आमाशय के अल्सर या आहार नाल के अन्य घावों से कई लोग पीड़ित
होते हैं। इलाज के पारंपरिक तरीकों के साथ कुछ ना कुछ समस्याएं हैं। अब
वैज्ञानिकों ने जैविक मुद्रण की मदद से अल्सर के उपचार का रास्ता सुझाया है।
दरअसल पेट के घावों के उपचार में दी जाने
वाली दवाइयां धीरे-धीरे काम करती हैं, और कभी-कभी तो उतनी प्रभावी भी नहीं होती।
एंडोस्कोपिक सर्जरी केवल छोटे घावों को ठीक कर पाती है। और एंडोस्कोपिक विधि से
दिए गए स्प्रे रक्तस्राव तो रोक पाते हैं लेकिन घावों की मरम्मत नहीं कर पाते।
जैविक मुद्रण की मदद से जटिल अंगों को
विकसित करने के प्रयास कई शोधकर्ता कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली अभी दूर है। फिलहाल
इसकी मदद से शरीर की अन्य सरल संरचनाएं जैसे बोन ग्राफ्ट विकसित कर प्रत्यारोपित
करने के प्रयोग किए गए हैं। अभी तरीका यह है कि पहले कोशिकाओं को शरीर के बाहर
विकसित करके प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके लिए बड़े चीरे लगाने पड़ते हैं, जो
संक्रमण की संभावना बढ़ाते हैं और ठीक होने में लंबा वक्त लेते हैं।
इसलिए कुछ शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में
कोशिकाओं को सीधे शरीर के अंदर प्रिंट करने के प्रयास किए। लेकिन प्रिंटिंग उपकरण
बड़े होने के कारण मामला सिर्फ बाहरी अंगों पर प्रिंटिंग तक सीमित हैं, पाचन
तंत्र या शरीर के अन्य अंदरूनी अंगों में जैविक मुद्रण इन उपकरणों से संभव नहीं।
बीज़िंग स्थित शिनहुआ युनिवर्सिटी के
बायोइंजीनियर ताओ शू और उनके साथियों ने जैविक मुद्रण की मदद से पेट के अल्सर के
उपचार के लिए एक लघु रोबोट तैयार किया, ताकि शरीर में चीरफाड़ कम हो और प्रिंटिंग
उपकरण शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाए। यह लघु रोबोट गुड़ी-मुड़ी अवस्था में महज़
सवा 4 सेंटीमीटर लंबा और 3 सेंटीमीटर चौड़ा है। शरीर में प्रवेश के बाद यह खुलकर 6
सेंटीमीटर लंबा हो जाता है, और फिर जैविक मुद्रण शुरू कर सकता है।
जैविक मुद्रक एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें स्याही के स्थान पर जीवित कोशिकाएं एक
जेल में मिलाकर भरी होती हैं। सही स्थान पर पहुंचकर जेल के साथ सजीव कोशिकाओं को
परत-दर-परत जमाया जाता है।
परीक्षण के लिए शोधकर्ताओं ने पेट का एक
पारदर्शी प्लास्टिक मॉडल तैयार करके लघु रोबोट को एंडोस्कोपी की मदद से उसमें
सफलतापूर्वक प्रवेश कराया। वहां उन्होंने पेट के अस्तर और पेट की मांसपेशियों की
कोशिकाओं को प्रिंट किया। बायोफेब्रिकेशन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार
मुद्रित कोशिकाओं में कोई क्षति नहीं हुई और 10 दिनों में उनमें काफी वृद्धि हुई।
लेकिन प्रयोग में शोधकर्ताओं के सामने कुछ
चुनौतियों भी आर्इं। उन्होंने पाया कि जो प्रिटिंग ‘स्याही’ इस्तेमाल की गई वह कम
तापमान पर ही स्थायी रहती है, शरीर के सामान्य तापमान पर तरल हो जाती है
जिससे उसे ढालना मुश्किल हो जाता है। इसका समाधान ओहायो स्टेट युनिवर्सिटी के
डेविड होएज़्ले द्वारा विकसित स्याही कर सकती है,
जो शरीर के सामान्य
तापमान पर स्थायी रहती है और दृश्य प्रकाश की मदद से गाढ़ी की जा सकती है।
जैविक मुद्रण की एक चुनौती यह है कि मुद्रित
कोशिकाओं को अंगों और ऊतकों के साथ प्रभावी ढंग से कैसे जोड़ा जाए। होएज़्ले की टीम
ने एक संभावित समाधान खोजा है, जिसमें 3-डी प्रिंटर की नोज़ल घाव में पहले प्रिंटिंग
स्याही से एक छोटी घुंडी बनाएगी, जो इसे बायोप्रिंटेड संरचना से जोड़ देगी।
बहरहाल, शोधकर्ताओं की योजना इससे भी छोटा (लगभग सवा सेंटीमीटर चौड़ा) रोबोट तैयार करने की है, जिसमें वे कैमरा और अन्य सेंसर भी जोड़ना चाहते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/249CC62E-2665-471B-A05B192EAEA29D59_source.jpg?w=590&h=800&0D8A9DFC-BE58-4047-9FBD27F3B36D62E6
वैसे तो यहां जिन मिथकों की चर्चा की गई है, वे मूलत: संयुक्त राज्य अमेरिका के सोशल मीडिया पर किए गए शोध और अन्य जानकारियों पर आधारित हैं। लेकिन थोड़े अलग रूप में ये भारत के सोशल मीडिया में भी नज़र आ जाते हैं।
कोरोनावायरस महामारी के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से लड़
रहा है जिसे ‘इंफोडेमिक’ का नाम दिया गया है। इस ‘सूचनामारी’ के चलते लोग रोग की
गंभीरता को कम आंकते हैं और सुरक्षा के उपायों को अनदेखा करते हैं। यहां इस
महामारी से सम्बंधित कुछ मिथकों पर चर्चा की गई है।
मिथक 1: नया कोरोनावायरस चीन की प्रयोगशाला
में तैयार किया गया है
चूंकि इस वायरस का सबसे पहला संक्रमण चीन
में हुआ था, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी सबूत के यह
दावा कर दिया कि इसे चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालांकि अमेरिकी
खुफिया एजेंसियों ने इन सभी दावों को खारिज करते हुए कहा है कि न तो यह मानव
निर्मित है और न ही आनुवंशिक फेरबदल से बना है। साइंटिफिक अमेरिकन में
प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी वायरोलॉजिस्ट शी ज़ेंगली और उनकी टीम द्वारा इस
वायरस के डीएनए अनुक्रम की तुलना गुफावासी चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोनावायरसों
से करने पर कोई समानता नज़र नहीं आई। इस वायरस के प्रयोगशाला में तैयार न किए जाने
पर ज़ेंगली ने एक विस्तृत आलेख साइंस पत्रिका में प्रकाशित भी किया है।
गौरतलब है कि ट्रम्प ने ज़ेंगली की प्रयोगशाला पर वायरस विकसित करने का इल्ज़ाम
लगाया था। इस मुद्दे पर स्वतंत्र जांच की मांग को देखते हुए चीन ने विश्व
स्वास्थ्य संगठन के शोधकर्ताओं को भी आमंत्रित किया है। लेकिन सबूत के आधार पर यही
कहा जा सकता है कि सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया गया है।
