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डेढ़ सौ से ज़्यादा औषधि मिश्रणों पर प्रतिबंध

डॉ. सुशील जोशी

पिछले सप्ताह भारत सरकार ने 156 औषधि के नियत खुराक संयोजनों यानी फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन्स (Fixed Dose Combinations – FDCs) के उत्पादन, विपणन और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया। इनमें आम तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले एंटीबायोटिक्स (Antibiotics), दर्द-निवारक (Painkillers), एलर्जी-रोधी दवाइयां तथा मल्टीविटामिन्स (Multivitamins) शामिल हैं। 

यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति तथा औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (Drug Technical Advisory Board – DTAB) की अनुशंसा के आधार पर लिया गया है। प्रतिबंध की अधिसूचना (21 अगस्त 2024) में इन FDC पर प्रतिबंध के मूलत: दो कारण दिए गए हैं: 

1. सम्बंधित FDC में मिलाए गए अवयवों का मिश्रण तर्कहीन है। इन अवयवों का कोई चिकित्सकीय औचित्य नहीं है। 

2. सम्बंधित FDC के उपयोग से मनुष्यों को जोखिम होने की संभावना है जबकि उक्त औषधियों के सुरक्षित विकल्प (Safer Alternatives) उपलब्ध हैं।

वैसे तो FDC के मामले में देश के चिकित्सा संगठन कई वर्षों से चिंता व्यक्त करते आए हैं। इस विषय पर विचार के लिए केंद्र सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2013 में सी. के. कोकाटे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। समिति ने FDC के मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद कई FDC को बेतुका घोषित किया था। 

उस दौरान चले विचार-विमर्श का सार कई वर्षों पूर्व लोकॉस्ट नामक संस्था द्वारा प्रकाशित पुस्तक आम लोगों के लिए दवाइयों की किताब में प्रस्तुत हुआ था। आगे की चर्चा उसी पुस्तक के अंशों पर आधारित है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) की विशेषज्ञ समिति के अनुसार सामान्यतः मिश्रित दवाइयों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इनका उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब वैकल्पिक इकहरी दवाइयां (Single Drug Alternatives) किफायती न हों। FDC से “साइड प्रभावों का खतरा बढ़ता है और अनावश्यक रूप से लागत भी बढ़ती है तथा तुक्केबाज़ीनुमा बेतुकी चिकित्सा को बढ़ावा मिलता है।” जब FDC का उपयोग किया जाता है, तब प्रतिकूल प्रतिक्रिया का खतरा अधिक होता है और यह पता करना मुश्किल होता है कि प्रतिक्रिया किस अवयव की वजह से हुई है। FDC इसलिए भी बेतुकी हैं कि उनकी स्थिरता (Stability) संदिग्ध है। लिहाज़ा कई मामलों में समय के साथ इनका प्रभाव कम हो जाता है।

जैसे, स्ट्रेप्टोमायसिन (टी.बी. की दवाई) और पेनिसिलीन के मिश्रित इंजेक्शन (अब प्रतिबंधित) का उपयोग बुखार, संक्रमणों और छोटी-मोटी बीमारियों के लिए बहुतायत से किया गया है। यह गलत है क्योंकि इसकी वजह से टी.बी. छिपी रह जाती है। इसके अलावा, हर छोटी-मोटी बीमारी में स्ट्रेप्टोमायसिन के उपयोग का एक परिणाम यह होता है कि टी.बी. का बैक्टीरिया (Mycobacterium Tuberculosis) इस दवाई का प्रतिरोधी हो जाता है। इसी प्रकार से स्ट्रेप्टोमायसिन और क्लोरेम्फिनेकॉल के मिश्रण का उपयोग (दुरुपयोग) दस्त के लिए काफी किया जाता था। इस पर रोक लगाने के प्रयासों का दवा कंपनियों ने काफी विरोध किया था मगर 1988 में अंततः इस पर रोक लग गई थी। दरअसल यह मिश्रण निरी बरबादी था क्योंकि दस्त के 60 प्रतिशत मामले तो वायरस की वजह से होते हैं और मात्र जीवन रक्षक घोल (Oral Rehydration Solution – ORS) से इन पर काबू पाया जा सकता है, बैक्टीरिया-रोधी दवाइयों की कोई ज़रूरत नहीं होती। क्लोरेम्फिनेकॉल का अंधाधुंध उपयोग भी खतरनाक है क्योंकि इससे एग्रेनुलोसायटोसिस जैसे जानलेवा रक्त दोष पैदा हो सकते हैं। जब इसका उपयोग मिश्रण के रूप में किया जाता है, तो टायफॉइड बैक्टीरिया इसका प्रतिरोधी होने लगता है। 

कई अन्य FDC को चिकित्सकीय दृष्टि से बेतुका पाया गया है। जैसे, विभिन्न एंटीबायोटिक्स के मिश्रण या उनके साथ कार्टिकोस्टीरॉइड्स या विटामिन जैसे पदार्थों के मिश्रण; बुखार और दर्दनिवारकों के मिश्रण जैसे इबुप्रोफेन+पेरासिटेमॉल (Ibuprofen+Paracetamol), एस्पिरिन+पेरासिटेमॉल (Aspirin+Paracetamol), डिक्लोफेनेक+पेरासिटेमॉल (Diclofenac+Paracetamol); दर्द निवारकों के साथ लौह, विटामिन्स या अल्कोहल के मिश्रण; कोडीन (Codeine) (जिसकी लत लगती है) के अन्य दवाइयों के साथ मिश्रण।

FDC के उपयोग के खिलाफ कुछ तर्क और भी हैं। एक है कि कई बार ऐसे मिश्रणों में दो एक-सी दवाइयों को मिलाकर बेचा जाता है जिसका कोई औचित्य नहीं है। इसके विपरीत कुछ FDC में दो विपरीत असर वाली औषधियों को मिला दिया जाता है। 

FDC अलग-अलग औषधियों की मात्रा के स्वतंत्र निर्धारण की गुंजाइश नहीं देती। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि FDC में मिलाई गई दवाइयों के सेवन का क्रम भिन्न-भिन्न होता है (जैसे एक दवाई दिन में दो बार लेनी है, तो दूसरी दवाई दिन में तीन बार)। ऐसे में मरीज़ को अनावश्यक रूप से दोनों दवाइयां एक साथ एक ही क्रम में लेना होती है। 

WHO के अनुसार FDC को निम्नलिखित स्थितियों में ही स्वीकार किया जा सकता है: 

1. जब चिकित्सा साहित्य में एक साथ एक से अधिक दवाइयों के उपयोग को उचित बताया गया हो। 

2. जब मिश्रण के रूप में उन दवाइयों का सम्मिलित असर अलग-अलग दवाइयों से अधिक देखा गया हो। 

3. जब मिश्रण की कीमत अलग-अलग दवाइयों की कीमतों के योग से कम हो। 

4. जब मिश्रण के उपयोग से मरीज़ द्वारा अनुपालन में सुधार हो (जैसे टी.बी. मरीज़ को एक से अधिक दवाइयां लेनी पड़ती हैं, और वे एकाध दवाई लेना भूल जाते हैं)। 

भारत में वर्तमान में जो FDC बेचे जाते हैं उनमें से ज़्यादातर तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि उनके चिकित्सकीय फायदे संदिग्ध हैं। उदाहरण से तौर पर निमेसुलाइड के नुस्खों की भरमार का प्रकरण देखा जा सकता है। सन 2003 में फार्माबिज़ (Pharmabiz) के संपादकीय में पी.ए. फ्रांसिस ने लिखा था: 

“…देश में निमेसुलाइड के 200 नुस्खे भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drug Controller General of India – DCGI) की अनुमति के बगैर बेचे जा रहे हैं। इन 200 नुस्खों में से 70 तो निमेसुलाइड के सस्पेंशन हैं जबकि शेष 130 विभिन्न अन्य दवाइयों के साथ निमेसुलाइड के मिश्रण हैं। इस समूह में सबसे ज़्यादा तो निमेसुलाइड और पेरासिटेमॉल के मिश्रण हैं जिनकी संख्या 50 है। निमेसुलाइड और मांसपेशियों को शिथिल करने वाली दो दवाइयों (टिज़ेनिडीन और सेराशियोपेप्टिडेज़) के मिश्रण भी काफी प्रचलित हैं, इनके 52 ब्रांड्स उपलब्ध हैं। हैरत की बात यह है कि निमेसुलाइड के इतने सारे बेतुके मिश्रण देश में बेचे जा रहे हैं जबकि स्वयं निमेसुलाइड की सुरक्षा सवालों के घेरे में है…” 

कुल मिलाकर, FDC पर रोक का निर्णय स्वास्थ्य के क्षेत्र में सही दिशा में एक कदम है हालांकि स्वास्थ्य क्षेत्र के कई कार्यकर्ता और जानकारी मिलने तक कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। वर्तमान निर्णय के साथ एक दिक्कत यह है कि प्रत्येक FDC को लेकर विशिष्ट रूप से कोई विवरण नहीं दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/health/rjwmde/article67194496.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/NKV-GenericDrugs.jpg

