क्या कॉकरोच का दूध प्रोटीन संकट का समाधान होगा?

डॉ. इरफाना बेगम (बिलन्दवी)

छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!

दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।

पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।

वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।

इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।

यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।

इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।

इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।

जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।

इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।

यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?

इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।

विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कैंसर से जंग में एक नई उम्मीद – एटलस

चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।

हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।

वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैश्विक महाप्रयोग: वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

दौलत सिंह तंवर

जकल हम हर दिन जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के बारे में सुनते हैं। गर्मियां लगातार लंबी और अधिक गर्म होती जा रही हैं, बेमौसम बारिश हो रही है और सर्दियां सिकुड़ रही हैं। जब मौसम अचानक बदलता है, तो मनुष्य तो अपने घरों में एसी या हीटर चालू कर लेते हैं। जानवर और पक्षी ठंडी या गर्म जगहों की ओर पलायन कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन पेड़-पौधों का क्या होता है, जो अपनी जड़ों से ज़मीन से बंधे होते हैं? उनके पास भागने या छिपने का कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें तो उसी जगह पर रहकर बदलते मौसम से लड़ना होता है।

अलबत्ता, किसी भी जीव को नए माहौल में खुद को ढालने में हज़ारों-लाखों साल लगते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) तो बहुत तेज़ी से हो रहा है। तो क्या पौधे इतनी जल्दी खुद को बदल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान के इतिहास का बहुत बड़ा और अद्भुत प्रयोग एरेबिडॉप्सिस थेलियाना पर किया है।

एरेबिडॉप्सिस थेलियाना

इस कहानी का मुख्य किरदार एक बहुत ही छोटा और आम-सा दिखने वाला पौधा थेल क्रेस है, जिसका वैज्ञानिक नाम एरेबिडॉप्सिस थेलियाना (Arabidopsis thaliana) है। यह सरसों वनस्पति कुल (brassica family) का एक जंगली पौधा है।

आप सोच रहे होंगे कि आम, नीम या गेहूं जैसे बड़े और ज़रूरी पौधों को छोड़कर वैज्ञानिकों ने इस छोटे से खरपतवार (weed) को क्यों चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दुनिया में यह पौधा एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। इसका आकार छोटा होता है, इसे उगाना आसान है, इसका जीवनचक्र बहुत छोटा (कुछ ही हफ्तों का) होता है। और, सबसे बड़ी बात, वैज्ञानिकों को इसकी आनुवंशिक सामग्री यानी डीएनए (DNA) की पूरी जानकारी है। इसलिए इसमें होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को वैज्ञानिक आसानी से पकड़ सकते हैं।

महा-प्रयोग

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मोई एक्सपोसिटो-अलोंसो के नेतृत्व में दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह जानने का फैसला किया कि पौधे तेज़ी से बदलते मौसम के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रयोग वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2022 के बीच 5 वर्षों तक किया गया। इसके नतीजे 26 मार्च 2026 को साइन्स में प्रकाशित किए गए हैं। प्रयोग की योजना अनोखी थी। दुनिया भर से एरेबिडॉप्सिस थेलियाना के 231 अलग-अलग स्ट्रेन्स इकट्ठे किए। ये सभी थे तो एरेबिडॉप्सिस थेलियाना, लेकिन हर एक के डीएनए में थोड़ा-थोड़ा अंतर था, जिसकी वजह से इनके गुणधर्मों (traits) में छोटे-मोटे अंतर थे। उन्होंने सभी 231 स्ट्रेन्स के बराबर-बराबर संख्या में बीजों का एक मिश्रण तैयार किया। बीजों के इस मिश्रण को दुनिया के 30 अलग-अलग स्थानों पर बोया गया। इनमें स्पेन की तेज़ गर्मी, उत्तरी युरोप की कड़ाके की ठंड और मध्य पूर्व (जैसे नेगेव रेगिस्तान) की भयंकर सूखे जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सबसे खास बात यह थी कि बीजों को बोने के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें कोई खाद-पानी या सुरक्षा नहीं दी। उन्हें पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे, प्राकृतिक रूप से बढ़ने, फूलने और अपने बीज गिराने के लिए छोड़ दिया। पांच सालों में पौधों की कई पीढ़ियां आई-गईं।

चौंकाने वाले परिणाम

डार्विन के विकासवाद (darwin’s theory of evolution) के अनुसार, विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। लेकिन जब पांच साल बाद वैज्ञानिकों ने उन 30 जगहों से पौधों के नए बीजों और डीएनए की जांच की तो नतीजे हैरान करने वाले थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 3 से 5 पीढ़ियों के भीतर ही पौधों में स्थानीय जलवायु के हिसाब से बदलाव हो गए थे। इसे रैपिड इवोल्यूशन (त्वरित विकास) (rapid evolution) कहा जाता है। हर जगह के पौधों में ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके से अनुकूलन (adaptation) हुआ। जो पौधे गर्म जगहों पर लगाए गए थे, उनके डीएनए में ऐसे बदलाव देखे गए जो उन्हें कम पानी में जीवित रहने और भीषण गर्मी सहने की ताकत देते थे। ठंडी जगहों वाले पौधों में ऐसे जीन विकसित हुए जो पाले (frost) से उनकी रक्षा कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वसंत ऋतु को पहचानने में था। गर्म इलाकों में पौधों ने जल्दी फूल देना शुरू कर दिया ताकि ज़्यादा गर्मी पड़ने से पहले ही वे बीज पैदा कर सकें। पौधों की डीएनए संरचना ही बदल गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जीन्स नए सिरे से विकसित हुए थे या कुदरती विविधता में से चुन भर लिए गए थे।

जेनेटिक विविधता का जादू

इस प्रयोग से एक बहुत बड़ा सबक यह मिला कि कोई भी प्रजाति तभी बच सकती है, जब उसके अंदर विविधता हो। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक टूलबॉक्स (toolbox) है जिसमें सिर्फ हथौड़े रखे हैं। अगर आपको कोई पेंच कसना हो, तो आप हथौड़े से वह काम नहीं कर सकते। लेकिन अगर आपके टूलबॉक्स में पेंचकस, प्लास और हथौड़ा सब कुछ है, तो आप हर तरह की समस्या सुलझा सकते हैं।

बिल्कुल इसी तरह, वैज्ञानिकों ने जो 231 तरह के बीजों का मिश्रण बनाया था वह एक टूलबॉक्स की तरह था। जब सूखा पड़ा, तो वे पौधे मर गए जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए था, लेकिन उसी मिश्रण में मौजूद वे पौधे बच गए जिनके अंदर सूखे से लड़ने वाले जीन मौजूद थे। इन्हीं बचे हुए पौधों ने आगे चलकर अपनी आबादी बढ़ाई। अर्थ सीधा-सा है, जैव विविधता (biodiversity) प्रकृति का सबसे बड़ा टूलबॉक्स है। अगर हम जंगलों और पौधों की विविधता को नष्ट करेंगे, तो हम उनसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत भी छीन लेंगे।

