बोतलबंद पानी का कारोबार – प्रमोद भार्गव

देश में लगातार फैल रहे बोतलबंद पानी के कारोबार पर संसद की स्थाई समिति ने कई सवाल खड़े किए हैं। समिति की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि पेयजल के कारोबार से अरबों रुपए कमाने वाली कंपनियों से सरकार भूजल के दोहन के बदले में न तो कोई शुल्क ले रही है और न ही कोई टैक्स वसूलने का प्रावधान है। समिति ने व्यावसायिक उद्देश्य के लिए भूजल का दोहन करने वाली इन कंपनियों से भारी-भरकम जल-कर वसूलने की सिफारिश की है। समिति का विचार है कि इससे जल की बरबादी पर भी अंकुश लगेगा। भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी की अध्यक्षता में जल संसाधन सम्बंधी इस समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा में पेश की है।

रिपोर्ट का शीर्षक है उद्योगों द्वारा जल के व्यावसायिक दोहन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव। इसमें केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास व गंगा संरक्षण मंत्रालय की खूब खिंचाई की गई है। समिति ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि जनता को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति करना सरकार का नैतिक और प्राथमिक कर्तव्य है। किंतु सरकार इस दायित्व के पालन में कोताही बरत रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) ने भूजल के दोहन के लिए 375 बोतलबंद पेयजल को अनापत्ति प्रमाण-पत्र दिए हैं। इसके इतर 5,873 पेयजल इकाइयों को बीआईएस से बोतलबंद पानी उत्पादन के लायसेंस मिले हैं। ये कंपनियां हर साल 1.33 करोड़ घनमीटर भूजल जमीन से निकाल रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि ये कंपनियां कई ऐसे क्षेत्रों में भी जल के दोहन में लगी हैं जहां पहले से ही जल का अधिकतम दोहन हो चुका है।

समिति ने सवाल उठाया है कि न तो सरकार के पास ऐसा कोई प्रामाणिक रिकॉर्ड है कि वाकई ये इकाइयां कुल कितना पानी निकाल रही हैं और न ही इनसे किसी भी प्रकार के टैक्स की वसूली की जा रही है जबकि ये देशी-विदेशी कंपनियां करोड़ों-अरबों रुपए का मुनाफा कमा रही हैं और इनसे राजस्व प्राप्त करके जन-कल्याण में लगाने की ज़रूरत है। समिति ने यह भी सिफारिश की है कि जनता को शुद्ध और स्वच्छ जल की आपूर्ति को केवल निजी उद्योगों के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता है।

संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीने का अधिकार देता है। लेकिन जीने की मूलभूत सुविधाओं को बिंदुवार परिभाषित नहीं किया गया है। इसीलिए आज़ादी के 70 साल बाद भी पानी की तरह भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जीने के बुनियादी मुद्दे पूरी तरह संवैधानिक अधिकार के दायरे में नहीं आए हैं। यही वजह रही कि 2002 में केंद्र सरकार ने औद्योगिक हितों को लाभ पहुंचाने वाली जल-नीतिपारित की और निजी कंपनियों को पेयजल का व्यापार करने की छूट दे दी गई। भारतीय रेल भी रेलनीरनामक उत्पाद लेकर बाज़ार में उतर आई।

पेयजल के इस कारोबार की शुरुआत छत्तीसगढ़ से हुई। यहां शिवनाथ नदी पर देश का पहला बोतलबंद पानी संयंत्र स्थापित किया गया। इस तरह एकतरफा कानून बनाकर समुदायों को जल के सामुदायिक अधिकार से अलग करने का सिलसिला चल निकला। यह सुविधा युरोपीय संघ के दबाव में दी गई थी। पानी को वि·ा व्यापार के दायरे में लाकर पिछले एक-डेढ़ दशक के भीतर एक-एक कर विकासशील देशों के जल रुाोत अंधाधुंध दोहन के लिए इन कंपनियों के हवाले कर दिए गए। इसी युरोपीय संघ ने दोहरा मानदंड अपनाकर ऐसे नियम-कानून बनाए हुए हैं कि वि·ा के अन्य देश पश्चिमी देशों में आकर पानी का कारोबार नहीं कर सकते हैं।

युरोपीय संघ विकासशील देशों के जल का अधिकतम दोहन करना चाहता है, ताकि इन देशों की प्राकृतिक संपदा का जल्द से जल्द नकदीकरण कर लिया जाए। पानी अब केवल पीने और सिंचाई का पानी नहीं रह गया है, बल्कि विश्व बाज़ार में नीला सोनाके रूप में तब्दील हो चुका है। पानी को लाभ का बाज़ार बनाकर एक बड़ी आबादी को जीवनदायी जल से वंचित करके आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को जल उपभोक्ता बनाने के प्रयास हो रहे हैं। यही कारण है कि दुनिया में देखते-देखते पानी का कारोबार 40 हज़ार 500 अरब डॉलर का हो गया है।

प्रमुख राज्यों में बोतलों में भरने के लिए भूजल निकासी           

                  

प्रांत कंपनियों  की संख्या प्रतिदिन निकासी (घन मीटर)
आंध्र प्रदेश 41 55
उत्तर-प्रदेश 111 941
गुजरात 24 —-
कर्नाटक 63 —-
तमिलनाड़ु 374 1000

 

भारत में पानी और पानी को शुद्ध करने के उपकरणों का बाज़ार लगातार फैल रहा है। देश में करीब 85 लाख परिवार जल शोधन उपकरणों का उपयोग करने लगे हैं। भारत में बोतल और पाउच में बंद पानी का 11 हज़ार करोड़ का बाजार तैयार हो चुका है। इसमें हर साल 40 से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। देश में इस पानी के करीब एक सौ ब्रांड प्रचलन में हैं और 1200 से भी ज्यादा संयंत्र लगे हुए हैं। देश का हर बड़ा कारोबारी समूह इस व्यापार में उतरने की तैयारी में है। कंप्यूटर कंपनी माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भारत में ओम्नी प्रोसेसर संयंत्र लगाना चाहते हैं। इस संयंत्र से दूषित मलमूत्र से पेयजल बनाया जाएगा।

भारतीय रेल भी बोतलबंद पानी के कारोबार में शामिल है। इसकी सहायक संस्था इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज़्म कार्पोरेशन (आईआरसीटीसी) रेल नीरनाम से पानी पैकिंग करती है। इसके लिए दिल्ली, पटना, चैन्नई और अमेठी सहित कई जगह संयंत्र लगे हैं। उत्तम गुणवत्ता और कीमत में कमी के कारण रेल यात्रियों के बीच यह पानी लोकप्रिय है। अलबत्ता, निजी कंपनियों की कुटिल मंशा है कि रेल नीर को घाटे के सौदे में तब्दील कराकर सरकारी क्षेत्र के इस उपक्रम को बाज़ार से बेदखल कर दिया जाए। तब कंपनियों को रेल यात्रियों के रूप में नए उपभोक्ता मिल जाएंगे।

वर्तमान में भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहां हर साल 250 घन किमी पानी धरती के गर्भ से खींचा जाता है, जो विश्व की कुल खपत के एक चौथाई से भी ज़्यादा है। इस पानी की खपत 60 फीसदी खेतों की सिंचाई और 40 प्रतिशत पेयजल के रूप में होती है। इस कारण 29 फीसदी भूजल के रुाोत अधिकतम दोहन की श्रेणी में आकर सूखने की कगार पर हैं। औद्योगिक इकाइयों के लिए पानी का बढ़ता दोहन इन रुाोतों के हालात और नाज़ुक बना रहा है। कई कारणों से पानी की बर्बादी भी खूब होती है। आधुनिक विकास और रहन-सहन की पश्चिमी शैली अपनाना भी पानी की बर्बादी का बड़ा कारण बन रहा है। 25 से 30 लीटर पानी सुबह मंजन करते वक्त नल खुला छोड़ देने से व्यर्थ चला जाता है। 300 से 500 लीटर पानी टब में नहाने से खर्च होता है। जबकि परंपरागत तरीके से स्नान करने में महज 25-30 लीटर पानी खर्चता है। एक शौचालय में एक बार फ्लश करने पर कम से कम दस लीटर पानी खर्च होता है। 50 से 60 लाख लीटर पानी मुंबई जैसे महानगरों में रोज़ाना वाहन धोने में खर्च हो जाता है जबकि मुंबई भी पेयजल का संकट झेल रहा है। 17 से 44 प्रतिशत पानी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में वॉल्वों की खराबी से बर्बाद हो जाता है।