वसायुक्त आहार कैंसर को बढ़ावा दे सकता है

ज़ुबैर सिद्दिकी

हाल ही के शोध में उच्च वसा आहार (high-fat diet), आंत के बैक्टीरिया (gut bacteria) और स्तन कैंसर (breast cancer) के बीच सम्बंध का पता चला है। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Proceedings of the National Academy of Sciences) में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार वसायुक्त आहार से पनपने वाला डीसल्फोविब्रियो नामक आंत का बैक्टीरिया, प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) को कमज़ोर करके ट्यूमर (tumor) के विकास में मदद करता है।

चीन के सुन यट-सेन मेमोरियल अस्पताल में स्तन कैंसर सर्जन एरवेई सोंग के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में यह पता लगाने का प्रयास किया गया कि ये बैक्टीरिया कैंसर की रफ्तार (cancer progression) को कैसे प्रभावित करता है। शोधकर्ताओं की रुचि विशेष रूप से इस बात में थी कि उच्च बॉडी मास इंडेक्स (high BMI) वाले लोगों में स्तन कैंसर के उपचार के बाद जीवित रहने की दर कम क्यों होती है।

टीम ने स्तन कैंसर ग्रस्त 61 रोगियों के ऊतक और मल के नमूनों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि 24 से अधिक BMI वाली महिलाओं में, 24 से कम BMI वाली महिलाओं की तुलना में डीसल्फोविब्रियो की संख्या अधिक थी।

आगे के प्रयोग चूहों पर किए गए। शोधकर्ताओं ने कुछ चूहों को उच्च वसा आहार दिया जिसके बाद इन चूहों की आंतों में डीसल्फोविब्रियो अधिक मात्रा में पाए गए। बैक्टीरिया में इस वृद्धि के साथ एक प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका – MDSC – का भी उच्च स्तर मिला। अस्थि मज्जा में बनने वाली ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र को कमज़ोर करती हैं, जिसके चलते ट्यूमर अनियंत्रित रूप से बढ़ सकता है।

उच्च वसा आहार वाले चूहों के रक्त में अमीनो एसिड ल्यूसीन का स्तर भी अधिक पाया गया। ल्यूसीन का निर्माण डीसल्फोविब्रियो तथा आंत के अन्य बैक्टीरिया करते हैं। जब चूहों का उपचार डीसल्फोविब्रियो को खत्म करने वाले एंटीबायोटिक्स (antibiotics) से किया गया, तो ल्यूसीन और MDSC दोनों का स्तर सामान्य हो गया – यह बैक्टीरिया, ल्यूसीन और कमज़ोर प्रतिरक्षा के बीच सम्बंध का संकेत था।

स्तन कैंसर रोगियों के रक्त के विश्लेषण से पता चला कि उच्च BMI वाले लोगों में ल्यूसीन और MDSC दोनों का स्तर अधिक था। इन रोगियों की जीवित रहने की दर भी कम थी।

इस खोज से पता चलता है कि उच्च वसा वाले आहार से लाभान्वित होकर डीसल्फोविब्रियो बैक्टीरिया शरीर की प्रतिरक्षा को कमज़ोर करके कैंसर के विकास में योगदान दे सकते हैं। कई वैज्ञानिक इसे कैंसर अनुसंधान (cancer research) में एक नई दिशा के रूप में देखते हैं। अलबत्ता, आंत की सूक्ष्मजीव जगत संरचना आहार पर निर्भर करती है, इसलिए यह पता करना होगा कि क्या ये निष्कर्ष सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं।

यह अध्ययन आहार, आंत के बैक्टीरिया और कैंसर के बीच जटिल परस्पर क्रिया को उजागर करता है और सुझाता है कि हमारे सूक्ष्मजीव संसार में फेरबदल कैंसर चिकित्सा का हिस्सा बन सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw1200/magazine-assets/d41586-024-01443-4/d41586-024-01443-4_27045734.jpg

खून का विकल्प

डॉ. सुशील जोशी

चोट लगने पर यदि बहुत खून बह जाए तो व्यक्ति के शरीर को ज़रूरी ऑक्सीजन (oxygen) व पोषण मिलने में दिक्कत आती है। और खून (blood) मिलना हर जगह आसान नहीं होता। ऐसे में कई बार खतरे की स्थिति बन जाती है। एक समय था जब बहुत अधिक रक्तस्राव तो जैसे मौत का ऐलान ही होता था। रक्ताधान (blood transfusion) किया जाता था लेकिन यह धुर में लट्ठ जैसा होता था। रक्त समूहों (blood groups) के बारे में कोई भनक तक नहीं थी। यदि गलत समूह का खून चढ़ जाए तो जानलेवा हो सकता था। आज भी खून बह जाने की वजह से दुनिया भर में हर साल करीब 20 लाख लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। दान दिए गए खून की शेल्फ लाइफ (shelf life) मात्र 42 दिन होती है और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भी नहीं होता। इस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए खून के विकल्पों (blood substitutes) की खोज कम से कम दो सदियों से चल रही है। और एक उपयुक्त विकल्प की ज़रूरत आज भी बरकरार है। पिछले वर्ष बाल्टीमोर की एक प्रयोगशाला में एक सफेद खरगोश ने आशा की किरण दिखाई है। 

इस खरगोश के शरीर से कुछ खून निकाल दिया गया था और फिर एक कैथेटर (catheter) के माध्यम से एक रक्त-विकल्प उसकी कैरोटिड धमनी में पहुंचाया जा रहा था। इस कृत्रिम रक्त-विकल्प का नाम है एरिथ्रोमर (ErythroMer)। इसका विकास मैरीलैंड विश्वविद्यालय स्कूल ऑफ मेडिसिन (University of Maryland School of Medicine) के चिकित्सक-शोधकर्ता एलन डॉक्टर द्वारा किया गया है। एरिथ्रोमर को ‘पुनर्चक्रित’ मानव हीमोग्लोबीन (recycled human hemoglobin) से बनाया गया है। हीमोग्लोबीन लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) में पाया जाने वाला वह प्रोटीन होता है जो ऑक्सीजन को फेफड़ों से लेकर पूरे शरीर में पहुंचाता है। इस ‘पुनर्चक्रित’ हीमोग्लोबिन को एक झिल्ली के आवरण में लपेटकर एक कोशिका का रूप दिया गया है। प्रयोग में लग रहा था कि रक्ताधान (सही मायनों में एरिथ्रोमराधान) काम कर रहा है। खरगोश की हृदय गति, रक्तचाप (blood pressure) वगैरह ठीक-ठाक ही लग रहे थे। 

एरिथ्रोमर व उससे पहले विकसित किए गए ऐसे पदार्थों को हीमोग्लोबिनाइज़्ड ऑक्सीजन वाहक (Hemoglobinized Oxygen Carrier – HBOC) कहते हैं। इन्हें कृत्रिम खून (artificial blood) भी कह सकते हैं। ऐसे विकल्प खास तौर से ऐसे मामलों में उपयोगी होंगे जहां ताज़ा खून मिलना मुश्किल होता है – जैसे युद्धक्षेत्र में या देहातों में। 

एरिथ्रोमर तत्काल देकर अस्पताल (hospital) पहुंचने तक मरीज़ को ऑक्सीजन मिलती रह सकती है। यह फ्रीज़ करके सुखाया गया पावडर होता है जिसे वर्षों तक इस्तेमाल किया जा सकता है। मरीज़ को देते समय इसे सैलाइन (saline) में घोलकर तैयार किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके उपयोग में रक्त समूह (blood group) जैसी कोई अड़चन नहीं होगी क्योंकि इसकी झिल्ली पर कोई सतही प्रोटीन नहीं होते जो रक्त समूह का निर्धारण करते हैं। 

वैसे तो ऑक्सीजन वाहक (oxygen carrier) लाल रक्त कोशिकाओं का विकल्प (alternative) विकसित करने के प्रयास दशकों से चल रहे हैं। इस संदर्भ में लग रहा है कि एरिथ्रोमर शायद प्राकृतिक लाल रक्त कोशिकाओं की तुलना में ज़्यादा टिकाऊ और लचीला होगा। हालांकि, एरिथ्रोमर अभी जंतु-परीक्षण (animal trials) के चरण में ही है लेकिन यह एकमात्र ऐसा प्रयास है जिसमें हीमोग्लोबिन को एक झिल्ली में कैद करके वास्तविक खून का रूप देने की कोशिश की गई है। दूसरी ओर, जापान में एक प्रतिस्पर्धी उत्पाद (competitive product) का परीक्षण मनुष्यों (human trials) में किया जा चुका है और वह सुरक्षित ही लग रहा है। 

