लंदन के नेशनल आर्ट म्यूज़ियम
में रखी लियोनार्डो दा विंची की बेजोड़ पेंटिंग – दी वर्जिन ऑफ दी रॉक्स – के पीछे
एक और तस्वीर छिपी है। हाल ही में उस ओझल तस्वीर के बारे में नई जानकारी सामने आई
है। इस पेंटिंग में वर्जिन मैरी, शिशु जीसस और शिशु सेंट जॉन और एक फरिश्ता हैं।
दरअसल 2005 में नेशनल आर्ट
गैलरी ने दी वर्जिन ऑफ दी रॉक्स पेंटिंग की इंफ्रारेड रिफ्लेक्टोग्राफी की मदद से
इमेंज़िंग की थी जिसमें उन्हें पता चला था कि एक अन्य चित्र इस पेंटिंग के पीछे
छिपा हुआ है जिसमें मैरी की आंखे बिलकुल अलग जगह पर बनी हुई थीं जिसे बाद में बनाए
गए चित्र के रंगों से पूरा ढंक दिया गया था।
और अब पेंटिंग के पीछे ढंके
चित्र के बारे में तफसील से जानने के लिए नेशनल आर्ट गैलरी ने तीन तकनीकों –
इंफ्रारेड रेफ्लेक्टोग्राफी, एक्स-रे फ्लोरोसेंस स्केनिंग और हायपर स्पेक्ट्रल इमेंजिंग – की मदद ली है।
इंफ्रारेड रेफ्लेक्टोग्राफी में
डाले गए इंफ्रारेड प्रकाश में ऊपरी रंगों के पीछे छिपे वे सभी ब्रश स्ट्रोक भी दिखाई
देते हैं जो सामान्य प्रकाश में दिखाई नहीं देते। इनसे पता चलता है कि इस पेंटिंग
में कलाकार ने पहले मैरी को बार्इं ओर बनाया था जो शिशु जीसस की ओर देख रही थी,
और फरिश्ता दार्इं ओर था। चित्रों से लगता है कि दा विंची
ने अंतत: जो पेंटिंग बनाई उसकी दिशा शुरुआती पेंटिंग से एकदम विपरीत है।
इसके अलावा एक्स-रे फ्लोरोसेंस
करने पर पता चला कि पीछे छिपे चित्र के रंगो में ज़िंक था। दरअसल ज़िंक के कण
एक्स-रे प्रकाश डालने पर चमकने लगते हैं। हायपर स्पेक्ट्रल इमेंजिंग में किसी चीज़
से आने वाली विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा का पता लगता है।
हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि दा विंची ने नीचे वाले चित्र को नई पेंटिंग से क्यों ढंका? वैसे यह पेंटिंग मूल पेंटिंग का दूसरा संस्करण है। उन्होंने अपनी मूल पेंटिंग चर्च के लिए बनाई थी जो किसी विवाद के बाद उन्होंने पेरिस में रहने वाले एक ग्राहक को बेच दी थी। उन्होंने दूसरी पेंटिंग हू-ब-हू पहली पेंटिंग की तरह बनाने की बजाय उसमें थोड़े बदलाव किए थे। जैसे दूसरी पेंटिंग में रंगों से उन्होंने अलग प्रकाश प्रभाव दिया है। चित्र में मौजूद लोगों की मुद्राएं भी थोड़ी अलग हैं। इमेंज़िंग से प्राप्त चित्रों का प्रदर्शन नवंबर से जनवरी के बीच किया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://news.artnet.com/app/news-upload/2019/08/leonardo-da-vinci-the-virgin-of-the-rock-underdrawing-594×1024.jpg
अमरीका में जल्द ही शुरू होने वाली 5जी सेवाओं पर मौसम
विज्ञानियों की चिंता है कि यदि आवंटित स्पेक्ट्रम पर 5जी सेवाएं शुरू हुर्इं तो
मौसम सम्बंधी भविष्यवाणी का काम प्रभावित होगा।
मार्च 2019 में फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन (FCC) द्वारा 5जी सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम
आवंटन किया गया था, जिसके बाद वायरलेस कंपनियां 24 गीगा हर्ट्ज़ पर 5जी सेवाएं
देना शुरु कर सकती हैं। 5जी शुरू होने के बाद सेवा की रफ्तार 100 गुना तक बढ़
जाएगी।
वहीं नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के प्रमुख नील जैकब्स की आशंका है कि 5जी का उपयोग मौसम पूर्वानुमान की सटीकता को 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है। तब मौसम भविष्यवाणी की स्थिति वैसी हो जाएगी जैसे 1980 के दशक में हुआ करती थी। जिससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को 2-3 दिन देर से चेतावनी मिल पाएगी। विसकॉन्सिन मेडिसन युनिवर्सिटी के मौसम विज्ञानी जॉर्डन गर्थ का कहना है कि दरअसल वायुमंडल में जलवाष्प मौजूदगी बताने वाले संकेत 23.6 गीगा हर्ट्ज़ से 24 गीगा हर्टज़ के बीच काम करते हैं और 5जी नेटवर्क 24 गीगा हर्ट्ज़ पर शुरू होगा। तो 5जी से होने वाला प्रसारण इन सेंसरों को आसानी से प्रभावित कर सकता है जैसे कोई शोरगुल करने वाला पड़ोसी हो।
लेकिन सेल्युलर टेलीकम्युनिकेशन इंडस्ट्री
संघ (CTIA) के उपाध्यक्ष ब्राड गिलेन का कहना है कि
मौसम पूर्वानुमान पर 5जी के प्रभाव पर जो गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं वे
गलत हैं। जो लोग 5जी के उपयोग पर रोक लगाना चाहते हैं वे यह सोच रहे हैं कि यह
मौसम के बारे में अनुमान देने वाले सेंसर,
कोनिकल माइक्रोवेव
इमेजर साउंडर (CMIS) को प्रभावित करेगा। लेकिन तथ्य यह है कि
इन्हें (CMIS) को 2006 में ही खारिज कर दिया गया था ये
कभी इस्तेमाल ही नहीं किए गए हैं।
इस पर गर्थ का कहना है कि CMIS के उन्नत तकनीक के सेंसर (एडवांस्ड
टेक्नॉलॉजी माइक्रोवेव साउंडर, ATMS) मौसम पूर्वानुमान में उपयोग किए जाते हैं
जो 23.8 गीगा हर्ट्ज़ पर काम करते हैं जो 5जी की सीमा के नज़दीक ही है। इस पर CTIA के निक ल्युडलम का कहना है कि CMIS की तुलना में ATMS सेंसर काफी छोटे हैं और उनकी रेंज सीमित है जिससे यह आसपास
की स्पेक्ट्रम के प्रति कम संवेदी है।
5जी के उपयोग के मसले पर मोबाइल कंपनियों
और अमरीकी सरकार के बीच असहमति और बहस तो कई महीनों से चल रही है लेकिन यह उजागर
कुछ समय पहले हुई है। लोग चाहते हैं कि 28 अक्टूबर को मिरुा में होने वाली वर्ल्ड
कम्युनिकेशन कॉन्फ्रेंस के पहले इस मुद्दे पर चल रही बहस को सुलझा लिया जाए।
वैसे यदि 5जी किसी अन्य स्पेक्ट्रम पर शुरू होता है तो वह भी नई बहस शुरू कर सकता है। गर्थ का कहना है कि 5जी के उपयोग पर विवाद तो 36-37 गीगा हर्ट्ज पर भी हो सकता है जिसका उपयोग बारिश और बर्फ गिरने के अनुमान के लिए किया जाता है या 50 गीगाहर्ट्ज़ पर भी हो सकता है जिस पर वायुमंडलीय तापमान का पता किया जाता है। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cnet2.cbsistatic.com/img/6JtSuF7ImhGHLbX4tC8bMbOba7U=/1092×0/2019/05/17/ca7dc5c9-83f8-4ed0-8c33-49c61391e026/weather-gettyimages-1030785334.jpg
देश के महानगरों और शहरों में जिस तेज़ी से वायु प्रदूषण बढ़
रहा है,
उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का
है। इस मुद्दे पर वर्षों से चिंता जताई जा रही है, लेकिन
ठोस परिणाम देखने में नहीं आ रहे हैं। वहीं देश में दो-पहिया और चार-पहिया वाहनों
की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है और रोज़ाना लाखों नए वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। आज
देश में पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले करोड़ों वाहन हैं, और
इनसे निकलने वाला काला धुआं कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है।
पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते भारत सरकार ने सन 2030 तक
बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने के लिए एक वृहद योजना तैयार की है।
उम्मीद की जा रही है कि पूरे देश में विद्युत वाहनों का उपयोग बढ़ने से बिजली
क्षेत्र में बड़ा बदलाव आएगा और उत्सर्जन में 40 से 50 प्रतिशत की कमी आएगी। इससे देश
में कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नीति आयोग की अगुवाई
में विद्युत गतिशीलता के मिशन को मंज़ूरी दी है। ध्यान रहे कि विद्युत गतिशीलता को
सार्वजनिक परिवहन से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार ने 2015 में हाइब्रिाड (बिजली और
र्इंधन दोनों से चलने वाले) और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से अपनाने और उनके
निर्माण की नीति शुरू की थी – फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हायब्रिाड
एंड इलेक्ट्रिक वेहिकल्स (एफएएमई)। इसका पुनरीक्षण किया जा रहा है। इसके तहत नीति
आयोग ने बिजली से चलने वाले वाहनों की ज़रूरत, उनके
निर्माण और इससे सम्बंधित ज़रूरी नीतियां बनाने की शुरुआत की है।
दरअसल,
भारत विद्युत वाहनों के लिए दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार
है। भारत में इस वक्त लगभग 4 लाख इलेक्ट्रिक दो-पहिया वाहन और 1 लाख ई-रिक्शा हैं, कारें तो हज़ारों की संख्या में ही हैं। सोसाइटी ऑफ मैन्युफैक्चरर्स ऑफ
इलेक्ट्रिक वेहिकल्स (एसएमईवी) के अनुसार, भारत
में 2017 में बेचे गए आंतरिक दहन इंजन वाहनों में से एक लाख से भी कम बिजली से
चलने वाले वाहन थे। इनमें से 93 प्रतिशत से अधिक इलेक्ट्रिक तीन-पहिया वाहन और 6
प्रतिशत दो-पहिया वाहन थे।
भारत भले ही इलेक्ट्रिक कारों में दूसरे देशों से पीछे हो, लेकिन बैटरी से चलने वाले ई-रिक्शा की बदौलत भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक मौजूदा समय में भारत में करीब 15 लाख ई-रिक्शा चल रहे हैं।
कंसÏल्टग फर्म ए.टी. कर्नी की एक
की रिपोर्ट में बताया गया है कि हर महीने भारत में करीब 11,000 नए ई-रिक्शा सड़कों
पर उतारे जा रहे हैं। भारत में अभी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चार्ज करने के लिए कुल
425 पॉइंट बनाए गए हैं। सरकार 2022 तक इन प्वाइंट्स को 2800 करने वाली है।
गौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की
मांग भी बढ़ रही है। उद्योग मंडल एसोचैम और अन्स्र्ट एंड यंग एलएलपी के संयुक्त
अध्ययन में कहा गया है कि सन 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की मांग
69.6 अरब युनिट तक पहुंचने का अनुमान है।
आलोचकों का तर्क यह भी है कि भारत में 90 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कोयले से
होता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक कारों से प्रदूषण कम करने की बात बेमानी लगती है।
नॉर्वे के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से कराए गए एक शोध के
मुताबिक बिजली से चलने वाले वाहन पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले वाहनों से कहीं
ज्यादा प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं। अध्ययन में कहा गया है कि यदि बिजली
उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल होता है तो इससे निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसें
डीज़ल और पेट्रोल वाहनों की तुलना में कहीं ज़्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। यही नहीं, जिन फैक्ट्रियों में बिजली से चलने वाली कारें बनती हैं वहां भी तुलनात्मक रूप
में ज़्यादा विषैली गैसें निकलती हैं। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इन खामियों
के बावजूद कई मायनों में ये कारें फिर भी बेहतर हैं। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है
कि ये कारें उन देशों के लिए फायदेमंद हैं जहां बिजली का उत्पादन अन्य स्रोतों से
होता है।
अपने देश में इलेक्ट्रिक वाहन चलाने के लिए पर्याप्त बिजली मिल सके, अभी इस पर काम किया जाना है। उसके लिए बुनियादी सुविधाओं, संसाधनों और बजट का प्रावधान किया जाना है। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बिजली चालित वाहन बड़ी तादाद में उतारे जा सकते हैं। ज़ाहिर है, बुनियादी सुविधाओं का बंदोबस्त सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s27836.pcdn.co/wp-content/uploads/2017/12/Air-pollution-electric-vehicles-electric-cars-technology-420×265.jpg
पिछली एक शताब्दी से
अधिक समय से हर वर्ष भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन किया जा रहा है जिसका मुख्य
उद्देश्य भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन देना है। आम
तौर पर ऐसे आयोजनों के बारे में चर्चा कम ही होती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वेद-पुराणों से विज्ञान को
जोड़कर देखने वाले दावों के कारण यह सुर्खियों में है। ऐसा नहीं है कि अवैज्ञानिक
और अतार्किक दावे पहले नहीं किए जाते थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अधिक देखने को
मिल रहे हैं।
वर्ष 2015 में इसी आयोजन में आनंद बोड़स और उनके साथी अमेय
जाधव ने वैदिक युग में विमानन पर एक ‘शोध पत्र’ प्रस्तुत किया था। उनका दावा था कि
केवल एक दिशा में उड़ने वाले आज के आधुनिक विमानों की तुलना में प्राचीन भारत के
विमान अधिक उन्नत थे और हर दिशा में उड़ने में सक्षम थे। ये विमान काफी विशाल थे
और अन्य ग्रहों पर भी उड़ान भर सकते थे। यह दावा करने वाले बोड़स स्वयं पायलट
प्रशिक्षण स्कूल, कोलकाता
के प्रधानाचार्य रहे हैं और फिलहाल एक स्कूल में शिक्षक हैं। उन्होंने अपने शोध
पत्र में प्रमाण के रूप में वैमानिकी
प्रकरण (वैमानिक शास्त्र) नामक ग्रंथ का हवाला दिया था।
जब भी हवाई जहाज़ के अविष्कार की बात होती है तो इसका श्रेय
राइट बंधुओं को दिया जाता है। लेकिन भारतीय विज्ञान कांग्रेस के इस पर्चे और फिर
कुछ न्यूज़ चैनलों और एक फिल्म (हवाईज़ादा) में बताया गया कि यह आविष्कार एक
भारतीय ने किया था। टी.वी. न्यूज़ चैनलों में बताया गया कि राइट बंधुओं ने हवाई
जहाज़ का आविष्कार 17 दिसंबर 1903 को किया था जबकि उससे लगभग आठ साल पहले शिवकर
बापूजी तलपदे नाम के एक मराठा ने 1895 में हवाई जहाज़ तैयार कर लिया था। बताया गया
कि यह हवाई जहाज़ 1500 फीट ऊपर उड़ा और फिर वापस नीचे गिर गया। इसका परीक्षण मुंबई
के एक समुद्र तट पर किया गया था।
तो सच्चाई क्या है? यहां दो सवाल हैं – पहला कि क्या तलपदे ने ऐसा कोई आविष्कार
किया था और दूसरा कि क्या उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा या जानकारी किसी प्राचीन
(वैदिक) ग्रंथ से मिली थी। इसी से जुड़ा तीसरा सवाल यह भी है कि क्या ऐसा कोई
वैदिक ग्रंथ अस्तित्व में भी है।
उड़ान के विवरण
शिवकर बापूजी तलपदे के जीवन और उनके आविष्कार का विवरण काफी
उलझा हुआ है। कुछ विवरणों के अनुसार, उन्होंने वैदिक ग्रंथ वैमानिकी प्रकरण में उल्लेखित विमानन
के विचारों को अपनाकर एक विमान बनाया था और बड़ौदा के तत्कालीन महाराज और कई अन्य
लोगों की उपस्थिति में 1895 में उड़ाया था। कुछ विवरण बताते हैं कि यह प्रयोग
उन्होंने मुंबई के नज़दीक मड टापू पर किया था जबकि अन्य विवरण गिरगांव चौपाटी को
मौका-ए-वारदात बताते हैं। कुछ ने दावा किया है कि तलपदे ने र्इंधन के रूप में पारे