पेयजल की ऐसी बर्बादी और पानी के निजीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय सरकारें पानी को बेचने की फिराक में ऐसे कानूनी उपाय लागू करने को तत्पर हैं। संयुक्त राष्ट्र भी कमोबेश इसी विचार को समर्थन देता दिख रहा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने पानी और स्वच्छता को बुनियादी मानवाधिकार घोषित किया हुआ है लेकिन इस बाबत उसके अजेंडे में पानी एवं स्वच्छता के अधिकार का वास्ता मुफ्त में मिलने से कतई नहीं है। बल्कि इसका मतलब यह है कि ये सेवाएं सबको सस्ती दर पर हासिल हों। साफ है, पानी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाज़ार के हवाले करने की साजि़श रची जा रही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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8 लाख वर्षों में सर्वोच्च वायुमंडलीय कार्बन स्तर

क नई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता 405 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) तक पहुंच गई। यह स्तर पिछले 8 लाख वर्षों में सर्वाधिक माना जा रहा है। यह उन वर्षों में से सबसे गर्म वर्ष रहा जिनमें एल नीनो नहीं हुआ हो। एल नीनो वास्तव में प्रशांत महासागर के पानी के गर्म होने के परिणामस्वरूप होता है। यदि सारे वर्षों में देखें, तो 1800 के दशक के बाद 2017 सबसे गर्म वर्षों में दूसरे या तीसरे नंबर पर रहेगा।

यूएस के राष्ट्रीय महासागर और वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) द्वारा प्रकाशित 28वीं वार्षिक स्टेट ऑफ दी क्लाइमेट इन 2017रिपोर्ट में 65 देशों में काम कर रहे 524 वैज्ञानिकों द्वारा संकलित डैटा शामिल है। रिपोर्ट के कुछ बिंदु इस प्रकार हैं:

·         वर्ष 2017 में वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता वर्ष 2016 के मुकाबले 2.2 पीपीएम अधिक रही। इससे पहले यह स्तर लगभग 8 लाख वर्ष पूर्व भी पहुंचा था। 8 लाख वर्ष पूर्व का यह आंकड़ा प्राचीन बर्फ कोर में फंसे हवा के बुलबुलों के विश्लेषण से प्राप्त हुआ है। कार्बन डाईऑक्साइड पृथ्वी को गर्म करने वाली मुख्य गैस है।

·         पृथ्वी को गर्म करने वाली अन्य गैसों मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर भी काफी अधिक था। मीथेन का स्तर 2016 से 2017 के बीच 6.9 भाग प्रति अरब (पीपीबी) बढ़ा और 1849.7 पीपीबी हो गया। इसी प्रकार, नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर 0.9 पीपीबी बढ़कर 329.8 पीपीबी दर्ज किया गया।

·         पिछले वर्ष विश्वव्यापी कोरल ब्लीचिंग घटना का भी अंत हुआ। कोरल ब्लीचिंग समुद्री जल के गर्म होने पर होता है जिसके कारण कोरल अपने ऊतकों में रहने वाले शैवाल को छोड़ देते हैं और सफेद पड़ जाते हैं। यह अब तक की सबसे लंबे समय तक रिकॉर्ड की गई कोरलब्लीचिंग घटना थी।

·         2017 में वैश्विक वर्षा/हिमपात औसत से अधिक रहा। 1900 के बाद से इस वर्ष रूस में सबसे अधिक हिम/वर्षापात हुआ। वेनेज़ुएला, नाइजीरिया और भारत के कुछ हिस्सों में भी असामान्य बारिश और बाढ़ का अनुभव हुआ।

·         गर्म तापमान से विश्व के कई जंगली इलाकों में आग लगने की खबर सामने आई। संयुक्त राज्य अमेरिका में 40 लाख हैक्टर जंगली क्षेत्र जलने से 18 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। अमेज़न के जंगलों में 2 लाख 72 हज़ार दावानल हुए।

·         अलास्का में 6 में से 5 पर्माफ्रॉस्ट वेधशालाओं में उच्च तापमान दर्ज किया गया। पिघलता पर्माफ्रॉस्ट वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन छोड़ता है और ग्लोबल वार्मिंग में योगदान दे सकता है।

·         आर्कटिक सागर के बर्फ का क्षेत्रफल 1981 से 2010 के औसत क्षेत्रफल से 8 प्रतिशत कम रहा। 2017 आर्कटिक के लिए दूसरा सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया।

·         अर्जेंटाइना, उरुग्वे, बुल्गारिया और मेक्सिको आदि देशों ने उच्च तापमान का रिकॉर्ड स्थापित किया।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पेड़ों के अनगिनत लाभ – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

सौ पेड़, हर साल 53 टन कार्बन डाईऑक्साइड और 200 कि.ग्रा. अन्य प्रदूषकों का वातावरण से निपटान करते हैं। हर साल ये 5,30,000 लीटर वर्षा जल को थामते हैं।

पेड़ों के अनेक फायदे

दिल्ली के अधिकारी इमारतें बनाने के लिए दिल्ली के कुछ इलाकों में 17,000 बड़ेबड़े पेड़ काटने की फिराक में हैं। इन पेड़ों को काटे जाने का विरोध कर रहे लोगों को यह दिलासा दिया जा रहा है कि हर एक काटे गए पेड़ पर 10 नए पौधे लगाए जाएंगे। मंत्री से लेकर नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन तक और हम सब ये अच्छी तरह से जानते हैं कि यह वादा मूर्खतापूर्ण है: आज जो खोएंगे, उसकी भरपाई कल कर दी जाएगी” (पर कब? आज से 20 साल बाद? और यदि पौधे बच पाए तो?)। और यह सिर्फ दिल्ली में नहीं चल रहा है। हर राज्य, हर शहर के योजनाकार यही कर रहे हैं। यह रवैया पेड़ों और उनके महत्व के प्रति ना सिर्फ अज्ञानता बल्कि अहंकार और उपेक्षा का द्योतक है। लेकिन वक्त आ गया है कि योजनाकार पेड़ों के आर्थिक, पारिस्थितिक, स्वास्थ सम्बंधी और सामाजिक महत्व के प्रति सचेत हो जाएं।

पेड़ों का महत्व

1979 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. टी. एम. दासगुप्ता ने गणना करके बताया था कि 50 साल की अवधि में एक पेड़ का आर्थिक मूल्य 2,00,000 डॉलर (उस समय की कीमत के आधार पर) होता है। यह मूल्य इस अवधि में पेड़ों से प्राप्त ऑक्सीजन, फल या बायोमास और लकड़ी वगैरह की कीमत के आधार पर है। पेड़ के वज़न में एक ग्राम की वृद्धि हो, तो उस प्रक्रिया में पेड़ 2.66 ग्राम ऑक्सीजन बनाता है। ऑस्ट्रेलिया की नैन्सी बेकहम अपने शोध पत्र पेड़ों का वास्तविक मूल्य (https://www.uow.edu.au/~sharonb/STS300/valuing/price/pricingarticles.html>) में कहती हैं: पेड़पौधे सालदरसाल अपना दैनिक काम करते रहते हैं। ये मिट्टी को रोके रखते हैं, पोषक तत्वों का नवीनीकरण करते हैं, हवा को ठंडा करते हैं, हवा के वेग की उग्रता में बदलाव करते हैं, बारिश कराते हैं, विषैले पदार्र्थों को अवशोषित करते हैं, र्इंधन की लागत कम करते हैं, सीवेज को बेअसर करते हैं, संपत्ति की कीमत बढ़ाते हैं, पर्यटन बढ़ाते हैं, मनोरंजन को बढ़ावा देते हैं, तनाव कम करते हैं, स्वास्थ्य बेहतर करते हैं, खाद्य सामग्री उपलब्ध कराते हैं, औषधि और अन्य जीवों के लिए आवास देते हैं।

इसी कड़ी में न्यूयॉर्क के पर्यावरण संरक्षण विभाग ने कुछ आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। इन्हें आप इस लिंक पर देख सकते हैं: http://www.dec.ny.gov/lands/40243.html ये बताते हैं:

(1) स्वस्थ पेड़ यानी स्वस्थ लोग: 100 पेड़ प्रति वर्ष 53 टन कार्बन डाईऑक्साइड और 200 कि.ग्रा. अन्य वायु प्रदूषकों को हटाते हैं।

(2) स्वस्थ पेड़ यानी स्वस्थ समुदाय: पेड़ों से भरा परिवेश घरेलू हिंसा कम करता है, ये ज़्यादा सुरक्षित और मिलनसार समुदाय होते हैं।

(3) स्वस्थ पेड़ यानी स्वस्थ वातावरण: 100 बड़े पेड़ प्रति वर्ष 5,30,000 लीटर वर्षा जल थामते हैं।

(4) स्वस्थ पेड़ यानी घर में बचत: सुनियोजित तरीके से लगाए गए पेड़ एयर कंडीशनिंग लागत में 56 प्रतिशत तक बचत करते हैं। सर्दियों की ठंडी हवाओं को रोकते हैं जिससे कमरे में गर्माहट रखने के खर्च में 3 प्रतिशत तक बचत हो सकती है।

(5) स्वस्थ पेड़ यानी बेहतर व्यवसाय: पेड़ों से ढंके व्यापारिक क्षेत्रों में, दुकानों में ज़्यादा खरीदार आते हैं और 12 प्रतिशत अधिक खरीदारी करते हैं।

