चंद्रमा की उम्र लगभग पृथ्वी के बराबर है!

हाल में प्रस्तुत एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि पृथ्वी (Earth) के अस्तित्व में आने के थोड़े समय बाद से ही चंद्रमा (Moon) उसका साथी रहा है। यह नया शोध बताता है कि चंद्रमा का जन्म सौर मंडल (Solar System) बनने के महज 6.5 करोड़ साल बाद ही हो गया था। यानी चंद्रमा की उम्र करीब 4.5 अरब साल है, जो पहले के अनुमानों से अधिक है।

ल्यूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC) में प्रस्तुत इस शोध में बताया गया है कि चंद्रमा का निर्माण पृथ्वी के बनने के तुरंत बाद हुआ था, जब मंगल ग्रह (Mars) के साइज़ जितना एक प्रोटो-प्लैनेट (Proto-planet) ‘थीया’ (Theia) पृथ्वी से टकराया था।

गौरतलब है कि सौर मंडल (Solar System) का निर्माण लगभग 4.56 अरब वर्ष पहले शुरू हुआ, और इसके 2-3 करोड़ साल बाद पृथ्वी आकार लेने लगी। उस समय अंतरिक्ष (Space) में भारी हलचल थी और बड़े-बड़े खगोलीय पिंडों की टक्कर एक आम बात थी। इन्हीं में से एक टक्कर युवा पृथ्वी से थीया नामक पिंड के टकराने की थी। यह टक्कर इतनी भीषण थी कि पृथ्वी से भारी मात्रा में पिघली हुई चट्टान और मलबा अंतरिक्ष में उछला, जो बाद में संघनित होकर चंद्रमा बना।

यह घटना पृथ्वी के विकास में भी महत्वपूर्ण रही। इस टक्कर से पृथ्वी की सतह पिघलकर खौलते मैग्मा के महासागर में बदल गई और इसने पृथ्वी के घूर्णन और झुकाव को स्थिर करने में मदद की। इसलिए चंद्रमा के निर्माण का सटीक समय जानकर वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि पृथ्वी अपने वर्तमान रूप में कब आई।

चंद्रमा की उम्र कैसे तय की?

कई वर्षों से वैज्ञानिक अपोलो मिशनों (Apollo Missions) द्वारा लाई गईं चंद्रमा की चट्टानों (Lunar Rocks) का अध्ययन करते आ रहे हैं। पूर्व में, जब वैज्ञानिकों ने चट्टानों का अध्ययन किया था तो पता चला था कि चंद्रमा की सतह से प्राप्त चट्टानें लगभग 4.35 अरब साल पुरानी थीं और ये चट्टानें चांद के अपने मैग्मा (Lunar Magma) से बनी थीं। तो माना गया कि चांद की उम्र लगभग उतनी ही है। लेकिन इतना युवा चंद्रमा बाकी प्रमाणों से मेल नहीं खाता।

इस पहेली को सुलझाने में बड़ी सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने चंद्रमा से मिले ज़िरकॉन क्रिस्टलों (Zircon Crystals) का अध्ययन किया। इन क्रिस्टल के रेडियोधर्मी तत्वों के विघटन से उनकी सही उम्र का पता लगाया जा सकता है। 2017 में, भू-रसायन वैज्ञानिक मेलानी बारबोनी ने आठ ज़िरकॉन रवों का विश्लेषण करके यह देखा कि इनमें मौजूद युरेनियम (Uranium) के विघटन से कितना लेड (Lead) बन चुका है। इस मापन के आधार पर बारबोनी ने निष्कर्ष निकाला कि चंद्रमा 4.51 अरब साल पुराना है।

2019 में, वैज्ञानिकों को चंद्रमा की चट्टानों में टंगस्टन (Tungsten) के हल्के आइसोटोप मिले। उस अध्ययन के मुखिया मैक्सवेल थीमेन्स ने अनुमान लगाया कि ये आइसोटोप तत्व हाफ्नियम (Hafnium) के अब विलुप्त हो चुके आइसोटोप से बने होंगे। और हाफ्नियम का यह आइसोटोप सौर मंडल के शुरू के 6 करोड़ वर्षों में ही उपस्थित था। इस खोज ने बारबोनी के निष्कर्षों को मज़बूती दी। यानी चंद्रमा उन वर्षों में बना होगा।

अब, वैज्ञानिकों ने रुबिडियम(rubidium) के स्ट्रॉन्शियम(strontium) में विघटन को मापने की एक नई विधि से इस निष्कर्ष  की पुष्टि की है। मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के थॉर्स्टन क्लाइन और उनकी टीम ने गणना की कि चंद्रमा लगभग 4.5 अरब साल पहले बना था। ये नतीजे पिछले शोधों को पुख्ता करते हैं और चंद्रमा के जन्म की एक सुसंगत समयरेखा देते हैं।

चंद्रमा बनने के बाद भी यह कोई शांत खगोलीय पिंड नहीं था। आरंभ में इसकी पूरी सतह पिघले हुए लावा के महासागर (lava ocean) से ढंकी थी, जो धीरे-धीरे ठंडी होकर ठोस बन गई। लेकिन शोध बताते हैं कि पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव ने इसकी सतह को दोबारा गर्म कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे बृहस्पति (Jupiter) के असर से उसके चंद्रमा ‘आयो’(Io) पर भीषण ज्वालामुखीय गतिविधि देखी जाती है। एक अन्य सिद्धांत के अनुसार, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (lunar south pole) पर किसी विशाल उल्कापिंड की टक्कर (asteroid impact) ने इसकी सतह को नया रूप दिया होगा। इनमें से किसी एक वज़ह से चंद्रमा की उम्र का सही अनुमान लगाना जटिल हो गया। अपोलो द्वारा लाए गए नमूनों को इस नए दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है। हो सकता है कि वे पिघलकर वापिस ठोस बन गए चंद्रमा के होंगे, मूल रूप में निर्मित चंद्रमा के नहीं।

चीन का चांग’ई-6 मिशन (Chang’e 6 Mission), जो चंद्रमा की दूरस्थ सतह से लगभग 2 किलोग्राम चट्टानें लेकर लौटा है, इस रहस्य पर और प्रकाश डाल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चट्टानों में हवा के बुलबुलों में छिपा पृथ्वी का अतीत

रबों  वर्षों में पृथ्वी के वातावरण (Earth’s atmosphere) में काफी परिवर्तन हुए हैं, जिससे जीवन (life evolution) के विकास की दिशा तय हुई। वैज्ञानिकों (scientists) ने ध्रुवों पर जमा बर्फ की परतों से पिछले 60 लाख वर्षों का वायुमंडलीय डैटा (atmospheric data) निकाला है, लेकिन यह डैटा पृथ्वी (Earth) के 4.5 अरब साल के इतिहास का बहुत छोटा हिस्सा है।

प्राचीन समय में वायु में कौन-से घटक कितनी मात्रा में थे, इसका पता वैज्ञानिक केवल चट्टानों (rocks) और खनिजों (minerals) में छिपे अप्रत्यक्ष प्रमाणों से लगाते आए हैं। लेकिन अब, एक नई तकनीक (new technique) से अधिक सटीक जानकारी मिल रही है – प्राचीन चट्टानों, लवणों और लावा (lava) में फंसे सूक्ष्म वायु बुलबुलों (air bubbles) का विश्लेषण। 

वैज्ञानिक यह जानते हैं कि 4.5 अरब वर्ष पूर्व जब पृथ्वी का निर्माण (Earth formation) हुआ, तब उसकी सतह पिघली हुई चट्टानों (magma) से ढंकी थी। इस मैग्मा से रिसी गैसों, और आगे चलकर ज्वालामुखी विस्फोटों (volcanic eruptions), क्षुद्रग्रहों (asteroids) की बौछार के कारण मुक्त गैसों ने एक प्रारंभिक वातावरण (early atmosphere) बनाया। समय के साथ, नाइट्रोजन (nitrogen) अपनी स्थिरता के कारण मुख्य गैस बन गई, जबकि हाइड्रोजन (hydrogen) और हीलियम (helium) जैसी हल्की गैसें अंतरिक्ष में विलीन हो गईं। ऑक्सीजन (oxygen) लगभग न के बराबर थी, जब तक कि लगभग 3 अरब साल पूर्व प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) करने वाले सूक्ष्मजीवों ने इसे धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ना शुरू नहीं किया।