मिथक 2: उच्च वर्ग के लोगों ने ताकत और
मुनाफे के लिए वायरस को जानबूझकर फैलाया है
जूडी मिकोविट्स नामक एक महिला ने सोशल
मीडिया पर 26 मिनट की षडयंत्र-सिद्धांत आधारित फिल्म ‘प्लानडेमिक’ और अपने ही
द्वारा लिखित एक किताब में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीज़ के
निर्देशक एंथोनी फौसी और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स पर इल्ज़ाम लगाया
है कि उन्होंने इस बीमारी से फायदा उठाने के लिए अपनी ताकत का उपयोग किया है। यह
वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 80 लाख से अधिक लोगों ने देखा।
साइंस और एक अन्य वेबसाइट politifact ने जांच करने के बाद इस दावे को झूठा
पाया। हालांकि इस वीडियो को अब सोशल मीडिया से हटा लिया गया है लेकिन इससे स्पष्ट
है कि गलत सूचनाएं बहुत तेज़ी से फैलती हैं।
मिथक 3: कोविड-19 सामान्य फ्लू के समान ही
है
महामारी के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रपति
ट्रम्प ने बार-बार दावा किया कि कोविड-19 मौसमी फ्लू से अधिक खतरनाक नहीं है।
लेकिन 9 सितंबर को वाशिंगटन पोस्ट ने ट्रम्प के फरवरी और मार्च में लिए गए
साक्षात्कार की एक रिकॉर्डिंग जारी की जिससे पता चलता है कि वे (ट्रम्प) जानते थे
कि कोविड-19 सामान्य फ्लू से अधिक घातक है लेकिन इसकी गंभीरता को कम करके दिखाना
चाहते थे।
हालांकि कोविड-19 की मृत्यु दर का सटीक
आकलन तो मुश्किल है लेकिन महामारी विज्ञानियों का विचार है कि यह फ्लू की तुलना
में कहीं अधिक है। फ्लू के मामले में टीकाकरण या पूर्व संक्रमण के कारण कई लोगों
में कुछ प्रतिरोधक क्षमता तो है, जबकि अधिकांश विश्व ने अभी तक कोविड-19 का
सामना ही नहीं किया है। ऐसे में कोरोनावायरस सामान्य फ्लू के समान तो नहीं है।
मिथक 4: मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है
हालांकि सीडीसी और डब्ल्यूएचओ द्वारा मास्क
के उपयोग पर प्रारंभिक दिशानिर्देश थोड़े भ्रामक थे लेकिन अब सभी मानते हैं कि
मास्क का उपयोग करने से कोरोनावायरस को फैलने से रोका जा सकता है। काफी समय से पता
रहा है कि मास्क का उपयोग किसी संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी प्रभावी है। अब
तो यह भी स्पष्ट है कि कपड़े से बने मास्क भी कारगर हैं। फिर भी कई साक्ष्यों के
बावजूद कुछ लोगों ने मास्क को नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए पहनने से
इन्कार कर दिया।
मिथक 5: हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन एक प्रभावी
उपचार है
फ्रांस में किए गए एक छोटे अध्ययन के आधार
पर सुझाव दिया गया कि मलेरिया की दवा हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का उपयोग इस बीमारी
के इलाज में प्रभावी हो सकता है। इसकी व्यापक आलोचना और इसके प्रभावी न होने के
साक्ष्य के बावजूद ट्रम्प और अन्य लोगों ने इसे जारी रखा। फूड एंड ड्रग
एडमिनिस्ट्रेशन ने भी शुरुआत में अनुमति देने के बाद ह्रदय सम्बंधी समस्याओं के
जोखिम के कारण इसे नामंज़ूर कर दिया। कई अध्ययनों से पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद
भी ट्रम्प ने इस दवा का प्रचार जारी रखा।
मिथक 6: ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ प्रदर्शन के
कारण संक्रमण में वृद्धि हुई है
अमेरिका में पुलिस द्वारा जॉर्ज फ्लॉयड की
हत्या के बाद मई-जून में अश्वेत अमरीकियों के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ बड़े स्तर पर
लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। कई लोगों ने दावा किया कि इन प्रदर्शनों
में भीड़ जमा होने से कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि हुई। लेकिन नेशनल ब्यूरो ऑफ
इकॉनोमिक रिसर्च द्वारा अमेरिका के 315 बड़े शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों के एक
विश्लेषण से ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं जिससे यह कहा जा सके कि इन प्रदर्शनों
के कारण कोविड-19 मामलों में वृद्धि हुई है या अधिक मौतें हुई हैं। वास्तव में
प्रदर्शन करने वाले लोगों में संचरण का जोखिम बहुत कम था और अधिकांश
प्रदर्शनकारियों ने मास्क का उपयोग किया था।
मिथक 7: अधिक परीक्षण के कारण कोरोनावायरस
मामलों में वृद्धि हुई है
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह दावा किया कि
अमेरिका में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों का कारण परीक्षण में हो रही वृद्धि है।
यदि यह सही है तो परीक्षणों में पॉज़िटिव परिणामों के प्रतिशत में कमी आनी चाहिए
थी। लेकिन कई विश्लेषणों ने इसके विपरीत परिणाम दर्शाए हैं। यानी वृद्धि वास्तव
में हुई है।
मिथक 8: संक्रमण फैलेगा तो झुंड प्रतिरक्षा
प्राप्त की जा सकती है
महामारी की शुरुआत में यूके और स्वीडन ने
झुंड प्रतिरक्षा के तरीके को अपनाया। इस तकनीक में वायरस को फैलने दिया जाता है जब
तक आबादी में झुंड प्रतिरक्षा विकसित नहीं हो जाती है। लेकिन इस दृष्टिकोण में एक
बुनियादी दोष है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के लिए
60 से 70 प्रतिशत लोगों का संक्रमित होना आवश्यक है। कोविड-19 की उच्च मृत्यु दर
को देखते हुए झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त करते-करते करोड़ों लोग मारे जाते। इसी कारण
इस महामारी में यूके की मृत्यु दर सबसे अधिक है। यूके और स्वीडन में लोगों की जान
और अर्थव्यवस्था का भी काफी नुकसान हुआ। देर से ही सही,
यू.के. सरकार ने इस
गलती में सुधार किया और लॉकडाउन लागू किया।
मिथक 9: कोई भी टीका असुरक्षित होगा और
कोविड-19 से अधिक घातक होगा
