हाल ही में एक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) मॉडल ने एक शिशु की आंखों के ज़रिए ‘crib (पालना)’ और ‘ball (गेंद)’ जैसे शब्दों को पहचानना सीखा है। एआई के इस तरह सीखने से हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि मनुष्य कैसे सीखते हैं, खासकर बच्चे भाषा कैसे सीखते हैं।
शोधकर्ताओं ने एआई को शिशु की तरह सीखने का अनुभव कराने के लिए एक शिशु को सिर पर कैमरे से लैस एक हेलमेट पहनाया। जब शिशु को यह हेलमेट पहनाया गया तब वह छह महीने का था, और तब से लेकर लगभग दो साल की उम्र तक उसने हर हफ्ते दो बार लगभग एक-एक घंटे के लिए इस हेलमेट को पहना। इस तरह शिशु की खेल, पढ़ने, खाने जैसी गतिविधियों की 61 घंटे की रिकॉर्डिंग मिली।
फिर शोधकर्ताओं ने मॉडल को इस रिकॉर्डिंग और रिकॉर्डिंग के दौरान शिशु से कहे गए शब्दों से प्रशिक्षित किया। इस तरह मॉडल 2,50,000 शब्दों और उनसे जुड़ी छवियां से अवगत हुआ। मॉडल ने कांट्रास्टिव लर्निंग तकनीक से पता लगाया कि कौन सी तस्वीरें और शब्द परस्पर सम्बंधित हैं और कौन से नहीं। इस जानकारी के उपयोग से मॉडल यह भविष्यवाणी कर सका कि कतिपय शब्द (जैसे ‘बॉल’ और ‘बाउल’) किन छवियों से सम्बंधित हैं।
फिर शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि एआई ने कितनी अच्छी तरह भाषा सीख ली है। इसके लिए उन्होंने मॉडल को एक शब्द दिया और चार छवियां दिखाईं; मॉडल को उस शब्द से मेल खाने वाली तस्वीर चुननी थी। (बच्चों की भाषा समझ को इसी तरह आंका जाता है।) साइंस पत्रिका में शोधकर्ताओं ने बताया है कि मॉडल ने 62 प्रतिशत बार शब्द के लिए सही तस्वीर पहचानी। यह संयोगवश सही होने की संभावना (25 प्रतिशत) से कहीं अधिक है और ऐसे ही एक अन्य एआई मॉडल के लगभग बराबर है जिसे सीखने के लिए करीब 40 करोड़ तस्वीरों और शब्दों की जोड़ियों की मदद से प्रशिक्षित किया गया था।
मॉडल कुछ शब्दों जैसे ‘ऐप्पल’ और ‘डॉग’ के लिए अनदेखे चित्रों को भी (35 प्रतिशत दफा) सही पहचानने में सक्षम रहा। यह उन वस्तुओं की पहचान करने में भी बेहतर था जिनके हुलिए में थोड़ा-बहुत बदलाव किया गया था या उनका परिवेश बदल दिया गया था। लेकिन मॉडल को ऐसे शब्द सीखने में मुश्किल हुई जो कई तरह की चीज़ों के लिए जेनेरिक संज्ञा हो सकते हैं। जैसे ‘खिलौना’ विभिन्न चीज़ों को दर्शा सकता है।
हालांकि इस अध्ययन की अपनी सीमाएं हैं क्योंकि यह महज एक बच्चे के डैटा पर आधारित है, और हर बच्चे के अनुभव और वातावरण बहुत भिन्न होते हैं। लेकिन फिर भी इस अध्ययन से इतना तो समझ आया है कि शिशु के शुरुआती दिनों में केवल विभिन्न संवेदी स्रोतों के बीच सम्बंध बैठाकर बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
ये निष्कर्ष नोम चोम्स्की जैसे भाषाविदों के इस दावे को भी चुनौती देते हैं जो कहता है कि भाषा बहुत जटिल है और सामान्य शिक्षण प्रक्रियाओं के माध्यम से भाषा सीखने के लिए जानकारी का इनपुट बहुत कम होता है; इसलिए सीखने की सामान्य प्रक्रिया से भाषा सीखा मुश्किल है। अपने अध्ययन के आधार पर शोधकर्ता कहते हैं कि भाषा सीखने के लिए किसी ‘विशेष’ क्रियाविधि की आवश्यकता नहीं है जैसे कि कई भाषाविदों ने सुझाया है।
इसके अलावा एआई के पास बच्चे के द्वारा भाषा सीखने जैसा हू-ब-हू माहौल नहीं था। वास्तविक दुनिया में बच्चे द्वारा भाषा सीखने का अनुभव एआई की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध और विविध होता है। एआई के पास तस्वीरों और शब्दों के अलावा कुछ नहीं था, जबकि वास्तव में बच्चे के पास चीज़ें छूने-पकड़ने, उपयोग करने जैसे मौके भी होते हैं। उदाहरण के लिए, एआई को ‘हाथ’ शब्द सीखने में संघर्ष करना पड़ा जो आम तौर पर शिशु जल्दी सीख जाते हैं क्योंकि उनके पास अपने हाथ होते हैं, और उन हाथों से मिलने वाले तमाम अनुभव होते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-024-00288-1/d41586-024-00288-1_26685816.jpg?as=webp
एक बार फिर ऐप्पल कंपनी के सीईओ टिम कुक ने हरे-भरे ऐप्पल पार्क में कंपनी के नवीनतम, सबसे तेज़ और सबसे सक्षम आईफोन (इस वर्ष आईफोन 15 और आईफोन 15-प्रो) को गर्व से प्रस्तुत किया। पिछले वर्ष सितंबर के इस ऐप्पल इवेंट के बाद दुनियाभर में हलचल मच गई थी और पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष प्री-ऑर्डर में 12% की वृद्धि देखी गई; अधिकांश प्री-ऑर्डर अमेरिका और भारत से रहे।
वास्तव में ऐप्पल कई उदाहरणों में से एक है कि कैसे आम लोग नासमझ उपभोक्तावाद के झांसे में आ जाते हैं और तकनीकी कंपनियां नए-नए आकर्षक उत्पादों के प्रति हमारी अतार्किक लालसा का फायदा उठाती हैं। निर्माता हर वर्ष स्मार्टफोन, लैपटॉप, कैमरे, इलेक्ट्रिक वाहन, टैबलेट जैसे अपने उत्पादों को रिफ्रेश करते हैं। अलबत्ता सच तो यह है कि किसी को भी हर साल एक नए स्मार्टफोन की ज़रूरत नहीं होती, नई इलेक्ट्रिक कार की तो बात ही छोड़िए।
एक दिलचस्प बात तो यह है कि ये इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, कार्बन तटस्थ और पर्यावरण-अनुकूल के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, केवल सतही तौर पर ही इस दिशा में काम करते हैं। कुल मिलाकर, सच्चाई उतनी हरी-भरी नहीं है जितनी ऐप्पल पार्क के बगीचों में नज़र आती है जिस पर टिम कुक चहलकदमी करते हैं।
पर्यावरणअनुकूलताकासच
आज हमारे अधिकांश उपकरण जैसे स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप, कैमरा, हेडफोन, स्मार्टवॉच या फिर इलेक्ट्रिक वाहन, सभी में धातुओं, मुख्य रूप से तांबा, कोबाल्ट, कैडमियम, पारा, सीसा इत्यादि का उपयोग होता है। ये अत्यंत विषैले पदार्थ हैं जो खनन करने वालों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी हानिकारक हैं। इसका एक प्रमुख उदाहरण कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में देखा जा सकता है। हाल ही में डीआरसी में मानव तस्करी का मुद्दा चर्चा में रहा है जहां बच्चों से कोबाल्ट खदानों में जबरन काम करवाया जा रहा है। कोबाल्ट एक अत्यधिक ज़हरीला पदार्थ है जो बच्चों में कार्डियोमायोपैथी (इसमें हृदय का आकार बड़ा और लुंज-पुंज हो जाता है और अपनी संरचना को बनाए रखने और रक्त पंप करने में असमर्थ हो जाता है) के अलावा खून गाढ़ा करता है तथा बहरापन और अंधेपन जैसी अन्य समस्याएं पैदा करता है। कई बार मौत भी हो सकती है। कमज़ोर सुरक्षा नियमों के कारण ये बच्चे सुरंगों में खनन करते हुए कोबाल्ट विषाक्तता का शिकार हो जाते हैं। गैस मास्क या दस्ताने जैसे सुरक्षा उपकरणों के अभाव में कोबाल्ट त्वचा या श्वसन तंत्र के माध्यम से रक्तप्रवाह में आसानी से प्रवेश कर जाता है। इन सुरंगों के धंसने का खतरा भी होता है।
कोबाल्ट और कॉपर का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साथ-साथ अर्धचालकों के सर्किट निर्माण में किया जाता है, जिन्हें मोबाइल फोन और टैबलेट में सिस्टम ऑन-ए-चिप (एसओसी) और कंप्यूटर में प्रोसेसर कहा जाता है। सीसा, पारा और कैडमियम बैटरी में उपयोग की जाने वाली धातुएं हैं। कैडमियम का उपयोग विशेष रूप से रोज़मर्रा के इलेक्ट्रॉनिक्स में लगने वाली लीथियम-आयन बैटरियों को स्थिरता प्रदान करने के लिए किया जाता है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, खनन उद्योग ने डीआरसी की सेना के साथ मिलकर संसाधन-समृद्ध भूमि का उपयोग करने के उद्देश्य से पूरे के पूरे गांवों को ज़मींदोज़ करके हज़ारों नागरिकों को विस्थापित कर दिया है।
एक अन्य रिपोर्ट में फ्रांस की दो सरकारी एजेंसियों ने यह गणना की है कि एक फोन के निर्माण के लिए कितने कच्चे माल की आवश्यकता होती है। इस रिपोर्ट के अनुसार सेकंड हैंड फोन खरीदने या नया फोन खरीदने को टालकर हम कोबाल्ट और तांबे के खनन की आवश्यकता को 81.64 किलोग्राम तक कम कर सकते हैं। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अगर अमेरिका के सभी लोग एक और साल के लिए अपने पुराने स्मार्टफोन का उपयोग करते रहें, तो हम लगभग 18.14 लाख किलोग्राम कच्चे माल के खनन की आवश्यकता से बच जाएंगे। इसे भारतीय संदर्भ में देखा जाए, जिसकी जनसंख्या अमेरिका की तुलना में 4.2 गुना है, तो हम 76.2 लाख किलोग्राम कच्चे माल के खनन की आवश्यकता से बच सकते हैं।
संख्याएं चौंका देने वाली लगती हैं लेकिन दुर्भाग्य से यही सच है। और तो और, ये संख्याएं बढ़ती रहेंगी क्योंकि दुनियाभर की सरकारें इलेक्ट्रॉनिक वाहनों और अन्य तथाकथित ‘पर्यावरण-अनुकूल’ जीवन समाधानों को प्रोत्साहित कर रही हैं। ये उद्योग विषाक्त पदार्थों का खनन करने वाले बच्चों के कंधों पर खड़े हैं, उनकी क्षमताओं का शोषण कर रहे हैं और उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। हाल के वर्षों में तांबे के खनन में 43% और कोबाल्ट के खनन में 30% की वृद्धि हुई है।
यह सच है कि इलेक्ट्रिक वाहन के उपयोग से प्रत्यक्ष उत्सर्जन कम होता है, लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि पर्यावरण की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ आम जनता पर है। व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो एक व्यक्ति इतना कम उत्सर्जन करता है कि भारी उद्योग में किसी एक कंपनी के वार्षिक उत्सर्जन की बराबरी करने के लिए उसे कई जीवन लगेंगे। आइए अब हमारी पसंदीदा टेक कंपनियों की कुछ गुप्त रणनीतियों पर एक नज़र डालते हैं जो हमें उन नई और चमचमाती चीज़ों की ओर आकर्षित करती हैं जिनकी वास्तव में हमें आवश्यकता ही नहीं है।
टेककंपनियोंकीतिकड़में
आम तौर पर टेक कंपनियां ऐसे उपकरण बनाती हैं जो बहुत लम्बे समय तक कार्य कर सकते हैं। स्मार्टफोन, टैबलेट या कंप्यूटर के डिस्प्ले तथा एंटीना और अन्य सर्किटरी दशकों तक काफी अच्छा प्रदर्शन करने में सक्षम होते हैं। हर हार्डवेयर सॉफ्टवेयर पर चलता है जो अंततः उपयोगकर्ता के अनुभव को निर्धारित करता है। इसका मतलब यह है कि सॉफ्टवेयर को ऑनलाइन अपडेट करके उपयोगकर्ता द्वारा संचालन के तरीके को बदला जा सकता है। हम यह भी जानते हैं कि टेक कंपनियों का मुख्य उद्देश्य लंबे समय तक चलने वाले उपकरण बनाना नहीं है, बल्कि उपकरण बेचना है और यदि उपभोक्ता नए-नए फोन न खरीदें तो कारोबर में पैसों का प्रवाह नहीं हो सकता है। इसका मतलब है कि फोन बेचते रहना उनकी ज़रूरत है और टिकाऊ उपकरण बनाना टेक कंपनियों के इस प्राथमिक उद्देश्य के विरुद्ध है।