फिर, वैज्ञानिक यह भी जानते थे कि चट्टानों में प्राचीन वायु (ancient air) कैद हो सकती है, लेकिन इन गैसों को निकालना और विश्लेषण (gas analysis) करना बेहद कठिन था। अब, वैज्ञानिक एक वैक्यूम-सील प्रेस (vacuum-sealed press) में प्राचीन चट्टानों को धीरे-धीरे दाब बढ़ाते हुए कुचलते हैं, जिससे उसमें फंसी हुई गैस निकलती है। इस गैस का विश्लेषण मास स्पेक्ट्रोमीटर (mass spectrometer) से किया जाता है।

सर्वप्रथम भू-रसायनविद (geochemist) बर्नार्ड मार्टी ने 2010 के दशक में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (Western Australia) के क्वार्ट्ज़ (quartz) और बैराइट भंडारों में फंसी गैस का विश्लेषण किया था। और पहली बार 3 अरब साल से भी अधिक पुराने वायुमंडलीय नमूने (atmospheric samples) उपलब्ध कराए। उसके बाद से इस तकनीक के इस्तेमाल से कई अध्ययन (research studies) हुए हैं। 

ऑक्सीजन की उपस्थिति : पहले वैज्ञानिक मानते थे कि लगभग 80 करोड़ साल पहले तक पृथ्वी के वातावरण में ऑक्सीजन बहुत कम थी, और तभी इसके स्तर में अचानक वृद्धि हुई, जिससे जंतुओं (animals) का विकास संभव हुआ। लेकिन विभिन्न अध्ययन (scientific studies) अलग-अलग निष्कर्ष देते हैं।

बोरिंग बिलियन: वैज्ञानिक 1.8 अरब से 80 करोड़ साल पहले के कालखंड को “बोरिंग बिलियन” (Boring Billion) कहते हैं, क्योंकि इस दौरान जलवायु (climate), टेक्टोनिक्स (tectonics) और जैव विकास (biological evolution) में कोई खास बदलाव नहीं दिखता था। लेकिन 1.4 अरब साल पुराने लवण (ancient salts) के क्रिस्टलों से पता चला है कि उस समय ऑक्सीजन स्तर अपेक्षा से अधिक था। इससे यह संकेत मिलता है कि जटिल जीवन (complex life) के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उस समय मौजूद रही होंगी।

नोबल गैसें : नोबल गैसें (noble gases), जैसे आर्गन (argon), नीऑन (neon) और ज़ीनॉन (xenon), रासायनिक रूप से अन्य तत्वों के साथ अभिक्रिया नहीं करतीं। इसलिए वे पृथ्वी के वायुमंडलीय परिवर्तनों (atmospheric changes) को समझने में उपयोगी होती हैं।

भारत में 2 अरब साल पुराने उल्कापिंड टकराव स्थल (meteorite impact site) के अध्ययन से पता चला है कि उस समय ज्वालामुखीय गतिविधि (volcanic activity) कई करोड़ वर्षों तक धीमी हो गई थी, जिससे पृथ्वी के आंतरिक भाग से गैसों का उत्सर्जन (gas emissions) भी कम हुआ। इसी प्रकार, ग्रीनलैंड (Greenland) की 3 अरब साल पुरानी चट्टानों में फंसी गैसों के अध्ययन से यह संकेत मिला कि ये गैसें प्राचीन पृथ्वी के मेंटल (Earth’s mantle) और समुद्री जल (ocean water) से आई थीं। ये खोजें (discoveries) हमें यह समझने में मदद करती हैं कि पृथ्वी का वायुमंडल (Earth’s atmosphere) कैसे बना और विकसित हुआ। इन खोजों के बावजूद, वैज्ञानिकों ने अभी केवल सतह को ही कुरेदा है। भविष्य की संभावनाएं (future possibilities) कई हैं। वे और भी प्राचीन चट्टानों के नमूने (ancient rock samples) इकट्ठा करेंगे, गैस निकालने की तकनीकों (gas extraction techniques) में सुधार करेंगे और यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि क्या ये वायुमंडलीय सुराग (atmospheric clues) जीवन की उत्पत्ति (origin of life) को समझने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्र की अतल गहराइयों में छिपी अद्भुत दुनिया

प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की अथाह गहराइयों में एक रहस्यमयी दुनिया छिपी हुई है। मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench) पृथ्वी के महासागरों की सबसे गहरी जगह है। यहां गहराई लगभग 11,000 मीटर तक है। इतनी गहराई पर दाब (pressure) बहुत अधिक, ठंड (temperature) अकल्पनीय और अंधकार (darkness) भी घटाटोप होता है। ये परिस्थितियां इस जगह को पृथ्वी की सबसे प्रतिकूल और दूभर परिस्थितियों में शुमार करती हैं। लेकिन हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इन परिस्थितियों में भी जीवन (deep-sea life)  की हैरतअंगेज़ विविधता मौजूद है। यह विविधता गहरे समुद्र की पारिस्थितिकी (deep ocean ecosystem) के बारे में हमारी वर्तमान समझ को ललकारती है।

हाल ही में, चीन के वैज्ञानिकों ने फेंडोज़े पनडुब्बी (Fendouzhe Submarine) के ज़रिए मैरियाना ट्रेंच की गहराइयों में गोता लगाया है। जैसे-जैसे वे नीचे उतरे, उन्होंने अंधकार में दीप्ति बिखेरने वाले जीव (bioluminescent organisms) देखे; जो हरी, पीली और नारंगी चमक बिखेर रहे थे। समुद्र के पेंदे (ocean floor) पर पहुंचने पर टीम ने जब रोशनी चालू की, तो उन्हें एक विस्मयकारी नीली दुनिया दिखाई दी, जहां प्लवकों (plankton) की भरमार थी।

यह खोज मैरियाना ट्रेंच पर्यावरण और पारिस्थितिकी अनुसंधान (MEER – Mariana Trench Ecology and Environment Research) परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत किए गए अध्ययन सेल पत्रिका (cell journal) में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध की सबसे चौंकाने वाली खोज 7000 से अधिक नए सूक्ष्मजीवों (new microbes, deep-sea bacteria) की पहचान है, जिनमें से 89 प्रतिशत विज्ञान के लिए पूरी तरह नए हैं। ये सूक्ष्मजीव हैडल ज़ोन (hadal zone – 6000 से 11,000 मीटर की गहराई) की कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विकसित हैं।

गौरतलब है कि कुछ सूक्ष्मजीवों (microorganisms) के जीनोम (genome sequencing) बहुत कुशल होते हैं, जो सीमित कार्यों के लिए अनुकूलित होते हैं। जबकि कुछ अन्य के जीन (genes) अधिक जटिल होते हैं, जिससे वे बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढाल सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide metabolism) जैसी गैसों को अपना भोजन बनाते हैं। यह क्षमता उन्हें पोषक तत्वों की कमी (nutrient-poor environment) वाले समुद्री वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।

आगे के इस अध्ययन में एम्फिपॉड्स (amphipods – छोटे झींगे जैसे जीव) पर ध्यान दिया गया, जो समुद्री खाइयों (deep-sea trench) में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों (scientists) ने पाया कि ये जीव गहरे समुद्र में रहने वाले बैक्टीरिया (deep sea symbiotic bacteria) के साथ सहजीवी सम्बंध रखते हैं। उनकी आंतों में सायक्रोमोनास (Psychromonas bacteria) नामक बैक्टीरिया काफी संख्या में मिले, जो ट्राइमेथिइलएमाइन एन-ऑक्साइड (TMAO – Trimethylamine N-oxide) नामक एक यौगिक का निर्माण करने में मदद करते हैं। TMAO गहरे समुद्र के अत्यधिक दाब (extreme pressure adaptation)से जीवों की रक्षा करने में अहम भूमिका निभाता है।

