कई लोगों को मकड़ियों (spiders) से नफरत होती है और कई लोगों को उनसे डर भी लगता है – इसी भावना को व्यक्त करने के लिए बना है शब्द एरेक्नेफोबिया (arachnophobia)। लेकिन वैज्ञानिकों (scientists) को मकड़ियों की एक बात आकर्षित करती है – उनकी पतली कमर। कहते तो यहां तक हैं कि जिस रेत-घड़ीनुमा फिगर (hourglass figure) की कामना कई तारिकाएं (celebrities) करती हैं, वह मकड़ियों को तो सहज ही मिल गया है। और अब प्लॉस बायोलॉजी (PLOS Biology) में प्रकाशित एक शोध पत्र बताता है कि इसके लिए मकड़ियों को डाएटिंग (dieting) वगैरह नहीं करना पड़ता, बल्कि यह एक प्राचीन जीन (ancient gene) का कमाल है।
इस शोध पत्र के लेखकों – विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (University of Wisconsin) की एमिली सेटन और उनके साथियों – ने दक्षिण-पूर्वी कोलोरैडो (Colorado) के घास के मैदानों में तफरीह करते हुए टेक्सास ब्राउन टेरेंटुला (Texas brown tarantula) (Aphonopelma hentzi) नामक मकड़ी के भ्रूण (embryos) इकट्ठे किए। इन भ्रूणों के जीनोम (genome sequencing) के अनुक्रमण से उन्हें 12 ऐसे जीन्स (genes) मिले जो कमर के दोनों ओर की कोशिकाओं में विकास के दौरान अभिव्यक्त होते हैं। आम घरेलू मकड़ी (common house spider) (Parasteatoda tepidariorum) के भ्रूणों में इन 12 जीन्स को एक-एक करके निष्क्रिय करने पर पता चला कि इनमें से एक (जिसे नाम दिया गया है waist-less) कमर के उस विशिष्ट पिचके हुए हिस्से के लिए ज़िम्मेदार होता है जो मकड़ी के शरीर (body structure) को दो भागों में बांटता है। जिन भ्रूणों में यह जीन नहीं होता वे एकदम गोल-मटोल आठ टांग वाली मकड़ी में विकसित हो जाते हैं।
शोधकर्ताओं (researchers) का मत है कि waist-less जीन लाखों साल पहले अस्तित्व में आया था और कई प्रजातियों के भ्रूणीय विकास (embryonic development) में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन कीटों (insects) व केंकड़ानुमा जंतुओं (crustaceans) ने इसे गंवा दिया। मकड़ियों में यह बना रहा और उन्हें उनकी पतली कमर देता रहा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://scitechdaily.com/images/Spider-Embryo-Loss-Waist-Region.jpg https://cms.interestingengineering.com/wp-content/uploads/2024/08/antimony-38.png
प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की अथाह गहराइयों में एक रहस्यमयी दुनिया छिपी हुई है। मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench) पृथ्वी के महासागरों की सबसे गहरी जगह है। यहां गहराई लगभग 11,000 मीटर तक है। इतनी गहराई पर दाब (pressure) बहुत अधिक, ठंड (temperature) अकल्पनीय और अंधकार (darkness) भी घटाटोप होता है। ये परिस्थितियां इस जगह को पृथ्वी की सबसे प्रतिकूल और दूभर परिस्थितियों में शुमार करती हैं। लेकिन हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इन परिस्थितियों में भी जीवन (deep-sea life) की हैरतअंगेज़ विविधता मौजूद है। यह विविधता गहरे समुद्र की पारिस्थितिकी (deep ocean ecosystem) के बारे में हमारी वर्तमान समझ को ललकारती है।
हाल ही में, चीन के वैज्ञानिकों ने फेंडोज़े पनडुब्बी (Fendouzhe Submarine) के ज़रिए मैरियाना ट्रेंच की गहराइयों में गोता लगाया है। जैसे-जैसे वे नीचे उतरे, उन्होंने अंधकार में दीप्ति बिखेरने वाले जीव (bioluminescent organisms) देखे; जो हरी, पीली और नारंगी चमक बिखेर रहे थे। समुद्र के पेंदे (ocean floor) पर पहुंचने पर टीम ने जब रोशनी चालू की, तो उन्हें एक विस्मयकारी नीली दुनिया दिखाई दी, जहां प्लवकों (plankton) की भरमार थी।
यह खोज मैरियाना ट्रेंच पर्यावरण और पारिस्थितिकी अनुसंधान (MEER – Mariana Trench Ecology and Environment Research) परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत किए गए अध्ययन सेल पत्रिका (cell journal) में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध की सबसे चौंकाने वाली खोज 7000 से अधिक नए सूक्ष्मजीवों (new microbes, deep-sea bacteria) की पहचान है, जिनमें से 89 प्रतिशत विज्ञान के लिए पूरी तरह नए हैं। ये सूक्ष्मजीव हैडल ज़ोन (hadal zone – 6000 से 11,000 मीटर की गहराई) की कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विकसित हैं।
गौरतलब है कि कुछ सूक्ष्मजीवों (microorganisms) के जीनोम (genome sequencing)बहुत कुशल होते हैं, जो सीमित कार्यों के लिए अनुकूलित होते हैं। जबकि कुछ अन्य के जीन (genes) अधिक जटिल होते हैं, जिससे वे बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढाल सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide metabolism) जैसी गैसों को अपना भोजन बनाते हैं। यह क्षमता उन्हें पोषक तत्वों की कमी (nutrient-poor environment) वाले समुद्री वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।
