यह सांप निगल जाता है मुंह से कई गुना बड़ा शिकार

दि आप किसी नन्ही-सी गिलहरी (Squirrel) को अपने से कहीं अधिक बड़ी बिल्ली को निगलते देखें तो अवश्य हैरान रह जाएंगे। वैज्ञानिक भी ऐसे ही कुछ नज़ारे से अचंभित हैं लेकिन वे गिलहरी से नहीं बल्कि पश्चिम अफ्रीका में पाए जाने वाले पक्षियों के अंडे खाने वाले सांप (Egg-Eating Snake) गान्स एग-ईटर (Dasypeltis gansi) के भोजन से अंचभित हैं। करीब एक मीटर लंबा और पतला गान्स एग-ईटर सांप अपने सिर की चौड़ाई से लगभग चार से पांच गुना बड़े अंडे को साबुत निगल जाता है और फिर उसे अपने मेरु-दंड की मदद से फोड़कर खोल को वापिस उगल देता है। यह बताते चलें कि इसे यह नाम मशहूर अमेरिकी सर्प वैज्ञानिक कार्ल गान्स के नाम पर दिया गया है।

गौरतलब है कि बोआ कांस्ट्रिक्टर (Boa Constrictor)  और ग्रीन एनाकोंडा (Green Anaconda) जैसे विशाल सांप अपने बड़े मुंह के लिए जाने जाते हैं और अपने विशाल मुंह में 100 से भी अधिक दांतों का इस्तेमाल कर अपने शिकार को फंसाते हैं और उसे पूरा का पूरा निगल जाते हैं। लेकिन हैरत इस बात की है कि एकदम पतले से गान्स एग-ईटर सांप का सिर महज 1 से.मी चौड़ा होता है और मुंह में दांत लगभग न के बराबर होते हैं। फिर कैसे यह सांप अपने मुंह से कई गुना बड़े बटेर के अंडों(Quail Eggs), फिंच (Finch) और चूज़ों (Chicks) जैसे शिकार (Prey) को कैसे निगल लेता है?

अंचभे ने सवाल को जन्म दिया और जुट गए वैज्ञानिक इसका जवाब पता करने में और जवाब उन्होंने जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी (Journal of Experimental Biology) में प्रकाशित किया है; इतने बड़े अंडों को साबुत निगलना उसकी गर्दन की अत्यंत लोचदार त्वचा (Elastic Skin) के कारण संभव होता है। देखा गया है कि शरीर के बाकी हिस्सों की त्वचा की तुलना में गर्दन की त्वचा 90 प्रतिशत तक अधिक लोचदार होती है।

अपने सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रजातियों के सांपों की कांचुली (Shedded Skin) एकत्रित की – चौड़े मुंह वाले बोआ कांस्ट्रिक्टर से लेकर छोटे मुंह वाले अमेरिकी पाइप सांप (American Pipe Snake) तक की। उन्होंने शरीर के विभिन्न बिंदुओं पर बल लगाकर मापा कि किस जगह कितने बल तक ऊतक फैलते जाते हैं और कितने बल के बाद टूट जाते हैं।

पाया गया कि अन्य छोटे मुंह वाले सांपों की तुलना में गान्स एग-ईटर के सिर और गर्दन की त्वचा तीन गुना तक अधिक फैल सकती है। इसी खूबी के चलते गान्स एग-ईटर अपने से बहुत बड़े आकार के शिकार को भी निगल लेते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्री मकड़ियां खुद को रेत में क्यों दबाती हैं?

क्षिणी अंटार्कटिक महासागर (Southern Antarctic Ocean) के ठंडे पानी में रहना कई जीवों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों से परिपूर्ण होगा, लेकिन एक प्रकार की समुद्री मकड़ी (Nymphon australe) के लिए यह जगह बहुत ही आरामदायक है।

लंबी टांग वाली इन समुद्री मकड़ियों की साइज़ करीब 4 से.मी. होती है। वास्तव में ये मकड़ी होती ही नहीं हैं किंतु उनके जैसी ही दिखती हैं। ये तो पाइनोगोनिडा (Pycnogonida)  नामक आर्थ्रोपोड (Arthropod)  समूह से सम्बंधित हैं। ऐसी ही एक समुद्री मकड़ी है Nymphon australe जिसके बारे में काफी बातें अनजानी हैं। इस अकेशरुकी (Invertebrate) जीव की जीवनशैली कैसी है, ये क्या खाती हैं और इन्हें कौन खाता है, इनका व्यवहार कैसा है वगैरह सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।

इनके बारे में जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से सेंट्रल मिशिगन युनिवर्सिटी (Central Michigan University) के समुद्र जीवविज्ञानी एंड्रयू महोन और उनके साथियों ने इन्हें समुद्र से पकड़ा और प्रयोगशाला के एक छोटे से मछलीघर में रखा।

शोधकर्ताओं ने देखा कि इनमें से एक मकड़ी बहुत धीमे-धीमे रेत खोद रही थी, फिर उसने अपना धड़ रेत में दबा लिया और अपने आठ पैर बाहर ही रहने दिए जो लहरा रहे थे। देखा गया कि ये मकड़ियां ऐसा बार-बार ऐसा कर रहीं थीं; खुद को रेत में दफनातीं, फिर बाहर निकलतीं और वहां से दूसरी जगह चली जातीं।

लेकिन वे ऐसा करती क्यों हैं। एक बैठक (Conference)  में अपने अवलोकन प्रस्तुत करते समय शोधकर्ताओं के सामने इनके इस व्यवहार के कारण को लेकर कुछ अनुमान सामने आए। एक अनुमान था कि संभवत: वे अपने इन उपांगों के माध्यम से ‘सांस’ (Respiration)लेती होंगी, जैसा कि कुछ अन्य प्रजातियां करती हैं। एक अन्य अनुमान था कि वे रेत के नीचे दबे शिकार तलाशती होंगी, लेकिन इस अनुमान पर तर्क था कि ऐसा होने की संभावना इसलिए नहीं लगती क्योंकि अधिकांश मकड़ियां मांसाहारी (Carnivorous)होती हैं और वे अपने शिकार को हिलते-डुलते हुए महसूस करना चाहती हैं।