मात्र 2 दशक पहले पूर्ववर्ती HBOC संस्करणों को एक तरफ रख दिया गया था क्योंकि परीक्षण में शामिल व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद किए गए अन्य प्रयासों के परिणाम भी बहुत बेहतर नहीं रहे थे। आज तक के सबसे उन्नत HBOC वे रहे हैं जिन्हें दक्षिण अफ्रीका और रूस में मंज़ूरी मिली थी लेकिन उनमें भी साइड इफेक्ट (side effects) के मुद्दे थे। 

खून की अनुकृति (blood replica) बनाने में मुश्किलात के कई कारण हैं। अव्वल तो खून स्वतंत्र अणुओं (molecules) और कोशिकाओं का एक जटिल मिश्रण (complex mixture) होता है। खून में आधा हिस्सा तो प्लाज़्मा (plasma) होता है, जो पानी, प्रोटीन्स (proteins) और लवणों से बना एक हल्का पीला तरल (fluid) होता है। शेष रक्त कोशिकाओं से बना होता है। इनमें मुख्यत: प्लेटलेट्स (platelets), सफेद रक्त कोशिकाएं (white blood cells) और लाल रक्त कोशिकाएं (red blood cells) होती हैं। प्लेटलेट्स किसी घाव या खरोंच के स्थान पर खून का थक्का बनाने में भूमिका निभाते हैं और सफेद रक्त कोशिकाएं संक्रमणों (infections) के विरुद्ध लड़ने में कारगर होती हैं। 

लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) में हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है। शरीर में सर्वाधिक संख्या लाल रक्त कोशिकाएं की ही होती है। आम तौर पर ये बीच में पिचकी हुई डिस्क (disc-shaped) के आकार की होती हैं। अस्थि मज्जा (bone marrow) में इनका निरंतर उत्पादन होता है – लगभग 20 लाख कोशिका प्रति सेकंड। किसी भी समय खून में करीब 30 खरब लाल रक्त कोशिकाएं (red blood cells) रक्त वाहिनियों (blood vessels) में दौड़ती रहती हैं। इन रक्त वाहिनियों की कुल लंबाई 20,000 कि.मी. (kilometers) तक हो सकती है। 

वास्तविक चुनौती यह है कि लाल रक्त कोशिकाओं की ऑक्सीजन परिवहन क्षमता (oxygen transport capacity) की नकल तैयार की जाए। लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन (hemoglobin) नामक प्रोटीन (protein) का अणु यह काम करता है। एक-एक रक्त कोशिका में हीमोग्लोबिन के 26 करोड़ अणु (molecules) पाए जाते हैं। इसके प्रत्येक अणु में हीम के घटकों के केंद्र में एक लौह परमाणु (iron atom) होता है। यही हीम संकुल ऑक्सीजन (oxygen) को पकड़ता है। 

शुरुआत में रक्त विकल्पों के निर्माण में कोशिश यह की गई थी कि हीमोग्लोबिन के स्थान पर एक अन्य ऑक्सीजन वाहक परफ्लोरोकार्बन (Perfluorocarbon) अणु को रखा जाए। इसका उपयोग रेफ्रिजरेंट्स (refrigerants) और अग्नि-शामकों में बहुतायत में किया जाता था। 1989 में ऐसे एक विकल्प को तो यूएस खाद्य व औषधि प्रशासन (U.S. Food and Drug Administration – FDA) ने शल्य क्रियाओं (surgery) के दौरान उपयोग की मंज़ूरी भी दे दी थी। लेकिन कतिपय कारणों से इसे वापिस ले लिया गया। 

तो बच गए HBOC। लाल रक्त कोशिका (red blood cell) के अंदर हीमोग्लोबिन प्रोटीन्स (proteins) चार-चार के समूहों में जुड़े रहते हैं। शुरुआती HBOC में कोशिश यह थी कि इस चौकड़ी संरचना (tetramer structure) की नकल की जाए और झिल्ली को छोड़ दिया जाए। 

लेकिन हीमोग्लोबिन (hemoglobin) अजीब अणु होता है – ऊतकों और रक्त वाहिनियों (blood vessels) के लिए विषैला (toxic) होता है। एक कारण तो यह है कि हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन (oxygen) लेकर चलता है जो गलत जगह पहुंच जाए तो घातक हो सकती है। लिहाज़ा हीमोग्लोबिन को रक्त प्रवाह (bloodstream) में छुट्टा नहीं छोड़ा जा सकता। पिछली सदी में जिन मरीज़ों को आवरणरहित हीमोग्लोबिन (unencapsulated hemoglobin) से बने रक्त-विकल्प (blood substitute) दिए गए थे, उनमें उच्च रक्तचाप (high blood pressure), उच्च चयापचय दर (high metabolism rate) और तेज़ नब्ज़ (rapid pulse) जैसे असर देखे गए हैं। कुछ मामलों में हार्ट अटैक (heart attack) और गुर्दा नाकामी (kidney failure) जैसे दुष्प्रभाव (side effects) भी प्रकट हुए। माना जाता है कि ऐसा रक्त वाहिनियों के सिकुड़ने (vasoconstriction) की वजह से हुआ था जो स्वतंत्र हीमोग्लोबिन (free hemoglobin) ने पैदा किया था। 

आवरण रहित HBOC का सबसे सफल उदाहरण हीमोप्योर (Hemopure) रहा है। 1990 के दशक में इसे गाय से प्राप्त लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) की मदद से तैयार किया गया था। पहले इन कोशिकाओं में से हीमोग्लोबिन (hemoglobin) निकाला जाता था और उसे रोगजनकों (pathogens) से मुक्त किया जाता था। फिर चार-चार हीमोग्लोबिन की चौकड़ियां बनाई जाती थीं। इसका अधिकांश उपयोग ऑपरेशन उपरांत एनीमिया (anemia) के उपचार हेतु किया गया था। 

लेकिन 2008 में जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (Journal of the American Medical Association – JAMA) में प्रकाशित एक मेटा-विश्लेषण का निष्कर्ष था कि ये सारे HBOC निहित रूप से हृदय (heart) के लिए विषैले (toxic) थे और इनसे उपचारित मरीज़ों की मृत्यु दर (mortality rate) सामान्य रक्ताधान (blood transfusion) प्राप्त करने वाले मरीज़ों से 30 प्रतिशत ज़्यादा थी। इस विश्लेषण के प्रकाशन के बाद सारे परीक्षण (trials) बंद कर दिए गए। 

हालांकि नया रक्त विकल्प एरिथ्रोमर जंतु-परीक्षण के दौर में ही है लेकिन डॉक्टर को यकीन है कि यह शुद्ध हीमोग्लोबिन उत्पादों के विषैलेपन की समस्या से निपट पाएगा और प्रकृति की बेहतर अनुकृति (better replica) साबित होगा क्योंकि इसमें हीमोग्लोबिन को ठीक उस तरह आवरण में बंद किया गया है जैसा लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) में होता है। 

वैसे डॉक्टर रक्त का विकल्प (blood substitute) बनाने के लिए काम कर भी नहीं रहे थे। वे तो हीमोग्लोबिन (hemoglobin) और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) नामक गैस के परस्पर सम्बंध (interaction) का अध्ययन कर रहे थे। नाइट्रिक ऑक्साइड वह गैस है जो रक्त वाहिनियों (blood vessels) का अस्तर खून में छोड़ता रहता है। नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) की उपस्थिति में रक्त वाहिनियां फैल (dilate) जाती हैं और इसकी अनुपस्थिति में सिकुड़ (constrict) जाती हैं। और महत्वपूर्ण बात यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं (red blood cells) इस गैस के स्तर (levels) को नियंत्रित करती हैं क्योंकि ऑक्सीजन (oxygen) के समान नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) भी हीमोग्लोबिन (hemoglobin) से जुड़ सकती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) और आसपास के ऊतकों (tissues) के बीच ऑक्सीजन (oxygen) के लेन-देन के आधार पर कोशिकाएं नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) को ग्रहण कर सकती हैं या बाहर कर सकती हैं। 

अब यदि कोई व्यक्ति ज़ोरदार कसरत कर रहा हो, तो पहले तो उसकी मांसपेशियों में ऑक्सीजन की खपत बढ़ती है। वहां ऊतकों की बढ़ी हुई सक्रियता का निर्वाह करने के लिए रक्त प्रवाह बढ़ता है और सक्रियता कम हो जाने पर रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है। जब लाल रक्त कोशिकाएं सक्रिय मांसपेशियों को ऑक्सीजन की आपूर्ति करती हैं, तब वे नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) भी छोड़ती हैं। यह छोड़ी गई नाइट्रिक ऑक्साइड उस क्षेत्र की रक्त वाहिनियों को फैला देती है जिससे उस क्षेत्र में रक्त प्रवाह (blood flow) बढ़ जाता है। कसरत पूरी हो जाने पर लाल रक्त कोशिकाएं (red blood cells) भारी मात्रा में ऑक्सीजन (oxygen) मुक्त करना बंद कर देती हैं। इसके चलते नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) वापिस कोशिकाओं में पहुंचकर हीमोग्लोबिन (hemoglobin) से जुड़ने लगती है और रक्त वाहिनियां सिकुड़ जाती हैं। 

