वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरल तैयार किया है जिसे रोशनी या अन्य किसी ऊर्जा स्रोत के संपर्क में रखा जाए तो वह एक ऊर्जा-सघन काली जेली में बदल जाता और इस ऊर्जा को वह महीनों तक कैद रख सकता है।
दरअसल, यह जेलीनुमा पदार्थ कुछ हद तक एक बैटरी की तरह काम करता है। जैसे ही इसका संपर्क ऑक्सीजन से कराया जाता है, तो संग्रहित ऊर्जा मुक्त हो जाती है।
हाल ही में केम नामक पत्रिका में प्रकाशित यह शोध अभी टेक्नॉलॉजी के स्तर पर नहीं पहुंचा है। यह तो एक अवधारणा का प्रदर्शन मात्र है कि कैसे एक धातु-रहित पदार्थ ऊर्जा का दोहन कर सकता है, उसे संग्रहित कर सकता है और फिर से उपयोग के लिए उपलब्ध करा सकता है। यदि यह प्रयोग टेक्नॉलॉजी में तबदील होता है तो यह तरल पदार्थ हमें सेमीकंडक्टर के लिए ऊर्जा का धातु-रहित स्रोत उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। यह टेक्नॉलॉजी खास तौर से चिकित्सा उपकरणों व यंत्रों में उपयोगी साबित होगी जहां धातु-उपकरणों के उपयोग में समस्याएं होती हैं।
दरअसल, इस नए पदार्थ का विचार कोशिकीय कंकाल के व्यवहार में से उपजा है। यह कोशिकीय कंकाल कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन तंतुओं का लगातार बनता-टूटता नेटवर्क होता है। यह कोशिकाओं को गति करने और विभाजन में समर्थ बनाता है।
इस व्यवस्था को कृत्रिम तंत्र में विकसित करने के लिए नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के सेमुअल स्टुप की टीम ने एक अणु की रंचना की जिसमें दो घटक थे: एक अमीनो नेफ्थलीन एरोमैटिक इकाई (ANI) जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है; दूसरी इकाई मिथाइल वाइलोजेन (MV) की थी जो इलेक्ट्रॉन संग्रह कर सकती है। शुरुआत में यह पदार्थ एक पीला तरल होता है लेकिन जब इस पर रोशनी पड़ती है, तो ANI घटक ऊर्जा सोखता है और अपने इलेक्ट्रॉन MV को दान कर देता है। ऊर्जा के अवशोषण का परिणाम यह होता कि ये अणु टिकाऊ फीतों जैसे संकुलों में जम जाते हैं। यह जमावट काफी टिकाऊ होती है और महीनों तक बनी रह सकती है।
जैसे ही इस जेली का संपर्क ऑक्सीजन से होता है, यह वापिस तरल रूप में आ जाती है और इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। इस दौरान मुक्त ऊर्जा का उपयोग रासायनिक क्रियाओं के संचालन में किया जा सकता है, अर्थात यह एक बैटरी है। स्टुप के शब्दों में, ‘यह रोशनी को बोतल में कैद करने जैसा है।’
वैसे देखा जाए तो कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए प्रकाश को रासायनिक ऊर्जा में तबदील करने के साधन उपलब्ध हैं। जैसे फोटो-इलेक्ट्रिक सेल में प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इन्हें फिर से जोड़ें तो ऊर्जा प्राप्त मिल सकती है या जलाकर भी ऊर्जा मिल जाएगी। लेकिन स्टुप के मुताबिक उनके द्वारा विकसित प्रक्रिया उत्क्रमणीय है और इसमें धातुओं का उपयोग भी नहीं करना होता। इस मायने में यह अतीत के प्रयासों से एकदम अलग है। (स्रोत फीचर्स)
लंबे समय से प्रजनन वैज्ञानिक मानते आए हैं कि प्रजनन उम्र समाप्त होते ही महिलाओं में अंडाशय की भूमिका शून्य हो जाती है, लगभग अपेंडिक्स की तरह। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस पुरानी समझ को चुनौती दी है। फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. फ्रांसिस्का डंकन और उनकी टीम ने पाया कि रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) के बाद अंडाशय शरीर में नई जिम्मेदारी संभालने लगता है जो महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी हो सकती है।
चूहों और इंसानों के अंडाशयों पर किया गया यह अध्ययन मॉलीक्यूलर ह्यूमन रीप्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ है। दरअसल, पांच साल पहले, डॉ. डंकन ऐसी कोशिकाओं के एक अध्ययन में जुड़ी थीं जिन्होंने विभाजन करना बंद कर दिया हो (इन्हें सेनेसेंट कोशिकाएं कहते हैं)। ऐसी कोशिकाओं की संख्या ऊतकों में बढ़ती जाने के साथ जरावस्था के लक्षण प्रकट होते हैं।
इस अध्ययन के दौरान वे अंडाशय की पूरी उम्र में सेनेसेन्ट कोशिकाओं का अध्ययन करना चाहती थी। लेकिन स्वस्थ अंडाशय पर शोध संभव न होने के कारण उन्होंने रजोनिवृत्त हो चुकी (पोस्टमेनोपॉज़) 50 से 75 वर्ष की महिलाओं के अंडाशय का अध्ययन किया। इन महिलाओं के अंडाशय चिकित्सकीय कारणों से निकाले गए थे।
उन्होंने पाया कि उम्र के साथ अंडाशय में अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बन रहे थे। डॉ. डंकन कहती हैं – यदि ये अंग उम्र के साथ नए प्रोटीन बना रहा है, तो इसका मतलब है कि इसमें बढ़ती उम्र के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव आ रहे हैं। यह जानकारी पुरानी सोच से अलग और चौंकाने वाली थी, क्योंकि अगर रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय कुछ काम नहीं कर रहा होता तो उसमें उम्र के साथ कोई बदलाव नहीं आना चाहिए।
और गहराई से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों पर शोध किया। इनमें भी एक उम्र के बाद अंडाशय अंडा निर्माण बंद कर देता है, हालांकि उनमें इंसानों जैसे रजोनिवृत्ति वाले लक्षण – जैसे एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट नहीं होती।
