कोविड-19 टीकों के शुरुआती क्लीनिकल परीक्षणों के सकारात्मक
परिणामों के बाद से ही इनके ‘आपातकालीन उपयोग’ की स्वीकृति की मांग होने लगी है।
इस तरह की मांग ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों की प्रमुख चिंता
यह है कि इस तरह के उपयोग से चलते हुए क्लीनिकल परीक्षण खटाई में पड़ जाएंगे। दवा
कंपनी नोवर्टिस के वैक्सीन डिज़ाइन के पूर्व प्रमुख क्लाउस स्टोहर इसे टीका विकास
के लिए असमंजस के रूप में तो देखते हैं लेकिन आपातकालीन उपयोग के पक्ष में भी हैं
क्योंकि शुरुआती चरणों में प्रभावशीलता स्थापित हो गई है।
इस संदर्भ में गौरतलब है कि विश्व
स्वास्थ्य संगठन ने नवंबर माह में ही पोलियो टीकाकरण के लिए एक नए टीके को कुछ
देशो में आपातकालीन उपयोग की मंज़ूरी दे दी है। जबकि इस टीके के तो तीसरे चरण के
परीक्षण अभी शुरू भी नहीं हुए हैं।
इसी दौरान टीका निर्माता फाइज़र और
बायोएनटेक ने तीसरे चरण के परीक्षणों के बाद इस तरह की विनियामक अनुमति की मांग की
है। देखा जाए तो कोविड-19 के लिए यूएस एफडीए के नियमों के अनुसार आपातकालीन उपयोग
में आधे प्रतिभागियों पर डोज़ देने के दो माह बाद तक निगरानी रखी जानी चाहिए।
फिलहाल फाइज़र और बायोएनटेक इस लक्ष्य को पार कर चुके हैं।
लेकिन इससे जुड़ी कुछ नैतिक समस्याएं भी
हैं। परीक्षण के दौरान आम तौर पर प्रतिभागियों को ‘अंधकार’ में रखा जाता है कि
उनको टीका दिया गया है या प्लेसिबो। लेकिन एक बार जब टीका काम करने लगता है तो
प्लेसिबो समूह के प्रतिभागियों को टीका न देकर असुरक्षित रखना अनैतिक लगता है।
स्टोहर के अनुसार यदि इन परीक्षणों में बड़ी संख्या में प्रतिभागी पाला बदलकर
‘प्लेसिबो समूह’ से ‘टीका समूह’ में चले
जाएंगे तो क्लीनिकल परीक्षण से सही आंकड़े प्राप्त करना मुश्किल हो जाएगा और टीके
के दीर्घकालिक प्रभावों की बात धरी की धरी रह जाएगी। अर्थात जल्दबाज़ी से टीके की
प्रभाविता का पर्याप्त डैटा नहीं मिल पाएगा। इससे यह पता लगाना भी मुश्किल होगा कि
टीका कितने समय तक प्रभावी रहेगा और क्या इससे संक्रमण को रोका जा सकता है या फिर
यह सिर्फ लक्षणों में राहत देगा। फिर भी फाइज़र के प्रवक्ता के अनुसार कंपनी एफडीए
के साथ प्रतिभागियों के क्रॉसओवर और प्रभाविता को मापने के लिए डैटा एकत्र करने की
प्रकिया पर चर्चा करेगी।
कुछ वैज्ञानिकों का सुझाव है कि ऐसे
प्रतिभागी जिनको शुरुआत में प्लेसिबो प्राप्त हुआ है और बाद में टीका लगवाते हैं, उनका
निरीक्षण एक अलग समूह के रूप में किया जा सकता है। इस तरह से ऐसे समूहों के बीच
टीके की दीर्घकालिक प्रभाविता और सुरक्षा की तुलना भी की जा सकेगी।
फिर भी, एक बार कोविड-19 टीके को आपातकालीन स्वीकृति मिलने से टीके का परीक्षण और अधिक जटिल हो जाएगा। ऐसे में नए परीक्षण शुरू करने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके टीके आपातकालीन स्वीकृति प्राप्त टीकों से बेहतर हैं। इसके लिए उनकी परीक्षण की प्रक्रिया और अधिक महंगी हो जाएगी। कुल मिलाकर बात यह है कि किसी भी टीके को मंज़ूरी मिलना, भले ही आपातकालीन उपयोग के लिए हो, टीकों के बाज़ार में आने के परिदृश्य को बदल देगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://etimg.etb2bimg.com/photo/79052191.cms
कोविड-19 से ग्रस्त लगभग 80 प्रतिशत लोगों में गंध संवेदना के
ह्रास की बात सामने आई है। समस्या इतनी आम है कि एक सुझाव है कि इसे एक नैदानिक
परीक्षण के रूप में उपयोग किया जाए। इस महामारी की शुरुआत में सोचा गया था गंध
संवेदना की क्षति का मतलब है कि वायरस नाक के माध्यम से मस्तिष्क में पहुंचकर
गंभीर व दीर्घावधि क्षति पहुंचा सकता है। यह सोचा गया कि वायरस शायद गंध-संवेदी
तंत्रिकाओं के ज़रिए मस्तिष्क तक पहुंचता होगा। लेकिन हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के
न्यूरोसाइंटिस्ट संदीप रॉबर्ट दत्ता के हालिया अध्ययन से पता चला है कि गंध की
क्षति का कारण नाक की उपकला की क्षति से है। यह कोशिकाओं की एक ऐसी परत होती है जो
गंध को दर्ज करती है। दत्ता को लगता है कि वायरस सीधे-सीधे न्यूरॉन्स को नहीं
बल्कि सपोर्ट कोशिकाओं और स्टेम कोशिकाओं पर हमला करता
है।
गंध संवेदी (घ्राण) तंत्रिकाओं में ACE2 ग्राही नहीं होते हैं। ACE2 ग्राही ही वायरस का कोशिकाओं में प्रवेश
संभव बनाते हैं। लेकिन इन घ्राण तंत्रिकाओं से सम्बंधित सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं
में ये ग्राही बहुतायत में पाए जाते हैं। ये कोशिकाएं श्लेष्मा में आयन का नाज़ुक
संतुलन बनाए रखती हैं। तंत्रिकाएं मस्तिष्क को संदेश भेजने के लिए इसी संतुलन पर
निर्भर करती हैं। यह संतुलन गड़बड़ा जाए तो तंत्रिका संदेश ठप हो जाते हैं और साथ ही
गंध संवेदना भी।
मामले को समझने के लिए पेरिस सैकले
युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस मुनियर ने कुछ चूहों को सार्स-कोव-2 से
