पिघलते हिमनदों से निकलते हानिकारक प्रदूषक – डॉ. तम्बान मेलत, रूना एंटनी

पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत मीठा पानी अंटार्कटिक एवं आर्कटिक और हिमालय, एंडीज़ तथा ऐल्प्स जैसे ऊंचे पर्वतों पर हिमनदों, हिमाच्छदों व पर्माफ्रॉस्ट के बर्फ के रूप में है। पर्वतीय नदियों के जल प्रवाह में ऊंचे पर्वतीय हिमनदों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये नदियां पर्वतीय राज्यों और नीचे के मैदानी क्षेत्रों के लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। पिछले कुछ दशकों से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनद खामोशी से धीरे-धीरे सिकुड़ रहे हैं। हिमनदों के पतला पड़ने और सिकुड़ने से उनके हाइड्रोलॉजिकल गुणों में परिवर्तन होता है जिसका प्रभाव घाटी क्षेत्र में मीठे पानी के प्रवाह और पानी की उपलब्धता पर पड़ रहा है। जलवायु की स्थिति में बदलाव के चलते ऊंचे पर्वतीय हिमनदों से बहकर आने वाले पानी की मात्रा में कमी-बेशी की संभावना है। इसकी वजह से इन क्षेत्रों में जल संसाधन पर असर पड़ेगा, विशेष रूप से शुष्क मौसम या सूखे वर्षों के दौरान। विश्व भर के पिघलते हिमनदों और हिमाच्छदों से बहने वाला जल नदियों से होते हुए अंतत: समुद्र में पहुंचेगा जिससे समुद्रों के जल स्तर में वृद्धि होगी और तटीय क्षेत्रों तथा टापुओं के जलमग्न होने की संभावना बनी रहेगी। इससे आबादी वाले कई तटीय क्षेत्र डूब जाएंगे।               

बर्फीले तथा हिमनदीय क्षेत्रों को आम तौर पर अछूता पर्यावरण माना जाता रहा है लेकिन हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि ऐसे क्षेत्रों में भी पर्यावरण प्रदूषकों के भंडार हो सकते हैं। ये प्रदूषक या तो हिमपात के साथ या सीधे बर्फ की सतह पर पहुंच सकते हैं। हिमनदों का पिघला हुआ बर्फ हिमनद-जनित पर्यावरण को संदूषित करने में द्वितीयक स्रोत के रूप में काम करता है; मूल स्रोत के चुक जाने के वर्षों बाद तक। अध्ययनों से पता चलता है कि आर्कटिक और अंटार्कटिक की बर्फीली परतों में प्रदूषकों का उच्च स्तर है जो हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करने के बाद हिमनदों में समाहित हो गया है। आर्कटिक क्षेत्र में पाए गए ज़हरीले कार्बनिक यौगिक, अम्ल, धातु तथा रेडियोन्यूक्लाइड्स के चिंह युरोप, उत्तरी अमेरिका और पूर्व-सोवियत संघ में उस दशक में किए गए मानवजनित उत्सर्जन से मेल खाते हैं जब ऐसा उत्सर्जन अधिकतम था। मध्य हिमालय से प्राप्त आइस कोर रिकॉर्ड के अनुसार युरोप की औद्योगिक क्रांति के दौरान उत्सर्जित ज़हरीली धातुएं ही हिमालय के शिखरों के वायुमंडल पर हावी थीं। बढ़ती आबादी और तेज़ी से औद्योगीकृत होते एशियाई देशों से निकटता के कारण, विश्व के अन्य पर्वतीय हिमनदों की तुलना में, हिमालय के हिमनदों तक ज़्यादा वायुमंडलीय प्रदूषक पहुंचते हैं। इसके परिणामस्वरूप जल प्रवाह का संतुलन प्रभावित होने के अलावा हिमनदों का पिघलना हिमालयी पर्वतीय राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक मुद्दा है।          

वास्तव में हिमनद सिर्फ बर्फ के विशाल खंड नहीं होते, बल्कि ये जीवन से परिपूर्ण हैं – वायरस, बैक्टीरिया, कवक, शैवाल जैसे विभिन्न सूक्ष्मजीवों और अकशेरुकीय जीवों का भंडार हैं। इनमें हवा के माध्यम से आसपास तथा दूर-दराज़ क्षेत्रों के प्राकृतिक मलबे और मानवजनित दूषित पदार्थ भी कैद हो जाते हैं।

हिमनद और इनके आसपास के पर्यावरण में देखे गए मानवजनित संदूषक पदार्थों में ब्लैक कार्बन, रेडियोन्यूक्लाइड्स, ज़हरीले तत्व, माइक्रोप्लास्टिक, नाइट्रोजन आधारित प्रदूषक और दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषक हैं। औद्योगीकरण, खनन और कृषि कार्यों जैसी इंसानी गतिविधियों से पर्यावरण में प्रदूषक तत्व उत्सर्जित होते हैं जो दूर-दूर तक व्याप्त वायुमंडलीय परिवहन प्रणाली के माध्यम से उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। जैसे-जैसे हिमनद पिघलते हैं, वैसे-वैसे इनमें कई दशकों से संचित पोषक तत्व और प्रदूषक पदार्थ जल राशियों में पहुंच जाते हैं जो नीचे के पारिस्थितिकी तंत्रों को भी प्रभावित कर सकते हैं।          

प्रदूषकों की सबसे अधिक मात्रा क्रायोकोनाइट रंध्रों में पाई जाती है। क्रायोकोनाइट रंध्र हिमनद की सतह पर पानी से भरे छिद्र होते हैं जो हिमनद में फंसी हुई तलछट के आसपास की बर्फ ज़्यादा पिघलने के कारण बनते हैं। क्रायोकोनाइट महीन चट्टानी कणों, कालिख (soot) और सूक्ष्मजीवों से निर्मित एक गहरे रंग की भुरभुरी धूल है जो बर्फ, हिमनदों या हिमाच्छदों पर जमा हो जाती है। ये कार्बनिक पदार्थ, पोषक तत्वों एवं अन्य तत्वों को चक्रित करने के गतिशील स्थल हैं जो हिमनद की सतह के अन्यथा शुष्क और सुखाने वाले वातावरण में संभव नहीं हो सकता है। क्रायोकोनाइट्स तब बनते हैं जब प्रकाश संश्लेषक सायनोबैक्टीरिया पर्यावरण में चिपचिपे पदार्थ छोड़ते हैं। ये खनिज धूल, सूक्ष्मजीव और कार्बनिक पदार्थों को एकत्रित कर कणिकाओं का रूप देते हैं। परोपजीवी बैक्टीरिया इन कणिकाओं में बस जाते हैं। इन बैक्टीरिया द्वारा जैविक पदार्थों के अपघटन से ह्यूमिक पदार्थों का निर्माण होता है जिससे कणिकाओं का रंग गहरा हो जाता है। गहरे रंग के कारण क्रायोकोनाइट कणिकाएं और अधिक धूप सोखती हैं जिससे बर्फ पिघलता है और सतह पर छिद्र बन जाते हैं। समय के साथ इन क्रायोकोनाइट रंध्रों की गहराई बढ़ती जाती है और पानी के छोटे-छोटे पोखर बन जाते हैं। ये पोखर मानवजनित संदूषकों के भंडार के रूप में कार्य करते हैं।