शोधकर्ताओं ने युवा चूहों, प्रजनन काल के आखिरी दौर वाले चूहों, और प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय निकाले। प्रत्येक चूहे के एक अंडाशय के आरएनए का अनुक्रमण करके उसके जीन्स की सक्रियता मापी। वहीं, दूसरे अंडाशय में अलग-अलग कोशिकाओं को पहचानने और फाइब्रोसिस की वृद्धि मापने के लिए सूक्ष्मदर्शी से जांच की गई। फाइब्रोसिस ऊतकों के सख्त होने की प्रक्रिया है, जो बढ़ती उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से होती है।
देखा गया कि चूहों के अंडाशयों में बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्रिया से जुड़े रसायन कम हो गए थे। लेकिन प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय में युवा चूहों की तुलना में अलग-अलग तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का भंडार पाया गया।
बूढ़े चूहों के अंडाशय में ऐसे जीन भी भारी मात्रा में सक्रिय थे जो शोथ (सूजन) बढ़ाने वाले रसायन बनाते हैं। ये रसायन शरीर के रक्त प्रवाह के ज़रिए दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं।
यह शोध रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय को एक नाकारा अंग समझने के बजाय एक नई संभावना की ओर इशारा करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंडाशय अपना मूल काम (अंडा निर्माण) समाप्त होने के बाद एक नई भूमिका अपना सकता है। अनुमान है कि यदि उम्रदराज अंडाशय रक्तप्रवाह में ये शोथ बढ़ाने वाले अणु छोड़ रहे हैं तो शायद इसी कारण महिलाओं को, उम्र पुरुषों की तुलना में लंबी होने के बावजूद, बुढ़ापे के दौरान होने वाली जीर्ण बीमारियों का अधिक सामना करना पड़ता है।
कई सालों से रजोनिवृत्त महिलाओं के अंडाशय आम तौर पर किसी भी सर्जरी के दौरान निकाल दिए जाते हैं, क्योंकि प्रजनन काल खत्म होने के बाद अंडाशय को बेकार और कैंसरकारी समझा जाता रहा है। यह शोध महिलाओं के शरीर को समझने में मददगार साबित हुआ है। हालांकि अभी भी महिलाओं की शारीरिक रचना को पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए रजोनिवृत्ति के दौरान व उसके बाद में होने वाली समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करने और समझ विकसित करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)
मनुष्यों को साथियों के साथ रहना पसंद है। क्या इसके पीछे कोई जीव वैज्ञानिक कारण है? इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जानवरों और मनुष्यों पर कुछ दिलचस्प अध्ययन किए हैं। अध्ययन बताते हैं कि समूह में रहना, मिलना-जुलना केवल पसंद -नापसंद मामला नहीं है बल्कि रोटी-कपड़ा-मकान की तरह यह भी हमारे जीवन का आधार और मूल ज़रूरत है।
तंत्रिका वैज्ञानिक चूहों और मनुष्यों के मस्तिष्क पर शोध करके यह समझने की कोशिश करने में जुटे हैं कि ‘अकेलापन दुख का और अपनों का साथ खुशी का कारण क्यों है?’ वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा शरीर बदलती बाहरी परिस्थितियों के अनुसार तापमान, रक्तचाप और शरीर के तरल पदार्थों का आंतरिक संतुलन बनाए रखता है। इसे समस्थापन (होमियोस्टेसिस) कहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ठीक उसी प्रकार हमारा दिमाग भी सामाजिक जीवन और अकेलेपन के बीच संतुलन की तलाश करता है। इसे उन्होंने दिमाग की मानसिक समस्थिति (mental homeostasis) नाम दिया है। हालांकि, सामाजिक संतुलन की ज़रूरतें और सीमाएं हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। किसी को अकेले रहना ज़्यादा पसंद होगा, तो किसी को बड़े समूह या लोगों के आसपास, लोगों से मिल-जुलकर रहना पसंद होगा।
वैज्ञानिक इसे ‘अपनों के साथ की लालसा’ कहते हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत लंबे समय तक अकेले रहता है तो मस्तिष्क के एक हिस्से (हायपोथैलेमस) की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की सक्रियता के कारण अकेलापन झेल रहा व्यक्ति बेचैनी, उदासी और दुख महसूस करता है। दूसरी ओर, जब अपनों से मिलने पर अकेलापन दूर होता है तब मस्तिष्क की अन्य कोशिकाएं सक्रिय होती हैं। इससे डोपामाइन नाम का रसायन स्रावित होता है; जो वैसा ही सुखद एहसास देता है जैसा किसी भूखे को खाना मिलने पर होता है।
कुदरत में कई जीवों को विभिन्न कारणों से समूह या साथ की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से चिपककर बैठने वाले पक्षी हों, दुश्मनों से सुरक्षा के लिए रेगिस्तान में बड़े समूहों में रहने वाले मीरकैट और भोजन की तलाश/शिकार करने के लिए झुंड में रहने वाली नीलगाय, ज़ेबरा, या लक्कड़बग्घे। दूसरी ओर, कुछ जानवर ऐसे भी हैं जो ज़्यादातर अकेले रहते हैं, जैसे ओरांगुटान अकेले अपना खाना ढूंढते हैं, तेंदुए अकेले ही शिकार करते हैं।