मुक्त हीमोग्लोबिन (free hemoglobin) से बने रक्त-विकल्प विषैले (toxic) हो सकते हैं। इसलिए कुछ वैज्ञानिक इस ऑक्सीजन वाहक (oxygen carrier) को एक झिल्ली (membrane) में कैद कर रहे हैं, किसी लघु कोशिका (microcell) के समान। एरिथ्रोमर की झिल्ली को इस तरह बनाया गया है कि वह रक्त वाहिनियों (blood vessels) में सुगमता से बह सके और हीमोग्लोबिन (hemoglobin) नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide) को न जकड़ सके। नाइट्रिक ऑक्साइड ही तो वाहिनियों को खुला रखती है। 

लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells) के समान ही एरिथ्रोमर भी हीमोग्लोबिन (hemoglobin) और ऑक्सीजन के बीच स्नेह के नियमन (affinity regulation) हेतु 2,3-DPG (2,3-Diphosphoglycerate) नामक एक अणु का उपयोग करता है। फेफड़ों (lungs) में 2,3-DPG का अणु एक संश्लेषित अम्लीयता संवेदी अणु (synthesized acidity sensor molecule) KC1003 से जुड़ जाता है। यह अणु एरिथ्रोमर की झिल्ली (membrane) में होता है। इनके बीच बने बंधन (bond) का परिणाम होता है कि हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को पकड़ने में सक्षम हो जाता है। जब यह ऊतकों में पहुंचता है तो वहां पर्यावरण ज़्यादा अम्लीय (acidic) होता है। इस स्थिति में 2,3-DPG मुक्त (released) हो जाता है और हीमोग्लोबिन से जुड़ जाता है जिसकी वजह से ऑक्सीजन (oxygen) मुक्त होने लगती है। 

सच तो यह है कि कोई भी कृत्रिम उत्पाद (artificial product) रक्त (blood) का स्थान नहीं ले सकता। ये थोड़े समय के लिए मरीज़ की मदद कर सकते हैं; अंतत: तो व्यक्ति की अस्थि मज्जा (bone marrow) को अपना काम शुरू करना होगा। बहरहाल, आज हम इतना तो जानते हैं कि इन उत्पादों के साइड प्रभावों (side effects) को संभाल सकें।(स्रोत फीचर्स) 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://anest.ufl.edu/files/2018/05/hemopure-bloodbag.jpg

प्लेसिबो प्रभाव क्या है, दर्द कैसे कम करता है

शोधकर्ता लंबे समय से प्लेसिबो प्रभाव (Placebo) से हैरान हैं। प्लेसिबो का मतलब है कि किसी मरीज़ को दवा के नाम पर कोई गोली दी जाए (Placebo Pill) और इससे मरीज़ को तकलीफ से राहत महसूस हो। सवाल यह रहा है कि किसी औषधि के बिना भी राहत कैसे मिलती है। हाल ही में चूहों पर हुए एक अध्ययन (Research on Mice) से इस घटना के पीछे मस्तिष्क तंत्र सम्बंधित नई जानकारी प्राप्त हुई है।

नेचर पत्रिका (Nature Journal) में प्रकाशित एक अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने चूहों में दर्द-राहत (Pain Management) को समझने के लिए मस्तिष्क की गतिविधि को समझने का प्रयास किया है, जिससे मानव प्लेसिबो प्रभाव (Human Placebo Effect) को भी समझने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मस्तिष्क के सेरिबेलम (Cerebellum) और ब्रेनस्टेम (Brainstem) नामक हिस्से, जिन्हें आम तौर पर शारीरिक गतियों (Motor Coordination) से जुड़ा माना जाता है, दर्द के अनुभव और राहत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के तंत्रिका विज्ञानी क्लिफर्ड वूल्फ के अनुसार इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि प्लेसिबो प्रभाव एक वास्तविक परिघटना है।

पूर्व में मनुष्यों पर किए गए इमेजिंग अध्ययनों से पता चला है कि प्लेसिबो-आधारित दर्द निवारण ब्रेनस्टेम और एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (Anterior Cingulate Cortex) में तंत्रिका-सक्रियता से सम्बंधित है। इस पर अधिक जांच करते हुए चैपल हिल स्थित उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय के तंत्रिका-जीव वैज्ञानिक ग्रेगरी शेरर और उनकी टीम ने चूहों में दर्द निवारण के लिए प्लेसिबो जैसा प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से एक प्रयोग विकसित किया।

उन्होंने कुछ चूहों को इस तरह तैयार किया कि वे प्लेसिबोनुमा दर्द निवारण की अपेक्षा (Pain Relief Expectation) करने लगें। उन चूहों को सिखाया गया कि तपते गर्म फर्श वाले प्रकोष्ठ से हल्के गर्म फर्श वाले प्रकोष्ठ में जाने से राहत मिलती है। इसके बाद प्रयोग में दोनों फर्शों को अत्यधिक गर्म (Extreme Heat) रखा गया। इसके बावजूद चूहों ने जब उस कक्ष में प्रवेश किया जो पहले ठंडा (Cold Room) रखा गया था, तो उन्होंने दर्द-सम्बंधी व्यवहार कम दर्शाया जबकि अब उसका फर्श भी दर्दनाक स्तर तक गर्म था।

लाइव-इमेजिंग टूल (Live-Imaging Tool) का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान सक्रिय तंत्रिकाओं की पहचान की। इसमें एक प्रमुख क्षेत्र पोंटाइन न्यूक्लियस (Pontine Nucleus) का पता चला जो ब्रेनस्टेम का एक हिस्सा है और पूर्व में दर्द से सम्बंधित नहीं माना जाता था। Pn सेरेब्रल कॉर्टेक्स को सेरेबेलम से जोड़ता है। इन तंत्रिकाओं की गतिविधि को अवरुद्ध करने से चूहों ने गर्म फर्श पर दर्द से राहत पाने की कोशिश का व्यवहार ज़्यादा जल्दी दर्शाया – जैसे पंजा चाटना और पैर को फर्श से दूर करना। इससे पता चलता है कि वे दर्द में वृद्धि का अनुभव कर रहे थे। दूसरी ओर, सक्रिय Pn न्यूरॉन्स वाले चूहों ने ऐसा व्यवहार देरी से दर्शाया था।

Pn तंत्रिकाओं के आगे विश्लेषण से पता चला कि 65 प्रतिशत तंत्रिका कोशिकाओं में ओपियोइड ग्राही (Opioid Receptors) थे, जो शरीर में प्राकृतिक रूप से बनने वाले दर्द निवारकों (Endogenous Painkillers) और शक्तिशाली दर्द दवाओं (Strong Analgesics) पर प्रतिक्रिया करते हैं। ये तंत्रिका कोशिकाएं सेरिबेलम के तीन हिस्सों में फैली हुई होती हैं। यह दर्द से राहत की अपेक्षा (Placebo Effect) में इस क्षेत्र की एक नई भूमिका दर्शाती हैं।

इस खोज से दर्द के उपचार (Pain Therapy) को समझने और विकसित करने के तरीके में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। वूल्फ का सुझाव है कि यह अध्ययन प्लेसिबो गोलियों पर निर्भर हुए बिना, शरीर के अपने दर्द नियंत्रण तंत्र (Pain Control Mechanisms) को अधिक मज़बूती से सक्रिय करने के तरीके खोजने में मदद कर सकता है।

इस शोध से यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (Cognitive Behavioral Therapy) और ट्रांसक्रैनियल चुंबकीय उद्दीपन (Transcranial Magnetic Stimulation) जैसे कुछ दर्द उपचार (Pain Treatment Methods) क्यों प्रभावी हैं। इन मस्तिष्क परिपथों को समझने से अधिक लक्षित और प्रभावी दर्द निवारण विधियां तैयार की जा सकती हैं।

हालांकि, एक सवाल अभी भी बना हुआ है कि कौन सी चीज़ प्लेसिबो प्रभाव को शुरू करती है और यह व्यक्ति-दर-व्यक्ति (Person-to-Person) अलग-अलग क्यों है। वूल्फ ने इसे समझने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वायु प्रदूषण और हड्डियों की कमज़ोरी