नियोजित रूप से चीज़ों को अनुपयोगी बना देना भी टेक जगत की एक प्रसिद्ध तिकड़म है। हर साल सैमसंग, श्याओमी और ऐप्पल जैसे प्रमुख टेक निर्माता ग्राहकों को अपने उत्पादों के प्रति लुभाने के लिए नए-नए लैपटॉप, स्मार्टफोन और घड़ियां जारी करते हैं, ताकि ग्राहक जीवन भर ऐसे नए-नए उपकरण खरीदते रहें जिनकी उनको आवश्यकता ही नहीं है। अभी हाल तक प्रमुख एंड्रॉइड फोन और टैबलेट निर्माता अपने उपकरणों के सॉफ्टवेयर और सुरक्षा संस्करणों को 2 साल के लिए अपडेट करते थे। यह एक ऐसा वादा था जो शायद ही पूरा होगा। ऐप्पल कंपनी 5-6 साल के वादे के साथ अपडेट के मामले में सबसे आगे थी, जो उन लोगों के लिए अच्छी खबर थी जो अपने फोन को लंबे समय तक अपने पास रखना चाहते थे। लेकिन सच तो यह है कि प्रत्येक अपडेट में पिछले की तुलना में अधिक कम्प्यूटेशनल संसाधनों की आवश्यकता होती है। जिसके परिणामस्वरूप फोन धीमा हो जाता है और उपभोक्ताओं को 6 साल तक अपडेट चक्र से पहले ही नया फोन खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
ऐप्पल जैसी कंपनियां फोन के विभिन्न पार्ट्स को क्रम संख्या देने और उन्हें लॉजिक बोर्ड में जोड़ने के लिए भी बदनाम हैं ताकि दूसरी कंपनी के सस्ते पार्ट्स उनके हार्डवेयर के साथ काम न करें। यह बैटरी या फिंगरप्रिंट या भुगतान के दौरान चेहरे की पहचान करने वाले सेंसर जैसे पार्ट्स के लिए तो समझ में आता है जो हिफाज़त या सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक हैं। लेकिन एक चुंबक को क्रम संख्या देना एक मरम्मत-विरोधी रणनीति है। यह लैपटॉप को बस इतना बताता है कि उसका ढक्कन कब नीचे है और उसकी स्क्रीन बंद होनी चाहिए। वैसे कैमरा, लैपटॉप और स्मार्टफोन बनाने वाली प्रमुख कंपनियां कार्बन-तटस्थ होने का दावा तो करती हैं लेकिन इन कपटी रणनीतियों से ई-कचरे में वृद्धि होती है।
यह मामला टेस्ला जैसे विद्युत वाहन निर्माताओं और जॉन डीरे जैसे इलेक्ट्रिक कृषि उपकरण निर्माताओं के साथ भी है। फरवरी 2023 में, अमेरिकी न्याय विभाग ने इलिनॉय संघीय न्यायालय से अपने उत्पादों की मरम्मत पर एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश के लिए जॉन डीरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा-विरोधी (एंटी-ट्रस्ट) मुकदमे को खारिज न करने का निर्देश दिया था। 2020 में जॉन डीरे पर पहली बार अपने ट्रैक्टरों की मरम्मत के लिए बाज़ार पर एकाधिकार स्थापित करने और उसे नियंत्रित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था। कंपनी ने उत्पादों को इस प्रकार बनाया था कि उनकी मरम्मत के लिए एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता अनिवार्य रहे जो केवल कंपनी के पास था। टेस्ला ने कारों में भी इन-बिल्ट सॉफ्टवेयर का उपयोग किया था जिससे यह पता लग जाता है कि थर्ड पार्टी या आफ्टरमार्केट रिप्लेसमेंट पार्ट्स का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा करने वाले ग्राहकों को अमेरिका भर में फैले टेस्ला के फास्ट चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से ब्लैकलिस्ट करके दंडित किया जाता है जिसकी काफी आलोचना भी हुई है।
इस मामले में यह समझना आवश्यक है कि निर्माता कार्बन-तटस्थ और पर्यावरण-अनुकूल होने के बारे में बड़े-बड़े दावे तो करते हैं लेकिन सच्चाई कहीं अधिक कपटपूर्ण और भयावह है। टेक कंपनियों की रुचि मुनाफा कमाने और अपने निवेशकों को खुश रखने के लिए हर साल नए उत्पाद लॉन्च करके निरंतर पैसा कमाने की है। उन्हें पर्यावरण-अनुकूल होने की चिंता नहीं है, बल्कि उनके लिए यह सरकार को खुश रखने का एक दिखावा मात्र है जबकि इन उपकरणों के लिए आवश्यक कच्चे माल से समृद्ध देशों में बच्चों का सुनियोजित शोषण एक अलग कहानी बताते हैं। इन सामग्रियों की विषाक्त प्रकृति के कारण बच्चों का जीवन छोटा हो जाता है। कंपनियां अपना खरबों डॉलर का साम्राज्य बाल मज़दूरों की कब्रों पर बना रही हैं।
निष्कर्ष
तो इन कंपनियों के साथ संवाद करते समय उपभोक्ता के रूप में हम किन बातों का ध्यान रखें? हमें यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि विज्ञापन का हमारे अवचेतन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और ये हमें ऐसी चीज़ें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है। ऐसा विभिन्न कारणों से हो सकता है – कभी-कभी हम इन वस्तुओं को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं, हो सकता है कोई व्यक्ति नए आईफोन को अपने दोस्तों के बीच प्रतिष्ठा में वृद्धि के रूप में देखता हो। कोई हर साल नया उत्पाद इसलिए भी खरीद सकता है क्योंकि मार्केटिंग हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमें हर साल नए उत्पादों में होने वाले मामूली सुधारों की आवश्यकता है। यह सच्चाई से कोसों दूर है। अगर हम केवल कॉल करते हैं, सोशल मीडिया ब्राउज़ करते हैं और ईमेल और टेक्स्ट भेजते और प्राप्त करते हैं तो हमें 12% अधिक फुर्तीले फोन की आवश्यकता कदापि नहीं है। यदि सड़कों पर 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी चला ही नहीं सकते, तो ऐसी कार की क्या ज़रूरत है जो पिछले साल के मॉडल के 4 सेकंड की तुलना में 3.5 सेकंड में 0-100 की रफ्तार तक पहुंच जाए। यहां मुद्दा यह है कि हम अक्सर, अतार्किक कारणों से ऐसी चीज़ें खरीदते हैं जिनकी हमें आवश्यकता नहीं होती और ऐसा करते हुए इन उत्पादों की मांग पैदा करके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
उत्पाद खरीदते समय हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इन उत्पादों के पार्ट्स को बदलना या मरम्मत करना कितना कठिन या महंगा होने वाला है। मरम्मत करने में कठिन उत्पाद उपभोक्ता को एक नया उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर करता है जिससे अर्थव्यवस्था में इन उत्पादों की मांग पैदा होती है। नतीजतन अंततः पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है तथा मानव तस्करी और बाल मज़दूरी के रूप में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।
ऐसे मामलों में जब भी बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा-विरोधी (एंटी-ट्रस्ट) प्रथाओं की बात आती है तो जागरूकता की सख्त ज़रूरत होती है। मानव तस्करी और बाल श्रम जैसी संदिग्ध नैतिक प्रथाओं तथा प्रतिस्पर्धा-विरोधी नीतियों में लिप्त कंपनियों से उपभोक्ताओं को दूर रहना चाहिए और उनका बहिष्कार करना चाहिए। इन बहिष्कारों का कंपनियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि मुनाफे के लिए वे अंतत: उपभोक्ताओं पर ही तो निर्भर हैं। दिक्कत यह है कि उपभोक्ता संगठित नहीं होते हैं। दरअसल बाज़ार उपभोक्ताओं को उनके पसंद की विलासिता प्रदान करता है, ऐसे में उपभोक्ता की यह ज़िम्मेदारी भी है कि वह बाज़ार को सतत और नैतिक विनिर्माण विधियों की ओर ले जाने के लिए अपनी मांग की शक्ति का उपयोग करे। अब देखने वाली बात यह है कि हम अपनी बेतुकी मांग से पर्यावरण व मानवाधिकारों को होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक होते हैं या नहीं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.independent.co.uk/2023/02/08/14/Siddharth%20Kara-1.jpg
दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शुमार एलन मस्क एक लंबे अर्से से मनुष्य और मशीनों के बीच तालमेल बढ़ाने तथा मानवीय क्षमताओं को मौलिक रूप से बढ़ाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उपयोग की वकालत करते रहे हैं। हाल ही में मस्क ने घोषणा की है कि उनकी कंपनी न्यूरालिंक ने पहली बार अपने ब्रेन चिप या ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को एक इंसान के दिमाग में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया है और वह तेज़ी से ठीक हो रहा है।
मस्क ने इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा कि “प्रारंभिक नतीजे उत्साहवर्धक हैं और ये न्यूरॉन स्पाइक का पता लगाने की उम्मीद जगाते दिखते हैं।” दरअसल न्यूरॉन स्पाइक, वे विद्युत संकेत होते हैं, जिससे तंत्रिकाएं आपस में संपर्क स्थापित करती हैं। मस्क ने इसके बाद लिखा कि न्यूरालिंक के पहले उत्पाद को ‘टेलीपैथी’ के नाम से जाना जाएगा। कंपनी का दावा है कि ब्रेन चिप इंप्लांट का उद्देश्य दृष्टिहीनता, बधिरता, टिनिटस, मस्तिष्क आघात या जन्मजात तंत्रिका विकारों से ग्रस्त रोगियों के जीवन को आसान बनाना है।
मस्क के मुताबिक, ब्रेन चिप इम्प्लांट केवल सोचने मात्र से, आपके मोबाइल या कंप्यूटर और उनके माध्यम से लगभग किसी भी डिवाइस का नियंत्रण संभव बना देता है। इसके आरंभिक उपयोगकर्ता वे दिव्यांग होंगे, जिनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया है। कल्पना करें, अगर स्टीफन हॉाकिंग होते तो इसकी मदद से वे एक स्पीड टायपिस्ट या नीलामीकर्ता के मुकाबले ज़्यादा तेज़ी से संवाद कर पाते।
गौरतलब है कि अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने मई 2023 में न्यूरालिंक को मानव परीक्षण के लिए मंज़ूरी दी थी। इसके बाद सितंबर में कंपनी ने घोषणा की थी कि वह अपने शुरुआती परीक्षण के लिए उपयुक्त लोगों की तलाश कर रही है। इसलिए मनुष्य में चिप इंप्लांट की हालिया घोषणा ने तंत्रिका विज्ञानियों को आश्चर्यचकित नहीं किया, उनके लिए यह खबर काफी हद तक अपेक्षित ही थी।
यह कल्पना ही बड़ी रोमांचक लगती है कि हमारे दिमाग में एक चिप इंप्लांट कर दिया जाए तथा हम हाथ-पैर हिलाए बिना बस पड़े रहें और हमारे सोचने भर से ही मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी जैसे उपकरण काम करने लगें। इंसानी दिमाग में चिप इंप्लांट की खबर के साथ यह कल्पना अब हकीकत का रूप लेती नज़र आ रही है। अगर न्यूरालिंक का यह प्रयोग पूरी तरह सफल हुआ तो चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी।
