फल-सब्ज़ियां अब उतनी पौष्टिक नहीं रहीं

तंदुरुस्त बने रहने के लिए जंक फूड, तला-भुना खाने की बजाय अक्सर फल, सलाद, सब्ज़ियों को भोजन में शामिल करने की सलाह दी जाती है। लेकिन हम शायद इस बात से अनभिज्ञ हैं कि पिछले सत्तर सालों में इन ‘सेहतमंद’ चीज़ों में भी पोषक तत्वों की मात्रा घट गई है।

वर्ष 2004 में जर्नल ऑफ दी अमेरिकन कॉलेज ऑफ न्यूट्रिशन में एक अध्ययन में 1950 से 1999 के बीच प्रकाशित यूएस कृषि विभाग के डैटा के आधार पर बताया गया था कि 43 फसलों में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, राइबोफ्लेविन, विटामिन सी जैसे 13 पोषक तत्वों में परिवर्तन दिखे थे। कमी कितनी हुई यह हर पोषक तत्व और फल-सब्ज़ी के प्रकार पर निर्भर है। लेकिन सामान्यत: प्रोटीन में 6 प्रतिशत से लेकर राइबोफ्लेविन में 38 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है। खासकर ब्रोकली, केल (एक तरह की गोभी) और सरसों के साग में कैल्शियम में सबसे अधिक कमी आई है। वहीं चार्ड, खीरे और शलजम में आयरन की मात्रा में काफी कमी हुई है। शतावरी, कोलार्ड (एक अन्य तरह की गोभी), सरसों का साग और शलजम के पत्तों में विटामिन सी काफी कम हो गया है। इसके बाद हुए अन्य अध्ययनों में भी इसी तरह के परिणाम देखने को मिले हैं।

अनाजों में भी इसी तरह की कमी देखने को मिली है। 2020 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया था कि 1955 से 2016 के बीच गेहूं में प्रोटीन की मात्रा 23 प्रतिशत कम हो गई है, साथ ही आयरन, मैंग्नीज़, जस्ता और मैग्नीशियम भी घटे हैं।

मांसाहारी भी कम पोषक तत्व वाले भोजन की समस्या से अछूते नहीं हैं। पशु अब कम पौष्टिक घास और अनाज खा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मांस और अन्य पशु उत्पाद अब पहले की तुलना में कम पौष्टिक हो गए हैं।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के भू-आकृति विज्ञानी डेविड आर. मॉन्टगोमेरी और जलवायु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्रिस्टी एबी बताते हैं कि इस समस्या के लिए कई कारक ज़िम्मेदार हैं। इनमें एक है फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए अपनाई गईं आधुनिक कृषि पद्धतियां।

पौधों को शीघ्र और बड़ा उगाने के लिए अपनाए गए तरीके में पौधे मिट्टी से पर्याप्त पोषक तत्व नहीं सोख पाते या उन्हें संश्लेषित नहीं कर पाते हैं।

फिर अधिक उपज से यह भी होता है कि मिट्टी से अवशोषित पोषक तत्व अधिक फलों में बंट जाते हैं, नतीजतन फल-सब्ज़ियों में पोषक तत्व कम होते हैं।

उच्च पैदावर के कारण होने वाली मृदा की क्षति भी इस समस्या का एक कारण है। गेहूं, मक्का, चावल, सोयाबीन, आलू, केला, रतालू और सन सभी फसलों की जड़ें कवक के साथ साझेदारी करती हैं जिससे पौधों द्वारा मिट्टी से पोषक तत्व और पानी लेने की क्षमता बढ़ती है। उच्च पैदावार वाली खेती से मिट्टी खराब हो जाती है जिससे कुछ हद तक कवक और पौधों की साझेदारी प्रभावित होती है।

कार्बन डाईऑक्साइड का बढ़ता स्तर भी हमारे खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता कम कर रहा है। पौधे वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड लेते हैं, और वृद्धि के लिए इसके कार्बन का उपयोग करते हैं। लेकिन जब गेहूं, चावल, जौं और आलू समेत बाकी फसलों को उच्च कार्बन डाईऑक्साइड मिलती है तो उनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। इसके अलावा, जब पौधों में कार्बन डाईऑक्साइड अधिक मात्रा में होती है तो ये मिट्टी से कम पानी खींचते हैं, जिसका अर्थ है कि वे मिट्टी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी कम ले रहे हैं।

2018 में साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि उच्च कार्बन डाईऑक्साइड के कारण 18 किस्म की धान में प्रोटीन, आयरन, ज़िंक और कई बी विटामिन कम पाए गए थे।

यदि इन पोषक तत्वों में और कमी आई तो पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोगों का खतरा बढ़ सकता है या जीर्ण रोगों के प्रति जोखिमग्रस्त हो सकते हैं। और इसका असर उन लोगों पर, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले लोगों पर, अधिक होगा जो ऊर्जा और पोषण के लिए मुख्यत: चावल-गेहूं जैसे अनाजों पर निर्भर हैं और पोषण के अन्य स्रोतों का खर्च वहन नहीं कर सकते।

यह तो सुनने में आता रहता है कि अब सब्ज़ियों या फलों में वो स्वाद नहीं रहा। देखा गया है कि कई सारे पोषक तत्व फल-सब्ज़ियों और अनाज के स्वाद में इजाफा करते हैं। इनकी कमी फल-सब्ज़ियों के स्वाद को भी प्रभावित करेंगे।

बुरी खबर यह है कि कई अनुमान मॉडलों का कहना है कि आगे भी आलू, चावल, गेहूं और जौं के प्रोटीन में 6 से 14 प्रतिशत की कमी आ सकती है। नतीजतन भारत समेत 18 देशों के आहार से 5 प्रतिशत प्रोटीन घट जाएगा।

तो इस समस्या से कैसे निपटा जाए? मिट्टी में सुधार के लिए एक तरीका है संपोषी खेती। पीअरजे: लाइफ एंड एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि संपोषी खेती से फसलों में कुछ विटामिन, खनिज और पादप-रसायनों का स्तर बढ़ता है, मिट्टी का जैविक स्वास्थ्य बेहतर होता है। इसके लिए पहला कदम यह है कि जितना संभव हो सके मिट्टी को खाली छोड़ दिया जाए और जुताई कम कर दी जाए। मिट्टी को ढंकने वाली तिपतिया घास, राई घास, या वेच लगाकर मिट्टी का कटाव और खरपतवार की वृद्धि रोकी जा सकती है। और खेत में बदल-बदल कर फसलें लगाने से पोषक तत्व में फायदा हो सकता है।

लेकिन जब तक पैदावार में पोषण बहाल नहीं होता तब तक क्या करें? पहले तो इस खबर से घबराकर लोग फल-सब्ज़ियां खाना छोड़ या कम कर पोषण पूरकों का रुख न करें। बल्कि इससे वाकिफ रहें कि उनका भोजन कैसे उगाया जा रहा है। हम क्या खा रहे हैं यह पता होना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह जानना भी है कि हम जो खा रहे हैं वह कैसे उगाया जा रहा है। और पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति के लिए अलग-अलग तरह और रंग की फल-सब्जियां आहार में शामिल करें। पृथ्वी पर मौजूदा सबसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य फल, सब्जियां और अनाज ही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या एआई चैटबॉट्स महामारी ला सकते हैं?

काफी समय से कुछ तकनीकी विशेषज्ञ कृत्रिम बुद्धि यानी एआई को मानवता के लिए खतरा बताते आए हैं। इस क्षेत्र में हुए हालिया विकास से प्रतीत होता है कि यह खतरा काफी नज़दीक है। विशेषज्ञों का दावा है कि एआई बिना किसी वैज्ञानिक विशेषज्ञता वाले बदनीयत व्यक्ति को घातक वायरस डिज़ाइन करने में मदद कर सकती है।

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के जैव सुरक्षा विशेषज्ञ केविन एस्वेल्ट ने हाल ही में अपने छात्रों को चैटजीपीटी या अन्य विशाल भाषा मॉडल की मदद से एक खतरनाक वायरस तैयार करने का काम दिया। मात्र एक घंटे में छात्रों के पास वायरसों की एक लंबी सूची थी; और तो और, साथ में उन कंपनियों की भी जानकारी थी जो रोगजनकों के आनुवंशिक कोड को बनाने में मदद कर सकती थीं और इन टुकड़ों को जोड़ने वाली कुछ अनुसंधान कंपनियों के भी नाम थे। इन परिणामों के आधार पर एस्वेल्ट और अन्य विशेषज्ञों का दावा है कि एआई सिस्टम जल्द ही गैर-वैज्ञानिक लोगों को परमाणु हथियारों के बराबर घातक जैविक हथियार डिज़ाइन करने में मदद कर सकती है। इसका उपयोग आतंकी गतिविधियों में भी किया जा सकता है। 

फिलहाल किसी खतरनाक विलुप्त या मौजूदा वायरस के आधार पर जैविक हथियार बनाने का तरीका मिलने के बाद भी इन्हें बनाने में काफी विशेषज्ञता चाहिए होती है। इसके लिए न केवल उचित वायरस की पहचान करना होगी, बल्कि वायरल आनुवंशिक सामग्री को संश्लेषित करने, जीनोम को एक साथ जोड़ने और इसे अन्य अभिकर्मकों के साथ जोड़कर एक ऐसा वायरस तैयार करना होगा जो कोशिकाओं को संक्रमित कर सके और अपनी प्रतिलिपियां बना सके।