क्रायोकोनाइट रंध्रों में जमा होने वाले प्राथमिक प्रदूषकों में ब्लैक कार्बन तथा ब्राउन कार्बन एयरोसोल हैं। ब्लैक कार्बन वाहनों में ईंधन के अधूरे दहन का परिणाम होता है और ब्राउन कार्बन एयरोसोल फसलों के जलने और जंगल की आग से उत्पन्न होता है। ब्लैक कार्बन बर्फ को काला और मटमैला रंग प्रदान करता है जो आसपास की सफेद या नीली बर्फ की तुलना में सूर्य के प्रकाश को अधिक सोखता है। नतीजतन, बर्फ अपेक्षाकृत तेज़ी से पिघलता है और हिमनदों के सिकुड़ने की दर में वृद्धि होती है। पिघलने की दर में वृद्धि से बर्फ में फंसे पुराने प्रदूषक, बैक्टीरिया और वायरस मुक्त हो जाते हैं जिससे पर्यावरण पर मानवजनित गतिविधि का प्रभाव और तेज़ हो जाता है।

वर्तमान में माइक्रोप्लास्टिक्स महासागरों, नदियों और हवा सहित पृथ्वी के लगभग हर  पर्यावरण में पाए जाते हैं। हाल के अध्ययनों से हिमालय के हिमनदों में माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति के साक्ष्य मिले हैं। संभावना है कि ये माइक्रोप्लास्टिक पिघले पानी के माध्यम से नदियों और तालों में मिल सकते हैं जो लाखों लोगों की जल आपूर्ति को दूषित कर सकते हैं। क्रायोकोनाइट छिद्रों में कीटनाशकों सहित पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे लंबे समय तक टिकाऊ कार्बनिक प्रदूषकों की काफी मात्रा जमा हो सकती है। मानव बस्तियों, पर्यटक पड़ावों और कृषि गतिविधियों के नज़दीकी हिमालयी हिमनदों में इनका उच्च स्तर पाया गया है। इन प्रदूषकों की उपस्थिति के चलते ऐसे बैक्टीरिया का प्राकृतिक चयन हुआ है जो इनको पचाने में सक्षम हैं। मानवजनित  एंटीबायोटिक दवाओं के संदूषण के परिणामस्वरूप क्रायोकोनाइट रंध्रों में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की तादाद भी बढ़ी है। हाल के वर्षों में बर्फ पिघलने की दर में वृद्धि के चलते गर्मियों में ये सूक्ष्मजीव काफी बड़ी संख्या में क्रायोस्फेरिक वातावरण से निकलकर मानव बस्तियों के नज़दीकी पारिस्थितिक तंत्रों में पहुंच जाते हैं। चूंकि इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव और वायरस रोगजनक भी हो सकते हैं इसलिए बर्फ में उपस्थित सूक्ष्मजीवों से स्थानीय महामारी की चिंता पैदा हुई है।

कार्बनिक प्रदूषकों के अलावा, क्रायोकोनाइट रंध्रों में आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम और पारा जैसी भारी धातुएं भी हो सकती हैं जिनकी उच्च मात्रा विषैली होती है। हालांकि, हो सकता है कि ये हानिकारक तत्व चट्टानों के क्षरण और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न हुए हों, लेकिन खनन और औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसी मानव गतिविधियां संभवत: इनके मुख्य स्रोत हैं।

क्रायोकोनाइट कणिकाओं में प्राकृतिक और कृत्रिम स्रोतों से उत्पन्न फालआउट रेडियोन्यूक्लाइड्स (एफआरएन) भी जमा हो सकते हैं; इन स्रोतों में ब्रह्मांडीय विकिरण, परमाणु हथियार परीक्षण और चेरनोबिल एवं फुकुशिमा जैसी परमाणु दुर्घटनाएं शामिल हैं। दुनिया भर में कई क्रायोस्फीयर्स में फालआउट रेडियोन्यूक्लाइड्स का पता चला है। इनमें विशेष रूप से सीज़ियम-137, एमेरिशियम-241  और लेड-201 शामिल हैं। इन रेडियोन्यूक्लाइड्स की मात्रा किसी परमाणु दुर्घटना वाले अत्यधिक दूषित स्थल के बराबर हो सकती है। युरोपीय हिमनदों के क्रायोकोनाइट में सीज़ियम-137 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित स्तर से अधिक पाया गया है। सीज़ियम-137 तो अपनी 30 साल की अल्प अर्धायु के कारण पर्यावरण में घट रहा है, लेकिन मूल रेडियोन्यूक्लाइड्स के विघटन से बनने वाले रेडियोन्यूक्लाइड्स बढ़ भी रहे हैं। इस तरह फॉलआउट रेडियोन्यूक्लाइड्स कई पीढ़ियों तक पर्यावरण में बने रहेंगे जिससे पारिस्थितिक तंत्र और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्यों और अन्य जीवों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। डब्ल्यूएचओ ने पीने के पानी में फालआउट रेडियोन्यूक्लाइड्स के निम्न व मध्यम स्तर पर भी कैंसर और आनुवंशिक विकृतियों की संभावना जताई है।