2016 में मस्क ने कुछ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के साथ मिलकर न्यूरालिंक कंपनी की स्थापना की थी। इस कंपनी का उद्देश्य ऐसी ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीकों का अविष्कार करना है, जिससे इंसान अपने दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ सके। लंबे समय से वैज्ञानिकों की यह मान्यता रही है कि इंसानी दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ने से मस्तिष्क के जटिल रहस्यों को समझा जा सकता है और शारीरिक व मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। इसका सबसे अधिक लाभ उन लोगों को मिल सकता है, जो किसी वजह से अपने हाथ-पांव नहीं चला सकते और अपने मन में चल रही बातों को व्यक्त नहीं कर पाते। इससे मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी आदि को चलाने या नियंत्रित करने के लिए हाथ-पांव हिलाने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी और मूक-बधिर भी मशीनों के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकेंगे तथा बाहरी दुनिया से संवाद स्थापित कर सकेंगे।
इंसानी दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ने की बात साइंस-फिक्शन फिल्मों जैसी लगती है। उदाहरण के लिए, 2018 में आई हॉलीवुड फिल्म ‘अपग्रेड’ को ही लीजिए। इसका नायक ग्रे एक हमले के दौरान लकवाग्रस्त हो जाता है। एक अरबपति, उसके शरीर में स्टेम नामक एक ऐसी कंप्यूटर चिप इंप्लांट करवाता है जिससे वह वापस चलने-फिरने लगता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भले ही आज हमें शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के चलने-फिरने और दृष्टिहीनों के दिखाई देने जैसी बातें साइंस-फिक्शन फिल्मों जैसी लगें, लेकिन मौजूदा तकनीकी प्रगति के मद्देनजर निकट भविष्य में यह पूरी तरह संभव होगा।
दिसंबर 2022 में एक वेब शो के दौरान मस्क ने न्यूरालिंक की सफलताओं और उपलब्धियों को सार्वजनिक करते हुए कहा था कि कंपनी द्वारा निर्मित ब्रेन चिप को मानव परीक्षण के बाद वे स्वयं डेमो के तौर पर अपने दिमाग में इंप्लांट करवाएंगे। इस वेब शो में एक वीडियो भी प्रदर्शित किया गया था, जिसमें एक बंदर अपने हाथों का इस्तेमाल किए बिना अपने दिमाग की मदद से टाइपिंग करता दिखाई दे रहा था। इस वीडियो को रिकॉर्ड करने से छह हफ्ते पहले बंदर के दिमाग में एक ब्रेन चिप इंप्लांट किया गया था। यह चिप कंप्यूटर या स्मार्टफोन और दिमाग के बीच एक इंटरफेस का काम कर रहा था। इससे भविष्य में हम सोचने भर से ही मशीनों को संचालित कर सकेंगे।
मौजूदा समय में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस जैसी तकनीकों का मुख्य उद्देश्य चिकित्सा ही है। मसलन लकवाग्रस्त लोगों के लिए ऐसी सुविधा उपलब्ध करना जिससे वे सोचने भर से अपने ज़रूरी काम कर सकें। इसके समर्थक कहते हैं कि याददाश्त घटने, बहरापन, दृष्टिहीनता, अवसाद, पार्किंसन, मिर्गी और नींद न आने जैसी परेशानियां भी इस तकनीक से दूर की जा सकती हैं। न्यूरालिंक अभी जिस ब्रेन चिप का मानव परीक्षण कर रही है, उसे अगले 5-6 वर्षों में व्यावसायिक उपयोग में लाने का लक्ष्य है।
मस्क के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस बहुत ज़रूरी है और न्यूरालिंक इसको विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके शब्दों में, “लंबी अवधि में इस तकनीक का उपयोग एआई से हमारे अस्तित्व सम्बंधी खतरे को दूर करने में किया जाएगा।” संभवत: यहाँ मस्क हालीवुड फिल्म ‘दी मैट्रिक्स’ की ओर संकेत कर रहे थे, जिसमें एआई से लैस कंप्यूटर प्रोग्राम पूरी दुनिया पर कब्ज़ा कर लेता है और इंसान अपने दिमाग में ऐसा ही कोई यंत्र इंप्लांट करके दिमागी स्तर पर उस कंप्यूटर प्रोग्राम से लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं।
ऐसा हो सकता है कि आगे चलकर इंसान, ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस की सहायता से स्वयं को अपग्रेड कर सकें, लेकिन यह भी हो सकता है कि इस टेक्नॉलॉजी के चलते इंसान किसी बड़े खतरे में पड़ जाएं। क्या होगा अगर ब्लूटूथ टेक्नॉलॉजी से संचालित किसी के ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को हैक कर लिया जाए? ताकतवर लोग इसका गलत इस्तेमाल भी कर सकते हैं। बड़ा सवाल यह होगा कि इंसानी दिमाग का कंट्रोल कंप्यूटर पर होगा या फिर कंप्यूटर ही दिमाग को चलाएगा? अगर कंप्यूटर ही दिमाग को नियंत्रित करेगा तो 21वीं सदी में वैश्वीकरण और मशीनीकरण के विस्तार के साथ शताब्दियों से चली आ रही मनुष्य की बल और बुद्धि की श्रेष्ठता के खत्म हो जाने का खतरा मंडराने लगेगा। उपरोक्त फिल्म ‘अपग्रेड’ के अंत में भी यही होता है। ब्रेन चिप ग्रे को अपने वश में कर लेता है और उसे अपने मनमुताबिक कंट्रोल करता है।
डर यह भी है कि इससे किसी इंसान की याददाश्त का कोई खास हिस्सा मिटाकर या जोड़कर उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके अलावा सबसे बड़ा डर प्रायवेसी (निजता) का है, क्योंकि यह किसी के दिमाग की सभी जानकारियां, समस्त अनुभव, यहां तक कि सारी निजी बातें इकट्ठी करके एक चिप में डाल देने जैसा है। बहरहाल, कोई चिप दिमाग की मदद के नाम पर देह और दिमाग दोनों को नियंत्रित करे, इस बात को लेकर वैज्ञानिक और दर्शनशास्त्री दोनों ही चिंतित हैं। कहना न होगा कि अगर हम इसके दुरुपयोग की आशंकाओं और चुनौतियों को दूर या कम कर सके तो निश्चित रूप से भविष्य में न्यूरालिंक चिप दुनिया भर के लाखों लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.majalla.com/styles/1200xauto/public/2024-02/167682.jpeg?itok=8XQCJvdx
विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर ने साल 2023 के टॉप टेन व्यक्तियों की सूची जारी की है। इस सूची में वे लोग हैं जिन्होंने विदा हो चुके साल में अदभुत अनुसंधान किया है या अहम वैज्ञानिक मुद्दों की ओर ध्यान खींचा है। गौरतलब है कि टॉप टेन व्यक्तियों का चयन पुरस्कार देने के लिए नहीं किया गया है वरन इसका उद्देश्य बीते साल में विज्ञान से जुड़े उन चुनिंदा व्यक्तियों के विलक्षण योगदान को रेखांकित करना है, जिनका समाज के हितों से सरोकार रहा है या जिनका सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
इस साल नेचर ने पहली बार टॉप टेन लोगों के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का भी चयन किया है। तो मिलिए साल 2023 के टॉप टेन व्यक्तियों से।
कल्पना कलाहस्ती
टॉप टेन की सूची में भारतीय महिला वैज्ञानिक कल्पना कलाहस्ती प्रथम स्थान पर हैं। उन्होंने पिछले साल चंद्रयान-3 के चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सफलतापूर्वक अवतरण में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने चंद्रयान-3 में एसोसिएट प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में काम किया। कलाहस्ती के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, चंद्रयान-3 का कुल वज़न कम करना और दूसरी, उपलब्ध बजट में चंद्रयान-3 का निर्माण करना। चंद्रयान-2 की असफलता से सबक लेते हुए उन्होंने अपनी टीम के साथ पूरी लगन से चंद्रयान-3 का निर्माण किया। इसके बाद चंद्रयान-3 के कई परीक्षण एवं इसरो के एक दर्जन केंद्रों के साथ उसके परिणामों का समन्वय किया। यह काम ऐसा था मानो पांच-छह उपग्रहों का एक साथ निर्माण!
कलाहस्ती को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट एवं सिस्टम्स इंजीनियर का व्यापक तर्जुबा है। उन्होंने इसके पहले कई पृथ्वी-प्रेक्षण उपग्रहों के विकास में नेतृत्व की भूमिका निभाई है।
मरीना सिल्वा: अमेज़ॉन संरक्षक
ब्राज़ील की पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री मरीना सिल्वा ने अमेज़ॉन वनों के विनाश को रोकने में अहम और पुरज़ोर भूमिका निभाई है। उन्होंने 3 अगस्त को अपने संबोधन में बताया था कि वन विनाश सम्बंधी चेतावनियों में 43 फीसदी कमी आई है। ये चेतावनियां उपग्रह चित्रों के आधार पर चेतावनी जारी की जाती है।
कात्सुहिको हयाशी: दो पिता की संतान का जनन
कात्सुहिको हयाशी ओसाका युनिवर्सिटी में डेवलपमेंट बायोलॉजिस्ट हैं, जिन्हें पहली बार बिना मादा के दो नर चूहों से एक चुहिया पैदा करने में कामयाबी मिली है। आम तौर पर किसी भी जीव में प्रजनन के लिए नर और मादा दोनों की ज़रूरत होती है।
इस कामयाबी से भविष्य में विलुप्तप्राय प्रजातियों को बचाना संभव हो सकेगा। हालांकि कात्सुहिको हयाशी की इस अभिनव सफलता से यह सवाल भी उठा है कि क्या लैंगिक प्रजनन विज्ञान के नियमों को फिर से परिभाषित करना पड़ेगा।
अपने अध्ययन के लिए हयाशी ने नर चूहे की पूंछ से कोशिकाएं निकालीं, जिनमें ‘एक्स’ और ‘वाय’ सेक्स गुणसूत्र मौजूद थे। फिर इन कोशिकाओं को स्टेम कोशिकाओं में बदल दिया। इस प्रक्रिया में तीन फीसदी कोशिकाओं में स्वत: ही ‘वाय’ गुणसूत्र नष्ट हो गया। ‘वाय’ गुणसूत्र रहित कोशिकाओं को पृथक कर एक ऐसे रसायन से उपचारित किया, जो कोशिका विभाजन के दौरान त्रुटियां पैदा करता है। कुछ त्रुटियां ऐसी हुई थीं जिनके कारण ऐसी कोशिकाओं का निर्माण हुआ, जिनमें दो ‘एक्स’ गुणसूत्र थे यानी एक मायने में वे मादा कोशिकाएं बन चुकी थीं। अनुसंधान टीम ने इन कोशिकाओं को अंडों में परिवर्तित किया और अंडों को निषेचित करके भ्रूण को मादा चुहिया के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया। 630 प्रत्यारोपित भ्रूणों में से 7 ही विकसित होकर चूहे बने।
एनी क्रिचर: नाभिकीय संलयन
साल 2023 में नाभिकीय साइंस की अध्येता एनी क्रिचर ने नाभिकीय संलयन के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की। क्रिचर का अपने शोध दल के साथ पहली बार कैलिर्फोनिया स्थित लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी में हाइड्रोजन के भारी आइसोटोप्स के नाभिकीय संलयन का प्रयोग सफल रहा। इसमें जितनी ऊर्जा दी गई थी उससे अधिक ऊर्जा पैदा की गई। उनका यह प्रयोग साफ-सुथरी ऊर्जा उत्पादन की दिशा में गेमचेंजर की तरह देखा जा रहा है।
एलेनी मायरिविली: ऊष्मा अधिकारी