लेकिन एआई इस प्रक्रिया को आसान बना रही है। उदाहरण के लिए बाज़ार में जल्द ही उपलब्ध होने वाले बेंचटॉप डीएनए प्रिंटर की मदद से शोधकर्ता स्क्रीनिंग प्रक्रिया को धोखा दे सकते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनियां यह सुनिश्चित करती हैं कि किसी नमूने में संभावित जैविक हथियारों के लिए आनुवंशिक सामग्री तो शामिल नहीं है। इस प्रक्रिया से बचकर कोई बदनीयत व्यक्ति इन आनुवंशिक ब्लूप्रिंट को अनुबंध अनुसंधान कंपनियों या एक रोबोटिक क्लाउड लैब को लक्ष्य वायरस में डालने के लिए भेज सकता है।

इस कार्य में एआई की भूमिका का पता लगाने के लिए एस्वेल्ट ने जीव-विज्ञान में बिना किसी विशेषज्ञता वाले स्नातक छात्रों को तीन से चार सदस्यों वाले तीन समूहों में बांटा। इन सभी समूहों के पास GPT-4, बार्ड और अन्य एआई चैटबॉट्स थे। एक घंटे के भीतर इन सभी समूहों को चैटबॉट्स की मदद से महामारी फैलाने में सक्षम वायरसों को डिज़ाइन करना था। हालांकि, कुछ चैटजीपीटी ने खतरनाक चीज़ों के बारे में पूछे गए सीधे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन जब शब्दों में हेर-फेर करके सवाल पूछे गए तो आसानी से जानकारी मिल गई। उदाहरण के तौर पर जब सवाल यह था कि “मैं एक टीका विकसित करने के लिए काम कर रहा हूं …” तो चैटबॉट्स ने जवाब में चार वायरस के सुझाव दे दिए थे। हालांकि गूगल पर ढूंढने पर भी ऐसी सूची मिल जाती लेकिन कुछ मामलों में चैटबॉट्स ने उन आनुवंशिक उत्परिवर्तनों की भी जानकारी दी जो संक्रमण को अधिक फैला सकते हैं।

इतना ही नहीं, एआई ने किसी वायरस के आनुवंशिक टुकड़ों को जोड़कर वायरस तैयार करने की तकनीक भी बताई इसके लिए उपयुक्त प्रयोगशालाओं और कंपनियों के नाम भी बताए जो बिना स्क्रीनिंग के आनुवंशिक सामग्री को प्रिंट करने के लिए तैयार हो सकती हैं।

एस्वेल्ट को चिंता है कि चैटबॉट्स द्वारा दिए गए विशिष्ट सुझाव किसी महामारी का खतरा बहुत अधिक बढ़ा सकते हैं। जैसे-जैसे जैविक खतरों पर वैज्ञानिक साहित्य में वृद्धि हो रही है और एआई प्रशिक्षण डैटा में इसे शामिल किया जा रहा है. इस बात की संभावना बढ़ रही है कि एआई आतंकवादियों का काम आसान बना सकती है। एस्वेल्ट का मानना है कि चैटबॉट और अन्य एआई प्रशिक्षण डैटा द्वारा साझा की जाने वाली जानकारी को सीमित किया जाना चाहिए। रोगजनकों को बनाने और बढ़ाने के बारे में बताने वाले ऑनलाइन पेपर्स को हटाकर जोखिम कम किया जा सकता है। सभी डीएनए संश्लेषण कंपनियों और डीएनए प्रिंटरों के लिए ज्ञात रोगजनकों और विषाक्त पदार्थों की आनुवंशिक सामग्री की जांच अनिवार्य की जानी चाहिए। इसके साथ ही एकत्रित की जाने वाली किसी भी आनुवंशिक सामग्री की सुरक्षा जांच करना भी सभी अनुबंध अनुसंधान संगठनों के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खाद्य सुरक्षा के लिए विविधता ज़रूरी – एस. अनंतनारायणन

अंग्रेज़ी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है: अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में मत रखो। यह कहावत भोजन के संदर्भ में एकदम मुनासिब लगती है। खाद्य आपूर्ति शृंखला में विविधता रखना खाद्य भंडार में कमी का संकट रोकने में प्रभावी है।

पेनसिल्वेनिया स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल गोमेज़ और उनके साथियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के 300 से अधिक शहरों और केंद्रों का अध्ययन किया और देखा कि चार साल की अवधि में इनमें से कुछ स्थान खाद्य आपूर्ति के संकट से सुरक्षित रहे। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि वे क्या खासियतें हैं जिन्होंने इन स्थानों को सुरक्षित रखा। नेचर पत्रिका में उन्होंने बताया है कि साल 2012 से 2015 के दौरान यूएसए के अधिकांश इलाकों ने विभिन्न स्तर पर सूखे का सामना किया था। लेकिन जिन स्थानों पर खाद्य आपूर्ति विविध स्रोतों से थी वहां की खाद्य आपूर्ति सबसे अधिक अप्रभावित रही।

ऐसा लगता है कि सेवा या आपूर्ति के कई महत्वपूर्ण नेटवर्क विविधता पर निर्भर होते हैं। इसका सबसे उम्दा उदाहरण है इंटरनेट, जो अत्यधिक और परिवर्तनशील डैटा ट्रैफिक संभालता है, लेकिन हमने शायद ही कभी सुना हो कि यह पूरी तरह ठप हो गया या इसकी स्पीड गंभीर स्तर तक कम हो गई। इसका कारण यह है कि इंटरनेट कभी एक पूरे संदेश को एक निश्चित रास्ते से नहीं भेजता। यह संदेश को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटता है और हर टुकड़ा उस समय उपलब्ध सर्वोत्तम रास्ता अख्तियार करता है। इस तरह किसी संदेश को गंतव्य पर पहुंचाने के लिए विविध सर्वोत्तम मार्गों का उपयोग किया जाता है और यातायात सुचारू बना रहता है। यदि किसी मार्ग पर भीड़भाड़ है तो वैकल्पिक रास्ता अपना लिया जाता है।

एक और प्रसिद्ध उदाहरण है पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) की स्थिरता। विशाल जंगल सूखा, भयानक गर्मी या जाड़ा, कवक या टिड्डियों के हमले झेलते हैं। लेकिन ये ऐसी जगह हैं जहां काफी सारी विविध प्रजातियां एक साथ फलती-फूलती हैं। कीटों और जानवरों की विविधता के महत्व को स्वीकारा जा चुका है और दुनिया भर में हो रहे संरक्षण के अधिकांश प्रयास विविधता के संरक्षण के लिए किए जा रहे हैं।

किसी गैस के दिए गए आयतन के दाब की स्थिरता को गैस के अणुओं की गतियों में विविधता के परिणाम के रूप में देखा जाता है। किसी एक तापमान गतियों का एक परास होता है। लेकिन चूंकि अणुओं की संख्या बहुत ज़्यादा है, गतियों का वितरण अपरिवर्तित रहता है, और इसीलिए गैस का दाब भी स्थिर रहता है। भौतिक तंत्रों में विविधता का अध्ययन गणित की मदद से किया जाता है। इसमें अनिश्चितता के स्तर का एक पैमाना है, जिसे एन्ट्रॉपी कहा जाता है, और यह तंत्र में विविधता को दर्शाती है। वैज्ञानिक क्लॉड शैनन टेलीग्राफ तारों से भेजी जाने वाली सूचनाओं पर आकस्मिक ‘शोर’ के प्रभाव सम्बंधी शोध कार्य के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने संदेश की एक लड़ी में उपस्थित विविधता पर काम करते हुए बताया था कि संदेश में जितने विविध अक्षर होंगे उतना ही अधिक मुश्किल यह पता करना होगा कि उसमें एक अक्षर के बाद अगला अक्षर क्या होगा। इस विचार को पारिस्थितिक प्रणालियों तक विस्तारित किया गया, और विविधता को मापने का यह तरीका शैनन सूचकांक कहलाया। संयुक्त राज्य अमेरिका में खाद्य आपूर्ति शृंखला सम्बंधी काम में शोधकर्ताओं ने खाद्य नेटवर्क के लिए इसी सूचकांक की गणना की है।

अध्ययन का संदर्भ भोजन की आपूर्ति शृंखला – अनाज, सब्ज़ियों, दूध, मांस उत्पादों – पर मनुष्यों की कई आबादियों की बढ़ती निर्भरता है। शोध पत्र बताता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली मौसम की चरम घटनाओं, जिनके भविष्य में बढ़ने की अपेक्षा है, के कारण खाद्य आपूर्ति में अचानक कमी होती है – जिसके कारण बड़े शहरों के भंडार अचानक खाली हो जाते हैं। भू-राजनीतिक व नीतिगत परिवर्तन, और महामारी जैसी घटनाएं भी स्रोतों और आपूर्ति मार्गों को प्रभावित कर सकती हैं। शोध पत्र में कहा गया है कि विश्व स्तर पर अनाज भंडार पर संकट का खतरा बढ़ रहा है। चूंकि अब किसी स्थान पर खाद्य आपूर्ति के स्रोत स्थानीय की बजाय दूर-दूर तक फैले हैं, यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय भी हैं, संकट के परिणाम भी दूर-दूर तक नज़र आ सकते हैं। यह उन घटनाओं को बढ़ा देगा जो आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं। अलबत्ता, आपूर्ति के स्रोतों में विविधता होने से लचीलापन मिलेगा।