शोध के तीसरे चरण में यह समझने की कोशिश की गई कि गहरे समुद्र की मछलियां (deep-sea fish) अत्यधिक दाब और ठंडे तापमान में कैसे जीवित रहती हैं। जेनेटिक विश्लेषण (genetic analysis) से पता चला कि 3000 मीटर से अधिक गहराई में रहने वाली मछलियों में एक विशेष जेनेटिक परिवर्तन (genetic mutation) होता है, जो उनकी कोशिकाओं को अधिक कुशलता से प्रोटीन बनाने (protein synthesis) में मदद करता है। यह अनुकूलन उन्हें समुद्री दाब से बचने में सहायता करता है।

शोध से यह भी पता चला कि विभिन्न जीवों ने गहरे समुद्र में कब शरण (deep-sea migration) ली होगी। मसलन, ईल मछलियां (eel fish)  शायद लगभग 10 करोड़ साल (100 million years ago) पहले गहरे समुद्र में चली गई होंगी जिसकी वजह से वे डायनासौर विलुप्ति (dinosaur extinction) वाली घटना से बच गई होंगी। इसी तरह स्नेलफिश (Snailfish) लगभग 2 करोड़ साल पहले (20 million years ago) समुद्र की गहरी खाइयों में पहुंच गई होगीं। यह वह समय था जब पृथ्वी पर टेक्टोनिक हलचल (tectonic activity) सबसे अधिक थी यानी धरती के भूखंड तेज़ी से इधर-उधर भटक रहे थे। 

ये निष्कर्ष इस बात को नुमाया करते हैं कि गहरा समुद्र (deep sea) लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और ऑक्सीजन के उतार-चढ़ाव के दौरान कई जीवों को पनाह देता रहा है। 

इन रोमांचक खोजों के साथ-साथ वैज्ञानिकों ने गहरे समुद्र में कुछ चिंताजनक चीज़ें (deep-sea pollution) भी देखीं; उन्हें मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench) और याप ट्रेंच (Yap Trench) में प्लास्टिक बैग(plastic pollution), बीयर की बोतलें (beer bottles), सोडा कैन (soda can) और एक टोकरी (basket) भी मिली है। यह दर्शाता है कि मानव गतिविधियों का असर (human activities impact) दूरस्थ और दुगर्म क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। 

हालांकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ बैक्टीरिया (bacteria) इन प्रदूषकों (pollutants) का इस्तेमाल ऊर्जा स्रोत (energy source) के रूप में करने में सक्षम हैं। इससे लगता है कि भविष्य में समुद्री बैक्टीरिया (marine bacteria) पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकते हैं।

बहरहाल, समुद्र की अधिकांश गहराइयां अब भी अनदेखी हैं। संभव है कि वहां भी असंख्य अनजाने जीव (undiscovered species) हैं। MEER की योजना आगे भी ऐसे अध्ययन जारी रखने की है। (स्रोत फीचर्स)

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गाज़ा: तबाही के साये में शोध कार्य

युद्ध (war), तबाही (destruction) और अनिश्चितता (uncertainty) के बावजूद, गाज़ा (Gaza) के वैज्ञानिक (scientists) अपने शोध (research) कार्य जारी रख रहे हैं। वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि शोध (scientific research) न केवल विनाश (documentation of destruction) के दस्तावेज़ीकरण और पुनर्निर्माण (reconstruction efforts) प्रयासों में मदद करता है, बल्कि मानवीय संकटों (humanitarian crisis) के समाधान के लिए भी आवश्यक है। 19 जनवरी को हमास (Hamas) और इस्राइल (Israel) के बीच अस्थायी संघर्ष विराम (ceasefire) से वैज्ञानिकों को स्थिति का आकलन करने का अवसर मिला है।

न्यूरोसाइंटिस्ट (neuroscientist) खमीस एलसी, जो वर्तमान में घायलों का इलाज कर रहे हैं, युद्ध के प्रभावों को दर्ज करने और प्रकाशित करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। इसी तरह, जलवाहित रोगों (waterborne diseases) के विशेषज्ञ सामर अबूज़र सुधार व पुनर्निर्माण में शोध (scientific studies) की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, विज्ञान (science) और शिक्षा (education) के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के चलते वैज्ञानिकों (Gaza scientists) ने अपना काम जारी रखा है।

युद्ध (conflict) के कारण गाज़ा की 22 लाख आबादी में से 90 प्रतिशत बेघर (homeless) हो गई है। भोजन (food crisis), पानी (water shortage), स्वास्थ्य सेवाएं (healthcare services) और शिक्षा (education crisis) जैसी बुनियादी सुविधाएं या तो नष्ट हो गई हैं या अत्यधिक सीमित रह गई हैं। बमबारी (airstrikes) से तबाह इलाकों से मलबा हटाना एक बड़ी चुनौती है। गाज़ा (Palestine conflict) के प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में करीब 100 किलोग्राम मलबा जमा है जिसमें खतरनाक पदार्थ (hazardous materials) भी मौजूद हैं।

गाज़ा में पानी (clean water crisis) की स्थिति भी गंभीर है। यहां 97 प्रतिशत पानी भूजल स्रोतों (groundwater contamination) से आता है, जो अत्यधिक असुरक्षित हैं और इनके दूषित होने का खतरा भी है। युद्ध (war damage) से पहले भी महज 10 प्रतिशत लोगों को साफ पानी (safe drinking water) मिलता था, लेकिन अब मात्र 4 प्रतिशत लोगों को ही मिल रहा है। टूटी-फूटी सीवेज लाइन (damaged sewage system) के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे डायरिया (diarrhea) और हेपेटाइटिस (hepatitis outbreak) जैसी जलवाहित बीमारियों (waterborne infections) का खतरा बढ़ गया है।

युद्ध (war crisis) के कारण गाज़ा (Gaza universities) के 21 उच्च शिक्षण संस्थानों में से 15 बुरी तरह क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके हैं। अस्पतालों (hospitals in Gaza) की स्थिति भी गंभीर है – लगभग आधे पूरी तरह बंद हैं, जबकि बाकी सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों (chronic diseases) से जूझ रहे 11,000 मरीज़ों को न तो इलाज मिल रहा है और न ही उनके पास विदेश में उपचार का कोई अवसर है।

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि सबसे पहले आवास (housing rehabilitation), सीवेज मरम्मत (sewage repair) और स्वास्थ्य सेवाओं (health services restoration) को बहाल करना ज़रूरी है। ऑनलाइन-लर्निंग विशेषज्ञ (online education expert) आया अलमशहरावी अस्थायी शिविर (temporary shelters) और घरों के पुनर्निर्माण (home reconstruction) के लिए तुरंत कदम उठाने की अपील कर रही हैं। वे खुद एक बमबारी (bombing survivor) में बचीं, जिसमें उनके अपार्टमेंट में 30 लोगों की जान चली गई, और अब वे एक शरणार्थी शिविर (refugee camp) में रह रही हैं।

भारी विनाश (mass destruction) के बावजूद, गाज़ा (Gaza research community) के वैज्ञानिक समुदाय का संकल्प अटूट है। वे इस संकट (ongoing crisis) का दस्तावेज़ीकरण कर रहे हैं और भविष्य के पुनर्निर्माण (future rebuilding) में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह साबित करता है कि युद्ध (war-torn regions) के कठिन समय में भी ज्ञान (knowledge) और शोध (scientific progress) को आगे बढ़ते रहना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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गाज़ा: बच्चों पर युद्ध का मनोवैज्ञानिक असर

हालिया अध्ययन ने गाज़ा के बच्चों पर युद्ध के विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभावों (psychological Impacts) का एक दिल दहला देने वाला खुलासा किया है। पता चला है कि 96 प्रतिशत बच्चों का मानना है कि उनकी मृत्यु अवश्यंभावी है। वॉर चाइल्ड एलायंस (Child war alliance) के सहयोग से गाज़ा स्थित एक एनजीओ (NGO) द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में बच्चों के गहरे भावनात्मक और मानसिक संकट को उजागर किया गया है। इस अध्ययन में शामिल लगभग आधे बच्चों ने अपने ऊपर होने वाले भारी आघात के कारण मरने की इच्छा व्यक्त की है। 

