आपको यह जानकर हैरानी होगी कि रसोई गैस हमारी सेहत के लिए बेहद जोखिमभरी है। यह बात ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स युनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में सामने आई है। आज अधिकतर घरों में लोग खाना पकाने के लिए एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अब एलपीजी गैस का विकल्प तलाशने का समय आ गया है।
अब तक यही कहा जाता था कि कोयला और लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर इनसे निकलने वाला धुआं सांस सम्बंधी बीमारियों को न्यौता है। इसके बनिस्बत एलपीजी धुआं नहीं छोड़ती और हवा को प्रदूषित नहीं करती है। लेकिन अध्ययन के अनुसार एलपीजी गैस पर भी खाना बनाना न सिर्फ हमारी सेहत के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है।
जब हम गैस जलाते हैं तो ज़हरीले यौगिक बनते हैं तथा नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर ज़हरीले नाइट्रोजन ऑक्साइड बनते हैं। इससे दमा व अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा ये रक्तप्रवाह में भी मिल सकते हैं। जो हृदय रोग, कैंसर और अल्ज़ाइमर वगैरह का खतरा पैदा कर सकते हैं।
जब हम गैस चूल्हा जलाते हैं तो असल में हम जीवाश्म ईंधन ही जला रहे होते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और फारमेल्डीहाइड भी बन सकते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड के उत्सर्जन से हवा में ऑक्सीजन कम होती है और खून में भी ऑक्सीजन नष्ट होती है। इससे हमें सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
रसोई गैस हमारी सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह है। इसका अंदाज़ा इससे बखूबी लगाया जा सकता है कि एंवायरमेंट साइंस एंड टेक्नॉलॉजी जर्नल में छपे अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका में बच्चों में दमा के 12.7 फीसदी मामले, यानी हर आठ में से एक मामले में वजह रसोई गैस से हुआ उत्सर्जन है। वहीं, 2022 में हुए एक अध्ययन में कहा गया था कि अमेरिका में रसोई गैस से कुल जितना कार्बन उत्सर्जन होता है वह पांच लाख कारों से होने वाले उत्सर्जन के बराबर है।
भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश है। यहां 2021 तक करीब 28 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे। इनमें हर साल 15 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, 2040 तक एलपीजी उपभोग बढ़कर 4.06 करोड़ टन हो जाएगा। बता दें कि भारत में एलपीजी में प्रोपेन गैस का प्रयोग होता है। इसके जलने से खतरनाक बेंज़ीन गैस निकलती है। लिहाज़ा, हमें ऐसे विकल्प तलाशने की ज़रूरत है जो अधिक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल हों। (स्रोत फीचर्स)
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एक हालिया अध्ययन के अनुसार वर्ष 2020 से 2050 के बीच कैंसर पर 25 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने की संभावना है। यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद पर 0.55 प्रतिशत के वार्षिक कर के बराबर है। इस विश्लेषण में 29 प्रकार के कैंसर से बीमार होने या मरने वाले लोगों द्वारा उपचार की लागत और आर्थिक उत्पादकता की हानि का अनुमान लगाया गया है। सबसे महंगे कैंसर में फेफड़े, आंत, स्तन और लीवर शामिल हैं जिनका वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रकोप होता है। जामा ऑन्कोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कैंसर की जांच, निदान और उपचार पर खर्च में वृद्धि से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पर्याप्त स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ मिलता है। 75 प्रतिशत कैंसर के मामले इन देशों में रिकॉर्ड किए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)
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एएलएस नामक रोग की वजह से एक महिला की बोलने की क्षमता पूरी तरह जा चुकी थी। एएलएस या लाऊ गेरिग रोग व्यक्ति को क्रमश: लकवा ग्रस्त करता जाता है। वह महिला आवाज़ तो पैदा कर सकती थी लेकिन शब्द समझने योग्य नहीं होते थे। अब उसी महिला ने एक मस्तिष्क इम्प्लांट की मदद से बोलने का रिकॉर्ड स्थापित कर दिया है।
यह दावा स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक दल ने बायोआर्काइव्स नामक वेबसाइट पर प्रकाशित शोध पत्र में किया है। महिला की पहचान गोपनीय रखने के लिए उसे छद्मनाम T12 से संबोधित किया गया है। रिकॉर्ड यह है कि T12 लगभग 62 शब्द प्रति मिनट की रफ्तार से बोल पा रही है। हम आम तौर पर करीब डेढ़ सौ शब्द प्रति मिनट की गति से बोलते हैं और बोलना संप्रेषण का सचमुच सबसे तेज़ तरीका है।
तो सवाल है कि यह करिश्मा हुआ कैसे और आगे की दिशा क्या होगी।
