बंजर भूमि में हरियाली की मुस्कान – भारत डोगरा

किसी भी किसान को खुशी होगी यदि उसकी पथरीली और बंजर (barren land) भूमि पर हरी-भरी फसलें (green crops) लहलहाने लगें। यही खुशी आज राजस्थान (Rajasthan) के करौली ज़िले (Karauli district) के अनेक किसानों में दिख रही है।

मकनपुरस्वामी गांव (मंडरयाल ब्लॉक) के कृषक बल्लभ और विमला ने बताया कि उनके गांव में पत्थर का खनन (stone mining) होता रहा है तथा बहुत सारी ज़मीन पथरीली (rocky land) होने के साथ-साथ खनन के पत्थर भी इधर-उधर बिखरे रहते हैं। गांव में पानी की बहुत कमी थी। अत: उनकी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा बंजर पड़ा था। इस स्थिति में आसपास के अनेक गांवों ने चंदा एकत्र किया (community funding) और श्रमदान करके वर्षा के बहते पानी को एक स्थान पर रोक कर जलसंकट (water crisis) को कुछ हद तक कम किया।

वे आगे बताते हैं कि इससे भी बड़ा बदलाव तब आया जब ‘सृजन’ नामक संस्था (Srijan NGO) ने जल स्रोतों से मिट्टी हटवाकर खेतों में डलवाई। इससे जल स्रोत में गहराई (deepening of water bodies) आई, अधिक जल एकत्र होने लगा व खेतों का उपजाऊपन बढ़ा। खेतों की मेड़बंदी (farm bunding) की तो उनमें भी पानी रुकने लगा। कृषि भूमि का समतलीकरण (land leveling)  किया गया। इस सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि बहुत सी पथरीली बंजर भूमि पर अब खेती होने लगी।

बल्लभ व विमला अपने हरे-भरे सब्ज़ी (organic vegetables) के खेत दिखाते हुए बताते हैं कि बीज, पौधों व प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण का यह असर है। आरंभ में प्राकृतिक खेती(zero budget farming) में कुछ कठिनाई आई पर अब प्राकृतिक खेती से उत्पादित गेहूं की कीमत डेढ़ गुना मिल रही है। विविध सब्ज़ियों का फसल-चक्र वर्ष भर चलता रहता है जिससे आय भी होती है व पोषण भी सुधरता है। पशुओं के गोबर व मूत्र की खाद बनाने के लिए बायो-रिसोर्स सेंटर (bio-resource center) भी उन्होंने स्थापित किया है।

इसी गांव के किसान मानसिंह बताते हैं कि संस्था की मदद से व सरकारी विभागों से प्राप्त सब्सिडी (government subsidy) से उन्हें सोलर पंप सेट लगाने में सहायता मिली है। सोलर पंप बहुत कामयाब हैं व डीज़ल के खर्च में बहुत कमी आई है, जबकि प्राकृतिक खेती (sustainable agriculture)  के प्रसार से अन्य खर्चों में भी बहुत कमी आई है।

इसी ब्लॉक में जगदड़पुरा (Jagdarpura village) की महिला किसान संगठित हुई हैं और वे नियमित मीटिंग कर विकास कार्य को आगे बढ़ाती हैं। यह गांव राजस्थान की सीमा पर है व थोड़ा-सा आगे जाकर मध्य प्रदेश का मुरैना ज़िला या चंबल के बीहड़ (Chambal ravines) आरंभ हो जाते हैं। अत: यहां भूमि बंजर होने का खतरा बीहड़ों के प्रसार से भी है, और मिट्टी के अधिक कटाव से बीहड़ फैलते व बढ़ते हैं। गांव के किसान अपनी मेहनत से ज़मीन को समतल (land reclamation) कर इस कठिन परिस्थिति को संभालते हैं।

जल संरक्षण (water conservation)  से लेकर प्राकृतिक खेती जैसे विभिन्न प्रयासों से इस गांव में लगभग 25 हैक्टर बंजर भूमि पर खेती होने लगी है व इससे लगभग दो गुनी भूमि पर फसल की सघनता व उत्पादकता बढ़ी है। जिस भूमि पर पहले केवल बाजरा होता था, उस पर अब गेहूं(wheat), चना (chickpeas), सरसों (mustard) व सब्ज़ियां (vegetables )सब हो रहे हैं। सृजन संस्था के माध्यम से सरकारी कृषि विज्ञान केंद्र से भी किसानों का मज़बूत का सम्बंध बना है व सिलाई मशीन, सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर आदि का लाभ मिला है।

खारा पानी गांव की बड़ी समस्या है। जब जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission)  में लगे नल से बेहतर गुणवत्ता का पानी आने लगा तो लोग बहुत प्रसन्न हुए पर किसी अन्य गांव में फसल के लिए पानी लेने हेतु पाइपलाइन तोड़ दी गई तो यहां नल में पानी आना रुक गया और लोग फिर खारा पानी पीने को मजबूर हो गए।

ऐसे अनेक गांवों में संस्था, सरकार और समुदाय की भागीदारी से बहुत कम बजट में जल स्रोतों के निर्माण(water bodies restoration), पुराने जल स्रोतों के सुधार, मेड़बंदी, भूमि समतलीकरण आदि कार्यों से बंजर भूमि को हरा-भरा (fertile land) करने की संभावनाएं बनाई गई हैं। पांच वर्षों के इस प्रयास में 1250 एकड़ बंजर भूमि पर खेती संभव हुई व 286 पोखरों का सुधार हुआ जबकि 96 नए पोखर बनाए गए। इस प्रयास से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैश्विक खाद्य व्यापार: लाभ या समस्याओं की थाली?

परस्पर जुड़ी इस दुनिया में अक्सर हमारे भोजन को थाली तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करना पड़ती है। उदाहरण के लिए, एक आम अमेरिकी (American Breakfast) नाश्ते पर गौर करें: आयरलैंड की जौं के दलिया को मीठा करने के लिए ब्राज़ील की चीनी (Brazilian sugar) डाली जाती है और इसके ऊपर डाला जाता है कोस्टा रिका (costa rican banana) का केला। सिर्फ इतना ही नहीं साथ में इथोपिया, कोलंबिया, सुमात्रा और होंडुरास के मिश्रित बीजों से बनी कॉफी (Global coffee trade )होती है। यह मिश्रण दर्शाता है कि भोजन का वैश्विक कारोबर (Global food trade) हमारे जीवन का कितना अहम हिस्सा बन गया है, जिसने न सिर्फ हमारे खानपान बल्कि अर्थव्यवस्थाओं (Economy impact of food trade) को भी बदल दिया है। लेकिन यह व्यापार जितना लाभदायक दिखता है, उतने ही बड़े खतरे और चुनौतियां भी लेकर आता है।

बढ़ता जाल

पिछले कुछ दशकों में, खाद्यान्न दुनिया की सबसे अधिक व्यापार की जाने वाली वस्तुओं (most traded commodities) में से एक बन गया है। भले ही लोगों को ‘स्थानीय भोजन’ (local food) खाने के लिए प्रेरित करने वाले अभियान चलाए जा रहे हों, लेकिन हमारा खानपान धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय होता जा रहा है। दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जो खाद्य पदार्थों का निर्यात कम, आयात (Food import and export) अधिक करते हैं। एक अनुमान है कि 2050 तक, विश्व की आधी आबादी ऐसे खाद्य पदार्थों पर निर्भर होगी जो हज़ारों किलोमीटर दूर उगाए जाते हैं।