यह रिपोर्ट गाज़ा में जीवन की जो तस्वीर पेश करती है, उसमें बच्चे लगातार डर(Fear), चिंता(Anxiety) और क्षति से जूझ रहे हैं। लगभग 79 प्रतिशत बच्चे दुस्वप्न (Nightmares) देखते हैं, 73 प्रतिशत में आक्रामकता(Aggression) के लक्षण दिखाई देते हैं, और 92 प्रतिशत को अपने वर्तमान हालात को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस होती है। ये लक्षण उस गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संकेत हैं, जो बमबारियां(Bombardments) देखने, अपनों को खोने और घर से बेघर होने जैसी त्रासदियों का सामना करने से पड़े हैं।

इस सर्वे में 504 बच्चों के देखभालकर्ताओं से जानकारी जुटाई गई। इनमें से कई परिवारों में विकलांग, घायल या अकेले रह रहे बच्चे हैं। यह गाज़ा में 19 लाख से अधिक विस्थापित फिलिस्तीनियों(Palestinians) के मानवीय संकट को उजागर करता है, जिनमें से आधे बच्चे हैं। इनमें से कई बच्चों को बार-बार अपने मोहल्लों से भागने पर मजबूर होना पड़ा है, और अनुमान है कि लगभग 17,000 बच्चे अब अपने माता-पिता (Parents) से बिछड़ चुके हैं। 

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन अनुभवों के गहरे और स्थायी प्रभाव हो सकते हैं। बुरे सपने देखना, सामाजिक रूप से अलग-थलग होना, एकाग्रता में कठिनाई और यहां तक कि शारीरिक दर्द जैसी समस्याएं आम हैं। रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ऐसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं (mental health problems) लंबे समय तक भावनात्मक और व्यवहारिक बदलाव ला सकती हैं, जिससे सदमा पीढ़ियों तक बना रह सकता है।

यह अच्छी बात है कि राहत पहुंचाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं, जिसमें वॉर चाइल्ड (war child) और उसके साझेदारों ने 17,000 बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता (mental health support) दी है। लेकिन संकट का पैमाना बहुत बड़ा है, और संगठन का लक्ष्य अगले तीन दशकों में अपनी सबसे बड़ी मानवीय प्रतिक्रिया के तहत 10 लाख बच्चों की मदद करना है। 

वॉर चाइल्ड यूके (war child UK) की सीईओ हेलेन पैटिन्सन ने मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य आपदा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संकट में बदलने से रोकने के लिए तुरंत अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया। उन्होंने गाज़ा के बच्चों पर पड़े अदृश्य घावों के साथ-साथ घरों, अस्पतालों और स्कूलों के विनाश को दूर करने के लिए वैश्विक हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

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त्रासदी के 40 साल बाद भी भारत में ढीले कानून – विवेक मिश्रा

भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) के चालीस साल हो गए हैं, और इन चालीस सालों में भारत दुनिया का छठवां सबसे बड़ा रसायन उत्पादक देश बन गया है। तेज़ी से बढ़ते रसायन उद्योग के साथ भारत में रासायनिक दुर्घटनाएं (chemical accidents) भी बढ़ रही हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों है?

कोविड-19 महामारी (2020-2023) के दौरान भारत में 29 रासायनिक दुर्घटनाएं हुईं। इन दुर्घटनाओं में 118 मौतें हुईं और लगभग 257 लोग घायल हुए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इन दुर्घटनाओं का कारण प्लांट की खराबी, रासायनिक रिसाव (chemical leakage), विस्फोट (explosion) और फैक्ट्री में आग लगना पाया है।

वैज्ञानिकों के एक समूह साइंटिस्ट फॉर पीपल (scientist for people) ने 2021 में एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद भी रासायनिक प्रक्रियाओं के लिए सुरक्षा सम्बंधी नियम-कायदों में कोई सुधार नहीं हुआ है।

भारत का फलता-फूलता औद्योगिक क्षेत्र लगातार ट्रेड सीक्रेट संरक्षण कानून (Trade secret protection law) की मांग कर रहा है। ऐसे कानून कंपनियों को बौद्धिक संपदा की आड़ में महत्वपूर्ण जानकारी गोपनीय रखने की अनुमति देते हैं। एक ओर जहां ट्रेड सीक्रेट को गोपनीय रखना किसी कंपनी को प्रतिस्पर्धात्मक फायदा दे सकता है, वहीं दूसरी ओर, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम पैदा करने वाली कंपनियां अक्सर इस गोपनीयता का दुरुपयोग करती हैं। ट्रेड सीक्रेट संरक्षण कानून की अनुपस्थिति में, कंपनियां फिलहाल व्यावसायिक प्रक्रियाओं की जानकारी उजागर होने से रोकने के लिए गैर-प्रकटीकरण (नॉन-डिसक्लोज़र) समझौतों पर निर्भर हैं।

पश्चिम बंगाल नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज़ (west Bengal national university of juridical sciences) के प्रोफेसर अनिरबन मजूमदार कहते हैं, “कंपनियां खुद को बचाने के लिए गैर-प्रकटीकरण समझौतों का उपयोग करती हैं, और भारत में ट्रेड सीक्रेट को लेकर कोई विशिष्ट कानून नहीं है। सूचना का अधिकार अधिनियम(RTI), 2005  की धारा 8(i) के तहत सार्वजनिक हित के उद्देश्य से बौद्धिक संपदा और ट्रेड सीक्रेट से सम्बंधित जानकारी मांगने की अनुमति देता है, लेकिन यह अधिनियम निजी कंपनियों पर लागू नहीं होता है।“

मजूमदार एक उदाहरण के तौर पर भोपाल गैस त्रासदी का हवाला देते हैं। “डॉऊ केमिकल्स(Dow Chemicals), जिसने 2001 में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (Union Carbide Corporation) का अधिग्रहण किया था, ने रिसी हुई गैस के रासायनिक संघटन (chemical composition) का खुलासा करने से इन्कार कर दिया था। यदि संघटन उजागर कर दिया जाता तो उसके आधार पर पीड़ितों का प्रभावी ढंग से इलाज किया जा सकता था। यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन 1950 के दशक से ही ट्रेड सीक्रेट संरक्षण का उपयोग कर रहा है।

मिक का उपयोग जारी है 

यहां भोपाल गैस त्रासदी एक प्रासंगिक उदाहरण होगा क्योंकि भारत में मिथाइल आइसोसाइनेट (mic) का उपयोग अब तक जारी है। मिक को खतरनाक रसायनों के निर्माण, भंडारण और आयात नियम, 1989 (अनुसूची 1) के तहत एक खतरनाक रसायन के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

डाउन टू अर्थ द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिक के उपयोग की मात्रा और स्थानों के बारे में सवाल के जवाब में रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग ने जानकारी नहीं दी। मजूमदार बताते हैं कि कुछ रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि डाऊ केमिकल्स सिंगापुर स्थित कंपनी मेगा वीसा के माध्यम से भारत में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के उत्पादों का व्यापार जारी रखे हुए है।

टॉक्सिक्स वॉच अलाएंस के गोपाल कृष्ण ने उजागर किया है कि कई खतरनाक रसायनों (hazardeous chemicals) को अभी भी ‘खतरनाक’ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है या ‘दर्ज’ करने योग्य ही नहीं माना गया है। उनका आरोप है कि भोपाल में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के अनुसंधान और विकास केंद्र ने अमेरिका में युद्ध हथियार निर्माण के लिए प्रतिबंधित गैसों और रसायनों के साथ प्रयोग किए हैं। त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार गैस की सटीक पहचान आज भी अज्ञात है।

यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन का भोपाल संयंत्र कीटनाशक कार्बेरिल (sevin) के निर्माण के लिए मिक का उपयोग एक मध्यवर्ती के रूप में करता था। इसे त्रासदी के लगभग तीन दशक बाद 8 अगस्त, 2018 को भारत में प्रतिबंधित किया गया। प्रतिबंध लगाने में इस देरी का कारण बताया नहीं गया है।

