जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।
लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।
शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।
यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।
इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।
यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।
यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।
इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)
हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में लगभग 20 हज़ार से ज़्यादा जीन्स होते हैं, लेकिन हर जीन हर समय सक्रिय नहीं रहता। शरीर का सही ढंग से विकास और कामकाज तभी संभव हो पाता है जब सही जीन, सही समय पर और सही जगह पर ‘ऑन’ हों। तो, यह कौन तय करता है कि कौन सा जीन कब ऑन होगा? इसका जवाब DNA के उन खास हिस्सों में छिपा है जो जीन्स को सक्रिय करने का संकेत देते हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब कृत्रिम बुद्धि (AI) की मदद से इसी छिपे हुए ‘जेनेटिक स्विच’ (genetic switch) को डिकोड करने में बड़ी सफलता हासिल की है।
रहस्यमयी इनिशिएटर
वैज्ञानिकों ने डीएनए के जिस भाग पर शोध किया, उसे इनिशिएटर (initiator) कहते हैं। यह वह जगह है जहां से किसी जीन में मौजूद जानकारी को प्रतिलेखन-अनुलेखन के माध्यम से प्रोटी न या किसी अन्य ज़रूरी अणु में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इनिशिएटर वह स्टार्ट बटन है, जो तय करता है कि जीन की गतिविधि कहां से शुरू होगी। यह जीन अभिव्यक्ति (gene expression) की पूरी प्रक्रिया की नींव माना जाता है, क्योंकि शरीर में एंज़ाइम, हॉर्मोन और तमाम ज़रूरी प्रोटीन इसी प्रक्रिया के ज़रिए बनते हैं।
अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह एक बड़ी पहेली रही है कि आखिर डीएनए की अरबों क्षार-जोड़ियों (base pairs) में इस इनिशिएटर को ठीक-ठीक कैसे पहचाना जाए। इसकी बनावट इतनी जटिल और विविधतापूर्ण थी कि पारंपरिक तरीकों से इसका पूरा पैटर्न समझना मुश्किल हो रहा था।
खोज प्रक्रिया
इस शोध का नेतृत्व कैलिफोर्निया के मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेम्स टी. कैडोनागा (James T. Kadonaga) और ग्रेजुएट रिसर्चर टॉरी राइन-कैरिग (Torrey Rhyne-Carrigg) ने किया। टीम ने सबसे पहले हाई-थ्रूपुट अनुक्रमण (High-throughput DNA sequencing) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डीएनए के लगभग 5,00,000 अलग-अलग वैरिएंट अनुक्रम तैयार किए और उनकी गतिविधि को मापा। इस तकनीक की मदद से एक साथ बहुत बड़ी संख्या में डीएनए अनुक्रम को तेजी से पढ़ा जा सकता है।
इसके बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल एक मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस मॉडल ने लाखों अनुक्रमों का विश्लेषण करके यह सीखा कि इनिशिएटर की पहचान करने वाला क्षार-जोड़ी पैटर्न (base pair pattern) आखिर होता क्या है। यह मॉडल पहली बार मानव जीन्स में इनिशिएटर की उपस्थति या अनुपस्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सफल रहा, और लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इस इनिशिएटर को सफलतापूर्वक पहचान लिया गया।
प्रोफेसर कैडोनागा के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एआई मॉडल ने डीएनए में मौजूद इनिशिएटर की मौजूदगी का इतना मज़बूत और भरोसेमंद अनुमान दिया है। इसके आधार पर डीएनए के इस क्षार अनुक्रम पैटर्न को असल मायनों में डिकोड (decode) किया जा सका।
खोज का महत्व
यह शोध सिर्फ अकादमिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी हैं:
1. बीमारियों को समझने में मदद: जब इनिशिएटर जैसे नियामक क्षेत्रों में उत्परिवर्तन होता है, तो जीन की गतिविधि गड़बड़ा सकती है, जिससे कोशिकाओं में खराबी आ सकती है। यह गड़बड़ी कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से जुड़ी मानी जाती है। अब वैज्ञानिक इस नए मॉडल की मदद से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कोई खास उत्परिवर्तन इनिशिएटर को कैसे प्रभावित करेगा और उससे जीन गतिविधि (gene activtiy) में क्या बदलाव आ सकता है।
2. सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करना: इस शोध से मिले आंकड़े भविष्य में सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करने में मदद कर सकते हैं। ये ऐसे कृत्रिम डीएनए अनुक्रम (artificila DNA sequences) होते हैं जिन्हें खास मकसद के हिसाब से जीन्स को चालू या बंद करने के लिए तैयार किया जाता है। इनका इस्तेमाल जीन थेरपी, बायोटेक्नोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में हो सकता है।
3. जीनोम की समझ: मानव जीनोम में सिर्फ जीन्स ही नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले असंख्य नियामक घटक भी मौजूद हैं। इन घटकों को डिकोड करना पूरे जीनोम की भाषा (genome understanding) को समझने की दिशा में एक अहम कदम है।
वास्तविक प्रयोग और कृत्रिम बुद्धि का मेल