एक ओर वैज्ञानिक निरंतर टीका विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ये चिंताजनक रिपोर्ट्स भी सामने आ रही हैं कि शायद कई लोग इसे लेने से इन्कार कर देंगे। संभावित टीके को साज़िश के रूप में देखा जा रहा है। प्लानडेमिक फिल्म में तो यह भी दावा किया गया है कि कोविड-19 का टीका लाखों लोगों की जान ले लेगा। साथ ही यह दावा भी किया गया है कि पहले भी टीकों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। लेकिन तथ्य यह है कि टीकों ने करोड़ों जानें बचाई हैं। यदि उपरोक्त दावा सही है, तो अलग-अलग चरणों में परीक्षण के दौरान लोगों की मौत हो जानी चाहिए थी। टीका-विरोधी समूहों द्वारा प्रस्तुत एक अन्य साज़िश-सिद्धांत में तो कहा गया है कि बिल गेट्स एक गुप्त योजना बना रहे हैं जिसके तहत टीकों के माध्यम से लोगों में माइक्रोचिप लगा दी जाएगी। इससे इतना तो स्पष्ट है कि टीके के निरापद होने की बात पर अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा ऐसी बातों को तूल मिलेगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/E4027069-A4E4-41E2-8E1556539BCCC03E_source.jpg?w=590&h=800&9E43B90F-9523-4D32-B59E75B0645A6602
दवाओं के विपरीत, लगभग सभी तरह के टीकों को उनके परिवहन से
लेकर उपयोग के ठीक पहले तक कम तापमान (सामान्यत: 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच)
पर रखने की आवश्यकता होती है। अधिक तापमान मिलने पर अधिकतर टीके असरदार नहीं रह
जाते। एक बार अधिक तापमान के संपर्क में आने के बाद इन्हें पुन: ठंडा करने से कोई
फायदा नहीं होता। इसलिए निर्माण से लेकर उपयोग से ठीक पहले तक इनके रख-रखाव और
परिवहन के लिए कोल्ड चैन (शीतलन शृंखला) बनाना ज़रूरी होता है। यदि हम सामान्य
तापमान पर रखे जा सकने और परिवहन किए जा सकने वाले टीके बना पाएं, जिनके
लिए कोल्ड चैन बनाने की ज़रूरत ना पड़े, तो यह बहुत फायदेमंद होगा।
बैंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के राघवन वरदराजन के नेतृत्व में एक भारतीय समूह ने ऐसे
ही ‘वार्म वैक्सीन’ पर काम किया है। इसमें उनके सहयोगी संस्थान हैं त्रिवेंदम
स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं
प्रौद्योगिकी संस्थान (THSTI) और IISc प्रायोजित स्टार्टअप Mynvax। Biorxive प्रीप्रिंट में प्रकाशित उनके शोधपत्र का शीर्षक है सार्स-कोव-2 के स्पाइक
के ताप-सहिष्णु, प्रतिरक्षाजनक खंड का डिज़ाइन। यहhttps://doi.org/10.1101/2020.08.18.25.237 पर उपलब्ध है।
कोविड वायरस की सतह पर एक प्रोटीन रहता है
जिसे स्पाइक कहते हैं। यह लगभग 1300 एमिनो एसिड लंबा होता है। इस स्पाइक में 250
एमीनो एसिड लंबा अनुक्रम – रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (RBD) – होता है। यह RBD मेज़बान कोशिका से जाकर जुड़ जाता है और संक्रमण की शुरुआत करता है। शोधकर्ताओं
ने प्रयोगशाला में पूरे स्पाइक प्रोटीन की बजाय RBD की 200 एमीनो एसिड
की शृंखला को संश्लेषित किया। फिर इस खंड की
संरचना (इसकी त्रि-आयामी बनावट या वह आकार जो इसे मेज़बान कोशिका की सतह पर ठीक ताला-चाबी
की तरह आसानी से फिट होने की गुंजाइश देता है) का अध्ययन किया। इसके अलावा इसकी
तापीय स्थिरता भी देखी गई कि क्या यह प्रयोगशाला की सामान्य परिस्थितियों के
तापमान से अधिक तापमान पर काम कर सकता है?
खुशी की बात है कि
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस तरह ठंडा करके सुखाने (फ्रीज़-ड्राइड करने) पर यह काफी
स्थिर होता है। यह बहुत थोड़े समय के लिए 100 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक का तापमान
झेल सकता है, और 37 डिग्री सेल्सियस पर एक महीने तक भंडारित किया जा सकता
है। इससे लगता है कि इस अणु को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड चैन की ज़रूरत नहीं
पड़ेगी।
प्रसंगवश बता दें कि पिछले 70 सालों से
भारत किसी प्रोटीन की संरचना या बनावट से उसके कार्यों के बारे में पता करने के
क्षेत्र में अग्रणी रहा है। और आज भी है। उदाहरण के लिए,
कैसे कोलेजन की तिहरी
कुंडली संरचना, जिसे दिवंगत जी. एन. रामचंद्रन ने 1954 में खोजा था,से पता चल जाता है कि
यह त्वचा और कंडराओं में क्यों पाया जाता है। यह त्वचा और कंडराओं को रस्सी जैसी
मज़बूती प्रदान करता है। प्रो. रामचंद्रन ने यह भी बताया था कि किसी प्रोटीन के
एमीनो एसिड अनुक्रम के आधार पर हम किस तरह यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह कैसी
त्रि-आयामी संरचना बनाएगा। इस समझ के आधार पर जैव रसायनज्ञ प्रोटीन के एमीनो एसिड
अनुक्रम में बदलाव करके प्रोटीन से मनचाहा कार्य करवाने की दिशा में बढ़े।
उपरोक्त अध्ययन में भी शोधकर्ताओं ने यही
किया है। उन्होंने अभिव्यक्ति के लिए RBD के खंड को ध्यानपूर्वक चुना, और
दर्शाया कि परिणामी प्रोटीन ताप सहन कर सकता है। यह प्रोटीन संरचना के विश्लेषण और
जेनेटिक इंजीनियरिंग की क्षमता की मिसाल है।
RBD प्रोटीन को काफी मात्रा में स्तनधारियों की कोशिकाओं में भी बनाया गया और पिचिया
पैस्टोरिस (Pichia pastoris) नामक एक यीस्ट में भी। यह यीस्ट बहुत किफायती और सस्ता
मेज़बान है। जब उन्होंने दोनों प्रोटीन की तुलना की तो पाया कि यीस्ट में बने
प्रोटीन में बहुत अधिक विविधता थी, और जंतु परीक्षण में देखा गया यह वांछित
एंटीबॉडी भी नहीं बनाता। उन्होंने RBD प्रोटीन को बैक्टीरिया मॉडल ई.कोली
में भी बनाकर देखा, लेकिन इसमें बना प्रोटीन भी कारगर नहीं रहा।
बहरहाल,
अब हमारे पास
ताप-सहिष्णु RBD है, तो क्या इससे टीका बनाने की कोशिश की जा सकती है? एक
ऐसा टीका जो एंटीबॉडी बनाकर वायरस के स्पाइक प्रोटीन को मेज़बान कोशिका के ग्राही
से न जुड़ने दे और संक्रमण की प्रक्रिया को रोक दे?
