गया है और अध्ययन का अधिकांश डैटा एक ही नर
लीमर से प्राप्त हुआ है इसलिए इसका सम्बंध प्रजनन से पक्का नहीं है।
बहरहाल यह अध्ययन इस सवाल की ओर ध्यान दिलाता है कि क्या गंध प्राइमेट्स में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। (स्रोत फीचर्स)
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20वीं शताब्दी की
शुरुआत तक लगभग 5 लाख
गैंडे एशिया और अफ्रीका में घूमते थे। कई दशकों से लगातार हो रहे शिकार और
प्राकृतिक आवास के नष्ट होने से सभी राष्ट्रीय उद्यानों में भी गैंडों की संख्या
बेहद कम हो चुकी है।
अफ्रीका
के पश्चिमी काले गैंडे और उत्तरी सफेद गैंडे हाल के वर्षों में जंगल से विलुप्त हो
गए हैं। गैंडों के संरक्षण में जुटे वैज्ञानिकों और अन्य कार्यकर्ताओं को तब झटका
लगा जब केन्या के एक संरक्षण स्थल पर 24 घंटे गार्ड की निगरानी में रखे गए अंतिम तीन उत्तरी सफेद
गैंडों में से एक 44 वर्ष
की आयु में मर गया। शोधकर्ताओं की अंतर्राष्ट्रीय टीम अनेक वर्षों से इन गैंडों को
प्रजनन कराने का भरसक प्रयास कर रही थी। कुछ समय पहले ही इन विट्रो-निषेचन की तकनीक से
गैंडे के दो अंडाणुओं को प्रयोगशाला में सफलता पूर्वक निषेचित करने से वैज्ञानिकों
ने गैंडों को बचाने के लिए एक बार फिर उम्मीद जगा दी है।
ऐसा
माना जाता है कि अफ्रीका के उत्तरी सफेद गैंडे 2007-08 में जंगलों से विलुप्त हो चुके थे। इन
गैंडों की एक छोटी-सी
आबादी चिड़ियाघरों में ही शेष बची थी। परंतु समस्या यह थी कि चिड़ियाघर में बचे
गैंडे किसी कारण से प्रजनन करने में सक्षम नहीं थे। 2014 में बचे शेष तीन उम्रदराज़ गैंडों में से
अकेला नर भी मर गया। नर के मर जाने के पूर्व भी दोनों मादाओं को प्राकृतिक तथा
कृत्रिम तरीके से गर्भधारण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया पर नतीजा शून्य रहा।
इसी वर्ष अगस्त माह में वैज्ञानिकों ने दोनों बची हुई मादाओं से 10 अंडाणु शरीर के बाहर
निकालने में सफलता प्राप्त की। मरने के पूर्व नरों से एकत्रित किए गए शुक्राणुओं
के द्वारा अंडों को निषेचित किया जा सकता है। योजना के अनुसार दोनों मादा गैंडों
से कुल 10 अंडाणु
प्राप्त किए गए।
क्रेमोना, इटली में स्थित एवांटिया प्रयोगशाला के इस
कार्य से जुड़े एक वैज्ञानिक ने बताया कि 10 में से केवल 7 अंडाणु ही शुक्राणु द्वारा निषेचन के लिए
उपयुक्त पाए गए। अंत में केवल दो अंडाणु भ्रूण में बदले। दोनों भ्रूणों को भविष्य
में उपयुक्त मादा गैंडों में प्रत्यारोपित करने के पूर्व बर्फ में जमा कर संरक्षित
कर लिया गया है।
यद्यपि
भ्रूण को सरोगेट मां में स्थापित कर जन्म तक देखभाल करने की तकनीक मनुष्यों में
बेहद सामान्य हो गई है परंतु गैंडे में इस प्रकार के प्रयोग पहली बार किए जा रहे
हैं। वैज्ञानिक सरोगेट मां के रूप में स्वस्थ दक्षिणी सफेद मादा को भी खोज रहे
हैं। वैज्ञानिकों के पास दो भ्रूण संरक्षित हैं।
गैंडों में भ्रूण प्रत्यारोपण एक बेहद कठिन कार्य है। आशा करते हैं कि वैज्ञानिकों के प्रयास से गैंडे की प्रजाति को बचाया जा सकेगा। यद्यपि उत्तरी सफेद गैंडों की पूरी तरह वापसी के लिए उपरोक्त प्रयोगों को कई बार दोहराने की ज़रूरत होगी। वैज्ञानिकों के पास केवल दो बूढ़ी गैंडा मादाएं शेष हैं जिनसे अभी और अंडाणु प्राप्त किए जा सकते हैं। केवल चार नरों से प्राप्त शुक्राणुओं की उपलब्धि के कारण आनुवंशिक विविधता बहुत कम रह गई है। यदि मृत गैंडों की जमी हुई (फ्रोज़न) कायिक कोशिकाओं के जीन्स को भी मिला लिया जाए तो जीन समूह 12 गैंडों का हो जाता है। अगर इन मृत गैंडों की संग्रहित जीवित स्टेम कोशिकाओं को प्रेरित कर अंडाणुओं और शुक्राणुओं में बदल दिया जाए तो काम और आसान हो जाएगा। वैज्ञानिक जुटे हुए हैं और आशा करें कि एक दिन उत्तरी सफेद गैंडे का शिशु पुन: दौड़ता दिखेगा।(स्रोत फीचर्स)
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किसी
प्रजाति के लिए हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस किसी अन्य प्रजाति को संक्रमित करने
के लिए काफी तेज़ी से विकसित हो सकते हैं। कोरोनावायरस इसका सबसे नवीन उदाहरण है।
एक जानलेवा बीमारी का जनक यह वायरस जानवरों से मनुष्यों में आ पहुंचा है और शायद
मनुष्यों से जानवरों में भी पहुंच रहा है।
इस
तरह के प्रजाति-पार
संक्रमण पशु पालन के स्थानों पर या बाज़ार में शुरू हो सकते हैं जहां संक्रामक
