जीवन की शुरुआत के और नज़दीक पहुंचे रसायनज्ञ

किसी समय पृथ्वी पर वे हालात बने होंगे जब ऐसे अणुओं का निर्माण हुआ होगा जिन्हें जीवन की ओर पहला कदम माना जा सके। वैज्ञानिकों के बीच लगभग आम सहमति है कि यह अणु राइबोन्यूक्लिक एसिड (यानी आर.एन.ए.) रहा होगा। आर.एन.ए. एक ऐसा अणु है जो सूचनाओं का संग्रह कर सकता है, और रासायनिक क्रियाओं को गति दे सकता है। यह अणु चार मूल अणुओं का पोलीमर है। तो सवाल है कि शुरुआत में ये चार मूल अणु या न्यूक्लिक एसिड कैसे बने थे।

आर.एन.ए. के निर्माण के ये चार अणु हैं सायटोसीन, यूरेसिल, एडीनीन और ग्वानीन। सायटोसीन और यूरेसिल को पिरिमिडीन कहते हैं और एडीनीन व ग्वानीन प्यूरिन हैं। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते रहे हैं कि पृथ्वी पर सूदूर अतीत में मौजूद हालात में इन अणुओं का निर्माण सामान्य रासायनिक क्रियाओं से हो सकता है या नहीं।

वर्ष 2009 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जॉन सदरलैंड के नेतृत्व में रसायनज्ञों के एक दल ने प्रयोगशाला में उन परिस्थितियों को निर्मित किया जो पृथ्वी के शुरुआती वातावरण में रही होंगी, ऐसा माना जाता है। इस प्रयोग में उन्होंने पांच ऐसे रसायन मिलाए थे जो उस समय पृथ्वी पर मौजूद रहे होंगे। प्रयोग में सायटोसीन और यूरेसिल (यानी पिरिमिडीन) बन गए।

फिर लगभग 2 वर्ष पूर्व जर्मनी के लुडविग मैक्सीमिलन विश्वविद्यालय के थॉमस कैरल और उनके सहयोगियों ने एक आसान से प्रयोग में प्यूरिन्स (एडीनीन और ग्वानीन) बनने की खबर दी।

इन प्रयोगों से स्पष्ट हो गया कि आर.एन.ए. की निर्माण इकाइयां सामान्य रासायनिक क्रियाओं के दौरान बन सकती हैं। मगर एक सवाल यह था कि यदि ये इकाइयां अलग-अलग जगहों पर बनीं तो फिर आर.एन.ए. का संश्लेषण कैसे हुआ होगा। अब कैरल की टीम ने इस सवाल का जवाब पा लिया है। ओरिजिन ऑफ लाइफ वर्कशॉप में उन्होंने अपने प्रयोगों का ब्यौरा दिया है।

कैरल की टीम ने 6 सरल पदार्थों के साथ काम किया – ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, मीथेन, अमोनिया, पानी और हाइड्रोजन सायनाइड। ये सभी शुरुआती धरती पर मौजूद रहे होंगे। इन पदार्थों की रासायनिक क्रियाओं की एक पूरी खाद्य शृंखला के बाद कैरल प्यूरिन्स और पिरिमिडीन्स दोनों समूह के यौगिक एक ही परखनली में बनाने में सफल रहे हैं। यानी यह समस्या तो सुलझ गई कि ये चारों इकाइयां एक स्थान पर कैसे बनी होंगी। लेकिन अभी भी एक बड़ी समस्या बाकी है – इन चारों इकाइयों को लंबी खाद्य शृंखलाओं में जोड़कर आर.एन.ए. कैसे बना होगा। अगला कदम वही समझने का होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पानी का प्रबंधन कर सकते हैं, पैदा नहीं कर सकते – संध्या रायचौधरी

साढ़े चार अरब साल पहले धरती पर पानी आया था। जब पृथ्वी का जन्म हुआ तब यह बहुत गर्म थी। कालांतर में यह ठंडी हुई और इस पर पानी ठहरा। वर्तमान में जल संकट बहुत गहरा है। आज पानी महत्वपूर्ण व मूल्यवान वस्तु बन चुका है। शुद्ध पानी जहां अमृत है, वहीं दूषित पानी विष और महामारी का आधार। जल संसाधन संरक्षण और संवर्धन आज की ज़रूरत है जिसमें जनता का सहयोग अपेक्षित है।

धरती के गर्भ से पानी की आखरी बूंद भी खींचने की कवायद की जा रही है। विख्यात समुद्र शास्त्री जैक्वस कांसट्यू ने कहा था कि हमें नहीं भूलना चाहिए कि जल और जीवन चक्र में कोई अंतर नहीं है और यह बात सोलह आने खरी है। लेकिन इस बात को नज़रअंदाज़ करके हम खुद ही बड़े संकट में घिरे हैं। बनारस की वरुणा नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसका पानी कब कीचड़ बन गया पता ही नहीं चला। यह हालत मात्र वरुणा की ही नहीं, देशदुनिया की सारी नदियों की हो गई है। दुनिया में पानी की किल्लत एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। भारत में पिछले वर्ष 33 करोड़ लोगों ने जल संकट का सामना किया था, लेकिन हमने कोई सबक नहीं लिया।

एक प्रतिशत पानी उपयोगी

पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल लगभग 1.36 अरब घन कि.मी. है, परंतु उसमें से 96.5 प्रतिशत जल समुद्री है जो खारा है। यह खारा जल समुद्री जीवों और वनस्पतियों को छोड़कर शेष जीवों के लिए अनुपयोगी है। शेष 3.5 प्रतिशत (लगभग 4.8 करोड़ घन कि.मी.) जल मीठा है, किंतु इसका 24 लाख घन कि.मी. हिस्सा 600 मीटर गहराई में भूमिगत जल के रूप में विद्यमान है तथा लगभग 5 लाख घन कि.मी. जल गंदा व प्रदूषित हो चुका है, इस प्रकार पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही उपयोगी है। इस एक फीसदी जल पर दुनिया के छ: अरब मनुष्यों समेत सारे सजीव और वनस्पतियां निर्भर हैं।