इन रंध्रों में संदूषकों के जमा होने का कारण क्रायोकोनाइट द्वारा पिघले बर्फ में से कोलाइडीय और अन्य घुले पदार्थों को इकट्ठा करना है। क्रायोकोनाइट में महीन कण (जैसे मिट्टी और गाद) और कार्बनिक पदार्थ (विभिन्न कोशिकीय बहुलक पदार्थों सहित) होते हैं जिनमें फॉलआउट रेडियोन्यूक्लाइड्स,  ट्रेस धातुओं और पोषक तत्वों के लिए उच्च बंधन क्षमता होती है। चूंकि अधिकांश हिमालयी झीलों का विस्तार हिमनदों के सिकुड़ने के कारण हो रहा है, ऐसे में यह संभव है कि इन झीलों में जमा होने वाली तलछट में प्रदूषकों का स्तर काफी अधिक होगा। ये प्रदूषक इन झीलों के पारिस्थितिक तंत्रों के जलीय जीवन और मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। इससे उन समुदायों का सबसे अधिक नुकसान होगा जो पीने के पानी के लिए हिमनद पोषित नदियों पर निर्भर हैं। ऐसे प्रदूषक पदार्थों के निरंतर संपर्क से कैंसर, प्रजनन सम्बंधी विकार और विकास सम्बंधी समस्याओं सहित विभिन्न स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं। लिहाज़ा, जलवायु परिवर्तन और हिमनदों के सिकुड़ने के संदर्भ में क्रायोस्फीयर में जमा दूषित पदार्थों के संभावित स्वास्थ्य प्रभाव चिंता का विषय हैं। जैसे-जैसे हिमनद पिघलेंगे, हिमालय की नदियों में बहने वाले पानी की मात्रा में वृद्धि होगी और संभव है कि इससे विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में संदूषण सम्बंधी जोखिमों में भी वृद्धि होगी। जैसा कि शुरू में बताया गया था, हिमनदों के सिकुड़ने से पूर्व में संग्रहित दूषित पदार्थ भी उजागर हो सकते हैं जिससे स्वच्छ जल आपूर्ति में अतिरिक्त प्रदूषक मिल सकते हैं। गर्माती दुनिया में हिमनदों का निरंतर पिघलना और क्रायोस्फीयर सिस्टम में उभरते हुए घुलनशील प्रदूषकों की उच्च मात्रा को ध्यान में रखते हुए मीठे पानी के स्रोतों में प्रदूषक पदार्थों का जोखिम बढ़ जाएगा। यह एक बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए। ऐसे में हिमालय में क्रायोकोनाइट रंध्रों और हिमनदों के आसपास की झीलों में जैव-रासायनिक चक्र, पारिस्थितिकी और दूषित पदार्थों के संचय को समझना डाउनस्ट्रीम पर्यावरण में मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में इन संदूषक पदार्थों के प्रभाव को समझने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। इस समस्या की गंभीरता का आकलन करने के लिए हिमनदों और क्रायोकोनाइट रंध्रों में प्रदूषकों के स्तर की निगरानी करने के साथ पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर इन प्रदूषकों के प्रभाव को कम करने के लिए रणनीति विकसित करना आवश्यक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ते तापमान से प्रजातियों की विलुप्ति का खतरा – अली खान

दुनिया में इस सदी के आखिर तक तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास चल रहे हैं, वहीं एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती गर्मी से प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम पैदा होगा। बता दें कि युनिवर्सिटी ऑफ केपटाउन के शोधकर्ताओं ने 35 हज़ार प्रजातियों पर चरम तापमान के बढ़ते प्रभाव का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष हासिल किया है।

नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं का दावा है कि यदि तापमान 2.5 डिग्री तक बढ़ा तो बढ़ती गर्मी को सहन न कर पाने की वजह से 30 फीसदी प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगी। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि तापमान बढ़ोतरी 1.5 डिग्री होने पर भी 30 फीसदी प्रजातियां अपनी भौगोलिक सीमा में बेहद अधिक तापमान अनुभव करेंगी। 2.5 डिग्री की बढ़ोतरी पर यह खतरा दुगना हो जाएगा और प्रजातियों के लिए अपने अस्तित्व को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा।‌ 

ऐसे में यह आवश्यक है कि जानवरों और पौधों पर जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए त्वरित प्रभाव वाले कदम उठाए जाएं।‌

गौरतलब है कि भारत में मौजूद जीव-जंतुओं की 29 प्रजातियां खतरे में आ गई हैं। इनका नाम इंटरनेशनल युनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की लाल सूची में शामिल हो गया है। यह सूची कनाडा में जैव विविधता सम्मेलन (कोप-15) के दौरान जारी की गई थी। सूची के इन नवीनतम आंकड़ों में चेतावनी दी गई थी कि अवैध और गैर-टिकाऊ ढंग से मछली पकड़ने, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और बीमारियों सहित कई खतरों की वजह से जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर प्रश्न चिंह लग गया है। बताते चलें कि आईयूसीएन की लाल सूची दुनिया की जैव विविधता की हालत का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। यह प्रजातियों की वैश्विक विलुप्ति के जोखिम की स्थिति के बारे में जानकारी देती है और संरक्षण लक्ष्यों को परिभाषित करने में मदद करती है। दुनिया भर के 15,000 से अधिक वैज्ञानिक और विशेषज्ञ आईयूसीएन के इस आयोग का हिस्सा हैं।

उन्होंने पाया कि भारत में पौधों, जानवरों और कवकों की 9472 से अधिक प्रजातियों में से 1355 लुप्तप्राय या विलुप्त होने की श्रेणी में है। भारत की 239 नई प्रजातियों को आईयूसीएन की लाल सूची में शामिल किया गया है। इनमें से 29 प्रजातियां गंभीर खतरे में हैं। इससे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों में चिंता व्याप्त हो गई है। अगर समय रहते इस खतरे को नहीं रोका गया तो कई प्रजातियां इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी। इस पर आईयूसीएन के डायरेक्टर ब्रूनो ओबेर्ल का कहना है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से जीव-जंतुओं की हालत खस्ता है। ऐसा ही चलता रहा तो कई जीव-जंतु खत्म हो जाएंगे।

लिहाजा, हमें जैव विविधता और जलवायु के सम्बंधों को सुधारने के प्रयास तत्काल करना होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कीटों को खत्म कर कर रहा कृत्रिम प्रकाश – सुदर्शन सोलंकी

जंतु जगत के संघ आर्थोपोडा के वर्ग इंसेक्टा में विचित्र प्रकार के कीट शामिल हैं और उनके क्रियाकलाप भी विचित्र होते हैं। इसलिए इन कीटों का अध्ययन, शोध और इनके रहस्यमय जीवन की जानकारियां पाना अत्यधिक रुचिकर व मज़ेदार होता है।

