खेती के लिए सौर फीडर से बिजली – अश्विन गंभीर और शांतनु दीक्षित

भारत में कुल सींचित क्षेत्र में से दो तिहाई भूजल के पंपिंग पर आश्रित है। इसके लिए 2 करोड़ पंप को बिजली से तथा 75 लाख पंप को डीज़ल से ऊर्जा मिलती है। भूजल की उपलब्धता मूलत: विश्वसनीय और किफायती बिजली आपूर्ति पर निर्भर होती है। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि इसका सम्बंध ग्रामीण गरीबों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा से है। कृषि क्षेत्र बिजली का एक प्रमुख उपभोक्ता है। कई राज्यों में कुल बिजली खपत में से एक-चौथाई से लेकर एक-तिहाई तक कृषि में जाती है।

1970 के दशक से कई राज्यों में खेती के लिए बिजली या तो निशुल्क या बहुत कम कीमत पर मिल रही है। अधिकांश कृषि सप्लाई का मीटरिंग नहीं किया जाता। कम कीमत और राजस्व वसूली की खस्ता हालत के चलते कृषि को दी गई बिजली को वितरण कंपनियों के वित्तीय घाटे का प्रमुख कारण माना जाता है। इस घाटे की कुछ भरपाई तो अन्य उपभोक्ताओं (जैसे औद्योगिक व व्यावसायिक) पर अधिक शुल्क लगाकर की जाती है। इसे क्रॉस सबसिडी कहते हैं। शेष घाटे की पूर्ति सरकार द्वारा सीधे सबसिडी देकर की जाती है।

चूंकि कृषि को बिजली सप्लाई की दृष्टि से घाटे का क्षेत्र माना जाता है, इसलिए खेती को अक्सर घटिया गुणवत्ता की सप्लाई मिलती है। इसकी वजह से पंप का बार-बार जलना और बिजली न मिलने जैसे समस्याएं पैदा होती हैं। सप्लाई को बहाल करने में बहुत समय लगता है। इसके अलावा नए कनेक्शन मिलने में काफी समय लगता है। और तो और, सप्लाई अविश्वसनीय होती है और प्राय: देर रात में ही मिल पाती है। इन सब कारणों से किसानों में वितरण कंपनियों को लेकर अविश्वास पनपा है।

अगले 10 वर्षों में खेती में बिजली की मांग दुगनी होने की संभावना है। सप्लाई की लागत बढ़ने के साथ-साथ कृषि सबसिडी की समस्या भी विकराल होती जाएगी। यदि इस मामले में नए विचार नहीं आज़माए गए तो खेती में बिजली सप्लाई की स्थिति बिगड़ती जाएगी। समाधान कुछ भी हो किंतु उसमें सबसे पहले किसानों को दिन के समय पर्याप्त बिजली की विश्वसनीय सप्लाई उचित दरों पर सुनिश्चित करनी होगी। इससे किसानों और वितरण कंपनियों के बीच परस्पर विश्वास बढ़ेगा। यदि ऐसे किसी समाधान को राष्ट्र के स्तर पर कारगर बनाना है तो इसमें सबसिडी की मात्रा भी कम की जानी चाहिए।

इस संदर्भ में तीन ऐसे विकास हुए हैं जो सर्वथा नई उत्साहवर्धक संभावनाएं प्रस्तुत करते हैं। पहला, सौर ऊर्जा से सस्ती दरों पर बिजली की उपलब्धता – चूंकि इसमें र्इंधन की कोई लागत नहीं है इसलिए यह बिजली स्थिर कीमत के अनुबंध के आधार पर अगले 25 वर्षों तक 2.75 से लेकर 3.00 रुपए प्रति युनिट की दर से मिल सकती है। दूसरा, सौर ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि का राष्ट्रीय लक्ष्य पूरा करने के लिए राज्यों को सौर ऊर्जा की खरीद में तेज़ी से वृद्धि करनी होगी। तीसरा और अंतिम, कि भारत में ग्रिड हर गांव में पहुंच चुकी है तथा कृषि फीडर्स को अलग करने का काम भी काफी तेज़ी से आगे बढ़ा है। फीडर पृथक्करण के ज़रिए पंप को मिलने वाली बिजली और गांव को मिलने वाली बिजली को भौतिक रूप से अलग कर दिया जाता है। फीडर पृथक्करण का दो-तिहाई लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।

