एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता

पाठ्यपुस्तकों में तो हमने यही पढ़ा है कि किसी व्यक्ति की सारी कोशिकाएं जेनेटिक रूप से हू-ब-हू एक जैसी होती है। यह ज़रूर संभव है कि कोशिकाओं में डीएनए की अभिव्यक्ति अलग-अलग हो लेकिन सूचना का भंडार एक ही रहता है। यह भी बताया जाता है कि उम्र के साथ डीएनए के आसपास एपिजेनेटिक परिवर्तन (epigenetic changes) होते रहते हैं, जिनकी वजह से उसके कामकाज पर असर होता है। लेकिन हाल में एक 74 वर्षीय व्यक्ति की 100 अलग-अलग कोशिकाओं के पूरे जीनोम के विश्लेषण (genome analysis) ने हैरतअंगेज़ परिणाम प्रदान किए हैं।

इन 100 कोशिकाओं में से किसी में गुणसूत्र में एक अतिरिक्त भुजा थी, किसी में डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े एक-दूसरे से भिन्न थे, विलोपित हो गए थे या दोहरे हो गए थे। कुछ कोशिकाओं में तो Y गुणसूत्र पूरी तरह नदारद (Y chromosome loss) था। बायोआर्काइव्स-1 में प्रकाशित शोध पत्र के एक लेखक हारवर्ड मेडिकल स्कूल के जो लुक्वेट कहते हैं कि कुछ कोशिकाएं तो एकदम गड्ड-मड्ड थीं।

दरअसल, एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता (genetic variation) का अध्ययन एक अहम सरोकार रहा है। कारण यह है कि एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं के बीच जेनेटिक भिन्नता (मोसेइसिज़्म या पच्चीकारिता) का असर स्वास्थ्य और कैंसर जैसी कई बीमारियों पर होता है।

जब व्यक्ति के शरीर की सारी कोशिकाएं एक ही मूल कोशिका (जॉ़यगोट) से बनी हैं, तो यह विविधता कहां से आती है। इन विविधताओं के कई स्रोत हो सकते हैं – जैसे डीएनए के प्रतिलिपिकरण या मरम्मत के दौरान होने वाली त्रुटियां, या डीएनए को क्षति पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों (पराबैंगनी प्रकाश या धूम्रपान – UV radiation, smoking) का असर।

वैसे तो इन बातों का अंदाज़ा पहले से था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डीएनए के अनुक्रमण (DNA sequencing technology) की टेक्नॉलॉजी में बहुत तरक्की हुई है। इससे यह समझने में मदद मिली है कि मोसेइसिज़्म कितना सामान्य है और यह स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, कुछ कोशिकाओं में लंबे समय में संग्रहित उत्परिवर्तन कैंसर का कारण बन सकते हैं। रक्त कोशिकाओं में Y गुणसूत्र का अभाव (Y chromosome deletion) कार्डियोवैस्कुलर रोगों और हार्ट अटैक (heart disease risk) से जुड़ा पाया गया है।

अब तक इन अंतरों का मानचित्र तैयार करके यह देख पाना मुश्किल था कि ये जीवन के किस पड़ाव में पैदा होते हैं। कारण यह है कि अधिकांश जीनोम अध्ययनों में कई सारी कोशिकाओं का डीएनए एक साथ निकालकर थोक में अनुक्रमण किया जाता है। तब एक प्रारूपिक जीनोम सामने आता है और एक-एक कोशिका में डीएनए की स्थिति नहीं दिखती। इसके अलावा, एक-एक कोशिका के जीनोम विश्लेषण के तरीके (single-cell genome analysis) परिष्कृत हुए हैं लेकिन आम तौर पर इन आधुनिक तकनीकों का उपयोग डीएनए नहीं बल्कि आरएनए के अध्ययन हेतु किया गया है। बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल की डिआने शाओ के मुताबिक इसका कारण यह है कि किसी भी कोशिका में आरएनए की तो कई प्रतियां एक साथ मौजूद होती हैं लेकिन डीएनए की दो ही प्रतियां पाई जाती हैं। वर्तमान अध्ययन ने इस चुनौती को स्वीकार करके आगे की राह दिखाई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw1200/magazine-assets/d41586-025-03768-0/d41586-025-03768-0_51720290.jpg

चैथम द्वीप पर प्राचीन नौका के अवशेष मिले

ह अगस्त 2024 की बात है। चैथम द्वीपसमूह (Chatham Islands) के प्रमुख द्वीप के निवासी मछुआरा निकाऊ डिक्स ने चैथम चौपाटी से इमारती लकड़ी के कुछ टुकड़े जुटाए थे। तब उन्हें भान नहीं था कि वे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज (archaeological discovery) कर रहे हैं। ये टुकड़े भारी बारिश के कारण खाड़ी से बहकर चौपाटी पर आ गए थे। अलबत्ता, वे जल्दी ही समझ गए कि ये कोई साधारण टुकड़े नहीं थे। जोड़ने पर इन्होंने एक नौका (ancient boat) का आकार ले लिया और जब वे वापिस वहां लौटे तो उन्हें लकड़ी का एक और टुकड़ा मिला जिस पर उभरे हुए खांचों की एक लड़ी थी।

उसके बाद से पुरातत्ववेत्ताओं ने उस स्थान से 450 मानव-निर्मित वस्तुएं खोजी हैं। इनमें 5 मीटर का एक पटिया है, जिसमें सुराख हैं और कई सारे छोटे-छोटे तराशे हुए लकड़ी टुकड़े हैं जिन्हें घोंघों के कवच और लावाजनित पत्थरों से सजाया गया था। इसके आसपास ही उन्हें गुंथी हुई रस्सियां भी मिलीं और लौकी की एक चिप्पी। अब वे जान गए हैं कि चौपाटी के रेत में शायद एक समूची नौका (Polynesian vaka boat) दबी हो सकती है, जिसे स्थानीय पोलीनेशियन भाषा में वाका कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन डेटिंग (radiocarbon dating)  की मदद से वाका पर चिपके रेशों की उम्र पता की है। ये रेशे 1440 से 1470 ईस्वीं के बीच के हैं। यह लगभग वही समय था जब चैथम के प्रमुख द्वीप रिकाहू पर मानव बसाहट के प्रथम अवशेष मिले हैं। देशज मोरिओरी लोग (Moriori people) इस द्वीप को इसी नाम से जानते हैं।