अनुकूलन की भी सीमा है

यह प्रयोग जहां एक तरफ उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बहुत गंभीर चेतावनी भी देता है। क्या पौधे हर तरह के खराब मौसम को झेल सकते हैं? जवाब है, नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि अत्यधिक विषम परिस्थितियों, जैसे तपते रेगिस्तान या अत्यधिक सूखे, में त्वरित विकास भी पौधों को नहीं बचा सका। तीन साल के भीतर ही इन इलाकों से पौधे पूरी तरह विलुप्त हो गए। उनके डीएनए में अनियमित बदलाव (irregular changes) होने लगे, जो इस बात का संकेत था कि तनाव इतना ज़्यादा हो चुका था कि प्रकृति का सुरक्षा तंत्र टूट गया। यह हमें बताता है कि पौधों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति और तीव्रता अगर एक सीमा से पार हो गई, तो जंगल-के-जंगल और खेत-के-खेत नष्ट हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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ऑक्टोपस ने त्रुटिरहित प्रोटीन निर्माण की राह दिखाई

क्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।

समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।

खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।

अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी . कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने . कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें  पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।

शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।

ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

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ज़ेब्रा फिश: एक सुंदर और शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार

ज़ेब्रा फिश (zebra fish) उष्णकटिबंधीय मीठे पानी की एक छोटी-सी, सुंदर मछली है। यह भारत की नदियों और तालाबों में पाई जाती है। आजकल एक्वेरियम फिश की तरह इनका काफी उपयोग हो रहा है। इनका नाम ज़ेब्रा फिश इसलिए पड़ा क्योंकि इनके शरीर के दोनों तरफ ज़ेब्रा के समान खड़ी (यानी शरीर के समांतर) नीली धारियां पाई जाती हैं। ये बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें शोल (shoal) कहते हैं।  

इसका वैज्ञानिक नाम है डेनियो रेरियो (Danio rerio)। यह नाम बांग्ला भाषा से आया है। नाम का पहला अक्षर दानी (धान के खेत की) बताता है कि यह धान के खेतों जैसे उथले पानी में रहती है। नाम का दूसरा हिस्सा भी बांग्ला है जो इसका स्थानीय नाम है। यह पूरे दक्षिण एशिया के धान के खेतों की एक खास मछली है। इस मछली का विवरण सबसे पहले एक स्कॉटिश चिकित्सक फ्रांसिस हैमिल्टन ने 1822 में दिया था। उन्होंने इसे नाम दिया था सायप्रिनस रेरिओ (Cyprinus rerio)। शोध साहित्य में कभी-कभी इसे Brachydanio rerio नाम से भी संदर्भित किया गया। इसका वर्तमान नाम डेनियो रेरिओ 1981 में स्थापित हुआ था।

देखा जाए तो जैव विकास के पायदान पर ज़ेब्रा फिश हम स्तनधारियों (Mammals) से बहुत पीछे है। फिर भी कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे और इस मछली के 70 प्रतिशत जीन्स (Genes) एक समान हैं। इसके अलावा, हमारी तरह इनमें आंखें, कान, नाक, रीढ़ की हड्डी, हृदय, मुंह और पाचन तंत्र पाए जाते हैं। शरीर के इन अंगों के विकास के लिए तमाम ज़रूरी जीन्स और प्रक्रियाएं मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में पाई जाती हैं और ‘संरक्षित’ हैं, यानी करोड़ों सालों में इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यही कारण है कि मनुष्य में इन शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाने वाली किसी बीमारी का अध्ययन सैद्धांतिक रूप से ज़ेब्रा फिश में किया जा सकता है। आज ज़ेब्रा फिश चूहों और गिलहरियों की तुलना में एक बेहतर मॉडल जीव (modal organism) बन चुकी है।

इस मछली पर शोध की शुरुआत 1960 के दशक में आणविक जीव विज्ञानी (molecular biologist) जॉर्ज स्ट्राइसिंगर ने की थी। उनके प्रयोगों ने इसमें आनुवंशिक हेरफेर किए जाने की क्षमता को पहचाना। 1980 तक ज़ेब्रा फिश मनुष्य व अन्य रीढ़धारी जीवों (vertebrates) के विकास के अध्ययन का एक अमूल्य मॉडल बन चुकी थी।

ज़ेब्रा फिश – एक मॉडल जीव

2001 में ज़ेब्रा फिश के जीनोम के अनुक्रमण से पता चला कि मानव जीनोम से इसकी समानता 70 प्रतिशत है। फिर, क्रिस्पर-कास-9 (CRISPER CAS-9) जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की प्रगति के साथ मानव रोगों की मॉडलिंग और दवा की खोज में ज़ेब्रा फिश एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में स्थापित हो गई। इसके श्रेष्ठ प्रायोगिक मॉडल होने में निम्नलिखित लक्षणों का बड़ा योगदान है:

– आकार में बहुत छोटी है, बड़े समूहों में रहना पसंद करती हैं। अतः चूहों की तुलना में इन्हें पालने में कम जगह लगती है और रख-रखाव भी सस्ता है।

– लगभग हर 10 दिन में प्रजनन करती है। एक बार में 50 से 300 तक अंडे देती है। वैज्ञानिक प्रयोगों में परिणामों की सटीकता जांचने के लिए उन्हें कई बार दोहराया जाता है। इसलिए ऐसा जीव जो बार-बार बड़ी संख्या में संतान पैदा कर सके, प्रयोगों के लिए उपयोगी होता है।

– ज़ेब्रा फिश में बाह्य निषेचन (Outer fertilization) होता है, भ्रूण भी बाहर विकसित होते हैं। इनमें इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन अर्थात शरीर से बाहर परखनली में निषेचन कराया जा सकता है।

– एक कोशिका अवस्था वाले निषेचित अंडों में डीएनए या आरएनए आसानी से डाले जा सकते हैं। इस तरह नॉक-आउट या ट्रांसजेनिक/नॉक-इन (Knock out/ transgenic knock-in) ज़ेब्रा फिश किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।

– ज़ेब्रा फिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इसके चलते निषेचित अंडे से पूर्ण विकसित शिशु मछली बनते समय आंतरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। चूहे व अन्य बड़े जंतुओं में यह संभव नहीं होता।

– भ्रूण के पारदर्शी होने के कारण उन्हें फ्लोरेसेंट (florescent) रूप से चिन्हित कर उनके ऊतकों को भी देखा जा सकता है।

एक खास बात यह है कि एक मॉडल जंतु के रूप में ज़ेब्रा फिश का उपयोग मुख्यत: जीन्स के कार्यों और विकास सम्बंधी रोगों के संदर्भ में किया गया है। इसके अलावा, इसका उपयोग कैंसर विज्ञान, विकास सम्बंधी विकारों के अध्ययन और औषधि विकास सम्बंधी अनुसंधान में भी हुआ है। इसकी एक खूबी यह है कि इसे कोई दवा देना आसान है – गलफड़ों में पानी के ज़रिए।

नॉकआउट, नॉकइन

अक्सर किसी बीमारी का कारण जानने के लिए मरीज़ के डीएनए का अनुक्रमण (DNA Sequencing) किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जीन में हुए उत्परिवर्तन अर्थात म्यूटेशन (Mutation) संभावित रूप से उस रोग का कारण हो सकते हैं। इस तरह के विश्लेषण से यह पता चलता है कि क्या किसी जीन के कामकाज में बदलाव आया है जो लक्षणों का कारण हो सकता है। फिर, ज़ेब्रा फिश में उसी जीन में उत्परिवर्तन करवाया जाता है या उसे निष्क्रिय कर दिया जाता है। और इन परिवर्तित मछलियों में वैसे ही लक्षणों की जांच की जाती है।