भारत में बड़ी संख्या में लोग अधेड़ उम्र से ही घुटने के दर्द (Knee Pain) जैसी समस्याओं से जूझते हैं। कुछ मामलों में तो लोग ठीक से चल भी नहीं पाते या चलते-चलते अक्सर गिर जाते हैं। दरअसल, यह अस्थिछिद्रता (Osteoporosis) नामक स्थिति है जिसमें हड्डियों का घनत्व (Bone Density) कम हो जाता है और वे भुरभरी हो जाती हैं। हल्की-सी टक्कर से उनके टूटने की संभावना बढ़ जाती है। एक बड़ी समस्या यह है कि इस स्थिति पर तब तक किसी का ध्यान नहीं जाता जब तक कोई गंभीर चोट न लग जाए। यह दुनिया भर में 50 से ज़्यादा उम्र की लगभग एक तिहाई महिलाओं और 20 प्रतिशत पुरुषों को प्रभावित करती है। संभव है कि भारत के तकरीबन 6 करोड़ लोग अस्थिछिद्रता से पीड़ित हैं, लेकिन इसके सटीक आंकड़े जुटाना काफी मुश्किल है।

अस्थिछिद्रता के कई कारण होते हैं – जैसे हार्मोनल परिवर्तन (Hormonal Changes), व्यायाम की कमी (Lack of Exercise), मादक पदार्थों का सेवन (Substance Abuse) और धूम्रपान (Smoking)। लेकिन भारत में एक और कारक इसमें योगदान दे रहा है: वायु प्रदूषण (Air Pollution)।

अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च प्रदूषण स्तर (High Pollution Levels) वाले क्षेत्रों में अस्थिछिद्रता का प्रकोप अधिक है। भारतीय शहर और गांव अपनी प्रदूषित हवा (Polluted Air) के लिए कुख्यात हैं, इसलिए शोधकर्ता धुंध (Smog) और भंगुर हड्डियों (Brittle Bones) के बीच जैविक सम्बंधों की जांच कर रहे हैं।

ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) शब्द 1830 के दशक में फ्रांसीसी रोगविज्ञानी जीन लोबस्टीन ने दिया था। तब से, वैज्ञानिकों ने हड्डियों की क्षति (Bone Damage) की प्रक्रिया और कई जोखिम कारकों (Risk Factors) की पहचान की है। 2007 में, नॉर्वे में किए गए एक अध्ययन ने पहली बार वायु प्रदूषण और हड्डियों के घनत्व में कमी (Bone Density Loss) के बीच सम्बंध का संकेत दिया था। इसके बाद विभिन्न देशों में किए गए शोध ने भी इस सम्बंध को प्रमाणित किया है।

2017 में इकान स्कूल ऑफ मेडिसिन के डिडियर प्राडा और उनकी टीम ने उत्तर-पूर्वी यूएस के 65 वर्ष से अधिक उम्र के 92 लाख व्यक्तियों के डैटा विश्लेषण में पाया कि महीन कण पदार्थ (PM 2.5) और ब्लैक कार्बन के अधिक संपर्क (Exposure to Black Carbon) में रहने से हड्डियों के फ्रैक्चर (Bone Fractures) और अस्थिछिद्रता की दर में वृद्धि हुई। इसके बाद 2020 में किए गए शोध ने रजोनिवृत्त महिलाओं (Postmenopausal Women) में अस्थिछिद्रता के कारकों की फेहरिस्त में एक अन्य प्रमुख प्रदूषक, नाइट्रोजन ऑक्साइड (Nitrogen Oxides), को जोड़ा।

यूके में, लगभग साढ़े चार लाख लोगों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वालों में फ्रैक्चर का जोखिम (Fracture Risk) 15 प्रतिशत अधिक था। इसी तरह, दक्षिण भारत के एक अध्ययन में पाया गया कि अधिक प्रदूषित गांवों (Polluted Villages) के निवासियों की हड्डियों में खनिज और हड्डियों का घनत्व काफी कम था।

चीन में भी वायु प्रदूषण (Air Pollution in China) और अस्थिछिद्रता के बीच सम्बंध देखा गया है। शैंडोंग प्रांत में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि थोड़े समय के लिए भी यातायात से सम्बंधित प्रदूषकों (Traffic-Related Pollutants) के संपर्क में आने से अस्थिछिद्रता जनित फ्रैक्चर (Osteoporosis-Induced Fractures) का खतरा बढ़ता है। एक अन्य अध्ययन का निष्कर्ष है कि ग्रामीण निवासियों को भी इसी तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ता है।

फिलहाल, शोधकर्ता यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रदूषक किस तरह से हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसमें एक प्रत्यक्ष कारक ज़मीन के निकट पाई जाने वाली ओज़ोन (Ground-Level Ozone) है, जो प्रदूषण के कारण पैदा होती है। यह विटामिन डी (Vitamin D) के उत्पादन के लिए आवश्यक पराबैंगनी प्रकाश को कम कर सकती है, जो हड्डियों के विकास (Bone Development) के लिए आवश्यक है। कोशिकीय स्तर पर, प्रदूषक से मुक्त मूलक (Free Radicals) बनते हैं जो डीएनए और प्रोटीन को नुकसान पहुंचाते हैं, सूजन (Inflammation) को बढ़ाते हैं और अस्थि ऊतकों के नवीनीकरण (Bone Tissue Renewal) में बाधा डालते हैं।

ये निष्कर्ष भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं, जहां 1998 से 2021 तक कणीय वायु प्रदूषण (Particulate Air Pollution) लगभग 68 प्रतिशत बढ़ा है। जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) और कृषि अवशेषों (Agricultural Residue Burning) को जलाने के साथ-साथ चूल्हों पर खाना पकाने से समस्या बढ़ जाती है। आज भी कई भारतीय महिलाएं पारंपरिक चूल्हे (Traditional Stove Cooking) पर खाना बनाती हैं, जिससे उनकी हड्डियों की हालत खस्ता हो सकती है।

प्रदूषण और अस्थिछिद्रता के बीच इस सम्बंध से प्रदूषण कम करने (Pollution Control) के लिए प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त, अस्थिछिद्रता के निदान (Osteoporosis Diagnosis) को बेहतर करना ज़रूरी है। अस्थि घनत्व की जांच (Bone Density Test) के लिए ज़रूरी DEXA स्कैनरों की भारी कमी है, जो महंगे हैं और मात्र बड़े शहरों में उपलब्ध हैं। समय पर समस्या का पता चलने से हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल अस्थिछिद्रता से पीड़ित बहुत से लोग बिना निदान और इलाज (Osteoporosis Treatment) के तकलीफ झेलते हैं, जो वायु प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारकों (Environmental Factors) से और भी बढ़ जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मच्छरों से निपटने के प्रयास

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

वर्ष 2007 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 15 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस (World Malaria Day) घोषित किया था; उद्देश्य था मलेरिया की रोकथाम (Malaria Prevention) और नियंत्रण (Control) के लिए निरंतर निवेश और निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता पर ज़ोर देना। मॉस्किटोपिया: दी प्लेस ऑफ पेस्ट्स इन ए हेल्दी वर्ल्ड नामक पुस्तक में कहा गया है कि अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर मच्छरों की 3500 से अधिक प्रजातियां (Mosquito Species) पाई जाती हैं। दुनिया में मच्छरों की कुल आबादी में से 12 प्रतिशत से अधिक भारत में है। वर्ष 2015 में जर्नल ऑफ मॉस्किटो रिसर्च (Journal of Mosquito Research) में प्रकाशित एक अध्ययन में बी. के. त्यागी और उनके साथियों ने बताया था कि भारत में मच्छर की 63 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें एनॉफिलीज़ (Anopheles) सबसे प्रमुख है। सर रोनाल्ड रॉस (Sir Ronald Ross) ने हैदराबाद में मलेरिया से पीड़ित मानव रोगी पर पड़ताल करके बताया था कि किस तरह एनॉफिलीज़ मच्छर के काटने से मलेरिया (Malaria Transmission) फैलता है। इसी काम के लिए सर रोनाल्ड रॉस को 1902 में कार्यिकी/चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Medicine) दिया गया था।

भारत सरकार के राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (National Vector Borne Disease Control Programme) ने बताया है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया, डेंगू (Dengue), फाइलेरिया (Filariasis), जापानी दिमागी बुखार (Japanese Encephalitis), और चिकनगुनिया (Chikungunya) जैसी बीमारियां फैलती हैं। केंद्र ने दवाओं और टीकों के माध्यम से इन बीमारियों को नियंत्रित करने (Disease Control) और उनसे निपटने के तरीके भी बताए हैं।

भारत में मच्छर अत्यधिक जल-जमाव (Waterlogging) वाले क्षेत्रों, जैसे ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक पाए जाते हैं। हालांकि, पुणे, दिल्ली, चेन्नई, और कोलकाता में भी भारी बारिश और पानी के अकुशल प्रबंधन के कारण मच्छरों की आबादी में काफी वृद्धि (Mosquito Population Increase) देखी गई है।