आम तौर पर प्रतिरक्षा
विज्ञानी टीके (कोशिका या अणु) के साथ एक सहायक भी जोड़ते हैं। जब यह टीके के साथ
शरीर में जाता है तो प्रतिरक्षा प्रणाली को उकसाता है और टीके की कार्य क्षमता
बढ़ाता है। आम तौर पर इसके लिए एल्यूमीनियम लवण उपयोग किए जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने अपने प्रारंभिक टीकाकरण के
लिए गिनी पिग को चुना, क्योंकि माइस की तुलना में गिनी पिग सांस की बीमारियों के
लिए बेहतर मॉडल माने जाते हैं। सहायक के रूप में उन्होंने MF59
के एक जेनेरिक संस्करण का उपयोग किया। MF59 मनुष्यों के लिए सुरक्षित पाया गया है।
फिर गिनी पिग में RBD नुस्खा प्रविष्ट कराया। दो खुराक के बाद गिनी पिग में
वांछित ग्राहियों को अवरुद्ध करने वाली एंटीबॉडी की पर्याप्त मात्रा दिखी। तो, यह
काम कर गया।
वे बताते हैं कि कई अन्य समूहों ने RBD, या संपूर्ण स्पाइक प्रोटीन, या
एंटीजन बनाने वाले नए आरएनए-आधारित तरीकों का उपयोग किया है। कोविड-19 के इन सारे
टीकों (जो परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं) के लिए कोल्ड चैन की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन
इस विशिष्ट ताप-सहिष्णु RBD खंड (और शायद अन्य RBD खंड भी) को कुछ समय के लिए सामान्य तापमान पर रखा जा सकता है।
शोधकर्ता अब जंतुओं में इसकी वायरस से संक्रमण के विरुद्ध सुरक्षा क्षमता की जांच कर रहे हैं और साथ ही साथ मनुष्यों पर नैदानिक परीक्षण करने के पहले इसकी सुरक्षा और विषाक्तता का आकलन कर रहे हैं। हम कामना करते हैं कि टीम को इसमें सफलता मिले।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/sites/btmt/images/stories/vaccine_660_040920115131.jpg
जब से कोविड-19 महामारी फैली है,
कई अध्ययन बता चुके
हैं कि कोविड-19 के गंभीर रूप से पीड़ित मरीज़ों में मोटापे से ग्रस्त लोगों की
संख्या सबसे अधिक है। हाल में हुए कुछ अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि
थोड़े से अधिक वज़न वाले लोगों में भी कोविड-19 के संक्रमण का अधिक जोखिम होता है।
मसलन ओबेसिटी रिव्यू में प्रकाशित एक मेटा-विश्लेषण कहता है कि कोविड-19 के
मरीज़ों में, सामान्य वज़न वाले लोगों की तुलना में मोटे लोगों के अस्पताल
में भर्ती होने की संभावना 113 प्रतिशत अधिक,
आईसीयू में पहुचंने
की संभावना 74 प्रतिशत अधिक, और मृत्यु की संभावना 48 प्रतिशत अधिक थी।
वैसे तो,
सामान्य वज़न वाले
लोगों की तुलना में मोटापे के शिकार लोगों में दिल की समस्या, फेफड़े
सम्बंधित समस्या और मधुमेह जैसी अन्य बीमारियां होने की संभावना अधिक ही होती है।
ये बीमारियां अपने आप में ही कोविड-19 के जोखिम को बढ़ाती हैं। मोटे लोगों में
चयापचय सिंड्रोम होने की संभावना भी रहती है,
जिसमें रक्त शर्करा
का स्तर, वसा का स्तर, या दोनों का स्तर असामान्य रहता है और उच्च
रक्तचाप की समस्या हो जाती है जिससे जोखिम और बढ़ता है। लेकिन सिर्फ और सिर्फ
मोटापे से शिकार लोगों में कोविड-19 अधिक गंभीर रूप ले सकता है। ऐसा मोटापे की वजह
से शरीर की कुछ प्रणालियों पर पड़े प्रभाव के कारण होता है। इनमें प्रतिरक्षा तंत्र
की दुर्बलता, खून के थक्के जमने की प्रवृत्ति शामिल हैं जो कोविड-19 को
गंभीर बना सकती हैं।
दरअसल एक तो होता यह है कि पेट की अधिक
चर्बी डायफ्राम को ऊपर धकेलती है जिसके कारण फेफड़ों पर दबाव पड़ता है और वायु
प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। इससे फेफड़ों का आयतन कम हो जाता है और फेफड़ों के
निचले हिस्से की वायु थैलियां बंद हो जाती हैं। फेफड़ों के ऊपरी हिस्से की तुलना
में निचले हिस्से में ऑक्सीजन के लिए अधिक रक्त आता है,
लेकिन मोटापे के कारण
वहां वायु कम पहुंच रही होती है। ऐसे में कोविड-19 का संक्रमण तेज़ी से गंभीर रूप
से ले लेता है।
इसके अलावा मोटे लोगों के रक्त में थक्का
बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, जो संक्रमण की गंभीरता में और अधिक इज़ाफा
करते हैं। सामान्यत: रक्त वाहिकाओं की आंतरिक सतह की कोशिकाएं रक्त का थक्का ना
बनने देने के संकेत देती हैं। लेकिन कोविड-19 का संक्रमण होने पर संभवत: वायरस इन
कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देते हैं, और रक्त को गाढ़ा करने वाला तंत्र सक्रिय हो
जाता है।
मोटे लोगों का प्रतिरक्षा तंत्र भी कमज़ोर
होता है। दरअसल, तिल्ली, अस्थि मज्जा और थाइमस जैसे अंगों में, जहां
प्रतिरक्षा कोशिकाएं बनती हैं और सहेजी जाती हैं,
वहां वसा कोशिकाएं
घुसपैठ कर लेती हैं। फलस्वरूप प्रतिरक्षा ऊतकों की जगह वसा ऊतक ले लेते हैं, और
प्रतिरक्षा कोशिकाओं की संख्या में कमी आती है प्रतिरक्षा प्रणाली कम प्रभावी हो
जाती है। यह देखा गया है कि फ्लू का टीका दिए जाने के बाद भी सामान्य वज़न वाले
लोगों की तुलना में मोटे लोगों में इसके संक्रमण की संभावना दोगुनी होती है। यानी
कोविड-19 के टीकों के परीक्षण में मोटे लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि
ये उन पर कम प्रभावी हो सकते हैं।
इसके अलावा मोटापे से शिकार लोग जीर्ण, निम्न स्तर की शोथ से पीड़ित रहते हैं। वसा कोशिकाएं शोथ पैदा करने वाले साइटोकाइन संदेशवाहक रसायन स्रावित करती हैं, और प्रतिरक्षा कोशिकाएं मृत वसा कोशिकाओं का सफाया करती हैं। ये दोनों मिलकर साइटोकाइन्स की गतिविधि को बेलगाम कर देते हैं जिसके कारण कोविड-19 का संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/ca_0911NID_Brazil_ICU_online.jpg?itok=HxOLuCSJ
हीमोफिलिया एक ऐसा विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति में रक्त का
थक्का नहीं बन पाता। ऐसे में थोड़ी भी चोट लगने पर खून बहना जल्द बंद नहीं होता। अब
तक हीमोफीलिया से गंभीर रूप से पीड़ित व्यक्ति को हफ्ते में तीन से चार बार तक रक्त
का थक्का जमाने वाले फैक्टर लेना पड़ता था क्योंकि एक बार लेने के बाद यह शरीर में
थोड़े समय तक ही टिकता है। लेकिन हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस फैक्टर में एक
छोटा प्रोटीन जोड़ने पर पाया कि यह फैक्टर तुलनात्मक रूप से लंबे समय तक शरीर में
टिका रह सकता है। पीड़ित को हफ्ते में 3-4 बार की बजाय सिर्फ एक बार इसे लेना होगा।
सामान्यत: हीमोफीलिया दो तरह का होता है:
टाइप ए और टाइप बी। टाइप ए हीमोफीलिया शरीर में थक्का जमाने वाले फैक्टर VIII की कमी से होता है और टाइप बी हीमोफीलिया थक्का जमाने वाले फैक्टर IX की कमी से। यह विकार पुरुषों में अधिक देखा गया है। इसमें
भी अधिकतर पुरुष टाइप ए हीमोफीलिया से पीड़ित होते हैं। इससे पीड़ित लोगो को
क्लॉटिंग डिसऑर्डर, जोड़ों की समस्या और जानलेवा रक्त स्राव (कभी-कभी साल में 30
से भी अधिक बार तक) होता है। इसके उपचार के लिए फैक्टर VIII या अन्य थक्का जमाने
वाले प्रोटीन लिए जाते हैं।
सामान्यत: फैक्टर VIII शरीर के एक अन्य प्रोटीन
वॉन विलब्रांड फैक्टर (VWF) से जुड़ जाता है जो फैक्टर VIII को शरीर में टिकाऊ बनाता है और इसे विघटित होने से बचाता है। लेकिन VWF भी फैक्टर VIII की हाफ-लाइफ शरीर में 15 घंटे से अधिक नहीं कर पाता है। इसलिए फैक्टर VIII की खुराक एक हफ्ते में तीन से चार बार तक लेनी पड़ती है।
ब्लडवर्क्स नॉर्थवेस्ट की हीमेटोलॉजिस्ट
बारबरा कोंकल और उनकी टीम कृत्रिम फैक्टर लेने के इस बार-बार के झंझट से निजात
दिलवाना चाहती थीं। इसलिए उनकी टीम ने एक प्रोटीन में VWF का सिर्फ वह हिस्सा
जोड़कर BIVV001 नामक एक नया प्रोटीन विकसित किया जो फैक्टर VIII को स्थायित्व देता
है। शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि यह नया प्रोटीन-संकुल थक्का बनाने वाले फैक्टर को
शरीर में रोककर रखेगा और शरीर के VWF से नहीं जुड़ेगा।
इसकी पुष्टि करने के लिए शोधकर्ताओं ने
हीमोफिलिया ए से पीड़ित और इसका उपचार लेने वाले सोलह पुरुषों पर अध्ययन किया।
उन्होंने प्रतिभागियों को दो समूह में बांटा। पहले तो दोनों समूह के प्रतिभगियों
को सिर्फ फैक्टर VIII की खुराक दी, लेकिन एक समूह को कम खुराक और दूसरे समूह
को अधिक खुराक दी। चूंकि फैक्टर VIII तीन दिन में शरीर से खत्म हो जाता है
इसलिए इसे देने के तीन दिन बाद उन्होंने प्रत्येक प्रतिभागी को नए संलयित प्रोटीन, BIVV001, का इंजेक्शन दिया। और प्रतिभागियों पर 28
दिन तक नज़र रखी।
उन्होंने पाया कि BIVV001 इंजेक्शन देने के
पहले तक कम खुराक वाले लोगों में फैक्टर VIII की हाफ लाइफ 9.1
घंटे थी, और अधिक खुराक वाले लोगों में फैक्टर VIII की हाफ लाइफ 13.2 घंटे थी। लेकिन BIVV001 का इंजेक्शन देने के बाद कम खुराक वाले
समूह में हाफ लाइफ औसतन 37.6 घंटे हो गई और अधिक खुराक वाले समूह में 42.5 घंटे हो
गई। शोधकर्ताओं ने दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में बताया है कि
उपचार के दौरान किसी भी मरीज़ ने फैक्टर VIII के लिए प्रतिरोध विकसित नहीं किया, और
ना ही उनमें इसके प्रति किसी तरह की संवेदनशीलता या एलर्जी दिखी।
फिलहाल इसके तीसरे चरण का परीक्षण चल रहा है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/hemophilia_main_1280p.jpg?itok=rPHxxYvh
इन दिनों अफ्रीकी घरों में मलेरिया वाहक मच्छरों से निपटने
के लिए एक विशेष कीटनाशक के उपयोग की योजना बनाई जा रही है। लगभग 2 वर्ष पूर्व विश्व
स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने क्लॉथियानिडीन के छिड़काव को घरों के भीतर मच्छर
नियंत्रण का एक मुख्य हथियार माना था। वैसे तो क्लॉथियानिडीन का उपयोग लंबे समय से
फसलों से कीटों का सफाया करने के लिए किया जा रहा था लेकिन कीटों में प्रतिरोध
विकसित होने से इसकी प्रभावशीलता खत्म हो रही है। घरों में इसके उपयोग की योजना
बनाते हुए इसके प्रति मच्छरों में पहले से मौजूद प्रतिरोध के सबूतों की तलाश की जा
रही है।
सेंटर फॉर रिसर्च इन इंफेक्शियस डिसीज़ेस, कैमरून
के वैज्ञानिकों ने इसके प्रमाण खोज निकाले हैं। उन्होंने हाल ही में कैमरून की
