एक गिलास दूध और एक छोटा-सा एंज़ाइम

ऋषि राज राय

ल्पना कीजिए, रात का खाना खत्म हुआ और सामने एक गिलास दूध हाज़िर हो गया। कुछ लोगों के लिए यह एक सुखद आदत है। लेकिन कुछ लोगों के पेट में दूध पहुंचते ही एक अजीब हलचल शुरू हो जाती है – गैस बनना, मरोड़ उठना, पेट फूलना और कभी-कभी दस्त भी लग जाते हैं। क्या इसके पीछे दूध दोषी है? या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो बदल चुका है, चुपके से, बिना बताए!

यह कहानी है लैक्टोज़ असहिष्णुता (lactose intolerance) की| एक ऐसी अवस्था जिसे अक्सर ‘दूध से एलर्जी’ (milk allergy) समझ लिया जाता है। लेकिन यह वास्तव में पाचन के जैव रसायन की एक बेहद रोचक और जैव विकास सम्बंधी गाथा है।

लैक्टोज़ क्या है?

Text Box: लैक्टेज़ कमी के लक्षण — दूध लेने के 30 मिनट से 2 घंटे के भीतर
- पेट फूलना और भारीपन
- गैस
- पेट में मरोड़ या ऐंठन
- दस्त (कभी-कभी तीव्र)
- मितली और बेचैनी
नोट: लक्षणों की तीव्रता व्यक्ति-व्यक्ति में अलग-अलग होती है और दूध की मात्रा पर निर्भर करती है।
दूध को संपूर्ण आहार (complete nutrition food) कहा जाता है, और इसका एक बड़ा कारण है उसमें मौजूद शर्करा, जिसे हम लैक्टोज़ कहते हैं। रासायनिक दृष्टि से यह एक डाईसेकराइड (disaccharide molecule) है, यानी दो सरल शर्करा अणुओं से मिलकर बना अणु। देखा जाए तो, साधारण शकर (सुक्रोज़) भी एक डाईसेकराइड होती है और ग्लूकोज़ तथा फ्रक्टोज़ के अणुओं के जुड़ने से बनती है:

शकर = ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़

इसी प्रकार से दूध में उपस्थित शर्करा (लैक्टोज़) भी दो शर्करा अणुओं से जुड़कर बनी होती है:

लैक्टोज़ = ग्लूकोज़ + गैलेक्टोज़

जब हम दूध पीते हैं तो आंतों (human digestive system) में लैक्टोज़ टूटकर ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ बन जाते हैं। असहिष्णुता की कहानी यहीं से शुरू होती है।

लैक्टोज़ पाचन की दिक्कत

Text Box: तालिका 1 : लोग अक्सर लैक्टोज़ असहिष्णुता और दूध से एलर्जी, दोनों को एक मान लेते हैं, लेकिन ये बिल्कुल अलग-अलग हैं।
पहलू	लैक्टोज़ असहिष्णुता	दूध एलर्जी
कारण	लैक्टेज़ एंज़ाइम की कमी	प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया
प्रभावित तंत्र	पाचन तंत्र	प्रतिरक्षा तंत्र
लक्षण	गैस, मरोड़, दस्त	पित्ती, सूजन, सांस में दिक्कत
खतरा	असहज, पर जानलेवा नहीं	गंभीर हो सकती है
उपचार	आहार परिवर्तन, एंज़ाइम सप्लीमेंट	सख्त परहेज़, एपिनेफ्रीन


हमारी छोटी आंत (small intestine) की भीतरी सतह पर असंख्य सूक्ष्म ऊंगली-नुमा संरचनाएं होती हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। इन्हीं विलाई पर एक विशेष एंज़ाइम काम करता है लैक्टेज़ (lactase enzyme)। लैक्टेज़ ही वह सूक्ष्म रसायन है जिस पर दूध, खासकर लैक्टोज़, पचाने की पूरी ज़िम्मेदारी टिकी है।

लैक्टेज़ दरअसल लैक्टोज़ के दोनों अणुओं के बीच की रासायनिक कड़ी को तोड़ता है, जिससे ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ अलग-अलग हो जाते हैं। ये दोनों सरल शर्कराएं आसानी से रक्तप्रवाह में अवशोषित होकर शरीर को ऊर्जा देती हैं।

यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में है तो लेक्टोज़ टूटता है, दूध पचता है, ऊर्जा मिलती है, सब सुचारू चलता है। यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में नहीं है तो कहानी बदल जाती है।

अपचित लैक्टोज़ जब छोटी आंत से आगे बड़ी आंत (large intestine) में पहुंचता है, तो वहां रहने वाले अरबों जीवाणु, जिन्हें सामूहिक रूप से आंतों का माइक्रोबायोटा (gut microbiota)  कहते हैं, इसे अपने भोजन के रूप में ‘किण्वित’ (bacterial fermentation) करने लगते हैं।

यह किण्वन क्रिया कई उत्पाद बनाती है – हाइड्रोजन गैस, कार्बन डाईऑक्साइड, और कभी-कभी मीथेन भी। साथ ही, लैक्टोज़ आंत में पानी को अपनी ओर खींचता है, जिससे दस्त की स्थिति diarrhea symptoms) बन सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्या दूध में नहीं, बल्कि उसे पचाने की हमारी घटी हुई क्षमता में है।

ऐसा क्यों होता है?

मनुष्य, गाय, बकरी, हाथी वगैरह सभी स्तनधारी जीव (mammals) जन्म के बाद मां के दूध पर निर्भर रहते हैं। इसलिए प्रकृति ने शिशु को लैक्टेज़ का भरपूर उत्पादन करने की क्षमता दी है।

लेकिन जैसे-जैसे बच्चा ठोस आहार ग्रहण करने लगता है और दूध (animal milk nutrition) उसके जीवन का एकमात्र ऊर्जा-स्रोत नहीं रहता, शरीर लैक्टेज़ बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन (LCT) की सक्रियता को धीरे-धीरे कम करने लगता है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक स्वाभाविक, सुनियोजित जैविक प्रक्रिया है।

एक अनोखा मोड़

लगभग दस हज़ार वर्ष पहले, जब युरोप, अरब और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में पशुपालन और डेयरी संस्कृति का उदय हुआ, तो एक जेनेटिक उत्परिवर्तन हुआ जिसने प्रकृति की ‘लॉटरी’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जिन व्यक्तियों में यह उत्परिवर्तन था, उनके शरीर में वयस्क होने पर भी लैक्टेज़ बनता रहा। वे बड़े होने पर दूध पीते रह सकते थे और उन्हें पशुओं के दूध से अतिरिक्त कैलोरी, प्रोटीन और कैल्शियम मिलता था। यह अकाल और कठिन परिस्थितियों में उनके जीवित रहने में सहायक था। इस अतिरिक्त पोषण स्रोत ने इन व्यक्तियों को अधिक संतानें पैदा करने की संभावना दी, और यह जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता गया। इस परिघटना को लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस (lactase persistence) या लैक्टोज़ सहिष्णुता कहते हैं।

लैक्टोज़ असहिष्णुता के प्रकार

प्राथमिक लैक्टोज़ असहिष्णुता (primary lactose intolerance): सबसे सामान्य प्रकार। उम्र के साथ LCT जीन की सक्रियता स्वाभाविक रूप से घटती है। यह जेनेटिक रूप से निर्धारित होती है और स्थायी होती है।

द्वितीयक लैक्टोज़ असहिष्णुता (secondary lactose intolerance): किसी संक्रमण, सीलिएक रोग, क्रोह्न रोग, या आंत की सूजन के कारण लैक्टेज़ उत्पादन अस्थायी रूप से कम हो जाता है। मूल रोग के उपचार के बाद यह प्राय: ठीक हो सकता है।

जन्मजात लैक्टोज़ असहिष्णुता (congenital lactose intolerance): यह अत्यंत दुर्लभ है। शिशु जन्म से ही लैक्टेज़ एंज़ाइम नहीं बना पाता। मां का दूध भी पच नहीं पाता, इसलिए इसमें तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप (medical treatment) आवश्यक होता है।