हमारा भोजन

इस बीच, कई खतरनाक कृषि रसायन नियमन/नियंत्रण से बाहर बने हुए हैं। जैसे संश्लेषित कीटनाशक डीडीटी (DDT) (डाइफिनाइलट्राइक्लोरोइथेन), जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरनाक है। वैश्विक स्तर पर चरणबद्ध तरीके से इसे समाप्त किए जाने के निर्णय के बावजूद भारत में, एचआईएल लिमिटेड (HIL Limited) के माध्यम से अफ्रीकी देशों को निर्यात के लिए इसका उत्पादन जारी है। 17वीं लोकसभा की रसायन और उर्वरक स्थायी समिति (2023-24) के अनुसार, सरकार ने डीडीटी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की बात को दिसंबर 2024 तक के लिए टाल दिया है।

2022 में, पेस्टिसाइड्स एक्शन नेटवर्क इंडिया (PAN India) ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी: भारत में क्लोरपाइरीफॉस, फिप्रोनिल, एट्राज़ीन और पैराक्वाट डाइक्लोराइड की स्थिति। रिपोर्ट में मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और अन्य जीवों पर गंभीर जोखिमों के कारण अत्यधिक विषैले कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की तत्काल आवश्यकता बताई गई है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी 1989 की अधिसूचना के माध्यम से, खतरनाक रसायन (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियमों की अनुसूची 1 के तहत 684 खतरनाक रसायनों को सूचीबद्ध किया है। अलबत्ता, इस सूची से कई खतरनाक रसायन नदारद हैं। गोपाल कृष्ण के अनुसार, यह एक अत्यंत सीमित सूची है। भारत में अब तक एस्बेस्टस जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग हो रहा है।

भारत में अनियंत्रित या अल्प-नियंत्रित संश्लेषित रसायनों का एक और उदाहरण है: पर-एंड-पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ (PFAS), जिन्हें ‘शाश्वत रसायन’ भी कहा जाता है। नॉन-स्टिक बर्तन, खाद्य पैकेजिंग और जल-रोधी उत्पादों में खूब उपयोग किए जाने वाले PFAS पर्यावरण में बने रहने और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। युरोपीय रसायन एजेंसी ने युरोप में इन्हें नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन इस संदर्भ में भारत में कोई प्रगति नहीं हुई है।

अक्टूबर 2024 में डाउन टू अर्थ ने एक बार फिर सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिक और अन्य खतरनाक रसायनों पर जानकारी तलब की थी। रसायन विभाग का जवाब था, “सूचना अधिकारी के पास ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।” यदि ट्रेड सीक्रेट संरक्षण विधेयक, 2024 पारित हो जाता है तो कंपनियों को, राष्ट्रीय आपात स्थिति या सार्वजनिक हित के मामलों को छोड़कर, महत्वपूर्ण जानकारी रोकने की और अधिक शक्ति मिल जाएगी।

भारत में रसायन उद्योग का विस्तार जारी है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय का अनुमान है कि 2040 तक यह 1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। रासायनिक प्रबंधन और सुरक्षा नियमों का मसौदा अधूरा है: भारत में अमेरिका या युरोपीय संघ के जैसे व्यापक नियमों का अभाव है। इसके अलावा, भारत में न तो कोई रासायनिक सूची है या न ही रासायनिक पंजीकरण अनिवार्य है।

पब्लिक पॉलिसी और PAN India से जुड़े नरसिम्हा रेड्डी दोंती का कहना है, “हमारे पास शस्त्र कानून जैसे मज़बूत कानून का अभाव है। बंदूक रखने पर सात वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा हो सकती है, लेकिन खतरनाक रसायनों से भरा डिब्बा खरीदने पर अक्सर कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ता। हमें क्रियान्वयन के लिए सख्त कानून, नियम और संस्थागत तंत्र की आवश्यकता है।”

टॉक्सिक्स लिंक के पीयूष महापात्रा बताते हैं कि मौजूदा नीतियां औद्योगिक हितों को प्राथमिकता देती हैं और रासायनिक प्रबंधन और खतरे के वर्गीकरण को नज़रअंदाज़ करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और समझौतों में शामिल होने के बावजूद नीतियों का कार्यान्वयन बदतर बना हुआ है।

लगभग पांच साल पहले 2019 में, डाउन टू अर्थ ने ई-मेल के माध्यम से बातचीत के एक लंबी शृंखला में देश में मिक के उत्पादन और उपयोग पर सरकार से जानकारी मांगी थी। उत्तर मिला: “रसायन विभाग के संयुक्त सचिव मिक जैसी विषाक्त गैस की अधिसूचना पर काम कर रहे हैं। उनके संपर्क में रहें।” अब तक मंत्रालय की ओर से ऐसी कोई अधिसूचना नहीं आई है। रसायन (प्रबंधन और सुरक्षा) नियमों का मसौदा तैयार है, लेकिन अभी तक इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

हालांकि भारत में रासायनिक उद्योग के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करने वाले 15 कानून और 19 नियम हैं, लेकिन उनमें से कोई भी विशेष रूप से रसायनों के उपयोग, उत्पादन और सुरक्षा को पूरे उद्योग के स्तर पर संबोधित नहीं करता। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व वैज्ञानिक डीडी बसु ने ज़ोर देकर कहा है, “हमें रासायनिक उपयोग, उत्पादन और सुरक्षा को विनियमित करने के लिए व्यापक कानून की आवश्यकता है।”

अन्य देश हानिकारक रसायनों पर नियंत्रण और प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को गति दे रहे हैं, लेकिन भारत इसमें अभी भी पिछड़ा है। दोंती का निष्कर्ष है, “भारत को एक मज़बूत नियामक ढांचे की आवश्यकता है जो न केवल ट्रेड सीक्रेट को संबोधित करता हो बल्कि आपूर्ति शृंखलाओं में पारदर्शिता भी सुनिश्चित करता हो। उद्योगों ने ऐसी प्रणालियां बनाई हैं जो उन्हें जांच से बचाती हैं जबकि जनता को नुकसान पहुंचाती हैं।” (स्रोत फीचर्स)

यह लेख मूलत: डाउन टू अर्थ में अंग्रेज़ी में Bhopal Gas Tragedy at 40: Harmful chemicals, including methyl isocyanate, are still used in India due to lax laws; can this change?  शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रकृति में सोने के डले कैसे बनते हैं – माधव केलकर

सोना एक बहुमूल्य धातु है। दुनिया के सभी देश अपनी मुद्राओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निश्चित स्वर्ण भंडार बनाए रखते हैं। लेकिन धरती पर सोने की मौजूदगी बेहद कम है। दुनिया में सोने की खदानों पर एक नज़र डालेंगे तो चीन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, अमरीका, कनाडा, रूस जैसे देश सोने के प्रमुख उत्पादक देश हैं। भारत में सोने का उत्पादन कर्नाटक व आंध्रप्रदेश में मौजूद खदानों से होता है। कुछ प्रमुख तांबा खदानों में भी सोना मिलता है। वहीं झारखंड की स्वर्णरेखा नदी में बेहद कम मात्रा में रेत के साथ सोने के कण मिलते हैं इन्हें स्थानीय लोग रेत को धोकर-छानकर प्राप्त करते हैं। 

सोना उन धातुओं में शुमार है जो प्रकृति में मुक्त रूप में मिलता है। आम तौर पर तत्वों के अयस्क ऑक्साइड, कार्बोनेट, सल्फेट, क्लोराइड के रूप में मिलते हैं। जैसे हीमेटाइट, मैग्नेटाइट, सिडेराइट, पायराइट, चाल्कोपायराइट आदि। लेकिन सोना, चांदी शुद्ध (Pure Metal) रूप में भी मिलते हैं। साथ ही, अन्य अयस्कों के साथ भी मिल सकते हैं। जैसे सोना तांबे के अयस्क चाल्कोपायराइट के साथ भी मिलता है हालांकि चाल्कोपायराइट में सोने की मात्रा बेहद कम होती है। सोना जिस खनिज के साथ सबसे ज़्यादा मिलता है वह है क्वार्ट्ज़ (Quartz) यानी सिलिका का ऑक्साइड। क्वार्ट्ज़ धरती की सतह से कुछ किलोमीटर नीचे तक चट्टानों के रूप में पाया जाता है। क्वार्ट्ज़ की दरारों में सोने के कण एकत्रित होते जाते हैं। इन दरारों तक कई खनिजों के तरल गरम मिश्रण, जिन्हें हाइड्रोथर्मल तरल (Hydrothermal Fluids) कहा जाता है, के साथ सोना इन क्वार्ट्ज़ दरारों तक आता है और इन दरारों में इकट्ठा होने लगता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और सोने के बड़े-बड़े डिगले या डले बनते जाते हैं। 