जिस तरह दुनिया से पानी गायब होना शुरू हो रहा है ऐसे में आने वाले समय में पानी झगड़ों का सबसे बड़ा कारक बनेगा। पानी की किल्लत व लड़ाई सिर्फ गलीकूचों तक नहीं रहने वाली, राज्यों व देशों के बीच नदियों का झगड़ा इसका उदाहरण है। हरियाणा, पंजाब और दिल्ली का झगड़ा हो या फिर कावेरी नदी के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की लड़ाई हो, मुद्दा पानी ही है। दूसरी तरफ ब्रम्हपुत्र के लिए चीन, भारत व बांग्लादेश का टकराव इसका उदाहरण है। पिछले वर्ष महाराष्ट्र के कई ज़िलों में धारा 144 इसलिए लगा दी गई थी क्योंकि पानी को लेकर झगड़े शुरू हो गए थे।

पिछले तीन दशकों में कुछ ऐसा हुआ है जिससे कि पानी की विभिन्न उपयोगिताएं तो बढ़ी ही हैं पर साथ में जनसंख्या की बढ़ोतरी ने भी दूसरी बड़ी मार की है। पहले पानी पीने और सीमित सिंचाई में काम आता था पर अब इसके कई अन्य उपयोग शुरू हो गए हैं। उद्योगों पर होने वाली पानी की खपत एक बड़ा मुद्दा है। अब पानी स्वयं ही उद्योगी उत्पाद के रूप में सामने है। जो पानी पोखरों, तालाबों या फिर नदियों में होना चाहिए था वह अब बोतलों में कैद है। हज़ारों करोड़ों में पहुंच चुका यह व्यापार अभी और फलनेफूलने वाला है। इसके अलावा आज देश भर में कई ऐसे उद्योग खड़े हैं जिनकी पानी की खपत अत्यधिक है। उदाहरण के लिये टेनरी, चमड़ा उद्योग, दवाई कारखाने आदि।

बढ़ते उपयोगों के साथ पानी की गुणवत्ता में भी भारी कमी आई है। एक अध्ययन के अनुसार प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटी है। पहले ये 2000 लीटर थी और वर्तमान में घटकर 1100 लीटर के करीब रह गई है। वर्ल्ड ऐड की ताज़ा रपट के अनुसार चीन, पाकिस्तान व बांग्लादेश के साथसाथ दुनिया के 10 देशों में एक भारत भी है जहां स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि पीने को साफ पानी नहीं मिलता। 7.6 करोड़ भारतीय पीने के साफ पानी से वंचित हैं और यही कारण है कि यहां प्रति वर्ष लगभग 14 लाख बच्चे दूषित पानी के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। अपने देश में पानी की कीमत अन्य देशों की तुलना में बहुत ज़्यादा है। इस रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों में पानी की कीमत लोगों की कमाई का मात्र एक प्रतिशत है जबकि भारत में यह 17 प्रतिशत तक है।

रिपोर्ट इशारा करती है कि पानी की घटती गुणवत्ता आने वाले समय में लाखों लोगों को लील लेगी या फिर मीठे जहर की तरह एक बड़ी आपदा जैसे हालात पैदा कर देगी। जीवन के इस मूल तत्व के प्रति अभी भी हम बहुत गंभीर नहीं दिखाई देते। जिन्हें नीतियां तैयार करनी हैं वे या तो बोतलों के पानी पर पलते हैं या फिर वॉटर प्यूरीफायरों ने उनकी जान बचा रखी है। सवाल उन करोड़ों लोगों का है जिनकी पहुंच उपरोक्त दोनों साधनों तक नहीं है।

पानी के संकट का बड़ा कारण इसका प्रबंधन का भी है। भूमिगत रुाोत लगभग 85 प्रतिशत पानी की आपूर्ति करते हैं जिनमें 56 प्रतिशत तक गिरावट आ चुकी है। देश का कोई भी ऐसा कोना नहीं बचा है जहां परंपरागत पानी के रुाोत सूखे न हों। पहाड़ों में वन विनाश या वर्षा की कमी के कारण जल धाराएं तेज़ी से गायब होती जा रही हैं। यही हालात देश के दूसरे जल रुाोतों के भी हैं। पोखर व तालाब तेज़ी से साथ छोड़ रहे हैं। ये या तो अन्य उपयोगों के लिए कब्ज़ा लिए गए हैं या फिर उचित रखरखाव के अभाव में नष्ट हो गए हैं।

विडंबना ही है कि देश के ग्रामीण क्षेत्र ही पानी के बड़े संकट में फंसे हैं। शहरों में जल वितरण व्यवस्था चरमराती है तो तत्काल प्रभावी कदम उठा लिए जाते हैं। पर गांवों की पानी की किल्लत हर वर्ष और मुश्किल होती जाती है। पहाड़ों में महिलाओं को पानी के लिए औसतन 2-3 कि.मी. और कभीकभी 3-4 कि.मी. चलना पड़ता है। मैदानी गांवों में भी एक के बाद एक सूखते कुएं व नीचे खिसकते भूजल ने कहर बरपाना शुरू कर दिया है। दिल्ली में यमुनागंगा के पानी से जब आपूर्ति नहीं हुई तो हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध का सहारा मिल गया। पर इन्हीं नदियों के जलागम क्षेत्रों में बसे गांवों में पानी के संकट का बड़ा शोर मचा है, लेकिन सुनवाई नहीं है। शहरों के पानी की व्यवस्था के कई विकल्प इसलिए खड़े हो जाते हैं क्योंकि वहां सरकार या नीतिकार बैठते हैं।

वास्तव में हम असली मुद्दों से कतरा रहे हैं। पहला है देश में सही जल प्रबंधन की कमी व दूसरी जल संरक्षण व संग्रहण की बड़ी योजनाओं का अभाव। पानी से जुड़ी एक बात और समझनी चाहिए कि जलवायु परिवर्तन या धरती के बढ़ते तापमान का सीधा असर इसी पर है। जल ही सभी क्रियाओं का केंद्र है इसीलिए जलवायु परिवर्तन को जल केंद्रित दृष्टि से देखना आवश्यक होगा। अब जल को कई आयामों से जोड़कर देखने का समय आ चुका है।

