अमन मदान

क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर कहीं जीवन (एलियन्स) (aliens) है? इसे लेकर बहस तो चलती ही रहती है। लेकिन लोगों की उत्सुकता होती है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे सवाल हमें दिलचस्प लग सकते हैं। खासकर यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते या कहते हैं क्योंकि, कम से कम, हम यह मानते हैं कि वैज्ञानिक जो सोचते या मानते हैं वह सही होगा। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि क्या सिर्फ कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन बसता है, या सभी वैज्ञानिक यह बात मानते हैं?
ऐसी रायशुमारी (ओपिनियन पोल) (opinion poll) के ज़रिए वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए इंग्लैंड की डरहम युनिवर्सिटी (durham university) ने एक केंद्र स्थापित किया है, जिसमें किसी सवाल पर वैज्ञानिकों की राय जानी जाती है। इसका नाम है सेंटर फॉर साइंटिफिक कम्युनिटी ओपिनियन पोलिंग एंड इवैल्यूएशन (C-SCOPE)। इसे स्पष्ट और सटीक सवालों के शीघ्र और सरल जवाब पाने के हिसाब से बनाया गया है। इसके तहत 2023 में पहला सर्वेक्षण किया गया था। इसमें भारत समेत 12 देशों और 30 संस्थानों के 20,085 वैज्ञानिकों से पूछा गया था: “क्या विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि COVID-19 एक वायरस की वजह से होता है?” जवाब ‘लिकर्ट स्केल’ (likert scale) पर मांगे गए थे, जिसमें पांच विकल्प थे – पूरी तरह असहमत, असहमत, तटस्थ, सहमत, पूरी तरह सहमत। 20,085 में से 6807 वैज्ञानिकों ने सवाल के जवाब दिए थे। 93.2 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने कहा था कि वे इस बात से सहमत या पूरी तरह सहमत हैं।
यह मानना लुभावना लगता है कि यदि ज़्यादातर वैज्ञानिक किसी बात पर सहमत हैं, तो वह सत्य होनी चाहिए। या, अगर ज़्यादातर वैज्ञानिक असहमत हैं, तो वह बात असत्य होनी चाहिए। इसके बाद की गई एक अन्य रायशुमारी में एक शोध पत्र पर 494 अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों की राय ली गई थी: शोध पत्र में दावा किया गया था कि पृथ्वी से लगभग 124 प्रकाश-वर्ष दूर K2-18b नाम के एक ग्रह पर जीवन हो सकता है। इस विचार से सिर्फ 6.6 प्रतिशत लोग सहमत या पूरी तरह सहमत थे। सवाल यह है कि यदि सहमत होने वालों की संख्या इतनी कम है, तो क्या यह दावा गलत है?
रायशुमारी हमें आसानी से समझने योग्य जानकारी देती हैं। “सिर्फ 6.6 प्रतिशत वैज्ञानिक सहमत हैं!” लेकिन हमें बहुत सी ऐसी बातें नहीं पता होतीं जो उस जवाब की पृष्ठभूमि में हो सकती हैं। जैसे, यह सर्वेक्षण शोध पत्र प्रकाशित होने के महज़ 8 दिन बाद किया गया था। तो हमें पता नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल कितने अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों ने वह शोध पत्र पढ़ा होगा।
वैज्ञानिक शोध के लिहाज़ से सर्वेक्षण (survey) एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, बाकी सभी तरीकों या साधनों की तरह, इसका इस्तेमाल भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए और इनसे उतना ही मतलब निकालना चाहिए जितना वे बता सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उत्तरदाता सवालों का गलत मतलब निकाल सकते हैं – अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या COVID-19 वायरस से हुआ था, तो मुझे लग सकता है कि मुझसे पूछा जा रहा है कि क्या मैंने खुद ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे देखे हैं जो इसकी पुष्टि करते हों। तो मेरा जवाब होगा, ‘नहीं’। और ईमानदारी से कहूं तो (और वैज्ञानिक को ईमानदार होना चाहिए) मैंने उन प्रतिष्ठित जर्नल्स के शोध पत्र देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई है जिनमें COVID-19 के लिए ज़िम्मेदार जीव की पहचान की गई थी। मुझे अब भी थोड़ी शंका है कि इसके लिए वायरस ज़िम्मेदार था, लेकिन मैं इसे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से नहीं कह सकता। जैसे, सर्वेक्षण में शामिल 7 प्रतिशत लोगों ने इस बात से सहमति नहीं जताई कि कोविड-19 वायरस से हुआ था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जानकार वैज्ञानिकों के बीच कोई बड़ा मतभेद है। हो सकता है कि बात या सवाल स्पष्ट करने के लिए कुछ और सवाल पूछने की ज़रूरत हो। कभी-कभी एक वाक्य के सवालों का मतलब समझना मुश्किल हो सकता है। लोगों की राय लेने वाले किसी भी सर्वेक्षण या साक्षात्कार की यह जानी-मानी समस्या है।
हालांकि, रायशुमारी के नतीजे पढ़ना मज़ेदार होता है। और सही तरीके से ‘आपकी राय’ ली जाए, तो दिलचस्प रुझान इसमें नज़र आ सकते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक सत्य या तथ्य तय करने का तरीका नहीं हो सकता। यह एक ऐसी आपत्ति है जो सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक द्वारा सवाल समझने के तरीके या नमूने में त्रुटि से कहीं आगे की बात है। असल में, विज्ञान का विकास ही सर्वमान्य तथ्य के खिलाफ हुआ था। विज्ञान ने इस बात को कड़ाई से खारिज किया है कि ज्ञान की प्रामाणिकता इस बात से तय होती है कि अन्य इस बारे में क्या सोचते हैं या खासकर सत्तानशीं लोग क्या सोचते हैं। जैसे आम राय संभवत: यह थी कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन ऐसे कई अवलोकन थे जो इस परिकल्पना से मेल नहीं खाते थे। किनारे से दूर जाते समय जहाज़ पानी में डूबते और धीरे-धीरे गायब होते क्यों दिखते थे? इसे तभी समझा जा सकता था जब हम यह मान लें कि पृथ्वी गोल है, न कि चपटी। बहुमत की राय (majority opinion) और सत्ता की बात मानने की बजाय, परीक्षण किए गए और तर्कों की जांच की गई। इसे ही वैज्ञानिक सत्य तक पहुंचने का तरीका माना गया।
