एंटीबायोटिक प्रतिरोध के इलाज की तलाश

वृंदा नम्पूथिरी

एंटीमाइक्रोबियल दवाओं (Antimicrobial Resistance) को दशकों से चमत्कारी दवाइयां माना गया है। काफी समय से ये जानलेवा संक्रमणों (Infectious diseases) का इलाज करने में सक्षम रही हैं। इसी धारणा के चलते एंटीबायोटिक्स (Antibiotics Overuse) का ज़रूरत से ज़्यादा और दुरुपयोग हुआ है। साधारण ज़ुकाम (common cold) से लेकर दस्त तक में, ये आम लोगों की पहली पसंद बन गए हैं, जिससे एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR – एएमआर) की समस्या बढ़ गई है।

एएमआर: क्या और कैसे

एएमआर एक ऐसी स्थिति है जिसमें सूक्ष्मजीव सामान्यत: दी जाने वाली एंटीमाइक्रोबियल दवाओं (Antimicrobial Drugs) के प्रतिरोधी हो जाते हैं। सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध काम करने वाली एंटीमाइक्रोबियल दवाएं विभिन्न प्रकार की होती हैं: बैक्टीरिया के लिए एंटीबायोटिक्स, फफूंद के लिए एंटीफंगल, वायरस के लिए एंटीवायरल (Antiviral medication) और एक-कोशिकीय प्रोटोज़ोआ जीवों के लिए एंटीप्रोटोज़ोआ दवाएं।

एएमआर का सबसे सामान्य रूप एंटीबायोटिक प्रतिरोध है, जिसमें बैक्टीरिया एंटीबायोटिक्स के विरुद्ध प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिरोधी बैक्टीरिया (Resistant Bacteria) से संक्रमित हो जाए तो वह एंटीबायोटिक दवा उस संक्रमण को ठीक नहीं कर पाएगी। ऐसा अनुमान है कि हर साल करीब 47 लाख लोग प्रतिरोधी संक्रमणों (Drug-resistant infections) से मर जाते हैं, जिन्हें अन्यथा इलाज से ठीक किया जा सकता था।

एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक व अंधाधुन्ध उपयोग त्वरित प्रतिरोध के विकास का कारण बना है। इसके चलते दवा कंपनियां नए एंटीबायोटिक्स के विकास में निवेश करने के प्रति भी हतोत्साहित हुई हैं। वर्तमान स्थिति में, जहां एंटीबायोटिक्स की संख्या सीमित है, यह ज़रूरी है कि हम उपलब्ध एंटीबायोटिक्स का सही तरीके से उपयोग करके उन्हें कारगर बनाए रखें।

भारत एंटीबायोटिक्स (India Antibiotic Consumption) का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इनके अति उपयोग के दो प्रमुख कारण हैं – भारत में संक्रामक रोगों का अधिक बोझ (Infectious Disease Burden) और एंटीबायोटिक्स तक सामुदायिक पहुंच पर नियंत्रण का अभाव।

भारत में अधिकांश लोग सीमित स्वास्थ्य सेवाओं (Healthcare Infrastructure in India) के कारण त्रस्त हैं। नतीजतन, रोगी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अनाधिकृत चिकित्सकों (Unqualified Practitioners) पर निर्भर रहते हैं। ऐसे चिकित्सकों के चलते सामान्य शारीरिक समस्याओं के लिए स्टेरॉयड, एंटीबायोटिक्स, मल्टीविटामिन्स और दर्द निवारक दवाओं का मिश्रण लेना आम बात है। यहां तक कि योग्य चिकित्सक भी अक्सर अनावश्यक और गलत एंटीबायोटिक्स लिखते हैं।

इसके अलावा, साफ पानी, स्वच्छता व सफाई की कमी, और मवेशियों को बढ़ावा देने के लिए एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित उपयोग, हमारे देश में एएमआर की समस्या को और बढ़ाता है।

फार्मासिस्ट और एएमआर

फार्मासिस्ट (Role of Pharmacists) समुदाय में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे लोगों और डॉक्टरों के बीच एक कड़ी हैं। अक्सर, लोग डॉक्टरों के मुकाबले फार्मासिस्ट से अधिक आसानी से संपर्क कर सकते हैं। डॉक्टर से परामर्श लेने के लिए पहले अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है, फिर घंटों इंतज़ार करना पड़ता है, यहां तक कि व्यक्ति को काम से छुट्टी भी लेनी पड़ सकती है। इसके विपरीत, लोग किसी स्थानीय मेडिकल स्टोर पर जाकर अपनी समस्या बताकर दवा ले सकते हैं और जल्दी से निकल सकते हैं। जैसा कि एक फार्मासिस्ट ने बताया कि बगैर डॉक्टरी पर्ची के एंटीबायोटिक्स/दवाइयां खरीदना एक सामान्य प्रथा है क्योंकि लोगों के पास निजी डॉक्टर से परामर्श करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते हैं।

हालांकि, यह ‘सुविधा’ अक्सर जोखिमों के साथ आती है। भारत में कई मामलों में, मेडिकल स्टोर में बैठने वाला व्यक्ति एक पंजीकृत फार्मासिस्ट भी नहीं होता है। चूंकि ऐसे अप्रशिक्षित व्यक्तियों के पास दवाइयों के सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के बारे में आवश्यक जानकारी नहीं होती, इसलिए रोगियों की जान को खतरा भी हो सकता है।

भारत में स्वास्थ्य सेवा के लिए फार्मेसियों पर निर्भरता जन स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे की खामियों को भी उजागर करती है। एक फार्मासिस्ट ने बताया कि यदि सभी फार्मासिस्ट बिना डॉक्टरी पर्ची के दवाइयां देना बंद कर दें, तो देश में हंगामा मच जाएगा क्योंकि सरकार के पास हर रोगी के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव है। हम जानते ही हैं कि हमारे सिविल अस्पतालों का क्या हाल है; लंबी कतारें और हमेशा ही भीड़। ऐसे में यदि मेडिकल स्टोर (रिटेल फार्मेसी) वाले दवाइयां देना बंद कर दें, तो सब कुछ रुक जाएगा।

एएमआर से जुड़ी गलत धारणाएं

एक और बड़ी समस्या यह है कि भारत में एंटीबायोटिक्स (Antibiotics misuse) को सभी संक्रमणों का ‘एक समाधान’ (Universal Cure Misconception) माना जाता है। अधिकांश लोग बैक्टीरियल, वायरल और फफूंद संक्रमणों के बीच अंतर नहीं कर पाते और यह नहीं जानते कि एंटीबायोटिक्स केवल बैक्टीरिया संक्रमणों के लिए प्रभावी होती हैं।

समझ की इसी कमी के कारण एंटीबायोटिक्स का गलत उपयोग होता है; जैसा कि मेडिकल स्टोर पर हम अक्सर लोगों को एंटीबायोटिक्स मांगते देखते हैं। एक फार्मासिस्ट ने बताया कि जो रोगी खुद से दवा लेने आते हैं, वे सीधे एंटीबायोटिक्स मांगते हैं, और यदि हम दवा नहीं देते तो वे बहस करने लगते हैं। कभी-कभी तो लोग पुरानी पर्ची लेकर दवाइयां खरीदने आते हैं।

लोग अक्सर मानते हैं कि एंटीबायोटिक्स लेने से वे जल्दी ठीक हो जाएंगे, और जल्दी काम पर लौट पाएंगे जिससे वेतन की हानि कम होगी। यह गलतफहमी पढ़े-लिखे और अनपढ़, दोनों तरह के लोगों में समान रूप से होती है। एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन में काम करने वाले व्यक्ति ने कहा, “मुझे सर्दी-खांसी हो गई थी… (मैंने एंटीबायोटिक्स लीं) मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था। मैं दिवाली पर बीमार नहीं पड़ सकता था।” इस सोच के चलते लोग डॉक्टरों से एंटीबायोटिक्स मांगते हैं और यदि उनकी मांग पूरी नहीं होती तो वे किसी और डॉक्टर के पास चले जाते हैं।

एक सर्जन अपने शोध कार्य के दौरान का मामला बताते हैं: “यदि मैं रोगी को समझा पाया तो वह खुश होकर वापस चला जाता है, लेकिन नहीं समझा पाया तो वह किसी और सर्जन के पास जाएगा, और फिर किसी और सर्जन के पास। आखिरकार, वह ऐसे सर्जन के पास जाएगा जो एंटीबायोटिक्स लिख देगा, और तब वह खुश हो जाएगा। इसे हम ‘डॉक्टर शॉपिंग’ कहते हैं।”

यह दर्शाता है कि लोगों को एंटीबायोटिक्स के ज़िम्मेदार उपयोग और दुरुपयोग के खतरों के बारे में शिक्षित करना कितना ज़रूरी है।

भारत में एएमआर से संघर्ष

भारत में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध से निपटने के लिए कई पहल हुई हैं। इनमें शामिल हैं: एंटीबायोटिक उपचार दिशानिर्देश बनाना और लागू करना; एंटीमाइक्रोबियल स्टुवार्डशिप प्रोग्राम (एएमएस, एंटीमाइक्रोबियल के उपयोग को बेहतर बनाने वाला प्रोग्राम) लागू करना; स्वास्थ्य पेशेवरों को एंटीबायोटिक के उचित उपयोग को लेकर शिक्षित-प्रशिक्षित करना; और एएमआर को थामने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय योजनाएं लागू करना।

हालांकि, लगभग 80 प्रतिशत एंटीबायोटिक का उपयोग सामुदायिक स्तर पर होता है, लेकिन इन पहलों में से अधिकांश का ध्यान मुख्य रूप से अस्पतालों पर केंद्रित है। सामुदायिक स्तर पर एंटीबायोटिक उपयोग को बेहतर बनाने के लिए किसी भी हस्तक्षेप से पहले, इन समस्याओं के कारणों को समझना ज़रूरी है।