दरअसल, वैज्ञानिक चूहों पर शोध करके यह जानना चाह रहे थे कि चूहे कब और कैसे अकेलापन महसूस करते हैं? इसके लिए उन्होंने पिंजरे के बीच में ऐसी जाली लगा दी जिससे चूहे एक-दूसरे को देख सकते थे, सुन सकते थे, सूंघ भी सकते थे – केवल छू नहीं सकते थे। परिणाम यह हुआ कि साथी चूहे सामने होते हुए भी वे अकेला और उदास महसूस कर रहे थे। उसके बाद वैज्ञानिकों ने अकेले रह रहे चूहों को दो खास सुरंग वाले रास्तों का विकल्प दिया। एक रास्ते में नर्म-मखमली चादर थी और दूसरा रास्ता सख्त था। उन्होंने पाया कि अकेलेपन से जुझ रहे चूहों ने सख्त रास्ते के बजाय नर्म-मखमली चादर वाले रास्ते को चुना। इससे यह साबित हुआ कि (चूहों में) अकेलापन दूर करने के लिए केवल देखना, सुनना या सूंघना काफी नहीं है बल्कि शारीरिक स्पर्श सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्यों और चूहों की त्वचा में खास संवेदक और इंद्रियां होती हैं जो स्नेह भरे स्पर्श से मस्तिष्क को तुरंत सक्रिय करके सुरक्षित महसूस करवाती हैं, इसे ‘स्पर्श की ताकत’ कहा गया।
वैज्ञानिकों ने नर और मादा चूहों में भी अकेलेपन के असर को देखा। उन्होंने पाया कि मादा चूहे लंबा वक्त अकेले बिताने के बाद ज़्यादा मिलनसार हो गईं। वहीं नर चूहे अकेले रहने से चिड़चिड़े, गुस्सैल, और अपने इलाके के प्रति संवेदनशील हो गए।
मनुष्यों और चूहों के गहन मस्तिष्क क्षेत्र बहुत हद तक समान हैं। इसलिए चूहों के अकेलेपन वाले व्यवहार को मनुष्यों के अकेलेपन से होने वाले व्यवहारों और समस्याओं को समझने के लिए अध्ययन किया जा रहा है।
शोध बताते हैं कि जेल की अकेली कोठरी में सज़ा काट रहे कैदियों को बहुत लंबे समय तक अकेले रहने के कारण बाहरी दुनिया से डर लगने लगता है, उनका मस्तिष्क लगातार खतरा और बेचैनी महसूस करता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ वे लोगों से मिलने और सामने आने से कतराने लगते हैं।
अकेलेपन से सेहत पर बुरा असर होने के कारण ज़िंदगी के साल भी कम होने लगते हैं। अकेलेपन से न सिर्फ मन दुखी रहता है बल्कि लंबे समय से अकेला महसूस करने वाले लोगों को दिल की बीमारी, स्ट्रोक, और कैंसर जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। यानी समय के साथ ये मानसिक और शारीरिक पीड़ा में बदल जाता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि संतुलन बनाए रखना ही अकेलेपन की समस्या का समाधान है। खुद की सामाजिक सीमाओं को पहचानकर थोड़ा समय खुद के साथ बिताएं, थोड़ा करीबी लोगों के साथ और कभी-कभी थोड़ा समय बड़े सामाजिक कार्यक्रमों में दें। इससे हर परिस्थिति में मस्तिष्क खुश रहना सीखता है। आखिर में, वैसे तो आजकल लोगों से जुड़े रहना तकनीकी साधनों से बहुत आसान हो गया है। लेकिन जब भी मौका हो, स्नेह-स्पर्श के ज़रिए अपनापन जताना हमारे तन, मन और मस्तिष्क के लिए किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)
क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर कहीं जीवन (एलियन्स) (aliens) है? इसे लेकर बहस तो चलती ही रहती है। लेकिन लोगों की उत्सुकता होती है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे सवाल हमें दिलचस्प लग सकते हैं। खासकर यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते या कहते हैं क्योंकि, कम से कम, हम यह मानते हैं कि वैज्ञानिक जो सोचते या मानते हैं वह सही होगा। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि क्या सिर्फ कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन बसता है, या सभी वैज्ञानिक यह बात मानते हैं?
ऐसी रायशुमारी (ओपिनियन पोल) (opinion poll) के ज़रिए वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए इंग्लैंड की डरहम युनिवर्सिटी (durham university) ने एक केंद्र स्थापित किया है, जिसमें किसी सवाल पर वैज्ञानिकों की राय जानी जाती है। इसका नाम है सेंटर फॉर साइंटिफिक कम्युनिटी ओपिनियन पोलिंग एंड इवैल्यूएशन (C-SCOPE)। इसे स्पष्ट और सटीक सवालों के शीघ्र और सरल जवाब पाने के हिसाब से बनाया गया है। इसके तहत 2023 में पहला सर्वेक्षण किया गया था। इसमें भारत समेत 12 देशों और 30 संस्थानों के 20,085 वैज्ञानिकों से पूछा गया था: “क्या विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि COVID-19 एक वायरस की वजह से होता है?” जवाब ‘लिकर्ट स्केल’ (likert scale) पर मांगे गए थे, जिसमें पांच विकल्प थे – पूरी तरह असहमत, असहमत, तटस्थ, सहमत, पूरी तरह सहमत। 20,085 में से 6807 वैज्ञानिकों ने सवाल के जवाब दिए थे। 93.2 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने कहा था कि वे इस बात से सहमत या पूरी तरह सहमत हैं।
यह मानना लुभावना लगता है कि यदि ज़्यादातर वैज्ञानिक किसी बात पर सहमत हैं, तो वह सत्य होनी चाहिए। या, अगर ज़्यादातर वैज्ञानिक असहमत हैं, तो वह बात असत्य होनी चाहिए। इसके बाद की गई एक अन्य रायशुमारी में एक शोध पत्र पर 494 अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों की राय ली गई थी: शोध पत्र में दावा किया गया था कि पृथ्वी से लगभग 124 प्रकाश-वर्ष दूर K2-18b नाम के एक ग्रह पर जीवन हो सकता है। इस विचार से सिर्फ 6.6 प्रतिशत लोग सहमत या पूरी तरह सहमत थे। सवाल यह है कि यदि सहमत होने वालों की संख्या इतनी कम है, तो क्या यह दावा गलत है?