लैक्टोज़ असहिष्णुता का अर्थ जीवनभर दूध का पूर्ण परित्याग (dairy avoidance) नहीं है। कई व्यावहारिक रास्ते खुले हैं, जैसे:

 – लैक्टोज़-मुक्त दूध (lactose free milk)  और दुग्ध उत्पादों का उपयोग करें।

 – दही और पनीर (fermented dairy products)  अक्सर पच जाते हैं।

 – डेयरी-उत्पाद खाने से पहले लैक्टेज़ एंज़ाइम सप्लीमेंट (lactase supplements) लें। थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे असर जांचें।

Text Box: तालिका 2: उपयोगी वैज्ञानिक तथ्य
कई लोग जो दूध नहीं पचा पाते, वे दही और पनीर आराम से खा लेते हैं। ऐसा क्यों?
उत्पाद	क्यों सहनशील?
दही	दही में लैक्टोबेसिलस जैसे बैक्टीरिया लैक्टोज़ को किण्वन के दौरान आंशिक रूप से तोड़ देते हैं, जिससे उसकी मात्रा घट जाती है।
पनीर	पनीर बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश लैक्टोज़ मट्ठे के साथ निकल जाता है। परिपक्व पनीर में लैक्टोज़ नगण्य होता है।
घी	घी में लैक्टोज़ लगभग शून्य होता है - यह केवल वसा है। इसीलिए लैक्टोज़ असहिष्णु लोग भी घी सहन कर लेते हैं।

 – कैल्शियम के वैकल्पिक स्रोत (calcium rich foods) (तिल, पालक, सोयाबीन, बादाम दूध) अपनाएं।

 – किसी भी परिवर्तन से पहले चिकित्सक से परामर्श (medical consultation) अवश्य लें।

यहां एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम और विटामिन डी के प्रमुख स्रोत हैं। इन्हें बिना उचित विकल्पों के छोड़ना हड्डियों को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में।

Text Box: तालिका 3: लैक्टोज़ असहिष्णुता में क्षेत्रवार विविधता
क्षेत्र			लैक्टोज़ असहिष्णु आबादी
उत्तर युरोप		10–15%
भारतीय उपमहाद्वीप	~60–70%
पूर्व एशिया		~80–95%
उप-सहारा अफ्रीका	~70–80%
लैक्टोज़ असहिष्णुता के आंकड़ों global lactose intolerance statistics) से यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि दुनिया की लगभग 60–70 प्रतिशत वयस्क आबादी इसी अवस्था में है। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या दूध न पचना असामान्य है, या वयस्क होने पर भी दूध पचना एक विशेष जेनेटिक अपवाद (genetic exception) है?

विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है: दूध न पचना जैविक रूप से सामान्य है। जैव विकास (evolutionary biology) की दृष्टि से देखें तो लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस  यानी वयस्कावस्था में भी लैक्टोज़ पचाने की क्षमता वास्तव में एक अपवाद है।

यह हमें यह भी याद दिलाता है कि ‘सामान्य’ की परिभाषा अक्सर हमारी सांस्कृतिक (cultural diet habits) और भौगोलिक पृष्ठभूमि (geographical food patterns) से आकार लेती है, विज्ञान से नहीं।

अंत में

दूध से दूरी बनाने की ज़रूरत शरीर की जैविक विविधता (human biological diversity) का एक ईमानदार संकेत है। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है; जो शिशु अवस्था में सहज था, वह वयस्क होने पर बदल सकता है। एक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक, दूसरे के लिए असहज हो सकता है। शरीर कोई एक स्थिर मशीन नहीं, बल्कि एक बदलती हुई जैविक कहानी (human biology) है — और हर कहानी का अपना स्वाद है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोशिकाओं के अनजाने-अनसमझे उपांग को काम पर लगाया

डॉ. सुशील जोशी


म तौर पर कोशिकाओं (cells) के बारे में बताया जाता है कि उनमें एक कोशिका झिल्ली होती है, पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ती होती है, एक केंद्रक होता है, माइटोकॉण्ड्रिया होते हैं, रिक्तिकाएं (vacuoles) होती हैं। लेकिन कोशिकाओं में हज़ारों की संख्या में एक ऐसा उपांग होता है जिसके बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं हैं।

इन उपांगों को वॉल्ट (तिज़ोरी-vault) कहते हैं और इनकी खोज कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेल्स (UCLA research)  के जीव वैज्ञानिक लियोनार्ड रोम और नैन्सी केडेर्शा ने 1986 में की थी। तभी से वे इनकी गुत्थी सुलझाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। बहरहाल, रहस्य बरकरार है लेकिन इनका एक उपयोग खोज लिया गया है।

वॉल्ट्स मनुष्यों सहित अधिकांश यूकेरियोटिक (केंद्रक-युक्त) कोशिकाओं (eukaryotic cells) के कोशिका द्रव्य में पाए जाने वाले खोखले, बैरल के आकार के राइबोन्यूक्लिक प्रोटीन कण होते हैं। ये कोशिकाओं में पाए जाने वाले सबसे बड़े कणों में से हैं (70 नैनोमीटर)। इनका आवरण मेजर वॉल्ट प्रोटीन (MVP) से बना होता है और अंदर छोटे वॉल्ट आरएनए (vault RNA) सहित तीन प्रोटीन होते हैं। एक औसत मानव कोशिका में लगभग 10,000 से 1,00,000 वॉल्ट्स होते हैं, विशेष रूप से मैक्रोफेज (macrophage immune cells) जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं में। ये मुख्य रूप से कोशिका द्रव्य में और कोशिका कंकाल से जुड़े पाए जाते हैं और साथ ही नाभिकीय छिद्र (nuclear pore complex) पर भी पाए जा सकते हैं।

कोशिकाओं में क्या चल रहा है यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिक आम तौर पर या तो किसी कोशिका में किसी क्षण पाए गए प्रोटीन्स (प्रोटियोम) का अध्ययन करते हैं या किसी कोशिका में पाए गए आरएनए अणुओं (ट्रांसक्रिप्टोम – transcriptome) का अध्ययन करते हैं। प्रोटीन्स कोशिका की क्रिया के प्रमुख उत्पाद होते हैं और इन्हें देखकर बताया जा सकता है कि उस समय किसी कोशिका में क्या-क्या क्रियाएं हुई हैं। दूसरी ओर, आरएनए (RNA molecules) वह अणु होता है जिसके आधार पर प्रोटीन्स बनते हैं। केंद्रक में मौजूद डीएनए (DNA genetic information) के रूप में इस बात की समस्त सूचना होती है कि किसी कोशिका में कौन-कौन से प्रोटीन बन सकते हैं। इस डीएनए के खंड जीन्स कहलाते हैं। ज़रूरत के अनुसार इन जीन्स के अनुलेख बनाए जाते हैं। ये अनुलेख आरएनए के रूप में होते हैं और यही कोशिका द्रव्य में जाकर सम्बंधित प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं। तो किसी कोशिका के समस्त आरएनए का विश्लेषण करके यह बताया जा सकता है कि उसमें किन प्रोटीन्स का निर्माण हो रहा है या हाल ही में हुआ है। इस विश्लेषण को ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण (transcriptome profiling) कहते हैं।

इस मामले में दिक्कत यह है कि आरएनए अत्यंत अस्थिर अणु (unstable RNA molecules) होता है और सम्बंधित प्रोटीन बनवाने का काम पूरा होने के बाद जल्द ही (मिनटों में) नष्ट हो जाता है। तो ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण से आपको कुछ समय पहले की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिल सकती। यहीं पर वॉल्ट्स (vault nanoparticles) का पदार्पण हुआ।

ब्रॉड इंस्टीट्यूट के जैव-चिकित्सा इंजीनियर फाइ चेन यह जानना चाहते थे कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स प्रोटीन निर्माण में सक्रिय रहे हैं। विचार यह था कि संदेशवाहक आरएनए (m-RNA, जो प्रोटीन बनवाते हैं) (messenger RNA – mRNA) को कैद कर लिया जाए, ताकि बाद में पता लगाया जा सके कि पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स से m-RNA बने थे।