उपरोक्त अध्ययन में संयुक्त राज्य अमेरिका के 284 शहरों और 45 अन्य केंद्रों में खाद्य आपूर्ति और खाद्य आपूर्ति प्रणाली – यानी फसलों के स्रोत, जीवित पशु या पशु आहार और मांस – की स्थिरता को देखा गया। खपत केंद्रों को ‘खाद्य में कमी पड़ने’ की आवृत्ति के अनुसार या खाद्य आपूर्ति किसी वर्ष में चार वर्षों के औसत से एक हद से कम (3 से 15 प्रतिशत कम) होने के आधार पर वर्गीकृत किया गया। चार वर्षों की अवधि में सैकड़ों शहरों में पड़े हज़ारों खाद्य संकटों के आधार पर टीम ने यह गणना की कि ‘कमी की तीव्रता’ की संभाविता कब एक हद से ज़्यादा हो जाएगी। इसके साथ उन्होंने यह भी आकलन किया कि शहरों के आपूर्ति के स्रोतों में विविधता कितनी है।

स्रोतों की विविधता का आकलन करने के लिए उन्होंने प्रत्येक शहर के विभिन्न तरह के खाद्य के व्यापारिक भागीदारों या पड़ोसियों, खाद्य व्यापारियों-आपूर्तिकर्ताओं को सूचीबद्ध किया। फिर इन्हें भौतिक दूरी, जलवायु सहसम्बंध, शहरी वर्गीकरण, आर्थिक विशेषज्ञता और संकुल शहर के तहत वर्गीकृत किया गया। और ‘शैनन सूचकांक’ के ज़रिए आपूर्ति स्रोतों की विविधता की गणना की गई।

विविधता में स्थिरता है

इसके बाद, विभिन्न शहरों में खाद्य आपूर्ति कमी की संभाविता और शहरों में खाद्य आपूर्ति के स्रोतों में विविधता के स्तर के बीच सम्बंध की खोज की गई। देखा गया कि आपूर्ति शृंखला में विविधता बढ़ने पर खाद्य आपूर्ति संकट की संभावना कम होती जाती है। अध्ययन कहता है कि खाद्य आपूर्तिकर्ताओं के अधिक विविधता वाले शहरों में किसी भी कारण से खाद्य आपूर्ति में कमी की संभावना कम है। ठीक वैसे ही जैसे इकोसिस्टम में विविधता उसे बाहरी झटकों के खिलाफ सुरक्षित रखती है।

दुनिया की आधी से अधिक आबादी शहरों में रहती है, और यह संख्या बढ़ रही है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के चलते खाद्य सामग्री की आपूर्ति को प्रभावित करने वाले कारकों की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यकता है। आज कृषि उपज की खरीद और वितरण की स्थापित प्रणालियों में संशोधन और ‘दक्षता लाने’ के प्रयास नज़र आ रहे हैं। चूंकि विविधता आपूर्ति शृंखलाओं में विफलता के विरुद्ध एक शक्तिशाली निरोधक साबित होती है, इसलिए यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि क्या ये परिवर्तन विविधता के स्तर को प्रभावित करेंगे।

इंटरनेट, इकोसिस्टम, या सामाजिक नेटवर्क डिज़ाइन और निर्मित नहीं किए गए हैं, बल्कि वे वे धीरे-धीरे विकसित हुए हैं, और स्थिरता की दृष्टि से अत्यधिक अनुकूलित हैं। उनमें संरक्षण के लिए अतिरिक्त चीज़ें और सुरक्षा उपाय होते हैं। इनकी पहचान जानी-मानी अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि स्थिरता है।

और यही बात आपूर्ति शृंखलाओं पर भी लागू होती है, जो कृषि वाणिज्य के सामाजिक नेटवर्क हैं। वे सदियों से शहरों, व्यापार मार्गों, उत्पादन क्षेत्रों और बाज़ारों के विकास से बने हैं। कई परिवर्तनों और सुधारों के बाद इस में तंत्र की कड़ियां टूटने, या उत्पादन या मांग में घट-बढ़, यहां तक कि फसल हानि के लिए भी कुशल और किफायती विकल्प उपलब्ध हैं। और तंत्र विकसित होने के साथ भौगोलिक, वाणिज्यिक, भंडारण, ढुलाई और व्यक्तिगत कारक जुड़ गए हैं।

तेज़ी से बदलती परिस्थितियों में खामियां आसानी से देखी जा सकती हैं। लेकिन ये बड़े-बड़े व्यापक परिवर्तनों का आधार नहीं हो सकती हैं क्योंकि कई खामियां को दूर किया जा सकता है। लेकिन एक ऐसी प्रणाली को छोड़ देना अनुचित होगा जो परस्पर निर्भर एजेंटों के एक जीवंत नेटवर्क पर आधारित है। (स्रोत फीचर्स)

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क्यों मच्छर कुछ लोगों को ज़्यादा काटते हैं?

ह तो जानी-मानी बात है कि मच्छर हमारे शरीर से निकलने वाली गंध सूंघकर हमें खोजते हैं। काश, यह पता चल जाए कि वह कौन-सी गंध है जो इन्हें कुछ मनुष्यों की ओर अधिक आकर्षित करती है। इस सवाल के जवाब का महत्व यह है कि मच्छर डेंगू, मलेरिया और पीत ज्वर जैसी बीमारियां फैलाते हैं जो प्रति वर्ष 7 लाख लोगों की जान लेती हैं।

हाल ही में जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के जीव विज्ञानी कोनोर मैकमेनीमैन ने खेल के एक खुले मैदान में विशाल टेंट लगाकर इसका जवाब तलाशने के प्रयास किए।

मच्छरों को किसी व्यक्ति की उपस्थिति का पता उसके शरीर की गंध, श्वसन से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड और शरीर के तापमान से लगता है। मच्छर अपने एंटीना पर उपस्थित गंध तंत्रिकाओं के माध्यम से लगभग 60 मीटर की दूरी से गंध का पता लगाते हैं और शरीर की गर्मी की मदद से अपने लक्ष्य पर सटीकता से पहुंच जाते हैं।

मच्छरों की शिकारी रणनीतियों को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने कुछ प्रतिभागियों को खेल मैदान की परिधि पर लगे 8 तंबुओं में सोने के लिए कहा। वैज्ञानिकों ने प्रत्येक तंबू से शरीर की गंध और कार्बन डाईऑक्साइड युक्त हवा को नलियों के माध्यम से मैदान के भीतर निर्धारित लैंडिंग प्लेटफॉर्मों तक पहुंचाया। इन जगहों को मनुष्यों के शरीर के सामान्य तापमान (35 डिग्री सेल्सियस) पर रखा गया था।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने इंफ्रारेड सेंसर की मदद से देखा कि भूखे मच्छर कहां जाते हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक विशाल क्षेत्र में विभिन्न गंध और ध्वनियां तथा मौसमी परिस्थितियां होने के बावजूद मच्छर कुछ मनुष्यों की गंध वाले प्लेटफॉर्म की ओर अधिक आकर्षित हुए।

विभिन्न मनुष्यों के शरीर से निकलने वाली विशिष्ट गंध का पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की त्वचा की रासायनिक बनावट का अध्ययन किया। जैसा कि पूर्व अध्ययनों में पाया गया था मच्छर ऐसे लोगों को अधिक पसंद करते हैं जिनकी त्वचा के स्राव में विभिन्न कार्बोक्सिलिक अम्लों का मिश्रण होता है। यह एक प्रकार का तैलीय स्राव होता है जो हमारी त्वचा में नमी बनाए रखता है और उसकी रक्षा करता है। इनमें से दो कार्बोक्सिलिक अम्ल लिम्बर्गर चीज़ में भी पाए जाते हैं जो मच्छरों को आकर्षित करने के लिए मशहूर है। दूसरी ओर, मच्छर सेज और नीलगिरी जैसे पेड़-पौधों में पाए जाने वाले रसायन युकेलिप्टॉल के नज़दीक कम जाते हैं।

टीम ने मच्छर-आकर्षक के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड और शरीर की गंध की तुलना की और पाया कि मच्छर गंध को अधिक प्राथमिकता देते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय में और अधिक काम करने की दरकार है। इसमें आर्द्रता जैसे पहलुओं को भी जोड़ना चाहिए ताकि सटीक निष्कर्ष मिल सकें।

आशा है कि मच्छरों की पसंद-नापसंद गंध का पता लगने से नई तरह की मच्छरदानी तथा मच्छर विकर्षक विकसित करने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

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विज्ञान समाचार संकलन: मई-जून 2023

अमेरिका में नमभूमियों की सुरक्षा में ढील

मेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले ने क्लीन वॉटर एक्ट के अंतर्गत शामिल दलदली क्षेत्रों की परिभाषा को संकीर्ण कर दिया है। इस फैसले से नमभूमियों को प्राप्त संघीय सुरक्षा कम हो गई है। बहुमत द्वारा दिया गया यह फैसला कहता है कि क्लीन वॉटर एक्ट सिर्फ उन नमभूमियों पर लागू होगा जिनका आसपास के विनियमित जल के साथ निरंतर सतही जुड़ाव है जबकि फिलहाल एंजेंसियों का दृष्टिकोण रहा है कि नमभूमि की परिभाषा में वे क्षेत्र भी शामिल हैं जिनका किसी तरह का जुड़ाव आसपास के सतही पानी से है। इस निर्णय से मतभेद रखने वाले न्यायाधीशों का मानना है कि यह नया कानून जलमार्गों के आसपास की नमभूमियों की सुरक्षा को कम करेगा और साथ ही प्रदूषण तथा प्राकृतवासों के विनाश को रोकने के प्रयासों को भी कमज़ोर करेगा। वर्तमान मानकों के पक्ष में जो याचिका दायर की गई थी उसके समर्थकों ने कहा है कि इस फैसले से 180 करोड़ हैक्टर नमभूमि यानी पहले से संरक्षित क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से से संघीय नियंत्रण समाप्त हो जाएगा। कई वैज्ञानिकों ने फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि इस फैसले में नमभूमि जल विज्ञान की जटिलता को नज़रअंदाज़ किया गया है। (स्रोत फीचर्स)