अब बारी थी इन अनुमानों को परखने की और उनके इस व्यवहार के कारण को समझने की। इसके लिए महोन और उनकी टीम ने समुद्री मकड़ियों की आंतों में सूक्ष्मजीवी डीएनए (Microbial DNA)  के नमूने लिए और उसे समुद्र के पेंदे के नीचे से लिए गए सूक्ष्मजीवों के नमूने से मिला कर देखा। पाया गया कि आंत के नमूने पेंदे में दफन नमूनों से मेल खा रहे थे। इससे लगता है कि ये जीव पेंदे के नीचे बैक्टीरिया और संभवत: अन्य सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों (Organic Matter) को खाते होंगे।

यह तो समुद्री मकड़ियों (Sea Spiders) के व्यवहार को समझने की शुरुआत भर है। अंटार्कटिका इतना प्रतिकूल परिस्थिति (Harsh Environment) भरा है कि वहां रहने वाले हर जीव के बारे में समझना रोमांचक और विस्मयकारी ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

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रैटलस्नेक एक-दूसरे के शल्क से पानी पीते हैं

वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि सूखे इलाकों (arid regions) में प्यास बुझाने के लिए रैटलस्नेक (rattlesnake) अक्सर बारिश होने पर अपने शरीर की कुंडली बनाते हैं और अपने शल्कों पर इकट्ठा हुई पानी (की बूंदें) पी लेते हैं। अब, करंट ज़ुऑलॉजी (Current Zoology) में प्रकाशित एक नया अध्ययन बताता है कि न सिर्फ वे अपने शरीर पर टपके पानी से प्यास बुझाते हैं बल्कि आसपास मौजूद अपने साथियों की त्वचा से भी पानी पीते हैं।

ये नतीजे शोधकर्ताओं ने कोलेराडो (Colorado) में सौ प्रेयरी रैटलस्नेक (Crotalus viridis) के अध्ययन के आधार पर दिए हैं। इस इलाके में वसंत से लेकर पतझड़ की शुरुआत तक हर महीने में केवल 2 मिलीमीटर बारिश होती है, इसी दौरान ये सरीसृप (reptiles) सबसे अधिक सक्रिय होते हैं। अपने अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने बगीचे में पानी देने वाले स्प्रेयर की मदद से ऐसी ही बारिश की स्थिति बनाई और इस बारिश में रेटलस्नैक की प्रतिक्रिया रिकॉर्ड की। पाया गया कि प्यास के मारे लगभग आधे रैटलस्नैक ने नकली बारिश (simulated rainfall) का पानी पिया।

देखा गया कि उन्होंने तीन अनूठे तरीकों (unique methods) से पानी पिया। कुछ सांप एक जगह इकट्ठे हुए और उन्होंने एक-दूसरे के शरीर पर एकत्रित पानी पिया(water collected on each other’s bodies); इनमें कुछ सांपों ने बारी-बारी से एक-दूसरे के सिर पर जमा पानी पिया और गर्भवती मादाओं (pregnant females) के एक समूह ने एक-दूसरे के तर शरीर से पानी की बूंदें पीं। कुछ सांपों ने अपनी शरीर की टेढ़े कटोरे (bowl-like coil) जैसी कुंडली बनाई, इस कुंडली का झुकाव उनके सिर की ओर था जिससे उनके कुंडलित शरीर में जमा पानी बहकर उनके मुंह तक आ रहा था। कुछ सांपों ने अपने मुंह तक बहकर आता पानी पीया, हालांकि यह स्पष्ट नहीं था कि उन्होंने कितनी बूंदें गुटकीं। शोधकर्ताओं ने देखा कि सांपों ने पानी पीने के लिए जिस तरीके का सर्वाधिक इस्तेमाल किया था वह था अपने आसपास के साथियों के शरीर से पानी पीना। आगे के अध्ययनों (future studies) में शोधकर्ता यह देखना चाहते हैं कि क्या ये तरीके वास्तव में एक-दूसरे की मदद (mutual aid) के तरीके हैं, खासकर गर्भवती मादाओं की मदद के लिए। (स्रोत फीचर्स)

रैटल स्नैक का वीडियों यहां देखें – https://www.science.org/content/article/watch-thirsty-rattlesnakes-drink-scales-other-snakes?utm_source=sfmc&utm_medium=email&utm_content=alert&utm_campaign=WeeklyLatestNews&et_rid=17088531&et_cid=5471795

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वृक्ष मेंढकों की दिलचस्प छलांग

चाइनीज़ ग्लाइडिंग वृक्ष मेंढक (Polypedates dennysi) (Chinese Gliding Tree Frog) चीन और दक्षिण पूर्व एशिया (South East Asia forests) के नम जंगलों में पाए जाते हैं। करीब 10 से.मी. के ये मेंढक इन जंगलों में झूलती शाखों और तनों (tree branches and trunks) पर छलांग लगाते रहते हैं। इनकी यही छलांग वैज्ञानिकों को इनका अध्ययन करने के लिए आकर्षित करती है। दरअसल, जिन जंगलों में ये मेंढक रहते हैं वहां की ज़मीन गीली, दलदली (swampy ground) है। छलांग लगाते वक्त यदि दूरी, ऊंचाई, शाख की चौड़ाई वगैरह का अंदाज़ा ज़रा भी चूका तो ये सीधा कीचड़ में समाएंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है: जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल ज़ुऑलॉजी पार्ट : इकॉलॉजिकल एंड इंटीग्रेटिव फिज़ियोलॉजी  (Journal of Experimental Zoology Part A: Ecological and Integrative Physiology) में प्रकाशित एक अध्ययन का कहना है कि उनमें खड़ी शाखाओं और तनों को पकड़ने के लिए कुछ लचीले तरीके विकसित हुए हैं।