संक्रमित किया। दो दिन बाद लगभग आधे चूहों की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाएं संक्रमित
थीं लेकिन दो हफ्तों बाद भी घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई थीं। यह भी देखा
गया कि घ्राण उपकला पूरी तरह से अलग हो गई थी जैसे धूप से झुलसकर चमड़ी अलग हो जाती
है। हालांकि घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई लेकिन उनके रोम पूरी तरह से खत्म
हो गए थे। इस तरह से घ्राण उपकला के विघटन से गंध संवेदना की क्षति की व्याख्या तो
की जा सकती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह क्षति वायरस के कारण हुई है या इसके
लिए प्रतिरक्षा कोशिकाएं ज़िम्मेदार हैं। संक्रमण के बाद प्रतिरक्षा कोशिकाएं भी
सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में देखी गर्इं। एक बात साफ है कि सामान्यत: श्वसन
सम्बंधी संक्रमणों में घ्राण उपकला की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में संक्रमण नहीं
देखा गया है, यह सार्स-कोव-2 का विशेष लक्षण है।
अब तक यह समझ में नहीं आया है कि यह वायरस
स्वाद संवेदना को कैसे ध्वस्त करता है। स्वाद संवेदना कोशिकाओं में तो ACE2 ग्राही नहीं होते लेकिन जीभ की अन्य सहायक कोशिकाओं में ये ग्राही उपस्थित
होते हैं जो शायद स्वाद संवेदना के कम होने का कारण बनते हैं। यह भी हो सकता है कि
गंध संवेदना जाने के कारण स्वाद प्रभावित हो रहा हो क्योंकि स्वाद की अनुभूति काफी
हद तक गंध पर निर्भर करती है।
रासायनिक संवेदना की कमी, जैसे
तीखी मिर्च या ताज़े पुदीने की संवेदना, का गायब होना भी अभी तक अस्पष्ट है। दरअसल, ये
संवेदनाएं स्वाद नहीं हैं। इनके संदेश दर्द-संवेदना तंत्रिकाओं द्वारा भेजे जाते
हैं। इनमें से कुछ में ACE2 ग्राही भी होते हैं।
गंध अनुभूति की क्षति अलग-अलग मरीज़ों में अलग-अलग अवधियों के लिए देखी गई है। कुछ में तो छ: माह बाद भी गंध महसूस करने की क्षमता लौटी नहीं है। कई शोधकर्ता इसका इलाज खोजने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। (स्रोत फीचर्स)
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धूम्रपान
से होने वाले नुकसान तो आज जगज़ाहिर हैं। भले ही अब टीवी-अखबारों या अन्यत्र आपको कहीं धूम्रपान को
बढ़ावा देने वाले विज्ञापन देखने ना मिलें,
लेकिन एक समय था जब सिगरेट कंपनियों और तंबाकू उद्योग ने
सिगरेट का खूब प्रचार किया। विज्ञापनों में सिगरेट पीने वाले को खुशमिज़ाज, बहादुर और स्वस्थ व्यक्ति की तरह पेश किया
गया और धूम्रपान को बढ़ावा दिया गया। और अब,
इसी राह पर वैपिंग उद्योग चल रहा है। वैपिंग उद्योग की
रणनीति को समझने के लिए हमें तंबाकू उद्योग का इतिहास समझने की ज़रूरत है।
वैपिंग
या ई-सिगरेट
एक बैटरी-चालित
उपकरण है, जिसमें निकोटिन या
अन्य रसायनयुक्त तरल (ई-लिक्विड या ई-जूस) भरा जाता है। बैटरी
इस तरल को गर्म करती है जिससे एरोसोल बनता है। यह एरोसोल सिगरेट के धुएं की तरह
पीया जाता है। बाज़ार में ई-सिगरेट के कई स्वाद और विभिन्न तरल रसायनों के विकल्प
उपलब्ध हैं।
1950 के दशक में बड़े
तंबाकू उद्योग का काफी बोलबाला था। उस समय तंबाकू उद्योग ने सिगरेट को ना सिर्फ
मौज-मस्ती
के लिए पी जाने वाली वस्तु बनाकर पेश किया बल्कि इसे विज्ञान की वैधता देने की भी
कोशिश की। धीरे-धीरे
शोध में यह सामने आने लगा कि धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है। यह फेफड़ों के
कैंसर, ह्रदय सम्बंधी
तकलीफों व कई अन्य समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है।
लेकिन
तंबाकू उद्योग ने स्वास्थ्य सम्बंधी इन खतरों को नकारना शुरू कर दिया। तंबाकू
उद्योग ने इन अनुसंधानों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और कहा कि सिगरेट को
हानिकारक बताने वाले कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इससे भी एक कदम आगे जाकर तंबाकू
उद्योग ने अनुसंधानों के लिए पैसा देना शुरू कर दिया,
और ऐसे अनुसंधानो को बढ़ावा दिया जो धूम्रपान के हानिकारक
असर को लेकर अनिश्चितता बनाए रखते थे। शोध में यह भी दर्शाया गया कि धूम्रपान
स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता। उद्योग के इस रवैये से धूम्रपान के
नियमन में देरी हुई। नतीजा एक महामारी के रूप में हमारे सामने है।
और
अब ई-सिगरेट
विज्ञान के लिए चुनौती बना हुआ है। कई सालों से ई-सिगरेट को सिगरेट छोड़ने में मददगार और
सुरक्षित कहकर, सिगरेट के विकल्प की
तरह पेश किया जा रहा है। धीरे-धीरे वैपिंग उद्योग ई-सिगरेट को मज़े,
फैशन और स्टाइल का प्रतीक बनाता जा रहा है और इसके उपयोग को
बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका व कई अन्य देशों में सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से
वैपिंग किशोरों और यहां तक कि मिडिल स्कूल के बच्चों के बीच लोकप्रिय होती जा रही