एलेनी मायरिविली राष्ट्र संघ की प्रथम ऊष्मा अधिकारी हैं, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना करने के लिए पुरज़ोर पहल करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्हें जुलाई 2021 में एथेंस सरकार द्वारा मुख्य ग्रीष्म लहर अधिकारी नियुक्त किया गया था। उनका विचार है कि ग्रीष्म लहर या लू को गंभीरता से लेने के साथ ही लोगों को संवेदनशील और जागरूक बनाने की ज़रूरत है। उन्होंने इस पद पर रहते हुए एक ऐसी कार्य योजना बनाई जिसमें स्वास्थ्य, बीमारी और मृत्यु दर के डैटा और मौसम सम्बंधी डैटा को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। उनका मानना है कि लू से बचाव के लिए छायादार सार्वजनिक स्थानों के निर्माण की ज़रूरत है। उन्होंने भीषण गर्मी की चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजिटल समाधान अपनाने का सुझाव भी दिया है।
मायरिविली ने अपने करियर की शुरुआत सांस्कृतिक मानव विज्ञानी के रूप में की थी। उन्होंने अपना पूरा ध्यान ग्रीष्म लहर के अध्ययन पर केंद्रित किया। साल 2007 में उनके जीवन में नया मोड़ आया। उन्होंने ग्रीष्म लहरों के बारे में सूचनाओं के अभाव से नाराज़ और असंतुष्ट होने के बाद राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। उन्हें दिसंबर 2023 में दुबई में आयोजित कॉप-28 में भाग लेने के लिए न्यौता केवल इसलिए दिया गया था, क्योंकि उन्होंने वैश्विक तापमान बढ़ोतरी में एयर कंडीशनिंग को दोषी मानते हुए इस उपकरण का बहिष्कार किया।
इल्या सटस्केवर: चैट-जीपीटी के प्रथम अन्वेषक
वैज्ञानिक और ओपन एआई कंपनी के सह-संस्थापक इल्या सटस्केवर ने चैट-जीपीटी सहित संवाद करने वाली कृत्रिम बुद्धि प्रणालियों के विकास में मुख्य भूमिका निभाई है। वर्ष 2022 में इल्या सटस्केवर द्वारा सृजित चैट-जीपीटी एक साल के भीतर ही लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गया था। इल्या सटस्केवर डीप लर्निंग और लार्ज लैंग्वेज मॉडल अनुसंधान में अग्रणी रहे हैं।
1986 में सोवियत संघ में पैदा हुए सटस्केवर ने इस्रायल में विश्वविद्यालय स्तर पर कोडिंग विषय पढ़ाया है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धि के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने इस प्रौद्योगिकी के खतरों और भविष्य को लेकर भी बड़ी चिंता जताई है। उन्होंने 2022 में यह घोषणा कर दी थी कि कृत्रिम बुद्धि में ‘मामूली चेतना’ आ चुकी है। सटस्केवर ने अल्फागो के विकास में भी मदद की है। उन्हें 2018 में जीपीटी के प्रथम अवतार के बाद जनरेटिव प्री-ट्रेन्ड ट्रांसफॉर्मर (जीपीटी) के विकास और संवारने में अत्यधिक योगदान का श्रेय जाता है।
जेम्स हेमलिन: अतिचालकता शोध में फर्ज़ीवाड़े का भंडाफोड़
भौतिक शास्त्री जेम्स हेमलिन ने साल 2023 में अतिचालकता सम्बंधी एक शोध पत्र में धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। जेम्स हेमलिन भौतिकी के प्राध्यापक हैं तथा उच्च दाब प्रयोग करते हैं और अतिचालकता के विशेषज्ञ हैं।
दरअसल, मार्च 2023 में नेचर में रोचेस्टर युनिवर्सिटी के शोधकर्ता रंगा डायस की रिपोर्ट छपी थी, जिसमें उन्होंने कमरे के तापमान पर अतिचालकता हासिल करने का दावा किया था। हेमलिन ने नेचर पत्रिका के संपादकीय विभाग से संपर्क किया और इस शोध पत्र में फर्ज़ीवाड़े की आशंका जताई। नवंबर में इस शोध पत्र को हटा दिया गया था।
स्वेतलाना मोजसोव: गुमनाम औषधि अन्वेषक
नेचर ने मधुमेह और वज़न घटाने वाली औषधियों की अनुसंधानकर्ता स्वेतलाना मोजसोव को टॉप टेन में शामिल किया है, जबकि साइंस ने वर्ष 2023 की उपलब्धियों में प्रथम स्थान पर रखा है। उन्होंने ग्लूकॉन-लाइक पेप्टाइड-1 (जीएलपी-1) हारमोन की खोज में योगदान दिया है। यह हारमोन भूख का दमन करता है। यही हारमोन ओज़ेम्पिक और वीगोवी जैसी वज़न घटाने वाली औषधियों का प्रमुख घटक है। दरअसल, स्वेतलाना मोजसोव उन गुमनाम व्यक्तियों में शामिल हैं, जिन्हें नई औषधि खोजने के बावजूद लंबे समय तक यथोचित मान्यता और शोहरत नहीं मिली।
स्वेतलाना मोजसोव ने दशकों तक रॉकफेलर युनिवर्सिटी में संश्लेषित पेप्टाइड्स और प्रोटीनों पर काम किया है। उन्होंने बोस्टन स्थित मेसाचूसेट्स जनरल हॉस्पिटल में संश्लेषित प्रोटीनों पर अनुसंधानकर्ताओं का मार्गदर्शन करने के साथ उन्हें रिसर्च टूल्स भी उपलब्ध करवाए थे। मोजसोव ने चूहों पर प्रयोग किए थे और जीएलपी-1 की जैविक सक्रियता को उजागर किया था।
मोजसोव ने लंबे अंतराल के बाद साल 2023 में अपनी उपेक्षा को देखते हुए मुखर होने का मार्ग चुना और जीएलपी-1 हारमोन पर अपना शोध पत्र सेल और नेचर पत्रिका को भेजा। ये शोध पत्र इन दोनों पत्रिकाओं के अलावा साइंस में भी प्रकाशित हुए।
हलीदू टिन्टो: मलेरिया योद्धा
मलेरिया योद्धा के रूप में पहचान स्थापित कर चुके हलीदू टिन्टो ने लंबे शोध प्रयासों के बाद मलेरिया से लड़ने के लिए टीका बनाने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब मलेरिया रोग से लड़ने के लिए दो टीके उपलब्ध हैं। एक ‘आरटीएस,एस’ है, जिसे ग्लैैक्सोस्मिथक्लाइन ने विकसित किया है। दूसरा ‘आर-21’ बुर्किना फासो स्थित क्लीनिकल रिसर्च युनिट ऑफ नैनोरो ने विकसित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मलेरिया से लड़ने में दोनों ही टीके कारगर साबित हुए हैं। हलीदू टिन्टो ने टीके बनाकर अफ्रीका महाद्वीप में लाखों लोगों का जीवन बचाने में असाधारण भूमिका निभाई है। टिन्टो के अनुसार अफ्रीका के विकास में अनुसंधान की भूमिका को समझने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। इन दिनों टिन्टो आर-21 टीके पर और अधिक अनुसंधान कार्य में जुटे हुए हैं। उम्मीद की जा रही है कि यह टीका 2024 के मध्य तक पूरे अफ्रीका महाद्वीप में उपलब्ध हो जाएगा।
थॉमस पॉवेल्स: कैंसर अध्येता
चिकित्सा वैज्ञानिक थॉमस पॉवेल्स ने घातक ब्लैडर कैंसर की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वस्तुत: उन्होंने आने वाले दिनों में इस रोग पर विजय पाने के लिए इम्युनोथैराप्युटिक ड्रग्ज़ का मार्ग प्रशस्त किया है।
प्रोफेसर थॉमस पॉवेल्स आरंभ में हृदय रोग चिकित्सक थे। उन्होंने बाद में ब्लैडर कैंसर की चपेट में आ चुके लोगों के क्लीनिकल परीक्षणों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने दो नई दवाओं के मिश्रण से एक नई दवा तैयार की और इसका क्लीनिकल परीक्षण किया। इस दवा के इस्तेमाल से पीड़ित व्यक्तियों का जीवनकाल सोलह माह से लेकर ढाई वर्ष तक बढ़ गया। इस परीक्षण को लगभग चार दशकों के बाद घातक ब्लैडर कैंसर के इलाज में बड़ी सफलता के रूप देखा गया है।
थॉमस पॉवेल्स के अनुसंधान से प्रेरणा लेकर युवा अनुसंधानकर्ताओं ने आगे कदम बढ़ाए और एंटीबॉडी ड्रग कांजुगेट्स (एडीसी) उपचार विकसित कर लिया। दरअसल एडीसी में कैंसर-रोधी औषधि होती है, जिसे एंटीबॉडी से जोड़ा गया होता है। एंटीबॉडी औषधि को सही लक्ष्य पर पहुंचने में मदद करती है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने साल 2023 के आरंभ में ही इस ड्रग को मंज़ूरी दे दी थी।
टॉप टेन में चैट-जीपीटी क्यों?
नेचर ने पहली बार टॉप टेन की लिस्ट में चैट-जीपीटी को भी शामिल किया है। बीते वर्ष 2023 में चैटजीपीटी का विज्ञान और समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। यह वैज्ञानिक शोध पत्र लिख सकता है, व्याख्यानों के प्रस्तुतीकरण की रूपरेखा बना सकता है, अनुदान हेतु प्रस्ताव तैयार कर सकता है। चैटजीपीटी एक विशाल भाषा मॉडल (लार्ज लैंग्वेज मॉडल) है, जिसे जटिल जिज्ञासाओं का उत्तर देने में सक्षम बनाया गया है। इसके ज़रिए गणित के सूत्रों को समझा जा सकता है, राजनीतिक टीका-टिप्पणी की जा सकती है। यह मनोरंजन कर सकता है। चिकित्सा सम्बंधी अनुमान लगा सकता है। इसके उपयोगों की सूची दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit :
प्रकृति से प्रेरणा लेते हुए वैज्ञानिकों द्वारा पानी पर तैरने वाले कीटों की अद्भुत क्षमताओं का उपयोग अब उन्नत जलीय रोबोट विकसित करने में किया जा रहा है। रिपल बग और व्हर्लिगिग बीटल नामक दो प्रजातियों की पानी पर अनोखी चपलता और गति ने एक जलीय रोबोट की एक नई तकनीक की प्रेरणा दी है।
इस खोज के लिए युनिवर्सिटी ऑफ मैन के जीवविज्ञानी विक्टर ओर्टेगा जिमेनेज़ ने रैगोवेलिया वॉटर स्ट्राइडर्स, जिसे रिपल बग भी कहा जाता है, की चाल-ढाल को समझने का प्रयास किया। जब ये छोटे कीट पानी की सतह पर तेज़ी से गुज़रते हैं तो पक्षियों जैसे प्रतीत होते हैं और इतनी तेज़ रफ्तार से मुड़ते हैं मानो हवा में उड़ रहे हों। जांच से पता चला कि कीट की बीच वाली टांगों के सिरों पर पंखे होते हैं। मुड़ते समय ये कीट अपने शरीर के एक तरफ के पंखे फैलाते हैं, जिससे शरीर के एक ओर रुकावट पैदा होती है जबकि दूसरी ओर की टांगें सामान्य ढंग से फिसलती रहती हैं। इस स्थिति में ये 50 मिलीसेकंड से भी कम समय में तेज़ी से 180° मुड़ जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वे न्यूनतम ऊर्जा खर्च करते हुए लंबे समय तक ज़िगज़ैग मार्ग अपनाकर आगे बढ़ते हैं।
यह काफी आश्चर्य की बात है कि जब शोधकर्ताओं ने मृत स्ट्राइडर्स को पानी में डाला, तब भी उनके पंखे खुले क्योंकि उनके पैर सतह से नीचे डूबे थे। इससे यह पता चलता है कि पंखे खोलने के लिए मांसपेशियों की आवश्यकता नहीं होती है। इस तरह मुड़ने के लिए रिपल बग को केवल अपने शरीर को थोड़ा एक ओर झुकाने की ज़रूरत होती है, जिससे पंखे डूबकर खुल जाते हैं और एक तरफ रुकावट बढ़ जाती है।
रिपल बग
एजू विश्वविद्यालय के मेकेनिकल इंजीनियर किम डोंगजिन ने जिमेनेज़ के साथ मिलकर एक रैगो-बॉट का निर्माण किया जो रिपल बग की नकल करता है। हालांकि, इस रोबोट ने शांत पानी में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन व्यापक रोबोटिक अनुप्रयोगों के लिए जटिल पंखे तैयार करना चुनौतीपूर्ण है।
इसी प्रकार के एक अन्य अध्ययन में, कॉर्नेल युनिवर्सिटी के इंजीनियर क्रिस रोह ने एक छोटे कीट व्हर्लिगिग बीटल की जलीय कलाबाज़ियों का पता लगाया। इन प्राणियों ने प्रति सेकंड अपने शरीर से 100 गुना दूरी तेज़ गति से तय की। पूर्व धारणाओं के विपरीत, शोधदल ने पाया कि कीट ने यह गति पानी के माध्यम से अपने पैरों को पतवार की तरह सीधे पीछे धकेलकर नहीं बल्कि अपने पैरों को नीचे की ओर तथा शरीर के आर-पार ले जाकर हासिल की है। इस अनूठी गति ने हेलीकॉप्टर ब्लेड के समान एक लिफ्ट बल उत्पन्न किया, जिसने बीटल की गति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पानी में भंवर बनाने में व्हर्लिगिग बीटल और रिपल बग के बीच समानताओं को देखते हुए जिमेनेज़ ने बीटल की गति में लिफ्ट की भूमिका को निर्धारित करने के लिए द्रव गतिकी में अधिक गहन जांच की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