दरअसल, इससे जुड़े शोधकर्ता कृष्णा शिनॉय पिछले कई वर्षों से मस्तिष्क-कंप्यूटर के संपर्क बिंदु की गति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहे हैं। इसके लिए वे एक छोटी सी पट्टी पर कई इलेक्ट्रोड लगाकर उसे व्यक्ति के मस्तिष्क के मोटर कॉर्टेक्स में स्थापित कर देते हैं। यह मस्तिष्क का वह हिस्सा है जो गतियों को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है। इस उपकरण की मदद से शोधकर्ता यह रिकॉर्ड कर पाते हैं व्यक्ति की कौन-सी तंत्रिकाएं एक साथ सक्रिय हो रही हैं। इस पैटर्न से यह पता चल जाता है कि वह व्यक्ति क्या क्रिया करने के बारे में सोच रहा है, भले वह व्यक्ति लकवाग्रस्त हो।
इससे पहले जो प्रयोग हुए थे उनमें लकवाग्रस्त व्यक्ति से हाथों की हरकत करने के बारे में सोचने को कहा गया था। ऐसे सोचते वक्त उसकी तंत्रिका गतिविधि को भांपकर वह इम्प्लांट कंप्यूटर के पर्दे पर कर्सर को चलाता था या वे सिर्फ सोचकर वीडियो गेम्स खेल सकते थे या रोबोटिक भुजा पर नियंत्रण कर सकते थे।
इन सफलताओं के बाद स्टैनफोर्ड की टीम यह समझने में लगी थी कि क्या बोलने से जुड़ी क्रियाओं के संदर्भ में मोटर कॉर्टेक्स की तंत्रिकाओं में कुछ उपयोगी जानकारी होती है।
जैसे, यदि T12 बोलने की कोशिश में अपने मुंह, जीभ, स्वर यंत्र को एक खास तरह से चलाने का प्रयास कर रही है तो क्या इस बात को तंत्रिका गतिविधियों में भांपा जा सकता है? ज़ाहिर है बोलते समय मांसपेशियों की बहुत छोटी-छोटी, बारीक हरकतें होती है। लेकिन बड़ी खोज यह हुई कि इन छोटी-छोटी हरकतों के बारे में भी चंद तंत्रिकाओं में ऐसी सूचनाएं होती है जिनकी मदद से कोई कंप्यूटर प्रोग्राम यह अनुमान लगा सकता है कि व्यक्ति क्या शब्द बोलने का प्रयास कर रहा है। और जब यह सूचना कंप्यूटर को दी गई तो उसके पर्दे पर वे शब्द प्रकट हो गए जो T12 बोलना चाहती थी।
देखा जाए, तो बोलते समय हम मांसपेशियों की निहायत पेचीदा हरकतें करते हैं – हम हवा को बाहर धकेलते हैं, उसमें कंपन पैदा करते हैं ताकि वह ध्वनि के रूप में निकले, फिर मुंह, होठों, जीभ की हरकतों से उस ध्वनि को शब्दों का रूप देते हैं।
पहले भी इन हरकतों को शब्दों में ढालने की ऐसी कोशिशें की जाती रही हैं लेकिन स्टैनफोर्ड की टीम ने अधिक सटीकता और गति हासिल कर ली है। इसमें कृत्रिम बुद्धि की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही और आगे यह भूमिका बढ़ने के साथ सटीकता और गति बढ़ने की उम्मीद है। इसमें भाषा के मॉडल्स का उपयोग यह पूर्वानुमान करने में किया जाएगा कि एक शब्द बोलने के बाद क्या अपेक्षा की जाए कि वह व्यक्ति अगला शब्द क्या बोलेगा। (स्रोत फीचर्स)
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कई लोग सपने में देखे गए दृश्यों को वास्तव में अंजाम देते हैं। यह एक समस्या है जो अक्सर नींद के रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) चरण में होती है। इसे आरईएम निद्रा व्यवहार विकार (आरबीडी) कहते हैं और यह लगभग 0.5 से लेकर 1.25 प्रतिशत लोगों, खासकर वयस्क पुरुषों, को प्रभावित करता है। विश्लेषण से पता चला है कि आरबीडी तंत्रिका-क्षति रोगों का पूर्वाभास हो सकता है। खास तौर से सिन्यूक्लीनोपैथी का अंदेशा होता है जिसमें मस्तिष्क में अल्फा-सिन्यूक्लीन नामक प्रोटीन के लोंदे जमा हो जाते हैं।
वैसे सोते हुए किए जाने वाले सारे व्यवहार आरबीडी नहीं होते। जैसे नींद में चलना या बड़बड़ाना गैर-आरईएम निद्रा के दौरान होते हैं और इन्हें आरबीडी की क्षेणी में नहीं रखा जा सकता। इसके अलावा एक तथ्य यह भी है कि सारे आरबीडी का सम्बंध सिन्यूक्लीनोपैथी से नहीं होता। और तो और, यह स्थिति अन्य कारणों से भी बन सकती है।
अलबत्ता, जब आरबीडी के साथ ऐसी कोई अन्य स्थिति न हो तो भविष्य में बीमारी अंदेशा होता है। कुछ अध्ययनों का निष्कर्ष है कि सपनों में हरकतें भविष्य में तंत्रिका-क्षति रोग पैदा होने की 80 प्रतिशत तक भविष्यवाणी कर सकती हैं। हो सकता है कि यह ऐसी बीमारी का प्रथम लक्षण हो।
आरबीडी से जुड़ा सबसे प्रमुख रोग पार्किंसन रोग है। इसमें व्यक्ति क्रमश: अपने मांसपेशीय क्रियाकलापों पर नियंत्रण गंवाता जाता है। एक अन्य रोग है लेवी बॉडी स्मृतिभ्रंश। इसमें मस्तिष्क में लेवी बॉडीज़ जमा होने लगती हैं और व्यक्ति का अपनी हरकतों और संज्ञान पर नियंत्रण नहीं रहता। एक तीसरे प्रकार की सिन्यूक्लीनोपैथी व्यक्ति की ऐच्छिक हरकतों के अलावा अनैच्छिक क्रियाओं (जैसे पाचन) में भी व्यवधान पहुंचाती है। शोधकर्ताओं का मत है कि जीर्ण कब्ज़ और गंध की संवेदना के ह्रास की अपेक्षा आरबीडी सिन्यूक्लीनोपैथी का बेहतर पूर्वानुमान देता है।
वैसे तो सपनों को चेष्टाओं में बदलना और पार्किंसन के आपसी सम्बंध के बारे में काफी समय से लिखा जाता रहा है। स्वयं जेम्स पार्किंसन ने 1817 में इसके बारे में लिखा था। सपनों और पार्किंसन रोग के बारे में कई रिपोर्ट्स के बावजूद इनकी कड़ियों को जोड़ा नहीं जा सका था। लेकिन हाल ही में खुद एक मरीज़, जिसे आरबीडी की शिकायत थी, ने अपने डॉक्टर से आग्रह किया कि उसका ब्रेन स्कैन करके पार्किंसन के बारे में शंका की जांच करें। उस मरीज़ की आशंका सही निकली – उसे पार्किंसन रोग था।
