आपके पैरों तले है विशाल जैव विविधता

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके पैरों तले एक विशाल जैविक तंत्र है? क्या आप जानते हैं कि मुट्ठी भर मिट्टी में लगभग 5,000 तरह के जीव बसते हैं और इसमें कुल कोशिकाओं की संख्या पृथ्वी की कुल आबादी के बराबर हो सकती है? साधारण मृदा में सूक्ष्म कवक, सड़ते-गलते पौधे, कवक को खाने वाले नन्हे कृमि और उन कृमियों का भक्षण करने की फिराक में सुई की नोक के बराबर घुन हो सकती है। और साथ में कोई ऐसा बैक्टीरिया भी हो सकता है जो अन्य बैक्टीरिया को अपने शक्तिशाली एंटीबायोटिक से खत्म कर सकता है। कुल मिलाकर, यह जैव विविधता का का विशाल मगर उपेक्षित संसार है।

लेकिन इस वर्ष विश्व मृदा दिवस (5 दिसंबर) पर संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने इस भूमिगत दुनिया में उपस्थित जैव विविधता का पहला वैश्विक मूल्यांकन जारी किया है। इस मूल्यांकन में 300 विशेषज्ञों ने इन जीवों की विविधता, प्राकृतिक और कृषि परिवेश में इनके योगदान और इन पर मंडराते संभावित खतरों को साझा करने के लिए जानकारियां और डैटा एकत्र किया है। इस रिपोर्ट में फसल की पैदावार में वृद्धि तथा मिट्टी व पानी को स्वच्छ रखने में इन जीवों के योगदान की चर्चा भी की गई है। स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल के मृदा एवं पादप पारिस्थितिकीविद फ्रांसिस्को पुग्नायर के अनुसार पौधों की जड़ें और भूमिगत जीव भूमि के ऊपर पाए जाने वाले जीवों से ज़्यादा कार्बन का संचय करते हैं और अधिक लंबे समय के लिए। 

देखा जाए तो मृदा कार्बनिक पदार्थों, खनिजों, गैसों और अन्य घटकों का मिश्रण होती है जो पौधों के विकास में मदद करता है। इतना ही नहीं, लगभग 40 प्रतिशत जंतु अपने जीवन चक्र में भोजन, आश्रय या फिर शरण लेने के लिए मृदा का उपयोग करते हैं। लेकिन धरती पर एक बुलडोज़र या ट्रैक्टर चलने, जंगल की आग, तेल के फैलने, यहां तक कि पैदल यात्रियों के निरंतर आवागमन से मृदा के पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंचती है। उम्मीद है कि यह रिपोर्ट वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और आम जनता को इस भूमिगत पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जागरूक करेगी।               

पूर्व के अध्ययनों में वैज्ञानिक मृदा के सबसे बड़े और सबसे छोटे जीवों पर ध्यान केंद्रित करते रहे हैं। कई सदियों से प्राकृतिक इतिहासकारों ने चींटियों, दीमकों, और यहां तक कि केंचुओं तथा मृदा से उनके सम्बंध पर चर्चा की है। पिछले कुछ दशकों में सूक्ष्मजीव विज्ञानियों ने तो मृदा के डीएनए का अनुक्रमण करके बैक्टीरिया और कवक की एक आश्चर्यजनक विविधता का भी पता लगाया है। लेकिन बड़े और छोटे जीवों के बीच हज़ारों जीवों को अनदेखा किया जाता रहा है। सूक्ष्म प्रोटिस्ट, कृमि और टार्डिग्रेड्स मृदा के कणों के आसपास पानी की बारीक झिल्ली का निर्माण करते हैं। कुछ बड़े और छोटे कृमि, स्प्रिंगटेल्स और कीट लार्वा, इन कणों के बीच हवादार छिद्रों में रहते हैं जो मृदा को जैविक रूप से इस पृथ्वी का सबसे विविध आवास बनाने में मदद करते हैं।   

यह विविधता एक समृद्ध और जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करती है जो फसल की वृद्धि को बढ़ावा देती है, प्रदूषकों को विघटित करती है और कार्बन के अनंत सोख्ते के रूप में काम कर सकती है। मृदा के कुछ जीव पौधों की विविधता को बढ़ावा देते हैं और कई तो एंटीबायोटिक दवाओं से लेकर प्राकृतिक कीटनाशकों तक महत्वपूर्ण यौगिक उत्पन्न करते हैं। मृदा, जीवों और उनकी गतिविधियों के बिना अन्य जीवों का जीवित रहना असंभव होगा।

इस रिपोर्ट में कई मानव गतिविधियों की चर्चा की गई है जो मृदा के जीवों को नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें वनों की कटाई, सघन कृषि, प्रदूषकों के कारण अम्लीकरण, अनुचित सिंचाई के कारण लवणीकरण, मृदा संघनन, सतह का बंद होना, आग तथा कटाव को शामिल किया गया है। इस सम्बंध में कुछ सरकारों और कंपनियों ने भी कार्य किया है। कई राष्ट्र ऐसे कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं जिनसे मृदा को विनाशकारी मानव गतिविधियों से बचाया जा सके। चीन में एग्रीकल्चर ग्रीन डेवलपमेंट कार्यक्रम के तहत विभिन्न फसलों को एक साथ उगाया जा रहा है ताकि जैव विविधता को संरक्षित किया जा सके। उम्मीद है कि यह रिपोर्ट मृदा-जीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाएगी और संरक्षण को प्रोत्साहित करेगी।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हरित पटाखे, पर्यावरण और स्वास्थ्य – सुदर्शन सोलंकी

दिवाली आई और निकल गई। कुछ राज्यों में पटाखों पर प्रतिबंध लगाए गए थे लेकिन कुछ राज्यों में समय-सीमा के अलावा और कोई रोक नहीं थी। वैसे तो इस बार दिवाली पर पटाखों का शोर पिछले सालों की अपेक्षा कम था और कुछ लोग शायद खुद को शाबाशी दे रहे होंगे कि उन्होंने हरित पटाखे जलाकर अपना पर्यावरणीय कर्तव्य पूरा किया। यह आलेख हरित पटाखों समेत पूरे मामले की पड़ताल करता है।

रित पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंघान परिषद (सीएसआईआर) के अंतर्गत आता है। हरित पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण कम होता है। इनमें विभिन्न रासायनिक तत्वों की मौजूदगी और हानिकारक गैसों वाले धुएं का कम उत्सर्जन करने वाले तत्वों का इस्तेमाल किया गया है। इनको जलाने से हवा दूषित करने वाले महीन कणों (पीएम) की मात्रा में 25 से 30 प्रतिशत और पोटेशियम तत्वों के उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है।

परंतु पर्यावरणविदों ने इन पटाखों के अधिक उपयोग को भी खतरनाक माना है। लोगों में हरित पटाखों को लेकर कई भ्रम हैं। लोग समझते हैं कि ये पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं। इसलिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि अगर लोग इन्हें हरित समझकर अधिक जलाते हैं तो निश्चित ही त्यौहारों के बाद में प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा।