इन तीन चीज़ों का फायदा उठाते हुए महाराष्ट्र में मुख्य मंत्री सौर कृषि फीडर कार्यक्रम के तत्वाधान में एक नवाचारी कार्यक्रम शुरू किया गया है। सौर कृषि फीडर मूलत: 1-10 मेगावॉट का समुदाय स्तर का सौर फोटो-वोल्टेइक संयंत्र होता है जिसे 33/11 केवी सबस्टेशन से जोड़ा जाता है। एक मेगावॉट क्षमता का सौर संयंत्र 5-5 हॉर्स पॉवर के करीब 350 पंप को संभाल सकता है और इसे लगाने के लिए लगभग 5 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत होती है। संयंत्र को लगाने में कुछ महीने लगते हैं और किसानों को अपने छोर पर कोई परिवर्तन नहीं करने पड़ते। उन्हें इसकी स्थापना और संचालन की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठानी पड़ती। पृथक्कृत कृषि फीडर से जुड़े सारे पंप्स को दिन के समय (सुबह 8 से शाम 6 बजे तक) 8-10 घंटे विश्वसनीय बिजली मिलेगी। जब सौर बिजली का उत्पादन कम होगा तब शेष बिजली वितरण कंपनी से ली जा सकती है। दूसरी ओर, जब पंपिंग की मांग कम है (जैसे बरसात के मौसम में) तब अतिरिक्त बिजली वितरण कंपनी को दी जा सकती है। इसके चलते संयंत्र का यथेष्ट आकार निर्धारित किया जा सकता है। प्रोजेक्ट डेवलपर्स का चयन प्रतिस्पर्धी नीलामी के द्वारा होता है और संयंत्र से बनने वाली सारी बिजली को वितरण कंपनी 25 साल के अनुबंध के ज़रिए खरीद लेगी। इसके एवज में वितरण कंपनी सम्बंधित फीडर से जुड़े किसानों को बिजली देती रहेगी।

किसानों को दिन के समय विश्वसनीय बिजली मिलने के अलावा इस तरीके का एक फायदा यह है कि इसके लिए सरकार की ओर से किसी पूंजीगत सबसिडी की ज़रूरत नहीं होगी। दरअसल यह तरीका लागत-क्षम है और इससे सबसिडी में कमी आएगी। एक फायदा यह भी है कि इसके लिए कोई नई ट्रांसमिशन लाइन डालने की ज़रूरत नहीं है। नई ट्रांसमिशन लाइन डालने का काम कई बड़े पैमाने के पवन व सौर ऊर्जा की निविदाओं के संदर्भ में प्रमुख अवरोध बन गया है। ऐसे सौर फीडर स्थापित करना वर्तमान नियामक व्यवस्था के तहत संभव है और यह बिजली उत्पादन कंपनियों के नवीकरणीय ऊर्जा खरीद दायित्व (आरपीओ) की पात्रता रखता है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस तरीके में स्थानीय युवाओं को संयंत्र के निर्माण, संचालन व रख-रखाव के कार्य में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के रास्ते भी खुलेंगे। इस तरीके के लाभों का प्रदर्शन करने के बाद ऐसे सौर फीडर्स को आपस में जोड़ा सकता है। इससे अनाधिकृत उपयोग/कनेक्शंस कम किए जा सकेंगे, मीटरिंग व शुल्क वसूली को बेहतर बनाया जा सकेगा। ऊर्जा-क्षम पंप तथा पानी की बचत के कार्यक्रम लागू किए जा सकेंगे।

फिलहाल महाराष्ट्र में इस योजना के तहत कुल लगभग 2-3 हज़ार मेगावॉट के सौर संयंत्र निविदा और क्रियांवयन के विभिन्न चरणों में हैं। यह करीब 7.5 लाख पंप यानी महाराष्ट्र के कुल पंप्स में 20 प्रतिशत को सौर बिजली सप्लाई करने के बराबर है। दिसंबर 2018 तक लगभग 10 हज़ार किसानों को इस योजना के तहत दिन के समय विश्वसनीय बिजली सप्लाई मिलने भी लगी है। और तो और, वितरण कंपनी अगले तीन से पांच सालों में इसे 7.5 लाख पंप के शुरुआती लक्ष्य से आगे ले जाने पर विचार कर रही है। राज्य वितरण कंपनी द्वारा बिजली सप्लाई की लागत करीब 5 रुपए प्रति युनिट है (और बढ़ती जा रही है), वहीं सौर बिजली की कीमत अगले 25 वर्षों के लिए 3 रुपए प्रति युनिट पर स्थिर रहेगी। 2 रुपए प्रति युनिट की यह बचत 5 हॉर्स पॉवर के एक पंप के लिए सालाना 10,000 रुपए होती है। किसी फीडर पर 500 पंप हों तो अगले 20 वर्षों में यह बचत 4.5 करोड़ रुपए होगी। भारत सरकार ने इसी तरह की एक योजना राष्ट्रीय स्तर पर भी घोषित की है। कुसुम नामक इस योजना का लक्ष्य 10,000 मेगावॉट है।

