अत्तिला के हूण आखिर कौन थे ?

हूण लोग लुटेरे योद्धाओं (hun warriors) के रूप में विख्यात हैं। ये लोग लगभग 370 ईसा पूर्व में रोमन साम्राज्य (roman empire) की सीमाओं पर पहुंचे, जब यह साम्राज्य लड़खड़ा ही रहा था। फिर कुछ दशकों बाद फौजी नायक अत्तिला (Attila the hun) के नेतृत्व में हूणों ने इसे पूरी तरह से पतन की ओर धकेल दिया। इतने कम समय में भी अत्तिला ने साम्राज्य को बहुत प्रभावित किया था। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि हूण जहां भी गए, अपनी छाप छोड़ी।

लेकिन इतिहासकारों के बीच हमेशा से ही यह बहस का विषय रहा है कि हूण मूलत: कहां से आए थे। एक अनुमान था कि ‘हूण’ शब्द ‘श्योन्ग्नू’(Xiongnu tribe) शब्द से आया है, जो घास के मैदानों के घुमंतुओं के एक समूह को दर्शाता है। 200 ईसा पूर्व के आसपास चीन(Ancient China) की उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर श्योन्ग्नू लोगों की दहशत थी, और 100 ईसवीं के आसपास उनका पतन हो गया। एक मत था कि हूण संभवत: यही श्योन्ग्नू लोग थे जो मध्य एशिया (central asia) के अल्ताई पहाड़ों से निकलकर 5000 किलोमीटर दूर रोम (rome) की सीमाओं तक पहुंचे और रोमन साम्राज्य के पतन का एक कारण बने। लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे पूरी तरह साबित नहीं कर पा रहे थे: श्योन्ग्नू लोगों की कब्रें 300 साल बाद के हूणों की कब्रों जैसी नहीं थीं, और यह अंतर दोनों के एक होने के विचार को खारिज करता था।

अब, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (national academy of sciences) में प्रकाशित ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय के आनुवंशिकीविद गाइडो नेची रुस्कोन और ओटवोस लॉरैंड विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद सोफिया राज़ के शोधदल द्वारा किया गया डीएनए आधारित अध्ययन (DNA Analysis of huns) बताता है कि कुछ हूण श्योन्ग्नू अभिजात वर्ग के दूर के वंशज थे, लेकिन वे रोम के आसपास रहने वाली जनजातियों के समूह का हिस्सा बन गए थे।

दरअसल, वर्तमान हंगरी (hungary) में दफन करीब 400 से 500 ईसवीं के समय की हूणों की सैकड़ों कब्रों की जांच करते समय शोधकर्ताओं को ऐसी कब्रें और कंकाल मिले जो बाकियों से अलग थे; इन कब्रों में दफन सामान भी बाकी कब्रों के सामान से अलग था और कंकालों की कद-काठी भी बाकी कब्रों में दफन कंकालों से अलग थीं। कुछ कंकालों से लगता था कि खोपड़ी को लंबी बनाने के लिए बचपन में बांधा गया था (Artificial cranial deformation), और कुछ कब्रों में शव के साथ घोड़ों के सिर और खाल रखे गए थे। इससे लगता था कि ये कंकाल मध्य यूरेशियाई घास के मैदानों (Eurasian nomads) में रहने वाले घुड़सवारों के सम्बंधियों के होंगे।

इन कंकालों की जेनेटिक बनावट की जांच में पाया गया कि कब्र में दफन कुछ लोगों के और श्योन्ग्नू के कुलीन वर्गों (Xiongnu elite) के पूर्वज साझा थे। और कुछ कंकाल ऐसे थे जो सीधे तौर पर कुलीन श्योन्ग्नू योद्धाओं से सम्बंधित थे; या तो वे कुलीन वर्गों के वंशज थे, या उनके करीबी सम्बंधियों के वंशज थे। यह संभव है कि ये योद्धाओं के एक समूह का ऐसा हिस्सा थे जिन्होंने अपनी घास के मैदान की संस्कृति (Nomadic culture) को बरकरार रखा था।

लेकिन हंगरी की कब्रों में दफन ‘हूण’ में श्योन्ग्नू वंशज बहुत थोड़ी संख्या में थे। इसे देखकर लगता है कि पूर्व की ओर से लोगों का प्रवास (Migration patterns) हुआ तो था लेकिन बड़े पैमाने पर नहीं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि संभवत: 1900 साल पहले श्योन्ग्नू साम्राज्य (Xiongnu Empire) के कुलीन लोग साम्राज्य के पतन के बाद बिखर गए होंगे; बिखराव के बाद कुछ लोग वहीं रुके रहे होंगे, कुछ को बाहर निकाल दिया गया होगा, कुछ लोगों को नए काम/अवसर मिल गए होंगे, और कुछ लोग पश्चिम की ओर पलायन कर गए होंगे। हालांकि अपनी जगह से कहीं और जाना जोखिमपूर्ण था, क्योंकि किसी और के इलाकों से गुज़रने का एक मतलब होता है कि रास्ते में वहां के लोगों से टकराव में आप अपने साथी, पशुधन या माल-असबाब खो दें। इस जोखिम को श्योन्ग्नू लोगों ने सोच-समझकर चुना हालांकि कुछ ही लोग इसे पार कर पाए। और जो लोग पार कर गए उन्होंने स्थानीय संस्कृतियों के साथ खुद को ढाल लिया और वहां की स्थानीय जनजातियों से विवाह सम्बंध बनाए। वे अपनी आनुवंशिक विरासत (Genetic heritage) तो साथ लेकर गए, लेकिन अपनी संस्कृति स्थानीय लोगों के साथ ढाल ली। यह अनुमान शोधकर्ताओं ने उनकी कब्रों और पूर्व में दफन उनके पूर्वजों की कब्रों अंतर के आधार पर दिया है – उनकी कब्रों में विशिष्ट बड़े आकार के सोने की परत वाले कांस्य बेल्ट बकल और अन्य आभूषणों का अभाव था जो उनके पूर्वजों की कब्रों में पाए जाते हैं।

बहरहाल, यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि सिर्फ आनुवंशिक जानकारी के आधार पर उन्हें श्योन्ग्नू के वंशज कहा जा रहा है। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि वे खुद को श्योन्ग्नू से सम्बंधित मानते थे, या एक सर्वथा अलग ही समूह मानते थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हड्डी के औज़ारों का इस्तेमाल कब शुरू हुआ ?