पानी का सच

दुनिया में 70 प्रतिशत पानी खेती के उपयोग में लाया जाता है और मात्र 10 प्रतिशत घरेलू उपयोग में। ग्रामीण दुनिया के 8 प्रतिशत लोगों को साफ पानी की व्यवस्था नहीं है। दुनिया के आधे से ज़्यादा स्कूलों में पानी, शौचालय आदि की व्यवस्था नहीं है और हर वर्ष 4 करोड़ स्कूली बच्चे पानी की बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। दुनिया के 64 प्रतिशत घरों में महिलाएं ही पानी की ज़िम्मेदारी उठाती हैं। करीब 80 प्रतिशत बीमारियां पानी की देन हैं। उपसहारा क्षेत्र में लोगों के 40 अरब घंटे पानी जुटाने में लग जाते हैं।

भारत में सभी प्राकृतिक संसाधनों में कुल पानी 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है और लगभग 370 बीसीएम सतही पानी उपयोग के लिए उपलब्ध हो पाता है। पहले प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यह उपलब्धता 5000 क्यूबिक मीटर तक थी। वर्ष 2000 में यह मात्रा 2000 क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति रह गई। अगर ऐसे ही चलता रहा तो वर्ष 2050 तक हम 160 करोड़ होंगे और यह उपलब्धता 100 क्यूबिक मीटर रह जाएगी। इसका मतलब प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 3.2 क्यूबिक मीटर ही उपलब्ध होगा, इसका मतलब है कि इसी पानी में हर व्यक्ति के लिए खेती, नहाना, कपड़े धोना, पीना, खानापकाना जुड़ा होगा। मतलब साफ है: एक बड़े संकट की आहट। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विश्व उबलने की राह पर

ज़रा कल्पना कीजिए, आपके शहर का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया है। फुटपाथ खाली पड़े हैं, पार्क शांत हैं और दूर-दूर तक कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा है। दिन की तुलना में लोग रात में घर से बाहर निकलना पसंद कर रहे हैं। खेल के मैदानों में एक अजीब-सी चुप्पी है। दिन के सबसे गर्म समय में बाहर काम करने पर अघोषित प्रतिबंध लग चुका है। केवल वही लोग दिख रहे हैं जो गरीब, बेघर, असंगठित मज़दूर हैं क्योंकि उनके पास एयर कंडीशनिंग की सुविधा नहीं है।

इन्ही एयर कंडीशनिंग उपकरणों से वातावरण और गर्म हो रहा है। बढ़ते तापमान के कारण व्यवहार में और खानपान में भी बदलाव आ रहा है। बढ़ते तापमान से हमारे अंदर अधिक गुस्से की प्रवृत्ति भी उत्पन्न हो सकती है। बाहर लंबा समय गुज़ारना हमारी जान के लिए घातक हो सकता है।

अस्पतालों में गर्मी के कारण पैदा होने वाले तनाव, श्वसन सम्बंधी समस्याओं और उच्च तापमान के कारण मरीज़ों की संख्या ज़्यादा नज़र आ रही है। इस तापमान पर मानव कोशिकाएं झुलसने लगती हैं, रक्त गाढ़ा हो जाता है, फेफड़ों के चारों ओर मांसपेशियों की जकड़न पैदा हो जाती है और मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है।

50 डिग्री सेल्सियस अब कोई अपवाद नहीं है, यह काफी तेज़ी से कई इलाकों में फैलता जा रहा है। इस वर्ष, पाकिस्तान के नवाबशाह के 11 लाख निवासियों ने 50.2 डिग्री सेल्सियस तापमान झेला। भारत में दो वर्ष पूर्व, फलोदी शहर में 51 डिग्री तामपान दर्ज किया गया था। एक सेहतमंद इंसान के लिए कुछ घंटे उमस भरा 35 डिग्री से अधिक तापमान जानलेवा साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि वर्ष 2100 तक विश्व की आधी से ज़्यादा आबादी वर्ष के 20 दिन जानलेवा गर्मी की चपेट में रहेगी।

खाड़ी देश के कई शहर तो ऐसी गर्मी के आदी हो रहे हैं। बसरा (जनसंख्या 21 लाख) में दो वर्ष पूर्व 53.9 डिग्री तापमान दर्ज़ किया जा चुका है। कुवैत और दोहा शहर पिछले दशक में 50 डिग्री या उससे अधिक तापमान झेल चुके हैं। ओमान के तटीय इलाके कुरियत में, गर्मियों में रात का तापमान 42.6 डिग्री से ऊपर रहा, जो कि दुनिया में अब तक का सबसे ज़्यादा ‘न्यूनतम’ तापमान माना जाता है।

आने वाले वर्षों में मक्का शहर में होने वाली तीर्थ यात्रा भी भीषण गर्मियों के मौसम में होगी। इस तीर्थ यात्रा में लगभग 20 लाख यात्रियों का आना होता है। 50 डिग्री से अधिक तापमान के चलते यात्रियों के लिए ठंडा वातावरण तैयार करना एक बड़ी चुनौती होगी। इन परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 2022 में, कतर में होने वाले फुटबॉल विश्व कप के लिए फीफा ने फाइनल मैच गर्मियों की बजाय क्रिसमस से एक सप्ताह पहले स्थानांतरित कर दिया है। जापानी राजनेता अब 2020 टोक्यो ओलंपिक के लिए डे-लाइट सेविंग टाइम शुरू करने की चर्चा कर रहे हैं ताकि मैराथन और रेसवॉक सुबह 5 बजे शुरू करके दोपहर की गर्मी से बचा जा सके।

कई इलाके भीषण गर्मी से जूझ रहे हैं। अहमदाबाद में अस्पतालों ने विशेष वार्ड खोले हैं। ऑस्ट्रेलिया के शहरों ने बेघर लोगों के लिए मुफ्त स्विमिंग पूल उपलब्ध कराए हैं। तापमान 40 डिग्री से ऊपर होने पर स्कूलों को मैदानी खेल का समय रद्द करने के निर्देश दिए जाते हैं। कुवैत में दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

वर्तमान में, 354 बड़े शहरों में 35 डिग्री से अधिक औसत ग्रीष्मकालीन तापमान देखा गया है और 2050 तक यह तादाद 970 तक पहुंच जाएगी। अनुमान लगाया गया है कि चरम गर्मी को झेलने वालों की संख्या आठ गुना बढ़कर 1.6 अरब हो जाएगी।