हवाई विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता पैट्रिक किर्क का कहना है कि लकड़ी से बनी नौका या उसके टुकड़े मिलना बहुत बिरली बात है और हर बार ऐसी खोज महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनका कहना है कि इनका काल 15वीं सदी का है, तो यह उस समय की पोलीनेशियन समुद्री यात्राओं (Polynesian navigation) का अहम प्रमाण है। वैसे काल निर्धारण अभी पक्का नहीं है लेकिन अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जस्टिन मैक्सवेल को लगता है कि इन मानव-निर्मित चीज़ों का उम्दा कुदरती परिरक्षण हुआ है और उनमें सामग्री की भरपूर विविधता दिखती है। इसके अलावा, मोरिओरी लोग इनके बारे में मौखिक परंपराओं की बातें जोड़ सकते हैं। इन सब कारणों के चलते यह खोज असाधारण है।

इससे पहले मैक्सवेल ने रिकाहू पर पहली बस्तियों का काल निर्धारण 1450 से 1650 ईस्वीं किया था। उसके लिए उन्होंने चारकोल और परागकणों के रिकॉर्ड का सहारा लिया था। रस्सी का एक टुकड़ा तो 1415 ईस्वीं का है जो इन स्थलों से भी पुराना है। और नौका के पास लौकी का टुकड़ा तो शायद 1400 ईस्वीं के आसपास का है। अलबत्ता, मैक्सवेल का मत है कि ये तारीखें सिर्फ इतना बताती (archaeological analysis) हैं कि इस वाका का आखरी उपयोग कब हुआ था; यह पता नहीं चलता कि इसे कब बनाया गया था।

अध्ययन की खास बात यह रही कि आदिवासी मुखियाओं ने वाका की लकड़ी और रेशों का काल निर्धारण करने की अनुमति दे दी थी किंतु वे अभी भी विचार कर रहे हैं कि और नमूने लेने की अनुमति दें या न दें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z6k1f44/full/_20251124_on_chathamislandlede.jpg

प्राचीन आरएनए हासिल किया जा सका

पिछले कुछ दशकों से वैज्ञानिक प्राचीन डीएनए का विश्लेषण (ancient DNA research) कर अतीत के जीवन के बारे में, उद्विकास (evolution studies) के बारे में समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अकेले डीएनए पर मौजूद जीन्स आधी-अधूरी कहानी बता पाते हैं। डीएनए वह अणु होता है जिसमें किसी जीव के निर्माण व कामकाज की सारी सूचना क्षारों के क्रम के रूप में मौजूद होती है। इस डीएनए के छोटे-छोटे अनुक्रम (जीन्स) के आधार पर कोशिकाओं में एक अन्य अणु बनाया जाता है जिसे आरएनए कहते हैं। आरएनए ही कोशिकाओं में प्रोटीन बनवाने (RNA sequencing) का काम करता है।

किसी जीवित जीव में कोई जीन कब और कहां सक्रिय होता है, उससे उस जीव की समझ बनाने पर बहुत फर्क पड़ सकता है। और यह जानकारी कि कोई जीन कब और कहां सक्रिय हुआ है आरएनए में दर्ज होती है। दिक्कत यह है कि आरएनए तो डीएनए से भी जल्दी अपघटित हो जाता है; कारण है उसकी नाज़ुक बनावट और उसको अपघटित करने वाले एंज़ाइम। पाठ्यपुस्तकों की ज़ुबानी, “मृत्यु के कुछ ही मिनटों या घंटों के भीतर आरएनए बरबाद हो जाता है।” इसलिए प्राचीन नमूनों से आरएनए हासिल (ancient RNA samples) करने के गिने-चुने प्रयास ही हुए हैं।

और ये प्रयास भी पिछले कुछ सालों में ही हुए हैं। सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को पुराने मक्के और जौ के बीजों से और पर्माफ्रॉस्ट में जमे भेड़िये के ऊतक से आरएनए के खंड हासिल करने में सफलता मिली। फिर 2023 में, कुछ वैज्ञानिकों ने 132 साल पुराने तस्मानियाई टाइगर (बिल्ली जैसा मार्सुपियल) का आरएनए (Tasmanian tiger RNA) हासिल कर उसका अनुक्रमण किया। और इन्ही नतीजों से प्रेरित होकर हालिया अध्ययन किया गया (RNA preservation)

अध्ययन में, स्टॉकहोम युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी लव डालेन ने रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 10 प्राचीन वुली मैमथ (हाथी जैसा झबरीला जानवर) (woolly mammoth RNA) के ऊतकों से आरएनए हासिल करने का प्रयास किया। ये नमूने पूरे मैमथ के नहीं बल्कि छोटे-छोटे टुकड़े थे। यानी आरएनए ढूंढने का मौका भी बस आर-पार की स्थिति जैसा था।

अच्छी बात कि वे इन नमूनों से ठीक-ठीक हालत में आरएनए हासिल कर पाए। उन्होंने एंज़ाइम की मदद से आरएनए अणु से डीएनए की शृंखलाएं बनाईं, फिर उन डीएनए का अनुक्रमण किया। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया कि उन आरएनए में अनुक्रम कैसा रहा होगा। वे 10 मैमथ में से तीन मैमथ के प्राचीन आरएनए पहचान पाए (genome reconstruction); ये 39,000 से 52,000 साल प्राचीन थे।

हालांकि इन मैमथ से अधिकतर आरएनए टूटी-फूटी हालत में मिले थे, लेकिन एक मैमथ जिसका नाम यूका रखा गया है, से काफी जानकारी मिल सकी। एक तो, कुछ ऐसे आरएनए अनुक्रम मिले जो सिर्फ वाय क्रोमोसोम (Y chromosome genes) पर पाए जाने वाले जीन में होते हैं। यह हैरान करने वाली बात थी क्योंकि अब तक उनको लगता था कि यूका मादा है। यूका से मिले दूसरे आरएनए में पेशीय ऊतक बनाने और रख-रखाव रखने के निर्देश थे (mammoth biology)।

