दुनिया
भर में प्लास्टिक रिसाइक्लिंग एक बड़ी समस्या है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित
शोध के मुताबिक इस समस्या के समाधान में शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक ऐसा एंज़ाइम
तैयार किया है जो प्लास्टिक को 90 प्रतिशत तक रिसाइकल कर सकता है।
पॉलीएथिलीन
टेरेथेलेट (PET) दुनिया में सर्वाधिक
इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक है। इसका सालाना उत्पादन लगभग 7 करोड़ टन है। वैसे तो अभी भी PET का पुनर्चक्रण किया जाता है लेकिन इसमें समस्या यह है कि
पुनर्चक्रण के लिए कई रंग के प्लास्टिक जमा होते हैं। जब इनका पुनर्चक्रण किया
जाता है तो अंत में भूरे या काले रंग का प्लास्टिक मिलता है। यह पेकेजिंग के लिए आकर्षक
नहीं होता इसलिए इसे या तो चादर के रूप में या अन्य निम्न-श्रेणी के फाइबर प्लास्टिक में बदल दिया
जाता है। और अंतत: इसे
या तो जला दिया जाता है या लैंडफिल में फेंक दिया जाता है जिसे पुनर्चक्रण तो नहीं
कहा जा सकता।
इसी
समस्या के समाधान में वैज्ञानिक एक ऐसे एंज़ाइम की खोज में थे जो PET और अन्य प्लास्टिक का पुनर्चक्रण कर सके। 2012 में ओसाका विश्वविद्यालय
के शोधकर्ताओं को कम्पोस्ट के ढेर में LLC
नामक एक एंज़ाइम मिला था जो PET के
दो बिल्डिंग ब्लॉक, टेरेथेलेट और एथिलीन
ग्लायकॉल, के बीच के बंध को
तोड़ सकता है। प्रकृति में इस एंज़ाइम का काम है कि यह कई पत्तियों पर मौजूद मोमी
आवरण का विघटन करता है। LLC सिर्फ पीईटी बंधों को तोड़ सकता है और वह
भी धीमी गति से। लेकिन यदि तापमान 65 डिग्री सेल्सियस हो तो कुछ समय काम करने के बाद यह नष्ट हो
जाता है। इसी तापमान पर तो PET नरम होना शुरू होता है और तभी एंज़ाइम
आसानी से प्लास्टिक के बंध तक पहुंचकर उन्हें तोड़ सकेगा।
हालिया
शोध में प्लास्टिक कंपनी कारबायोस के एलैन मार्टी और उनके साथियों ने इस एंज़ाइम
में कुछ फेरबदल किए। उन्होंने उन अमिनो अम्लों का पता किया जिनकी मदद से यह एंज़ाइम
टेरेथेलेट और एथिलीन ग्लाइकॉल समूहों के रासायनिक बंध से जुड़ता है। उन्होंने इस
एंज़ाइम को उच्च तापमान पर काम करवाने के तरीके भी खोजे।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने ऐसे सैकड़ों परिवर्तित एंज़ाइम्स की मदद से PET प्लास्टिक का पुनर्चक्रण करके देखा। कई प्रयास के बाद उन्हें एक ऐसा परिवर्तित एंज़ाइम मिला जो मूल LLC की तुलना में 10,000 गुना अधिक कुशलता से PET बंध तोड़ सकता है। यह एंज़ाइम 72 डिग्री सेल्सियस पर भी काम करता है। प्रायोगिक तौर पर इस एंज़ाइम ने 10 घंटों में 90 प्रतिशत 200 ग्राम PET का पुनर्चक्रण किया। इस प्रक्रिया से प्राप्त टेरेथेलेट और एथिलीन ग्लायकॉल से PET और प्लास्टिक बोतल तैयार किए गए जो नए प्लास्टिक जितने मज़बूत थे। हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है कि यह आर्थिक दृष्टि से कितना वहनीय होगा लेकिन इसकी खासियत यह है कि इससे जो प्लास्टिक मिलता है वह नए जैसा टिकाऊ और आकर्षक होता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images.fastcompany.net/image/upload/w_937,ar_16:9,c_fill,g_auto,f_auto,q_auto,fl_lossy/wp-cms/uploads/2019/10/p-1-90412215-hitachi-wants-to-use-a-plastic-eating-enzyme-to-clean-up-plastic-pollution-1.jpg
कोविड-19 के लिए दो मलेरिया
रोधी दवाओं, क्लोरोक्वीन और
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, के उपयोग को लेकर
काफी राजनैतिक बहस हो रही है। राजनेताओं के दावों के परिणामस्वरूप,
फ्रांसीसी चिकित्सकों पर कोविड-19 के गंभीर रोगियों पर
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का उपयोग करने का दबाव बनाया जा रहा है। 4.6 लाख लोग एक याचिका
पर हस्ताक्षर भी कर चुके हैं कि इसे व्यापक रूप से उपलब्ध करवाया जाए। इसकी वकालत
की अगुआई करने वाले डिडिएर राउल्ट एक विवादास्पद और राजनीति से जुड़े सूक्ष्मजीव
विज्ञानी हैं।
हाल
ही में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से राउल्ट की मुलाकात ने मामले को
हवा दी है। फ्रांसीसी जनमत संग्रह संस्थान के अनुसार फ्रांस की 59 प्रतिशत जनता
क्लोरोक्वीन को कोरोनावायरस के खिलाफ प्रभावी मानती है। यहां तक कि मैक्रों की
आर्थिक नीति का विरोध करने वाले समूह ‘येलो वेस्ट’ के 80 प्रतिशत लोग भी इसके समर्थन में हैं।
फ्रांस
के कई चिकित्सकों और विशेषज्ञों द्वारा इस दवा को नुस्खे में न लिखने पर निरंतर
धमकियां मिल रही हैं और इसे हासिल करने के लिए झूठी डॉक्टरी दवा पर्चियों का भी
उपयोग किया जा रहा है।
जहां
तक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सवाल है, कोविड-19 के खिलाफ इसकी
प्रभाविता के कई अध्ययनों ने नकारात्मक या अस्पष्ट परिणाम दिए हैं। इसके सेवन से
ह्मदय गति में गड़बड़ सहित कई अन्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं। राउल्ट के अध्ययनों में
सकारात्मक परिणामों को लेकर उनके अध्ययनों की सीमाओं और पद्धति सम्बंधी समस्याओं
की व्यापक रूप से आलोचना की जा रही है। इसमें उन्होंने केवल 42 रोगियों को शामिल किया और उसमें से भी
उन्होंने खुद चुना कि किसको दवा देनी है किसका प्लेसिबो से काम चलाना है। ऐसे
अध्ययन का नैदानिक शोध में कोई महत्व नहीं है। इंटरनेशनल सोसायटी फॉर माइक्रोबियल
कीमोथेरपी की शोध पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स में
प्रकशित इस पेपर से स्वयं सोसायटी ने असहमति जताई है। उनका दूसरा पेपर बिना समकक्ष
समीक्षा के प्रकाशित हुआ था।
राउल्ट
के अनुसार अस्पताल में सभी कोविड-19 रोगियों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एज़िथ्रोमाइसिन का
मिश्रण दिया गया और मृत्यु दर में काफी कमी आई थी।
ऐसे
में यह बात तो तय है कि राउल्ट को अपने राजनीतिक सम्बंधों से काफी फायदा मिला है।
फ्रांस के पूर्व उद्योग मंत्री ने भी एक टीवी साक्षात्कार में राउल्ट का समर्थन
किया है। इसके अलवा उनको चिकित्सा जगत में भी उच्च-स्तरीय समर्थन मिला है। उनके द्वारा चलाई
गई ऑनलाइन याचिका में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों,
चिकित्सा अकादमियों के प्रमुख चिकित्सकों और यहां तक कि
फ्रांस के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के हस्ताक्षर भी शामिल हैं।
लेकिन फ्रांस के कई वैज्ञानिक इस हानिकारक दवा की प्रभाविता के अल्प प्रमाण के बावजूद उपयोग को लेकर चिंतित हैं। 7 युरोपीय देशों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और कई अन्य उपचारों की प्रभाविता का अध्ययन करने के लिए एक रैंडम परीक्षण शुरू किया गया है। पेरिस स्थित सेंट लुइस अस्पताल में संक्रामक रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष बर्गमन के अनुसार इस परीक्षण के लिए उनको लोग नहीं मिल रहे हैं चूंकि वे हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के अलावा कोई और उपचार लेना ही नहीं चाहते। बर्गमन का मानना है कि यह ‘चिकित्सा भीड़तंत्र’ है जो सत्य की खोज को मुश्किल कर रहा है।(स्रोत फीचर्स)
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रोज़ाना
हमें कोविड-19 के
बारे में कुछ ना कुछ पता चलता रहता है: यह कितनी आसानी से लोगों को संक्रमित कर रहा है और व्यक्ति
से व्यक्ति में फैल रहा है, और कैसे वैज्ञानिकों