है। वैपिंग उद्योग दो तरह से फैल रहा है: एक तो किशोर उम्र के बच्चे इसके आदी होते
जा रहे हैं, और दूसरा, जिन लोगों ने सिगरेट छोड़ दी थी वे अब ई-सिगरेट लेने लगे
हैं।
शोध
बताते हैं कि ई-सिगरेट
के स्वास्थ्य पर लगभग वैसे ही दुष्प्रभाव होते हैं जैसे सिगरेट के होते हैं।
अधिकतर ई-सिगरेट
में निकोटिन होता है जो ह्रदय सम्बंधी समस्याओं को तो जन्म देता ही है, साथ ही किशोरों के मस्तिष्क विकास को भी
प्रभावित करता है। इसके अलावा ई-सिगरेट के अन्य दुष्प्रभाव भी हैं। जैसे कुछ ब्रांड इसमें
फार्मेल्डिहाइड का उपयोग करते हैं जो एक कैंसरकारी रसायन है, यानी फेफड़ों के कैंसर की संभावना भी बनी
हुई है। वहीं एक शोध में पता चला है कि सिगरेट की लत छोड़ने से भी अधिक मुश्किल ई-सिगरेट की लत छोड़ना
है। और, हाल ही में हुए एक
शोध में संभावना जताई गई है कि ई-सिगरेट पीने वालों में फेफड़ों की क्षति के चलते कोविड-19 अधिक गंभीर रूप ले
सकता है।
लेकिन
वैपिंग उद्योग तंबाकू उद्योग के ही नक्श-ए-कदम पर चल रहा है। यह इन दुष्प्रभावों को
झुठलाने की कोशिश कर रहा है। इसी प्रयास में इसने अपना एक शोध संस्थान भी स्थापित
कर लिया है। वैपिंग उद्योग शोधकर्ताओं को अपने यहां शोध करने का आमंत्रण देकर अपने
उत्पाद को वैध साबित करना चाहते हैं। और ई-सिगरेट पीने वालों में आलम यह है कि वे
वैपिंग के दुष्प्रभाव बताने वाले शोधों के खिलाफ और वैपिंग के पक्ष में प्रदर्शन
करते हैं।
युनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना में हेल्थ बिहेवियर के एसोसिएट प्रोफेसर समीर सोनेजी कहते हैं कि चिंता का विषय यह है कि फायदे-नुकसान की इस बेमतलब बहस में ई-सिगरेट के नियमन में देरी हो रही है और इस देरी के आगे गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बहरहाल, भारत समेत कुछ देशों ने इसके उपयोग और व्यापार पर कुछ प्रतिबंध तो लगाया है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://selecthealth.org/-/media/selecthealth82/article/post/2019/07/man_vaping_blog_lg.ashx
कैंसर
की बढ़िया से बढ़िया दवाइयां भी कैंसर के गंभीर मरीज़ों को जीने की ज़्यादा मोहलत नहीं
दे पातीं। लेकिन कुछ अपवाद मरीज़ों के ट्यूमर इन्हीं दवाइयों से कम या खत्म हुए, और वे कई वर्षों तक तंदुरुस्त रहे हैं।
शोधकर्ता लंबे समय से इन अपवाद मरीज़ों को नज़रअंदाज़ करते आए थे। लेकिन अब इन मरीज़ों
पर व्यवस्थित अध्ययन करके जो जानकारी मिल रही है वह कैंसर उपचार को बेहतर बना सकती
है।
ऐसे
एक प्रयास में, अमेरिका के
राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के लुईस स्टॉड की अगुवाई में कैंसर के 111 अपवाद मरीज़ों के
ट्यूमर, और ट्यूमर के भीतर
और उसके आसपास की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के डीएनए का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं को
26 मरीज़ों
के ट्यूमर या प्रतिरक्षा कोशिकाओं में जीनोमिक परिवर्तन दिखे। इन परिवर्तनों से
पता लगाया जा सकता है कि क्यों जो औषधियां इन मरीज़ों पर कारगर रहीं वे अधिकतर
लोगों पर असरदार नहीं रहतीं।
अध्ययन
के लिए ऐसे 111 मरीज़ों
के ट्यूमर और प्रतिरक्षा कोशिकाओं के डीएनए का डैटा चुना गया जिनके ट्यूमर ऐसी दवा
के असर से कम या खत्म हो गए थे जिस दवा ने परीक्षण में 10 प्रतिशत से भी कम मरीज़ों पर असर किया था, या उन मरीज़ों को चुना गया जिनमें दवा का
असर सामान्य की तुलना में तीन गुना अधिक समय तक रहा।
शोधकर्ता
26 मरीज़ों
की उपचार के प्रति प्रतिक्रिया की व्याख्या कर पाए। उदाहरण के लिए मस्तिष्क कैंसर
से पीड़ित मरीज़, जो टेमोज़ोलोमाइड
नामक औषधि से उपचार के बाद 10 साल से अधिक जीवित रहा था,
उसके ट्यूमर में ऐसे जीनोमिक परिवर्तन दिखे जो ट्यूमर
कोशिकाओं के डीएनए की मरम्मत की दो कार्यप्रणालियों को बाधित करते हैं।
टेमोज़ोलोमाइड डीएनए को क्षतिग्रस्त करके कैंसर कोशिकाओं को मारती है।
कोलोन
कैंसर से पीड़ित मरीज़ में टेमोज़ोलोमाइड उपचार के 4 वर्ष बाद दो जीनोमिक परिवर्तन हुए जो डीएनए
मरम्मत के दो मार्ग अवरुद्ध करते हैं। उसी मरीज़ को दी गई एक अन्य दवा ने डीएनए
मरम्मत के तीसरे मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था। कैंसर सेल पत्रिका में
प्रकाशित इन परिणामों से लगता है कि डीएनए की मरम्मत करने वाले विभिन्न मार्गों को
अवरुद्ध करने वाली औषधियों के मिले-जुले उपयोग से उपचार को बेहतर किया जा सकता है।
इसके
अलावा, गुदा कैंसर और पित्त
वाहिनी के कैंसर से पीड़ित दो मरीज़ों के ट्यूमर के बीआरसीए जीन्स, जो स्तन कैंसर के लिए ज़िम्मेदार हैं, में उत्परिवर्तन दिखा। इस उत्परिवर्तन ने
भी कीमोथेरेपी में ट्यूमर को असुरक्षित कर दिया था। अन्य मामलों में, मरीज़ों को जब ट्यूमर कोशिकाओं की वृद्धि के
लिए ज़िम्मेदार प्रोटीन को बाधित करने वाली औषधि दी गई तो दवा इन मरीज़ों पर कारगर