आगे के इस अध्ययन में एम्फिपॉड्स (amphipods – छोटे झींगे जैसे जीव) पर ध्यान दिया गया, जो समुद्री खाइयों (deep-sea trench) में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों (scientists) ने पाया कि ये जीव गहरे समुद्र में रहने वाले बैक्टीरिया (deep sea symbiotic bacteria) के साथ सहजीवी सम्बंध रखते हैं। उनकी आंतों में सायक्रोमोनास (Psychromonas bacteria) नामक बैक्टीरिया काफी संख्या में मिले, जो ट्राइमेथिइलएमाइन एन-ऑक्साइड (TMAO – Trimethylamine N-oxide) नामक एक यौगिक का निर्माण करने में मदद करते हैं। TMAO गहरे समुद्र के अत्यधिक दाब (extreme pressure adaptation)से जीवों की रक्षा करने में अहम भूमिका निभाता है।
शोध के तीसरे चरण में यह समझने की कोशिश की गई कि गहरे समुद्र की मछलियां (deep-sea fish) अत्यधिक दाब और ठंडे तापमान में कैसे जीवित रहती हैं। जेनेटिक विश्लेषण (genetic analysis) से पता चला कि 3000 मीटर से अधिक गहराई में रहने वाली मछलियों में एक विशेष जेनेटिक परिवर्तन (genetic mutation) होता है, जो उनकी कोशिकाओं को अधिक कुशलता से प्रोटीन बनाने (protein synthesis) में मदद करता है। यह अनुकूलन उन्हें समुद्री दाब से बचने में सहायता करता है।
शोध से यह भी पता चला कि विभिन्न जीवों ने गहरे समुद्र में कब शरण (deep-sea migration) ली होगी। मसलन, ईल मछलियां (eel fish) शायद लगभग 10 करोड़ साल (100 million years ago) पहले गहरे समुद्र में चली गई होंगी जिसकी वजह से वे डायनासौर विलुप्ति (dinosaur extinction) वाली घटना से बच गई होंगी। इसी तरह स्नेलफिश (Snailfish) लगभग 2 करोड़ साल पहले (20 million years ago) समुद्र की गहरी खाइयों में पहुंच गई होगीं। यह वह समय था जब पृथ्वी पर टेक्टोनिक हलचल (tectonic activity) सबसे अधिक थी यानी धरती के भूखंड तेज़ी से इधर-उधर भटक रहे थे।
ये निष्कर्ष इस बात को नुमाया करते हैं कि गहरा समुद्र (deep sea) लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और ऑक्सीजन के उतार-चढ़ाव के दौरान कई जीवों को पनाह देता रहा है।
इन रोमांचक खोजों के साथ-साथ वैज्ञानिकों ने गहरे समुद्र में कुछ चिंताजनक चीज़ें (deep-sea pollution) भी देखीं; उन्हें मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench)और याप ट्रेंच (Yap Trench) में प्लास्टिक बैग(plastic pollution), बीयर की बोतलें (beer bottles), सोडा कैन (soda can) और एक टोकरी (basket) भी मिली है। यह दर्शाता है कि मानव गतिविधियों का असर (human activities impact) दूरस्थ और दुगर्म क्षेत्रों तक पहुंच चुका है।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ बैक्टीरिया (bacteria) इन प्रदूषकों (pollutants) का इस्तेमाल ऊर्जा स्रोत (energy source) के रूप में करने में सक्षम हैं। इससे लगता है कि भविष्य में समुद्री बैक्टीरिया (marine bacteria) पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकते हैं।
बहरहाल, समुद्र की अधिकांश गहराइयां अब भी अनदेखी हैं। संभव है कि वहां भी असंख्य अनजाने जीव (undiscovered species) हैं। MEER की योजना आगे भी ऐसे अध्ययन जारी रखने की है। (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zcaho64/card-type9/_20250306_on_marianatrench-1741811731603.jpg
समुद्री कछुए (Sea Turtles) अपने भोजन स्थलों को याद रखने के लिए पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) का उपयोग करते हैं। नेचर पत्रिका (Nature Journal) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, लॉगरहेड कछुए (Loggerhead Turtles – Caretta caretta) खास चुंबकीय संकेतों को पहचान सकते हैं, जिससे वे भोजन के स्थान को याद रख पाते हैं, ठीक जीपीएस (GPS-like navigation) की तरह।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 62 लॉगरहेड कछुओं का अध्ययन किया। उन्हें पानी से भरे कटोरे में रखा गया, जिसके चारों ओर विद्युत-चुंबक (electromagnets) लगे थे जो विशिष्ट चुंबकीय क्षेत्र बनाते थे। प्रत्येक कछुए को एक विशेष चुंबकीय क्षेत्र में रखा गया और उसे स्वादिष्ट भोजन (स्क्विड और न्यूट्रिएंट जेल) (squid and nutrient gel) दिया गया जिसके नतीजे में कछुओं ने उत्साह में टर्टल डांस (मुंह खोलना (opening mouth), पानी में उछलना (leaping in water), और शरीर को बाहर निकालना (raising body out of water)) किया।
भोजन न मिलने पर भी, जब कछुओं को वही चुंबकीय क्षेत्र (magnetic signals memory) दोबारा अनुभव कराया गया तो उन्होंने खुशी से अपना टर्टल डांस किया। इससे पता चला कि वे भोजन से जुड़े चुंबकीय संकेतों (food-associated magnetic fields) को याद रखते हैं। हैरानी की बात यह है कि उनमें यह याददाश्त कम से कम चार महीने तक बरकरार रही।