जीवों के संपर्क को बढ़ावा मिलता है। ऐसी परिस्थिति में विभिन्न रोगजनक
सूक्ष्मजीवों के बीच जीन्स का लेन-देन हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है सामान्य जंतु-मनुष्य संपर्क के
दौरान कोई सूक्ष्मजीव प्रजाति की सीमा-रेखा पार कर जाए।
जंतुओं
से मनुष्यों में पहुंचने वाले रोगों को ज़ुऑनोसेस कहा जाता है। इनमें 3 दर्ज़न से अधिक रोग
तो ऐसे हैं जो सिर्फ स्पर्श से हमें संक्रमित कर सकते हैं जबकि 4 दर्ज़न से अधिक ऐसे
हैं जो जीवों के काटने से हमें मिलते हैं। इनमें कुछ रोग ऐसे भी हैं जो मनुष्यों
से जीवों में पहुंचते हैं। यहां एक से दूसरी प्रजातियों में फैलने वाली कुछ
जानलेवा बीमारियों पर चर्चा की गई है।
नया
कोरोनावायरस
नए
कोरोनावायरस (SARS-CoV-2) की पहचान दिसंबर 2019 में चीन के वुहान प्रांत के सी-फूड बाज़ार में हुई
थी। आनुवंशिक विश्लेषण से पता चला कि यह चमगादड़ से आया है। उस बाज़ार में चमगादड़
नहीं बेचे जाते थे, इसलिए वैज्ञानिकों
ने माना कि इस वायरस के मानवों में संक्रमण के पीछे एक अज्ञात तीसरा जीव होना
चाहिए। कुछ अध्ययनों के आधार पर कहा जा रहा है कि यह मध्यवर्ती जीव पैंगोलिन हो
सकता है। लेकिन नेचर पत्रिका के अनुसार अवैध रूप से तस्करी किए गए पैंगोलिन से
प्राप्त नमूने SARS-CoV-2 से इतना मेल नहीं
खाते हैं जिससे इसकी पुष्टि एक मध्यवर्ती जीव के रूप में की जा सके। इसके पूर्व के
अध्ययनों में सांपों को इसका संभावित स्रोत माना गया था लेकिन सांपों में
कोरोनावायरस के संक्रमण की पुष्टि नहीं की गई है।
इन्फ्लुएंज़ा
महामारियां
वर्ष
1918 में
इन्फ्लुएंज़ा ने कुछ ही महीनों में 5 करोड़ लोगों की जान ली थी। विश्व की एक-तिहाई आबादी को संक्रमित करने वाला यह
इन्फ्लुएंज़ा वायरस (H1N1) पक्षी-मूल का था। मुख्य रूप से बुज़ुर्गों और
कमज़ोर प्रतिरक्षा तंत्र वाले लोगों की जान लेने वाले साधारण फ्लू के विपरीत H1N1 ने युवा व्यस्कों
को अपना शिकार बनाया था। ऐसा लगता है कि बुज़ुर्गों में पिछले किसी H1N1 संक्रमण के कारण
प्रतिरक्षा उत्पन्न हुई थी, और इस वजह से 1918 की महामारी में उन
पर ज़्यादा असर नहीं हुआ।
H1N1 वायरस (H1N1pdm09) का नवीनतम हमला 2009 में हुआ था जिसमें
अमेरिका में 6.08 करोड़
मामले सामने आए थे और 12,496
लोगों की मौत हुई थी। विश्व भर में मौतों की संख्या डेढ़ से
पौने छ: लाख
के बीच थी। यह वायरस सूअरों के झुंड में उत्पन्न हुआ था जहां आनुवंशिक पदार्थ की
अदला-बदली
के दौरान इन्फ्लुएंज़ा वायरसों का पुनर्गठन हुआ। यह प्रक्रिया उत्तरी अमेरिकी और
यूरेशियन सूअरों में प्राकृतिक रूप से होती रहती है।
प्लेग
14वीं सदी में ब्लैक
डेथ के नाम से मशहूर इस एक बीमारी के सामने कई सभ्यताओं ने घुटने टेक दिए थे।
युरोप से लेकर मिस्र और एशिया तक अनगिनत लोग मारे गए थे। उस समय 36 करोड़ की आबादी वाले
विश्व में 7.5 करोड़
लोग मारे गए थे। प्लेग एक बैक्टीरिया-जनित रोग है जो यर्सिनिया पेस्टिस नामक बैक्टीरिया
के कारण होता है। यह बैक्टीरिया चूहों (और शायद बिल्लियों) में रहता है और संक्रमित पिस्सुओं के काटने
से मनुष्यों में फैल जाता है। यह एक जानलेवा रोग है और आज भी यदि इसका इलाज न किया
जाए तो जानलेवा होता है।
14वीं शताब्दी का
प्लेग जिस बैक्टीरिया के कारण फैला था वह गोबी रेगिस्तान में वर्षों तक निष्क्रिय
रहने के बाद चीन के व्यापार मार्गों के माध्यम से युरोप,
एशिया और अन्य देशों में फैल गया। इसके लक्षणों में बुखार,
ठण्ड लगना, कमज़ोरी,
लसिका ग्रंथियों में सूजन और दर्द शामिल हैं। कई समाजों को
इससे उबरने में सदियां लगी थीं।
दंश
से फैलते रोग
कई
जंतु-वाहित
बीमारियां जानवरों द्वारा काटने से फैलती हैं। मच्छरों द्वारा मानव शरीर में
परजीवी के संक्रमण से मलेरिया रोग काफी जानलेवा सिद्ध होता है। एक रिपोर्ट के
अनुसार मच्छरों के काटने से वर्ष 2018 में लगभग 22.8 करोड़ लोग संक्रमित हुए जबकि 40 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई। इनमें
सबसे अधिक संख्या अफ्रीकी देशों में रहने वाले बच्चों की थी।
मच्छरों
से फैलने वाले डेंगू बुखार से सालाना 40 करोड़ लोग संक्रमित होते हैं, जिनमें
से 10 करोड़
लोग बीमार होते हैं और 22,000
लोग मारे जाते हैं। यह रोग एडीज़ वंश के मच्छर द्वारा काटने
से होता है।
पालतू
प्राणि और चूहे