क्वार्ट्ज़ की दरारों में सोने के इस जमाव को लेकर काफी शोध एवं नए विचार सामने आए हैं। हाल में ही नेचर जियोसाइंस (Nature Geoscience) में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि धरती पर आने वाले भूकंप क्वार्ट्ज़ में आवेशों को उत्तेजित कर सकते हैं जिससे हाइड्रोथर्मल तरल में तैर रहे मुक्त सोने के कण क्वार्ट्ज़ पर एकत्रित होते जाते हैं। अभी तक इस परिकल्पना की जांच प्रयोगशाला स्तर पर करके देखी गई है। धरती के भूगर्भीय हालात में इसका अध्ययन किया जाना बाकी है। 

सामान्य तौर पर सोने के बड़े डिगले या डले क्वार्ट्ज़ शिराओं या दरारों में पाए जाते हैं। भूवैज्ञानिक काफी पहले से यह जानते थे कि सोने से भरपूर हाइड्रोथर्मल तरल इन दरारों में जमा होते हैं। दरारों के बनने का सिलसिला धरती के भीतर उठने वाले भूकंप (Earthquakes) या विविध बलों की वजह से होता है। सोने के कण इस गरम तरल पदार्थ में घुले हुए नहीं होते बल्कि इसमें तैर रहे होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस गरम तरल में सोने की सांद्रता बहुत ज़्यादा होती हो। एक अनुमान है कि पांच स्वीमिंग पूल में मौजूद पानी के बराबर गरम तरल में एक किलो सोने की डली बनने लायक सोने के कण हो सकते हैं। 

सवाल यह है कि जब गरम तरल में सोने के कण इतने बिखरे-बिखरे हुए होते हैं तो ये चिपककर इतनी बड़ी डली कैसे बना लेते हैं। मोनाश विश्वविद्यालय (Monash University) के भूविज्ञानी क्रिस्टोफर वोइसी और उनके सहकर्मियों को लगा कि इसका जवाब दाब-विद्युत यानी पीज़ोइलेक्ट्रिक (Piezoelectric Effect) प्रभाव में छुपा हो सकता है। 

क्वार्ट्ज़ एक पीज़ोइलेक्ट्रिक पदार्थ (Piezoelectric Material) है, यानी जब इस पर यांत्रिक तनाव (Mechanical Stress) आरोपित किया जाता है तो इसमें विद्युत आवेश पैदा होता है। यह विद्युत तरल पदार्थ में मौजूद सोने के आयनों को ठोस सोना (Solid Gold) बनाने का कारण बन सकती है। ठोस सोना क्वार्ट्ज़ के विद्युत क्षेत्र में एक कंडक्टर के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे घोल में मौजूद अधिक सोने के आयन एक ही स्थान पर आकर्षित होते हैं और अंततः एक साथ चिपक जाते हैं। लेकिन क्या भूकंप क्वार्ट्ज़ में पर्याप्त पीज़ोइलेक्ट्रिक वोल्टेज स्थापित कर सकता है जिससे ऐसा सब घटित हो?  इसका परीक्षण करने के लिए, टीम ने क्वार्ट्ज़ क्रिस्टल को छोटे, स्वतंत्र रूप से तैरते सोने के कणों वाले घोल में डुबोया और भूकंपीय तरंगों की आवृत्ति जितनी सूक्ष्म तरंगों से क्वार्ट्ज़ क्रिस्टल पर तनाव बनाया और हटाया। वोइसी और उनकी टीम ने पाया कि क्वार्ट्ज़ पर मामूली तनाव से भी क्रिस्टल की सतहों पर सोने के कण जमा हो जाते हैं। इस प्रयोग को कई बार दोहराने पर सोने के कणों का ढेर बड़ा होता जाता है। 

वोइसी कहते हैं कि यह भी संभव है कि पीज़ोइलेक्ट्रिक प्रभाव इन सोने की डलियों के बनने का केवल एक कारण हो, अन्य कारण खोजे जाने बाकी हैं। जब तक मनुष्य सोने को महत्व देते रहेंगे, तब तक सोने की डली बनने की खोज जारी रहेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा प्राथमिकता बने

भारत डोगरा

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब तो धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में है। लाखों वर्षों तक धरती पर बहुत विविधतापूर्ण जीवन पनपने का आधार ही गंभीर संकट में है। धरती की जीवनदायिनी क्षमता के संकटग्रस्त होने के अनेक कारण हैं – जलवायु बदलाव (climate change) व अनेक अन्य गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं (environmental issues), परमाणु हथियार (nuclear weapons) व अन्य महाविनाशक हथियार आदि। 

वर्ष 1992 में विश्व के 1575 वैज्ञानिकों ने (जिनमें उस समय जीवित नोबल पुरस्कार (Nobel Prize) सम्मानित वैज्ञानिकों में से लगभग आधे शामिल थे) एक बयान जारी किया था। इसमें उन्होंने कहा था, “हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की ज़रूरत है अन्यथा दुख-दर्द बहुत बढ़ेंगे और हम सबका घर यह पृथ्वी इस कदर तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा।” 

आगे इन वैज्ञानिकों ने कहा था कि वायुमंडल (atmosphere), समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों पर तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों (life forms) में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं। मनुष्य की वर्तमान जीवन-पद्धति के कई तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही दूभर हो जाए। प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने ज़ोर देकर कहा था कि प्रकृति की इस तबाही को रोकने के लिए बुनियादी बदलाव ज़रूरी है। 

वर्ष 1992 की चेतावनी के 25 वर्ष पूरा होने पर एक बार फिर विश्व के कई जाने-माने वैज्ञानिकों ने 2017 में एक नई अपील जारी की थी। इस पर 180 देशों के 13,524 वैज्ञानिकों व अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किए थे। इस अपील में कहा गया था कि जिन गंभीर समस्याओं की ओर वर्ष 1992 में ध्यान दिलाया गया था उनमें से अधिकांश समस्याएं पहले से अधिक विकट हुई हैं या उनको सुलझाने के प्रयास में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं है। केवल ओज़ोन परत (ozone layer) सम्बंधी समस्या में कुछ उल्लेखनीय सफलता मिली है। अस्तित्व को संकट में डालने वाली अन्य समस्याएं पहले की तरह गंभीर स्थिति में मौजूद हैं या फिर उनकी स्थिति और विकट हुई है। 

स्टॉकहोम रेसिलिएंस सेंटर (Stockholm Resilience Center) के वैज्ञानिकों के अनुसंधान ने हाल के समय में धरती के सबसे बड़े संकटों की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है। इस बहुचर्चित अनुसंधान में धरती पर जीवन की सुरक्षा के लिए नौ विशिष्ट सीमा-रेखाओं की पहचान की गई है जिनका उल्लंघन मनुष्य की क्रियाओं को नहीं करना चाहिए। गहरी चिंता की बात है कि इन नौ में से तीन सीमाओं का उल्लंघन आरंभ हो चुका है। ये तीन सीमाएं हैं – जलवायु बदलाव (climate change), जैव-विविधता का ह्रास व भूमंडलीय नाइट्रोजन चक्र में बदलाव। 

इसके अतिरिक्त चार अन्य सीमाओं के उल्लंघन की संभावना निकट भविष्य में है। ये चार क्षेत्र हैं – भूमंडलीय फॉस्फोरस चक्र (phosphorus cycle), भूमंडलीय जल उपयोग, समुद्रों का अम्लीकरण व वैश्विक स्तर पर भूमि उपयोग में बदलाव। 