जब ज़ेब्रा फिश में किसी समकक्ष जीन में उत्परिवर्तन के ज़रिए उसे ठप कर दिया जाता है, तो कहते हैं कि उस जीन को नॉक-आउट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि रोगी को मांसपेशियों से सम्बंधित बीमारी है तो ज़ेब्रा फिश में जीन में परिवर्तन (नॉक-आउट) के बाद मांसपेशियों के तंतुओं की संरचना में आई असामान्यता की जांच आसानी से सूक्ष्मदर्शी से की जा सकती है।

इसी प्रकार से यदि रोग के लक्षण गर्भाशय में विकास के दौरान शुरू हुए हों तो नाक-इन या नाक-आउट ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों में जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन के असर की जांच आसानी से की जा सकती है। नॉक-इन तब कहते हैं जब ज़ेब्रा फिश में किसी जीन को जोड़ा जाए और यह देखा जाए कि इसका क्या असर होता है।

कुछ मानव रोगों के उदाहरण 

मांसपेशीय विकार

ड्यूशेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) मांसपेशियों का एक रोग है जो अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें मांसपेशियों की कमज़ोरी बचपन में ही प्रकट होने लगती है और क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है।

ऐसा अंदाज़ा था कि डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) नामक जीन में उत्परिवर्तन ही डीएमडी के लिए ज़िम्मेदार है। डिस्ट्रॉफिन जीन की पहचान 1986 में लू कुन्केल ने की थी। उन्होंने बताया था कि यह एक्स गुणसूत्र पर स्थित होता है और डीएमडी में इसकी भूमिका है। 1987 में इस जीन के द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन (डिस्ट्रॉफिन) की पहचान हुई। डिस्ट्रॉफिन प्रोटीन मांसपेशियों की रक्षा करता है, यदि यह प्रोटीन न हो तो मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनका स्थान वसा और सख्त ऊतक लेने लगते हैं।

ज़ेब्रा फिश में डिस्ट्रॉफिन जीन के नॉक-आउट प्रयोगों से पता चला कि इसके असर मानव रोग डीएमडी से काफी मिलते-जुलते हैं। डीएमडी से पीड़ित रोगियों में डिस्ट्रॉफिन में उत्परिवर्तन पाए गए हैं। मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में, डिस्ट्रॉफिन की कमी से धीरे-धीरे मांसपेशियों के तंतु नष्ट हो जाते हैं।

उम्मीद है कि ज़ेब्रा फिश पर हो रहे अनुसंधान मांसपेशियों के विकार, खास तौर से डीएमडी के लिए विभिन्न औषधियों की जांच-पड़ताल में मददगार होंगे।

कैंसर व मेलेनोमा

मेलेनोमा त्वचा कैंसर का एक प्रकार है। वैसे तो यह एक तिल के रूप में शुरू होता है लेकिन समय से सर्जरी करके न हटाया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह मुख्य रूप से त्वचा की मेलेनोसाइट (melenocyte) कोशिकाओं को प्रभावित करता है और यूवी प्रकाश या टैनिंग बेड के उपयोग से शुरू होता है।

ज़ेब्रा फिश को मानव मेलेनोमा का सफल मॉडल भी बनाया गया है। मानव मेलेनोमा में सबसे आम तौर पर पहचाना जाने वाला उत्परिवर्तन जीन BRAF में एक एकल अमीनो एसिड परिवर्तन (V600E) है। BRAF V600E उत्परिवर्तन एक अर्जित उत्परिवर्तन है। इस उत्परिवर्तित जीन द्वारा बनाए गए BRAF प्रोटीन में पोज़ीशन 600 पर वैलीन नामक अमीनो एसिड का स्थान ग्लूटेमिक एसिड ले लेता है। इस परिवर्तन की वजह से यह प्रोटीन निरंतर सक्रिय रहता है और कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर ट्यूमर तथा कैंसर का कारण बन जाती हैं।

चूंकि कैंसर कई जेनेटिक परिवर्तनों के संयोजन से होते हैं, इसलिए इस नॉक-इन ज़ेब्रा फिश लाइन का उपयोग अन्य संभावित कैंसर पैदा करने वाले उत्परिवर्तनों की जांच के लिए किया गया था। जब BRAF नॉक-इन ज़ेब्रा फिश में SETDB1 नामक एक अन्य सामान्य रूप से देखे जाने वाले मेलेनोमा उत्परिवर्तन को जोड़ा गया, तो तेज़ी से मेलेनोमा विकसित हुआ।

हृदय रोग

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी ज़ेब्रा फिश मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। ज़ेब्रा फिश का हृदय हमारे समान चार प्रकोष्ठ वाला नहीं बल्कि दो प्रकोष्ठ का होता है। लेकिन हृदय का शुरुआती विकास लगभग वैसा ही होता है जैसा अन्य एम्नियॉटिक जंतुओं में (एम्नियोटिक जंतु उन्हें कहते हैं जिनमें भ्रूण के विकास के दौरान उसके आसपास एक विशेष झिल्ली (एम्नियॉन) बनती है। इस झिल्ली से बनी एम्नियोटिक थैली (amniotic sac) की बदौलत ही इन जंतुओं के भ्रूण का विकास पानी से बाहर शुष्क वातावरण में भी हो पाता है।चूहों के विपरीत, ज़ेब्रा फिश को भ्रूण अवस्था में जीवित रहने के लिए एक कार्यात्मक हृदय प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती है। कारण यह है कि इतने छोटे जंतु को ज़रूरी ऑक्सीजन सीधे विसरण के ज़रिए मिल जाती है। इसलिए, शोधकर्ता गंभीर हृदय विकृतियों वाली ज़ेब्रा फिश में ऐसे शारीरिक अंतरों का अवलोकन कर पाते हैं जिनका अध्ययन चूहों में नहीं किया जा सकता है। 

वैसे कशेरुकी जंतुओं में मायोसाइट एनहांसर फैक्टर (हृदय कोशिकाओं को उन्नत बनाने वाले कारक) के चार रूप पाए जाते हैं Mef2A, Mef2B, Mef2C और Mef2D। जहां इनसे बनाए जाने वाले प्रोटीन्स हृदय के विकास में भूमिका निभाते हैं, वहीं यह भी देखा गया है कि इनमें से Mef2C प्रमुख है।

अब बात आती है ज़ेब्रा फिश की। एक तो हम देख चुके हैं कि ज़ेब्रा फिश कई दिनों तक हृदय के बगैर भी जी पाती हैं। दूसरा, पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में जैव-विकास के किसी चरण में Mef2C जीन दो भागों में बंट गया था – Mef2ca और Mef2cb।

2012 के एक शोध से पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में Mef2ca और Mef2cb पहले और दूसरे हृदय क्षेत्र दोनों की कोशिकाओं के विभेदन के लिए आवश्यक हैं। Mef2ca और Mef2cb कोशिकीय विभेदन के महत्वपूर्ण नियामक हैं। इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि जब ज़ेब्रा फिश भ्रूण में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीनों की हानि हो जाए तो क्या होता है। पाया गया कि जिन भ्रूणों में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीन की कमी होती है, उनमें हृदय में मांसपेशीय कोशिका विभेदन में दोष होते हैं। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, Mef2ca या Mef2cb जीन में से किसी एक की कमी हृदय के कार्य को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि Mef2 गतिविधि सभी हृदय कोशिका विभेदन के लिए आवश्यक है।