हाल के वर्षों में आरबीडी और सिन्यूक्लीनोपैथी के बीच कार्यकारी सम्बंध की समझ बढ़ी है। आम तौर पर आरईएम निद्रा के दौरान कुछ क्रियाविधि होती है जो ऐसी चेष्टाओं पर रोक लगाकर रखती है। लेकिन आरबीडी पीड़ित व्यक्ति में यह क्रियाविधि काम नहीं करती और वे शारीरिक चेष्टाएं करते रहते हैं। 1950 व 1960 के दशक में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि आरईएम निद्रा के दौरान ऐसी हरकतें कितनी ऊटपटांग हो सकती हैं। जैसे कुछ बिल्लियों पर प्रयोग के दौरान उनके ब्रेन स्टेम के कुछ हिस्सों को काटकर निकाल दिया गया। ऐसा करने पर आरईएम निद्रा के दौरान मांसपेशियों की हरकतों पर जो रुकावट लगी थी वह समाप्त हो गई और आरईएम निद्रा के दौरान वे बिल्लियां ऐसे हाथ-पैर मारती रहीं जैसे सपने देखकर उसके अनुसार हरकतें कर रही हों।
फिर 1980 के दशक में एक मनोचिकित्सक कार्लोस शेंक और उनके साथियों ने आरबीडी को लेकर पहले केस अध्ययन प्रकाशित किए। ये मरीज़ वैसे तो शांत स्वभाव के थे किंतु उनका कहना था कि वे हिंसक सपने देखते हैं और आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं। शेंक की टीम ने 29 आरबीडी मरीज़ों का अध्ययन किया। सभी 50 वर्ष से अधिक उम्र के थे। शेंक की टीम ने रिपोर्ट किया है कि इनमें से 11 में आरबीडी की शुरुआत के औसतन 13 वर्षों बाद तंत्रिका-क्षति रोग उभरे। आगे चलकर, कुल 21 मरीज़ों में ऐसे रोग प्रकट हुए।
इन परिणामों की पुष्टि एक ज़्यादा व्यापक अध्ययन से भी हुई है। दुनिया भर के 21 केंद्रों के 1280 आरबीडी मरीज़ों में से 74 प्रतिशत में 12 वर्षों के अंदर तंत्रिका-क्षति रोग का निदान किया गया। धीरे-धीरे आरबीडी और तंत्रिका-क्षति रोगों के बीच की कड़ियों को स्वीकार कर लिया गया है। लेकिन अभी स्पष्ट नहीं है कि इन कड़ियों का कार्यिकीय आधार क्या है।
कई वैज्ञानिकों का मत है कि आरबीडी इस वजह से होता है क्योंकि सिन्यूक्लीन ब्रेन स्टेम के उस हिस्से में जमा होने लगता है जो हमें आरईएम निद्रा के दौरान निष्क्रिय करके रखता है। अपने सामान्य रूप में यह प्रोटीन तंत्रिकाओं के कामकाज में भूमिका निभाता है। लेकिन जब यह असामान्य ढंग से तह हो जाता है तो यह विषैले लोंदे बना सकता है। ऑटोप्सी परीक्षणों से पता चला है कि आरबीडी से पीड़ित 90 प्रतिशत मरीज़ों की मृत्यु मस्तिष्क में सिन्यूक्लीन जमाव के लक्षणों के साथ होती है। अभी तक ऐसी कोई तकनीक उपलब्ध नहीं है जिससे जीवित व्यक्ति के मस्तिष्क में सिन्यूक्लीन के थक्कों की जांच की जा सके। अलबत्ता, वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि शरीर के अन्य हिस्सों (खासकर सेरेब्रो-स्पायनल द्रव) में गलत तरह से तह हुए सिन्यूक्लीन का पता लगाया जा सके। ऐसे एक अध्ययन में आरबीडी पीड़ित 90 प्रतिशत व्यक्तियों में गलत ढंग से तह हुआ सिन्यूक्लीन मिला है।
इतना तो सभी मान रहे हैं कि आरबीडी पार्किंसन तथा अन्य तंत्रिका-क्षति रोगों का प्रारंभिक लक्षण है। इस समझ के साथ वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा हानिकारक सिन्यूक्लीन शरीर में किस तरह फैलता है। इस बात के काफी प्रमाण मिले हैं कि यह विकार आंतों में शुरू होता है और वहां से मस्तिष्क तक पहुंचता है। उदाहरण के लिए चूहों पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि आंतों से मस्तिष्क तक यह वैगस तंत्रिका के ज़रिए पहुंचता है। मनुष्यों में भी देखा गया है कि वैगस तंत्रिका को काट दें (जो जीर्ण आमाशय अल्सर के इलाज के लिए किया जाता है), तो पार्किंसन होने का जोखिम कम हो जाता है।
कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि पार्किंसन दो प्रकार का होता है। कुछ में यह आंतों में पहले शुरू होता है और कुछ में पहले मस्तिष्क में। जैसे डेनमार्क के आर्हुस विश्वविद्यालय के पर बोर्गहैमर का कहना है कि आरबीडी मस्तिष्क-प्रथम पार्किंसन का एक शुरुआती लक्षण हो सकता है लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि आरबीडी के हर मरीज़ को अंतत: पार्किंसन रोग होगा ही। मात्र एक-तिहाई मरीज़ों में ऐसा होता है।
इस संदर्भ में एक और अवलोकन महत्वपूर्ण है। सॉरबोन विश्वविद्यालय की इसाबेल आर्नल्फ ने पार्किंसन के मरीज़ों के स्वप्न के समय के व्यवहार में कुछ अजीब बात देखी। ये मरीज़ जागृत अवस्था में तो शारीरिक क्रियाओं में दिक्कत महसूस करते थे, लेकिन सोते समय इन्हें हिलने-डुलने में कोई परेशानी नहीं होती थी। इस तरह के व्यवहार के रिकॉर्डिग की मदद से आर्नल्फ की टीम को आरबीडी मरीज़ों के सपनों की कुछ विशेषताएं देखने को मिलीं जिनके आधार पर शायद यह समझने में मदद मिलेगी कि हमें सपने कैसे और क्यों आते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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हर किसी की तमन्ना होती है कि लंबा जीए लेकिन शरीर जवां और तंदुरुस्त बना रहे। अब यह तमन्ना सेनोलिटिक्स औषधियों से पूरी होने का दावा किया जा रहा है।