सेल पत्रिका में प्रकाशित (Cell journal study) ये नतीजे इस दिशा में शोध के और मौके खुलने की आशा जगाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://assets.newatlas.com/dims4/default/f133ffd/2147483647/strip/true/crop/3200×2000+0+0/resize/2880×1800!/format/webp/quality/90/?url=https%3A%2F%2Fnewatlas-brightspot.s3.amazonaws.com%2F6f%2F83%2Febc281534996aa7d19ee0e2c7246%2Fdepositphotos-325270902-xl.jpg

शाकनाशी के असर सम्बंधी एक शोध पत्र रद्द किया गया 

शाकनाशक ग्लायफोसेट (glyphosate) के स्वास्थ्य पर असर को लेकर एक शोध पत्र 2000 में रेग्यूलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्मेकोलॉजी (Regulatory Toxicology and Pharmacology) नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। हाल ही में जर्नल ने इस शोध पत्र को निरस्त यानी रीट्रेक्ट (paper retraction) करने का निर्णय लिया है। निरस्त करने का कारण इस शोध पत्र के साथ जुड़े गंभीर नैतिक सरोकारों और इसके निष्कर्षों की वैधता के प्रति संदेहों को बताया गया है।

इस शोध पत्र में कहा गया था कि कीटनाशक ग्लायफोसेट (जिसे राउंड-अप के नाम से बेचा जाता है) मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालता है।   

दरअसल, पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब कुछ लोगों ने मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा (Monsanto lawsuit) दायर किया कि उन्हें जो कैंसर (नॉन-हाजकिन्स लिम्फोमा – non-Hodgkin lymphoma) हुआ है वह ग्लायफोसेट की वजह से हुआ है। इस मुकदमे के दौरान यह उजागर हुआ था कि 2015 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट (IARC report)  में यह निष्कर्ष दिया गया था कि संभवत: ग्लायफोसेट एक कैंसरकारी पदार्थ है। यह प्रमाण मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता था।

मॉनसेंटो इस प्रमाण को गलत साबित करने में जुट गई। सुनवाई के दौरान सामने आया कि कंपनी ने कुछ शोधकर्ताओं से संपर्क किया था कि वे एक समीक्षा पर्चे (review paper) में यह कहें कि ग्लायफोसेट का ऐसा कोई असर नहीं होता है। कंपनी अधिकारियों के आंतरिक ईमेल वार्तालाप (internal emails) से यह साज़िश उजागर हो गई।

शोध पत्र को निरस्त करते हुए जर्नल ने कहा है कि उपरोक्त शोध पत्र के लेखकों ने मात्र उन्हीं अध्ययनों को समीक्षा में शामिल किया था जो मॉनसेंटो द्वारा किए गए थे और अप्रकाशित (unpublished studies) थे। लेखकों ने कई सारे बाहरी प्रकाशित अध्ययनों को अनदेखा कर दिया था, हालांकि वे भी समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू – peer review) आधारित जर्नल्स में प्रकाशित नहीं हुए थे।

उपरोक्त शोध पत्र के तीन लेखकों में से दो (रॉबर्ट क्रोस और इयान मनरो) का निधन हो चुका है। जर्नल ने शोध पत्र निरस्त करने से पहले तीसरे लेखक गैरी विलियम्स (Gary Williams) से संपर्क किया मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

समीक्षा पर्चे के निरस्त होने के बाद मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे फरियादियों (plaintiffs) की राह की एक बाधा दूर हो गई है। इस समीक्षा पर्चे के आधार पर मॉनसेंटो दावा कर रहा था कि वैज्ञानिक अध्ययन ग्लायफोसेट को हानिरहित प्रमाणित करते हैं। वैसे मॉनसेंटो (अब बायर (Bayer acquisition) के स्वामित्व में) ने एक बयान में कहा है कि इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट मात्र एक रिपोर्ट है और दुनिया भर की नियामक संस्थाएं सहमत हैं कि ग्लायफोसेट का उपयोग निरापद है और यह कैंसरकारी नहीं है।

अब इतना तो स्पष्ट है कि इस समीक्षा पर्चे को कहीं भी उद्धरित (citation ban) नहीं किया जा सकेगा और इसके हवाले से ग्लायफोसेट को हानिरहित नहीं बताया जा सकेगा। लेकिन अभी भी यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) और युरोपियन केमिकल्स एजेंसी (European Chemicals Agency) ने अपना निर्णय बदला नहीं है। दूसरी ओर, मॉनसेंटो के प्रभाव में लिखे गए कुछ अन्य शोध पत्रों (industry-funded research) पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zccwjp8/full/_20251204_on_roundup.jpg

रंग बदलते जीवाश्मों को खोजना आसान

डायनासौर के जितने जीवाश्म (dinosaur fossils) मिलें, कम हैं। जितनी अधिक संख्या में ये मिलेंगे, जैव वैकास (evolution research) के कुछ अनसुलझे रहस्य उतनी आसानी से सुलझेंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि हर किसी को इनकी पहचान नहीं होती, इनकी पहचान के लिए नज़रों को पैना और पारखी होना पड़ता है। यदि नज़रें तेज़ हों तो भी पत्थरों और झाड़-झंखाड़ वाले विशाल भूभाग में बिखरे इन जीवाश्मों को खोजना मुश्किल होता है।

लेकिन करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हालिया अध्ययन से ऐसा लगता है कि अब यह मुश्किल दूर होने वाली है। जीवाश्मों को खोज निकालने में वैज्ञानिकों का साथ देने वाले हैं चटख रंग के लाइकेन (lichen detection technology) (फफूंद और शैवाल के संगम से बने जीव)।

हाल ही में, कनाडा के डायनासौर प्रोविन्शियल पार्क (Dinosaur Provincial Park) में शोधकर्ताओं ने चटख नारंगी रंग की ऐसी लाइकेन की पहचान की है जो डायनासौर की हड्डियों पर फलती-फूलती हैं, जबकि उसके आसपास के पत्थरों और चट्टानों को अपेक्षाकृत अछूता छोड़ देती हैं। इससे जीवाश्म को पहचानना आसान हो सकता है।

ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि खासकर क्रेटेशियस काल (Cretaceous period fossils) की अश्मीभूत हड्डियों की क्षारीय, कैल्शियम युक्त और छिद्रमय संरचना कनाडाई बैडलैंड्स जैसे अर्ध-शुष्क वातावरण में लाइकेन को पनपने के लिए माकूल परिस्थिति देती है।