विष विज्ञान

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेन्यूब नदी के पानी के विभिन्न नमूनों में ज़ेब्रा फिश रखीं और भ्रूण की असामान्यताओं के विकास का अवलोकन किया। पता चला कि सभी 22 नमूने कुछ हद तक मृत्यु का कारण बन सकते थे। चूंकि शोधकर्ता ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के विकास का अवलोकन कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इन भ्रूणों में आंखों की विकृतियां, असामान्य रंजक और बहुत कम या न के बराबर रक्त संचार देखा। ज़ेब्रा फिश की मदद से शोधकर्ताओं ने पानी में मौजूद विषैले पदार्थों की पहचान भी की। ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों को कृत्रिम रूप से तैयार किए गए एक मिश्रण में डाला गया। कुल मिलाकर उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या ज़ेब्रा फिश का उपयोग पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन करने में किया जा सकता है।

इसी प्रकार के प्रयोग कई अन्य नदियों/तालाबों में किए गए हैं। जैसे मुंबई महानगर की मीठी नदी के पानी का ज़ेब्रा फिश भ्रूणों पर असर 2023 में एन्वायर्मेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन के लिए मीठी नदी से 10 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए थे। इन सभी नमूनों में ज़ेब्रा फिश भ्रूण विषाक्तता परीक्षण किया गया। प्रयोग में पता चला कि सामान्य पानी में रखे गए भ्रूणों और विभिन्न स्थलों के पानी में रखे गए भ्रूणों के बीच मृत्यु दर, अंडे में कोग्यूलेशन, पेरिकार्डियल एडीमा (pericardial edima), योक थैली के एडीमा, पूंछ की ऐंठन और कंकाल (skeleton) सम्बंधी विकारों की दृष्टि से काफी अंतर रहा। एक तो इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ की मीठी नदी का पानी जलीय जीवों के लिए घातक है। साथ ही पानी की गुणवत्ता को परखने के लिए ज़ेब्रा फिश की उपयोगिता भी प्रमाणित हुई।

टॉक्सिकोलॉजी साइंसेस में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में विष वैज्ञानिक अध्ययनों में ज़ेब्रा फिश के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका उपयोग आणविक स्तर से लेकर पूरे जीव की सेहत और व्यवहार पर असर के अध्ययन तक में किया जा रहा है। दरअसल, समीक्षा पर्चे में कहा गया है कि ज़ेब्रा फिश कांच के उपकरणों (in-vitro) में किए जाने वाले अध्ययनों और उच्चतर जीवों पर असर के बीच एक सेतु बन गया है।

विकास/परिवर्धन की विकृतियां

ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक उत्परिवर्ती (हेडलेस) में T-cell factor-3 में उत्परिवर्तन हुआ था जिसके चलते उसके सिर के विकास में गड़बड़ियां पैदा हुईं। इन प्रयोगों से यह स्थापित हुआ कि हेडलेस उत्परिवर्ती Wnt संकेतन मार्ग से नियंत्रित जीन्स का दमन करता है। ये जीन्स कोशिकाओं की संख्यावृद्धि, उनके विभेदन और स्टेम कोशिका (stem cells) अवस्था बनाए रखने का नियंत्रण करते हैं।

इसी प्रकार से ज़ेब्रा फिश ने तंत्रिकाओं की पहचान करने और मस्तिष्क की बनावट (आर्किटेक्चर) को समझने में भी योगदान दिया है। इसमें शुरुआती तंत्रिका प्लेट अवस्था में तंत्रिकाओं के निर्माण से लेकर वयस्क मस्तिष्क के विकास तक की अवस्थाओं को देखा जा सका है।

मानसिक विकार

ज़ेब्रा फिश अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में रहते हैं। लिहाज़ा, इनका उपयोग मानसिक विकारों के व्यवहारगत परीक्षणों में संभव है। चिओल-ही किम व उनके साथियों ने ज़ेब्रा फिश में मानसिक विकारों से सम्बंधित एक जीन समूह की खोज की है। इस जीन परिवार को सैमडोरी (सैम) नाम दिया गया है। पांच जीन्स के इस समूह में से sam2 मस्तिष्क के हैबेन्यूलर न्यूक्लिआई में अभिव्यक्त होता है। इसका सम्बंध बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से देखा गया है।        sam2 नॉक-आउट से चूहों व ज़ेब्रा फिश दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया (जैसे डर और दुश्चिंता) में गड़बड़ी देखी गई जो दुश्चिंता सम्बंधी विकारों और ऑटिज़्म में भी दिखती है।

वायरस संक्रमणों का अध्ययन

हाल के वर्षों में ज़ेब्रा फिश वायरस संक्रमणों की तहकीकात के लिए भी एक मॉडल बनकर उभरा है। ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से वायरस की रोगजनन क्रियाविधि, मेज़बान की प्रतिक्रिया तथा संभावित उपचारों की दिशा में मदद मिली है। खास तौर से ज़ेब्रा फिश मॉडल्स से वायरस संख्यावृद्धि, टिशू ट्रॉपिज़्म (tissue tropism) (यानी कोई वायरस किन ऊतकों को संक्रमित करेगा), और प्रतिक्षा तंत्र को चकमा देने की विभिन्न वायरसों की रणनीतियों को उजागर करने में मदद मिली है। इनमें चिकनगुनिया वायरस, डेंगू वायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस टाइप-1 और इंफ्लुएंज़ा-ए वायरस शामिल हैं।

इसके अलावा कई वायरसों जैसे, सार्स-सीओवी-2, ज़िका वायरस और डेंगू वायरस के खिलाफ विकसित एंटी-वायरल (anti-viral) पदार्थों तथा प्राकृतिक एजेंट्स की प्रभाविता की जांच करने में भी मदद मिली है।

खास तौर से ज़ेब्रा फिश भ्रूणों की पारदर्शिता तथा जेनेटिक तहकीकात की सरलता के चलते वायरस के प्रसार और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करना सुगम हुआ है।

ज़ेब्रा फिश की सीमाएं

ज़ेब्रा फिश को एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ सीमाएं भी है। जैसे ज़ेब्रा फिश में ऐसी इंसानी बीमारियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता जो ऐसे जीन्स की वजह से होती हैं जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते। जैसे ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के पैंक्रियास की रचना तो एक सी है लेकिन उनके बीच जेनेटिक अंतर हैं। इस वजह से मोटापे जैसे कई चयापचय रोगों (metabolic diseases) का अध्ययन नहीं हो पाता। इसके अलावा, ज़ेब्रा फिश की मदद से उन अंगों से सम्बंधित अध्ययन भी नहीं किए जा सकते जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते – जैसे प्रोस्टेट ग्रंथि (prostrate gland), स्तन ग्रंथियां या फेफड़े।

ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि जहां मनुष्य व अन्य स्तनधारी समतापी होते हैं वहीं ज़ेब्रा फिश (अन्य मछलियों व सरिसृपों के समान) विषमतापी होते हैं यानी इनके शरीर का तापमान आसपास के वातावरण के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश को कृत्रिम रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रखा जाता है। इसलिए इन पर किए गए प्रयोगों के परिणाम शायद मनुष्यों पर लागू न हो पाएं।