और चिकित्सा विशेषज्ञों ने इसके प्रसार के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। हम यह भी सुनते
हैं कि कैसे यह बैक्टीरिया से अलग है और क्यों एंटीबायोटिक दवाइयां इसका सफाया करने
में कारगर नहीं हो सकतीं।
आखिर
वायरस और बैक्टीरिया में अंतर क्या है? बैक्टीरिया
सजीव होता है। हर बैक्टीरिया कोशिका में पुनर्जनन करने की प्रणाली होती है। यदि आप
एक बैक्टीरिया कोशिका को लें और उसे पोषक तत्वों से युक्त घोल में डालें तो यह
उसमें स्वयं वृद्धि कर सकता है, और विभाजित होकर
अपनी संख्या वृद्धि कर सकता है। कोशिकाओं में मौजूद जीन (जीनोम, जो
डीएनए अणुओं से बना होता है और जिसमें निहित जानकारी संदेशवाहक अणु आरएनए के लिए
एक संदेश के रूप में लिखी होती है) में निहित संदेश प्रोटीन नामक कार्यकारी अणु में परिवर्तित
हो जाता है जो बैक्टीरिया को पनपने और संख्या वृद्धि करने में मदद करता है।
कोरोनावायरस में डीएनए नहीं होता लेकिन आरएनए होता है;
दूसरे शब्दों में कहें तो वे केवल संदेश पढ़ सकते हैं,
संदेश लिख नहीं सकते। इसलिए ये ‘मृतप्राय’ होते हैं जो स्वयं वृद्धि और पुनर्जनन नहीं
कर सकते, इसके लिए उन्हें
सहायता की दरकार होती है। यह सहायता वे ‘मेज़बान कोशिकाओं’ को संक्रमित करके लेते हैं और लाखों की
संख्या में वृद्धि करते हैं। बिना सहायक मेज़बान कोशिका के वायरस एक बेकार वस्तु के
समान है।
पॉलीप्रोटीन
रणनीति
संक्रमण
होने पर इस आरएनए की 33,000
क्षारों की शृंखला अमीनो अम्लों की एक लंबी शृंखला में
तब्दील हो जाती है। चूंकि इस लंबी शृंखला में कई प्रोटीन होते हैं इसलिए इसे ‘पॉलीप्रोटीन’ अनुक्रम कहा जाता
है। तो हमें इस पूरी पॉलीप्रोटीन शृंखला का विश्लेषण करना होता है,
संक्रमण के लिए ज़िम्मेदार प्रोटीन पता करना होता है,
उसे अलग करना होता है और संक्रमण में इन प्रोटीन की भूमिका
पता करना होता है। (वैज्ञानिक
पॉलीप्रोटीन को सिंगल रीडिंग फ्रेम कहते हैं जिसमें कई ओपन रीडिंग फ्रेम होते हैं।
ये फ्रेम एक स्टार्ट कोड के साथ शुरु और एक स्टॉप कोड के साथ समाप्त होते हैं। और
इनमें से प्रत्येक में वह प्रोटीन होता है जिसे मेज़बान कोशिका द्वारा व्यक्त किया
जाना है)।
यह युक्ति वायरल जीनोम को सघन रखती है और आवश्यकता पड़ने पर ही प्रोटीन व्यक्त करती
है। यह कुछ हद तक उस किफायती व्यक्ति की तरह है जो बैंक में अपना पैसा फिक्स्ड
डिपॉज़िट करके रखता है और वक्त पर ज़रूरत के हिसाब से पैसा निकालता है। वायरस की
ज़रूरत मेज़बान को संक्रमित करके अपनी संख्या बढ़ाने की है। यदि कोई ज़रूरत नहीं,
तो कुछ खर्च नहीं, तो
कोई संक्रमण नहीं, और संख्या में
वृद्धि नहीं!
यू
चेन और उनके साथी जर्नल ऑफ मेडिकल वायरोलॉजी में प्रकाशित अपनी हालिया
समीक्षा में बताते हैं कि कोविड-19 की पॉलीप्रोटीन शृंखला में आरएनए-आधारित जीनोम और उप-जीनोम होते हैं,
जो स्पाइक प्रोटीन (S),
झिल्ली प्रोटीन (M),
आवरण प्रोटीन (E) और
न्यूक्लियोकैप्सिड प्रोटीन (N, जो वायरस की कोशिका
के केन्द्रक की सामग्री का आवरण होता है) के लिए कोड करते हैं। ये सभी प्रोटीन वायरस
के निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं। इसके अलावा, खास
संरचना के लिए ज़िम्मेदार प्रोटीन और अतिरिक्त सहायक प्रोटीन भी होते हैं जिन्हें
गैर-निर्माणकारी
प्रोटीन (NSP) कहा
जाता है। इनमें से 16 प्रोटीन
वायरस के संक्रमण और वृद्धि में मदद करते हैं।
इस
तरह हमारे पास वायरस के प्रोटीन्स की एक खासी तादाद उपलब्ध है,
जिनके निर्माण को बाधित करने या रोकने के लिए हम कई संभावित
अणुओं और दवाइयों का परीक्षण कर सकते है। वास्तव में,
पिछले महीने प्रकाशित हुए कई अध्ययनों में ऐसा ही करने की
कोशिश की गई है।
इनमें
से एक अध्ययन में वायरस के प्रमुख एंज़ाइम RDRp के निर्माण को
लक्ष्य करने का प्रयास किया था, जिसका निर्माण रेमेडेसेविर
दवा द्वारा रोका गया था। अमेरिका, जर्मनी और चीन के
तीन अध्ययनों में वायरस के स्पाइक (S) प्रोटीन
को बनाने वाले एंज़ाइम (जिसे
3CLpro या
Mpro
कहा जाता है) का
निर्माण रोकने के तरीकों का विवरण है। और यू चेन ने उपरोक्त पेपर में वायरस के
पॉलीप्रोटीन के 16 से
अधिक गैर-निर्माणकारी
प्रोटीन (NSP) सूचीबद्ध
किए हैं, जिनका निर्माण
संभावित दवाइयों द्वारा रोका जा सकता है। (बोस्टन के डॉ. पांडुरंगाराव का मत है कि इनमें से भी
एंज़ाइम NSP12 एक
महत्वपूर्ण व लाभदायक लक्ष्य होगा)।
इस
संदर्भ में यहां भारतीय शोधकर्ता तनीगैमलाई पिल्लैयार के काम का उल्लेख महत्वपूर्ण
होगा। पिल्लैयार 2013 से
जर्मनी स्थित युनिवर्सिटी ऑफ बॉन में औषधी रसायनज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। साल 2016 में जर्नल ऑफ
मेडिसिनल केमिस्ट्री में प्रकाशित शोध पत्र में उन्होंने SARS-CoV के
मुख्य एंज़ाइम कीमोट्रिप्सीन-नुमा सिस्टीन प्रोटीएज़ (3CLpro या
Mpro) की 3-डी मॉडलिंग करके
सम्बंधित वायरस TGEV (ट्रांसमिसेबल गैस्ट्रोएंटेराइटिस वायरस) का पता लगाया और
उसके एक्स-रे
क्रिस्टल संरचना की मदद से उन्होंने पता लगाया कि यह एंज़ाइम वायरस की संरचना में
ताला-चाभी
तरीके से जुड़ता है। इस आणविक मॉडलिंग के बाद उन्होंने ऐसी दवा की पड़ताल की जो इस
बंधन को निष्क्रिय कर सके और SARS-CoV को संक्रमित करने से रोक सके। अनुमान था
कि लगभग 160 ज्ञात
दवाएं यह कार्य करने में विभिन्न दक्षता के साथ कारगर हो सकती हैं। दवाओं की यह
सूची क्रिस्टल संरचना की जानकारी के 3-4 साल पहले सुझाई गई थी, जिसे
पिल्लैयार और उनके साथियों ने जनवरी 2020 में ड्रग डिस्कवरी टुडे में प्रकाशित,
अपने हालिया शोध पत्र में अपडेट किया है।
भारत
को पिछले 90 वर्षों
से कार्बनिक और औषधीय रसायन के क्षेत्र में खासा अनुभव हासिल है। भारत
गुणवत्तापूर्ण औषधि निर्माण, और 1970 पेटेंट अधिनियम के
बाद से निर्यात में कुशलता पूर्वक कार्य कर रहा है। आज हमारी दक्षता सार्वजनिक और
निजी दोनों क्षेत्रों में न केवल ज़रूरत के मुताबिक अणुओं को संश्लेषित करने की है
बल्कि कंप्यूटर मॉडलिंग की मदद से बैक्टीरिया और वायरस के प्रोटीन को लक्ष्य करने
में, होमोलॉजी मॉडलिंग,
ड्रग डिज़ाइन, दवाओं
के नए उपयोग खोजने वगैरह में भी है।
CSIR ने इस जानलेवा वायरस का मुकाबला करने वाले रसायन और तरीकों को विकसित करने की ज़िम्मेदारी ली है, और हमें पूरी उम्मीद है कि वे निकट भविष्य में अवश्य सफल होंगे! (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.thehindu.com/sci-tech/science/xaced1/article31375821.ece/ALTERNATES/FREE_960/19TH-SCICORONAVIRUS
दुनिया
के रंगमंच पर एक वायरस इन दिनों खलनायक की भूमिका में है! SARS-CoV-2 नामक वायरस की वजह से इंसानी दुनिया के पहिए थम चुके हैं।
और
वायरस की हैसियत क्या है। पूरी तरह से सजीव की पदवी भी नहीं मिल सकी इसे। यह सजीव
व निर्जीव के बीच की दहलीज़ पर है। इस पार वह एक निर्जीव,
निस्तेज कण मात्र होता है, वहीं
किसी कोशिका में घुसपैठ कर जाए तो जी उठता है।
वायरस
एक सरल-सा
कण है जिसमें न्यूक्लिक अम्ल का मामूली-सा धागा व चारों ओर प्रोटीन का आवरण होता
है। सूक्ष्म इतना कि नग्न आंखों से दिखाई ही न दे। मिलीमीटर या सेंटीमीटर तो इसके
सामने विशाल हैं। यह महज़ कुछ नैनोमीटर (एक मिलीमीटर का दस लाखवां हिस्सा) का होता है। लेकिन
इस अति सूक्ष्म कण ने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। यह सच है कि कुछ वायरस अपने