वृक्ष मेंढकों की छलांग का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं (researchers) ने प्रयोगशाला में सेटअप (laboratory setup) जमाया। उन्होंने अलग-अलग व्यास के खंभे जमाए – फेविस्टिक से लेकर टॉयलेट पेपर रोल तक। फिर इन खंभों पर पांच मेंढकों की सैकड़ों छलांगों को वीडियो रिकॉर्ड (video recordings) किया।

पाया गया कि मेंढकों ने इस बात का अंदाज़ा लेने के लिए कुछ सेकंड लगाए कि खंभे का व्यास कितना है और वे कितनी दूरी पर हैं, फिर इसके हिसाब से उन्होंने अपनी छलांग लगाने का तरीका (jumping technique) तय किया। मुख्यत: दो तरीकों से छलांग लगाई। एक तरीके में वे अपने लक्ष्य (यानी शाख) के पास से गुज़रते हुए उससे ज़रा-सा आगे निकल जाते हैं और फिर गुज़रने के एकदम अंतिम क्षण में अपने चिपचिपे, गद्देदार हाथ या पैर (sticky padded hands and feet) से उसे पकड़ लेते हैं, और उसके सहारे खंभे से लिपट जाते हैं। दूसरे तरीके में वे शाख पर पेट के बल उतरते हैं और उससे लिपट जाते हैं।

मोटे खंभों (thicker poles) के लिए मेंढकों ने खंभों से आगे निकलकर, उसे हाथ बढ़ाकर पकड़ने का तरीका अपनाया। लेकिन जैसे-जैसे खंभे संकरे (narrower poles) होते गए, मेंढकों ने लैंडिंग की चूक से बचने के लिए पैरों और पेट के बल लैंड करने का तरीका अपनाया। शोधकर्ताओं का कहना है कि मेंढकों ने छलांग लगाने के लिए क्या पोज़ीशन ली है (jumping posture), इसे देखकर बताया जा सकता है कि वे शाख को पकड़ने के लिए हाथ या पैर से शाख थामेंगे या पेट का सहारा लेंगे।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि खड़ी शाखाओं (vertical branches) पर लैंड करने से मेंढकों के शरीर पर कम ठेस लगती है, इस बात का पता उन्हें खंभों के नीचे लगे बल संवेदी (force sensors) से चला। इस नतीजे से वैज्ञानिकों को एक नया सवाल सता रहा है: आडी और खड़ी दोनों तरह की शाख मौजूद हों तो ये मेंढक क्या खड़ी शाखों पर उतरना पसंद करेंगे या आड़ी शाख (horizontal branches) पर? (स्रोत फीचर्स) छलांग का वीडियो यहां देखें – https://www.science.org/content/article/watch-these-tree-frogs-make-some-most-dramatic-landings-nature?utm_source=sfmc&utm_medium=email&utm_content=alert&utm_campaign=WeeklyLatestNews&et_rid=17088531&et_cid=5471795 

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व्हेल दोगुना जी सकती हैं, बशर्ते मनुष्य जीने दें

ह तो जानी-मानी बात है कि व्हेल (whales)  दीर्घायु (long-living mammals) स्तनधारी हैं। कई प्रजातियां तो 100 वर्ष से अधिक भी जी सकती हैं। व्हेल की उम्र का अंदाज़ा लगाने के लिए वैज्ञानिक कई तरीके अपनाते हैं; जैसे उनके कान के मैल की परतें गिनना जो पेड़ के छल्लों की तरह साल दर साल जमा होती हैं, या आंखों के प्रोटीन में एक निश्चित दर से होने वाले रासायनिक परिवर्तन को नापना, या उनके त्वचा के नीचे की वसा में शिकारी भालों के निशान गिनकर।

इन तकनीकों से विश्लेषण के लिए अक्सर तुरंत मृत व्हेलों के नमूने (whale samples) चाहिए होते हैं, जो मिलना मुश्किल है। फिर, शिकारी गतिविधियों के चलते वृद्ध व्हेल भी मिलना मुश्किल है क्योंकि अब अधिकांश युवा व्हेल ही जीवित बची हैं। इसी कारण व्हेल की सटीक आयु बता पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन वैज्ञानिक भी इन मुश्किलों के सामने हाथ-पर-हाथ धरे बैठे नहीं रहते, वे हल खोजते रहते हैं। अब, उन्होंने व्हेल की उम्र की गणना का एक बेहतर तरीका खोजा है जो साइंस एडवांसेस पत्रिका (Science Advances journal) में प्रकाशित हुआ है।

युनिवर्सिटी ऑफ अलास्का फेयरबैंक के इकॉलॉजिस्ट ग्रेग ब्रीड और उनके साथियों ने मृत व्हेल के नमूनों की बजाय राइट व्हेल की दो प्रजातियों – उत्तरी अटलांटिक राइट व्हेल (Eubalaena glacialis) और दक्षिणी राइट व्हेल (Eubalaena australis) पर अध्ययन किया, जिनका अंधाधुंध शिकार किया गया है। उन्होंने इन दो व्हेल प्रजातियों की 1970 से अब तक की तस्वीरों को खंगाला और उनका बारीकी से अवलोकन किया। इसकी मदद से शोधकर्ता प्रत्येक व्हेल को पहचान सकते थे और यह बता सकते थे कि कौन सी व्हेल कब (संभवत: मृत्यु के कारण) आबादी से गायब हो गई। व्हेल के गायब होने के समय के आंकड़ों को उन्होंने विभिन्न सांख्यिकीय मॉडल्स (statistical models)  में डाला जो यह बता सकते थे कि कितने प्रतिशत आबादी किस-किस उम्र तक जीवित रहेगी।