ज़ेब्रा फिश सांस लेने का काम गलफड़ों (gills) से करती है जबकि मनुष्य इसके लिए फेफड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके चलते ज़ेब्रा फिश में हृदय और गलफड़ों के बीच परिवहन तंत्र नहीं पाया जाता। इसी वजह से कई बीमारियों का अध्ययन ज़ेब्रा फिश मॉडल में नहीं किया जा सकता – जैसे श्वसन रोग, हार्ट अटैक।

कृन्तकों (rodents) के विपरीत ज़ेब्रा फिश और अन्य मछलियां, अंतःप्रजनन (inbreeding) को सहन नहीं कर पातीं और अंतःप्रजनन से तेज़ी से प्रजनन क्षमता खो देती हैं। अंत:प्रजनन इसलिए करवाया जाता है ताकि जेनेटिक संरचना कई पीढ़ियों तक बनी रहे।

ज़ेब्रा फिश पानी में रहती हैं। इनके भ्रूणों के थ्री-डी विश्लेषण (3-D analysis) के दौरान प्रकाश के अपवर्तन की वजह से छवियां ठीक से नहीं बन पातीं। दूसरी दिक्कत यह आती है कि ये भ्रूण हिलते-डुलते रहते हैं।

आम तौर पर किसी दवा का असर जांचने के लिए वह दवा पानी में घोल दी जाती है और भ्रूण उसे गलफड़ों के ज़रिए ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन पानी में अघुलनशील दवाइयां इस तरह से देना कठिन होता है।

प्रतिरक्षा के संदर्भ में भी ज़ेब्रा फिश में कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखते हैं।

हालांकि ज़ेब्रा फिश कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, फिर भी उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च-थ्रूपुट तकनीक ने रसायनों और दवाओं की जांच में विषाक्तता परीक्षणों में ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के उपयोग की संभावना को बढ़ा दिया है।

प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश उन अनुसंधान क्षेत्रों की पूर्ति कर सकती हैं जिनमें चूहे के मॉडल असफल हुए हैं। शायद अगले कुछ वर्षों में, विज्ञान की अगली बड़ी खोज का श्रेय ज़ेब्रा फिश को दिया जाएगा (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बोतल में कैद रोशनी, जब चाहें इस्तेमाल करें

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरल तैयार किया है जिसे रोशनी या अन्य किसी ऊर्जा स्रोत के संपर्क में रखा जाए तो वह एक ऊर्जा-सघन काली जेली (black gel) में बदल जाता और इस ऊर्जा को वह महीनों तक कैद रख सकता है।

दरअसल, यह जेलीनुमा पदार्थ कुछ हद तक एक बैटरी की तरह काम करता है। जैसे ही इसका संपर्क ऑक्सीजन से कराया जाता है, तो संग्रहित ऊर्जा मुक्त हो जाती है।

हाल ही में केम नामक पत्रिका में प्रकाशित यह शोध अभी टेक्नॉलॉजी के स्तर पर नहीं पहुंचा है। यह तो एक अवधारणा का प्रदर्शन मात्र है कि कैसे एक धातु-रहित पदार्थ ऊर्जा का दोहन कर सकता है, उसे संग्रहित कर सकता है और फिर से उपयोग के लिए उपलब्ध करा सकता है। यदि यह प्रयोग टेक्नॉलॉजी में तबदील होता है तो यह तरल पदार्थ हमें सेमीकंडक्टर (semiconductor) के लिए ऊर्जा का धातु-रहित स्रोत उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। यह टेक्नॉलॉजी खास तौर से चिकित्सा उपकरणों व यंत्रों में उपयोगी साबित होगी जहां धातु-उपकरणों के उपयोग में समस्याएं होती हैं।

दरअसल, इस नए पदार्थ का विचार कोशिकीय कंकाल के व्यवहार में से उपजा है। यह कोशिकीय कंकाल (cellular skeleton) कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन तंतुओं का लगातार बनता-टूटता नेटवर्क होता है। यह कोशिकाओं को गति करने और विभाजन में समर्थ बनाता है।

इस व्यवस्था को कृत्रिम तंत्र में विकसित करने के लिए नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के सेमुअल स्टुप की टीम ने एक अणु की रंचना की जिसमें दो घटक थे: एक अमीनो नेफ्थलीन एरोमैटिक इकाई (ANI) जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है; दूसरी इकाई मिथाइल वाइलोजेन (MV) की थी जो इलेक्ट्रॉन (electron) संग्रह कर सकती है। शुरुआत में यह पदार्थ एक पीला तरल होता है लेकिन जब इस पर रोशनी पड़ती है, तो ANI घटक ऊर्जा सोखता है और अपने इलेक्ट्रॉन MV को दान कर देता है। ऊर्जा के अवशोषण का परिणाम यह होता कि ये अणु टिकाऊ फीतों जैसे संकुलों में जम जाते हैं। यह जमावट काफी टिकाऊ होती है और महीनों तक बनी रह सकती है।

जैसे ही इस जेली का संपर्क ऑक्सीजन से होता है, यह वापिस तरल रूप में आ जाती है और इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। इस दौरान मुक्त ऊर्जा का उपयोग रासायनिक क्रियाओं के संचालन में किया जा सकता है, अर्थात यह एक बैटरी है। स्टुप के शब्दों में, ‘यह रोशनी को बोतल में कैद करने जैसा है।’

वैसे देखा जाए तो कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए प्रकाश को रासायनिक ऊर्जा में तबदील करने के साधन उपलब्ध हैं। जैसे फोटो-इलेक्ट्रिक सेल (photoelectric cell) में प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इन्हें फिर से जोड़ें तो ऊर्जा प्राप्त मिल सकती है या जलाकर भी ऊर्जा मिल जाएगी। लेकिन स्टुप के मुताबिक उनके द्वारा विकसित प्रक्रिया उत्क्रमणीय है और इसमें धातुओं का उपयोग भी नहीं करना होता। इस मायने में यह अतीत के प्रयासों से एकदम अलग है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंडाशय की नई प्रतिरक्षात्मक भूमिका

लंबे समय से प्रजनन वैज्ञानिक  मानते आए हैं कि प्रजनन उम्र (reproductive age) समाप्त होते ही महिलाओं में अंडाशय (ovary) की भूमिका शून्य हो जाती है, लगभग अपेंडिक्स की तरह। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस पुरानी समझ को चुनौती दी है। फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. फ्रांसिस्का डंकन और उनकी टीम ने पाया कि रजोनिवृत्ति (menopause)) के बाद अंडाशय शरीर में नई जिम्मेदारी संभालने लगता है जो महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) से जुड़ी हो सकती है।

चूहों और इंसानों के अंडाशयों पर किया गया यह अध्ययन मॉलीक्यूलर ह्यूमन रीप्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ है। दरअसल, पांच साल पहले, डॉ. डंकन ऐसी  कोशिकाओं के एक अध्ययन में जुड़ी थीं जिन्होंने विभाजन करना बंद कर दिया हो (इन्हें सेनेसेंट कोशिकाएं कहते हैं)। ऐसी कोशिकाओं की संख्या ऊतकों में बढ़ती जाने के साथ जरावस्था के लक्षण प्रकट होते हैं (senescent cells)।

इस अध्ययन के दौरान वे अंडाशय की पूरी उम्र में सेनेसेन्ट कोशिकाओं का अध्ययन करना चाहती थी। लेकिन स्वस्थ अंडाशय पर शोध संभव न होने के कारण उन्होंने रजोनिवृत्त हो चुकी (postmenopause) 50 से 75 वर्ष की महिलाओं के अंडाशय का अध्ययन किया। इन महिलाओं के अंडाशय चिकित्सकीय कारणों से निकाले गए थे।