का इस्तेमाल किया था, जबकि
अन्य का कहना है कि इसमें किसी प्रकार के मूत्र का उपयोग किया गया था।
तलपदे के जीवन पर सबसे विस्तृत विवेचन वास्तुविद इतिहासकार
प्रताप वेलकर ने लगभग 20 साल पहले लिखी अपनी किताब महाराष्ट्रचा उज्जवल इतिहास में
किया है। वेलकर ने बड़ौदा के महाराज के उपस्थित होने की बातों को खारिज करते हुए
कहा है कि यह एक खेल आयोजन की तरह था जिसमें तलपदे के कुछ साथी मौजूद थे।
वेलकर के अनुसार, तलपदे का विमान ‘मारुतसखा’ (कहीं-कहीं इसे ‘मारुतशक्ति’ भी
कहा गया है) बांस से बनी एक बेलनाकार संरचना थी। यह पंखों वाला ग्लाइडर नहीं था
जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है। ईंधन के रूप में तरल पारा इस्तेमाल किया गया था।
वेलकर के मुताबिक पारा सूर्य के प्रकाश के साथ अभिक्रिया करता है तो उससे
हाइड्रोजन उत्पन्न होती है। चूंकि हाइड्रोजन हवा की तुलना में हल्की है,
यह विमान को उड़ने में मदद करती है। वैसे
बाद में किसी ने यह भी कहा है कि दरअसल पारे का उपयोग पारे के आयनों की मदद से
विमान को उड़ाने का था। वेलकर कहते हैं कि विमान न तो बहुत ऊंचा उड़ा और ना ही हवा
में बहुत लंबे समय तक रहा। यह सिर्फ थोड़ी ऊंचाई तक गया और कुछ ही मिनटों में
दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस कथा के कई अलग-अलग विवरण उपलब्ध हैं।
हवाईज़ादा
वर्ष 2016 में इस विषय पर हवाईज़ादा नाम से एक बॉलीवुड
फिल्म रिलीज़ हुई थी। कहानी को रोचक बनाने के लिए कुछ और बाहरी विचारों को भी
शामिल किया गया। फिल्म के मुताबिक यह उड़ान सफल रही थी, और इसके आविष्कारक ने खुद इसे उड़ाया था। दूसरी ओर,
इस घटना के विवरणों में यह भी कहा गया है
कि कोशिश तो मानव रहित विमान बनाने की थी।
हवाईज़ादा के निर्देशक विभु पुरी का दावा है कि उन्होंने
करीब चार साल तक शोध किया है। उनके अनुसार कुछ चीज़ें विरोधाभासी लगीं,
इसलिए उन्होंने एक काल्पनिक संस्करण बनाया।
उनका कहना है कि उनकी फिल्म एक बायोपिक तो नहीं है लेकिन सच्ची घटनाओं पर आधारित
है। फिल्म में बापू तलपदे का किरदार निभाने वाले आयुष्मान खुराना का कहना है कि
हवाईज़ादा कोई डाक्यूमेंट्री नहीं है बल्कि मनोरंजन के लिए बनाई गई फिल्म है।
वैमानिक शास्त्र
कथित रूप से जिस वैमानिकी प्रकरण को पढ़कर व जिसके आधार पर
तलपदे ने मारुतसखा बनाया था उसके बारे में कहा जाता है कि हज़ारों साल पहले
भारद्वाज नाम के एक ऋषि ने उसकी रचना की थी। इसमें आठ अध्यायों में लगभग 3000
श्लोक हैं और दावा है कि वैदिक महाकाव्यों में वर्णित ‘विमान’ उन्नत स्तर की उड़ने
वाली मशीनें थीं।
इस विषय पर एक मराठी पुस्तक के लेखक आर्य समाज,
पुणे के सचिव माधव देशपांडे का दावा है कि
उन्हें तलपदे द्वारा हस्तलिखित कुछ नोट्स मिले हैं। देशपांडे का कहना है कि वायु
वेदनाओं का सिद्धांत हमारे वेदों में मौजूद था और बापू तलपदे ने उसी सिद्धांत को
साकार रूप प्रदान किया था।
दूसरी ओर, 1974
में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलुरु
के वैज्ञानिकों ने ग्रंथ में वर्णित सिद्धांतों की जांच करने के बाद एक अध्ययन
प्रकाशित किया, और
निष्कर्ष निकाला कि यह रचना प्राचीन तो कदापि नहीं है। उनके अनुसार यह ग्रंथ 1904
से पहले का कदापि नहीं है।
ग्रंथ के अध्ययन से यह भी साफ हो जाता है कि इसमें प्रस्तुत
अधिकांश सिद्धांत कामकाजी स्तर पर असंभव हैं। तलपदे द्वारा बनाए गए मॉडलों में कोई
भी उड़ने में सफल नहीं हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार ग्रंथ में वर्णित विमानों में
कोई वास्तविकता नहीं है बल्कि सब कुछ मनगढ़ंत है। आगे उनका कहना है कि ग्रंथ में
वर्णित किसी भी विमान में उड़ान भरने के गुण या क्षमताएं नहीं हैं। उड़ान के
दृष्टिकोण से इनकी संरचना अकल्पनीय रूप से भयावह है और प्रणोदन के जो सिद्धांत
इसमें प्रस्तुत किए गए हैं, वे
उड़ान में मदद करने के बजाय इसका प्रतिरोध करते हैं।
इसमें ‘समरांगण सूत्रधार’ नामक अध्याय में तो यह भी कहा गया
है कि इस ज्ञान का उपयोग बुरे उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाने लगे इसलिए इसके
निर्माण और अन्य विशेषताओं का विस्तृत वर्णन नहीं दिया जा सकता है। वैज्ञानिकों का
निष्कर्ष था कि “इतिहास में हमें दुर्भाग्यपूर्ण बात यह लगती है कि अतीत में कुछ
भी मिल जाए, तो
कुछ लोग बगैर किसी प्रमाण के उसका महिमामंडन और गुणगान करने लगते हैं। हमें लगता
है कि प्रकाशन से जुड़े लोग ही पांडुलिपियों के इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने या
छिपाने के लिए पूर्णत: दोषी हैं।”
वेलकर बताते हैं कि चौपाटी पर शो की विफलता के बाद,
तलपदे ने एक और विमान बनाने के लिए धन
जुटाने की कोशिश की। उन्होंने बड़ौदा के तत्कालीन महाराजा और अहमदाबाद में
व्यवसायियों के एक समूह से अपील भी की थी जिसका रिकॉर्ड भी मौजूद है। कुछ
संस्करणों में बताया गया है कि चौपाटी शो में इस्तेमाल किया गया क्षतिग्रस्त विमान
मुंबई के मलाड इलाके में एक गोदाम में रखा गया था। बाद में विमान को टाटा कंपनी के
रैलिस ब्रादर्स को बेच दिया गया था, जबकि कुछ अन्य लोगों के अनुसार इसे बैंगलुरु में हिंदुस्तान
एयरोनॉटिक्स को दे दिया गया था। जब वेलकर ने इसकी और जानकारी प्राप्त करने की कोशिश
की तो पता चला कि इससे जुड़े कागज़ात केंद्रीय रक्षा मंत्रालय में हैं। जिस अंतिम
व्यक्ति ने इनका विस्तार से अध्ययन किया था उन्होंने बताया कि तलपदे असफल रहे थे।
उड़ने की कल्पना तो बहुत लोगों ने की है। शिवकर बापूजी
तलपदे का काम भले ही कामयाब न रहा हो लेकिन वास्तव में विमान तैयार करना कोई
मामूली बात नहीं। हो सकता है उनका विमान कथित वैमानिक शास्त्र में हवाई जहाज़ के
कथित वर्णन से प्रेरित था, मगर
मुख्य बात यह है कि उन्होंने इस पर काम किया था, इसे साकार रूप देने की कोशिश की थी। वेलकर के अनुसार विमान
तैयार करने के लिए बापूजी तलपदे ने काफी कोशिश की होगी।
उनकी इस कहानी को स्कूल सिलेबस में शामिल करवाने के लिए एक
ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था। कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि अंग्रेज़
नहीं चाहते थे कि कोई भारतीय पहले हवाई जहाज़ का निर्माण करे,
इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि तलपदे
का काम असफल रहे और वे इस विषय में शोध जारी ना रख सकें।
यह बात तो सही है कि ऐसे योगदान पर चर्चा ज़रूर होनी चाहिए
और इसे किताबों के माध्यम से छात्रों को बताने में भी कोई हर्ज नहीं है। लेकिन
मुख्य बात तो यह है कि छात्रों को इस बारे में क्या पढ़ाया जाए। ठोस सबूतों के
अभाव में, हम यह नहीं कह सकते
कि यह प्रयास सफल रहा था। लेकिन यह सिखाना भी गलत न होगा कि तलपदे ने कोशिश की थी,
जो अधिक महत्वपूर्ण है।