पालतू
प्राणियों से होने वाली बीमारियों में रेबीज़ सबसे जानी-मानी है। इससे हर वर्ष लगभग 55,000 लोगों की मृत्यु
होती है। इनकी सबसे अधिक संख्या एशिया और अफ्रीका के देशों में होती है। आम तौर पर
यह रोग संक्रमित पालतू कुत्ते के काटने से होता है हालांकि जंगली जानवरों में
रैबीज़ के वायरस पाए जाते हैं।
एक
और बीमारी है जो जानवर के काटे बगैर भी हो जाती है। चूहों जैसे प्राणियों में
मौजूद हैन्टावायरस उनके मल, मूत्र वगैरह में
होता है और यदि ये पदार्थ कण रूप में हवा में फैल जाएं तो वायरस सांस के साथ
मनुष्यों में पहुंच जाता है। यह मुख्य रूप से डीयर माइस से फैलता है। यह वायरस एक
व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संचरण नहीं करता है। इसके मुख्य लक्षणों में ठण्ड
लगना, बुखार, सिरदर्द
आदि शामिल हैं। वैसे तो यह बीमारी बिरली है लेकिन इसकी मृत्यु दर 36 प्रतिशत है।
एचआईवी./एड्स
सीडीसी
के अनुसार एड्स का वायरस (एचआईवी) मध्य अफ्रीका के एक
चिम्पैंज़ी से आया है। यह वायरस (मूलत: एसआईवी) मनुष्यों में इन जीवों के शिकार ज़रिए पहुंचा है। यह
मनुष्यों में इन जीवों के संक्रमित खून से आया जिसने मानवों में विकसित होकर
एचआईवी का रूप ले लिया। अध्ययनों के अनुसार यह मनुष्यों में 18वीं सदी से मौजूद है।
एचआईवी
प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस
कर देता है जिससे जानलेवा बीमारियों और कैंसर का रास्ता खुल जाता है। विश्व
स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वर्ष 2018 में 7.7 लाख लोगों की मृत्यु एचआईवी के कारण हुई जबकि इसी वर्ष के
अंत तक 3.7 करोड़
लोग इससे संक्रमित पाए गए। एचआईवी संक्रमित लोगों में टीबी से मृत्यु दर काफी अधिक
होती है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में शारीरिक तरल पदार्थ (जैसे खून,
स्तनपान, वीर्य,
योनि स्राव आदि) के आदान प्रदान से पहुंचता है।
मस्तिष्क
पर नियंत्रण
एक
विचित्र परजीवी टोक्सोप्लाज़्मा गोंडाई ने विश्व भर में लगभग 2 अरब लोगों को अपना शिकार बनाया है। यह
परजीवी शीज़ोफ्रीनिया का कारण होता है। इसका प्राथमिक मेज़बान बिल्लियां हैं। यह
रोगाणु बिल्ली की आंत में विकसित होते हैं। इसके अंडे बिल्ली के मल के साथ बाहर
आते हैं और इनके छोटे-छोटे
कण हवा के माध्यम से नाक के ज़रिए मनुष्यों में प्रवेश कर जाते हैं।
मनुष्य
में प्रवेश करने के बाद ये अंडे शरीर के उन अंगों में छिप जाते हैं जहां
प्रतिरक्षा तंत्र का अभाव होता है, जैसे मस्तिष्क,
ह्मदय, और कंकाल की
मांसपेशियां। इन अंगों में अंडे सक्रिय परजीवी टैकीज़ोइट में तबदील हो जाते हैं और
अन्य अंगों में फैलने व संख्यावृद्धि करने लगते हैं।
इनको
मस्तिष्क पर नियंत्रण करने वाला जीव इसलिए कहा जाता है क्योंकि इससे संक्रमित
चूहों में बिल्लियों का डर खत्म हो जाता है और वे बिल्लियों के मूत्र की गंध की ओर
आकर्षित होने लगते हैं। ऐसे में वे बिल्ली का आसान शिकार बन जाते हैं और परजीवी को
बिल्ली की आंत में पहुंचने का एक आसान रास्ता मिल जाता है।
मनुष्यों
में इनके संक्रमण का कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देता है। हालांकि कुछ मामलों में
सामान्य फ्लू और लसिका नोड्स पर सूजन की शिकायत होती है जो कुछ हफ्तों से लेकर
महीनों तक रहती है। कभी-कभार
दृष्टि गंवाने से लेकर मस्तिष्क क्षति जैसी गंभार समस्याएं हो सकती हैं।
सिस्टीसर्कोसिस
सिस्टीसर्कोसिस
की समस्या फीता कृमि (टीनिया
सोलियम) के
अण्डों के शरीर में प्रवेश करने से होती है। इसका लार्वा मांसपेशियों और मस्तिष्क
में पहुंच कर गठान बना देता है। मनुष्यों में यह सूअर के मांस का सेवन करने से भी
पहुंचता है। यह छोटी आंत के अस्तर से जुड़कर दो महीनों में एक व्यस्क कृमि में
विकसित हो जाता है। इसका सबसे खतरनाक रूप मस्तिष्क में गठान के रूप में सामने आता
है। इसके लक्षणों में सिरदर्द, दौरे,
भ्रमित होना, मस्तिष्क
में सूजन, संतुलन बनाने में
समस्या, स्ट्रोक या मृत्यु
शामिल हैं।
एबोला
यह
रोग एबोला वायरस के पांच में से एक प्रकार के कारण होता है। यह मध्य अफ्रीका में
गोरिल्ला और चिम्पैंज़ियों के लिए एक बड़ा खतरा है। सीडीसी के अनुसार मनुष्यों में
यह चमगादड़ या गैर-मानव
प्राइमेट्स के द्वारा फैली है। इसकी पहचान पहली बार कांगो में एबोला नदी के किनारे