रायशुमारी हमें आसानी से समझने योग्य जानकारी देती हैं। “सिर्फ 6.6 प्रतिशत वैज्ञानिक सहमत हैं!” लेकिन हमें बहुत सी ऐसी बातें नहीं पता होतीं जो उस जवाब की पृष्ठभूमि में हो सकती हैं। जैसे, यह सर्वेक्षण शोध पत्र प्रकाशित होने के महज़ 8 दिन बाद किया गया था। तो हमें पता नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल कितने अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों ने वह शोध पत्र पढ़ा होगा।
वैज्ञानिक शोध के लिहाज़ से सर्वेक्षण (survey) एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, बाकी सभी तरीकों या साधनों की तरह, इसका इस्तेमाल भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए और इनसे उतना ही मतलब निकालना चाहिए जितना वे बता सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उत्तरदाता सवालों का गलत मतलब निकाल सकते हैं – अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या COVID-19 वायरस से हुआ था, तो मुझे लग सकता है कि मुझसे पूछा जा रहा है कि क्या मैंने खुद ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे देखे हैं जो इसकी पुष्टि करते हों। तो मेरा जवाब होगा, ‘नहीं’। और ईमानदारी से कहूं तो (और वैज्ञानिक को ईमानदार होना चाहिए) मैंने उन प्रतिष्ठित जर्नल्स के शोध पत्र देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई है जिनमें COVID-19 के लिए ज़िम्मेदार जीव की पहचान की गई थी। मुझे अब भी थोड़ी शंका है कि इसके लिए वायरस ज़िम्मेदार था, लेकिन मैं इसे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से नहीं कह सकता। जैसे, सर्वेक्षण में शामिल 7 प्रतिशत लोगों ने इस बात से सहमति नहीं जताई कि कोविड-19 वायरस से हुआ था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जानकार वैज्ञानिकों के बीच कोई बड़ा मतभेद है। हो सकता है कि बात या सवाल स्पष्ट करने के लिए कुछ और सवाल पूछने की ज़रूरत हो। कभी-कभी एक वाक्य के सवालों का मतलब समझना मुश्किल हो सकता है। लोगों की राय लेने वाले किसी भी सर्वेक्षण या साक्षात्कार की यह जानी-मानी समस्या है।
हालांकि, रायशुमारी के नतीजे पढ़ना मज़ेदार होता है। और सही तरीके से ‘आपकी राय’ ली जाए, तो दिलचस्प रुझान इसमें नज़र आ सकते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक सत्य या तथ्य तय करने का तरीका नहीं हो सकता। यह एक ऐसी आपत्ति है जो सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक द्वारा सवाल समझने के तरीके या नमूने में त्रुटि से कहीं आगे की बात है। असल में, विज्ञान का विकास ही सर्वमान्य तथ्य के खिलाफ हुआ था। विज्ञान ने इस बात को कड़ाई से खारिज किया है कि ज्ञान की प्रामाणिकता इस बात से तय होती है कि अन्य इस बारे में क्या सोचते हैं या खासकर सत्तानशीं लोग क्या सोचते हैं। जैसे आम राय संभवत: यह थी कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन ऐसे कई अवलोकन थे जो इस परिकल्पना से मेल नहीं खाते थे। किनारे से दूर जाते समय जहाज़ पानी में डूबते और धीरे-धीरे गायब होते क्यों दिखते थे? इसे तभी समझा जा सकता था जब हम यह मान लें कि पृथ्वी गोल है, न कि चपटी। बहुमत की राय (majority opinion) और सत्ता की बात मानने की बजाय, परीक्षण किए गए और तर्कों की जांच की गई। इसे ही वैज्ञानिक सत्य तक पहुंचने का तरीका माना गया।
वैज्ञानिकों से उम्मीद की जाती है कि वे पारदर्शी (transparent) हों और अपने तरीके और नतीजे सबके साथ साझा करें। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे एक-दूसरे के काम की जांच करें और ऐसी समझ बनाएं जो अलग-अलग अवलोकनों और नज़रियों से मेल खाती हो। इससे कुछ हद तक एक साझा समझ बनती है। आजकल विज्ञान के कई दार्शनिक सावधानीपूर्वक यह कहते हैं कि वैज्ञानिक ऐसे नियम प्रतिपादित नहीं करते जो सार्वभौमिक हों और जिन्हें हमें अंतिम सत्य की तरह पूजना पड़े। इसकी बजाय, वैज्ञानिक संभाविताओं (scientific potential) के आधार पर सामान्यीकरण (normalization) करते हैं।
पूर्व अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर इस बात की काफी संभावना है कि पृथ्वी गोल है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आ सकते जो इस ओर इशारा करें कि पृथ्वी पूरी तरह गेंद जैसी गोल नहीं है, बल्कि इसके कुछ हिस्से चपटे हैं या कहीं ऊबड़-खाबड़ है। वास्तव में, पृथ्वी ऐसी ही है।
विज्ञान का इतिहास हमें यह भी बताता है कि वैज्ञानिक भी बाकी लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और वे ऐसी नई जानकारी को मानने से इन्कार कर सकते हैं जो उनके पहले से बने विचारों से मेल नहीं खाती।
विज्ञान के जाने-माने दार्शनिक थॉमस एस. कुन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी में तत्कालीन मान्य सिद्धांतों को चुनौती देने वाले प्रमाण होने के बावजूद वे पुराने ‘मान्य’ सिद्धांत (accepted principles and theories) अपनी जगह डटे रहे थे। नए सिद्धांतों (new principles and theories) को या तो अपवाद मानकर या अवलोकन में गलती मानकर खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ बड़े बदलावों के बाद ही नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों की जगह ले पाए। बेशक, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैज्ञानिक सत्य के इतर हर राय उतनी ही सही हो और उसे मात्र वैज्ञानिक संस्थाओं की मनमानी या सख्ती की वजह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो। वैज्ञानिक विधियों से हम वाकई काफी यकीन के साथ कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं। हम काफी हद तक यह कह सकते हैं कि कुछ सिद्धांत दूसरों के मुकाबले कम भरोसेमंद हैं। लेकिन हमें कभी भी ऐसे अडिग दावे नहीं करने चाहिए जैसा धार्मिक संस्थाएं अपनी मान्यताओं को लेकर करती हैं।
