माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से छोटे कण होते
हैं। ये व्यावसायिक प्लास्टिक उत्पादन के दौरान और बड़े प्लास्टिक के टूटने से
उत्पन्न होते हैं। रोज़मर्रा के जीवन में प्लास्टिक के अधिक इस्तेमाल के कारण
माइक्रोप्लास्टिक ने पूरी पृथ्वी को अपनी चपेट में ले लिया है। प्रदूषक के रूप में
माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण, मानव और पशु स्वास्थ्य के लिए
अत्यंत हानिकारक हो सकता है।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने गर्भवती महिलाओं के गर्भनाल में माइक्रोप्लास्टिक्स
पाया है। यह बेहद चिंता का विषय है। नए शोध में गर्भनाल के नमूनों में अनेक प्रकार
के सिंथेटिक पदार्थ भी पाए गए हैं। इटली में हुए एक अध्ययन में महिलाओं की प्रसूति
में कोई जटिलता नहीं पता चली है और इसलिए
छोटे प्लास्टिक के कणों का शरीर पर प्रभाव निश्चित तौर पर अभी तक ज्ञात नहीं हो
पाया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक के
रसायन गर्भस्थ शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान अवश्य पहुंचा सकते हैं।
रोम के फेटबेनफ्रेटेली के प्रसूति और स्त्री रोग विभाग के शोध प्रमुख एंटोनियो
रागुसा तब आश्चर्यचकित हो गए जब उन्होंने बच्चों के जन्म के बाद माताओं द्वारा दान
में दिए गए छह में से चार गर्भनाल में 12 माइक्रोप्लास्टिक टुकड़े पाए। अनुमान है
कि माओं के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक भोजन या सांस के साथ प्रवेश कर गए होंगे।
अध्ययन के लिए प्रत्येक गर्भनाल से केवल तीन प्रतिशत ऊतक का नमूना लिया गया था, और उसमें भी इतनी अधिक मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक टुकड़ों का मिलना बेहद
गंभीर मामला है। शोध पत्र में कहा गया है कि सभी प्लास्टिक के कण रंगीन थे। तीन
नमूनों को पॉलीप्रोपायलीन के रूप में पहचाना गया, जबकि
अन्य नौ अन्य नमूनों के केवल रंग की पहचान ही संभव हो पाई।
एनवायरनमेंट इंटरनेशनल नामक जर्नल में प्रकाशित एक
शोध में शोधकर्ताओं ने बताया है कि पिछली सदी में ही प्लास्टिक का वैश्विक उत्पादन
प्रति वर्ष 32 करोड़ टन तक पहुंच गया था। उत्पादन में हुई 40 प्रतिशत की वृद्धि का
उपयोग एकल-उपयोग पैकेजिंग के रूप में किया जाता है। उपयोग हो जाने पर इसे कचरे के
रूप में फेंक दिया जाता है।
गर्भनाल गर्भस्थ शिशु से अपशिष्ट पदार्थ को निकालने के साथ-साथ बच्चे को ऑक्सीजन और पोषण भी प्रदान करता है। 10 माइक्रॉन (0.01 मि.मी.) के माइक्रोप्लास्टिक रक्त प्रवाह में पहुंचकर मां से गर्भस्थ शिशु में भी पहुंच जाते हैं। शरीर में पहुंचते ही ये माइक्रोप्लास्टिक्स शिशु के शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करके प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्तेजित करते हैं। माइक्रोप्लास्टिक्स पर्यावरणीय प्रदूषकों और प्लास्टिक योजक सहित अन्य रसायनों के वाहक के रूप में भी कार्य कर सकता है, जिससे शरीर को अत्यधिक हानि होती है। माइक्रोप्लास्टिक्स गर्भनाल के भ्रूण और मातृ दोनों हिस्सों में पाए गए थे। ये कण शिशुओं के शरीर में प्रवेश कर गए होंगे, हालांकि वैज्ञानिक शिशु के अंदर इनका पता लगाने में असमर्थ थे। भ्रूण पर माइक्रोप्लास्टिक्स के संभावित प्रभाव में भ्रूण की सामान्य वृद्धि कम हो जाना है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि अध्ययन में शामिल दो अन्य महिलाओं के गर्भनाल में माइक्रोप्लास्टिक कणों का न पाया जाना बेहतर आहार, शरीर की कार्यिकी या बेहतर जीवन शैली का परिणाम हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit :https://i.guim.co.uk/img/media/294635653dcf9c2e923a9f7a8d2c9eedf0344587/0_220_4199_2519/master/4199.jpg?width=445&quality=45&auto=format&fit=max&dpr=2&s=f9aa3e0e2a17ecf9ab5aeaddf0d1611b https://cdn.thewire.in/wp-content/uploads/2021/01/10103527/image.png
फिलहाल 9 टीके हैं जो कोविड-19 की गंभीर बीमारी और मृत्यु की
रोकथाम में असरदार पाए गए हैं। लेकिन टीकों की आपूर्ति में कमी को देखते हुए
वैज्ञानिक इस सवाल पर विचार और परीक्षण कर रहे हैं कि क्या दो खुराक देने के लिए
टीकों का मिला-जुला उपयोग किया जा सकता है। यानी पहली खुराक किसी टीके की दी जाए
और बूस्टर किसी अन्य टीके का? यदि ऐसे कुछ सम्मिश्रण कारगर
रहते हैं तो आपूर्ति की समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकेगा। यह भी सोचा जा रहा है
कि क्या दो अलग-अलग टीकों के मिले-जुले उपयोग से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
ऐसे मिश्रित उपयोग का एक परीक्षण चालू भी हो चुका है। इसमें यह देखा जा रहा है
कि रूस के गामेलाया संस्थान द्वारा विकसित स्पूतनिक-5 का उपयोग
एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड द्वारा बनाए गए टीके के बूस्टर डोज़ के साथ किया जा सकता
है। इसी प्रकार के अन्य परीक्षण में एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड टीके और
फाइज़र-बायोएनटेक द्वारा बनाए गए टीके के मिले-जुले उपयोग पर काम चल रहा है। ये दो
टीके अलग-अलग टेक्नॉलॉजी का उपयोग करते हैं। कुछ अन्य परीक्षण अभी विचार के स्तर
पर हैं। अलबत्ता,
इन परीक्षणों के परिणाम आने तक सावधानी बरतना ज़रूरी है।
अतीत में भी टीकों के मिले-जुले उपयोग के प्रयास हो चुके हैं। जैसे एड्स के
संदर्भ में दो टीकों का इस्तेमाल करके ज़्यादा शक्तिशाली प्रतिरक्षा प्राप्त करने
के प्रयास असफल रहे थे। ऐसा ही परीक्षण एबोला के टीकों को लेकर भी किया गया था।
कुछ मामलों में स्थिति बिगड़ भी गई थी। कोविड-19 के टीकों के मिले-जुले उपयोग की