जब कभी भी ‘प्राचीन प्रौद्योगिकी’ के शिक्षण की बात हो तो लगन और उद्यमिता की भावना को विकसित करना चाहिए। आज के हज़ारों-लाखों शिवकर बापूजी तलपदे को कोशिश करने और असफल होने के लिए तैयार होना चाहिए क्योंकि कई असफलताएं ही सफलता के एक दुर्लभ क्षण को संभव बनाती हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://img.huffingtonpost.com/asset/5c3515392400003300c3ff41.jpeg?ops=scalefit_630_noupscale https://img.huffingtonpost.com/asset/5c3515392400003500c3ff3f.jpeg?ops=scalefit_630_noupscale https://img.huffingtonpost.com/asset/5c3515393c00005006102633.jpeg?ops=scalefit_630_noupscale
अभी कुछ महीनों पहले
खबर आई थी कि वैज्ञानिकों ने अब तक की सबसे बड़ी अभाज्य (प्राइम) संख्या ढूंढ ली
है। यह संख्या है 28,25,89,933-1। इस संख्या में 2 करोड़ 48 लाख 62
हज़ार 48 अंक हैं। यदि इस संख्या को साधारण कॉपी पर लिखें तो तकरीबन 40 पन्ने भर
जाएंगे। ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिकों ने पहली बार बहुत बड़ी प्राइम संख्या पता की
हो। इसके पहले उन्होंने जो संख्या पता की थी वह 27,72,32,917-1 थी।
लेकिन क्यों वे बड़ी-से-बड़ी अभाज्य संख्याएं पता करना चाहते हैं।
इसे जानने से पहले हम थोड़ा अभाज्य संख्या के बारे में समझ
लेते हैं। अभाज्य संख्या वह प्राकृत संख्या है जो सिर्फ 1 और स्वयं उसी संख्या द्वारा
विभाजित होती है, इन
संख्याओं में अन्य किसी संख्या से पूरा-पूरा भाग नहीं जाता। जैसे – 2,
3, 5, 7,
11, 17…। अभाज्य संख्याएं अनंत हैं। इन संख्याओं की कुछ
खूबियां भी हैं। जिनके कारण इनकी उपयोगिता है।
वैसे जब हमें स्वास्थ्य, चिकित्सा, नई
तकनीक आदि से जुड़ी खोज या आविष्कार की खबरें मिलती हैं तो हमारे मन में कभी यह
सवाल नहीं उठता कि इनकी खोज की क्या ज़रूरत है। लेकिन जब यह सुनने में आता है कि
वैज्ञानिकों ने अब और भी बड़ी अभाज्य संख्या पता की है तो मन में सवाल उठता है कि
इतनी बड़ी संख्या पता करने की क्या ज़रूरत है जबकि हम अपनी आम ज़िंदगी में इतनी
बड़ी संख्याओं के साथ काम भी नहीं करते और वे भी अभाज्य संख्या।
सच्चाई इसके विपरीत है। सीधे तौर पर ना सही,
लेकिन वर्तमान में इन संख्याओं का हम अपनी ज़िंदगी
में भरपूर उपयोग करते हैं। आज अधिकतर लोग टेलीफोन, इंटरनेट सेवाओं, स्टोरेज डिवाइस, क्रेडिट कार्ड, एटीम, स्मार्ट
फोन, ऐप्स,
गेम्स, व्हाट्सऐप जैसे मेसेंजर ऐप्स वगैरह कई तकनीकों का उपयोग
करते हैं और इनका उपयोग दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। यदि हम इन तकनीकों का निश्चितता
से और सुरक्षित ढंग से उपयोग कर पाते हैं, तो इसका श्रेय काफी हद तक अभाज्य संख्याओं को जाता है।
जितनी तेज़ी से इंटरनेट सुविधाओं, कंप्यूटर जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है,
उतना अधिक हमारा महत्वपूर्ण डैटा डिजिटल
रूप में स्टोर और ट्रांसफर हो रहा है। सूचना या डैटा महत्वपूर्ण है तो उसे
सुरक्षित रखने की भी ज़रूरत है। इसलिए डैटा को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न कूटलेखन
सूत्रविधियों (एल्गोरिदम) का सहारा लिया जाता है। (कूटलेखन किसी संदेश को कूट
संदेश यानी सीक्रेट मैसेज में बदलने का तरीका है ताकि वांछित व्यक्ति ही उसे पढ़
सके।) और इन कूटलेखन सूत्रविधियों में अभाज्य संख्याओं की अहम भूमिका है।
सुरक्षित तरीके से संदेश भेजने में अक्सर आरएसए एल्गोरिद्म
का उपयोग किया जाता है। आरएसए एल्गोरिदम का आविष्कार मूलत: तीन गणितज्ञों ने
संयुक्त रूप से किया था: रॉन रिवेस्ट, अदी शमीर और लियोनार्ड एडलमैन। तब से इसमें कई सुधार हो
चुके हैं।
इस एल्गोरिद्म में दो कुंजियों (key) का इस्तेमाल किया जाता है: सार्वजनिक या पब्लिक कुंजी और
निजी या प्रायवेट कुंजी। जैसा कि नाम से ज़ाहिर है सार्वजनिक कुंजी सभी को उजागर
होती है जबकि निजी कुंजी गुप्त रखी जाती है। जिसे संदेश भेजा जाना है उसकी
सार्वजनिक कुंजी से संदेश को कूटबद्ध किया जाता है। और संदेश पाने वाला उसे अपनी
निजी कुंजी की मदद से पढ़ लेता है। ये दोनों कुंजियां संदेश प्राप्त करने वाले
द्वारा बनाई जाती हैं। वह सार्वजनिक कुंजी तो जगज़ाहिर कर देता है लेकिन निजी
कुंजी गुप्त रखता है।
कुंजियां
सार्वजनिक कुंजी वास्तव में दो संख्याएं होती है। इसमें
पहली संख्या किन्हीं भी दो प्राइम संख्याओं का गुणनफल होती है,
और दूसरी संख्या इन दोनों प्राइम संख्याओं
के आधार पर तय की जाती है। इसी तरह निजी कुंजी भी दो संख्याएं होती हैं।
यहां एक उदाहरण की मदद से इन कुंजियों के निर्माण की
प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। यहां हम सार्वजनिक कुंजी को N व e से और निजी कुंजी को d से प्रदर्शित करेंगे।
N का चुनाव
1. पहले कोई भी दो प्राइम संख्याएं चुनी जाती हैं। माना कि
हमने यहां 11 और 17 चुनी।
2. फिर N की गणना के लिए इन
दोनों प्राइम संख्याओं का आपस में गुणा किया जाता है (11 × 17)। और प्राप्त गुणनफल
N
होता है। यानि N = 187।
e का चुनाव
1. सबसे पहले चुनी गई दोनों प्राइम संख्याओं (11 और 17) में
से एक-एक घटाते हैं।
2. इस तरह प्राप्त संख्याओं (10 और 16) का आपस में गुणा
करते हैं (प्राप्त गुणनफल को हम Q कहेंगे)।
3. e के लिए एक ऐसी संख्या चुनी जाती है जो Q से छोटी हो और उसका Q में पूरा-पूरा भाग
ना जाता हो। यहां Q = 160। तो e के लिए 160 से छोटी कोई भी संख्या चुनी जा सकती है जिसका
160 में पूरा-पूरा भाग ना जाता हो। चलिए e के लिए 7 चुन लेते
हैं। तो सार्वजनिक कुंजी हुई (N =187, e = 7)
d का चुनाव
1. सबसे पहले Q में 1 जोड़ा जाता है, 160 अ 1 = 161।
2. अब इस प्राप्त संख्या में e से भाग दिया जाता
है। प्राप्त भागफल d होता है। यहां, 161 में 7 का भाग देने पर प्राप्त भागफल 23 है। तो निजी
कुंजी यानी d है 23।
कूटलेखन
संदेश भेजने की प्रक्रिया में सबसे पहले जो भी संदेश भेजा
जाना है उसे किसी एल्गोरिद्म की मदद से संख्या में बदला जाता है। फिर सार्वजनिक
कुंजी की सहायता से संदेश कूट किया जाता है। माना कि भेजा जाने वाला संदेश है 3।
सार्वजनिक कुंजी 187 व 7 है।
1. संदेश कूट करने के लिए पहले (संदेश संख्या)e की गणना की जाती है।
यहां e = 7
है। इस प्रकार 37 (3×3×3×3×3×3×3) हल करने पर मिला 2187।
2. अब प्राप्त संख्या में N से भाग दिया जाता
है। फिर जो शेषफल बचता है वही संदेश के रूप में भेजा जाता है। यहां 2187 में 187
का भाग देने पर शेषफल बचा 130। तो भेजा जाने वाला कूट संदेश है 130।
3. निजी कुंजी (d) की मदद से संदेश पढ़ा जाता है। यहां हमारी निजी कुंजी है
23। तो संदेश पढ़ने के लिए सबसे पहले (प्राप्त संदेश)d हल किया जाता है,
यहां (130)23। इसका मतलब है कि
130 में 130 का गुणा 23 बार किया जाएगा।
4. हल करने पर प्राप्त संख्या में N से भाग दिया जाता
है। भाग देने पर जो शेषफल मिलता है वही संदेश होता है। यहां हल करने पर मिला
41753905 × 1041। इसे 187 से भाग देने पर जो शेषफल मिला वह 3 होगा। और
यही हमारा वास्तविक संदेश था।
गौर करने वाली बात है कि हमने उदाहरण के लिए छोटी अभाज्य
संख्याओं का चुनाव किया, वास्तव
में ये संख्याएं काफी बड़ी होती हैं।
लेकिन बड़ी प्राइम संख्याएं ही क्यों?