पहला विचार यह आया कि इसके लिए पोली (A) बाइंडिंग प्रोटीन (PABP) की मदद ली जाए। यह वह प्रोटीन है जिसे स्वाभाविक रूप से m-RNA के एक सिरे पर जोड़ा जाता है और यह m-RNA की हिफाज़त करता है। कोशिश यह थी कि इस प्रोटीन (PABP) को किसी अन्य टिकाऊ अणु से जोड़ दिया जाए। जब यह संकुल m-RNA से जुड़ेगा तो m-RNA संरक्षित रहेगा जिसे बाद में देखा जा सकेगा।

इसके लिए सर्वप्रथम उन्होंने PABP को एक बैक्टीरिया प्रोटीन से जोड़ा। मगर इससे काम नहीं बना। तब सुझाव मिला कि इस काम के लिए रहस्यमयी वॉल्ट्स (vault nanostructures) की मदद ली जाए। अंदर से तो वॉल्ट्स खोखले होते हैं। m-RNA को वॉल्ट के अंदर पहुंचाने के लिए टीम ने यह रणनीति अपनाई कि PABP के जीन को MVP से जुड़ने वाले अंदरुनी प्रोटीन के जीन से संलग्न कर दिया।

जैसा कि हमने देखा ये वॉल्ट प्रोटीन की तीन परतों से घिरे होते हैं। सबसे ऊपर होता है मेजर वॉल्ट प्रोटीन (major vault protein – MVP)और अंदर दो छोटे वॉल्ट प्रोटीन के अस्तर होते हैं। अलबत्ता, बाहरी आवरण गतिशील होता है और इसमें समय-समय पर छिद्र खुलते हैं। इन्हीं छिद्रों से होकर छोटे अणु (small biomolecules)  अंदर जा सकते हैं।

वॉल्ट के आवरण में अंदर घुसने के लिए बाहर से आने वाले प्रोटीन या अन्य अणुओं को आवरण के वॉल्ट पोली (एडीपी राइबोस) पोलीमरेज़ प्रोटीन (VPARP) से जुड़ना होता है। यह एक संकेत के रूप में काम करता है। जब कोई प्रोटीन या अन्य अणु इससे जुड़ जाता है तो उसे वॉल्ट के अंदर प्रवेश मिल जाता है।

शोधकर्ता इसी मार्ग का उपयोग करके मनचाहे अणु को वॉल्ट के अंदर पहुंचाते हैं। इसके लिए MVP प्रोटीन पर ऐसे स्थल तैयार किए जाते हैं जो मनचाहे अणु से जुड़ सकें।

इस परिवर्तित PABP जीन को कोशिका में जोड़ दिया गया और साथ में MVP जीन की अतिरिक्त प्रतियां भी डाल दी गईं। हुआ यह कि इस परिवर्तित PABP ने m-RNA को पकड़ा (जो वह सामान्य तौर पर भी करता है) (gene expression signal) और उसे वॉल्ट के अंदर पहुंचा दिया। इसके बाद टीम ने यह किया कि वॉल्ट्स को रासायनिक विधि से खोला और वहां मौजूद m-RNA का क्षार अनुक्रम (RNA sequencing) पता किया। इससे यह पता चल सका कि वहां उपस्थित m-RNA अणुओं की उत्पत्ति किन जीन्स (gene origin analysis)  से हुई है।

यानी इस विधि में m-RNA अणुओं को वॉल्ट में कैद कर लिया जाता है जहां ये काफी समय तक (लगभग 7 दिन तक) सुरक्षित रहते हैं। कोशिकाओं को गर्मी या कम ऑक्सीजन (hypoxia conditions) जैसी परिस्थितियां में उनकी जेनेटिक प्रतिक्रिया देखकर इस विधि की जांच की गई। टीम ने इन वॉल्ट्स का उपयोग करके उन जीन्स का पता भी लगाया जो फेफड़े के कुछ कैंसर (lung cancer research) को स्वीकृत औषधियों का प्रतिरोध करने में मदद करते हैं। m-RNA रिकॉर्ड करने वाले वॉल्ट्स को उन्होंने कैंसर कोशिकाओं में डाला और फिर उन कोशिकाओं को औषधि के संपर्क में रखा। टीम यह चिंहित कर पाई कि कौन से सुरक्षात्मक जीन्स थे जो उपचार से पहले ही सक्रिय थे। पहले के अध्ययनों में सिर्फ उन्हीं जीन्स की पहचान की गई थी जो उपचार की प्रतिक्रिया स्वरूप सक्रिय होते हैं। जब टीम ने इस नए चिंहित जीन को लक्ष्य करने वाली दवा भी जोड़ दी तो प्रथम उपचार की प्रतिरोधी अधिकांश कोशिकाएं मारी गई।

इसे टीम ने टाइम-वॉल्ट या टाइम कैप्सूल (time vault technology)  भी कहा है। कुछ लोग इसे आणविक सेल्फी भी कह रहे हैं। इसके चिकित्सा में कई उपयोग सोचे जा रहे हैं। वैसे चेन यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह विधि एक-एक कोशिका के स्तर काम करेगी जिसकी मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन सक्रिय (gene activity tracking) रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विश्वास, उम्मीद और अच्छी सेहत का जीवविज्ञान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

मेरिकी लेखक और एक्टिविस्ट हेलन केलर (Helen Keller) इंसानी क्षमता और संभावना की एक अंतर्राष्ट्रीय मिसाल हैं। बहरेपन और अंधेपन से ग्रसित हेलन केलर ने लिखा था, “आशावाद (inspirational mindset) वह विश्वास है जो कामयाबी की ओर ले जाता है। उम्मीद और भरोसे के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता।”

आशावाद को भविष्य में अच्छा और हितकर होने की सकारात्मक उम्मीद रखने के रूप में समझा जा सकता है। यह एक इंसानी खूबी है जिसे बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी से भी जोड़ कर देखा जाता है। आशावाद तय करता है कि हम भविष्य को कैसे देखते-सोचते हैं। यह एक मॉड्युलेटर की तरह काम करता है जो सकारात्मक संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा-चढ़ा देता है और नकारात्मक विचारों और ख्यालों को दूर रखता है। इस्राइली-ब्रिटिश तंत्रिका विज्ञानी ताली शारोट (Tali Sharot neuroscientist) का अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत मनुष्य आशावादी हैं, लेकिन अधिकतर लोग ‘थोड़े ही’ आशावादी होते हैं।

यह कहा जा सकता है कि आशावाद वास्तविकता से अलग, एकतरफा सोच दिखाता है। जैव-विकास (evolutionary biology) ऐसी खूबी को क्यों तरजीह देगा जो आपको पूरी तरह निष्पक्ष रखने की बजाय एकतरफा ढंग से पूर्वाग्रह से लैस करे? वैज्ञानिकों के बीच आम राय यह है कि आशावाद की बदौलत अनुकूलन (adaptive advantage) काफी ज़्यादा होता है, अर्थात आशावाद किसी जीव की उत्तरजीविता (survival benefit) को बढ़ाता है।

कल्पना कीजिए कई हज़ार साल पहले कोई महिला जिस तरह रहती थी। मान लीजिए वह एक गुफा के अंदर रहती है और उस समय उस क्षेत्र में सूखा पड़ रहा है। अगर वह बाहर भोजन (कोई खरगोश या फल से लदी झाड़ी) मिलने की संभाविता निकालकर निर्णय करे, तो शायद ही भोजन की तलाश में बाहर जाए। ऐसे में निष्क्रिय रहना उसके लिए सही चुनाव रहता, क्योंकि इससे यहां-वहां भटकने में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती। दूसरी ओर, (कुछ-न-कुछ मिल जाने की) उम्मीद उसे भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलने की हिम्मत दे सकती है। बाहर कुछ-न-कुछ भोजन मिल जाने की संभावना ज़्यादा मानकर, उसके पास कोशिश करने की ज़्यादा संभावना होगी। किसी एक तरफ यह थोड़ा अधिक झुकाव उसे कोशिश करने के लिए बढ़ावा (risk taking behavior) देता है, जिससे उसके जीने की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि, इसकी भी एक सीमा है कि आप कितने आशावादी होकर इससे फायदा उठा सकते हैं। फायदे के लिए जो तरीका सबसे अच्छा काम करता है वह है एक सामान्य सकारात्मक सोच रखना, जिसे आशावादी स्वभाव कहा जाता है। असल ज़िंदगी में कुछ बुरा होने पर किसी निराशावादी व्यक्ति की प्रतिक्रिया होगी “मैं जानता था, ऐसा ही होगा”। जबकि आशावादी लोग कहेंगे “कल बेहतर होगा”।