राजधानी याउंडे के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से कुछ मच्छरों पर अध्ययन किया
जिनमें दो प्रमुख मलेरिया वाहक भी शामिल थे। bioRxivप्रीप्रिंट के माध्यम से वैज्ञानिकों ने बताया है कि
एक अतिसंवेदनशील परीक्षण में एनॉफिलीस कोलुज़ी (Anopheles coluzzii) प्रजाति के मच्छरों को एक घंटे तक क्लॉथियानिडीन के संपर्क में रखने पर सभी
मच्छरों का सफाया हो गया जबकि एनॉफिलीस गेम्बिए(Anopheles coluzzii) प्रजाति की 55 प्रतिशत आबादी पर इस कीटनाशक का कोई असर
नहीं हुआ।
यह मलेरिया वाहक मच्छरों में क्लॉथियानिडीन
के प्रतिरोध की पहली रिपोर्ट है। अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता कॉलिन्स कामडेम के
अनुसार यदि इस प्रकार का डैटा पहले मौजूद होता तो WHO इस कीटनाशक को कभी
स्वीकृति न देता। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि एक कीटनाशक को उपयोग में लाने से
पहले प्रतिरोध के लिए मलेरिया वाहक परीक्षण कितना महत्वपूर्ण है। पिछले 2 दशक में
कीटनाशक लेपित मच्छरदानी और घरों में छिड़काव से मलेरिया मृत्यु दर और रुग्णता में
कमी आई है। इन कार्यक्रमों में 4 वर्गों के कीटनाशकों का उपयोग किया गया लेकिन
सबसे अधिक निर्भरता प्राकृतिक रूप से निर्मित पायरेथ्रोइड्स पर रही। ये सस्ते हैं
और मनुष्यों सहित अन्य स्तनधारियों के लिए हानिकारक भी नहीं हैं।
वास्तव में मच्छरों में पायरेथ्रोइड्स
प्रतिरोध विकसित होने से WHO द्वारा क्लॉथियानिडीन को मंज़ूरी दी गई।
इसके पूर्व कृषि कीटनाशकों के रूप में निकोटीन आधारित नियोनिकोटिनोइड्स के उपयोग
की भी काफी आलोचना हुई है। क्लॉथियानिडीन भी इसी वर्ग का कीटनाशक है। परागणकर्ताओं
पर इसके दुष्प्रभाव के चलते युरोप में कृषि उपयोग के लिए इन पर प्रतिबंध लगा दिया
गया है। जबकि कैमरून और अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों में कीटनाशक के रूप में इनका
काफी अधिक उपयोग किया जा रहा है। कामडेम के अनुसार कृषि क्षेत्रों में
नियोनिकोटिनॉइड कीटनाशक-अवशेषों से ही मच्छरों में इनके विरुद्ध प्रतिरोध विकसित
हुआ है।
हालांकि कई बड़ी कंपनियां घरों में छिड़काव के लिए मिश्रित कीटनाशक तैयार कर रही हैं लेकिन कामडेम इन सभी का परीक्षण मच्छरों पर करने की सलाह देते हैं। अब तक WHO द्वारा इस अध्ययन की समीक्षा नहीं की गई है लेकिन संभवत: क्लॉथियानिडीन प्रतिरोध अन्य कीटनाशकों की तुलना में कम व्यापक लगता है और इसलिए यह अभी तो एक उपयोगी विकल्प है लेकिन ऐसा कब तक रहेगा, कहना मुश्किल है।(स्रोत फीचर्स)
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कोरोना महामारी के शुरुआती दौर की तुलना में कोविड-19 से होने
वाली मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है। यह परिवर्तन विशेष रूप से युरोप में देखा
गया है लेकिन इसके पीछे के कारणों पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के जैसन ओक और
उनके सहयोगियों ने बताया है कि इंग्लैंड में जून से अगस्त माह के दौरान विभिन्न
डैटा सेट के अनुसार संक्रमण से मृत्यु दर (आईएफआर) में 55 से 80 प्रतिशत तक गिरावट
दर्ज की गई है। 17 अगस्त से शुरू होने वाले सप्ताह में ब्रिटेन में 7000 से अधिक
संक्रमितों में से 95 लोगों की मृत्यु हुई (आईएफआर 1.4) जबकि अप्रैल के पहले हफ्ते
में 40,000 पॉज़िटिव मामलों में से 7164 लोगों की मृत्यु हुई थी (आईएफआर
17.9)।
आईएफआर का पता पॉज़िटिव मामलों को मृत्यु की
संख्या से विभाजित कर लगाया जाता है लेकिन ओक इन आकड़ों को सही आईएफआर नहीं मानते
क्योंकि एक तो संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के बीच कुछ सप्ताह का फर्क रहता है
और समय के साथ परीक्षण में भी बदलाव होता है। फिर भी इन आंकड़ों से मोटा-मोटा अंदाज़
तो मिलता ही है। ओक और उनके सहयोगियों ने आईएफआर में बदलाव का अनुमान लगाने के लिए
अधिक परिष्कृत विधि का उपयोग किया है। उन्होंने पाया कि पूरे युरोप में पैटर्न यही
रहा है। लेकिन इसका कारण स्पष्ट नहीं है।
आंकड़ों के आधार पर एक कारण यह हो सकता है
कि अप्रैल माह के दौरान संक्रमितों में युवा लोगों का अनुपात कम था और 10-16 अगस्त
के बीच संक्रमितों में 15-44 वर्ष के लोगों का का अनुपात अधिक था। मान्यता यह है
कि युवाओं में मौत का जोखिम कम रहता है। लेकिन ओक इसे पर्याप्त व्याख्या नहीं
मानते हैं। अभी भी पाए जाने वाले पॉज़िटिव मामलों में वृद्ध लोगों की संख्या काफी
अधिक है।
कुछ शोधकर्ता अस्पतालों में बेहतर उपचार
व्यवस्था को भी घटती मृत्यु दर का कारण मानते हैं।
इसी संदर्भ में नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ
सिंगापुर के पॉल टमब्या का दावा है कि कोरोनावायरस का उत्परिवर्तित संस्करण (D614G) इस बीमारी की जानलेवा प्रकृति को कम कर
रहा है। इस नए संस्करण से संक्रमण दर में तो वृद्धि हुई है लेकिन जान का जोखिम कम
हो गया है। अन्य शोधकर्ता सहमत नहीं हैं।