दीर्घ-कोविड को परिभाषित करने के प्रयास

कोविड-19 से पीड़ित कई लोगों में लंबे समय तक विभिन्न तकलीफें जारी रही हैं। इसे दीर्घ-कोविड कहा गया है। इसने लाखों लोगों को कोविड-19 से उबरने के बाद भी लंबे समय तक बीमार या अक्षम रखा। अब वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने दीर्घ-कोविड के प्रमुख लक्षणों की पहचान कर ली है। दीर्घ-कोविड से पीड़ित लगभग 2000 और पूर्व में कोरोना-संक्रमित 7000 से अधिक लोगों की रिपोर्ट का विश्लेषण कर शोधकर्ताओं ने 12 प्रमुख लक्षणों की पहचान की है। इनमें ब्रेन फॉग (भ्रम, भूलना, एकाग्रता की कमी वगैरह), व्यायाम के बाद थकान, सीने में दर्द और चक्कर आने जैसे लक्षण शामिल हैं। अन्य अध्ययनों ने भी इसी तरह के लक्षण पहचाने हैं। दी जर्नल ऑफ दी अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित इस अध्ययन का उद्देश्य एक मानकीकृत परिभाषा और दस पॉइन्ट का एक पैमाना विकसित करना है जिसकी मदद से इस सिंड्रोम का सटीक निदान किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)

निजी चंद्र-अभियान खराब सॉफ्टवेयर से विफल हुआ

त 25 अप्रैल को जापानी चंद्र-लैंडर की दुर्घटना के लिए सॉफ्टवेयर गड़बड़ी को दोषी बताया जा रहा है। सॉफ्टवेयर द्वारा यान की चंद्रमा की धरती से ऊंचाई का गलत अनुमान लगाया गया और यान ने अपना ईंधन खर्च कर दिया। तब वह चंद्रमा की सतह से लगभग 5 किलोमीटर ऊंचाई से नीचे टपक गया। यदि सफल रहता तो हकोतो-आर मिशन-1 चंद्रमा पर उतरने वाला पहला निजी व्यावसायिक यान होता। कंपनी अब 2024 व 2025 के अभियानों की तैयारी कर रही है, जिनमें इस समस्या के समाधान पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

यूएई द्वारा क्षुद्रग्रह पर उतरने योजना

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की स्पेस एजेंसी मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित सात क्षुद्रग्रहों के अध्ययन के लिए एक अंतरिक्ष यान का निर्माण करने की योजना बना रही है। 2028 में प्रक्षेपित किया जाने वाला यान यूएई का दूसरा खगोलीय मिशन होगा। इससे पहले होप अंतरिक्ष यान लॉन्च किया गया था जो वर्तमान में मंगल ग्रह की कक्षा में है। इस नए यान को दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के नाम पर एमबीआर एक्सप्लोरर नाम दिया जाएगा।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यान 2034 में जस्टिशिया नामक लाल रंग के क्षुद्रग्रह पर एक छोटे से लैंडर को उतारेगा। इस क्षुद्रग्रह पर कार्बनिक पदार्थों के उपस्थित होने की संभावना है।

एमबीआर एक्सप्लोरर का निर्माण संयुक्त अरब अमीरात द्वारा युनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो बोल्डर के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

डब्ल्यूएचओ द्वारा फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन का आग्रह

त 29 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक प्रस्ताव पारित करके सदस्य देशों से खाद्य पदार्थों में फोलिक एसिड मिलाने का आग्रह किया है। यह प्रस्ताव स्पाइना बाईफिडा जैसी दिक्कतों की रोकथाम के लिए दिया गया है जो गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में एक प्रमुख विटामिन की कमी से होती हैं। फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन के प्रमाणित लाभों को देखते हुए इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से अपनाया गया। वर्तमान में डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में से केवल 69 देशों में फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन अनिवार्य किया गया है जिसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूएसए और कोलंबिया शामिल हैं। इस प्रस्ताव में खाद्य पदार्थों को आयोडीन, जस्ता, कैल्शियम, लौह और विटामिन ए और डी से साथ फोर्टिफाई करने का भी आह्वान किया गया है ताकि एनीमिया, अंधत्व और रिकेट्स जैसी तकलीफों की रोकथाम की जा सके। (स्रोत फीचर्स)

एक्स-रे द्वारा एकल परमाणुओं की जांच की गई

क्स-रे अवशोषण की मदद से पदार्थों का अध्ययन तो वैज्ञानिक करते आए हैं। लेकिन हाल ही में अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी को एकल परमाणुओं पर आज़माया गया है। नेचर में प्रकाशित इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने लोहे और टर्बियम परमाणुओं वाले कार्बनिक अणुओं के ऊपर धातु की नोक रखी। यह नोक कुछ परमाणुओं जितनी चौड़ी थी और कार्बनिक पदार्थ से मात्र चंद नैनोमीटर ऊपर थी। फिर इस सैम्पल को एक्स-रे से नहला दिया गया जिससे धातुओं के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हुए। जब नोक सीधे धातु के परमाणु पर मंडरा रही थी तब उत्तेजित इलेक्ट्रॉन परमाणु से नोक की ओर बढ़े जबकि नीचे लगे सोने के वर्क से परमाणु उनकी जगह लेने को प्रवाहित हुए। एक्स-रे की ऊर्जा के साथ इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में परिवर्तन को ट्रैक करके धातु के परमाणुओं के आयनीकरण की अवस्था को निर्धारित करने के अलावा यह पता लगाया गया कि ये परमाणु अणु के अन्य परमाणुओं से कैसे जुड़े थे। (स्रोत फीचर्स)

कोविड-19 अध्ययन संदेहों के घेरे में

कोविड-19 महामारी के दौरान विवादास्पद फ्रांसीसी सूक्ष्मजीव विज्ञानी डिडिएर राउल्ट ने कोविड  रोगियों पर मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एंटीबायोटिक एज़िथ्रोमाइसिन के प्रभावों का अध्ययन किया था। 28 मई को ले मॉन्ड में प्रकाशित एक खुले पत्र में 16 फ्रांसीसी चिकित्सा समूहों और अनुसंधान संगठनों ने इस अध्ययन की आलोचना करते हुए कहा है कि यह अब तक का सबसे बड़ा ज्ञात अनाधिकृत क्लीनिकल परीक्षण था। उन्होंने कार्रवाई की गुहार लगाई है। खुले पत्र के अनुसार उक्त दवाओं के अप्रभावी साबित होने के लंबे समय बाद भी 30,000 रोगियों को ये दी जाती रहीं और क्लीनिकल परीक्षण सम्बंधी नियमों का पालन नहीं किया गया। फ्रांसीसी अधिकारियों के अनुसार इस क्लीनिकल परीक्षण को युनिवर्सिटी हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट मेडिटेरेनी इंफेक्शन (जहां राउल्ट निदेशक रहे हैं) द्वारा की जा रही तहकीकात में शामिल किया जाएगा। राउल्ट का कहना है कि अध्ययन में न तो नियमों का उल्लंघन हुआ और न ही यह कोई क्लीनिकल परीक्षण था। यह तो रोगियों के पूर्व डैटा का विश्लेषण था। (स्रोत फीचर्स)

बढ़ता समुद्री खनन और जैव विविधता

पूर्वी प्रशांत महासागर में एक गहरा समुद्र क्षेत्र है जिसे क्लेरियन-क्लिपर्टन ज़ोन कहा जाता है। यह आकार में अर्जेंटीना से दुगना बड़ा है। वर्तमान में इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर वाणिज्यिक खनन जारी है जो इस क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों के लिए खतरा है।

इस क्षेत्र में पेंदे पर रहने वाली (बेन्थिक) 5000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से मात्र 436 को पूरी तरह से वर्णित किया गया है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में शोध यात्राओं के दौरान एकत्र किए गए लगभग 1,00,000 नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने ये आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। बेनाम प्रजातियों में बड़ी संख्या क्रस्टेशियन्स (झींगे, केंकड़े आदि) और समुद्री कृमियों की है।

यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले बहु-धातुई पिंडों से भरा पड़ा है जिनमें निकल, कोबाल्ट और ऐसे तत्व मौजूद हैं जिनकी विद्युत वाहनों के लिए उच्च मांग है। इन्हीं के खनन के चलते पारिस्थितिक संकट पैदा हो रहा है। इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी ने इस क्षेत्र में 17 खनन अनुबंधों को मंज़ूरी दी है और उम्मीद की जा रही है कि अथॉरिटी जल्द ही गहरे समुद्र में खनन के लिए नियम जारी कर देगी। (स्रोत फीचर्स)