ये विभिन्न संकट परस्पर सम्बंधित हैं व एक सीमा पार करने (जिसे टिपिंग पॉइंट (tipping point) कहा जाता है) पर धरती की जीवनदायिनी क्षमता की इतनी क्षति हो सकती है कि बहाली कठिन होगी। 

इक्कीसवीं शताब्दी में पहले से कहीं गंभीर चुनौतियां मानवता के सामने हैं। एक वाक्य में कहें, तो यह धरती पर जीवन के अस्तित्व (existence of life) मात्र के लिए संकट उत्पन्न होने की शताब्दी है। धरती पर कई छोटे-मोटे बदलाव तो होते ही रहे हैं, पर धरती पर मानव के पदार्पण के बाद ऐसे हालात पहली बार इक्कीसवीं शताब्दी में ही निर्मित हुए हैं; मानव निर्मित कारणों से हर तरह के जीवन को संकट में डालने वाली स्थिति उत्पन्न हुई है। 

इस संकट के तीन पक्ष हैं। पहला है पर्यावरणीय संकट। पर्यावरणीय संकट के भी अनेक पहलू हैं जैसे, जलवायु परिवर्तन (climate change), जल संकट, वायु प्रदूषण, समुद्र प्रदूषण, जैव विविधता का तेज़ ह्रास, फॉस्फोरस व नाइट्रोजन चक्र (phosphorus and nitrogen cycle) में बदलाव, अनेक खतरनाक नए रसायनों व उत्पादों का बिना पर्याप्त जानकारी के प्रसार, ओज़ोन परत में बदलाव (ozone depletion) आदि। 

दूसरा पक्ष है, महाविनाशक हथियार (weapons of mass destruction), विशेषकर परमाणु, रासायनिक व जैविक तथा रोबोट हथियार। इनमें रासायनिक व जैविक हथियार प्रतिबंधित हैं तथा रोबोट हथियार अभी विकास की आरंभिक स्थिति में है। इसके बावजूद परमाणु हथियारों के साथ ये अन्य हथियार भी जीवन को संकट में डाल सकते हैं। 

तीसरा पक्ष है, कुछ तकनीकों का एक सीमा से आगे विकास। जैसे जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) व रोबोटिक्स। अस्तित्व का संकट उत्पन्न करने वाले खतरों को तीन या अधिक श्रेणियों में विभाजित करने से उनकी समझ बेहतर बन सकती है पर इसका अर्थ यह नहीं है कि ये संकट हमें अलग-अलग प्रभावित करेंगे। इनमें से कई संकट साथ-साथ बढ़ रहे हैं व हमें इनके मिले-जुले असर को ही सहना होगा। जलवायु बदलाव का असर जल-संकट, समुद्रों में आ रहे बदलावों, जैव विविधता के ह्रास आदि से नज़दीकी तौर पर जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर, यदि परमाणु हथियारों का उपयोग वास्तव में होता है तो उसके बाद एक बड़े क्षेत्र में जो बदलाव आएंगे वे विभिन्न अन्य पर्यावरणीय संकटों के साथ मिलकर धरती की जीवनदायिनी क्षमता को प्रभावित करेंगे। 

इसी तरह रोबोट तकनीक के नागरिक उपयोग से उसके सैन्य उपयोग की संभावनाएं बढ़ेंगी। कृषि व स्वास्थ्य में जेनेटिक इंजीनियरिंग के उपयोग से नए जैविक हथियारों की संभावनाएं खुलने लगती हैं। अर्थात ये विभिन्न खतरे एक-दूसरे से विभिन्न स्तरों पर जुड़े हुए हैं। 

यह जानकारी कई दशकों से उपलब्ध है कि धरती पर ऐसे मानव-निर्मित खतरे उत्पन्न हो चुके हैं जो जीवन के अस्तित्व मात्र के लिए संकट उत्पन्न कर सकते हैं। पर अफसोस कि ऐसे संकटों की गंभीर व प्रमाणिक चेतावनियां मिलने के बावजूद, विश्व नेतृत्व की इन खतरों को कम करने की कोई असरदार व टिकाऊ सफलता सामने नहीं आई है। ओज़ोन परत पर मॉन्ट्रियल समझौता (Montreal Protocol) को इस दिशा में सबसे उल्लेखनीय सफलता बताया जाता है, पर ऐसे कुछ छिट-पुट प्रयासों से समग्र स्थिति नहीं बदलने वाली है। ज़ाहिर है, विफलताओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है, और सफलताओं की सूची बहुत छोटी है। 

अतः स्पष्ट है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता को खतरे में डालने वाली समस्याएं एक ऐसे अति संवेदनशील दौर में पहुंच रही हैं कि आगामी दशक बहुत निर्णायक सिद्ध होगा, संभवतः मानव इतिहास का सबसे निर्णायक दशक। अतः 2025-2035 के दशक को विश्व स्तर पर धरती की रक्षा के दशक के रूप में घोषित करना चाहिए। इस दशक में एक अभियान की ज़रूरत है ताकि धरती पर जीवन की रक्षा के प्रयासों को बल मिले। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.thinkoneweek.com/wp-content/uploads/2018/01/ThinkOneWeek-infographic-Some-of-the-Factors-That-Allow-Life-on-Earth-to-Exist.png

डायनासौर का सफाया करने वाला पिंड कहां से आया?

ज़ुबैर सिद्दिकी

शोधकर्ता यह पता लगाने में सफल रहे हैं कि पृथ्वी से टकराकर उथल-पुथल मचाने वाली चट्टान कहां से आई थी और किस प्रकार की थी। यह तो आम जानकारी का विषय है कि लगभग साढ़े 6 करोड़ वर्ष पूर्व एक उल्का (meteor impact) पृथ्वी से टकराई थी जिसने डायनासौर (dinosaur extinction) समेत उस समय उपस्थित 75 प्रतिशत प्रजातियों का सफाया कर दिया था। 

दरअसल, वर्ष 2016 में उल्कापिंड की टक्कर से बने गड्ढे, जो मेक्सिको के चिक्सुलब (Chicxulub crater) गांव के निकट समुद्र के पेंदे में दफन है, की ड्रिलिंग के दौरान शोधकर्ताओं को चट्टान का एक टुकड़ा मिला था। वह टुकड़ा कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट (carbonaceous chondrite) था। कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट एक किस्म की उल्काएं होती हैं जिनमें काफी मात्रा में कार्बन पाया जाता है। उस समय लुईस व वाल्टर अल्वारेज़ ने यह विचार प्रस्तुत किया था कि करोड़ों वर्ष पूर्व कोई विशाल उल्का पृथ्वी से टकराई थी जिसके चलते यहां कयामत आ गई थी। 

1980 के बाद अल्वारेज़ द्वय ने यह दर्शाया था कि दुनिया भर में क्रेटेशियस और पेलिओजीन युगों (Cretaceous-Paleogene boundary) के संगम स्थल की परतों में इरिडियम (iridium element) की मात्रा पृथ्वी पर निर्मित चट्टानों से ज़्यादा होती है। यह इस बात का प्रमाण था कि इन परतों के बनने में पृथ्वी से बाहर के पदार्थ का योगदान था। आगे चलकर यह भी पता चला था कि क्रेटेशियस-पेलियोजीन संगम परतों में क्रोमियम (chromium concentration) की मात्रा भी ज़्यादा है लेकिन कहा गया था कि क्रोमियम तो आसपास से घुलकर भी पहुंच सकता है।

अब साइन्स (Science journal) पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि दुनिया भर में उस टक्कर से उत्पन्न मलबे (meteor debris) का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हुआ है कि साढ़े 6 करोड़ वर्ष पूर्व टकराई उल्का कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट ही थी। कोलोन विश्वविद्यालय के मारियो फिशर-गोडे और उनके साथियों ने दुनिया भर में ऐसे मलबे में रुथेनियम (ruthenium isotope) नामक दुर्लभ धातु के विश्लेषण में पाया है कि उनमें समस्थानिकों का अनुपात वही है जो कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट्स में पाया जाता है। पृथ्वी से बाहर की चट्टानों में रुथेनियम की मात्रा स्थानीय चट्टानों से 100 गुना ज़्यादा होती है। लिहाज़ा यह पहचान का बेहतर साधन है।