इस साल, लॉस एंजेल्स से 50 कि.मी. दूर चिनो में 48.9 डिग्री तापमान दर्ज़ किया गया। सिडनी में 47, मैड्रिड और लिस्बन में 45 डिग्री के आसपास तापमान रहा। नए अध्ययनों से पता चलता है कि शताब्दी के अंत तक फ्रांस का उच्चतम तापमान काफी आसानी से 50 डिग्री से अधिक हो सकता है, जबकि ऑस्ट्रेलियाई शहर तो उससे भी जल्दी इस बिंदु तक पहुंच जाएंगे। इस बीच कुवैत 60 डिग्री तक पहुंच चुका होगा।

एक तरफ मज़दूर, रिक्शा चलाने वाले और खोमचे-ठेले वाले खुद को सिर से लेकर पैर तक ढांके हुए हैं ताकि इस गर्मी से अपना बचाव कर सकें। दूसरी ओर, अमीरों के लिए बात केवल एक अनुकूल वातावरण से दूसरे अनुकूल वातावरण में जाने की है, जैसे घर, कार्यालय, कार, जिम या शॉपिंग मॉल। इत तरह से, बढ़ती गर्मी ने असमानता का एक नया मुद्दा खड़ा कर दिया है। गौर से देखिए, समाज ठंडे और गर्म दायरों में बंट चुका है।

घनी आबादी वाले क्षेत्रों को कैसे ठंडा रखा जाए, यह अर्बन क्लाइमेट संगोष्ठी का मुख्य एजेंडा है। जल संरक्षण, शेड और गर्मी को कम करने के अन्य उपायों के माध्यम से शहरों को गर्मी से बचाया जा सकता है। दुनिया के कई स्थानों में ऐसे प्रयास शुरू भी हो चुके हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मिट्टी में आर्सेनिक विषाक्तता – सरोज कुमार सान्याल

हालांकि भूमिगत जल में व्यापक आर्सेनिक प्रदूषण भारत के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बंगाल डेल्टा बेसिन के इलाकों तक सीमित है किंतु भारत के कई हिस्सों और राज्यों के भूमिगत जल में भी आर्सेनिक पाया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक की सुरक्षित मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है। किंतु वर्तमान में पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, त्रिपुरा और नागालैंड राज्यों के भूमिगत जल में 50 से 3700 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक आर्सेनिक पाया गया है। भूमिगत जल में आर्सेनिक पाए जाने के कुछ भूगर्भीय कारण माने जाते हैं। अब तक आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में सबसे अधिक ध्यान पेयजल पर दिया जा रहा था जबकि इन इलाकों में भूमिगत जल का उपयोग पेयजल से ज़्यादा सिंचार्इं में किया जाता है। आर्सेनिक युक्त भूमिगत जल वाले इलाकों में सिंचाई के कारण मिट्टीपौधेमनुष्य शृंखला पर होने वाले असर पर अध्ययन बहुत कम हुए हैं। वास्तव में बंगाल डेल्टा बेसिन समेत आर्सेनिक प्रभावित अन्य क्षेत्रों में इस तरह के शोध की आवश्यकता है। आर्सेनिक प्रदूषण के मुख्य कारण को पहचानना महत्वपूर्ण है। जहां पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का स्रोत एक बिंदु पर सिमटा होता है, वहीं खेती में आर्सेनिक प्रदूषित भूजल से सिंचाई के माध्यम से मानवखाद्य  शृंखलामेंफैलताहैऔरखाद्य शृंखलामेंआगेबढ़ते हुए इसकी गंभीरता बढ़ती है। इस लेख में आर्सेनिक प्रदूषण के महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों के साथसाथ इसके समाधान की सूची बनाने का प्रयास किया है। इसमें लोगों की भागीदारी अहम होगी। साथ ही उचित नीतियों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है।

भूमिका

आर्सेनिक फारसी शब्द ज़ार्निक से आया है जो यूनानी में आर्सेनिकॉन हुआ। हिंदी में इसे संखिया कहते हैं। पर्शिया और अन्य जगहों के लोग आर्सेनिक का उपयोग प्राचीन काल से करते रहे हैं। आर्सेनिक शाही ज़हरऔर ज़हर का राजानाम से भी मशहूर है।

कांस्य युग में आर्सेनिक कांसे में अशुद्धि के रूप में मौजूद होता था जिससे धातु कठोर हो जाती थी। माना जाता है कि अल्बर्टस मैग्नस ने 1250 ईस्वीं में इस तत्व को सबसे पहले पृथक किया था। आर्सेनिक का उपयोग कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है। कीटनाशकों के छिड़काव से मानव खाद्य और पर्यावरण में आर्सेनिक प्रदूषण हुआ है जिसका लोगों और उनकी अगली पीढ़ी के स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। भूमिगत आर्सेनिक दुनिया की कई जगहों के पेयजल स्रोतों को प्रभावित करता है। लगातार सालों तक प्रदूषित पानी पीने की वजह से लाखों लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

मिट्टी, पानी, वनस्पति, पशु और मानव में विषैले आर्सेनिक की मौजूदगी पर्यावरणीय चिंता का विषय है। जैवमंडल में इसके अति विषैलेपन और बढ़ी हुई मात्रा ने सार्वजनिक और राजनीतिक चिंता को जन्म दिया है। अर्जेंटाइना, चिली, फिनलैंड, हंगरी, मेक्सिको, नेपाल, ताइवान, बांग्लादेश और भारत समेत दुनिया के 20 देशों में भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण और इसके कारण मानव स्वास्थ सम्बंधी समस्या दर्ज हुई है। सबसे अधिक प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या बांग्लादेश में है। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। बंगाल डेल्टा बेसिन के लाखों लोग खतरे में हैं। पश्चिम बंगाल में भागीरथी नदी के किनारे बसे 5 ज़िलों और इसकी सीमा से लगे बांग्लादेश के ज़िलों में मुख्य रूप से भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण है। बंगाल डेल्टा बेसिन के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से भी अधिक निकली है। इसके अलावा चट्टानों, अन्य पदार्थों और पानी के विभिन्न स्रोतों में आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है।