वैज्ञानिकों से उम्मीद की जाती है कि वे पारदर्शी (transparent) हों और अपने तरीके और नतीजे सबके साथ साझा करें। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे एक-दूसरे के काम की जांच करें और ऐसी समझ बनाएं जो अलग-अलग अवलोकनों और नज़रियों से मेल खाती हो। इससे कुछ हद तक एक साझा समझ बनती है। आजकल विज्ञान के कई दार्शनिक सावधानीपूर्वक यह कहते हैं कि वैज्ञानिक ऐसे नियम प्रतिपादित नहीं करते जो सार्वभौमिक हों और जिन्हें हमें अंतिम सत्य की तरह पूजना पड़े। इसकी बजाय, वैज्ञानिक संभाविताओं (scientific potential) के आधार पर सामान्यीकरण (normalization) करते हैं।
पूर्व अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर इस बात की काफी संभावना है कि पृथ्वी गोल है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आ सकते जो इस ओर इशारा करें कि पृथ्वी पूरी तरह गेंद जैसी गोल नहीं है, बल्कि इसके कुछ हिस्से चपटे हैं या कहीं ऊबड़-खाबड़ है। वास्तव में, पृथ्वी ऐसी ही है।
विज्ञान का इतिहास हमें यह भी बताता है कि वैज्ञानिक भी बाकी लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और वे ऐसी नई जानकारी को मानने से इन्कार कर सकते हैं जो उनके पहले से बने विचारों से मेल नहीं खाती।
विज्ञान के जाने-माने दार्शनिक थॉमस एस. कुन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी में तत्कालीन मान्य सिद्धांतों को चुनौती देने वाले प्रमाण होने के बावजूद वे पुराने ‘मान्य’ सिद्धांत (accepted principles and theories) अपनी जगह डटे रहे थे। नए सिद्धांतों (new principles and theories) को या तो अपवाद मानकर या अवलोकन में गलती मानकर खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ बड़े बदलावों के बाद ही नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों की जगह ले पाए। बेशक, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैज्ञानिक सत्य के इतर हर राय उतनी ही सही हो और उसे मात्र वैज्ञानिक संस्थाओं की मनमानी या सख्ती की वजह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो। वैज्ञानिक विधियों से हम वाकई काफी यकीन के साथ कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं। हम काफी हद तक यह कह सकते हैं कि कुछ सिद्धांत दूसरों के मुकाबले कम भरोसेमंद हैं। लेकिन हमें कभी भी ऐसे अडिग दावे नहीं करने चाहिए जैसा धार्मिक संस्थाएं अपनी मान्यताओं को लेकर करती हैं।
वैज्ञानिक सत्य को उन वैज्ञानिकों के एक-वाक्यीय सर्वेक्षण के नतीजों से नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने डैटा शायद ही देखा हो या न भी देखा हो और उसका विश्लेषण किया हो या न भी किया हो। इन सर्वेक्षण से जो आंकड़े मिलते हैं, वे मज़ेदार या तसल्लीबख्श हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे वास्तविकता के द्योतक हों। वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों से बात करना ज़रूरी हो सकता है जिन्होंने पेश किए गए सबूतों और दिए जा रहे तर्कों को ध्यान से देखा है, जांचा-परखा है।
इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के सर्वेक्षण और उनके आंकड़ों से महत्वपूर्ण नतीजे नहीं मिल सकते। पूर्व अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण (meta-analysis) काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, एलिज़ाबेथ लेवी पेलक और उनके साथियों ने 2021 में ऐसे 418 प्रयोगों के नतीजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया था कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को कैसे कम किया जा सकता है। उनके विश्लेषण से पता चला था कि कुछ तरीके अन्य के मुकाबले ज़्यादा असरदार होते हैं। लेकिन उन्होंने यह दावा कदापि नहीं किया कि उनके नतीजे अंतिम सत्य हैं। ऐसा करना विज्ञान की भावना के खिलाफ होता।
वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए रायशुमारी करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते हम यह दावा न करें कि उनसे वैज्ञानिक सत्य उजागर हो रहे हैं या सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलेगी। हमें हमेशा किसी वैज्ञानिक सत्य की ज़रूरत नहीं होती।
उदाहरण के लिए, साहित्य और कविता मनुष्यों के कई अहम सरोकारों को रखते और समझते हैं, जिन्हें विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण नहीं समझ सकता। फिर भी, ऐसे जनमतसंग्रह (referendum) – जो जानकारी देने से ज़्यादा मनोरंजन और तसल्ली देते हैं – उन्हें वैज्ञानिक सच की वैधता तय करने के काम से अलग रखना ही बेहतर है।
प्रमाणों की सावधानीपूर्वक की गई व्याख्या और विभिन्न अध्ययनों की बारीकी से तुलना करके ही वैज्ञानिक सत्य को सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह काम एक-वाक्य वाले सवाल-जवाबों के बस का नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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