सामान्यतः जंतु और पौधे प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं। पौधों में प्रकाशानुवर्तन और गुरुत्वानुवर्तन के गुण विद्यमान हैं। कीटों में भी प्रकाशानुवर्तन होता है। प्रकाशानुवर्तन में कीट प्रकाश स्रोत की ओर गमन करते है। यह प्रवृत्ति धनात्मक प्रकाशानुवर्तन कहलाती है। कीटों का प्रकाश के प्रति आकर्षण भिन्न-भिन्न होता है। कॉकरोच (Periplaneta americana) रोशनी से दूर अंधेरे की तरफ भागते हैं; इस प्रवृत्ति को ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन कहते हैं। कई कीट-पतंगे प्रकाश स्रोत से आकर्षित होकर इनके करीब आते हैं। उदाहरण के लिए, बारिश के मौसम में जलते हुए बल्ब के चारों तरफ हमें ढेरों कीट-पतंगों के झुण्ड देखने को मिलते हैं। कीट-पतंगे रोशनी के स्रोत के इर्द-गिर्द भिनभिनाते रहते हैं, और अंत में प्रकाश स्रोत से टकराकर उसकी गर्मी से मर जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने इनकी इस प्रवृत्ति पर कई शोध किए हैं और तर्क, अवधारणाएं व सिद्धांत दिए हैं किंतु पूरी तरह से सटीक रूप से आज भी इसका जवाब विवादास्पद है।

बायोलोजिकल कंज़र्वेशन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 30 में से 10 कीट बल्ब को चांद समझकर रात भर बल्ब के चक्कर लगाते हैं व सुबह तक मर जाते हैं। एक प्रसिद्ध परिकल्पना के अनुसार जब पूर्व में कृत्रिम प्रकाश स्रोत नहीं थे, तब कीट पतंगे चांद का अनुगमन किया करते होंगे ताकि वे अपनी दिशा का निर्धारण कर सकें। चूंकि चांद से इनकी दूरी बहुत अधिक है इसलिए इनके द्वारा गति करने पर बनाया गया कोण हमेशा ही एक समान बना रहेगा। लेकिन अब कृत्रिम प्रकाश स्रोत के होने से उन्हें यह आभास होने लगा कि चांद धरती पर आ गया है। इस परिकल्पना के मुताबिक वे अपने और कृत्रिम प्रकाश स्रोत (जिसे वे चांद समझ रहे हैं) के बीच समान कोण बनाए रखना चाहते हैं, किंतु प्रकाश स्रोत करीब होने से ऐसा संभव नहीं हो पाता और वे उसी से टकराकर मर जाते हैं।

वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि केवल नर कीट ही प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं जबकि मादा नहीं। ज्ञात हुआ है कि नर कीट-पतंगों को अपनी ओर आ‍कर्षित करने के लिए मादा कीट-पतंगे विशेष प्रकार की गंध छोड़़ते हैं। यह गंध वैसी ही होती है जैसी गंध जलते हुए प्रकाश स्रोत से निकलती है। इस कारण से नर कीट को आभास होता है कि वहां कोई मादा है और वह उसकी खोज में प्रकाश के करीब पहुंच जाते हैं एवं प्रकाश स्रोत से टकराकर मर जाते हैं।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार 60 प्रतिशत कीटों को कृत्रिम प्रकाश में दिखना भी बंद हो जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि कीट-पतंगे रोशनी के संपर्क में आने के बाद जब उससे दूर होते हैं तब इन्हें करीब आधे घंटे तक कुछ भी दिखाई नहीं देता है। इस वजह से अंधेपन से बचने के लिए वे प्रकाश स्रोत के चारों ओर मंडराते रहते हैं। जब अचानक से ये स्रोत के बहुत करीब पहुंचकर उससे टकराते हैं तब उसकी गर्मी से इनकी मौत हो जाती है।

परीक्षणों द्वारा यह भी पता चला है कि कुछ मादा पतंगे अपने शरीर से अवरक्त प्रकाश (इंफ्रारेड) उत्पन्न करती हैं जिससे नर पतंगे आकर्षित होते हैं। ठीक उसी तरह का अवरक्त प्रकाश आग या जलती हुई चीजों से उत्पन्न होता है जिससे नर पतंगे आकर्षित होते हैं। यही कारण है की कीट-पतंगे प्रकाश स्रोत के आसपास मंडराते रहते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक जर्मनी में गाड़ियों की हेडलाइट से सालाना करीब 120 करोड़ से ज़्यादा कीट मारे जाते हैं।

रात में कीट सफेद व पीले रंग के कपड़ों में चिपकने लगते हैं क्योंकि इन्हें पराबैंगनी प्रकाश और कम तरंग दैर्घ्य के रंग अत्यधिक आकर्षित करते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदी होते हैं।

स्पष्ट है कि अब तक कीटों के प्रकाश के प्रति आकर्षण के बारे में वैज्ञानिकों द्वारा कोई ठोस व एकमेव सिद्धांत नहीं दिया गया है। यानी कीटों का प्रकाश की ओर आकर्षण अब तक एक रहस्य है। किंतु हमें समझना होगा कि कीट-पतंगे मिट्टी को उपजाऊ बनाने में, परागण में व खाद्य उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मल एवं लाशों का सफाया करने में भी कीटों का बड़ा योगदान है। हम कई मामलों में इनकी 9 लाख प्रजातियों पर निर्भर हैं। इसलिए इन्हें बचाने के लिए हमें कृत्रिम प्रकाश का उपयोग कम करके अन्य विकल्प खोजने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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पश्चिमी घाट का पालक्कड़ (पालघाट) दर्रा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

श्चिमी घाट का एक अहम विभाजक कहा जाने वाला पालक्कड़ दर्रा लगभग 40 किलोमीटर चौड़ा है। इसके दोनों ओर समुद्र तल से 2000 मीटर तक ऊंचे, एकदम खड़ी ढलान वाले नीलगिरी और अन्नामलाई पर्वत हैं।

ऐतिहासिक रूप से पालक्कड़ दर्रा केरल राज्य में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण रहा है। यहां से कोयम्बटूर को पालक्कड़ से जोड़ने वाले सड़क और रेल मार्ग गुज़रते हैं। इसके बीच से भरतप्पुझा नदी बहती है। पश्चिमी घाट के ऊष्णकटिबंधीय वर्षावनों के विपरीत, पालक्कड़ दर्रे की वनस्पति शुष्क सदाबहार वन की श्रेणी में आती है। यह दर्रा पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली वनस्पतियों और जंतुओं का विभाजक भी है। उदाहरण के लिए, मेंढकों की कई प्रजातियां दर्रे के केवल एक तरफ पाई जाती हैं।