a: हाथी की हड्डी से बने औज़ार, b: दरियाई घोड़े की हड्डी से बने औज़ार

मानव विकास (human evolution) के इतिहास में पाषाण काल (stone age) एक विशेष महत्व रखता है। एक मायने में इसे पहली औद्योगिक क्रांति (first industrial revolution) कहा जा सकता है – लगभग तीस लाख साल पहले का एक ऐसा दौर जब मनुष्यों ने पत्थरों से औज़ार (stone tools) बनाना और उनका इस्तेमाल करना शुरू किया था। पाषाण काल में पत्थरों के औज़ार के साथ-साथ इन्हीं मनुष्यों द्वारा जब-तब हड्डी के औज़ार (bone tools) इस्तेमाल किए जाने के भी प्रमाण मिलते हैं। लेकिन ये प्रमाण बहुत छिट-पुट रूप में मिलते हैं। जैसे शोधकर्ताओं को करीब 14 लाख साल पुरानी हड्डी से बनी कुल्हाड़ी मिली थी, फिर 5 लाख साल पुराने कुछ और औज़ार मिले थे। लेकिन बहुत कम प्रमाणों के चलते सटीक रूप से यह निर्धारित नहीं किया जा सका है कि मनुष्यों ने हड्डी के औज़ार बनाना कब शुरू किया।

इतने कम प्रमाण का एक कारण है कि पत्थरों के माफिक हड्डियां सालों-साल सुरक्षित नहीं रहतीं। हड्डियां समय के साथ सड़-गल जाती हैं, और जैसी-तैसी हालत में जो हड्डियां मिलती भी हैं उनमें यह अंतर कर पाना एक बड़ी चुनौती होती है कि वे किसी जीव की हड्डियां मात्र हैं या मनुष्यों ने उन्हें तराश कर औज़ार का रूप दिया था।

बावजूद इसके, किसी बात को पुख्ता तौर पर कहने के लिए वैज्ञानिकों (scientists) की पैनी नज़रें सदैव ही अधिकाधिक प्रमाणों की तलाश में रहती हैं। इसी उद्देश्य से 2015 में, पुरातत्वविदों (archaeologists) के एक दल ने तंज़ानिया के ओल्डुवाई गॉर्ज (Olduvai Gorge) पुरातात्विक स्थल (archaeological site) पर खुदाई कार्य शुरू किया था। दरअसल इस स्थल पर पूर्व में भली-भांति संरक्षित जीवाश्म (fossils) और पत्थर के औज़ार मिले थे, जो 20 लाख साल की लंबी अवधि के मानव विकास के इतिहास को बयां कर रहे थे। इस स्थल की 8 मीटर गहरी खुदाई करीब 8 साल में पूरी हुई थी।

पहले तो शोधकर्ताओं ने इन परतों का काल-निर्धारण किया; ये परतें करीब 15 लाख साल पुरानी थीं। फिर खुदाई में मिली हाथी के पांव की एक हड्डी और बाकी हड्डियों (से बने औज़ारों) का बारीकी से अवलोकन किया। कुल मिलाकर इस खुदाई स्थल से उन्हें हड्डियों के 27 औज़ार मिले। अवलोकन में दिखा कि इन हड्डियों पर तराशने के निशान हैं; आकार देने के लिए उनसे छीलकर हटाई गई छिल्पियों के निशान साफ गवाही दे रहे थे कि ये महज़ हड्डियां नहीं बल्कि औज़ार हैं। पाया गया कि अधिकतर औज़ार हाथी (elephant) और दरियाई घोड़े (hippopotamus) जैसे विशालकाय जानवरों की हड्डियों से बनाए गए थे।

इन औज़ारों की बनावट वगैरह देखकर लगता है कि इनका इस्तेमाल मांस काटने (butchering) और हड्डियों के अंदर से मज्जा निकालने के लिए हड्डियों को तोड़ने में किया जाता होगा। इस आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि उस समय के मनुष्य जानवरों को केवल भोजन के स्रोत (food source) के रूप में ही नहीं बल्कि अन्य संसाधन (resources)  के तौर पर भी देखते थे।

बहरहाल, नेचर (Nature) में प्रकाशित ये नतीजे बताते हैं कि हमारे एक पूर्वज, होमो इरेक्टस (Homo erectus), करीब 15 लाख साल पहले पत्थर के औज़ार (stone tools)  बनाने के साथ-साथ हड्डियों के औज़ारों का भी इस्तेमाल करते थे। हालांकि इस खुदाई स्थल से मानव शरीर के कोई अवशेष (human remains) नहीं मिले हैं। फिर भी ये नतीजे मनुष्यों के प्रारंभिक विकास (early human evolution) को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इससे पता चलता है कि उनमें चीज़ों के गुणों के मुताबिक उनका इस्तेमाल करने को लेकर समझ थी। पत्थरों और हड्डियों की विशेषता अलग-अलग हैं, उनकी विशेषता के मुताबिक औज़ार बनाना और इस्तेमाल करना इसी कौशल को दर्शाता है। पत्थरों के मुकाबले उसी साइज़ की हड्डी वज़न में हल्की होती हैं। यानी हड्डियों से कहीं अधिक बड़े और हल्के औज़ार बन सकते हैं, जो भाले (spears) वगैरह के लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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बंद पड़ी रेल लाइन का ‘भूत’

भूत-प्रेत (Ghost stories) के किस्से कहानियां काफी प्रचलित हैं। यकीन करें या ना करें, लेकिन ऐसे किस्से-कहानियां इतने रोमांचक होते हैं कि हर जगह इनको सुनने-सुनाने वाले लोग मिल ही जाते हैं।

किसी भी आहट, हरकत, या मंज़र को भूत की करामात मान लेने का हुनर और विश्वास दुनिया के सभी हिस्सों में होता है और ऐसे किस्से हर जगह मिल जाएंगे। इसी का एक उदाहरण है दक्षिण कैरोलिना (South Carolina haunted places) के समरविले के जंगल में एक बंद पड़ी रेल लाइन (Abandoned railway track) पर अचानक कौंधने वाली चमक।

इस इलाके के कुछ बड़े-बुज़ुर्ग इस चमक से जुड़ी एक भूतिया कहानी (Ghost legend) सुनाते हैं: कई साल से एक महिला रात के वक्त हाथ में लालटेन लिए अपने पति का सिर इस रेल लाइन (Haunted railway track)  पर तलाशने निकलती है। उसका पति कभी किसी समय इस रेल लाइन पर ट्रेन से कट गया था और इस घटना में उसका सिर धड़ से अलग हो गया था।

इस कहानी पर गौर करें तो मन में कुछ ज़ाहिर से सवाल उठ सकते हैं। जैसे महिला को यदि सिर की ही तलाश है तो वह रात में तलाशने क्यों निकलती है, दिन में क्यों नहीं जाती? दिन में तलाशे तो सिर मिलने की संभावना अधिक होगी।

इसी कहानी का एक दूसरा रूप भी सुनने को मिलता है: 1880 के दशक में जब यह रेल लाइन (Old railway stories) चालू थी तब एक महिला रोज़ रात को हाथ में लालटेन (Lantern ghost story) लिए अपने ट्रेन कंडक्टर पति से मिलने और उसे खाना देने इस रेल ट्रेक पर आती थी। एक रात को वह आई लेकिन ट्रेन नहीं आई, बस खबर आई कि ट्रेन पटरी से उतर गई है और उसका पति उसमें मारा गया। लेकिन उसे यकीन नहीं हुआ और इस विश्वास में कि उसका पति लौटकर आएगा, वह रात को यहां लालटेन लेकर उसका इंतज़ार करती है।