भारत में बिना पर्ची एंटीबायोटिक दवाइयां बेचने पर प्रतिबंध लगाने के लिए नियम बनाए गए हैं, जैसे शेड्यूल एच और एच1 दवाएं (केवल पर्ची पर मिलने वाली दवाएं) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया रेड लाइन जागरूकता अभियान। लेकिन, देश के कई हिस्सों में इन नियमों का क्रियान्वयन पर्याप्त नहीं है। 

मेरी एक विदेशी सहकर्मी कुछ साल पहले भारत आई थीं। वे इस बात से हैरान थीं कि एयरपोर्ट की फार्मेसी पर एंटीबायोटिक बिना पर्ची के आसानी से मिल रही थी। जबकि उनके देश में सामुदायिक फार्मेसियों पर एंटीबायोटिक सख्त नियंत्रण में बेची जाती हैं और एंटीबायोटिक के लिए डॉक्टरी पर्ची के लिए कई दिनों तक इंतज़ार करना पड़ता है।

फार्मासिस्ट का संभावित योगदान

बतौर फार्मासिस्ट, मुझे लगता है कि एंटीबायोटिक उपयोग को बेहतर बनाने में हम कई तरीके से सक्रिय योगदान दे सकते हैं। 

हमारी सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों में से एक है एंटीबायोटिक्स की ओवर-दी-काउंटर बिक्री (OTC Antibiotics ban) पर रोक। यह सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि एंटीबायोटिक्स केवल पंजीकृत डॉक्टर की वैध पर्ची पर ही दी जाएं। इसके लिए पर्ची की तारीख का सत्यापन और यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि पर्ची उसी व्यक्ति की है जो इसे दिखा रहा है। कई बार रोगी पुरानी पर्ची दिखाकर उन्हीं लक्षणों के लिए दोबारा एंटीबायोटिक खरीदना चाहते हैं, या परिवार के किसी अन्य सदस्य की पर्ची दिखाते हैं। ऐसे दुरुपयोग को रोकने के लिए सतर्कता अहम है।  

रोगियों को एंटीबायोटिक के सही उपयोग के बारे में शिक्षित करना हमारी भूमिका का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। अक्सर, फार्मासिस्ट केवल बुनियादी निर्देश देने तक ही सीमित रहते हैं, जैसे दवा भोजन से पहले लें या बाद में, खुराक की मात्रा और उपचार की अवधि। यह सब महत्वपूर्ण है, लेकिन रोगियों को एंटीबायोटिक के सही व गलत उपयोग के बारे में बताना भी उतना ही ज़रूरी है।

हमें रोगियों को समझाना चाहिए कि एंटीबायोटिक क्यों दी गई है, उसका नाम क्या है, और इसे कुछ खास खाद्य पदार्थों या दवाओं के साथ लेने से बचना चाहिए या नहीं। रोगियों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि दवा का कोर्स पूरा करना ज़रूरी है, भले ही उन्हें बीच में ही अच्छा लगने लगे। साथ ही, यह भी बताना चाहिए कि एंटीबायोटिक को कभी भी दूसरों को नहीं देना चाहिए, भले ही उनके लक्षण एक जैसे क्यों न लग रहे हों। 

एंटीबायोटिक के सही और तर्कसंगत उपयोग पर अपडेट रहना भी एक अहम ज़िम्मेदारी है, जिसमें क्लीनिकल फार्मासिस्ट्स को पहल करनी चाहिए। मैंने देखा है कि कुछ वरिष्ठ फार्मासिस्ट नई जानकारी अपनाने में हिचकिचाते हैं, जिससे देखभाल की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।

चाहे हम कम्युनिटी फार्मेसी में काम करें या अस्पताल में, हमारी भूमिका सिर्फ दवा देने तक सीमित नहीं है। हम ऐसे स्थान पर हैं जहां हम एंटीबायोटिक के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देकर रोगियों के इलाज को बेहतर बना सकते हैं। अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अच्छी प्रथाओं को साझा करना और इन्हें अलग-अलग जगहों पर लागू करने के लिए काम करना हमारे प्रयासों को और प्रभावी बना सकता है। 

हमारे योगदान को पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए अस्पताल प्रबंधन एवं सरकारी संस्थानों से मान्यता मिलना बहुत ज़रूरी है। ऐसा समर्थन न केवल क्लीनिकल फार्मासिस्ट्स को बेहतर रोज़गार के अवसर देगा, बल्कि रोगियों की देखभाल के नतीजे भी सुधारने में मदद करेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हाथ से लिखने से याददाश्त में मदद मिलती है – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

क समय था जब हम अधेड़ लोग खत व अन्य पत्राचार कागज़-कलम का उपयोग करके लिखते थे और डाक से भेजा करते थे। आजकल तो ग्रीटिंग कार्ड (Greeting card) ही डाक से भेजे जाते हैं। बाकी कामों के लिए हम स्मार्टफोन (smartphone), कंप्यूटर (computer) जैसे डिजिटल उपकरणों (digital tools) का इस्तेमाल करने लगे हैं। आवेदन, संदेश(message), और जवाब भेजने के लिए इन पर हम अक्षर टाइप करते हैं और भेज देते हैं। अलबत्ता, आज के ई-युग (e-age) में भी प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों के बच्चे अपने सबक लिखने (note-taking), होमवर्क (homework) करने, परीक्षाओं में जवाब लिखने और निबंध (essay writing) वगैरह हाथ से ही लिखते हैं। लेकिन यह सब पूरा हो जाने के बाद वे स्मार्टफोन उठाकर दोस्तों से बातें करते हैं या व्हाट्सऐप (whatsApp) करते हैं।

साइन्टिफिक अमेरिकन (Scientific American) में चार्लोट हू का एक लेख छपा है जिसमें ऐसे कई सारे शोध पत्रों का हवाला दिया गया है जो बताते हैं कि हाथों से लिखने से मस्तिष्क (brain Activity) के कई परस्पर सम्बंधित क्षेत्र सक्रिय हो जाते हैं, जिनका सम्बंध सीखने(learning) और याददाश्त(memory) से है। मैं यहां इनमें से कुछ प्रकाशनों का ज़िक्र करूंगा। ट्रॉडेनहाइम (नॉर्वे) के टेक्नॉलॉजीविदों (technologist) के एक समूह ने शिक्षा के क्षेत्र (education research) में शोध किया है जो फ्रन्टियर्स इन सायकोलॉजी (Frontiers in Psychology) में प्रकाशित हुआ है। इस शोध पत्र में बताया गया है कि टाइपरायटिंग (tyring) की बजाय हाथ से लिखने पर मस्तिष्क में व्यापक कड़ियां जुड़ती हैं। दूसरे शब्दों में, एक ही सामग्री को टायपिंग की बजाय हाथ से लिखने पर दिमाग पर कहीं अधिक सकारात्मक असर होता है। सबसे पहले तो हाथ से लिखना न सिर्फ वर्तनी की सटीकता (spelling accuracy) में सुधार करता है बल्कि बेहतर याददाश्त और पुन:स्मरण (वापिस याद करने) में भी मदद करता है।

उक्त दल ने स्कूली बच्चों के एक समूह का अध्ययन किया था। उनके सिरों पर इलेक्ट्रॉनिक सेंसर्स (electronic sensors) लगाए गए थे और उनकी मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया गया था। यह काम दो स्थितियों में किया गया था – एक, जब बच्चे हाथ से लिख रहे थे और दूसरा, तब जब वे कंप्यूटर का उपयोग कर रहे थे। इस तरह के इलेक्ट्रोएंसेफेलोग्राम (ईईजी) (EEG Studies) अध्ययन से पता चला कि टायपिंग की बजाय हाथों से लिखने या चित्र बनाने से मस्तिष्क में ज़्यादा गतिविधि होती है और उसमें दिमाग का ज़्यादा बड़ा क्षेत्र शामिल रहता है। अर्थात टायपिंग की बजाय लिखना दिमाग के अधिक बड़े क्षेत्र को रोशन कर देता है। जब छात्रों को एक मुश्किल शब्द पहेली दी गई (जैसे स्क्रेबल(scrabble) या वर्डल(wordle)) तब भी उनकी याददाश्त का स्तर कहीं अधिक पाया गया।

हस्तलेखन (handwriting) वर्णमाला के अक्षरों के आकार व साइज़ को पहचानने और समझने में भी मदद करता है। 30 छात्रों के साथ किए गए एक अध्ययन में, सहभागियों से कहा गया था कि वे दिए गए शब्दों को एक डिजिटल कलम (digital pen) की मदद से कर्सिव ढंग से एक टच स्क्रीन (touch screen) पर भी लिख सकते हैं या कीबोर्ड (keyboard) की सहायता से टाइप भी कर सकते हैं। इस अध्ययन में भी हाथ से लिखे गए अक्षरों की आकृतियां व साइज़ टाइप किए गए अक्षरों से बेहतर थी।

जिन भाषाओं में वर्णमाला अंग्रेज़ी से भिन्न होती है (जैसे मध्य पूर्व, सुदूर पूर्व या कुछ भारतीय भाषाओं (Indian Languages) की) उन्हें भी हाथों से कहीं अधिक आसानी से लिखा जा सकता है और वे अधिकांश व्यावसायिक तौर पर उपलब्ध कंप्यूटर पर सरलता से उपलब्ध नहीं होतीं।

भारत के अधिकांश स्कूलों में प्राथमिक से लेकर कक्षा 10 तक शिक्षण का माध्यम स्थानीय भाषा (local language) होती है। अंग्रेज़ी एक अतिरिक्त भाषा (secondary language) के रूप में सेकंडरी स्कूल से पढ़ाई जाती है। अलबत्ता, बच्चे इससे पहले ही मोबाइल फोन (mobile phone) का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिनमें अंग्रेज़ी वर्णमाला होती है। कई भारतीय भाषाओं में अनोखे अक्षर होते हैं जो अंग्रेज़ी वर्णमाला में नहीं होते (जैसे तमिल व मलयालम में ழ और ഴ जिन्हें अंग्रेज़ी में लगभग ‘zha’ के रूप में लिखा जाता है।