भूवैज्ञानिक उथल-पुथल

यह दर्रा एक भूवैज्ञानिक अपरूपण क्षेत्र है जो पूर्व-पश्चिम की ओर खुलता है। अपरूपण क्षेत्र पृथ्वी की भूपर्पटी के कमज़ोर क्षेत्र होते हैं – यही कारण है कि कोयम्बटूर क्षेत्र में कभी-कभी भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं।

माना जाता है कि पालक्कड़ दर्रे का निर्माण ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के गोंडवाना भूभाग से टूटकर अलग होने के बाद महाद्वीपीय जलमग्न तटों के बहाव की वजह से हुआ है।

भारत और मेडागास्कर तब तक एक ही भूभाग का हिस्सा थे जब तक कि बड़े पैमाने पर हुई ज्वालामुखीय गतिविधि ने दोनों को विभाजित नहीं कर दिया था; यह विभाजन वहां हुआ था जहां पालक्कड़ दर्रा है – यह दर्रा बिलकुल मेडागास्कर के पूर्वी ओर स्थित रेनोत्सरा दर्रे का दर्पण प्रतिबंब है। दर्रा कितना पहले बना था? मेडागास्कर लगभग 10 करोड़ साल पहले अलग हो गया था, और दर्रा इससे पहले बन गया था; लेकिन कितने पहले बना था इस पर अभी सोच-विचार जारी है।

यह अनुमान है कि दर्रे के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों में अंतर का एक कारण प्राचीन नदी या सुदूर अतीत में समुद्र की घुसपैठ हो सकता है।

नीलगिरी पर्वत पर पाए जाने वाले हाथियों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अन्नामलाई पर्वत और पेरियार अभयारण्यों में पाए जाने वाले हाथियों से भिन्न होते हैं।

आईआईएससी बैंगलोर द्वारा किए गए एक अध्ययन में पेट पर सफेद धारी वाले शॉर्टविंग पक्षी के डीएनए अनुक्रम के विस्तृत डैटा का विश्लेषण किया गया है। शॉर्टविंग एक स्थानिक और संकटग्रस्त पक्षी है। ऊटी और बाबा बुदान के आसपास पाए जाने वाले पक्षियों को नीलगिरी ब्लू रॉबिन कहा जाता है; अन्नामलाई पर पाए जाने वाले पक्षी दिखने में थोड़े अलग होते हैं, और इन्हें व्हाइट-बेलीड ब्लू रॉबिन कहा जाता है।

दर्रे का दक्षिणी भाग

किसी भी क्षेत्र की जैव विविधता दो तरीकों से व्यक्त की जाती है। एक, प्रजातियों की प्रचुरता से। यानी किसी पारिस्थितिकी तंत्र में कितनी प्रजातियां पाई जाती हैं। और दूसरा, फाइलोजेनेटिक विविधता से। फाइलोजेनेटिक विविधता में देखा जाता है कि वहां उपस्थित प्रजातियों के बीच जैव विकास की दृष्टि से कितनी दूरी है।

हैदराबाद स्थित सीसीएमबी और अन्य संस्थानों के शोधदल द्वारा प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार पालक्कड़ दर्रे के दक्षिणी पश्चिमी घाट में ये दोनों विविधताएं प्रचुर मात्रा में हैं। मैग्नोलिया चंपका (चंपा) सहित यहां पेड़ों की 450 से अधिक प्रजातियां हैं, जो यहां लगभग 13 करोड़ वर्षों से अधिक समय से हैं।

भूमध्य रेखा से करीब होने के कारण गर्म मौसम और नम हवा के कारण दक्षिणी पश्चिमी घाट में बहुत बारिश होती है। इसलिए यह क्षेत्र जीवन के सभी रूपों के लिए एक आश्रय की तरह रहा है, भले ही बार-बार आते हिमयुगों और सूखे के चक्र ने आसपास के क्षेत्रों में जैव विविधता कम कर दी हो। देखा जाए तो पालक्कड़ दर्रे के उत्तर की ओर सालाना अधिक बारिश होती है, लेकिन दक्षिणी हिस्से में साल भर समान रूप से बारिश होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ता तापमान और बेसबॉल में बढ़ते होम रन

ह तो हम जानते हैं कि बढ़ता वैश्विक तापमान जीवन पर असर डालता है। लेकिन यह बात शायद थोड़ा हैरान कर दे कि यह खेलों को भी प्रभावित करता है। फिलहाल यह बात बेसबॉल के मामले में कही गई है।

दरअसल, हवा जितनी गर्म होगी उसका घनत्व उतना कम होगा। इसलिए वैश्विक तापमान में वृद्धि से, बल्ले द्वारा उछाली गई गेंद को हवा में कम घर्षण मिलेगा और सिद्धांतत: होम रन की संख्या बढ़ेगी। हालिया अध्ययन बताता है कि 2010 के बाद से मेजर लीग बेसबॉल (एमएलबी) में लगभग 0.8 प्रतिशत होम रन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण हुए हैं। हालांकि हाल के दशकों में होम रन की संख्या बढ़ने में अन्य कारकों की भूमिका भी रही है, जैसे खिलाड़ियों के बेहतर प्रयास और गेंद की डिज़ाइन आदि। बेसबॉल के खेल में आम तौर पर होम रन गेंद के मैदान को छुए बगैर सीमापार जाने पर माना जाता है।

वैसे 2012 में एक मैच के दौरान, पूर्व खिलाड़ी और कमेंटेटर टिम मैककार्वर ने संभावना जताई थी कि बढ़ते होम रन का कारण जलवायु परिवर्तन हो सकता है। उस समय तो यह विचार खारिज कर दिया गया था। लेकिन बेसबॉल प्रशंसक और जलवायु वैज्ञानिक क्रिस्टोफर कैलेहन ने इसे परखने का सोचा।

होम रन की बढ़ती संख्या में बढ़ते तापमान और घटते वायु घनत्व की भूमिका देखने के लिए कैलेहन के दल ने एमएलबी द्वारा सहेजे गए अथाह डैटा को देखा। एमएलबी ने दशकों से होम रन के आंकड़े तो सहेज ही रखे थे, साथ ही वर्ष 2015 से स्वचालित कैमरों और कंप्यूटरों द्वारा हर गेंद के वेग और प्रक्षेपवक्र का भी रिकॉर्ड रखा हुआ था।