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (Middle East and North Africa) जैसे शुष्क जलवायु वाले देश आयात पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं। सऊदी अरब अपना 90 प्रतिशत खाद्य आयात करता है। हैरत की बात यह है कि कृषि समृद्ध देश भी कुछ विशेष खाद्य पदार्थों के बड़े आयातक हैं। ब्रेक्ज़िट (यानी ब्रिटेन द्वारा युरोपीय संघ छोड़ने) से पहले, यूके (UK food dependency) अपने विटामिन सी की लगभग आधी ज़रूरत को पूरा करने के लिए आयातित केले (Imported bananas) पर निर्भर था। स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार किस तरह खाद्य सुरक्षा वाले क्षेत्रों में भी आहार विविधता बनाए रखने में मदद करता है।

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य व्यापार में इस तेज़ी का कारण है 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना। संगठन ने शुल्क और मूल्य नियंत्रण जैसी बाधाओं को हटाकर आयात-निर्यात आसान बना दिया। 2001 में संगठन में चीन (China food import) के प्रवेश ने इस व्यापार को और बढ़ाया, और चीन काफी तेज़ी से खाद्य पदार्थों (खासकर सोयाबीन) का सबसे बड़ा आयातक बन गया। आज, चीन दुनिया की करीब 70 प्रतिशत सोयाबीन आयात करता हैै।

वैश्विक खानपान के लाभ

एक मायने में वैश्विक खाद्य व्यापार (global food trade benefits) काफी लाभदायक रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे उन देशों को खाद्य सुरक्षा (food security in dry regions) मिली, जहां सूखा, बाढ़ या प्रतिकूल जलवायु के कारण घरेलू उत्पादन में समस्या रहती है। भोजन आयात (food import benefits) करने से ये देश अकाल और अभाव जैसी स्थितियों से बच सकते हैं और अपने नागरिकों के लिए स्थिर आपूर्ति बनाए रख सकते हैं।

इसके अलावा, उत्पादक देशों (producing nations) को भी आर्थिक रूप से लाभ होता है। भोजन का निर्यात रोज़गार पैदा करता है, अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करता है, और किसानों और मज़दूरों के लिए आय का एक स्थिर स्रोत बनाता है। उदाहरण के लिए, ब्राज़ील और भारत क्रमशः सोयाबीन (soyabean) और मसालों (spices) के वैश्विक उत्पादक बन गए हैं, जिससे लाखों लोगों को आजीविका मिलती है।

वैश्विक व्यापार (international trade) से आहार में विविधता भी बढ़ती है। अलग-अलग देशों से मिलने वाले फलों (fruits), सब्ज़ियों(vegetables), अनाज और मसालों से भोजन की पौष्टिकता बढ़ती है और भोजन स्वादिष्ट तथा आनंददायक(flavourful) बनता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार यह भी सुनिश्चित करता है कि मौसमी उत्पाद साल भर उपलब्ध रहें।

अदृश्य लागतें

वैश्विक खाद्य व्यापार के लाभ तो स्पष्ट हैं, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर समस्याएं (global food trade challenges) भी जुड़ी हुई हैं। पर्यावरण सम्बंधी चिंताएं (environmental concerns) सबसे प्रमुख हैं। निर्यात की मांग को पूरा करने के लिए, उत्पादक देश अक्सर प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन करते हैं। उदाहरण के लिए, ब्राज़ील ने सोयाबीन उगाने और पशुपालन के लिए अमेज़ॉन वर्षावन (amazon rainforest) के बड़े हिस्सों को साफ कर दिया है, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान हुआ है। इसी तरह, दुनिया के अनानास की आधी आपूर्ति करने वाले कोस्टा रिका ने इसकी खेती के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग किया जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा है।

उत्पादन के अलावा खाद्य पदार्थों को अलग-अलग महाद्वीपों पर पहुंचाना पर्यावरणीय समस्याओं को और बढ़ा देता है। शिपिंग, रेफ्रिजरेशन और पैकेजिंग से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) में काफी वृद्धि होती है। कृषि और उससे जुड़े कार्य मिलकर सभी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा होते हैं, जिससे वैश्विक खाद्य व्यापार जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण बन जाता है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव

पर्यावरणीय लागतों के अलावा, वैश्विक खाद्य व्यापार का प्रभाव जन स्वास्थ्य (public health impact) पर भी पड़ता है। यह सही है कि आयातित फलों(import fruits), सब्ज़ियों और मेवों तक पहुंच पोषण में सुधार करती है और वैश्विक मृत्यु दर को कम करती है। 2023 में नेचर फूड में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार हर साल 14 लाख लोगों की जान बचाता है क्योंकि यह बेहतर और स्वस्थ भोजन विकल्प उपलब्ध कराता है।

दूसरी ओर, प्रोसेस्ड फूड (processed food) और रेड मीट (red meat) के व्यापार का असर इसके विपरीत है। जिन देशों में पहले इन सामग्रियों तक पहुंच नहीं थी, वहां अब मधुमेह, हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। रेड मीट उपभोग का सम्बंध इन बीमारियों से देखा गया है। इसका निर्यात मुख्य रूप से अमेरिका और जर्मनी जैसे देश करते हैं। शोधकर्ताओं ने इसे ‘बीमारियों का निर्यात’ कहा है, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि व्यापार नीतियां मुनाफे से अधिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।

नाज़ुक खाद्य प्रणाली 

वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं (global food chain) पर निर्भरता ने खाद्य प्रणाली को अधिक कुशल बनाया है, लेकिन इसे कमज़ोर भी किया है। मुख्य फसलों जैसे गेहूं, चावल, मक्का और सोयाबीन के निर्यात में केवल 10 देश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जिससे कुछ ही देशों पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ गई है। उदाहरण के लिए, अमेरिका विश्व के कुल खाद्य पदार्थों का लगभग 25 प्रतिशत निर्यात करता है, और इसका अधिकांश हिस्सा कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे कुछ राज्यों से आता है। ऐसे में जब ये क्षेत्र सूखे या प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हैं, तब वैश्विक खाद्य कीमतें तेज़ी से बढ़ जाती हैं।

यूक्रेन युद्ध (Ukraine war) इस कमज़ोर व्यवस्था का ज्वलंत उदाहरण है। यूक्रेन और रूस मिलकर वैश्विक गेहूं निर्यात (global wheat export) का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करते हैं। 2022 में युद्ध के कारण जब इनका उत्पादन बाधित हुआ तो गेहूं की कीमतों (prise rise) में भारी उछाल आया, जिससे उन देशों पर असर पड़ा जो इस आपूर्ति पर निर्भर थे। हालांकि, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया, लेकिन इस संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति शृंखला कितनी संवेदनशील है।

जटिल भविष्य की तैयारी

वैश्विक खाद्य व्यापार (global food trade) की चुनौतियां आने वाले समय में और गंभीर हो सकती हैं। 2080 के दशक के मध्य तक पृथ्वी की जनसंख्या 10 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे खाद्य प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और तापमान पर अनिश्चित प्रभाव से फसल उत्पादन (crop production) घट सकता है और कृषि उद्योग अधिक अस्थिर बन सकता है।

इन जोखिमों से निपटने के लिए देशों को अधिक मज़बूत खाद्य प्रणालियां बनानी होंगी। इसमें घरेलू उत्पादन में वृद्धि, आयात के स्रोतों को अधिक विविध बनाने और अनाज भंडारण तथा बंदरगाह जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा। नीति निर्माताओं को इसके लिए अधिक डैटा की आवश्यकता होगी।

फूड एंड क्लाइमेट सिस्टम्स ट्रांसफॉर्मेशन अलाएंस (food and climate systems transformation alliance) जैसी पहल ऐसे साधन विकसित कर रही हैं जो यह अनुमान लगाने में मदद करेंगे कि जलवायु, भू-राजनीति, और बाज़ार में उतार-चढ़ाव 2050 तक खाद्य सुरक्षा को कैसे प्रभावित करेंगे। इनका उपयोग करके देश अपनी खाद्य नीतियों के बारे में प्रभावी निर्णय ले सकते हैं।