वैसे तो लाइकेन कई तरह के जीवाश्मों पर फल-फूल कर उन्हें चटख रंगों से रंग सकती है, लेकिन यह शाकाहारी ऑर्निथिशियन डायनासौर (ornithischian dinosaurs) की बड़ी हड्डियों को सबसे अधिक उजागर करती हैं। और इन डायनासौर के जीवाश्म इस पार्क में बहुतायत में पाए जाते हैं। उम्मीद है, अब लाइकेन से ढंके जीवाश्मों को विशेष सेंसर से लैस ड्रोन (drone fossil mapping) की मदद से पहचाना जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/content/article/organism-turns-dino-bones-orange-making-them-easier-spot

भूख मिटाकर मोटापा भगाने वाला प्रोटीन

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पेट में गुड़गुड़ाहट जैसी आवाज़ का एहसास भूख लगने का सीधा संकेत है। शरीर को भूख (hunger) तब लगती है जब शरीर में पोषक तत्वों की, विशेषत: रक्त शर्करा (blood sugar) की, कमी होती है। जैसे ही भोजन का समय होता है मस्तिष्क भूख का संदेश देता है जिसके फलस्वरूप आमाशय द्वारा उत्पन्न हार्मोन ग्रेलीन हमारे पेट और आंतों की मांसपेशियों में संकुचन पैदा करने लगता है और हमें भूख लगने लगती है। ग्रेलीन को भूख हॉर्मोन (हंगर हॉर्मोन – hunger hormone) भी कहते हैं। दूसरी ओर, पेट भरने पर लेप्टिन और कोलेसिस्टोकाइनिन (CCK) जैसे हॉर्मोन भूख को कम करने का काम करते हैं। लेप्टिन हमारे शरीर के वसा ऊतकों में बनता है और बताता है कि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा वाला भोजन मिल गया है, जबकि कोलेसिस्टोकाइनिन छोटी आंत से निकलता है और पेट भर जाने का संकेत देता है, जिससे हमें तृप्ति का एहसास होता है। 

हाल ही में वैज्ञानिकों की एक टीम ने भूख मिटाने के लिए मस्तिष्क में छिपे हुए एक ‘स्विच’ का पता लगाया है। इसका नाम है मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर (जीन MC4R)। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया है कि MRAP2 नामक एक प्रोटीन (protein) भूख को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्रोटीन भूख रिसेप्टर MC4R को कोशिका की सतह पर पहुंचाने में मदद करता है। वहां यह ‘खाना बंद करो’ के मज़बूत संकेत देता है। वैज्ञानिकों को लगता है कि MRAP2 प्रोटीन द्वारा नियंत्रित यह स्विच – MC4R – मोटापे (obesity) से लड़ने, उसे कम करने और वज़न नियंत्रण में सुधार के लिए नए मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर

मेलानोकोर्टिन-4 (MC4R) रिसेप्टर एक महत्वपूर्ण रिसेप्टर है। यह पेप्टाइड-स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (peptide hormone) द्वारा सक्रिय होता है। MC4R रिसेप्टर मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस (hypothalamus) में पाया जाता है और भूख, तृप्ति, तथा ऊर्जा चयापचय क्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भूख को कम करता है जिससे मोटापा घटता है। यह ऊर्जा संतुलन (energy balance) भी बनाए रखता है।

MC4R के जीन में यदि उत्परिवर्तन (gene mutation) हो जाए तो भूख अधिक लगती है जिससे भोजन सेवन को नियंत्रित करने और वज़न कम करने में कठिनाई होती है। परिणामत: मोटापा बढ़ जाता है। मोटापे के इस कारण के लिए वर्तमान में कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, हालांकि भविष्य में इस रिसेप्टर को लक्षित करने वाली नई औषधियां (medicines) विकसित की जा सकती हैं।

सेटमेलानोटाइड

वैज्ञानिक शोध से ज्ञात हुआ है कि सेटमेलानोटाइड (setmelanotide) नामक दवा लेप्टिन-मेलानोकॉर्टिन मार्ग (leptin-melanocortin pathway) में कुछ विशिष्ट आनुवंशिक विकारों या उत्परिवर्तनों के कारण होने वाले गंभीर आनुवंशिक मोटापे (genetic obesity) का उपचार करती है। यह मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर को उत्तेजित करने का काम करती है, जो मस्तिष्क में भूख नियंत्रण से सम्बंधित होता है। यह दवा भूख को कम करती है, पेट भरा हुआ महसूस कराती है और शरीर द्वारा कैलोरी जलाने की दर भी बढ़ा सकती है, जिससे वज़न घटाने में मदद मिलती है। 

MRAP2 एक जीन है जो MC4R रिसेप्टर के सहायक प्रोटीन को एनकोड करता है, जो MC4R रिसेप्टर सिग्नलिंग को नियंत्रित करता है।

वैज्ञानिकों की टीम ने आधुनिक फ्लोरेसेंट माइक्रोस्कोपी (fluorescent microscopy) और सिंगल सेल इमेजिंग तकनीक का उपयोग करते हुए पाया है कि प्रोटीन MRAP2 कोशिकाओं के भीतर मस्तिष्क-रिसेप्टर MC4R के मौलिक स्थान और व्यवहार को बदल देता है। फ्लोरेसेंट माइक्रोस्कोपी और कॉन्फोकल इमेजिंग (confocal imaging) ने दर्शाया है कि MRAP2, MC4R को कोशिका की सतह तक पहुंचाने के लिए आवश्यक है, जहां यह भूख को दबाने या कम करने वाले संकेतों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित कर सकता है। उपरोक्त शोध के निष्कर्ष हाल ही में नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

रिसेप्टर के कार्य करने के तरीके की समझ उन चिकित्सकीय रणनीतियों (therapeutic strategies) की ओर इंगित करती है जो MRAP2 की नकल या उसका नियमन करती हैं और मोटापे तथा सम्बंधित चयापचय विकारों (metabolic disorders) से निपटने की क्षमता रखती हैं। उपरोक्त शोध के निष्कर्ष भविष्य में विभिन्न दृष्टिकोणों और विविध प्रयोगात्मक विधियों द्वारा, चिकित्सकीय प्रासंगिकता वाले भूख नियमन के महत्वपूर्ण नए शारीरिक और पैथोफिज़ियोलॉजिकल (pathophysiological) पहलुओं की बेहतर समझ विकसित करने में मददगार होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.researchgate.net/profile/Giles-Yeo/publication/8644502/figure/fig2/AS:282060989190159@1444259988550/MC4R-integrates-energy-related-signalsSeparate-populations-of-neurons-whose-cell-bodies.png