वर्ष 2007 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन (Nature journal research) के अनुसार यह लचीलापन ‘आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टिमिज़्म बायस)’ से बना रहता है, जो मस्तिष्क में सूचनाओं की प्रोसेसिंग में गैर-बराबरी का परिणाम है: मस्तिष्क द्वारा अच्छी बातों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है और बुरी बातों को कम।

मस्तिष्क के अग्र और मध्य भाग का एक क्षेत्र है रोस्ट्रल एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (rACC)। जब आशावादी लोग अच्छे और सुखद भविष्य की कल्पना करते हैं तब यह क्षेत्र बहुत सक्रिय होता है। इस हिस्से में अधिक सक्रिय न्यूरॉन अच्छी संभावनाओं की एन्कोडिंग को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत, नकारात्मक जानकारियों पर rACC कम प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप असफलताओं का व्यक्ति की भविष्य की उम्मीदों पर कम असर पड़ता है।

रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (Life Orientation Test) एक छोटा-सा परीक्षण है जिसका इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में आशावादिता है या नहीं। इसमें स्थिति आधारित 10 वक्तव्य होते हैं जिन्हें आपको 0 से 4 के बीच अंक देने होते हैं (‘पूरी तरह असहमत’ के लिए 0 से ‘पूरी तरह सहमत’ के लिए 4 तक)। मसलन, ऐसे वक्तव्य होते हैं: “कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता हूं” और “यदि कुछ बुरा होना है, तो होकर रहेगा।” (psychological assessment)।

जिन लोगों में आशावादिता अधिक होती है, उनका हृदय अधिक स्वस्थ (heart health benefits) पाया गया है। बुज़ुर्गों में, आशावादी स्वभाव को न्यूरॉन्स का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो मस्तिष्क को बुढ़ापे की मार से बचाता है। वर्ष 2024 में एजिंग एंड डिसीज़ जर्नल (Aging and Disease journal study) में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) का उच्च स्तर बुढ़ापे में लचीलापन बढ़ाता है। बुढ़ाने के कारण भले ही कुछ न्यूरॉन्स खत्म होते जाते हैं, लेकिन BDNF बचे हुए न्यूरॉन्स को ज़्यादा असरदार तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति की इंद्रियां चाक-चौबंद रहती हैं और दिमाग समझदार बना रहता है। (स्रोत फीचर्स)

क्या आप आशावादी हैं? रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (LOT-R)

देखें कि यहां दिए गए वक्तव्यों से आप कितना सहमत हैं? सहमति की गंभीरता के अनुसार आपको इन वक्तव्यों को अंक देना है।

वक्तव्य

  1. कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता/ती हूं।
  2. मुश्किलों या चिंता को भूलना/हावी न होने देना मेरे लिए आसान है।
  3. यदि मेरे साथ कुछ बुरा होना है तो वह होकर रहेगा।
  4. मैं अपने भविष्य को लेकर हमेशा सकारात्मक रहता/ती हूं।
  5. मुझे अपने दोस्तों के साथ बहुत मज़ा आता है।
  6. मेरे लिए व्यस्त रहना ज़रूरी है।
  7. मुझे शायद ही कभी लगता है कि चीज़ें मेरे हिसाब से/अच्छे के लिए होंगी।
  8. मैं बहुत जल्दी परेशान नहीं होता/ती।
  9. मेरे साथ शायद ही कभी अच्छा हुआ है।
  10. कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि मेरे साथ बुरी चीज़ों की तुलना में अच्छी चीज़ें अधिक होंगी।

नोट: अंक ईमानदारी से दें। कोशिश करें कि किसी एक सवाल का जवाब, दूसरे सवाल के जवाब को ध्यान में रखकर न दिया जाए। जवाब वे चुनें जो आप पर लागू होते हों, न कि आदर्श जवाब हों या दूसरों को ध्यान में रखकर चुनें हों। ध्यान रहे यहां कोई भी जवाब सही या गलत नहीं हैं।

अंक कैसे दें?

ध्यान दें: स्कोर के लिए केवल कथन क्रमांक 1, 3, 4, 7, 9, 10 नंबर के सवालों अंकों को जोड़ा जाता है। वक्तव्य क्रमांक 2, 5, 6, 8 के अंकों को नहीं जोड़ा जाता।

वक्तव्य क्रमांक 1, 2, 4, 5, 6, 8 और 10 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह असहमत – 0
असहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
सहमत – 3
पूरी तरह सहमत – 4

वक्तव्य क्रमांक 3, 7 और 9 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह सहमत – 0
सहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
असहमत – 3
पूरी तरह असहमत – 4 

आपके द्वारा दिए गए जवाबों के अंक जोड़कर जो स्कोर निकलेगा उसकी व्याख्या का तरीका

19-24 घोर आशावादी;
14-18 मध्यम आशावादी;
9-13 उदासीन;
4-8 मध्यम निराशावादी; और
0-3 घोर निराशावादी।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/2d6p7g/article70654691.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/pablo-guerrero-I6QTv5pjq0E-unsplash.jpg

नए कोशिका एटलस से प्रतिरक्षा व्यवस्था में विविधता उजागर

क ऐसा कोशिका एटलस (cell atlas study) तैयार किया गया है जो चीन के 400 व्यक्तियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज (immune cells profiling) का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। इस एटलस से पता चला है कि अलग-अलग आबादियों के लोगों में कई जीव वैज्ञानिक अंतर (population level differences) होते हैं।

साइंस (Science journal research) में प्रकाशित इस अध्ययन में खून में उपस्थित प्रतिरक्षा कोशिकाओं का एक मल्टी-ओमिक विवरण (multi-omics analysis) दिया गया है। ओमिक शब्द आजकल काफी प्रचलन में है – किसी कोशिका के सारे जीन्स को मिलाकर जीनोम कहते हैं, सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटियोम और किसी मनुष्य के सारे सूक्ष्मजीवों के समूह को माइक्रोबायोम कहते हैं। यह अध्ययन विभिन्न ओम्स का परिचय देता है। इसे चाइनीज़ मल्टी-ओमिक्स एटलस (CIMA- Chinese Multi-Omics Atlas) नाम दिया गया है। इस एटलस में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज में महत्वपूर्ण विविधता पहचानी गई है जो इसी तरह के युरोपीय और जापानी समूहों में नहीं देखी गई थीं। एटलस के रचयिताओं ने कहा है कि यह डैटाबेस अन्य ऐसे ही डैटाबेस का पूरक है जो मूलत: युरोप-केंद्रित हैं।

अलग-अलग अध्ययनों के अंतर्गत विभिन्न कोशिका प्रकारों के लिए मल्टी-ओमिक एटलस तैयार किए हैं और इनका उपयोग मस्तिष्क, अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s research) और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े सवालों को समझने में किया गया है। लेकिन ये एटलस अक्सर युरोपीय मूल के लोगों से प्राप्त डैटा पर निर्भर रहे हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि इनके आधार पर विकसित औषधियां शायद अन्य मूल के लोगों के लिए प्रभावी न साबित हों। इसी खामी को भरने के लिए चीन के शांक्सी मेडिकल युनिवर्सिटी-बीजीआई कोलेबोरेटिव सेंटर फॉर फ्यूचर मेडिसिन के जुआनहुआ यिन और उनके साथियों ने चीन के 428 वयस्कों के खून में उपस्थित एक करोड़ से ज़्यादा कोशिकाओं का मल्टी-ओमिक विश्लेषण (large scale genomic profiling) किया।