जैसे, इम्पीरियल कॉलेज लंदन के एरिक वोल्ज़ के नेतृत्व में ब्रिटेन के 19,000 रोगियों से लिए गए वायरस के नमूनों के जीनोम पर अध्ययन किया गया। इस अध्ययन की अभी समकक्ष समीक्षा तो नहीं हुई है लेकिन वोल्ज़ के अनुसार वायरस के D614G संस्करण के कम जानलेवा होने के कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं।(स्रोत फीचर्स)
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संतानोत्पत्ति में बाधा कई कारणों से आ सकती है। कभी-कभी तो
डॉक्टर भी इसे समझ नहीं पाते। और अब, प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित में एक अध्ययन में शोधकर्ता
बताते हैं कि जिन स्त्री-पुरुष जोड़ियों के ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (HLA) के जीन्स आपस में कम समानताएं रखते हैं उनमें महिलाओं के गर्भाशय ग्रीवा के
म्यूकस (या श्लेष्मा) में शुक्राणु अधिक जीवित रह पाते हैं। और जिन जोड़ियों के
जीनोटाइप में अधिक समानता होती है उनमें गर्भाशय ग्रीवा के म्यूकस में शुक्राणु
जीवित बचने संभावना कम होती है। (बता दें कि HLA एक तरह का प्रोटीन
है जिसकी मदद से प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी चीज़ों की पहचान करती है। और, म्यूकस
गर्भाशय ग्रीवा में मौजूद ग्रंथियों द्वारा स्रावित द्रव है।)
पूर्व में हुए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने
पाया था कि संभवत: शुक्राणु की सतह पर HLA मौजूद होते हैं और यही HLA महिलाओं के गर्भाशय ग्रीवा के म्यूकस में भी पाए गए थे, जो
इस बात की संभावना बढ़ाते हैं कि अंडाणु और शुक्राणु की समानता संतानोत्पत्ति में
एक कारक हो सकती है।
कई जीवों में युग्मक (यानी अंडाणु और
शुक्राण) स्तर पर, सभी नर-मादा जोड़ियां समान रूप से एक-दूसरे के सुसंगत नहीं
होतीं। संतानोत्पत्ति में बाधा का कारण जानने के लिए आम तौर पर डॉक्टर या तो पुरुष
के शुक्राणुओं की गुणवत्ता की जांच करते हैं या महिला में समस्या की जांच करते
हैं। लेकिन चिकित्सा में युग्मक स्तर पर अनुकूलता पता करने के लिए कोई नियमित
परीक्षण नहीं है। और युग्मक अनुकूलता के बारे में हमारा ज्ञान भी सीमित है।
इसे विस्तार से समझने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ ईस्टर्न फिनलैंड के जीव विज्ञानी केकैलाइनन और उनके सहयोगियों ने नौ महिलाओं के ग्रीवा म्यूकस के और आठ पुरुषों के शुक्राणु के नमूने लिए। फिर हरेक नमूने के HLA का क्षार-अनुक्रम पता किया। और फिर ग्रीवा म्यूकस के नमूनों और शुक्राणु के नमूनों की सारी संभव जोड़ियां बनाईं और इसमें शुक्राणु की दशा का अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि जिन पुरुष-महिला में आनुवंशिक समानता कम थी उन जोड़ियों में शुक्राणु के जीवित रहने की संभावना अधिक थी। इससे लगता है कि प्रतिरक्षा अनुकूलता प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
बहरहाल इस बारे में व्यापक स्तर पर अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है कि क्या HLA की आनुवंशिक संरचना निषेचन को प्रभावित करती है। इसमें शुक्राणु के उन लक्षणों की भी पड़ताल की जा सकती है जिससे निषेचन की सफलता प्रभावित होती है। फिलहाल शोधकर्ता पता कर रहे हैं कि शुक्राणु की जीवन क्षमता HLA की आनुवंशिक संरचना से किस प्रकार प्रभावित होती है।(स्रोत फीचर्स)
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पूर्व अध्ययनों से पता है कि महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान
वज़न बढ़ने और इंसुलीन प्रतिरोध बढ़ने के कारण आजीवन टाइप-2 मधुमेह का खतरा बढ़ जाता
है। लेकिन अब अध्ययनों से पता चला है कि स्तनपान कराने से यह जोखिम कम होता है और
धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
इसके कारण तो स्पष्ट नहीं थे लेकिन
युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के जीव विज्ञानी माइकल जर्मन का विचार था कि इसके
पीछे पैंक्रियाज़ की बीटा कोशिकाओं की भूमिका हो सकती है क्योंकि लंबे समय तक
सुरक्षा के लिए ज़रूरी होता है कि रक्त शर्करा को नियंत्रित करने वाले तंत्र के कुछ
हिस्सों में परिवर्तन हो जाएं। बीटा कोशिका में परिवर्तन सबसे कारगर होता है क्योंकि
यही इंसुलीन का निर्माण करती हैं। इंसुलीन ग्लूकोज़ को रक्त से शरीर की कोशिकाओं
में प्रवेश करने में मदद करता है। लेकिन टाइप-2 मधुमेह में कोशिकाएं इंसुलीन
प्रतिरोधी हो जाती हैं और उनमें पर्याप्त ग्लूकोज़ को अवशोषित करने की क्षमता कम हो
जाती है। इसके चलते पैंक्रियाज़ अधिक इंसुलीन बनाने लगते हैं। अंतत: जब इसके बावजूद
भी पर्याप्त अतिरिक्त इंसुलीन नहीं बन पाता तो रक्त शर्करा का स्तर बढ़ता रहता
है।
हालिया अध्ययन में जर्मन और कोरिया
एडवांस्ड इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के हेल किम ने अन्य समूहों के सहयोग
से कुछ गर्भवती महलाओं का चयन किया। ये महिलाएं गर्भावस्था सम्बंधित मधुमेह की