मेज़बान के साथ रोगजनक सम्बंध रखते हैं – सर्दी-ज़ुकाम, गंभीर
श्वसन रोग से लगाकर मृत्यु शैय्या तक पहुंचा देते हैं।
वायरस
को सक्रिय होने के लिए कोई सजीव शरीर चाहिए। वायरस जैसे ही सजीव कोशिकाओं में
प्रवेश करता है, कोशिका की
कार्यप्रणाली पर अपना कब्ज़ा जमा लेता है और फिर अपने हिसाब से कोशिका को संचालित
करने लगता है। वायरस खुद अपने न्यूक्लिक अम्ल की प्रतिलिपियां बनाने लगता है।
लेकिन
सभी वायरस खलनायक नहीं होते। कई वायरस तो वाकई में उन बैक्टीरिया को अपना शिकार
बनाते हैं जिनके मारे दुनिया में महामारियां आई हैं। प्लेग,
तपेदिक, कोढ़,
टायफाइड, बैक्टीरियल
मेनिन्जाइटिस, निमोनिया इत्यादि
प्रमुख बैक्टीरिया-जनित
रोग हैं। एक ज़माना था जब इन बीमारियों की वजह से लोग जान गंवा देते थे। अब इन
बीमारियों के लिए एंटीबायोटिक दवाइयां उपलब्ध हैं।
लेकिन
पिछले कुछ वर्षों में एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर समस्याएं बढ़ी हैं। बैक्टीरिया
एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी हुए हैं। बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति
प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं। टीबी के जीवाणु बहु-औषधि प्रतिरोधी हो चुके हैं। ऐसे मरीज़ों का
इलाज करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
दुनिया
भर में चिंता व्याप्त है कि एंटीबायोटिक के खिलाफ बढ़ते प्रतिरोध के चलते कहीं हम
उस दौर में न लौट जाएं जब एंटीबायोटिक थे ही नहीं।
वायरस
की दुनिया में एक किस्म के वायरसों को बैक्टीरियोफेज (बैक्टीरिया-भक्षी) कहते हैं। दरअसल,
बैक्टीरियोफेज बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं। ये
बैक्टीरिया की कोशिका में घुस जाते हैं और उससे अपनी प्रतिलिपियां बनवाते हैं।
इसका परिणाम होता है बैक्टीरिया कोशिका की मृत्यु। ये बैक्टीरियोफेज वायरस मुक्त
हो जाते हैं और फिर से किसी बैक्टीरिया में घुसते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है।
हज़ारों
प्रकार के बैक्टीरियोफेज मौजूद हैं जिनमें से प्रत्येक प्रकार केवल एक या कुछ ही
प्रकार के बैक्टीरिया को संक्रमित कर सकता है। अन्य वायरसों के समान इनकी आकृति भी
सरल होती है। इनमें न्यूक्लिक अम्ल होता है जो कैप्सिड नामक आवरण से घिरा होता है।
बैक्टीरियोेफेज
की खोज 1915 में
फ्रेडरिक विलियम ट्वॉर्ट द्वारा चेचक का टीका बनाने की कोशिश के दौरान की गई थी।
वे दरअसल, एक प्लेट पर
वैक्सिनिया बैक्टीरिया का कल्चर करने में मुश्किल का सामना कर रहे थे क्योंकि
प्लेट में बैक्टीरिया वायरस से संक्रमित होकर मर रहे थे। ट्वॉर्ट के ये अवलोकन
प्रकाशित हुए मगर प्रथम विश्व युद्ध व वित्तीय बाधाओं के चलते वे आगे इस दिशा में
काम नहीं कर सके। 1917 में
इस काम को सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक फेलिक्स डी हेरेल ने पेरिस के पाश्चर संस्थान में
आगे बढ़ाया। उन्होंने पेचिश के रोगियों को ठीक करने के लिए ‘बैक्टीरियोफेज’ का उपयोग किया था।
पेरिस
के एक अस्पताल में चार मरीज़ शिगेला बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण पेचिश से पीड़ित
थे। इस बीमारी में खूनी दस्त, पेट में ऐंठन व
बुखार आता है। उन मरीज़ों को शिगेला बैक्टीरिया का भक्षण करने वाले बैक्टीरियोफेज
वायरस की खुराक दी गई। आश्चर्यजनक रूप से, एक
ही दिन में उन मरीज़ों में बीमारी से उबरने के संकेत मिले।
हेरेल
के निष्कर्ष प्रकाशित होने के बाद चिकित्सक रिचर्ड ब्रइनोगे और उनके छात्र मैसिन
ने एक बैक्टीरिया की वजह से होने वाले चमड़ी के रोग के उपचार में बैक्टीरियोफेज का
उपयोग किया और 48 घंटों
के भीतर ठीक होने के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किए।
1925 में हेरेल ने प्लेग-पीड़ित चार मरीज़ों का
इलाज किया। प्लेग यर्सिनिया पेस्टिस नामक बैक्टीरिया की वजह से होता है। जब
इसका भक्षण करने वाले बैक्टीरियोफेज का इंजेक्शन लगाया गया तो चारों मरीज़ स्वस्थ
हो गए।
जीवाणु
संक्रमण से उबरने की सफलता की कहानी ने मिस्र में क्वारेंटाइन बोर्ड के ब्रिटिश
प्रतिनिधि मॉरिसन का ध्यान खींचा। मॉरिसन ने हेरेल को फेज उपचार पर काम करने के
लिए जुड़ने का अनुरोध किया। हेरेल को 1926 में कई अस्पतालों व अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से भारत
में, इंडियन रिसर्च फंड एसोसिएशन (आईआरएफए) द्वारा फेज उपचार
करने के लिए जोड़ा गया। 1927
में यह काम शुरू होकर नौ साल तक चला और 1936 में पूरा किया गया।
जो काम था वह प्रदूषित पानी की वजह से हैजे में फेज उपचार के प्रभाव का अध्ययन
करना था। अध्ययन के नतीजे उम्मीद जगाने वाले थे। 1927 में एसोसिएशन ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के
सातवें सम्मेलन में फेज उपचार ने खासा ध्यान आकर्षित किया।
पिछले
कुछ वर्षों में बैक्टीरियोफेज पर काफी अनुसंधान हुआ है। बैक्टीरियोफेज बहुकोशिकीय
जंतुओं या वनस्पतियों में कोई बीमारी नहीं फैलाते। ऐसे वायरस न केवल मनुष्यों में
बल्कि फसलों की बैक्टीरिया-जनित बीमारियों के उपचार में उपयोगी हो सकते हैं।
बैक्टीरिया-जनित बीमारियों में
दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता एक आम समस्या है। हाल ही में युनाइटेड किंगडम में
एक बैक्टीरिया-जनित
बीमारी में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाने की वजह से
एक किशोर मौत की कगार पर था। उसका इलाज बैक्टीरियोफेज की मदद से सफलतापूर्वक किया
जा सका।
इन
दिनों बैक्टीरियोफेज को जेनेटिक इंजीनियरींग के जरिए इस तरह से बनाया जा रहा है कि
वह विशिष्ट बैक्टीरिया को निशाना बना सके।
उपचार
के लिए बैक्टीरियोफेज का डोज़ सुविधानुसार या तो मुंह से दिया जा सकता है या फिर
घाव पर लगाया जा सकता है या फिर संक्रमित हिस्से पर स्प्रे किया जा सकता है।
इंजेक्शन के ज़रिए फेज की खुराक को कैसे दी जाए इस पर परीक्षण चल रहे हैं।
बैक्टीरियोफेज उपचार को लेकर कुछ आस बनती दिखाई दे रही है। कुछ अस्पतालों में वायरस-उपचार के सफल उपयोग के समाचार मिले हैं। बैक्टीरियोफेज वायरसों को पहचानना व एकत्रित करना और उन्हें सहेजकर रखना अब आसान हुआ है। एक समय पर एंटीबायोटिक दवाओं ने संक्रामक रोगों से बचने में अहम भूमिका अदा की थी और आज भी कर रहे हैं। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि बैक्टीरियोफेज से बैक्टीरिया जनित बीमारियों का उपचार इस दिशा में क्रांतिकारी साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.cancer.gov/sites/g/files/xnrzdm211/files/styles/cgov_article/public/cgov_image/media_image/100/600/6/files/polio-virus-article.jpg?h=b26af281&itok=awKDstU0
नए
कोरोना वायरस की वजह से दुनिया परेशान है, वैज्ञानिक
इसका इलाज ढूंढने में दिन-रात
एक कर रहे हैं, सरकारें इसे फैलने
से रोकने के कठिन प्रयास कर रही हैं। लेकिन पूरी कहानी में षडयंत्र की बू न हो तो
कुछ लोगों को मज़ा नहीं आता। तो यह सुझाव दिया गया कि यह नया जानलेवा वायरस SARS-CoV-2 वुहान की प्रयोगशाला में बनाकर जानबूझकर छोड़ा गया है। हाल
ही में स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने गहन विश्लेषण के आधार पर
स्पष्ट कर दिया है कि SARS-CoV-2 कहीं किसी
प्रयोगशाला की साज़िश नहीं है। तो उन्होंने यह कैसे पता लगाया?