वैज्ञानिक सत्य को उन वैज्ञानिकों के एक-वाक्यीय सर्वेक्षण के नतीजों से नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने डैटा शायद ही देखा हो या न भी देखा हो और उसका विश्लेषण किया हो या न भी किया हो। इन सर्वेक्षण से जो आंकड़े मिलते हैं, वे मज़ेदार या तसल्लीबख्श हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे वास्तविकता के द्योतक हों। वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों से बात करना ज़रूरी हो सकता है जिन्होंने पेश किए गए सबूतों और दिए जा रहे तर्कों को ध्यान से देखा है, जांचा-परखा है।
इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के सर्वेक्षण और उनके आंकड़ों से महत्वपूर्ण नतीजे नहीं मिल सकते। पूर्व अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण (meta-analysis) काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, एलिज़ाबेथ लेवी पेलक और उनके साथियों ने 2021 में ऐसे 418 प्रयोगों के नतीजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया था कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को कैसे कम किया जा सकता है। उनके विश्लेषण से पता चला था कि कुछ तरीके अन्य के मुकाबले ज़्यादा असरदार होते हैं। लेकिन उन्होंने यह दावा कदापि नहीं किया कि उनके नतीजे अंतिम सत्य हैं। ऐसा करना विज्ञान की भावना के खिलाफ होता।
वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए रायशुमारी करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते हम यह दावा न करें कि उनसे वैज्ञानिक सत्य उजागर हो रहे हैं या सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलेगी। हमें हमेशा किसी वैज्ञानिक सत्य की ज़रूरत नहीं होती।
उदाहरण के लिए, साहित्य और कविता मनुष्यों के कई अहम सरोकारों को रखते और समझते हैं, जिन्हें विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण नहीं समझ सकता। फिर भी, ऐसे जनमतसंग्रह (referendum) – जो जानकारी देने से ज़्यादा मनोरंजन और तसल्ली देते हैं – उन्हें वैज्ञानिक सच की वैधता तय करने के काम से अलग रखना ही बेहतर है।
प्रमाणों की सावधानीपूर्वक की गई व्याख्या और विभिन्न अध्ययनों की बारीकी से तुलना करके ही वैज्ञानिक सत्य को सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह काम एक-वाक्य वाले सवाल-जवाबों के बस का नहीं है।(स्रोत फीचर्स)
लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति (origin of life) कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है।
जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) (phosphate) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए (DNA or RNA) की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया (reaction) करता है।
तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया?
गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं (microbiology lab) में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया – डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) – मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण (oxidation) करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।
जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है।
फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया में से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।
इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एन्ज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक (catalyst) की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी।
हाइड्रोथर्मल वेंट्स
समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) (hydrothermal vents) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है।
एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम (palledium) जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।
इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट (phosphate) में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था।
हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी (oxygen less earth) पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा।
आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन तो चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)