सबसे उपयुक्त परिणाम उस मॉडल से मिले जो बीमा कंपनियां (insurance companies) मनुष्यों की मृत्यु दर का पूर्वानुमान लगाने और उसके अनुसार प्रीमियम दरें तय करने के लिए करती हैं। परिणाम के अनुसार दक्षिणी राइट व्हेल का औसत जीवनकाल लगभग 73 साल है, लेकिन 10 प्रतिशत 132 साल से भी अधिक आयु तक जीवित रह सकती हैं। जबकि, पूर्व अध्ययनों का कहना था कि इस व्हेल का जीवनकाल अधिकतम 70 से 80 साल है।

उत्तरी अटलांटिक राइट व्हेल के बारे में मॉडल का विश्लेषण है कि इनका औसत जीवनकाल करीब 22 वर्ष है लेकिन 10 प्रतिशत 47 वर्ष से अधिक आयु तक जी सकती हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि काफी सारी व्हेल कुदरती रूप से नहीं बल्कि जहाज़ों से टकराकर (ship strikes) और मत्स्याखेट उपकरणों (fishing gear entanglement) में उलझकर मरती हैं। साथ ही, पूर्व में हुए अंधाधुंध शिकार से ये उबर नहीं पाई हैं और विलुप्ति की कगार (endangered whales) पर हैं। इनके अधिक असुरक्षित होने का एक कारण यह भी है कि वे मानव आबादी वाले तटीय क्षेत्रों (coastal areas)  में रहती हैं।

हालांकि दीर्घायु के मामले में बोहेड व्हेल (Balaena mysticetus) अब भी आगे हैं – वे 200 साल से अधिक जीवित रहती हैं। वैज्ञानिकों का मानना था कि बोहेड व्हेल इतने लंबे समय तक इसलिए जीवित रहती हैं क्योंकि वे सुस्त होती हैं – वे धीरे-धीरे तैरती (slow swimmers) हैं, धीरे-धीरे परिपक्व होती हैं और उनका चयापचय धीमा होता है। लेकिन राइट व्हेल तुलनात्मक रूप से फुर्तीली होती हैं, इनकी चयापचय गति (metabolism rate)  अन्य स्तनधारियों की तरह ही होती है, इसलिए यहां एक सवाल उभरता है कि वे इतना लंबा कैसे जीवित रहती हैं?

बहरहाल, व्हेल की नैसर्गिक उम्र (natural lifespan of whales) चाहे जितनी लंबी रहे लेकिन जब तक उन पर शिकार (whale hunting) और मानव गतिविधियों (human activities) का खतरा मंडराता रहेगा उनका चिरंजीवी होना मुश्किल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियों ने खेती लाखों साल पहले शुरू की थी

खेती-किसानी (farming and agriculture) की बात निकलते ही हम सबको गांवों मे हल-बैल लेकर फसल उगाते किसान (farmers with plough and oxen) नज़र आते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है कि नन्हीं चींटियों (ants farming fungus) ने खेती करना करीब पौने तीन करोड़ साल पहले शुरू कर दिया था।

आजकल सैकड़ों चींटी प्रजातियां फफूंद की खेती (fungus farming by ants) करती हैं। ये चींटियां पौधों की पत्तियां कुतरती हैं और उन्हें अपनी बांबी (ant colony) में ले जाती हैं और ताज़ी हरी पत्तियां फफूंदों को खिलाती हैं। जहां इन फफूंदों को रखा जाता है, उन प्रकोष्ठों के वातावरण को भलीभांति नियंत्रित रखा जाता है। चींटियां फिर इन फफूंदों का भक्षण करती हैं।

चींटियों के उद्विकास (evolution of ants) के अध्ययन से संकेत मिलता है कि चींटी-फफूंद का यह सम्बंध करोड़ों वर्ष पुराना (millions of years old ant-fungus relationship) है। अब साइन्स में प्रकाशित (Science journal) एक अध्ययन में फफूंद के साथ चींटियों के इस सम्बंध की शुरुआत का समय अधिक सटीकता से निर्धारित किया गया है। यह अनुकूलन लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले हुआ था जब एक उल्का की टक्कर (asteroid impact) ने पृथ्वी से डायनासौर (dinosaurs extinction) समेत कई प्राणियों का सफाया कर दिया था।

चींटियों के फफूंद बागानों (fungus gardens)  का सर्वप्रथम विवरण डेढ़ सौ साल पहले दिया गया था। तब से वैज्ञानिकों ने 247 ऐसी चींटी प्रजातियां खोजी हैं जो फफूंदों को पालती हैं और भोजन के लिए उन पर निर्भर हैं। शोधकर्ताओं का मत रहा है कि ऐसी सारी किसान चींटियां एक साझा पूर्वज से विकसित हुई हैं और धीरे-धीरे प्रत्येक प्रजाति ने अलग-अलग फफूंद को पालतू बना लिया और इस तरह वे अलग-अलग प्रजातियां बन गईं।

लेकिन इस फफूंद-चींटी कृषि सम्बंध (ant-fungus symbiotic relationship) में शामिल फफूंदों का वंशवृक्ष तैयार करना एक चुनौती रही है। इस वजह से यह कहना मुश्किल रहा था कि यह सम्बंध कब शुरू हुआ था। अब फफूंद जीनोम (fungal genome) के विश्लेषण की नई तकनीकें विकसित होने के बाद 475 फफूंद प्रजातियों के जीनोम का निर्धारण संभव हो पाया है। इनमें से लगभग सभी की खेती चींटियों द्वारा की जाती है। स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के टेड शूल्ज़ और उनके साथियों ने इस जानकारी को 276 चींटी प्रजातियों के जीनोम आंकड़ों के साथ रखकर देखा। इन वंशवृक्षों को जब चींटी व फफूंद के जीवाश्म रिकॉर्ड के साथ रखकर अध्ययन किया तो वे प्रत्येक जोड़ी के आरंभ की तारीख का अंदाज़ लगा पाए।

इस विश्लेषण के आधार पर शूल्ज़ का निष्कर्ष है कि किसानी में शामिल चींटी और फफूंद दोनों का उद्भव करीब 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व (66 million years ago ant-fungus adaptation) हुआ था। उस समय उल्का की टक्कर (asteroid impact aftermath) के कारण मलबे का ऐसा गुबार फैला कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कई महीनों के लिए ठप हो गई। वनस्पतियों और उन पर निर्भर जीवों का सफाया हो गया। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया वनस्पतियों के लिए तो ज़रूरी है ही, समस्त जंतु भी भोजन के लिए इसी के भरोसे हैं।