कहानी के ऐसे कुछ और भी संस्करण सुनने को मिलते हैं। लेकिन जितने भी संस्करण आप सुनेंगे, उनमें एक चीज़ कॉमन है: रेल ट्रेक के पास लालटेन की रोशनी, या यूं कहें लालटेन की लौ के समान प्रकाश की वलयाकार चमक। दरअसल, इन सभी कहानियों में (एकमात्र) यही वास्तविक अवलोकन है और लोगों द्वारा इसके विविध अनुभवों ने भूतिया कहानियों (Paranormal stories)  को जन्म दिया है।

इन कहानियों ने जब स्थानीय किस्सागोई से आगे बढ़कर किताबों और अखबारों की सुर्खियों में जगह बनाई तो यू.एस. जियोलॉजिकल सर्वे (US Geological Survey) की भूकंपविज्ञानी सुज़ैन हफ (Seismologist Susan Hough) का ध्यान इनकी ओर गया। और बारीकी से जब उन्होंने इनके विवरणों को पढ़ा तो पाया कि यह कोई भूत-प्रेत (Ghost phenomena) का मामला नहीं बल्कि एक भूकंपीय घटना (Seismic event) का संकेत है।

जैसे लोगों ने कहा था कि उन्होंने अपनी कारें बेतहाशा हिलते हुए महसूस कीं, या अचानक घर के दरवाज़े हिलते हुए देखे। स्पष्ट तौर पर ये भूकंप के नतीजे थे। अलबत्ता, कुछ विवरण ऐसे थे जो सीधे तौर पर भूकंपीय घटना (Earthquake lights) से जुड़े नहीं लगे रहे थे। जैसे, लोगों को शोर और फुसफुसाहट सुनाई देना। लेकिन हवा में टंगी वलयाकार रोशनी(annular light) तो भूकंपीय घटना का परिणाम लग रही थी।

दरअसल इस इलाके में किए उनके पूर्वकार्य के अनुभव कह रहे थे कि यह रोशनी भूकंपीय घटना का परिणाम है। 2023 में, हफ और उनके साथियों ने इन्हीं पटरियों पर फील्डवर्क करते समय देखा था कि इन पटरियों में एक अजीब सा खम (घुमाव) है; बिछे ट्रेक पर पटरियां जहां-तहां थोड़ा मुड़ गई हैं और सीधी की बजाय लहरदार बिछी हैं। कभी सीधी रहीं इन पटरियों के लहरदार हो जाने का कारण उन्होंने 1886 में चार्ल्सटन में 7.3 तीव्रता का भूकंप (Charleston earthquake 1886) पाया था।

फिर, कई अन्य जगहों पर भूकंपीय रोशनियां (Earthquake lights phenomenon) अनुभव भी की गई हैं, जैसे विलमिंगटन और कैरोलिनास में भी इसी तरह की रोशनी दिखने की सूचना मिली है। और ये विलमिंगटन, कैरोलिनास या दक्षिणी कैरोलिना में ही नहीं, बल्कि कहीं भी दिख सकती हैं। लेकिन इनका अध्ययन करना मुश्किल है, क्योंकि ये कब-कहां दिखेंगी इसका कोई ठिकाना नहीं, इसलिए भूकंप की रोशनी को कैमरों वगैरह में कैद करना थोड़ा मुश्किल है। और फिर अब इतने सालों बाद समरविले और ऐसे अन्य स्थान इतने भी सुनसान और अंधकार में डूबे नहीं रहे हैं कि पल भर को कौंधती रोशनी अच्छे से दिख जाए।

जापान के एक वैज्ञानिक, युजी एनोमोटो ने इन भूकंपीय रोशनियों (Mysterious glow) के निकलने का कारण तो बताया है। जब भूकंप आता है तो कभी-कभी इसके साथ रेडॉन या मीथेन जैसी गैसें निकलती हैं, और जब ये गैसें ऑक्सीजन के संपर्क में आती हैं तो जलने लगती हैं। नतीजतन चमक (Mysterious glow) पैदा होती है।

लेकिन समरविले के मामले में हफ का ख्याल है कि यहां भूकंप के साथ रोशनी पैदा करने में रेडॉन या मीथेन जैसी गैसें नहीं बल्कि रेल की पटरियां भूमिका निभाती हैं। दरअसल साउथ कैरोलिना में अपने फील्डवर्क के दौरान उन्होंने देखा था कि ट्रेक के आसपास पुरानी पड़ चुकी पटरियों का ढेर पड़ा हुआ है। होता यह है कि जब रेल कंपनियां पुरानी पटरियों को बदलती हैं तो प्राय: पुरानी पटरियों को वहां से हटाती ही नहीं हैं। इसलिए, ट्रेक के आसपास ढेर सारी स्टील की पटरियां पड़ी होती हैं। और थोड़ी हलचल या भूकंप से जब ये पटरियां आपस में रगड़ खाती हैं तो इनसे चिंगारी निकलती है, जो लोगों ने अनुभव की। और कहानी बन गईं।

अपने इस विचार को हफ ने सिस्मोलॉजिकल रिसर्च लैटर्स (Seismological Research Letters) में प्रकाशित किया है, और वे इस पर खुद व अन्य लोगों द्वारा आगे काम करने और भूकंपीय रोशनी को तफसील से समझने की उम्मीद करती हैं।

बहरहाल, जैसा कि हमने शुरुआत में कहा, हमारे यहां भी ऐसी ढेरों कहानियां मशहूर हैं। भानगढ़ के मशहूर किले (Bhangarh Fort haunted place)  को ही ले लें; किले में रात के वक्त सुनाई देने वाली आवाज़ें उसे भूतिया करार देती हैं। हफ के द्वारा किया गया यह अध्ययन और उसका परिणाम क्या हमारे यहां के वैज्ञानिकों को यह समझने के लिए प्रेरित कर सकता है कि खाली पड़े खंडहर में रात को किसी (‘प्राणी’ या ‘शय’) की गूंज/पुकार (Supernatural sounds)  सुनाई देती है या माजरा कुछ और ही है? (स्रोत फीचर्स)

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गाज़ा: तबाही के साये में शोध कार्य

युद्ध (war), तबाही (destruction) और अनिश्चितता (uncertainty) के बावजूद, गाज़ा (Gaza) के वैज्ञानिक (scientists) अपने शोध (research) कार्य जारी रख रहे हैं। वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि शोध (scientific research) न केवल विनाश (documentation of destruction) के दस्तावेज़ीकरण और पुनर्निर्माण (reconstruction efforts) प्रयासों में मदद करता है, बल्कि मानवीय संकटों (humanitarian crisis) के समाधान के लिए भी आवश्यक है। 19 जनवरी को हमास (Hamas) और इस्राइल (Israel) के बीच अस्थायी संघर्ष विराम (ceasefire) से वैज्ञानिकों को स्थिति का आकलन करने का अवसर मिला है।