कुछ समस्याएं भी हैं। जैसे हो सकता है कि दो में से एक टीके को मंज़ूरी मिल चुकी हो
लेकिन दूसरे को न मिली हो। एक समस्या यह भी हो सकती है कि दो टीके अलग-अलग
टेक्नॉलॉजी पर आधारित हों – जैसे एक एमआरएनए पर आधारित हो और दूसरा प्रोटीन पर
आधारित हो।
अलबत्ता,
टीकों के ऐसे मिश्रित उपयोग का एक फायदा भी है। हरेक टीका
प्रतिरक्षा तंत्र के किसी एक भाग को सक्रिय करता है। तो संभव है कि दो अलग-अलग
टीकों का उपयोग करके हम दो अलग-अलग भागों को सक्रिय करके बेहतर सुरक्षा हासिल कर
पाएं।
जैसे स्पूतनिक-5 टीके में दो अलग-अलग एडीनोवायरस (Ad26, Ad5) का उपयोग सम्बंधित जीन को शरीर में पहुंचाने के लिए किया गया है। दूसरी ओर, एस्ट्राज़ेनेका टीके में प्रमुख खुराक और बूस्टर दोनों में चिम्पैंज़ी एडीनोवायरस (ChAd) का ही उपयोग हुआ है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि एक खुराक से उत्पन्न प्रतिरक्षा को दूसरी खुराक स्थगित कर दे। ऐसे में स्पूतनिक और एस्ट्राज़ेनेका के मिले-जुले उपयोग से यह समस्या नहीं आएगी। यह फायदा कई अन्य मिश्रणों में भी संभव है। वैसे सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा संभव हुआ तो आपूर्ति की समस्या से निपटा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
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पिछले वैज्ञानिकों ने एक ऐसे पदार्थ की पहचान कर ली है जो
लगभग 4000 डिग्री सेल्सियस के तापमान को सहन कर सकता है। यह खोज बेहद तेज़
हायपरसोनिक अंतरिक्ष वाहनों के लिए बेहतर ऊष्मा प्रतिरोधी कवच बनाने का रास्ता खोल
सकती है।
इंपीरियल कॉलेज, लंदन के शोधकर्ताओं ने खोज की है कि हैफ्नियम कार्बाइड का गलनांक अब तक दर्ज किसी भी पदार्थ के गलनांक से ज़्यादा है। टैंटेलम कार्बाइड और हैफ्नियम कार्बाइड रीफ्रेक्ट्री सिरेमिक्स हैं; अर्थात ये असाधारण रूप से ऊष्मा-सह हैं। अत्यधिक ऊष्मा को सहन कर सकने की इनकी क्षमता का अर्थ है कि इनका इस्तेमाल तेज़ गति के वाहनों में ऊष्मीय सुरक्षा प्रणाली में और परमाणु रिएक्टर के बेहद गर्म पर्यावरण में र्इंधन के आवरण के रूप में किया जा सकता है। इन दोनों ही यौगिकों के गलनांक के परीक्षण प्रयोगशाला में करने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं थी। अत:, शोधकर्ताओं ने इन दोनों यौगिकों की गर्मी सहन कर सकने की क्षमता के परीक्षण के लिए लेज़र का इस्तेमाल करके तेज़ गर्मी पैदा करने वाली एक नई प्रौद्योगिकी विकसित की है। उन्होंने पाया कि इन दोनों यौगिकों के मिश्रण का गलनांक 3990 डिग्री सेल्सियस था। लेकिन दोनों यौगिकों के अलग-अलग गलनांक अब तक ज्ञात इस तरह के यौगिकों से ज़्यादा पाए गए (टैंटेलम कार्बाइड 3880 डिग्री सेल्सियस, हैफ्नियम कार्बाइड 3928 डिग्री सेल्सियस)। ये पदार्थ तेज़ अंतरिक्ष यानों में उपयोगी होंगे (स्रोत फीचर्स)
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मौजूदा डिजिटल स्टोरेज डिवाइसेस में कई टेराबाइट
डैटा सहेजा जा सकता है। किंतु नई टेक्नॉलॉजी आने पर ये तकनीकें पुरानी पड़ जाती हैं
और इनसे डैटा पढ़ना मुश्किल हो जाता है, जैसा कि मैग्नेटिक टेप और
फ्लॉपी डिस्क के साथ हो चुका है। अब, वैज्ञानिक जीवित सूक्ष्मजीव
के डीएनए में इलेक्ट्रॉनिक रूप से डैटा लिखने की कोशिश में हैं।
डैटा सहेजने के लिए डीएनए कई कारणों से आकर्षित करता है। पहला
तो यह कि डीएनए हमारी सबसे कॉम्पैक्ट हार्ड ड्राइव से भी हज़ार गुना ज़्यादा सघन है; नमक के एक दाने के बराबर टुकड़े में यह 10 डिजिटल फिल्में सहेज सकता है। दूसरा, चूंकि डीएनए जीव विज्ञान का केंद्र बिंदु है इसलिए उम्मीद है कि डीएनए को पढ़ने-लिखने
की तकनीक समय के साथ सस्ती और अधिक बेहतर हो जाएंगी।
वैसे डीएनए में डैटा सहेजना कोई बहुत नया विचार नहीं है। शुरुआत
में शोधकर्ता डीएनए में डैटा सहेजने के लिए डिजिटल डैटा (0 और 1) को चार क्षार – एडेनिन, गुआनिन,
साइटोसीन और थायमीन – के संयोजनों के रूप में परिवर्तित करते
थे। डीएनए संश्लेषक की मदद से यह परिवर्तित डैटा डीएनए में लिखा जाता था। यदि कोड बहुत
लंबा हो तो डीएनए सिंथेसिस की सटीकता पर फर्क पड़ता है, इसलिए डैटा
को छोटे-छोटे हिस्सों (200 से 300 क्षार लंबे डैटा खंड) में तोड़कर डीएनए में लिखा जाता
है। प्रत्येक डैटा खंड को एक इंडेक्स नंबर दिया जाता है, जो अणु
में उसका स्थान दर्शाता है। डीएनए सीक्वेंसर की मदद से डैटा पढ़ा जाता है। लेकिन यह
तकनीक बहुत महंगी है; एक मेगाबिट डैटा लिखने में लगभग ढाई लाख रुपए
लगते हैं। और डीएनए जिस पात्र में सहेजा जाता है वह समय के साथ खराब हो सकता है।
इसलिए टिकाऊ और आसानी से लिखे जाने वाले विकल्प के रूप में पिछले
कुछ समय से शोधकर्ता सजीवों के डीएनए में डैटा सहेजने पर काम कर रहे हैं। कोलंबिया
विश्वविद्यालय के तंत्र जीव विज्ञानी हैरिस वांग ने जब ई.कोली बैक्टीरिया की
कोशिकाओं में फ्रुक्टोज़ जोड़ा तो उसके डीएनए के कुछ हिस्सों की अभिव्यक्ति में वृद्धि
हुई।
फिर, क्रिस्पर की मदद से अधिक अभिव्यक्त
होने वाले खंड को कई भागो में काट दिया और इनमें से कुछ को बैक्टीरिया के डीएनए के
उस विशिष्ट हिस्से में जोड़ा जो पूर्व में हुए वायरस के हमलों को ‘याद’ रखता है। इस
तरह जोड़ी गई जेनेटिक बिट डिजिटल 1 दर्शाती है। फ्रुक्टोज़ संकेत की अनुपस्थिति में डीएनए
कोई रैंडम बिट सहेजता है जो डिजिटल 0 दर्शाती है। ई. कोली के डीएनए को अनुक्रमित
कर डैटा पढ़ा जा सकता है।
लेकिन इस व्यवस्था में भी सीमित डैटा ही सहेजा जा सकता है इसलिए
वांग की टीम ने फ्रुक्टोज़ की जगह इलेक्ट्रॉनिक संकेतों का उपयोग किया। उन्होंने ई.