मच्छर खेतों, बाड़ों, गमलों, नालियों, पक्षियों के लिए रखे गए पानी के बर्तनों, टायरों और कूड़ेदान जैसी चीज़ों या जगहों पर भरे थमे हुए पानी में पनपते हैं। इनकी समय-समय पर सफाई (Regular Cleaning) करने से मच्छरों की वृद्धि कम करने में मदद मिलेगी। दी हेल्दी टैलबोट (The Healthy Talbot) वेबसाइट मच्छरों से छुटकारा पाने के कई सरल उपाय (Mosquito Repellents) बताती है। इनमें से कुछ उपाय शहरों और कस्बों में उपयोगी हो सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग (जहां चावल/गेहूं की खेती होती है और इस कारण पानी भरा रहता है) कपूर (Camphor) और तुलसी (Basil Leaves) की पत्तियों का उपयोग कर सकते हैं; इन दोनों चीज़ों का उपयोग लोग घरों में पूजा-पाठ में करते हैं। सिट्रोनेला पौधे (Citronella Plant) से प्राप्त तेल मच्छरों को दूर रखने में प्रभावी है। इसी से मच्छर भगाने वाली ओडोमॉस (Odomos) बनाई जाती है जो बाज़ार में सस्ती कीमतों पर उपलब्ध है; यह क्रीम के रूप में और चिपकू पट्टी के रूप में उपलब्ध है।

व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाने वाला कीट-भगाऊ एन,एन-डायइथाइल-मेटा-टॉल्यूमाइड (DEET) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों की सुरक्षा के लिए विकसित किया गया था। DEET की रासायनिक संरचना (Chemical Composition) में एक मामूली बदलाव ने इस औषधि को अधिक कारगर (Effective Insect Repellent) बना दिया। बलसारा होम प्रोडक्ट्स के इस स्वदेशी उत्पाद का अध्ययन एक दशक पहले मित्तल और उनके साथियों द्वारा किया गया था (इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च, 2011), जो आज चिपचिप-मुक्त एडवासंस्ड ओडोमॉस (Advanced Odomos) के रूप में बाज़ार में उपलब्ध है। ऐसे और भी अणु (New Molecules) खोजने की ज़रूरत है। उम्मीद है कि कार्बनिक रसायनज्ञ और जैव-रसायनज्ञ (Organic and Biochemists) ऐसे नए अणु संश्लेषित करेंगे जो और भी कार्यकुशल होंगे।

वर्ष 2021 में, WHO ने ग्लैक्सो-स्मिथ-क्लाइन (GSK) और PATH द्वारा निर्मित ‘मॉस्कियूरिक्स (Mosquirix)’ नामक मलेरिया के टीके की चार खुराक शिशुओं को देने की सिफारिश की थी, और इसे अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर उपयोग की अनुमति दी थी। इसका इस्तेमाल दुनिया के किसी और हिस्से में अब तक नहीं किया गया है। भारत में दो बायोटेक फर्म ने मलेरिया के टीकों के निर्माण और आपूर्ति के लिए काम शुरू कर दिया है। भारत बायोटेक (Bharat Biotech), जो पहले से ही मलेरिया से जुड़े कुछ टीकों पर काम कर रही है, ने मॉस्कियूरिक्स की लंबे समय तक आपूर्ति के लिए GSK-PATH के साथ इसकी प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए करार किया है। उम्मीद है कि 2026 तक भारत के लोगों के लिए इसका निर्माण और आपूर्ति शुरू हो जाएगी। 2021 में, WHO ने R21/मैट्रिक्स (R21/Matrix) टीके की भी सिफारिश की थी। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी (Oxford University) के साथ मिलकर सीरम इंस्टीट्यूट (Serum Institute) ने R21/मैट्रिक्स टीके का उत्पादन किया है; इसी जुलाई में पश्चिमी अफ्रीका के कोट डी आइवरी (Côte d’Ivoire) में इस टीके को देने की शुरुआत की गई है, इस तरह यह देश R21/मैट्रिक्स का उपयोग करने वाला पहला देश बन गया है। हमें उम्मीद है कि जल्द ही भारतीयों को भी यह टीका मिलेगा, संभवत: 2026 के विश्व मलेरिया दिवस तक। (स्रोत फीचर्स)

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अंडाशय में अंडे लंबे समय तक कैसे बचे रहते हैं

ह तो सर्वज्ञात है कि स्तनधारी मादाओं के अंडाशय में जीवन भर के लिए सारे अंडाणु भ्रूणावस्था में ही निर्मित हो जाते हैं और फिर एक-एक या अधिक संख्या में विकसित होकर बाहर निकलते रहते हैं। जैसे, 20 सप्ताह के स्त्री भ्रूण में तकरीबन 60-70 लाख अंडाणु होते हैं। समय बीतने के साथ अधिकांश की मृत्यु हो जाती है लेकिन लगभग 3 लाख अंडाणु स्त्री के रजस्वला होने यानी यौवनारंभ (प्यूबर्टी) तक जीवित रहते हैं। और तो और, रजोनिवृत्ति (लगभग 50 वर्ष की आयु) तक भी 1000 अंडाणु मौजूद होते हैं। तो यह चमत्कार कैसे होता है?

आम तौर पर कोई भी कोशिका अपने प्रोटीन्स को काफी जल्दी-जल्दी तोड़ती है, प्राय: चंद दिनों में। लेकिन कुछ प्रोटीन्स का विघटन इतनी जल्दी नहीं होता। मनुष्यों में आंखों के लेंस में, उपास्थि जोड़ों में, मस्तिष्क में और माइटोकॉण्ड्रिया में ऐसे प्रोटीन पाए गए हैं जो दशकों तक टिके रहते हैं। वैज्ञानिक यह तो जानते थे कि अंडाशय में भी ऐसे प्रोटीन पाए जाते हैं, लेकिन यह पता नहीं था कि ये कितने आम तौर पर पाए जाते हैं। प्रोटीन्स के कई कार्यों में से एक कार्य कोशिका की रक्षा करना भी है।

ऐसे ही दीर्घजीवी प्रोटीन्स का पता लगाने के लिए दो अनुसंधान समूहों ने अद्भुत रणनीति अपनाई। गौरतलब है कि उन्होंने सारे प्रयोग चूहों पर किए थे। इसलिए सारे नतीजों को चूहों की उम्र के हिसाब से देखना होगा। देखना यह था कि कतिपय प्रोटीन की उम्र कितनी होती है।

दोनों समूहों ने मादा चूहों को ऐसा भोजन खिलाया जिसमें कार्बन या नाइट्रोजन के भारी समस्थानिक थे। चूंकि उनके भोजन में इन तत्वों के भारी समस्थानिक थे, तो जो प्रोटीन उनके शरीर में बने उनमें भी यही भारी समस्थानिक थे। और उनके गर्भाशय में पल रही संतानों में भी। यानी आगे चलकर इन प्रोटीन्स को पहचाना जा सकता था।

जन्म होते ही इन संतानों को सामान्य कार्बन तथा नाइट्रोजन वाला भोजन देना शुरू कर दिया। तो स्थिति यह थी कि इन संतानों ने जो प्रोटीन भोजन-परिवर्तन से पूर्व बनाए थे उनमें भारी समस्थानिक होना चाहिए और परिवर्तन के बाद बने प्रोटीन्स में सामान्य समस्थानिक। इस आधार पर शोधकर्ता यह पता लगा सकते थे कि शरीर में पाए गए किसी प्रोटीन की उम्र कितनी है।

मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी साइन्सेज़ की मेलिना शू के नेतृत्व में काम कर रहे समूह ने 8 सप्ताह आयु के चूहों के अंडाणुओं का विश्लेषण किया। गौरतलब है कि 8 सप्ताह की आयु चूहों के हिसाब से प्रजनन का शिखर होता है। विश्लेषण से पता चला कि इन अंडाणु कोशिकाओं में तकरीबन 10 प्रतिशत प्रोटीन उस समय बने थे जब ये मादा चूहे अपनी मां के गर्भाशय में थे। ये नतीजे नेचर सेल बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

जब उन्होंने लगभग 15 माह आयु के चूहों के साथ यह प्रयोग दोहराया तो गणितीय मॉडल विश्लेषण से पता चला कि 10 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन्स का अर्ध-जीवन काल 100 दिन से अधिक है।  अर्ध-जीवन काल यानी उतने समय में उनमें से आधे अणु विघटित हो जाएंगे। ध्यान रहे कि 100 दिन मतलब चूहे की आयु का 13 प्रतिशत होता है।

पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की एवा बोम्बा-वार्कज़ैक के नेतृत्व में एक अन्य समूह को भी ऐसे ही नतीजे प्राप्त हुए, जो उन्होंने ईलाइफ नामक पत्रिका में प्रकाशित किए हैं। 7 माह के चूहों के अंडाणुओं में प्रोटीन के विश्लेषण से पता चला कि इनमें से कम से कम 5 प्रतिशत का संश्लेषण जन्म से पहले या तत्काल बाद हुआ था। 11 माह की उम्र तक टिकाऊ प्रोटीन्स में से 10 प्रतिशत शेष थे।