देश के हर गांव में बिजली ग्रिड की उपस्थिति तथा साथ में राष्ट्रीय फीडर पृथक्करण कार्यक्रम मिलकर इस लागत-क्षम व आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले इस तरीके को समूचे राष्ट्र में व्यावहारिक बना देते हैं। कृषि क्षेत्र के लिए दिन के समय किफायती व विश्वसनीय बिजली उपलब्ध कराने का लक्ष्य इस तरीके को अनिवार्य बना देता है। यह किसान, सरकार व वितरण कंपनियों तीनों के लिए लाभ का सौदा है और यह बिजली क्षेत्र के लिए किसान-केंद्रित रास्ता खोलता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत के ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का मूल्यांकन – आदित्य चुनेकर, संजना मुले, मृदुला केलकर

भारत के अपने नागरिकों को विश्वसनीय, किफायती, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध करवाने के लक्ष्य में ऊर्जा दक्षता काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत में पिछले कुछ सालों में ऊर्जा संरक्षण, बेहतर ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा आपूर्ति प्रबंधन से सम्बंधित कई नीतियां और कार्यक्रम लागू किए गए हैं। इन कार्यक्रमों के स्तर और दायरे दोनों ही बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए उजाला कार्यक्रम बड़े स्तर पर परिवारों को कम दामों में एलईडी बल्ब उपलब्ध कराता है।

किंतु इस तरह के बड़े कार्यक्रमों के समग्र मूल्यांकन पर बहुत ही कम ध्यान दिया जा रहा है। समग्र मूल्यांकन कार्यक्रमों के विभिन्न प्रभावों और उनकी कारगरता की व्यवस्थित जांच करते हैं, इन कार्यक्रमों की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं और कार्यक्रमों के क्रियांवयन से होने वाली ऊर्जा की बचत का अनुमान बताते हैं। समग्र मूल्यांकन वर्तमान में लागू कार्यक्रमों की समीक्षा भी करते हैं तथा भविष्य में लागू किए जाने वाले ऐसे अन्य कार्यक्रमों की डिज़ाइन को बेहतर करने में मदद करते हैं।

कई व्यवस्थागत बाधाओं के चलते भारत में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का समग्र मूल्यांकन बहुत सीमित रहा है। एक तो ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम क्रियांवित करने वाले संस्थानों के लिए, इन कार्यक्रमों का समयसमय पर और स्वतंत्र आकलन करवाने की कोई अनिवार्यता नहीं है। ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001; विद्युत अधिनियम, 2003; राष्ट्रीय विद्युत नीति 2005 और इसके संशोधन; राष्ट्रीय शुल्क नीति, 2006; और नियामक मंच द्वारा मांग प्रबंधन के नियमन सम्बंधी दिशानिर्देशों में इन नियमों की कमी स्पष्ट दिखती है।

समग्र मूल्यांकन की राह में दूसरी बाधा यह (गलत) धारणा है कि मूल्यांकन बोझिल, असमय, और महंगा होता है। यह गलतफहमी कुछ शुरुआती कार्यक्रमों में ऊर्जा बचत मापने के लिए डैटा लॉगर्स की मदद से ऊर्जा बचत सम्बंधी वास्तविक मापन के अनुभवों से उपजी है। और खासकर छोटे स्तर के कार्यक्रमों के लिए मूल्यांकन को एक बोझ माना जाता है।

अंततः ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का सार्वजनिक डैटा दुर्लभ या बहुत कम उपलब्ध होता है। डैटा की कमी के कारण स्वतंत्र रुप से मूल्यांकन करने वाले शोधकर्ताओं, अकादमिक लोगों, और सामाजिक संगठनों द्वारा मूल्यांकन बहुत सीमित हो जाता है। इन व्यवस्थागत बाधाओं को दूर करने की ज़रूरत है ताकि भारत में इन कार्यक्रमों का समग्र मूल्यांकन किया जा सके।

ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम के किसी भी समग्र मूल्याकन में कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन (अर्थात यह देखना कि ऊर्जा खपत में कितनी कमी आई और सर्वोच्च मांग में कितनी कमी आई), प्रक्रिया का मूल्यांकन (कार्यक्रम का क्रियान्वन कितना कारगर रहा), और बाज़ार प्रभाव मूल्यांकन (कार्यक्रम के कारण बाज़ार में आए बदलावों का आकलन) शामिल हैं।