न्यूरोसाइंटिस्ट (neuroscientist) खमीस एलसी, जो वर्तमान में घायलों का इलाज कर रहे हैं, युद्ध के प्रभावों को दर्ज करने और प्रकाशित करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। इसी तरह, जलवाहित रोगों (waterborne diseases) के विशेषज्ञ सामर अबूज़र सुधार व पुनर्निर्माण में शोध (scientific studies) की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, विज्ञान (science) और शिक्षा (education) के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के चलते वैज्ञानिकों (Gaza scientists) ने अपना काम जारी रखा है।

युद्ध (conflict) के कारण गाज़ा की 22 लाख आबादी में से 90 प्रतिशत बेघर (homeless) हो गई है। भोजन (food crisis), पानी (water shortage), स्वास्थ्य सेवाएं (healthcare services) और शिक्षा (education crisis) जैसी बुनियादी सुविधाएं या तो नष्ट हो गई हैं या अत्यधिक सीमित रह गई हैं। बमबारी (airstrikes) से तबाह इलाकों से मलबा हटाना एक बड़ी चुनौती है। गाज़ा (Palestine conflict) के प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में करीब 100 किलोग्राम मलबा जमा है जिसमें खतरनाक पदार्थ (hazardous materials) भी मौजूद हैं।

गाज़ा में पानी (clean water crisis) की स्थिति भी गंभीर है। यहां 97 प्रतिशत पानी भूजल स्रोतों (groundwater contamination) से आता है, जो अत्यधिक असुरक्षित हैं और इनके दूषित होने का खतरा भी है। युद्ध (war damage) से पहले भी महज 10 प्रतिशत लोगों को साफ पानी (safe drinking water) मिलता था, लेकिन अब मात्र 4 प्रतिशत लोगों को ही मिल रहा है। टूटी-फूटी सीवेज लाइन (damaged sewage system) के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे डायरिया (diarrhea) और हेपेटाइटिस (hepatitis outbreak) जैसी जलवाहित बीमारियों (waterborne infections) का खतरा बढ़ गया है।

युद्ध (war crisis) के कारण गाज़ा (Gaza universities) के 21 उच्च शिक्षण संस्थानों में से 15 बुरी तरह क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके हैं। अस्पतालों (hospitals in Gaza) की स्थिति भी गंभीर है – लगभग आधे पूरी तरह बंद हैं, जबकि बाकी सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों (chronic diseases) से जूझ रहे 11,000 मरीज़ों को न तो इलाज मिल रहा है और न ही उनके पास विदेश में उपचार का कोई अवसर है।

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि सबसे पहले आवास (housing rehabilitation), सीवेज मरम्मत (sewage repair) और स्वास्थ्य सेवाओं (health services restoration) को बहाल करना ज़रूरी है। ऑनलाइन-लर्निंग विशेषज्ञ (online education expert) आया अलमशहरावी अस्थायी शिविर (temporary shelters) और घरों के पुनर्निर्माण (home reconstruction) के लिए तुरंत कदम उठाने की अपील कर रही हैं। वे खुद एक बमबारी (bombing survivor) में बचीं, जिसमें उनके अपार्टमेंट में 30 लोगों की जान चली गई, और अब वे एक शरणार्थी शिविर (refugee camp) में रह रही हैं।

भारी विनाश (mass destruction) के बावजूद, गाज़ा (Gaza research community) के वैज्ञानिक समुदाय का संकल्प अटूट है। वे इस संकट (ongoing crisis) का दस्तावेज़ीकरण कर रहे हैं और भविष्य के पुनर्निर्माण (future rebuilding) में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह साबित करता है कि युद्ध (war-torn regions) के कठिन समय में भी ज्ञान (knowledge) और शोध (scientific progress) को आगे बढ़ते रहना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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दांतों ने उजागर किया स्तनपान का पैटर्न

मां के दूध (breastfeeding) के जगजाहिर फायदों को देखते हुए सलाह दी जाती है कि पहले 6 महीनों तक शिशु को केवल स्तनपान कराना चाहिए। लेकिन शिशु को स्तनपान कराना बंद कब करें? यह प्रश्न जितना महत्वपूर्ण आजकल के माता-पिता के लिए है, उतना ही महत्वपूर्ण प्राचीन रोमवासियों (ancient Romans) के लिए भी था। और प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ नेक्सस (PNAS Nexus) में प्रकाशित हालिया अध्ययन कहता है कि आधुनिक समय और प्राचीन समय के बाशिंदो की न सिर्फ स्तनपान सम्बंधी चिंताएं एक जैसी हैं, बल्कि स्तनपान बंद कराने की प्रवृत्ति भी मेल खाती है। पाया गया कि अतीत में ग्रामीण रोमवासियों की तुलना में शहरी रोमवासी बच्चे का स्तनपान जल्दी बंद करा देते थे, और स्तनपान बंद कराने के ऐसे ही पैटर्न (weaning trends) आधुनिक समय में भी दिखते हैं।

मां का दूध शिशुओं को पोषक तत्व और एंटीबॉडीज़ (antibodies)  देता है जो उन्हें बीमारियों से बचाते हैं और उनकी अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास में मदद करते हैं। ऐसा देखा गया था कि बेबी फॉर्मूला के आगमन से पहले, जिन शिशुओं का मां का दूध बहुत जल्दी छुड़ा दिया जाता था उन्हें संक्रमण (infection risk)  होने का जोखिम अधिक होता था। द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के सोरेनस जैसे चिकित्सकों ने स्तनपान के बारे में विस्तार से लिखा था, और बच्चे के लगभग दो वर्ष की आयु होने पर स्तनपान बंद करने (weaning off) की सलाह दी थी। वर्तमान में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) सलाह देता है कि पहले छह महीने तक सिर्फ स्तनपान कराना चाहिए, और फिर धीरे-धीरे कम करते हुए दो साल की उम्र तक स्तनपान छुड़ाया जा सकता है।

लेकिन प्राचीन समय में स्तनपान प्रथाएं (breastfeeding practices) कैसी थीं? प्राचीन रोम के संदर्भ में हुए कुछ अध्ययनों में इसे समझने के लिए प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों और पुरातात्विक अवशेषों (archaeological remains)  को ही खंगाला गया था। लेकिन इन ग्रंथों तक पहुंच अक्सर अमीर परिवारों की ही होती थी, जो शहरों में रहते थे और आम तौर पर अपने शिशुओं को स्तनपान कराने के लिए धाय-मां (wet nurse)  रखते थे। इसलिए रोमन साम्राज्य के ग्रामीण इलाकों में शिशुओं का खान-पान अब तक अनजाना ही था।

मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ जियोएंथ्रोपोलॉजी (Max Planck Institute of Geoanthropology) के जैव पुरातत्वविद कार्लो कोकोज़ा की टीम संपूर्ण रोमन साम्राज्य (ग्रामीण और शहरी) (urban and rural Roman Empire)  में बच्चों के आहार पैटर्न समझना चाहती थी। लेकिन इसे समझने के लिए अध्ययन किसका किया जाए?