अधिक गहराई से समझने के लिए, वैज्ञानिकों ने रेडियोफ्रिक्वेंसी तरंगों (radio frequency waves) का उपयोग किया, जो जीवों की चुंबकीय दिशा-सूचना को बाधित करती हैं। इसके उपयोग से कछुए भ्रमित (turtle disorientation) हुए और दिशा पहचानने में असफल रहे, लेकिन जब भोजन से जुड़े चुंबकीय संकेत (food-related magnetic cues) दिए गए तो वे फिर से नृत्य करने लगे। इससे यह पता चलता है कि कछुए दो अलग-अलग जैविक प्रणालियों (biological navigation systems) का उपयोग कर सकते हैं – एक दिशा पहचानने के लिए और दूसरी भोजन स्थलों जैसी महत्वपूर्ण जगहों को याद रखने के लिए।
इस खोज से यह भी स्पष्ट होता है कि पक्षी (birds) और उभयचर (amphibians) जैसे कई प्रवासी जीव (migratory species) भोजन, प्रजनन स्थल और अनुकूल जलवायु खोजने के लिए दोहरी चुंबकीय प्रणाली का उपयोग कर सकते हैं।
लॉगरहेड कछुए का मनमोहक नृत्य देखने के लिए: https://phys.org/news/2025-02-sea-turtles-secret-gps-loggerheads.html (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/content/article/watch-sea-turtles-dance-joy-when-they-magnetically-sense-it-s-snack-time
आपको कहीं कोई परिचित दिख जाए तो कभी हाव-भाव से, तो कभी पलकें झपका आप उससे दुआ-सलाम कर लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। कई बार पलकें झपकाकर किसी बात पर सहमति भी जता देते हैं। कुल मिलाकर हम हाव-भाव से और पलकें झपकाकर अपने साथियों से कई बातें कर लेते हैं। वो भी बिना सोचे-विचारे। यह बरबस ही अनुक्रिया के तौर पर हो जाता है। इस तरह से संवाद करना मनुष्यों और अन्य प्राइमेट्स (primates) में दिखाई देता है। अब, रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन (scientific study) बताता है कि कुत्ते भी पलकें झपकाकर आपस में संवाद करते हैं।
शोधकर्ताओं को यह तो पहले से ही पता था कि पालतू कुत्ते (pet dogs) जब दूसरे कुत्तों के आसपास होते हैं तो पलकें ज़्यादा झपकाते हैं। ऐसा भी लगता है कि जब तनाव (stress) या टकराव की स्थिति बढ़ती दिखाई देती है तो वे अपने साथी कुत्तों और इंसानों के साथ भी शांति बनाए रखने के लिए पलकें झपकाते हैं। इसके अलावा, कुत्ते अन्य कुत्तों के जम्हाई लेने और खुशमुमा चेहरे बनाने पर वही व्यवहार दोहराते हैं, जिससे लगता है वे संवाद करने और रिश्ते बनाने के लिए चेहरे के भावों की नकल (फेस मिमिक्री- face mimicry) करते हैं।
कुत्तों में बार-बार पलकें झपकाने का व्यवहार देख पर्मा विश्वविद्यालय की वैकासिक जीवविज्ञानी (evolutionary biologist) चिआरा कैनोरी को लगा कि क्या पलकें झपकाने का यह व्यवहार फेस मिमिक्री (facial mimicry) का हिस्सा है या कुछ अलग है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए कैनोरी और उनके साथियों ने टेरियर (terrier), कॉकर स्पैनियल (cocker spaniel), और बॉर्डर कोली (border collie) कुत्तों के 12-12 सेकंड लंबे कई वीडियो बनाए। उनके सामने कोई खिलौना या खाने का सामान रखा गया था।
कुछ वीडियो क्लिप्स (video clips) में शोधकर्ताओं ने देखा कि कुत्ते पलकें झपका रहे थे, जबकि कुछ में नहीं झपका रहे थे। शोधकर्ताओं को कुछ वीडियो ऐसे भी मिले जिनमें कुत्ते नाक चाट रहे थे और लालसा या झुंझलाहट का भाव दिखा रहे थे। इसके बाद शोधकर्ताओं ने वीडियो को संपादित किया और उनसे 71 सेकंड लंबी एक वीडियो क्लिप (video footage) बनाई जिसमें कुत्ते हर 4 सेकंड के अंतराल पर पलक झपकाने और नाक चाटने की हरकत करते दिखाई दे रहे थे।
इसे उन्होंने एक बड़े पर्दे पर रेंडम तरीके से चुने हुए विभिन्न नस्लों के 54 वयस्क पालतू कुत्तों (adult pet dogs) को दिखाया। हां, चुनाव करते समय शोधकर्ताओं ने इस बात का ध्यान ज़रूर रखा था कि वीडियो में दिख रहे कुत्ते इन 54 कुत्तों से पहले कभी न मिले हों। वीडियो दिखाते समय शोधकर्ताओं ने दर्शक कुत्तों के भावों को पढ़ने के लिए उन पर हार्ट मॉनिटर (heart monitor) लगाए और उनकी प्रतिक्रियाओं का वीडियो भी बनाया।
इन सभी रिकॉर्डिंग (recordings) का विश्लेषण करने पर पाया गया कि कुछ दर्शक कुत्ते तो वीडियो से ऊब गए और सो गए, लेकिन बाकी ने कुछ प्रतिक्रियाएं दिखाईं। दर्शक कुत्तों ने दो अन्य प्रकार के हाव-भाव की तुलना में पलक झपकाने के वीडियो के प्रति औसतन 16 प्रतिशत अधिक पलकें झपकाईं। पलकें अधिक बार झपकाने से लगता है कि कुत्ते शायद पलक झपकाने की नकल करते हैं।
हालांकि शोधकर्ता इन परिणामों को थोड़ा सावधानी से समझने को कहते हैं। उनका कहना है कि अधिक बार पलकें झपकाने का मतलब यह नहीं है कि कुत्ते सोच-समझकर पलकें अधिक बार झपका रहे हैं। यह हमारी तरह का मामला हो सकता है। हम मनुष्यों की तरह कुत्ते भी शायद अवचेतन रूप से संवाद (subconscious communication) कर रहे होंगे।