अधिकतम की सीमा

डब्ल्यूएचओ ने अस्थायी तौर पर पेयजल में आर्सेनिक की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है क्योंकि इससे कम स्तर के प्रदूषण का मापन बड़े पैमाने पर संभव नहीं है। भारत और बांग्लादेश समेत कई देशों में डब्ल्यूएचओ की इससे पूर्व 1971 में निर्धारित स्वीकार्य सीमा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर थी। हाल ही में भारत ने भी पेयजल में आर्सेनिक की स्वीकार्य सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है।

मनुष्यों में अकार्बनिक आर्सेनिक यौगिकों के कारण कैंसर होने के पर्याप्त प्रमाण और जानवरों में सीमित प्रमाण मिले हैं। इसी आधार पर अकार्बनिक आर्सेनिक यौगिकों के समूह को कैंसरजनक समूह में रखा गया है। इसलिए पेयजल में आर्सेनिक की उपस्थिति की स्वीकार्य सीमा को घटाकर 5 माइक्रोग्राम प्रति लीटर करना विचाराधीन है। किंतु कार्बनिक आर्सेनिक की कैंसरकारिता के पर्याप्त प्रमाण नहीं है। 1983 में एफएओ/डब्ल्यूएचओ की एक संयुक्त विशेषज्ञ समिति द्वारा मनुष्यों द्वारा अकार्बनिक आर्सेनिक के दैनिक सेवन की अधिकतम सीमा शरीर के प्रति किलोग्राम वज़न पर 2.1 माइक्रोग्राम तय की गई है। इसके बाद 1988 में साप्ताहिक स्वीकार्य सेवन की सीमा शरीर के प्रति किलोग्राम वजन पर 15 माइक्रोग्राम निर्धारित की गई। किंतु इस तरह के मानक मिट्टी, पौधे और पशुओं के लिए निर्धारित नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल के प्रभावित क्षेत्रों के भूमिगत जल में आर्सेनिक सांद्रता (50-3700 माइक्रोग्राम प्रति लीटर) भारत और डब्ल्यूएचओ की निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक है। इसके अलावा, पंजाब के भूमिगत जल में आर्सेनिक सांद्रता 4 से 688 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक है। 1978 में पहली बार पश्चिम बंगाल में भूजल में आर्सेनिक की निर्धारित सीमा से अधिक उपस्थिति का पता चला था और मनुष्यों में आर्सेनिक के विषैले असर का पहला मामला 1983 में कलकत्ता के स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन में सामने आया था। पेयजल में अकार्बनिक आर्सेनिक और वयस्कों में इसके स्वास्थ्य सम्बंधी प्रभावों को चिकित्सक भलीभांति स्थापित कर चुके हैं।

अब तक भूमिगत जल में आर्सेनिक की उपस्थिति को पेयजल की समस्या के तौर पर ही देखा जा रहा था जबकि पश्चिम बंगाल के इन इलाकों में भूमिगत जल का उपयोग सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। तो मिट्टी और कृषि उपज में आर्सेनिक अधिक मात्रा में होने की संभावना है। दरअसल आर्सेनिक युक्त मिट्टी में खेती और आर्सेनिक युक्त जल से सिंचाई के कारण कृषि उपज में आर्सेनिक पहुंचने की बात कई शोधकर्ता बता चुके हैं। इस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है। जहां पेयजल में आर्सेनिक की समस्या किसी ट्यूब वेल जैसे स्पष्ट स्रोत से जोड़ी जा सकती है वहीं कृषि उपज में आर्सेनिक की उपस्थिति एक विस्तृत और अनिश्चितसा स्रोत है। इस बात का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब यह देखा जाता है कि ऐसे लोगों के मूत्र के नमूनों में भी उच्च मात्रा में आर्सेनिक निकला है जिन्होंने कभी आर्सेनिक युक्त पानी नहीं पीया। दिलचस्प बात यह है कि आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में सतही जल स्रोत आर्सेनिक मुक्त हैं। इससे लगता है कि मिट्टी आर्सेनिक युक्त पानी लेती है और इसे अपने में ही रोक कर रखती है और आस पास के जलस्रोतों में इसे फैलने नहीं देती।

स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में आर्सेनिक विषैला तत्व है। आर्सेनिक ट्राईऑक्साइड की अत्यंत कम मात्रा (0.1 ग्राम) भी इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। आर्सेनिक विषाक्तता के शुरुआती लक्षण त्वचा सम्बंधी विकार, कमज़ोरी, थकान, एनोरेक्सिया (भूख न लगना), मितली, उल्टी और दस्त या कब्ज़ हैं। जैसेजैसे विषाक्तता बढ़ती है, लक्षण और अधिक विशिष्ट होने लगते हैं, जिनमें गंभीर दस्त, पानीदार सूजन (विशेष रूप से पलकों और एड़ियों पर), त्वचा का रंग बदलना, आर्सेनिकल काला कैंसर और चमड़ी का मोटा व सख्त होना, लीवर बढ़ना, श्वसन रोग और त्वचा कैंसर शामिल हैं। कुछ गंभीर मामलों में पैर में गेंग्रीन और ऊतकों में असामान्य वृद्धि भी देखी गई है। आर्सेनिक विषाक्तता के कारण अर्जेंटाइना में बेल विले रोग’, ताइवान में ब्लैक फुट रोगऔर थाईलैंड में काई डेमरोग व्याप्त हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों के बाल, नाखून, त्वचा और पेशाब के कई नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक आर्सेनिक था।

मनुष्यों पर प्रभाव

आर्सेनिक के रूप और विषाक्तता

भूमिगत जल और मिट्टी में आर्सेनिक कार्बनिक रूपों के अलावा आर्सेनाइट्स (तीनसंयोजी आर्सेनिक) या आर्सेनेट (पांचसंयोजी आर्सेनिक) के रूप में मौजूद रहता है। मिट्टी और फसल में आर्सेनिक की घुलनशीलता, गतिशीलता, जैव उपलब्धता और विषाक्तता मुख्य रूप से आर्सेनिक की ऑक्सीकरण अवस्था (वैलेंसी) पर निर्भर करती है। साथ ही इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अकार्बनिक रूप में है या कार्बनिक रूप में। भूमिगत जल/मिट्टी में विभिन्न आर्सेनिक यौगिकों के विषैलेपन का क्रम:

आर्सीन > ऑर्गेनोआर्सेनिक यौगिक > आर्सेनाइट्स और ऑक्साइड >  आर्सेनेट्स > एकसंयोजी आर्सेनिक >  मुक्त आर्सेनिक धातु।

जल और मिट्टी में आर्सेनेट की तुलना में आर्सेनाइट अधिक घुलनशील, गतिशील और ज़हरीला होता है। आर्सेनिक के कार्बनिक रूप मुख्य रुप से डाईमिथाइल आर्सेनिक एसिड या केकोडाइलिक एसिड भी मिट्टी में उपस्थित रहते हैं। ये मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी जैसी स्थितियों में वाष्पशील डाईमिथाइल आर्सीन और ट्राईमिथाइल आर्सीन बनाते हैं। भूमिगत जल और मिट्टी में मोनो मिथाइल आर्सेनिक एसिड (एमएमए) भी मौजूद रहता है। आर्सेनिक के कार्बनिक रूप या तो ज़हरीले नहीं होते या बहुत कम ज़हरीले होते हैं। जब फसलों को हवादार मिट्टी में उगाया जाता है तो मिट्टी में मुख्य रूप से पांचसंयोजी आर्सेनिक पाया जाता है। यह कम ज़हरीला होता है। जबकि चावल के पानी भरे खेतों में अधिक घुलनशील और ज़हरीले तीनसंयोजी रूप अधिक रहते हैं।

मिट्टीफसल में आर्सेनिक की उपस्थिति और खाद्य शृंखला पर प्रभाव

यह पाया गया कि शरद ऋतु में उगाई जाने वाली धान से प्राप्त चावल में आर्सेनिक के अधिक विषैले तीनसंयोजी रूप पाए जाते हैं। दूसरी ओर, चावल के भूसे में आर्सेनिक के पांचसंयोजी रूप मौजूद होते हैं। इसके अलावा धान की, पारंपरिक और उच्च पैदावार, दोनों ही किस्मों के साथ पारबॉइलिंग और मिलिंग जैसी प्रक्रियाओं में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ती है। जैविक खाद के माध्यम से मृदा संशोधन करने पर आर्सेनिक की मात्रा में कमी आती है। आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में उगाए जाने वाले चावल में आर्सेनिक विषाक्तता और इसके सेवन से सम्बंधित खतरों का अध्ययन किया गया है। ग्रामीण बंगाल में चावल के माध्यम से अकार्बनिक आर्सेनिक का सेवन, दूषित पेयजल की तुलना में मानव स्वास्थ के लिए ज़्यादा बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा है। जैविक संशोधन और संवर्धित फॉस्फेट तथा चुनिंदा सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जस्ता, लौह) से उर्वरीकरण चावल में आर्सेनिक को कम करता है। साथ ही इसके सेवन से होने वाला खतरा भी कम होता है।

भूजल दूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में पानी और आहार दोनों के माध्यम से आर्सेनिक सेवन और पेशाब में आर्सेनिक के उत्सर्जन को लेकर किए गए कई अध्ययन बताते हैं कि आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में सिर्फ पेयजल में आर्सेनिक की समस्या को दूर करने से आर्सेनिक सम्बंधी खतरे कम नहीं होंगे। चावल का नियमित सेवन शरीर में आर्सेनिक पहुंचने का एक प्रमुख ज़रिया है जिसका समाधान ढूंढने की ज़रूरत है। आर्सेनिक विषाक्तता के उपचार के लिए समग्र व समेकित तरीके की आवश्यकता है जिसमें खाद्य शृंखला में आर्सेनिक की उपस्थिति और पेयजल में आर्सेनिक सुरक्षित मात्रा की सीमा में रखने के मिलेजुले प्रयास करने होंगे।

सुधार के उपाय

चावल समेत कई उपज में आर्सेनिक की उपस्थिति को कम करने में कुछ उपाय काफी प्रभावी पाए गए हैं।

1. कम वर्षा वाली अवधि में आर्सेनिक युक्त पानी से सिंचाई कम करने के लिए सतही जल स्रोतों और भूमिगत जल का मिलाजुला इस्तेमाल हो। साथ ही वर्षा के आर्सेनिकमुक्त पानी को ज़मीन में पहुंचाने की व्यवस्था हो।

2. आर्सेनिक युक्त इलाकों में कम पानी में ज़्यादा फसल देने वाली और आर्सेनिक का कम संग्रह करने वाली किस्मों की पहचान/विकास हो। इन इलाकों में खास तौर से जनवरी से मई के कम वर्षा वाले दिनों में अनुकूल फसल चक्र अपनाया जाए। जैसे जूटचावलचावल या हरी खादचावलचावल की जगह जमीकंदसरसोंतिल, मूंगधानसरसों जैसे फसल चक्र।

3. भूजल को तालाब में भरकर उस संग्रहित पानी से सिंचाई करना। इस तरह अवसादन और वर्षा का पानी मिलने से संग्रहित पानी में आर्सेनिक की मात्रा कम की जा सकती है।

4. धान की सिचांई के लिए भूमिगत जल की दक्षता को बढ़ाना, खास तौर पर गर्मियों की धान में। उदाहरण के लिए फसल की वृद्धि के दौरान कुछकुछ समय खेतों में पानी भरा जाए और पकने के दौरान लगातार पानी भरकर रखा जाए। ऐसा करने से फसल की पैदावार पर कोई असर नहीं पड़ेगा और भूजल का उपयोग कम होने से आर्सेनिक की मात्रा में कमी आएगी।

5. कंपोस्ट और अन्य जैविक व हरी खाद का उपयोग बढ़ाएं। साथ ही अकार्बनिक लवणों का उपयुक्त उपयोग  किया जाए।

6. ऐसी फसलों की पहचान और विकास हो जो फसल के खाद्य हिस्सों में कम से कम आर्सेनिक जमा करती हों और जिनमें आर्सेनिक के अकार्बनिक रूपों का अनुपात कम हो।