वैश्विक खाद्य व्यापार का भविष्य दक्षता और स्थिरता (efficiency and stbility) के बीच संतुलन खोजने पर निर्भर करेगा। देशों को यह फिर से विचार करना होगा कि वे क्या उत्पादन करें, उत्पादन कैसे करें, और आयात पर कितना निर्भर रहें। इसके लिए अपव्यय को कम करना, टिकाऊ कृषि प्रथाओं को अपनाना और निर्यात के पर्यावरणीय प्रभाव को सीमित करना महत्वपूर्ण होगा। यह तो ज़रूरी नहीं है कि आयातित कॉफी या उष्णकटिबंधीय फलों का उपभोग छोड़ दिया जाए लेकिन पर्यावरण पर अधिक दबाव डालने वाले उत्पादों की खपत को नियंत्रित करने से महत्वपूर्ण अंतर पड़ सकता है।

बहरहाल, वैश्विक खाद्य व्यापार आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक अद्भुत उदाहरण है, लेकिन इसकी कई चुनौतियां भी हैं। इसके पर्यावरणीय प्रभावों, स्वास्थ्य सम्बंधी प्रभावों और व्यवधानों के प्रति दुर्बलता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जो निर्णय हम आज लेंगे, वही यह तय करेंगे कि वैश्विक व्यापार मानवता को पोषण देता रहेगा या हमें समाधान के लिए तरसने पर मजबूर करेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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परंपरागत बीजों की रक्षा का उत्सव

भारत डोगरा

कृषि में जैव-विविधता को बचाने की ज़रूरत विश्व स्तर पर महसूस की जा रही है। एक समय जिन फसलों की सैकड़ों किस्में मौजूद थीं, अब उनमें से कुछ ही नज़र आती हैं। यहां तक कि खेती-किसानी के स्तर पर अनेक फसलें तो लुप्तप्राय ही हैं। इस तरह जिन खाद्य व पोषण स्रोतों को किसानों की कई पीढ़ियों ने सैकड़ों वर्षों में एकत्र किया था, उनका ह्रास हाल के दशकों में बहुत तेज़ी से हुआ है।

विश्व स्तर पर बीज सेक्टर पर चंद बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण बहुत तेज़ी से बढ़ गया है। उनके लिए बीज मोटे मुनाफे का स्रोत हैं तथा वे ऐसे बीज बेचने में रुचि रखते हैं जिनसे उन्हें मोटा मुनाफा हो व साथ में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों वगैरह की अधिक बिक्री हो। इस तरह स्थानीय किसान समुदायों के जो अपने बीज स्थानीय जलवायु व अन्य स्थितियों के अधिक अनुकूल हैं व जिनके आधार पर सस्ती व आत्म-निर्भर खेती संभव है, उनकी उपेक्षा हो रही है। विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में यह क्षति अधिक गंभीर है क्योंकि उनकी परंपरागत खेती बहुत विविधता भरी रही है। इस खेती के अनेक सार्थक व अति उपयोगी पक्ष हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

हाल के वर्षों में आदिवासी क्षेत्रों में प्रयासरत अनेक कार्यकर्ताओं ने यहां के विविधता भरे देशी व परंपरागत बीजों की रक्षा का प्रयास आरंभ किया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश व गुजरात के मिलन क्षेत्र की आदिवासी पट्टी में बीज-स्वराज के नाम से वागधारा संस्था का प्रयास विशेष तौर पर चर्चित रहा है। संस्था ने पदयात्राएं निकाल कर देशी परंपरागत बीजों का संदेश दूर-दूर के गांवों तक पहुंचाया। अनेक किसानों को देशी बीजों की रक्षा के लिए प्रोत्साहित किया व देशी बीजों के सामुदायिक बैंक भी स्थापित किए।

इसी सिलसिले में हाल ही में जून 2024 में वागधारा ने बीज उत्सव का आयोजन किया। बीज-रक्षा सभाओं का उद्देश्य बीज-रक्षा के महत्व को रेखांकित करना और दुर्लभ होती जा रही प्रजातियों के महत्व के प्रति जागरूकता लाना था। इस उत्सव के अंतर्गत लगभग 90 छोटे स्तर की बीज-रक्षा सभाओं का आयोजन विभिन्न गांवों में किया गया। इन सभाओं में आदिवासी महिला किसानों की भागीदारी विशेष तौर पर उत्साहवर्धक रही। विभिन्न जन-सभाओं में मौटे तौर पर 5 से 15 गांवों से 50 से 100 किसान एकत्र हुए। इस तरह इस उत्सव में लगभग 1000 गांवों के किसानों की भागीदारी हुई।

बीज-रक्षा सभाओं में आने वाले कुछ किसान अपने साथ कुछ बीज भी लेकर आए थे। जिनमें दुर्लभ हो रहे बीजों पर अधिक महत्व दिया गया। जब वे बीज-रक्षा सभा से लौटे तो अपने साथ उन बीजों को लेकर गए जिनकी उन्हें ज़रूरत थी। इस तरह बहुत सहज रूप से विभिन्न किसानों में परंपरागत देशी बीजों का आदान-प्रदान हो गया।

बीज उत्सव का आयोजन ऐसे वक्त हुआ जब खरीफ की फसल की दृष्टि से यह आदान-प्रदान विशेष उपयोगी था। (स्रोत फीचर्स)

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आम फलों का राजा क्यों है? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