भले ही पलक झपकाना पूरी तरह से सोच-समझकर प्रत्युत्तर देने का व्यवहार न हो, लेकिन परिणाम बताते हैं कि कुत्ते इसे सार्थक तरीकों से उपयोग करने लगे हैं। पलक झपकाना एक संकेत (non-verbal signal) हो सकता है कि मैं शांत हूं, तुम भी शांत रहो।
इसके विपरीत, अध्ययन में यह भी देखा गया कि दर्शक कुत्तों ने वीडियो के कुत्तों को नाक चाटते देखकर अपनी नाक नहीं चाटी, बल्कि उन्होंने अपनी आंखों का श्वेत पटल (स्क्लेरा (sclera)) अधिक दिखाया। यह अवलोकन थोड़ा हैरत में डालता है क्योंकि वैज्ञानिक (scientists) अब तक इस प्रतिक्रिया को कुत्तों के किसी सशक्त भावावेग – सकारात्मक या नकारात्मक – के प्रदर्शन से जोड़कर देखते आए हैं। इस मामले में साफ है कि इन कुत्तों ने ऐसे किसी भावावेग की अनुपस्थिति में यह प्रतिक्रिया दी।
यह अवलोकन इस बात को रेखांकित करता है कि हमें जानवरों के संवाद (animal communication) को समझना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं, बल्कि यह पेचीदा और टेढ़ा मामला है। लोग अक्सर कहते हैं कि अरे, कुत्तों के ऐसा करने का मतलब यह है, वैसा करने का मतलब वह है, फलाना तनाव (dog stress signals) का संकेत है, ढिमकाना खुशी (dog happiness signs) का संकेत है वगैरह-वगैरह। लेकिन इस अवलोकन से लगता है कि इस तरह के सामान्यीकरण करते हुए बहुत सतर्कता की ज़रूरत है।(स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z6v2wss/abs/_20250218_on_dog_blinking.jpg
हाल में करंट बायोलॉजी (Current Biology) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2004 में आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के ताई नेशनल पार्क (Tai National Park) में शिकारियों ने जब चिम्पैंज़ियों (chimpanzees) के एक समूह के अंतिम दो वयस्क नरों में से एक को गोली मार दी थी तो उसके साथ-साथ चिम्पैंज़ियों के उस समूह की ‘बोली’ का एक इशारा (भाव-भंगिमा) भी खत्म हो गया।
वैसे तो कई अध्ययनों से हमें चिम्पैंज़ियों के व्यवहार (chimpanzee behavior)/औज़ारों के इस्तेमाल वगैरह में विविधता के बारे में काफी कुछ पता चला है। हम यह भी जानते हैं चिम्पैंज़ी समुदाय (chimpanzee community) किस तरह से औज़ारों/साधनों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह अध्ययन पहली बार इस बात के प्रमाण प्रस्तुत करता है कि चिम्पैंज़ियों के अलग-अलग समूह एक ही चाहत या संवाद के लिए अलग-अलग हाव-भाव (gestures) का इस्तेमाल करते हैं और मनुष्यों के हस्तक्षेप या गतिविधियों के कारण उनके समूह के ये विशिष्ट व्यवहार विलुप्त हो रहे हैं।
दरअसल नर चिम्पैंज़ी जब मादा के लिए अन्य नरों के साथ होने वाले टकराव और लड़ाई को टालना चाहते हैं तो वे गुपचुप संभोग (mating) के लिए मादा को चुपके से इशारा करते हैं। ये इशारे आम तौर पर संभोग आमंत्रण (mating invitation) के लिए दिए जाने वाले इशारों से अलग होते हैं। ये इशारे इतने चुपके से किए जाते हैं कि बस पास मौजूद मादा का ही इन पर ध्यान जाए, अन्य नरों का नहीं।
स्विस सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च (Swiss Center for Scientific Research) के संरक्षण जीवविज्ञानी (conservation biologist) चिम्पैंज़ियों के इन्हीं इशारों और उनके मायनों में विविधता का अध्ययन कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने ताई जंगल (Tai forest) में रहने वाले चार चिम्पैंज़ी समुदायों के 495 इशारों का अध्ययन किया और पाया कि एक ही बात के लिए प्रत्येक समूह के इशारों में अंतर होता है, हालांकि कुछ इशारे एक समान भी होते हैं। जैसे संभोग के लिए आग्रह करने के लिए चारों समुदायों के नर किसी एक डाली को आगे-पीछे हिलाते हैं या अपनी एड़ी को ज़मीन पर पटकते हैं। लेकिन सिर्फ दक्षिणी और पूर्वी समुदाय के चिम्पैंज़ी चुपके से संभोग के इशारे के लिए पत्तियों को चीरते हैं, और केवल पूर्वोत्तर समुदाय के चिम्पैंज़ी उंगलियों के जोड़ से पेड़ या किसी सख्त सतह को ठोंकते हैं जैसे हम दरवाज़े को खटखटाते हैं। इस इशारे को नकल नॉक (knuckle knock) कहते हैं।
वहीं हज़ारों किलोमीटर दूर युगांडा (Uganda) के चिम्पैंज़ी इनमें से किसी इशारे का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि वे अपने दोनों हाथों से किसी वस्तु पर तबला जैसे बजाते हैं, और यह इशारा आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के चिम्पैंज़ियों में नहीं देखा गया था।
जब शोधकर्ता इन इशारों का अध्ययन कर रहे थे तब दल की फील्ड असिस्टेंट होनोरा नेने कपाज़ी का ध्यान चिम्पैंज़ियों के पूर्वोत्तर समूह द्वारा किए जाने वाले एक इशारे की ओर गया। उनके ध्यान में यह बात पिछले 30 से अधिक वर्षों से चिम्पैंज़ियों के साथ किए गए उनके काम के अनुभव के चलते आई। कपाज़ी ने पाया कि चिम्पैंज़ियों के पूर्वोत्तर क्षेत्र के समूह द्वारा किए गए इस नकल नॉक (knuckle knock) इशारे का उपयोग उत्तरी क्षेत्र के समुदायों में भी काफी आम हुआ करता था, लेकिन यह इशारा अब वहां से नदारद है।