जीर्णता (या सेनेसेंस) उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। जीर्ण पड़ चुकी कोशिकाएं हमारे शरीर में घूमती रहती हैं और ऐसे पदार्थ स्रावित करती हैं जो स्वस्थ कोशिकाओं को भी जीर्ण कर सकते हैं; कुछ उसी तरह जैसे एक सड़ा हुआ फल बाकी फलों को भी सड़ाना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में अवरोध पैदा करने वाले पदार्थों को कहते हैं सेनोलिटिक्स – वृद्धावस्था-रोधी।
सेनोलिटिक्स में (कृत्रिम या प्राकृतिक) सेनोलिटिक एंजेट की मदद से जीर्ण कोशिकाओं को हटाया जा सकता है, और इस तरह स्वस्थ कोशिकाओं पर जीर्ण कोशिकाओं के प्रभावों को रोककर वृद्धावस्था को टाला जा सकता है।
वर्तमान में शोधकर्ताओं ने सेनोलिटिक्स की मदद से वृद्ध हो रहे अलग-अलग अंगों की बहाली या तंदुरुस्ती लौटाने में सफलता पा ली है। जैसे मेयो क्लिनिक में एक ही परिस्थिति में एक ही उम्र के दो कृन्तकों पर अध्ययन किया गया था। देखा गया कि जो कृन्तक स्वाभाविक रूप से वृद्ध हो रहा था वह दुबला और बूढ़ा दिख रहा था, जबकि सेनोलिटिक उपचार वाला दूसरा कृन्तक स्फूर्तिभरा था।
अन्य शोधों में पाया गया है कि सेनोलिटिक्स के साथ उपचार से रक्त में इतना बदलाव हो जाता है कि ऐसे चूहों का रक्त प्राप्त करने वाले करीब दो साल के चूहे आठ महीने के चूहे लगने लगते हैं। इसके अलावा, दृष्टि बहाल करने से लेकर मेरुदंड में डिस्क ठीक से बिठाने तक के प्रयास सेनोलिटिक्स की मदद से किए जा रहे हैं।
यहां तक कि हृदय के मामले में सेनोलिटिक्स कारगर लगते हैं। पूरे शरीर में कुशलतापूर्वक रक्त पहुंचाने के लिए हृदय की रक्त पम्प करने वाले ऊतकों को सटीक लयबद्धता से काम करना पड़ता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और इनकी कोशिकाएं बूढ़ी होती जाती हैं, यह लय गड़बड़ा सकती है। नतीजतन शरीर बीमारियों का घर बन सकता है। एक अध्ययन में देखा गया है कि अन्य उपयोगों के लिए स्वीकृत दो औषधियां हृदय को फिर तंदुरुस्त बना देती हैं। दोनों औषधियों का मिश्रण पुरानी पड़ चुकी कोशिकाओं को हटा देता है, जिससे उनकी पड़ोसी कोशिकाएं सामान्य तरह से कार्य करने लगती हैं।
लेकिन समग्र बुढ़ापे को पलटना यानी उम्र बढ़ाने का मामला थोड़ा पेचीदा है। बुढ़ापे का अंतिम पड़ाव है मृत्यु। किसी भी उपचार का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं को ऐसे पड़ाव या बिंदु की ज़रूरत होती है जिन पर वे उपचार की सफलता या विफलता तय कर सकें। लेकिन शोधकर्ता किसी व्यक्ति की मृत्यु का समय नहीं माप सकते, क्योंकि यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उपचार से कोई कितना जीया और बिना उपचार के कितना जीता। बड़ी आबादी पर अध्ययन करके ही जाना जा सकेगा कि क्या अपनाए गए उपचार ने वास्तव में मृत्यु को टाला। कुछ संभव सेनोलिटिक उपचारों को 2026 के आसपास एफडीए से मंज़ूरी मिलने की संभावना है। (स्रोत फीचर्स)
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हमारे शरीर में वसा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये ऊर्जा प्रदान करने के साथ-साथ शरीर के विकास के लिए भी आवश्यक हैं। लेकिन शरीर में वसा की अतिरिक्त मात्रा से स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है और उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग जैसी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। भारत में औसतन 40 प्रतिशत लोग मोटापे की समस्या से परेशान हैं। इससे निपटने के लिए सबसे अच्छा सुझाव तो नियमित रूप से व्यायाम और शारीरिक परिश्रम करना है लेकिन ऐसा करना सबके लिए संभव नहीं हो पाता। इस विषय में कई तरह के शोध किए गए हैं लेकिन अभी तक कोई ऐसा नुस्खा नहीं मिला जिससे आसानी से शरीर की वसा को नियंत्रित किया जा सके।
हाल के वर्षों में एक अंतर्राष्ट्रीय शोध दल ने शरीर में उपस्थित अत्यधिक वसा से निपटने का तरीका खोज निकाला है। गौरतलब है कि हमारे शरीर में मुख्य रूप से दो प्रकार की वसा होती है: ब्राउन फैट और व्हाइट फैट। ब्राउन फैट चयापचय, मोटापे और मधुमेह को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और दीर्घायु को संभव बनाती है। दूसरी ओर, व्हाइट फैट चयापचय की दृष्टि से अकार्यशील होता है। इसकी ऊर्जा का अधिक उपयोग नहीं किया जाता है, और यह शरीर में जमा होता रहता है और कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।
तो यह एक महत्वपूर्ण सवाल रहा है कि शरीर में ब्राउन फैट को कैसे बढ़ाया व सक्रिय किया जाए। साथ ही यह भी एक मुद्दा रहा है कि क्या व्हाइट फैट को ब्राउन में तबदील करना संभव है।