ये अध्ययन जलीय रोबोटिक्स के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। और जीव विज्ञानियों, भौतिकविदों और इंजीनियरों के बीच सहयोग बायोमिमिक्री को सशक्त करेगा, जिसमें प्रकृति के जटिल तंत्र नवीन टेक्नॉलॉजीगत समाधानों की प्रेरणा बनते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit :
पिछले कुछ समय में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (GenAI) में काफी विस्तार हुआ है। GenAI प्रशिक्षण के तौर पर दिए गए डैटा से पैटर्न, बनावट, विशेषताएं और बारीकियां सीखकर एकदम नया वांछित डैटा (संदेश, छवियां, वीडियो, ऑडियो, 3डी मॉडल वगैरह) गढ़ सकता है। GenAI के इस कौशल से कई आसानियां हुईं हैं; जैसे इसने मूवी डबिंग बेहतर की है, जीन अनुक्रमण को आसान बनाया है। लेकिन इसने उतनी ही समस्याएं भी पैदा की हैं।
GenAI की मदद से (किसी भी व्यक्ति या जंतु की) कृत्रिम आवाज़ बनाने की गुणवत्ता इतनी बेहतर हो गई है कि अब यह अंतर कर पाना मुश्किल है कि वे किसी वास्तविक व्यक्ति या जानवर की आवाज़ है या डीपफेक से सृजित नकली आवाज़। ऐसे में किसी व्यक्ति की मर्ज़ी और जानकारी के बिना उसकी आवाज़ को किसी जालसाज़ी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे किसी अभिनेता की आवाज़ में कोई अमुक प्रतियोगिता जीतने का झांसा देने में, पैसे ऐंठने, धमकाने वगैरह में। और धोखाधड़ी या आवाज़ से छेड़खानी के लिए आपके किसी लंबे-चौड़े ऑडियो की ज़रूरत नहीं होती, बस चंद सेकंड लंबी रिकॉर्डिंग या वॉइस नोट ही आपकी आवाज़ में संदेश गढ़ने के लिए काफी है। तस्वीरों और वीडियो के मामले में तो इस तरह से नकली तस्वीर और वीडियो गढ़ने और धमकाने व वायरल करने के कितने सारे मामले सामने आ चुके हैं।
ये तकनीकें उपयोगी हों लेकिन साथ ही सुरक्षित भी रहें, इसी उद्देश्य से वाशिंगटन विश्वविद्यालय के कंप्यूटर वैज्ञानिक निंग झांग ने एक एंटीफेक नामक टूल बनाया है। एंटीफेक सायबर अपराधियों या अनाधिकृत लोगों को अपेक्षित ऑडियो सृजित करने ही नहीं देता और अपराध होने के पहले ही रोक लेता है।
आवाज़ों की चोरी रोकने और जालसाजी से बचाने के लिए एंटीफेक ध्वनि डैटा और रिकॉर्डिंग से उन विशेषताओं को हासिल करना मुश्किल बना देता है जो कृत्रिम ध्वनि बनाने के लिए ज़रूरी हैं। ऐसा करने के लिए यह रिकॉर्डेड ऑडियो या डैटा को बस इतना विकृत कर देता है या उसमें खलल डाल देता है कि हमें सुनने में तो वह आवाज़ ठीक-ठाक ही लगती है, लेकिन नकली आवाज़ गढ़ने वाले मॉडल को इसके ज़रिए सीखना-समझना असंभव हो जाता है।
छवियों के मामले में इसी तकनीक पर आधारित ग्लेज़ जैसे सुरक्षा टूल पहले ही मौजूद हैं। लेकिन ध्वनि सुरक्षा के मामले में एंटीफेक पहला प्रयास है। एंटीफेक अभी आवाज़ों की छोटी रिकॉर्डिंग की मदद से बनाई जाने वाली आवाज़ या ध्वनि क्लोनिंग से सुरक्षा दे सकता है, यह छोटी रिकॉर्डिंग ही सायबर आपराधियों द्वारा जालसाज़ी का सबसे आम ज़रिया है।
एंटीफेक द्वारा ऑडियो सुरक्षा का दावा किए जाने का आधार वह परीक्षण है जो शोधकर्ताओं ने पांच आधुनिक ध्वनि सिंथेसाइज़र के विरुद्ध किया है। एंटीफेक ने ऑडियो रिकॉर्डिंग को 95 प्रतिशत सुरक्षा दी है, यहां तक उन अज्ञात ध्वनि सिंथेसाइज़र के खिलाफ भी जिनके लिए इसे विशेष रूप से डिज़ाइन नहीं किया गया था। इसके अलावा, 24 प्रतिभागियों के साथ भी इस एंटीफेक की जांच की गई है। अधिक व्यापक अध्ययन इस एंटीफेक की कुशलता को और अधिक स्पष्ट करेंगे।
वैसे एक बात यह भी है कि इस डिजिटल युग में डैटा की पूर्ण सुरक्षा हासिल करना नामुमकिन है। क्योंकि जैसे-जैसे सुरक्षा तकनीकें परिष्कृत होती जाएंगी, सायबर अपराधी भी और अधिक शातिर होते जाएंगे। और दोनों में ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की स्थिति बनी रहेगी। लेकिन फिर भी सुरक्षा दीवार को भेदना मुश्किल से मुश्किलतर करके अपराधिक मामलों की संख्या को शून्य न सही लेकिन शून्य के करीब लाया जा सकता है।
फिलहाल, इस तकनीक के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। एक बड़ी चुनौती तो यह है कि फिलहाल उपयोगकर्ताओं को स्वयं इसका उपयोग करना होगा, जिसे चलाने के लिए थोड़े-बहुत प्रोग्रामिंग कौशल की आवश्यकता होगी। दूसरी चुनौती यह है कि सुरक्षा के लिए जो तरीके और उपकरण निरंतर विकसित किए जा रहे हैं लोगों को उन्हें अनिवार्य तौर पर अपनाना और लगातार अपग्रेड करते जाना होगा। वरना लगातार अधिक शातिर और अपग्रेड होते जा रहे सायबर अपराधियों से डैटा असुरक्षित ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/AA71A9F7-F6EB-4F6B-BDCBFE460FA0842C_source.jpg?w=1200
इन दिनों डीपफेक टेक्नॉलॉजी सुखिर्यों में है। दरअसल यह कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई) के इस्तेमाल की एक और देन है। आजकल इंटरनेट पर डीप फेक तकनीक से बने वीडियो में वृद्धि हुई है क्योंकि अब इसने सेलेब्रिटीज़ को चपेट में ले लिया है। कुछ का कहना है कि जिस तरह से उन्हें डीपफेक तकनीक से तैयार वीडियो-ऑडियो में पेश किया गया है, उन्होंने वैसा एक बार भी नहीं किया है।
डीपफेक तकनीक डिजिटल हेरफेर का कमाल है, जिसका इस्तेमाल व्यक्तियों के बारे में भ्रामक जानकारियां फैलाने के लिए किया गया है। जानकारों का विचार है कि भविष्य में होने वाले चुनावों में डीपफेक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से मनगढ़ंत वीडियो की बाढ़ आ सकती है; विपक्ष के खिलाफ भ्रामक कंटेट तैयार कर प्रसारित किया जा सकता है।
डीपफेक प्रौद्योगिकी क्या है? मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क कुछ मुख्य तकनीकें हैं जिनका उपयोग डीपफेक बनाने में किया जाता है। इनकी सहायता से किसी व्यक्ति का किसी भी तरह का वीडियो अथवा फोटो बनाया जा सकता है। दरअसल इसका इस्तेमाल विश्वसनीय दिखने वाली भ्रामक वीडियो, तस्वीरें और श्रव्य सामग्री बनाने में किया जाता है।
एआई आधारित डीपफेक तकनीक संपादन का एक ऐसा साॅफ्टवेयर है, जिसमें मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म का उपयोग किया जाता है। अर्थात डीपफेक एक सिंथेटिक माध्यम है, जिसका इस्तेमाल वीडियो, ऑडियो और तस्वीरें बनाने में किया जाता हैै। हाल के वर्षों में एआई के उपयोग का विस्तार हुआ है और डीपफेक तकनीक के दुरूपयोग का चेहरा भी सामने आया है।
डीपफेक तकनीक में दो प्रकार के एल्गोरिद्म – जनरेटर और डिस्क्रिमिनेटर – भूमिका निभाते हैं। इसे बनाने के लिए सोर्स, वीडियो डीपफेक, ऑडियो डीपफेक और लिप सिंक आदि का उपयोग किया जाता है। वर्तमान दौर में ऐसी तकनीकें उपलब्ध हैं, जिनसे सटीक डीपफेक बनाना आसान हो गया है। इनमें जनरेटिव एडवरसेरियल नेटवर्क (जीएएन), कन्वोल्यूशन न्यूरल नेटवर्क (सीएनएन) और ऑटो एन्कोडर्स शामिल हैं। ऑडियो डीपफेक बनाने के लिए नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी) का उपयोग किया जाता है।
दरअसल डीपफेक तकनीक का अतीत अधिक पुराना नहीं है। तस्वीरों में फेरबदल करना उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ था। आगे चलकर इसका इस्तेमाल चलचित्रों में होने लगा। विकास का सिलसिला बीसवीं सदी में जारी रहा और डिजिटल वीडियो आने के साथ ही विकास की रफ्तार और तेज़ हो गई। डीपफेक टेक्नॉलॉजी नब्बे के दशक तक अनुसंधानकर्ताओं तक सीमित थी, लेकिन बाद में शौकिया लोग इस तकनीक का इस्तेमाल ऑनलाइन संचार में करने लगे।
वस्तुत: डीपफेक शब्द ‘डीप लर्निंग’ और ‘फेक’ से मिलकर बना है। इस नाम का उपयोग एक रेडिट उपयोगकर्ता ने किया था। रेडिट सामाजिक खबरें जुटाने वाली अमेरिकी वेबसाइट और प्लेटफॉर्म है।
सन 2017 में पहली बार सार्वजनिक डोमेन में इसका इस्तेमाल किया गया। डीपफेक हेरफेर की अति उन्नत प्रौद्योगिकी है, जिसमें किसी का वीडियो किसी में मिलाकर और किसी का चेहरा किसी में लगाकर नकली वीडियो अथवा फोटो बना दिया जाता है।
अलबत्ता, डीपफेक का सकारात्मक चेहरा भी है, जो चर्चा का विषय नहीं बना है। इसके इस्तेमाल से विदेशी भाषाओं की फिल्मों को डबिंग के ज़रिए बेहतर बनाया जा सकता है। जो गायक या गायिकाएं अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी आवाज़ को जिलाया जा सकता है। यह तकनीक युद्धग्रस्त इलाकों में लोगों में सहानुभूति पैदा करने में सहायक सिद्ध हुई है। इस प्रौद्योगिकी से स्क्लेरोसिस बीमारी की चपेट में आ चुके लोगों की आवाज़ को वापस लाने में सफलता मिली है।
इस तकनीक से शैक्षणिक वीडियो बनाए जा सकते हैं। विद्यार्थियों को इतिहास की घटनाओं से परिचित कराया जा सकता है। डीपफेक तकनीक से मृत व्यक्ति का चेहरा बनाने में सफलता मिली है। अक्टूबर 2020 में किम कार्देशियन ने अपने दिवंगत पिता का चेहरा इसी तकनीक से बनाया था। हेल्थकेयर, फैशन, ई-कामर्स आदि में भी इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया है। इस तकनीक से कलाकृतियों का सृजन भी किया जा सकता है। ऐसे सदुपयोगों की सूची लंबी होती जा रही है।
हाल के वर्षों में डीपफेक प्रौद्योगिकी के दुरूपयोग का खुलासा हुआ है। इनमें ब्लैकमेल, पोर्नोग्राफी, वित्तीय धोखाधड़ी, फर्ज़ी खबरें आदि शामिल हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रंप, व्लादीमीर पुतिन, रश्मिका मंदाना जैसी सेलेब्रिटीज़ को बदनाम करने हेतु और राजनेताओं पर व्यंग्य और पैरोडी बनाने में भी हुआ है। इस तकनीक का इस्तेमाल विपक्षी उम्मीदवार के खिलाफ माहौल बनाने और भ्रामक जानकारियां प्रसारित करने में किया जा सकता है।
आखिर कैसे बनता है डीपफेक? यह विशेष मशीन लर्निंग – डीप लर्निंग का उपयोग करके बनाया जाता है। कंप्यूटर को दो वीडियो अथवा फोटो दिए जाते हैं, जिन्हें देखकर वह स्वयं ही दोनों वीडियो अथवा फोटो को एक ही जैसा बनाता है। इस प्रकार के फोटो और वीडियो में गुप्त परतें होती हैं, जिन्हें विशेष साॅफ्टवेयर के ज़रिए ही देखा जा सकता है।