रही। कुछ मामलों में कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाएं मरीज़ों के ट्यूमर में प्रवेश कर
गर्इं थी। इससे लगता है कि इन मरीज़ों की प्रतिरक्षा कोशिकाएं तैयार बैठी थीं कि
दवा ट्यूमर में प्रवेश करे और पीछे-पीछे वे भी घुस जाएं।
नतीजों का तकाज़ा है कि सामान्यत: कैंसर ट्यूमर का जीनोमिक परीक्षण किया जाना चाहिए ताकि उपचार के लिए उपयुक्त औषधि का चयन किया जा सके। वैसे अभी भी कई परिणामों की व्याख्या करना मुश्किल है, क्योंकि कई मामलों में ट्यूमर में उत्परिवर्तन और प्रतिरक्षा कोशिका में परिवर्तन के विभिन्न सम्मिश्रण दिखे हैं। टीम ने अपने सारे आंकड़े ऑनलाइन कर दिए हैं ताकि अन्य अनुसंधान समूह इस काम को आगे बढ़ा पाएं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/braincancer_1280_0.jpg?itok=0UHKsJDd
कोई भी घातक महामारी हमेशा टिकी नहीं रहती। उदाहरण के लिए 1918 में फैले
इन्फ्लूएंज़ा ने तब दुनिया के लाखों लोगों की जान ले ली थी लेकिन अब इसका वायरस
बहुत कम घातक हो गया है। अब यह साधारण मौसमी फ्लू का कारण बनता है। अतीत की कुछ
महामारियां लंबे समय भी चली थीं। जैसे 1346 में फैला ब्यूबोनिक प्लेग (ब्लैक डेथ)।
इसने युरोप और एशिया के कुछ हिस्सों के लगभग एक तिहाई लोगों की जान ली थी। प्लेग
के बैक्टीरिया की घातकता में कमी नहीं आई थी। सात साल बाद इस महामारी का अंत
संभवत: इसलिए हुआ था क्योंकि बहुत से लोग मर गए थे या उनमें इसके खिलाफ प्रतिरक्षा
विकसित हो गई थी। इन्फ्लूएंज़ा की तरह 2009 में फैले H1N1 का रोगजनक सूक्ष्मजीव भी कम घातक हो गया था। तो क्या
सार्स-कोव-2 वायरस भी इसी रास्ते चलेगा?
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि अब यह वायरस
इस तरह से विकसित हो चुका है कि यह लोगों में आसानी से फैल सके। हालांकि यह कहना
अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन मुमकिन है कि यह कम घातक होता जाएगा। शायद अतीत में
झांकने पर इसके बारे में कुछ कहा जा सके।
यह विचार काफी पुराना है कि समय के साथ
धीरे-धीरे संक्रमण फैलाने वाले रोगजनक कम घातक हो जाते हैं। 19वीं सदी के चिकित्सक
थियोबाल्ड स्मिथ ने पहली बार बताया था कि परजीवी और मेज़बान के बीच ‘नाज़ुक संतुलन’
होता है; समय के साथ रोगजनकों की घातकता में कमी आनी चाहिए क्योंकि
अपने मेज़बान को मारना किसी भी सूक्ष्मजीव के लिए हितकर नहीं होगा।
1980 के दशक में शोधकर्ताओं ने इस विचार को
चुनौती दी। गणितीय जीव विज्ञानी रॉय एंडरसन और रॉबर्ट मे ने बताया कि रोगाणु अन्य
लोगों में तब सबसे अच्छे से फैलते हैं जब उनका मेज़बान बहुत सारे रोगाणु बिखराता या
छोड़ता है। यह स्थिति अधिकतर तब बनती है जब मेज़बान अच्छे से बीमार पड़ जाए। इसलिए
रोगजनक की घातकता और फैलने की क्षमता एक संतुलन में रहती है। यदि रोगजनक इतना घातक
हो जाए कि वह बहुत जल्द अपने मेज़बान की जान ले ले तो आगे फैल नहीं पाएगा। इसे
‘प्रसार-घातकता संतुलन’ कहते हैं।
दूसरा सिद्धांत विकासवादी महामारी विशेषज्ञ
पॉल इवाल्ड द्वारा दिया गया था जिसे ‘घातकता का सिद्धांत’ कहते हैं। इसके अनुसार, कोई
रोगजनक जितना अधिक घातक होगा उसके फैलने की संभावना उतनी ही कम होगी। क्योंकि यदि
व्यक्ति संक्रमित होकर जल्द ही बिस्तर पकड़ लेगा (जैसे इबोला में होता है) तो अन्य
लोगों में संक्रमण आसानी से नहीं फैल सकेगा। इस हिसाब से किसी भी रोगजनक को फैलने
के लिए चलता-फिरता मेज़बान चाहिए, यानी रोजगनक कम घातक होते जाना चाहिए।
लेकिन सिद्धांत यह भी कहता है कि प्रत्येक रोगाणु के फैलने की अपनी रणनीति होती है, कुछ
रोगाणु उच्च घातकता और उच्च प्रसार क्षमता,
दोनों बनाए रख सकते
हैं।
इनमें से एक रणनीति है टिकाऊपन। जैसे चेचक
का वायरस शरीर से बाहर बहुत लंबे समय तक टिका रह सकता है। ऐसे टिकाऊ रोगाणु को
इवाल्ड ‘बैठकर प्रतीक्षा करो’ रोगजनक कहते हैं। कुछ घातक संक्रमण अत्यंत गंभीर
मरीज़ों से पिस्सू, जूं, मच्छर सरीखे वाहक जंतुओं के माध्यम से
फैलते हैं। हैज़ा जैसे कुछ संक्रमण पानी से फैलते हैं। और कुछ संक्रमण बीमार या
मरणासन्न लोगों की देखभाल से फैलते हैं, जैसे स्टेफिलोकोकस बैक्टीरिया संक्रमण।
इवाल्ड के अनुसार ये सभी रणनीतियां रोगाणु को कम घातक होने से रोक सकती हैं।
लेकिन सवाल है कि क्या यह कोरोनावायरस कभी
कम घातक होगा? साल 2002-03 में फैले सार्स को देखें। यह संक्रमण एक से
दूसरे व्यक्ति में तभी फैलता है जब रोगी में संक्रमण गंभीर रूप धारण कर चुका हो।
इससे फायदा यह होता था कि संक्रमित रोगी की पहचान कर उसे अलग-थलग करके वायरस के
प्रसार को थामा जा सकता था। लेकिन सार्स-कोव-2 संक्रमण की शुरुआती अवस्था से ही
अन्य लोगों में फैलने लगता है। इसलिए यहां वायरस के फैलने की क्षमता और उसकी
घातकता के बीच सम्बंध ज़रूरी नहीं है। लक्षण-विहीन संक्रमित व्यक्ति भी काफी वायरस
बिखराते रहते हैं। इसलिए ज़रूरी नहीं कि मात्र गंभीर बीमार हो चुके व्यक्ति के