क्यूबैक स्थित शेरब्रुक युनिवर्सिटी हॉस्पिटल और युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में शरीर में उपस्थित ब्राउन फैट को सक्रिय करने का प्रयास किया गया है। वास्तव में ब्राउन फैट ठंड या कुछ रासायनिक संकेतों के प्रत्युत्तर में सक्रिय होकर शरीर में गर्मी उत्पन्न करता है।
मनुष्यों के शरीर में ब्राउन फैट की मात्रा काफी कम होती है। वैज्ञानिकों का प्रयास रहा है कि किसी अन्य तरीके से ब्राउन फैट को सक्रिय किया जा सके या व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में परिवर्तित किया जा सके ताकि चयापचय में सुधार हो।
ब्राउन फैट नवजात शिशुओं की गर्दन और कंधों में पाया जाता है। यह काफी मात्रा में कैलोरी जलाता है और शरीर को गर्म रखने का काम करता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह कम होने लगता है और 6 वर्ष की आयु तक यह कुल फैट के 5 प्रतिशत से भी कम हो जाता है। इसके बाद हमारे शरीर में केवल निष्क्रिय व्हाइट फैट बनता है।
इस व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदलने और स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया। उन्होंने व्हाइट फैट की कोशिकाओं को लेकर उन्हें बहुसक्षम (प्लूरिपोटेंट) स्थिति में परिवर्तित किया और फिर कुछ एपीजेनेटिक स्विच के साथ छेड़छाड़ की तो वे ब्राउन फैट कोशिकाओं में परिवर्तित हो गई।
इसके बाद उन्होंने ब्राउन फैट कोशिकाओं को कल्चर किया और एक अन्य जीन को सक्रिय करके कोशिका की सतह पर ऐसे प्रोटीन की संरचना को परिवर्तित कर दिया जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। ऐसा करने से ब्राउन फैट को भेड़ों में इंजेक्ट करने पर उनके शरीर ने इसे अस्वीकार नहीं किया।
इस ब्राउन फैट को एक मोटी भेड़ में डाला गया। जैसी कि उम्मीद थी अधिक मात्रा में ब्राउन फैट वाली भेड़ दुबली हो गई और उसमें चयापचय सिंड्रोम तथा मधुमेह भी खत्म हो गया।
इस संदर्भ में, डॉ. शिन्या यामानाका द्वारा वयस्क कोशिकाओं को उनकी मूल भ्रूण अवस्था में लाने का काम महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसके लिए उन्होंने चार प्रकार के जीन को सक्रिय किया था जिन्हें यामानाका कारक कहा जाता है। ये कारक एक तरह से स्विच का काम करते हैं। भ्रूणीय अवस्था में आने के बाद ये कोशिकाएं ब्राउन फैट, व्हाइट फैट, हृदय. लीवर या गुर्दे वगैरह की कोशिकाएं बनाने में सक्षम हो जाती हैं।
ब्राउन फैट को उपयोग करने में एक बड़ी समस्या रही है कि ब्राउन फैट द्वारा किए जाने वाले कार्यों को व्हाइट फैट में प्रोग्राम किया जाए। यह अब संभव हो गया है। डेलावेयर स्थित एक समूह ने एक मान्य उपचार के माध्यम से कुछ महिलाओं में निष्क्रिय ब्राउन फैट को सक्रिय किया तथा व्हाइट फैट को ब्राउन में भी परिवर्तित किया। इसकी मदद से व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में परिवर्तित करने की तकनीकें विकसित की जा सकेंगी। यह ब्राउन फैट आपके वज़न को कम करने के साथ मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, अस्थि रोग और डिमेंशिया के जोखिम को भी कम करेगा।
यह तकनीक जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। गौरतलब है कि 1974 से मधुमेह, अस्थिरोग और कैंसर जैसे बीमारियों के लिए व्हाइट फैट का बढ़ता स्तर सबसे बड़ा कारण है। इसके अलावा थकान और ताकत की कमी जैसे बुढ़ापे के लक्षणों के पीछे का कारण भी शरीर की अतिरिक्त वसा है। वसा के बढ़ने से जीवन प्रत्याशा में भी कमी आई है। यदि वैज्ञानिक मनुष्यों में व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में परिवर्तित करने का रास्ता खोज निकालते हैं तो इससे कई बीमारियों के जोखिम में कमी आ सकती है। (स्रोत फीचर्स)
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इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड का अपना महत्व है, बशर्ते कि हम उनका सही तरह से विश्लेषण करें। हाल ही में किए गए ऐसे विश्लेषण से संकेत मिला है कि फ्लू व अन्य आम वायरसों के संक्रमण और अल्ज़ाइमर या पार्किंसन जैसे तंत्रिका-क्षय रोगों के बीच कुछ सम्बंध है।
वैसे तो हर्पीज़ वायरस के संक्रमण का सम्बंध अल्ज़ाइमर रोग से देखा गया है और एप्स्टाइन-बार वायरस संक्रमण और मल्टीपल स्क्लेरोसिस के बीच सम्बंध के भी सशक्त प्रमाण मिले हैं। लेकिन ताज़ा अध्ययन में सेंटर फॉर अल्ज़ाइमर रिलेटेड डिमेंशिया के क्रिस्टीन लेविन और उनके साथियों ने यह देखने की कोशिश की है कि क्या आम तौर पर वायरस संक्रमण और तंत्रिका-क्षय रोगों के बीच कोई सम्बंध है।
लगभग साढ़े चार लाख इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्डों की जांच के न्यूरॉन में प्रकाशित परिणामों से पता चला है कि वायरस संक्रमण और तंत्रिका-क्षय रोगों के बीच कम से कम 22 कड़ियां हैं और कई मामलों में तंत्रिका क्षय रोग का जोखिम संक्रमण के 15 वर्षों बाद भी देखा गया। वैसे फिलहाल इस सह-सम्बंध की कार्यप्रणाली की समझ नहीं बनी है।