कोली बैक्टीरिया में कुछ जीन जोड़े जो विद्युत संकेत दिए जाने पर डीएनए की अभिव्यक्ति
में वृद्धि करते हैं। अभिव्यक्ति में वृद्धि बैक्टीरिया के डीएनए में 1 सहेजती है।
डीएनए को अनुक्रमित कर 0-1 के रूप में लिखा डैटा पढ़ा जा सकता है। नेचर केमिकल बायोलॉजी
में शोधकर्ता बताते हैं कि इस तकनीक की मदद से उन्होंने 72 बिट लंबा संदेश ‘हैलो वर्ल्ड!’
लिखा है। संदेशयुक्त ई. कोली को मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के साथ भी जोड़कर
उनमें डैटा सहेजा जा सकता है।
बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन से डैटा में बदलाव या उसकी हानि हो सकती है, जिस पर काम करने की आवश्यकता है। बहरहाल यह तकनीक जासूसी फिल्मों-कहानियों को जानकारी छुपाने के एक और खुफिया तरीके का विचार तो देती ही है। (स्रोत फीचर्स)
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विदा हो चुका वर्ष 2020 भारतीय विज्ञान जगत के लिए नई
चुनौतियों और अपेक्षाओं का रहा। अदृश्य कोरोनावायरस से फैली कोविड-19 महामारी का
विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव दिखाई दिया। साल के पूर्वार्ध में वैज्ञानिकों ने नए कोरोनावायरस (सार्स-कोव-2) का जीनोम
अनुक्रम पता करने में सफलता प्राप्त की। इसी के साथ देश में ही टीका बनाने का
मार्ग प्रशस्त हुआ। दरअसल किसी भी रोग से जंग के लिए टीकों का विकास बेहद जटिल और
परीक्षणों के कई चरणों से गुज़रने वाली लंबी अनुसंधान प्रक्रिया है। लेकिन
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशालाओं में रात-दिन एक कर वर्ष के अंत तक कोविड-19 का टीका
बनाकर अपनी कुशलता का परिचय दिया।
वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के
झंडे तले कार्यरत तीन प्रयोगशालाओं – हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्युलर
बायोलॉजी, नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव
बायोलॉजी और चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी के
अनुसंधानकर्ताओं ने सार्स-कोव-2 का जीनोम अनुक्रम तैयार किया, जिसका
उद्देश्य वायरस की उत्पत्ति और उसके बदलते स्वरूपों का पता लगाकर टीका निर्माण की
राह बनाना था।
गुज़रे साल में देश की पांचवी विज्ञान, प्रौद्योगिकी
और नवाचार नीति-2020 (एसटीआईपी) का प्रारूप तैयार किया गया। देश में शोध और विकास
को मूर्त रूप देने में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही
है। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के बाद पहली विज्ञान नीति का निर्माण 1958 में किया
गया था। वर्ष 2020 में बनाई जा रही नई विज्ञान नीति में आत्मनिर्भर भारत के विचार
को केंद्र में रखकर स्वदेशी प्रौद्योगिकी,
महिलाओं और पंचायतों
के सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। विज्ञान मंत्रालय ने पहली बार नई
विज्ञान नीति निर्माण में राज्यों की विज्ञान परिषदों सहित लगभग 15,000 लोगों की
राय ली। नई विज्ञान नीति में स्थानीय से वैश्विक नवाचारों,
आवश्यकता आधारित
प्रौद्योगिकी तैयार करने और सतत विकास को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है।
हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड
मॉलीक्युलर बायोलॉजी के अनुसंधानकर्ताओं को ततैया का जीनोम अनुक्रमण करने में
सफलता मिली। ततैया का वैज्ञानिक नाम लेप्टोफिलिन बोलार्डी है। वैज्ञानिकों
का कहना है कि ततैया का जीनोम अनुक्रमण ड्रॉसोफिला और ततैया के बीच होने
वाले जैविक संघर्ष से सम्बंधित कारणों को समझने में सहायक होगा।
जनवरी में भारतीय विज्ञान कांग्रेस
एसोसिएशन का 107वां सालाना जलसा बैंगलुरू में संपन्न हुआ,
जिसमें देश-विदेश के
वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं ने ग्रामीण विकास में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की
भूमिका पर मंथन किया। वैज्ञानिकों का कहना था कि ग्रामीण विकास में प्रौद्योगिकी
को व्यापक बनाने की आवश्यकता है। वर्ष 2006 में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के
दौरान समेकित ग्रामीण विकास के विभिन्न मुद्दों पर विमर्श हुआ था।
17 जनवरी को फ्रेंच गुआना प्रक्षेपण केंद्र
से जी-सैट संचार उपग्रह को अंतरिक्ष में विदा किया गया। 7 नवंबर को भारतीय
अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-डीएल से दस
उपग्रहों को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजा गया। दस उपग्रहों में से नौ विदेशी हैं, जबकि
राडार इमेजिंग उपग्रह अर्थ ऑब्जर्वेशन सेटैलाइट-1 स्वदेशी उपग्रह है। यह सामरिक
निगरानी के साथ कृषि विज्ञान, वानिकी,
भू-विज्ञान, तटीय
निगरानी और बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान उपयोगी सिद्ध होगा। अंतरिक्ष विज्ञान की
गतिविधियों और कार्यक्रमों में निजी क्षेत्र की सहभागिता के लिए मार्ग प्रशस्त
हुआ।
कोरोना महामारी का असर भारत के प्रथम मानव
मिशन गगनयान पर भी पड़ा। गगनयान मिशन का प्रक्षेपण अब अगले वर्ष तक होने की उम्मीद
है। गगनयान परियोजना में तीन भारतीय वैज्ञानिक भेजे जाएंगे, जो
सात दिन अंतरिक्ष में बिताएंगे।
गुज़रे साल वैज्ञानिकों की टीम ने अगस्त में
मेघालय में मशरूम की रात में चमकने वाली एक नई प्रजाति रोरीडोमाइसेज़
फायलोस्टेकायडीस खोजी। अंधेरे में यह हरे रंग की रोशनी से जगमगाता है। इसी