उनके
शोध कार्य का ब्यौरा नेचर मेडिसिन शोध पत्रिका के 17 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों के दल ने इन नए वायरस के जीनोम (यानी पूरी जेनेटिक सामग्री) की तुलना सात ऐसे
कोरोना वायरसों से की जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं: सार्स, मर्स
और सार्स-2 (ये
तीनों गंभीर रोग पैदा करते हैं), HKU1, NL63,
OC43 और
229E (जो
हल्की बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं)। शोधकर्ताओं का कहना है कि “हमारे विश्लेषण से साफ तौर पर पता चलता है
कि SARS-CoV-2 प्रयोगशाला की कृति
या जानबूझकर सोद्देश्य बनाया गया वायरस नहीं है।”
स्क्रिप्स
रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रतिरक्षा विज्ञान और सूक्ष्मजीव विज्ञान के एसोसिएट
प्रोफेसर क्रिस्टियान एंडरसन और उनके साथियों ने वायरस की सतह के उभारों के कंटक
प्रोटीन का जेनेटिक सांचा देखा। कोरोना वायरस इन कंटकों का उपयोग किसी कोशिका की
सतह को पकड़कर रखने और उसके अंदर प्रवेश करने के लिए करता है। शोधकर्ताओं ने इन
कंटक प्रोटीन के दो प्रमुख गुणधर्मों के लिए ज़िम्मेदार जीन शृंखला
को देखा। ये दो मुख्य गुणधर्म होते हैं – संडसी (हुक) और छेदक। संडसी वह हिस्सा होता है जो
कोशिका की सतह पर चिपक जाता है और छेदक वह हिस्सा होता है जो कोशिका झिल्ली को
खोलकर वायरस को अंदर घुसने में मदद करता है।
विश्लेषण
से पता चला कि हुक वाला हिस्सा इस तरह विकसित हुआ है कि वह मानव कोशिका की बाहरी
सतह पर उपस्थित ACE2 नामक ग्राहियों से
जुड़ जाता है। जुड़ने में यह इतना कारगर है कि वैज्ञानिकों का ख्याल है कि यह
जेनेटिक इंजीनियरिंग का नहीं बल्कि प्राकृतिक चयन का परिणाम है।
उन्हें
ऐसा क्यों लगता है? SARS-CoV-2 एक अन्य वायरस का बहुत नज़दीकी सम्बंधी है जो सार्स के लिए
ज़िम्मेदार होता है। वैज्ञानिकों ने इस बात का अध्ययन कर लिया है कि SARS-CoVऔर SARS-CoV-2 में क्या अंतर हैं।
इनके जेनेटिक कोड में कई महत्वपूर्ण अंतर देखे गए हैं। लेकिन जब कंप्यूटर मॉडल
तैयार किया गया तो SARS-CoV-2 के उत्परिवर्तन उसे
मानव कोशिका से जुड़ने में बहुत मददगार नहीं रहे। यदि किसी प्रयोगशाला ने जानबूझकर
ये परिवर्तन किए होते तो वे कदापि ऐसे उत्परिवर्तनों को नहीं चुनते जो कंप्य़ूटर
मॉडल के हिसाब से मददगार नहीं हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि प्रकृति कहीं अधिक
चतुर है और उसने सर्वथा नए उत्परिवर्तनों को चुना है।
एक
और मुद्दा है। कुल मिलाकर, इस वायरस की संरचना
अन्य कोरोना वायरसों से बहुत अलग है। इसकी संरचना चमगादड़ों और पैंगोलिन में पाए
जाने वाले वायरस के कहीं अधिक समान है। इन वायरसों का ज़्यादा अध्ययन नहीं हुआ है
और इन्होंने मनुष्यों को हानि पहुंचाई हो, ऐसी
कोई रिपोर्ट भी नहीं है।
“यदि कोई एक नया
कोरोना वायरस एक रोगजनक के रूप में विकसित करना चाहता तो वह इसे किसी ऐसे वायरस की
बुनियाद पर निर्मित करता जो जाना-माना रोगजनक हो।”
वायरस
आया कहां से और कैसे? यह सवाल सिर्फ
वैज्ञानिक रुचि का सवाल नहीं है बल्कि SARS-CoV-2 के भावी परिणामों से जुड़ा है। शोध समूह ने दो परिदृश्य
प्रस्तुत किए हैं।
पहला
परिदृश्य मानव आबादी को प्रभावित करने वाले कुछ ऐसे कोरोना वायरस से मेल खाता है
जो सीधे किसी अन्य जंतु से आए हैं। सार्स के मामले में वायरस सिवेट (मुश्कबिलाव) से आया था और मिडिल
ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) के मामले में वह ऊंट से मनुष्य में आया था। अनुसंधान से पता
चला है कि SARS-CoV-2 चमगादड़ से मनुष्य
में आया है। चमगादड़ से यह वायरस एक मध्यस्थ जंतु (संभवत: पैंगोलिन) में पहुंचा और वहां से मनुष्य में।
यदि
यह परिदृश्य हकीकत है तो इस वायरस के मनुष्य में पहुंचने से पहले ही मनुष्य को
संक्रमित करने की इसकी क्षमता (रोगजनक क्षमता) तैयार हो चुकी होगी।
दूसरा
परिदृश्य यह है कि इसके रोगजनक लक्षण जंतु से मनुष्य में पहुंचने के बाद विकसित
हुए हैं। पैंगोलिन में उत्पन्न कुछ कोरोना वायरस ऐसे हैं जिनमें हुक की संरचना SARS-CoV-2 जैसी होती है। इस तरह से पैंगोलिन ने
वायरस को मनुष्य के शरीर में पहुंचा दिया और एक बार मनुष्य शरीर में प्रवेश के बाद
वायरस ने बाकी के लक्षण (कोशिका
के अंदर घुसने के लिए ज़रूरी औज़ार) विकसित कर लिए होंगे। एक बार कोशिका में घुसने की क्षमता आ
जाए तो यह वायरस एक से दूसरे मनुष्य में फैलना संभव हो गया होगा।
इस तरह की तकनीकी जानकारी से लैस होकर वैज्ञानिक इस महामारी का भविष्य बता पाएंगे। यदि यह वायरस मनुष्य में पहुंचने से पहले ही रोगजनक था तो इसका मतलब है कि मनुष्यों में से इसके खात्मे के बाद भी यह सम्बंधित जंतु में पनपता रहेगा और फिर से हमला कर सकता है। दूसरी ओर, यदि दूसरा परिदृश्य सही है तो इसके वापिस लौटने की संभावना कम है क्योंकि तब इसे फिर से मानव शरीर में प्रवेश करके एक बार फिर नए सिरे से रोगजनक क्षमता विकसित करनी होगी।(स्रोत फीचर्स)
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लोगों
से उनकी लंबी उम्र का राज़ पूछो तो वे इसका श्रेय अपने खान-पान, व्यायाम,
नृत्य, दिमागी कसरत जैसी
तमाम गतिविधियों को देते हैं। 109 वर्षीय जेसी गैलन से जब उनकी लंबी आयु का राज़ पूछा गया तो
उन्होंने एक जवाब यह भी दिया कि वे पुरुषों से दूर रहती हैं। लेकिन किसी के मन में
यह ख्याल नहीं आता कि इसमें गुणसूत्र (क्रोमोसोम) की भी भूमिका हो सकती है। इसी संदर्भ में हाल ही में बायोलॉजी
लेटर्स में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि असमान लैंगिक गुणसूत्र वाले जीवों
की तुलना में समान लैंगिक गुणसूत्र वाले जीव अधिक जीते हैं।
अधिकतर
जानवरों में नर और मादा का निर्धारण लैंगिक गुणसूत्रों से होता है। स्तनधारियों में,
मादाओं में दोनों लैंगिक गुणसूत्र समान (XX) होते
हैं जबकि नर में असमान (XY) होते
हैं। पक्षियों में नर में लैंगिक गुणसूत्र समान (ZZ) होते हैं जबकि मादा
में असमान (ZW) होते
हैं। नर ऑक्टोपस जैसे कुछ जीवों में एक ही लैंगिक गुणसूत्र होता है।
युनिवर्सिटी
ऑफ न्यू साउथ वेल्स के इकॉलॉजिस्ट ज़ो ज़ाइरोकोस्टास और उनके साथी जानना चाहते थे
कि क्या असमान लैंगिक गुणसूत्र (जैसे XY) वाले जीवों में
आनुवंशिक उत्परिवर्तनों का खतरा अधिक होता है, जिसके
कारण उनका जीवन काल छोटा हो जाता है? शोधकर्ताओं
ने वैज्ञानिक शोध पत्रों, किताबों और ऑनलाइन
डैटाबेस को खंगाला और लैंगिक गुणसूत्र और आयु सम्बंधी डैटा निकाला। उन्होंने 99 कुल,
38 गण
और 8 वर्गों
की 229 प्रजातियों
के नर और मादाओं के जीवन काल की तुलना की। उन्होंने पाया कि किसी भी प्रजाति में