टीम ने सबसे पहले तो 35,000 ऐसे लोगों के रिकॉर्ड देखे जिन्हें मस्तिष्क सम्बंधी कोई रोग था। तुलना के लिए उन्होंने 3,10,000 ऐसे लोगों के रिकॉर्ड की भी जांच की जिन्हें ऐसा कोई रोग नहीं था। ये सारे रिकॉर्ड उन्हें फिनजेन नामक डैटाबेस से प्राप्त हुए थे। इस जांच में टीम को संक्रमण और मस्तिष्क रोगों के बीच 45 उल्लेखनीय कड़ियां देखने को मिलीं। इसी बात को उन्होंने एक अन्य डैटाबेस – यूके बायोबैंक – से तुलना करके भी देखा। अंतत: उनके पास 22 कड़ियां शेष रहीं।
सबसे सशक्त कड़ी वायरस-जन्य मस्तिष्क ज्वर और अल्ज़ाइमर के बीच सामने आई। मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित व्यक्तियों को आगे चलकर अल्ज़ाइमर होने की संभावना 31 गुना ज़्यादा देखी गई। अन्य मामलों में सह-सम्बंध इतने सशक्त नहीं दिखे, हालांकि कुछ हद तक देखे गए।
इस अध्ययन की कुछ ज़ाहिर-सी सीमाएं भी हैं। पहली तो यह है कि सारे आंकड़े युरोपीय मूल के लोगों के हैं। इसके अलावा, दुनिया के अन्य इलाकों में ज़्यादा संक्रमित करने वाले वायरसों को भी इसमें शामिल नहीं किया जा सका है। बहरहाल, इस अध्ययन से कुछ संकेतक तो मिले हैं जिन पर आगे काम किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw1024/magazine-assets/d41586-023-00181-3/d41586-023-00181-3_23939536.jpg
एंटीबायोटिक प्रतिरोध दुनिया भर में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक खतरा है। ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2019 में इसके कारण 12 लाख लोगों की मृत्यु हुई। अक्सर ऐसा माना जाता है कि एंटीबायोटिक दवाइयों के अत्यधिक उपयोग के चलते बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी होते जा रहे हैं। लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने प्रतिरोध का एक और संभावित कारण पाया है: अवसादरोधी औषधियों का सेवन।
प्रयोगशाला अध्ययन में देखा गया है कि किस तरह अवसादरोधी दवाइयां बैक्टीरिया में प्रतिरोध को शुरू कर सकती हैं। इन दवाइयों के संपर्क से बैक्टीरिया में एक नहीं बल्कि कई एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध देखा गया।
मामले की शुरुआत ऐसे हुई कि ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर वॉटर एंड एनवायरमेंटल बायोटेक्नॉलॉजी के जियानहुआ गुओ ने साल 2014 में देखा था कि अस्पतालों के अपशिष्ट जल नमूनों की तुलना में घरेलू अपशिष्ट जल नमूनों में अधिक एंटीबायोटिक-रोधी जीन्स हैं, जबकि अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाइयों का उपयोग अधिक होता है।
इसके अलावा, गुओ और अन्य समूहों ने यह भी देखा था कि अवसादरोधी दवाइयां कुछ बैक्टीरिया को मार देती हैं या उनकी वृद्धि रोक देती हैं। ये दवाइयां कोशिका के प्रतिरक्षा तंत्र को उकसाती हैं, जो बैक्टीरिया को बाद में एंटीबायोटिक उपचार से बचने में सक्षम बनाता है।
गुओ और उनकी टीम देखना चाहती थी कि गैर-एंटीबायोटिक दवाओं का एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित करने में क्या योगदान है। 2018 के एक अध्ययन में उन्होंने देखा था कि फ्लोक्सेटीन (ब्रांड नाम प्रोज़ेक) के संपर्क में आने के बाद ई. कोली बैक्टीरिया में कई एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित हो गया था। हालिया अध्ययन में उन्होंने 5 अन्य अवसाद-रोधी दवाइयों और 13 एंटीबायोटिक दवाइयों पर अध्ययन किया और देखा कि ई. कोली में प्रतिरोध कैसे विकसित हुआ।
भरपूर ऑक्सीजन युक्त प्रयोगशाला परिस्थितियों में रखे गए बैक्टीरिया में उन्होंने देखा कि अवसादरोधी दवाइयों के कारण कोशिकाओं में सक्रिय ऑक्सीजन मूलक बने। ये विषैले अणु होते हैं जो बैक्टीरिया के प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करते हैं। इसने बैक्टीरिया की उस प्रणाली को सक्रिय कर दिया था जिसका उपयोग कई बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं सहित विभिन्न अणुओं को बाहर निकालने के लिए करते हैं। इससे शायद इस बात की व्याख्या हो जाती है कि प्रतिरोधी जीन की अनुपस्थिति में भी कैसे ये बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाइयों का सामना कर सकते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि आंतों में, जहां ये बैक्टीरिया पाए जाते हैं, परिस्थिति ऑक्सीजन-रहित होती है। तो देखना होगा कि वहां क्या होता होगा। वैसे प्रयोग के दौरान अनॉक्सी परिस्थितियों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध बहुत धीरे-धीरे विकसित हुआ था।
लेकिन अवसादरोधी दवाइयों के संपर्क में आने से ई. कोली बैक्टीरिया की उत्परिवर्तन दर में भी वृद्धि हुई, और उनमें से प्रतिरोधी जीन्स का चयन हुआ।
गौरतलब बात यह रही कि कम से कम एक अवसाद-रोधी दवा, सेरट्रेलाइन, ने बैक्टीरिया कोशिकाओं के बीच जीन्स के हस्तांतरण को बढ़ावा दिया। ऐसा हस्तांतरण विभिन्न बैक्टीरिया के बीच भी संभव है। इससे बैक्टीरिया की विभिन्न प्रजातियों के बीच भी प्रतिरोध फैल सकता है। अभी यह समझना बाकी है कि अवसादरोधी बैक्टीरिया में किन अणुओं को लक्षित करते हैं और विभिन्न बैक्टीरिया प्रजातियों पर इनके प्रभाव को देखने की भी ज़रूरत है।