संपर्क में आने पर ही जोखिम हो।
इसलिए सार्स-कोव-2 वायरस में प्रसार-घातकता
संतुलन मॉडल शायद न दिखे। लेकिन इवाल्ड इसके टिकाऊपन को देखते हैं। सार्स-कोव-2
वायरस के संक्रामक कण विभिन्न सतहों पर कुछ घंटों और दिनों तक टिके रह सकते हैं।
यानी यह इन्फ्लूएंज़ा वायरस के बराबर ही टिकाऊ है। अत:,
उनका तर्क है कि
सार्स-कोव-2 मौसमी इन्फ्लूएंज़ा के समान घातकता विकसित करेगा, जिसकी
मृत्यु दर 0.1 प्रतिशत है।
लेकिन अब भी निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा
सकता कि सार्स-कोव-2 किस ओर जाएगा। वैज्ञानिकों ने वायरस के वैकासिक परिवर्तनों का
अवलोकन किया है जो दर्शाते हैं कि सार्स-कोव-2 का प्रसार बढ़ा है, लेकिन
घातकता के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। लॉस एलामोस नेशनल
लेबोरेटरी की कंप्यूटेशनल जीव विज्ञानी बेट्टे कोरबर द्वारा जुलाई माह की सेल
पत्रिका में प्रकाशित पेपर बताता है कि अब वुहान में मिले मूल वायरस की जगह उसका D614G उत्परिवर्तित
संस्करण ले रहा है। संवर्धित कोशिकाओं पर किए गए अध्ययन के आधार पर कोरबर का कहना
है कि उत्परिवर्तित वायरस में मूल वायरस की अपेक्षा फैलने की क्षमता अधिक है।
बहरहाल, कई शोधकर्ताओं का कहना है कि ज़रूरी नहीं कि संवर्धित कोशिकाओं
पर किए गए प्रयोगों के परिणाम वास्तविक परिस्थिति में लागू हों।
कई लोगों का कहना है कि सार्स-कोव-2 वायरस
कम घातक हो रहा है। लेकिन अब तक इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं। सामाजिक दूरी, परीक्षण, और
उपचार बेहतर होने के कारण प्रमाण मिलना मुश्किल भी है। क्योंकि अब सार्स-कोव-2 का
परीक्षण सुलभ होने से मरीज़ों को इलाज जल्द मिल जाता है,
जो जीवित बचने का
अवसर देता है। इसके अलावा परीक्षणाधीन उपचार मरीज़ों के लिए मददगार साबित हो सकते
हैं। और जोखिमग्रस्त या कमज़ोर लोगों को अलग-थलग कर उन्हें संक्रमण के संपर्क से
बचाया जा सकता है।
सार्स-कोव-2 वायरस शुरुआत में व्यक्ति को
बहुत बीमार नहीं करता। इसके चलते संक्रमित व्यक्ति घूमता-फिरता रहता है और बीमार
महसूस करने के पहले भी संक्रमण फैलाता रहता है। इस कारण सार्स-कोव-2 के कम घातक
होने की दिशा में विकास की संभावना कम है।
कोलंबिया युनिवर्सिटी के विंसेंट रेकेनिएलो
का कहना है कि वायरस में होने वाले परिवर्तनों के कारण ना सही, लेकिन
सार्स-कोव-2 कम घातक हो जाएगा, क्योंकि एक समय ऐसा आएगा जब बहुत कम लोग
ऐसे बचेंगे जिनमें इसके खिलाफ प्रतिरक्षा ना हो। रेकेनिएलो बताते हैं कि चार ऐसे
कोरोनावायरस अभी मौजूद हैं जो अब सिर्फ सामान्य ज़ुकाम के ज़िम्मेदार बनते हैं जबकि
वे शुरू में काफी घातक रहे होंगे।
इन्फ्लूएंज़ा वायरस से तुलना करें तो
कोरोनावायरस थोड़ा अधिक टिकाऊ है और इस बात की संभावना कम है कि यह इंसानों में
पहले से मौजूद प्रतिरक्षा के खिलाफ विकसित होगा। इसलिए कई विशेषज्ञों का कहना है
कि कोविड-19 से बचने का सुरक्षित और प्रभावी तरीका है टीका। टीकों के बूस्टर
नियमित रूप से लेने की ज़रूरत होगी; इसलिए नहीं कि वायरस तेज़ी से विकसित हो रहा
है बल्कि इसलिए कि मानव प्रतिरक्षा क्षीण पड़ने लग सकती है।
बहरहाल, विशेषज्ञों के मुताबिक हमेशा के लिए ना सही, तो कुछ सालों तक तो वायरस के कुछ संस्करण बने रहेंगे।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.thewire.in/wp-content/uploads/2020/11/13082636/49680384281_2605248bc8_k-1600×1321.jpg
कुछ समय पहले डेनमार्क के स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा था कि
मिंक और लोगों में सार्स-कोव-2 के उत्परिवर्तनों के चलते कोविड-19 टीकों की
प्रभावशीलता खतरे में पड़ सकती है। इस खबर के मद्देनज़र डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने
4 नवंबर को घोषणा की कि मिंक-पालन समाप्त किया जाए और डेढ़ करोड़ से भी अधिक मिंक को
मौत के घाट उतार दिया जाए। इस घोषणा से बहस छिड़ गई और वैज्ञानिकों द्वारा डैटा
विश्लेषण किए जाने तक इस फैसले को स्थगित कर दिया गया। गौरतलब है कि मिंक एक
प्रकार का उदबिलाव होता है जिसे विर्सक भी कहते हैं।
अब,
डैटा की समीक्षा में
युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड की एस्ट्रिड इवर्सन का कहना है कि ये उत्परिवर्तन अपने
आप में चिंताजनक नहीं हैं क्योंकि इस बात के बहुत कम सबूत हैं कि मिंक में हुए ये
उत्परिवर्तन सार्स-कोव-2 वायरस को लोगों में आसानी से फैलने में मदद करते हैं,या वायरस को अधिक
घातक बनाते हैं या चिकित्सा और टीकों की प्रभाविता को कम करते हैं।
लेकिन फिर भी कुछ वैज्ञानिकों को लगता है
कि मिंक को मारना शायद आवश्यक है क्योंकि जून के बाद से 200 से अधिक मिंक फार्म
में यह वायरस तेज़ी से और अनियंत्रित तरीके से फैला है। इसके चलते ये वायरस के स्रोत
हो गए हैं जहां से वह लोगों को आसानी से संक्रमित कर सकता है। डेनमार्क में मिंक
की संख्या वहां की लोगों की आबादी की तीन गुना है,