परजीवियों की बातें और रोचक अनुसंधान

टोनी गोल्डबर्ग प्रायमेट प्राणियों में परजीवी प्रकोप का अध्ययन करते हैं। उनके अनुभव रोचक हैं, उनके द्वारा किए गए अध्ययन महत्वपूर्ण रहे हैं और उनके पास आपके लिए कई सलाहें हैं।

मारे शरीर पर कोई कीड़ा (insect) रेंगे तो हम क्या करेंगे? तुरंत उसे झटक कर फेंक देंगे। उसका बारीकी से अवलोकन (observe) तो दूर की बात है, अक्सर तो यह भी नहीं देखते कि कीड़ा था कौन-सा। लेकिन कीड़े-मकोड़ों (कीटों) में रुचि रखने वाले चंद लोग ऐसे मौके नहीं गंवाते। बल्कि ऐसे मौके उनके लिए कुछ नया खोजने का अवसर बन जाते हैं, जो कीटों के बारे में हमारी समझ को बढ़ाते हैं।

ऐसे ही मौकापरस्त हैं टोनी गोल्डबर्ग (Tony Goldberg)। वे पेशे से वन्यजीव महामारी विज्ञानी (wildlife epidemiologist) हैं और विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। परजीवियों में उनकी खासी रुचि है। उन्होंने अपनी पिछली कुछ खोजी यात्राओं के दौरान उनके शरीर पर सवार हुए परजीवी कीटों का अध्ययन कर कुछ गुत्थियां सुलझाईं हैं।

2013 में जब वे युगांडा के किबले राष्ट्रीय उद्यान (Kibale National Park) गए थे तो उनकी नाक में एक किलनी (टिक) घुस गई थी। उन्होंने उसे निकाल फेंकने की बजाय उसका जेनेटिक अनुक्रमण (genetic sequencing) किया, और पता चला कि वह तो किलनी की एक नई प्रजाति (new species) है।

पिछले दिनों जब वे किबले राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा से लौटे तो उनकी कांख में मक्खी का लार्वा (fly larva) फंसकर आ गया। सरसरी तौर पर देखा तो लगा वह उस क्षेत्र में आम तौर पर पाई जाने वाली मक्खी का लार्वा है। लेकिन जब उन्होंने उसका जीन अनुक्रमण किया पता चला कि ये लार्वा आम अफ्रीकी बॉट फ्लाई (African botfly) के लार्वा नहीं बल्कि एक दुर्लभ प्रजाति के लार्वा हैं।

इसी प्रकार से, वे किबले राष्ट्रीय उद्यान के जंगल में प्राइमेट्स (primates) का अध्ययन कर रहे थे। जिन प्राइमेट्स का वे उपचार/देखभाल कर रहे थे, उनके शरीर में उन्हें कुछ परजीवी कीट (parasitic insects) मिले। इन कीटों को देखने पर वे उप-सहारा अफ्रीका में बहुतायत में पाई जाने वाली सामान्य परजीवी मक्खी कॉर्डिलोबिया एंथ्रोपोफैगा (Cordylobia anthropophaga) लग रहे थे। लेकिन इन मक्खियों को प्राइमेट्स को संक्रमित करते कभी देखा नहीं गया था और इस बात के ज़्यादा सबूत नहीं थे कि यह प्रजाति प्राइमेट्स को संक्रमित करती है।

लिहाज़ा, उन्होंने वे कीट अध्ययन के लिहाज़ से इकट्ठा कर लिए। इन्हें जमा करने में उनके साथियों ने भी खूब साथ दिया – उन्होंने अपने-अपने शरीर पर चढ़ आए कीटों को निकाल-निकाल कर गोल्डबर्ग देना शुरू कर दिया। वापिस आकर जब उन्होंने इन कीटों का अनुक्रमण (DNA sequencing) किया तो पता चला कि ये कीट वे मक्खियां नहीं हैं बल्कि यह उन्हीं से सम्बंधित एक अन्य दुर्लभ प्रजाति है – कॉर्डिलोबिया रोडेनी (Cordylobia rodhaini)

दिलचस्प बात यह है कि परजीवी विज्ञान (parasitology) में 120 सालों से यह रहस्य रहा है कि अफ्रीकी बॉट मक्खी की यह दूसरी प्रजाति (कॉर्डिलोबिया रोडेनी) रहती कहां है। और यह अध्ययन पहला ऐसा ठोस प्रमाण है कि गैर-मानव प्राइमेट इस प्रजाति के एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक मेज़बान (natural host) हैं।

एक और गौरतलब बात जो गोल्डबर्ग कहते हैं वह यह कि पूरी दुनिया में देखा जाए तो बॉट मक्खियां दुर्लभ हो सकती हैं, लेकिन हो सकता है कि जहां उनके लिए माकूल परिस्थितियां हों वहां वे प्रचुरता में मौजूद हों, जैसे किबले नेशनल पार्क। यहां उनके मेज़बान गैर-मानव प्राइमेट (यानी जिन पर उनके लार्वा पनपते हैं), अच्छी जलवायु (climate), और उन्हें फैलने की आदर्श परिस्थिति है, जो इन मक्खियों और अन्य बॉट मक्खियों के लिए एक आकर्षक जगह हो सकती है।

तेज़ी से बदलती जलवायु (climate change) और बढ़ते मानव हस्तक्षेप (human interference) के मद्देनज़र बॉट मक्खियों (botflies) समेत तमाम परजीवियों के बारे में जानना सिर्फ वैज्ञानिकों की रुचि का मामला नहीं है। यह कृषि और जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनका अनियंत्रित प्रसार कृषि और जीव-जंतुओं को प्रभावित करेगा।