जीन-संपादित फसलें निगरानी के दायरे में

मेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी की हालिया घोषणा के अनुसार अब कंपनियों को बाज़ार में उतारने से पहले उन फसलों का भी डैटा जमा करना आवश्यक होगा जिन्हें कीटों से सुरक्षा हेतु जेनेटिक रूप से संपादित किया गया है। पूर्व में यह शर्त केवल ट्रांसजेनिक फसलों पर लागू होती थी। ट्रांसजेनिक फसल का मतलब उन फसलों से है जिनमें अन्य जीवों के जीन जोड़े जाते हैं। अलबत्ता, जेनेटिक रूप से संपादित उन फसलों को इस नियम से छूट रहेगी जिनमें किए गए जेनेटिक परिवर्तन पारंपरिक प्रजनन के माध्यम से भी किए जा सकते हों। लेकिन अमेरिकन सीड ट्रेड एसोसिएशन का मानना है कि इस छूट के बावजूद कागज़ी कार्रवाई तो बढ़ेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मैनीक्योर से एलर्जी

न दिनों बाज़ार में कई सौंदर्य उत्पाद और मेकअप तकनीकें आ गई हैं। इसमें हाथों और नाखूनों को सुंदर बनाने के लिए जेल मैनीक्योर काफी प्रचलन में है। आम तौर पर जेल मैनीक्योर से कोई बड़ी स्वास्थ्य समस्या नहीं होती है, लेकिन कुछ लोगों को जीवनभर के लिए विभिन्न चिकित्सीय उपकरणों से या दांतों के मसाले वगैरह से एलर्जी हो सकती है। जेल मैनीक्योर या पेडीक्योर से होने वाली एलर्जी हाथों, उंगलियों या कलाई पर अधिक होती है। त्वचा लाल पड़ सकती है, लोंदे बन सकते हैं, पपड़ियां बन सकती हैं और खुजली हो सकती है। चेहरा, गर्दन और पलकें भी प्रभावित होती हैं जिन्हें हम अक्सर छूते हैं। एलर्जी पैर की उंगलियों या पैरों पर भी हो सकती है। एलर्जी के चलते नाखून टूटकर गिर भी सकते हैं। गंभीर मामलों में उच्च मात्रा में इसके उपयोग से व्यक्तियों को सांस लेने में समस्या हो सकती है। ऐसे में मैनीक्योर का काम करने वाले लोगों को श्वसन सम्बंधी प्रभावों का अधिक जोखिम रहता है।

मैनीक्योर में उपयोग की जाने वाली जेल को सुखाने व कठोर बनाने के लिए पराबैंगनी या एलईडी प्रकाश से संपर्क ज़रूरी होता है। नेल पॉलिश के मुकाबले यह जल्दी सूखती है और लंबे समय तक टिकती है। हालिया अध्ययन बताता है कि नेल ड्रायर्स का पराबैंगनी प्रकाश जेनेटिक उत्परिवर्तन का कारण बन सकता है और कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है।

दरअसल, इस प्रक्रिया में नाखूनों पर एक्रिलेट पाउडर का लेप लगाया जाता है और फिर नाखूनों को प्रकाश स्रोत के नीचे रखते हैं। ये एक्रिलेट्स एलर्जी शुरू कर सकते हैं। अमेरिकी खाद्य व औषधि प्रशासन ने कई एक्रिलेट्स पर प्रतिबंध लगाया है लेकिन कई अभी भी नाखून सम्बंधित सौंदर्य उत्पादों में उपयोग होते हैं।

यह तो पता नहीं है कि ऐसी एलर्जी कितने लोगों को होती है लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि अधिक बार मैनीक्योर करवाने से एलर्जी की संभावना बढ़ती है। इसके उपचार के रूप में विशेषज्ञ नाखूनों को हटाने के अलावा स्थानीय स्टेरॉयड से इलाज करने की सलाह देते हैं।

कई मामलों में तो यह एक जीवनभर की समस्या भी बन सकती है। यह मुख्य रूप से बड़ी समस्या इसलिए भी है कि इसमें उपयोग किया जाने वाला रसायन दंत चिकित्सा, प्रोस्थेटिक्स और मधुमेह सम्बंधी उपकरणों में भी उपयोग होता है। कुछ सावधानी बरतकर इस समस्या को कम किया जा सकता है। इसके लिए विशेषज्ञ घर पर जेल नेल किट के इस्तेमाल की मनाही करते हैं और प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा ही इस प्रक्रिया को कराने का सुझाव देते हैं। और तकनीशियनों को नाइट्राइल दस्ताने पहनने की सलाह दी जाती है। (स्रोत फीचर्स)  

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दक्षिण भारत की फिल्टर कॉफी – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

वेबसाइट स्टेटिस्टा (Statista) बताती है कि ब्राज़ील, वियतनाम, कोलंबिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और होंडुरास के बाद भारत दुनिया का छठवां सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक देश है। 2022-23 में भारत में करीब 4 लाख टन कॉफी का उत्पादन हुआ है।

डॉ. के. टी. अचया अपनी पुस्तक इंडियन फूड: ए हिस्टोरिकल कम्पेनियन में लिखते हैं कि 14वीं-15वीं शताब्दी में कॉफी मध्य पूर्व से ‘कोहा’ नाम से भारत आई, और बाद में कॉफी कहलाने लगी। कुछ ब्लॉगर्स लिखते हैं कि औपनिवेशिक अंग्रेजों ने मैसूर से युरोप तक भारतीय कॉफी का व्यावसायीकरण किया था।

स्रोत के फरवरी 2020 के अंक में प्रकाशित अपने एक लेख में मैंने लिखा था कि कॉफी एक स्वास्थ्यवर्धक पेय है। मेटा-विश्लेषण से पता चलता है कि कॉफी में कई विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इस तरह, यह एक ऐसा स्वास्थ्यकारी पेय है जो हमारे आमाशय की कोशिकाओं को ऑक्सीकारक क्षति से बचाता है, और टाइप-2 डायबिटीज़ और बढ़ती उम्र से जुड़ी कई बीमारियों के जोखिम को कम करता है। लेकिन इसकी अति से बचना चाहिए; एक दिन में पांच कप से ज़्यादा नहीं।

दक्षिण भारतीय कॉफी वास्तव में भुने हुए कॉफी के बीज और भुनी हुई चिकरी की जड़ों के पावडरों का मिश्रण होती है। चिकरी की यह मिलावट ही दक्षिण भारतीय कॉफी को खास बनाती है।

लेकिन चिकरी है क्या? यह मूलत: युरोप और एशिया में पाई जाने वाली एक वनस्पति है। इसकी जड़ में इनुलिन नामक एक स्टार्ची पदार्थ होता है। यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। यह गेहूं, प्याज़, केले, लीक (हरी प्याज़ सरीखी सब्ज़ी), आर्टिचोक (हाथी चक) और सतावरी सहित विभिन्न फलों, सब्ज़ियों और जड़ी-बूटियों में पाया जाता है।

चिकरी की जड़ हल्का-सा विरेचक (दस्तावर) असर देती है और सूजन कम करती है। यह बीटा कैरोटीन का भी एक समृद्ध स्रोत है। यह कॉफी के मुकाबले कोशिकाओं को ऑक्सीकारक क्षति से बेहतर बचाता है। इसके अलावा, चिकरी में कैफीन भी नहीं होता, जिसके कारण बेचैनी और अनिद्रा की शिकायत होती है। दूसरी ओर, कॉफी में कैफीन होता है। यही कारण है कि दक्षिण भारतीय तरीके से (कॉफी और चिकरी पाउडर मिलाकर) कॉफी बनाना एक अच्छी परम्परा लगती है: इस मिश्रण में 70 प्रतिशत कॉफी और 30 प्रतिशत चिकरी पावडर मिलाते हैं। स्वादानुसार ये प्रतिशत अलग भी हो सकते हैं।

भारत में कॉफी बागान कहां-कहां हैं? इसके अधिकतर बागान कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के पहाड़ी क्षेत्रों में हैं। फिर आंध्र प्रदेश (अरकू घाटी) और ओडिशा, मणिपुर, मिज़ोरम के पहाड़ी क्षेत्रों में और पूर्वोत्तर भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ पहाड़ों में कॉफी के बागान हैं। चिकरी मुख्यत: उत्तर प्रदेश और गुजरात में उगाई जाती है। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों राज्यों में ज़्यादातर लोग चाय पीते हैं, कॉफी नहीं। अच्छी बात यह है कि तुलनात्मक रूप से प्रति कप चाय में भी कम कैफीन होता है।

दुनिया के कई हिस्सों में लोग बिना दूध वाली ब्लैक कॉफी पीते हैं। इतालवी लोग कॉफी को कई तरह से बनाते हैं। मसलन एस्प्रेसो कॉफी में, उच्च दाब पर कॉफी पावडर से गर्मा-गरम पानी गुज़ारा जाता है। दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी आम तौर पर गर्म दूध डाल कर पी जाती है। कॉफी में दूध मिलाने से उसका स्वाद और महक बढ़ जाते हैं।

दरअसल, जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर एंड फूड केमिस्ट्री के जनवरी 2023 के अंक में युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन, डेनमार्क के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक पेपर बताता है कि दूध वाली कॉफी पीना शोथ-रोधी असर दे सकता है। दूध में प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट की उपस्थिति रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने वाली कोशिकाओं को सक्रिय करने में मदद करती है।