देश में आम का मौसम जारी है, और इसी के साथ यह बहस भी कि आम की कौन सी किस्म सबसे बढ़िया है। हम तेलंगाना के लोगों का कहना है कि ‘बंगनपल्ली’ और ‘बेनिशां’ आम का कोई सानी नहीं है; आम की कोई भी अन्य किस्म इनके आसपास भी नहीं ठहरती। मेरी पत्नी और उनका परिवार गुजरात से है; उनका कहना है कि सबसे अच्छे आम रत्नागिरी या हापुस (Alphonso) हैं। और उत्तर प्रदेश के रहवासी मेरे दोस्त दसहरी आम के गुण गाते नहीं थकते।
आम के बगीचे लगाने, पैदावार और आम के शौकीन लोगों के हिसाब से भारत पहले नंबर पर है और फिर चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस, पाकिस्तान और मेक्सिको का नंबर आता है। हालांकि, दुनिया भर में पैदा होने वाले कुल आमों में से 54.2 प्रतिशत के योगदान साथ भारत आम उत्पादन में सबसे अव्वल है। हम न सिर्फ सबसे ज़्यादा आम खाते हैं, बल्कि निर्यात भी करते हैं। पिछले साल हमने 28,000 मीट्रिक टन आम निर्यात किए थे और इससे करीब 4 अरब रुपए कमाए थे।
डॉ. के. टी. अचया अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में बताते हैं कि आम मूलत: भारत का देशज है, जिसे उत्तरपूर्वी पहाड़ों और म्यांमार में उगाया जाता था, और पड़ोसी देशों में निर्यात किया जाता था। आजकल, आम के बगीचे उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लगाए जाते हैं; प्रत्येक राज्य के फलों का अपना विशेष स्वाद होता है।
पिछली गणना के अनुसार, भारत में आम की 1000 से अधिक किस्में हैं। इतनी विविध किस्मों का श्रेय जाता है आम के पौधों की आसान ग्राफ्टिंग को। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तीन केन्द्र आम अनुसंधान में अग्रणी हैं। इसके अलावा, नई दिल्ली स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी आम के पौधे के बुनियादी जीव विज्ञान को समझने के लिए उसके जीनोम का विश्लेषण कर रहा है। इस संस्थान के डॉ. नागेंद्र सिंह और उनके साथियों द्वारा इंडियन जर्नल ऑफ दी हिस्ट्री ऑफ साइंस में प्रकाशित शोध पत्र में इस पहलू पर चर्चा की गई है। हाल ही में, आर. सी. जेना और पी. के. चांद ने भारतीय आम के डीएनए में विविधता का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है, जो बताता है कि हर क्षेत्र के आम की आनुवंशिकी में विविधता होती है, नतीजतन अलग-अलग जगहों के आम का आकार, रंग और स्वाद अलग होता है (साइंटिफिक रिपोर्ट, 2021)।
आम को फलों का राजा क्यों कहा जाता है? पूरे देश में, आम के अलावा कई अन्य मौसमी फल भी मिलते हैं और खाए जाते हैं। इनमें से कुछ मौसमी फल हैं अंगूर, अमरूद, कटहल, पपीता, संतरा। फिर, केले जैसे कुछ फल साल भर मिलते हैं। फिर भी, आम को फलों का राजा कहा जाता है। इसका कारण यह है कि आम न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि यह सबसे स्वास्थ्यप्रद भी है; अन्य फलों के मुकाबले एक आम से अधिक विटामिन A, B, C, E और K, तथा अन्य धात्विक यौगिक (मैग्नीशियम, कॉपर, पोटेशियम), और एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्वास्थ्य लाभ कई अन्य फलों से भी मिलते हैं, लेकिन आम सबमें अव्वल है क्योंकि इसमें अन्य की तुलना में विटामिन, खनिज और फाइबर सबसे अधिक होते हैं। इसलिए इसकी बादशाहत है।
अमेरिका के क्लीवलैंड क्लीनिक की वेबसाइट पर एक दिलचस्प लेख है, जिसका शीर्षक है: मैंगोलिशियस: आम के प्रमुख छह स्वास्थ्य लाभ (Mangolicious: the top six health benefits of mango)। ये लाभ हैं :
यह आपका पेट दुरुस्त करता है; इसका उच्च फाइबर परिमाण कब्ज़ और पेट फूलने से निपटने में मदद करता है;
आम भूख को नियंत्रित करने में मदद करता है, जो आपको अपने स्वास्थ्यकर खाने के लक्ष्यों पर टिके रहने में मदद कर सकता है;
आम में मौजूद विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट बालों और त्वचा को स्वस्थ रखते हैं;
इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं;
आम खाने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है; और
आम में मौजूद एक एंटीऑक्सीडेंट – मैंगिफेरिन – कुछ प्रकार के कैंसर को रोकने में मदद करता है। और तो और, हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने भी यह पता लगाया है कि मैंगिफेरिन अल्सर को कम करता है।
स्वाद, किस्में, उपलब्धता और स्वास्थ्य लाभ – इन सभी के मद्देनज़र चलिए हम सभी अपने-अपने पसंदीदा बादशाह आम का लुत्फ उठाएं! (स्रोत फीचर्स)

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परंपरागत जल संरक्षण की बढ़ती उपयोगिता

स वर्ष फरवरी के महीने से ही कर्नाटक के एक बड़े क्षेत्र से गंभीर जल संकट के समाचार मिलने आरंभ हो गए थे। दूसरी ओर, पिछले वर्ष बरसात के मौसम में हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में बाढ़ से भयंकर तबाही हुई थी। जलवायु बदलाव के इस दौर में विभिन्न स्तरों पर बाढ़ और सूखे दोनों के संकट अधिक गंभीर हो सकते हैं।

देखने में तो बाढ़ और सूखे की बाहरी पहचान उतनी ही अलग है जितनी पर्वत और खाई की – एक ओर वेग से बहते पानी की अपार लहरें तो दूसरी ओर बूंद-बूंद पानी को तरसती सूखी प्यासी धरती। इसके बावजूद प्राय: देखा गया है कि बाढ़ और सूखे दोनों के मूल में एक ही कारण है और वह है उचित जल प्रबंधन का अभाव।

जल संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने के कारण जो स्थिति उत्पन्न होती है उसमें हमें आज बाढ़ झेलनी पड़ती है तो कल सूखे का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि हम जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था कर लें तो न केवल बाढ़ पर नियंत्रण पा सकेंगे अपितु सूखे की स्थिति से भी बहुत हद तक राहत मिल सकेगी।

भारत में वर्षा और जल संरक्षण का विशेष अध्ययन करने वाले मौसम विज्ञानी पी. आर. पिशारोटी ने बताया है कि युरोप और भारत में वर्षा के लक्षणों में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। युरोप में वर्षा पूरे साल धीरे-धीरे होती रहती है। इसके विपरीत, भारत के अधिकतर भागों में वर्ष के 8760 घंटों में से मात्र लगभग 100 घंटे ही वर्षा होती है। इसमें से कुछ समय मूसलाधार वर्षा होती है। इस कारण आधी वर्षा मात्र 20 घंटों में ही हो जाती है। अत: स्पष्ट है कि जल संग्रहण और संरक्षण युरोप के देशों की अपेक्षा भारत जैसे देशों में कहीं अधिक आवश्यक है। इसके अलावा, भारत की वर्षा की तुलना में युरोप में वर्षा की औसत बूंद काफी छोटी होती है। इस कारण उसकी मिट्टी काटने की क्षमता भी कम होती है। युरोप में बहुत सी वर्षा बर्फ के रूप में गिरती है जो धीरे-धीरे धरती में समाती रहती है। भारत में बहुत सी वर्षा मूसलाधार वर्षा के रूप में गिरती है जिसमें मिट्टी को काटने और बहाने की बहुत क्षमता होती है।

दूसरे शब्दों में, हमारे यहां की वर्षा की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि यदि उसके पानी के संग्रहण और संरक्षण की उचित व्यवस्था नहीं की गई तो यह जल बहुत सारी मिट्टी बहाकर निकट की नदी की ओर वेग से दौड़ेगा और नदी में बाढ़ आ जाएगी। चूंकि अधिकतर जल न एकत्र होगा न धरती में रिसेगा, अत: कुछ समय बाद जल संकट उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है। इन दोनों विपदाओं को कम करने के लिए या दूर करने के लिए जीवनदायी जल का अधिकतम संरक्षण और संग्रहण आवश्यक है।

इसके लिए पहली आवश्यकता है वन, वृक्ष व हर तरह की हरियाली जो वर्षा के पहले वेग को अपने ऊपर झेलकर उसे धरती पर धीरे से उतारे ताकि यह वर्षा मिट्टी को काटे नहीं अपितु काफी हद तक स्वयं मिट्टी में ही समा जाए या रिस जाए और पृथ्वी के नीचे जल के भंडार को बढ़ाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करे।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह है कि वर्षा का जो शेष पानी नदी की ओर बह रहा है उसके अधिकतम संभव हिस्से को तालाबों या पोखरों में एकत्र कर लिया जाए। वैसे इस पानी को मोड़कर सीधे खेतों में भी लाया जा सकता है। खेतों में पड़ने वाली वर्षा का अधिकतर जल खेतों में ही रहे, इसकी व्यवस्था भू-संरक्षण के विभिन्न उपायों जैसे खेत-तालाब, मेड़बंदी, पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत आदि से की जा सकती है। तालाबों में जो पानी एकत्र किया गया है वह उसमें अधिक समय तक बना रहे इसके लिए तालाबों के आसपास वृक्षारोपण हो सकता है व वाष्पीकरण कम करने वाला तालाब का विशेष डिज़ाइन बनाया जा सकता है। तालाब से होने वाले सीपेज का भी उपयोग हो सके, इसकी व्यवस्था हो सकती है। एक तालाब का अतिरिक्त पानी स्वयं दूसरे में पहुंच सके और इस तरह तालाबों की एक शृंखला बन जाए, यह भी कुशलतापूर्वक करना संभव है।