उन्होंने पाया कि उम्र के साथ अंडाशय में अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बन रहे थे। डॉ. डंकन कहती हैं – यदि ये अंग उम्र के साथ नए प्रोटीन बना रहा है, तो इसका मतलब है कि इसमें बढ़ती उम्र के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव आ रहे हैं। यह जानकारी पुरानी सोच से अलग और चौंकाने वाली थी, क्योंकि अगर रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय कुछ काम नहीं कर रहा होता तो उसमें उम्र के साथ कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

और गहराई से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों पर शोध किया। इनमें भी एक उम्र के बाद अंडाशय अंडा निर्माण बंद कर देता है, हालांकि उनमें इंसानों जैसे रजोनिवृत्ति वाले लक्षण – जैसे एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट नहीं होती।

शोधकर्ताओं ने युवा चूहों, प्रजनन काल के आखिरी दौर वाले चूहों, और प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय निकाले। प्रत्येक चूहे के एक अंडाशय के आरएनए (RNA) का अनुक्रमण करके उसके जीन्स की सक्रियता मापी। वहीं, दूसरे अंडाशय में अलग-अलग कोशिकाओं को पहचानने और फाइब्रोसिस (fibrosis) की वृद्धि मापने के लिए सूक्ष्मदर्शी से जांच की गई। फाइब्रोसिस ऊतकों के सख्त होने की प्रक्रिया है, जो बढ़ती उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से होती है।

देखा गया कि चूहों के अंडाशयों में बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्रिया से जुड़े रसायन कम हो गए थे। लेकिन प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय में युवा चूहों की तुलना में अलग-अलग तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का भंडार पाया गया।

बूढ़े चूहों के अंडाशय में ऐसे जीन भी भारी मात्रा में सक्रिय थे जो शोथ (सूजन) (inflammation) बढ़ाने वाले  रसायन बनाते हैं। ये रसायन शरीर के रक्त प्रवाह के ज़रिए दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं। 

यह शोध रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय को एक नाकारा अंग समझने के बजाय एक नई संभावना की ओर इशारा करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंडाशय अपना मूल काम (अंडा निर्माण) समाप्त होने के बाद एक नई भूमिका अपना सकता है। अनुमान है कि यदि उम्रदराज अंडाशय रक्तप्रवाह में ये शोथ बढ़ाने वाले अणु छोड़ रहे हैं तो शायद इसी कारण महिलाओं को, उम्र पुरुषों की तुलना में लंबी होने के बावजूद, बुढ़ापे के दौरान होने वाली जीर्ण बीमारियों का अधिक सामना करना पड़ता है।

कई सालों से रजोनिवृत्त महिलाओं के अंडाशय आम तौर पर किसी भी सर्जरी के दौरान निकाल दिए जाते हैं, क्योंकि प्रजनन काल खत्म होने के बाद अंडाशय को बेकार और कैंसरकारी (cancerous) समझा जाता रहा है। यह शोध महिलाओं के शरीर को समझने में मददगार साबित हुआ है। हालांकि अभी भी महिलाओं की शारीरिक रचना को पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए रजोनिवृत्ति के दौरान व उसके बाद में होने वाली समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करने और समझ विकसित करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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‘हम साथ-साथ हैं’ की तड़प क्यों?

नुष्यों को साथियों के साथ रहना पसंद है। क्या इसके पीछे कोई जीव वैज्ञानिक कारण है?   इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जानवरों और मनुष्यों पर कुछ दिलचस्प अध्ययन किए हैं। अध्ययन बताते हैं कि समूह में रहना, मिलना-जुलना केवल पसंद -नापसंद मामला नहीं है बल्कि रोटी-कपड़ा-मकान की तरह यह भी हमारे जीवन का आधार और मूल ज़रूरत है। 

तंत्रिका वैज्ञानिक चूहों और मनुष्यों के मस्तिष्क पर शोध करके यह समझने की कोशिश करने में जुटे हैं कि ‘अकेलापन दुख का और अपनों का साथ खुशी का कारण क्यों है?’ वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा शरीर बदलती बाहरी परिस्थितियों के अनुसार तापमान, रक्तचाप और शरीर के तरल पदार्थों का आंतरिक संतुलन बनाए रखता है।  इसे समस्थापन (होमियोस्टेसिस) कहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ठीक उसी प्रकार हमारा दिमाग भी सामाजिक जीवन और अकेलेपन के बीच संतुलन की तलाश करता है। इसे उन्होंने दिमाग की मानसिक समस्थिति (mental homeostasis) नाम दिया है। हालांकि, सामाजिक संतुलन की ज़रूरतें और सीमाएं हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। किसी को अकेले रहना ज़्यादा पसंद होगा, तो किसी को बड़े समूह या लोगों के आसपास, लोगों से मिल-जुलकर रहना पसंद होगा। 

वैज्ञानिक इसे ‘अपनों के साथ की लालसा’ कहते हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत लंबे समय तक अकेले रहता है तो मस्तिष्क के एक हिस्से (हायपोथैलेमस) की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की सक्रियता के कारण अकेलापन झेल रहा व्यक्ति बेचैनी, उदासी और दुख महसूस करता है। दूसरी ओर, जब अपनों से मिलने पर अकेलापन दूर होता है तब मस्तिष्क की अन्य कोशिकाएं सक्रिय होती हैं। इससे डोपामाइन (dopamine) नाम का रसायन स्रावित होता है; जो वैसा ही सुखद एहसास देता है जैसा किसी भूखे को खाना मिलने पर होता है। 

कुदरत में कई जीवों को विभिन्न कारणों से समूह या साथ की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से चिपककर बैठने वाले पक्षी हों, दुश्मनों से सुरक्षा के लिए रेगिस्तान में बड़े समूहों में रहने वाले मीरकैट और भोजन की तलाश/शिकार करने के लिए झुंड में रहने वाली नीलगाय, ज़ेबरा, या लक्कड़बग्घे। दूसरी ओर, कुछ जानवर ऐसे भी हैं जो ज़्यादातर अकेले रहते हैं, जैसे ओरांगुटान अकेले अपना खाना ढूंढते हैं, तेंदुए अकेले ही शिकार करते हैं।

दरअसल, वैज्ञानिक चूहों पर शोध करके यह जानना चाह रहे थे कि चूहे कब और कैसे अकेलापन महसूस करते हैं? इसके लिए उन्होंने पिंजरे के बीच में ऐसी जाली लगा दी जिससे चूहे एक-दूसरे को देख सकते थे, सुन सकते थे, सूंघ भी सकते थे – केवल छू नहीं सकते थे। परिणाम यह हुआ कि साथी चूहे सामने होते हुए भी वे अकेला और उदास (sad) महसूस कर रहे थे। उसके बाद वैज्ञानिकों ने अकेले रह रहे चूहों को दो खास सुरंग वाले रास्तों का विकल्प दिया। एक रास्ते में नर्म-मखमली चादर थी और दूसरा रास्ता सख्त था। उन्होंने पाया कि अकेलेपन से जुझ रहे चूहों ने सख्त रास्ते के बजाय नर्म-मखमली चादर वाले रास्ते को चुना। इससे यह साबित हुआ कि (चूहों में) अकेलापन(lonliness) दूर करने के लिए केवल देखना, सुनना या सूंघना काफी नहीं है बल्कि शारीरिक स्पर्श सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्यों और चूहों की त्वचा में खास संवेदक और इंद्रियां (Sensors and senses) होती हैं जो स्नेह भरे स्पर्श से मस्तिष्क को तुरंत सक्रिय करके सुरक्षित महसूस करवाती हैं, इसे ‘स्पर्श की ताकत’ कहा गया।