दरअसल, उत्तरी क्षेत्र के चिम्पैंज़ियों की संख्या में 1990 के दशक की शुरुआत में इबोला (Ebola) के कारण कमी आनी शुरू हुई थी। फिर 1999 में मनुष्यों से चिम्पैंज़ियों में एक श्वसन रोग (respiratory disease) फैला, जिसके कारण वहां उस समूह में मात्र दो वयस्क नर सदस्य बचे। फिर 2004 में शिकारियों ने उन दो नरों में से एक नर, मारियस, को गोली मार दी। बचा मात्र एक नर चिम्पैंज़ी। और जब समूह में एक ही नर बचा तो मादा के लिए टकराव या लड़ाई की गुंजाइश ही नहीं रही, और जब मादा के लिए कोई प्रतिद्वंदी ही नहीं तो संभोग के लिए चुपके से इशारा कर बुलाने की कोई ज़रूरत ही नहीं रही। नतीजतन, मारियस की मृत्यु के साथ ही नकल नॉक (knuckle knock) का इशारा भी खत्म हो गया।
वास्तव में, चिम्पैंज़ियों में कई तरह के जन्मजात इशारे (innate gestures) होते हैं, जो सभी समुदाय के नर चिम्पैंज़ी कर सकते हैं – लेकिन अलग-अलग समुदायों के इन इशारों के अर्थ अलग-अलग होते हैं। और यह अध्ययन संरक्षण प्रयासों (conservation efforts) में इसी विविधता के महत्व पर ध्यान दिलाता है।
हम जानते हैं कि शिकारी जंगलों से चिम्पैंज़ियों समेत तमाम जीव-जंतुओं का सफाया कर रहे हैं। इसके चलते चिम्पैंज़ियों की जेनेटिक विविधता (genetic diversity) खतरे में है। जेनेटिक विविधता पर्यावरणीय बदलावों (environmental changes) के साथ अनुकूलन को संभव बनाती है। सांस्कृतिक विविधता (cultural diversity) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है; इसका विनाश चिम्पैंज़ियों में बदलते पर्यावरण के प्रति अनुकूलन की क्षमता प्रभावित करेगा।(स्रोतफीचर्स)
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एक ताज़ा अध्ययन कहता है कि प्रजातियों के संरक्षण (species conservation) के मामले में छोटे किंतु विषय विशेषज्ञ जर्नल में प्रकाशन नेचर (Nature) या साइंस (Science) जैसे प्रतिष्ठित जर्नल (high-impact journals) में प्रकाशन से ज़्यादा असरदार होता है। यूएस में जोखिमग्रस्त प्रजाति अधिनियम (ESA) सम्बंधी निर्णय प्रक्रिया में उद्धरणों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष दिया गया है।
गौरतलब है कि वनों की कटाई, निर्माण कार्य, या ऐसी ही अन्य मानवीय गतिविधियों के चलते यदि जोखिमग्रस्त वन्यजीव (endangered wildlife) पर खतरा मंडराता है तो ESA के तहत इन गतिविधियों पर लगाम कसी जा सकती है।
वास्तव में होता यह है कि लोग प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशन करते हैं क्योंकि इससे संरक्षण शोधकर्ता के करियर में मदद मिलती है – नौकरी, पदोन्नति या फंडिंग के निर्णय इस आधार पर होते हैं कि शोधकर्ता के प्रकाशनों को कितनी बार उद्धरित किया गया और जिन जर्नल में वे प्रकाशित हुए उनका इम्पैक्ट फैक्टर क्या है। इम्पैक्ट फैक्टर (journal impact factor) यह बताता है कि किसी जर्नल में छेपे लेखों का हवाला कितने लेखों में दिया जाता हैष
शोधार्थियों (researchers) को आम तौर पर शोध पत्र प्रजाति-विशिष्ट जर्नल (species-specific journals) में प्रकाशन न करने की सलाह दी जाती, क्योंकि उनका इम्पैक्ट फैक्टर कम होता है। शोध कितना भी बढ़िया और उपयोगी हो, विशिष्ट जर्नल में प्रकाशन से पाठक बहुत सीमित हो जाते हैं और आगे के अवसर भी।
ड्यूक विश्वविद्यालय (Duke University) के समुद्री संरक्षण जीवविज्ञानी (marine conservation biologist) ब्रायन सिलिमन और उनके साथियों को यह जानने का ख्याल आया कि कौन से जर्नल में प्रकाशित अध्ययनों का उल्लेख ESA में नई प्रजाति शामिल करते समय किया गया है। शोधकर्ताओं ने 2012 से 2016 के बीच ESA में जोड़ी गईं 260 प्रजातियों के 785 जर्नल में प्रकाशित शोध पत्रों के 4836 उल्लेखों का विश्लेषण किया।
जर्नल के इम्पैक्ट फैक्टर के अनुसार उन्होंने पाया कि ESA के सिर्फ 7 प्रतिशत उल्लेख 9 से अधिक इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल से थे जबकि 87 प्रतिशत उल्लेख 4 से कम इम्पैक्ट फैक्टर (तथाकथित अप्रभावी) (low-impact journals) जर्नल से थे। मध्यम इम्पैक्ट फैक्टर (medium-impact journals) वाले जर्नल के महज 6 प्रतिशत उल्लेख थे जबकि इम्पैक्ट फैक्टर की गणना से सर्वथा बाहर के जर्नलों का उल्लेख 13 प्रतिशत था।
इतना ही नहीं शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि ESA में शामिल होने के लिए किस जर्नल में प्रकाशन असरदार होगा। इसमें सर्वोच्च रैंक वाली पत्रिका थी पैसिफिक साइंस(Pacific Science), जो एक क्षेत्रीय पत्रिका है और जिसका इम्पैक्ट फैक्टर महज 0.74 था।
कुल मिलाकर ESA उल्लेखों के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत थे क्षेत्रीय पत्रिकाएं, टैक्सा-विशिष्ट पत्रिकाएं (taxon-specific journals) और साथ ही हैबिटैट विशिष्ट जर्नल(habitat-specific journals)।