कारण इसे ल्यूमिनिसेंट मशरूम कहते हैं। मेघालय में मशरूम की अलग-अलग प्रजातियों का
पता लगाने के लिए एक प्रोजेक्ट चल रहा है।
इसी वर्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग
ने 50 वें वर्ष में प्रवेश किया और स्वर्ण जयंती वर्ष आयोजनों की शुरुआत हुई।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना 3 मई 1971 को की गई थी। इस विभाग की
स्थापना का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक गतिविधियों और परियोजनाओं को बढ़ावा देने
में नोडल एजेंसी की भूमिका निभाना है।
विज्ञान समागम प्रदर्शनी का समापन 20 मार्च
को दिल्ली में हुआ। यह अपने ढंग की अनोखी प्रदर्शनी थी,
जिसमें आम लोगों को
विज्ञान की प्रगत विधाओं से परिचित होने का मौका मिला। प्रदर्शनी मुम्बई, कोलकाता
और बैंगलुरु के बाद दिल्ली पहुंची थी।
साल के उत्तरार्द्ध में भारत हाइपरसोनिक
टेक्नोलॉजी प्राप्त करने वाला चौथा देश बन गया। इस तकनीक की सहायता से ध्वनि से छह
गुना अधिक रफ्तार वाली मिसाइलें तैयार होंगी।
वर्ष के अंत में पहली बार वर्चुअल माध्यम
से इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टीवल आयोजित किया गया,
जिसमें इस बार 41
गतिविधियां शामिल की गर्इं। पहली बार महोत्सव में कृषि वैज्ञानिक सम्मेलन हुआ, जिसमें
खेती-किसानी से सम्बंधित कार्यों के लिए कृत्रिम बुद्धि के उपयोग पर ज़ोर दिया गया।
विज्ञान को उत्सव से जोड़ते इस कार्यक्रम की शुरुआत 2015 में नई दिल्ली से हुई थी।
गुज़रे वर्ष भारतीय वैज्ञानिक नेशनल सुपर
कंप्यूटिंग मिशन के अंतर्गत देश में ही सुपरकंप्यूटरों की शृंखला तैयार करने में
जुटे रहे। अंतरिक्ष, उद्योग और मौसम सम्बंधी पूर्वानुमानों में सुपरकंप्यूटरों
की अहम भूमिका है।
10 जुलाई को रीवा अल्ट्रा मेगा सौर
परियोजना राष्ट्र को समर्पित की गई। यह विश्व की बड़ी परियोजनाओं में से एक है। यह
पहली सौर योजना है, जिसे विश्व बैंक और क्लीन टेक्नोलॉजी फंड से धनराशि मिली
है। इस सौर परियोजना से हर साल 15.7 लाख टन कार्बन उत्सर्जन रोका जा सकेगा।
बीते साल ‘अम्फन’ और ‘निसर्ग’ जैसे
विनाशकारी तूफान आए, लेकिन उपग्रहों से प्राप्त सटीक पूर्वानुमानों के आधार पर
लाखों लोगों का जीवन बचा लिया गया।
विज्ञान के विभिन्न विषयों में मौलिक और
उत्कृष्ट अनुसंधान के लिए 14 वैज्ञानिकों को शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार से
सम्मानित किया गया। इनमें दो महिला वैज्ञानिक भी शामिल हैं। अभी तक 560
वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया जा चुका है। इनमें 542 पुरुष और 18 महिला वैज्ञानिक
हैं।
इसी वर्ष सितंबर में विख्यात अंतरिक्ष
वैज्ञानिक प्रो. सतीश धवन का जन्मशती वर्ष मनाया गया। इसरो ने विभिन्न कार्यक्रम
आयोजित किए और अंतरिक्ष में उनके असाधारण योगदान का स्मरण किया। प्रोफेसर धवन का
जन्म 25 सितंबर 1920 को हुआ था। प्रोफेसर धवन 1972 में इसरो के अध्यक्ष बने थे।
इसी वर्ष सर पैट्रिक गेडेस द्वारा भारतीय
वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बसु पर लिखी किताब के सौ साल पूरे हुए।
विदा हो चुके वर्ष में कोरोनावायरस पर बनाए
गए विज्ञान कॉर्टूनों पर केंद्रित किताब बाय बाय कोरोना प्रकाशित हुई।
पुस्तक के लेखक जाने-माने वैज्ञानिक और सांइटूनिस्ट डॉ. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
हैं। यह विश्व की विज्ञान कॉर्टूनों पर प्रकाशित अपनी तरह की पहली किताब है।
दिसंबर में भारत उन चुनिंदा देशों में
शामिल हो गया, जहां चालकरहित मेट्रो ट्रेनों का संचालन हो रहा है। देश में
इसकी शुरुआत दिल्ली से हुई। चालकरहित मेट्रो की यात्रा कम्युनिकेशन बेस्ड ट्रेन
कंट्रोल सिग्नलिंग सिस्टम पर आधारित है। बीते साल देश में ही तैयार ज़मीन से हवा
में प्रहार करने वाली आकाश मिसाइल के निर्यात का मार्ग प्रशस्त हो गया। आकाश
मिसाइल लड़ाकू विमानों, क्रूज़ मिसाइलों और ड्रोन पर सटीक निशाना लगा सकती है।
26 जनवरी 2020 को रोटावायरस वैक्सीन के
खोजकर्ता और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व सचिव डॉ. एम.के. भान का निधन हो गया।
13 फरवरी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राजेंद्र कुमार पचौरी
नहीं रहे। उनके नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी पैनल ने जलवायु
परिवर्तन पर 2007 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया था। श्री पचौरी आईपीसीसी के
अध्यक्ष और टेरी के महानिदेशक रहे। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़े
संस्थानों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 2001 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया
था।
18 अप्रैल 2020 को जाने-माने कृषि विज्ञानी
और आनुवंशिकीविद प्रो. वी. एल. चोपड़ा का 83 वर्ष की आयु में देहांत हो गया।
उन्होंने भारत में गेहूं की पैदावार बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक योगदान किया।
उन्हें कृषि के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए प्रतिष्ठित बोरलाग अवॉर्ड और 1985
में पद्मभूषण से अलंकृत किया गया था। वे योजना आयोग के सदस्य रहे। उन्होंने भारतीय
कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक पद को सुशोभित किया।
इस वर्ष 15 मई को प्रसिद्ध भौतिकीविद डॉ.