कुछ सामान्य बातें…

यदि आप ऐसी जगह जा रहे हैं जहां परजीवियों (parasites) के आपके ऊपर सवार होकर आने की संभावना है तो आप थोड़ी ऐहतियात बरतें ताकि आप और अन्य सुरक्षित रहें। जैसे आप किबले राष्ट्रीय उद्यान या ऐसे ही जलवायु और परिस्थिति (tropical forest conditions) वाले किसी स्थान पर जा रहे हैं तो झाड़ियों, पेड़ों से सटकर न गुज़रे। ऐसा कर आप अपने साथ इन्हें लाने की संभावना बढ़ाते हैं। दूसरा कपड़ों को बाहर न सुखाएं। क्योंकि वयस्क मक्खी मिट्टी या अन्य गीली जगहों पर अंडे देती है। आपके गीले कपड़े अंडे देने की बढ़िया जगह बन सकते हैं। और यदि आप कपड़े बाहर सुखा भी रहे हैं तो उन्हें बिना अच्छे से इस्तरी किए न पहने यहां तक कि अंत:वस्त्र भी। इस संदर्भ में गोल्डबर्ग ने अपने साथियों के कुछ अनुभव साझा किए हैं।

और खुदा न ख्वास्ता आप किसी परजीवी (parasite infection) को अपने संग ले आते हैं, तो जूं के काटने-रेंगने जैसे एहसास से आपको उनकी मौजूदगी का पता चल जाएगा। जैसे ही आपको उनकी मौजूदगी का एहसास हो उनसे बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि आप उन्हें निकाल कर अलग कर दें। कई लोग पेट्रोलियम जेली (petroleum jelly) लगाने की सलाह देते हैं जो प्राय: कारगर होता है क्योंकि सांस न ले पाने के कारण लार्वा मर जाता है। लेकिन अगर लार्वा अपने किए घाव में मर जाए तो आपकी त्वचा में संक्रमण (skin infection) फैल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z261u85/full/_20251021_on_tropical.qa_lead-1761231855180.jpg

भूतिया आग को समझने में एक कदम और

ई बार ऐसी खबरें मिलती हैं कि किसी दलदली जगह (swamp area) पर रोशनियां नृत्य करती नज़र आती हैं। इनके बारे में लोक विश्वास है कि ये हड्डियों का नाच होता है या आत्माएं मुसाफिरों को भ्रमित करने या राह दिखाने के लिए रोशनी दिखाती हैं। अंग्रेज़ी में इसे विल-ओ-दी-विस्प (Will-o’-the-wisp) कहते हैं।

आम तौर पर वैज्ञानिक मानते आए हैं कि इन रोशनियों का स्रोत दलदल से निकलती मीथेन गैस (methane gas) होती है जो सतह पर ऑक्सीजन (oxygen) के संपर्क में आकर जल उठती है। दलदलों में सड़ता जैविक पदार्थ ही इस गैस का स्रोत होता है। लेकिन यह समझ से परे रहा था कि यह गैस आग कैसे पकड़ लेती है क्योंकि वहां न तो कोई चिंगारी होती है और न ही तापमान इतना अधिक होता है कि गैस जल उठे। अब शोधकर्ताओं (researchers) ने इसकी एक नई व्याख्या पेश की है।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस (यूएस) (PNAS) में प्रकाशित एक शोध पत्र में स्टेनफर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के रिचर्ड ज़ेयर (Richard Zare) और उनके सहकर्मियों ने बताया है कि यह दलदल से निकलने वाले सूक्ष्म बुलबुलों (microbubbles) का करिश्मा है। ये बुलबुले अत्यंत सूक्ष्म (साइज़ नैनोमीटर से लेकर माइक्रोमीटर) के होते हैं। ज़ेयर और उनके साथी ऐसे बुलबुलों का अध्ययन करते रहे हैं। उन्होंने पाया कि जब अलग-अलग साइज़ के बुलबुले हवा और पानी की संपर्क सतह पर आते हैं तो उनकी सतहों पर आवेश (electric charge) पैदा हो जाते हैं। होता यह है कि छोटे बुलबुलों पर ऋणावेश संग्रहित हो जाता है जबकि बड़े बुलबुले धनावेशित हो जाते हैं। यदि ये बुलबुले पास-पास आ जाएं तो उनके बीच विद्युत क्षेत्र बन जाता है और विद्युत प्रवाह (electric discharge) के कारण चिंगारी पैदा होती है।

ज़ेयर के मन में विचार आया कि कहीं यह विद्युत प्रवाह ही भूतिया रोशनी (ghost light) के लिए ज़िम्मेदार न हो। इस बात का पता लगाने के लिए उन्होंने एक मशीन (experimental setup) बनाई जिसमें एक नोज़ल थी जो पानी में डूबी थी। फिर उन्होंने इस नोज़ल से मीथेन और हवा के बुलबुले पानी में उड़ाए। हाई-स्पीड कैमरा (high-speed camera)  में नज़र आया कि इन बुलबुलों के टकराने पर हल्की रोशनी पैदा होती है।

टीम ने यह भी देखा कि रोशनी तब भी पैदा होती है जब मात्र हवा के बुलबुले बनाए गए थे। अर्थात सूक्ष्म रोशनी आवेशों के पृथक्करण (charge separation)  की वजह से पैदा होती है, न कि मीथेन के स्वत:स्फूर्त दहन (spontaneous combustion) के कारण। अलबत्ता, जब मीथेन भी मौजूद हो तो रोशनी तेज़ होती है और तापमान भी बढ़ता है।

वैसे तो अभी भी बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं है लेकिन कई वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसे बुलबुले तो धरती की शुरुआत (early Earth) में भी उपस्थित रहे होंगे, और संभव है कि इनकी परस्पर क्रिया से जीवन के रसायन (origin of life chemistry) बनने के लिए ज़रूरी रासायनिक क्रियाओं को ऊर्जा मिली हो। यह भी सोचा जा रहा है कि यह प्रक्रिया रासायनिक संश्लेषण का एक मार्ग उपलब्ध करा सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5f/Will-o-the-wisp_and_snake_by_Hermann_Hendrich_1823.jpg/1024px-Will-o-the-wisp_and_snake_by_Hermann_Hendrich_1823.jpg