कंज़र्वेशन बायोलॉजी (Conservation Biology) में प्रकाशित यह अध्ययन दर्शाता है कि संरक्षण कानून ठोस व्यावहारिक कार्य के आधार पर चलता है जो आम तौर पर विषय विशिष्ट पत्रिकाओं में प्रकाशित होता है, लेकिन यह काम अकादमिक प्रोत्साहन और वित्त पोषण प्रणालियों द्वारा पुरस्कृत नहीं किया जाता। लिहाज़ा, ज़रूरत इस बात की है कि विषय विशिष्ट पत्रिकाओं (specialized journals) में प्रकाशन को भी समर्थन मिले। (स्रोत फीचर्स)
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यह तो हम जानते हैं कि चमगादड़(bats) रेबीज़(rabies), इबोला(ebola), मारबर्ग(marburg) और सार्स(sars) जैसे कई घातक वायरस अपने शरीर में ढोते हैं। चमगादड़ों से संपर्क (bat-human transmission) के चलते संक्रमण मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं में फैल सकता है। लेकिन चमगादड़ इन वायरस (pathogens) से कभी बीमार नहीं पड़ते; कभी वे इन वायरस से संक्रमित हो भी गए तो बहुत मामूली से बीमार होते हैं, और उनकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) कभी अतिसक्रिय नहीं होती है।
यह क्षमता उनमें आई कब और कैसे? झेजियांग विश्वविद्यालय (Zhejiang University) के तुलनात्मक प्रतिरक्षाविज्ञानी (comparative immunologist) आरोन इरविंग और उनके साथियों ने इस सवाल का जवाब खोजने के लिए 10 चमगादड़ों के जीनोम का अनुक्रमण किया – जिनमें चार हॉर्सशू चमगादड़ (horseshoe bats) और हिप्पोसाइडरिडे कुल (Hipposideridae family) के कुछ चमगादड़ शामिल थे। ये सभी चमगादड़ कोरोनावायरस (coronavirus carriers) के वाहक थे। इसके बाद उन्होंने इनकी तुलना वंशवृक्ष के 10 अन्य चमगादड़ प्रजातियों के जीनोम अनुक्रम से की।
नेचरपत्रिका (Nature Journal) में प्रकाशित इन नतीजों पाया गया कि 95 अन्य स्तनधारी प्रजातियों की तुलना में चमगादड़ों में काफी अधिक संख्या में प्रतिरक्षा जीन मौजूद थे, और उनमें पाए गए परिवर्तन प्राकृतिक चयन का संकेत देते थे।
इनमें से कुछ अनुकूलन तो चमगादड़ों के कुल विशिष्ट में ही पाए गए थे, जो इस बात का संकेत देते हैं कि कुछ प्रतिरक्षा जीन चमगादड़ों के कुलों के अलग-अलग होने के बाद विकसित हुए हैं। लेकिन कई प्रतिरक्षा अनुकूलन (जीन) (genetic immune adaptations) सभी चमगादड़ों में मौजूद थे, जो इस बात का संकेत देते हैं कि ये जीन एक ही पूर्वज में पनपकर हस्तांतरित हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि जीवाश्म साक्ष्य (fossil evidence) बताते हैं कि चमगादड़ों में ये जीन लगभग उसी समय आए थे जब उनमें उड़ने की क्षमता विकसित हुई थी। (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.abd9595/full/bat_1280p-1644908614173.jpg
शहरों में चूहों की बढ़ती आबादी (rat infestation) एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिससे बीमारियों (diseases) और आर्थिक नुकसान (economic loss) का खतरा बढ़ रहा है। अनुमान है कि अकेले अमेरिका में चूहों से जुड़ी समस्याओं के कारण हर साल करीब 3000 अरब रुपए का आर्थिक नुकसान होता है। लेकिन अलग-अलग शहरों में इनके प्रकोप की तुलना के लिए ठोस आंकड़ों की कमी है।
इस सम्बंध में युनिवर्सिटी ऑफ रिचमंड (university of richmond) के शहरी पारिस्थितिकीविद जोनाथन रिचर्डसन द्वारा साइंस एडवांसेज़(Science advances) में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन(climate change), जनसंख्या वृद्धि (Population growth) और घटते हरित क्षेत्र (declining green spaces) चूहों की बढ़ती संख्या के मुख्य कारण हैं। तापमान बढ़ने और बगीचों व खुले इलाकों को रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्रों में बदलने से चूहों को अनुकूल परिस्थितियां (favourable conditions) मिल रही हैं।
चूहे बहुत चालाक और अनुकूलनशील जीव (adaptive creature) हैं, जो हज़ारों सालों से इंसानों के साथ रह रहे हैं। वे कचरे, सीवर और सड़क किनारे मिट्टी के छोटे-छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल बिल बनाने(nesting) और भोजन प्राप्त (food scavenging) करने के लिए बखूबी कर लेते हैं।
रिचर्डसन के अध्ययन में पाया गया कि जिन शहरों में तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है और जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, वहां चूहों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है। ठंड का मौसम (cold weather) आम तौर पर चूहों के प्रजनन (rat breeding) और भोजन खोजने की गतिविधियों को धीमा कर देता है। लेकिन गर्म जलवायु में वे तेज़ी से प्रजनन करते हैं और आसानी से भोजन जुटा लेते हैं। इसके अलावा शहरी इलाकों की अधिक जनसंख्या (high urban population) का मतलब है अधिक रेस्टोरेंट, कूड़ेदान और कचरा, जो चूहों के लिए पर्याप्त भोजन स्रोत उपलब्ध कराते हैं।