दल ने 1962 से 2019 के बीच विभिन्न स्टेडियम में हुए एमएलबी मैचों वाले लगभग 1,00,000 दिनों के तापमान और होम रन का विश्लेषण किया। कंट्रोल के तौर पर उन्होंने 2015 से 2019 के बीच खेले गए मैचों में 2,20,000 बल्लेबाज़ों के हाई-स्पीड वीडियो फुटेज का विश्लेषण किया। दोनों विश्लेषणों के नतीजे एक ही थे: औसतन, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियम की वृद्धि होम रन में लगभग 2 प्रतिशत की वृद्धि होती है। अमेरिकन मिटिरियोलॉजिकल सोसायटी के अनुसार हर 1 डिग्री सेल्सियस अतिरिक्त तापमान ने हर बेसबॉल सीज़न में 95 अतिरिक्त होम रन दिए हैं, और 2010 के बाद से 500 से भी अधिक अतिरिक्त होम रन बढ़ते तापमान की देन हैं।

वैसे, यह संख्या 2010 के बाद से मारे गए 65,300 से भी अधिक होम रन के सामने कुछ भी नहीं है। पिछले 40 सालों में प्रति गेम होम रन की संख्या 34 प्रतिशत बढ़ी है। और इसमें से अधिकांश बढ़त का जलवायु परिवर्तन से कोई लेना-देना नहीं है। होम रन की संख्या बढ़ने के मुख्य कारक बल्लेबाज़ के होम रन करने के प्रयास, और गेंद की सिलाई में बदलाव हैं।

बहरहाल, इतने अधिक और अच्छी तरह सहेजे गए डैटा की बदौलत जलवायु परिवर्तन का होम रन पर इतना बारीक प्रभाव पता लगा है और यह तापमान बढ़ने के साथ बढ़ेगा। तापमान बढ़ता रहा तो मैच के लिए रात का समय या बंद स्टेडियम पर विचार करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिबंधित सीएफसी का बढ़ता स्तर

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) के तहत ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले रसायन क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) के उपयोग को 2010 तक पूरी तरह खत्म करने का संकल्प लिया गया था। यह काफी सफल रहा था और उम्मीद थी कि 2060 ओज़ोन परत बहाल हो जाएगी। लेकिन ताज़ा आंकड़ों ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।

नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2020 के बीच 5 प्रकार के सीएफसी के स्तर में काफी तेज़ी से वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन सीएफसी का वर्तमान स्तर ओज़ोन परत की बहाली के लिए ज़्यादा खतरा उत्पन्न नहीं करता है। लेकिन सीएफसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें भी हैं जो जलवायु को प्रतिकूल प्रभावित करती हैं। गौरतलब है सीएफसी सैकड़ों वर्षों तक वातावरण में बने रहते हैं। इन 5 सीएफसी की वजह से वातावरण जितना गर्म होगा वह स्विट्ज़रलैंड जैसे किसी छोटे देश द्वारा किए गए उत्सर्जन के असर के बराबर होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार काफी संभावना है कि सीएफसी विकल्पों के उत्पादन के दौरान संयंत्रों से गलती से सीएफसी-113A, सीएफसी-114A और सीएफसी-115 का उत्सर्जन हो रहा हो। वास्तव में सीएफसी को खत्म करने के लिए हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) को विकल्प के रूप में लाया गया था। लेकिन एचएफसी उत्पादन के दौरान अनपेक्षित रूप से सीएफसी के उत्पादन की संभावना बनी रहती है। इस प्रकार के उत्पादन को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत हतोत्साहित किया गया था लेकिन प्रतिबंधित नहीं किया गया था।

अन्य दो सीएफसी (सीएफसी-13 और सीएफसी-112A) के स्तर में वृद्धि एक रहस्य है क्योंकि इनका उत्पादन या उपयोग  प्रतिबंधित है। संभावना है कि विलायक या रासायनिक फीडस्टॉक के तौर पर उपयोग के कारण सीएफसी-112A के स्तर में वृद्धि हो रही है। लेकिन सीएफसी-13 के उत्सर्जन का अभी तक कोई सुराग नहीं है। वैश्विक स्तर पर पर्याप्त निगरानी स्टेशन की अनुपस्थिति में सीएफसी-13 के स्रोत का पता लगाना मुश्किल है।    

बहरहाल, आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि वैश्विक निगरानी प्रणाली काफी सक्रियता से काम कर रही है और वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी के वातावरण और जलवायु समस्याओं पर कड़ी नज़र रखी जा रही है। पूर्व में भी दक्षिण कोरिया और जापान के निगरानी स्टेशन से सीएफसी-11 के उच्च स्तर का पता लगा था, जिसका स्रोत पूर्वी चीन में मिला था। इसके उत्सर्जन को नियंत्रित किया गया और इसके स्तर में कमी आने लगी। लिहाज़ा, अधिक निगरानी स्टेशनों की ज़रूरत है।

यदि हाल ही में खोजे गए 5 सीएफसी का अधिकांश उत्सर्जन सीएफसी-विकल्पों के उत्पादन के दौरान हो रहा है तो विकल्पों के बारे में विचार करना आवश्यक है। शायद हाइड्रोफ्लोरोओलीफीन्स (एचएफओ) का उपयोग करना होगा। लेकिन उसके उत्पादन से भी सीएफसी का उत्सर्जन हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कार्बन डाईऑक्साइड: उत्सर्जन घटाएं या हटाएं?