अब एक सवाल यह है कि डीपफेक वीडियो अथवा तस्वीर को कैसे पहचानें? डीपफेक वीडियो इतने सटीक होते हैं कि इन्हें पहली नज़र में पहचाना नहीं जा सकता। इसके लिए डीपफेक तकनीक से तैयार वीडियो का बेहद बारीकी से अवलोकन करना होता है। इसमें चेहरे और आंखों से झलकती अभिव्यक्ति सम्मिलित है। लिप सिंकिंग के ज़रिए भी इस प्रकार के वीडियो पहचाने जाते हैं। ऐसे वीडियो को अतिरिक्त ब्राइटनेस द्वारा भी पहचाना जा सकता है।
सोशल मीडिया कंपनियों, संगठनों और सरकारी एजेंसियों ने डीपफेक का पता लगाने की तकनीक का विकास किया है। इसी प्रकार अमेरिका की डिफेंस एडवांस रिसर्च एजेंसी (डीएआरपीए) ने भी इसके लिए प्रौद्योगिकी विकसित की है। सोशल मीडिया से जुड़ी कुछ कंपनियों ने डीपफेक का पता लगाने के लिए ब्लाॅकचेन प्रौद्योगिकी का उपयोग किया है। एडोब, माइक्रोसाॅफ्ट सहित कुछ कंपनियों ने डीपफेक प्रोटेक्शन साॅफ्टवेयर उपलब्ध कराया है। वैसे तो डीपफेक का उपयोग वैधानिक है, लेकिन नियमों को तोड़ने पर अवैधानिक हो जाता है।
डीपफेक तकनीक का सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू यह है कि इसके गलत इस्तेमाल को प्रभावी तरीके से कैसे रोका जाए? युरोप, अमेरिका, चीन आदि ने डीपफेक तकनीक से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए कारगर कदम उठाए हैं। हाल की घटनाओं के बाद भारत भी कानून बनाने की दिशा में सक्रिय हो गया है। लेकिन मात्र कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। वर्तमान दौर में डिजिटल डोमेन में प्रौद्योगिकी साक्षरता और जागरूकता दोनों ही ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images.spiceworks.com/wp-content/uploads/2022/05/23103504/Concept-of-artificial-intelligence-face-combined-with-electronic-circuit.jpg
हम इंटरनेट युग में जी रहे हैं जहां पूरी दुनिया डैटा से घिरी हुई है। यह डैटा और कुछ नहीं बल्कि हमारी यादें, अनुभव, सूझ-बूझ, दुख-दर्द के क्षण और कभी-कभी सांसारिक गतिविधियों के बारे में है। जैसे, कोई विगत यात्रा या महीने और वर्ष में दिन के किसी विशेष घंटे में क्या खाया या फिर दैनिक जीवन के सामान्य घटनाक्रम का लेखा-जोखा।
क्या ऐसा पहले नहीं था? ऐसे तथ्यात्मक, भावनात्मक, आनुभविक और व्यवहारिक क्षणों को संग्रहित और संरक्षित करना हमेशा से एक मानवीय प्रवृत्ति रही है। अंतर केवल इतना है कि हमारे पूर्वज डैटा को अपनी स्मृतियों में या गुफाओं, पत्थरों या कागजों पर उकेरी गई छवियों के माध्यम से संग्रहित करते थे, जबकि आज हम प्रौद्योगिकी एवं उपकरणों की मदद से ऐसा करते हैं!
अतीत में, बातों को मानव स्मृति में संग्रहित करने के साथ-साथ पत्थर पर नक्काशी करना, पत्तों पर और बाद में कागज़ो पर ग्रंथ लिखना काफी श्रमसाध्य था। यह संग्रहण कुछ समय तक ही रह पाता था। समय के साथ, जलवायु के प्रहार पत्थरों, कागज़ों को नष्ट कर डैटा को भी विलोपित कर देते थे। मानव स्मृति की भी डैटा संग्रहण की एक निर्धारित क्षमता होती है। दूसरे शब्दों में, प्राचीन काल से चली आ रही डैटा संग्रहण की मानवीय प्रवृत्ति, वर्तमान युग की वैज्ञानिक तकनीकों एवं साधनों की आसान उपलब्धता से डैटा विज्ञान का उदय हुआ है।
डैटाविज्ञान: शुरुआतीवर्ष
शब्द ‘डैटा विज्ञान’ 1960 के दशक में एक नए पेशे का वर्णन करने के लिए गढ़ा गया था, जो उस समय भारी मात्रा में एकत्रित होने वाले डैटा को समझने और उसका विश्लेषण करने में सहायक सिद्ध हुआ। वैसे संरचनात्मक रूप से इसने 2000 की शुरुआत में ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
यह एक ऐसा विषय है जो सार्थक भविष्यवाणियां करने और विभिन्न उद्योगों में सूझ-बूझ प्राप्त करने के लिए कंप्यूटर विज्ञान और सांख्यिकीय पद्धतियों का उपयोग करता है। इसका उपयोग न केवल सामाजिक जीवन, खगोल विज्ञान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में बल्कि व्यापार में भी बेहतर निर्णय लेने के लिए किया जाता है।
1962 में अमेरिकी गणितज्ञ जॉन डब्ल्यू. टुकी ने सबसे पहले डैटा विज्ञान के सपने को स्पष्ट किया। अपने प्रसिद्ध लेख ‘दी फ्यूचर ऑफ डैटा एनालिसिस’ में उन्होंने पहले पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) से लगभग दो दशक पहले इस नए क्षेत्र के उद्गम की भविष्यवाणी की थी।
एक अन्य प्रारंभिक व्यक्ति डेनिश कंप्यूटर इंजीनियर पीटर नॉर थे, जिनकी पुस्तक कॉन्साइस सर्वे ऑफ कंप्यूटर मेथड्स डैटा विज्ञान की सबसे पहली परिभाषाओं में से एक प्रस्तुत करती है।
1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि डैटा विज्ञान एक मान्यता प्राप्त और विशिष्ट क्षेत्र के रूप में उभरा। कई डैटा विज्ञान अकादमिक पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं, और जेफ वू और विलियम एस. क्लीवलैंड आदि ने डैटा विज्ञान की आवश्यकता और क्षमता को विकसित करने और समझने में मदद करना जारी रखा।
पिछले 15 वर्षों में, पूरे विषय को व्यापक उपकरणों, प्रौद्योगिकियों और प्रक्रिया के द्वारा परिभाषित और लागू करने के साथ एक भलीभांति स्थापित पहचान मिली है।
डैटाविज्ञानऔरजीवन
पिछले 100 वर्षों में मानव जीवन शैली में बहुत कुछ बदला है और विज्ञान और प्रौद्योगिकी से 20 वर्षों में तो बदलावों का सैलाब-सा ही आ गया है। अलबत्ता, जो चीज़ समय के साथ नहीं बदली, वह है मूल मानव व्यवहार और अपने क्षणों और अनुभवों को संग्रहित करने की उसकी प्रवृत्ति।
मानवीय अनुभव और क्षण (डैटा!), जो मानव स्मृति, नक्काशी और चित्रों में रहते थे, उन्हें प्रौद्योगिकी के ज़रिए एक नया शक्तिशाली भंडारण मिला है। अब मानव डैटा छोटे/बड़े बाहरी ड्राइव्स, क्लाउड स्टोरेज जैसे विशाल डैटा भंडारण उपकरणों में संग्रहित किए जा रहे हैं। मज़ेदार बात यह है कि अब डैटा को, पहले के विपरीत, बिना किसी बाधा के, जितना चाहें उतना और जब तक चाहें तब तक संग्रहित रखा जा सकता है।
पिछले 20 वर्षों में, एक और दिलचस्प बदलाव इंटरनेट टेक्नॉलॉजी के आगमन से भी हुआ। इंटरनेट टेक्नॉलॉजी की शुरुआत के साथ, मानव व्यवहार और उसके सामाजिक संपर्क की प्रवृत्ति ने एक बड़ी छलांग लगाई। लोगों ने दिन-प्रतिदिन हज़ारों किलोमीटर दूर विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अन्य मनुष्यों से जुड़ना शुरू कर दिया और इस तरह विभिन्न तरीकों से बातचीत करने और अभिव्यक्ति की मानवीय क्षमता कई गुना बढ़ गई।
आज छत्तीसगढ़ के घने जंगलों के ग्रामीण इलाके का कोई बच्चा बॉलीवुड की किसी मशहूर हस्ती को सुन सकता है और उससे जुड़ सकता है, वहीं न्यूयॉर्क में रहते हुए एक व्यक्ति उत्तरी अफ्रीका में रह रहे किसी पीड़ित बच्चे की भावनाओं से रूबरू हो सकता है। इंटरनेट क्रांति ने इस पूरी दुनिया को मानो एक बड़े से खेल के मैदान में बदल दिया है जहां हर एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति, विषय या घटना से तत्काल जुड़ सकता है।
इन क्षमताओं के रहते पूरा विश्व नई तरह की संभावनाओं और अभिव्यक्तियों के प्रयोगों से भर गया है। इस तरह की गतिविधियों ने अपनी एक छाप छोड़ी है (जिन्हें हम डैटा कह सकते हैं) और टेक्नॉलॉजी ने इसे असीमित रूप से एकत्रित और संग्रहित करना शुरू कर दिया है।
नई दुनिया के ये परिवर्तन विशाल डैटा (Big Data) के रूप में प्रस्फुटित हुए। अधिकांश लोग (जो इंटरनेट वगैरह तक पहुंच रखते हैं) डैटा (यानी शब्द, आवाज़, चित्र, वीडियो वगैरह के रूप में) के ज़रिए यादों और अनुभवों से सराबोर हैं। ये डैटा न केवल सामाजिक या अंतर-वैयक्तिक स्तर पर, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर (जैसे ऑनलाइन भुगतान, ई-बिल, ई-लेनदेन, क्रेडिट कार्ड) और यहां तक कि अस्पतालों के दौरों, नगर पालिका की शिकायतों, यात्रा के अनुभवों, मौसम के परिवर्तन तक में नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो संपूर्ण जीवन की गतिविधियां डैटा पैदा कर रही हैं और इसे संग्रहित किया जा रहा है।
आधुनिक जीवनशैली बड़ी मात्रा में डैटा उत्पन्न करती है। डैटा की मात्रा इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि आधुनिक तकनीक ने बड़ी मात्रा में डैटा निर्मित करना और संग्रहित करना आसान बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में, दुनिया में पैदा किया गया 90% से अधिक डैटा संग्रहित कर लिया गया है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हर घंटे 2 करोड़ से अधिक छवियां पोस्ट करते हैं।
डैटाविज्ञान: कार्यपद्धति
मानव मस्तिष्क विभिन्न उपकरणों में संग्रहित विशाल डैटा का समय-समय पर उपयोग करना चाहता है। इस कार्य के लिए एक अलग प्रकार की तकनीकी क्षमता की आवश्यकता थी, जो संग्रहित डैटा को निकालने और निर्णय लेने का काम कर सके। यह मस्तिष्क के संचालन की नकल करने जैसा था। ऐसे जटिल दिमागी ऑपरेशनों को दोहराने के लिए एक कदम-दर-कदम चलने वाले एक समग्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है ताकि:
– डैटा इष्टतम तरीके से संग्रहित किया जाए;
– डैटा को कुशलतापूर्वक, शीघ्रता से प्रबंधित, पुनर्प्राप्त, संशोधित, और विलोपित किया जा सके;
– डैटा की व्याख्या आसानी से और शीघ्रता से की जा सके; इससे भविष्य के बारे में निर्णय लेने में मदद मिलती है।
वैसे तो हमारा मस्तिष्क सूक्ष्म और जटिल तरीके से डैटा को आत्मसात करने और निर्णय लेने का काम करता आया है, लेकिन मस्तिष्क की क्षमता सीमित है। डैटा से जुड़ी उक्त प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मानव मस्तिष्क जैसे एक विशाल स्पेक्ट्रम की आवश्यकता हुई। टेक्नॉलॉजी ने इस प्रक्रिया के लिए डैटा भंडारण (विशाल डैटा सर्वर), पुनर्प्राप्ति के विभिन्न साधनों को सांख्यिकीय/गणितीय जानकारी से युक्त करना शुरू कर दिया। जावा, पायथन, पर्ल जैसी कोडिंग भाषा, विभिन्न मॉडलिंग तकनीकों (जैसे क्लस्टरिंग, रिग्रेशन, भविष्यवाणी और डैटा माइनिंग) के साथ-साथ ऐसी मशीनें विकसित हुईं जो डैटा को बार-बार समझ सकती हैं और स्वयं सीखकर खुद को संशोधित कर सकती हैं (मशीन लर्निंग मॉडल)। मूल रूप से कोशिश यह थी कि प्रौद्योगिकी और विज्ञान के सहारे हम अपने मस्तिष्क जैसी निर्णय लेने की क्षमता मशीन में पैदा कर सकें!