7. सस्ते वनस्पति और जैविक उपचार विकल्प विकसित करना चाहिए।

8. बड़े पैमाने पर प्रचारप्रसार।

9. लोगों की भगीदारी से खतरे के बारे में जागरूकता बढ़ाएं और स्थानीय स्तर पर समस्या के समाधान के उपायों को अपनाया और लोकप्रिय बनाया जाए।

नीतिगत हस्तक्षेप

देश के कुछ हिस्सों के भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण का मुद्दा और मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रतिकूल प्रभाव वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, सामुदायिक शोधकर्ताओं, कानून बनाने वालों और आम जनता के लिए बड़ी चिंता का विषय है। आर्सेनिक प्रदूषण के संदर्भ में मुख्य रूप से पेयजल आपूर्ति की समस्या को दूर करने पर ज़ोर दिया गया है। पेयजल की समस्या अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। इन इलाकों में पेयजल के अधिकतर विकल्प या तो सतही जल स्रोत या 150-200 मीटर से अधिक गहराई के जलस्रोत के उपयोग पर आधारित हैं। इस गहराई में पानी में विषैले पदार्थ नहीं होते। इन पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता की समयसमय पर जांच भी काफी अच्छे से होती है।

खाद्य शृंखला का मुद्दा अनछुआ रह जाता है। आर्सेनिकप्रदूषित भूजल से सिंचाई के माध्यम से आर्सेनिक खाद्य पदार्थों में पहुंचता है। वैसे इस बारे में काफी समझ बनी है कि खाद्य शृंखला द्वारा ग्रामीण इलाकों में आर्सेनिक लोगों के शरीर में पहुंच रहा है। इसलिए बड़े स्तर पर आर्सेनिक विषाक्तता को दूर करने के लिए पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा को कम करने के साथसाथ खाद्य शृंखला से आर्सेनिक को दूर करने के लिए समेकित तरीके अपनाने की ज़रूरत है। जब तक यह प्रयास सफल नहीं होता तब तक सुरक्षित खाद्य की चिंता बनी रहेगी। वैज्ञानिकों के बीच इस मुद्दे की गंभीरता के एहसास के बावजूद अभी तक ठोस योजना बनाने की दरकार है। शुरू में छोटे स्तर पर प्रायोगिक कार्यक्रम लागू करके फिर इसे प्रभावित क्षेत्रों में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।

इस तरह के एकीकृत तरीकों की सफलता विभिन्न हितधारकों की प्रकृति, शोधकर्ताओं, तकनीशियनों और योजनाकारों को जोड़कर ही संभव है जिसमें वास्तविक लाभार्थियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए। लाभार्थी इस कार्यक्रम को समझ सकें और उसमें अपना योगदान दे सकें इसके लिए उन्हें जागरूक और प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है। खालिस तकनीकी तरीकों की जगह समेकित तरीके अपनाने के लिए तकनीकी व्यावहारिकता, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से मज़बूत कार्य योजना की ज़रूरत है।

निष्कर्ष

लोगो को पेयजल की गुणवत्ता जांचने के मामले में जागरूक करना और परीक्षण करने के लिए प्रेरित करना महत्वपूर्ण है। गंभीर त्वचाघाव से प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य खतरे और परेशानी को ध्यान में रखते हुए आर्सेनिक मुक्त पेयजल की आपूर्ति के साथ राज्य अस्पतालों में इन रोगियों के निशुल्क उपचार की व्यवस्था बीमारी को कम करने में मदद कर सकती है। यह ध्यान रखने की ज़रूरत है कि आर्सेनिक से प्रभावित लोग बहुत गरीब हैं व दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

जैसा कि पहले बताया गया है, बंगाल और अन्यत्र सिंचाई और पीने के लिए आर्सेनिक प्रदूषित भूजल ही समस्या की जड़ है। आर्सेनिक प्रदूषित भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी और खाद्य शृंखला में काफी आर्सेनिक प्रदूषण हुआ है। आर्सेनिक प्रदूषित जल का उपयोग कम करने और इसके उपायों के बारे में किसानों को जागरूक बनाने में काफी समय लगेगा। इसके अलावा समेकित तरीके की सफलता के लिए सिर्फ कृषि वैज्ञानिकों को नहीं बल्कि चिकित्सकों, सामाजिक वैज्ञानिकों और योजनाकारों को भी साथ लाना होगा।

फौरी तौर पर बड़े पैमाने पर आर्सेनिक की मात्रा पता करने के लिए खेतों और प्रयोगशाला प्रोटोकॉल में सुधार की ज़रूरत है ताकि भूमिगत जल में विभिन्न आर्सेनिक रूपों का मापन किया जा सके। खाद्य शृंखला में कुल आर्सेनिक के कारण कितनी विषाक्तता है इसे पहचानने की ज़रूरत है। इसके अलावा विविध संस्थाओं और विविध विषयों को जोड़कर कार्यक्रमों को मज़बूत करना होगा, तभी आर्सेनिकदूषित संसाधनों पर निर्भरता को कम करने के लिए दीर्घकालिक तकनीकी विकल्प विकसित हो सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास में नया युग

अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने हाल ही में घोषणा की है कि पृथ्वी के वर्तमान दौर को एक विशिष्ट काल के रूप में जाना जाएगा। यह होलोसीन युग का एक हिस्सा है जिसे नाम दिया गया है मेघालयन। भूगर्भ संघ के मुताबिक हम पिछले 4200 वर्षों से जिस काल में जी रहे हैं वही मेघायलन है।

भूगर्भ वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के लगभग 4.6 अरब वर्ष के अस्तित्व को कई कल्पों, युगों, कालों, अवधियों वगैरह में बांटा है। इनमें होलोसीन एक युग है जो लगभग 11,700 वर्ष पहले शुरू हुआ था। अब भूगर्भ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि पिछले 4,200 वर्षों को एक विशिष्ट नाम से पुकारा जाना चाहिए भारत के मेघालय प्रांत से बना नाम मेघालयन।