हुई थी। यह वायरस संक्रमित प्राणियों के रक्त या शरीर के अन्य तरल पदार्थों से
फैलता है। मनुष्यों के बीच यह निकट संपर्क से फैलता है।
इसके
लक्षण काफी भयानक होते हैं। अचानक बुखार, कमज़ोरी,
मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द,
और गले में खराश शुरुआती लक्षण हैं,
जिसके बाद उल्टी, दस्त,
शरीर पर दाने, गुर्दों
और लीवर की तकलीफ और कुछ मामलों में आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव। मृत्यु दर 90 प्रतिशत तक हो सकती
है।
लाइम
रोग
यह रोग एक काली टांग वाले पिस्सू द्वारा मनुष्यों में बैक्टीरिया संक्रमण के कारण होता है। यह रोग मुख्य रूप से बोरेलिया बर्गडोरफेरी प्रजाति और कभी कभी एक अन्य प्रजाति बी. मेयोनाई से भी होता है। इसके लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, थकान और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं। उपचार न किया जाए तो यह शरीर के जोड़ों से ह्मदय और तंत्रिका तंत्र तक फैल जाता है। हर वर्ष इसके लगभग 30,000 मामले सामने आते हैं।(स्रोत फीचर्स)
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वाइल्डलाइफ
कंज़र्वेशन सोसायटी ने हाल ही में घोषणा की है कि न्यूयॉर्क के एक चिड़ियाघर ब्रॉन्क्स
ज़ू की एक 4-वर्षीय
बाघिन (नादिया) कोविड-19 पॉज़िटिव निकली है।
गौरतलब है कि न्यूयॉर्क अत्यधिक संक्रमित क्षेत्र है।
यह
मलायन बाघिन, बिल्ली कुल के छ: अन्य साथियों (जिनमें नादिया की एक
बहन, दो अमूर बाघ और तीन अफ्रीकी शेर शामिल हैं) के साथ सूखी खांसी
से पीड़ित थी। हालांकि इन अन्य प्राणियों की जांच नहीं की गई है किंतु ज़ू के
अधिकारी मानकर चल रहे हैं कि ये सब SARS-CoV-2 से संक्रमित हैं जो कोविड-19 का कारण है।
दरअसल,
इस बाघिन की जांच ऐहतियात के तौर पर की गई थी और अधिकारियों
की कहना है कि उन्हें इस बाघिन के अध्ययन से जो भी जानकारी मिलेगी वह कोरोनावायरस
से हमारी विश्वव्यापी लड़ाई में मददगार ही होगी।
वाइल्डलाइफ
कंज़र्वेशन सोसायटी का मत है कि चिड़ियाघर का एक कर्मचारी कोविड-19 से पीड़ित था और संभवत: उसने ही इन
बिल्लियों को संक्रमित किया है। इसके बाद से सभी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के
उपाय लागू कर दिए गए हैं।
यह
देखा गया है कि संक्रमित जानवरों की भूख कम हुई है लेकिन चिड़ियाघर के अनुसार उनकी
हालत ठीक है। चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक इन बाघ-शेरों की देखभाल व उपचार में लगे हैं।
एक
अच्छी बात यह है कि बिल्ली कुल के अन्य प्राणियों में फिलहाल कोविड-19 के लक्षण नहीं दिखे
हैं।
यह देखा जा चुका है कि पालतू बिल्लियां संक्रमित हुई हैं। पता चला है कि उनकी श्वसन कोशिकाओं की सतह पर लगभग वैसे ही ग्राही पाए जाते हैं, जैसे मनुष्य की कोशिकाओं पर होते हैं, जो वायरस को कोशिका में प्रवेश करने में मदद करते हैं। वैसे अभी इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि बिल्लियां यह वायरस मनुष्यों में फैला सकती हैं। बहरहाल, न्यूयॉर्क के विभिन्न चिड़ियाघरों को बंद कर दिया गया है। (स्रोत फीचर्स)
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मनुष्यों
में मृतकों के अंतिम संस्कार की प्रथाओं से तो हम अच्छी तरह से परिचित हैं लेकिन
एक ताज़ा अध्ययन से पता चला है कि श्रमिक मधुमक्खियों में एक ऐसा वर्ग होता है जो
अपने मृत साथियों का अंतिम संस्कार करता है। दिलचस्प बात है कि ये अपने मृत
साथियों को अंधेरे में भी ढूंढ लेते हैं – 30 मिनट से ही कम समय में।
इसको
समझने के लिए चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंस के ज़ीशुआंग बन्ना ट्रॉपिकल बॉटेनिकल गार्डन
के वेन पिंग ने सोचा कि शायद एक विशिष्ट गंध-अणु होता होगा जो शहीद मधुमक्खियों को
खोजने में मदद करता होगा। दरअसल चींटियां, मधुमक्खियां
और अन्य कीट क्यूटीक्यूलर हाइड्रोकार्बन (सीएचसी) नामक यौगिकों से ढंके होते हैं। यह मोमी
परत इन जीवों की त्वचा को सूखने से बचाती है। जीवित कीट में ये पदार्थ हवा में
लगातार छोड़े जाते हैं। इन्हीं की मदद से छत्ते के सदस्यों की पहचान की जाती
है।
वेन
ने अनुमान लगाया कि मरने के बाद जब उनके शरीर का तापमान कम हो जाता है,
तब मधुमक्खियां हवा में काफी कम मात्रा में फेरोमोन छोड़ती
होंगी। जब रासायनिक तरीकों से परीक्षण किया गया तो पता चला कि मृत,