अध्ययन में शामिल 16 शहरों में से वॉशिंगटन डी.सी. (Washington D.C.) सबसे ज़्यादा प्रभावित पाया गया। पिछले 20 वर्षों में यहां चूहों की संख्या बोस्टन (boston) की तुलना में तीन गुना और न्यूयॉर्क सिटी (New York city) की तुलना में 1.5 गुना तेज़ी से बढ़ी है हालांकि अमेरिका का नगरीय प्रशासन हर साल चूहों पर नियंत्रण के लिए करीब 50 करोड़ डॉलर (4250 करोड़ रुपए) खर्च कर रहा है।
कुछ शहरों ने ज़रूर चूहों की संख्या को सफलतापूर्वक कम भी किया है। इनमें टोक्यो(tokyo), लुइविले (केंटकी) (Louisville, Kentucky) और न्यू ऑरलियन्स (New Orleans) शामिल हैं, जिससे यह पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में चूहों की समस्या को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे:
1. सख्त कचरा प्रबंधन (strict garbage management)– टोक्यो में कचरे के प्रभावी निपटान और कड़े नियमों के कारण चूहों को पनपने के लिए भोजन और आश्रय नहीं मिल पाता है।
2. जागरूकता अभियान (awareness campaigns)– न्यू ऑरलियन्स में लोगों को सिखाया जाता है कि वे अपने घरों और कचरा क्षेत्रों को चूहों से मुक्त कैसे रखें और चूहे दिखने की सूचना जल्द से जल्द दें।
3. सामाजिक दबाव (social pressure)– टोक्यो में सोशल मीडिया (social media) पर चूहों की समस्या सामने आते ही होटलों और व्यवसायों द्वारा तुरंत कार्रवाई की जाती है।
4. दीर्घकालिक निगरानी (long term monitoring)– चूहों की संख्या पर सतत नज़र रखने से यह समझने में मदद मिलती है कि कौन से उपाय प्रभावी हैं और कहां सुधार की आवश्यकता है।
रिचर्डसन की टीम के मुताबिक चूहों की समस्या पर काबू पाने के लिए अधिक संसाधन लगाने और नियंत्रण टीमों का विस्तार करने की आवश्यकता है। नगरीय प्रशासन और नागरिक मिलकर कचरा प्रबंधन, जागरूकता और बेहतर शहरी योजनाओं (waste management, awareness and urban planning)को प्राथमिकता दें, तो समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://nypost.com/wp-content/uploads/sites/2/2025/01/general-view-rat-coming-sidewalk-19299281.jpg?resize=1536,1069&quality=75&strip=all
जब हम जैव विविधता (Biodiversity) के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में हरे-भरे जंगल, रंगीन मूंगा चट्टानें (Coral reefs) और विभिन्न प्रकार के पौधे व जीव आते हैं। वैज्ञानिक अब एक और छिपे हुए खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं – प्रजातियों के भीतर जेनेटिक विविधता (Genetic diversity) में गिरावट।
नेचर पत्रिका (nature Journal) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जिस तरह विश्व में प्रजातियों की संख्या घट रही है, वैसे ही कई प्रजातियों के भीतर जेनेटिक विविधता भी कम हो रही है। इसका सीधा असर उनकी जलवायु परिवर्तन(Climate change) से निपटने, बीमारियों से लड़ने और पर्यावरणीय चुनौतियों (Environmental challenges) से बचने की क्षमता पर पड़ता है। यानी, जो प्रजातियां आज स्थिर दिख रही हैं, वे शायद हमारी सोच से कहीं अधिक खतरे में हो सकती हैं।
गौरतलब है कि जेनेटिक विविधता प्रकृति की सुरक्षा व्यवस्था की तरह काम करती है। यदि किसी प्रजाति में विविध जेनेटिक लक्षण (Genetic traits) होते हैं, तो प्रजाति के कुछ सदस्य नए खतरों – जैसे बढ़ते तापमान या नई बीमारियों से बचने में सक्षम हो सकते हैं। लेकिन शहरीकरण(Urbanisation), प्राकृतवासों का विनाश (habitat destruction) और जलवायु परिवर्तन (climate change) जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण जब जीवों की आबादी घटती है, तो उनके भीतर की जेनेटिक विविधता भी कम हो जाती है। इसे ‘मौन विलुप्ति’ (silent extinction) कहा जाता है। यानी एक धीमी और अदृश्य प्रक्रिया जो कई प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है।
इस शोध में वैज्ञानिकों ने पक्षी(birds), स्तनधारियों(mammals), मछलियों(Fish) और पौधों सहित 628 प्रजातियों पर किए गए 882 अध्ययनों का विश्लेषण किया। परिणाम चौंकाने वाले थे।
दो-तिहाई प्रजातियों में आनुवंशिक विविधता घट रही है। इसमें पहले से ही संकटग्रस्त काकेपो (न्यूज़ीलैंड का दुर्लभ उड़ानहीन तोता)(kakaepo) जैसे जीव तो शामिल हैं ही, गौरैया(sparrow) और ब्लैक-टेल प्रेयरी डॉग जैसी आम प्रजातियां भी प्रभावित हो रही हैं।
पारिस्थितिक तंत्र की बहाली (ecosystem restoration) या नाशी जीवों के नियंत्रण (pest control) जैसे कुछ संरक्षण प्रयासों का जेनेटिक विविधता के संरक्षण पर खास असर नहीं हुआ है। दूसरी ओर, प्राकृतवासों का विस्तार(habitat expansion), अलग-थलग आबादियों को फिर से जोड़ना और छोटी होती आबादी में नए जीवों को शामिल करना जेनेटिक विविधता बनाए रखने में सहायक साबित हुए हैं।