दरअसल, भूगर्भीय समय विभाजन भूगर्भ में तलछटों की परतों, तलछट के प्रकार, उनमें पाए गए जीवाश्म तथा तत्वों के समस्थानिकों की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है। समस्थानिकों की विशेषता है कि वे समय का अच्छा रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हैं। इनके अलावा उस अवधि में घटित भौतिक व रासायनिक घटनाओं को भी ध्यान में रखा जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने बताया है कि दुनिया के कई क्षेत्रों में आखरी हिम युग के बाद कृषि आधारित समाजों का विकास हुआ था। इसके बाद लगभग 200 वर्षों की एक जलवायुसम्बंधी घटना ने इन खेतिहर समाजों को तहसनहस कर दिया था। इन 200 वर्षों के दौरान मिस्र, यूनान, सीरिया, फिलीस्तीन, मेसोपोटेमिया, सिंधु घाटी और यांगत्से नदी घाटी में लोगों का आव्रजन हुआ और फिर से सभ्यताएं विकसित हुर्इं। यह घटना एक विनाशकारी सूखा था और संभवत: समुद्रों तथा वायुमंडलीय धाराओं में बदलाव की वजह से हुई थी।

इस अवधि के भौतिक, भूगर्भीय प्रमाण सातों महाद्वीपों पर पाए गए हैं। इनमें मेघायल में स्थित मॉमलुह गुफा (चेरापूंजी) भी शामिल है। भूगर्भ वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के कई स्थानों से तलछट एकत्रित करके विश्लेषण किया। मॉमलुह गुफा 1290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह भारत की 10 सबसे लंबी व गहरी गुफाओं में से है (गुफा की लंबाई करीब 4500 मीटर है)। इस गुफा से प्राप्त तलछटों में स्टेलेग्माइट चट्टानें मिली हैं। स्टेलेग्माइट किसी गुफा के फर्श पर बनी एक शंक्वाकार चट्टान होती है जो टपकते पानी में उपस्थित कैल्शियम लवणों के अवक्षेपण के कारण बनती है। संघ के वैज्ञानिकों का मत है कि इस गुफा में जो परिस्थितियां हैं, वे दो युगों के बीच संक्रमण के रासायनिक चिंहों को संरक्षित रखने के हिसाब से अनुकूल हैं।

गहन अध्ययन के बाद विशेषज्ञों के एक आयोग ने यह प्रस्ताव दिया कि होलोसीन युग को तीन अवधियों में बांटा जाना चाहिए। पहली, ग्रीलैण्डियन अवधि जो 11,700 वर्ष पहले आरंभ हुई थी। दूसरी, नॉर्थग्रिपियन अवधि जो 8,300 वर्ष पूर्व शुरू हुई थी और अंतिम मेघालयन अवधि जो पिछले 4,200 वर्षों से जारी है। अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।

मेघालयन अवधि इस मायने में अनोखी है कि यहां भूगर्भीय काल और एक सांस्कृतिक संक्रमण के बीच सीधा सम्बंध नज़र आता है। (स्रोत फीचर्स)

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स्वायत्त जानलेवा रोबोट न बनाने की शपथ

कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में कार्यरत कई सारे अग्रणी वैज्ञानिकों ने शपथ ली है कि वे ऐसे रोबोट-अस्त्र बनाने के काम में भागीदार नहीं होंगे जो बगैर किसी मानवीय निरीक्षण के स्वयं ही किसी व्यक्ति को पहचानकर मार सकते हैं। शपथ लेने वालों में गूगल डीपमाइंड के सह-संस्थापक और स्पेसएक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी समेत 2400 वैज्ञानिक शामिल हैं।

इस शपथ का मुख्य मकसद सैन्य कंपनियों और राष्ट्रों को लीथल ऑटोनॉमस वेपन्स सिस्टम (जानलेवा स्वायत्त अस्त्र प्रणाली) बनाने से रोकना है। संक्षेप में इन्हें लॉस भी कहते हैं। ये ऐसे रोबोट होते हैं जो लोगों को पहचानकर उन पर आक्रमण कर सकते हैं, इन पर किसी इन्सान का निरीक्षण-नियंत्रण नहीं होता।

हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों और उनके संगठनों का कहना है कि जीवन-मृत्यु के फैसले कृत्रिम बुद्धि से संचालित मशीनों पर छोड़ने में कई खतरे हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे हथियारों की टेक्नॉलॉजी पर प्रतिबंध की मांग की है जो जनसंहार के हथियारों की नई पीढ़ी बनाने में काम आ सकती है।

इस शपथ पर हस्ताक्षर अभियान का संचालन बोस्टन की एक संस्था दी फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट कर रहा है। शपथ में सरकारों से आव्हान किया गया है कि वे जानलेवा रोबोट के विकास को गैर-कानूनी घोषित करें। यदि सरकारे ऐसा नहीं करती हैं तो हस्ताक्षरकर्ता वैज्ञानिक जानलेवा स्वायत्त शस्त्रों के विकास में सहभागी नहीं बनेंगे।

इस संदर्भ में मॉन्ट्रियल इंस्टीट्यूट फॉर लर्निंग एल्गोरिदम के योशुआ बेंजिओ का कहना है कि इस हस्ताक्षर अभियान के ज़रिए जनमत बनाने की कोशिश हो रही है ताकि ऐसे क्रियाकलापों में लगी कंपनियां और संगठन शर्मिंदा हों। उनका कहना है कि यह रणनीति बारूदी सुरंगों के मामले में काफी कारगर रही है हालांकि यूएस जैसे प्रमुख देशों ने उस मामले में हस्ताक्षर नहीं किए थे।

अधुनातन कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी से लैस रोबोट शत्रु के इलाके में उड़ान भर सकते हैं, ज़मीन पर चहलकदमी कर सकते हैं और समुद्र के नीचे निगरानी कर सकते हैं। पायलट रहित वायुयान की टेक्नॉलॉजी विकास के अंतिम चरण में है। धीरे-धीरे इन रोबोटों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि ये बगैर मानवीय नियंत्रण के स्वयं ही निर्णय लेकर क्रियांवित कर सकेंगे। कई शोधकर्ताओं को यह अनैतिक लगता है कि मशीनों को यह फैसला करने का अधिकार दे दिया जाए कि कौन जीएगा और कौन मरेगा। (स्रोत फीचर्स)

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