ऐसा लगता है कि ये दीर्घजीवी प्रोटीन अंडाणुओं की हिफाज़त करते हैं और साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि इन प्रोटीन के क्रमिक विघटन के साथ अंडाशय में अंडाणुओं की संख्या घटती जाती है और एक समय के बाद मादा प्रजननक्षम नहीं रह जाती। इसी को रजोनिवृत्ति या मेनोपॉज़ कहते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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एक अति-दुर्लभ, विचित्र बीमारी का उपचार

फायब्रोडिसप्लेसिया ओसिफिकेन्स प्रोग्रेसिवा या संक्षेप में FOP का नाम आपने शायद ही सुना हो। सुनेंगे भी कैसे। यह बीमारी दुनिया भर में महज 8000 लोगों को पीड़ित करती है। लेकिन जिन्हें भी डसती है, बहुत तकलीफ पहुंचाती है और अंतत: जान ले लेती है।

FOP नामक इस दुर्लभ बीमारी में शरीर में हड्डियां कहीं भी उग आती हैं, जहां उन्हें नहीं होना चाहिए। जैसे स्नायु में, कंडराओं में और यहां तक कंकाल की मांसपेशियों में भी। दरअसल, होता यह है कि कंकाल की मांसपेशियों और मुलायम संयोजी ऊतकों में कायांतरण होने लगता है और वे हड्डियों में परिवर्तित होने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि हड्डियों के जोड़ सख्त हो जाते हैं और कोई भी हरकत नामुमकिन हो जाती है।

FOP के मरीज़ों में जन्मजात बड़े पंजे होते हैं और बाकी की विकृतियां धीरे-धीरे सामने आती हैं। इसके चलते उनके लिए गर्दन, कंधों, कोहनी, कूल्हों, घुटनों, कलाइयों और जबड़ों की गति असंभव हो जाती है।

यह एक जेनेटिक रोग है जिसमें अस्थि निर्माण में शामिल एक जीन (ACVR1 जिसे ALK2 भी कहते हैं) के नए संस्करण बन जाते हैं। यह जीन एक प्रोटीन (BMP) बनाता है जो भ्रूण में कंकाल के निर्माण तथा जन्म के उपरांत कंकाल की मरम्मत में भूमिका निभाता है।

ज़ाहिर है इतनी दुर्लभ बीमारी का इलाज खोजने में किसी की दिलचस्पी नहीं होगी क्योंकि इस इलाज के ग्राहक ही नहीं होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि कम से कम 13 कंपनियां इस काम में लगी हुई हैं। और उनके प्रयास रंग लाने लगे हैं। पिछले वर्ष यूएस खाद्य व औषधि प्रशासन ने FOP के लिए पहली दवा – पैलोवैरोटीन – को मंज़ूरी दी थी। चार अन्य दवाइयां परीक्षण से गुज़र रही हैं।

लेकिन…एक लेकिन और है। आशंका है कि ये दवाइयां निहायत महंगी होंगी। जैसे पैलोवैरोटीन की सालाना लागत छ: लाख चौबीस हज़ार डॉलर है। एक संभावना यह है कि यह औषधि बीमारी को आगे बढ़ने से रोक देगी और सर्जन यहां-वहां उगी हड्डियों को हटा देंगे।

इस बीमारी पर अध्ययन अनुसंधान का एक कारण तो यही है कि यह इतनी क्रूर बीमारी है। साथ ही शोधकर्ताओं को लगता है कि इसके गहन अध्ययन से हड्डियों के विकास सम्बंधी अन्य विकारों को भी समझ पाएंगे। जैसे पहले तो यह भी पता नहीं था कि यह रोग जेनेटिक है। फिर 2006 में वह जीन पहचाना गया जिसमें उत्परिवर्तन की वजह से यह रोग पैदा होता है: ALK2 नामक प्रोटीन के जीन में उत्परिवर्तन। यह प्रोटीन कई कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। यह पता चल चुका है कि असामान्य ALK2 अति-सक्रिय हो जाता है और  इसके द्वारा भेजे गए संदेश से मांसपेशियों की स्टेम कोशिकाएं हड्डियों में बदलने लगती हैं।

बहरहाल, शोधकर्ताओं ने सीधे-सीधे ALK2 पर निशाना न साधते हुए उस अणु को सक्रिय करने का मार्ग चुना जो उपास्थि के निर्माण को रोकता है। उपास्थि हड्डी के निर्माण में पूर्ववर्ती होती है। अंतत: पैलोवैरोटीन हाथ लगी। परीक्षण के दौरान पैलोवैरोटीन लेने वाले मरीज़ों में नई हड्डियों का निर्माण 60 प्रतिशत कम देखा गया। अलबत्ता, इसकी कीमत के अलावा कुछ अन्य समस्याएं भी हैं। एक तो यही है कि पैलोवैरोटीन बीमारी को रोकती नहीं – सिर्फ टालती है। दूसरी समस्या यह है कि यह दवा बच्चों को देने में परेशानी होगी क्योंकि शायद यह उनमें सामान्य हड्डी निर्माण को भी बाधित कर देगी।

रीजेनेरॉन नामक कंपनी ने एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (गैरेटोस्मैब) तैयार की है। इसके परीक्षण के नतीजे तो ठीक-ठाक रहे हैं लेकिन परीक्षण के दौरान 5 मरीज़ों की मृत्यु हो गई थी। जापान के एक समूह ने भी पाया था कि ALK2 जीन का दोषपूर्ण संस्करण एक्टिविन-ए नामक प्रोटीन के असर से अति-सक्रिय हो जाता है। दरअसल, गैरेटोस्मैब एक्टिविन-ए को निष्क्रिय कर देता है। कुछ शोध समूह सीधे-सीधे ALK2 जीन को  लक्षित कर रहे हैं। अन्य विकल्पों पर काम चल रहा है लेकिन उनकी अपनी-अपनी दिक्कतें हैं। (स्रोत फीचर्स)

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सुबह की धूप और आपकी सेहत

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

म इंसान हर दिन चलने वाले उजाले (दिन) और अंधेरे (रात) के चक्र से प्रभावित होते हैं। हमारे शरीर में लगभग 24 घंटे की (सर्केडियन घड़ी या जैविक घड़ी की) लय होती है जो हार्मोन स्राव जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं का रूप ले लेती है, और उनके माध्यम से हमारे क्रियाकलापों का संचालन करती है।

परिवेश के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए, और सही समय पर सही काम करने के लिए सूर्य की रोशनी हमारे लिए एक अलार्म घड़ी की तरह काम करती है। प्रकाश के साथ यह समन्वय (फोटोएनट्रेनमेंट) आंखों से आने वाले प्रकाश संकेतों द्वारा मस्तिष्क में होता है।

कई अन्य प्रजातियां भी अपनी दिनचर्या शुरू करने का संकेत पाने के लिए प्रकाश पर निर्भर होती हैं। जब ये प्रकाश पैटर्न बाधित होते हैं, तो उनकी प्राकृतिक लय (घड़ी) और व्यवहार गड़बड़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए, मालदीव में पर्यटन संचालक रात को पर्यटकों को नावों में भरकर सैर के लिए ले जाते हैं, और समुद्र की सतह पर तेज़ रोशनी (लगभग 4000 वॉट) डालते हैं। समुद्र के जीव इसे सुबह समझ बैठते हैं और सुबह जैसी गतिविधियां करने लगते हैं। नतीजतन पर्यटकों को व्हेल शार्क देखने को मिल जाती हैं।

हमें दिखाई देने में हमारे बाहरी रेटिना पर मौजूद प्रकाशग्राही कोशिकाएं, छड़ और शंकु, ज़िम्मेदार हैं। छड़ कोशिकाएं प्रकाश की उपस्थिति के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं लेकिन रंग के प्रति संवेदनशील नहीं होती हैं, और इसलिए ये मंद प्रकाश में सबसे उपयोगी होती हैं; दूसरी ओर शंकु कोशिकाएं उजले प्रकाश में सबसे अच्छा काम करती हैं, इनकी मदद से हम रंगों को देख पाते हैं। छड़ और शंकु कोशिकाएं प्रकाश फोटॉन्स को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करती हैं, जो रेटिना की गैंगलियन कोशिकाओं को भेजे जाते हैं। गैंगलियन कोशिकाएं रेटिना से प्राप्त सूचना को प्रोसेस करती हैं और इसे मस्तिष्क को भेज देती हैं।