2018 में, बैक्टीरिया को सीधे तौर पर प्रभावित न करने वाली 835 दवाइयों के सर्वेक्षण में देखा गया था कि इनमें से 24 प्रतिशत दवाइयों ने मानव आंत के कम से कम एक बैक्टीरिया किस्म की वृद्धि को रोक दिया था।
शोधकर्ता चूहों के सूक्ष्मजीव संसार पर अवसादरोधी दवाइयों के प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि ये दवाइयां चूहों की आंत के सूक्ष्मजीव संसार को बदल सकती हैं और जीन हस्तांतरण को बढ़ावा दे सकती हैं।
बहरहाल शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि इस शोध के आधार पर अवसादरोधी का सेवन बंद न करें। क्योंकि अवसाद का इलाज करना सबसे ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)
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साइंस न्यूज़ में एक प्रशिक्षु एना गिब्स ने 9 मई 2022 के अंक में लिखा था, “आप जलवायु परिवर्तन को मानें या न मानें, लेकिन यह भविष्य में हमारे खान-पान को बदल देगा।” मनुष्य जितनी कैलोरी का उपभोग करते हैं, उसमें से आधा हिस्सा मक्का, चावल और गेहूं से आता है। हम अपनी 80 फीसदी पोषण सम्बंधी ज़रूरतों के लिए 13 फसलों पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अनियमित वर्षा और चरम मौसम की वजह से इनका उत्पादन घटेगा। हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सख्तजान प्रजातियों को विकसित करने की ज़रूरत है, और यही वजह है कि मोटे अनाज (मिलेट्स) महत्व प्राप्त कर रहे हैं।
मोटे अनाज गर्म क्षेत्रों में अनुपजाऊ मिट्टी में उगाए जाते हैं और छोटे दानों वाली भरपूर उपज देते हैं, जिनका उपयोग आटा बनाने में किया जाता है। मोटे अनाज के कुछ उदाहरण हैं बाजरा, ज्वार, रागी। कम उगाए जाने वाले कुछ मोटे अनाज हैं तिनई (कंगनी), समा या समई और सांवा, जिनका उपयोग ब्रेड, रस्क (टोस्ट) और बिस्किट बनाने में किया जाता है।
अग्रणी उत्पादक
मोटे अनाज 10,000 से अधिक वर्षों से एशिया और अफ्रीका के लोगों के मुख्य आहार रहे हैं। ये जलवायु को लेकर लचीले हैं; बहुत कम पानी और गर्म, शुष्क परिस्थिति में अच्छी तरह से पनपते हैं। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत सालाना लगभग 1.2 करोड़ मीट्रिक टन मोटे अनाजों का उत्पादन करता है। HelgiLibrary के अनुसार, इनके उत्पादन में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, इसके बाद चीन और नाइजर का स्थान है।
खाद्य और कृषि संगठन ने वर्ष 2023 को मोटे अनाज का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारत के कृषि मंत्रालय ने मोटे अनाज के उपयोग पर केंद्रित योजनाओं और गतिविधियों की एक शृंखला तैयार की है, विशेषकर आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में। मंत्रालय पंजाब, केरल और तमिलनाडु में ‘सही खाओ मेलों’ के आयोजन की भी योजना बना रहा है। चेन्नई स्थित एम.एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन मोटे अनाज के उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने के लिए बहुत सक्रिय रहा है।
यह सही है कि हममें से अधिकांश लोग गेहूं और चावल को मुख्य भोजन के रूप में खाते हैं, लेकिन ये मोटे अनाज के बराबर पौष्टिक नहीं होते हैं। इसलिए उन्हें ‘पोषक-अनाज’ नहीं कहा जाता है। मोटे अनाज में उल्लेखनीय मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन बी, और कई धात्विक आयन होते हैं जो चावल जैसे प्रमुख खाद्य पदार्थों में नहीं होते हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि इन लाभों को प्राप्त करने के लिए मोटे अनाज हमारे दैनिक भोजन में शामिल किए जाएं।
मोटे अनाज का अर्थशास्त्र
बैंगलुरु स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान की प्रोफेसर और एम.एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन की प्रमुख मधुरा स्वामिनाथन ने 31 जनवरी, 2023 को दी हिंदू में प्रकाशित अपने लेख में इस विषय के अर्थशास्त्र की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की है। वे बताती हैं कि अगर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में वितरित किए जाने वाले चावल और गेहूं के लगभग 20 प्रतिशत हिस्से की जगह मोटा अनाज दिया जाए, तो इससे मध्याह्न भोजन से स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य को बहुत लाभ होगा। मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ाना और कृषि भूमि में गिरावट को पलटना संभव तो है लेकिन आसान नहीं होगा और इसके लिए बहुस्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। भारत सरकार, और कर्नाटक और ओडिशा राज्यों ने मोटा अनाज मिशन शुरू किया है, जो स्वागत योग्य कदम है। (स्रोत फीचर्स)