इसी प्रकार से कई उर्दू/अरबी शब्द (urdu/ Arabic words), जिनका उपयोग हिंदी में किया जाता है, भी कीबोर्ड पर टाइप नहीं किए जा सकते। और जब भारत में हम लोग कुछ लिखने के लिए मोबाइल फोन या कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, तो हमें कठिनाई होती है क्योंकि इन उपकरणों पर सिर्फ अंग्रेज़ी वर्णमाला होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कुपोषण प्रबंधन का एक नया आयाम

दुनिया भर में लगभग साढ़े चार करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से एक-तिहाई भारत में रहते हैं। सरकारें तथा कई संस्थाएं इस समस्या से जूझने के प्रयास में लगे हैं। फिलहाल, किया यह जाता है कि कुपोषित बच्चों को विशेष खुराक दी जाती है जिसमें दूध पावडर, मूंगफली का चूरा, मक्खन, तेल और शकर का मिश्रण होता है। इस तैयारशुदा मिश्रण के सेवन से कुपोषित बच्चों का वज़न तो बढ़ता है लेकिन उनमें दीर्घावधि अभाव के खतरे बने रहते हैं। इनमें कद न बढ़ना, प्रतिरक्षा तंत्र की कमज़ोरी तथा तंत्रिका तंत्र के विकास में बाधाएं शामिल हैं।

एक हालिया अध्ययन का निष्कर्ष है कि यदि कुपोषित बच्चों के आहार में ऐसा भोजन शामिल किया जाए जो उनकी आंतों के सूक्ष्मजीव संसार को समृद्ध कर सके तो इससे बहुत लाभ मिल सकता है।

इस अध्ययन की प्रेरणा दरअसल वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के सूक्ष्मजीव संसार (माइक्रोबायोम) विशेषज्ञ जेफ्री गॉर्डन तथा बांग्लादेश स्थित अंतर्राष्ट्रीय अतिसार रोग केंद्र के निदेशक व बालपन कुपोषण के विशेषज्ञ तहमीद अहमद के प्रयोगों से मिली थी। करीब 10 साल पहले गॉर्डन और तहमीद ने दर्शाया था कि भोजन की अत्यधिक कमी का असर शिशुओं की आंतों के सूक्ष्मजीव संसार के समुचित विकास पर भी होता है। ऐसे कुपोषित बच्चों में वे बैक्टीरिया तो पाए जाते हैं, जो नवजात शिशुओं में होते हैं लेकिन वे ऐसे बैक्टीरिया हासिल नहीं कर पाते हैं जो सामान्य बड़े बच्चों में होते हैं। इसके बाद इन शोधकर्ताओं ने इसके परिणामों का अध्ययन किया।

यह देखा गया कि ‘कीटाणु-रहित’ चूहों को कुपोषित बच्चों की आंतों से प्राप्त माइक्रोबायोम दिया गया तो इन चूहों की मांसपेशियों और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का विकास उन चूहों की अपेक्षा कम हुआ जिन्हें स्वस्थ बच्चों का माइक्रोबायोम दिया गया था। कीटाणु-रहित चूहों की आंतों में कोई भी सूक्ष्मजीव नहीं होते हैं। निष्कर्ष यह था कि माइक्रोबायोम शायद कुपोषण के प्रभावों को कम कर सकता है।

गॉर्डन-अहमद की टीम ने ऐसे खाद्य पदार्थों की पहचान की जो आंतों में सामान्य सूक्ष्मजीव संसार के सामान्य विकास में मदद करते हैं और बांग्लादेश में आसानी से उपलब्ध हैं – जैसे चना, केला, सोयाबीन व मूंगफली का आटा। झुग्गियों में रहने वाले 118 मध्यम स्तर के कुपोषित बच्चों (उम्र 12-18 माह) पर इन पूरक पदार्थों का परीक्षण किया गया। दी न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया है कि इन बच्चों को तीन माह तक यह उपचार दिया गया और फिर एक महीने बाद जांच की गई। पता चला कि सामान्य पूरक आहार की बजाय नया पूरक आहार लेने वाले बच्चों में वज़न अधिक तेज़ी से बढ़ा और इसका लाभदायक प्रभाव उनके खून के 700 प्रोटीन्स पर देखा गया जबकि सामान्य पूरक आहार वाले बच्चों में ऐसा असर मात्र 82 प्रोटीन्स पर हुआ था। दो साल बाद फिर से की गई जांच में कई अन्य लाभ भी नज़र आए।

अब साइंस ट्रांसलेशन मेडिसिन में जो अध्ययन प्रकाशित हुआ है उसमें गंभीर रूप से कुपोषित 12-18 माह के 124 बच्चों को शामिल किया गया था। पहले तो उन्हें भोजन दिया गया और किसी भी संक्रमण या दस्त के लिए इलाज किया गया ताकि वे गंभीर स्तर से मध्यम स्तर के कुपोषित की श्रेणी में आ जाएं। इसके बाद तीन माह तक आधे बच्चों को मानक पूरक आहार दिया गया जबकि बाकी आधे बच्चों को सूक्ष्मजीव संसार उन्मुखी आहार दिया गया। पता चला दूसरे समूह के बच्चों का वज़न अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ा और उनके खून में ऐसे प्रोटीन्स की सांद्रता भी अधिक थी जो कंकाल, मांसपेशियों और मस्तिष्क के विकास को बढ़ावा देते हैं।

अब, शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह उपचार काम कैसे करता है। जैसे उपचार के दौरान लिए गए मल के नमूनों में डीएनए व आरएनए का विश्लेषण करके वे बच्चों की आंतों में सूक्ष्मजीव संसार के परिवर्तनों को समझ पाएंगे। पिछले वर्ष नेचर में प्रकाशित एक पर्चे में उन्होंने बताया था कि 75 सूक्ष्मजीवी प्रजातियों की संख्या में भरपूर वृद्धि हुई थी। इनमें एक बैक्टीरिया प्रेवोटेला कोप्री था जो ऐसे जीन्स को सक्रिय कर देता है जो पूरक आहार के कार्बोहायड्रेट के पाचन में मदद करते हैं। आगे के अध्ययनों में भी प्रेवोटेला कोप्री की भूमिका की पुष्टि हुई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक ऐसा परीक्षण शुरू किया है जिसमें विभिन्न परिस्थितियों में इस तरीके का असर परखा जाएगा। साल 2025 में पूरे होने वाले इस परीक्षण में बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, माली और तंज़ानिया देश के 6360 बच्चों को शामिल किया जाएगा।

उम्मीद है कि इस परीक्षण के नतीजों के आधार पर कुपोषण प्रबंधन में वर्तमान आहार की बजाय माइक्रोबायोम-उन्मुखी आहार को शामिल करने का मार्ग प्रशस्त होगा। (स्रोत फीचर्स)

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मलेरिया में दवा प्रतिरोध की समस्या

फ्रीका में मलेरिया से गंभीर रूप से पीड़ित बच्चों में इलाज के लिए उपयोग की जाने वाली एक मुख्य दवा, आर्टेमिसिनिन, के प्रतिरोध का पता चला है। यह खोज चिंताजनक है क्योंकि दुनिया में मलेरिया से होने वाली मौतों में से 95 प्रतिशत अफ्रीका में होती हैं, और इनमें भी सबसे अधिक प्रभावित बच्चे होते हैं।

गौरतलब है कि आर्टेमिसिनिन मलेरिया के इलाज में अहम है। हल्के मामलों में इसे एक अन्य दवा के साथ दिया जाता है, जिसे आर्टेमिसिनिन-आधारित संयोजन उपचार (ACTs) कहा जाता है। गंभीर मामलों में, आर्टेसुनेट (तेज़ी से असर करने वाली आर्टेमिसिनिन) को शिराओं में इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाता है, और इसके बाद ACT दिया जाता है। यह उपचार खासकर बच्चों के लिए जीवनरक्षक है।

लेकिन युगांडा के जिन्जा में किए गए एक अध्ययन में गंभीर मलेरिया से पीड़ित 10 प्रतिशत बच्चों में आर्टेमिसिनिन के प्रति आंशिक प्रतिरोध का पता चला है। इसका मतलब है कि यह दवा मलेरिया परजीवी (प्लाज़्मोडियम फैल्सिपेरम) को उम्मीद से अधिक समय में खत्म करती है।

6 महीने से 12 साल की आयु के गंभीर मलेरिया से पीड़ित 100 बच्चों पर किए गए अध्ययन में 11 बच्चों में आर्टेमिसिनिन के प्रति आंशिक प्रतिरोध देखा गया। वहीं 10 बच्चों में इलाज पूरा होने के बाद दोबारा संक्रमण हुआ, जिससे सहयोगी दवा लुमेफैंट्रिन की प्रभाविता पर सवाल खड़े होते हैं।

जेनेटिक विश्लेषण से पता चला कि परजीवी में कुछ विशेष म्यूटेशन आर्टेमिसिनिन के धीमे प्रभाव के लिए ज़िम्मेदार हैं। हालांकि, कुछ मामलों में संक्रमण के दोबारा होने से लुमेफैंट्रिन के प्रति प्रतिरोध की संभावना भी नज़र आई, जिसके लिए अधिक गहराई से जांच की ज़रूरत है।

आर्टेमिसिनिन के आंशिक प्रतिरोध का मामला 2000 के दशक में दक्षिण-पूर्व एशिया में पता चला था, और तभी से यह वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। हालांकि अध्ययन में शामिल सभी बच्चे ठीक हो गए, लेकिन परजीवी को खत्म करने में देरी गंभीर मामलों में मृत्यु दर बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों को डर है कि अफ्रीका, जहां मलेरिया सबसे अधिक है, में बढ़ता यह प्रतिरोध वैश्विक मलेरिया नियंत्रण प्रयासों को बाधित कर सकता है और दशकों की मेहनत पर पानी फेर सकता है।

तो आगे क्या किया जाए?