(6) स्वस्थ पेड़ यानी संपत्ति का उच्चतर मूल्य।

मंत्रीजन और एनबीसीसी अधिकारी समझदार लोग हैं। निश्चित रूप से वे ये सारे तथ्य जानते होंगे। फिर भी उनके लिए एक परिपक्व पेड़ शहर की जगह को खाताहै। 17,000 पेड़ों का सफाया करना यानी साफ हवा को तरसते किसी शहर में मकान, कॉलोनी और शॉपिंग मॉल बनाने का व्यापार। (दिल्ली ग्रीन्स नामक एक एनजीओ ने 2013 में बताया था कि एक स्वस्थ पेड़ की सालाना कीमत मात्र उससे प्राप्त ऑक्सीजन की कीमत के लिहाज़ से 24 लाख रुपए होती है)। मगर अधिकारियों के मुताबिक काटे गए पेड़ों द्वारा घेरी गई जगह की तुलना में नए रोपे जाने वाले पौधे सौंवा हिस्सा या उससे भी कम जगह घेरेंगे। लेकिन पौधे लगाएंगे कहां जहां पेड़ थे? निर्माण कार्य शुरू होने पर क्या ये पौधे जीवित रह पाएंगे? अधिकारियों का रवैया है कि हम तो ट्रांसफर या रिटायर होकर यहां रहेंगे नहीं, तो इन सवालों का जवाब हमें तो नहीं देना होगा। किंतु बात को समझने के लिए यह देखा जा सकता है कि पहले गुड़गांव क्या था और आज क्या है।

पेड़ों की कीमत पहचानें

वृक्षों के प्रति क्रूर व्यवहार के विपरीत कई अनुकरणीय उदाहरण हैं। सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा प्रवर्तित चिपको आंदोलन, कर्नाटक की सलामुरादा थिम्मक्का द्वारा लगाए गए 398 बरगद के पेड़ जिन्हें वे अपने बच्चे मानती हैं और मजीद खान और जीव विज्ञानियों व बागवानों का समूह, जो तेलंगाना के महबूबनगर में 700 साल पुराने पिल्लालमर्री नामक बरगद के पेड़ की बखूबी देखभाल कर रहे हैं। 4 एकड़ में फैले बरगद के इस पेड़ को दीमक खाने लगी थी। इस समूह ने हर शाखा के फ्लोएम में कीटनाशक का इंजेक्शन देकर, देखभाल करके इसे फिर से हराभरा कर दिया है (https://www.thehindu.com/news/national/telangana/a-tree-in-intensive-care/article24241462.ece)। क्या इस पेड़ को काटकर 4 एकड़ ज़मीन का उपयोग रियल एस्टेट में कर लेना चाहिए था?

पेड़ भावनात्मक, आध्यात्मिक शान्ति प्रदान करते हैं। भारतीय इतिहास इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक और तमिल राजा पारि वल्लल जिन्होंने अपने रथ को एक पौधे के पास छोड़ दिया था ताकि वह इससे सहारा पाकर फैल सके।

क्या दिल्ली के 17,000 पेड़ बचाने और उपनगरों में कहीं और कॉलोनियां बनाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए? और यदि वहीं बनाना है तो ऐसे तरीके निकाले जाएं जिसमें पेड़ों की बलि ना चढ़े। और यदि पेड़ काटने भी पड़े तो बहुत ही कम संख्या में। असंभवसी लगने वाली इस योजना के बारे में सोचना वास्तुकारों के लिए चुनौती है। दरअसल कई स्थानों पर गगनचुंबी इमारतें बनाई गई हैं और पेड़ों को बचाया गया है। कई जगह तो पेड़ों को इमारतों का हिस्सा ही बना दिया गया है। ऐसे कुछ उदाहरण इटली, तुर्की और ब्राज़ील की इमारतों में देखे जा सकते हैं।

भारत में भारतीय और विदेशी दोनों तरह के वास्तुकार हैं जिन्होने पर्यावरण से सामंजस्य बैठाते हुए घरों और परिसरों का निर्माण किया है। भारत में लगभग 80 संस्थान हैं जो वास्तुकला की शिक्षा प्रदान करते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स में लगभग 20,000 सदस्य हैं। क्यों ना उन लोगों के सामने इस तरह के डिज़ाइन की चुनौती रखी जाए और सर्वश्रेष्ठ योजना को पुरस्कृत किया जाए और उसे घर, कॉलोनी बनाने के लिए अपनाया जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्मार्टफोन के क्लिक से रंग बदलते कपड़े – डॉ. डी बालसुब्रमण्यन

पी.जी. वुडहाउस के प्रशंसकों को याद होगा कि ऑन्ट डहलिया कहानी के नायक बर्टी वूस्टर को उनकी अपनी साप्ताहिक पत्रिका मिलेडीज़ बुडवारके लिए  “what the well dressed man is wearing” (बनेठने आदमी ने क्या पहना है?) विषय पर लेख लिखने को राज़ी कर लेती हैं। यह बात 1920 के दशक की है और तब लोगों के पास फुरसत के पल भी थे। पर आज, लगभग 100 साल बाद, भागदौड़ भरा समय है। और हाल ही में साइंस न्यूज़ नामक पाक्षिक पत्रिका ने फैशन फॉरवर्ड आधुनिक वस्त्र उद्योग परिधानों में गैजेट्स लगा सकेगानामक एक लेख प्रकाशित किया है। इसकी लेखक मारिया टेमिंग और मारियाह क्वांटानिला हैं।

मारिया और मारियाह ने अपने इस लेख में आने वाले समय में गैजेट से लैस स्मार्टकपड़ों के बारे में लिखा है। उन्होंने अमेरिका में हुई तकनीकी बैठक में कई डेवलपर्स और अन्वेषकों द्वारा प्रस्तुत कुछ उदाहरण दिए हैं। लेख के कुछ अंश प्रस्तुत हैं।

रंग बदलते कपड़े

साठसत्तर साल पहले ब्लीडिंग मद्रासकहलाने वाली शर्ट बिकती थी। यह हर धुलाई पर रंग बदलती थी (और रंग हल्का पड़ता जाता था)। पर यहां जिन कपड़ों के बारे में बात की जा रही है वे धोने पर नहीं बल्कि रोशनी (सूरज वगैरह की रोशनी) पड़ने पर रंग बदलते हैं और यह बदलाव पलटा जा सकता है। इसके लिए पहनने वाले को अपने स्मार्टफोन के स्क्रीन को क्लिक करना होता है। पर यह रंग बदलता कैसे है?

दरअसल इन कपड़ों को बनाने के लिए ऐसे धागों का उपयोग किया जाता है जिनमें तांबे के अत्यंत पतले तार पॉलीस्टर (या नायलॉन) में लिपटे होते हैं। पॉलीस्टर के रेशों पर रंजक (पिगमेंट) होते हैं, ठीक उसी तरह जैसे सामान्य कपड़ों पर होते हैं। परिधान इन्हीं रंजक युक्त धागों से बनाए जाते हैं, और इन परिधानों पर छोटी बैटरी भी लगी होती है। यह बैटरी धागे में लिपटे तांबे के तार को गर्म करती है। परिधान पहना व्यक्ति अपने स्मार्टफोन से एक वाईफाई सिग्नल भेजता है, तो बैटरी चालू हो जाती है और तांबे का तार गर्म होने लगता है। इसके चलते कपड़े का रंग बदल जाता है या कपड़े पर नया पैटर्न (धारियां, चौखाने वगैरह) उभर आता है। अमेरिका स्थित सेंट्रल फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के डॉ. जोशुआ कॉफमैन और डॉ. अयमान अबॉरेड्डी द्वारा बनाए ये कपड़े, बैग और अन्य चीज़ें जल्द ही बाज़ार में पहुंच जाएंगी।

गुजरात और राजस्थान की महिलाएं वहां की पारंपरिक पोशाक लहंगा या घाघरा पहनती हैं, इनमें छोटेछोटे कांच जड़े होते हैं। जब इन कांच के टुकड़ों पर रोशनी पड़ती है तो ये चमकते हैं। पर अब जल्द ही इन कपड़ों का हाईटेक संस्करण आएगा जिनमें कपड़ों पर पारंपरिक निर्जीव कांच की जगह जलतेबुझते एलईडी लगे होंगे जो प्रकाश उत्सर्जित करेंगे। इन एलईडी को शोधकर्ताओं ने ओएलईडी का नाम दिया है। ये ओएलईडी पॉलीस्टर कपड़े पर ही बनाए जाते हैं और परंपरागत एलईडी की तुलना में कहीं अधिक लचीले होते हैं। इसे दक्षिण कोरिया के डीजॉन में कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के डॉ. एस. क्वोन और उनके सहयोगियों ने विकसित किया है। स्मार्टफोन से विद्युत सिग्नल भेजकर इन ओएलईडी को चालू करके कपड़ों को रोशन किया जा सकता है। इस तरह कपड़ों पर पैटर्न, संदेश वगैरह बनाए जा सकते है या रात में पैदल चलने वाले राहगीरों के लिए रोशनी की जा सकती है।