इस एटलस में प्रत्येक व्यक्ति के जैव-आणविक सूचक (biomolecular markers) पता चलते हैं। इनमें चयापचय उत्पादों की तस्वीर, रक्त के जैव रासायनिक चिंह, क्रोमेटिन एक्सेसिबिलिटी (यानी सक्रिय डीएनए) डैटा और विभिन्न कोशिका आबादियों में जीन्स की अभिव्यक्ति में फर्क नज़र आते हैं।

इससे पहले OneK1K नामक परियोजना (OneK1K database) के तहत एक डैटाबेस बन चुका था, जिसमें उत्तर युरोपीय मूल के लोगों का विश्लेषण किया गया था। इसके अलावा जापान का ImmuNexUT project नामक डैटाबेस भी मौजूद था। इनसे तुलना करके शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न आबादियों में प्रमुख प्रतिरक्षा क्रियामार्ग और कोशिका प्रकार एक जैसे हैं।

इस समानता के बावजूद इन तीन एटलसों के बीच जेनेटिक नियमन (genetic regulation differences) और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की अवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर दिखे। जैसे उन्होंने कतिपय जीन्स के निकट उपस्थित विविधताओं पर ध्यान दिया जो इस बात पर असर डालती है कि वह जीन कितना सक्रिय होगा। पाया गया कि CIMA डैटा में 93 प्रतिशत लक्षित जीन्स और जापानी समूह के ऐसे जीन्स में समानता थी लेकिन युरोपीय समूह के साथ यह समानता मात्र 44 प्रतिशत ही देखी गई (population genomics)।

एक उदाहरण के तौर पर rs11886530 जीन (gene variant rs11886530) के परिवर्तित रूप पूर्वी एशियाई आबादी में तो आम थे मगर युरोपीय आबादी में बिरले थे। यह जीन प्रतिरक्षा कोशिकाओं (टी-कोशिकाओं) की अंदरुनी दैनिक घड़ी को प्रभावित करता है। इससे पहले यह क्रियाविधि प्रतिरक्षा कोशिकाओं में कभी नहीं देखी गई थी।

चीनी परियोजना में जिन लोगों (189 पुरुषों और 239 महिलाओं) का अध्ययन किया गया उनकी उम्र 20 से 77 वर्ष के बीच थी। शोधकर्ताओं ने देखा कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तियों में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, जो शोथ (इन्फ्लेमेशन) का कारण बनती है। इसके अलावा, डेंड्राइटिक कोशिकाओं में जीन्स की अभिव्यक्ति बदल जाती है। ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र में संदेशवाहक का काम करती हैं।

कुल मिलाकर CIMA का यह एटलस चिकित्सा के क्षेत्र में हमारी समझ को बढ़ाएगा और व्यक्ति-आधारित चिकित्सा व औषधि चयन में योगदान देगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड वैक्सीन और कभी-कभार खून के थक्के बनना

वैश्विक कोविड-19 टीकाकरण (COVID-19 vaccination) के दौरान वैज्ञानिकों ने एस्ट्राज़ेनेका (AstraZeneca vaccine) और जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा विकसित टीका लेने वाले कुछ लोगों में एक गंभीर दुष्प्रभाव पाया, हालांकि यह दुष्प्रभाव दुर्लभ है। इन लोगों में असामान्य तरीके से खून के थक्के बने और प्लेटलेट्स की संख्या घट गई थी। शोधकर्ताओं ने अब इस बीमारी के के लिए ज़िम्मेदार जैविक प्रक्रिया को समझ लिया है।

VITT यानी वैक्सीन इंड्यूस्ड इम्यून थ्रम्बोसायटोपीनिया एंड थ्रम्बोसिस) की स्थिति अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन टीका लेने वाले लगभग 2 लाख में से 1 व्यक्ति और ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका टीका लेने वाले लगभग 1 लाख में से 3 व्यक्तियों में देखी गई थी। दोनों टीकों को बनाने में एडेनोवायरस (adenovirus vector vaccine) के परिवर्तित रूप का उपयोग किया गया था। हालांकि इन टीकों ने लाखों लोगों की जान बचाई, फिर भी VITT के चंद मामलों के बाद कुछ देशों ने अपनी टीका नीति बदल (vaccine policy change) ली। उदाहरण के तौर पर, 2021 में ब्रिटेन ने 40 साल से कम उम्र के लोगों को ऐसा दूसरा टीका लेने की सलाह दी, जिनमें खून के थक्के बनने का जोखिम नहीं था।

गौरतलब है कि 2021 में वैज्ञानिकों ने पाया था कि VITT से प्रभावित लोगों के शरीर में PF4 (Platelet Factor 4)नामक एक प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बन रही थीं, जो खून के थक्के बनने में भूमिका निभाता है। लेकिन यह साफ नहीं था कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अचानक इस प्रोटीन पर हमला क्यों करने लगी (autoimmune reaction)।

हाल ही में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन (New England Journal of Medicine study) में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इसका कारण बताया है। जब एक विशेष जीन संस्करण वाले लोग एडेनोवायरस का सामना करते हैं, तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली आम तौर पर pVII नामक वायरल प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ज़्यादातर लोगों में यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित होती है। लेकिन थोड़े-से लोगों में एक छोटा-सा जेनेटिक बदलाव (genetic mutation) इन एंटीबॉडीज़ की बनावट बदल देता है। इसमें सिर्फ एक अमीनो अम्ल का परिवर्तन होता है, जिसके कारण एंटीबॉडी pVII की बजाय PF4 प्रोटीन से चिपकने लगती है। यदि टीकाकरण के बाद ऐसी गलत दिशा में काम करने वाली एंटीबॉडीज़ ज़्यादा बनने लगें, तो इससे शरीर में खतरनाक थक्के बनने लगते हैं और साथ-साथ प्लेटलेट्स की संख्या भी घट जाती है (abnormal immune response)।

शोधकर्ताओं ने जिन 21 लोगों में VITT पाया, उन सभी में एक अमीनो अम्ल का यह जेनेटिक बदलाव मौजूद था। जब वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के बिना एंटीबॉडी बनाकर उन्हें चूहों पर परखा, तो खून के थक्के बनना काफी कम हो गया (preclinical research)।

फ्लिंडर्स युनिवर्सिटी के प्रतिरक्षा विशेषज्ञ टॉम गॉर्डन के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी ऑटोइम्यून बीमारी को उसके अंतिम असली कारण तक साफ-साफ जोड़ा जा सका है।

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि टीकों में कोई कमी या खोट नहीं थी। इस अध्ययन से भविष्य में और ज़्यादा सुरक्षित टीके बनाने में मदद मिल सकती है, साथ ही ऐसी दुर्लभ ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं की पहले पहचान भी बेहतर तरीके से हो सकेगी (vaccine safety research)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?

न दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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व्यायाम और मस्तिष्क

क्सरसाइज़ (व्यायाम – exercise benefits) का नाम सुनते ही क्या ख्याल आता है? मज़बूत मसल्स, स्वस्थ दिल, स्वस्थ फेफड़े यानी तंदुरुस्त शरीर। और यदि कहा जाए कि शरीर की इस तंदुरुस्ती में मस्तिष्क (brain health) भी शामिल है तो?