1. अधिक शोध: इन निष्कर्षों की पुष्टि और संयोजक दवा प्रतिरोध की भूमिका को समझने के लिए अधिक शोध आवश्यक हैं।

2. उपचार दिशा-निर्देशों को अद्यतन करना: यदि प्रतिरोध फैलता है तो वैकल्पिक उपचार या नई दवाओं के संयोजन की ज़रूरत होगी। 3. मज़बूत निगरानी: प्रतिरोध के पैटर्न को ट्रैक करने और त्वरित कार्रवाई के लिए उचित निगरानी की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तेज़ आवाज़ और आपके कान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

दीवाली का त्यौहार गुज़रे करीब एक महीना हो गया है। हमारे सभी त्यौहार हमें खुशी-उल्लास देते हैं, लेकिन हमारा दीपों का यह त्यौहार साथ में बहुत ज़्यादा शोर भी देता है। सल्फर डाईऑक्साइड जैसे हानिकारक उत्सर्जन को कम करने और पटाखे फोड़ने पर होने वाले शोर को कम करने के लिए ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल करने की लगातार अपील की जाती है। इन्हें सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत निर्देशों, जैसे लड़ियों वाले पटाखों के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध, के ज़रिए अनिवार्य किया है। लेकिन हर साल इस त्यौहार के मौसम में पटाखों की तेज़ आवाज़ें गूंजती रहती हैं।

लोगों की चिंता पटाखों के कारण होने वाले वायु प्रदूषण पर केंद्रित रहती है, लेकिन उतनी ही चिंता की बात यह है कि बहुत तेज़ आवाज़ या धमाके हमारी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पटाखों से इतर, साल भर होने वाले शोर या ध्वनि प्रदूषण पर अन्य तरह के प्रदूषण की तुलना में कम ध्यान दिया जाता है। ऐसा लगता है कि शोर को हमारे आसपास के पर्यावरण के हिस्से के रूप में अधिक आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है, खासकर तब जब यह शोर आप स्वयं पैदा कर रहे हों।

ध्वनि तरंगों के माध्यम से आगे बढ़ती है। इन तरंगों में ऊर्जा होती है। जितनी अधिक ऊर्जा होगी, उतनी ही ज़्यादा तीव्र तरंग होगी और उतनी ही तेज़ आवाज़ होगी। ध्वनि की तीव्रता मापने के लिए डेसिबल (डीबी) पैमाने का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक लघुगणकीय पैमाना है, इसलिए जब ध्वनि स्तर 10 डेसिबल बढ़ता है तो इसका मतलब होता है कि ध्वनि की तीव्रता दस गुना बढ़ गई है। डीबी पैमाने पर, मानव श्रवणशक्ति की शुरुआत 0 डीबी पर सेट की गई है। एक फुसफुसाहट की ध्वनि की माप इस पैमाने पर 30 डेसिबल आती है, और सामान्य बातचीत की ध्वनि की माप 60 डेसिबल।

तेज़ धमाके के साथ फूटने वाले पटाखे की ध्वनि तीव्रता, 10 फीट दूर मापने पर, 140 डेसिबल आती है। यह तीव्रता कान के कॉक्लिया (आंतरिक कान में एक सर्पिलाकार रचना जो ध्वनि तरंगों को विद्युत संकेतों में बदलती है) में मौजूद रोम कोशिकाओं को आसानी से नुकसान पहुंचा सकती है। कॉक्लिया कान के परदे के माध्यम से कंपन प्राप्त करता है और फिर रोम कोशिकाएं उन्हें तंत्रिका संकेतों में बदल देती हैं। इन रोम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने से वे ध्वनि के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं। नतीजतन, रोम कोशिका द्वारा प्रतिक्रिया करने और तंत्रिका संकेतों को मस्तिष्क तक भेजने के लिए तेज़ या ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है। रोम कोशिकाएं मध्यम आवाज़ के असर के बाद कुछ हद तक ठीक हो सकती हैं। लेकिन हमारी त्वचा कोशिकाओं के विपरीत, ये कोशिकाएं पुनर्जनन में असमर्थ हैं। इसलिए बार-बार होने वाले आघातों से उबरना इन कोशिकाओं के लिए मुश्किल हो सकता है। नतीजतन, लगातार तेज़ शोरगुल के कारण सुनने की क्षमता घट सकती है।

छोटे बच्चों के संवेदनशील कानों के लिए तेज़ आवाज़ें एक गंभीर खतरा हैं, क्योंकि सुनने की क्षमता में मामूली कमी भी उनकी सीखने की क्षमता को कम कर सकती है। शोर के अत्यधिक संपर्क के कारण होने वाला ध्वनि आघात अक्सर कान बजने (टिनिटस) की समस्या पैदा करता है, जिसमें कहीं कुछ आवाज़ न होने पर भी आपको कानों में सीटी बजने सी आवाज़ सुनाई देती रहती है। यह ‘सीटी की आवाज़’ क्षतिग्रस्त रोम कोशिकाओं की असामान्य विद्युत गतिविधि का संकेत है। आम तौर पर, यह आवाज़ कम हो जाती है, लेकिन लंबे समय तक लगातार शोर-शराबे के संपर्क में रहने से यह आपके जीवन का स्थायी लक्षण बन सकती है। बेशक, टिनिटस बुज़ुर्गों को भी हो सकता है, जो उम्र से सम्बंधित क्षति के कारण पैदा होता है।

लंबे समय तक मध्यम-तीव्रता वाली आवाज़ों (शोरगुल) के संपर्क में रहने से भी सुनने की क्षमता ठीक वैसे ही कम हो सकती है, जैसे तेज़ आवाज़ें सुनने से होती है। भारतीय शहरों की सड़कों पर यातायात का शोर एक दिन में 60 से 102 डेसिबल तक मापा गया है। साल 2008 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन में हैदराबाद शहर के यातायात पुलिसकर्मियों पर किया गया एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। अध्ययन में पांच साल की सेवा के बाद सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मियों में सुनने की क्षमता में कमी पाई गई थी, ऐसे ही नतीजे सुब्रतो नंदी और सारंग धात्रक को भारत में व्यावसायिक शोर पर किए गए सर्वेक्षण में मिले थे।

इयरप्लग जैसे निवारक उपाय सुनने की क्षमता में कमी के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। निर्माण उद्योग जैसे कुछ पेशों में ज़रूरत के अनुसार इयरप्लग अपनाए जा रहे हैं, लेकिन इसे और अधिक व्यापक बनाने की ज़रूरत है। शायद, ग्रीन पटाखों के चलन में आने के पहले ही, त्यौहार की रातों में इयरप्लग पहनना एक आम दृश्य बन जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गर्भावस्था में अतिरिक्त रक्त की आपूर्ति – अर्पिता व्यास

र्भावस्था में बढ़ते बच्चे और आंवल को पोषण देने के लिए अतिरिक्त रक्त की आवश्यकता होती है। महिलाओं में 9 महीने के गर्भकाल के अंत में करीब 20 प्रतिशत अतिरिक्त लाल रक्त कोशिकाओं की आवश्यकता होती है। यह वृद्धि कुछ हद तक हार्मोन्स के नियंत्रण में होती है लेकिन शोधकर्ता अभी तक निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते थे कि स्तनधारियों में खून में यह वृद्धि ठीक-ठीक कैसे होती है।

हाल ही में इसके लिए एक नई व्याख्या सामने आई है। जिसमें ट्रांसपोज़ॉन के सक्रिय होने का सम्बंध लाल रक्त कोशिकाओं के बनने से देखा गया है।

ट्रांसपोज़ॉन को जंपिंग जीन भी कहते हैं। ये डीएनए के ऐसे खंड होते हैं जो जीनोम में एक जगह से कटकर दूसरी जगह चिपक जाते हैं। मानव जीनोम का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ऐसे ही जंपिंग जीन से बना होता है। पहले माना जाता था कि ये कोई काम नहीं करते हैं; बस खुद की कॉपी बना-बनाकर डीएनए में अन्यत्र चिपकते रहते हैं। कभी-कभार ये उछल कर किसी अन्य जीन में चिपक जाते हैं और उत्परिवर्तन का कारण बनते हैं।

साइंस में प्रकाशित नई व्याख्या के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान जीनोम में पड़े कुछ सुप्त ट्रांसपोज़ॉन्स सक्रिय हो जाते हैं जिसकी वजह से मां के शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप रक्त कोशिकाएं बनने लगती हैं। चूहों और मनुष्यों में स्टेम कोशिकाओं के जीनोम के अध्ययन से इस बात का पता चला है।

वैसे तो स्तनधारियों में ज़्यादातर ट्रांसपोज़ॉन्स उद्विकास के दौरान निष्क्रिय हो गए हैं, लेकिन अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि ये अन्य जीन्स की अभिव्यक्ति के नियमन तथा नई जेनेटिक विविधता पैदा करने में और संभवत: भ्रूण के विकास में भी भूमिका निभाते हैं।

टेक्सास विश्वविद्यालय साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर के चिल्ड्रन्स मेडिकल सेंटर रिसर्च इंस्टीट्यूट के स्टेम सेल जीव विज्ञानी सीन मॉरीसन और उनके साथी पहले यह दर्शा चुके थे कि गर्भावस्था में एस्ट्रोजन नामक हार्मोन की मात्रा में वृद्धि होती है जो स्प्लीन (तिल्ली) की स्टेम कोशिकाओं को विभाजित होकर लाल रक्त कोशिकाएं बनाने को प्रेरित करता है। इसी काम को आगे बढ़ाते हुए मॉरीसन की छात्रा जूलिया फान गर्भवती और सामान्य मादा चूहों में स्टेम सेल्स की जीन अभिव्यक्ति की तुलना कर रही थी।

अपने विश्लेषण में उन्होंने ट्रांसपोज़ॉन्स की गतिविधि को खारिज नहीं किया जो सामान्य तौर पर किया जाता है। उन्होंने पाया कि स्प्लीन की रक्त-निर्माता स्टेम कोशिकाओं में कुछ खास किस्म के जंपिंग जीन (रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स) काफी सक्रिय हो गए थे, और अस्थि मज्जा में कुछ कम सक्रिय हुए थे। तो सवाल था कि क्या इन रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की सक्रियता की रक्त निर्माण में कुछ भूमिका है?