समान लैंगिक गुणसूत्र वाले लिंग का जीवन काल 17.6 प्रतिशत तक अधिक होता है। जीवन काल का यह
पैटर्न मनुष्यों, जंगली जानवरों और
पालतू जानवरों में दिखाई दिया।
शोधकर्ताओं
का कहना है कि लिंगों के बीच जीवन काल का यह अंतर विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग होता है। जैसे
जर्मन कॉकरोच (Blattellagermanica प्रजाति) के नर (सिर्फ X) की
तुलना में मादा (XX) 77
प्रतिशत अधिक जीवित रहती है। यह अंतर इस बात पर भी निर्भर
करता है कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाला जीव नर है या मादा। अध्ययन में उन्होंने
पाया कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाली मादा (स्तनधारी, सरीसृप,
कीट और मछलियां) अपनी प्रजाति के नर की तुलना में 20.9 प्रतिशत अधिक समय तक जीवित रहती हैं। दूसरी
ओर, समान लैंगिक गुणसूत्र वाले नर (पक्षी और तितलियां) अपनी प्रजाति की
मादाओं की तुलना में सिर्फ 7 प्रतिशत ही अधिक जीते हैं।
शोधकर्ताओं
का कहना है कि समान लैंगिक गुणसूत्र वाले नर और मादा के जीवन काल में फर्क देखकर
लगता है कि दीर्घायु को लैंगिक गुणसूत्र के अलावा अन्य कारक भी प्रभावित करते हैं।
इनमें से एक कारक हो सकता है प्रजनन-साथी चयन का दबाव। मादाओं को रिझाने के लिए कुछ प्रजातियों
के नर की शारीरिक बनावट और व्यवहार आकर्षक होते हैं, जिसके
लिए उन्हें काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है जिसका खामियाज़ा उनके स्वास्थ्य को
भुगतना पड़ता है और जिससे उनकी मृत्यु जल्दी हो जाती है।
आगे शोध से यह समझने में मदद मिलेगी कि लैंगिक गुणसूत्र जीवन काल को कैसे प्रभावित करते हैं। जैसे क्या एक लैंगिक-गुणसूत्र का छोटा आकार नर और मादाओं की आयु में अंतर के लिए जि़म्मेदार है। (स्रोत फीचर्स)
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चुर्इंगम को चबाते हुए हमने कई अठखेलियां की हैं। हाल ही में दक्षिणी डेनमार्क
से 5700 वर्ष पूर्व इंसानों
द्वारा चबाए गए टार के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। बर्च नामक पेड़ की छाल को चबाने से
बनी चिपचिपी एवं काली टार की इस चुर्इंगम को चबाते-चबाते उन लोगों ने अपने कई रहस्य उसमें कैद कर दिए। इनकी
मदद से आज के वैज्ञानिक उनके रहन-सहन और खान-पान की आदतों का पता लगा
सकते हैं।
5700 वर्ष पूर्व
के प्राचीन डेनमार्क निवासी शिकार करके अपना जीवन यापन करते थे। वे तीर के सिरे पर
नुकीले पत्थर चिपकाने के लिए या पत्थरों के सूक्ष्म औजारों को लकड़ी पर चिपकाने के
लिए चिपचिपे टार का उपयोग करते थे। टार प्राप्त होता था बर्च नामक पेड़ की छाल को
चबाने से। लगातार चबाने से टार चुर्इंगम के समान नरम हो जाता था और औज़ारों को
चिपकाने-सुधारने के काम आता था। शायद, टार
में पाए जाने वाले एन्टिसेप्टिक तेल और रसायन का उपयोग दांत दर्द से राहत पहुंचाने
के लिए भी किया जाता हो। यह भी हो सकता है कि आज के बच्चों के समान उस समय के
बच्चे भी टार की चुर्इंगम से खिलवाड़ करते रहे हों। टार की चुर्इंगम को चबाते-चबाते मुंह के अंदर की
टूटी कोशिकाएं, भोजन
के कण एवं सूक्ष्मजीव भी उसमें संरक्षित हो गए थे। यह प्राचीन चुर्इंगम
वैज्ञानिकों को प्राचीन मानव के डीएनए का अध्ययन करने का बेहतरीन अवसर दे रही है।
नेचर कम्यूनिकेशन में दी एनशियंट डीएनए (प्राचीन डीएनए) नामक शोध पत्र में बताया गया है कि प्राचीन चुर्इंगम से
प्राप्त डीएनए उस क्षेत्र में बसे लोगों की शारीरिक रचना तथा उनके भोजन और दांतों
पर पाए जाने वाले जीवाणु के सुराग देता है।
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के
पुरातत्ववेत्ता हेंस श्रोडर ने बताया है कि अक्सर वैज्ञानिक डीएनए अध्ययन के लिए
हड्डियों का उपयोग करते हैं क्योंकि उनका कठोर आवरण अंदर नाज़ुक कोशिकाओं और डीएनए
को संरक्षित कर लेता है। परंतु, इस शोध में वैज्ञानिकों ने हड्डियों के बजाय प्राचीन टार की चुर्इंगम का उपयोग
किया। उन्होंने यह भी बताया कि टार की चुर्इंगम से बहुत से जीवाणुओं के संरक्षित
डीएनए भी प्राप्त हुए हैं।
शोधकर्ताओं को टार की चुर्इंगम
पिछले साल खोजबीन के दौरान एक सुरंग से प्राप्त हुई थी। डॉ. श्रोडर ने कहा कि इस स्थान से
प्राप्त जीवाश्म के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस इलाके के रहने वाले लोग मुख्य
रूप से मछली पकड़ने, शिकार करने
और जंगली बेर और फल खाकर अपना जीवन यापन करते थे। यद्यपि, आसपास के इलाकों में लोगों ने खेती और पशुपालन भी प्रारंभ
कर दिया था।
जब शोधकर्ताओं ने 5700 साल पुरानी टार की चुर्इंगम में संरक्षित मानव डीएनए का
विश्लेषण किया तो पाया कि जिसने उसे चबाया था वह एक महिला थी जो शिकारी समुदाय से
अधिक निकटता रखती थी। वैज्ञानिकों ने उस महिला का नाम लोला रखा। लोला के डीएनए को
पूरा पढ़ने के बाद उसी क्षेत्र की वर्तमान आबादी के डीएनए आंकड़ों का तुलनात्मक
विश्लेषण करके वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लोला की त्वचा का रंग गहरा था,
बाल भी गहरे रंग के थे तथा आंखों का रंग नीला था। वह
लेक्टोस असहिष्णुता से ग्रसित थी जिसके कारण वह दूध की शर्करा का पाचन नहीं कर
सकती थी।
डीएनए में क्षारों के अनुक्रम
को पढ़कर व्यक्ति के रंग-रूप, कद-काठी एवं अन्य लक्षणों से
चेहरे और शरीर का पुनर्निर्माण करना अब कोई आश्यर्चजनक कार्य नहीं रह गया है।
वैज्ञानिकों ने कुछ ही समय पहले दस हज़ार वर्ष
पुराने ब्रिटिश व्यक्ति (चेडर मेन) के कंकाल को देखकर और डीएनए को पढ़कर
शारीरिक लक्षणों का अंदाज़ लगाया था।
टार की चुर्इंगम से प्राप्त
कुछ अन्य डीएनए नमूनों से यह भी ज्ञात हुआ है कि लोला ने टार की चुर्इंगम को चबाने
से पहले हेसलनट तथा बतख खाई थी। बर्च टार से बैक्टीरिया एवं वायरस का डीएनए भी
प्राप्त हुआ है। हम सभी के मुंह और आंत में बैक्टीरिया, वायरस और फफूंद होती हैं। अत: प्राप्त सबूतों से लोला के मुंह में पाए जाने वाले
सूक्ष्मजीव संसार (माइक्रोबायोम) का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
लोला की चुर्इंगम से कई
बैक्टीरिया भी प्राप्त हुए हैं जो दांतों में प्लाक और जीभ पर भी पाए जाते हैं।
चुर्इंगम से प्राप्त एक बैक्टीरिया पोकायरोमोनास जिंजिवेलिस मसूड़ों की बीमारी का
द्योतक है। चुर्इंगम में स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया जैसे अन्य प्रकार के
बैक्टीरिया एवं वायरस भी प्राप्त हुए हैं जो लोला के स्वास्थ्य का सुराग देते हैं।
छोटे से गम के टुकड़े से जानकारी का खजाना प्राप्त करना उत्कृष्ट शोध का नमूना है। अलबत्ता, वैज्ञानिक लोला की उम्र ज्ञात नहीं कर पाए हैं। और निश्चित तौर पर यह भी कहा नहीं जा सकता कि लोला ने चुर्इंगम को क्यों चबाया (स्रोत फीचर्स)