समुद्र की आवाज़ बताएगी अम्लीयता का स्तर

मुद्र (ocean)  तरह-तरह की आवाज़ों से गुंजायमान (sound waves)  है – मनुष्य के जहाज़ों की धीमी गड़गड़ाहट से लेकर उसके नैसर्गिक रहवासियों जैसे व्हेल(whales), डॉल्फिन और झींगों की धीमी-तेज़ आवाज़ों तक से। और अब, शोधकर्ताओं ने पाया है कि समुद्र की ये नैसर्गिक आवाज़ें यह बताने में मदद कर सकती हैं कि पानी कितना अम्लीय है: ये आवाज़ें समुद्री अम्लीयकरण (ocean acidification)  जैसे गंभीर पर्यावरणीय खतरे को समझने का नया तरीका बन सकती हैं।

जर्नल ऑफ जियोफिज़िकल रिसर्च: ओशियन (Journal of Geophysical Research: Oceans) में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार लहरों, हवा और बारिश की आवाज़ें पानी की अम्लीयता को दूर तक और गहराई तक मापने में मददगार हो सकती हैं।

गौरतलब है कि समुद्र हर वर्ष मानव गतिविधियों (carbon emissions) से उत्सर्जित कार्बन डाईऑक्साइड का लगभग एक-तिहाई भाग सोख लेता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग (global warming) में कुछ हद तक कमी तो होती है, लेकिन परिणामस्वरूप समुद्र के पानी की pH घटती है और वह अधिक अम्लीय हो जाता है। 1985 से अब तक समुद्र की सतह का pH 8.11 से घटकर 8.04 हो गई है। यह मामूली फर्क भी कोरल रीफ(coral reefs), समुद्री जीवों की खोल और पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा है।

इसी समस्या को समझने के लिए कनाडा के वैज्ञानिक डेविड बार्कले और उनकी टीम ने एक नया तरीका खोजा। उन्होंने हाइड्रोफोन (hydrophone technology)  से लैस ‘डीप साउंड’ नामक उपकरण को 5000 मीटर गहराई तक भेजा और पाया कि इतनी गहराई में भी सतह की लहरों की आवाज़ें सुनी जा सकती है। शोध में पता चला कि समुद्र में मौजूद बोरिक एसिड और मैग्नीशियम सल्फेट जैसे रसायन अलग-अलग आवृत्तियों की ध्वनि (sound frequency) सोखते हैं। और अम्लीयता बढ़ने पर दोनों पर अलग-अलग असर होते हैं – जहां बोरिक एसिड घटता जाता है (और उसके द्वारा सोखी गई ध्वनि भी), वहीं मैग्नीशियम सल्फेट अप्रभावित रहता है। जैसे-जैसे समुद्र अम्लीय होता है, यह संतुलन बदलता है और ध्वनि की आवृत्ति की मदद से वैज्ञानिक समुद्र की pH माप सकते हैं। इस खोज (scientific discovery)  को मुकम्मल करने में टीम को लगभग 15 साल लगे। लेकिन अब उनका नया उपकरण 10,000 मीटर की गहराई (मैरियाना ट्रेंच के चैलेंजर डीप) (Mariana Trench)  तक काम कर सकता है। यह तकनीक बड़े पैमाने पर pH मॉनीटरिंग (pH monitoring)  को संभव बनाती है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका अभी पारंपरिक रासायनिक मापों जितना सटीक नहीं है। अलबत्ता, मौजूदा रोबोटिक सेंसर आधारित BGC-Argo तकनीकें फंडिंग और सप्लाई की दिक्कतों से जूझ रही हैं, ऐसे में यह ध्वनि-आधारित तकनीक एक महत्वपूर्ण विकल्प (alternative technology)  बन सकती है।

बहरहाल, योजना इन उपकरणों को महीनों तक समुद्र तल पर छोड़कर दीर्घकालिक डैटा (long-term data) जुटाने की है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z5vgjj5/abs/_20251023_on_ph.jpg

दीर्घायु की प्रार्थनाएं और पुरुषों की अल्प-आयु

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पुरुषों के लिए लंबी आयु (life expectancy in men) की सारी कामनाओं, प्रार्थनाओं के बावजूद मैं अपने परिजनों में पाता हूं कि पुरुष पहले स्वर्ग सिधारते हैं और अक्सर महिलाएं लंबी आयु प्राप्त करती हैं। तो क्या पुरुष जन्म से ही पहले मरने के लिए नियत है? सभी परिस्थितियां समान मिलें तो भी मेरे साथ पैदा हुई महिला की तुलना में मैं तीन वर्ष पूर्व मरने के लिए अभिशप्त हूं।

महिला-पुरुष के जीवनकाल (male vs female lifespan)  में अंतर बहुत पहले से ज्ञात है। यह केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में पत्थर की लकीर-सा नियम है। तो पुरुषों में ऐसा क्या है कि वे महिलाओं की तुलना में अल्प आयु में मर जाते हैं। हाल ही के शोध कार्यों से हम इस तथ्य का कारण समझने के समीप पहुंचे हैं।

कुछ लोग पुरुषों के छोटे जीवनकाल का कारण व्यवहार में अंतर (lifestyle differences)  को मानते हैं। व्यवहार, जैसे पुरुष युद्ध लड़ते हैं, खदानों में कार्य करते हैं, श्रमयुक्त मज़दूरी करते हैं और इस प्रकार अपने शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालकर भी मैदान में डटे रहते हैं। सामाजिक विज्ञान के कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पुरुष आदतन झक्की होते हैं। वे अत्यधिक धूम्रपान (smoking habits)  करते हैं, अनियंत्रित पीते हैं और पेटू होते हैं इसलिए उनका वज़न ज़्यादा होता है। बीमार होने पर चिकित्सीय सहायता लेने में भी आना-कानी करते हैं और बीमारी का पता चल जाए तो भी अधिक संभावना इस बात की रहती हैं कि वे पूरा उपचार ना लें। साथ ही, वे गुस्सैल होते हैं और आपसी लड़ाई, दुर्घटना और अत्यधिक जोखिम भरे कार्य पसंद करते हैं। इस दौरान चोट अथवा बीमारी से उनका शरीर कमज़ोर हो जाता है। किंतु यदि ऐसा ही था तो पुरुषों को आरामदायक कार्य मिलने पर तो दोनों का जीवनकाल एक जैसा होना था।