वीनस फ्लाईट्रैप (Dionaea muscipula) उन चुनिंदा पौधों में शुमार है जो कीटों को अपना शिकार बनाते हैं और उनसे अपना कुछ पोषण हासिल करते हैं। वीनस फ्लाईट्रैप (venus flytrap) अमेरीका के उत्तरी और दक्षिणी कैरोलिना के दलदली इलाके में पाया जाता है। चूंकि इन दलदली इलाकों (wetlands) की मिट्टी में कुछ विशेष पोषक तत्व कम होते हैं इसलिए यह पौधा भरपाई लिए कीटों का शिकार करता है। वैसे तो इस मशहूर कीटभक्षी पौधे का अपने शिकार को पकड़ने का तरीका सर्वविदित है। लेकिन यही तरीका वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बनाए हुए है।
दरअसल, वीनस फ्लाईट्रैप ज़मीन सटकर लगने वाला पौधा है। जिसमें लगभग भूमिगत गांठ-नुमा संरचना (तना) से रोज़ेट जैसी आकृति बनाती 4 से 7 पत्तियां निकली होती हैं, जिनकी अधिकतम लंबाई 10 सेंटीमीटर तक जाती है। इसकी पत्तियां दो खंडों में बंटी होती हैं। पत्ती का निचला भाग सामान्य पत्ती की तरह होता है और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करता है। पत्ती के ऊपरी छोर पर शिकंजे (ट्रैप) होते हैं, जो शिकार को पकड़ने का काम करते हैं। जैसे-जैसे पत्ती लंबी और परिपक्व होती जाती है, ये शिकंजे भी परिपक्व होते जाते हैं।
परिपक्व शिकंजे शिकार पकड़ते हैं। शिकंजा हरे-लाल रंग के दो अर्ध-अंडाकार पाटों से बने होते हैं जो एक कब्जे-नुमा संरचना से जुड़े होते हैं। इनके सिरों पर कांटे-नुमा (needle-like) नुकीली संरचनाएं होती हैं, और दो अंदर की सतह पर रोम जैसी संरचनाएं होती हैं। सामान्य स्थिति में ये शिकंजा तने हुए, बाहर को थोड़ा मुड़कर (घुमाव लिए) खुले रहते हैं। किसी कीट के शिकंजा की अंदरुनी सतह पर बैठने का संकेत मिलता है तो दोनों पाट झट से बंद हो जाते हैं और कीट बेचारा फंस जाता है। पत्तियों के बंद होने की गति बहुत तेज़ होती है, कीट के बैठे होने का संकेत मिलने के सेकंड के दसवें हिस्से के भीतर ये बंद हो जाती है। और इसी गति ने वैज्ञानिकों को उलझा रखा है।
वे दशकों से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर शिकंजा इतनी तेज़ी से बंद कैसे हो जाता है। कुछ अध्ययनों ने बताया था कि जब कीट शिकंजा पर मौजूद रोम-नुमा संरचनाओं को छूते हैं, तो पत्ती में विद्युत संकेत (electric current) संचारित होता है, जिससे वह अपने शिकार को पकड़ने और पचाने के लिए हरकत में आ जाती है। फिर 2005 में, फ्रांस की ऐक्स-मार्सेली युनिवर्सिटी के भौतिक शास्त्री योएल फॉर्टेरे और उनके साथियों ने बताया था कि जब शिकंजा खुली स्थिति में होता है, यानी उसके दोनों पाट बाहर की तरफ मुड़े हुए होते हैं, तो वे तनाव की स्थिति में होते हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर बैठता है, तो यह तनाव अचानक खत्म हो जाता है — जिससे दोनों हिस्से अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं और कीट की शामत आ जाती है।
हाल ही में उन्होंने रहस्य को सुलझाने में एक कदम और बढ़ाया गया है। उन्होंने पता लगा लिया है कि यह तनाव टूटता कैसे है। दरअसल, इस सम्बंध में वैज्ञानिकों के बीच दो मत थे कि शिकंजा का यह तनाव खत्म कैसे होता है। एक मत के अनुसार, पानी शिकंजा की अंदरूनी सतह से बाहरी सतह की एपिडर्मल कोशिकाओं (epidermal cells) में तेज़ी से जाता है, जिससे सूजन आती है और तनाव खत्म होता है। दूसरे मत के अनुसार बाहरी एपिडर्मल कोशिकाओं की सख्त भित्ति अचानक नरम पड़ जाती हैं, जिससे तनाव खत्म हो जाता है।
फॉर्टेरे और उनकी टीम ने सैकड़ों फ्लाईट्रैप पौधों पर दोनों संभावनाओं को जांचने के लिए अलग-अलग कई प्रयोग किए। पाया कि कोशिकाओं की भित्ति (membrane) नरम पड़ने के कारण तनाव खत्म होता है।
क्या वास्तव में पानी के बहाव के कारण तनाव खत्म होता है? इस संभावना को जांचने के लिए उन्होंने अंदरूनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पानी के पहुंचने का समय मापा। पाया कि पानी को अंदरुनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पहुंचने में 30 से 150 सेकंड लगते हैं — यह समय शिकंजा के झटके से बंद होने की गति से कई गुना अधिक है, इसलिए यह वजह तो नहीं लगती।
दूसरी संभावना को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने शिकंजा की एपिडर्मल कोशिकाओं के तनाव को मापा और पाया कि यह तनाव खत्म होने कारण ही शिकंजा बंद होता है। यानी जब कोई कीट शिकंजा पर रेंगता है तो शिकंजा की बाहरी सतह पर मौजूद कोशिकाएं नरम पड़ जाती हैं और शिकंजा बंद हो जाता है।
हालांकि, शोधकर्ता एकदम सटीक जवाब पर अब भी नहीं पहुंचे हैं। यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि शिकंजा की कोशिका भित्ति को क्या चीज़ नरम करती है। लेकिन साइंस जर्नल में उन्होंने इसके कुछ संभावित कारणों की ओर इशारा किया है। इसके अनुसार, पौधों की कोशिका भित्ति नरम जेल जैसे मैट्रिक्स और सख्त रेशों के जाल से बनी होती हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर आता है तो कुछ एंज़ाइम्स (enzymes) स्रावित होते हैं, जो रेशों और मैट्रिक्स के बीच के जोड़ों को कमज़ोर कर देते हैं और वे नरम पड़ जाते हैं और तनाव खत्म हो जाता है।
वैसे वैज्ञानिक तो अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अनसुलझी गुत्थियां सुलझाते रहते हैं। लेकिन जिज्ञासा के साथ-साथ स्वार्थ भी चलता है। ऐसी उम्मीद जगी है कि शिकंजा बंद होने की प्रक्रिया को अच्छी तरह समझकर मनुष्य के लिए काम आने वाले रोबोट को बेहतर और लचीला (flexible) बनाया जा सकेगा: इस कार्यप्रणाली के आधार पर ऐसे रोबोट बनाए जा सकते हैं जो ज़रूरत पड़ने पर सख्त से नरम पड़ जाएं, या नरम से सख्त। (स्रोत फीचर्स)
पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नामक प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, जिसमें वे सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया करवाते हैं और कार्बोहायड्रेट बनाते हैं। लेकिन मनुष्यों समेत सभी जंतुओं के पास इस क्रिया के लिए ज़रूरी आणविक मशीनरी नहीं होती।
अब एक अनुसंधान दल ने चूहों और मनुष्यों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण करने वाली संरचना जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली है। इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। लेकिन यह मत सोचिए कि ये कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषण करके कार्बोहायड्रेट बनाकर हमें पोषण प्रदान करेंगी। ये तो हमें मात्र शुष्क आंख (dry eyes) की समस्या से छुटकारा दिलाएंगी।
सेल नामक शोध पत्रिका में सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के डेविड ताई लियोंग और कुओरान ज़िंग ने बताया है कि उनकी इस रणनीति से आंखों की कोशिकाएं एक ऐसा अणु बनाने लगीं जो शोथ में राहत देता है। इसके अलावा प्रकाश संश्लेषी मशीनरी जोड़ने के बाद शुष्क आंखों की वजह से होने वाली क्षति भी दुरुस्त हो गई।
वैसे तो प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता सिर्फ पौधों, शैवाल और कुछ सूक्ष्मजीवों में ही पाई जाती है। लेकिन कुछ समुद्री स्लग्स हैं जो शैवालों का क्लोरोप्लास्ट चुराकर कुछ अतिरिक्त पोषण प्राप्त कर लेते हैं। गौरतलब है कि क्लोरोप्लास्ट (chloroplast) ही वह कोशिकांग होता है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।
इस सिलसिले में दो साल पहले टोक्यो विश्वविद्यालय (Tokyo university) के साचीहिरो मात्सुनागा की टीम ने यही करामात प्रयोगशाला में की थी। उन्होंने एक पूरा क्लोरोप्लास्ट मानव कोशिका में प्रत्यारोपित करके उसे दो दिन तक कामकाजी बनाए रखा था।
फिर कई अन्य शोधकर्ता सोचने लगे कि यदि हमारी कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की थोड़ी-बहुत क्षमता जोड़ दी जाए, तो वे ऐसे अणु बनाने लगेंगी जिनसे ऊर्जा मिलेगी या शोथ हल्का पड़ जाएगा।
मसलन, 2022 में चीन के एक दल ने गठिया पीड़ित चूहों के घुटनों के जोड़ में कुछ कण इंजेक्ट किए जिनमें प्रकाश संश्लेषी मशीनरी के कुछ हिस्से थे। शोधकर्ताओं ने नेचर में रिपोर्ट किया था कि इन चूहों के घुटनों में उपास्थियों की क्षति धीमी पड़ गई थी। दिक्कत यह है कि हमारे घुटनों को धूप बहुत कम मिलती है। इन चूहों को प्रतिदिन आधे घंटे लाल रोशनी में रखने पर ही उपरोक्त लाभ मिल पाया था।
अलबत्ता, आंखों की बात अलग है। उन पर तो दिन भर रोशनी पड़ती है। तो वर्तमान अध्ययन में लियोंग और ज़िंग ने पालक में से प्रकाश संश्लेषण मशीनरी के प्रमुख हिस्से (थाएलेकॉइड) पृथक किए। इन तश्तरीनुमा रचनाओं में क्लोरोफिल तथा ऊर्जा को कैद करने के लिए ज़रूरी अणु पाए जाते हैं। पूर्व के अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने थाएलेकॉइड (thylakoid) के टुकड़ों का इस्तेमाल किया था। लेकिन लियोंग और ज़िंग की टीम ने पूरे के पूरे थायलेकॉइड निकाले और उन्हें छोटे-छोटे कणों में पैक कर दिया।
वैसे तो प्रकाश संश्लेषण का अंतिम उत्पाद ऊर्जा से भरपूर ग्लूकोज़ होता है लेकिन शोधकर्ताओं की रुचि इस प्रक्रिया के दो मध्यवर्ती अणुओं में थी – एटीपी और एनएडीपीएच। ये दोनों ही शोथ को कम कर सकते हैं और तथाकथित ऑक्सीडेंट्स से निजात पाने में कोशिकाओं की मदद कर सकते हैं। रोचक बात है कि शोधकर्ताओं ने पालक आधारित इस पदार्थ को नाम दिया है लीफ (लाइट रिएक्शन एनरिच्ड थायलेकॉइड एनएडीपीएच फाउंड्री – LEAF)।
शोधकर्ताओं का ख्याल था कि कोशिकाओं में एनएडीपीएच (NADPH) का उत्पादन बढ़ने से शुष्क आंख समस्या में मदद मिलेगी। शुष्क आंख समस्या में होता यह है कि पर्याप्त मात्रा में आंसू नहीं बनते जो आंखों में स्नेहक (लुब्रिकेशन) दे सकें। कभी-कभी आंसू बहुत गाढ़े बनते हैं। परिणाम यह होता है कि आंख की सतह में क्षति होने लगती है।
प्रयोग के दौरान चूहों की कल्चर्ड कोशिकाओं ने थायलेकॉइड को अवशोषित कर लिया और ज़्यादा एनएडीपीएच बनाने लगी। टीम ने यह भी देखा कि लीफ प्रदान करने पर शोथ सम्बंधी जीन्स की सक्रियता कम हुई और शोथ से लड़ने वाले तथा ऑक्सीकारकों से निपटने वाले जीन्स की सक्रियता बढ़ी। मानव कॉर्निया (human cornea) से ली गई मानव कोशिकाओं पर भी ऐसे ही असर देखे गए।
ऐसे ही प्रयोग जीवित चूहों पर करने पर LEAF का लाभदायक असर देखने को मिला। अब बारी है इंसानों पर परीक्षणों की। उससे पहले इस उपचार की सुरक्षा व दीर्घावधि असर पर भी विचार करना होगा।(स्रोत फीचर्स)
कोलोसल बायोसाइन्स नाम की एक कंपनी ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो विलुप्त पक्षियों (Extinct Birds) को वापिस अस्तित्व में ला सकेगी और जोखिमग्रस्त पक्षियों को बचा सकेगी। हालांकि यह तकनीक और इसकी बारीकियों को कहीं प्रकाशित नहीं किया गया है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
तकनीक क्या है?