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वर्ष 2019 विज्ञान जगत के इतिहास में एक ऐसे वर्ष के रूप में
याद किया जाएगा,
जब वैज्ञानिकों ने पहली बार ब्लैक होल की तस्वीर जारी की।
यह वही वर्ष था,
जब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बन के एक और नए रूप
का निर्माण कर लिया। विदा हुए साल में गूगल ने क्वांटम प्रोसेसर में श्रेष्ठता
हासिल की। अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में आठ रासायनिक अक्षरों वाले डीएनए अणु
बनाने की घोषणा की।
इस वर्ष 10 अप्रैल को खगोल वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी की।
यह तस्वीर विज्ञान की परिभाषाओं में की गई कल्पना से पूरी तरह मेल खाती है।
भौतिकीविद अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहली बार 1916 में सापेक्षता के सिद्धांत के साथ
ब्लैक होल की भविष्यवाणी की थी। ब्लैक होल शब्द 1967 में अमेरिकी खगोलविद जॉन
व्हीलर ने गढ़ा था। 1971 में पहली बार एक ब्लैक होल खोजा गया था।
इस घटना को विज्ञान जगत की बहुत बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। ब्लैक होल का
चित्र इवेंट होराइज़न दूरबीन से लिया गया, जो हवाई, एरिज़ोना,
स्पेन, मेक्सिको, चिली और दक्षिण ध्रुव में लगी है। वस्तुत: इवेंट होराइज़न दूरबीन एक संघ है। इस
परियोजना के साथ दो दशकों से लगभग 200 वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं। इसी टीम की सदस्य
मैसाचूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी की 29 वर्षीय कैरी बोमेन ने एक कम्प्यूटर
एल्गोरिदम से ब्लैक होल की पहली तस्वीर बनाने में सहायता की। विज्ञान जगत की
अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका साइंस ने वर्ष 2019 की दस प्रमुख खोजों में ब्लैक
होल सम्बंधी अनुसंधान को प्रथम स्थान पर रखा है।
उक्त ब्लैक होल हमसे पांच करोड़ वर्ष दूर एम-87 नामक निहारिका में स्थित है।
ब्लैक होल हमेशा ही भौतिक वैज्ञानिकों के लिए उत्सुकता के विषय रहे हैं। ब्लैक होल
का गुरूत्वाकर्षण अत्यधिक शक्तिशाली होता है जिसके खिंचाव से कुछ भी नहीं बच सकता; प्रकाश भी यहां प्रवेश करने के बाद बाहर नहीं निकल पाता है। ब्लैक होल में
वस्तुएं गिर सकती हैं, लेकिन वापस नहीं लौट सकतीं।
इसी वर्ष 21 फरवरी को अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में बनाए गए नए डीएनए अणु
की घोषणा की। डीएनए का पूरा नाम डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड है। नए संश्लेषित
डीएनए में आठ अक्षर हैं, जबकि प्रकृति में विद्यमान
डीएनए अणु में चार अक्षर ही होते हैं। यहां अक्षर से तात्पर्य क्षारों से है।
संश्लेषित डीएनए को ‘हैचीमोजी’ नाम दिया गया है। ‘हैचीमोजी’ जापानी भाषा का शब्द
है,
जिसका अर्थ है आठ अक्षर। एक-कोशिकीय अमीबा से लेकर
बहुकोशिकीय मनुष्य तक में डीएनए होता है। डीएनए की दोहरी कुंडलीनुमा संरचना का
खुलासा 1953 में जेम्स वाट्सन और फ्रांसिक क्रिक ने किया था। यह वही डीएनए अणु है, जिसने जीवन के रहस्यों को सुलझाने और आनुवंशिक बीमारियों पर विजय पाने में अहम
योगदान दिया है। मातृत्व-पितृत्व का विवाद हो या अपराधों की जांच, डीएनए की अहम भूमिका रही है।
सुपरकम्प्यूटिंग के क्षेत्र में वर्ष 2019 यादगार रहेगा। इसी वर्ष गूगल ने 54
क्यूबिट साइकैमोर प्रोसेसर की घोषणा की जो एक क्वांटम प्रोसेसर है। गूगल ने दावा
किया है कि साइकैमोर वह कार्य 200 सेकंड में कर देता है, जिसे
पूरा करने में सुपर कम्प्यूटर दस हज़ार वर्ष लेगा। इस उपलब्धि के आधार पर कहा जा
सकता है कि भविष्य क्वांटम कम्यूटरों का होगा।
वर्ष 2019 में रासायनिक तत्वों की प्रथम आवर्त सारणी के प्रकाशन की 150वीं
वर्षगांठ मनाई गई। युनेस्को ने 2019 को अंतर्राष्ट्रीय आवर्त सारणी वर्ष मनाने की
घोषणा की थी,
जिसका उद्देश्य आवर्त सारणी के बारे में जागरूकता का
विस्तार करना था। विख्यात रूसी रसायनविद दिमित्री मेंडेलीव ने सन 1869 में प्रथम
आवर्त सारणी प्रकाशित की थी। आवर्त सारणी की रचना में विशेष योगदान के लिए
मेंडेलीव को अनेक सम्मान मिले थे। सारणी के 101वें तत्व का नाम मेंडेलेवियम रखा
गया। इस तत्व की खोज 1955 में हुई थी। इसी वर्ष जुलाई में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ प्योर
एंड एप्लाइड केमिस्ट्री (IUPAC) का
शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस संस्था की स्थापना 28 जुलाई 1919 में उद्योग जगत के
प्रतिनिधियों और रसायन विज्ञानियों ने मिलकर की थी। तत्वों के नामकरण में युनियन
का अहम योगदान रहा है।
विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के अनुसार गुज़िश्ता साल रसायन
वैज्ञानिकों ने कार्बन के एक और नए रूप सी-18 सायक्लोकार्बन का सृजन किया। इसके
साथ ही कार्बन कुनबे में एक और नया सदस्य शामिल हो गया। इस अणु में 18 कार्बन
परमाणु हैं,
जो आपस में जुड़कर अंगूठी जैसी आकृति बनाते हैं। शोधकर्ताओं
के अनुसार इसकी संरचना से संकेत मिलता है कि यह एक अर्धचालक की तरह व्यवहार करेगा।
लिहाज़ा,
कहा जा सकता है कि आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिकी में इसके उपयोग
की संभावनाएं हैं।
गुज़रे साल भी ब्रह्मांड के नए-नए रहस्यों के उद्घाटन का सिलसिला जारी रहा। इस
वर्ष शनि बृहस्पति को पीछे छोड़कर सबसे अधिक चंद्रमा वाला ग्रह बन गया। 20 नए
चंद्रमाओं की खोज के बाद शनि के चंद्रमाओं की संख्या 82 हो गई। जबकि बृहस्पति के
79 चंद्रमा हैं।
गत वर्ष बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा पर जल वाष्प होने के प्रमाण मिले। विज्ञान
पत्रिका नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोपा की मोटी
बर्फ की चादर के नीचे तरल पानी का सागर लहरा रहा है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार
इससे यह संकेत मिलता है कि यहां पर जीवन के सभी आवश्यक तत्व विद्यमान हैं।
कनाडा स्थित मांट्रियल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बियर्न बेनेक के नेतृत्व में
वैज्ञानिकों ने हबल दूरबीन से हमारे सौर मंडल के बाहर एक ऐसे ग्रह (के-टू-18 बी)
का पता लगाया है,
जहां पर जीवन की प्रबल संभावनाएं हैं। यह पृथ्वी से दो गुना
बड़ा है। यहां न केवल पानी है, बल्कि
तापमान भी अनुकूल है।
साल की शुरुआत में चीन ने रोबोट अंतरिक्ष यान चांग-4 को चंद्रमा के अनदेखे
हिस्से पर सफलतापूर्वक उतारा और ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। चांग-4
जीवन सम्बंधी महत्वपूर्ण प्रयोगों के लिए अपने साथ रेशम के कीड़े और कपास के बीज भी
