दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।
एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।
एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।
दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
आने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?
एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।
परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।
यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।
इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।
दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही मौसम की भविष्यवाणी।
इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।
ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।
एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया।
1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।
इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)
हाल ही में सान्टा मार्टा में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में 50 से अधिक देश शामिल हुए। यह एक अलग तरह का जलवायु सम्मेलन था, जिसमें फैसलों में वैज्ञानिकों को ज़्यादा महत्व दिया गया, न कि सिर्फ राजनीति को। Transitioning Away from Fossil Fuels नाम का यह सम्मेलन इस ओर इशारा करता है कि कुछ देश अब प्रदूषण कम करने के नए तरीके अपनाना चाहते हैं।
आम तौर पर COP30 जैसी बैठकों में वैज्ञानिकों की बात राजनीतिक चर्चाओं के बीच कमज़ोर पड़ जाती है। लेकिन इस बैठक में वैज्ञानिकों को सीधे निर्णय लेने वालों से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसी दौरान एक समूह बनाया गया, जो सरकारों को स्वतंत्र और वैज्ञानिक स्तर पर सलाह देगा, ताकि वे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सकें।
पूर्व में आयोजित वैश्विक बैठकों में कई तेल उत्पादक देशों ने जीवाश्म ईंधन को कम करने के स्पष्ट कदमों का विरोध किया, जिससे निराशा बढ़ी। इसी वजह से कोलंबिया और नीदरलैंड जैसे देशों ने एक अलग बैठक आयोजित की, जिसमें सिर्फ उन्हीं देशों को बुलाया गया जो बदलाव के लिए तैयार थे।
इस बैठक में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट और काम करने लायक सुझाव दिए। यह रिपोर्ट लंबी-चौड़ी बातों की बजाय सीधे लागू होने वाली नीतियों पर केंद्रित थी। इसमें मुख्य सुझाव थे—नए फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाना, इन पर मिलने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना, और सौर व पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।
इस प्रक्रिया में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सम्मेलन को एक खास मौका बताया, जहां वे सीधे उन नीति-निर्माताओं से बात कर सके जो वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर फैसले लेना चाहते हैं। उनका मानना है कि इस तरीके से ज़्यादा साफ और असरदार नीतियां बन सकती हैं, क्योंकि इसमें वे समझौते कम होते हैं जो अक्सर अंतर्राष्ट्रीय संधियों को कमज़ोर कर देते हैं।
इस सम्मेलन की अहमियत सिर्फ इसके सुझावों में ही नहीं, बल्कि इसके तरीके में भी है। इसमें विज्ञान को प्राथमिकता दी गई, जो ऐसे समय में ज़रूरी है जब दुनिया में प्रदूषण अभी भी काफी अधिक है। भले ही इसमें कम देश शामिल हुए, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर आगे चलकर बड़े पैमाने पर दिख सकता है। इस बैठक से यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि मज़बूत वैज्ञानिक समझ भी ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit: https://www.lowyinstitute.org/sites/default/files/2025-11/54906955698_ec14fbec01_k.jpg
जैसे-जैसे कंपनियां और सरकारें जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास बढ़ा रही हैं, यह सवाल उठ रहा है कि हवा से कार्बन डाईऑक्साइड हटाने का सबसे सही तरीका क्या है? पेड़ लगाने जैसे प्राकृतिक उपाय या मशीनों से कार्बन कैप्चर वाली तकनीक? इस पर नियम तय किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी यह साफ नहीं है कि किसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल, ‘प्रकृति बनाम तकनीक’ का विवाद सही नहीं है। ज़रूरी यह है कि हम समझें कि कौन सा तरीका कैसे काम करता है, कब उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और वह किस समस्या का समाधान करता है। अगर इन दोनों को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा जाएगा, तो ज़रूरी कदम उठाने में देरी हो सकती है।