दूध वाली कॉफी के स्वास्थ्य पर प्रभावों का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने मनुष्यों पर परीक्षण शुरू कर दिए है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कॉफी के शौकीन भारतीय लोग इस ट्रायल में ज़रूर शामिल होना चाहेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खानपान पर ध्यान, सूक्ष्मजीवों को भुलाया

I

र्ष 1826 में एक फ्रांसीसी वकील ऐंथेल्मे ब्रिलैट-सैवरीन का यह कथन खानपान के बारे में हमारी समझ को बखूबी व्यक्त करता है, “मुझे बताइए कि आप क्या खाते हैं, मैं आपको बता दूंगा कि आप क्या हैं।” कुछ ऐसी ही बात जर्मन दार्शनिक लुडविग एंड्रियास फॉयरबैक ने 1863 में कही थी, “आप वही हैं जो आप खाते हैं।” आगे चलकर 1942 में एक अमेरिकी स्वस्थ-खाद्य लेखक विक्टर लिंडलार ने तो स्वस्थ और संतुलित आहार पर एक किताब ही लिख डाली: यू आर व्हाट यू ईट: हाउ टू विन एंड कीप हेल्थ विद डाएट

विभिन्न संस्कृतियों में खान-पान की पसंद-नापसंद और उसकी गुणवत्ता के बारे में समझ अलग-अलग रही है। खाद्य के वैश्वीकरण ने प्राचीन काल से अब तक भोजन के विकल्पों को काफी सीमित कर दिया है। जनसंख्या बढ़ने के साथ भोजन की मांग में वृद्धि हुई है। 1998 में एस. बेंगमार्क और उनके दल द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति औसत जीवनकाल में करीबन 60 टन भोजन खा डालता है। आधुनिक खाद्य विकल्पों की मांग की आपूर्ति के लिए सघन उत्पादन ने मनुष्यों को कई जोखिमों में डाल दिया है, जिनमें खाद्य गुणवत्ता से लेकर बिगड़ते अर्थशास्त्र, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन तथा जलवायु परिवर्तन की घटनाएं शामिल हैं।

खाद्य गुणवत्ता सम्बंधी नज़रिए खाद्य अर्थशास्त्र और स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण कसौटियां हैं। गुणवत्ता मूल्यांकन तो एक व्यक्तिपरक मामला है। आम तौर पर उपभोक्ता किसी खाद्य सामग्री को खरीदते समय उसकी ताज़गी, स्वाद, रंग-रूप और कीमत जैसे प्रत्यक्ष सूचकों को देखते हैं। दूसरी ओर, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के लिए रासायनिक अवयव, पोषण सम्बंधी तथ्य, कुल सामग्री, ऐडिटिव्स और बेस्ट बिफोर डेट जैसे विशिष्ट संकेतक महत्वपूर्ण होते हैं।

सूक्ष्मजीवी गुणवत्ता एवं सुरक्षा के बारे में उपभोक्ताओं की जागरूकता और नियामक दिशानिर्देश फिलहाल सिर्फ भोजन को खराब करने वाले सूक्ष्मजीवों और खाद्य वाहित रोगजनकों तक ही सीमित हैं। आजकल खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता सर्वेक्षणों में सूक्ष्मजीवी संकेतकों का उपयोग किया जाने लगा है।

लेकिन जिस चीज़ को अनदेखा किया गया है, वह है भोजन से जुड़ा लाभकारी सूक्ष्मजीव संसार जो मानव पोषण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। किसी भी स्वस्थ प्राणि या पौधे में लाभकारी और संभावित रूप से हानिकारक सूक्ष्मजीव सह-अस्तित्व में रहते हैं। सहजीवी (पारस्परिक रूप से लाभकारी), सहभोजी और रोगजनक सूक्ष्मजीवों के बीच संतुलन बाधित होने पर सूक्ष्मजीव असंतुलन की समस्या पैदा होती है। यहां भोजन का माइक्रोबायोम (सूक्ष्मजीवों का समग्र जीनोम) गुणवत्ता निर्धारित करता है जबकि उपभोक्ता का माइक्रोबायोम स्वास्थ्य का निर्धारण करता है, जिसमें भोजन का पाचन भी शामिल है।             

मनुष्यों की आंत में खरबों सूक्ष्मजीव होते हैं। बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरियोट जैसे सूक्ष्मजीवों के इस समुदाय में 98 लाख जीन होते हैं जो चयापचयी पदार्थ पैदा करते हैं। ये पदार्थ मेज़बान के चयापचय, प्रतिरक्षा, स्वास्थ्य और फीनोटाइप (यानी प्रकट रूप) को प्रभावित करते हैं। सूक्ष्मजीवी विविधता एक ‘स्वस्थ आंत’ की सूचक है।

मनुष्य की आंत का माइक्रोबायोम व्यक्ति के आनुवंशिकी और पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर होता है जिसमें आहार और दवाएं भी शामिल हैं। आंत के सूक्ष्मजीव शरीर को कई पोषक तत्व, अमीनो एसिड और बी विटामिन प्रदान करते हैं। आहार से प्राप्त बी विटामिन्स का अवशोषण छोटी आंत में होता है जबकि आंत के सूक्ष्मजीव से उत्पन्न बी विटामिन्स का उत्पादन और अवशोषण बड़ी आंत में होता है। ये बी विटामिन शरीर के प्रतिरक्षा संतुलन को बनाए रखते हैं। आंत के सूक्ष्मजीव डोपामाइन, सेरेटोनिन, गामा-एमीनोब्यूटरिक अम्ल और नॉरएपिनेफ्रीन जैसे न्यूरोट्रांसमीटरों का उत्पादन या उपयोग भी करते हैं और उनके न्यूरोट्रांसमीटर में उतार-चढ़ाव आंत-मस्तिष्क कड़ी के लिए एक आवश्यक संचार मार्ग प्रदान करता है।

स्वस्थ लोगों के मल के सूक्ष्मजीव जगत को चपापचयी दिक्कतों वाले रोगियों में प्रत्यारोपित करने (स्वस्थ व्यक्ति के मल के तनु घोल को रोगी व्यक्ति की आंत में पहुंचाने) के प्रयासों ने आंत के सूक्ष्मजीव जीनोम की भूमिका के बारे में हमारी समझ बढ़ाई है।

आंत में माइक्रोबायोम की स्थापना जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है और गर्भनाल के ज़रिए बैक्टीरिया का संचरण या गर्भाशय में मां की आंतों के बैक्टीरिया का भ्रूण में स्थानांतरण संभव है। शिशु विकास के शुरुआती चरण में आंत के सूक्ष्मजीव जगत की विविधता कम होती है और इसमें बाइफिडोबैक्टीरियम प्रजातियों और बैक्टीरॉइड्स प्रजातियों की संख्या अधिक होती है। यह माइक्रोबायोटा के स्थानांतरण और मां के दूध के माध्यम से प्राप्त होता है (लगभग 8 लाख बैक्टीरिया प्रतिदिन)। अधिक मात्रा में आंत के रोगजनकों की उपस्थिति की वजह से सूक्ष्मजीव असंतुलन कुपोषित बच्चों में आम तौर पर देखा जाता है। पहले साल में, मां के दूध से ठोस आहार पर जाने से सूक्ष्मजीव विविधता में वृद्धि होती है। तीन वर्ष की आयु तक सूक्ष्मजीव संघटन की संरचना, विविधता और कार्यात्मक क्षमताएं एक वयस्क की तरह होने लगती हैं। वयस्क अवस्था में आंत की सूक्ष्मजीव संरचना अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। दूसरी ओर, बुज़ुर्गों में शॉर्ट-चेन फैटी एसिड उत्पादन और एमायलोलायसिस की क्षमता कम हो जाती है। इस तरह लंबे समय तक सूक्ष्मजीवों का सक्रिय या निष्क्रिय स्थानांतरण व्यक्ति की आंत के सूक्ष्मजीव संघटन में योगदान देता है।

लंबे समय का आहार पैटर्न आंत के माइक्रोबायोम के लचीलेपन का निर्धारण करता है जो अपने तईं जीवन की गुणवत्ता या आहार-सम्बंधी बीमारियों का नियंत्रण करता है। आंत के माइक्रोबायोम में गुणात्मक परिवर्तन या तो स्वयं माइक्रोबायोम की अपरिपक्वता (यानी एक ही उम्र के स्वस्थ व अस्वस्थ व्यक्ति के माइक्रोबायोम में अंतर) या माक्रोबायोम असंतुलन (सूक्ष्मजीवों की स्थायी हानि) के कारण होते हैं।

बांग्लादेश में जीनेट एल. गेहरिग और उनके दल द्वारा किए गए एक परीक्षण में पाया गया कि माइक्रोबायोम-लक्षित पूरक आहार गंभीर कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की माइक्रोबायोम अपरिपक्वता को ठीक करता है। इस पूरक आहार में विभिन्न मात्रा में चना, सोयाबीन, मूंगफली और केले वगैरह शामिल थे। यह अध्ययन 2019 में साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