प्रदूषण कम करने, विषैले रसायन और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। अब शिवकाशी ने खुद को ऐसे पटाखों के लिए तैयार कर लिया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका हरित विकल्प पोटेशियम परआयोडेट 400 गुना महंगा है। इसी वजह से हरित पटाखे काफी महंगे होते हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के अनुसार सरकार को सभी परिवारों के पटाखे खरीदने की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए, जिससे लोग एक तय सीमा से अधिक इन पटाखों का इस्तेमाल ना कर सकें। लोग समूहों में पटाखे जलाएं जिससे कम से कम पटाखों में सबका जश्न हो सके। अधिकांश त्यौहारों में पटाखे जलाकर जश्न मनाया जाता है किंतु बढ़ते प्रदूषण स्तर के चलते इनके उपयोग को सीमित रखना बेहद आवश्यक है।

बड़े त्यौहारों पर व्यापक आतिशबाज़ी से बड़ी मात्रा में हानिकारक गैसें और विषाक्त पदार्थ वायुमंडल में पहुंचते हैं। परिणामस्वरूप, वायु प्रदूषित हो जाती है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। हाल ही के अध्ययन में दिल्ली और गुवाहाटी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के शोधकर्ताओं ने दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले अत्यधिक वायु और ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव का अध्ययन जर्नल ऑफ हेल्थ एंड पॉल्युशन में प्रकाशित किया है।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी परिसर में दीपावली के त्यौहार के दौरान हवा की गुणवत्ता और शोर के स्तर का अध्ययन किया था। उन्होंने 10 माइक्रोमीटर या व्यास में उससे छोटे, हवा में तैरते कणों (पीएम-10) के घनत्व को मापा और शोर के स्तर को भी। उन्होंने दीपावली में 10 दिनों की अवधि के दौरान पीएम-10 में मौजूद धातुओं (जैसे कैडमियम, कोबाल्ट, लोहा, जस्ता और निकल) तथा आयनों (जैसे कैल्शियम, अमोनियम, सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड, नाइट्रेट और सल्फेट) की सांद्रता को नापा।

स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, शोधकर्ताओं ने उस अवधि के दौरान संस्थान के अस्पताल में जाने वाले रोगियों के स्वास्थ्य का सर्वेक्षण भी किया। इस अध्ययन में प्रदूषकों के स्तर में वृद्धि देखी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार दीपावली के दौरान पीएम-10 की सांद्रता अन्य समय की तुलना में 81 प्रतिशत अधिक थी, और धातुओं एवं आयनों की सांद्रता में भी 65 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई। शोर का स्तर भी अधिक था। हालांकि शोधकर्ताओं ने पाया कि अन्य दिनों की तुलना में दीपावली के दौरान पीएम-10 में बैक्टीरिया की सांद्रता 39 प्रतिशत कम थी। सीसा, लोहा, जस्ता जैसी भारी धातुओं की उपस्थिति इसका कारण हो सकती है।

डब्लूएचओ ने सिफारिश की है कि पीएम-2.5 का वार्षिक औसत घनत्व 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम होना चाहिए, लेकिन भारत और चीन के शहरी क्षेत्रों में इसका स्तर छह गुना ज़्यादा (क्रमश: 66 और 59 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से पता चला है कि वायु की गुणवत्ता के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में भारत और चीन हैं। पीएम-2.5 घनत्व में बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही शहर शामिल है। किंतु बीजिंग ने इसमें सुधार किया है।

वायु में अन्य गैसें और बगैर जले कार्बन कण मिश्रित होकर स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक बन जाते हैं। सूक्ष्म कण (पीएम-2.5) मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये फेफड़ों में काफी अंदर तक चले जाते हैं, और इनसे फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है। वर्ष 2015 में पीएम-2.5 के कारण विश्व भर में 42 लाख से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। इनमें से 58 प्रतिशत मौतें भारत और चीन में हुर्इं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ेस नामक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 से लेकर अब तक चीन में पीएम-2.5 के कारण असमय मौतों में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत में यह आंकड़ा तीन गुना अधिक है। पटाखों के अत्यधिक उपयोग से छोटी-सी अवधि में ही हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ओज़ोन परत बचेगी तभी जीवन बचेगा – प्रदीप

साल 2018-19 में पर्यावरण के हितैषी अंतर्राष्ट्रीय समुदायों के बीच खासा उत्साह का माहौल था। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट से यह पता चला था कि साल 2000 से ओज़ोन परत में 2 फीसदी की दर से सुधार हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की इस रिपोर्ट से यहां तक कयास लगाए जा रहे थे कि सदी के मध्य तक ओज़ोन परत पूरी तरह दुरुस्त हो जाएगी।

मगर हाल में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अमेरिका के ही नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एन.ओ.ए.ए.) ने अवलोकनों के आधार पर बताया है कि इस साल अंटार्कटिका का ओज़ोन सुराख अपने वार्षिक आकार के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। इसका आकार 20 सितंबर को 2.48 करोड़ वर्ग किलोमीटर हो गया था। इसने आशावादियों को थोड़ा चिंतित कर दिया है। ‘थोड़ा’ इसलिए क्योंकि वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार ठंडे तापमान और तेज़ ध्रुवीय हवाओं की वजह से अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन की परत में गहरा सुराख हुआ है। यह सुराख सर्दियों तक बना रहेगा और उसके बाद गर्मियों से ओज़ोन परत में धीरे-धीरे सुधार आने लगेगा।

धरती पर जीवन के लिए ओज़ोन परत का बहुत महत्व है। पृथ्वी के धरातल से लगभग 25-30 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल के समताप मंडल (स्ट्रेटोस्फेयर) में ओज़ोन गैस का एक पतला-सा आवरण है। यह आवरण धरती के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण को सोख लेता है। अगर ये किरणें धरती तक पहुंचें तो कई खतरनाक और जानलेवा बीमारियों का प्रकोप बढ़ सकता है। इसके अलावा ये पेड़-पौधों और जीवों को भी भारी नुकसान पहुंचाती हैं।

घरेलू इस्तेमाल के लिए और थोड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों को ठंडा रखने के लिए साल 1917 से ही रेफ्रिजरेटर या फ्रिज का व्यावसायिक पैमाने पर निर्माण शुरू हो चुका था। हालांकि तब रेफ्रिजरेशन के लिए अमोनिया या सल्फर डाईऑक्साइड जैसी विषैली और हानिकारक गैसों का इस्तेमाल किया जाता था। रेफ्रिजरेटर से इनका रिसाव जान-माल के लिए बेहद घातक था। इसलिए जब जर्मनी और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने रेफ्रिजरेशन के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) की खोज की, जो प्रकृति में नहीं पाया जाता, तो रेफ्रिजरेटर सर्वसाधारण के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित और सुलभ हो गए। इस खोज के बाद क्लोरोफ्लोरोकार्बन का इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर एयर कंडीशनर, एरोसोल कैंस, स्प्रे पेंट, शैंपू आदि बनाने में किया जाने लगा, जिससे हर साल अरबों टन सीएफसी वायुमंडल में घुलने लगा। सीएफसी वायुमंडल की ओज़ोन को नुकसान पहुंचाता है।