कम समयावधि में, पेड़ लगाना और मिट्टी में कार्बन वृद्धि जैसे प्राकृतिक उपाय बहुत काम के होते हैं। इन्हें जल्दी लागू किया जा सकता है और ये अगले 20 सालों में हवा से कार्बन कम करने में मदद करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सबसे अहम समय है। भले ही यह कार्बन हमेशा के लिए न रुके, लेकिन जल्दी किया गया यह काम भी काफी फायदा देता है।
मध्य समयावधि में, कुछ उद्योग – जैसे हवाई यात्रा और बड़ी फैक्ट्री – पूरी तरह प्रदूषण कम नहीं कर पाते। ऐसे में कार्बन हटाना ज़रूरी हो जाता है। यहां ऐसे तरीके ज़्यादा काम के हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक कैप्चर रख सकें, जैसे ज़मीन के अंदर स्टोर करना या उसे ठोस रूप में बदल देना, ताकि वह लंबे समय तक हवा में वापस न जाए।
दीर्घ समयावधि में, कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए सैकड़ों साल तक लगातार प्रयास करने होंगे। यह काम किसी एक तरीके से नहीं हो सकता, बल्कि सभी उपलब्ध उपायों को साथ मिलाकर अपनाना पड़ेगा।
हालांकि, अलग-अलग अवधि के ये लक्ष्य जुड़े हुए ज़रूर हैं, लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इन्हें गड्डमड्ड करने से नीतियां बनाने और निवेश करने में उलझन पैदा होती है। इसलिए ज़रूरत है दोनों के संतुलित इस्तेमाल की, तभी जलवायु परिवर्तन से सही तरीके से निपटा जा सकता है। बहरहाल, लंबे समय से कार्बन डाईऑक्साइड को कम करने के लिए तकनीक का उपयोग करने से हटकर एक संतुलित दृष्टिकोण पर चर्चा होने लगी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit: https://thumbs.dreamstime.com/b/technology-trees-growing-digital-network-lines-conceptual-image-green-emerging-complex-glowing-symbolizing-energy-448000897.jpg?w=768
यह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।
अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।
तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।
सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।
नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।
इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।
शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।
वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://scitechdaily.com/images/Glow-of-Coronae.jpg
यह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है कि हमारे पास अनाज (Grains) की ऐसी फसलें होंगी जिन्हें हर साल नए सिरे से बोने की ज़रूरत नहीं होगी; एक बार बो दिया और साल-दर-साल दाने लेते रहिए। फिलहाल तो धान, गेहूं, तुअर जैसी फसलों को हर साल बोना ही पड़ता है। क्या ऊपर की कल्पना साकार हो सकती है?
इस सिलसिले में चीन के वैज्ञानिकों ने 2018 में धान की एक ऐसी किस्म (PR23) प्रस्तुत की थी जिससे कई सालों तक उपज ली जा सकती थी। अलबत्ता, इसे बनाने में कई दशकों तक पारंपरिक ब्रीडिंग का सहारा लेना पड़ा था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने धान की एक फसली किस्म का संकरण एक वन्य किस्म से किया था।
अब शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि यही काम द्रुत गति से किया जा सकता है यदि किसी उपयुक्त वन्य किस्म से जीन्स (Genes) चोरी कर लिए जाएं। फिर तो अलग-अलग इलाकों के लिए बहुवर्षी धान (Parennial Paddy) तैयार किए जा सकेंगे।
इस संदर्भ में हाल ही में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया है कि जंगली धान (Wild Rice) (ओराइज़ा रुफिपोगोन – Oryza rufipogon) साल-दर-साल फूलता-फलता है और उन्होंने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स भी खोज निकाले हैं। उन्होंने आम तौर पर फसल के रूप में उगाए जाने धान (ओराइज़ा सटाइवा- Oryza sativa) में ये जीन्स जोड़ने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इन जीन्स ने ओराइज़ा सटाइवा को बहुवर्षी गुण प्रदान कर दिए; यानी यह एक बार पुष्पन (Flowering) के बाद मरता नहीं बल्कि पुष्पन को रोककर फिर से सामान्य वृद्धि (वर्धी विकास) शुरू कर देता है। यह प्रगति तो ज़बर्दस्त है लेकिन एक दिक्कत बाकी है। जो नई वृद्धि शुरू होती है उसमें लगने वाले फूलों में दाने पैदा नहीं होते।
दरअसल, अनाजों को बहुवर्षी पौधों में तबदील करना सहस्राब्दियों में चुन-चुनकर किए गए प्रजनन को वापिस पलटने जैसा होगा। एकवर्षी पौधे (Annual Plants) ज़मीन के ऊपर तेज़ी से वृद्धि (Growth) करते हैं और वहुवर्षी पौधों की तुलना में कहीं अधिक दाने पैदा करते हैं क्योंकि वहुवर्षी पौधे अपने काफी सारे संसाधन जड़ों के विकास में निवेश करते हैं। जब इन पौधों के पालतू बनाया गया था, तब पुराने ज़माने के लोगों ने एकवर्षी पौधों को शायद उनकी अधिक दाना उत्पादन क्षमता के कारण ही चुना था।