एस. के. जोशी का निधन हो गया। उन्हें भौतिकी में विशेष योगदान के लिए प्रतिष्ठित
शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार मिला था।
22 जून 2020 को कोलकाता में अमलेंदु
बंद्योपाध्याय का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने खगोल विज्ञान को आम
लोगों में लोकप्रिय बनाने में विशेष योगदान दिया था। उन्होंने आठ किताबें और लगभग
2500 लेख लिखे। उन्हें विज्ञान संचार में विशेष योगदान के लिए राष्ट्रीय विज्ञान
एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था।
विख्यात गणितज्ञ सी. एस. शेषाद्रि का 17
जुलाई को 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें ‘शेषाद्रि कांस्टेंट’ के लिए
अत्यधिक ख्याति मिली। उन्हें पद्मभूषण और शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित
किया गया था। इसी साल हमने प्रसिद्ध रेडियो खगोलविद प्रो. गोविन्द स्वरूप को खो
दिया। सितंबर में विख्यात परमाणु वैज्ञानिक और परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक डॉ.
शेखर बसु का निधन हो गया।
इसी वर्ष 7 सितंबर को जाने-माने वैज्ञानिक
डॉ. नरेन्द्र सहगल का निधन हो गया। उन्हें विज्ञान संचार के क्षेत्र में विशेष
योगदान के लिए अंतर्राष्ट्रीय कलिंग पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने
भारत में विज्ञान संचार की गतिविधियों के विस्तार में अहम भूमिका निभाई थी। डॉ.
सहगल राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद और विज्ञान प्रसार के
संस्थापक निदेशक थे।
इसी वर्ष 14 दिसंबर को प्रसिद्ध एयरोस्पेस
वैज्ञानिक आर. नरसिंहा का देहांत हो गया। उन्होंने लाइट कॉम्बैट एयरक्रॉफ्ट (एलसीए)
और तेजस की डिज़ाइन एवं विकास में अहम भूमिका निभाई थी। प्रो. नरसिंहा को पद्मभूषण
से सम्मानित किया गया था।
विज्ञान जगत की अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं के संपादक मंडल ने इस बार बीते साल को यादगार बनाने वाले व्यक्तियों और अनुसंधान कथाओं का चयन कर एक सूची बनाई है, जिसमें कोविड-19 के टीकों के अनुसंधान और विकास को शामिल किया गया है। हमारे देश के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टीवल में अपने संबोधन के दौरान विदा हो चुके साल 2020 को ‘विज्ञान वर्ष’ की संज्ञा दी है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.technologyforyou.org/wp-content/uploads/2020/04/covid-updates1.jpg
मशीनों की खासियत है कि उन्हें हम मनुष्यों (और अन्य
प्राणियों) की तरह सोने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन कैसा हो यदि आपका फ्रिज, कार
या अन्य कोई उपकरण कुछ देर की नींद चाहे। ऐसा हो भी सकता है यदि इन उपकरणों में
बिल्कुल मानव मस्तिष्क के समान कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस) हो। लॉस
अलामोस नेशनल लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को भी
ठीक से काम करते रहने के लिए थोड़ी नींद की ज़रूरत होती है।
इस ज़रूरत का पता शोधकर्ताओं को तब चला जब
वे एक ऐसा न्यूरल नेटवर्क तैयार कर रहे थे जो बिल्कुल जीवित मस्तिष्क की तरह काम
करता हो। वे न्यूरल नेटवर्क को मनुष्यों और अन्य जीवों की तरह सीखने के लिए तैयार
कर रहे थे, जिसमें उन्होंने नेटवर्क को बगैर किसी पूर्व डैटा या
प्रशिक्षण के वस्तुओं को वर्गीकृत करने के लिए तैयार किया। ठीक वैसे ही जैसे यदि
कोई किसी छोटे बच्चे को कुछ जानवरों की तस्वीरें देकर समूह बनाने कहे तो वह बना
देगा हालांकि वह उनके नाम नहीं जानता। बच्चा हिरण जैसे जानवरों की तस्वीर हिरण के
साथ रखेगा, शेर या पेंगुइन के साथ नहीं।
शोधकर्ताओं ने देखा कि लगातार इस तरह का
वर्गीकरण करते रहने से नेटवर्क अस्थिर हो गया था। नेटवर्क की हालत लगभग मतिभ्रम की
समस्या जैसी हो गई थी जिसमें वह बहुत सारी छवियां बनाए जा रहा था। शुरुआत में
शोधकर्ताओं ने नेटवर्क को स्थिर करने के विभिन्न प्रयास किए। उन्होंने नेटवर्क को
कई तरह के संख्यात्मक शोर का अनुभव कराया जो कुछ वैसा था जैसा रेडियो की चैनल
बदलते वक्त बीच में खर-खर की आवाज़ होती है। थक-हार कर शोधकर्ताओं ने जब नेटवर्क को
उन तरंगों का अनुभव कराया जो बिल्कुल वैसी ही थीं जैसे नींद के वक्त हमारा
मस्तिष्क अनुभव करता है तो नेटवर्क स्थिर हो गया। उन्हें सबसे अच्छा परिणाम तब
मिला जब इस शोर में विभिन्न आवृत्तियों और आयाम की तरंगे थीं। न्यूरल नेटवर्क के
लिए यह अनुभव वैसा ही था जैसे उसे एक अच्छी और लंबी नींद दी गई हो। इन परिणामों से
लगता है कि कृत्रिम और प्राकृतिक बुद्धि, दोनों में गहरी नींद यह सुनिश्चित करने का
कार्य करती है कि न्यूरॉन्स अस्थिर ना हों और मतिभ्रम की स्थिति ना बनें।