कम तापमान वाली मधुमक्खियां अपने जीवित साथियों की तुलना
में कम सीएचसी का उत्सर्जन करती हैं।
अब
अगला प्रयोग यह जानना था कि क्या गंध में परिवर्तन को जीवित मधुमक्खियां जान पाती
हैं। इसके लिए वेन ने एशियाई मधुमक्खी (Apiscerana) के पांच छत्तों का अध्ययन किया। वेन ने
पाया कि जब सामान्य मृत ठंडी पड़ चुकी मधुमक्खियों को रखा गया तब श्रमिक
मधुमक्खियों ने 30 मिनट
से भी कम समय में उन्हें वहां से हटा दिया। लेकिन जब उन्होंने मृत मधुमक्खियों के
शरीर को गर्म करना शुरू किया तब श्रमिक मधुमक्खियों को अपने मृत साथियों को ढूंढने
में घंटो लग गए। बायोआर्काइव्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ऐसा शायद
इसलिए हुआ क्योंकि एक मृत गर्म मक्खी, एक
जीवित मक्खी के लगभग बराबर सीएचसी का उत्सर्जन करती है।
अपने इस अध्ययन को और पक्का करने के लिए वेन ने मृत मधुमक्खियों का सीएचसी हेक्सेन से साफ कर दिया जिससे उनकी त्वचा पर मौजूद तेल और मोम को हटाया जा सके। इसके बाद उन्होंने इन मक्खियों को उनके जीवित साथियों के तापमान तक गर्म किया और उन्हें वापस छत्ते में रख दिया। उन्होंने पाया कि अंतिम संस्कार करने वाली श्रमिक मधुमक्खियों ने आधे घंटे के अंदर इस तरह साफ किए गए अपने 90 प्रतिशत मृत साथियों को वहां से हटा दिया। इससे मालूम चलता है कि न केवल तापमान बल्कि सीएचसी की अनुपस्थिति भी मृतक की पहचान में उपयोगी होती है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Undertaker_bees_1280x720.jpg?itok=Gt82Rstg
नेचर
पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार हाल ही में शोधकर्ताओं को हिंद महासागर के
नीचे, पृथ्वी की भू-पर्पटी की सबसे निचली परतों में
सूक्ष्मजीवों का एक नया संसार मिला है।
वुड्स
होल ओशिएनोग्राफी इंस्टिट्यूट की समुद्री सूक्ष्मजीव विज्ञानी वर्जीनिया एजकॉम्ब
और उनके दल को समुद्र के नीचे मौजूद पर्वत – अटलांटिस बैंक – की चट्टानों पर बैक्टीरिया,
कवक और आर्किया की कई प्रजातियां मिलीं हैं। ये सूक्ष्मजीव
पृथ्वी की सतह के नीचे सूक्ष्म दरारों और अल्प-पोषण की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित हैं।
इन गहराइयों में ये अपना भोजन ऐसे अमीनो एसिड और अन्य कार्बनिक रसायनों से प्राप्त
करते हैं जो समुद्री धाराओं के साथ इतनी गहराई में पहुंच जाते हैं।
वैसे
काफी पहले तक इन कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने वाले सूक्ष्मजीवों को जीवन का ‘इन्तहा’ रूप माना जाता था,
लेकिन पिछले कुछ दशकों का अनुसंधान बताता है कि पृथ्वी पर
मौजूद सूक्ष्मजीवों में से लगभग 70 प्रतिशत इसी तरह की कठिन परिस्थितियों में जीवित रहते हैं।
कई अन्य अध्ययन बताते हैं कि ऐसे स्थान, जो
लंबे समय तक जीवन के अनुकूल नहीं माने जाते थे, उन
स्थानों पर भी प्रचुर मात्रा में जीवन मौजूद है। जैसे महासागरों के नीचे गहरी तलछट
में, अंटार्कटिका के ठंडे रेगिस्तान में और ऊपरी
वायुमंडल के समताप मंडल में भी।
इन
स्थानों पर पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव विषम परिस्थितियों की चुनौतियों से निपटने के
लिए विभिन्न तरह से विकसित हुए हैं। जैसे कुछ सूक्ष्मजीव धातुओं से सांस ले सकते
हैं (यहां
तक कि युरेनियम जैसी रेडियोधर्मी धातुओं से भी), कुछ सूक्ष्मजीव हवा
में अत्यल्प गैसों से पोषण लेते हैं और दलदली गहरे समुद्र तल में दबे कुछ
सूक्ष्मजीव तो इतनी धीमी गति से जीवनयापन करते हैं कि वे सैकड़ों-हज़ारों साल तक जीवित
रह पाते हैं; इस दौरान वे बहुत कम
खाते हैं और कम प्रजनन करते हैं।
चूंकि
इन सूक्ष्मजीवों को प्रयोगशाला में कल्चर कर पाना संभव नहीं था इसलिए इनमें से
अधिकांश सूक्ष्मजीवों का अध्ययन नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा कई सूक्ष्मजीव
कृत्रिम परिस्थितियों में प्राकृतिक परिस्थितियों से भिन्न व्यवहार करते हैं इसलिए
उनके जीवन सम्बंधी रणनीतियों का अध्ययन करना मुश्किल रहा है। लेकिन मेटाजीनोमिक
तकनीक से सूक्ष्मजीवों की जीन-अभिव्यक्ति को ट्रैक करने में मदद मिली है।
इन
तकनीक की मदद से प्रोटीन, डीएनए की मरम्मत के
लिए कम-ऊर्जा
तकनीकों और ऊर्जा-कुशल
चयापचय रणनीति के लिए ज़िम्मेदार जीन्स की पहचान की गई है। इसके अलावा इनकी मदद से
उन जीन्स का पता भी लगाया गया है जो बैक्टीरिया को कार्बन मोनोऑक्साइड और