नए अध्ययन में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्स के सेंटर फॉर एक्सेलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइन्सेस के बिन हान और जिया-वाई वांग ने उन जीन्स की तलाश की जो धान में वहुवर्षिता का नियमन करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले तो वे ओ. रुफिपोगोन पर गए। उन्होंने अनुसंधान के दौरान विकसित एक किस्म का प्रजनन एक आम तौर पर अध्ययन की जाने वाली किस्म से करवाया ताकि ऐसी ढेर सारी संतानें पैदा कर सकें जिनमें से प्रत्येक में वन्य किस्म के डीएनए (DNA) का अलग-अलग छोटा-छोटा खंड हो। बड़े होने के बाद उन्होंने एक पौधा चुना जिसमें यह गुण था कि वह पुष्पन को रोककर वर्धी विकास जारी रख सके। इसे उन्होंने नाम दिया G43।
सारे धान के पौधों, चाहे वे कृष्य वार्षिक किस्म के हों, में एक मुख्तसर द्वितीय जीवन होता है। वार्षिक धान के पौधे से जब दानों की उपज प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद वे एक दूसरा शाखित तना पनपाते हैं, जिन्हें टिलर (Tiller)कहते हैं। इनसे भी एक कमतर उपज पैदा होती है जिसे रैटून राइस (Ratoon Rice) कहते हैं। इसे प्रक्रिया को रैटूनिंग (Ratooning) कहते हैं।
बहुवर्षी धान
बहरहाल, हान और वांग ने जो G43 धान विकसित किया था वह ऐसे टिलर्स पैदा करने में काफी उदार था – जहां एकवर्षी धान में 10-12 टिलर बनते हैं, वहीं G43 में 70 ऐसे द्वितीयक टिलर्स (Secondary Tillers) बने।
अब शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स का स्थान निश्चित किया – ये गुणसूत्र-1 पर पाए गए और शोधकर्ताओं ने इन्हें नाम दिया ‘एंडलेस ब्रांचेज़ एंड टिलर्स’ (EBT1)। इसके बाद उन्होंने दो विशिष्ट जीन्स की पहचान की – MIR156B और MIR156C। ये दोनों ही माइक्रो-आरएनए (Micro-RNA) का निर्माण करते हैं और ये माइक्रो-आरएनए विशिष्ट संदेशवाहक आरएनए (mRNA) से जुड़ जाते हैं। जुड़ने के बाद ये कुछ अन्य जीन्स की गतिविधि को ठप्प कर देते हैं जो युवा पौधे को परिपक्वता की ओर ले जाएंगे।
इसी प्रकार के MIR156 जीन्स घास की अन्य प्रजातियों में भी पाए जाते हैं। गौरतलब है कि गेहूं, धान आदि भी घास कुल में ही आते हैं। आम तौर पर इनकी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद थम जाती है जिसके चलते वृद्धि रुक जाती है। लेकिन G43 में इनका व्यवहार अलग रहा। इनकी भी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद कम हुई लेकिन फिर से बढ़ गई और टिलर्स का वर्धी विकास फिर चल निकला। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यदि अन्य बहुवर्षी अनाजों में ऐसी ही क्रियाविधि हुई तो अचरज नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में मक्का की एक उत्परिवर्तित किस्म (Mutated Species) खोजी गई थी जो लगातार एक झाड़ीनुमा ढंग से बढ़ती है। Corngrass1 नामक इस उत्परिवर्ती में MIR156 जीन पाया जाता है और शायद इसका व्यवहार बहुवर्षी धान के समान ही होगा।
G43 किसी भी वार्षिक पौधे की तरह ही बढ़ता है – एक दम सीधा खड़ा। यह ज़मीन पर फैलकर नहीं बढ़ता, जिस गुण की वजह से ओ. रुफिपोगोन के द्वितीयक टिलर्स जड़ें उगाकर नए पौधे बन जाते हैं। पौधे की बनावट को बदलने के लिए हान और वांग की टीम ने ओ. रुफिपोगोन के दो जीन्स (PROG1 और TIG1) G43 में जोड़ दिए थे। इस तरह जो पौधा विकसित हुआ वह ज़मीन पर आड़ा विकसित हुआ। यह एक आशाजनक संकेत है।
लेकिन अभी एक बड़ी बाधा सामने है। हालांकि ये द्वितीयक टिलर्स काफी अच्छे से बढ़े लेकिन उनसे बने पौधों पर वंध्या फूल आए और दाने नहीं बने। यह समस्या तब भी आई जब ओ. रुफिपोगोन का समूचा EBT1 खंड एक वार्षिक किस्म में रोपा गया।
ज़ाहिर है, इस काम को अंजाम देने के लिए अन्य जीन्स की ज़रूरत है। हान और वांग इन जीन्स की तलाश में हैं ताकि द्वितीयक टिलर्स भी उपजाऊ फूल पैदा कर सकें। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://eng.ruralvoice.in/national/paddy-planting-leads-overall-2023-kharif-crops-sowing-in-india.html
डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)
आज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।
इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।
मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-
“मालवा धरती धीर गंभीर