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यह तो बरसों से पता रहा है कि प्रोटीन बनाने वाले नए-नए जीन्स मौजूदा जीन्स में दोहराव या परिवर्तन की वजह से बन सकते हैं। लेकिन कुछ प्रोटीन-निर्माता जीन्स डीएनए के ऐसे खंडों से भी बन सकते हैं जो पहले लक्ष्यहीन आरएनए बनाया करते थे। गौरतलब है कि जब डीएनए के किसी हिस्से से सम्बंधित प्रोटीन बनवाना होता है तो उसकी एक प्रतिलिपि आरएनए के रूप में बनती है जो केंद्रक से बाहर जाकर प्रोटीन निर्माण करवाती है।
जब कोई डीएनए ऐसा आरएनए बनाए जिसका उपयोग प्रोटीन निर्माण में न हो सके तो वह फालतू ही हुआ ना? लेकिन इस तरीके से नए जीन्स बन जाएं, यह समझ से परे था।
अब एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह करिश्मा कैसे होता है कि डीएनए की फालतू शृंखला से बनने वाले आरएनए में ऐसी निपुणता पैदा हो जाती है कि वह केंद्रक से बाहर निकल जाता है। आरएनए का केंद्रक से बाहर निकलना उसके द्वारा प्रोटीन संश्लेषण की दिशा में पहला कदम होता है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने ऐसे 74 मानव प्रोटीन-निर्माता जीन्स उजागर किए हैं जो मनुष्य के चिम्पैंज़ी से अलग होने के बाद अस्तित्व में आए हैं। इनमें से कुछ जीन्स ने हमें ज़्यादा बड़े और जटिल मस्तिष्क प्रदान किए हैं। नेचर इकॉलॉजी एंड इवोल्यूशन पत्रिका में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जब ये जीन्स चूहों वगैरह जैसे कृन्तक जीवों में जोड़े गए तो उनके मस्तिष्क अपेक्षाकृत बड़े और मानव-सदृश हो गए।
देखा जाए तो जीन्स द्वारा बनाए गए आरएनए में से कुछ तो स्वयं कुछ नियामक भूमिका निभाते हैं। ये केंद्रक से बाहर नहीं जाते। दूसरी और प्रोटीन का संश्लेषण करवाने वाले आरएनए (संदेशवाहक आरएनए) केंद्रक से निकलकर कोशिका द्रव्य में पहुंचते हैं और राइबोसोम की मदद से प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं।
मामले की शुरुआत पेकिंग विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक चुआन-युन ली की इस खोज के साथ हुई थी कि मनुष्यों में कुछ प्रोटीन-निर्माता जीन्स रीसस बंदरों में पाए जाने वाले गैर-प्रोटीन निर्माता डीएनए खंडों से बहुत मिलते-जुलते होते हैं। तो सवाल उठा कि रीसस बंदरों के ये लगभग लक्ष्यविहीन डीएनए खंड मनुष्यों में प्रोटीन-निर्माता जीन्स कैसे बन गए?
फिर उन्हीं के छात्र ने ऐसे कुछ गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए को केंद्रक से बाहर निकलते देखा। इस खोज के बाद इन शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर की मदद से यह पता लगाया कि ऐसे गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए जो केंद्रक से बाहर नहीं निकलते और जो केंद्रक से बाहर निकल पाते हैं, उनके बीच क्या अंतर हैं।
पूरी कवायद से पता चला कि अंतर डीएनए के उन खंडों में हैं जिन्हें U1 तत्व कहते हैं। जब ये U1 तत्व आरएनए में जुड़ जाते हैं तो वह आरएनए केंद्रक से बाहर निकलने सक्षम नहीं रह जाता। दूसरी ओर, प्रोटीन-निर्माता जीन्स के U1 तत्वों में ऐसे उत्परिवर्तन पाए जाते हैं कि वे आरएनए की केंद्रक से बाहर निकलने की क्षमता को प्रभावित नहीं करते। ये आरएनए बाहर कोशिका द्रव्य में पहुंचकर राइबोसोम की मदद से प्रोटीन बना देते हैं।
आगे खोजबीन के लिए ली के दल ने मनुष्य व चिम्पैंज़ी के ऐसे नवीन प्रोटीन-निर्माता जीन्स की तलाश की जो रीसस बंदरों में गैर-प्रोटीन निर्माता आरएनए के रूप में मौजूद थे। इसके अलावा उन्होंने U1 तत्व में वह उत्परिवर्तन भी खोज निकाला जो केंद्रक से बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है। अंतत: उन्हें 45 मानव जीन्स और 29 मानव तथा चिम्पैंज़ी के साझा जीन्स मिले जो इस शर्त को पूरा करते हैं।
इतना होने के बाद उन्होंने इनमें से उन नौ जीन्स पर ध्यान केंद्रित किया जो मानव मस्तिष्क में सक्रिय होते हैं। वे देखना चाहते थे कि ये जीन्स क्या भूमिका निभाते हैं। उन्होंने इन जीन्स सहित और इनसे रहित कृत्रिम मस्तिष्क ऊतक (ऑर्गेनॉइड) विकसित किए। इसके आधार पर उन्होंने दो जीन्स पहचाने हैं जो मस्तिष्क को सामान्य से थोड़ा बड़ा बनाने में मदद करते हैं।
उन्होंने इनमें से एक जीन को चूहों में भी डालकर देखा और पाया कि उन चूहों का दिमाग सामान्य चूहों की अपेक्षा बड़ा हो गया। और तो और, उनमें कॉर्टेक्स भी बड़ा बना जो तर्क व भाषा के लिए ज़िम्मेदार होता है। एक अन्य जीन का भी ऐसा ही असर रहा और इस जीन से लैस चूहों का याददाश्त के परीक्षण में प्रदर्शन बेहतर रहा।
शोधकर्ताओं का कहना है कि मानव मस्तिष्क के विकास में कुछ सर्वथा नए जीन्स की भूमिका रही है जो प्रोटीन-निर्माता जीन्स में उत्परिवर्तनों से नहीं बल्कि गैर-प्रोटीन जीन्स के कारण बने हैं। इस ताज़ा खोज से नए जीन्स बनने की क्रियाविधि समझने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)
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