दांतों व दाढ़ों की डेंटाइन (dentine analysis) इसमें मददगार साबित हो सकती है। दरअसल डेंटाइन के ऊतकों की परतें आपने कब क्या खाया, सब बयां कर सकती हैं। और, मां के दूध में कार्बन-13 (carbon-13) के मुकाबले नाइट्रोजन-15 (nitrogen-15 isotope) आइसोटोप का स्तर काफी अधिक होता है। डेंटाइन की परतों में नाइट्रोजन आइसोटोप का स्तर देखकर स्तनपान बंद किए जाने के समय का अंदाज़ा लगाया सकता है; जब तक शिशु स्तनपान कर रहा होगा नाइट्रोजन आइसोटोप डेंटाइन की शुरुआती परतों में अधिक मिलेगा और बंद करने के बाद की परतों में अचानक से नदारद दिखेगा।

तो, शोधकर्ताओं ने पहली शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर चौथी ईसवीं सदी के समय में रोमन साम्राज्य (ancient Roman sites)  में रहने वाले 45 वयस्कों की पहली दाढ़ (molar tooth) के डेंटाइन का अध्ययन किया। इन दाढ़ों को शहरी इलाकों – जैसे ग्रीस के थेसालोनिकी और इटली के पोम्पेई से लेकर ग्रामीण इलाकों – जैसे इंग्लैंड के बैनेस और इटली के ओस्टिया तक से प्राप्त किया गया था।

विश्लेषण में पाया गया कि रोमन साम्राज्य के शहरी स्थलों में स्तनपान दो वर्ष की आयु में बंद कर दिया जाता था, जबकि ग्रामीण स्थलों में डेढ़ साल से लेकर पांच साल की आयु तक के बच्चों को स्तनपान कराया जाता था। इससे लगता है कि रोम के शहरी केंद्रों से दूर के स्थलों पर ‘आधिकारिक’ चिकित्सा सलाह कम पहुंची होगी, साथ ही यह भी लगता है कि निम्न आय वाले ग्रामीण परिवार (low-income rural families) यह सोचकर स्तनपान लंबे समय तक जारी रखते होंगे कि सीमित भोजन (food scarcity) एक और शिशु में न बंटे।

ये नतीजे आज के स्तनपान पैटर्नों (modern breastfeeding patterns)  से मेल खाते हैं। अध्ययन बताते हैं कि वर्तमान समाज में शहरी क्षेत्रों में स्तनपान जल्दी छुड़ाया जाता है। इसका एक कारण शहरीकरण है; जीवन स्तर में सुधार के साथ लोगों के स्वास्थ्य और पोषण में सुधार (improved living standards) हुआ है, साथ ही चिकित्सा तक अधिक पहुंच (access to healthcare) भी हुई है। दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों (rural communities)  में लंबे समय तक स्तनपान जारी रहता है।

बहरहाल, ये निष्कर्ष सीमित नमूनों (limited sample size)  पर आधारित हैं इसलिए पर्याप्त डैटा (data collection)  के साथ अधिक अध्ययन इन नतीजों को मज़बूती दे सकते हैं। साथ ही कई अनुत्तरित सवालों के जवाब भी दे सकते हैं। जैसे, क्या आप्रवासी लोग (immigrant communities)  रोमन चिकित्सकों की सिफारिशों का पालन करते थे? (स्रोत फीचर्स)

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तंबाकू के विरुद्ध आवाज उठाने वाले वैज्ञानिकों पर संकट

वैसे तो हम सभी जानते हैं कि तंबाकू[tobacco], शराब [alcohol] और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों [ultra-processed foods]  का सेवन हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन इस जागरूकता को लाने में एक भूमिका वैज्ञानिकों [scientists] की भी है। क्योंकि यूं बेबुनियाद तो किसी चीज़ को नुकसानदेह या फायदेमंद नहीं कहा जा सकता। कोई चीज़ कितनी नुकसानदेह या कितनी फायदेमंद है, इस बात का निर्णय सतत शोधकार्यों [scientific research]  के ज़रिए बारीकी से पड़ताल करने के बाद होता है।

इस पड़ताल के दौरान वैज्ञानिकों को न सिर्फ अनुसंधान सम्बंधी चुनौतियों [research challenges] का सामना करना पड़ता है बल्कि उन्हें ऑनलाइन धमकियां [online threats], मुकदमे [lawsuits], सायबर हमले [cyber attacks], और यहां तक कि जान से मारने की धमकियां [death threats] तक झेलनी पड़ती हैं। इन वैज्ञानिकों को बदनाम करने और स्वास्थ्य से जुड़े अहम नियमों [public health policies] को टालने के लिए तंबाकू उद्योग [tobacco industry] ऐसी ही रणनीतियां अपनाते हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन [study] में इस समस्या पर प्रकाश डाला गया है।

हेल्थ प्रमोशन इंटरनेशनल [Health Promotion International] में प्रकाशित अध्ययन में वर्ष 2000 से 2022 के बीच 64 प्लेटफॉर्म पर दर्ज हुए उत्पीड़न [harassment] के मामलों की समीक्षा की गई: करीब आधे मामले वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं [public health activists] को अखबारों [news media], सोशल मीडिया [social media], विज्ञापनों [advertisements] और टीवी [TV] के ज़रिए बदनाम करने के संगठित प्रयास थे।

तंबाकू और अन्य उद्योग आम तौर पर शोधकर्ताओं को ‘चरमपंथी’ [extremist] या ‘पाबंदीपसंद’ [prohibitionist] साबित करने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए, पोलैंड में एक तंबाकू कंपनी [tobacco company] ने इन वैज्ञानिकों को ‘लड़ाकू चरमपंथी’ कहा है। कड़े नियमों की मांग करने वाले शोधकर्ताओं को ‘निकोटीन नाज़ी’ [nicotine nazi], ‘स्वास्थ्य तानाशाह’ [health dictator] और ‘प्रतिबंधवादी’ [ban supporter] जैसे आपत्तिजनक नामों से पुकारा जाता है।

इन आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल एक बड़ी रणनीति [industry strategy] का हिस्सा है, जिसका मकसद जन स्वास्थ्य उपायों [public health measures] को बाधित करना और तंबाकू, मीठे पेय [sugary drinks] और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण वाले कानूनों [regulations] के क्रियांवयन को टालना या रोकना है।

कभी-कभी तो ये दहशतगर्दियां हिंसा [violence] तक पहुंच जाती हैं; ऐसा छ: मामलों में देखा गया है। नाइजीरिया में तंबाकू नियंत्रण [tobacco control] के पक्ष में बोलने वाले एक कार्यकर्ता और उनके बच्चों को बंदूक की नोक पर धमकाया गया। इस घटना में उनके साले और गार्ड की हत्या कर दी गई।