वैसे,
सभी तरह के
आर्टिफिशियल नेटवर्क को नींद की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह ज़रूरत सिर्फ उन नेटवर्क को
पड़ती है जिन्हें वास्तविक मस्तिष्क की तरह प्रशिक्षित किया जा रहा हो, या
नेटवर्क खुद से कोई वास्तविक प्रणाली को सीख रहा हो। मशीन लर्निंग, डीप
लर्निंग और एआई को इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि ये मूलत: गणितीय संक्रियाओं पर
निर्भर होते हैं।
न्यूरल नेटवर्क में नींद की अवस्था
पारंपरिक कंप्यूटर के ‘स्लीप मोड’ से अलग है। कंप्यूटर के स्लीप मोड में जाने पर
उसमें कुछ समय के लिए गतिविधियां रुक जाती हैं। आईटी एक्सपर्ट हमेशा से सलाह देते
रहे हैं कि यदि आपका कंप्यूटर नखरे करने लगे तो उसे बंद करके फिर से चालू कीजिए।
लेकिन अस्थिर न्यूरल नेटवर्क में इस तरह का
‘स्लीप मोड’ कोई मदद नहीं कर सकता। और नेटवर्क को बंद करके वापिस चालू करना बात और
बिगाड़ सकता है, बिजली की सप्लाई बंद करने से नेटवर्क रीसेट हो जाएगा और
सारे पूर्व प्रशिक्षण को भुला देगा। न्यूरल नेटवर्क और प्राणियों की नींद का मतलब
पूरी तरह निष्क्रिय होना नहीं है बल्कि इनमें नींद एक अलग तरह की अवस्था है जो
न्यूरॉन्स को सुचारु रूप से काम करते रहने में मदद करती है।
अब शोधकर्ता नेटवर्क को कृत्रिम नींद देने के फायदों की पड़ताल रहे हैं। इसका एक लाभ उन्होंने पाया कि अक्सर ऐसा होता है कि सिमुलेशन शुरू करने पर कुछेक न्यूरॉन्स अपना कार्य नहीं करते, कृत्रिम नींद देने पर नेटवर्क के वे न्यूरॉन्स भी कार्यशील हो गए थे। जैसे-जैसे शोधकर्ता बिल्कुल जीवित तंत्रों जैसा न्यूरल नेटवर्क बनाते जा रहे हैं, इसमें आश्चर्य नहीं कि उन्हें भी नींद की ज़रूरत पड़ती है। उम्मीद है कि परिष्कृत न्यूरल नेटवर्क हमें हमारी नींद और अन्य प्रणालियों को और भी बेहतर समझने में मदद करेंगे।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://live.staticflickr.com/65535/50694445983_e8be6800c4_o.jpg
वैसे तो हमारा मस्तिष्क काफी शोर भरे माहौल में भी किसी एक
आवाज़ पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, और उसे ठीक-ठीक सुन सकता है। लेकिन जब
हमारे आसपास शोर ही शोर हो, या वृद्धावस्था हो,
तो किसी एक आवाज़ को
ठीक से सुन पाना मुश्किल हो जाता है। अब शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग की मदद से
इसका समाधान ढूंढ लिया है जिसे उन्होंने कोन ऑफ साइलेंस (खामोश शंकु) नाम दिया है।
कंप्यूटर विज्ञानियों ने मानव मस्तिष्क के
समान संरचना वाले न्यूरल नेटवर्क को एक कमरे में कई लोगों द्वारा बोली जा रही
आवाज़ों का स्रोत पता लगाने और उन आवाज़ों को अलग-अलग करने के लिए प्रशिक्षित किया।
नेटवर्क ने यह इस आधार पर सीखा किकमरे के बीचों-बीच रखे गए कुछ माइक्रोफोन से कोई
आवाज़ कितनी देर बाद टकराती है।
इस तरह प्रशिक्षित नेटवर्क को जब
शोघकर्ताओं ने अत्यधिक शोर भरे माहौल में जांचा तो पाया गया कि नेटवर्क ने 3.7
डिग्री कोण वाले शंकुनुमा दायरे के भीतर आने वाली सिर्फ दो ही आवाज़ो को चिंहित
किया और उन्हें ही सुनाना जारी रखा। इस तरह बाकी आवाज़ें बहुत मंद पड़ गर्इं, और
वांछित आवाज़ ठीक से सुनाई पड़ी। शोधकर्ताओं द्वारा ये नतीजे न्यूरल इंफॉरमेशन
प्रोसेसिंग सिस्टम पर हुए एक सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए हैं।
भविष्य में इस तकनीक की श्रवण यंत्र, निरीक्षण प्रणाली, स्पीकरफोन, या लैपटॉप में उपयोग की जाने की संभावना है। यह तकनीक चलती-फिरती आवाज़ें भी पहचान कर उन्हें अलग कर सकती है, अत: यह पार्श्व में हो रहे शोर जैसे बाहर की आवाज़ें, बच्चों की आवाज़ें या अन्य शोर-शराबे को भी हटाकर सिर्फ वक्ता की आवाज़ सुना सकता है। इस तरह इसकी मदद से ज़ूम कॉल बेहतर किए सकते हैं। बहरहाल इस तकनीक को बाज़ार तक पहुंचने में अभी काफी पड़ाव पार करने बाकी हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/listen_1280p.jpg?itok=uPSfILuw
जापान एक बार फिर एक क्षुद्रग्रह के नमूने पृथ्वी पर लाने में
सफल रहा है। इन नमूनों पर वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी पर पानी और कार्बनिक अणुओं के
प्राचीन वितरण के सुरागों की छानबीन की जाएगी। हयाबुसा-2 का कैप्सूल रयूगू
क्षुद्रग्रह का लगभग 5.3 अरब किलोमीटर का फासला तय करके 6 दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया
के वूमेरा रेगिस्तान में पैराशूट से उतारा गया। इसके बाद एक हेलीकॉप्टर की मदद से
कैप्सूल को सुरक्षित जापान ले जाया गया।
गौरतलब है कि हयाबुसा-2 को जापान एयरोस्पेस
एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जाक्सा) द्वारा 2014 में प्रक्षेपित किया गया था। इसने 18