प्रौद्योगिकी द्वारा मानव मस्तिष्क की क्षमताओं के प्रतिरूपण की इस पूरी प्रक्रिया को डैटा विज्ञान का नाम दिया गया है। डैटा विज्ञान एक ऐसा क्षेत्र है जो डैटा से अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए सांख्यिकी, वैज्ञानिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धि (एआई) और डैटा विश्लेषण सहित कई विषयों को जोड़ता है। डैटा वैज्ञानिक वे हैं जो वेब, स्मार्टफोन, ग्राहकों और सेंसर सहित विभिन्न स्रोतों से प्राप्त डैटा का विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार की क्षमताओं को एकीकृत करते हैं।
डैटासाइंसकाभविष्य
क्या यह डैटा विज्ञान, भारत जैसे देश में अंतिम व्यक्ति के जीवन को छू सकता है या यह केवल थ्रिलर फिल्म या सस्ते दाम में कॉन्टिनेंटल खाने के लिए सर्वश्रेष्ठ रेस्तरां की खोज करने जैसे कुछ मनोरंजक/आनंद/विलास की गतिविधियों तक ही सीमित है? क्या यह हमारे समाज को बेहतर बनाने और वंचितों को कुछ बुनियादी सुविधाएं देने में मदद कर सकता है?
यकीनन। किसी भी अन्य गहन ज्ञान की तरह विज्ञान भी राष्ट्र, पंथ, जाति, रंग या एक वर्ग तक सीमित नहीं है। इरादा हो तो यह सभी के लिए है। संक्षेप में इसका उपयोग भारत में समाज को कई तरीकों से बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। कुछ उदाहरण देखिए।
चिकित्सा/स्वास्थ्य
यह एक प्राथमिक क्षेत्र हो सकता है जहां डैटा विज्ञान का लाभ उठाया जा सकता है। डैटा के संदर्भ में, वर्तमान अस्पताल प्रणाली अभी भी रोगियों के प्रवेश, निदान और उपचार जैसे सामान्य संदर्भो में ही काम करती है। इस क्षेत्र में जनसांख्यिकी, स्वास्थ्य मापदंडों से लेकर रोगियों के विभिन्न चरणों में किए गए निदान/उपचार जेसे डैटा को संग्रहित करने की आवश्यकता है, जिसे नैदानिक परिणामों और उपचार विकल्पों को एकत्रित, संग्रहित, और व्याख्या के द्वारा व्यापक रूप से चिकित्सा समुदाय में साझा किया जा सके। यह डैटा विज्ञान को भारतीय स्थिति में रोगियों को समझने और सर्वोत्तम संभव उपचार विकल्पों के साथ-साथ रोकथाम के उपायों को समझने में सक्षम करेगा। यह रोगियों/डॉक्टरों का बहुत सारा धन और समय बचा सकता है, त्रुटियों को कम कर सकता है और मानव जीवन को अधिक सुरक्षित और स्वस्थ बना सकता है। आवश्यकता यह है कि सरकारी और निजी अस्पताल डैटा रिकॉर्ड करना और संग्रहित करना शुरू करें ताकि इसका उपयोग अनुसंधान और विकास के लिए किया जा सके। यूएस जैसे विकसित देशों में ऐसी प्रक्रिया से समाज को काफी लाभ मिलता है। डैटा विज्ञान वास्तव में भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र को कई लाभकारी तरीकों से सम्पन्न कर सकता है।
कृषिउत्पादकता
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में डैटा विज्ञान तरह-तरह की जानकारी के ज़रिए किसानों को लाभ पहुंचा सकता है:
– मिट्टी किस प्रकार की फसल के लिए अच्छी है;
– मौसम और जलवायु की परिस्थिति में किन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है;
– फसल के प्रकार के लिए आवश्यक मिट्टी की पानी और नमी की आवश्यकता;
– अप्रत्याशित मौसम की भविष्यवाणी और फसलों की सुरक्षा;
– ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ-साथ मौसम के मिज़ाज के आधार पर निश्चित समय में किसी निश्चित क्षेत्र में इष्टतम फसल की पैदावार की भविष्यवाणी करना।
इस तरह के डैटा का सरकार द्वारा समय-समय पर निरीक्षण करना और भौगोलिक सेंसर व अन्य उपकरणों की मदद से डैटा तैयार करने की आवश्यकता है। डैटा विज्ञान फसलों की बहुत बर्बादी को बचा सकता है और हमारी उपज में भारी वृद्धि कर सकता है।
शिक्षाएवंकौशलविकास
अशिक्षा का मुकाबला करने के लिए शैक्षणिक सुविधाओं के अधिक प्रसार की और शिक्षकों की दक्षता, अनुकूलित शिक्षण विधियों के विकास की भी आवश्यकता है। इसके अलावा विभिन्न छात्रों की विविध और व्यक्तिगत सीखने की शैलियों/क्षमताओं के संदर्भ में गहरी समझ की भी आवश्यकता है। डैटा विज्ञान इस संदर्भ में समाधान प्रदान कर सकता है:
– देश भर में छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों के विस्तृत प्रोफाइल तैयार करना;
– छात्रों के सीखने और प्रदर्शन के आंकड़े जुटाना;
– प्रतिभाओं के कुशल प्रबंधन के लिए व्यक्तिगत शिक्षण विधियों/शैलियों का विकास
– देश भर में कनेक्टेड डैटा के साथ अकादमिक अनुसंधान को बढ़ाना।
पर्यावरणसंरक्षण
– भूमि, जल, वायु/अंतरिक्ष और जीवन के सम्बंध में डैटा एकत्र करना और पृथ्वी ग्रह के स्वास्थ्य को बढ़ाना;
– वनों की कटाई के विभिन्न कारणों जैसे मौसम पैटर्न, मिट्टी या नदियों की स्थलाकृति के बीच सम्बंध का पता लगाना;
– ग्रह-स्तरीय डिजिटल मॉडल निरंतर, वास्तविक समय में डैटा कैप्चर करेगा और चरम मौसम की घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं (जैसे, आग, तूफान, सूखा और बाढ़), जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के संसाधनों से सम्बंधित अत्यधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान कर सकता है;
– विलुप्ति की प्रक्रिया का कारण जानने और इसे उलटने के तरीके के लिए वर्षों से एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण;
– विलुप्ति के खतरे से घिरे जीवों को बचाने के लिए कारणों का विश्लेषण।
ग्रामीणएवंशहरीनियोजन
भारत में नगर पालिकाओं, ग्राम पंचायतों, भू-राजस्व सम्बंधी डैटा अभी भी विशाल कागज़ी फाइलों में संग्रहित किया जाता है, जिससे कुशल निर्णय लेने में देरी होती है। डैटा विज्ञान डैटा को एकीकृत करने में मदद कर सकता है और डैटा साइंस राज्य के प्रबंधन के लिए प्रभावी नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में गति ला सकता है।
कुल मिलाकर डैटा विज्ञान के उपयोग के कई लाभ हैं। देश की विशाल प्रतिभा और अपेक्षाकृत कम श्रम लागत की बदौलत भारत तेज़ी से डैटा साइंस का केंद्र बनता जा रहा है। नैसकॉम विश्लेषण का अनुमान है कि भारतीय डैटा एनालिटिक्स बाज़ार 2017 के 2 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 16 अरब डॉलर का हो जाएगा। यह तीव्र वृद्धि कई कारकों से प्रेरित है, जिसमें डैटा की बढ़ती उपलब्धता, डैटा-संचालित निर्णय-प्रक्रिया, कृत्रिम बुद्धि (एआई) की वृद्धि शामिल हैं। भारत में कई विश्वविद्यालयों में डैटा साइंस के कोर्सेस भी चलाए जा रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://techvidvan.com/tutorials/wp-content/uploads/sites/2/2020/02/data-science-application.jpg
फर्ज़ी मतदान रोकने में ‘अमिट स्याही’ की अहम भूमिका रही है। अमिट स्याही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मिटाया अथवा धोया नहीं जा सकता। बैंगनी रंग की यह स्याही आम चुनाव का प्रतीक बन गई है। अभी तक कोई भी विकल्प अमिट स्याही की जगह नहीं ले पाया है।
मतदान में प्रयुक्त अमिट स्याही को बनाने में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (एनपीएल) के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसे अमिट स्याही की जन्म स्थली कहा जाता है। प्रयोगशाला की स्थापना के तुरन्त बाद रसायन विज्ञान प्रभाग के अंतर्गत स्याही विकास इकाई का गठन किया गया था। एनपीएल ने 1950-51 में अमिट स्याही तैयार कर ली थी, जिसका उपयोग प्रथम आम चुनाव में किया गया था। दूसरे आम चुनाव (1957) में एनपीएल ने ही अमिट स्याही की 3,16,707 शीशियां उपलब्ध कराई थीं।
बहरहाल, अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अमिट स्याही उत्पादन के काम को आगे जारी नहीं रखा जा सका था। ऐसी स्थिति में सरकारी-निजी प्रतिष्ठान को इसके उत्पादन का लायसेंस देने की ज़रूरत दिखाई दी। काफी विचार-विमर्श के बाद कर्नाटक की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मैसूर पेंट्स का चुनाव किया गया। इस कंपनी की स्थापना 1937 में मैसूर के महाराजा कृष्णराजा वाडियार ने की थी। वर्ष 1947 में इस कंपनी का अधिग्रहण पूर्व मैसूर राज्य ने कर लिया था और आगे चलकर इसका नाम बदल कर मैसूर लैक एंड पेंट वर्क्स लिमिटेड कर दिया गया। फिर 1989 में नाम बदलकर मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड कर दिया गया। वर्तमान में इसी को निर्वाचन आयोग से अमिट स्याही खरीदी के आदेश प्राप्त हो रहे हैं। और तो और, यह कंपनी दो दर्ज़न अन्य देशों को भी अमिट स्याही का निर्यात कर रही है।
निर्णय लिया गया है कि 1962 के बाद के सभी चुनावों में मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड ही अमिट स्याही का उत्पादन और निर्यात करेगी। नेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने अमिट स्याही के नुस्खे का पेटेंट करा लिया है, ताकि अन्य कंपनियां इसका उत्पादन न कर सकें।
अमिट स्याही के विकास का इतिहास लगभग सात दशकों का है। सात दशकों की इस छोटी-सी अवधि में कई महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हैं। 1940 के दशक में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर ने रसायन विज्ञानी डॉ. सलीमुज्जमान सिद्दीकी से अमिट स्याही तैयार करने के लिए कहा था। उन्होंने सिद्दीकी को सिल्वर क्लोराइड युक्त एक नमूना भेजा, जिसे लगाने के बहुत देर बाद त्वचा पर निशान पड़ता था। रसायनविद डॉ. सिद्दीकी ने इसमें सिल्वर ब्रोमाइड मिलाया, जिससे तत्काल निशान पड़ गया। डॉ. सिद्दीकी शुरुआत से ही एनपीएल में स्याही विकास इकाई से जुड़े थे। आगे चलकर डॉ. एम. एल. गोयल के नेतृत्व में अमिट स्याही का नुस्खा तैयार किया गया। उनके सहयोगी प्रतिष्ठित और समर्पित युवा रसायन विज्ञानी डॉ. जी. बी. माथुर, डॉ. वी. डी. पुरी आदि थे।