कोलंबिया में, डॉ. एस्पेरैंज़ा सेरॉन को मीठे पेय पर कर लगाने [sugar tax] के समर्थन में अभियान चलाने पर धमकियां मिलीं, डरावने फोन कॉल्स आए और मोटरसाइकिल सवार लोगों ने उनका पीछा किया; बाद में उन्हें जान से मारने की धमकी मिली।

इन दहशतों के बावजूद, अधिकतर शोधकर्ता [researchers] अपने काम पर डटे रहे। वैसे डराने-धमकाने के कारण बहुत थोड़े लोग पीछे भी हटे या हिचके।

युनिवर्सिटी ऑफ बाथ [University of Bath] में तंबाकू नियंत्रण पर शोध कर रही वैज्ञानिक डॉ. केरन इवांस-रीव्स ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया पर उपहास [online trolling] का सामना करना पड़ा, तंबाकू कंपनियों ने उनकी आलोचना की और उन पर कानूनी कार्रवाई की धमकी भी दी। उन्होंने इस बात को साझा किया है कि उनके काम पर लगातार निगरानी रखने से उन्हें मानसिक रूप से कितना दबाव झेलना पड़ा। अलबत्ता, उन्होंने अपना शोध जारी रखा।

यह अध्ययन [research study] उन अदृश्य दिक्कतों को उजागर करता है, जिनका सामना जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए काम करने वाले शोधकर्ताओं को करना पड़ता है। अध्ययन इस बात पर भी ज़ोर देता है कि वैज्ञानिकों को वैश्विक समर्थन [global support] की ज़रूरत है ताकि वे डर और हिंसा के बिना अपना काम कर सकें।

इन शोधकर्ताओं की दृढ़ता यह दर्शाती है कि जोखिमों के बावजूद वे स्वस्थ समाज [healthy society] बनाने के अपने मिशन में अडिग हैं। यह शोध हमें याद दिलाता है कि शक्तिशाली उद्योगों [powerful industries] के खिलाफ यह संघर्ष [struggle] जारी है और उन लोगों की सुरक्षा बेहद ज़रूरी है जो समाज के हित में काम कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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गाज़ा: बच्चों पर युद्ध का मनोवैज्ञानिक असर

हालिया अध्ययन ने गाज़ा के बच्चों पर युद्ध के विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभावों (psychological Impacts) का एक दिल दहला देने वाला खुलासा किया है। पता चला है कि 96 प्रतिशत बच्चों का मानना है कि उनकी मृत्यु अवश्यंभावी है। वॉर चाइल्ड एलायंस (Child war alliance) के सहयोग से गाज़ा स्थित एक एनजीओ (NGO) द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में बच्चों के गहरे भावनात्मक और मानसिक संकट को उजागर किया गया है। इस अध्ययन में शामिल लगभग आधे बच्चों ने अपने ऊपर होने वाले भारी आघात के कारण मरने की इच्छा व्यक्त की है। 

यह रिपोर्ट गाज़ा में जीवन की जो तस्वीर पेश करती है, उसमें बच्चे लगातार डर(Fear), चिंता(Anxiety) और क्षति से जूझ रहे हैं। लगभग 79 प्रतिशत बच्चे दुस्वप्न (Nightmares) देखते हैं, 73 प्रतिशत में आक्रामकता(Aggression) के लक्षण दिखाई देते हैं, और 92 प्रतिशत को अपने वर्तमान हालात को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस होती है। ये लक्षण उस गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संकेत हैं, जो बमबारियां(Bombardments) देखने, अपनों को खोने और घर से बेघर होने जैसी त्रासदियों का सामना करने से पड़े हैं।

इस सर्वे में 504 बच्चों के देखभालकर्ताओं से जानकारी जुटाई गई। इनमें से कई परिवारों में विकलांग, घायल या अकेले रह रहे बच्चे हैं। यह गाज़ा में 19 लाख से अधिक विस्थापित फिलिस्तीनियों(Palestinians) के मानवीय संकट को उजागर करता है, जिनमें से आधे बच्चे हैं। इनमें से कई बच्चों को बार-बार अपने मोहल्लों से भागने पर मजबूर होना पड़ा है, और अनुमान है कि लगभग 17,000 बच्चे अब अपने माता-पिता (Parents) से बिछड़ चुके हैं। 

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन अनुभवों के गहरे और स्थायी प्रभाव हो सकते हैं। बुरे सपने देखना, सामाजिक रूप से अलग-थलग होना, एकाग्रता में कठिनाई और यहां तक कि शारीरिक दर्द जैसी समस्याएं आम हैं। रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ऐसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं (mental health problems) लंबे समय तक भावनात्मक और व्यवहारिक बदलाव ला सकती हैं, जिससे सदमा पीढ़ियों तक बना रह सकता है।

यह अच्छी बात है कि राहत पहुंचाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं, जिसमें वॉर चाइल्ड (war child) और उसके साझेदारों ने 17,000 बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता (mental health support) दी है। लेकिन संकट का पैमाना बहुत बड़ा है, और संगठन का लक्ष्य अगले तीन दशकों में अपनी सबसे बड़ी मानवीय प्रतिक्रिया के तहत 10 लाख बच्चों की मदद करना है। 

वॉर चाइल्ड यूके (war child UK) की सीईओ हेलेन पैटिन्सन ने मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य आपदा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संकट में बदलने से रोकने के लिए तुरंत अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया। उन्होंने गाज़ा के बच्चों पर पड़े अदृश्य घावों के साथ-साथ घरों, अस्पतालों और स्कूलों के विनाश को दूर करने के लिए वैश्विक हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

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मानव की दो पूर्वज प्रजातियों के पदचिंह साथ-साथ मिले

श्मीभूत पदचिंहों (fossilized footprints) के एक अध्ययन में रोमांचक बात सामने आई है। लगभग 15 लाख वर्ष पूर्व किसी दिन हमारे वंश होमो का सदस्य अफ्रीका की एक झील के कीचड़ भरे किनारे पर चला था और उसके चंद घंटे आगे-पीछे मानव कुल के एक और सदस्य ने उसी स्थान पर चहलकदमी की थी। वह दूसरा सदस्य संभवत: अपेक्षाकृत छोटे मस्तिष्क और बड़े जबड़े वाला पैरेन्थ्रोपस (paranthropus) था। देखने वाली बात यह है कि ये दोनों एक ही जगह पर, एक ही समय पर अस्तित्व में थे। यह रोमांचक खोज साइन्स (science)पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

यह खोज पूर्व में प्रस्तावित इस धारणा के विपरीत है कि कोई भी दो होमिनिन प्रजातियां एक ही स्थान और एक ही समय पर साथ-साथ नहीं रही थीं। लेकिन पिछले वर्षों में खोदे गए जीवाश्म दर्शाते हैं कि हमारे पूर्वज और अन्य होमिनिन प्रजातियां सह-अस्तित्व में रही थीं। लेकिन उन जीवाश्मों के आधार पर पक्का निष्कर्ष निकालने में एक दिक्कत यह रही थी कि एक ही भूगर्भीय परत में पाए गए जीवाश्म हज़ारों या दसियों हज़ार वर्षों की अवधि में जमा हुए हो सकते हैं। इसलिए यह कहना संभव नहीं था कि विभिन्न होमिनिन वंश एक ही समय पर एक स्थान पर रहे थे।