दरअसल एक से बड़ी किसी भी संख्या के
गुणनखंड अभाज्य संख्याओं के रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए 70 को
2×5×7 के रूप में लिखा जा सकता है। इन्हें अभाज्य गुणनखंड कहते हैं। गणितज्ञों के
अनुसार किन्हीं भी दो बड़ी अभाज्य संख्याओं का गुणनफल पता करना तो आसान है लेकिन
अभाज्य गुणनखंड पता करना काफी मुश्किल है, यहां तक कि सुपर कंप्यूटर के लिए भी। ऐसा नहीं है कि बहुत
बड़ी संख्याओं के अभाज्य गुणनखंड पता नहीं किए जा सकते। पता तो किए जा सकते हैं
लेकिन बहुत अधिक समय लगता है, शायद
कई वर्ष। इसलिए अभाज्य संख्याएं जितनी बड़ी होंगी डैटा उतना अधिक सुरक्षित रहेगा।
कूटलेखन का उपयोग इंटरनेट के ज़रिए पैसों के लेन-देन की
सुरक्षा में, नियत
समय में संदेश पहुंचाने में, सूचना
भेजे जाने वाले व्यक्ति के प्रमाणीकरण या सत्यापन (डिजिटल सिग्नेचर) में,
क्रेडिट कार्ड, एटीएम, ई-मेल,
स्टोरेज डिवाइस की सुरक्षा वगैरह में होता
है। इन सभी जगह प्राइम संख्या का उपयोग होता है।
इसके अलावा प्राइम संख्याएं रैंडम नंबर पैदा करने वाली
एल्गोरिद्म में उपयोग होती हैं। यानी जहां भी संख्याओं में बेतरतीबी की ज़रूरत
होती है वहां ये एल्गोरिद्म काम करती हैं। जैसे सुरक्षित लेन-देन के लिए ओटीपी
नंबर (वन टाइम पासवर्ड) में, ऑनलाइन
कैसिनो में पत्ते निकालने या पांसे पर आने वाली संख्या तय करने में। इंटरनेट पर
बने किसी भी एकाउंट में लॉग-इन करते वक्त पासवर्ड का मिलान किया जाता है,
चूंकि इस मिलान को कम-से-कम समय में अंजाम
देना होता है इसलिए यहां हैश-टेबल की मदद ली जाती है। और हैश-टेबल में भी प्राइम
संख्या का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा हैश टेबल सर्फिंग या सर्चिंग जैसे
किसी शॉपिंग साइट में चीज़ों को जल्दी ढूंढ निकालने में भी मददगार होती है।
कई खेलों को बनाने में भी अभाज्य संख्याओं का उपयोग किया
जाता है। जैसे कैंडी क्रश खेल में कई गणितीय अवधारणाओं का उपयोग किया गया है और
इनमें अभाज्य संख्याओं का उपयोग किया गया है। तो जब भी हम इनमें से किन्हीं भी
सुविधाओं का उपयोग कर रहे होते हैं तब अनजाने में अभाज्य संख्या का भी उपयोग करते
हैं।
वैसे प्रकृति में भी अभाज्य संख्याएं दिखाई देती हैं। जैसे सिकाडा कीट लंबे समय तक ज़मीन के अंदर रहते हैं और 13 या 17 साल बाद ज़मीन से बाहर निकलते हैं और प्रजनन करते हैं ताकि वे अपने शिकारियों से सुरक्षित रहें। आप स्वयं सोचिए कि इससे सुरक्षा कैसे मिलती है। (स्रोत फीचर्स)
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एजेंसी
फ्रांस प्रेस के अनुसार 19 जुलाई को चीनी अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-2 अपनी कक्षा
छोड़ धरती पर गिर गया। लेकिन पिछली बार के विपरीत,
इस दौरान पूरे समय इस पर चीन के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का
नियंत्रण रहा।
चीनी
राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (CNSA)
पहले ही यह बता चुका था कि चीन का दूसरा प्रायोगिक अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-2
अपनी कक्षा छोड़ने वाला है और पृथ्वी के वायुमंडल में पुन: प्रवेश करने वाला है।
प्रशासन के अनुसार पुन: प्रवेश के दौरान तियांगोंग-2 वायुमंडल में पूरी तरह जल
जाएगा और यदि कुछ बचा तो वह प्रशांत महासागर के पाइंट नेमो नामक इलाके में गिरेगा।
लेकिन यह स्थिति चीन के पहले अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-1 से भिन्न है। उसने भी अप्रैल
2018 में अपनी कक्षा छोड़ दी थी और पृथ्वी पर अनियंत्रित तरीके से आ गिरा था।
लेकिन तियांगोंग-1 पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। हालांकि संयोग से तियांगोंग-1
भी प्रशांत महासागर के इसी इलाके में गिरा था।
तियांगोंग-2 उत्तरी बॉटलनोज़ व्हेल से थोड़ा बड़ा, 10 मीटर लंबा और 8600 किलोग्राम वज़नी था। इस अंतरिक्ष स्टेशन में 18 मीटर लंबे सौलर पैनल थे जिससे यह अजीब-सी व्हेल मछली की तरह दिखता था।
अंतरिक्ष प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि तियांगोंग-2 ने अपने सारे प्रयोग पूरे कर लिए थे। और इसने अपनी 2 साल की तयशुदा उम्र से एक साल अधिक कार्य किया। स्पेस डॉटकॉम के मुताबिक इस दौरान तियांगोंग-2 ने एक बार (अक्टूबर-नवंबर 2016 में) दो अंतरिक्ष यात्रियों और कई रोबोटिक मिशन की मेज़बानी की थी। (स्रोत फीचर्स)
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अपोलो 11 यान के चांद पर उतरने की आधी शताब्दी के बाद भी कई
लोग इस घटना को झूठा मानते हैं। आम तौर पर कहा जाता रहा है कि फिल्म निर्देशक
स्टेनली कुब्रिक ने चांद पर उतरने के छह ऐतिहासिक झूठे फुटेज तैयार करने में नासा
की मदद की।
लेकिन क्या वास्तव में उस समय की उपलब्ध
तकनीक से ऐसा कर पाना संभव था? एमए-फिल्म और टेलीविज़न प्रोडक्शन के
प्रमुख हॉवर्ड बैरी का कहना है कि एक फिल्म निर्माता के रूप में वह यह तो नहीं बता
सकते कि नासा का यान 1969 में चांद पर कैसे पहुंचा था लेकिन दावे के साथ कह सकते
हैं कि इन ऐतिहासिक फुटेज का झूठा होना असंभव है। उन्होंने इस सम्बंध में कुछ आम
मान्यताओं और सवालों का जवाब दिया है।
आम तौर इस घटना को एक स्टूडियो में फिल्माए
जाने की बातें कही गई हैं। गौरतलब है कि चलती छवियों को कैमरे में कैद करने के दो
तरीके होते हैं। एक तो फोटोग्राफिक सामग्री का उपयोग करके और दूसरा चुम्बकीय टेप
का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिक तरीके से। एक मानक मोशन पिक्चर फिल्म 24 फ्रेम प्रति
सेकंड से छवियों को रिकॉर्ड करती है, जबकि प्रसारण टेलीविज़न आम तौर पर 25 से 30
फ्रेम प्रति सेकंड का होता है। यदि हम यह मान भी लें कि चंद्रमा पर उतरना टीवी
स्टूडियो में फिल्माया गया था तो वीडियो उस समय के मानक 30 फ्रेम प्रति सेकंड का