लेकिन फफूंदों की तो बन आई। फफूंद आम तौर पर वनस्पति अवशेषों का विघटन करके काम चलाती हैं। शोधकर्ताओं का मत है कि इस समय जो चींटियां फफूंदों के साथ ढीला-ढाला सम्बंध बना चुकी थीं, उन्होंने इसे और मज़बूत कर लिया। यही आगे चलकर फफूंदों के पालतूकरण (domestication of fungi by ants) के रूप में सामने आया, जिसमें फफूंद पूरी तरह चींटियों की परवरिश के भरोसे हो गईं। पहले कुछ लाख वर्षों तक तो चींटियां जंगली फफूंदों को पालती रहीं। फिर लगभग 2.7 करोड़ वर्ष पूर्व कुछ चींटियों ने फफूंद की किस्मों को पूरी तरह पालतू बना लिया जो आज अपने जंगली सम्बंधियों से पूरी तरह कट चुकी हैं।

यहां एक दिलचस्प बात बताई जा सकती है कि चींटियां सिर्फ खेती (ant agriculture) नहीं करती, बल्कि मनुष्यों के समान पशुपालन (ant animal husbandry) भी करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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विज्ञान समाचार संकलन

कोविड-19 की उत्पत्ति

कोविड-19 वायरस और प्रयोगशाला लीक थ्योरी (Lab Leak Theory) कोविड-19 महामारी (COVID-19 pandemic) की जांच कर रही एक अमेरिकी संसदीय समिति (US congressional committee) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वायरस संभवत: चीन (China lab leak) की एक प्रयोगशाला (laboratory) से लीक हुआ था। हालांकि, रिपोर्ट में कोई ठोस सबूत (concrete evidence) नहीं हैं, केवल परिस्थितिजन्य प्रमाण (circumstantial evidence) दिए गए हैं।  520 पन्नों की इस रिपोर्ट में वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (Wuhan Institute of Virology) में किए गए गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च (gain-of-function research) पर ध्यान दिया गया है।  एक नए खुलासे में, रिपोर्ट ने ईमेल का उल्लेख किया है, जो वायरस की उत्पत्ति (origin of the virus) से जुड़े अपराधों (potential crimes) पर एक ग्रैंड जूरी जांच (grand jury investigation) की ज़रूरत बताते हैं। इसके विपरीत, वैज्ञानिकों (scientists) और समिति के असहमत सदस्यों (dissenting members) ने प्रयोगशाला से लीक होने के सिद्धांत (lab leak hypothesis) को लेकर रिपोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती (challenged conclusions) दी है। (स्रोत फीचर्स) 

महामारी का शैक्षणिक प्रदर्शन पर असर

ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल मैथेमेटिक्स एंड साइंस स्टडी (Trends in International Mathematics and Science Study – TIMSS) की ताज़ा रिपोर्ट (latest report) बताती है कि 2019 के मुकाबले 2023 में 8वीं कक्षा (Grade 8) के गणित (Mathematics scores) के प्राप्तांक 39 प्रतिशत देशों में और विज्ञान (Science scores) के प्राप्तांक 42 प्रतिशत देशों में घटे हैं। वहीं, चौथी कक्षा (Grade 4) के विद्यार्थियों के अंक कुछ बेहतर (improved scores) रहे, जबकि अधिकांश देशों (most countries) में अंक स्थिर (stable scores) रहे। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) में दोनों कक्षाओं के अंक 1995 में पहले टेस्ट (first test in 1995) के बाद से सबसे निचले स्तर (lowest level) पर पहुंचे हैं। वहीं, सिंगापुर (Singapore), ताइवान (Taiwan), और दक्षिण कोरिया (South Korea) वैश्विक रैंकिंग (global rankings) में शीर्ष पर (top positions) बने हुए हैं।  (स्रोत फीचर्स)

नारंगी बिल्लियां का रहस्य खुला

वैज्ञानिकों ने नारंगी रंग (orange color) की बिल्लियों (cats) के फर (fur) के पीछे की आनुवंशिक गुत्थी (genetic mystery) को सुलझा लिया है, जो 60 सालों से एक रहस्य (decades-old mystery) बनी हुई थी। दो शोध टीमों ने स्वतंत्र रूप से पाया कि एक्स गुणसूत्र (X chromosome) पर एक उत्परिवर्तन (mutation) रंजक बनाने वाली कोशिकाओं (pigment-producing cells) में Arhgap36 प्रोटीन (protein) के उत्पादन को बढ़ा देता है। यह प्रोटीन एक ऐसा मार्ग सक्रिय करता है, जो हल्के लाल रंग का रंजक (light red pigment) बनाता है, जिससे बिल्लियों का नारंगी रंग का फर (orange fur) बनता है। यह खोज (discovery) जीवों में आनुवंशिकी (genetics) और फर के रंग (fur color) को समझने में एक नई दिशा (new insights) है। (स्रोत फीचर्स)

अल्ज़ाइमर की दवा परीक्षण में असफल

अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease) के लिए बनाई गई प्रयोगात्मक दवा सिम्यूफिलम (Simufilam experimental drug) ने अंतिम चरण के क्लीनिकल परीक्षण (clinical trial) में कोई सकारात्मक असर नहीं दिखाए। प्लेसिबो (placebo) लेने वाले रोगियों से तुलना में, एक साल तक सिम्यूफिलम लेने वाले रोगियों में न तो संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive ability) में सुधार दिखा, और न ही रोज़मर्रा के कार्यों (daily tasks) में कोई बेहतरी दिखी। दवा बनाने वाली कंपनी कसावा साइंस (Cassava Sciences) पर शोध में धोखाधड़ी (fraud in research) और वित्तीय कदाचार (financial misconduct) के आरोप तक लगे हैं। परीक्षण (trial) में असफलता के बाद इस दवा के विकास (drug development) को रोक दिया गया है। (स्रोत फीचर्स)