वास्तव में जल संरक्षण के ये सब उपाय हमारे देश की ज़रूरतों के अनुसार बहुत समय से किसी न किसी रूप में अपनाए जाते रहे हैं। चाहे राजस्थान व बुंदेलखंड के तालाब हों या बिहार की अहर पईन व्यवस्था, नर्मदा घाटी की हवेली हो या हिमालय की गूलें, महाराष्ट्र की बंधारा विधि हो या तमिलनाडु की एरी व्यवस्था, इन सब माध्यमों से अपने-अपने क्षेत्र की विशेषताओं के अनुसार स्थानीय लोगों ने वर्षा के जल के अधिकतम और बढ़िया उपयोग की तकनीकें विकसित कीं। औपनिवेशिक शासन के दिनों में विभिन्न कारणों से हमारी तमाम परंपरागत व्यवस्थाओं का ढांचा चरमराने लगा। जल प्रबंधन पर भी नए शासकों और उनकी नीतियों की मार पड़ी। किसानों और ग्रामीणों की आत्मनिर्भरता तो अंग्रेज़ सरकार चाहती ही नहीं थी, उपाय क्या करती। फिर भी तरह-तरह के शोषण का बोझ सहते हुए लोग जहां-तहां अपनी व्यवस्था को जितना सहेज सकते थे, उन्होंने इसका प्रयास किया।

दुख की बात यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी जल प्रबंधन के इन आत्म-निर्भर, सस्ते और स्थानीय भौगोलिक विशेषताओं का पूरा ध्यान रखने वाले परंपरागत तौर-तरीकों पर ध्यान नहीं दिया गया। औपनिवेशिक शासकों ने जल प्रबंधन की जो नीतियां अपनाई थीं, उसमें उनके अपने स्वार्थों के साथ-साथ युरोप में वर्षा के पैटर्न पर आधारित सोच हावी थी। इस सोच के आधार पर स्थानीय स्तर के जल संरक्षण को अधिक महत्व नहीं दिया गया। बाद में धीरे-धीरे इस क्षेत्र के साथ बड़ी निर्माण कंपनियों, ठेकेदारों व उनसे लाभ उठाने वाले अधिकारियों व नेताओं के स्वार्थ भी जुड़ गए। निहित स्वार्थ जब नीति पर हावी हो गए तो गांवों के सस्ते और आत्म-निर्भर तौर तरीकों की बात भला कौन सुनता, समझता?

गांव की बढ़ती आबादी के साथ मनुष्य व पशुओं के पीने के लिए, सिंचाई व निस्तार के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ती जा रही थी, अत: परंपरागत तौर-तरीकों को और दुरूस्त करने की, उन्हें बेहतर बनाने की आवश्यकता थी। यह नहीं हुआ और इसके स्थान पर अपेक्षाकृत बड़ी नदियों पर बड़े व मझोले बांध बनाने पर ज़ोर दिया गया। पानी के गिरने की जगह पर ही उसके संरक्षण के सस्ते तौर तरीकों के स्थान पर यह तय किया गया कि उसे बड़ी नदियों तक पहुंचने दो, फिर उन पर बांध बनाकर कृत्रिम जलाशय में एकत्र कर नहरों का जाल बिछाकर इस पानी के कुछ हिस्से को वापिस गांवों में पहुंचाया जाएगा। निश्चय ही यह दूसरा तरीका अधिक मंहगा था और गांववासियों की बाहरी निर्भरता भी बढ़ाता था।

इस तरीके पर अधिक निर्भर होने से हम अपनी वर्षा के इस प्रमुख गुण को भी भूल गए कि विशेषकर वनस्पति आवरण कम होने पर उसमें अत्यधिक मिट्टी बहा ले जाने की क्षमता होगी। यह मिट्टी कृत्रिम जलाशयों की क्षमता और आयु को बहुत कम कर सकती है। मूसलाधार वर्षा के वेग को संभालने की इन कृत्रिम जलाशयों की क्षमता इस कारण और भी सिमट गई है। आज हालत यह है कि वर्षा के दिनों में प्रलयंकारी बाढ़ के अनेक समाचार ऐसे मिलते हैं जिनके साथ यह लिखा रहता है – अमुक बांध से पानी अचानक छोड़े जाने पर यह विनाशकारी बाढ़ आई। इस तरह अरबों रुपए के निर्माण कार्य जो बाढ़ से सुरक्षा के नाम पर किए गए थे, वे ही विनाशकारी बाढ़ का स्रोत बने हुए हैं। दूसरी ओर, नहरों की सूखी धरती और प्यासे गांव तक पानी पहुंचाने की वास्तविक क्षमता उन सुहावने सपनों से बहुत कम है, जो इन परियोजनाओं को तैयार करने के समय दिखाए गए थे। इन बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के अनेकानेक प्रतिकूल पर्यावरणीय और सामाजिक परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आ चुके हैं।

जो लोग विकास कार्यों में केवल विशालता और चमक-दमक से प्रभावित हो जाते हैं उन्हें यह स्वीकार करने में वास्तव में कठिनाई हो सकती है कि सैकड़ों वर्षों से हमारे गांवों में स्थानीय ज्ञान और स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर जो छोटे स्तर की आत्म-निर्भर व्यवस्थाएं जनसाधारण की सेवा करती रही हैं, वे आज भी बाढ़ और सूखे का संकट हल करने में अरबों रुपयों की लागत से बनी, अति आधुनिक इंजीनियरिंग का नमूना बनी नदी-घाटी परियोजनाओं से अधिक सक्षम हैं। वास्तव में इस हकीकत को पहचानने के लिए सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपनी विरासत को पहचानने और पूर्वजों के संचित ज्ञान के विनम्र मूल्यांकन की आवश्यकता है।

यह सच है कि इस परंपरा में अनेक कमियां भी मिलेंगी। हमारे पुराने समाज में भी अनेक विषमताएं थीं और ये विषमताएं कई बार तकनीक में भी खोट पैदा करती थीं। जिस समाज में कुछ गरीब लोगों की अवहेलना होती हो, वहां पर अन्याय भी ज़रूर रहा होगा कि उनको पानी के हकों से भी वंचित किया जाए या उनसे भेदभाव हो। एक ओर हमें इन पारंपरिक विकृतियों से लड़ना है और उन्हें दूर करना है। लेकिन दूसरी ओर यह नहीं भूलना चाहिए कि विशेषकर जल प्रबंधन की हमारी विरासत में गरीब लोगों का बहुत बड़ा हाथ है क्योंकि इस बुनियादी ज़रूरत को पूरा करने में सबसे ज़्यादा पसीना तो इन मेहनतकशों ने ही बहाया था। आज भी जल प्रबंधन का परंपरागत ज्ञान जिन जातियों या समुदायों के पास सबसे अधिक है उनमें से अधिकांश गरीब ही हैं। जैसे केवट, मल्लाह, कहार, ढीमर, मछुआरे आदि। ज़रूरत इस बात की है कि स्थानीय जल प्रबंधन का जो ज्ञान और जानकारी गांव में पहले से मौजूद है उसका भरपूर उपयोग आत्म-निर्भर और सस्ते जल संग्रहण और संरक्षण के लिए किया जाए और इसका लाभ सब गांववासियों को समान रूप से दिया जाए।

महाराष्ट्र में पुणे ज़िले में पानी पंचायतों के सहयोग से ग्राम गौरव प्रतिष्ठान ने दर्शाया है कि कैसे भूमिहीनों को भी पानी का हिस्सा मिलना चाहिए और पानी का उपयोग बराबर होना चाहिए। परंपरागत तरीकों को इस तरह सुधारने के प्रयास निरंतर होने चाहिए, पर परंपराओं की सही समझ बनाने के बाद। यदि सरकार बजट का एक बड़ा हिस्सा जल संग्रहण और संरक्षण के इन उपायों के लिए दे और निष्ठा तथा सावधानी से कार्य हो तो बाढ़ व सूखे का स्थायी समाधान प्राप्त करने में बहुत सहायता मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कीटनाशक: प्रभाव और विकल्प – डॉ. आष्मा अग्रवाल