हाइड्रोजन जैसी अत्यल्प गैसों पर जीवित रहने के लिए तैयार करते हैं।
ओरेगन स्टेट युनिवर्सिटी के माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट रिक कोलवेल बताते हैं कि इस अध्ययन के नतीजे इस बारे में हमारी समझ को बढ़ाते हैं कि चट्टानों की दरारों में सूक्ष्मजीव कैसे जीवित रहते हैं। इस दिशा में हमें और प्रमाण मिल रहे हैं कि ये सूक्ष्मजीव जिन चीजों पर निर्वाह करते हैं (जैसे ऊर्जा के रुाोत के रूप में हाइड्रोजन), वे जीवन को एक अलग ही आयाम प्रदान करते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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वर्षा
ऋतु में प्रकृति सजीव हो उठती है। कीट-पतंगे, मकडि़यां और नाना
प्रकार के जीव जंतु दिखाई पड़ने लगते हैं। मेंढकों का भी यह प्रजनन काल होता है।
नर मेंढक ज़ोर-ज़ोर
से टर्रा कर मादा को आमंत्रित करते हैं। और मादा भी उनके प्रणय निवेदन को स्वीकार
कर खिंची चली आती है।प्रजनन के दौरान मादा मेंढक पानी में अंडे देती है और नर अपने
शुक्राणु उनपर छिड़क देता है। अंडों से टैडपोल बनता है और उसके बाद मेंढक। संरचना
और स्वभाव में टैडपोल मेंढक से काफी भिन्न होते हैं। टैडपोल पानी में रहते हैं,
गलफड़ों से श्वसन करते हैं, शाकाहारी
होते हैं और काई कुतर कर खाते हैं। इनकी आंत बहुत लंबी होती है और तैरने के लिए
इनमें पूंछ भी होती है। दूसरी ओर, मेंढक पानी और ज़मीन
दोनों जगह रहते हैं। त्वचा और फेफड़ों से श्वसन करते हैं। मांसाहारी होते हैं,
छोटे-मोटे जीव जंतुओं का शिकार करते हैं। इनकी आंत भी छोटी होती
है, पूंछ नहीं होती लेकिन चलने और तैरने के लिए
इनके पास बढि़या अनुकूलित टांगें होती हैं।
जब
टैडपोल से वयस्क मेंढक बनता है तो उसकी पूंछ और गलफड़े कहां चले जाते हैं?
ये टूट कर गिरते नहीं बल्कि अवशोषित कर लिए जाते हैं।
टैडपोल
से मेंढक बनने जैसा ही कुछ-कुछ तितली के जीवन में भी घटता है। इनके अंडों से कैटरपिलर (इल्ली) निकलते हैं।
कैटरपिलर खूब फूल-पत्तियां
खाते हैं। उसके बाद वे एक प्यूपा (शंखी) में बदल जाते हैं। और फिर एक दिन प्यूपा में से तितली
निकलती है। तितली कैटरपिलर से बिल्कुल अलग होती है। जहां लंबे कैटरपिलर में चलने
के लिए अनेक टांगों जैसी रचनाएं होती हैं, पत्तियों
को कुतर-कुतर
कर खाने के लिए मज़बूत जबड़े होते हैं वहीं तितलियों में फूल का रस पीने के लिए
लंबी स्ट्रॉ के समान सूंड (प्रोबोसिस) नाम की नली होती है, चलने
के लिए 3 जोड़ी
टांगें और उड़ने के लिए पंख होते हैं।
टैडपोल
और कैटरपिलर दोनों में ही अनेक अंग वयस्क होने पर बदल जाते हैं। पुराने अंग नष्ट
होकर अवशोषित हो जाते हैं और नए अंगों का निर्माण होता है। अर्थात प्रत्येक प्राणी
में विकास के दौरान अनेक पुरानी और टूटी-फूटी कोशिकाएं बेकार हो जाने पर निर्धारित
कार्यक्रम के अनुसार नष्ट हो जाती हैं। कोशिका के नष्ट होने की इस प्रक्रिया को
एपोप्टोसिस या तयशुदा कोशिका मृत्यु (प्रोग्राम्ड सेल डेथ) कहते हैं।
हमारे
शरीर की प्रत्येक कोशिका की निश्चित आयु होती है। जैसे रक्त में पाई जाने वाली लाल
रक्त कोशिकाएं मात्र 120 दिन
जीवित रहती हैं। इनकी भरपाई के लिए कोशिका विभाजन द्वारा निरंतर नई कोशिकाएं बनती
रहती हैं।
प्राय: कोशिकाओं की मृत्यु
चोट, संक्रमण, विकिरण
या रसायनों आदि के कारण होती हैं। यह आत्मघात नहीं है। इसे नेक्रोसिस कहते हैं।
इसमें कोशिकाएं स्वेच्छा से नहीं मरतीं, उनकी
हत्या होती है। किन्तु एपोप्टोसिस आंतरिक या बाह्य कारणों से,
शरीर के हित में स्वैच्छिक आत्म बलिदान है,
मृत्यु का वरण है। शरीर के रोगों से और दर्द से बचाने का
तरीका है।
नेक्रोसिस
और एपोप्टोसिस में कोशिकाएं भिन्न प्रकार से नष्ट होती हैं। कोशिका मृत्यु के
दोनों प्रकार नेक्रोसिस और एपोप्टोसिस की विधियों में भिन्नता आसानी से पहचानी जा
सकती है।
नेक्रोसिस
के प्रारंभ में प्राय: कोशिकाओं
में सूजन आ जाती है और सूजन के सभी लक्षण परिलक्षित होते हैं। दर्द महसूस होता है।
कोशिकाएं फूल जाती है और उनका ढांचा और उनकी अखंडता नष्ट हो जाती है। कोशिकांग फूल
कर फूटने लगते हैं। यह सब अव्यवस्थित ढंग से होता है।
एपोप्टोसिस
में कोशिकाएं फूलने के बजाए सूखने और सिकुड़ने लगती हैं,
छोटी हो जाती हैं। कोशिका झिल्ली की बाहरी सतह पर बुलबुलों
के समान रचनाएं (ब्लेब) बनने लगती हैं।