और देखा गया है कि
जिन फार्म के मिंक संक्रमित हुए हैं उन इलाकों के लोगों में कोविड-19 के मामले बढ़े
हैं। अंतत: 10 नवंबर को डेनमार्क सरकार ने किसानों से मिंक का खात्मा करने का
आग्रह किया।
40 मिंक फार्म से लिए गए नमूनों में वायरस
के 170 संस्करण दिखे। और डेनमार्क के कुल कोविड-19 मामलों के 20 प्रतिशत मामलों
में लगभग 300 संस्करण दिखे, ये संस्करण मिंक में भी देखे गए। अत: माना
जा रहा है कि ये उत्परिवर्तन पहले मिंक में उभरे थे।
मिंक और लोगों के सार्स-कोव-2 के स्पाइक प्रोटीन में भी कई उत्परिवर्तन देखे गए थे। यह वायरस स्पाइक प्रोटीन के ज़रिए ही कोशिकाओं में प्रवेश करता है। स्पाइक प्रोटीन में परिवर्तन प्रतिरक्षा प्रणाली की संक्रमण को पहचानने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कई टीके प्रतिरक्षा प्रणाली को स्पाइक प्रोटीन की पहचान करवाकर उसे अवरुद्ध करने पर आधारित हैं। विशेष रूप से स्पाइक प्रोटीन का क्लस्टर-5 नामक उत्परिवर्तन अधिक चिंता का विषय है। इसमें तीन एमिनो एसिड में बदलाव और दो स्पाइक प्रोटीन में दो एमिनो एसिड का विलोपन देखा गया। प्रारंभिक प्रयोगों में, कोविड-19 से उबर चुके लोगों की एंटीबॉडीज़ के लिए अन्य उत्परिवर्तित वायरस के मुकाबले क्लस्टर-5 उत्परिवर्तन वाले वायरस की पहचान करना ज़्यादा मुश्किल था। इससे लगता है कि इस संस्करण पर एंटीबॉडी उपचार या टीकों का कम असर पड़ेगा। और इसलिए मिंक को मारने की सलाह दी गई। मिंक में हुआ एक अन्य उत्परिवर्तन (Y453F) 300 से अधिक लोगों में दिखा था। इस संस्करण के भी स्पाइक प्रोटीन के एमिनो एसिड परिवर्तन में परिवर्तन हुआ है। और यह भी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी से बच निकलता है। समीक्षकों का कहना है कि ये दावे संदेहास्पद हैं क्योंकि क्लस्टर-5 संस्करण बहुत कम मामलों में दिखा है – 5 मिंक फार्म और 12 लोगों में। जो संक्रमित लोग मिले हैं उनमें से कई मिंक फार्म पर काम करते थे और सितंबर के बाद से यह संस्करण दिखा भी नहीं है। लिहाज़ा टीकों और उपचार की प्रभाविता को लेकर कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी। अलबत्ता, मिंकों की बलि तो चढ़ाई ही जाएगी।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw800/magazine-assets/d41586-020-03218-z/d41586-020-03218-z_18579560.jpg
पश्चिमी निमाड़ (मध्य प्रदेश) के एक गांव के स्कूल के गेट के निकट
सर्प देवता के छोटे-छोटे मंदिरों की कतार ध्यान खींचती है। वैसे तो सर्प देवता के
मंदिर निमाड़ अंचल में पग-पग पर दिखाई देंगे लेकिन यहां एक साथ इतने मंदिर देखकर
आश्चर्य होता है। गांव के एक बुज़ुर्ग ने बताया कि ये सर्पदंश से मृतकों की
समाधियां हैं।
अन्य गांवों की तरह यह गांव भी खेतों, खलिहानों
व झाड़-झंखाड़ से घिरा है। गांव में प्रवेश करते ही खुली नालियां गांव के घरों से
सटी हुई उफनती दिखती हैं। मकानों की छतों,
आंगन व ज़मीन पर अनाज
सुखाया व भंडारित किया जाता है। घास-चारा भी घरों के ही एक हिस्से में जमा किया
जाता है। तो चूहों की मौजूदगी स्वाभाविक है।
भारत में सर्पदंश से मृत्यु के आंकड़े भयावह
है। आज भी सर्पदंश से पीड़ित मरीज़ अस्पताल की दहलीज तक नहीं पहुंच पाते हैं। वे या
तो जल्द ही काल के गाल में समा जाते हैं या फिर झाड़-फूंक,
टोने-टोटके पर भरोसा
किया जाता है। यह भरोसा तब और पुख्ता हो जाता है जब मरीज़ को विषहीन सर्प ने काटा
हो। या अगर विषैले सर्प ने डसा भी हो तो दंश सूखा हो,
अर्थात विष मरीज़ के
शरीर में पहुंचा ही न हो। ऐसा तब होता है जब विषैले सर्प की विष थैलियों में विष
बचा ही न हो और उसने अपनी जान बचाने के लिए डसा हो। इसलिए मरीज़ मृत्यु से बच जाते
हैं।
सर्पदंश का खतरा अधिकतर ग्रामीण इलाकों व
कृषि जगत से जुड़ा है। दुनिया भर में हर वर्ष सर्पदंश से लगभग एक लाख लोग दम तोड़
देते हैं। इनमें से आधी मौतें अकेले भारत में होती हैं। भारत में मौतों का आंकड़ा
ज़्यादा भी हो सकता है क्योंकि आज भी भारत में सर्पदंश के कई मामले अस्पताल तक नहीं
पहुंच पाते।
निमाड़ ज़िले के एक गांव में सर्पदंश से या अन्य कारणों से अकाल मृत्यु होने पर शव का दाह संस्कार करने की बजाय दफन किया जाता है।
उस गांव में एक शादीशुदा महिला को सांप ने काटा था। वह महिला खलिहान में कपास की काठी लेने को गई थी। जैसे ही महिला कपास के ढेर में से काठियां उठाने लगी कि सांप ने डस लिया। उस परिवार में शादी तीज-त्यौहार के समय उक्त महिला के समाधि स्थल की पुताई की जाती है और पूजा की जाती है।
एक बालक की समाधि भी है। बताया जाता है कि वह खेत में गया था जहां उसे सांप ने डस लिया।
एक और समाधि गोविंद नामक एक अधेड़ व्यक्ति की है। बताते हैं कि गोविंद सांपों के बारे में थोड़ा-बहुत जानते थे। एक बार सांप दिखने पर गोविंद ने उसका मुंह पकड़ लिया। पकड़ थोड़ी ढीली हुई तो उसने हाथ में डस लिया। झाड़-फूंक वगैरह के बाद लगभग 15 किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते गोविंद ने दम तोड़ दिया।