कार्यक्रम के प्रायोगिक क्रियान्वन के दौरान मूल्यांकन का विशेष महत्व होता है क्योंकि प्रायोगिक क्रियांवयन में सामने आई खामियों या मुश्किलों को बड़े स्तर पर कार्यक्रम लागू करने से पहले दूर किया जा सकता है। इसके अलावा लागू हो चुके कार्यक्रमों का मूल्यांकन भी ज़रूरी है क्योंकि इस तरह के मूल्यांकन कार्यक्रम के कारगर और गैरकारगर बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाते हैं।

प्रयास द्वारा तैयार रिपोर्ट में भारत में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने के व्यापक दिशानिर्देश प्रस्तुत किए गए हैं। ये दिशानिर्देश विश्व स्तर की सर्वोत्तम परिपाटियों की समीक्षाओं पर आधारित हैं और केस स्टडीज़ की मदद से इन परिपाटियों के उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट, वर्तमान में भारत में लागू ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों के समग्र मूल्यांकन के लिए नीति निर्माताओं, वितरण कंपनियों के प्रबंधकों और नियंत्रकों के लिए है जो मूल्यांकनकर्ताओं को नियुक्त कर सकते हैं। साथ ही यह रिपोर्ट भारत के ऊर्जा दक्षता संस्थानों जैसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड और सरकार द्वारा निर्धारित एजेंसियों के कार्यक्रमों में समग्र मूल्यांकन को शामिल करवाने में भी उपयोगी होगी। अंत में इस रिपोर्ट में उपभोक्ताओं, सामाजिक संगठनों और शोधकर्ताओं की दृष्टि से ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम के समग्र मूल्यांकन के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। यह रिपोर्ट भारत के सभी ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों की व्यापक मार्गदर्शिका नहीं है। यह रिपोर्ट तो ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए एक सामान्य खाका या कार्यक्रमविशेष के लिए दिशानिर्देश प्रस्तुत करती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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अड़ियल फिलामेंट बल्ब – आदित्य चुनेकर, संजना मुले, मृदुला केलकर

भारत में वर्ष 2014 से एलईडी बल्ब की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह वृद्धि मुख्य रूप से उजाला कार्यक्रम के तहत सस्ते एलईडी बल्ब उपलब्ध कराने की योजना की बदौलत हुई है। हालांकि, फिलामेंट बल्ब की मांग अभी भी काफी है, हालांकि धीरेधीरे घट रही है। 2017 में, भारत में लगभग 77 करोड़ फिलामेंट बल्ब बेचे गए थे, जो उस वर्ष बल्ब और ट्यूबलाइट की कुल बिक्री के 50 प्रतिशत से भी अधिक था।

इस आलेख में, हम भारत में फिलामेंट बल्ब के निरंतर उपयोग की जांच के लिए भारतीय घरों के लिए उपलब्ध विभिन्न प्रकाश विकल्पों की मांग और आपूर्ति के कुछ पहलुओं की जांच करेंगे। इस विश्लेषण के आधार पर, हम भारत में फिलामेंट बल्ब के उपयोग को कम करने और अंतत: समाप्त करने करने के लिए कुछ कार्यक्रम और नीतिगत हस्तक्षेपों के सुझाव भी देंगे।

हमने अपने द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया कि लोग, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में, एलईडी बल्ब और उसके लाभों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं। संभावित उपभोक्ता की प्रमुख चिंता एलईडी बल्ब द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की गुणवत्ता और देश में खराब बिजली आपूर्ति के मद्देनज़र उनके टिकाऊपन को लेकर है। एलईडी बल्ब की एकमुश्त ऊंची कीमत अभी भी एक चुनौती है क्योंकि अधिकांश सर्वेक्षित घरों ने वित्त पोषित योजना को पसंद किया है। सर्वेक्षण में स्थानीय बाज़ारों, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में एलईडी बल्बों की सीमित उपलब्धता का भी पता चला है।

जहां तक फिलामेंट बल्ब की आपूर्ति का सवाल है, मुट्ठी भर कंपनियां भारत में अधिकांश फिलामेंट बल्ब का उत्पादन करती हैं। फिलामेंट बल्ब का उत्पादन करने वाले कारखाने पुराने, घिसेपिटे और स्वचालित हैं। फिलामेंट बल्ब के उत्पादन में शोध, गारंटी और विपणन की लागत बहुत कम होती है। इस कारण से कंपनियां फिलामेंट बल्ब बहुत कम कीमत पर बेच पाती हैं। इसके अलावा, फिलामेंट बल्ब उद्योग में कोई नया प्रवेशकर्ता भी नहीं है।