हालिया जलवायु सम्मेलनों में नेट-ज़ीरो उत्सर्जन काफी चर्चा में रहा। इसमें नेट शब्द का अर्थ है कि हम सिर्फ उत्सर्जन कम करने पर नहीं बल्कि कार्बन डाईऑक्साइड को वातावरण में हटाने पर भी ध्यान दें। एक विचार यह है कि सिर्फ उत्सर्जन कम करके हम 1.5 या 2 डिग्री वृद्धि का लक्ष्य नहीं पा सकेंगे।

फिलहाल उड्डयन और नौपरिवहन ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े स्रोत हैं, और आगे भी बने रहने की संभावना है। ऐसे में बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए कार्बन डाईऑक्साइड रिमूवल (सीडीआर) की भी आवश्यकता है।

सीडीआर का ऐतिहासिक तरीका पेड़ लगाना रहा है, लेकिन वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड हटाकर भूमि, समुद्र या अन्य स्थानों पर संग्रहित कर देना शायद अधिक टिकाऊ साबित हो।

वर्तमान में कई कंपनियां विभिन्न सीडीआर तकनीकों को जलवायु समाधान के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। इस विषय में प्राकृतिक कार्बन चक्र और हाल ही में सीडीआर तकनीकों पर काम कर रहे डेविड टी. हो लंबी अवधि के लिए सीडीआर तकनीकों को विकसित करने के पक्ष में तो हैं लेकिन थोड़े संशय में हैं। गौरतलब है कि पूर्व में डायरेक्ट एयर कैप्चर (डीएसी) तकनीक का छोटे स्तर पर प्रदर्शन किया गया था जो रासायनिक तरीकों से कार्बन डाईऑक्साइड को वातावरण से बाहर करती है। इसके लिए 2022 में यू.एस. बायपार्टीज़न इंफ्रास्ट्रक्चर कानून ने चार डीएसी विकसित करने के लिए 3.5 अरब डॉलर का अनुदान देने का भी निर्णय लिया था। लेकिन डेविड के अनुसार यह प्रयास तब तक व्यर्थ है जब तक प्रदूषणकारी गतिविधियों को पूरी तरह से खत्म न कर दिया जाए।

इसको इस तरह से समझें। हमें कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर को कई वर्ष पहले की स्थिति में ले जाना है। प्रत्येक डीएसी सुविधा से प्रतिवर्ष 10 लाख टन कार्बन डाईऑक्साइड वातावरण से बाहर करने की उम्मीद है। अब देखिए कि 2022 में 40.5 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ है। यदि डीएसी संयंत्र वर्ष भर अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करते हैं तो इससे वातावरण की स्थिति को मात्र 13 मिनट पीछे ले जाया जा सकता है। लेकिन 13 मिनट में जितनी कार्बन डाईऑक्साइड हटाई जाएगी उतने ही समय में बाकी गतिविधियां साल भर की कार्बन डाईऑक्साइड वापस वातावरण में उंडेल देंगी। अब यह देखिए कि यदि हर व्यक्ति एक पेड़ लगाए इन 8 अरब पेड़ों के परिपक्व होने के बाद हमारा वातावरण हर वर्ष 43 घंटे पीछे जा सकता है।

कुल मिलाकर इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सीडीआर तकनीकों की क्षमता कितनी सीमित है।

ऐसे में सीडीआर तकनीकों को तत्काल समाधान के रूप में देखना उचित नहीं है। आने वाले समय में जलवायु समाधानों के लिए काफी धन आवंटित होने की उम्मीद है जिसका सही दिशा में उपयोग करना आवशयक है। यदि हम कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन के मौजूदा स्तर को लगभग 10 प्रतिशत यानी 4 अरब टन प्रति वर्ष तक कम करते हैं तो 10 लाख टन हटाने में सक्षम एक डीएसी संयंत्र हमें 13 मिनट के बजाय 2 घंटे से अधिक समय पीछे ले जाएगी। इस स्थिति को देखते हुए एक निर्धारित वर्ष में नेट ज़ीरो हासिल करने के लिए पूरी तरह से अक्षय ऊर्जा द्वारा संचालित 4000 डीएसी सुविधाओं की आवश्यकता होगी।

इस तरह से अवशिष्ट उत्सर्जन संभवत: हमारे वर्तमान कुल उत्सर्जन का 18 प्रतिशत होगा, इसलिए नेट-ज़ीरो तक पहुंचने के लिए कई सीडीआर स्थापित करने होंगे। तकरीबन 7290 डीएसी हब बनाना पर्याप्त होगा। साथ ही, सीडीआर विधियों की खोज के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है जो भूमि उपयोग और ऊर्जा खपत को कम करें तथा जिन्हें स्थायी और सस्ता बनाया जा सके।

फिर भी, यह ज़रूरी नहीं कि प्रयोगशाला में सुचारू रूप से काम करने वाली तकनीकें वास्तविक दुनिया में भी वैसे ही काम करेंगी। इनमें से कुछ तकनीकें जैव विविधता और पर्यावरण के लिए हानिकारक भी हो सकती हैं। यह सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है कि सीडीआर वास्तव में कितना काम कर रहा है। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक कलहंसों को मिला नया प्रजनन स्थल

निरंतर हो रहे जलवायु परिवर्तन से गुलाबी पैरों वाले कुछ गीस (कलहंसों) ने उत्तरी रूस में एक ठिकाना बना लिया है। यह स्थान उनके पारंपरिक ग्रीष्मकालीन प्रजनन क्षेत्र से लगभग 1000 किलोमीटर उत्तर पूर्व में है। विशेषज्ञों के अनुसार यह घटना इस तथ्य की ओर संकेत देती हैं कि कुछ प्रजातियां, थोड़े समय के लिए ही सही, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ अनुकूलन कर सकती हैं। गौरतलब है कि प्रत्येक वसंत ऋतु में लगभग 80,000 कलहंस (एन्सेर ब्रैचिरिन्चस) नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीपसमूह में प्रजनन के लिए डेनमार्क, नेदरलैंड और बेल्जियम से उत्तर की ओर प्रवास करते हैं। स्वीडन और फिनलैंड में कुछ हज़ार पक्षियों के देखे जाने के बाद वैज्ञानिकों ने 21 पक्षियों को जीपीएस ट्रैकर लगाए। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ट्रैकर लगे आधे पक्षी उत्तरी रूस के एक द्वीपसमूह नोवाया ज़ेमल्या के उत्तर-पूर्व की ओर उड़ गए। इस क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने नई प्रजनन आबादी पाई जिसमें लगभग 3-4 हज़ार पक्षी शामिल हो सकते हैं। नोवाया ज़ेमल्या का वर्तमान वसंत तापमान अब स्वालबार्ड के दशकों पहले रहे तापमान के समान है। ऐसी संभावना है कि पक्षियों ने अपने नए प्रजनन क्षेत्र चुन लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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एक इकोसिस्टम की बहाली के प्रयास

मानव गतिविधियों से न जाने कितने प्राकृतिक स्थलों की दुर्दशा हो गई है। इन्हीं में से एक है इटली की बेगनोली खाड़ी, जिसमें समुद्री जीवन लगभग शून्य हो चुका है। ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बेगनोली खाड़ी की तलछट में बचे रह गए पर्यावरणीय डीएनए (तलछटी डीएनए) की मदद से 200 साल पीछे तक का जैविक इतिहास खंगाला और इस पारिस्थितिक तंत्र के तबाह होने की क्रमिक तस्वीर निर्मित की। ऐसी जानकारी बेगनोली खाड़ी और अन्य खस्ताहाल पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली में मददगार हो सकती है।