जी हां, न्यूरॉन जर्नल (Neuron journal study) में प्रकाशित हालिया अध्ययन यही बात कहता है; व्यायाम से मस्तिष्क की वायरिंग मज़बूत होती है, जिससे कुछ न्यूरॉन्स फटाफट सक्रिय हो जाते हैं। इससे समझ आता है कि लगातार व्यायाम करने से व्यायाम में होने वाली आसानी और बेहतर क्षमता (यानी व्यायाम सहिष्णुता (exercise tolerance)) में मस्तिष्क सक्रिय रूप से शामिल होता है। फिलहाल यह निष्कर्ष चूहों पर हुए अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है कि ऐसा मनुष्यों में भी होता हो लेकिन पहले इसे परखना होगा।

फिलेडेल्फिया में पेन्सिलवेनिया युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस बेटली और उनके साथी यह जानना चाहते थे कि जब लोग व्यायाम करते हैं तो मस्तिष्क में क्या होता है। असल में पूर्व अध्ययन में ऐसा पाया गया था कि स्टेरॉयडोजेनिक फैक्टर-1 (SF1) नामक प्रोटीन को कोड करने वाले जीन को ठप करने से चूहों में व्यायाम सहिष्णुता कम हो जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस (ventromedial hypothalamus) हिस्से के उन न्यूरॉन समूहों की निगरानी करना तय किया जो SF1 नामक प्रोटीन बनाते हैं। गौरतलब है कि वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस भूख और रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, और SF1 प्रोटीन चयापचय क्रिया को नियंत्रित (metabolic regulation) करने में भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों को ट्रेडमिल पर दौड़ाया और उनमें SF1 न्यूरॉन्स की गतिविधि देखी। ये तो उन्होंने पाया ही कि ये न्यूरॉन्य व्यायाम करने से सक्रिय हो गए थे, लेकिन और भी दिलचस्प बात उन्हें यह पता चली कि SF1 न्यूरॉन्स का एक समूह व्यायाम खत्म होने के बाद ही सक्रिय होता है। कई व्यायाम सत्रों के बाद चूहों में सक्रिय होने वाले न्यूरॉन्स की संख्या और उनकी सक्रियता के परिमाण में भी बढ़ोतरी देखी गई।

जब शोधकर्ताओं ने तीन हफ्तों तक लगातार नियमित व्यायाम करने वाले चूहों की मस्तिष्क गतिविधि की तुलना उन चूहों की मस्तिष्क गतिविधि से की जिन्होंने व्यायाम करने में नागा किया था, तो उन्हें दोनों समूह के चूहों के SF1 न्यूरॉन्स के विद्युतीय गुणों में अंतर मिला। नियमित व्यायाम करने वाले चूहों में न्यूरॉन्स को सक्रिय करना आसान हो गया था। साथ ही न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन्स (सायनेप्स) की संख्या भी दुगनी हो गई थी। अनुमान तो लगाया जा सकता है कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा कुछ होता होगा, लेकिन इसे परख कर देखना ज़रूरी है। आखिरकार यह तो देखा ही गया है कि मनुष्यों में भी व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिन थोड़ा तकलीफदेह गुज़रते हैं, लेकिन दिन-ब-दिन आसानी होने लगती है (brain exercise link)। (स्रोत फीचर्स)

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लंबी उम्र विरासत में मिलती है

क ताज़ा अध्ययन कहता है कि किसी व्यक्ति की दीर्घायु (longevity) में जीन्स (genes) की भूमिका हमारी अपेक्षा से अधिक है। साइंस (Science journal) में प्रकाशित शोध के अनुसार इंसान यदि लंबी उम्र पाए, तो उसका लगभग 55 प्रतिशत श्रेय आनुवंशिकी को दिया जा सकता है। यह पिछले अनुमानों (10-25 प्रतिशत) से कहीं ज़्यादा है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जीन्स के योगदान को लेकर पिछले अनुमान कम थे क्योंकि उन अध्ययनों में बाहरी कारकों (जैसे संक्रामक रोग या दुर्घटनाओं) और अंदरूनी कारकों (जैसे समय के साथ डीएनए क्षति) से होने वाली मौतों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग नहीं किया जा सका था।

इस्राइल के वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जैव-भौतिकविद बेन शेनहार और उनकी टीम ने सोचा कि इन अध्ययनों के डैटा (research data)  को फिर से देखा जाए। उन्होंने डेनमार्क और स्वीडन में हुए जुड़वां बच्चों के अध्ययनों (twin studies), और यूएस में सौ साल से ज़्यादा जीने वाले सहोदरों के अध्ययन के डैटा पर गौर किया।

गौरतलब है कि जुड़वां बच्चे दो तरह के होते हैं। आइडेंटिकल जुड़वां (identical twins)  तब पैदा होते हैं जब दोनों संतानें एक ही अंडाणु-शुक्राणु से निर्मित भ्रूण के दो भागों में बंटने से बनती हैं। फ्रेटरनल जुड़वां ऐसी दो संतानें होती हैं जो दो अलग-अलग भ्रूण से गर्भाशय में साथ-साथ विकसित होती हैं। आईडेंटिकल ट्विन्स (fraternal twins) के डीएनए शत-प्रतिशत एक समान होते हैं, जबकि फ्रेटरनल ट्विन्स और सहोदरों में लगभग 50 प्रतिशत डीएनए एक समान होता है।

शोधकर्ताओं ने आइडेंटिकल जुड़वां और फ्रेटरनल जुड़वां/ सहोदरों के जीवनकाल (lifespan) की तुलना करके दीर्घायु में आनुवंशिकता (genetic inheritance) या जीन्स की भूमिका को समझा। उपरोक्त अध्ययनों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि यदि बाहरी कारक मृत्यु का कारण न बनें तो जेनेटिक आधार से सम्बंधित व्यक्तियों के जीवनकाल में समानता होती है। बेहतर होती गई सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा (public health) के कारण यह बात समय के साथ और भी स्पष्ट होती गई: 1800 के दशक के अंत में और 1900 के दशक की शुरुआत में, जब लोग संक्रमण के कारण कम उम्र में मर जाते थे, तो आयु के सम्बंध में जेनेटिक संकेत (genetic signals) लगभग नदारद थे। लेकिन बीसवीं सदी में दीर्घायु से आनुवंशिकता का सम्बंध अधिक स्पष्ट दिखा।

यह भी पाया गया कि मृत्यु के सभी आंतरिक कारण (internal causes of death) समान रूप से जेनेटिक नहीं होते हैं। डिमेंशिया और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (cardiovascular diseases) में वंशानुगत हस्तांतरण ज़्यादा दिखा, लेकिन कैंसर में कम। इससे लगता है कि ऐसा ज़्यादातर रैंडम उत्परिवर्तन या पर्यावरणीय कारणों से होता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि दीर्घायु में शामिल जीन्स को पहचानना उम्र से सम्बंधित बीमारियों के इलाज (age-related disease treatment) खोजने में मददगार हो सकता है। साथ ही, शोधकर्ता यह भी ध्यान में रखने को कहते हैं कि दीर्घायु होना जीन्स के अलावा काफी हद तक जीवनशैली (lifestyle), खान-पान और परिस्थितियों आदि से तय होता है। हमें दीर्घायु जीन्स मिलें, यह तो हमारे हाथ में नहीं, लेकिन बेहतर जीवन शैली अपनाना कुछ हद तक मनुष्यों के हाथ में है। लंबा जीने से ज़रूरी है स्वस्थ जीना (healthy aging)। (स्रोत फीचर्स)

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बिन पीए नशा

राब पीए बिना नशे जैसे लक्षण दिखने लगें – लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना, चक्कर आना, भ्रम, एकाग्रता में कमी, थकान, सिरदर्द, मतली, पेट फूलना, त्वचा का लाल होना, और बदमिज़ाजी –  तो समझ लीजिए वह व्यक्ति एक तकलीफ से पीड़ित है जिसे तकनीकी भाषा में ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम (एबीएस – Auto Brewery Syndrome) कहते हैं। वैसे तो चिकित्सा साहित्य (medical literature) में ऐसे व्यक्तियों के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं लेकिन कई चिकित्सकों का मानना है कि यह सिंड्रोम काफी आम है। तो बगैर एक घूंट भी हलक में उतारे यह नशा होता क्यों है?