समस्या से पीड़ित थीं। अध्ययन में आधी महिलाओं ने स्तनपान कराया जबकि शेष ने नहीं।
प्रसव के दो माह बाद ग्लूकोज़ सहनशीलता परीक्षण में दोनों समूह की महिलाओं में रक्त
शर्करा के स्तर में अधिक फर्क नहीं पाया गया (स्तनपान करने वाली महिलाओं में फास्टिंग
ग्लूकोज़ में कमी पाई गई)। लेकिन प्रसव के साढ़े तीन साल बाद, स्तनपान
कराने वाली महिलाओं में रक्त शर्करा तो काफी कम थी ही,
बीटा कोशिकाओं का काम
भी बेहतर था।
जर्मन और किम पहले दर्शा चुके थे कि बीटा
कोशिकाएं सेरोटोनिन का निर्माण कर सकती हैं। अब एक नई तकनीक से पता चला है कि बीटा
कोशिका में सेरोटोनिन की सांद्रता स्तनपान कराने वाले चूहों में 200 गुना अधिक
होती है। जंतुओं पर किए गए कई प्रयोगों के बाद टीम ने अनुमान लगाया कि स्तनपान
कराने वाले मनुष्य या चूहे एक विशेष हार्मोन का निर्माण करते हैं जो बीटा कोशिकाओं
को सेरोटोनिन निर्माण का निर्देश देता है। इसके परिणामस्वरूप बीटा कोशिकाओं की
संख्या में तेज़ी से वृद्धि होती है और इंसुलीन का निर्माण होता है। इसके अलावा, स्तनपान
करने वाले चूहों में सेरोटोनिन एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है जो बीटा कोशिकाओं को
स्वस्थ रखने में मदद करता है।
अन्य शोधकर्ता इस अध्ययन को काफी दिलचस्प मानते हैं क्योंकि इसके माध्यम से कुछ नए डैटा प्राप्त हुए हैं जो पहले उपलब्ध नहीं थे। साथ ही, इस अध्ययन के आंकड़ों से जुड़े कई सवाल भी उठ रहे हैं। एक टिप्पणी यह है कि इस अध्ययन में गर्भकालीन मधुमेह की दर, स्तनपान एवं स्तनपान न कराने वाले समूहों के उपचार के बीच अंतर तथा स्तनपान की अवधि और गहनता की कोई जानकारी नहीं दी गई है। इन सभी का टाइप-2 मधुमेह में महत्वपूर्ण योगदान रहता है।(स्रोत फीचर्स)
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कोविड-19 पर अनिश्चितताओं के बीच एक सवाल उभर कर आ रहा है कि
क्या इस बीमारी से ठीक होने वाले लोग कोरोनावायरस के प्रति टिकाऊ दूरगामी
प्रतिरक्षा विकसित कर पाएंगे? इस सम्बंध में रैगन इंस्टिट्यूट ऑफ एमजीएच, एमआईटी
के इम्यूनोलॉजिस्ट शिव पिल्लई और हार्वर्ड के एक शोध समूह ने कोविड-19 से मरने
वाले लोगों के शव-परीक्षण में देखा कि उनके शरीरों में कथित जर्मिनल केंद्र
अनुपस्थित थे।
जर्मिनल केंद्र एक तरह से प्रतिरक्षा
कोशिकाओं की पाठशालाएं हैं। ये केंद्र तिल्ली और लसिका ग्रंथियों में पाए जाते
हैं। यहां प्रतिरक्षा कोशिकाएं किसी रोगजनक के विरुद्ध लंबे समय तक चलने वाली एंटीबॉडी
प्रतिक्रिया देना सीखती हैं। हालांकि यह निष्कर्ष हल्के लक्षण या लक्षण-रहित लोगों
पर लागू नहीं होते लेकिन इनसे सबसे गंभीर मामलों में कोविड-19 प्रगति की व्याख्या
करने और टीका विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे यह भी पता चलता है कि कुछ
लोगों में एंटीबॉडी-प्रतिक्रिया अल्प अवधि के लिए भी हो सकती है और व्यक्ति को यह
संक्रमण दोबारा भी हो सकता है।
इसके लिए पिल्लई और उनके सहकर्मियों ने
कोविड-19 से मरने वाले 11 लोगों की तिल्ली और वक्ष की लसिका ग्रंथियों का विश्लेषण
किया जहां फेफड़ों की प्रतिरक्षा कोशिकाएं पहुंचती हैं। इन की तुलना समान आयु वर्ग
के 6 अन्य लोगों से की गई जिनकी मृत्यु किसी अन्य कारण से हुई थी। सामान्य हालात
में तिल्ली और लसिका ग्रंथियां एंटीबॉडी बनाने वाली बी-कोशिकाओं को नव-निर्मित
जर्मिनल केंद्रों में एकत्रित करती हैं। इन विशिष्ट सूक्ष्म संरचनाओं में कोशिकाएं
परिपक्व होती हैं और वायरस के प्रति एंटीबॉडी प्रतिक्रिया को परिष्कृत करती हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार कोविड-19 से मरने वाले लोगों के शव-परीक्षण में ये जर्मिनल
केंद्र नहीं पाए गए। एक पूर्व परीक्षण में भी यही पाया गया था ।
देखा गया है कुछ कोविड-19 संक्रमणों में
साइटोकाइन्स नामक जैव-रसायनों का तूफान आ जाता है। यह शोथ व गंभीर रोग का कारण बन
जाता है। वैसे साइटोकाइन्स संक्रमणों की प्रतिक्रिया में बी-कोशिकाओं और
प्रतिरक्षा प्रणाली के अन्य किरदारों को संदेश भेजते हैं। पिल्लई की टीम ने कोविड-19
मृतकों की लसिका ग्रंथियों में एक प्रकार के साइटोकाइन (TNF-α) की मात्रा में वृद्धि पाई। शोधकर्ताओं ने
टाइप-टी कोशिका की भी कमी पाई जो जर्मिनल केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाती हैं। संभवत: TNF-α ही टी-कोशिकाएं बनने से रोकता है।
अन्य इम्यूनोलॉजिस्ट की तरह पिल्लई का भी ऐसा मानना है कि सार्स-कोव-2 के विरुद्ध ठीक तरह से तैयार किया गया टीका टिकाऊ एंटीबॉडी प्रक्रिया दे सकता है। लेकिन उनका मानना है कि टीका विकसित करने वाले समूहों के लिए इस अध्ययन के निष्कर्ष काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। पिल्लई के अनुसार यदि लसिका ग्रंथियों में अत्यधिक TNF- α का निर्माण हुआ तो शायद टीकाकरण लंबे समय तक सुरक्षा नहीं दे पाएगा।(स्रोत फीचर्स)
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