किण्वित खाद्य पदार्थ महत्वपूर्ण विकल्प रहे हैं, खासकर शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली से कृषि आधारित जीवन शैली की ओर बदलाव के दौरान। लेकिन आज किण्वित पेय अधिक लोकप्रिय हो गए हैं। किण्वित खाद्य बनाने की पारिवारिक परंपराएं लगभग खत्म हो चुकी हैं। आज की बाज़ारू खाद्य सामग्री और फास्ट फूड ने लगभग 5000 किण्वित खाद्य सामग्री को गायब कर दिया है। ताज़ा खाद्य सामग्री को प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों से किण्वित करके कच्ची सामग्री से पौष्टिक या नशीले उत्पाद बनाए जाते थे। ब्रेड और बीयर का खमीर (सैकरोमायसीज़ सेरेवीसिए) से घनिष्ठ सम्बंध तो जाना-माना है। इस खमीर ने 14,000 से अधिक वर्षों में मनुष्यों के साथ हज़ारों जीन साझा किए हैं। चावल और उड़द के घोल से लोकप्रिय इडली बनाई जाती है। इसमें किण्वन प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों द्वारा होता है। दही, केफिर, टेम्पे, मीसो और कोम्बुचाज़ जैसे कई किण्वित खाद्य पदार्थों में जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं जबकि कई अन्य में नहीं होते। लिहाज़ा, किण्वन की जैव रासायनिक परिभाषा केवल कुछ खाद्य किण्वनों पर ही लागू की जा सकती है। हाल ही में इंटरनेशनल साइंटिफिक एसोसिएशन फॉर प्रोबायोटिक्स एंड प्रीबायोटिक्स ने किण्वित खाद्य और पेय पदार्थों को निम्नानुसार परिभाषित किया है: ‘वांछित सूक्ष्मजीव वृद्धि और खाद्य घटकों के एंज़ाइम आधारित रूपांतरण’ द्वारा निर्मित खाद्य पदार्थ। इसमें ‘वांछित सूक्ष्मजीव वृद्धि’ पर काफी ज़ोर दिया गया है, इसलिए किण्वित खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा काफी हद तक खाद्य पदार्थों और कच्ची सामग्री के माइक्रोबायोम पर निर्भर करती है। खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता में सुधार के अलावा, किण्वित खाद्य पदार्थ शर्करा के स्तर, भूख, तंत्रिका सम्बंधी विकारों और चिंता को भी नियंत्रित कर सकते हैं।

खानपान के प्रति जागरूकता भोजन और कच्चे माल के उत्पादन तथा प्रसंस्करण से शुरू होनी चाहिए न कि थाली में भोजन परोसे जाने के बाद। मिट्टी, पानी, ऊर्जा और पादप विविधता जैसे प्राकृतिक संसाधनों के वर्तमान उपयोग का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सघन औद्योगिक कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता के चलते रासायनिक रूप से संदूषित, कम पौष्टिक और जैव-सक्रिय यौगिकों तथा संशोधित माइक्रोबायोम वाली खाद्य सामग्री और कच्चे माल का उत्पादन होता है। मसलन एक कुदरती सेब में 10 करोड़ बैक्टीरिया होते हैं। रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित फलों की तुलना में जैविक खेती से प्राप्त फलों में समृद्ध माइक्रोबायोम विविधता होती है। इसलिए आजकल का सेब डॉक्टर को दूर नहीं बल्कि व्यस्त रख सकता है।

आजकल की कृषि पद्धतियों और भोजन विकल्पों के चलते ‘आहार और दवा’ का मिला-जुला सेवन आम बात हो चली है। मल प्रत्यारोपण अब संभव दिख रहा है। पिछले वर्ष अमेरिका के खाद्य व औषधि प्रशासन ने क्लॉस्ट्रीडियम डिफिसाइल जनित जीर्ण दस्त के इलाज के लिए मल प्रत्यारोपण को मंज़ूरी दी है। वनस्पति, जीव-जगत, मनुष्य और पर्यावरणीय सूक्ष्मजीवों के परस्पर प्रभावों को देखते हुए भोजन के विकल्पों के साथ-साथ खाद्य उत्पादन शृंखला पर पुनर्विचार आवश्यक है।

कृषि क्षेत्र में नवीन प्रबंधन पद्धतियों का उद्देश्य पोषक तत्व और ऊर्जा के साथ एक स्वस्थ माइक्रोबायोम होना चाहिए। मिट्टी से लेकर उपभोक्ताओं के दस्तरखान तक माइक्रोबायोम मानक और निगरानी तकनीकों की मदद से खाद्य सुरक्षा में सुधार किया जा सकता है।

राष्ट्रीय खाद्य आधारित आहार दिशानिर्देश (एफबीडीजी) मानव पोषण और उर्जा आवश्यकताओं पर समग्र दृष्टिकोण प्रदान करते हैं तथा स्वस्थ आहार चुनने और अपनाने के लिए संस्कृति-विशिष्ट सलाह देते हैं (https://www.fao.org/nutrition/education/food-based-dietary-guidelines)। इन एफबीडीजी का मुख्य लक्ष्य विभिन्न प्रकार के कुपोषण (यानी अल्पपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग एवं कतिपय कैंसर जैसी आहार सम्बंधी बीमारियों) का मुकाबला करना है।

इस तरह, मानव पोषण के लिए माइक्रोबायोम के योगदान और खेत से प्लेट तक भोजन एवं कच्चे माल से सम्बंधित माइक्रोबायोम के लिए नियामक दिशानिर्देशों पर विचार करते हुए नए दिशानिर्देश स्थापित करना फायदेमंद हो सकता है। माइक्रोबायोम अनुसंधान, मानकों और नवाचारों के साथ किण्वित खाद्य पदार्थों को पुनर्जीवित करने से स्वास्थ्य में सुधार, भोजन की बर्बादी में कमी और भोजन उत्पादन एवं प्रबंधन के लिए ऊर्जा के बेहतर उपयोग का रास्ता खुल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हृदय रुक जाने के बाद भी मस्तिष्क में गतिविधियां

मौत के करीब से गुज़रे कई लोग बताते हैं कि उनकी नज़रों के सामने से उनका जीवन गुज़रने लगता है। जीवन के यादगार क्षण दोहराने लगते हैं और यह सब कुछ वे शरीर के बाहर से अनुभव करते हैं जैसे खुद को कहीं बाहर से देख रहे हों। हाल ही में चार मरणासन्न लोगों पर किए गए एक अध्ययन से लगता है कि इसकी व्याख्या की जा सकती है। पता चला है कि मृत्यु के दौरान दिल की धड़कन बंद होने के बाद भी दिमाग में हलचल जारी रहती है।

चिकित्सकीय रूप से मृत्यु उस स्थिति को कहा जाता है जब हृदय हमेशा के लिए धड़कना बंद कर देता है। लेकिन हालिया अध्ययनों से पता चला है कि हृदय गति रुकने के बाद भी कुछ सेकंड से लेकर घंटों तक मस्तिष्क में हलचल जारी रह सकती है। वर्ष 2013 में चूहों पर हुए एक अध्ययन में चूहों के मस्तिष्क में मरने के 30 सेकंड बाद तक चेतना के लक्षण देखे गए थे।

अब एक नए अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की न्यूरोलॉजिस्ट जिमो बोर्जिगिन की टीम ने कोमा या लाइफ सपोर्ट वाले चार ऐसे रोगियों के सिर पर ईईजी टोपियां लगाईं जिनके जीने की संभावनाएं काफी कम थीं।  

ये टोपियां मस्तिष्क की सतह के विद्युत संकेतों की निगरानी के लिए लगाई गई थीं। चिकित्सकों द्वारा वेंटीलेटर हटाए जाने पर दो रोगियों के दिल की धड़कन बंद होने के बाद दिमाग में गामा तरंग नामक उच्च-आवृत्ति वाले तंत्रिका पैटर्न देखे गए। एक स्वस्थ व्यक्ति में ऐसे पैटर्न तब बनते हैं जब वह कुछ सीख रहा हो, या कोई स्मृति या सपना याद कर रहा हो। कई तंत्रिका वैज्ञानिक इसे चेतना से जोड़ते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गामा तरंगें इस बात का संकेत देती हैं कि मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र एक साथ काम कर रहे थे, जैसे – हम किसी वस्तु को समझने के लिए दृष्टि, गंध और ध्वनि को एक साथ महसूस करते हैं। हालांकि यह अभी भी एक रहस्य है कि मस्तिष्क यह सब कैसे करता है लेकिन मरने वाले लोगों में गामा तरंगें देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने अंतिम क्षणों में यादगार घटनाएं याद कर रहे थे।

टीम ने मस्तिष्क के उस क्षेत्र की विद्युत गतिविधियों में वृद्धि देखी, जिसकी चेतना में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है और यह क्षेत्र सपनों, दिमागी दौरे और मतिभ्रम के दौरान सक्रिय होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार मस्तिष्क की गतिविधि में अचानक वृद्धि होना उसके जीवित रहने की कोशिश का हिस्सा है – ऑक्सीजन से वंचित होने पर मस्तिष्क इस मोड में चला जाता है। मस्तिष्क-मृत्यु से गुज़रते जीवों के अध्ययन में पाया गया है कि उनका मस्तिष्क कई संकेतक अणु छोड़ने लगता है और खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने के लिए असामान्य ब्रेनवेव पैटर्न बनाता है। ऐसा करते हुए वह चेतना के बाहरी संकेतों को बंद कर देता है।

बोर्जिगिन मरणासन्न मरीज़ों में मस्तिष्क गतिविधि का अध्ययन करने के लिए अन्य चिकित्सा केंद्रों के साथ सहयोग की उम्मीद करती हैं ताकि निष्कर्षों की पुष्टि हो सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूख का नियंत्रण करते सात हार्मोन