तेज़ चाल से चलने या दौड़ने के बाद हमें गर्मी लगती है चलनेफिरने से ऊष्मीय ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसी तरह कुछ देर धूप में खड़े रहने पर भी हमें गर्मी लगती है, उर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा गर्मी के रूप में खो जाती है। इस तरह गर्मी के माध्यम से ऊर्जा खोने की बजाय क्या हम इस गर्मी या शरीर की गति को विद्युत उर्जा में परिवर्तित कर सकते हैं? इस सवाल पर स्टैनफोर्ड और जॉर्जिया टेक विश्वविद्यालय के डॉ. जून चेन और डॉ. झोंग लिन वांग ने काम किया है। उन्होंने कपडों में फोटोवोल्टेइक तार गूंथ दिए। इन तारों पर सूर्य का प्रकाश पड़ने पर वे सोलर सेल की तरह, कुछ मात्रा में बिजली उत्पन्न कर सकते हैं। इस बिजली को कपड़ों में लगी बैटरी में स्टोर किया जा सकता है। डॉ. चेन का कहना है कि आपकी टीशर्ट पर सौर सेल कपड़े का 4 सेमी × 5 सेमी टुकड़ा सिल दिया जाए, और आप सूर्य की रोशनी में दौड़ें तो एक सेलफोन चार्ज करने लायक बिजली उत्पन्न की जा सकती है। सोचिए अगर आपने पूरी तरह इस कपड़े से बनी शर्ट या जैकेट पहनी हो तब!

डॉ. चेन ने एक और विशेष प्रकार के पॉलीमर या बहुलक (जिसे पीटीएफई कहा जाता है) से कपड़ा तैयार किया है। यह शरीर की गति से उत्पन्न उर्जा को सोखता है और इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। मारिया और मारियाह लिखती हैं: इस तरह के ऊर्जा उत्पन्न करने वाले यंत्र तंबुओं में भी लगाए जा सकते हैं। इन पर सूरज की रोशनी पड़ने या हवा के चलने पर ये शिविर में रहने वाले लोगों के उपकरणों को चार्ज कर सकते हैं।

मारिया और मारियाह का यह लेख इंटरनेट पर (https://www.sciencenews.org/article/future-smart-clothes-could-pack-serious-gadgetry) मुफ्त में उपलब्ध है और अत्यंत पठनीय है। लेख में और भी ऐसे अध्ययनों का उल्लेख किया गया है जो इस तरह के उपकरणों के माध्यम से पर्यावरण की ऊर्जा को विद्युत उर्जा में परिवर्तित करके संग्रहित कर उसका उपयोग करते हैं।

हल्केफुल्के सेल फोन

कुछ लोग भारी भरकम सेलफोन संभालने के बजाए कलाई में पहने जाने वाले फोन उपयोग करना पसंद कर रहे हैं। कुछ लोग लैपटॉप की जगह स्मार्टफोन का उपयोग करने लगे हैं। (हाल ही में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. मार्टिन चाफी ने हैदराबाद में तीन अलगअलग व्याख्यान दिए। व्याख्यान से जुड़ी स्लाइड, फिल्में वगैरह लैपटाप में नहीं स्मार्टफोन में थीं। पहनने योग्य उपकरण (कम्प्यूटर तक) तेज़ी से लोकप्रिय और सुविधाजनक हो जाएंगे। इन्हें अब आपके कपड़ों में लगे उपकरणों की मदद से चार्ज किया जा सकेगा। तो देखते हैं, अगले साल का फैशन क्या होगा।(स्रोत फीचर्स)

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एयर कंडीशनर में परिवर्तन से ऊर्जा बचत की उम्मीद – आदित्य चुनेकर

र्जा मंत्रालय देश में एयर कंडीशनिंग का डिफॉल्ट तापमान 24 डिग्री सेल्सियस करने की योजना बना रहा है। इससे क्या हासिल होगा तथा इसमें और क्या किया जा सकता है? डिफॉल्ट से आशय है कि यदि आप छेड़छाड़ नहीं करेंगे तो एयर कंडीशनर 24 डिग्री सेल्सियस पर काम करेगा।

सलाह क्या है?

उर्जा मंत्रालय (एमओपी) ने घोषणा की है कि वह एयर कंडीशनर निर्माताओं और हवाई अड्डों, होटल, शॉपिंग मॉल और सरकारी भवन जैसे प्रतिष्ठानों को यह सलाह जारी करने वाला है कि वे एयर कंडीशनिंग का डिफॉल्ट तापमान 24 डिग्री सेल्सियस पर सेट रखें।

मंत्रालय के अनुसार, एयर कंडीशनर (एसी) के तापमान की सेटिंग में एक डिग्री की वृद्धि से बिजली की खपत में 6 प्रतिशत की कमी आती है। इसके अलावा, यह दावा भी किया गया है कि यदि सभी उपयोगकर्ता एसी की तापमान सेटिंग 24 डिग्री सेल्सियस पर रखते हैं, तो भारत में बिजली की खपत 20 अरब युनिट कम हो जाएगी। यह भारत की कुल बिजली खपत का लगभग 1.5 प्रतिशत है। लेकिन यह सलाह वास्तव में काम कैसे करेगी?

सबसे पहले, 24 डिग्री सेल्सियस के डिफॉल्ट तापमान सेटिंग के महत्व पर चर्चा करते हैं। अपने घरों के अंदर लोग किस तापमान पर आराम महसूस करते हैं यह व्यक्तिगत पसंद का मामला है। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की राष्ट्रीय भवन संहिता (एनबीसी) विभिन्न तापमान सेटिंग्स की सलाह देता है जिससे विभिन्न प्रकार की इमारतों में रहने वालों को ऊष्मीय आराम प्राप्त होता है। एनबीसी के अनुसार, लोग केंद्रीय वातानुकूलित इमारतों में 23-26 डिग्री सेल्सियस पर, मिश्रित शैली की इमारतों में 26-30 डिग्री सेल्सियस पर और गैरवातानुकूलित इमारतों में 29-34 डिग्री सेल्सियस पर आराम महसूस करते हैं। मिश्रित शैली इमारतों में, एसी आवश्यकता अनुसार चालूबंद किया जाता है। हालांकि तापमान की ये सीमाएं मात्र संकेतक के रूप में हैं। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि लोग 26-32 डिग्री सेल्सियस पर आराम महसूस करते हैं। इसलिए, 24 डिग्री सेल्सियस गर्मी से राहत के लिए एक ठीकठाक सीमा है तथा इससे भी ऊंचा तापमान निर्धारित किया जा सकता है।

क्या हासिल होगा?

रूम एयर कंडीशनर का उपयोग घरों, छोटी दुकानों और छोटे कार्यालयों में किया जाता है। इस तरह के एसी के सभी निर्माता नए डिफॉल्ट सेट करने पर सहमत हैं। फिलहाल, अधिकांश एसी पहली बार चालू करने पर 18-20 डिग्री सेल्सियस से शुरू होते हैं। उसके बाद कभी भी चालू करने पर अंतिम बार सेट किए गए तापमान पर चालू होते हैं। इस सलाह के बाद, एसी हमेशा 24 डिग्री सेल्सियस पर चालू होंगे। चालू करने के बाद उपयोगकर्ता तापमान को बढ़ा या घटा सकते हैं। लेकिन अगली बार चालू करने पर सेटिंग वापिस डिफॉल्ट पर आ जाएगी। यानी यदि कोई उपभोक्ता एसी का उपयोग 20 डिग्री सेल्सियस पर करना चाहे तो हर बार एसी चालू करने के बाद उसे 20 डिग्री सेल्सियस पर लाना होगा। उम्मीद की जाती है कि इससे उपभोक्ता डिफॉल्ट तापमान के प्रति जागरूक होंगे और शायद वे अपना व्यवहार बदलकर थोड़े ऊंचे तापमान सेटिंग से काम चलाने लगेंगे। हालांकि, जो उपभोक्ता पहले से ही 24 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर एसी का उपयोग कर रहे हैं, उन पर इसका विपरीत असर हो सकता है और हो सकता है कि वे अब कम तापमान पर एसी सेट करने लगें। इस समस्या का एक समाधान यह हो सकता है कि अगली बार का डिफॉल्ट तापमान केवल तभी सेट हो जब अंतिम तापमान सेटिंग 24 डिग्री सेल्सियस से कम रही हो। यदि एसी का उपयोग 24 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की सेटिंग पर किया गया है, तो वह उसी तापमान सेटिंग से शुरू हो सकता है।