टीम ने पाया कि रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की इस बाढ़ के  प्रतिक्रियास्वरूप स्टेम कोशिकाएं ऐसे प्रोटीन्स बना रही थीं जो वायरस-रोधी प्रतिरक्षा में प्रमुख रूप से शामिल होते हैं – ये प्रोटीन्स फिर इन कोशिकाओं के विभाजित होने तथा कुछ मामलों में लाल रक्त कोशिकाएं बनाने को प्रेरित कर रहे थे। कुछ चूहों में उन्होंने ये प्रतिरक्षा जीन्स ठप कर दिए थे या उन्हें वह एंज़ाइम बनाने से रोक दिया था जिसका उपयोग रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स अपनी नकल बनाकर चिपकने के लिए करते हैं। इन चूहों में रक्त निर्माण में बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली।

मनुष्यों में भी देखा गया कि गर्भवती महिलाओं की स्टेम कोशिकाओं में रिट्रोट्रांसपोज़ॉन सक्रियता थी जबकि गैर-गर्भवती स्त्रियों में नहीं। जब इन गर्भवती महिलाओं को रीवर्स ट्रांसक्रिप्प्टेस रोधी एंज़ाइम से उपचारित किया गया, तब उन महिलाओं में रक्त की कमी (एनीमिया) हो गई। यदि इन निष्कर्षों की पुष्टि होती है तो ये शरीर में रक्त निर्माण की एक नई क्रियाविधि को उजागर करेंगे और शायद कुछ एनीमिया पीड़ित लोगों के लिए मददगार साबित हों।

यह समझना अभी बाकी है कि गर्भावस्था में रेट्रोट्रांसपोज़ॉन्स क्यों व कैसे सक्रिय हो जाते हैं। क्या ये गर्भधारण करते ही सक्रिय हो जाते हैं या बाद में सक्रिय होते हैं? यह भी स्पष्ट नहीं है कि रेट्रोट्रांसपोज़ॉन्स गर्भावस्था से प्रेरित होते हैं या फिर एस्ट्रोजन के बढ़ने से। कई शोधकर्ताओं का मानना है कि यह एक आश्चर्यजनक बात है कि स्तनधारियों में यह प्रक्रिया रेट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की गतिविधि पर निर्भर करती है, जो कोशिकाओं में उत्परिवर्तन का कारण बनता है। मॉरीसन का अनुमान है कि शरीर किसी तरह इन वायरसनुमा जीन अनुक्रमों को जीनोम में जुड़ने से रोकता है या मात्र स्टेम कोशिकाओं में सक्रिय होने देता है। बहरहाल, क्रियाविधि कुछ भी हो, रेट्रोट्रांसपोज़ॉन की क्रिया को अनदेखा नहीं करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पंखे कितने तापमान तक फायदेमंद होते हैं?

गर्मियों में लोग राहत के लिए पंखे (fans) चलाते हैं। इस मामले में यूएस के सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल (CDC – Center for Disease Control) ने 32.2 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान (temperature) पर ही पंखे चलाने की सलाह दी है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO – World Health Organization) की सलाह है कि 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर पंखा चला सकते हैं। सवाल उठता है कि पंखे का उपयोग कब सुरक्षित (safe usage) है और कब तकलीफदायक? 

इसके समाधान के लिए दो अध्ययनों (studies) ने तापमान और नमी (humidity) दोनों को ध्यान में रखते हुए यह निर्धारित करने का प्रयास किया है कि पंखे का उपयोग कब फायदेमंद (beneficial) है और कब नुकसानदेह। 

दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन (The New England Journal of Medicine) में प्रकाशित एक अध्ययन (study) में, शोधकर्ताओं (researchers) ने 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों पर दो परिस्थितियों में पंखे के असर का परीक्षण किया – एक गर्म और नम (38 डिग्री सेल्सियस और 60 प्रतिशत आर्द्रता) तथा दूसरी गर्म और शुष्क (45 डिग्री सेल्सियस और 15 प्रतिशत आर्द्रता)। परिणामों से पता चला कि नम परिस्थिति में, पंखे 38 डिग्री सेल्सियस तक भी फायदेमंद (effective cooling) थे। पंखे ने पसीने को अधिक प्रभावी ढंग से वाष्पित करने में मदद की, जिससे हृदय सम्बंधी तनाव (cardiovascular stress) 31 प्रतिशत तक कम हुआ। इस स्थिति में जब प्रतिभागियों पर पानी (water spray) छिड़का गया तो उनके हृदय सम्बंधी तनाव में 55 प्रतिशत तक की कम आई। दूसरी ओर शुष्क गर्मी में परिणाम बिलकुल अलग थे। कम नमी में 45 डिग्री सेल्सियस पर पंखा हानिकारक (harmful effects) साबित हुआ। नमी की कमी के कारण पसीना बहुत जल्दी वाष्पित हो गया, जिससे बहुत कम ठंडक मिली। नतीजा, प्रतिभागियों को गंभीर हृदय तनाव हुआ और प्रयोग जल्दी रोकना पड़ा। इससे पता चलता है कि नमी की उपस्थिति में पंखे सुरक्षित (safe fans) हैं और CDC द्वारा सुझाए गए तापमान से अधिक तापमान पर भी फायदेमंद हैं। लेकिन शुष्क गर्मी में पंखे गर्म हवा को फैलाकर गर्मी बढ़ा सकते हैं। 

जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (Journal of American Medical Association) में प्रकाशित दूसरे अध्ययन में ओटावा विश्वविद्यालय (University of Ottawa) की प्रयोगशाला में इसी तरह के परीक्षण किए गए। वहां कमरे में नमी 45 प्रतिशत और तापमान 36 डिग्री सेल्सियस रखा गया। पंखा चलाने पर शरीर का कोर तापमान (core body temperature) 0.1 डिग्री सेल्सियस तक कम हुआ और हृदय गति (heart rate) थोड़ी कम हुई लेकिन इसके लाभ पहले अध्ययन की तरह नहीं थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि पंखे कुछ हद तक राहत (relief) दे सकते हैं, लेकिन 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर वृद्धों को ठंडक देने में प्रभावी नहीं होते। 

तो क्या करें? WHO ने पंखे के इस्तेमाल की सीमा 40 डिग्री सेल्सियस तक रखी है, CDC 32.2 डिग्री सेल्सियस की सीमा पर कायम है। लेकिन दोनों संगठन इस बात पर सहमत हैं कि पंखे के इस्तेमाल की सुरक्षित स्थिति (safe conditions) निर्धारित करने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। तो, सटीक सलाह आने तक आप अपनी सहूलियत (comfort) के हिसाब से पंखा चलाएं और जिस तापमान पर आपको पंखे से परेशानी होने लगे, पंखा बंद करने से न झिझकें। (स्रोत फीचर्स) 

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ज़्यादा खाने से मधुमेह कैसे होता है?

मोटापा (obesity) मधुमेह (diabetes) के जोखिम को काफी बढ़ा देता है, लेकिन इसका सटीक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन नए शोध (new research) से पता चलता है कि अत्यधिक उच्च वसायुक्त भोजन (high-fat diet) के सेवन से लीवर (liver) सहित पूरे शरीर में तंत्रिका-संप्रेषकों (न्यूरोट्रांसमीटर – neurotransmitters) में उछाल आता है। इनके प्रभाव से लीवर में वसीय ऊतक विघटित (fatty tissue breakdown) होने लगते हैं। यह खोज लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को चुनौती देती है कि ज़्यादा खाने से मधुमेह होता है। यह अध्ययन नई उपचार रणनीतियों (treatment strategies) का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। 

आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि मधुमेह तब होता है जब शरीर इंसुलिन (insulin) के प्रति प्रतिक्रिया करना बंद कर देता है, जिससे रक्तप्रवाह (bloodstream) में हानिकारक फैटी एसिड (fatty acids) बढ़ जाते हैं। हालांकि, सेल मेटाबॉलिज़्म (Cell Metabolism) में प्रकाशित हालिया निष्कर्षों (findings) में इसके पीछे शरीर के रासायनिक संदेशवाहक यानी न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका को उजागर किया गया है। मोटे (obese) लोगों में ये न्यूरोट्रांसमीटर, विशेष रूप से नॉरएपिनेफ्रिन (norepinephrine), इंसुलिन की उपस्थिति में भी शरीर में वसीय अम्लों का अत्यधिक विघटन जारी रखते हैं। वसीय अम्लों में यह वृद्धि मधुमेह, फैटी लीवर (fatty liver) और ऊतकों में सूजन (inflammation) जैसी स्थितियों को जन्म देती है। 

रटगर्स यूनिवर्सिटी (Rutgers University) के क्रिस्टोफ ब्यूटनर और केनिची सकामोटो के शोध दल ने इस बात का पता लगाने के लिए एक चूहा मॉडल (mouse model) का इस्तेमाल किया, जिनके मस्तिष्क (brain) को छोड़कर अन्य अंगों से न्यूरोट्रांसमीटर बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन को हटा दिया गया था। इसके बाद दोनों तरह के चूहों को उच्च वसा वाला आहार (high-fat diet) दिया गया। 

नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। हालांकि चूहों के दोनों समूहों ने समान वज़न (weight gain) हासिल किया और दोनों में ही समान इंसुलिन गतिविधि देखी गई, लेकिन संशोधित चूहों में इंसुलिन प्रतिरोध (insulin resistance), फैटी लीवर या सूजन विकसित नहीं हुई। वहीं, असंशोधित चूहों में गंभीर इंसुलिन प्रतिरोध व लीवर क्षति (liver damage) देखी गई। 

जैव-रसायनज्ञ मार्टिना श्वेइगर (Martina Schweiger) के अनुसार, यह शोध एक नई दिशा का संकेत देता है। इंसुलिन की विफलता मधुमेह का एकमात्र कारण होने की बजाय, न्यूरोट्रांसमीटर भी शरीर को हानिकारक स्थिति में धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्ययन कहता है कि मोटापे से ग्रस्त लोगों में केवल इंसुलिन पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय न्यूरोट्रांसमीटर्स पर ध्यान देने से मधुमेह के इलाज (diabetes treatment) या रोकथाम (prevention) के नए तरीके मिल सकते हैं। 

हालांकि यह खोज एक बड़ी सफलता (major breakthrough) है, लेकिन अभी भी कई सवालों के जवाब दिए जाने बाकी हैं। उच्च वसा वाले आहार से न्यूरोट्रांसमीटर उछाल (neurotransmitter spike) कैसे शुरू होता है? क्या मस्तिष्क को प्रभावित किए बिना, विशिष्ट ऊतकों (specific tissues) में न्यूरोट्रांसमीटर को लक्षित करने के लिए दवाएं बनाई जा सकती हैं? क्या ऐसा करने से मोटापे से संबंधित इंसुलिन प्रतिरोध (obesity-related insulin resistance) का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सकता है? 