जब फिशर-गोडे की टीम ने क्रेटेशियस-पेलियोजीन संगम परतों के पांच नमूनों में रुथेनियम के सात टिकाऊ समस्थानिकों (stable isotopes) की जांच की तो पता चला कि उनका अनुपात सर्वत्र एक ही है। इसका मतलब हुआ कि ये सारे नमूने एक ही पिंड के अंश हैं। इसके अलावा जाने-माने कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट्स में देखे गए रुथेनियम समस्थानिक अनुपात भी लगभग इनके बराबर ही पाए गए। उन्होंने 3.6 करोड़ और 4.7 करोड़ वर्ष पूर्व की टक्कर से बने गड्ढों (impact craters) के नमूनों में भी जांच की। यहां पता चला कि उनमें रुथेनियम की मात्रा सिलिकायुक्त उल्काओं (silicate meteorites) के समान हैं। ये उल्काएं सूर्य के अपेक्षाकृत नज़दीक बनती हैं।

तो इतना तो स्पष्ट हो गया कि साढ़े 6 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी का नसीब बदल देने वाली उल्का कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट (carbonaceous impactor) थी। इनमें भरपूर मात्रा में पानी, कार्बन तथा अन्य वाष्पशील अणु होते हैं। यानी इनका उद्गम सूर्य से बहुत दूर हुआ होगा क्योंकि पास हुआ होता तो ये पदार्थ भाप बनकर उड़ चुके होते।

ये सौर मंडल के शुरुआती दौर में (solar system formation) बनी थीं। माना जाता है कि इनके साथ पृथ्वी पर पानी (water origin) और कार्बनिक अणु आए थे जिन्होंने जीवन के पनपने में मदद की थी। लेकिन ऐसे कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट तो पृथ्वी से शुरुआती एकाध अरब वर्षों में टकराया करते थे। आजकल टकराने वाली उल्काओं में महज़ 5 प्रतिशत ही कार्बनयुक्त कॉन्ड्राइट होते हैं।

लेकिन चिक्सुलब इम्पैक्टर तो अभी हाल के इतिहास में टकराया था। तो यह कहां से टपक पड़ा? ऐसा माना जाता है कि ये किसी वजह से मंगल और बृहस्पति के बीच स्थिति क्षुद्र ग्रह पट्टी (asteroid belt) में खिंच गए थे। कभी-कभार ये वहां से मुक्त होकर अंदरुनी सौर मंडल (inner solar system) में प्रवेश कर जाते हैं। संभवत: 10 किलोमीटर व्यास का चिक्सुलब इम्पैक्टर भी वहां से निकल धरती से टकरा गया था। यह इतना विनाशकारी इसीलिए साबित हुआ था क्योंकि यह कार्बनयुक्त था। इस वजह से जब यह जला होगा तो इसने गहरा धुआं (dark cloud formation) पैदा किया होगा जिसने सूरज की रोशनी को पृथ्वी पर पहुंचने से रोक दिया होगा जिसके चलते टक्कर के प्रत्यक्ष प्रभावों के अलावा भी असर हुए होंगे।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नासा उवाच – मंगल पर जीवन के चिंह मिले हैं

नासा (NASA) ने घोषणा की है कि उसके परसेवरेंस रोवर (Perseverance Rover) द्वारा मंगल ग्रह (Mars) पर खोजी गई एक चट्टान पर ऐसे चिंह मिले हैं जो इस बात के प्रमाण हो सकते हैं कि मंगल पर अतीत में कभी सूक्ष्मजीवी जीवन (Microbial Life) रहा होगा। नासा के मुताबिक यह चट्टान इस बात का स्पष्ट प्रमाण देती है कि कभी यहां पानी (Water), कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter) थे और ऐसी अभिक्रियाएं हुई थीं जो ऊर्जा का स्रोत हो सकती हैं।

लेकिन…जी हां लेकिन। इस निष्कर्ष को लेकर कई अगर-मगर हैं और सभी वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। कइयों का तो कहना है कि मंगल की खोजबीन (Mars Exploration) के इतिहास में ऐसे कई ‘रोमांचक’ क्षण आए और गए हैं। ऐसी सबसे मशहूर चट्टान एलन हिल्स 84001 (Allan Hills 84001) रही है। यह दरअसल अंटार्कटिका में खोजी गई एक उल्का (Meteorite) थी। 1996 में साइंस पत्रिका में शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि इसमें बैक्टीरिया के नैनो-जीवाश्म (Nano-Fossils) मौजूद थे। अलबत्ता, आज अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि इस पर मिली ‘जीवाश्मनुमा’ रचनाएं जीवन के बगैर भी बन सकती हैं। इसी प्रकार का शोरगुल तब भी मचा था जब मार्स रोवर (Mars Rover) ने गेल क्रेटर (Gale Crater) में तमाम किस्म के कार्बनिक अणु (Organic Molecules) खोज निकाले थे। मार्स रोवर पर एक रासायनिक प्रयोगशाला भी थी।

लेकिन परसेवरेंस पर ऐसी कोई प्रयोगशाला नहीं है। वह जो भी चट्टानी नमूने (Rock Samples) खोदता है उन्हें एक कैप्सूल में भरकर जमा करता रहता है, जिन्हें बाद में मार्स सैम्पल रिटर्न मिशन (Mars Sample Return Mission) द्वारा पृथ्वी पर भेजा जाएगा। फिलहाल वह मिशन टल गया है। तो बगैर प्रयोगशाला के, महज़ चेयावा फॉल्स (Jezero Crater) से खोदी गई चट्टान के अवलोकनों के आधार पर सारा हो-हल्ला है। माना जा रहा है कि इस स्थान पर कभी कोई नदी (River) बहती थी। उसके साथ आई गाद ही अश्मीभूत हो गई है। इस चट्टान में कैल्शियम सल्फेट (Calcium Sulfate) से बनी शिराओं के बीच-बीच में चकत्ते हैं जैसे तेंदुओं की खाल पर होते हैं। नासा से जुड़े वैज्ञानिकों का मत है कि ये चकत्ते ऐसी रासायानिक अभिक्रियाओं के संकेत हैं जो धरती पर सूक्ष्मजीवों को ऊर्जा मुहैया कराती हैं।

रोवर पर लगे स्कैनर से चट्टान में कार्बनिक यौगिकों (Organic Compounds) की उपस्थिति का भी पता चला है। यह तो सही है कि ऐसे कार्बन यौगिक (Carbon Compounds) जीवन की अनिवार्य निर्माण इकाइयां होते हैं लेकिन ये गैर-जैविक प्रक्रियाओं से भी बन सकते हैं। सबसे रहस्यमयी तो तेंदुआ चकत्ते हैं – इन मिलीमीटर साइज़ के चकत्तों में फॉस्फोरस (Phosphorus) व लौह (Iron) पाए गए हैं। पृथ्वी पर ऐसे चकत्ते तब बनते हैं जब कार्बनिक पदार्थ जंग लगे लोहे से क्रिया करते हैं। यह क्रिया सूक्ष्मजीवों को ऊर्जा प्रदान कर सकती है। लेकिन इस तथ्य की अन्य व्याख्याएं भी हैं। जैसे चट्टान में पाए गए खनिज यह भी दर्शाते हैं कि यह ज्वालामुखी के लावा (Volcanic Lava) से बनी हैं और लावा का उच्च तापमान किसी जीवन को पनपने नहीं देगा।

बहरहाल, परसेवरेंस अब तक 22 चट्टानें इकट्ठी कर चुका है। इनमें से कई में ऐसे पदार्थ मिले हैं जो पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवों को सहारा दे सकते हैं। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ये नमूने पृथ्वी पर पहुंच पाएंगे क्योंकि यह काम बहुत महंगा (Expensive) है। कुछ लोगों का तो कहना है कि यह सारा हो-हल्ला फंडिंग (Funding) जारी रखने के लिए है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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