क्रियान्वयन एजेंसी, ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई), हर 4-5 महीने में क्रियान्वयन के सर्वेक्षण की योजना बना रही है और फिर इस प्रणाली को अनिवार्य बना दिया जाएगा। इस सर्वेक्षण में लोगों के व्यवहार को समझने और आदर्श डिफॉल्ट तापमान निर्धारित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आराम और बिजली में बचत दोनों सुनिश्चित करे।

सेंट्रल एसी सिस्टम पर असर

हवाई अड्डे, होटल, अस्पताल और बड़े कार्यालय सेंट्रल एयर कंडीशनिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं। इन अनुप्रयोगों में बचत की संभवाना और निश्चितता अधिक होती है क्योंकि इन स्थानों पर तापमान सेटिंग बहुत कम (18-21 डिग्री सेल्सियस) निर्धारित होती है। केंद्रीय रूप से नियंत्रित होने की वजह से इनमें डिफॉल्ट तापमान को नियंत्रित करना और बनाए रखना तुलनात्मक रूप से आसान है। ऊर्जा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति से यह बात स्पष्ट नहीं है कि सरकार इन प्रतिष्ठानों के साथ डिफॉल्ट तापमान सेटिंग की सूचना देने और निगरानी करने की क्या योजना बना रही है। इसके क्रियान्वन के लिए जापान का कूल बिज़कार्यक्रम एक अच्छा उदाहरण हो सकता है। 2005 की गर्मियों में, जापान सरकार ने पुस्तकालयों और सामुदायिक केंद्रों जैसे सभी कार्यालयों और सार्वजनिक इमारतों से एयर कंडीशनर को 28 डिग्री सेल्सियस पर रखने को कहा था। कर्मचारियों को आराम से रहने के लिए सूट और टाई के बजाय आरामदेह ड्रेस कोड की अनुमति थी। प्रारंभ में, अभियान की आलोचना इस आधार पर की गई कि रूढ़िवादी जापानी लोग कभी भी अनौपचारिक वस्त्रों में कार्यालय नहीं जाएंगे। लेकिन जापानी सरकार ने अभियान को जारी रखा। निरंतर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित होते रहे और प्रधानमंत्री समेत वरिष्ठ कैबिनेट नेताओं ने अनौपचारिक वस्त्रों में साक्षात्कार देकर उदाहरण प्रस्तुत किए। इस अभियान का अब तेरहवां वर्ष है। 2011 में, भूकंप और सुनामी के बाद जापान के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के कारण बिजली की कमी की समस्या का समाधान करने के लिए सुपर कूल बिज़अभियान शुरू किया गया। निजी क्षेत्र ने भी सरकार के उदाहरण का पालन किया है और कई कार्यालयों के साथसाथ शॉपिंग मॉल में थर्मोस्टैट को 28 डिग्री सेल्सियस पर सेट किया गया। कर्मचारी अब टीशर्ट और शॉर्ट्स में कार्यालय जा सकते हैं। कार्यालय में तापमान कम करने के लिए पर्दों और रंगीन शीशों का उपयोग किया जाने लगा। टोकियो समाचार और मेट्रो सिस्टम में हर सुबह बिजली की अपेक्षित मांग और आपूर्ति पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है। 2011 में, इस अभियान ने टोकियो क्षेत्र में लगभग 12 प्रतिशत बिजली बचाई। भारत में भी स्थानीय परिवेश के अनुकूल एक अभियान इसी तरह के परिणाम प्राप्त करने के लिए तैयार किया जा सकता है।

और क्या हो सकता है?

एयर कंडीशनर के लिए उच्च डिफॉल्ट तापमान निर्धारित करना बिजली की खपत को सीमित करने के लिए एक अच्छी पहल है। हालांकि, इससे और अधिक करने की जरूरत है। भारत में लगभग 4-5 प्रतिशत घरों में ही एसी हैं। बढ़ती आय, बढ़ते शहरीकरण और बढ़ते तापमान के साथ इसमें वृद्धि की उम्मीद है। इन एसी को चलाने के लिए लगने वाली बिजली हेतु महत्वपूर्ण संसाधनों की ज़रूरत होगी और इसके परिणामस्वरूप सामाजिक, पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तन सम्बंधी मुद्दे भी उठेंगे। बड़ी समस्या तो यह है कि व्यस्ततम समय में एसी की बिजली खपत में वृद्धि होती है जिसकी वजह से ऐसे ऊर्जा संयंत्रों की आवश्यकता बढ़ जाएगी, जो व्यस्ततम समय में सर्वोच्च मांग की पूर्ति कर सकें। इस समस्या का तकाज़ा है कि एसी का उपयोग कम करने के मामले में नीतिगत हस्तक्षेप किए जाएं।

सबसे अच्छी नीति वह है जो एसी की आवश्यकता को या तो कम या बिलकुल खत्म कर दे। उच्च ऊष्मारोधक गुणों वाली निर्माण सामग्री और हवा की अच्छी आवाजाही वाली बिल्डिंग डिज़ाइन से अंदर के तापमान को कम रखा जा सकता है। नीतियों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि लोग ऐसी तापमान रोधी डिज़ाइन व निर्माण के तरीकों को अपनाएं। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाने के अलावा ऐसी ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता के बेहतर क्रियान्वन का लक्ष्य भी होना चाहिए जिसमें तापमान रोधी डिजाइनों का उपयोग शामिल हो।

इसके बाद एसी की दक्षता में सुधार की बात आती है। बीईई में पहले से ही एसी के लिए अनिवार्य मानक और लेबलिंग कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम भारतीय बाज़ारों में एसी को 1 सितारा (सबसे कम ऊर्जा दक्षता) से 5 सितारा (सबसे ज़्यादा ऊर्जा दक्षता) तक रेटिंग देता है। 1 स्टार से कम ऊर्जा दक्षता वाला एसी बेचा नहीं जा सकता। दक्षता स्तर की स्टार रेटिंग समयसमय पर संशोधित होती रहती है लेकिन इनमें आगे सुधार भी किया जा सकता है। यह भी देखा गया है कि जब बीईई स्टार रेटिंग को संशोधित करता है, तो बाज़ार कम रेटिंग वाले मॉडल्स की ओर चला जाता है। वर्तमान 5 सितारा रेटेड मॉडल संशोधन के आधार पर 4 या 3 सितारा मॉडल में बदल जाते हैं और कुछ ही 5 सितारा मॉडल शेष रह जाते हैं। जिस तरह एलईडी बल्ब के मामले में किया गया था, थोक खरीद जैसी नीतियां के द्वारा अत्यधिक कुशल मॉडल को प्रोत्साहित करके इस मुद्दे को संबोधित किया जा सकता है। अंत में, बीईई को रेटिंग शुदा मॉडल्स में मानकों के अनुपालन की जांच करके परिणाम मीडिया में प्रकाशित करना चाहिए। इससे कार्यक्रम की विश्वसनीयता और दृश्यता बढ़ेगी।

एसी के अलावा, छत के पंखे और रेफ्रिजरेटर जैसे अन्य उपकरण भी हैं जो भारत की कुल आवासीय बिजली खपत में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यह खपत वर्ष 2000 से अब तक तीन गुना हो गई है। 70 प्रतिशत से अधिक घरों में गर्मी से राहत के लिए छत के पंखों का उपयोग किया जाता है। यह भारत की कुल आवासीय बिजली खपत का लगभग 18 प्रतिशत है। भारत में बेचे जाने वाले अधिकांश छत के पंखे, सबसे कुशल पंखों की तुलना में दो गुना अधिक बिजली खर्च करते हैं। वर्ष 2009 में बीईई द्वारा छत के पंखों में दक्षता रेटिंग की शुरुआत की गई और उसके बाद से इसे कभी संशोधित नहीं किया गया। दूसरी ओर, एयर कंडीशनर और फ्रॉस्ट फ्री रेफ्रिजरेटर की रेटिंग को अब तक 3-4 बार संशोधित किया जा चुका है। रेफ्रिजरेटर एक खामोश पियक्कड़ है जो किसी भी घर में 25-50 प्रतिशत बिजली की खपत कर जाता है। कुछ मामलों में एक अक्षम रेफ्रिजरेटर घर के वार्षिक बिजली बिल को 4-5 हज़ार रुपए तक बढ़ा सकता है। हालांकि, एसी की तुलना में उसकी खपत के बारे में जागरूकता कम होती है। इन उपकरणों की दक्षता में सुधार लाने और उनमें बिजली की खपत को कम करने के उद्देश्य से नीतियां बनाने के लिए उनका उपयोग पैटर्न और वास्तविक बिजली खपत के डैटा की आवश्यकता होगी। प्रयास (ऊर्जा समूह) ने स्मार्ट मीटर का उपयोग करके कुछ घरों की वास्तविक बिजली खपत और चयनित उपकरणों की निगरानी करने की एक पहल शुरू की है। यह डेटा emarc.watchyourpower.org पर देखा जा सकता है। इस डैटा का उपयोग विभिन्न उपकरणों की बिजली की खपत के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के साथसाथ इन उपकरणों की दक्षता में सुधार के लिए मानक और लेबलिंग जैसे कार्यक्रमों की बुनियादी तैयार करने के लिए किया जा सकता है।