कोशिका द्रव्य और केन्द्रक सिकुड़ने लगते हैं। क्रोमेटिन यानी डीएनए और प्रोटीन
नष्ट होने लगते हैं और अन्तत: कोशिका छोटे-छोटे पैकेट्स में टूट जाती हैं जिन्हें भक्षी कोशिकाएं (फेगोसाइट्स) अपने अंदर लेकर नष्ट
कर देते हैं।
कोशिकाएं
आत्मघात क्यों करती हैं? शरीर की वृद्धि के
लिए जिस प्रकार कोशिका विभाजन आवश्यक है उसी प्रकार स्थान बनाने के लिए आत्मघात भी
आवश्यक है। कुछ कोशिकाएं विशेष कार्य के लिए बनती हैं। कार्य की समाप्ति पर ये
अनावश्यक और शरीर पर अवांछित बोझ हो जाती हैं। जैसे मेंढक की पूंछ,
गलफड़े और लंबी आंत।
इसी
प्रकार नए अंगों के निर्माण में भी आत्मघात महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए मानव
भ्रूण में हाथ-पैर
चप्पू जैसे होते हैं। उंगलियों के बीच में जाल होने के कारण उंगलियां पकड़ के लिए
स्वतंत्र नहीं होती। अंगूठा भी उंगलियों से जुड़ा होता है और पकड़ने लायक नहीं
होता। आत्मघात से ही कार्यशील उंगलियां निर्मित होती हैं। शरीर की वे कोशिकाएं जो
संक्रमित हो जाती हैं उन्हें भी आत्मघात के द्वारा संक्रमण को बढ़ने से रोक कर
पूरे शरीर को संक्रामक रोग से बचा लिया जाता है।
कैंसर
का एपोप्टोसिस से गहरा नाता है। वायरस कैंसर कोशिकाओं को आत्मघात नहीं करने देता
अन्यथा वायरसयुक्त कोशिकाएं आत्मघात करके शरीर को कैंसर जैसे घातक रोगों से बचा
सकती हैं। अंग प्रत्यारोपण में आत्मघात की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी
प्रकार से प्रतिरक्षा कोशिकाएं आत्मघात से नष्ट हो जाएं तो प्रत्यारोपित अंगों को
शरीर स्वीकार कर लेता है।
आत्मघात
के अध्ययन में सिनोरैब्डाइटिस एलेगेंस नामक कृमि को मॉडल जीव के रूप में प्रयुक्त
कर बहुत से रहस्यों पर से पर्दा उठाने में मदद मिली है।
सन 2002 में चिकित्सा/कार्यिकी का नोबेल
पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को मिला था। इन्होंने भ्रूणीय विकास के दौरान अंगों के
निर्माण तथा कोशिका आत्मघात में आनुवंशिक नियंत्रण की भूमिका को समझाने के लिए
मौलिक खोज की थी। छोटी आयु, भरपूर प्रजनन क्षमता,
पारदर्शी शरीर एवं आसानी से प्रयोगशाला में कल्चर हो जाने
की सुविधाओं के कारण वैज्ञानिकों ने सिनोरैब्डाइटिस एलेगेंस कृमि का चुनाव किया
था। उन्होंने पाया कि कृमि के 1090 में से 131 कोशिकाएं नियत समय पर कोशिका आत्मघात से मर जाती है।
उन्होंने
यह भी बताया कि भ्रूण से कृमि बनने की प्रक्रिया के दौरान कुछ कोशिकाएं कोशिका
आत्मघात से गुजरती हैं क्योंकि उनका कार्य कृमि शरीर में खत्म हो चुका होता है।
उन्होंने कोशिका आत्मघात की प्रक्रिया के लिए जि़म्मेदार जीन भी खोज निकाला।
आत्मघात के लिए जि़म्मेदार जीन में म्यूटेशन होने से मरने की बजाय कोशिकाएं विभाजन
करने लगती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ये जीन मानव में भी पाए जाते हैं।
जब टैडपोल या कैटरपिलर को क्रमश: मेंढक और तितली (यानी वयस्क) में बदलने का समय आ जाता है तो उनकी अनेक कोशिकाओं को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है। टैडपोल के परिवर्धन में थायरॉइड हार्मोन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। थायरॉइड हार्मोन वहां पर जुड़ जाता है जहां कोशिका के केन्द्रक में थायरॉइड ग्राही हो। थायरॉइड हार्मोन के जुड़ते ही कोशिका आत्मघात करने वाले जीन को अभिव्यवित करने लगती है। इसके साथ ही आत्मघात के आंतरिक एवं बाहरी रास्ते भी खुल जाते हैं।(स्रोत फीचर्स)
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लोगों
से उनकी लंबी उम्र का राज़ पूछो तो वे इसका श्रेय अपने खान-पान, व्यायाम,
नृत्य, दिमागी कसरत जैसी
तमाम गतिविधियों को देते हैं। 109 वर्षीय जेसी गैलन से जब उनकी लंबी आयु का राज़ पूछा गया तो
उन्होंने एक जवाब यह भी दिया कि वे पुरुषों से दूर रहती हैं। लेकिन किसी के मन में
यह ख्याल नहीं आता कि इसमें गुणसूत्र (क्रोमोसोम) की भी भूमिका हो सकती है। इसी संदर्भ में हाल ही में बायोलॉजी
लेटर्स में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि असमान लैंगिक गुणसूत्र वाले जीवों
की तुलना में समान लैंगिक गुणसूत्र वाले जीव अधिक जीते हैं।
अधिकतर
जानवरों में नर और मादा का निर्धारण लैंगिक गुणसूत्रों से होता है। स्तनधारियों में,
मादाओं में दोनों लैंगिक गुणसूत्र समान (XX) होते
हैं जबकि नर में असमान (XY) होते