मुर्गी द्वारा अंडा देने के 24-48 घंटे के अंदर उस अंडे में मौजूद सारी सामग्री (निषेचित भ्रूण सहित, लेकिन बाहरी खोल नहीं) एक कृत्रिम अंडे (Artificial Egg) में डाल दी जाती है। इसके बाद का सारा विकास कृत्रिम अंडे के अंदर होता है।
कृत्रिम अंडा 3-डी प्रिंटिंग विधि (3-D Printing Method) से बनाई गई एक षट्कोण फ्रेम (Hexagonal Frame) होती है, जिसमें अंदर सिलिकॉन की झिल्ली (Silicon Membrane) का अस्तर होता है। असली अंडे की खोल के समान यह नमी को बनाए रखती है, ऑक्सीजन को अंदर जाने देती है और बैक्टीरिया को अंदर नहीं जाने देती। भ्रूण के लिए पोषण की व्यवस्था मूल अंडे की सामग्री से होती है। इस जुगाड़ का उपयोग करके लगभग 2 दर्ज़न चूज़ों को विकसित किया जा चुका है। अब कोलोसल को उम्मीद है कि वह इसकी मदद से दक्षिणी द्वीप पर कभी पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी मोआ (Dinornis robustus) को पुनर्जीवन देगी। न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 3 मीटर ऊंचा यह पक्षी पंद्रहवीं शताब्दी में विलुप्त हो गया था। इसके अंडे लगभग फुटबॉल के आकार के होते थे।
प्रेस विज्ञप्ति को देखकर वैज्ञानिकों को लगता है कि कोलोसल का यह आविष्कार शायद एक बड़ा कदम साबित होगा। वैसे इस तरह से कृत्रिम परिवेश में भ्रूण को विकसित करके चूज़े पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं।
जैसे 1998 में ऐसा पहला सफल प्रयास हुआ था। जापान के युताका तहारा, कात्सुया ओबारा और मासामिची कामिहिरा के दल ने एक कुदरती तौर पर निषेचित अंडे को पहले दो दिन तक कुदरती रूप से इन्क्यूबेशन (Incubation) बाद उसके अंदर की सामग्री को कांच के मर्तबान में रख दिया गया था। साथ में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) डाला गया था जो खोल निर्माण के लिए ज़रूरी होता है। इसी तरह के अगले प्रयास में पारदर्शी प्लास्टिक प्यालों का उपयोग किया गया था। इसमें मुर्गी द्वारा अंडा देने के तुरंत बाद भ्रूण (Fetus) को कृत्रिम अंडे में रख दिया गया था। गौरतलब है कि तहारा एक हाई स्कूल शिक्षक हैं और वे अपने छात्रों के साथ यह प्रयोग करते रहते हैं।
दरअसल, कोलोसल के कृत्रिम अंडे की एक खासियत है वह झिल्ली जो उसने विकसित की है। इसके चलते भ्रूण का विकास ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा पर होता है जबकि तहारा और साथियों ने जो कृत्रिम अंडा बनाया था उसमें ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह से ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। कोलोसल द्वारा विकसित कृत्रिम अंडे की एक विशेषता यह है कि उसमें ऊपर एक पारदर्शी झरोखा है जिसके ज़रिए भ्रूण के विकास (Fetus Development) पर नज़र रखी जा सकती है।
विकसित होते अंडे का सतत निरीक्षण इसलिए भी ज़रूरी होगा कि विलुप्त पक्षियों के जीन्स में संशोधन किए जाएंगे और उनके असर पर नज़र रखनी होगी।
कुल मिलाकर माना जा रहा है कि भ्रूण विकास में कृत्रिम अंडों के निर्माण में हम आगे तो बढ़े हैं, लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। (स्रोत फीचर्स)
वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।
हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।
इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।
बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।
पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।
एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के गैबर एगरवैरी और उनके साथियों ने चूहों (Rodents) पर कुछ मज़ेदार प्रयोग करके बताया है कि एक यौगिक (Metabolic Byproduct) है एसिटेट जो उनकी याददाश्त को सुदृढ़ करता है और यह असर सिर्फ मादा चूहों पर होता है। जिस यौगिक की बात हो रही है वह आम तौर पर शरीर में अल्कोहल, ग्लूकोज़ और अधिक रेशेदार खाद्य पदार्थों के विघटन से बनता है।
याददाश्त सम्बंधी दो प्रयोग किए गए थे। पहले प्रयोग में चूहों को दो समान वस्तुओं के साथ 10 मिनट तक खेलने दिया गया। फिर चौबीस घंटे बाद चूहों को उन्हीं वस्तुओं के संपर्क में लाया गया। लेकिन इस बार एक वस्तु की जगह बदल दी गई थी। विचार यह था कि यदि चूहे की याददाश्त अक्षुण्ण रही तो वह समझ जाएगा कि एक वस्तु की जगह बदली गई है। दूसरी ओर, यदि याददाश्त अस्त-व्यस्त हुई होगी तो वे दोनों वस्तुओं के साथ बराबर समय बिताएंगे। चूहों ने नई जगह पर रखी वस्तु से साथ ज़्यादा समय बिताया। यानी पहली बात (अक्षुण्ण याददाश्त) सही है।
दूसरे प्रयोग में चूहों को एक बार फिर दो एक-सी वस्तुओं के साथ 10 मिनट के लिए छोड़ा गया। 24 घंटे बाद वस्तुएं फिर से रखी गईं लेकिन इस बार एक वस्तु बदल दी गई थी। देखा यह गया था कि क्या चूहे नई वस्तु पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, यानी उस पर ज़्यादा समय बिताते हैं।
देखा गया कि जिन मादा चूहों को एसिटेट (Acetate) का इंजेक्शन दिया गया था उन्होंने अन्य के मुकाबले (जिन्हें प्लेसिबो इंजेक्शन दिया गया था) इन दोनों कार्यों में बेहतर प्रदर्शन किया। अलबत्ता, रोचक बात यह रही कि नर चूहों (Male Rodents) में कोई फर्क नज़र नहीं आया।
शोधकर्ताओं को पता चला है कि एसिटेट मस्तिष्क में जीन्स की अभिव्यक्ति (Gene Expression) को प्रभावित करता है। वह हिस्टोन प्रोटीन्स (Histone Proteins) में परिवर्तन कर देता है। हिस्टोन्स वे प्रोटीन होते हैं जिनके इर्द-गिर्द डीएनए (DNA) कसकर लिपटा होता है। जब हिस्टोन पर एसिटेट समूह जुड़ जाते हैं तो यह लिपटना थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसकी वजह से कई जीन्स और कोशिका की आणविक मशीनरी के बीच संपर्क आसान हो जाते हैं। ऐसे में ये जीन्स सक्रिय रहते हैं।
शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे हिस्टोन परिवर्तन देखे जिनका सम्बंध दीर्घावधि याददाश्त (Long term memory) से जाना-माना है। इसके अलावा एसिटेट ने मादा चूहों के मस्तिष्क के सीखने से सम्बंधित हिस्सों में भी जीन्स की अभिव्यक्ति पर असर डाला था।
एक तो यह महत्वपूर्ण बात रही कि फर्क सिर्फ मादा चूहों (Female Rodents) की स्मृति (Memory) पर दिखा। दूसरी बात और भी महत्वपूर्ण है। साइन्स सिग्नलिंग पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि एसिटेट तभी कारगर होता है जब मस्तिष्क में तंत्रिका गतिविधि को सीखने की किसी प्रक्रिया के दौरान सक्रिय कियी जाए; यह आम याददाश्त सुदृढ़ीकरण का तरीका नहीं है। (स्रोत फीचर्स)