भारत में एसी के लिए डिफॉल्ट तापमान निर्धारित करना देश में भविष्य में बिजली की खपत को कम करने के लिए एक अच्छा कदम है। इससे उपभोग के बारे में सामान्य जन जागरूकता को बढ़ावा मिलेगा जिसके परिणामस्वरूप अन्य उपकरणों का भी तर्कसंगत उपयोग हो सकता है। बिजली की खपत को घटाने के प्रयासों को न केवल एसी पर बल्कि अन्य घरेलू उपकरणों, जैसे छत के पंखों और रेफ्रिजरेटरों पर भी लक्षित करना आवश्यक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन और आत्महत्या का सम्बंध

हाल ही में हुए शोध में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन (बढ़ता हुआ तापमान) लोगों की आत्महत्या की प्रवृत्ति को उतना ही प्रभावित करता है जितना कि आर्थिक मंदी लोगों को आत्महत्या करने के लिए उकसाती है।

मानसिक स्वास्थ्य और ग्लोबल वार्मिंग के बीच सम्बंध पर व्यापक रूप से शोध नहीं हुए हैं। किंतु हाल ही के शोध में अमेरिका और मेक्सिको में पिछले दशक में हुई आत्महत्याओं और तापमान का विश्लेषण किया है। विश्लेषण में पाया गया कि औसत मासिक तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने के साथ अमेरिका में आत्महत्या की दर में 0.7 प्रतिशत और मेक्सिको में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

शोध में मौसम में बदलाव, गरीबी के स्तर (आर्थिक स्तर) को ध्यान में रखा गया था। यहां तक कि मशहूर लोगों की आत्महत्या की खबरों का भी ध्यान रखा गया था जिनकी वजह से ज़्यादा लोग आत्महत्या कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि सारी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भी किसी क्षेत्र में गर्म दिनों में ज़्यादा आत्महत्याएं हुर्इं।

अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्शल बर्क और उनके साथियों का कहना है कि यह पता करना काफी महत्वपूर्ण है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आत्महत्या की दर में फर्क पड़ता है या नहीं क्योंकि विश्व भर में अकेले आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के आंकड़े अन्य हिंसक कारणों से होने वाली मृत्यु की कुल संख्या से ज़्यादा हैं। विश्व स्तर पर यह मृत्यु 10-15 प्रमुख कारणों में से एक है। यह विश्लेषण नेचर क्लाइमेट चेंज पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आत्महत्या दर में मामूली बदलाव भी विश्व स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकता है, खासकर अमीर देशों में जहां वर्तमान आत्महत्या दर वैसे ही अधिक है। दुनिया भर में हाल ही के हफ्तों में उच्च तापमान दर्ज किया गया है। जो संभवतः जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ है।

इस प्रकार के अध्ययन बढ़ते तापमान और आत्महत्या के बीच कोई कार्यकारण सम्बंध नहीं दर्शाते पर समय के साथ और अलगअलग स्थानों पर परिणामों में उल्लेखनीय स्थिरता दिखी है। यह बात भारत के संदर्भ में हुए शोध में भी दिखी है जो कहता है कि पिछले 30 सालों में भारत में 60,000 आत्महत्याओं और तापमान बढ़ने के बीच सम्बंध है।

शोधकर्ताओं ने ट्विटर पर 60 करोड़ से अधिक संदेशों का भी विश्लेषण किया और पाया कि उच्च तापमान के दिनों में लोग मायूस शब्दों (जैसे अकेलापन, उदासी, उलझे हुए) वगैरह का उपयोग अधिक करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य सामान्य से गर्म दिनों के दौरान बिगड़ता है। एक संभावना यह हो सकती है कि जब शरीर गर्म परिस्थितियों में खुद को ठंडा करता है तो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह में फर्क पड़ता हो।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि मौजूदा कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं किया जाता है तो जलवायु परिवर्तन के कारण अमेरिका और कनाडा में साल 2050 तक 9,000 से 40,000 तक अतिरिक्त आत्महत्या होने की आशंका है। यह बेरोज़गारी के कारण होने वाली आत्महत्या में 1 प्रतिशत की वृद्धि से भी ज़्यादा है। शोध यह बताते हैं कि तापमान बढ़ने से हिंसा बढ़ती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पानी के अभाव में कोका कोला पी रहे हैं लोग

मेक्सिको के चियापास प्रांत में एक शहर है सैन क्रिस्टोबल। यहां काफी बारिश होती है। किंतु लोगों को पेयजल मुश्किल से मिलता है। लोगों को टैंकरों से पानी खरीदना पड़ता है। तो हालत यह है कि कई शहरवासी पानी की बजाय कोका कोला पीते हैं। एक स्थानीय बॉटलिंग प्लांट द्वारा बेचा जाने वाला यह कोका कोला ज़्यादा आसानी से मिल जाता है और दाम में लगभग पानी के बराबर है।

नतीजतन, मेक्सिको सॉफ्ट ड्रिंक की खपत में दुनिया का अग्रणी देश है और चियापास प्रांत मेक्सिको में अव्वल है। सैन क्रिस्टोबल के रहवासी प्रतिदिन औसतन 2 लीटर सोड़ा पी जाते हैं। इसके स्वास्थ्य पर असर भी हुए हैं।

2013 से  2016 के बीच चियापास में डायबीटीज़ की वजह से मृत्यु दर 30 प्रतिशत बढ़ी। आज वहां यह मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। प्रति वर्ष 3000 मौतों के लिए ज़िम्मेदार इस रोग से निपटने में वहां के स्वास्थ्य कर्मियों के पसीने छूट रहे हैं। लोग इसके लिए कोका कोला कारखाने को ही जवाबदेह मानते हैं। इस कारखाने को प्रतिदिन 12 लाख लीटर पानी उलीचने की अनुमति है। यह अनुमति उसे दस वर्ष पहले केंद्र सरकार के साथ एक अनुबंध के तहत मिली थी। इसके खिलाफ जन आक्रोश बढ़ता जा रहा है और पिछले वर्ष लोगों ने प्रदर्शन भी किया था।

दूसरी ओर, कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि उनकी कंपनी को बेवजह बदनाम किया जा रहा है, पानी के अभाव का वास्तविक दोषी तो तेज़ शहरीकरण और घटिया नियोजन है। कुछ वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इलाके के कुएं सूखने के पीछे जलवायु परिवर्तन की भूमिका है। गौरतलब है कि पूरे मेक्सिको में कोका कोला के बॉटलिंग व बिक्री के अधिकार फेम्सा नामक कंपनी के पास हैं जो लेटिन अमेरिका में भी कोका कोला बेचती है। यह एक विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी है और बहुत शक्तिशाली खिलाड़ी है। तो ऐसा लगता है कि मेक्सिको के लोगों को पानी मिलेगा या नहीं, यह तर्कों से नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन से तय होगा। (स्रोत फीचर्स)

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भारत के ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का मूल्यांकन – आदित्य चुनेकर, संजना मुले, मृदुला केलकर

भारत के अपने नागरिकों को विश्वसनीय, किफायती, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध करवाने के लक्ष्य में ऊर्जा दक्षता काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत में पिछले कुछ सालों में ऊर्जा संरक्षण, बेहतर ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा आपूर्ति प्रबंधन से सम्बंधित कई नीतियां और कार्यक्रम लागू किए गए हैं। इन कार्यक्रमों के स्तर और दायरे दोनों ही बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए उजाला कार्यक्रम बड़े स्तर पर परिवारों को कम दामों में एलईडी बल्ब उपलब्ध कराता है।

किंतु इस तरह के बड़े कार्यक्रमों के समग्र मूल्यांकन पर बहुत ही कम ध्यान दिया जा रहा है। समग्र मूल्यांकन कार्यक्रमों के विभिन्न प्रभावों और उनकी कारगरता की व्यवस्थित जांच करते हैं, इन कार्यक्रमों की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं और कार्यक्रमों के क्रियांवयन से होने वाली ऊर्जा की बचत का अनुमान बताते हैं। समग्र मूल्यांकन वर्तमान में लागू कार्यक्रमों की समीक्षा भी करते हैं तथा भविष्य में लागू किए जाने वाले ऐसे अन्य कार्यक्रमों की डिज़ाइन को बेहतर करने में मदद करते हैं।

कई व्यवस्थागत बाधाओं के चलते भारत में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का समग्र मूल्यांकन बहुत सीमित रहा है। एक तो ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम क्रियांवित करने वाले संस्थानों के लिए, इन कार्यक्रमों का समयसमय पर और स्वतंत्र आकलन करवाने की कोई अनिवार्यता नहीं है। ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001; विद्युत अधिनियम, 2003; राष्ट्रीय विद्युत नीति 2005 और इसके संशोधन; राष्ट्रीय शुल्क नीति, 2006; और नियामक मंच द्वारा मांग प्रबंधन के नियमन सम्बंधी दिशानिर्देशों में इन नियमों की कमी स्पष्ट दिखती है।