उपरोक्त पदचिंह 2021 में रिचर्ड लोकी (Richard Lokey) द्वारा खोजे गए थे। उन्होंने केन्या के मशहूर जीवाश्म स्थल कूबी फोरा (Koobi Fora) में तुर्काना झील के निकट कई जीवाश्म खोजे थे। कूबी फोरा में कई होमिनिन जीवाश्म मिल चुके हैं और इन्हें उभारने में लुइस लीकी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने यहां कम से कम पांच होमिनिन प्रजातियों की खोज की है। लेकिन ये पदचिंह खास तौर पर संरक्षित रहे हैं।

फिर 2022 में इन पदचिंहों के बारीकी से अध्ययन के लिए केविन हटाला (Kevin Hatala) और नील रोच (Neil Roach) को आमंत्रित किया गया। पदचिंहों में 13 कदम एक व्यक्ति के हैं जो तेज़ी से चलकर पूर्व की ओर गया था। इन पदचिंहों से 1 मीटर से भी कम दूरी पर अन्य तीन पदचिंह हैं जो उत्तर की ओर जा रहे हैं। आम तौर पर पदचिंह तभी भलीभांति संरक्षित रह पाते हैं जब बनने के फौरन बाद वे मिट्टी, रेत अथवा राख से ढंक जाएं। इन्हें देखकर लगता है कि ये चंद घंटों के अतंराल पर बने होंगे।

हटाला की टीम ने इन पदचिंहों की आकृति व साइज़ की तुलना 340 वर्तमान मनुष्यों के पदचिंहों और अफ्रीका के अन्य प्राचीन मानव पदचिंहों से की। हटाला की टीम यह तो पहले ही दर्शा चुकी थी कि जब हमारी प्रजाति के प्राणी कीचड़ वाली जगह पर चलते हैं तो हमारा पैर ज़मीन पर एक मेहराब छोड़ता है। लेकिन तंज़ानिया के लेटिओली (Laetoli) में करीब 36.6 लाख साल पहले कुछ होमिनिन प्राणियों ने ज़्यादा सपाट पदचिंह छोड़े थे। यह संभवत: ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus)वंश का होमिनिन था।

कूबी फोरा में जो अलग-थलग पदचिंह मिले हैं वे दो या तीन अलग-अलग प्राणियों के हैं और काफी हद तक आधुनिक मानव (modern humans) जैसे हैं। ये संभवत: हमारे ही वंश होमो के सदस्य हैं। लेकिन पदचिंहों की जो लंबी कतार है, उसमें चिंह बगैर मेहराब वाले यानी सपाट हैं। लगभग लैटिओली में मिले ऑस्ट्रेलोपिथेकस जैसे।

विश्लेषण से पता चला है कि इस प्राणी के पैर के अंगूठे में अधिक लचीलापन था और यह उसके पास वाली उंगली से दूर की ओर अधिक मुड़ा हुआ था। यह आधुनिक मानवों से भिन्न है और चिम्पैंज़ी (chimpanzee) में देखा जाता है और उन्हें पेड़ों पर चढ़ने में मददगार होता है।

तो लगता है कि हमारे वंश होमो के एक प्रारंभिक सदस्य और एक अन्य किस्म के होमिनिन शायद एक ही दिन वहां चले होंगे। यह इन प्रजातियों के सह-अस्तित्व का ज़्यादा मज़बूत प्रमाण है। यह तो पता ही था कि सीधे चलने वाले होमिनिन्स – होमो इरेक्टस (Homo erectus) और पैरेन्थ्रोपस बॉइसाई (Paranthropus boisei) – की काफी सारी हड्डियों और दांत के जीवाश्म उस इलाके में मिले हैं और ये लगभग पदचिंह के समय के हैं। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे प्राचीन वर्णमाला मिली

कुछ वर्ष पूर्व सीरिया की एक कब्र से मिट्टी की बेलनाकार कृतियां मिली थी, और अब विश्लेषण से निष्कर्ष निकला है कि उन पर 4400 साल पुरानी वर्णमाला के अक्षर अंकित हैं। और ये संभवत: अब तक की ज्ञात सबसे प्राचीन वर्णमाला के अक्षर हैं।      

दरअसल, 2004 में अलेप्पो के पास उम्म अल-मर्रा में हुई खुदाई में 10 प्राचीन कब्रों का पता चला था। इनमें से एक कब्र से प्रारंभिक कांस्य युग (2600-2150 ईसा पूर्व) के मानव अवशेष और अन्य वस्तुएं निकली थीं। इन वस्तुओं में सोने के आभूषण, चांदी के बर्तन, हाथी-दांत की कंघी और मिट्टी के बर्तन आदि थे। और साथ में चार मिट्टी के बेलन भी थे। हर बेलन लगभग एक उंगली की साइज़ का था – एक सेंटीमीटर मोटा और 4.7 सेंटीमीटर लंबा और इनमें लंबाई में एक सुराख भी था। बेलनों पर आठ अलग-अलग प्रतीक चिन्ह उकेरे हुए थे।

हालिया अध्ययन में जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय के पुरातत्वविज्ञानी ग्लेन श्वार्ट्ज़ ने इन मृदालेखों का विश्लेषण करके बताया है कि ये प्रतीक a, i, k, l, n, s और y के समान ध्वनियों के संकेत हैं। हालांकि ये प्रतीक अक्षर किसी ज्ञात भाषा से मेल नहीं खाते हैं और न ही उनके समान हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने इन्हें डिकोड करने के लिए इनकी तुलना पश्चिमी सेमिटिक भाषाओं (हिब्रू, अरामेक और अरबी के प्राचीन और आधुनिक रूप) में इस्तेमाल किए जाने वाले अक्षरों से की। विश्लेषण से ऐसा लगता है कि मृदालेखों में जो संकेताक्षर खुदे हुए हैं वे या तो व्यक्तियों के नाम हैं या कब्र में दफन वस्तुओं के नाम हैं। अमेरिकन सोसाइटी ऑफ ओवरसीज़ रिसर्च की वार्षिक बैठक में श्वार्ट्ज़ ने बताया कि यदि ये अक्षर प्रतीक नाम या वस्तुओं के लेबल हैं तो यह समाज में बढ़ते प्रशासनिक कामों के लिए लेखन की ज़रूरत की ओर इशारा करते हैं।