प्रकाश संवेदी कोशिकाएं

लगभग 20 साल पहले प्रकाश को महसूस कर सकने वाली कोशिकाओं का एक नया समूह आंतरिक रेटिना में खोजा गया था। इन्हें इंट्रिंसिकली फोटोसेंसिटिव रेटिनल गैंगलियन कोशिकाएं (ipRGC) कहा गया। इनके अन्य नाम हैं फोटोसेंसिटिव गैंगलियन कोशिकाएं और मेलेनॉप्सिन युक्त रेटिनल गैंगलियन कोशिकाएं। ipRGC कोशिकाओं में एक प्रकाश संवेदी रंजक, मेलानॉप्सिन, होता है जो इन कोशिकाओं को सीधे प्रकाश पर प्रतिक्रिया करने में सक्षम बनाता है। ये कोशिकाएं हमारे प्रकाश के साथ दृष्टि से इतर संपर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

ipRGC से विद्युत संकेत मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में जाते हैं जो नींद, सतर्कता और मूड के नियमन में शामिल होते हैं। ये संकेत मस्तिष्क के उस क्षेत्र में भी जाते हैं जो आंखों की पुतलियों को नियंत्रित करते हैं, जिससे वे तेज़ रोशनी में सिकुड़ जाती हैं।

और इन सबसे भी महत्वपूर्ण, ये विद्युत संकेत हाइपोथैलेमस के उस हिस्से में भी जाते हैं जो सर्केडियन लय को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के इस हिस्से को लंबे समय से मास्टर घड़ी के रूप में जाना जाता है, जहां आपके शरीर की आंतरिक घड़ी बाहरी दुनिया के दिन-रात के चक्र के साथ तालमेल बिठाती है।

सुबह के बाशिंदे

सुबह की दिनचर्या की प्राथमिकता उन लोगों की होती है जो जल्दी सोना पसंद करते हैं और जल्दी उठते हैं। यदि आप अपना अधिकतर काम सुबह जल्दी (और दिन के उजाले में) निपटा लेते हैं तो ऐसा करना मोटापे के जोखिम को तो कम करता ही है, साथ ही शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर करता है। कई अध्ययनों से यह भी पता चला है कि जल्दी सोना गंभीर अवसाद विकार के जोखिम को कम रखता है (साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 2021)। स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजी के प्रोफेसर एंड्रयू हुबरमैन ने अपने लोकप्रिय पॉडकास्ट में सर्केडियन घड़ी को रीसेट करने में सुबह-सुबह की धूप (जब सूरज क्षितिज के नज़दीक होता है) के लाभकारी प्रभावों के बारे में बताया है। ipRGC कोशिकाएं नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 480 नैनोमीटर) के प्रति सबसे अधिक प्रतिक्रिया देती हैं। सुबह की रोशनी में पीली की अपेक्षा नीली रोशनी का अनुपात कम होता है। यह बस इतना होता है कि हाइपोथैलेमस को संदेश मिल जाए कि एक और सर्केडियन चक्र की शुरुआत करे। इसके सोलह घंटे बाद आपका शरीर निद्रालु होगा। इसलिए बाहर निकलें और सुबह की रोशनी में नहाएं – चाहे खुली धूप हो या बादलों से छनकर आती धूप (सूरज को सीधे न देखें)। अपनी घड़ी को सूर्योदय के साथ लयबद्ध करने से आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सिकल सेल रोग के सस्ते इलाज की उम्मीद

सिकल सेल रोग से दुनिया भर के लाखों लोग प्रभावित हैं। एक अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष लगभग पौने चार लाख लोग इसकी वजह से जान गंवाते हैं और लाखों लोग दर्दनाक तकलीफें झेलते हैं। यू.एस. खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने पिछले वर्ष इसके उपचार के लिए दो जीन थेरेपी प्रक्रियाओं को मंज़ूरी दी थी। लेकिन ये उपचार काफी महंगे हैं – इनका खर्च प्रति व्यक्ति करीब 17 करोड़ रुपए बैठता है। साथ ही इनमें जोखिमभरी कीमोथेरेपी शामिल होती है।

हाल ही में औषधि शोधकर्ताओं ने मुंह से दी जाने वाली एक दवा की खोज की है। इस औषधि ने सिकल सेल रोग से ग्रसित जंतुओं में स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को पुनर्स्थापित किया है। देखा जाए तो जीन थेरेपी एक बार करनी होती है और वह लंबे समय तक लाभ प्रदान कर सकती है। इसके विपरीत इस नई दवा को समय-समय पर जीवन भर लेने की आवश्यकता हो सकती है।

यह दवा मनुष्यों में अभी सुरक्षा परीक्षण से नहीं गुज़री लेकिन साइंस जर्नल में वर्णित इस प्रायोगिक दवा ने व्यापक रूप से सुलभ और किफायती उपचार की एक उम्मीद जगाई है।

गौरतलब है कि सिकल सेल रोग वयस्क हीमोग्लोबीन के उत्पादन के लिए ज़िम्मेदार जीन में उत्परिवर्तन के कारण होता है। यह उत्परिवर्तन लाल रक्त कोशिकाओं को हंसिए (सिकल) आकार का बना देता है, जिससे रक्त कोशिकाएं आपस में चिपक जाती हैं। इसके चलते रक्त वाहिकाएं अवरुद्ध होती हैं, और तेज़ दर्द के साथ ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं।

रोचक तथ्य यह है कि इस जीन में उत्परिवर्तन से पीड़ित व्यक्तियों में भी भ्रूणावस्था में सामान्य लाल रक्त कोशिकाएं बनती हैं। उपचारों में कोशिश यह की जाती है कि वयस्क व्यक्ति में वयस्क जीन को बाधित करके भ्रूण के लाल रक्त कोशिका जीन को सक्रिय कर दिया जाए ताकि सामान्य लाल रक्त कोशिकाएं बनने लगें।

सिकल सेल रोग उस जीन में उत्परिवर्तन के कारण होता है जो वयस्क में हीमोग्लोबीन बनाने के लिए ज़िम्मेदार होता है। वर्तमान में स्वीकृत एक जीन थेरेपी में किया यह जाता है कि एक वायरस की मदद से वयस्क हीमोग्लोबीन का संशोधित जीन व्यक्ति की स्टेम कोशिकाओं में प्रविष्ट करा दिया जाता है। फिर इन संशोधित कोशिकाओं को वापिस उस व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है। लेकिन उससे पहले उसके शरीर में पहले से मौजूद रक्त स्टेम कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।

दूसरी जीन थेरेपी में भी मरीज़ की रक्त स्टेम कोशिकाओं में संशोधन किया जाता है लेकिन इसके लिए क्रिस्पर नामक तकनीक की मदद ली जाती है। क्रिस्पर की मदद से BCL11A नामक एक प्रोटीन को बाधित कर दिया जाता है। यह वह प्रोटीन है जो वयस्कों में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन रोक देता है। तो जब BCL11A जीन को ठप कर दिया जाता है तो रक्त स्टेम कोशिकाओं में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन फिर बनने लगता है और मरीज़ को मदद मिलती है।

लेकिन जीन थेरेपी के भारी खर्च और जटिलता के चलते हर व्यक्ति तक इसकी पहुंच सीमित हो जाती है, खासकर अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में जहां सिकल सेल रोगी अधिक पाए जाते हैं।

अलबत्ता, वयस्कों में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन जीन को सक्रिय करने वाली औषधियां विकसित करने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं लेकिन उतने कारगर नहीं रहे हैं।

जैसे नोवार्टिस की पामेला टिंग और जे ब्रैडनर एक ऐसा यौगिक खोज रहे थे जो BCL11A द्वारा बनाए गए प्रोटीन से जुड़ सके और उसे कोशिका की प्रोटीन विध्वंस मशीनरी में पहुंचा सके ताकि वह भ्रूणीय हीमोग्लोबीन के जीन को शांत न कर सके। टीम ने एक यौगिक (dWIZ-1) की पहचान की है जो कोशिका में डाले जाने पर भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन बढ़ा देता है। लेकिन यह BCL11A को लक्षित नहीं करता।

इस यौगिक में संशोधन कर dWIZ-2 का निर्माण किया गया, जिसने लाल रक्त कोशिकाओं में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का स्तर 17-45 प्रतिशत तक बढ़ा दिया। यह स्तर मनुष्यों में लाल रक्त कोशिकाओं के कार्यात्मक उत्पादन करने के लिए पर्याप्त है।

dWIZ-2 ने चूहों और तीन में से दो साइनोमोल्गस बंदरों में प्रभावशीलता दिखाई है और कोई दुष्प्रभाव भी नज़र नहीं आए हैं। यह ऐसा पहला छोटा अणु है जो स्टेम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन बढ़ाता देता है।

दिक्कत यह है कि dWIZ प्रोटीन कई कोशिकाओं में बनता है और यह कई जीनों को नियंत्रित करता है। यानी इसकी नियामक भूमिका काफी व्यापक हो सकती है और इसका दमन करना शायद सुरक्षित न हो। बहरहाल, ब्रैडनर का मत है कि भ्रूणीय हीमोग्लोबन को बढ़ाने की dWIZ-2 की क्षमता बहुत अधिक है और यह आगे के विकास का रास्ता तो खोलता ही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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