समग्र मूल्यांकन की राह में दूसरी बाधा यह (गलत) धारणा है कि मूल्यांकन बोझिल, असमय, और महंगा होता है। यह गलतफहमी कुछ शुरुआती कार्यक्रमों में ऊर्जा बचत मापने के लिए डैटा लॉगर्स की मदद से ऊर्जा बचत सम्बंधी वास्तविक मापन के अनुभवों से उपजी है। और खासकर छोटे स्तर के कार्यक्रमों के लिए मूल्यांकन को एक बोझ माना जाता है।

अंततः ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का सार्वजनिक डैटा दुर्लभ या बहुत कम उपलब्ध होता है। डैटा की कमी के कारण स्वतंत्र रुप से मूल्यांकन करने वाले शोधकर्ताओं, अकादमिक लोगों, और सामाजिक संगठनों द्वारा मूल्यांकन बहुत सीमित हो जाता है। इन व्यवस्थागत बाधाओं को दूर करने की ज़रूरत है ताकि भारत में इन कार्यक्रमों का समग्र मूल्यांकन किया जा सके।

ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम के किसी भी समग्र मूल्याकन में कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन (अर्थात यह देखना कि ऊर्जा खपत में कितनी कमी आई और सर्वोच्च मांग में कितनी कमी आई), प्रक्रिया का मूल्यांकन (कार्यक्रम का क्रियान्वन कितना कारगर रहा), और बाज़ार प्रभाव मूल्यांकन (कार्यक्रम के कारण बाज़ार में आए बदलावों का आकलन) शामिल हैं।

कार्यक्रम के प्रायोगिक क्रियान्वन के दौरान मूल्यांकन का विशेष महत्व होता है क्योंकि प्रायोगिक क्रियांवयन में सामने आई खामियों या मुश्किलों को बड़े स्तर पर कार्यक्रम लागू करने से पहले दूर किया जा सकता है। इसके अलावा लागू हो चुके कार्यक्रमों का मूल्यांकन भी ज़रूरी है क्योंकि इस तरह के मूल्यांकन कार्यक्रम के कारगर और गैरकारगर बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाते हैं।

प्रयास द्वारा तैयार रिपोर्ट में भारत में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने के व्यापक दिशानिर्देश प्रस्तुत किए गए हैं। ये दिशानिर्देश विश्व स्तर की सर्वोत्तम परिपाटियों की समीक्षाओं पर आधारित हैं और केस स्टडीज़ की मदद से इन परिपाटियों के उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट, वर्तमान में भारत में लागू ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों के समग्र मूल्यांकन के लिए नीति निर्माताओं, वितरण कंपनियों के प्रबंधकों और नियंत्रकों के लिए है जो मूल्यांकनकर्ताओं को नियुक्त कर सकते हैं। साथ ही यह रिपोर्ट भारत के ऊर्जा दक्षता संस्थानों जैसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड और सरकार द्वारा निर्धारित एजेंसियों के कार्यक्रमों में समग्र मूल्यांकन को शामिल करवाने में भी उपयोगी होगी। अंत में इस रिपोर्ट में उपभोक्ताओं, सामाजिक संगठनों और शोधकर्ताओं की दृष्टि से ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम के समग्र मूल्यांकन के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। यह रिपोर्ट भारत के सभी ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों की व्यापक मार्गदर्शिका नहीं है। यह रिपोर्ट तो ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए एक सामान्य खाका या कार्यक्रमविशेष के लिए दिशानिर्देश प्रस्तुत करती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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स्वास्थ्य और स्वच्छता को चुनौती देता ई-कबाड़ – नवनीत कुमार गुप्ता

भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल यानी एसोचैम के पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन परिषद के ताज़ा अध्ययन के अनुसार भारत दुनिया में सर्वाधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाला देश है। यहां हर वर्ष 13 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसका सिर्फ1.5 प्रतिशत भाग विभिन्न संगठित अथवा असंगठित इकाइयों में दोबारा इस्तेमाल योग्यबनाया जाता है।

असल में आज का युग उपभोक्तावाद का युग है और इस युग को तेज़ गति प्रदान की है सूचना तथा संचार क्रांति ने। अर्थ­व्यवस्था, उद्योगों तथा संस्थाओं सहित हमारे दैनिक जीवन में सूचना तथा संचार क्रांति तेज़ी से बदलाव ला रही है। एक ओर, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद हमारी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। वहीं दूसरी ओर यही उत्पाद, संसाधनों के अनियंत्रित उपभोग तथा भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न करने के लिए भी जिम्मेदार हैं। 

प्रौद्योगिकी का तेज़ विकास, तकनीकी आविष्कारों का आधुनिकीकरण तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में तेज़ी से बदलाव के कारण विश्व में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उत्पादन में भारी वृद्धि हो रही है। इलेक्ट्रॉनिक कचरा या कचरा इलेक्ट्रॉनिक तथा विद्युत उपकरणों से उत्पन्न होने वाले ऐसे सभी प्रकार के कचरे को कहते हैं, जिनकी अब मूल रूप में उप­योगिता नहीं रही है और जिन्हें दोबारा उपयोग लायक बनाने या पूरी तरह समाप्त कर देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए पुराने रेफ्रिजरेटर, खराब हो चुकी वॉशिंग मशीन, बेकार कंप्यूटर तथा प्रिंटर, टेलीविज़न, मोबाइल, आईपॉड, सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव इत्यादि। 

देश में उत्पन्न कचरे का 90% से अधिक भाग असंगठित बाज़ार में दोबारा इस्तेमाल के लिए अथवा नष्ट करने के लिए पहुंचता है। ये असंगठित क्षेत्रआम तौर पर महानगरों तथा बड़े शहरों की झुग्गीबस्तियों में होते हैं, जहां अकुशल कामगार लागत कम करने के उद्देश्य से बिलकुल अनगढ़ तरीकों से कचरे को दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाते हैं। ये कामगार खतरनाक परिस्थितियों जैसे, दस्तानों तथा मुखौटों का प्रयोग किए बिना कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया में कचरे से निकलने वाली गैसें, अम्ल, विषैला धुआं तथा विषैली राख कामगारों तथा स्थानीय पर्यावरण के लिए खतरनाक होती है

कचरे में कई प्रकार के प्रदूषण फैलाने वाले तथा विषैले पदार्थ होते हैं, जैसे, सर्किट बोर्ड में कैडमियम तथा लेड, स्विच तथा फ्लैट स्क्रीन मॉनिटर में पारा, पुराने कैपेसिटर्स तथा ट्रांसफार्मर्स में पोलीक्लोरिनेटेड बाईफिनाइल तथा प्रिंटेड सर्किट बोर्ड को जलाने पर निकलने वाली ब्रोमीनयुक्त आग। इन हानिकारक पदार्थों तथा विषैले धुएं के लगातार सम्पर्क में रहने से इस काम में लगे कामगारों में बीमारियां पनपती हैं। 

देश के 70 प्रतिशत कचरे का उत्पादन देश के 10 राज्यों में होता है, जिसमें 19.8 प्रति­शत योगदान के साथ महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। इसके बाद तमिलनाडु में 13.1 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 12.5 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 10.1 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 9.8 प्रतिशत, दिल्ली में 9.5 प्रतिशत, कर्नाटक में 8.9 प्रतिशत, गुजरात में 8.8 प्रतिशत तथा मध्यप्रदेश में 7.6 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन होता है।

देश में बढ़ते कचरे के खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कचरा प्रबंधन नियम, 2016 लागू किया है। 2018 में इसनियम में सुधार किया गया, ताकिदेश में कचरे के निस्तारण को दिशा दी जा सके तथा निर्धारित तरीके से कचरे को नष्टअथवा पुनर्चक्रित किया जा सके। कोशिश यह है किईकचरे को ठिकाने लगाने के क्षेत्रको मान्यता प्राप्त हो, कामगारों के स्वास्थ्यपर बुरा प्रभाव ना पड़े तथा वातावरण प्रदूषित हो।

नए नियमों में इलेक्ट्रॉनिक सामग्रियों के उत्पादकों के लिए उनके निस्तारण, प्रबं­धन तथा परिचालन के लिए दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि 2018 के संशोधन के बाद अब यह इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कचरे को एकत्र करके निस्तारण करें। इससे उत्पादक भी कम विषैले तथा पर्यावरण के अनुरूप उत्पाद तैयार करने के लिए प्रेरित होंगे, और उपभोक्ता स्वस्थ वातावरण में प्रौद्योगिकी के विकास का सार्थक एवं स्वस्थ उपयोग कर सकें (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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प्लास्टिक: एक और मौका हाथ से गया – गुरुस्वामी कुमारस्वामी