ले गया था।
अप्रैल में पहली बार नेपाल का अपना उपग्रह नेपालीसैट-1 सफलतापूर्वक लांच किया
गया। दो करोड़ रुपए की लागत से बने उपग्रह का वज़न 1.3 किलोग्राम है। इस उपग्रह की
मदद से नेपाल की भौगोलिक तस्वीरें जुटाई जा रही हैं। दिसंबर के उत्तरार्ध में युरोपीय
अंतरिक्ष एजेंसी ने बाह्य ग्रह खोजी उपग्रह केऑप्स सफलतापूर्वक भेजा। इसी साल
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजा गया अपार्च्युनिटी रोवर पूरी तरह
निष्क्रिय हो गया। अपाच्र्युनिटी ने 14 वर्षों के दौरान लाखों चित्र भेजे। इन
चित्रों ने मंगल ग्रह के बारे में हमारी सीमित जानकारी का विस्तार किया।
बीते वर्ष में जीन सम्पादन तकनीक का विस्तार हुआ। आलोचना और विवादों के बावजूद
अनुसंधानकर्ता नए-नए प्रयोगों की ओर अग्रसर होते रहे। वैज्ञानिकों ने जीन सम्पादन
तकनीक क्रिसपर कॉस-9 तकनीक की मदद से डिज़ाइनर बच्चे पैदा करने के प्रयास जारी रखे।
जीन सम्पादन तकनीक से बेहतर चिकित्सा और नई औषधियां बनाने का मार्ग पहले ही
प्रशस्त हो चुका है। चीन ने जीन एडिटिंग तकनीक से चूहों और बंदरों के निर्माण का
दावा किया है। साल के उत्तरार्ध में ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने शरीर की
नरम हड्डी अर्थात उपास्थि की मरम्मत के लिए एक तकनीक खोजी, जिससे
जोड़ों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
बीते साल भी जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता की लकीर लंबी होती गई। बायोसाइंस
जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार पहली बार विश्व के 153 देशों के 11,258
वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन पर एक स्वर में चिंता जताई। वैज्ञानिकों ने
‘क्लाइमेट इमरजेंसी’ की चेतावनी देते हुए जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण
कार्बन उत्सर्जन को बताया। दिसंबर में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में संयुक्त
राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में विचार मंथन का मुख्य मुद्दा पृथ्वी
का तापमान दो डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बढ़ने से रोकना था।
इसी साल हीलियम की खोज के 150 वर्ष पूरे हुए। इस तत्व की खोज 1869 में हुई थी।
हीलियम का उपयोग गुब्बारों, मौसम विज्ञान सम्बंधी उपकरणों
में हो रहा है। इसी वर्ष विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के
प्रकाशन के 150 वर्ष पूरे हुए। नेचर को विज्ञान की अति प्रतिष्ठित और
प्रामाणिक पत्रिकाओं में गिना जाता है। इस वर्ष भौतिकीविद रिचर्ड फाइनमैन द्वारा
पदार्थ में शोध के पूर्व अनुमानों को लेकर दिसंबर 1959 में दिए गए ऐतिहासिक
व्याख्यान की हीरक जयंती मनाई गई।
विदा हो चुके वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ (IAU) की स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाया गया। इसकी स्थापना 28 जुलाई 1919 को ब्रुसेल्स
में की गई थी। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ के 13,701 सदस्य हैं। इसी साल
मानव के चंद्रमा पर पहुंचने की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। 21 जुलाई 1969 को अमेरिकी
अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चांद की सतह पर कदम रखा था।
इसी वर्ष विश्व मापन दिवस 20 मई के दिन 101 देशों ने किलोग्राम की नई परिभाषा
को अपना लिया। हालांकि रोज़मर्रा के जीवन में इससे कोई अंतर नहीं आएगा, लेकिन अब पाठ्य पुस्तकों में किलोग्राम की परिभाषा बदल जाएगी। किलोग्राम की नई
परिभाषा प्लैंक स्थिरांक की मूलभूत इकाई पर आधारित है।
गत वर्ष अक्टूबर में साहित्य, शांति, अर्थशास्त्र
और विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई। विज्ञान के नोबेल पुरस्कार
विजेताओं में अमेरिका का वर्चस्व दिखाई दिया। रसायन शास्त्र में लीथियम आयन बैटरी
के विकास के लिए तीन वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया – जॉन गुडइनफ, एम. विटिंगहैम और अकीरा योशिनो। लीथियम बैटरी का उपयोग मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक कार, लैपटॉप आदि में होता है। 97 वर्षीय गुडइनफ
नोबेल सम्मान प्राप्त करने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति हो गए हैं। चिकित्सा
विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को प्रदान किया गया –
विलियम केलिन जूनियर, ग्रेग एल. सेमेंज़ा और पीटर रैटक्लिफ।
इन्होंने कोशिका द्वारा ऑक्सीजन के उपयोग पर शोध करके कैंसर और एनीमिया जैसे रोगों
की चिकित्सा के लिए नई राह दिखाई है। इस वर्ष का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जेम्स
पीबल्स,
मिशेल मेयर और डिडिएर क्वेलोज़ को दिया गया। तीनों
अनुसंधानकर्ताओं ने बाह्य ग्रहों खोज की और ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा हटाया।
ऑस्ट्रेलिया के कार्ल क्रूसलेंकी को वर्ष 2019 का विज्ञान संचार का
अंतर्राष्ट्रीय कलिंग पुरस्कार प्रदान किया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले
वे पहले ऑस्ट्रेलियाई हैं।
वर्ष 2019 का गणित का प्रतिष्ठित एबेल पुरस्कार अमेरिका की प्रोफेसर केरन
उहलेनबेक को दिया गया है। इसे गणित का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। इसकी स्थापना
2002 में की गई थी। पुरस्कार की स्थापना के बाद यह सम्मान ग्रहण करने वाली केरन
उहलेनबेक पहली महिला हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने वर्ष 2019 के दस प्रमुख
वैज्ञानिकों की सूची में स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को शामिल किया
है। टाइम पत्रिका ने भी ग्रेटा थनबर्ग को वर्ष 2019 का ‘टाइम पर्सन ऑफ दी
ईयर’ चुना है। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में
पहचान बनाई और जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयासों का ज़ोरदार अभियान चलाया।
5 अप्रैल को नोबेल सम्मानित सिडनी ब्रेनर का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें 2002 में मेडिसिन का नोबेल सम्मान दिया गया था। उन्होंने सिनोरेब्डाइटिस एलेगेंस नामक एक कृमि को रिसर्च का प्रमुख मॉडल बनाया था। 11 अक्टूबर को सोवियत अंतरिक्ष यात्री अलेक्सी लीनोव का 85 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। लीनोव पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में चहलकदमी करके इतिहास रचा था। (स्रोत फीचर्स)
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ट्यूमर ऊतक असामान्य कोशिकाओं का समूह होता है। ये कोशिकाएं खाऊ
होती हैं और पोषक तत्वों को निगलकर विकसित होती रहती हैं। कई वर्षों से शोधकर्ता