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डायनासौर धरती पर हावी कैसे हो गए

नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि डायनासौर ने पूरी धरती पर दबदबा कैसे कायम किया था। इस बात का सुराग ट्राएसिक युग (25-20 करोड़ वर्ष पूर्व) के अंतिम दौर से लेकर प्रारंभिक जुरासिक युग (20-14.5 करोड़ वर्ष पूर्व) में डायनासौर की विष्ठा (fossilized dung analysis) और वमन जीवाश्मों (Bromalite study) के विश्लेषण से मिला है। डायनासौर के भोजन के अध्ययन से पता चलता है कि कैसे 23-20 करोड़ वर्ष पूर्व के समय में डायनासौर ने अपने सारे प्रतिद्वन्द्वियों को विस्थापित कर दिया था और स्वयं विविध आकारों और साइज़ों (Dinosaur dominance) में विकसित हुए थे। यह घटना प्राचीन सुपर महाद्वीप पैंजिया के एक हिस्से में घटी थी। यह शोध पत्र उपसला विश्वविद्यालय के पुराजीव वैज्ञानिक मार्टिन क्वार्नस्ट्रॉम (Martin Qvarnström ) और उनके साथियों का है।

क्वार्नस्ट्रॉम का कहना है कि आम तौर पर लोग जंतुओं के कंकालों के जीवाश्मों पर ध्यान देते हैं, उनकी विष्ठा पर नहीं, जबकि विष्ठा जानकारी का खज़ाना होती है।

पहले डायनासौर करीब 23 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर अदना किरदारों के रूप में प्रकट हुए थे। उस समय की पारिस्थितिकी में तमाम अन्य किरदार मौजूद थे – विशाल शाकाहारी (डायसिनोडोन्टDicynodonts), बड़े-बड़े शिकारी सरिसृप (रौइसुकिड्सRauisuchids) और मगरमच्छ जैसे जीव। लेकिन 3 करोड़ सालों के अंदर डायनासौर धरती पर छा गए – उन्होंने अपने प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा घेरे गए समस्त निशे पर कब्ज़ा कर लिया। पारिस्थितिकी में निशे का मतलब होता है कि कोई प्रजाति अपने परिवेश में क्या भूमिका निभाती है – यानी परिवेश के अन्य सजीव और निर्जीव घटकों से क्या सम्बंध निर्वाह करती है। यह बहस का विषय रहा है कि क्या डायनासौर इसलिए हावी हुए थे कि उनके पास खास किस्म के शारीरिक लक्षण थे या फिर उनके प्रतिद्वन्द्वी जलवायु में हुए बदलाव के कारण परास्त हो गए थे।

क्वार्नस्ट्रॉम और उनके साथियों को लगता था कि इसका सुराग डायनासौर के भोजन में मिलेगा। डायनासौर की खुराक का खुलासा करने के लिए वे पोलिश बेसिन में डायनासौर की विष्ठा और वमन के जीवाश्म की तलाश में जुट गए। यह वह इलाका है जहां से हड्डियों के जीवाश्म और पुराजलवायु सम्बंधी विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। टीम ने तीन मुख्य स्रोतों से प्राचीन भोजन शृंखला का पुनर्निर्माण किया: कोप्रोलाइट (coprolite -विष्ठा जीवाश्म), रीगर्जिएट (Regurgitated fossils – वमन के जीवाश्म) और कोलोलाइट्स (cololites – पाचन तंत्र के जीवाश्मित पदार्थ)। इन तीनों प्रकार के जीवाश्मों का मिला-जुला नाम है ब्रोमालाइट।

शोधकर्ताओं ने नौ जगहों से प्राप्त 532 ब्रोमालाइट्स की जांच की। इसके बाद उन्होंने इन ब्रोमालाइट्स को साइज़, आकृति और पदार्थों के आधार विभिन्न प्राचीन जंतु समूहों (Taxa – टैक्सा) में बांट दिया। उदाहरण के लिए, लंगफिश (Lungfish – फेफड़ों वाली मछलियां) और शार्क की आहार नाल सर्पिलाकार होती है और उनकी विष्ठा ऐंठे हुए भंवर के आकार की होती है। इससे अलग, उभयचर जीव अंडाकार विष्ठा छोड़ते हैं जिसमें मछलियों के शल्क बहुतायत में होते हैं।

खोज स्थल से भी कई सुराग मिले। जैसे कोप्रोलाइट्स प्राय: उससे सम्बंधित जीव की हड्डियों और पदचिंहों के बीच मिलते हैं। उदाहरण के लिए यदि आपको 30 से.मी. से ज़्यादा लंबी/बड़ी विष्ठा मिलती है और जहां आसपास डायनासौर के खूब पदचिंह हैं, तो पक्का है कि उसी की विष्ठा है।

इसके बाद रासायनिक विश्लेषण और सिन्क्रोट्रॉन टोमोग्राफी (Synchrotron tomography) जैसी तकनीकों की मदद से शोधकर्ताओं ने उस काल के भोजन की तहकीकात की। उदाहरण के लिए, जब उन्हें लंबी विष्ठा मिली जिसमें मछलियों के अवशेष भरपूर मात्रा में थे तो उन्होंने माना कि यह विष्ठा मगरमच्छ जैसे किसी सरिसृप ने छोड़ी होगी जिसकी थूथन लंबी होगी और दांत पैने होंगे (Paleorhinus – पैलियोराइनस)। दूसरी ओर यदि गोबर के जीवाश्म में गुबरैले हैं तो वह यकीनन कीटभक्षी सिलेसौरस की करतूत है। सिलेसौरस डायनासौर का निकट सम्बंधी था। आर्कोसौर स्मॉक की विष्ठा के जीवाश्म में उसके शिकार की चबाई हुई हड्डियां और दांत मिले। स्मॉक 5 मीटर लंबा दोपाया शिकारी था जिसके जबड़े निहायत शक्तिशाली और दांत आरीनुमा थे।