महीनों तक रयूगू का चक्कर लगते हुए दूर से अवलोकन किया। इस दौरान डैटा एकत्र करने
के लिए क्षुद्रग्रह पर कई छोटे रोवर भी उतारे गए। इसके अलावा सतह और सतह के नीचे
से नमूने एकत्रित करने के लिए दो बार यान क्षुद्रग्रह पर उतरा भी। इसका उद्देश्य
100 मिलीग्राम कार्बन युक्त मृदा और चट्टान के टुकड़े एकत्र करना था। नमूने की असल
मात्रा तो टोक्यो स्थित क्लीन रूम में कैप्सूल को खोलने के बाद ही पता चलेगी।
इसके पहले 2010 में हयाबुसा मिशन के तहत ही
इटोकावा क्षुद्रग्रह से सामग्री पृथ्वी पर लाई गई थी। क्षुद्रग्रहों में दिलचस्पी
का कारण उनमें उपस्थित वह पदार्थ है जो 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौर मंडल के निर्माण के
समय से मौजूद है। ग्रहों पर होने वाली प्रक्रियाओं के विपरीत यह सामग्री दबाव एवं
गर्मी के प्रभाव से परिवर्तित नहीं हुई है और अपने मूल रूप में मौजूद है।
वास्तव में रयूगू एक कार्बनमय या सी-प्रकार
का क्षुद्रग्रह है जिसमें कार्बनिक पदार्थ और हाइड्रेट्स मौजूद हैं। इन दोनों में
रासायनिक रूप से बंधा हुआ पानी काफी मात्रा में होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब
इस तरह के क्षुद्रग्रह अरबों वर्ष पहले नवनिर्मित पृथ्वी से टकराए होंगे तब इन
मूलभूत सामग्रियों से जीवन की शुरुआत हुई होगी। वैसे दूर से किए गए अवलोकनों से
संकेत मिल चुके हैं यहां पानी युक्त खनिज और कार्बनिक पदार्थ मौजूद है।
रयूगू पर पानी की मात्रा के आधार पर पता
लगाया जा सकेगा कि अरबों वर्ष पहले पृथ्वी पर क्षुद्रग्रहों से कितना पानी आया है।
नासा के अवलोकनों के अनुसार बेनू क्षुद्रग्रह पर रयूगू से अधिक मात्रा में पानी
है।
बहुत कम वैज्ञानिक क्षुद्रग्रहों के ज़रिए
पृथ्वी पर जीवन के आगमन के विचार के समर्थक हैं। अलबत्ता,
रयूगू जैसे
क्षुद्रग्रहों से उत्पन्न कार्बन युक्त उल्कापिंडों से अमीनो अम्ल और यहां तक कि
आरएनए भी उत्पन्न होने के संकेत मिले हैं। तो हो सकता है कि प्राचीन पृथ्वी पर
जीवन की उत्पत्ति जैविक-पूर्व रासायनिक क्रियाओं के कारण हुई हो। अत: रयूगू से
प्राप्त सामग्री के विश्लेषण में कई अन्य वैज्ञानिक रुचि ले रहे हैं।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में कैप्सूल को छोड़ने के बाद हयाबुसा-2 एक बार फिर 1998 केवाय-26 क्षुद्रग्रह के मिशन पर रवाना हो गया है। यान के शेष र्इंधन के आधार पर जाक्सा को उम्मीद है कि हयाबुसा अपने नए मिशन में भी सफल रहेगा। इसी बीच नासा के ओसिरिस-रेक्स मिशन के तहत सितंबर 2023 में बेनू क्षुद्रग्रह से नमूने प्राप्त होने हैं। नासा और जाक्सा अपने-अपने मिशनों से प्राप्त नमूनों की अदला-बदली पर भी सहमत हुए हैं। इकोटावा नमूनों सहित तीनों नमूनों की तुलना करने पर सौर मंडल के निर्माण सम्बंधी काफी जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं।(स्रोत फीचर्स)
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हम छूकर कई बारीक अंतर कर पाते हैं। जैसे एक सरीखे दिखने वाले कपड़ों की
क्वालिटी में फर्क। और हालिया अध्ययन बताता है कि ऐसा हम अपनी उंगलियों के सिरों
में पाए जाने वाले अशरिन नामक प्रोटीन की बदौलत कर पाते हैं। सामान्यत: अशरिन
प्रोटीन हमें देखने और सुनने में मदद करता है। और अब पता चला है कि यह स्पर्श में
भी सहायक हैं। इससे लगता है कि हमारी प्रमुख इंद्रियों के बीच एक गहरा आणविक
सम्बंध है।
देखा गया है कि अशरिन प्रोटीन को कूटबद्ध
करने वाले जीन, USH2A, में उत्परिवर्तन
हो जाए तो अशर सिंड्रोम होता है। अशर सिंड्रोम एक बिरली आनुवंशिक बीमारी है जिसमें
अंधापन, बहरापन और उंगलियों में हल्का कंपन्न भी महसूस ना कर पाने
की समस्या होती है। इसलिए वैज्ञानिकों को इस बारे में अंदाज़ा तो था कि स्पर्श के
एहसास के लिए अशरिन प्रोटीन महत्वपूर्ण है।
मैक्स डेलब्रुक सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर
मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक गैरी लेविन और उनकी टीम ने स्पर्श में अशरिन की
भूमिका को विस्तार से समझने के लिए अशर सिंड्रोम से पीड़ित 13 ऐसे मरीज़ों का अध्ययन
किया जिनमें विशेष रूप से स्पर्श अनुभूति प्रभावित थी। इन मरीज़ों में उन्होंने
तापमान में अंतर कर पाने, दर्द,
और 10 हर्ट्ज़ व 125
हर्ट्ज़ के कंपन को महसूस करने की क्षमता जांची। यह कंपन लगभग वैसा ही उद्दीपन है
जो उंगली को किसी खुरदरी सतह पर फिराते वक्त मिलता है। इन परिणामों की तुलना
उन्होंने 65 स्वस्थ लोगों के परिणामों से की।
टीम ने पाया कि तापमान और हल्के दर्द के
प्रति तो दोनों समूहों के लोगों ने एक जैसी प्रतिक्रिया दी। लेकिन अशर सिंड्रोम से