कीटनाशक प्राकृतिक या रासायनिक रूप से संश्लेषित यौगिक हैं जो संपूर्ण खाद्य और पशु आहार उत्पादन चक्र के दौरान कीटों को रोकने, नष्ट करने, खदेड़ने या नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। कीटनाशक कई तरह के होते हैं। जैसे, पौधों के विकास नियामक, डिफॉलिएटर्स (पत्तीनाशी), डेसिकैंट्स (जलशोषक), फलों की तादाद कम करने वाले रसायन, और परिवहन एवं भंडारण के दौरान फसल को खराब होने से बचाने वाले रसायन जिन्हें कटाई के पहले या बाद में फसलों पर लगाया जाता है। जंतुओं के बाह्य-परजीवियों का प्रबंधन भी कीटनाशकों के माध्यम से किया जाता है। कीटनाशी, शाकनाशी, कवकनाशी, कृमिनाशी और पक्षीनाशी वगैरह कीटनाशकों की विभिन्न श्रेणियां हैं।

कीटनाशकों को उनके सक्रिय घटक, रासायनिक संरचना, क्रिया के तरीके और विषाक्तता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। कीटनाशक कार्बनिक और अकार्बनिक दोनों तरह के हो सकते हैं। जैविक कीटनाशक कार्बन आधारित होते हैं, जैसे प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त कीटनाशक या कार्बनिक रसायनों से संश्लेषित कीटनाशक। अकार्बनिक कीटनाशक खनिज या ऐसे रासायनिक यौगिकों से प्राप्त होते हैं जो प्रकृति में जमा होते हैं। इनमें मुख्य रूप से एंटीमनी, तांबा, बोरॉन, फ्लोरीन, पारा, सेलेनियम, थैलियम, जस्ता के यौगिक तथा तात्विक फास्फोरस और सल्फर होते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कीटनाशकों को उनकी विषाक्तता के आधार पर वर्गीकृत किया है। अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों को वर्ग-1a, अधिक खतरनाक को वर्ग-1b, मध्यम खतरनाक को वर्ग-II और थोड़े खतरनाक को वर्ग-III में वर्गीकृत किया गया है।

किसानों की बढ़ती उत्पादकता और बढ़ती आमदनी के रूप में कीटनाशकों के उपयोग का भारी प्रभाव पड़ा है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या के चलते बढ़ती वैश्विक खाद्य मांग ने इनके उपयोग को बेतहाशा बढ़ा दिया है।

कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से खाद्य उपज में कीटनाशक अवशेष बचे रह जाते हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। कीटनाशकों के अनियमित उपयोग और दुरुपयोग के कारण पर्यावरण में अवशेष जमा हो जाते हैं, जिनमें से कई आसानी से नष्ट नहीं होते और वर्षों तक वहीं बने रहते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अनाज, सब्ज़ियों, फलों, शहद और उनसे व्युत्पन्न उत्पादों, जैसे जूस आदि में कीटनाशकों के अंश पाए गए हैं। लापरवाह और अनुचित निपटान प्रथाएं मछली, अन्य जलीय जीवन, प्राकृतिक परागणकर्ताओं (मधुमक्खियों और तितलियों) सहित गैर-लक्षित जीवों  (पशुधन, पक्षी और लाभकारी सूक्ष्मजीव) पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

खाद्य, कृषि उत्पादों या पशु आहार में कीटनाशक अवशेष विभिन्न रूपों में हो सकते हैं – जैसे उनके चयापचय से बने, परिवर्तन से बने, अभिक्रियाओं से बने पदार्थ। कीटनाशकों के बार-बार उपयोग से लाभकारी जीव मारे जाते हैं, कीटों में प्रतिरोध बढ़ जाता है और जैव विविधता का नुकसान होता है। इन सबके चलते कीटों का वापिस लौटना आसान हो जाता है। हेप्टाक्लोर, एंड्रिन, डायएल्ड्रिन, एल्ड्रिन, क्लोर्डेन, डीडीटी और एचसीबी कुछ टिकाऊ कार्बनिक पर्यावरण प्रदूषक हैं।

भारत कीटनाशकों का एक प्रमुख निर्माता और आपूर्तिकर्ता है। भारत में कीटनाशक उद्योग एक अरब डॉलर का है। जिसमें एसीफेट का उत्पादन सबसे अधिक होता है, इसके बाद अल्फामेथ्रिन और क्लोरपाइरीफॉस का नंबर आता है। एनएसीएल इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, यूपीएल लिमिटेड और भारत रसायन लिमिटेड के अलावा बायर क्रॉप साइंस लिमिटेड, रैलीज़ कुछ प्रमुख कीटनाशक निर्माता हैं। एक ओर भारत से 6,29,606 मीट्रिक टन कीटनाशकों का निर्यात किया जाता है वहीं दूसरी ओर, 1,33,807 मीट्रिक टन कीटनाशकों का आयात किया जाता है।

कीटनाशकों की खपत युरोप में सबसे अधिक है। इसके बाद चीन और यूएसए का नंबर आता है। भारत में भी प्रति हैक्टर कीटनाशकों की खपत बढ़ी है।

2022 की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कीटनाशकों की औसत खपत लगभग 0.381 कि.ग्रा सक्रिय घटक/हैक्टर है। तुलना के लिए, विश्व की औसत खपत 0.5 कि.ग्रा. सक्रिय घटक/हैक्टर है। (विश्व स्तर पर) उपयोग के लिए पंजीकृत 293 कीटनाशकों में से भारत में 104 कीटनाशकों का निर्माण हो रहा है। 2022 तक, हमारे देश में 46 कीटनाशकों और 4 कीटनाशक फॉर्मूलेशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। अभी भी 39 कीटनाशक वर्ग-1b के हैं, जबकि 23 कीटनाशक वर्ग-II और वर्ग-III स्तर के हैं। भारत में खपत होने वाले कुल कीटनाशकों में से अधिकांश अत्यधिक या अधिक खतरनाक (1a या 1b) श्रेणी में आते हैं और केवल 10-15 प्रतिशत गैर-विषैले कीटनाशक के रूप में पंजीकृत हैं।

भारत में कीटनाशकों के उपयोग का नियमन व नियंत्रण 1968 के कीटनाशक अधिनियम और 1971 के कीटनाशक नियमों के अधीन है। ये नियम-अधिनियम मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण की सुरक्षा के उद्देश्य से कीटनाशकों के आयात, पंजीकरण, निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और उपयोग को नियंत्रित करते हैं।

यद्यपि दो कीटनाशकों, बेरियम कार्बोनेट व कूमाक्लोर का उपयोग बंद कर दिया गया है लेकिन तीन बेहद खतरनाक कीटनाशक, ब्रोडिफाकम, ब्रोमैडायओलोन और फ्लोकोमाफेन (1a) अभी भी भारत में उपयोग के लिए पंजीकृत हैं। फरवरी 2020 में प्रकाशित एक मसौदा अधिसूचना (S.O.531(E)) में प्रस्ताव दिया गया था कि मनुष्यों व जानवरों के स्वास्थ्य और पर्यावरण सम्बंधी खतरों को देखते हुए ट्राइसाइक्लाज़ोल और बुप्रोफेज़िन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।

वैकल्पिक उपाय

1. जैव कीटनाशक – ये पौधों, जानवरों, बैक्टीरिया और कुछ खनिजों जैसे प्राकृतिक पदार्थों से बने होते हैं। ये पर्यावरण के अनुकूल हैं। और आम तौर पर रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में अधिक सुरक्षित होते हैं।

2. एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) – कीट प्रबंधन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण जिसमें रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करने के लिए जैविक और यांत्रिक तरीकों सहित विभिन्न कीट नियंत्रण विधियां हैं।

3. मिश्रित फसलें – इसके तहत कीटों को दूर रखने या लाभकारी कीटों को आकर्षित करने के लिए एक साथ विभिन्न फसलें लगाई जाती हैं।