वैज्ञानिकों ने नर और मादा चूहों में भी अकेलेपन के असर को देखा। उन्होंने पाया कि मादा चूहे लंबा वक्त अकेले बिताने के बाद ज़्यादा मिलनसार हो गईं। वहीं नर चूहे अकेले रहने से चिड़चिड़े, गुस्सैल, और अपने इलाके के प्रति संवेदनशील हो गए। 

मनुष्यों और चूहों के गहन मस्तिष्क क्षेत्र बहुत हद तक समान हैं। इसलिए चूहों के अकेलेपन वाले व्यवहार को मनुष्यों के अकेलेपन से होने वाले व्यवहारों और समस्याओं को समझने के लिए अध्ययन किया जा रहा है।

शोध बताते हैं कि जेल की अकेली कोठरी में सज़ा काट रहे कैदियों को बहुत लंबे समय तक अकेले रहने के कारण बाहरी दुनिया से डर लगने लगता है, उनका मस्तिष्क लगातार खतरा (danger) और बेचैनी महसूस करता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ वे लोगों से मिलने और सामने आने से कतराने लगते हैं।

अकेलेपन से सेहत पर बुरा असर होने के कारण ज़िंदगी के साल भी कम होने लगते हैं। अकेलेपन से न सिर्फ मन दुखी रहता है बल्कि लंबे समय से अकेला महसूस करने वाले लोगों को दिल की बीमारी, स्ट्रोक, और कैंसर जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। यानी समय के साथ ये मानसिक और शारीरिक पीड़ा (physical trauma) में बदल जाता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि संतुलन बनाए रखना ही अकेलेपन की समस्या का समाधान है। खुद की सामाजिक सीमाओं को पहचानकर थोड़ा समय खुद के साथ बिताएं, थोड़ा करीबी लोगों के साथ और कभी-कभी थोड़ा समय बड़े सामाजिक कार्यक्रमों में दें। इससे हर परिस्थिति में मस्तिष्क खुश रहना सीखता है। आखिर में, वैसे तो आजकल लोगों से जुड़े रहना तकनीकी साधनों से बहुत आसान हो गया है। लेकिन जब भी मौका हो, स्नेह-स्पर्श के ज़रिए अपनापन जताना हमारे तन, मन और मस्तिष्क के लिए किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं हैं।  (स्रोत फीचर्स)

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क्या ‘रायशुमारी’ वैज्ञानिक सत्य बता सकती है?

अमन मदान

क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर कहीं जीवन (एलियन्स) (aliens) है? इसे लेकर बहस तो चलती ही रहती है। लेकिन लोगों की उत्सुकता होती है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे सवाल हमें दिलचस्प लग सकते हैं। खासकर यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते या कहते हैं क्योंकि, कम से कम, हम यह मानते हैं कि वैज्ञानिक जो सोचते या मानते हैं वह सही होगा। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि क्या सिर्फ कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन बसता है, या सभी वैज्ञानिक यह बात मानते हैं?

ऐसी रायशुमारी (ओपिनियन पोल) (opinion poll) के ज़रिए वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए इंग्लैंड की डरहम युनिवर्सिटी (durham university) ने एक केंद्र स्थापित किया है, जिसमें किसी सवाल पर वैज्ञानिकों की राय जानी जाती है। इसका नाम है सेंटर फॉर साइंटिफिक कम्युनिटी ओपिनियन पोलिंग एंड इवैल्यूएशन (C-SCOPE)। इसे स्पष्ट और सटीक सवालों के शीघ्र और सरल जवाब पाने के हिसाब से बनाया गया है। इसके तहत 2023 में पहला सर्वेक्षण किया गया था। इसमें भारत समेत 12 देशों और 30 संस्थानों के 20,085 वैज्ञानिकों से पूछा गया था: “क्या विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि COVID-19 एक वायरस की वजह से होता है?” जवाब ‘लिकर्ट स्केल’ (likert scale) पर मांगे गए थे, जिसमें पांच विकल्प थे – पूरी तरह असहमत, असहमत, तटस्थ, सहमत, पूरी तरह सहमत। 20,085 में से 6807 वैज्ञानिकों ने सवाल के जवाब दिए थे। 93.2 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने कहा था कि वे इस बात से सहमत या पूरी तरह सहमत हैं।

यह मानना लुभावना लगता है कि यदि ज़्यादातर वैज्ञानिक किसी बात पर सहमत हैं, तो वह सत्य होनी चाहिए। या, अगर ज़्यादातर वैज्ञानिक असहमत हैं, तो वह बात असत्य होनी चाहिए। इसके बाद की गई एक अन्य रायशुमारी में एक शोध पत्र पर 494 अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों की राय ली गई थी: शोध पत्र में दावा किया गया था कि पृथ्वी से लगभग 124 प्रकाश-वर्ष दूर K2-18b नाम के एक ग्रह पर जीवन हो सकता है। इस विचार से सिर्फ 6.6 प्रतिशत लोग सहमत या पूरी तरह सहमत थे। सवाल यह है कि यदि सहमत होने वालों की संख्या इतनी कम है, तो क्या यह दावा गलत है?

रायशुमारी हमें आसानी से समझने योग्य जानकारी देती हैं। “सिर्फ 6.6 प्रतिशत वैज्ञानिक सहमत हैं!” लेकिन हमें बहुत सी ऐसी बातें नहीं पता होतीं जो उस जवाब की पृष्ठभूमि में हो सकती हैं। जैसे, यह सर्वेक्षण शोध पत्र प्रकाशित होने के महज़ 8 दिन बाद किया गया था। तो हमें पता नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल कितने अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों ने वह शोध पत्र पढ़ा होगा।

वैज्ञानिक शोध के लिहाज़ से सर्वेक्षण (survey) एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, बाकी सभी तरीकों या साधनों की तरह, इसका इस्तेमाल भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए और इनसे उतना ही मतलब निकालना चाहिए जितना वे बता सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उत्तरदाता सवालों का गलत मतलब निकाल सकते हैं – अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या COVID-19 वायरस से हुआ था, तो मुझे लग सकता है कि मुझसे पूछा जा रहा है कि क्या मैंने खुद ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे देखे हैं जो इसकी पुष्टि करते हों। तो मेरा जवाब होगा, ‘नहीं’। और ईमानदारी से कहूं तो (और वैज्ञानिक को ईमानदार होना चाहिए) मैंने उन प्रतिष्ठित जर्नल्स के शोध पत्र देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई है जिनमें COVID-19 के लिए ज़िम्मेदार जीव की पहचान की गई थी। मुझे अब भी थोड़ी शंका है कि इसके लिए वायरस ज़िम्मेदार था, लेकिन मैं इसे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से नहीं कह सकता। जैसे, सर्वेक्षण में शामिल 7 प्रतिशत लोगों ने इस बात से सहमति नहीं जताई कि कोविड-19 वायरस से हुआ था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जानकार वैज्ञानिकों के बीच कोई बड़ा मतभेद है। हो सकता है कि बात या सवाल स्पष्ट करने के लिए कुछ और सवाल पूछने की ज़रूरत हो। कभी-कभी एक वाक्य के सवालों का मतलब समझना मुश्किल हो सकता है। लोगों की राय लेने वाले किसी भी सर्वेक्षण या साक्षात्कार की यह जानी-मानी समस्या है।