डीएनए का यह चालू-बंद स्विच (DNA switch) दशकों से एक पहेली बना हुआ था। इस अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक प्रयोगों और कृत्रिम बुद्धि (एआई) की आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लाया गया। पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाए और फिर उस एक एआई मॉडल को इन आंकड़ों के आधार पर प्रशिक्षित किया ताकि वह पैटर्न पहचान सके। यह तरीका भविष्य में जीनोम की अन्य उलझनों को समझने के लिए भी एक मॉडल के तौर पर काम आ सकता है।
आगे की राह
हालांकि इस शोध ने लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इनिशिएटर को पहचान लिया है, फिर भी बाकी बचे जीन्स में इनकी पहचान करना अभी बाकी है। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य होगा कि वे मॉडल (model) को और बेहतर बनाएं, ताकि बाकी जीन्स में भी इनिशिएटर या उससे मिलते-जुलते नियामक घटकों को खोजा जा सके। इसके अलावा, यह समझना भी ज़रूरी होगा कि अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं और ऊतकों में यह स्विच किस तरह अलग-अलग व्यवहार करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?
नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।
इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।
1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा
इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।
2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार
अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।
3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध
रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।
2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।
4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें
चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।
5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है
यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।
6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल
भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।
7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग
तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।
8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध
घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।
9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों
शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।
10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत
मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।
चलते–चलते
विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।
इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।
अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)
हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है।
पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।
हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना।
शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।
पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा।
शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।
भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)
विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।
सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।
चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।
हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।
शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।
अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।
इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।
विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।
यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में उष्णकटिबंधीय जंगलों (tropical forests) को सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता रहा है। लेकिन नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक खोज ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। शोधकर्ताओं ने कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको के वनों के विभिन्न पेड़ों पर सूखे के प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया।
पाया गया कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग पेड़ों में पानी की उपलब्धता और वातावरण के अनुकूल अपने हिसाब से परिवर्तन (adaptations) होते हैं। इस तरह के पूर्व अध्ययन अलग-अलग प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित थे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना था कि एक ही प्रजाति के सभी पेड़ सूखे के प्रति लगभग एक जैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिको में प्राकृतिक वर्षा की मात्रा के आधार पर छह वन क्षेत्रों को चिन्हित किया। सालाना 85 सेंटीमीटर वर्षा वाले सूखे ग्वानिका वन (guanica forest) से लेकर 450 सेंटीमीटर वाले लुक्विलो वर्षावन (luquilo rainforest) में 18 विभिन्न प्रजातियों के 290 पेड़ों का परीक्षण किया। हर एक पेड़ से शाखाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनके सूखने की प्रक्रिया को जांचा। जांच के दौरान हर पांच मिनट के अंतराल पर शाखाओं की तस्वीर ली गईं। तनों के जल विभव (वाटर पोटेंशियल) और वाहिका-रोध (एम्बोलिज़्म) को भी मापा गया। जल विभव से आशय होता है कि किसी स्थान से पानी किस ओर बहेगा और वाहिका-अवरोध का मतलब होता है कि पानी की कमी का कितना तनाव होने पर संवहनी ऊतक (ज़ायलम) की नलिकाओं में हवा के बुलबुले बनकर पानी का प्रवाह रोक देंगे।