पग-पग रोटी, डग-डग नीर”
सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।
बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।
सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।
भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।
जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।
वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।
इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।
सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।
ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।
इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।
चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.tripadvisor.in/Attraction_Review-g2282389-d3913026-Reviews-Gandhi_Sagar_Dam-Neemuch_Neemuch_District_Madhya_Pradesh.html
हर गर्मी के मौसम में कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली में तेज़ गर्मी से राहत एक अनोखे तरीके से मिलती है – समुद्र से आने वाली घनी धुंध। यह हवा को ठंडा करती है और ज़मीन को हल्की नमी देती है। लोगों के लिए यह कुदरती कूलर जैसा काम करती है, और खेतों व जंगलों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अधिक गर्मी के कारण यह धुंध भविष्य में कम हो सकती है।
गौरतलब है कि धुंध तब बनती है जब समुद्र की नम हवा ठंडी होकर पानी की छोटी-छोटी बूंदों में बदल जाती है और ज़मीन की ओर बढ़ती है। भले ही यह बारिश जितनी बड़ी चीज़ न लगे, लेकिन इसका असर बहुत अहम होता है। जैसे कैलिफोर्निया के रेडवुड जंगलों में यह गर्मियों में लगभग आधा पानी उपलब्ध कराती है। वहीं सैलिनास वैली जैसे खेती वाले इलाकों में यह लेट्यूस और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों को नमी देती है। शहरों में भी यह हवा में मौजूद प्रदूषण को पकड़कर उसे कम करने में मदद करती है।
इतनी महत्वपूर्ण होने के बावजूद, धुंध पर अब तक ज़्यादा वैज्ञानिक ध्यान नहीं दिया गया है। वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि कुछ सालों में धुंध ज़्यादा क्यों होती है, इसमें कौन-कौन से रसायन होते हैं और बढ़ते तापमान का इस पर क्या असर पड़ेगा। बारिश और सूखे जैसे विषयों की तुलना में धुंध को लंबे समय तक एक छोटी और स्थानीय घटना माना गया। अब इसी कमी को दूर करने के लिए बड़े स्तर पर नया शोध शुरू किया जा रहा है।
पैसिफिक कोस्टल फॉग रिसर्च नामक एक पांच साल का प्रोजेक्ट धुंध को पहले से कहीं अधिक गहराई से समझने की कोशिश करेगा। करीब 36.5 लाख डॉलर की मदद से चलने वाला यह प्रोजेक्ट ज़मीन पर किए जाने वाले माप और उन्नत कंप्यूटर मॉडल का उपयोग करेगा, ताकि यह जाना जा सके कि धुंध कैसे बनती है, इसमें क्या-क्या होता है और भविष्य में यह कैसे बदल सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक जटिल पर्यावरणीय पहेली को समझने का मौका है।
धुंध का अध्ययन करना मुश्किल इसलिए है क्योंकि यह समुद्र, हवा और भूमि तीनों के बीच बनती है। इसके बनने के लिए ठंडे समुद्र और गर्म तटीय इलाकों के बीच तापमान में अंतर होना ज़रूरी है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण जब समुद्र और भूमि दोनों का तापमान बदल रहा है, तो यह संतुलन भी बिगड़ सकता है। गर्म समुद्र धुंध बनने की प्रक्रिया को कमज़ोर कर सकते हैं, जबकि गर्म भूमि धुंध को अपनी ओर ज़्यादा खींच सकती है। इन दोनों असर को एक साथ समझना मुश्किल है, इसलिए भविष्य के सही अनुमान लगाना अभी आसान नहीं है।
कुछ संकेत ऐसे भी मिल रहे हैं कि धुंध पहले से कम हो रही है। पुराने आंकड़ों के आधार पर किए गए शोध बताते हैं कि कैलिफोर्निया में पिछले कई दशकों में धुंध की मात्रा घटी है। लेकिन यह पूरी तरह पक्का नहीं है, क्योंकि डैटा सीमित है और उपग्रह तस्वीरों में धुंध को दूसरे बादलों से अलग पहचानना मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि ज़्यादा सटीक माप की ज़रूरत है, ताकि यह पता चल सके कि यह बदलाव सच में हो रहा है या नहीं, और क्या इसके लिए जलवायु परिवर्तन ज़िम्मेदार है।
बेहतर जानकारी जुटाने के लिए वैज्ञानिक कैलिफोर्निया के समुद्री किनारों पर कई जगहों – शहरों, जंगलों और खेतों – में खास उपकरण लगाएंगे। ये उपकरण हवा से धुंध की पानी की छोटी-छोटी बूंदों को पकड़ते हैं, जिससे पता चल सके कि धुंध कितना पानी देती है और उसमें कौन-कौन से पदार्थ मौजूद हैं। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि धुंध पर्यावरण को कितनी नमी देती है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव आ रहा है।