इस समस्या पर अनुसंधान उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था और आम मान्यता यह बनी थी कि इसकी वजह व्यक्ति के पेट में खमीर (फफूंद- yeast overgrowth) की अधिकता होती है। जैसा कि सभी जानते हैं हमारी आंतों में फफूंद, बैक्टीरिया के साथ-साथ कई सूक्ष्मजीव निवास करते हैं और प्राय: मददगार होते हैं। यदा-कदा ये हमें बीमार भी करते हैं। तो एबीएस का प्रमुख कारण खमीर (एक किस्म की फफूंद) को माना गया था और यह मत बना था कि जब ये खमीर अत्यधिक मात्रा में आंतों में पलते हैं तो व्यक्ति जो भी शर्करा या अन्य कार्बोहायड्रेट (carbohydrate fermentation) खाता है, उसका किण्वन करके ये अल्कोहल (एथेनॉल) पैदा करते हैं। और अल्कोहल से नशा हो जाता है।

अलबत्ता, हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल (Nature Microbiology) में प्रकाशित शोध पत्र ने एबीएस पर नई रोशनी डाली है। एबीएस पीड़ितों के बड़े समूह का अध्ययन करके शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस तकलीफ का कारण खमीर नहीं बल्कि आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलन (gut bacteria imbalance) है। इससे पहले 2019 में बेजिंग स्थित कैपिटल इंस्टीट्यूट ऑफ पीडियाट्रिक्स (Capital Institute of Pediatrics) के जिंग युआन ने अपने सीमित अनुसंधान के आधार पर यह संभावना व्यक्त की थी। अब इसकी पुष्टि हुई है।

ताज़ा अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (University of California San Diego) (सैन डिएगो) के बर्न्ड स्क्नेबल के नेतृत्व में किया गया है। दरअसल यह गड़बड़ी आम तौर पर मान्य नहीं की जाती, यहां तक कि चिकित्सक भी व्यक्ति पर यकीन नहीं कर पाते कि उसने वास्तव में शराब नहीं पी है। अंतत: कई परीक्षण करके जब इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इलाज पूर्व धारणा के आधार पर ही किया जाता है जिसमें फफूंद-रोधी दवाइयां (antifungal drugs) दी जाती हैं। साथ में कुछ एंटीबायोटिक्स देते हैं और व्यक्ति को कम कार्बोहायड्रेट वाली खुराक लेने को कहा जाता है जो अल्कोहल-उत्पादक सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों में लक्षण बार-बार प्रकट होते रहते हैं।

2019 में किए गए अध्ययन में एबीएस के उभरने के लिए एक बैक्टीरिया क्लेबसिएला न्यूमोनिए (Klebsiella pneumoniae) को ज़िम्मेदार पाया गया था। अध्ययन में एबीएस की स्थिति में फैटी लीवर रोग (fatty liver disease) को भी सहायक बताया गया था।

युआन की टीम ने गंभीर एबीएस से पीड़ित कुछ व्यक्तियों से प्राप्त क्लेबसिएला का प्रत्यारोपण चूहों में किया था। उन्होंने कुछ अन्य व्यक्तियों को भी पहचाना जिनमें क्लेबसिएला के आधिक्य ने एबीएस लक्षणों में उभार उत्पन्न किया।

2019 के अध्ययन के बाद युआन की टीम को काफी लोगों ने संपर्क करके एबीएस जांच करवाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्होंने एबीएस मरीज़ों का अध्ययन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्क्नेबल की मदद ली।

स्क्नेबल ने ऐसे 22 मरीज़ों की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इनके साथ उन्होंने परिवार के सदस्यों को शामिल किया था ताकि वे इस संभावना को निरस्त कर सकें कि यह दिक्कत एक जैसे भोजन या पर्यावरणीय कारणों से हो रही है।

अपेक्षा के अनुरूप, एबीएस मरीज़ों की विष्ठा के कल्चर में अल्कोहल (alcohol production in gut) बना जबकि परिवार के अन्य लोगों की विष्ठा के कल्चर में नहीं। स्क्नेबल का कहना है कि स्वस्थ लोगों की आंतों में भी थोड़ा अल्कोहल बनाता है लेकिन शरीर उसे आसानी से पचा डालता है। एबीएस मरीज़ों में ऐसे एंज़ाइम्स की सांद्रता भी अधिक थी जिससे पता चलता है कि लीवर को क्षति हुई है। एक मरीज़ में तो लीवर सिरोसिस (liver cirrhosis) की स्थिति भी पाई गई।

अपने परिजनों की तुलना में एबीएस मरीज़ों में क्लेबसिएला कहीं अधिक मात्रा में था। उनकी आंतों में एशरीशिया कोली (. कोली) नामक बैक्टीरिया भी अधिक संख्या में थे, जो अल्कोहल पैदा करते हैं। हालांकि, अब तक इसे रोग का प्रमुख कारण नहीं माना गया था। यह भी देखा गया कि लक्षणों में उछाल के दौरान मरीज़ों की आंतों में ई. कोली बैक्टीरिया की संख्या अधिक थी और इनकी संख्या लगभग लक्षणों की गंभीरता को झलकाती थी।

शोधकर्ताओं को एबीएस मरीज़ों तथा अन्य लोगों के बीच खमीर या अन्य फफूंद के स्तर में कोई खास अंतर नहीं मिला। स्क्नेबल के मुताबिक इसका कारण यह हो सकता है कि कुछ मरीज़ों को पहले ही फफूंद-रोधी उपचार मिल चुका था।

एक मरीज़ का सफल उपचार विष्ठा के सूक्ष्मजीव प्रत्यारोपण (फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट, FMT) द्वारा किया गया। इसके लिए उसे एक स्वस्थ दानदाता की विष्ठा कैप्सूल (FMT capsule) में भरकर खिलाई गई थी। स्क्नेबल अब इस पर आगे काम कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि ज़्यादा लक्षित उपचार (targeted therapy) मिल सके।

अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि फिलहाल यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि हमें पूरा जवाब मिल गया है। आगे खोजबीन जारी रखने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या च्यूइंग गम चबाने से तनाव कम होता है?

ज़ुबैर सिद्दिकी

पिछले सौ साल से भी ज़्यादा समय से च्यूइंग गम (chewing gum) सिर्फ मुखवास के तौर पर नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाली चीज़ के रूप में बेचा जाता रहा है। दावा किया जाता था कि च्यूइंग गम तंत्रिकाओं को शांत करता है और मन को हल्का (stress relief) करता है। आज वही दावे आ रहे हैं – फर्क यह है कि अब लग रहा है कि इसमें थोड़ा हाथ शायद मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान (neuroscience) का भी है।

हालांकि, थोड़ी सतर्कता ज़रूरी भी है क्योंकि ऐसे वैज्ञानिक दावे तब आ रहे हैं जब कोविड-19 के बाद च्यूइंग गम की बिक्री तेज़ी से घटी है। कोविड-19 (covid-19 pandemic) महामारी के दौरान अमेरिका में च्यूइंग गम का इस्तेमाल काफी कम हो गया था। लोग कम बाहर निकलते, कम मिलते-जुलते और सांस की ताज़गी की चिंता में कमी भी थी। अब कंपनियां लोगों को लुभाने के लिए च्यूइंग गम को मानसिक सेहत से जोड़कर पेश कर रही हैं।

च्यूइंग गम एक अजीब लत है। इससे कोई पोषण नहीं मिलता और यह जल्द ही बेस्वाद हो जाती है; फिर भी लोग इसे लंबे समय तक चबाते रहते हैं। क्यों?

यह सवाल वैज्ञानिकों को लंबे समय से परेशान करता रहा है। शोध बताते हैं कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान (concentration) थोड़ा बेहतर होता है और कुछ हद तक तनाव कम (stress reduction) होता है, लेकिन इसका कारण अब तक पूरी तरह समझ में नहीं आया है। दिलचस्प बात यह है कि मनुष्य हज़ारों सालों से च्यूइंग गम जैसी चीज़ें चबा रहे हैं।

पुरातात्विक सबूत (archaeological evidence) बताते हैं कि मनुष्य करीब 8000 साल पहले भी चिपचिपी चीज़ें चबाया करते थे। स्कैंडिनेविया में पेड़ों की छाल से बनी प्राचीन गम (ancient chewing gum) मिली है, जिस पर दांतों के निशान मौजूद हैं। कुछ निशान छोटे बच्चों के भी थे। इससे लगता है कि पुराने समय में गोंद चबाना सिर्फ औज़ारों के लिए गोंद नरम करने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों को इससे आनंद भी मिलता होगा।

अमेरिका में च्यूइंग गम

आधुनिक समय में च्यूइंग गम की शुरुआत अमेरिका में 1800 के दशक में हुई थी। अलबत्ता, च्यूइंग गम को लोकप्रिय बनाने का काम विलियम रिग्ले जूनियर (William Wrigley Jr.) ने किया। पहले साबुन और बेकिंग सोडा के साथ च्यूइंग गम मुफ्त दिए गए। लोकप्रियता बढ़ने पर 1890 के दशक में सिर्फ च्यूइंग गम का कारोबार शुरू कर दिया। 20वीं सदी की शुरुआत तक च्यूइंग गम हर जगह दिखने लगी। हालांकि इससे सभी खुश नहीं थे – सार्वजनिक जगहों पर च्यूइंग गम चबाने की आलोचना हुई और सड़कों पर थूके गए च्यूइंग गम से प्रशासन परेशान रहने लगे।