होना चाहिए था। हम जानते हैं कि चंद्रमा पर प्रथम अवतरण को स्लो स्कैन टेलीविज़न
(एसएसटीवी) के विशेष कैमरे से 10 फ्रेम प्रति सेकंड पर रिकॉर्ड किया गया था।
एक बात यह भी कही जाती है कि वीडियो फुटेज
को किसी स्टूडियो में विशेष अपोलो कैमरा पर रिकॉर्ड करके स्लो मोशन में प्रस्तुत
किया गया ताकि यह भ्रम पैदा किया जा सके कि पूरी घटना कम गुरुत्वाकर्षण के परिवेश
में फिल्माई गई है। गौरतलब है कि फिल्म को धीमा करने के लिए ऐसे कैमरे की ज़रूरत
होती है जो प्रति सेकंड सामान्य से अधिक फ्रेम रिकॉर्ड करने में सक्षम हो। इसे
ओवरक्रैंकिंग कहा जाता है। जब ऐसी फिल्म को सामान्य फ्रेम दर पर चलाया जाता है तो
यह लंबे समय तक चलती है। यदि आप अपने कैमरे को ओवरक्रैंक नहीं कर सकते हैं तो
सामान्य फ्रेम दर पर रिकॉर्ड करके कृत्रिम रूप से फुटेज को धीमा कर सकते हैं।
लेकिन उसके लिए आपको अतिरिक्त फ्रेम उत्पन्न करने की तकनीक की आवश्यकता होगी
अन्यथा बीच-बीच में खाली जगह छूटेगी।
अपोलो अवतरण के ज़माने में स्लो मोशन को
रिकॉर्ड करने में सक्षम चुंबकीय रिकॉर्डर कुल 30 सेकंड का ही फुटेज रिकॉर्ड कर
सकते थे। इसे 90 सेकंड के स्लो मोशन वीडियो के रूप में चलाया जा सकता था। लेकिन
यदि आपको 143 मिनट का स्लो मोशन फुटेज चाहिए तो वास्तविक घटना का 47 मिनट का
रिकॉर्डिंग करना होता। यह उस समय असंभव था।
यह भी शंका व्यक्त की गई है कि नासा के पास
उन्नत स्टोरेज रिकॉर्डर था। लोग मानते हैं कि नासा के पास अत्यधिक उन्नत
टेक्नॉलॉजी सबसे पहले आ जाती है। बैरी कहते हैं कि हो सकता है कि नासा के पास उस
समय कोई गुप्त एडवांस स्टोरेज रिकॉर्डर रहा हो लेकिन वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध
रिकॉर्डर से 3000 गुना अधिक उन्नत रहा होगा,
जो संभव नहीं
है।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नासा ने पहले
साधारण फोटोग्राफिक फिल्म पर रिकॉर्डिंग किया और फिर उसे धीमा करके चलाया और टीवी
पर प्रदर्शन के लिए परिवर्तित कर लिया। फिल्म तो जितनी चाहे उपलब्ध हो सकती थी!
थोड़ी गणना करते हैं। 24 फ्रेम प्रति सेकंड
पर चलने वाली 35 मि.मी. फिल्म की एक रील 11 मिनट तक चलती है और उसकी लम्बाई लगभग
1,000 फुट होती है। अगर हम इसे 12 फ्रेम प्रति सेकंड की फिल्म पर लागू करें तो
अपोलो-11 के 143 मिनट के फुटेज के लिए कुल साढ़े छह रीलों की आवश्यकता होगी।
फिर शूटिंग के बाद इन्हें एक साथ जोड़ना
पड़ता। जोड़ने के निशान, नेगेटिव्स के स्थानांतरण और प्रिंट निकालने के अलावा संभावित धूल, कचरा या खरोंचों के निशान सारा सच बयान कर
देते। लेकिन अपोलो-11 अवतरण की फिल्म में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता। मतलब साफ है कि
इसे फोटोग्राफिक फिल्म पर शूट नहीं किया गया था।
यह भी कहा गया है कि चांद पर तो हवा है
नहीं, फिर अमेरिका का झंडा हवा से फहरा क्यों रहा है? ज़रूर
यह स्टूडियो में लगे पंखे का कमाल है। सच्चाई यह है कि एक बार लगाए जाने के बाद
पूरे फुटेज में कहीं भी झंडा हिलता हुआ नज़र नहीं आ रहा है, फहराने
की तो बात ही जाने दें।
कुछ लोगों को लगता है कि फुटेज में स्पष्ट
रूप से स्पॉटलाइट का प्रकाश नज़र आ रहा है। इस पर बैरी कटाक्ष करते हुए कहते हैं
कि सही है। वह प्रकाश 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित एक स्पॉटलाइट से आ रहा है, जिसे
हम सूरज कहते हैं। उनका कहना है कि यदि स्पॉटलाइट नज़दीक होता तो छाया एक
केन्द्रीय बिंदु से उत्पन्न होती, लेकिन रुाोत इतनी दूर है कि परछाइयां
अधिकांशत: समानांतर हैं।
अंत में बैरी का कहना है कि जो लोग मानते हैं कि इसे स्टेनली कुब्रिक ने फिल्माया था तो उन्हें यह बता दें कुब्रिक इतने परफेक्शनिस्ट (सटीकतावादी) थे कि वे इस फिल्म को लोकेशन यानी चांद पर ही शूट करने पर ज़ोर देते। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.abc.net.au/news/image/4166712-3×2-700×467.jpg
पूर्व में शोधकर्ताओं द्वारा ऐसे उपकरण विकसित किए जा चुके
हैं जो कोनों के पीछे ओझल चीज़ों को देखने के लिए प्रकाश तरंगों का उपयोग करते थे।
इस प्रक्रिया में प्रकाश तरंगों को कोनों पर टकराकर उछलने दिया जाता था ताकि जो
वस्तुएं आंखों की सीध में नहीं हैं उन्हें भी देखा जा सके। हाल ही में इसी से
प्रेरित एक प्रयोग में वैज्ञानिकों के एक अन्य समूह ने प्रकाश तरंगों की बजाय
ध्वनि का प्रयोग किया। माइक्रोफोन और कार में उपयोग किए जाने वाले छोटे स्पीकरों
की सहायता से एक खंभे जैसा हार्डवेयर तैयार किया गया है।
ये स्पीकर ध्वनियों की एक शृंखला उत्सर्जित करते हैं जो एक दीवार पर एक कोण पर
टकराने के बाद दूसरी दीवार पर छिपी हुई वस्तु पर पड़ती है। वैज्ञानिकों ने दूसरी
दीवार पर H अक्षर का एक पोस्टर बोर्ड रखा था। इसके बाद उन्होंने इस उपकरण को धीरे-धीरे
घुमाया और हर बार अधिक ध्वनियों की संख्या बढ़ाते गए। हर बार ध्वनियां एक दीवार से
परावर्तित होकर दूसरी दीवार पर रखे पोस्टर बोर्ड से टकराकर माइक्रोफोन में वापस
आई।
भूकंपीय इमेजिंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हुए उनके यंत्र ने H अक्षर की एक मोटी-मोटी छवि बना दी। शोधकर्ताओं ने एल (L) और टी (T) अक्षरों के साथ भी प्रयोग किया और अपने परिणामों की तुलना प्रकाशीय विधि से
की। प्रकाशीय विधि, जिसके लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती
है,
अधिक दूरी के L की छवि
बनाने में विफल रही। इसके साथ ही ध्वनि-आधारित विधि में केवल 4-5 मिनट लगे जबकि
प्रकाशीय विधि में एक घंटे से अधिक समय लगता है। शोधकर्ता अपने इस कार्य को
कंप्यूटर विज़न एंड पैटर्न रिकॉग्निशन काफ्रेंस में प्रस्तुत करेंगे।