स वर्ष गुड़ी पड़वा (18 मार्च 2018, पारंपरिक नव वर्ष) पर महाराष्ट्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसके ज़रिए प्लास्टिक और थर्मोकोल उत्पादों के उपयोग पर लगभग प्रतिबंध लगा दिया गया। अधिसूचना में, इस प्रतिबंध को उचित सिद्ध करते हुए गैर-जैव-विघटनशील प्लास्टिक, खास तौर पर कम समय के लिए उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक, से होने वाली समस्याओं का ज़िक्र किया गया है। मुख्य समस्याओं में प्लास्टिक की वजह से नालियों के अवरुद्ध होने, समुद्री जीवन और उसकी विविधता पर खतरा, पर्यावरण में ऐसे प्लास्टिक का बढ़ते जाना और स्वास्थ्य पर प्रभाव शामिल बताए गए हैं। इस प्रतिबंध में दवाइयों के लिए प्लास्टिक पैकेजिंग की अनुमति दी गई है। दूध के पाउच पर भी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है – हालांकि, इस तरह के प्रत्येक बैग पर वापस खरीद का मूल्य मुद्रित होगा। और जून 2018 तक सरकार द्वारा इनके संग्रह का एक तंत्र स्थापित करने की बात कही गई है। यहां, मैं इस प्रतिबंध, या इसके कार्यान्वयन की खूबियों-खामियों में नहीं जाऊंगा। दरअसल यह आलेख, रविवार की सुबह सुपरमार्केट में मैंने जो कुछ भी देखा उसी से प्रेरित है।

प्लास्टिक पैकेजिंग सामग्री के प्रचलन को देखते हुए, मैं यह सोच रहा था कि समाज और स्थानीय व्यवसाय इस प्रतिबंध के प्रभावों का सामना कैसे करेंगे। एक समाचार पत्र में प्रकाशित आलेख में अखिल भारतीय प्लास्टिक निर्माता संघ के हवाले से बताया गया है कि इस प्रतिबंध के कारण लगभग 4 लाख लोगों की नौकरियां छिन जाने का अनुमान है। राज्य सरकार ने प्रतिबंध को लागू करने का काम स्थानीय सरकार, नगर पालिकाओं, आदि को सौंपा है। इस कार्य के चुनौतीपूर्ण होने की संभावना है क्योंकि ज़्यादातर स्थानीय निकाय पहले ही संसाधनों के अभाव से त्रस्त हैं। ऐसे में हो सकता है कि वे बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वालों पर नज़र रखने और पहचानने में सक्षम न हो सकें (जैसा कि नए कानून में प्रावधान है)। होगा यह कि कम से कम कुछ समय तक, मोहल्ले की किराना दुकान जैसे छोटे व्यवसायी पॉलीबैग त्यागने को राज़ी नहीं होंगे और प्रबंधन के उपाय तलाश करने की कोशिश करेंगे (जैसे सम्बंधित लागतों को उपभोक्ताओं से वसूल कर)। राज्य सरकार जब तक इस प्रतिबंध की कानूनी चुनौतियों से निपटे, तब तक वे शायद थोड़ी प्रतीक्षा करने की रणनीति अपनाएंगे। यह आलेख इस पहलू को भी तलाशने का इरादा नहीं रखता है।

आज सुबह खरीदारी करते वक्त मैं यह सोच रहा था कि इतने बड़े-बड़े सुपरमार्केट जो प्लास्टिक पैकेजिंग पर उतने ही निर्भर हैं (लेकिन छोटे किराना स्टोर्स जैसी रणनीतियों का उपयोग नहीं कर सकते) वे इस परेशानी से कैसे निपटेंगे। इस मुद्दे में मेरी दिलचस्पी संभवतः दूसरों के मुकाबले ज़्यादा है, क्योंकि मैं प्लास्टिक पर काम करता हूं और अपशिष्ट निपटान से सम्बंधित मुद्दों पर नगर पालिका को सलाह भी देता हूं। मैं प्लास्टिक पैकेजिंग के कारण उत्पन्न समस्याओं के बारे में सचेत हूं। और, मैं पॉलीथीन (एलएलडीपीई) की कम लागत को लेकर भी जागरूक हूं और यह भी जानता हूं कि उसकी खूबियों की बराबरी करना मुश्किल है। तो, मुझे स्पष्ट है कि परिवर्तन लाने में नियमन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। लेकिन मैं भटक रहा हूं। जब मैं सुपरमार्केट गया तो देखा कि उन्होंने एक गैर-पॉलीथीन, जैव-विघटनशील बैग अपनाया हुआ था।

ये बैग एक गुजरात स्थित कंपनी बायोलाइस नामक सामग्री से बनाकर सप्लाई करती है। बायोलाइस जैविक पदार्थ से बनाया जाता है और यह एक जैव-विघटनशील झिल्ली बना सकता है। इसे फ्रांस में लीमाग्रेन द्वारा विकसित किया गया है। इसके मार्केटिंग वीडियो में दावा किया गया है कि इसे गैर-खाद्य स्रोतों से तैयार किया गया है (हालांकि इसके अपने साहित्य का यह भी कहा गया है कि इसमें मक्का के आटे का उपयोग हुआ है)। लीमाग्रेन की वेबसाइट कहती है कि वह एक सहकारी समूह है जिसकी स्थापना व संचालन किसानों (संभवत: फ्रांसीसी) द्वारा किया जाता है। लगभग 90 पेटेंट से यह स्पष्ट है कि कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन के लिए व्यापक अनुसंधान किया गया है। पॉलीथीन पैकेजिंग झिल्लियों में फटने का विरोध करने की सामथ्र्य से मेल खाने वाले विकल्प बहुत कम हैं, लेकिन आज सुबह जो बैग मैंने देखे उससे मैं काफी प्रभावित था। कुल मिलाकर यह एक अद्भुत तकनीकी नवाचार है जो चीनी प्रयोगशाला से उत्पादन के चरण में पहुंचकर अब सुपरमार्केट में उपयोग किया जा रहा है।

तो इस अनुभव ने मुझे व्याकुल क्यों किया? मुख्य रूप से इसलिए कि यहां मैंने देखा कि हमने एक अवसर गंवा दिया है – अवसर था उद्योग में व्यवधान को कम से कम रखते हुए पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव डालने के साथ-साथ स्थानीय नवाचार नेटवर्क को मज़बूत करने का। एक वैकल्पिक परिदृश्य की कल्पना कीजिए। एक बड़े राज्य की सरकार प्लास्टिक पैकेजिंग पर प्रतिबंध लागू करने का निर्णय लेती है, मगर यह जानती है कि पॉलीथीन के कोई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। तो वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) से संपर्क करती है और उसे इस स्पष्ट लक्ष्य के साथ धन देती है कि एक निर्धारित समय सीमा के अंदर कोई विकल्प विकसित किया जाए। डीएसटी तब राज्य नवाचार परिषद, विज्ञान व इंजीनियरिंग अकादमियों और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) जैसे उद्योग संगठनों के साथ मिलकर इसके लिए प्रस्ताव आमंत्रित करता है। डीएसटी विशेषज्ञता वाले संस्थानों से सीधे अनुरोध भी कर सकता है। पॉलीथीन-जैसे गुणों के साथ एक विकल्प विकसित करने के लिए ज़रूरी अनुसंधान और बुनियादी नवाचार एक वर्ष में नहीं हो सकता है (ध्यान दें कि लीमाग्रेन के पेटेंट का प्रथम आवेदन 2000 या उससे पहले दिया गया था)। अलबत्ता, ज़रूरत अर्जेंट हो (जैसे, प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया जा चुका हो) और उत्पाद को विकसित करने के लिए वित्त पोषण दिया जाए एवं उद्योग इसे करने को तैयार हो (जैसा मैनहटन परियोजना में हुआ था) तो क्या एक सार्थक विकल्प उभर सकता है? शायद, बगासे जैसे स्थानीय कच्चे माल (जिसे वर्तमान में विद्युत सह-उत्पादन संयंत्रों में जला दिया जाता है) के आधार पर? ऐसा कुछ करने के संदर्भ कौन-से तत्व नदारद हैं? मिलिंद सोहनी का मत है कि भारतीय अकादमिक जगत को स्थानीय चुनौतियों को उठाना चाहिए तथा स्थानीय नीति निर्माताओं के साथ बेहतर समन्वय/सहयोग करना चाहिए। अतुल भाटिया के मुताबिक यह समय अकादमिक जगत और उद्योग के बीच सहयोग स्थापित करने के लिए सही समय है।

मेरा ख्याल है कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या के संदर्भ में, यह सब करने के लिए हमारे पास एक बेहतरीन अवसर था। यदि इस परिवर्तन की योजना और व्यवस्था सावधानीपूर्वक बनाई जाती तो इस प्रतिबंध के कारण होने वाली समस्याओं को कम किया जा सकता था। और साथ ही साथ, सरकार, अकादमिक जगत और उद्योग के बीच साझेदारी निर्मित होती जो नवाचारों की श्रृंखला को और मज़बूत करती। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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