ओज़ोन परत को नुकसान से बचाने के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल संधि लागू हुई जिसमें कई सीएफसी रसायनों और दूसरे औद्योगिक एयरोसॉल रसायनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अभी तक विश्व के तकरीबन 197 देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए हामी भर चुके हैं।

इस संधि के लागू होने से सीएफसी और अन्य हानिकारक रसायनों के उत्सर्जन में धीरे-धीरे कमी आई। मगर साल 2019 में नेचर की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब भी चीन जैसे देश पर्यावरण से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन करते हुए ओज़ोन परत के लिए घातक गैसों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन का फोम उद्योग अवैध रूप से सीएफसी-11 का उपयोग ब्लोइंग एजेंट के रूप में करता रहा है। चूंकि अन्य विकल्पों की तुलना में सीएफसी-11 सस्ता है, इसलिए उद्योग पॉलीयूरेथेन फोम बनाने के लिए इसका उपयोग करते हैं। चीन में सीएफसी की तस्करी की समस्या भी चिंता का सबब बनी हुई है। देखने वाली बात यह है कि क्या चीनी सरकार पर्यावरण विरोधी ऐसी गतिविधियों पर लगाम लगा पाएगी या फिर पिछले वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की 30 सालों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

बहरहाल, नासा और एन.ओ.ए.ए. के हालिया अध्ययनों में दक्षिणी ध्रुव के ऊपर समताप मंडल में चार मील ऊंचे स्तंभ में ओजोन की पूर्ण गैर-मौजूदगी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले 40 साल के रिकॉर्ड के अनुसार साल 2020 में ओज़ोन सुराख का यह 12वां सबसे बड़ा क्षेत्रफल है। वहीं गुब्बारों पर लगे यंत्रों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार यह पिछले 33 सालों में 14वीं न्यूनतम ओज़ोन की मात्रा है। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में अर्थ साइंसेज़ के प्रमुख वैज्ञानिक पॉल न्यूमैन के मुताबिक साल 2000 के उच्चतम स्तर से समताप मंडल में क्लोरीन और ब्रोमीन का स्तर सामान्य स्तर से 16 प्रतिशत गिरा है। क्लोरीन और ब्रोमीन के अणु ही ओज़ोन अणुओं को ऑक्सीजन के अणुओं में बदलते हैं।

सर्दियों के मौसम में समताप मंडल के बादलों में ठंडी परतें बन जाती है। ये परतें ओज़ोन अणुओं का क्षय करती हैं। गर्मी के मौसम में समताप मंडल में बादल कम बनते हैं और अगर वे बनते भी हैं तो लंबे वक्त तक नहीं टिकते, जिससे ओज़ोन के खत्म होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। सर्दियों में तेज़ हवाओं और बेहद ठंडे वातावरण की वजह से क्लोरीन के अणु ओज़ोन परत के पास इकट्ठे हो जाते हैं। क्लोरीन के ये अणु सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने पर परमाणुओं में टूट जाते हैं। क्लोरीन परमाणु ओज़ोन अणुओं से टकरा कर उसे ऑक्सीजन में तोड़ देते हैं।

हम अपने दैनिक जीवन में बहुत से ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं जिनमें से ज़्यादातर में से किसी न किसी गैस का रिसाव ज़रूर होता है। इनमें मुख्य रूप से एयर कंडीशनर हैं जिनमें ओज़ोन परत के लिए घातक फ्रियान-11, फ्रियान-12 गैसों का उपयोग होता है। दरअसल इन गैसों का एक अणु ओज़ोन के लाखों अणुओं को नष्ट करने में समर्थ होता है! बहरहाल, ओज़ोन संरक्षण के लिए सशक्त कदम उठाने की आवश्यकता है। ओज़ोन परत को बचाने के लिए हमें अपनी जीवन शैली में आमूल-चूल परिवर्तन लाना होगा।(स्रोत फीचर्स)

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जलवायु की उथल-पुथल का प्राचीन औज़ारों पर असर

जकल टेक्नॉलॉजी के बदलने की रफ्तार को देखकर आश्चर्य होता है कि प्राचीन मनुष्य सात लाख वर्ष तक एक ही तकनीक से पत्थर के औज़ार बनाते रहे। अब तक इसके कारण स्पष्ट नहीं थे लेकिन अब, केन्या स्थित एक प्राचीन झील की तलहटी से प्राप्त डैटा से पता चला है कि लगभग चार लाख साल पहले जलवायु परिवर्तन, टेक्टॉनिक हलचल और तेज़ी से बदलती पशु आबादी ने प्राचीन मनुष्यों में सामाजिक और तकनीकी बदलावों को जन्म दिया था। इनमें नए किस्म के औज़ार और दूर-दूर तक व्यापार का फैलाव शामिल थे।

लगभग 12 लाख साल पहले केन्या के ओलोरगेसेली बेसिन में होमो प्रजातियों ने पत्थर के किनारों को तराशकर कुल्हाड़ियां बनाना शुरू किया। ये कुल्हाड़ियां आकार में अंडाकार और नुकीली होती थीं। इनसे कई तरह के काम किए जा सकते थे, जैसे जानवर मारना, खाल निकालना, लकड़ी काटना और भूमि से कंद निकालना। लगभग सात लाख सालों तक इसी एक्यूलीयन तकनीक से औज़ार बनते रहे। इस दौरान जलवायु लगभग स्थिर बनी रही थी। लेकिन इसके बाद औज़ार बनाने की तकनीक में अचानक परिवर्तन हुए। लेकिन इन परिवर्तनों के कारण अस्पष्ट थे।

2012 में नेशनल म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के रिक पॉट्स और उनके दल ने कूरा बेसिन के निकट एक प्राचीन झील की तलछट से ड्रिल करके 139 मीटर लंबा कोर निकाला था। यह कोर लगभग 10 लाख सालों में जमा हुआ था। कोर का अध्ययन कर शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र की जलवायु और पारिस्थितिकी की एक समयरेखा खींची। डायटम और शैवाल की मौजूदगी से झील के जल स्तर और लवणता के बारे में पता चला। पत्तियों के मोम से पता चला कि आसपास जंगल था या घास का मैदान।