दूसरी तरफ, एलईडी लाइटिंग उद्योग हाल ही के वर्षों में उजाला कार्यक्रम द्वारा उत्पन्न मांग पर चल रहा है। चूंकि शुरुआती पूंजी निवेश कम लगता है और बल्ब के पुर्ज़ों को हाथ से जोड़ा जा सकता है, इसलिए मांग को पूरा करने के लिए लघु उद्योग भी मौजूद है। भारतीय मानक ब्यूरो और ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के पास एलईडी बल्बों के प्रदर्शन और सुरक्षा सम्बंधी अनिवार्य मानक हैं। हालांकि, बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों में इन मानकों के अनुपालन को लेकर स्थिति चिंताजनक है। मात्र कीमत में कमी पर ध्यान केन्द्रित किए जाने के कारण शायद एलईडी बल्ब की गुणवत्ता के साथ समझौता हुआ होगा। खास तौर से उन पहलुओं की उपेक्षा हुई होगी जो उनके जीवनकाल और प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं। मौजूदा मानकों में शायद इन्हें सटीक रूप से पकड़ा नहीं जा सका है।

फिलामेंट बल्ब को बाज़ार से दूर करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अब तक अपनाए गए मूल्यकेंद्रित हस्तक्षेप एलईडी बल्ब की कीमत को कम करके उनकी मांग में वृद्धि करने में सफल रहे हैं। किंतु फिलामेंट बल्ब से पूरी तरह से निजात पाने के लिए मूल्यकेंद्रित हस्तक्षेप से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। जैसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो लोगों को एलईडी बल्ब के लाभों के बारे में जागरूक करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान आयोजित कर सकता है। ऐसे अभियान ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के स्टार रेटिंग कार्यक्रम द्वारा प्रमाणित अच्छी गुणवत्ता वाले एलईडी बल्ब खरीदने के बारे में जागरूकता भी बढ़ा सकते हैं। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो और भारतीय मानक ब्यूरो समयसमय पर मानकों के अनुपालन की जांच कर सकते हैं और अनुपालन न करने वालों की जानकारी प्रकाशित भी कर सकते हैं। उजाला की कार्यान्वयन एजेंसी, ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड (ईईएसएल), खरीदे गए एलईडी बल्बों की गुणवत्ता की जांच कर सकती है और अनुपालन न करने वाले निर्माताओं को ब्लैकलिस्ट कर सकती है। ईईएसएल सुनिश्चित कर सकता है कि गारंटीशुदा बल्बों को बदलने की प्रक्रिया आसान हो। इससे लोगों में एलईडी बल्ब की गुणवत्ता को लेकर विश्वास पैदा करने में मदद मिलेगी। एलईडी बल्ब के ऊंचे मूल्य के मुद्दे को हल करने के लिए, ईईएसएल बिल भुगतान के समय वित्त पोषण प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दे सकता है। यह उजाला कार्यक्रम का हिस्सा तो रहा है, लेकिन इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। ईईएसएल ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने के लिए डाकघर, पेट्रोल पंप और ग्राम स्वराज अभियान के माध्यम से वितरण की अपनी वर्तमान पहल को जारी रख सकता है। सरकार का विद्युतीकरण कार्यक्रम सौभाग्य नव विद्युतीकृत घरों में एलईडी बल्ब के उपयोग को बढ़ावा देने का एक और तरीका हो सकता है।

एलईडी बल्ब के बारे में जागरूकता बढ़ाने, उनकी गुणवत्ता में सुधार करने, उनकी कीमत को कम करने और उनकी उपलब्धता में वृद्धि करने और आसान बनाने जैसे हस्तक्षेपों से भारत में फिलामेंट बल्ब के उपयोग को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। लेकिन आज की स्थिति में तो अन्य समस्याओं को संबोधित किए बिना फिलामेंट बल्ब को एकाएक विदा करने की सिफारिश नहीं की जा सकती है। ऐसा करने से इसका बोझ मुख्य रूप से निम्न आय वर्ग और नव विद्युतीकृत घरों पर पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)

पुणे स्थित प्रयास (ऊर्जा समूह) ने हाल ही में एलईडी बल्बों के उपयोग सम्बंधी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी ऑब्स्टिनेट बल्ब मूविंग बियॉण्ड प्राइस फोकस्ड इंटरवेंशन्स टु टेकल इंडियाज़ पर्सिस्टेंट इनकेंडेसेंट बल्ब प्रॉबलम। यह रिपोर्ट निम्नलिखित वेबसाइट पर उपलब्ध है: http://www.prayaspune.org/peg/publications/item/380यहां उस रिपोर्ट का सारांश प्रस्तुत है।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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