इस तरह शोधकर्ताओं ने समय के साथ भोजन में आए परिवर्तनों पर गौर किया तो उन्हें डायनासौर के दबदबा स्थापित होने के नए सुराग मिलते गए।

डायनासौर के पूर्वज छोटे-छोटे सर्वाहारी थे जो ट्राएसिक पारिस्थितिकी में गौण किरदार थे। इनसे शुरुआती डायनासौर का विकास हुआ – जैसे छोटे शिकारी थेरोपॉड्स (Theropods)। ये मूलत: कीट और मछलियां खाते थे। जुरासिक काल के उत्तरार्ध में जलवायु अपेक्षाकृत गर्म और नम होने लगी थी। इसके चलते वनस्पतियों का विस्तार हुआ और शाकाहारी डायनासौर (जाने-माने विशाल लंबी गर्दन वाले सौरोपॉड्स) (Sauropods) के लिए ज़्यादा भोजन उपलब्ध होने लगा। इन्होंने जो विष्ठा छोड़ी है उसमें वनस्पति अवशेष भरपूर मात्रा में पाए गए हैं। सारे संकेत यही दर्शाते हैं कि सौरोपॉड्स भारी मात्रा में बड़ी पत्तियों वाले फर्न खाते थे। धीरे-धीरे ये शाकाहारी विशाल हो गए और साथ ही इनका शिकार करने वाले थेरोपॉड भी।

ट्राएसिक काल के अंतिम दौर का विष्ठा रिकॉर्ड दर्शाता है कि डायनासौर पारिस्थितिकी तंत्र के हर स्तर पर छा चुके थे और उनके गैर-डायनासौर प्रतिद्वन्द्वी विस्थापित हो गए थे। यह पूर्व में अस्थि जीवाश्मों व अन्य प्रमाणों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों की पुष्टि करता है। इस विषय के शोधकर्ता आम तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि विष्ठा के विश्लेषण से यह पता करना कि कौन किसको खाता था, पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्वार्नस्ट्रॉम को उम्मीद है कि यह शोध पत्र अन्य शोधकर्ताओं को भी इस दिशा में काम करने को प्रेरित करेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अथाह महासागर में ये जीव सूंघकर घर लौटते हैं – स्निग्धा दास

नाब, आप तो सूंघकर लज़ीज़ भोजन या किसी खुशबूदार या बदबूदार चीज़ का बखूबी पता लगा लेते होंगे पर कोई आपसे सूंघकर घर तक पहुंचने की बात कर दे तो? यह तो नामुमकिन ही लगेगा, भला कोई अपने घर तक सूंघकर कैसे पहुंच सकता है?

लेकिन कुछ ऐसे जीव हैं जो यह कर पाते हैं। हाल ही में एक और ऐसे ही जीव का पता चला है जो समुद्र की गहराइयों में अपने घर का पता सूंघकर लगा लेते हैं!

महासागर विशाल है और अगर आप एक ऐसे जीव हैं जो महज 1 मिलीमीटर लंबा है, तो वहां खो जाना आसान है। हालांकि, माईसिड्स नामक छोटे झींगा जैसे क्रस्टेशियन्स गहरे पानी में खोह, जो उनका घर होती है, का रास्ता अपनी सूंघने की क्षमता से ढूंढ सकते हैं। यह खोज उन समुद्री जीवों की सूची में एक और जीव जोड़ती है, जो रासायनिक संकेतों का उपयोग करके रास्ता खोजते हैं। इन जीवों में सैल्मन मछली भी शामिल है।

एंडोम मरीन स्टेशन के समुद्री पारिस्थितिकीविद और अध्ययन के लेखक थेरी पेरेज़ कहते हैं, “चौंकाने वाली बात यह थी कि हमने एक सच्चा घर वापसी व्यवहार देखा, माईसिड्स अपनी खोह का पता लगा सकते हैं, लेकिन हर किसी खोह का नहीं – बल्कि वह खोह जहां वे पैदा हुए थे।”

प्रत्येक रात भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों में, लाखों माईसिड्स (Hemimysis margalefi) दैनिक प्रवास करते हैं। सूर्यास्त के समय, वे अपने गृह-खोहों को छोड़कर खुले समुद्र में भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। शिकारियों से बचने के लिए, वे दिन उगने से पहले खोहों में लौट आते हैं। पिछले शोधों से यह पता चला था कि जब माईसिड्स अपनी खोहों को छोड़ते हैं, तो वे प्रकाश की मदद से मार्ग-निर्धारण करते हैं। लेकिन अंधेरे में ये जीव अपने घर का रास्ता कैसे ढूंढते होंगे?

पेरेज़ और उनके सहयोगियों का विचार था कि जैसे सैल्मन, रासायनिक संकेतों का अनुसरण करके उन नदियों तक पहुंचते हैं जहां वे पैदा हुए थे, वैसे ही माईसिड्स भी अपनी सूंघने की क्षमता का उपयोग करके अंधकार में अपना रास्ता खोजते होंगे।

इस विचार को परखने के लिए, शोधकर्ताओं ने फ्रांस के मार्सेल के पास दक्षिणी तट में पानी के नीचे की दो खोहों से माईसिड्स इकट्ठा किए। फिर, प्रयोगशाला में उन्होंने इनमें से एक-एक जंतु को छोटे Y-आकार के पात्र में रखा। कभी-कभी, Y की एक भुजा माईसिड्स के गृह-खोह से लिए गए समुद्री पानी की ओर जाती थी, जबकि दूसरी भुजा किसी अन्य खोह या स्थान से लिए गए समुद्री पानी की ओर। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि दोनों ही भुजाएं गृह-खोह के पानी की ओर नहीं जाती थी। शोधकर्ताओं ने फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस जर्नल में बताया है कि माईसिड्स अपनी गृह-खोह का पानी ताड़ लेते थे और उसी में रहना पसंद करते थे।