युद्ध में च्यूइंग गम

पहले विश्व युद्ध (World War I) के दौरान विलियम रिग्ले ने अमेरिकी सेना को सुझाव दिया कि च्यूइंग गम सैनिकों के लिए फायदेमंद हो सकता है। उनका कहना था कि इससे भूख कुछ हद तक दबाई जा सकती है, दांत साफ रहते हैं और तनाव कम होता है। सेना ने यह बात मान ली।

इसके बाद च्यूइंग गम सैनिकों के राशन (military ration) का हिस्सा बन गई। अमेरिकी सैनिकों के साथ च्यूइंग गम युरोप, एशिया और बाकी दुनिया में फैली। इसी दौरान अखबारों में यह बातें छपने लगीं कि च्यूइंग गम चबाने से चिंता कम होती है, नींद अच्छी आती है और उदासी दूर होती है। इन्हीं दावों से वैज्ञानिकों की इसमें रुचि बढ़नी शुरू हुई।

शुरुआती अध्ययन

1940 के दशक में अमेरिका के बार्नार्ड कॉलेज (Barnard College) में च्यूइंग गम पर किए गए शोध में पाया गया कि च्यूइंग गम चबाने वाले लोग थोड़ा कम तनाव महसूस करते थे और उनका काम करने का तरीका कुछ बेहतर लगता था। तब वैज्ञानिक यह नहीं समझ पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है।

कई साल बाद कार्डिफ युनिवर्सिटी (Cardiff University) के मनोवैज्ञानिक एंड्र्यू स्मिथ (Andrew Smith) ने करीब 15 साल तक च्यूइंग गम चबाने के असर का अध्ययन किया। उनके कुछ शोध च्यूइंग गम बनाने वाली कंपनी के सहयोग से हुए थे, इसलिए नतीजों पर सवाल भी उठे। स्मिथ ने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त में कोई खास सुधार नहीं होता – लोग कहानियां या शब्द दूसरों से बेहतर याद नहीं रख पाते। अलबत्ता, कुछ और असर ज़रूर देखने को मिले। कई शोधों में यह बात सामने आई कि च्यूइंग गम के दो असर साफ हैं। पहला, इससे सतर्कता और एकाग्रता थोड़ी देर तक बेहतर बनी रहती है। दूसरा, कुछ स्थितियों में तनाव कम महसूस होता है।

अध्ययनों के अनुसार च्यूइंग गम चबाने से सतर्कता (alertness) लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, खासकर तब जब काम बहुत लंबा, उबाऊ या मशीनी हो। जैव-मनोवैज्ञानिक (biopsychology) क्रिस्टल हैस्केल-रैम्से के शोध में भी यही नतीजे मिले। उन्होंने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान लगाने में तब ज़्यादा मदद मिलती है, जब व्यक्ति पहले से थका हुआ या मानसिक रूप से बोझिल हो (mental benefit)। लेकिन अगर कोई पहले ही पूरी तरह सतर्क है, तो गम से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। तनाव कम होने के मामले में, इसके असर के प्रमाण अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत पाए गए।

प्रयोगशाला (laboratory studies) में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जब लोग सार्वजनिक भाषण देने या गणित के कठिन सवाल हल करने जैसे तनाव वाले काम के दौरान च्यूइंग गम चबाते हैं, तो उनकी घबराहट कुछ कम हो जाती है। अस्पतालों में हुए अध्ययनों में दिखा कि कुछ सर्जरी से पहले च्यूइंग गम चबाने वाली महिलाओं की चिंता कम थी।

हालांकि च्यूइंग गम कोई जादू नहीं है। बहुत ज़्यादा तनाव की स्थिति में – जैसे ऑपरेशन से ठीक पहले या बेहद कठिन हालात में – यह मददगार साबित नहीं होता। कुल मिलाकर, च्यूइंग गम मानसिक रूप से थोड़ा फायदा ज़रूर देता है। लेकिन इसके पीछे के कारण अब भी पूरी तरह समझ में नहीं आए हैं। अलबत्ता, कुछ संभावनाएं बताई गई हैं।

एक विचार यह है कि चबाने से चेहरे की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जिससे मस्तिष्क तक खून का प्रवाह बढ़ जाता है। दूसरी धारणा यह है कि मांसपेशियों की हल्की गतिविधि एकाग्रता में मदद करती है, जिससे दिमाग अधिक सक्रिय रहता है।

तीसरा विचार है कि चबाना शरीर की तनाव-नियंत्रण प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जो कॉर्टिसोल नामक हार्मोन को नियंत्रित करती है। यह हार्मोन सतर्कता और तनाव दोनों से जुड़ा होता है। अध्ययनों में इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं – कभी कॉर्टिसोल (cortisol hormone) बढ़ा, जो ध्यान बढ़ने के संकेत है, तो कभी यह घटा, जो तनाव कम होने का संकेत है।

चबाना क्या नैसर्गिक आदत है?

कुछ वैज्ञानिकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या चबाने की आदत (chewing behavior)  बहुत पुराने समय से हमारे भीतर मौजूद है। कई जानवर तनाव में कुछ न कुछ चबाते हैं – जैसे कुत्ते खिलौने कुतरते हैं और शाकाहारी जानवर लगातार जुगाली करते रहते हैं। इसलिए माना गया कि शायद चबाना एक स्वाभाविक तरीके से मन को शांत करने वाली क्रिया हो।

लेकिन वैज्ञानिक एडम वैन कैस्टरेन (Adam van Casteren) इससे अलग बात कहते हैं। उनके अनुसार इंसान अपने करीबी प्राइमेट (primates) रिश्तेदारों की तुलना में बहुत कम चबाता है। चिंपैंज़ी दिन में 4–5 घंटे और गोरिल्ला करीब 6 घंटे तक चबाते रहते हैं, जबकि इंसान औसतन सिर्फ 35 मिनट ही भोजन चबाता है। खाना पकाने और औज़ारों के विकास से इंसानों को ज़्यादा चबाने की ज़रूरत नहीं रही, और बची हुई ऊर्जा मस्तिष्क के विकास में लगी।

इसलिए च्यूइंग गम को किसी पुरानी जीवन-रक्षा आदत का हिस्सा नहीं माना जाता। वैन कैस्टरेन का मानना है कि इसकी वजह कहीं ज़्यादा सरल है – इंसानों को बार-बार होने वाली हल्की और दोहराई जाने वाली गतिविधियां पसंद आती हैं।

सोचते वक्त लोग अक्सर पैर हिलाते हैं, पेन क्लिक करते हैं, स्ट्रेस बॉल दबाते हैं या कागज़ पर कुछ बनाते रहते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसी छोटी-छोटी दोहराई जाने वाली हरकतें लंबे काम के दौरान ध्यान बनाए रखने में मदद करती हैं।

कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी (University of California) के शोध में पाया गया कि जब एकाग्रता के अभाव और अति सक्रियता (ADHD) से पीड़ित बच्चों को काम करते समय खुलकर हिलने-डुलने दिया गया तो उनका प्रदर्शन बेहतर रहा। च्यूइंग गम भी कुछ ऐसा ही काम करता है और दिमाग बेहतर तरीके से ध्यान लगा पाता है।

आज की तेज़ रफ्तार, स्क्रीन और तनाव से भरी दुनिया में च्यूइंग गम से मिलने वाली ज़रा-सी राहत शायद इसकी सबसे बड़ी ताकत है। वैज्ञानिक जब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर की हलचल मस्तिष्क (brain function) को कैसे प्रभावित करती है, तब च्यूइंग गम हमें याद दिलाता है कि मस्तिष्क अकेले काम नहीं करता। कई बार जबड़ा हिलाने जैसी क्रिया भी हमारे सोचने और महसूस करने के तरीके को बदल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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