ऐसी दवा विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे इन कोशिकाओं की भोजन की आपूर्ति को
बंद किया जा सके। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार एक असफल कैंसर दवा का
एक अद्यतन संस्करण न केवल ट्यूमर को आवश्यक पोषक तत्वों के उपयोग से रोकता है
बल्कि प्रतिरक्षा कोशिकाओं को भी प्रेरित करता है कि वे ट्यूमर को खत्म कर
दें।
कैंसर कोशिकाएं जीवित रहने और विभाजन के
लिए न सिर्फ ज़रूरी अणु सोखती हैं, अपने खाऊ व्यवहार के चलते वे आसपास के
परिवेश को अम्लीय और ऑक्सीजन-विहीन कर देती हैं। इसके चलते प्रतिरक्षा कोशिकाएं ठप
पड़ जाती हैं और ट्यूमर को बढ़ने से रोकने में असफल रहती हैं। ट्यूमर को प्रचुर
मात्रा में ग्लूटामाइन नामक एमिनो एसिड की आवश्यकता होती है जो डीएनए, प्रोटीन
और लिपिड जैसे अणुओं के निर्माण के लिए ज़रूरी होता है।
1950 के दशक में शोधकर्ताओं ने ट्यूमर की
ग्लूटामाइन निर्भरता को उसी के खिलाफ तैनात करने की कोशिश की थी जिसके बाद इसके
चयापचय को अवरुद्ध करने वाली दवा का विकास हुआ। उदाहरण के लिए बैक्टीरिया से
उत्पन्न एक यौगिक (DON) कई ऐसे एंज़ाइम्स की क्रिया को रोक देता है जो कैंसर कोशिकाओं को ग्लूटामाइन
का उपयोग करने में समर्थ बनाते हैं। परीक्षण के दौरान मितली और उलटी की गंभीर
समस्या के कारण इसे मंज़ूरी नहीं मिल सकी थी।
पॉवेल और उनकी टीम ने अब DON का एक ऐसा संस्करण तैयार किया है जो पेट
के लिए हानिकारक नहीं है। इसमें दो ऐसे रासायनिक समूहों को जोड़ा गया है जो ट्यूमर
के नज़दीक पहुंचने तक इसे निष्क्रिय रखते हैं। जब यह ट्यूमर के पास पहुंचता है तो
वहां उपस्थित एंज़ाइम इन आणविक बेड़ियों को हटा देते हैं और दवा कैंसर कोशिकाओं पर
हमला कर देती है।
इस नई दवा का परीक्षण करने के लिए पॉवेल और
उनकी टीम ने चूहों में चार प्रकार की कैंसर कोशिकाएं इंजेक्ट कीं। इसके बाद
उन्होंने कुछ चूहों को नव विकसित DON का डोज़ दिया। साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार
इस दवा ने चारों ट्यूमर के विरुद्ध कार्य किया। जिन चूहों को यह उपचार नहीं दिया
गया था उनका ट्यूमर 3 सप्ताह में लगभग 5 गुना बढ़ गया जबकि DON उपचारित चूहों में ट्यूमर सिकुड़ता हुआ
धीरे-धीरे खत्म हो गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह दवा न केवल ग्लूटामाइन चयापचय को
कम करती है बल्कि कोशिकाओं की ग्लूकोज़ के उपयोग करने की क्षमता को भी बाधित करती
है।
कैंसर औषधियों की एक बड़ी समस्या यह होती है
कि ये प्रतिरक्षा कोशिकाओं तथा अन्य सामान्य कोशिकाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं।
लेकिन DON का नया संस्करण कैंसर कोशिकाओं को नष्ट
करने के साथ-साथ प्रतिरक्षा तंत्र की टी-कोशिकाओं को उग्र भी बनाता है। DON द्वारा ग्लूटामाइन से वंचित टी-कोशिकाएं
डीएनए और अन्य प्रमुख अणुओं को संश्लेषित करने के लिए वैकल्पिक रुाोत खोज लेती हैं
जबकि ट्यूमर कोशिकाएं ऐसा नहीं कर पातीं।
पॉवेल का ऐसा मानना है कि जब इसका परीक्षण इंसानों पर किया जाएगा तब हम कुछ बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/SS21580898-1280×720.jpg?itok=liW98e8N
अब तक हुए कई अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हम
मनुष्य आम तौर पर उच्च तारत्व (या आवृत्ति) वाली ध्वनियों यानी तीखी आवाज़ों, जैसे
सीटी की आवाज़ के साथ किसी ऊंची जगह की कल्पना करते हैं। और अब बायोलॉजी लेटर्स
में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि कुत्ते भी ऐसा ही करते हैं। शोधकर्ताओं के
अनुसार यह अध्ययन इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि क्यों हम कुछ आवाज़ों को
खास भौतिक लक्षणों से जोड़कर देखते हैं।
दरअसल कई अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते
हैं कि हम उच्च तारत्व की ध्वनियों के साथ ऊंचाई,
उजली या छोटी वस्तुओं
की कल्पना करते हैं। लेकिन अब तक वैज्ञानिक आवाज़ के साथ इनके जुड़ाव के कारण की कोई
तार्किक व्याख्या नहीं कर पाए हैं। जैसे अध्ययन कहते हैं कि संभवत: ध्वनि और स्थान, आकार
या रंग आदि का यह जुड़ाव अनुभव से बना है। उदाहरण के तौर पर चूहे और पक्षियों जैसे
छोटे जीव आम तौर पर तीखी (पतली) आवाज़ निकालते हैं जबकि भालू जैसे बड़े जानवर भारी
(निम्न तारत्व वाली) आवाज़ें निकालते हैं। या यह भी हो सकता कि यह सम्बंध इसलिए बन
गया कि अंग्रेजी में ‘हाई’ और ‘लो’ शब्दों का इस्तेमाल आवाज़ और ऊंचाई दोनों के लिए
होता है।
युनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स की जीव व्यवहार
विज्ञानी ऐना कोर्ज़ेनिवोस्का और उनके साथियों का कुत्तों पर किया गया एक अध्ययन इस
बात को और समझने में मदद कर सकता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 101 कुत्तों को एक
गेंद के ऊपर-नीचे जाने का एनीमेशन दिखाया और कभी-कभी गेंद की गति के साथ ध्वनियां
सुनाई गर्इं। कभी गेंद के ऊपर जाने के साथ ध्वनि का तारत्व बढ़ता और नीचे आने के
साथ कम होता या, कभी इसके विपरीत होता। 64 प्रयोगों के बाद उन्होंने पाया कि
जब गेंद के ऊपर जाने के साथ तारत्व बढ़ता है तो
कुत्तों ने गेंद को 10 प्रतिशत अधिक वक्त तक देखा। इससे लगता है कि जानवर
आवाज़ का तारत्व बढ़ने को ऊंचे स्थान से जोड़कर देखते हैं। इस निष्कर्ष के आधार पर
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आवाज़ के प्रकार के साथ स्थान का सम्बंध भाषा की वजह से
नहीं बल्कि जन्मजात होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है।
बर्मिंगहैम युनिवर्सिटी के संज्ञान
विज्ञानी मार्कस पर्लमेन का कहना है कि इस अध्ययन की डिज़ाइन तो उचित है लेकिन
संभावना है कि कुछ अन्य कारक भी नतीजों पर असर डाल रहे हों। जैसे प्रयोग के दौरान
कुत्तों के मालिक नज़दीक बैठे थे, हो सकता है गेंद के ऊपर जाने और उसके साथ
उच्च तारत्व वाली आवाज़ बजने के वक्त अनजाने में उन्होंने कुत्तों को कुछ संकेत दिए
हों। या हो सकता है कि कुत्तों के मालिकों ने पहले कभी कुत्तों को आवाज़ पर प्रतिक्रिया
देने के लिए प्रशिक्षित किया हो।
लिहाज़ा,
पर्लमैन का सुझाव है
कि एक अन्य अध्ययन किया जाना चाहिए जिसमें कुत्ते के मालिक ऐसी भाषा बोलते हों
जिसमें ध्वनि के तारत्व को स्थान सम्बंधी शब्द से संबोधित ना किया जाता हो, जैसे
फारसी। फारसी भाषा में उच्च तारत्व की आवाज़ को पतली आवाज़ और निम्न तारत्व की आवाज़
को मोटी आवाज़ कहते हैं।
बहरहाल इस सम्बंध की व्याख्या के लिए आगे और विस्तार से अध्ययन करने की आवश्कता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/dog_1280p_0.jpg?itok=XXaw0X8a