‘अमिट स्याही’ का मुख्य घटक सिल्वर नाइट्रेट है। यही रसायन स्याही के निशान को उभारता है। इसकी सांद्रता दस से लेकर पच्चीस प्रतिशत के बीच होती है। सिल्वर नाइट्रेट और त्वचा के प्रोटीन की अभिक्रिया से त्वचा पर गहरा निशान बन जाता है, जो कुछ दिनों तक नहीं छूटता। सिल्वर नाइट्रेट से त्वचा को जरा भी हानि नहीं होती। यह निशान तभी हटता है, जब नई कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं की जगह ले लेती हैं। स्याही चालीस सेकंड से कम समय में सूख जाती है। अमिट स्याही में कुछ रंजक भी होते हैं। यह स्याही रोशनी के प्रति संवेदनशील होती है, अत: इसे रंगीन शीशियों में रखा जाता है।
निर्वाचन आयोग को सौंपने के पहले अमिट स्याही का कई बार परीक्षण किया जाता है। निर्वाचन आयोग चुनाव प्रक्रिया के दौरान ‘रेंडम सेम्पल’ लेकर परीक्षण के लिए एनपीएल के पास भेजता है जो प्रत्येक परीक्षण के बाद निर्वाचन आयोग को नियमित रिपोर्ट भेजती है।
बैंगनी रंग की अमिट स्याही को मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी पर लगाया जाता है। मतदान की अवधि में स्याही सूखने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इसे साबुन, तेल, डिटरजेंट अथवा रसायनों से मिटाया नहीं जा सकता। कुछ दिनों बाद यह अपने आप मिट जाती है।
एक बात और। एनपीएल को आज भी अमिट स्याही की रॉयल्टी मिलती है।
वर्ष 1962 में विकसित अमिट स्याही का मूल नुस्खा छह दशकों बाद भी नहीं बदला है। साल 2001 में एनपीएल के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण लाल ने अमिट स्याही के नुस्खे को बेहतर बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य मूल स्याही से पानी को हटाना था, ताकि यह जल्दी सूख सके। सूखने की प्रक्रिया को बेहतर करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने बिना पानी का एक ऐसा मिश्रण तैयार किया, जो पहले मिश्रण की तुलना में जल्दी सूख तो जाता था, लेकिन रंग बहुत समय तक बना रहता था।
पिछले वर्षों में अमिट स्याही के उपयोग का विस्तार हुआ है। 2016 में इसका उपयोग नोटबंदी के संदर्भ में हुआ था।
तर्जनी उंगली पर अमिट स्याही का निशान लगाना संवैधानिक ज़रूरत है। सवाल यह है कि निशान कहां पर लगाया जाए? इस बारे में परिवर्तन हुए हैं। शुरुआत में अमिट स्याही का निशान तर्जनी के मूल में बिंदु के रूप में लगाया जाता था। वर्ष 1962 में यह निशान नाखून की जड़ के ऊपर लगाया जाता था। साल 2006 से इस निशान को बड़ा करके नाखून के ऊपर के सिरे से तर्जनी अंगुली के जोड़ के नीचे तक लगाया जाता है। इसने अब एक छोटी-सी लकीर का रूप ले लिया है।
स्वतंत्रता के पहले अमिट स्याही के मामले में देश निर्यात पर निर्भर था। लेकिन आज हम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो चुके हैं। यही नहीं भारत 25 देशों को अमिट स्याही का निर्यात भी कर रहा है। अमिट स्याही का उपयोग लोकसभा, विधानसभा चुनावों से लेकर स्थानीय निकायों के चुनावों में हो रहा है। सारांश में कहा जा सकता है कि अमिट स्याही का नुस्खा अपने ही देश में बनाना और उत्पादन करना लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के साथ ही हमारे देश के वैज्ञानिकों की ऐतिहासिक भूमिका और प्रतिभा को आम मतदाताओं के सामने प्रदर्शित करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://starofmysore.com/wp-content/uploads/2018/05/news-5-7.jpg
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में मतदाता बटन दबाकर उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। इस पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ने कागज़ी मतपत्रों की जगह ले ली है। ईवीएम ने आम चुनाव को पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभाई है।
पहली बार 1982 में केरल के पारूर में ईवीएम का उपयोग किया गया था। बाद में विभिन्न राज्यों के उपचुनावों में भी ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। आरंभ में मशीनी मतदान की विशेषताओं से परिचित न होने के कारण राजनीतिक दलों ने कई शंकाएं जताते हुए इसका विरोध किया था, लेकिन विशेषज्ञों द्वारा समाधान के बाद इन पर विराम लग गया। मतदाताओं ने भी जानकारी के अभाव में ईवीएम को लेकर कल्पानाएं गढ़ ली थीं। आगे चलकर निर्वाचन आयोग ने स्थिति स्पष्ट की। काफी समय से ईवीएम का उपयोग लोकसभा और विधानसभा से लेकर स्थानीय निकाय के चुनावों में हो रहा है।
भारत में ईवीएम का उपयोग करने से पहले दस वर्षों तक रिसर्च हुई और उसके बाद निर्वाचन आयोग के अनुरोध पर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) ने इन मशीनों का निर्माण किया है। ईवीएम की शेल्फ लाइफ 15 वर्ष होती है। इनमें चुनाव परिणामों को कई वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अनुसंधान के दौरान ईवीएम की कार्यक्षमता पर मौसम, तापमान, धूल, धुएं, पानी आदि का कोई असर नहीं पड़ा है।
ईवीए दो भागों में बंटी होती है: बैलट युनिट और कंट्रोल युनिट। कंट्रोल युनिट पॉवर सप्लाई, रिकार्डिंग, संग्रहण आदि का काम करती है। बैलट युनिट में वोटिंग पैनल होता है, जिसका उपयोग मतदान करने के लिए किया जाता है। एक कंट्रोल युनिट से अधिकतम चार बैलट युनिट को जोड़ा जा सकता है। एक बैलट युनिट में अधिकतम 16 उम्मीदवारों के वोट दर्ज किए जा सकते हैं। इस प्रकार एक कंट्रोल युनिट 64 उम्मीदवारों के वोट दर्ज करने की क्षमता रखती है।
एक बैलट युनिट में अधिकतम 3840 वोट दर्ज किए जा सकते हैं। आम तौर पर एक मतदान केंद्र पर एक कंट्रोल युनिट और एक या एक से अधिक बैलट युनिट हो सकती हैं। कंट्रोल युनिट में 6 वोल्ट की रिचार्जेबल बैटरियों का इस्तेमाल किया जाता है जिनका जीवनकाल दस वर्ष का होता है। कंट्रोल युनिट में चार बटन होते हैं। पहला बटन दबाने पर मशीन बैलट युनिट को वोट रिकॉर्ड करने का आदेश देती है। दूसरा बटन दबाने से मशीन में संग्रहित पूरी जानकारी खत्म हो जाती है। तीसरा बटन दबाने से मशीन बंद हो जाती है और उसके बाद वह वोट दर्ज नहीं करती। चौथा बटन दबाने पर परिणाम बताती है।
बैलट युनिट के ऊपरी फलक पर उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिन्ह चिपका दिए जाते हैं। प्रत्येक नाम के सामने एक बटन और लाल बत्ती होती है। जिस उम्मीदवार के नाम के आगे बटन दबाया जाता है, उसके खाते में वोट दर्ज हो जाता है। गोपनीयता की दृष्टि से बैलट युनिट को एक अलग स्थान पर रखा जाता है जहां मतदाता के अलावा कोई नहीं रहता है। कंट्रोल युनिट मतदान केंद्र के पीठासीन अधिकारी के पास होती है, जहां पर विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं।
ईवीएम से वोट डालने का तरीका अलग है। वोट डालने के लिए जाने वाले मतदाता की अंगुली पर अमिट स्याही का निशान लगाकर और उसके हस्ताक्षर लेकर उसे मतदान कक्ष में भेज दिया जाता है। मतदाता के मतदान कक्ष में प्रवेश करते ही मतदान अधिकारी मशीन का स्टार्ट बटन दबा देते हैं और वोटिंग मशीन वोट दर्ज करने के लिए तैयार हो जाती है।
ईवीएम काम कैसे करती है? कंट्रोल युनिट में सबसे पहले क्लीयर का बटन दबाया जाता है। इससे मशीन की मेमोरी में मौजूद हर चीज मिट जाती है। इसके बाद पीठासीन अधिकारी द्वारा स्टार्ट बटन दबाया जाता है। बटन के दबते ही कंट्रोल युनिट में लाल बत्ती और बैलट युनिट में हरी बत्ती जल उठती है। यानी बैलट युनिट बैलट लेने को और कंट्रोल युनिट मत को दर्ज करने के लिए तैयार है। जैसे ही मतदाता द्वारा अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने वाला बटन दबाया जाएगा, उम्मीदवार के सामने वाली बत्ती जल उठेगी। और कंट्रोल युनिट में ‘बीप’ की आवाज़ भी होगी। इससे मतदाता को पता चल जाएगा कि उसने वोट दे दिया है। इसके बाद बटन दबाने बटन का कोई अर्थ नहीं होगा। यदि दो बटन एक साथ दबा दिए जाएं तो वोट दर्ज नहीं होगा। मतदान समाप्ति पर क्लोज़ का बटन दबाया जाता है।
मतदाताओं का भरोसा बढ़ाने के लिए ईवीएम के साथ अब ‘वीवीपैट’ (वोटर वेरीफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) जोड़ दिया गया है। यह एक स्वतंत्र प्रिंटर प्रणाली है। इससे मतदाताओं को अपना मतदान बिलकुल सही होने की पुष्टि करने में सहायता मिलती है। ‘वीवीपैट’ का निर्माण भी सार्वजनिक क्षेत्र के उपरोक्त दो प्रतिष्ठानों ने ही किया है। वर्ष 2017-18 के दौरान गोवा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में ‘वीवीपैट’ का उपयोग किया गया था।
वैज्ञानिक अध्ययनों और विश्लेषणों में पता चला है कि चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल से लाभ की तुलना में हानि नहीं के बराबर है। ईवीएम के इस्तेमाल से होने वाले लाभ की एक सूची बनाई जा सकती है। यह सूची लगातार लंबी होती जा रही है। ईवीएम के इस्तेमाल से बूथ पर कब्ज़ा करने की घटनाएं खत्म हो गई हैं। वोटिंग में बहुत कम समय लगता है। वोटों की गिनती तीन से छह घंटों में पूरी हो जाती है, जबकि पहले दो दिन तक लगते थे। इन मशीनों में सीलबंद सुरक्षा चिप होती है। ईवीएम के प्रोग्राम में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इससे वोटों की हेरा-फेरी को रोका जा सकता है।
एक मिनट में एक ईवीएम से पांच लोग वोट डाल सकते हैं। ईवीएम बैटरी से चलती है। इसमें डैटा एक दशक तक सुरक्षित रहता है। एक ईवीएम में 64 उम्मीदवार फीड हो सकते हैं। मतपत्रों के ज़माने में बड़ी संख्या में मत अवैध हो जाते थे। कई चुनावों में अवैध मतों की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा हुआ करती थी। अब ईवीएम के उपयोग से कोई वोट अवैध नहीं होता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://starofmysore.com/wp-content/uploads/2023/04/news-12-evm-setup-elections.jpg