अपने अध्ययन के दूसरे भाग में, शोधकर्ताओं ने दिखाया कि प्रत्येक खोह से लिया गया पानी अपनी अलग रासायनिक पहचान रखता था, जो शायद माईसिड्स का मार्गदर्शन करता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में प्रत्येक खोह को उसकी अनूठी ‘गंध’ किस चीज़ से मिलती है। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद खोहों में रहने वाले स्पंज द्वारा छोड़े गए यौगिकों की इसमें कुछ भूमिका हो सकती है।

एक समुद्री पारिस्थितिकीविद फर्नांडो काल्डेरोन गुटिरेज़ का मत है कि “अध्ययन बहुत अच्छी तरह से किया गया है, और बहुत सरल है, जो इस अध्ययन की एक खूबसूरती है।” उनका कहना है कि इसी तरह के प्रयोगों से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि क्या अन्य जीव भी रास्ता खोजने के लिए गंध पर निर्भर हैं?

दूसरी ओर, पेरेज़ को कई खतरों का अंदेशा है। जैसे समुद्री प्रदूषण में वृद्धि और कुछ स्पंज प्रजातियों का खोहों से लुप्त होना वगैरह। ये अंततः समुद्र के रासायनिक परिदृश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। तब, पेरेज़ को डर है कि, माईसिड्स ‘अथाह समुद्र के अंधकार में खो जाएंगे और अपने घर ढूंढने में असमर्थ हो जाएंगे।’ (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चमकीले समुद्री घोंघे को नाम मिला

समुद्री घोंघे (Marine Snails), जिन्हें न्यूडिब्रांक (Nudibranchs) के नाम से भी जाना जाता है, मोलस्क (Mollusk) की श्रेणी में आते हैं। इनकी लगभग सभी प्रजातियां कोरल रीफ (Coral Reef) से लेकर समुद्री ज्वार (Tidal Pools) के चलते तटों पर बने पानी के पोखरों और उथले समुद्र के पेंदे में रेंगती पाई जाती हैं। लेकिन इनकी एक प्रजाति है जो समुद्र के गहरे और अंधेरे वातावरण (Deep-Sea Environment) में रहना पसंद करती है, ऐसा कहना है डीप-सी रिसर्च पार्ट-I (Deep-Sea Research Part-I) में प्रकाशित रिपोर्ट का।

दरअसल करीब 25 साल पहले मॉन्टेरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट (Monterey Bay Aquarium Research Institute) के वैज्ञानिकों ने मॉन्टेरे खाड़ी (Monterey Bay) में करीब ढाई किलोमीटर की गहराई में पहली बार इस जीव को देखा था। यह अपनी चौड़ी पूंछ की मदद से तैर रहा था और बीच-बीच में अपनी जैव-दीप्ति (Bioluminescence) बिखेर रहा था। और हैरत की बात थी कि यह उस गहराई पर रहने वाले किसी ज्ञात जीव जैसा नहीं था।

इसलिए अगले करीब 20-22 वर्षों तक वैज्ञानिक इस जीव पर नज़र रखे रहे। इस अवधि में उन्होंने इसे करीब 150 बार देखा और हर बार यह ओरेगन (Oregon) से लेकर दक्षिणी कैलिफोर्निया (Southern California) तक फैले तट से 1 से 4 किलोमीटर की गहराई पर तैरते हुए दिखाई दिया – इस गहराई पर सूरज की ज़रा भी रोशनी (Sunlight) नहीं पहुंचती। आकार में यह अनोखा जीव बेसबॉल (Baseball) की गेंद जितना बड़ा और पारदर्शी था। घोंघों (Snails) के समान इसका एक मांसल पैर था, इसलिए ऐसा लग रहा था कि यह शायद कोई घोंघा हो। लेकिन जहां समुद्री घोंघे अपने मांसल पैर के सहारे रेंगते हुए आगे बढ़ते हैं, वहीं यह अपने शरीर पर बनी भोंपू नुमा संरचना (Funnel-Like Structure) के सहारे तैरते हुए आगे बढ़ता था। खतरा महसूस होने पर इसकी कांटानुमा (Fork-Like) पूंछ का सिरा चमकने लगता और फिर पूंछ शरीर से छिटककर अलग हो जाती, संभवत: शिकारियों (Predators) का ध्यान भटकाने के लिए।

कुल मिलाकर इन अवलोकनों से वह घोंघों की किसी ज्ञात प्रजाति (Known Species) से मेल खाता नहीं लग रहा था। इसलिए वैज्ञानिकों ने 18 जीवों को पकड़ा और इनके शरीर की आंतरिक संरचना का बारीकी से अवलोकन और आनुवंशिक विश्लेषण (Genetic Analysis) किया। पाया गया कि यह जीव एक तरह का समुद्री घोंघा है, लेकिन ज्ञात प्रजातियों से इतने दूर का सम्बंधी है कि यह अपने कुल का एकमात्र सदस्य है। शोधकर्ताओं ने इसका नाम बेथीडेवियस कॉडेक्टाइलस (Bathydevius caudactylus) रखा है। इसकी मायावी खासियत के कारण जीनस का नाम बेथीडेवियस (Bathydevius) रखा गया है जिसका अर्थ है ‘घोर छलिया’ (Master of Disguise) और इसकी फोर्क जैसी पूंछ के कारण प्रजाति का नाम कॉडेक्टाइलस रखा गया है।

जांच-पड़ताल में इसके पेट में झींगा (Shrimp) के अवशेष भी मिले थे, हालांकि यह अभी पहेली ही है कि ये सुस्त घोंघे फुर्तीले झीगों (Agile Shrimps) का शिकार कैसे करते होंगे। संभवत: उनके शरीर पर बनी भोंपू समान रचना (Funnel Structure) उन्हें मदद करती होगी। बहरहाल, आगे अध्ययन जारी रहेंगे और इससे जुड़ी गुत्थियां सुलझती रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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