बहरहाल, यह अध्ययन मधुमेह एवं मोटापे से जुड़े अन्य चयापचय विकारों (metabolic disorders) के बेहतर उपचार की उम्मीद जगाता है। (स्रोत फीचर्स) 

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नेत्रदान और कॉर्निया प्रत्यारोपण

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, तेजा बालनत्रपु

अंधत्व रोकथाम के लिए कार्यरत इंटरनेशनल एजेंसी फॉर दी प्रीवेंशन ऑफ ब्लाइंडनेस (International Agency for the Prevention of Blindness – IAPB) प्रति वर्ष अक्टूबर के दूसरे गुरुवार को विश्व दृष्टि दिवस (World Sight Day) के रूप में मनाती है। इस वर्ष यह दिन 10 अक्टूबर को था। इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना और दुनिया भर में हर किसी को दृष्टि का लाभ पहुंचाने के प्रयासों का समर्थन करना है। इन प्रयासों में शामिल हैं ज़रूरतमंदों को चश्मा वितरण (Eyeglasses Distribution) और आंख के क्षतिग्रस्त हिस्सों का इलाज करना, जैसे मोतियाबिंद के उपचार (Cataract Surgery) के लिए आंख के अपारदर्शी लेंस को बदलना, या अंधेपन के इलाज के लिए कॉर्निया का प्रत्यारोपण (Corneal Transplant). 

कॉर्नियल क्षति (Corneal Damage) के कारण हुआ अंधापन भारत में अंधेपन की समस्या का एक प्रमुख कारण है। कॉर्निया के प्रत्यारोपण में दानदाता (Donor) के स्वस्थ ऊतक लेकर क्षतिग्रस्त कॉर्निया वाले व्यक्ति में प्रत्यारोपित कर उसकी दृष्टि को बहाल किया जाता है। अलबत्ता, प्रत्यारोपण की दीर्घकालिक सफलता (Long-term Success) कई कारकों से प्रभावित होती है: दाता के ऊतकों की गुणवत्ता (Tissue Quality), कॉर्निया की हालत, और सबसे महत्वपूर्ण लंबे समय तक नियमित जांच और देखभाल (Regular Check-ups and Care)। 

कॉर्निया (Cornea), आंख की पुतली और तारे को ढंकने वाली एक पतली, पारदर्शी और गुंबदनुमा परत होती है। कॉर्निया के ऊतकों का विशिष्ट गुण होता है पारदर्शी बने रहना ताकि वह आने वाले प्रकाश (Incoming Light) को रेटिना तक पहुंचने दे सके। रेटिना (Retina) पर प्रकाश-ग्राही कोशिकाएं होती हैं जो हमें देखने में मदद करती हैं। यदि किसी कारण से कॉर्निया क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो यह प्रकाश को रेटिना की ओर अंदर आने देने की अपनी क्षमता खो देता है और व्यक्ति की दृष्टि चली जाती है। ऐसे में, दृष्टि बहाल करने का एकमात्र तरीका होता है कॉर्निया का प्रत्यारोपण। 

सन 1905 में ऑस्ट्रियाई नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. ई. के. ज़िम (Dr. Eduard Zirm) ने पहला मानव कॉर्नियल प्रत्यारोपण (First Corneal Transplant) किया था। भारत में पहला प्रत्यारोपण सन 1948 में डॉ. मुथैया (Dr. Muthayya) ने चेन्नई के अपने नेत्र बैंक (Eye Bank) में किया था, और इंदौर के डॉ. आर. पी. धोंडा ने 1960 में पहला सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण किया था। तब से, कॉर्निया प्रत्यारोपण और भी परिष्कृत (Refined) हुए हैं और प्रत्यारोपण की सफलता दर (Success Rate) भी काफी बढ़ गई है। कॉर्निया के पारदर्शी ऊतक को छह परतों में बांटा जा सकता है और अब सर्जन पूरे कॉर्निया की बजाय कॉर्निया की केवल एक विशिष्ट उप-परत (Specific Sub-layer) का प्रत्यारोपण कर सकते हैं। इस सर्जरी में रिकवरी तेज़ (Faster Recovery) होती है और प्रत्यारोपण के बाद प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा अस्वीकृति (Immune Rejection) की संभावना कम होती है। 

ये सभी विशेषताएं कॉर्निया के प्रत्यारोपण को एक आसान विकल्प बनाती हैं। इसके बावजूद, भारत में तकरीबन दस लाख से अधिक लोग कॉर्नियल क्षति (Corneal Damage) के कारण अंधेपन का शिकार हैं। राष्ट्रीय दृष्टिहीनता और दृश्य हानि नियंत्रण कार्यक्रम (National Programme for Control of Blindness – NPCBVI) के अनुसार, 50 वर्ष से कम आयु के लोगों में अंधेपन का मुख्य कारण यही है। पिछले कई वर्षों से, भारत ने प्रति वर्ष एक लाख कॉर्निया प्रत्यारोपण (100,000 Corneal Transplants) करने का अनौपचारिक लक्ष्य रखा है। लेकिन हम इस लक्ष्य से बहुत पीछे हैं। कॉर्निया के ऊतक केवल व्यक्ति की मृत्यु के बाद (Post-mortem Donation) ही दान किए जा सकते हैं। भारत में दर्ज लाखों मौतों में से कुछ ही कॉर्नियल दान (Corneal Donations) के योग्य होते हैं। हालांकि, वर्तमान में हम सभी योग्य दाताओं से कॉर्निया हासिल नहीं कर पाते हैं, खासकर प्रक्रियागत देरी (Procedural Delays) और सहमति कानूनों (Consent Laws) के कारण। 

इस कमी को दूर करने के लिए सरकार मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 (Transplantation of Human Organs Act – THOA) में संशोधन पर विचार कर रही है, जो ‘मान ली गई या मानित सहमति’ (Presumed Consent) का रास्ता खोलता है। ‘मानित सहमति’ से आशय है ऐसा मान कर चलना कि सभी योग्य दाताओं की अंगदान के लिए सहमति है। हालांकि, मानित सहमति पर सख्ती या दबाव नहीं होना चाहिए, इसमें सामाजिक स्वीकृति (Social Acceptance) सुनिश्चित करने के लिए परिवार की औपचारिक अनुमति (Family Approval) भी शामिल होनी चाहिए – एक ‘स्वीकार्य’ विकल्प।  वक्त की मांग है उदार नेत्रदान (Generous Eye Donations), समर्पित प्राप्तकर्ता (Committed Recipients) की जो नियमित चेक-अप या देखभाल के लिए आता रहे, और एक ऐसी प्रणाली (Systematic Framework) की जो इन दोनों को सक्षम बनाए। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि सरकार के नारे ‘नेत्र दान’ और नेत्ररोग विशेषज्ञों के बोध वाक्य ‘पश्यन्तु सर्वे जन: (सभी के पास दृष्टि हो)’ के बीच तालमेल हो, जिसे परिवार की सहमति (Family Consent) से समर्थन मिले: ‘सम्मति परिवारस्य।’ (स्रोत फीचर्स)

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आपातकालीन गर्भनिरोधक की ‘ओव्हर दी काउंटर’ बिक्री पर रोक गलत – डॉ. क्रिस्टियनेज़ रत्ना किरुबा

कुछ दिनों पहले यह खबर आई थी कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली (emergency contraceptive pill) (यानी ‘अगली-सुबह-की-गोली’) की ओव्हर दी काउंटर (over the counter) उपलब्धता पर रोक लगाने पर विचार कर रहा है। ओव्हर दी काउंटर (OTC) का मतलब होता है कि वह औषधि डॉक्टरी पर्ची (prescription) के बगैर मिल जाती है। इस प्रतिबंध की सिफारिश संभवत: एक छ:-सदस्यीय विशेषज्ञ उप समिति द्वारा की जाएगी। इस समिति में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के एक प्रसव व स्त्री रोग विशेषज्ञ (gynecologist) तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research) और डीजीसीए के प्रतिनिधि होंगे।

ओव्हर दी काउंटर बिक्री पर प्रतिबंध (ban on OTC sale) लगाने का कारण यह बताया जा रहा है कि इस अगली-सुबह-की-गोली (morning after pill) का बेतुका व अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसकी वजह से महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बंधी दिक्कतें हो सकती हैं। यह कहा जा रहा है कि इस गोली के लिए डॉक्टरी पर्ची (prescription) ज़रूरी बनाने से महिलाओं की सेहत की सुरक्षा होगी और आपातकालीन गर्भनिरोधकों (emergency contraceptives) के अनावश्यक उपयोग से होने वाली परेशानियों से बचा जा सकेगा।

इस संदर्भ के मद्देनज़र इस बात पर चर्चा की ज़रूरत है कि भारत में आपातकालीन गोली (emergency pill) की ओव्हर दी काउंटर उपलब्धता (over the counter availability) की सुरक्षा को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण (scientific evidence) क्या कहते हैं। क्या इस तरह के प्रतिबंध (restriction) के लिए कोई वैज्ञानिक औचित्य है? साथ ही, इस बात पर भी विचार करना होगा कि इस तरह बिक्री पर प्रतिबंध की वजह से किस तरह की समस्याएं पैदा होंगी।