हैं। पक्षियों में नर में लैंगिक गुणसूत्र समान (ZZ) होते हैं जबकि मादा
में असमान (ZW) होते
हैं। नर ऑक्टोपस जैसे कुछ जीवों में एक ही लैंगिक गुणसूत्र होता है।
युनिवर्सिटी
ऑफ न्यू साउथ वेल्स के इकॉलॉजिस्ट ज़ो ज़ाइरोकोस्टास और उनके साथी जानना चाहते थे
कि क्या असमान लैंगिक गुणसूत्र (जैसे XY) वाले जीवों में
आनुवंशिक उत्परिवर्तनों का खतरा अधिक होता है, जिसके
कारण उनका जीवन काल छोटा हो जाता है? शोधकर्ताओं
ने वैज्ञानिक शोध पत्रों, किताबों और ऑनलाइन
डैटाबेस को खंगाला और लैंगिक गुणसूत्र और आयु सम्बंधी डैटा निकाला। उन्होंने 99 कुल,
38 गण
और 8 वर्गों
की 229 प्रजातियों
के नर और मादाओं के जीवन काल की तुलना की। उन्होंने पाया कि किसी भी प्रजाति में
समान लैंगिक गुणसूत्र वाले लिंग का जीवन काल 17.6 प्रतिशत तक अधिक होता है। जीवन काल का यह
पैटर्न मनुष्यों, जंगली जानवरों और
पालतू जानवरों में दिखाई दिया।
शोधकर्ताओं
का कहना है कि लिंगों के बीच जीवन काल का यह अंतर विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग होता है। जैसे
जर्मन कॉकरोच (Blattellagermanica प्रजाति) के नर (सिर्फ X) की
तुलना में मादा (XX) 77
प्रतिशत अधिक जीवित रहती है। यह अंतर इस बात पर भी निर्भर
करता है कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाला जीव नर है या मादा। अध्ययन में उन्होंने
पाया कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाली मादा (स्तनधारी, सरीसृप,
कीट और मछलियां) अपनी प्रजाति के नर की तुलना में 20.9 प्रतिशत अधिक समय तक जीवित रहती हैं। दूसरी
ओर, समान लैंगिक गुणसूत्र वाले नर (पक्षी और तितलियां) अपनी प्रजाति की
मादाओं की तुलना में सिर्फ 7 प्रतिशत ही अधिक जीते हैं।
शोधकर्ताओं
का कहना है कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाले नर और मादा के जीवन काल में फर्क देखकर
लगता है कि दीर्घायु को लैंगिक गुणसूत्र के अलावा अन्य कारक भी प्रभावित करते हैं।
इनमें से एक कारक हो सकता है प्रजनन-साथी चयन का दबाव। मादाओं को रिझाने के लिए कुछ प्रजातियों
के नर की शारीरिक बनावट और व्यवहार आकर्षक होते हैं, जिसके
लिए उन्हें काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है जिसका खामियाज़ा उनके स्वास्थ्य को
भुगतना पड़ता है और जिससे उनकी मृत्यु जल्दी हो जाती है।
आगे शोध से यह समझने में मदद मिलेगी कि लैंगिक गुणसूत्र जीवन काल को कैसे प्रभावित करते हैं। जैसे क्या एक लैंगिक-गुणसूत्र का छोटा आकार नर और मादाओं की आयु में अंतर के लिए जि़म्मेदार है। (स्रोत फीचर्स)
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लगभग
दस करोड़ वर्ष पुराने एम्बर में अब तक पाए गए सबसे छोटे डायनासौर का सिर सुरक्षित
मिला है। रेजि़न में फंसा यह सिर (चोंच सहित) लगभग 14 मिलीमीटर का है। इससे लगता है कि यह डायनासौर बी-हमिंगबर्ड जितना
बड़ा रहा होगा। यह सिर जिस डायनासौर समूह का है, माना
जाता है कि उससे आधुनिक पक्षियों का विकास हुआ है।
म्यांमार
से प्राप्त इस जीवाश्म को ओकुलुडेंटेविस खौंगरेई यानी आई-टूथ बर्ड का नाम
दिया गया है। आधुनिक छिपकली की तरह, इसके
सिर के दोनों ओर बड़ी-बड़ी
आंखें हैं। और इसकी आंखों का छिद्र छोटा है जो आंखों में प्रवेश करने वाली रोशनी
को सीमित करता है। इससे लगता है कि यह जानवर दिन में सक्रिय रहता था।
आदिम
पक्षियों की तरह ओकुलुडेंटेविस के ऊपरी और निचले जबड़े में नुकीले दांत थे,
जिससे लगता है कि यह एक शिकारी जीव था जो कीटों और छोटे
अकशेरुकी जीवों का शिकार करता था। नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोध में
शोधकर्ताओं को लगता है कि डायनासौर की यह प्रजाति द्वीपीय बौनेपन का एक उदाहरण है,
जो टापुओं की उस अर्ध वलय पर रहते थे जहां वर्तमान म्यांमार
स्थित है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि शरीर के बाकी हिस्सों के बिना पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि ओकुलुडेंटेविस अन्य डायनासौर से कितना करीबी था, या वह उड़ सकता था या नहीं। लेकिन उन्हें लगता है कि यह शायद आर्कियोप्टेरिक्स और जेहोलॉर्निस प्रजाति के पक्षियों के समान है जो लगभग 15 से 12 करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में थे।(स्रोत फीचर्स)
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