पीड़ित लोगों ने 125 हर्ट्ज़ का कंपन स्वस्थ लोगों के मुकाबले चार गुना कम महसूस
किया और 10 हर्ट्ज़ का कंपन डेढ़ गुना कम महसूस किया।
इसका कारण जानने के लिए शोधकर्ताओं ने यही
प्रयोग चूहों पर दोहराया। नेचर न्यूरोसाइंस में शोधकर्ता बताते हैं कि
मनुष्यों की तरह दोनों समूहों के चूहे, USH2A जीन वाले और USH2A जीन रहित चूहे, तापमान परिवर्तन और दर्द का एहसास तो ठीक से कर पा रहे थे।
लेकिन जीन-रहित चूहों की तुलना में जीन-सहित चूहे कंपन की संवेदना के मामले में
बेहतर थे।
सामान्यत: अशरिन प्रोटीन देखने और सुनने के
लिए ज़िम्मेदार तंत्रिका कोशिकाओं में पाया जाता है। लेकिन पाया गया कि चूहों और
मनुष्यों में यह माइस्नर कॉर्पसकल में भी मौजूद होता है। माइस्नर कॉर्पसकल सूक्ष्म
और अंडाकार कैप्सूल जैसी रचना है जो उंगलियों की तंत्रिका कोशिकाओं को चारों ओर से
घेरकर उन्हेंे सुरक्षित रखती है व सहारा देती है। यह खोज एक मायने में बहुत
महत्वपूर्ण है। आम तौर पर माना जाता है कि तंत्रिकाएं अकेले ही संदेशों को प्रेषित
करती हैं। लेकिन माइस्नर कार्पसकल में पाए जाने वाले प्रोटीन की संदेश-प्रेषण में
भूमिका दर्शाती है कि तंत्रिका के बाहर उपस्थित अणु भी संदेशों के प्रेषण में कुछ
भूमिका निभाते हैं।
शोधकर्ता आगे यह जानना चाहते हैं कि ठीक किस तरह USH2A प्रोटीन कंपन का एहसास करने में मदद करता है। जीन और प्रोटीन दोनों पर गहन अध्ययन कर यह बेहतर समझा जा सकता है कि हमारी पकड़ बनाने की क्षमता कैसे बढ़ाई और नियंत्रित की जा सकती है।(स्रोत फीचर्स)
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यह
काफी हैरत की बात है कि जब आप किसी मीठे खाद्य पदार्थ में नमक डालते हैं तो उसकी
मिठास और बढ़ जाती है। और अब हाल ही में वैज्ञानिकों ने मिठास में इस वृद्धि का
कारण खोज निकाला है।
भोजन
के स्वाद की पहचान हमारी जीभ की स्वाद-कलिकाओं में उपस्थित ग्राही कोशिकाओं से होती है। इनमें टी1आर समूह के ग्राही
दोनों प्रकार के मीठे, प्राकृतिक या
कृत्रिम शर्करा, के प्रति संवेदनशील
होते हैं। शुरू में वैज्ञानिकों का मानना था कि टी1आर को निष्क्रिय कर दिया जाए तो मीठे के
प्रति संवेदना खत्म हो जाएगी। लेकिन 2003 में देखा गया कि चूहों में टी1आर के जीन को ठप करने पर भी उनमें ग्लूकोज़
के प्रति संवेदना में कोई कमी नहीं आई। इस खोज से पता चला कि चूहों और संभवत: मनुष्यों में मिठास
की संवेदना का कोई अन्य रास्ता भी है।
इस
मीठे रास्ते का पता लगाने के लिए टोकियो डेंटल जूनियर कॉलेज के कीको यासुमत्सु और
उनके सहयोगियों ने सोडियम-ग्लूकोज़
कोट्रांसपोर्टर-1 (एसजीएलटी1) नामक प्रोटीन पर
ध्यान दिया। एसजीएलटी1 शरीर
के अन्य हिस्सों में ग्लूकोज़ के साथ काम करता है। गुर्दों और आंत में, एसजीएलटी1 ग्लूकोज़ को कोशिकाओं तक पहुंचाने के लिए
सोडियम का उपयोग करता है। यह काफी दिलचस्प है कि यही प्रोटीन मीठे के प्रति
संवेदनशील स्वाद-कोशिकाओं
में भी पाया जाता है।
इसके
बाद शोधकर्ताओं ने स्वाद कोशिकाओं से जुड़ी तंत्रिकाओं की प्रक्रिया का पता लगाने
के लिए ग्लूकोज़ और नमक के घोल को बेहोश टी1आर-युक्त चूहों की जीभ पर रगड़ा। यानी इस घोल
में एसजीएलटी1 की
क्रिया के लिए ज़रूरी सोडियम था। पता चला कि नमक की उपस्थिति होने से चूहों की
तंत्रिकाओं ने अधिक तेज़ी से संकेत प्रेषित किए बजाय उन चूहों के जिनके टी1आर ग्राही ठप कर दिए
गए थे और सिर्फ ग्लूकोज़ दिया गया था। गौरतलब है कि सामान्य चूहों ने भी चीनी-नमक को ज़्यादा तरजीह
दी लेकिन ऐसा केवल ग्लूकोज़ के साथ ही हुआ,
सैकरीन जैसी कृत्रिम मिठास के साथ नहीं।
यह
भी पता चला है कि जो पदार्थ एसजीएलटी1 की क्रिया को बाधित करते हैं,
वे टी1आर विहीन चूहों में ग्लूकोज़ संवेदना को खत्म कर देते हैं।
इससे यह पता लगता है कि एसजीएलटी1 ग्लूकोज़ की छिपी हुई संवेदना का कारण हो सकता है। संभावना
है कि इससे टी1आर
विहीन चूहों में ग्लूकोज़ की संवेदना बनी रही और सामान्य चूहों में मीठे के प्रति
संवेदना और बढ़ गई। एक्टा फिज़ियोलॉजिका में शोधकर्ताओं ने संभावना व्यक्त की
है कि शायद यह निष्कर्ष मनुष्यों के लिए भी सही है।
शोधकर्ताओं ने मीठे के प्रति संवेदनशील तीन प्रकार की कोशिकाओं के बारे में बताया है। पहली दो या तो टी1आर या एसजीएलटी1 का उपयोग करती हैं जो शरीर को प्राकृतिक और कृत्रिम शर्करा में अंतर करने में मदद करते हैं। एक अंतिम प्रकार टी1आर और एसजीएलटी1 दोनों का उपयोग करती हैं और वसीय अम्ल तथा उमामी स्वादों को पकड़ती हैं। लगता है, इनकी सहायता से कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थों का पता चलता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/salt_1280p.jpg?itok=KMVjR1sp