4. जैविक खाद – जैविक खाद का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करने के लिए किया जा सकता है; रासायानिक उर्वरक कीटों को आकर्षित कर सकते हैं।

हालांकि ये उपाय उतने प्रभावी नहीं हैं लेकिन अधिक सुरक्षित व टिकाऊ हैं। जैविक खेती, परिशुद्ध खेती और कृषि-पारिस्थितिकी जैसे कुछ अन्य वैकल्पिक उपाय रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाकर अधिक टिकाऊ विधियां अपनाने में मदद कर सकते हैं (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉफी के स्वाद निराले – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कॉफी शब्द कहां से आया? कॉफी इथियोपिया से आई थी, जहां के लोग इसे कहवा कहते थे। स्वर्गीय डॉ. के. टी. अचया ने वर्ष 1998 में ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से प्रकाशित अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि कॉफी के बीज अरब व्यापारियों द्वारा कुलीन वर्ग के उपयोग के लिए भारत लाए गए थे। अरबी लोगों ने दक्षिण भारत और श्रीलंका में कॉफी के बागान लगाए। और सूफी बाबा बुदान ने कर्नाटक के चिकमगलुर के पास कॉफी के पौधे उगाए।

1830 की शुरुआत में, शुरुआती ब्रिटिश आगंतुकों ने दो प्रकार की कॉफी के कॉफी बागान लगाए – अच्छी ऊंची जगहों पर कॉफी अरेबिका के, और निचले इलाकों में कॉफी रोबस्टा के बागान। (चूंकि युरोप में कहवे का कारोबार अरब व्यापारी करते थे इसलिए अरेबिका नाम पड़ा; और रोबस्टा, क्योंकि पश्चिम अफ्रीका की यह किस्म रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी है)। जैसा कि मैंने कॉफी पर अपने पूर्व लेखों में लिखा था, कॉफी एक स्वास्थ्यवर्धक पेय है, खासकर जब इसे गर्म दूध के साथ मिला कर पीया जाता है। कई अमेरिकी लोग बिना दूध वाली (ब्लैक) कॉफी पीते हैं।

तमिलनाडु के कुंभकोणम शहर के कॉफी के शौकीन बाशिंदे अपनी कॉफी को कुंभकोणम डिग्री कॉफी कहते हैं। उनका दावा है कि उसके स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है। वे आगे कहते हैं कि यह कॉफी विशुद्ध अरेबिका कॉफी है और इसमें चिकरी पाउडर नहीं मिला होता है, जो आम तौर पर डिपार्टमेंटल स्टोर या कॉफी शॉप पर मिलने वाले कॉफी पाउडर या कॉफी के बीजों में होता है। इसी तरह, सिकंदराबाद की जिस कॉफी शॉप से मैं कॉफी खरीदता हूं वहां शुद्ध अरेबिका कॉफी पावडर के साथ-साथ चिकरी मिश्रित अरेबिका कॉफी पीने वालों के लिए चिकरी मिश्रित कॉफी पावडर भी मिलता है।

लेकिन चिकरी है क्या? यह भी कॉफी की एक किस्म है, और भारत चिकरी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। हमारे देश में यह सुदूर पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, सिक्किम) में उगाई जाती है। वहीं कुछ लोगों का ऐसा दावा है कि पोषण के मामले में चिकरी अरेबिका से बेहतर हो सकती है, क्योंकि इसमें कैफीन की मात्रा कम होती है। कैफीन एक अणु है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है, हालांकि इस सम्बंध में अब तक कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिले हैं।

आंध्र प्रदेश अराकू घाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अपनी विशेष कॉफी के लिए प्रसिद्ध है। अराकू कॉफी के बारे में दावा है कि यह न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी उपलब्ध सबसे अच्छी कॉफी है। यह शुद्ध अरेबिका कॉफी है। बहुत अच्छी किस्म की अरेबिका तमिलनाडु की शेवरॉय पहाड़ियों और कर्नाटक के मंजराबाद किले के आसपास के इलाकों में भी उगाई जाती है। भारत भर के बड़े शहरों में कई युवा स्टारबक्स की कॉफी खरीदते हैं और पीते हैं, और कैफे कॉफी डे (सीसीडी) से भी। स्टारबक्स सिर्फ शुद्ध अरेबिका कॉफी का उपयोग करता है, जबकि सीसीडी के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे शुद्ध अरेबिका का उपयोग करते हैं या मिश्रण का।

कॉफी की इन विभिन्न प्रमुख किस्मों को लेकर इतना शोर क्यों है? जवाब इतालवी आनुवंशिकीविद डॉ. मिशेल मॉर्गन्टे द्वारा किए गए हालिया आनुवंशिकी अध्ययन (नेचर कम्युनिकेशंस जनवरी 2024) से मिलता है जो बताता है कि कॉफी की कई कृष्य किस्में बेहतर स्वाद दे सकती हैं। दी हिंदू ने हाल में संक्षेप में अपने विज्ञान पृष्ठ पर यह बात बताई है और बीबीसी न्यूज़ के अनुसार कॉफी अरेबिका में आनुवंशिक परिवर्तन बेहतर महक दे सकते हैं। तो वक्त आ गया है कि भारतीय आनुवंशिकीविद भारतीय कॉफियों के जीन्स अनुक्रमित करके देखें। (स्रोत फीचर्स)

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फ्रिज में गाजर को रसीला कैसे रखा जाए

प बाज़ार से ताज़ातरीन गाजर लाते हैं और फ्रिज में इस उम्मीद से रखते हैं कि वे थोड़ा लंबे समय तक ताज़ा, रसीली और खस्ता बनी रहेंगी। लेकिन आप देखते हैं कि फ्रिज में भी गाजर कुछ ही दिनों में मुरझा-सी जाती हैं और अपनी ताज़गी खो देती हैं। गाजर ही नहीं, कई सब्ज़ियों, खासकर पत्तेदार सब्ज़ियों, के साथ भी ऐसा ही होता है।

यह जानने के लिए कि ऐसा क्यों होता हैं, शोधकर्ताओं ने गाजर को लंबाई में काटकर फ्रिज में रखा। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि शीतलन से गाजर का आंतरिक भाग कैसे प्रभावित होता है। उन्होंने पाया कि फ्रिज का ठंडा वातावरण सब्ज़ियों और भोजन वगैरह को सड़ने से तो बचा देता है, लेकिन फ्रिज में चल रही वायु धाराओं के कारण सब्ज़ियां अपनी नमी खोती जाती हैं और सूख जाती हैं।

शोधकर्ताओं ने रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में बताया है कि फ्रिज में गाजर ने 22 प्रतिशत तक नमी गंवाई थी और प्रति दिन औसतन 0.37 प्रतिशत सिकुड़ती जा रही थीं। गाजरों की नमी खोने से उनकी कोशिकाओं ने अपना आकार खो दिया, जिससे सब्ज़ियां सूख-सिकुड़ गईं। मेकेनिकल और सिविल इंजीनियरिंग में प्रयुक्त एक 3डी-मॉडल प्रोग्राम ने एकदम सही भविष्यवाणी की थी कि समय के साथ गाजरें कैसे मुरझाएंगी।

गाजरों के मुरझाने में एक अन्य कारक भी भूमिका निभाता है। गाजर काटने के बाद, वे उस अक्ष से मुड़ती हैं जिससे उन्हें काटा गया था – एक यांत्रिक गुण जिसे ‘अवशिष्ट तनाव’ कहा जाता है।