बेलनों पर कुल 11 बार प्रतीक दिखाई देते हैं, जिनमें कुछ प्रतीकों का दोहराव भी है – यह इस बात का प्रमाण है कि ये प्रतीक किसी वर्णमाला के अक्षर हैं, न कि किसी शब्द के लिए चित्र के रूप में निरूपण। चार बेलनों में से दो बेलन में एक ही क्रम दिखाई देता है, जो उनके अखंडित सिरों पर एक ही प्रतीकाक्षर से समाप्त होता है। श्वार्ट्ज का कहना है कि प्रतीकों का क्रम जितना लंबा होगा, उतनी ही अधिक संभावना है कि वे चित्र निरूपण की बजाय अक्षर प्रतीक होंगे।

चूंकि दो अक्षर मिस्र की कीलाक्षरी से मिलते-जुलते पाए गए हैं, इसलिए ऐसे सवाल भी उठते हैं कि क्या बेलन के निर्माता मिस्र की कीलाक्षरी से प्रभावित थे, या उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपनी एक वर्णमाला विकसित की थी। उम्मीद है कि भविष्य के अध्ययन प्रतीकों के अर्थ को उजागर कर सकेंगे और इस गुत्थी को सुलझाने में मदद करेंगे कि पहली वर्णमाला कब विकसित हुई थी। (स्रोत फीचर्स)

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मनुष्य का इतना लंबा बचपन कब शुरू हुआ?

धिकतर जीव-जंतुओं के बच्चे जन्म के कुछ ही समय की देखभाल और प्रशिक्षण के बाद परिपक्व हो जाते हैं और स्वंतत्र रूप से भोजन वगैरह तलाशने और जीवनयापन करने लगते हैं। लेकिन मनुष्य के बच्चों को माता-पिता की देखभाल की काफी सालों तक ज़रूरत पड़ती है और उन्हें स्वतंत्र रूप से हर काम करने में सक्षम होने में (या यूं कहें कि बड़ा या वयस्क होने में) काफी साल लगते हैं। तुलना की जाए तो वयस्कता तक पहुंचने में मनुष्य के बच्चों को चिम्पैंज़ियों के बच्चों की तुलना में लगभग दुगुना समय लगता है।

मानवविज्ञानी बताते हैं कि संभवत: हमारा लंबा बचपन और किशोरावस्था की शुरुआत या तो हमें तुलनात्मक रूप से बड़ा मस्तिष्क विकसित करने के लिए अधिक समय और ऊर्जा की मोहलत देने के लिए हुई होगी, या जीवन की जटिल सामाजिक अंतःक्रियाओं और वातावरण के अनुकूल होने के कौशल सीखने के लिए। लेकिन वैज्ञानिकों के सामने यह अहम सवाल हमेशा से रहा है कि हमारे पूर्वजों (होमो जीनस) में लंबे बचपन की शुरुआत आखिर हुई कब?

इस सवाल के जवाब तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक अक्सर दांत, खासकर दाढ़, का अध्ययन करते हैं। दांतों का अध्ययन इसलिए क्योंकि प्राचीन दांत या दाढ़ अक्सर खोपड़ी के साथ अश्मीभूत अवस्था में मिल जाते हैं, समय के साथ नष्ट नहीं होते, और सबसे बढ़कर कि उनमें पेड़ के वलयों जैसी वृद्धि रेखाएं बनती हैं। ये रेखाएं दांतों पर डेंटाइन परत चढ़ने के कारण बनती है, जो आधुनिक मनुष्यों में हर 8 दिन में चढ़ जाती है। फिर, मनुष्यों और अन्य प्राइमेट्स की दांतों की वृद्धि की दर भी मस्तिष्क और शरीर के विकास से जुड़ी है।

ज्यूरिख युनिवर्सिटी के पुरामानवविज्ञानी क्रिस्टोफ ज़ोलिकोफर, मारिका पॉन्स डी लियोन और उनका दल भी यह जानना चाहता था कि लंबा बचपन होने की शुरुआत कब हुई। इसके लिए उन्होंने 2001 में जॉर्जिया के डमेनीसी में खुदाई में प्राप्त बच्चे की जबड़े सहित खोपड़ी और दांतों का अध्ययन किया। यह खोपड़ी करीब 17.7 लाख साल पुरानी थी और होमो जीनस के सदस्य की थी। अश्मीभूत दांतों में वृद्धि रेखाओं को देखने के लिए उन्होंने सिंक्रोट्रॉन की मदद से उच्च-विभेदन वाली एक्स-रे छवियां प्राप्त कीं और रेखाओं की गणना की। रेखाओं की गिनती से पता चला कि मृत्यु के समय उसकी उम्र लगभग साढ़े ग्यारह साल रही होगी।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने दांत पर गहरी तनाव रेखाओं का अध्ययन किया। ये तनाव रेखाएं किसी बीमारी या आहार में कमी के चलते सभी दांतों पर आ जाती हैं। इन रेखाओं का अध्ययन करके उन्होंने देखा कि विभिन्न दांत कैसे बने और उभरे। फिर उन्होंने इसका एक मॉडल वीडियो बना कर देखा कि जन्म से लेकर मृत्यु तक हर 6 महीने के अंतराल पर इस प्राचीन बच्चे के दांत कैसे बढ़े।

अंत में, शोधकर्ताओं ने डमेनीसी मनुष्य के दांतों के वृद्धि पथ की तुलना आधुनिक मनुष्यों, चिम्पैंज़ी और अन्य वानरों के दांतों की वृद्धि से की। देखा गया कि डमेनीसी बच्चे के जीवन के शुरुआती 5 वर्षों तक दाढ़ धीरे-धीरे विकसित हुई, जिससे दूध के दांत लंबे समय तक बने रहे – यह चिम्पैंज़ी की बजाय आधुनिक मनुष्य के दांत आने की तरह अधिक था। फिर, 6 से 11 वर्ष की आयु में, डमेनीसी बच्चे के दांत चिम्पैंज़ी की तरह अधिक तेज़ी से विकसित हुए और उभरे।

नेचर में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि डमेनीसी बच्चे के शुरुआती सालों में धीमी गति से विकास का यह सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण है, और धीमी वृद्धि के पिछले साक्ष्यों से करीब पांच लाख साल पहले का है। और संभवत: यह हमारे धीमे विकास की ओर पहला कदम भी हो सकता है।

डमेनीसी के निवासियों के मस्तिष्क चिम्पैंज़ियों से बस थोड़े से ही बड़े थे। इस आधार पर लेखकों का कहना है कि मस्तिष्क बड़ा होने के पहले ही हमारे पूर्वजों में दांतों का विकास धीमा हो गया था, संभवत: इसलिए कि औज़ारों के उपयोग, मांस खाने और सामाजिक संरचना में बदलाव ने बच्चों का लंबे समय तक वयस्कों पर निर्भर रहना संभव बनाया।

हालांकि, ये नतीजे सिर्फ एक बच्चे के दांत के विश्लेषण पर आधारित हैं, और चूंकि हर प्राइमेट की वृद्धि करने की गति अलग होती है इसलिए अधिक डैटा ही इन नतीजों की पुष्टि कर सकता है या इन्हें खारिज कर सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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