गांववासी बताते हैं कि ऐसी समाधियां अन्य गांवों में भी हैं।
आंकड़े बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप
में भारत की तुलना में अधिक विषैले सांप हैं;
फिर भी भारत में
सर्पदंश से मृत्यु का आंकड़ा कहीं अधिक है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि भारत में
सर्पदंश को लेकर फ्रंटलाइन तैयारी कमज़ोर है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक
चिकित्सा की व्यवस्था नहीं होती। दूसरी ओर,
प्राथमिक चिकित्सा
केंद्रों पर एंटी-वेनम सीरम का टीका उपलब्ध नहीं होता। इससे जुड़ी समस्या यह है कि
एंटी-वेनम सीरम का टीका लगाने का अनुभव रखने वाले चिकित्सकों का अभाव है।
सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च, युनिवर्सिटी
ऑफ टोरंटो के साथ भारत व संयुक्त राज्य अमेरिका के साथियों द्वारा किए गए अध्ययन
से पता चलता है कि 2000 से 2019 के दौरान 12 लाख लोगों की मृत्यु सर्पदंश से हुई
(सालाना लगभग 58,000)।
सन 2009 से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने
विषैले सर्पदंश को ‘नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिसीज़’ यानी उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग
की श्रेणी में सूचीबद्ध किया है। सर्पदंश की सबसे अधिक घटनाएं दुनिया के 149
उष्णकटिबंधीय देशों में होती हैं। इससे अरबों डॉलर के नुकसान का आकलन है।
उपरोक्त अध्ययन का मकसद भारत में घातक
सर्पदंश का शिकार होने वाले लोगों की पहचान करना और उनके जीवन पर होने वाले असर को
जानना था। सर्पदंश की वजह से मृत्यु के अलावा लकवा मारना,
रक्तस्राव, किडनी
खराब होना और गैंग्रीन होना आम बात है। यह अध्ययन सिफारिश करता है कि सर्पदंश को
भारत सरकार नोटिफाएबल डिसीज़ के रूप में शामिल करे।
भारत में सांपों की लगभग 3000 प्रजातियां
पाई जाती हैं। इनमें से मात्र 15 प्रजातियों के सांप विषैले होते हैं। इन 15 में
से भी केवल चार प्रजातियां ऐसी हैं जिनके दंश से मरीज़ मौत के मुंह में समा जाते
हैं। इन्हें विषैली चौकड़ी के नाम से जाना जाता है। ये हैं नाग (कोबरा), दुबोइया
(रसेल वाइपर), फुर्सा (सॉ-स्केल्ड वाइपर),
और घोणस (करैत)। भारत
में 20 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि सर्पदंश से सबसे अधिक मौतें
(लगभग 43.2 प्रतिशत) रसेल वाइपर के काटने से हुई। उसके बाद करैत (17.7 प्रतिशत) व
कोबरा (11.7 प्रतिशत) आते हैं।
भारत में सर्पदंश से होने वाली मौतों में
97 फीसदी मौतें ग्रामीण इलाकों में होती है। सर्पदंश की कुल मौतों में 70 फीसदी
बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश,
ओडिशा, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, राजस्थान
और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में हुई। अध्ययन बताते हैं कि सर्पदंश से मरने
वालों में पुरुष (59 प्रतिशत) अधिक होते हैं। ये घटनाएं जून से सितंबर के बीच अधिक
होती है। अधिकतर सांप मानसून के मौसम में ज़मीन पर आ जाते हैं और यहां-वहां अपने
बचाव में, शिकार की खोज आदि के लिए भटकते हैं। सांप खेतों, जंगलों
या ऐसी जगहों पर मिलते हैं जहां उनका भोजन उपलब्ध होता है।
सर्पदंश की अधिकांश घटनाएं जंगल, खेतों में होती हैं जहां से मरीज़ को
चिकित्सा केंद्र पर लाना भी संभव नहीं होता।
और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इन मौतों में
से सत्तर फीसदी 20 से 50 बरस की आयु के वे पुरुष होते हैं जो रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम
करते हैं।
गांवों में अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएं
जैसे प्रकाश की व्यवस्था, सीवेज सिस्टम,
स्वच्छता के अभाव में
चूहों की बढ़ती आबादी सर्पदंश को बढ़ावा देती है।
अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि अधिकांश
मज़दूर और किसान खेत में काम करते वक्त जूते नहीं पहनते। लगभग 70 फीसदी सर्पदंश
पैरों में होता है। ज़मीन पर सोना सर्पदंश को आमंत्रण देता है। घर के पास पशुओं को
बांधा जाता है। परिणामस्वरूप चूहे और पीछे-पीछे सांप अधिक आते हैं।
सर्पदंश से पीड़ित मरीज़ पर वित्तीय बोझ भी
पड़ता है। एक ओर जहां मरीज़ों को अस्पताल का भारी खर्च उठाना पड़ता है वहीं वह श्रम
से हाथ धो बैठता है। यह भी देखा गया है कि सर्पदंश से ग्रसित मरीज़ अगर बच भी जाता
है तो वह मनोवैज्ञानिक तनाव से गुज़रता है। खासकर रसेल वाइपर व फुर्सा के दंश के
मामले में मरीज़ बच तो जाते हैं लेकिन उनके दंश वाले अंगों में गैंग्रीन हो जाता है
और उस अंग को काटना पड़ता है।
अध्ययन अनुशंसा करता है कि सांपों व
सर्पदंश के बारे में लोगों को शिक्षित व जागरूक किया जाए। सांपों से बचाव के लिए
खेत-जंगल में काम करने के दौरान जूते व दस्ताने पहनना और रोशनी के लिए टार्च का