इस प्रोजेक्ट में यह भी देखा जाएगा कि धुंध अपने साथ क्या-क्या लेकर आती है। पहले के अध्ययनों में पाया गया है कि इसमें कुछ विषैले हानिकारक पदार्थ भी हो सकते हैं, जो मनुष्यों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अब वैज्ञानिक इसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों का भी अध्ययन करेंगे, जो समुद्र से भूमि तक आ सकते हैं। इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर इसके असर को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
फील्ड पर किए जा रहे काम के साथ-साथ वैज्ञानिक बेहतर कंप्यूटर मॉडल का भी इस्तेमाल करेंगे, जो तटीय इलाकों को करीब से समझते हुए पूरे विश्व के पैटर्न को भी ध्यान में रखते हैं। इन मॉडलों की मदद से वे अतीत और आने वाले समय की स्थिति का अनुमान लगाकर यह समझने की कोशिश करेंगे कि धुंध में हो रहे बदलाव प्राकृतिक हैं या ग्लोबल वार्मिंग की वजह से। इससे भविष्य में धुंध के व्यवहार का ज़्यादा साफ अंदाज़ा मिल सकेगा।
फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इतने जटिल सिस्टम को समझने के लिए पांच साल का समय कम हो सकता है, क्योंकि इसमें कई चीज़ें एक साथ असर डालती हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग मानते हैं कि यह प्रयास एक ऐसे क्षेत्र में बहुत ज़रूरी और बड़ा कदम है, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया था।
यह शोध सिर्फ कैलिफोर्निया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्र किनारे बनने वाली धुंध दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे इलाकों में भी पाई जाती है, जहां यह सूखे क्षेत्रों में पानी का अहम स्रोत बन सकती है। वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इस काम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ेगा और नए तरीके सामने आएंगे – जैसे धुंध से पीने का पानी प्राप्त करना।
आखिर में, धुंध सिर्फ एक साधारण मौसमी घटना नहीं है। यह समुद्र, ज़मीन और हवा को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे वैज्ञानिक अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। जैसे-जैसे जलवायु गर्म हो रही है, धुंध को समझना और भी ज़रूरी हो जाएगा – ताकि हम पर्यावरण में हो रहे बदलावों का सही अनुमान लगा सकें और उन जल स्रोतों व पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा कर सकें, जो इस नाज़ुक धुंध पर निर्भर हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.magnific.com/free-photo/aerial-view-forest-shrouded-morning-fog_6889308.htm#fromView=keyword&page=1&position=4&uuid=6e898618-1d68-4eec-ae27-320ce4021ca0&query=Nature+fog
भवन लोगों को सुरक्षित आवास (safe housing) देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि आजकल जिस ढंग से इनका निर्माण व प्रबंधन किया जाता है, वह अक्सर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है। निर्माण कार्य से कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions), जल प्रदूषण (water pollution) और कचरा उत्पन्न होता है। विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और कचरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा निर्माण कार्य से आता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारे लिए विकास की परिभाषा में प्रकृति शामिल ही नहीं है। हम प्रकृति को एक असीम संसाधन और कूड़ागाह की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी असंतुलन के कारण पर्यावरण को नुकसान और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम (environmental health risks) बढ़ रहे हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए अब केवल ‘टिकाऊ’ यानी नुकसान कम करने की सोच (sustainable development) से आगे बढ़कर ‘रीजनरेटिव डिज़ाइन’ की बात हो रही है। इसका मकसद ऐसे भवन और शहर बनाना है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे सुधारें। यानी सिर्फ संसाधनों का कम इस्तेमाल नहीं, बल्कि प्राकृतिक चक्रों को फिर से मज़बूत करना, जैव विविधता बढ़ाना और पर्यावरण को स्वस्थ बनाना इसका लक्ष्य है। यह सोच प्रकृति से प्रेरित (nature inspired design) है, जहां हर चीज़ संतुलन में रहती है और संसाधनों का बार-बार उपयोग होता है।
शहरएकजीविततंत्र
रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक अहम विचार यह है कि शहरों को एक जीवित तंत्र (urban ecosystem) की तरह देखा जाए। जैसे प्रकृति में एक ही समय पर कई काम होते हैं – पानी साफ करना, ऑक्सीजन बनाना, कार्बन थामना और जीवों को आश्रय देना – वैसे ही शहरों को भी इस तरह डिज़ाइन किया जा सकता है कि वे ये सब काम एक साथ कर सकें। इसके लिए योजनाकार किसी क्षेत्र के प्राकृतिक तंत्र (ecological planning) के काम करने के काम तरीके को समझकर उसके अनुसार शहर को विकसित करने की कोशिश कर सकते हैं।
इसका मतलब है कि हर क्षेत्र के शहर के लिए अलग-अलग तरीके (climate responsive design) अपनाए जाएं। जैसे ठंडे इलाकों में शहरों में ज़्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं ताकि हवा साफ हो और वायुमंडलीय कार्बन में कमी आए। वहीं सूखे इलाकों में ऐसे पौधे लगाए जा सकते हैं जो कम पानी में भी जीवित रह सकते हैं।
प्रकृतिनेबदलेशहर
दुनिया के कई उदाहरण (urban design examples) दिखाते हैं कि प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन शहरों को बेहतर बना सकती हैं। दक्षिण कोरिया के सियोल में एक बड़ी सड़क हटाकर उसके नीचे छिपी नदी को फिर से जीवित किया गया, जिससे शहर में एक हरा-भरा क्षेत्र बना। इससे न सिर्फ पर्यावरण सुधरा, बल्कि शहर का तापमान और ट्रैफिक भी कम हुआ। इसी तरह चीन में स्पंज सिटी मॉडल (sponge city concept) अपनाया गया, जहां पार्क, झीलें और ऐसी सतहें बनाई गईं जो बारिश का पानी सोख लेती हैं और बाढ़ रोकती हैं। इससे पानी की बचत (rainwater management) होती है, शहर ठंडा रहता है और लोगों के लिए बेहतर जगहें बनती हैं।
संसाधनोंकापुनर्चक्रण
रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत (circular economy) है कि शहरों में संसाधनों के उपयोग को नए तरीके से समझा जाए। अभी हमारी व्यवस्था ऐसी है कि चीज़ें निकाली जाती हैं, इस्तेमाल की जाती हैं और फिर फेंक दी जाती हैं (linear economy)। लेकिन प्रकृति में ऐसा नहीं होता – वहां हर चीज़ का बार-बार उपयोग होता है, यानी एक का कचरा किसी और का संसाधन बन जाता है। अगर यही तरीका शहरों में अपनाया जाए, तो कचरा कम हो सकता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग (resource efficiency) हो सकता है।
डेनमार्क के कालुंडबर्ग (industrial symbiosis Kalundborg) में इसका अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है, जहां उद्योग एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग करते हैं। एक जगह की बची हुई ऊर्जा या कचरा दूसरी जगह काम आ जाता है। इससे ऊर्जा, जल उपयोग और प्रदूषण तीनों में कमी आती है। इसी तरह ब्रिटेन और स्वीडन में भी कचरे को उपयोगी चीज़ों में बदलने (waste recycling) के प्रयास किए गए हैं, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा हुआ है।
निर्माणसामग्रीपरविचार
निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री (building materials) को भी प्रकृति के सिद्धांतों के अनुसार बदलने की ज़रूरत है। आज कई पारंपरिक सामग्री ज़हरीले रसायनों और ऊर्जा के भारी उपभोग से बनती हैं, जो इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है। इसकी बजाय रीजनरेटिव डिज़ाइन ऐसी सामग्री (eco friendly materials) के उपयोग पर ज़ोर देता है जो सुरक्षित हों, दोबारा इस्तेमाल की जा सकें और स्थानीय रूप से उपलब्ध हों, ताकि वे आसानी से प्राकृतिक चक्र में वापस जा सकें।
प्रकृति हमें इसका अच्छा उदाहरण देती है। प्राकृतिक सामग्री (biomaterials) कुछ सीमित और सुरक्षित पदार्थों से बनती हैं, फिर भी वे मज़बूत और उपयोगी होती हैं। इन्हीं से सीखकर वैज्ञानिक नई सामग्री विकसित कर रहे हैं, जो टिकाऊ भी हों और अच्छा प्रदर्शन भी करें। जैसे पौधों के कचरे और कवक से बनी इंसुलेशन (fungal insulation) सामग्री, जो पेट्रोलियम से बने उत्पादों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।
प्रकृतिसेप्रेरितस्मार्टनिर्माण
प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि चीज़ें कम संसाधनों में और आसानी से कैसे बनाई जा सकती हैं (efficient construction)। जहां उद्योगों में सामान बनाने के लिए ज़्यादा तापमान, भारी मशीनें और अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है, वहीं प्रकृति साधारण परिस्थितियों में ही मज़बूत चीज़ें बना लेती है। मसलन, मकड़ी का जाला (spider silk strength) सामान्य तापमान पर बनता है, लेकिन वह बहुत मज़बूत और लचीला होता है।