इस तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता में अभी काफी समय है, लेकिन शोधपत्र के लेखकों का ऐसा मानना है कि आगे चलकर इस तकनीक का उपयोग वाहनों में अनदेखी बाधाओं को देखने के लिए किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/corners_16x9.jpg?itok=TUfGbtX5
‘तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होगा।’ यह आश्वासन था महिला सोनोग्राफर
का। न कोई इंजेक्शन, न निश्चेतक। वह केवल एक ठंडी और चिकनी जेल
काफी मात्रा में मरीज़ की छाती पर पोत देती है। वॉशिंग मशीन के बराबर स्कैनर को
ठेलती हुई वह मरीज़ के पलंग के पास लाती है। उसके ऊपर टेलीविज़न स्क्रीन लगा है।
फिर वह एक छोटे माइक्रोफोन से मिलते-जुलते ट्रांसड्यूसर को मरीज़ की पांचवीं और
छठी पसली के बीच में रखती है।
मशीन को चालू करने के बाद वीडियो पर एक
विचित्र-सी चीज़ का चित्र प्रकट होता है जिसका गड्ढेनुमा मुंह लयबद्ध तरीके से
फूलता और पिचकता है। यह होता है परा-ध्वनि (अल्ट्रासाउंड) की सहायता से, जिसकी ध्वनि तरंगों की आवृत्ति इतनी अधिक है कि मनुष्य
उन्हें नहीं सुन सकते। मरीज़ अपने धड़कते हुए ह्मदय के महाधमनी वाल्व को खुलते और
बंद होते देख रहा है। एकदम भीतर तक उतर जाने वाली यह दृष्टि चिकित्सा के लिए एक
क्रांतिकारी आयाम है। अब चिकित्सक बगैर चीरफाड़ शरीर के लगभग हर भाग की गहन जांच
कर सकते हैं।
पराध्वनि तरंगों की मदद से देखा जा सकता है
कि कौन-सी धमनियां मोटी या अवरुद्ध हो गई हैं, किन
मांसपेशियों को रक्त नहीं मिल पा रहा है। वास्तव में शरीर के लगभग हर भाग की ऐसी
जांच संभव है। चिकित्सक ग्रंथियों, घावों, अवरोधों के बारे में पता लगा सकते हैं।
जांच के अलावा परा-ध्वनि तरंगों को लेंस की
मदद से संकेंद्रित किया जा सकता है जिससे वे शरीर के भीतर एक सूक्ष्म स्थान पर
प्रहार कर सकें। नेत्र रोग विशेषज्ञ इनका प्रयोग आंखों के ट्यूमर का उपचार करने के
अलावा उस दबाव को कम करने में भी करते हैं जिससे मोतियाबिंद होता है। अति तीव्र
पराध्वनि की केवल एक चोट गुर्दे की पथरी को चूर-चूर कर देती है, और पीड़ादायक ऑपरेशनों की ज़रूरत ही नहीं रहती।
एक्सरे के विपरीत परा-ध्वनि के कोई
दुष्प्रभाव नहीं हैं। लगभग हर किस्म की जांच में इनका प्रयोग किया जा सकता है।
जांच के अन्य तरीकों की तुलना में यह तेज़ भी है और सस्ता भी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समुद्र की
गहराइयों को नाप कर जर्मन पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए ईजाद किया गया
प्रतिध्वनि मापी परा-ध्वनि पर आधारित था। ध्वनि तरंगों के रास्ते में कोई वस्तु आए
(चाहे वह समुद्र में पनडुब्बी हो, हमारे कान के पर्दे
हों या स्टील के टुकड़े में दरार हो) तो तरंगें टकरा कर बिखर जाती हैं और कुछ वहीं
लौट आती हैं, जहां से शुरू हुई थीं। इस तरह प्राप्त
प्रतिध्वनियों को एकत्रित करके इलेक्ट्रॉनिक के ज़रिए चित्र में परिवर्तित किया जा
सकता है।
प्रतिध्वनि चित्र द्वारा शारीरिक जांच का
विचार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपजा था। पर वे चित्र इतने अस्पष्ट थे कि उनसे
विश्वसनीय निदान नहीं हो सकते थे। सत्तर के दशक में सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रॉनिक
तकनीक के विकास के कारण बहुत सारी जानकारी का लगभग तत्क्षण विश्लेषण किया जाने
लगा।
उपरोक्त ट्रांसड्यूसर में पिन के सिरे के
आकार के 64 लाउडस्पीकर लगे थे। हर लाउडस्पीकर मरीज़ की त्वचा से ध्वनि के अविश्वसनीय
25 लाख स्पंदन प्रति सेकंड भेजता है, और
लौटती हुई मंद प्रतिध्वनियों को सुनता है। कंप्यूटर गणना करता है कि वे कितने
सेंटीमीटर तक चली हैं और तुरंत उस जानकारी को एक चित्र में परिवर्तित कर देता है।
अपने अनुभवी हाथों से ट्रांसड्यूसर को
फिराती हुई महिला सोनोग्राफर ह्मदय के विभिन्न वाल्व और प्रकोष्ठों के चित्र दिखा
सकी। मरीज़ अपने मिट्रल वाल्व को भी तितली के पंख की तरह फड़फड़ाते देख सकता था।
एक महिला मरीज़ को सांस लेने में कठिनाई हो
रही थी। महिला सोनोग्राफर स्कैनर को उसके पास लाई और कुछ ही क्षणों में उसकी तकलीफ
स्पष्ट दिखाई दी। ह्मदय के आसपास तरल पदार्थ इकट्ठा हो कर उसे दबा रहा था जिससे
उसके प्रकोष्ठ हवा नहीं भर पा रहे थे। उसका ह्मदय किसी भी क्षण रुक सकता था। रोग
का पता तुरंत चल गया और तरल पदार्थ को निकाल दिया गया।
अगर तब परा-ध्वनि उपलब्ध नहीं होता तो रोग
का पता चलाने के लिए चिकित्सकों को एक्सरे और अन्य चिकित्सा तकनीकों की सहायता
लेनी पड़ती या फिर तारों को शिराओं में घुसाकर ह्मदय तक पहुंचाने वाला लंबा और
अंतरवेधी तरीका अपनाना पड़ता।
परा-ध्वनि गर्भवती महिलाओं के लिए भी
उपयोगी है। क्या बच्चे जुड़वां हैं? क्या शिशु ठीक जगह पर
है? क्या उसका दिल धड़क रहा है? परा-ध्वनि की सहायता से शल्य चिकित्सक भ्रूण का ऑपरेशन भी
कर सकते हैं।
पूर्व में यकृत के कुछ रोगों का पता कई
सप्ताहों तक किए जाने वाले जटिल रक्त परीक्षणों या फिर जोखिम भरे ऑपरेशन के बाद
चलता था। परा-ध्वनि की सहायता से चिकित्सक तुरंत ही अवरोध या घाव को देख सकते हैं, एकदम सही स्थान पर सुई डाल कर परीक्षण के लिए कोशिकाएं
प्राप्त कर सकते हैं और कुछ ही घंटों के भीतर रोग का कारण, गंभीरता
और विस्तार जान सकते हैं।
चिकित्सा के अलावा भी परा-ध्वनि से तकनीकी
उपलब्धियों के नए आयाम खुले हैं। प्रबल ध्वनि तरंगें प्लास्टिक और पोलीमर को
जोड़ने का काम करती हैं। वैक्यूम क्लीनर के थैले, जूस
के गत्ते के डिब्बे, कैसेट टेप, डिब्बे
वगैरह परा-ध्वनि द्वारा पैक किए जाते हैं। और आपको अंगवस्त्र या मूंगफलियों का
पैकेट खोलने में जो मुश्किल होती है वह इसलिए कि उनके जोड़ों को संकेंद्रित
परा-ध्वनि से तब तक गरम किया जाता है जब तक वे पिघलते नहीं और दोनों भाग जुड़कर एक
नहीं बन जाते।
परा-ध्वनि से सफाई भी कर सकते हैं। तरल