पता चला कि कोर बनने के शुरुआती छ: लाख वर्षों तक पर्यावरण स्थिर रहा। वहां प्रचुर मात्रा में मीठे पानी की झील और विशाल घास का मैदान था जिसमें जिराफ, भैंस और हाथी जैसे बड़े जानवर पाए जाते थे। फिर, लगभग चार लाख साल पहले स्थिति बिगड़ी। मीठे पानी की आपूर्ति में उतार-चढ़ाव होने लगे, जिससे यह स्थान तेज़ी से घास के मैदान और जंगलों में बदलता रहा। पिछले पांच लाख से तीन लाख साल के बीच कूरा बेसिन की झील आठ बार सूखी थी। जीवाश्म रिकॉर्ड से पता चलता है कि तब घास का मैदान जगह-जगह सूखने लगा और दूर से दिखाई देने वाले बड़े जानवरों की जगह चिंकारा, हिरण जैसे छोटे और फुर्तीले जानवरों ने ले ली।

पूर्व अध्ययनों से भी शोधकर्ता जानते थे कि लगभग 5 लाख साल पहले ज्वालामुखी विस्फोट के कारण इस क्षेत्र में दरारें पड़ी थी जिससे बड़ी झील बह गई और छोटे बेसिन बने। इनमें बहुत जल्दी बाढ़ आती थी और वे उतनी ही जल्दी सूख भी जाते थे। साइंस एडवांसेस पत्रिका में शोधकर्ता बताते हैं कि कुल मिलाकर इस क्षेत्र के मनुष्यों ने अस्थिर वातावरण का सामना किया। जिससे उन्होंने लावा पत्थर से ऐसे औज़ार बनाने शुरू किए कि वे छोटे और फुर्तीले जानवरों का शिकार कर पाएं। इन ब्लेडनुमा औज़ारों को लकड़ी में बांधकर भाले की तरह इस्तेमाल किया जाता था। इन पत्थरों का स्रोत कई किलोमीटर दूर था, इसलिए उनका आवागमन क्षेत्र बढ़ा और संचार के अधिक जटिल तरीके विकसित हुए और सामाजिक नेटवर्क स्थापित हुए। वैसे एक मत यह है कि एक क्षेत्र के आधार पर निष्कर्ष को व्यापक स्तर पर लागू करने में सावधानी रखनी चाहिए।(स्रोत फीचर्स)
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कोविड-19 मौतों में वायु प्रदूषण का योगदान

हाल ही में किए गए अध्ययनों से कोविड-19 से होने वाली मौतों और वायु प्रदूषण के सम्बंध का पता चला है। शोधकर्ताओं के अनुसार वैश्विक स्तर पर कोविड-19 से होने वाली 15 प्रतिशत मौतों का सम्बंध लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से है। जर्मनी और साइप्रस के विशेषज्ञों ने संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के वायु प्रदूषण, कोविड-19 और सार्स (कोविड-19 जैसी एक अन्य सांस सम्बंधी बीमारी) के स्वास्थ्य एवं रोग के आकड़ों का विश्लेषण किया है। यह रिपोर्ट कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च नामक जर्नल में प्रकाशित हुई है।  

इस डैटा में विशेषज्ञों ने वायु में सूक्ष्म कणों की उपग्रह से प्राप्त जानकारी के साथ पृथ्वी पर उपस्थित प्रदूषण निगरानी नेटवर्क का डैटा शामिल किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि कोविड-19 से होने वाली मौतों के पीछे वायु प्रदूषण का योगदान किस हद तक है। डैटा के आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूर्वी एशिया, जहां हानिकारक प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक है, में कोविड-19 से होने वाली 27 प्रतिशत मौतों का दोष वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर हुए असर को दिया जा सकता है। यह असर युरोप और उत्तरी अमेरिका में क्रमश: 19 और 17 प्रतिशत पाया गया। पेपर के लेखकों के अनुसार कोविड-19 और वायु प्रदूषण के बीच का यह सम्बंध बताता है कि यदि हवा साफ-सुथरी होती तो इन अतिरिक्त मौतों को टाला जा सकता था।

यदि कोविड-19 वायरस और वायु प्रदूषण से लंबे समय तक संपर्क एक साथ आ जाएं तो स्वास्थ्य पर, विशेष रूप से ह्रदय और फेफड़ों पर, काफी हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं। टीम ने यह भी बताया कि सूक्ष्म-कणों के उपस्थित होने से फेफड़ों की सतह के ACE2 ग्राही की सक्रियता बढ़ जाती है और ACE2 ही सार्स-कोव-2 के कोशिका में प्रवेश का ज़रिया है। यानी मामला दोहरे हमले का है – वायु प्रदूषण फेफड़ों को सीधे नुकसान पहुंचाता है और ACE2 ग्राहियों को अधिक सक्रिय कर देता है जिसकी वजह से वायरस का कोशिका-प्रवेश आसान हो जाता है।

अन्य वैज्ञानिकों का मत है कि हवा में उपस्थित सूक्ष्म-कण इस रोग को बढ़ाने में एक सह-कारक के रूप में काम करते हैं। एक अनुमान है कि कोरोनावायरस से होने वाली कुल मौतों में से यू.के. में 6100 और अमेरिका में 40,000 मौतों के लिए वायु प्रदूषण को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है।

देखने वाली बात यह है कि कोविड-19 के लिए तो टीका तैयार हो जाएगा लेकिन खराब वायु गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कोई टीका नहीं है। इनका उपाय तो केवल उत्सर्जन को नियंत्रित करना ही है।(स्रोत फीचर्स)

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माइक्रोप्लास्टिक्स: इकॉलॉजी व जीवों पर नया संकट – सुदर्शन सोलंकी

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हर साल लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक कूड़ा-कचरा समुद्रों में फेंका जाता है। समुद्री किनारों, उनकी सतहों और पेंदे में जो कूड़ा-कचरा इकट्ठा होता है उसमें से 60 से 90 फीसदी हिस्सा प्लास्टिक होता है। यह समुद्री कूड़ा-कचरा 800 से भी ज़्यादा समुद्री प्रजातियों के लिए खतरा है। इनमें से 15 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। पिछले 20 वर्षों से तो प्लास्टिक के बारीक कणों (माइक्रोप्लास्टिक) और सिर्फ एक बार ही इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को फेंके जाने से समस्या और भी ज़्यादा गंभीर हो गई है। प्लास्टिक के बारीक कण बहुत बड़ा खतरा पैदा करते हैं। चूंकि ये आंखों से दिखाई नहीं देते, इसलिए इनकी तरफ किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।

समुद्र व समुद्री जीवों को प्लास्टिक प्रदूषण से बचाने के लिए विश्व भर के कई संगठन प्रयासरत हैं लेकिन समुद्र में मौजूद प्लास्टिक कचरा कम होने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी संदर्भ में हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि गहरे समुद्र में अनुमानित 1.4 करोड़ टन माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। प्रति वर्ष महासागरों में बड़ी मात्रा में कचरा एकत्रित होता है। ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी ने अध्ययन में बताया है कि समुद्र में मौजूद छोटे प्रदूषकों की मात्रा पिछले साल किए गए एक स्थानीय अध्ययन की तुलना में 25 गुना अधिक थी।

माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं जो जीवों के लिए हानिकारक हैं। प्लास्टिक सूक्ष्म कणों में टूटता है जो सरलता से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकता है। माइक्रोप्लास्टिक बनने का मुख्य स्रोत ओपन डंपिंग, लैंडफिल साइट और विनिर्माण इकाइयां है। माइक्रोप्लास्टिक जल प्रवाह के साथ भूजल प्रणाली में भी पहुंच जाता है।

सामान्यत: घरेलू अपशिष्ट जल में फाइबर/सिंथेटिक ऊन के कपड़े धोने से छोटे-छोटे कणों का प्रवाह होता है। विशेष रूप से ऐसे एक्वीफर्स में जहां सतह का पानी और भूजल संपर्क में होते हैं। माइक्रोब्लेड्स एक प्रकार का माइक्रोप्लास्टिक है, जो पॉलीएथिलीन प्लास्टिक के बहुत छोटे टुकड़े होते हैं, जिन्हें स्वास्थ्यवर्धक और सौंदर्य उत्पादों (जैसे कुछ क्लींज़र और टूथपेस्ट) में मिलाया जाता है। ये छोटे कण आसानी से जल फिल्टरेशन प्रणालियों से गुजर जाते हैं। कुछ सफाई और सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों के उपयोग के बाद ये अपशिष्ट जल के साथ मिल सकते हैं, जो कुछ समय बाद मिट्टी-भूजल प्रणाली में मिल जाते हैं और पर्यावरण प्रदूषित करते हैं।

ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिक शोध की सरकारी एजेंसी – कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन – के शोधकर्ताओं ने दक्षिण ऑस्ट्रेलियाई तट से 380 कि.मी. की दूरी तक 3,000 मीटर गहराई तक के नमूने इकट्ठे किए। इस कार्य के लिए लिए उन्होंने एक रोबोटिक पनडुब्बी का उपयोग किया। नमूनों में, एक ग्राम सूखी समुद्री तलछट में 14 प्लास्टिक कण तक देखे गए। इसके आधार पर वैज्ञानिकों ने गणना की कि समुद्र तल पर माइक्रोप्लास्टिक्स की कुल वैश्विक मात्रा 1.4 करोड़ टन है। एजेंसी ने इसे सी-फ्लोर माइक्रोप्लास्टिक्स का पहला वैश्विक अनुमान माना है।

फ्रंटियर इन मरीन साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस शोध के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जहां तैरते हुए कचरे की मात्रा ज़्यादा थी, उस क्षेत्र में समुद्र के पेंदे में माइक्रोप्लास्टिक के टुकड़े अधिक पाए गए। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले जस्टिन बैरेट ने कहा, जो प्लास्टिक कचरा समुद्र में जाता है उसी से माइक्रोप्लास्टिक बनता है। समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए तत्काल समाधान खोजने की ज़रूरत है क्योंकि इससे पारिस्थितिकी तंत्र, वन्य जीव और वन्य जीवन के साथ मानव स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

प्लास्टिक से समुद्री जीवों के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। क्वीन्स युनिवर्सिटी, बेलफास्ट और लिवरपूल जॉन मूर्स युनिवर्सिटी द्वारा किया गया शोध जर्नल बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुआ है, जिसमें हर्मिट केंकड़ों पर प्लास्टिक के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। ये केंकड़े समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा होते हैं।

ये केंकड़े स्वयं के लिए कवच विकसित नहीं करते, बल्कि अपने शरीर को बचाने के लिए घोंघे की कवच का उपयोग करते हैं। एक हर्मिट केंकड़े को बढ़ने में सालों लग जाते हैं। जैसे-जैसे यह बढ़ता जाता है, उसे अपने लिए नए बड़े कवच की आवश्यकता होती है। यह कवच इन केंकड़ों को बढ़ने, प्रजनन करने और सुरक्षा देने में मदद करते हैं। पर इस नए अध्ययन से पता चला है कि जैसे ही ये केंकड़े माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आते हैं, उनके द्वारा शैलों को पहचानने और उनमें घुसने की क्षमता कमज़ोर होती जाती है।

इससे स्पष्ट है कि माइक्रोप्लास्टिक जैव विवधता को हमारे अनुमान से कहीं ज़्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि माइक्रोप्लास्टिक से हो रहे प्रदूषण पर रोक लगाई जाए।

एक शोध से ज्ञात हुआ है कि पानी और नमक में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद होते हैं। शायद आप सिर्फ नमक के साथ ही हर साल 100 माइक्रोग्राम से अधिक माइक्रोप्लास्टिक्स खा रहे हों। यह जानकारी हाल ही में आईआईटी, मुंबई के शोध में सामने आई है।

आईआईटी, मुंबई के सेंटर फॉर एन्वॉयरमेंट साइंस एंड इंजीनियरिंग के दो सदस्यों द्वारा किए गए शोध में नमक के शीर्ष 8 ब्रांड्स की जांच की गई। जांच के नमूनों में प्रति किलोग्राम नमक में 63.76 माइक्रोग्राम माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। लोकप्रिय नमक ब्रांड्स के सैंपल में जो कण निकले, उनमें 63 फीसदी प्लास्टिक और 37 फीसदी प्लास्टिक फाइबर्स थे। विशेषज्ञों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक के कुछ कण 5 माइक्रॉन से भी छोटे होते हैं जो नमक उत्पादकों के ट्रीटमेंट से भी आसानी से पार निकल जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के आधार पर एक व्यस्क आदमी को प्रतिदिन कम से कम 5 ग्राम नमक खाना चाहिए। इस आधार पर साल भर में सिर्फ नमक के ज़रिए हम करीब 100 माइक्रोग्राम माइक्रोप्लास्टिक्स खा रहे हैं। और तो और, हमारे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक्स पहुंचने का यह एकमात्र रास्ता नहीं है।

माइक्रोप्लास्टिक से बचने का कोई रास्ता नहीं है। कॉन्टेमिनेशन ऑफ इंडियन सी साल्ट्स विद माइक्रोप्लास्टिक्स एंड ए पोटेंशियल प्रिवेंशन स्ट्रेटजी में पाया गया कि यह वैश्विक परिघटना है एवं सूचना के अभाव के कारण अभी इससे बचाव की कोई रणनीति उपलब्ध नहीं है। सभी समुद्री जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। जब इस प्रदूषित जल को किसी भी सामग्री के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है, तब ये माइक्रोप्लास्टिक उसमें आ जाते हैं। परंतु यदि हम प्लास्टिक का उपयोग कम से कम से करें और कम कचरा पैदा करें और साथ ही इसे समुद्र में न फेंका जाए, तो काफी हद तक इससे बचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त सामान्य रेत फिल्टरेशन के ज़रिए समुद्री नमक में माइक्रोप्लास्टिक्स के ट्रांसफर को कम किया जा सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैश्विक तापमान में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

प्रथम औद्योगिक क्रांति (वर्ष 1870) के समय से अब तक वैश्विक तापमान में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। तापमान में बढ़ोतरी पेट्रोल, प्राकृतिक गैस, कोयला जैसे जीवाश्म र्इंधनों के दहन का परिणाम है, और इसी वजह से वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) का स्तर 280 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से बढ़कर 400 पीपीएम हो गया। गर्म होती जलवायु के कारण हिमनद (ग्लेशियर) पिघलने लगे और समुद्रों का जल स्तर बढ़ गया है। नेशनल जियोग्राफिक पत्रिका के 2 अक्टूबर के अंक में डेनियल ग्लिक आगाह करते हैं कि 2035 तक गढ़वाल (उत्तराखंड) के ग्लेशियर लगभग गायब हो सकते हैं!