अब तक संरक्षण (conservation) के प्रयास मुख्य रूप से प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन 2022 में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता संधि (UN Biodiversity treaty) ने जेनेटिक विविधता की रक्षा के महत्व को भी स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम सुझाए हैं। जैसे प्राकृतवासों की सुरक्षा (Habitat Protection) और विस्तार जिसके अंतर्गत बड़े और आपस में जुड़े प्राकृतिक क्षेत्रों को संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि प्रजातियां स्वस्थ और जेनेटिक रूप से विविध बनी रहें। इसी प्रकार से, संकटग्रस्त आबादियों में नए सदस्यों को शामिल करना जेनेटिक विविधता को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
एक सुझाव यह भी है कि डीएनए विश्लेषण (DNA Analysis) और अन्य तकनीकों का उपयोग करके जेनेटिक विविधता पर नज़र रखी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संरक्षण प्रयास जेनेटिक क्षति (genetic loss) को पूरी तरह रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। डीएनए निगरानी (DNA Monitoring) जटिल और महंगी हो सकती है। लिहाज़ा इसके विकल्पों पर काम हो रहा है, जैसे आबादी के फैलाव के आधार पर जेनेटिक विविधता का अनुमान लगाना। अध्ययनों में पाया गया है कि 58 प्रतिशत से अधिक प्रजातियों की आबादी इतनी सिमट चुकी है कि वे दीर्घकालिक जेनेटिक विविधता बनाए नहीं रख सकतीं।
इस स्थिति को देखते हुए तत्काल कार्रवाई (immediate action) की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल प्राकृतवासों की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है बल्कि प्रजातियों के जेनेटिक भविष्य (genetic future) को भी सुरक्षित करना अनिवार्य है।
यदि संरक्षण प्रयासों में जेनेटिक विविधता को प्राथमिकता दी जाए, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रजातियां न केवल आज जीवित रहें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों (future generations) के लिए भी सशक्त और जीवनक्षम बनी रहें। (स्रोत फीचर्स)
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अधिकतर कोरल को देखकर ऐसा लग सकता है कि वे बस एक जगह जमे रहते हैं, अपनी जगह छोड़कर ज़रा भी यहां-वहां टहलते नहीं। बस अपना भोजन पाने के लिए थोड़ा लहरा-लहरा कर पास से गुज़रते जंतु-प्लवकों को पकड़ लेते हैं। लेकिन इनकी कुछ प्रजातियां थोड़ा घुमक्कड़ भी होती हैं। ऐसी ही कुछ घुमक्कड़ प्रजातियां मशरूम कोरल (Fungiidae) कुल की सदस्य हैं। इस कुल के सदस्य देखने में ऐसे लगते हैं जैसे कोमल सुइयों का कोई चमकीला तकिया हों।
अवलोकनों से इतना तो पता चल चुका है कि मशरूम कोरल कुल के कुछ सदस्य स्थिर और माकूल तापमान और प्रचुर भोजन के लिए भीड़-भाड़ वाले उथले समंदर (Shallow Water) से शांत, गहरे समंदर (Deep Sea) की ओर कूच करते हैं। लेकन यह सवाल अब तक सवाल ही था कि ये कोरल गति (Coral Movement) कैसे करते हैं? क्या ये शांत गहरे पानी तक पहुंचने के लिए अन्य जीवों (के शरीर) से ‘लिफ्ट’ लेते हैं? या वे अपने ऊतकों का इस्तेमाल नाव की पाल की तरह करते हैं; जिस तरह हवाएं पाल के ज़रिए नाव को गति देती है वैसे ही पानी पालनुमा ऊतक के सहारे इन्हें बहा ले जाता है।
प्लॉसवन (PLOS One Journal) में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है, जिसमें कोरल के बारे में उपरोक्त अनुत्तरित सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की गई है। डिस्क कोरल (Cycloseris cyclolites) पर अध्ययन कर शोधकर्ताओं ने पाया कि गुंबद सरीखे शरीर वाले डिस्क कोरल प्रकाश स्रोत (Light Source) की दिशा में ‘जाने’ के लिए अपने शरीर को लुढ़काते हैं, फिसलाते हैं, और क्रमाकुंचन (यानी क्रमश: फैलना-सिकुड़ना) की मदद से आगे बढ़ाते हैं। कोरल बेहतर पकड़ के लिए अपने बाहरी ऊतकों के कुछ हिस्सों को फुलाते हैं, फिर अपने ऊतकों को थोड़ा मरोड़ते हैं, फिर और संकुचित होकर अपने शरीर को आगे की और खींचते हैं। यानी कोरल काफी हद तक जेलीफिश (Jellyfish) की चाल चलते हैं।
यह भी देखा गया कि कोरल विशेष रूप से नीली रोशनी के प्रति संवेदनशील होते हैं – कुछ मामलों में कोरल प्रकाश स्रोत की ओर 22 से.मी. तक बढ़े थे। चूंकि नीला प्रकाश (Blue Wavelength Light) अन्य रंगों की तुलना में पानी में अधिक गहराई तक जाता है, इसलिए इस रंग की रोशनी मशरूम कोरल को अपनी पसंदीदा छायादार और माकूल गहराई तक पहुंचने में मदद कर सकती है। एक और बात पता चली कि जैसे-जैसे कोरल बड़े होते जाते हैं उनके लिए घूमना मुश्किल होता जाता है। इसलिए वे ऐसी गति से आगे बढ़ते हैं कि चलना भारी न पड़े। वैसे, लगता तो ऐसा है कि उन्हें अपने गंतव्य पर पहुंचने की कोई जल्दी नहीं होती। कोरल हर 24 घंटे में औसतन 4.5 से.मी. नीली रोशनी की ओर बढ़ते हैं – सुस्ती के लिए मशहूर घोंघे (Snail) से भी बहुत, बहुत धीमी गति से। (स्रोतफीचर्स)
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