हालांकि, रायशुमारी के नतीजे पढ़ना मज़ेदार होता है। और सही तरीके से ‘आपकी राय’ ली जाए, तो दिलचस्प रुझान इसमें नज़र आ सकते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक सत्य या तथ्य तय करने का तरीका नहीं हो सकता। यह एक ऐसी आपत्ति है जो सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक द्वारा सवाल समझने के तरीके या नमूने में त्रुटि से कहीं आगे की बात है। असल में, विज्ञान का विकास ही सर्वमान्य तथ्य के खिलाफ हुआ था। विज्ञान ने इस बात को कड़ाई से खारिज किया है कि ज्ञान की प्रामाणिकता इस बात से तय होती है कि अन्य इस बारे में क्या सोचते हैं या खासकर सत्तानशीं लोग क्या सोचते हैं। जैसे आम राय संभवत: यह थी कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन ऐसे कई अवलोकन थे जो इस परिकल्पना से मेल नहीं खाते थे। किनारे से दूर जाते समय जहाज़ पानी में डूबते और धीरे-धीरे गायब होते क्यों दिखते थे? इसे तभी समझा जा सकता था जब हम यह मान लें कि पृथ्वी गोल है, न कि चपटी। बहुमत की राय (majority opinion) और सत्ता की बात मानने की बजाय, परीक्षण किए गए और तर्कों की जांच की गई। इसे ही वैज्ञानिक सत्य तक पहुंचने का तरीका माना गया।

वैज्ञानिकों से उम्मीद की जाती है कि वे पारदर्शी (transparent) हों और अपने तरीके और नतीजे सबके साथ साझा करें। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे एक-दूसरे के काम की जांच करें और ऐसी समझ बनाएं जो अलग-अलग अवलोकनों और नज़रियों से मेल खाती हो। इससे कुछ हद तक एक साझा समझ बनती है। आजकल विज्ञान के कई दार्शनिक सावधानीपूर्वक यह कहते हैं कि वैज्ञानिक ऐसे नियम प्रतिपादित नहीं करते जो सार्वभौमिक हों और जिन्हें हमें अंतिम सत्य की तरह पूजना पड़े। इसकी बजाय, वैज्ञानिक संभाविताओं (scientific potential) के आधार पर सामान्यीकरण (normalization) करते हैं।

पूर्व अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर इस बात की काफी संभावना है कि पृथ्वी गोल है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आ सकते जो इस ओर इशारा करें कि पृथ्वी पूरी तरह गेंद जैसी गोल नहीं है, बल्कि इसके कुछ हिस्से चपटे हैं या कहीं ऊबड़-खाबड़ है। वास्तव में, पृथ्वी ऐसी ही है।

विज्ञान का इतिहास हमें यह भी बताता है कि वैज्ञानिक भी बाकी लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और वे ऐसी नई जानकारी को मानने से इन्कार कर सकते हैं जो उनके पहले से बने विचारों से मेल नहीं खाती।

विज्ञान के जाने-माने दार्शनिक थॉमस एस. कुन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी में तत्कालीन मान्य सिद्धांतों को चुनौती देने वाले प्रमाण होने के बावजूद वे पुराने ‘मान्य’ सिद्धांत (accepted principles and theories) अपनी जगह डटे रहे थे। नए सिद्धांतों (new principles and theories) को या तो अपवाद मानकर या अवलोकन में गलती मानकर खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ बड़े बदलावों के बाद ही नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों की जगह ले पाए। बेशक, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैज्ञानिक सत्य के इतर हर राय उतनी ही सही हो और उसे मात्र वैज्ञानिक संस्थाओं की मनमानी या सख्ती की वजह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो। वैज्ञानिक विधियों से हम वाकई काफी यकीन के साथ कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं। हम काफी हद तक यह कह सकते हैं कि कुछ सिद्धांत दूसरों के मुकाबले कम भरोसेमंद हैं। लेकिन हमें कभी भी ऐसे अडिग दावे नहीं करने चाहिए जैसा धार्मिक संस्थाएं अपनी मान्यताओं को लेकर करती हैं।

वैज्ञानिक सत्य को उन वैज्ञानिकों के एक-वाक्यीय सर्वेक्षण के नतीजों से नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने डैटा शायद ही देखा हो या न भी देखा हो और उसका विश्लेषण किया हो या न भी किया हो। इन सर्वेक्षण से जो आंकड़े मिलते हैं, वे मज़ेदार या तसल्लीबख्श हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे वास्तविकता के द्योतक हों। वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों से बात करना ज़रूरी हो सकता है जिन्होंने पेश किए गए सबूतों और दिए जा रहे तर्कों को ध्यान से देखा है, जांचा-परखा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के सर्वेक्षण और उनके आंकड़ों से महत्वपूर्ण नतीजे नहीं मिल सकते। पूर्व अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण (meta-analysis) काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, एलिज़ाबेथ लेवी पेलक और उनके साथियों ने 2021 में ऐसे 418 प्रयोगों के नतीजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया था कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को कैसे कम किया जा सकता है। उनके विश्लेषण से पता चला था कि कुछ तरीके अन्य के मुकाबले ज़्यादा असरदार होते हैं। लेकिन उन्होंने यह दावा कदापि नहीं किया कि उनके नतीजे अंतिम सत्य हैं। ऐसा करना विज्ञान की भावना के खिलाफ होता।

वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए रायशुमारी करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते हम यह दावा न करें कि उनसे वैज्ञानिक सत्य उजागर हो रहे हैं या सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलेगी। हमें हमेशा किसी वैज्ञानिक सत्य की ज़रूरत नहीं होती।

उदाहरण के लिए, साहित्य और कविता मनुष्यों के कई अहम सरोकारों को रखते और समझते हैं, जिन्हें विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण नहीं समझ सकता। फिर भी, ऐसे जनमतसंग्रह (referendum) – जो जानकारी देने से ज़्यादा मनोरंजन और तसल्ली देते हैं – उन्हें वैज्ञानिक सच की वैधता तय करने के काम से अलग रखना ही बेहतर है।

प्रमाणों की सावधानीपूर्वक की गई व्याख्या और विभिन्न अध्ययनों की बारीकी से तुलना करके ही वैज्ञानिक सत्य को सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह काम एक-वाक्य वाले सवाल-जवाबों के बस का नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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समुद्र तल में छिपे हैं शुरुआती जीवन के राज़!

लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति (origin of life) कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है।

जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) (phosphate) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए (DNA or RNA) की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया (reaction) करता है।

तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया? 

गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं (microbiology lab) में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया – डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) – मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण (oxidation) करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है।

फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया में से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।

इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एन्ज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक (catalyst) की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स

समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) (hydrothermal vents) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है।

एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम (palledium) जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।

इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट (phosphate) में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था। 

हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी (oxygen less earth) पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा।

आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन तो चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

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