कार्बन डाईऑक्साइड के बढ़ते स्तर से सागर अम्लीय भी हो गए हैं, जिससे समुद्री जीवों के खोल और कंकाल कमज़ोर पड़ रहे हैं (climate.org)। और भू-स्थल पर, कार्बन डाईऑक्साइड के बढ़ते स्तर के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के प्रभाव पड़े हैं। कार्बन डाइऑक्साइड एक ‘ग्रीन हाउस गैस’ है जो वायुमंडल में सूर्य की गर्मी को रोक कर रखती है और तापमान बढ़ाती है। यह पौधों के प्रकाश संश्लेषण में सहायक होती है और पौधे अधिक वृद्धि करते हैं, लेकिन साथ ही यह पौधे की नाइट्रोजन अवशोषित करने की क्षमता को कम कर देती है जिससे फसलों की वृद्धि बाधित होती है (phys.org)।

लेकिन आने वाले सालों में बढ़ते कार्बन डाईऑक्साइड स्तर की वजह से से बढ़ी हुई गर्मी खाद्य सुरक्षा को कैसे प्रभावित करेगी? डी. एस. बेटिस्टी और आर. एल. नेलॉर ने वर्ष 2009 में साइंस पत्रिका में प्रकाशित अपने पेपर में इसी बारे में आगाह किया था। पर्चे का शीर्षक था: अप्रत्याशित मौसमी गर्मी से भविष्य की खाद्य असुरक्षा की ऐतिहासिक चेतावनी (DOI:10.1126/science.1164363)। पेपर में उन्होंने चेताया है कि उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (जैसे भारत और उसके पड़ोसी देश, सहारा और उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों) में फसलों की वृद्धि के मौसम में इतना अधिक तापमान फसलों की उत्पादकता को बहुत प्रभावित करेगा, और यही ‘सामान्य’ हो जाएगा। समुद्री जीवन और खाद्य सुरक्षा दोनों पर इस दोहरे हमले को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की नीतियां अक्षम्य हैं जिनमें जलवायु परिवर्तन को अनदेखा करके उद्योगों को बढ़ावा देने की बात है।

प्रायोगिक परीक्षण

वैश्विक तापमान और कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर में वृद्धि पौधों की वृद्धि और पैदावार को कैसे प्रभावित करते हैं? क्या ये पैदावार को बढ़ाते हैं, या क्या चयापचय प्रक्रिया में बाधा डालते हैं और उसे नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं? क्या हम प्रयोगशाला में कुछ मॉडल पौधों पर प्रयोग करके यह देख सकते हैं कि वर्तमान (सामान्य) तापमान और भावी उच्च तापमान पर पौधों में क्या होता है; इसी तरह क्या प्रायोगिक रूप से कार्बन डाईऑक्साइड के वर्तमान सामान्य स्तर और भावी उच्च स्तर का प्रभाव देखा जा सकता है?

जे. यू और उनके साथियों ने 2017 में फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस पत्रिका में प्रकाशित अपने शोध में ऐसे ही प्रयोग करके देखे थे, जिसका शीर्षक था: बढ़ी हुई कार्बन डाईऑक्साइड से बरमुडा घास में गर्मी में वृद्धि को सहन करने के चयापचयी तरीके (https://doi.org/10.3389/fpls.2017.01506)। उन्होंने पाया कि पौधे की ताप सहिष्णुता बेहतर हुई थी, और गर्मी के कारण होने वाले नुकसान में कमी आई थी। ये परिणाम दिलचस्प हैं लेकिन घास खरगोशों और मवेशियों जैसे जानवरों के लिए अच्छी है, हम मनुष्यों के लिए नहीं जिनके पास ना तो घास को पचाने वाला पेट है और ना ही लगातार बढ़ने वाले दांत।

वनस्पति शास्त्री घासों को C4 पौधे कहते हैं और खाद्यान्न (हमारे मुख्य भोजन) को C3 पौधे। दोनों तरह के पौधों में प्रकाश संश्लेषण अलग-अलग तरह से होता है। इसलिए उपरोक्त प्रयोग यदि सेम और फलीदार पौधों (जैसे चना, काबुली चना) और इसी तरह के अन्य अनाज पर किए जाएं तो उपयोगी होगा।

इस दिशा में, अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दी सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) के हैदराबाद सेंटर के एक समूह ने प्रयोग करने का सोचा। उन्होंने देखा कि दो प्रकार के चने (देसी या बंगाली चना और काबुली चना जो मूल रूप से अफगानिस्तान से आया है) कार्बन डाईऑक्साइड के अलग-अलग स्तरों – 380 पीपीएम का वर्तमान स्तर, और 550 पीपीएम और 700 पीपीएम के उच्च स्तर – पर किस तरह व्यवहार करेंगे? उन्होंने इन परिस्थितियों में पौधे बोए, और वर्धी अवस्था में और पुष्पन अवस्था में (यानी अंकुरण के 15 दिन और 30 दिन बाद) इन्हें काट लिया गया। परमिता पालित द्वारा प्लांट एंड सेल फिज़ियोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन का शीर्षक है: बढ़े हुए कार्बन डाईऑक्साइड स्तर पर चनों में आणविक और भौतिक परिवर्तन (https: //academy.oup/pcp)।

पूर्व में वार्षनेय और उनका समूह नेचरबायोटेक्नॉलॉजी पत्रिका में चने के पूरे जीनोम का अनुक्रम प्रकाशित कर चुका था। शोधकर्ताओं ने इस संदर्भ में कम से कम 138 चयापचय तरीके पहचाने थे। इनमें मुख्य हैं शर्करा/स्टार्च चयापचय, क्लोरोफिल और द्वितीयक मेटाबोलाइट्स का जैव संश्लेषण। इनका अध्ययन करके वे उन तरीकों के बारे में पता कर सकते थे कि कैसे कार्बन डाईऑक्साइड का उच्च स्तर चने के पौधों की वृद्धि को प्रभावित करता है। उन्होंने पौधों की जड़ और तने की लंबाई (या पौधे की ऊंचाई) में उल्लेखनीय वृद्धि पाई। इसके अलावा कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर अधिक होने पर जड़ों की गठानों (जहां नाइट्रोजन को स्थिर करने वाले बैक्टीरिया रहते हैं) की संख्या भी प्रभावित हुई थी। गौरतलब है कि क्लोरोफिल संश्लेषण में कमी से पत्तियां जल्दी पीली हो जाती हैं और पौधे बूढ़े होने लगते हैं।