पदार्थ पर परा-ध्वनि ऊर्जा की बौछार करने से वह नन्हे बुलबुलों वाला झाग बन जाता
है जो सूक्ष्म दरारों में घुस कर मैल को निकाल फेंकते हैं। हालांकि यह तकनीक
रसोईघर में इस्तेमाल करने के लिए अभी भी बहुत महंगी है। इसका बड़े पैमाने पर
इस्तेमाल प्रयोगशालाओं, युद्ध पोतों, कारखानों
और आभूषणों की सफाई में होता है।
परा-ध्वनि गहराई मापी की मदद से मछुआरे
समुद्रों में मछलियों के समूहों का पता लगा सकते हैं। फिलहाल विमानों में
छोटी-मोटी खराबियों का पता लगाने के लिए विमान को खोल कर उसके ज़रूरी कलपुर्जों की
जांच करने में लाखों डॉलर खर्च होते हैं। एक जेट विमान के रोटर की जांच में 40
घंटे लगते हैं। परा-ध्वनि तकनीक से यह काम चंद मिनटों में हो सकता है।
जब धातु के एक कलपुर्ज़े से ध्वनि तरंगें
टकराती हैं तो वह एक निश्चित आवृत्ति पर ‘बजता’ है। अनुनाद का पैटर्न फिंगर प्रिंट
की भांति अनूठा होता है, और कोई खराबी होने पर
ही बदलता है। परा-ध्वनि टेस्टिंग प्रोजेक्ट के मुख्य भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट
मिगलिमोरी के अनुसार, “हर कलपुर्ज़े के बनने के समय उसके ध्वनि
चित्र को संचित करने का प्रस्ताव है। बाद में जांच करने पर अगर यह उससे भिन्न
निकलता है तो उस कलपुर्ज़े को निकाल देंगे। आशा है कि हर कॉकपिट में एक बॉक्स होगा
जिससे विमान अपनी जांच स्वयं करेगा।”
सबसे अधिक रोचक प्रगति चिकित्सा के क्षेत्र
में हुई है। नई प्रणालियां, जिनमें डिजिटल तकनीक
का प्रयोग होता है, उनके द्वारा महज़ एक मिलीमीटर मोटी शिराओं
को देखा जा सकता है और रक्त प्रवाह का पता लग सकता है। पर चिकित्सक केवल उनको देख
पाने से ही संतुष्ट नहीं हैं। परा-ध्वनि के उन्नत तरीकों द्वारा ह्मदय रोग
विशेषज्ञ को इस बात की सटीक जानकारी मिलेगी कि आपके ह्मदय के वाल्व से कितनी
मात्रा में रक्त प्रवाहित हो रहा है।
सान फ्रांसिस्को हार्ट इंस्टीट्यूट में
शोधकर्ताओं का एक दल ट्रांसड्यूसर को ही ह्मदय तक ले जाने और अल्ट्रासाउंड के
द्वारा अवरुद्ध और सख्त हो गई धमनियों की सफाई के तरीके खोजने में जुटा है।
धमनियों में जमा हुआ प्लाक परा-ध्वनि के प्रहार से गायब हो जाता है। इसमें धमनी के
क्षतिग्रस्त होने का कोई खतरा नहीं है।
प्रतिदिन नई खोजें हो रही हैं। चिकित्सक परा-ध्वनि की सहायता से वह सब देख रहे हैं जिसे पहले कभी नहीं देखा गया था और ऐसे नतीजे पा रहे हैं जिनकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.physics-and-radio-electronics.com/blog/wp-content/uploads/2016/05/sonarworking.png
युनिसेफ के अनुसार, दुनिया भर में 78करोड़ से ज़्यादा लोगों (हर 10 में से एक) के
पास साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है। ये लोग प्रतिदिन कुल मिलाकर 20 करोड़ घंटे दूर-दूर
से पानी लाने में खर्च करते हैं। भले ही दूषित पानी को शुद्ध करने के लिए तकनीकें
मौजूद हैं,
लेकिन महंगी होने के कारण ये कई समुदायों की पहुंच से परे
है।
टैंकनुमा उपकरण (सोलर स्टिल) में रखे गंदे पानी को वाष्पन की मदद से साफ करने
की प्रक्रिया काफी समय से उपयोग की जा रही है। सोलर स्टिल पानी से भरा एक काला
बर्तन होता है जिसे कांच या प्लास्टिक से ढंक दिया जाता है। काला बर्तन धूप को
सोखकर पानी को गर्म करके वाष्प में बदलता है और दूषित पदार्थों को पीछे छोड़ देता
है। वाष्पित पानी को संघनित करके जमा कर लिया जाता है।
लेकिन इसका उत्पादन काफी कम है। धूप से पूरा पानी गर्म होने तक वाष्पीकरण की प्रक्रिया
शुरू नहीं होती। एक वर्ग मीटर सतह हो तो
एक घंटे में 300 मिलीलीटर पानी का उत्पादन होता है। व्यक्ति को पीने के लिए एक दिन
में औसतन 3 लीटर पानी की आवश्यकता होती
है। एक छोटे परिवार के लिए पर्याप्त पानी के लिए लगभग 5 वर्ग मीटर सतह वाला बर्तन
चाहिए।
टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के पदार्थ वैज्ञानिक
गुहुआ यू और सहयोगियों ने हाल ही में इसके लिए एक रास्ता सुझाया है। इसमें
हाइड्रोजेल और पोलीमर के मिश्रण से बना एक छिद्रमय जल-अवशोषक नेटवर्क होता है। टीम
ने इस तरह का एक स्पंज तैयार किया जो दो पोलीमर से मिलकर बना है – एक पानी को
बांधकर रखने वाला (पीवीए) और दूसरा प्रकाश सोखने वाला (पीपीवाय)। स्पंज को सौर
स्टिल में पानी की सतह के ऊपर रखा जाता है।
स्पंज में पानी के अणुओं की एक परत पीवीए से हाइड्रोजन बांड के ज़रिए कसकर
बंधी होती है। लेकिन पीवीए के साथ बंधे होने के कारण पानी के अणु आस-पास के अन्य
पानी के अणुओं से शिथिल रूप से बंधे होते हैं। इन कमज़ोर रूप से जुड़े पानी के
अणुओं को यू ‘मध्यवर्ती पानी’ कहते हैं। ये अपने आसपास के अणुओं के साथ कम बंधन
साझा करते हैं,
इसलिए वे अधिक तेज़ी से वाष्पित होते हैं। इनके वाष्पित होते
ही स्टिल में मौजूद पानी के अन्य अणु इनकी जगह ले लेते हैं। नेचर
नैनोटेक्नॉलॉजी में पिछले वर्ष प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस तकनीक का
उपयोग करते हुए,
यू ने एक घंटे में प्रति वर्ग मीटर 3.2 लीटर पानी का
उत्पादन किया था।
अब यू की टीम ने इसे और बेहतर बनाया है। उन्होंने स्पंज में चिटोसन नाम का एक तीसरा पोलीमर जोड़ा है जो पानी को और भी मज़बूती से पकड़ता करता है। इसको मिलाने से मध्यवर्ती पानी की मात्रा में वृद्धि होती है। साइंस एडवांसेज़ की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार नए स्पंज के उपयोग से 1 वर्ग मीटर से प्रतिदिन 30 लीटर स्वच्छ पेयजल मिल सकता है। हाइड्रोजेल में उपयोग किए गए तीनों पोलीमर व्यावसायिक रूप से उपलब्ध और सस्ते हैं। मतलब अब ऐसे इलाकों में भी साफ पेयजल उपलब्ध कराया जा सकता है जहां इसकी सबसे अधिक ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/solar%20still-1280×720.jpg?itok=z3tQrZAa