18 में से 17 प्रजातियों के पेड़ों में वर्षा की मात्रा से सम्बंधित अंतर साफ दिखे। सूखे क्षेत्र वाले पेड़ों के संवहनी ऊतकों में एम्बोलिज़्म (embolism) के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। ये पेड़ सूखे के हालत में भी पर्ण रंध्रों (स्टोमैटा) को खुले रखने में सक्षम थे, जिससे पानी की कमी होते हुए भी नियंत्रित तौर पर भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) जारी रही।
दूसरी ओर, नमी वाले वन क्षेत्रों के पेड़ों के तनों और पत्तियों में पानी संग्रह करने की अधिक क्षमता पाई गई।
शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate areas) में एक ही प्रजाति के पेड़ों में वातावरण के अनुसार ऐसा अनुकूलन अक्सर कम ही देखने को मिलता है, लेकिन प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। इस अनुकूलन क्षमता का एक कारण वर्षावन की ज्वालामुखीय मिट्टी है, जो नमी बेहतर ढंग से सोखती है। जबकि सूखे क्षेत्र में चूना पत्थर (limestone) की मिट्टी पानी नहीं रोक पाती।
यह खोज जलवायु परिवर्तन के अनुसार वन संरक्षण मॉडलों (forest conservation models) को ज़्यादा सटीक बनाने में मददगार साबित होगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक किसी प्रजाति की एक निश्चित क्षमता के बजाय स्थानीय स्तर पर होने वाले अनुकूलन को भी शामिल कर सकेंगे। यह अध्ययन पेड़ों के लचीले स्वभाव को तो दर्शाता है, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक एक चेतावनी भी दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता वैश्विक तापमान और सूखे जैसे हालात इन पेड़ों की सहनशीलता की सीमा को लांघ सकते हैं, जिससे भविष्य में वनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)
आम तौर पर प्राचीन समय के शैल चित्र ऐसी चट्टानों पर मिलते हैं जो थोड़ी गुफानुमा या ढंकी हुई हों। प्राचीन लोगों ने जब खुली चट्टान या खड़ी-चट्टानों पर चित्रकारी की भी है तो उनका मौसम-पानी की मार के कारण सलामत बचा रहना मुश्किल रहा है। लेकिन अब शैल चित्रों (Rock paintings) का ऐसा समूह मिला है जो खड़ी चट्टान के खुले पहलू पर होने के बाद भी सदियों से सही-सलामत है।
चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी (Zuojiang River Valley) की सपाट, खड़ी चट्टानों पर बने शैल चित्र हवा-पानी की सीधी मार पड़ने के बावजूद आज भी एकदम नुमाया और अक्षुण्ण हैं। ये रंग चट्टानों से इतनी मज़बूती से चिपके हैं कि यदि वे उखड़ते हैं, तो रंग के साथ चूना-पत्थर की परत भी साथ झड़ जाती है। ये शैल-चित्र ज़ुओजियांग नदी के साथ-साथ 260 किलोमीटर लंबाई में फैली चूना-पत्थर (कार्स्ट लाइमस्टोन) की खड़ी चट्टानों पर करीब 80 पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं। ये स्थल ज़ुओजियांग हुआशान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप (Zuojiang rock art cultural landscape) नाम से जाने जाते हैं।
ये चित्र लगभग 2000 साल से अधिक पुराने हैं। इन्हें लोयुए संस्कृति के लोगों ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवीं के बीच लगभग लगभग 700 साल की अवधि में बनाया था। लोयुए समाज (luoyue) दक्षिणी चीन में रहने वाला एक मातृसत्तात्मक समाज (matrilineal society) था। ये लोग प्राय: शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे।
लोयुए संस्कृति के लोगों ने कमोबेश इन चित्रों में दोनों हाथ ऊपर किए हुए उकड़ू बैठी मुद्रा में नग्न पुरुषों की टोली, पंखों का ताज पहने एक विशालकाय व्यक्ति, आसपास कुछ जानवर और प्राचीन रस्मों में बजने वाले ढोल और घंटियां गेरुआ लाल रंग में बनाए हैं। साथ ही, गर्भवती महिलाओं और प्रसव का चित्रण मिलता है।
काफी समय से वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे यह मुक्ताकाश शैल चित्र दीर्घा मौसम की इतनी कड़ी मार कैसे झेल पाई, जबकि अन्य स्थलों पर इसके सैकड़ों साल बाद बने शैल चित्र मिट चुके हैं या धुंधले पड़ चुके हैं।
इस हैरानी ने ही शेडोंग युनिवर्सिटी की रसायनशास्त्री मेंग वू और उनके साथियों को चट्टानों के तीन स्थलों पर चित्रों के झड़े हुए टुकड़ों का अवरक्त प्रकाश (Infrared spectroscopy) और इलेक्ट्रॉन बीम से विश्लेषण करने को उकसाया। अवरक्त प्रकाश की मदद से उन्होंने इन चित्रों के रंगों में इस्तेमाल घटकों की आणविक स्तर पर पहचान की। और अत्यंत सूक्ष्म स्तर इसके कण-गठन (टेक्स्चर) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम का इस्तेमाल किया।
पता चला कि रंग बनाने के लिए लोयुए कलाकारों ने पहले अत्यधिक तपाए गए चूना-पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) और जानवरों की हड्डियों से एक गाढ़ा पेस्ट बनाया। इस पेस्ट में उन्होंने पानी और खून मिलाकर एक चिकना और पतला घोल तैयार किया। इस घोल में मौजूद बुझा हुआ चूना, कैल्शियम फॉस्फेट (calcium phosphate) और खून के प्रोटीन रंग को बांधे रखने का काम करते थे। लाल रंग के लिए उन्होंने स्थानीय लाल मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) का इस्तेमाल किया।
इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (electron microscopy) में उन्हें चित्रों की अलग-अलग परतें दिखाई दीं, जिससे पता चला कि चट्टान पर चित्रकारी दो चरणों में की गई थी। पहले चरण में चट्टान की सतह पर प्राइमर (primer) के तौर पर रक्त-युक्त घोल लगाया गया था और फिर इस अध-सूखे अस्तर पर लाल मिट्टी का रंग चढ़ाया गया था। जैसे ही बुझा हुआ चूना हवा की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ क्रिया करता था, रक्त-प्रोटीन कैल्शियम कार्बोनेट के ‘जैव-खनिजीकरण’ (biomineralization) को बढ़ावा देते थे, जिससे रंग चट्टान की सतह के साथ मज़बूती से जुड़ जाता था।
जब शोध दल ने रक्त का विश्लेषण किया, तो उन्हें उसमें जानवरों के साथ-साथ मानव रक्त के प्रोटीन (human blood protein) भी मिले। वू बताती है कि वे नमूनों में मानव रक्त के निशान मिलने से भौंचक्की रह गई थीं। वे सोचने लगीं कि क्या ये कलाकार चित्रकारी के लिए खुद अपने शरीर पर घाव करते थे? क्या लोगों की बलि दी जाती थी? लेकिन तभी उन्हें एक बात सूझी – उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। उन्होंने सोचा कि शायद खून कम हिंसक तरीके से इकट्ठा किया गया होगा, जैसे माहवारी या प्रसव का।
वू की टीम ने खून की और भी बारीकी से जांच की, तो उन्हें उसमें दो प्रोटीन – प्रोलैक्टिन-इंड्यूसिबल प्रोटीन (protein inducible protein) और लैक्टोफेरिन (lactoferin) – की थोड़ी मात्रा मिली। ये दोनों प्रोटीन रक्त में गर्भावस्था के आखिरी समय में बढ़ जाते हैं। चूंकि लोयुए लोग मातृवंशीय परंपरा को मानते थे, और भित्ति-चित्रों में गर्भवती महिलाओं और बच्चे के जन्म चित्रित किए गए हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रसव के दौरान निकलने वाले खून को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े अनुष्ठानों के लिए इकट्ठा किया जाता होगा। वैसे भी, चित्रकारी के लिए हर वर्ग मीटर पर खून की बस चंद मिलीलीटर मात्रा की ही ज़रूरत रहती होगी।
अन्य शोधकर्ता कहते हैं वैसे तो अध्ययन बहुत सावधानी से और विस्तार से किया गया है। फिर भी, इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वह खून गर्भवती महिलाओं (pregnant females) का ही था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसानी खून के संकेत बहुत हल्के थे, और इनमें 2000 सालों तक चट्टान की सतह पर मौसम की मार झेलने के कोई रासायनिक संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शायद ये रसायन नमूनों की जांच के दौरान के दौरान मिल गए होंगे।
पूरे दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम इतिहास में वापिस जाकर लोयुए लोगों से बात करके कुछ पक्का नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्राचीन लोग न सिर्फ चित्रकारी करके अपनी संस्कृति की जानकारी दर्ज कर रहे थे, बल्कि वे कुशल बायोकेमिकल इंजीनियर (skilled biochemical engineers) थे। यह अध्ययन विस्तार से जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस के आगामी किसी अंक में प्रकाशित होगा। (स्रोत फीचर्स)
नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।
वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।
शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।
अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।
जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
एक हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।
हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।
यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।
सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।
गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।
इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।
हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।
छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!
दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।
पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।
वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।
इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।
यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।
इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफीजर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।
वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।
इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।
जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।
इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।
वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।
अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।
यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?
इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।
विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)