विभिन्न प्रतिक्रियाएं

शोधकर्ताओं ने एक दिलचस्प बात यह भी पाई कि कार्बन डाईऑक्साइड के उच्च स्तर के प्रति देसी चना और काबुली चना दोनों ने अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दी। इस पर और अधिक विस्तार से अध्ययन की ज़रूरत है।

और अब, पहचाने गए 138 चयापचय तरीकों की जानकारी के आधार पर इस बात का गहराई से पता लगाया जा सकता है कि हम अणुओं या एजेंटों का उपयोग किस तरह करें कि किसी विशिष्ट प्रणाली को बढ़ावा देकर या बाधित करके, पौधों की वृद्धि और पैदावार बढ़ाई जा सके, और उन फलीदार पौधों के बारे में पता लगाया जा सके जो स्थानीय परिस्थितियों के लिए सबसे उपयुक्त हों। अब, जब नोबेल विजेता जे. डाउडना और ई. शारपेंटिए ने बताया है कि जीन को कैसे संपादित किया जा सकता है, तो यह समय है कि जीन संपादन को खास स्थानीय फलीदार पौधों पर आज़माया जाए!(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चीन के दुर्लभ पक्षियों के बदलते इलाके

चीन में शौकिया पक्षी प्रेमियों की बढ़ती संख्या ने जलवायु परिवर्तन के नए पहलू को उजागर किया है। एक नए अध्ययन में पिछले 2 दशकों से अधिक समय से चीन के नागरिक-वैज्ञानिकों द्वारा एकत्रित डैटा की मदद से पक्षियों की लगभग 1400 प्रजातियों का एक नक्शा तैयार किया गया है। इसमें लुप्तप्राय रेड-क्राउन क्रेन से लेकर पाइड फाल्कोनेट प्रजातियां शामिल हैं। इस डैटा के आधार पर शोधकर्ताओं ने 2070 तक के हालात का अनुमान लगाया गया है। इस नक्शे में प्रकृति संरक्षण के लिहाज़ से 14 क्षेत्रों को प्राथमिकता की श्रेणी में रखा गया है।    

गौरतलब है कि पक्षी प्रेमी नागरिकों द्वारा उपलब्ध कराए गए वैज्ञानिक डैटा का पहले भी शोधकर्ताओं ने उपयोग किया है लेकिन चीन में पहली बार इसका उपयोग राष्ट्रव्यापी स्तर पर किया जा रहा है। देखा जाए तो चीन में पिछले 20 वर्षों में पक्षी प्रेमियों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। कई विश्वविद्यालयों में भी इनकी टीमें तैयार की गई हैं। पक्षी प्रेमी अपने अनुभवों को bird report नामक वेबसाइट पर दर्ज करते हैं, जिसकी सटीकता और प्रामाणिकता की जांच अनुभवी पक्षी विशेषज्ञ करते हैं।

इस डैटा का उपयोग करते हुए पेकिंग युनिवर्सिटी के रुओचेंग हू और उनके सहयोगियों ने 1000 से अधिक प्रजातियों के फैलाव क्षेत्र के नक्शे तैयार किए। इसके बाद उन्होंने दो परिदृश्यों, वर्ष 2100 तक 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और 3.7 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक की वृद्धि, के साथ उनके फैलाव में आने वाले बदलाव को देखने के लिए एक मॉडल तैयार किया। इस मॉडल में उन्होंने दैनिक और मासिक तापमान, मौसमी वर्षा और ऊंचाई जैसे परिवर्तियों को शामिल किया है। प्लॉस वन पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार तापमान में अधिक वृद्धि होने से कई पक्षी उत्तर की ओर या अधिक ऊंचे क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाएंगे। हालांकि लगभग 800 प्रजातियां ऐसी होंगी जिनके इलाके में विस्तार होगा, लेकिन इनमें से अधिकांश क्षेत्र सघन आबादी वाले और औद्योगिक क्षेत्र होंगे जो पक्षियों के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त हैं। मोटे तौर पर 240 प्रजातियों के इलाके में कमी आएगी।

ऐसे में सबसे अधिक प्रवासी पक्षी और सिर्फ चीन में पाए जाने वाली पक्षी प्रभावित होंगे। इस पेपर के लेखकों के अनुसार प्रतिष्ठित रेड-क्राउन क्रेन का इलाका भी सिमटकर आधा रह जाएगा। चीन के मौजूदा राष्ट्रीय आरक्षित क्षेत्र इन पक्षियों के प्राकृत वासों की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इस विनाश से बचने के लिए अध्ययन में इंगित 14 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

नए आरक्षित क्षेत्रों के विकास में भी काफी चुनौतियों का सामना करना होगा। इसके लिए स्थानीय हितधारकों को आश्वस्त करना होगा और भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में सीमाओं को तय करना होगा। विशेषकर ऐसे नए तरीकों का पता लगाना होगा जिससे शहरी उद्यानों और कृषि क्षेत्रों को पक्षियों के अनुकूल बनाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन के साथ फूलों के रंग बदल रहे हैं

लवायु परिवर्तन के साथ पेड़-पौधे और जीव-जंतु अपने इलाकों, प्रजनन के मौसम या अन्य तौर-तरीकों में बदलाव करके खुद को इस परिवर्तन के अनुकूल कर रहे हैं। अब ऐसा ही अनुकूलन फूलों में भी दिखा है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार पिछले 75 वर्षों में बढ़ते तापमान और ओज़ोन ह्रास के साथ फूलों की पंखुड़ियों के अल्ट्रावायलेट (यूवी) रंजकों में बदलाव आया है।

पंखुड़ियों पर यूवी किरणें सोखने वाले रंजक मौजूद होते हैं, जो हमें तो नज़र नहीं आते लेकिन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं और पौधों के लिए एक तरह से सनस्क्रीन का काम भी करते हैं। मनुष्यों की तरह यूवी विकिरण फूलों के पराग के लिए भी हानिकारक होते हैं। पंखुड़ियों पर जितने अधिक यूवी-अवशोषक रंजक होंगे, संवेदनशील कोशिकाओं तक यूवी किरणें उतनी कम पहुंचेंगी।

क्लेम्सन युनिवर्सिटी के पादप पारिस्थितिकीविद मैथ्यू कोस्की ने अपने पूर्व अध्ययन में पाया था कि जिन फूलों ने यूवी विकिरण का सामना अधिक किया, उनमें यूवी-रंजक भी अधिक थे। ऐसा प्राय: अधिक ऊंचाई या भूमध्य रेखा के निकट उगने वाले पौधों में होता है।