आपातकालीन गोली सुरक्षित है (Emergency Contraceptive Pill is Safe) 

कई रासायनिक नुस्खों का उपयोग अगली-सुबह-की-गोली (morning after pill) के रूप में किया जा सकता है। जैसे मिफेप्रिस्टोन (Mifepristone), लेवोनॉरजेस्ट्रेल (Levonorgestrel) और उलीप्रिस्टाल (Ulipristal)। लेकिन भारत में ओव्हर दी काउंटर बिक्री (OTC sale) के लिए इनमें से एक को ही मंज़ूरी मिली है – लेवोनॉरजेस्ट्रेल (Levonorgestrel)। यह मशहूर ब्रांड नामों आईपिल (I-Pill) या अनवांटेड 72 (Unwanted 72) के नाम से बिकती है। इस गोली में 1.5 मि.ग्रा. लेवोनॉरजेस्ट्रेल होता है और यदि इसे संभोग के 72 घंटे के अंदर ले लिया जाए तो यह 89 प्रतिशत गर्भावस्था से बचाव करती है।

लेवोनॉरजेस्ट्रेल (Levonorgestrel) के साइड इफेक्ट्स में मितली (nausea), उल्टी (vomiting) के अलावा कुछ हल्का-सा खून आना हो सकता है। इस दवा का अर्ध-जीवन काल 20-60 घंटे है। इसका मतलब है कि इसे 5 दिन से 2 सप्ताह के बीच शरीर से पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। फिलहाल इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि इस गोली का बार-बार सेवन करने से यह शरीर में जमा होती रहती है या इसके साइड इफेक्ट (side effects) बढ़ जाते हैं।

आपातकालीन गोली का सबसे बुरा ज्ञात असर एनाफायलेक्सिस (गंभीर एलर्जिक प्रतिक्रिया) है। यह तब होता है जब आपको किसी चीज़ से एलर्जी हो और आप उसका उपभोग कर लें। लेकिन यह सिर्फ उन लोगों के मामले में प्रासंगिक होगा जिन्हें आपातकालीन गर्भनिरोधक (emergency contraception) गोली से एलर्जी का इतिहास रहा है। देखा जाए तो यह खतरा तो दुनिया की लगभग किसी भी दवाई के साथ हो सकता है। 

आज तक मात्र एक रिपोर्ट है कि किसी व्यक्ति को आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली की वजह से आंख में खून का थक्का जम गया था, एक रिपोर्ट मस्तिष्क में खून के थक्के की है और एक रिपोर्ट ब्रेन स्ट्रोक की है। लेकिन मात्र प्रोजेस्टरॉन आधारित आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली और खून के थक्कों के बीच सम्बंध की बात को मात्र इन तीन प्रकरणों के दम पर स्थापित नहीं किया जा सकता। और तो और, इस बात के काफी प्रमाण हैं कि मात्र प्रोजेस्टरॉन वाली आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियों से खून का थक्का नहीं बनता है। लेवोनॉरजेस्ट्रेल (Levonorgestrel) दरअसल प्रोजेस्टरॉन का संश्लेषित रूप है। 

एक अन्य संभावित साइड इफेक्ट है माहवारी में अनियमितता, जो चिंता का सबब हो सकता है। हालांकि, यह साइड इफेक्ट काफी आम है (15 प्रतिशत) लेकिन यह अगले मासिक चक्र तक बगैर किसी उपचार के ठीक भी हो जाता है। 

लेवोनॉरजेस्ट्रेल (Levonorgestrel) के उपयोग का एकमात्र पक्का निषेध लक्षण है पक्की गर्भावस्था। लेकिन जिन महिलाओं ने यह गोली ली और बाद में पता चला कि वे पहले से गर्भवती थीं, उनके मामले में भी गोली ने न तो मां के लिए और न ही शिशु के लिए गर्भावस्था के दौरान कोई दिक्कत पैदा की। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने इसे सबसे सुरक्षित गर्भनिरोधकों में शामिल किया है और स्तनपान कराती महिलाओं के लिए भी मंज़ूरी दी है। 

हालांकि इसे मात्र आपातकालीन उपयोग के लिए मंज़ूरी दी गई है, लेकिन हो सकता है कि कुछ लोग अगली-सुबह-की-गोली (morning-after pill) का उपयोग नियमित गर्भनिरोधक के रूप में करते हों। तमिलनाडु सरकार द्वारा ड्रग कंसल्टेटिव कमिटी (Drug Consultative Committee) की सन 2023 की 62वीं बैठक में इसकी ओव्हर दी काउंटर बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का जो सुझाव दिया गया था, उसके पीछे यही चिंता लगती है।

डीएमके के मीडिया शाखा के प्रांतीय उपसचिव डॉ. एस.ए.एस. हफीज़ुल्ला ने अपने ट्वीट में कहा था, “आपातकालीन गर्भनिरोधक (emergency contraception) गोली के गैर-तार्किक उपयोग से स्वास्थ्य सम्बंधी प्रतिकूल असर होते हैं और लगातार उपयोग की वजह से जानलेवा बीमारियों का जोखिम हो सकता है। ये गोलियां कुछ बीमारियों में पूर्णत: निषिद्ध हैं।” वैसे उनकी इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। 

गर्भनिरोध (contraception) की पात्रता के सम्बंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) की फैक्ट शीट और दिशानिर्देशों में बताया गया है कि कौन-सी महिलाएं किसी खास किस्म के गर्भनिरोध के उपयोग के कारण दुष्प्रभाव के जोखिम में हो सकती हैं। इनको देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि लेवोनॉरजेस्ट्रेल (levonorgestrel) का बारंबार उपयोग सभी महिलाओं के लिए सुरक्षित है, हालांकि आदर्श नहीं है। आदर्श स्थिति तो वह होगी जहां आपातकालीन गोली का उपयोग किसी नियमित अवरोधक विधि (कंडोम वगैरह), या नियमित गर्भनिरोधक गोली या आई.यू.डी. (IUD – intrauterine device) या नसबंदी के साथ-साथ किया जाए।

गलतफहमियां 

आपातकालीन गोली के सुरक्षित होने की बात करते हुए यह ध्यान देना ज़रूरी है कि कई अध्ययनों से पता चला है कि इसके बारे में गलत जानकारी खूब फैली है। यहां तक कि, डॉक्टरों की भी यही स्थिति है। 

उत्तर प्रदेश में किए गए एक अध्ययन में पता चला था कि 96 प्रतिशत डॉक्टरों को इस बारे में सही जानकारी नहीं थी कि आपातकालीन गोली काम कैसे करती है। पॉपुलेशन कौंसिल इंस्टीट्यूट (Population Council Institute) द्वारा स्त्री रोग विशेषज्ञों के एक अन्य अध्ययन का निष्कर्ष था कि 96 प्रतिशत विशेषज्ञों में भी इस गोली की क्रियाविधि की सही-सही जानकारी नहीं थी। इन विशेषज्ञों मानना था कि यह गोली भ्रूण को गर्भाशय में ठहरने से रोकती है जबकि इस बात के पर्याप्त वैश्विक प्रमाण हैं कि यह गोली अंडोत्सर्ग (ovulation) की क्रिया को ही रोक देती है।  

यह आम गलतफहमी है कि आपातकालीन गर्भनिरोधक (emergency contraceptive) गर्भाशय में भ्रूण के ठहरने को रोकती है और इस गलतफहमी की वजह से यह गलत धारणा बनी है कि यह गोली अस्थानिक (ectopic pregnancy) गर्भावस्था का कारण बन जाती है। कई डॉक्टर तो यह गलत जानकारी मीडिया प्लोटफॉर्म्स (media platforms) पर भी फैलाते रहते हैं। एक शोध पत्र में 136 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया था और इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला था कि आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली अस्थानिक गर्भधारण का कारण बनती है। और तो और, यह कहने का कोई जीव वैज्ञानिक आधार भी नहीं है कि लेवोनॉरजेस्ट्रेल-आधारित गर्भनिरोधक अस्थानिक गर्भ का कारण बन सकता है। 

सही जानकारी तक पहुंच के अभाव के चलते कई डॉक्टरों की यह धारणा बन गई है कि अगली-सुबह-की-गोली (morning-after pill) जानलेवा खून के थक्के (blood clots) पैदा कर सकती है। अलबत्ता, मात्र वही गोलियां ऐसे खून के थक्के पैदा कर सकती हैं जिनमें एस्ट्रोजेन (estrogen) हॉर्मोन होता है। एस्ट्रोजेन कई सारी मिश्रित गर्भनिरोधक गोलियों में पाया जाता है जिनकी रोज़ाना सेवन की सलाह दी जाती है। लेवोनॉरजेस्ट्रेल, जो प्रोजेस्टरॉन नामक हॉर्मोन का संश्लेषित रूप है जिसमें खून के थक्के बनने की कोई संभावना नहीं है। 

उत्तर प्रदेश के अध्ययन में यह भी पता चला था कि लगभग 25 प्रतिशत डॉक्टरों में यह गलत धारणा व्याप्त है कि इस गोली के बारंबार उपयोग से स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम हो सकते हैं और बांझपन (infertility) तक पैदा हो सकता है। एक अन्य अध्ययन से पता चला था कि दो-तिहाई स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को लगता है कि स्तनपान (breastfeeding) के दौरान आपातकालीन गोलियों का सेवन असुरक्षित है। यह धारणा भी गलत है। 

स्वास्थ्य कर्मियों के बीच भी गलतफहमियों के इस अंबार के मद्देनज़र यदि इन गोलियों के लिए डॉक्टरी पर्ची अनिवार्य कर दी गई, तो उन लोगों के लिए भी गर्भनिरोधकों तक पहुंच असंभव हो जाएगी, जिन्हें सचमुच उनकी ज़रूरत है।