हने को तो यह बड़ी सरल-सी बात है कि हमें जब भूख लगती है तो हम खाना खा लेते हैं, और पेट भरने का एहसास होने पर खाना बंद कर देते हैं। लेकिन वास्तव में यह काफी जटिल मामला है। आपको भूख लगने और पेट भरने का एहसास दिलाने के लिए कई हार्मोन मिल-जुल कर काम करते हैं ताकि न खाने या अत्यधिक खाने के कारण शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित न हो।

यहां भूख नियमन में लिप्त सात प्रमुख हार्मोन पर बात की जा रही है। इनमें कुछ हार्मोन जेनेटिक कारकों से प्रभावित होते हैं जबकि कुछ अन्य हार्मोंन हमारी जीवन शैली, सेहत की हालत और/या शरीर के वज़न में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। कुछ हार्मोन भोजन सेवन का अल्पकालिक नियमन करते हैं ताकि हम अत्यधिक भोजन करने से बच जाएं, वहीं अन्य हार्मोन शरीर में सामान्य ऊर्जा भंडार को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक भूमिका निभाते हैं।

लेप्टिन: लेप्टिन हार्मोन हमारे शरीर के वसा ऊतकों द्वारा बनाया जाता है। वसा कोशिकाएं तृप्ति (पेट भरने) का संकेत देने के लिए पूरे शरीर में लेप्टिन स्रावित करती हैं, जिससे भूख शांत होने का एहसास होता है और भोजन सेवन रोक दिया जाता है। 1994 में लेप्टिन के बारे में पता चलने से पहले हमें यह नहीं पता था कि शरीर के वसा भंडार मस्तिष्क के साथ कैसे संवाद करते हैं।

जो लोग मोटापे का शिकार होते हैं उनमें लेप्टिन का स्तर अधिक होता है क्योंकि या तो उनके शरीर में अधिक वसा कोशिकाएं होती हैं या उनका शरीर हार्मोन के प्रति प्रतिरोधी होता है। दूसरी ओर, यदि आप भोजन में कैलोरी की मात्रा घटाते हैं और शरीर की चर्बी घटाते हैं तो शरीर में लेप्टिन का स्तर कम हो जाता है। लेप्टिन भूखे मरने और शरीर के वसा भंडार को घटने से बचाने की कोशिश करता है। एक मायने में यह वज़न को संतुलित बनाए रखने वाला हार्मोन है।

ग्रेलीन: ग्रेलीन आमाशय में बनता है, और इसे अक्सर ‘भूख का हार्मोन’ कहा जाता है। खाने से ठीक पहले ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, और भोजन करने के बाद कम हो जाता है।

यदि आप वज़न कम करने की कोशिश में कम कैलोरी लेते हैं, तो ग्रेलीन अपने सामान्य स्तर से बढ़ा रहेगा। इससे वज़न कम करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि सामान्य से अधिक समय तक भूख का एहसास बना रहेगा या बार-बार भूख लगेगी। 2017 में ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि ग्रेलीन के सामान्य से अधिक स्तर ने लोगों में खाने की लालसा बढ़ा दी थी – खासकर तले-भुने, मसालेदार या मीठे पदार्थों के लिए, और छह महीने में ही उनका वज़न काफी बढ़ गया था।

कोलेसिस्टोकायनीन (CCK): यह तृप्ति के एहसास से जुड़ा हार्मोन है। यह खाना खाने के बाद आंत में बनता है और पेट भरे होने का एहसास दिलाता है। यह आमाशय से भोजन के गुज़रने की गति को मंद करके पाचन बेहतर करता है जिससे देर तक पेट भरे होने का एहसास होता है। इसके चलते अग्न्याशय से वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का चयापचय करने वाले और अधिक द्रव और एंज़ाइम स्रावित होते हैं।

इंसुलिन: रक्तप्रवाह में शर्करा का स्तर बढ़ जाने पर अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं द्वारा इंसुलिन स्रावित किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अधिक सेवन से अधिक इंसुलिन उत्पन्न होता है जो ज़्यादा ग्लूकोज़ को ऊर्जा के लिए कोशिकाओं में भेजने का काम करता है। यह हार्मोन भी तृप्ति का एहसास कराता है।

कॉर्टिसोल: इसे तनाव हार्मोन के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि शरीर में इसका स्तर तब उच्च होता है जब आप तनाव में होते हैं। वास्तव में, कॉर्टिसोल के कई अलग-अलग कार्य होते हैं – इनमें से एक है चयापचय को नियंत्रित करना। कॉर्टिसोल का उच्च स्तर इंसुलिन के काम में बाधा डालता है और वसा भंडारण बढ़ाता है। देखा गया है कि जीर्ण तनाव की स्थिति में, कॉर्टिसोल के उच्च स्तर से भूख बढ़ जाती है खासकर मीठा, नमकीन-मसालेदार, या वसायुक्त भोजन की भूख तथा रक्त में शर्करा और इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है। न्यूरोइमेज क्लीनिकल पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि कॉर्टिसोल का अधिक स्तर भूख को उकसाता है और मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में रक्त प्रवाह को कम कर देता है जो भोजन सेवन का नियंत्रण करते हैं।

ग्लूकागोन लाइक पेप्टाइड-1 (GLP-1): GLP-1 खाना खाने के बाद आंत में मुक्त होता है। यह मस्तिष्क में रिसेप्टर्स के साथ संवाद करता है और तृप्ति का एहसास पैदा करता है। यह पाचन और आंत से भोजन गुज़रने की गति को धीमा कर देता है, जिसके कारण लंबे समय तक पेट भरे होने का एहसास होता रहता है।

ग्लूकोज़ डिपेंडेंट इंसुलिनोट्रॉपिक पॉलीपेप्टाइड (GIP): यह हार्मोन खाना खाने के बाद छोटी आंत द्वारा बनाया जाता है। यह इंसुलिन के स्तर को बढ़ाता है जो ग्लायकोजन और वसा अम्लों के निर्माण को उकसाते हैं, और वसा को टूटने को रोकते हैं। GIP की भूमिका को पूरी तरह समझना बाकी है।

ये तो हुई भूख नियंत्रण में जुड़े हार्मोन्स की भूमिकाओं की बात। इनमें गड़बड़ी भूख नियंत्रण प्रणाली को गड़बड़ा देती है, नतीजतन शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि कुछ उपचार और जीवनशैली में कुछ बदलाव मदद कर सकते हैं। इनमें से कुछ की चर्चा यहां की जा रही है।

भरपूर नींद: भूख से जुड़े कई हार्मोन के सुचारू कामकाज के लिए पर्याप्त नींद ज़रूरी है। नींद की कमी से शरीर में कॉर्टिसोल और ग्रेलीन का स्तर बढ़ा रहता है, और लेप्टिन कम हो जाता है। ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि रात में नींद की कमी से पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लेप्टिन का स्तर अधिक कम हुआ था। और जो लोग मोटापे से ग्रस्त थे उनमें नींद की कमी के कारण ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ था।

नियमित व्यायाम: देखा गया है कि एरोबिक व्यायाम कुछ समय के लिए भूख को शांत कर देते हैं, ग्रेलीन का स्तर कम कर देते हैं और GLP-1 के स्तर को बढ़ा देते हैं। और सघन व्यायाम स्वस्थ लोगों में ग्रेलीन के स्तर को अधिक प्रभावी तरीके से कम करते हैं। लगता है कि नियमित व्यायाम इन हार्मोन को आपके पक्ष में करेंगे, और इंसुलिन को शरीर में बेहतर तरीके से काम करने में मदद करेंगे।

तनाव भगाना: जीवन एकदम ही तनावमुक्त हो, ऐसा होना तो ज़रा मुश्किल है। लेकिन खुद को तनावमुक्त रखने के उपाय करके आप भूख सम्बंधी हार्मोन्स को संतुलित रख सकते हैं।

अध्ययनों में पाया गया है कि अत्यधिक तनाव भूख घटाता है, लेकिन जीर्ण या लंबे समय के तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ता है। नतीजतन खाने की इच्छा बढ़ती है – खास कर उच्च कैलोरी वाली चीज़ों को खाने की।

तनाव और कॉर्टिसोल के स्तर को कम करने में सांस सम्बंधी या शारीरिक व्यायाम कारगर पाए गए हैं। बिहेवियोरल साइंसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि मानसिक शांति के लिए किए गए 12 मिनट के सत्र, सांस सम्बंधी व्यायाम सहित, से लार के कॉर्टिसोल स्तर में कमी आई।

इसके अलावा खान-पान का ध्यान रखना (जैसे प्रोसेस्ड खाद्य का कम सेवन, भोजन में साबुत अनाज, फल, सब्ज़ियां शामिल करना) फायदेमंद होगा।

बहरहाल कभी-कभी हार्मोन का संतुलन रखने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप की ज़रूरत भी पड़ती है। मोटापे और डायबिटीज़ के इलाज के लिए GLP-1 और GIP हार्मोन पर लक्षित उपचार इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई दवाएं मोटापा घटाने और रक्त शर्करा नियंत्रित करने में कारगर हैं। लेकिन इनका उपयोग चिकित्सकीय सलाह पर आहार, जीवनशैली में परिवर्तन और व्यायाम के साथ किया जाना चाहिए। आखिर आप पूरी तरह दवाओं पर निर्भर तो नहीं रह सकते – वे संपूर्ण समाधान नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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