दरअसल औद्योगिक क्रांति से पहले, लगभग 1827 तक बेगनोली खाड़ी स्वस्थ और सुंदर हुआ करती थी। इसमें नेपच्यून घास उगा करती थी और यह कृमियों, समुद्री स्क्वर्ट्स, स्पॉन्ज और छोटे प्लवकों जैसे जीवों का घर हुआ करती थी। लेकिन 20वीं शताब्दी के आरंभ तक, स्टील और एस्बेस्टस संयंत्र बनने के साथ खाड़ी के बीच मौजूद द्वीप को मुख्य ज़मीन से जोड़ने के लिए पुल बने। इन गतिविधियों ने इसकी समुद्री घास को तबाह कर दिया था, जिससे इस पर निर्भर जीवन भी प्रभावित हुआ। नतीजतन खाड़ी प्रदूषित होती गई और इसका पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाता गया।

ऐसा नहीं था कि खाड़ी की बहाली के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे थे। यह अध्ययन बहाली के इन्हीं प्रयासों के चलते किया गया था। दरअसल बहाली के लिए उठाए गए कदमों से खाड़ी का प्रदूषण तो काफी हद तक कम हो गया था, लेकिन इसके पारिस्थितिक तंत्र में कोई खास सुधार नहीं हो सका था।

पारिस्थितिक तंत्र की बहाली के लिए यह पता होना ज़रूरी है कि मानव दखल या औद्योगिक क्रांति से पहले आखिर यह था कैसा? इसमें कौन से जीव, प्रजातियां, पौधे वगैरह वापस लाए जाएं और किस हिसाब से वापस लाए जाएं।

इसके लिए दो समुद्री पारिस्थितिकीविदों एंटॉन डॉर्न ज़ुऑलॉजिकल इंस्टीट्यूट की लॉरेना रोमेरो और अर्बिनो युनिवर्सिटी के मार्को कैवलियरे ने सोचा कि इसकी तलछट में मौजूद डीएनए इसकी पूर्वस्थिति के सुराग दे सकते हैं।

तलछटी डीएनए के अध्ययन से शोधकर्ता न सिर्फ मानव दखल से पहले और बाद की खाड़ी की तस्वीर बना पाए बल्कि वे यह भी पता कर पाए कि समय के साथ धीरे-धीरे खाड़ी किस तरह बदहाल होती गई। तलछटी डीएनए के अध्ययन का फायदा यह है कि तलछट परत-दर-परत जमा होती है, और हर परत में मौजूद डीएनए उस काल विशेष के जीवन के बारे में बता सकते हैं। खाड़ी की परतों के नमूनों में शोधकर्ताओं को कुछ अनजानी प्रजातियों के डीएनए भी मिले।

इस लिहाज से तलछटी डीएनए का अध्ययन किसी पारिस्थितिक तंत्र की बहाली के लिए एक उम्दा तरीका लगता है लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। मसलन, डीएनए समय के साथ क्षतिग्रस्त होते जाते हैं। संभावना है कि इसमें कई प्रजातियां छूट जाएं। इसलिए इसे पारिस्थितिकी पता करने के कई तरीकों में से एक तरीके के तौर पर देखा जाना चाहिए न कि एकमात्र तरीके के तौर पर। (स्रोत फीचर्स)

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प्लास्टिकोसिस की जद में पक्षियों का जीवन – अली खान

हालिया अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि प्लास्टिक के कारण समुद्री पक्षियों का पाचन तंत्र खराब हो रहा है। बता दें कि यह पहली बार प्लास्टिक से होने वाली बीमारी का पता चला है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम प्लास्टिकोसिस रखा है। फिलहाल यह बीमारी समुद्री पक्षियों को हो रही है। लेकिन आशंका है कि भविष्य में यह कई प्रजातियों में फैल सकती है।

प्लास्टिकोसिस उन पक्षियों को हो रहा है जो समुद्र में अपना शिकार ढूंढते हैं। शिकार के साथ ही उनके शरीर में छोटे और बड़े आकार के प्लास्टिक चले जाते हैं जिनसे उनके शरीर को नुकसान होने लगता है। धीरे-धीरे वे बीमार होकर मर जाते हैं। वैज्ञानिकों ने प्लास्टिकोसिस की वजह से शरीर पर पड़ने वाले असर को भी रिकॉर्ड किया है।

इस शोध की रिपोर्ट हैज़ार्डस मटेरियल्स जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोध के मुताबिक प्लास्टिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि विभिन्न उम्र के पक्षियों में प्लास्टिक की उपस्थिति के संकेत पाए गए हैं। शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया में शीयरवाटर्स पक्षी का अध्ययन करने के बाद यह जानकारी दी है। अध्ययन में बताया गया है कि पक्षियों की आहार नाल के प्रोवेन्ट्रिकुलस नामक अंग की ग्रंथियों के क्रमिक क्षय के कारण यह रोग होता है। इन ग्रंथियों की कमी से पक्षी संक्रमण और परजीवियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ये भोजन को पचाने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

हकीकत यही है कि रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक थैलियों, बर्तनों व अन्य प्लास्टिक से उपजा प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक एक ऐसा नॉन-बायोडीग्रेडबल पदार्थ है जो जल और भूमि में विघटित नहीं होता है। यह लंबे समय तक हवा, मिट्टी व पानी के संपर्क में रहने पर हानिकारक विषैले पदार्थ उत्सर्जित करने लगता है। ये विषैले पदार्थ घुलकर पानी के स्रोतों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में यह लोगों में विभिन्न प्रकार की बीमारियां फैलाने का काम करता है। एक शोध से पता चला है कि प्लास्टिक के ज़्यादा संपर्क में रहने से खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है जिससे गर्भ में शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है। प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनाल रसायन शरीर में मधुमेह और यकृत एंज़ाइम को असंतुलित कर देता है। इसके अलावा प्लास्टिक कचरा जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे श्वसन, त्वचा और आंखों से सम्बंधित बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है।

सवाल है कि प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम कैसे हो? सर्वप्रथम तो प्लास्टिक के खतरों के प्रति आम लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। साथ ही सरकारी प्रयासों को गति दी जानी चाहिए। इसमें आम लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी है। इसके बिना प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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