कोस्की जानना चाहते थे कि मानव गतिविधि की वजह से ओज़ोन परत में हुई क्षति और बढ़ता तापमान क्या फूलों के यूवी-रंजकों को प्रभावित करते हैं। यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने उत्तरी अमेरिका, युरोप और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली 42 अलग-अलग प्रजातियों के 1238 फूलों के वर्ष 1941 के संग्रह का अध्ययन किया। फिर विभिन्न समय पर एकत्रित किए गए इन्हीं प्रजातियों के फूलों की पंखुड़ियों की यूवी-संवेदी कैमरे से तस्वीरें खींची। इस तरह उन्होंने पंखुड़ियों में यूवी-रंजकों में आए बदलावों को देखा। इन बदलाव का मिलान स्थानीय ओज़ोन स्तर और तापमान में बदलाव के डैटा के साथ किया।

पाया गया कि सभी स्थानों पर 1941-2017 के बीच अल्ट्रावायलेट रंजकों में प्रति वर्ष औसतन 2 प्रतिशत वृद्धि हुई है। लेकिन भिन्न-भिन्न बनावट के फूलों के यूवी-रंजकों में परिवर्तन में भिन्नता थी। मसलन, तश्तरी आकार के बटरकप जैसे फूलों (जिनका पराग उजागर रहता है) में,जिन इलाकों में ओज़ोन में कमी हुई थी वहां उनके यूवी-अवशोषक रंजकों में वृद्धि हुई और जिन स्थानों पर ओज़ोन में वृद्धि हुई थी वहां ऐसे रंजकों में कमी आई। दूसरी ओर, कॉमन ब्लेडरवर्ट जैसे फूलों (जिनका पराग उनकी पंखुड़ियों में छिपा होता है) में तापमान बढ़ने से यूवी-रंजकों में कमी आई, चाहे फिर उस स्थान का ओज़ोन स्तर बढ़ा हो या कम हुआ हो।

पंखुड़ियों के भीतर छिपा पराग नैसर्गिक रूप से यूवी विकिरण से सुरक्षित होता है। ऐसी स्थिति में पंखुड़ियों में मौजूद यूवी-रंजकों की अतिरिक्त सुरक्षा ग्रीनहाउस की तरह कार्य करती है और गर्मी बढ़ाती है। इसलिए जब फूल उच्च तापमान का सामना करते हैं तो पराग के झुलसने की संभावना होती है। यदि पंखुड़ियों में कम यूवी-रंजक हों तो कम विकिरण अवशोषित होगा और ताप भी कम रहेगा।

लेकिन यही यूवी-रंजक हमिंगबर्ड और मधुमक्खियों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित भी करते हैं। अधिकांश परागणकर्ता उन फूलों पर बैठना पसंद करते हैं जिनकी पंखुड़ियों के किनारों पर यूवी-अवशोषक रंजक कम और बीच में अधिक हो। लेकिन यदि यूवी-अवशोषक रंजक बढ़े तो यह अंतर मिट जाएगा, नतीजतन परागणकर्ता ऐसे फूलों पर नहीं आएंगे। ये बदलाव पराग को तो सुरक्षित कर देंगे लेकिन परागणकर्ता दूर हो जाएंगे।(स्रोत फीचर्स)

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केवल गाड़ियों से नहीं, सड़कों से भी प्रदूषण होता है

र्मियों के मौसम में बाहर जाते समय अक्सर हमें डामर से नव-निर्मित सड़क की गंध महसूस होती है। लेकिन बात सिर्फ गंध तक ही सीमित नहीं है। हाल ही में किए गए अध्ययन से पता चला है कि ताज़ा डामर भी वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। गौरतलब है कि पिछले कुछ दशकों में संयुक्त राज्य अमेरिका के कई हिस्सों में वायु गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। यह वास्तव में वाहनों और बिजली संयंत्रों से नियंत्रित और साफ निकासी के कारण संभव हो पाया है। लेकिन इसके बावजूद वायु प्रदूषण के कारण दमा और ह्रदय सम्बंधी समस्याएं उभर रही हैं।

ऐसे में वैज्ञानिकों ने लॉस एंजेल्स और उसके आसपास के क्षेत्रों से वायु प्रदूषण के सभी ज्ञात स्रोतों का अध्ययन किया। सारे स्रोतों से होने वाले प्रदूषण का योग वास्तविक प्रदूषण से मेल नहीं खा रहा था। अध्ययन में शामिल येल युनिवर्सिटी के पर्यावरण इंजीनियर ड्रयू जेंटनर बताते हैं कि वे अपने अध्ययन में डामर से होने वाले वायु प्रदूषण को अनदेखा कर रहे थे। वास्तव में कच्चे तेल या इसी तरह के पदार्थों से बनी चीज़ों में अर्ध-वाष्पशील कार्बनिक यौगिक होते हैं जो किसी न किसी तरह से वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं। जेंटनर की टीम ने दो तरह के ताज़ा डामर एकत्रित किए और उनको प्रयोगशाला की भट्टी में गर्म किया। टीम ने छत पर उपयोग किए जाने वाले डामर के पटरों और तरल डामर का भी परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पुरानी सामग्री की तुलना में नई सामग्री से अधिक रसायनों का उत्सर्जन होता है। वे यह भी देखना चाहते थे कि समय के साथ इस उत्सर्जन में कैसे बदलाव आता है। 

साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार सामान्य डामर की सतह पर सबसे अधिक अर्ध-वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन 140 डिग्री सेल्सियस तापमान पर होता है। जैसे-जैसे डामर ठंडा होता है उत्सर्जन में कमी आती है लेकिन 60 डिग्री सेल्सियस पर यह स्थिर हो जाता है और इसका प्रभाव भी अधिक रहता है। निष्कर्ष बताते हैं कि डामर लंबे समय तक वायु प्रदूषण का स्रोत हो सकता है।

टीम ने उत्सर्जन के लिए धूप को भी काफी महत्वपूर्ण माना है। मध्यम प्रकाश में उत्सर्जन में 300 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह उत्सर्जन हवा में छोटे कण (एयरोसोल) के रूप में उपस्थित रहता है जो सांस के ज़रिए शरीर में प्रवेश करने पर काफी हानिकारक हो सकता है। गर्म मौसम में ज़्यादा प्रदूषण होता है।  

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि डामर से निकलने वाले छोटे कणों की सालाना मात्रा 1000 से 2500 टन के करीब होती है जबकि पेट्रोल और डीज़ल गाड़ियों से यह 900 से 1400 टन के बीच निकलता है। ऐसे में यह प्रश्न काफी महत्वपूर्ण है कि डामर से होने वाला उत्सर्जन कितने समय तक जारी रहता है। जेंटनर के अनुसार इसका निरंतर मापन ज़रूरी है। हालांकि अभी तक डामर से होने वाले प्रदूषण की जानकारी अधूरी है लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक है। यह डैटा वायु प्रदूषण के अध्ययन के मॉडल्स के लिए काफी महत्वपूर्ण है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में कंपनियां डामर के कारण होने वाले उत्सर्जन को कम करने की दिशा में काम करेंगी।(स्रोत फीचर्स)

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