मॉडल ने गाजर को कुरकुरा रखने का एक तरीका भी बताया है: उन्हें ठंडे, हल्के नमीदार और एयरटाइट (सीलबंद) डिब्बे में रखें। सीधे फ्रिज की किसी शेल्फ या कंटेनर में न पटक दें। इस तरीके का उपयोग अवशिष्ट तनाव झेलने वाली चीज़ों, जैसे लकड़ी, बांस और अन्य जैविक सामग्री का स्वरूप और आकार बरकरार रखने के लिए किया जा सकता है ताकि सुरक्षित भवन, खिड़की-दरवाज़े, कलाकृतियां बनाने में मदद मिले और वे अपना स्वरूप न खोएं। (स्रोत फीचर्स)

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जंगली खाद्य पदार्थों का सेवन – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जकल जैव विविधता की अवधारणा पर बहुत जोर दिया जाता है। अधिकांश सरकारों के नीतिगत ढांचे में जैव विविधता के संरक्षण के महत्व को स्वीकार किया गया है। लेकिन विडंबना यह है कि विश्व भर के लोगों के भोजन में विविधता बेहद कम हो गई है। हम अपने कुल कैलोरी सेवन का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चावल, गेहूं, मक्का और चीनी से लेते हैं।

हमारे सुपरमार्केट के ताज़ा सब्ज़ियों वाले हिस्सों में भी यह प्रवृत्ति झलकती है, जहां हमेशा वही दो-चार तरह की सब्ज़ियां रखी होती हैं।

‘आहार विविधता’ में यह कमी हमारे आहार की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। कई अलग-अलग खाद्य समूहों से चुनकर भोजन करने से अच्छा पोषण मिलता है। लेकिन मोनोकल्चर खेती करने – भूमि के बड़े हिस्से पर एक ही तरह की फसल या सब्ज़ी उगाने – से न केवल ‘कृषि जैव विविधता’ कम होती है बल्कि दूसरे खाद्य विकल्पों की उपलब्धता के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से खाद्यान्नों को मंगाना उनकी कीमत बढ़ाता है और पर्यावरण पर भारी पड़ता है।

तरहतरह की किस्में

छोटी जोत वाले किसान, चारागाह पर चरवाहे और कृषि वानिकी करने वाले आदिवासी हमारे देश की पोषण विविधता में प्रमुख योगदान देते हैं। जब हम स्थानीय किस्मों की बात करते हैं, तो हम आम तौर पर उन सब्ज़ियों और फसलों के पैदावार की बात कर रहे होते हैं जो इन लोगों द्वारा छोटे पैमाने पर उगाई जाती हैं। क्षेत्र-दर-क्षेत्र इनका चुनाव काफी अलग-अलग और निराला हो सकता है। दक्षिण भारत में, हम हरी पत्तेदार सब्ज़ियां उगाते हैं जो आयरन और कैल्शियम से भरपूर होती हैं; जैसे जंगली चौलई (तमिल में कुप्पी कीराई) और ल्यूकस (तमिल में थंबई; संस्कृत में द्रोण पुष्पी)। कुछ मंडयुक्त कंद उगाते हैं, जैसे त्योखर या पूर्वी भारतीय अरारोट (तमिल में कुवा), जिनके कंद का पावडर पौष्टिक होता है और विशेष रूप से पेट के लिए अच्छा होता है।

हर जगह मिलने वाला विटामिन सी का भंडार भारतीय आंवला (तमिल में नेल्ली) है। मध्य भारत में, महुआ (तमिल में इलुपाई) होता है जिसके फूल खाने योग्य होते हैं, और बीजों से तेल निकाला जा सकता है। राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी (तमिल में परंबई) से खाने योग्य फलियां मिलती हैं जिनसे स्वादिष्ट सिघरी भाजी बनती है, साथ ही यह वृक्ष मरुस्थलीकरण को भी रोकता है। हम सभी की शायद कोई न कोई ‘जंगली’ सब्ज़ी, फल, बेरी या कंद पसंद होगा, जो बहुत कम मिलता है।

झूम खेती

पूर्वोत्तर भारत के स्थानीय लोग झूम खेती करते थे, जिसमें भूमि के एक ही हिस्से पर लगभग 20 अलग-अलग तरह की खाद्य फसलें उगाई जाती थीं। खेती का यह रूप आधुनिक कृषि पद्धतियों के सर्वथा विपरीत है, लेकिन उनके आहार में काफी विविधता प्रदान करता है। अफसोस की बात है कि खेती का यह रूप अपनी जड़़ें छोड़ता जा रहा है। अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने वर्ष 2022 में फूड सिक्योरिटी पत्रिका में बताया है कि अकेले पश्चिमी गारो ज़िले में झूम खेती का क्षेत्र वर्ष 2000 में 1328 वर्ग कि.मी. था जो घटकर मात्र 112 वर्ग कि.मी. रह गया था। 2015 में सुपारी, काली मिर्च और रबर इस भूमि पर पसंदीदा फसलें बन गईं थी।

उपभोक्ता और उनके खाने की पसंद विभिन्न प्रकार की जंगली किस्मों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। कवीट या केथा और जामुन को अपने आहार में शामिल करने से आपके पोषण आहार की गुणवत्ता में तो वृद्धि होगी ही, साथ ही साथ छोटे उत्पादकों को मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

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भारत में हरित क्रांति के पुरौधा स्वामिनाथन नहीं रहे

त 28 सितंबर के दिन मशहूर कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामिनाथन का निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। उन्होंने भारत में हरित क्रांति की बुनियाद रखी थी जिसकी बदौलत किसी समय खाद्यान्न के अभाव से पीड़ित देश न सिर्फ आत्मनिर्भर बना बल्कि निर्यातक भी बन गया।

वे सात दशकों तक कृषि अनुसंधान, नियोजन और प्रशासन के अलावा किसानों को नई तकनीकें अपनाने के लिए प्रशिक्षित करने में भी सक्रिय रहे।

1925 में तमिलनाडु के एक छोटे कस्बे में जन्मे डॉ. स्वामिनाथन ने आलू संवर्धन में विशेषज्ञता हासिल की थी और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में इसी विषय पर पोस्ट-डॉक्टरल अनुसंधान किया था। यूएस में ही आगे काम करते रहने का अवसर मिलने के बावजूद वे 1954 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में काम करने को भारत लौट आए थे।

1979 से 1982 तक वे कृषि एवं सिंचाई मंत्रालय में प्रमुख सचिव रहे। डॉ. स्वामिनाथन योजना आयोग के सदस्य और मंत्रिमंडल की विज्ञान सलाहकार समिति के अध्यक्ष भी रहे। 1982 में उन्हें इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (फिलिपाइन्स) का महानिदेशक नियुक्त किया गया और 1988 तक वे इस पद पर रहे। भारत लौटकर वे पर्यावरण नीति व भूजल नीति सम्बंधी समितियों के अध्यक्ष रहे और राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में पादप आनुवंशिकीविद के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने देखा कि मेक्सिको में नॉर्मन बोरलॉग द्वारा विकसित गेहूं की नई किस्में परीक्षण के दौरान अद्भुत पैदावार दे रही हैं। स्वामिनाथन और बोरलॉग के बीच एक लाभदायक साझेदारी विकसित हुई और स्वामिनाथन ने बोरलॉग द्वारा विकसित किस्मों का संकरण मेक्सिको व जापान की अन्य किस्मों से करवाकर बेहतर गेहूं पैदा करने में सफलता हासिल की। गेहूं के ये नए पौधे ज़्यादा मज़बूत थे और दाना सुनहरा था।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक के नाते उन्होंने सरकार को राज़ी किया कि मेक्सिको से 18,000 टन गेहूं के बीज का आयात किया जाए। असर यह हुआ कि 1974 तक भारत गेहूं व धान के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका था।

डॉ. स्वामिनाथन को 1987 में प्रथम विश्व खाद्य पुरस्कार दिया गया; उन्होंने इस पुरस्कार के साथ प्राप्त 2 लाख डॉलर का उपयोग एम. एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना हेतु किया जो आज भी देश में एक अग्रणी नवाचार संस्थान है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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