उपयोगकर्ताओं के प्रति पूर्वाग्रह 

जब डॉक्टरों के बीच यह धारणा व्याप्त है कि आपातकालीन गोली भ्रूण को ठहरने से रोकती है, तो उनमें इसके उपयोग के खिलाफ यह पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है कि यह गोली शायद गर्भपात (abortion) भी करवा सकती है। तो कुछ प्रो-लाइफ डॉक्टर इसके विरुद्ध नैतिक मुद्दा भी उठा सकते हैं। उत्तर प्रदेश के अध्ययन में पता चला था कि कुछ डॉक्टर इस गोली को गर्भपात-कारी मानते हैं। लेकिन जैसा कि पहले कहा गया था, इस गोली की क्रिया अंडोत्सर्ग को रोकने की है, अर्थात लेवोनॉरजेस्ट्रेल आधारित गोली गर्भपात नहीं करवा सकती। 

उत्तर भारत में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि आधे से ज़्यादा डॉक्टर (53 प्रतिशत) यह भी मानते हैं कि आपातकालीन गोली चाहने वाले लोगों की विवाह-पूर्व यौन सम्बंधों (premarital sex) में लिप्त होने की ज़्यादा संभावना है और तीन-चौथाई का विश्वास था कि आपातकालीन गोली के उपयोग से यौन स्वच्छंदता (sexual freedom) को बढ़ावा मिलेगा। एक अन्य अध्ययन में पता चला था कि लगभग आधे डॉक्टर मानते हैं कि आपातकालीन गोली चाहने वाले लोग यौन सम्बंधों को लेकर स्वच्छंद होते हैं। 

दी न्यूज़ मिनट (The News Minute) में एक खोजी पत्रकारिता रिपोर्ट में बताया गया था कि दो गुप्त रिपोर्टर्स चेन्नै के एक सरकारी अस्पताल से आपातकालीन गर्भनिरोधक के लिए पर्ची हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी इस कोशिश में उन्हें अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा और नर्सों व डॉक्टरों की नैतिक निगरानी से गुज़रना पड़ा, तब जाकर उन्हें गोली दी गई। यदि ओव्हर दी काउंटर (over the counter) उपलब्धता प्रतिबंधित हुई तो यह नज़ारा सामान्य होने में देर नहीं लगेगी। 

वैश्विक नज़रिया 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली की ओव्हर दी काउंटर उपलब्धता की ज़ोरदार सिफारिश करता है। इसके अलावा, 112 देश ओव्हर दी काउंटर बिक्री (OTC sale) की अनुमति देते हैं और अर्जेंटाइना व जापान भी 2023 में इन देशों में शामिल हो गए हैं। ज़ाहिर है, वैश्विक रुझान ओव्हर दी काउंटर बिक्री के पक्ष में है। 

लेवोनॉरजेस्ट्रेल आधारित आपातकालीन गर्भनिरोधक यूएस के खाद्य व औषधि प्रशासन (FDA) की उस कसौटी पर भी खरी उतरती है जिन्हें ओव्हर दी काउंटर बिक्री की अनुमति दी जा सकती है। प्रशासन ने इसे 2013 में ओव्हर दी काउंटर बिक्री की अनुमति दे दी थी। 

प्रतिबंध के नकारात्मक असर 

भारत में असुरक्षित गर्भपातों (unsafe abortions) की संख्या काफी अधिक है। 2019 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक 2007 से 2011 के दरम्यान भारत में कुल गर्भपातों में से दो-तिहाई खतरनाक हालात में हुए थे और इनकी वजह से देश में प्रतिदिन औसतन 8 मौतें हुई थीं। अध्ययन में यह भी बताया गया था कि हाशिए की महिलाएं (marginalized women) ज़्यादा प्रभावित होती हैं। दी लैंसेट ग्लोबल हेल्थ रिपोर्ट (The Lancet Global Health Report) के मुताबिक भारत में 2015 में 8 लाख असुरक्षित गर्भपात हुए थे। 

जो लोग गर्भपात सुविधा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं उन्हें कलंकित (stigma) होने और अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे हालात में आपातकालीन गर्भनिरोधक तक पहुंच से अनचाहे गर्भ (unwanted pregnancies) से बचा जा सकेगा और ऐसे गर्भ की वजह से किए जाने वाले असुरक्षित गर्भपातों से बचा जा सकेगा, जो कई बार महिला के लिए जानलेवा साबित होते हैं। 

लिहाज़ा, ओव्हर दी काउंटर आपातकालीन गर्भनिरोधकों पर प्रतिबंध अनचाहे गर्भ और असुरक्षित गर्भपातों में वृद्धि करके भारत में मातृत्व मृत्यु (maternal mortality) की स्थिति को बदतर कर सकता है। प्रतिबंध लगने पर शायद आपातकालीन गर्भनिरोधकों का ब्लैक मार्केट (black market) पनपे। इसके चलते अमानक और नकली दवाइयों के बाज़ार को बढ़ावा मिलेगा। 

इसके अलावा, देहरादून में किए गए एक एथ्नोग्राफिक अध्ययन में उजागर हुआ था कि ओव्हर दी काउंटर पहुंच विभिन्न सामाजिक-आर्थिक तबकों की महिलाओं को अपनी स्वायत्तता और निजता (privacy and autonomy) को सुरक्षित रखते हुए गर्भनिरोध हासिल करने में मददगार होती है। खास तौर से भारत में, जहां कंडोम का उपयोग बहुत कम (मात्र 9.5 प्रतिशत) है, वहां कई महिलाओं (जिनमें विवाहित महिलाएं भी शामिल हैं) के लिए अपने साथी को कंडोम (condom) का उपयोग करने के लिए राज़ी करना मुश्किल होता है। ऐसे में आपातकालीन गोली उन्हें अपनी सुरक्षा का एक विकल्प उपलब्ध कराती हैं जिसमें शर्मिंदगी और अपमान न हो और असुरक्षित गर्भपात का खतरा न हो। 

ज़रा अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का (Lipstick Under My Burkha) का वह दृश्य याद कीजिए जिसमें कोंकणा सेन शर्मा (Konkona Sen Sharma) द्वारा अभिनीत पात्र बार-बार एक स्थानीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाता (healthcare provider) के पास गर्भपात (abortion) के लिए जाती है। कारण यह बताती है कि उसका पति कंडोम (condom) का उपयोग नहीं करता। दुनिया के सबसे सुरक्षित गर्भनिरोधकों (contraceptives) में शुमार लेवोनॉरजेस्ट्रेल आधारित गोली (Levonorgestrel pill) यकीनन एक बेहतर विकल्प लगती है।   

अटकलों के आधार पर नीतियां न बनें 

भारत वह देश है जहां तंबाकू (tobacco), अल्कोहल (alcohol), और यहां तक कि कीटनाशक (pesticides) जैसे जानलेवा पदार्थ आसानी से मिल जाते हैं जो 66 देशों में प्रतिबंधित हैं। दूसरी ओर, एक ऐसी अत्यंत सुरक्षित दवा के दुरुपयोग (misuse of drugs) को लेकर अटकलें (speculations) लगाई जा रही हैं जो यौन व प्रजनन स्वास्थ्य (sexual and reproductive health) में उपयोगी है और ऐसी अटकलों के आधार पर इसकी ओव्हर दी काउंटर बिक्री (over-the-counter sale) पर रोक लगाने की योजना बनाई जा रही है। 

इतना तो स्पष्ट है कि प्रतिबंध (ban) की इस सिफारिश के समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण (scientific evidence) नहीं है। इसके अलावा, जो चिकित्सक (doctors) इस दवा की पर्ची लिखने के लिए ज़िम्मेदार होंगे, उनके पास इन दवाइयों (medications) के बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं हैं और उनकी धारणा है कि ये कई साइड इफेक्ट (side effects) उत्पन्न करती हैं। यह भी संभव है कि उन्हें समुचित जेंडर संवेदनशीलता प्रशिक्षण (gender sensitivity training) भी न मिला हो कि वे अपने पूर्वाग्रहों (bias) से ऊपर उठ सकें। 

अभी तो यही लगता है कि नीतिगत परिवर्तन (policy change) के बारे में वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर नहीं बल्कि अटकलों के आधार पर विचार किया जा रहा है। वैसे तो काफी प्रमाण (evidence) उपलब्ध हैं लेकिन यदि इनके बावजूद कुछ शंकाएं (doubts) हैं तो जनसंख्या आधारित अध्ययन (population-based studies) किए जाने चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि क्या देश में आपातकालीन गोलियों (emergency contraceptive pills) का दुरुपयोग काफी अधिक हो रहा है, और साइड इफेक्ट (side effects) कितने आम हैं। 

दरअसल, उपलब्धता व पहुंच (availability and access) पर रोक लगाने की बजाय बेहतर यह होगा कि आम लोगों व स्वास्थ्य पेशेवरों (healthcare professionals) दोनों को आपातकालीन गर्भनिरोधकों (emergency contraceptives) के सही व सुरक्षित उपयोग (safe use) के बारे में जागरूक किया जाए ताकि महिलाएं (women) अपने प्रजनन स्वास्थ्य (reproductive health) के बारे में निर्णय सोच-समझकर ले सकें। 

डॉ. एस.ए.एस. हफीज़ुल्ला ने एक ट्वीट (tweet) में स्वयं को महिलाओं के पक्षधर (women’s advocate) के रूप में पेश किया है। वे कहते हैं कि आपातकालीन गर्भनिरोधकों (emergency contraceptives) पर प्रतिबंध (ban) लगना चाहिए ‘क्योंकि गर्भनिरोध की ज़िम्मेदारी (responsibility of contraception) मात्र महिला पर क्यों रहे?’ लेकिन यदि देश के लगभग 90 पुरुष (men) आगे आकर सुरक्षित बैरीयर विधियों (barrier methods) (जैसे कंडोम (condoms)) का उपयोग करना या नसबंदी (sterilization) करवाना नहीं चाहते तो क्या यह महिलाओं के हक में होगा कि उन्हें अपनी सुरक्षा (safety) के विकल्पों (options) से वंचित किया जाए? (स्रोत फीचर्स) 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://nivarana.org/article/Why-Over-The-Counter-Emergency-Contraceptives-Must-Stay-6704ef82e9e36