तो क्या हमारे करीबी रिश्तेदार वानरों में भी ऐसा ही है? मानव को छोड़कर बाकी सभी प्रायमेट्स (primates study)  पर भी वैज्ञानिकों ने शोध किया। वे देखना चाहते थे कि क्या हमारे नज़दीकी रिश्तेदार वानरों में भी मादा की आयु नर से ज़्यादा होती है? वैज्ञानिकों ने 6 जंगली प्रायमेट्स (सिफाकास, मुरिक्विस, गोरिल्ला, चिम्पैंजी और बबून) के ऐसे समूह से उम्र सम्बंधी आंकड़े बटोरे जिनकी संख्या समूह में 400 से 1500 तक थी। फिर शोधकर्ताओं ने आधुनिक एवं ऐतिहासिक दोनों समय के छह मानव समूह की आबादी के आंकड़े भी देखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि पिछली शताब्दी की तुलना में मानव आयु में बहुत वृद्धि होने के बावजूद पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर कम नहीं हुआ। शोध से यह भी बात सामने आई कि मानव आबादी में यद्यपि महिलाएं ज़्यादा समय तक जीवित रहती हैं परंतु भौगोलिक वितरण के अनुसार यह अंतर अलग-अलग रहा था। उदाहरण के लिए आधुनिक रूस में पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर लगभग 10 वर्ष का है जो सबसे अधिक है।

अधिक उम्र का जैविक कारण (biological reasons for longevity)

जीव विज्ञानी अल्पायु के लिए पुरुषों के गुणसूत्रों (chromosomes in men) को दोषी ठहराते हैं। महिलाओं को निश्चित रूप से जैविक लाभ जन्म के साथ ही प्राप्त होने लगता है। बाहरी प्रभावों के अभाव में भी लड़कों की मृत्यु दर लड़कियों से 25-30 प्रतिशत अधिक देखी गई है। आंकड़े भी महिलाओं के जन्मजात आनुवंशिक (genetic advantage in women)  लाभ दर्शाते हैं।

मनुष्यों तथा कई अन्य जंतुओं में लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों द्वारा होता है। मनुष्यों की कोशिकाओं में कुल 23 जोड़ी गुणसूत्र पाए जाते हैं। इनमें 22 जोड़ियों में तो गुणसूत्र परस्पर पूरक होते हैं। लेकिन 23वीं जोड़ी में दो गुणसूत्र अलग-अलग किस्म के होते हैं। शुक्राणु दो प्रकार के होते हैं (X तथा Y), जबकि सारे अंडाणु एक ही प्रकार के होते हैं (X)। यदि व्यक्ति में दोनों गुणसूत्र X हों तो मादा यानी लड़की बनती है और जब एक गुणसूत्र X तथा Y दूसरा हो तो नर यानी लड़का।

जब इन X गुणसूत्रों के जीन्स में से एक जीन उत्परिवर्तित होता है तो महिलाओं में पाया जाने वाला दूसरा X गुणसूत्र उसके कार्य को संभाल लेता है या उसके दुष्प्रभाव को दबा देता है। जबकि पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र होने के कारण उसमें उत्परिवर्तन हो जाए तो गंभीर परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है।

इस प्रकार दोनों लिंगों के बीच जेनेटिक अंतर (genetic difference) एक लिंग में उम्र बढ़ाता है तो दूसरे में कम कर देता है। इसके अलावा महिलाओं के हार्मोन (female hormones)  और प्रजनन में महिलाओं की अगली पीढ़ी में निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका को भी दीर्घायु से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए महिलाओं में बनने वाला हार्मोन एस्ट्रोजन (estrogen hormone) खराब कोलेस्ट्रॉल को खत्म करने में कारगर है जिससे महिलाओं का शरीर हृदय सम्बंधी बीमारियों (heart disease risk)  से प्राय: सुरक्षित बना रहता है। दूसरी ओर केवल पुरुषों में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उनमें हिंसा और जोखिम लेने की उत्कंठा उत्पन्न करता है। आखिर में महिलाओं का शरीर गर्भावस्था (pregnancy health) और स्तनपान की ज़रूरतों के अनुसार भोजन का भंडारण करने के लिए बना होता है। वे भोजन की ज़्यादा मात्रा को भी उचित तरीके से संग्रहित या शरीर के बाहर निकालने के अनुरूप ढली हुई हैं। इसके अलावा भी अनेक आनुवंशिक एवं जैविक कारण ज्ञात हैं जिनका स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर पर समग्र प्रभाव को मापना असंभव है। पिछले कुछ दशकों में असाधारण आर्थिक और सामाजिक प्रगति से मातृत्व बोझ में नाटकीय कमी भी देखी गई है। इस प्रकार सभी परिस्थितियां महिलाओं को अनुकूल बनाती हैं।

एक परिकल्पना ‘जॉगिंग हार्ट’ (jogging heart hypothesis) के अनुसार माहवारी चक्र के उत्तरार्ध में, यानी अंडोत्सर्ग के बाद, हृदय की गति बढ़ जाती है। हृदय गति बढ़ने से वैसी ही लाभकारी परिस्थिति उत्पन्न होती है जैसी हल्का व्यायाम (light exercise benefits) करने पर या जॉगिंग करने पर होती है। बाद के जीवन में इसके लाभकारी असर देखे जा सकते हैं। इसलिए हृदय रोग का जोखिम भी महिलाओं को बेहद कम होता है।

अधिक कद भी एक महत्वपूर्ण कारक (height and aging factor) है। लंबे लोगों में अधिक कोशिकाएं होती हैं। इसलिए उन्हें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अधिक कोशिकाओं में उत्परिवर्तन की संभावनाएं भी अधिक हो जाती है तथा ज़्यादा ऊर्जा खर्च करने से कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं। अत: पुरुषों की अधिक ऊंचाई उन्हें अधिक दीर्घकालीन क्षति की ओर धकेलती है।

वे कारण जो महिलाओं को लंबी उम्र (women longevity reasons) देते हैं कई बार अटपटे, अनिश्चित और रहस्यमयी लगते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि सारी प्रार्थनाएं और व्रत-उपवास इस खाई को पाट नहीं सके हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static01.nyt.com/images/2025/03/04/well/25WELL-LONGEVITY-WOMEN/25WELL-LONGEVITY-WOMEN-superJumbo-v3.jpg?quality=75&auto=webp