अब नई तकनीकें, जैसे 3-डी प्रिंटिंग (3D printing construction), इन सिद्धांतों को अपनाने में मदद कर रही हैं। प्रकृति में कम सामग्री का उपयोग करके उसे इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वह ज़्यादा मज़बूत बने। इसी तरह इंजीनियर अब डिजिटल तकनीक से हल्की लेकिन मज़बूत संरचनाएं बना रहे हैं, जिनमें कम सामग्री और ऊर्जा लगती है। इस तरह बेहतर डिज़ाइन पर ध्यान देकर निर्माण को अधिक प्रभावी और टिकाऊ (smart architecture) बनाया जा सकता है।
मज़बूतऔरस्वस्थशहर
अगर इमारतों और शहरों को प्रकृति के अनुसार बनाया जाए, तो इसके कई फायदे (green buildings benefits) मिल सकते हैं। इससे पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा, जलवायु परिवर्तन (climate change adaptation) के असर से निपटना आसान होगा और लोगों के रहने के लिए अधिक स्वस्थ परिवेश मिलेगा। हरित भवन शहरों का तापमान कम कर सकते हैं, हवा को साफ कर सकते हैं और लोगों के लिए बेहतर सार्वजनिक स्थान (urban green spaces) बना सकते हैं। साथ ही, संसाधनों का पुनर्चक्रित उपयोग खर्च घटा सकता है और नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकता है।
लेकिन इसे सफल बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों – जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, डिज़ाइन और नीति – के लोगों को मिलकर काम करना होगा। अंतत: शहरों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम प्रकृति से कितना सीखते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/w580h326/magazine-assets/d41586-026-00971-5/d41586-026-00971-5_52209098.jpg
मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।
कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।
फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।
हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।
हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।
आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।
कार्बन के बाद आए तत्व
सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।
दुर्लभ मृदा तत्व
दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।
उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।
अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।
सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।
और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।
दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता
पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।
वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।
तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।
अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।
दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।
दुर्लभ मृदाओं के गुण
आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।
बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।
चुंबकत्व
चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।
इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।
लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।
दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।
दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।
प्रकाश–उत्सर्जन
किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।
विद्युतीय गुण
दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।
धातुकर्म की दिक्कतें
दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।
दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।
इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।
एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।
भू–राजनीतिक समस्याएं
विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।
उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।
जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।
फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।
आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।
ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।
एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।
एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।
फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।
जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।
इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।
एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://hasetins.com/wp-content/uploads/2026/01/Rare-Earth-Pictures-845×684.png