इस्तेमाल सर्पदंश के जोखिम को कम कर सकता है। मच्छरदानी का व्यापक वितरण व
इस्तेमाल मच्छरों के साथ ही रात में सांपों से बचा सकता है।
यह अध्ययन इस ओर भी ध्यान दिलाता है कि
समस्या चिकित्सा विज्ञान की प्राथमिकता की भी है। चिकित्सा विज्ञान के पाठ्यक्रम
में सर्पदंश को हाशिए पर रखा हुआ है। छात्रों को सर्पदंश का पाठ पढ़ाया तो जाता है
लेकिन जो डॉक्टर तैयार होते हैं उन्हें सर्पदंश का मैदानी अनुभव न के बराबर मिल
पाता है। ऐसे में सर्पदंश के लक्षणों के आधार पर पता लगाना कि किस सांप ने काटा है
और एंटी-वेनम की खुराक कितनी देनी है, जैसी बारीकियों के अनुभव से वे वंचित होते
हैं।
अध्ययन एक और बात की ओर इशारा करता है।
वर्तमान में जो एंटी-वेनम सीरम उपलब्ध है वह केवल स्पेक्टेकल्ड कोबरा, कॉमन
करैत, रसेल वाइपर व सॉ-स्केल्ड वाइपर के विष को बेअसर कर पाता है।
12 अन्य विषैली प्रजातियों के खिलाफ यह असरकारक नहीं होता।
वर्तमान में चैन्नई के पास इरूला
को-ऑपरेटिव सोसायटी एंटी-वेनम के निर्माण के लिए सांपों का विष उपलब्ध कराती है।
उल्लेखनीय है कि इरूला जाति के लोग सांपों को पकड़ने में निपुण माने जाते हैं।
रोमुलस व्हिटेकर की पहल पर इरूला को-ऑपरेटिव सोसायटी का गठन किया गया जो सांपों का
विष निकालते हैं और वापस उन्हें जंगल में छोड़ देते हैं। सोसायटी विष प्राप्त करके
एंटी-वेनम सीरम का निर्माण करती है और कुछ दवा कंपनियों को उपलब्ध करवाती है।
लेकिन यह देखने में आया है कि दक्षिण भारत
में पाए जाने वाले स्पेक्टेकल्ड कोबरा या रसेल वाइपर का विष पूर्वी भारत में पाए
जाने वाली उसी प्रजाति के विष से भिन्न होता है। यह फर्क होने से भी कई बार
एंटी-वेनम सीरम कारगर नहीं होता।
निमाड़ ज़िले के एक गांव में सर्पदंश से
या अन्य कारणों से अकाल मृत्यु होने पर शव का दाह संस्कार करने की बजाय दफन
किया जाता है।
उस गांव में एक शादीशुदा महिला को सांप
ने काटा था। वह महिला खलिहान में कपास की काठी लेने को गई थी। जैसे ही महिला
कपास के ढेर में से काठियां उठाने लगी
कि सांप ने डस लिया। उस परिवार में शादी तीज-त्यौहार के समय उक्त महिला के
समाधि स्थल की पुताई की जाती है और पूजा की जाती है।
एक बालक की समाधि भी है। बताया जाता है
कि वह खेत में गया था जहां उसे सांप ने डस लिया।
एक और समाधि गोविंद नामक एक अधेड़
व्यक्ति की है। बताते हैं कि गोविंद सांपों के बारे में थोड़ा-बहुत जानते थे।
एक बार सांप दिखने पर गोविंद ने उसका मुंह पकड़ लिया। पकड़ थोड़ी ढीली हुई तो
उसने हाथ में डस लिया। झाड़-फूंक वगैरह के बाद लगभग 15 किलोमीटर दूर अस्पताल
पहुंचते-पहुंचते गोविंद ने दम तोड़ दिया।
गांववासी बताते हैं कि ऐसी समाधियां
अन्य गांवों में भी हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह लक्ष्य निर्धारित किया है कि वर्ष 2030 तक सर्पदंश को नियंत्रित कर मृत्यु दर को आधा कर लिया जाएगा। सर्पदंश के खिलाफ तभी प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है जब सार्वजनिक चिकित्सा का दृष्टिकोण सकारात्मक हो। सर्पदंश के मामले में हस्तक्षेप स्थानीय स्तर पर ही किया जाना चाहिए। तभी मरीज़ों को मृत्यु से बचाया जा सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
सार्स-कोव-2 से संक्रमित रोगियों ने कई ऐसी तकलीफों का अनुभव
किया है जिनका सम्बंध तंत्रिका तंत्र से हो सकता है। जैसे सिरदर्द, जोड़ों
और मांसपेशियों में दर्द, थकान,
सोचने-समझने में
परेशानी, गंध/स्वाद महसूस न होना वगैरह। कुछ गंभीर स्थितियों में तो
मस्तिष्क में सूजन और स्ट्रोक के मामले भी सामने आए हैं। स्पष्ट है कि यह वायरस
तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। लेकिन कैसे?
एक व्याख्या यह थी कि शायद ये प्रतिरक्षा
तंत्र के अति सक्रिय होने के परिणाम हैं। लेकिन ऐसे भी मामले सामने आए जिनमें
रोगियों में थकान और सोचने-समझने की दिक्कतें तो थीं किंतु प्रतिरक्षा प्रणाली
अनियंत्रित नहीं हुई थी। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ऐसे लक्षण प्रतिरक्षा
प्रणाली के अति-सक्रिय होने के कारण हैं या फिर वायरस सीधे तंत्रिका तंत्र पर हमला
करता है। यह भी संभव है कि ये लक्षण वायरस द्वारा उत्पन्न शरीर-व्यापी सूजन के
परिणाम हों।
इस सवाल की खोज करने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ
डैलास के तंत्रिका विज्ञानी थिओडोर प्राइस ने ऐसे कुछ लक्षणों पर ध्यान दिया। इन
लक्षणों में गले में खराश, सिरदर्द,
शरीर-व्यापी दर्द और
गंभीर खांसी शामिल है। खांसी तो तंत्रिकाओं की उत्तेजना से होती है। कुछ मरीज़ों ने
रासायनिक संवेदना की क्षति भी बताई थी और इसकी संवेदना स्वाद तंत्रिकाओं के ज़रिए
नहीं बल्कि दर्द-तंत्रिकाओं द्वारा प्रेषित की जाती है। जब मामूली रोगियों में भी
ऐसे लक्षण दिखें तो लगता है कि संवेदी तंत्रिकाएं सीधे प्रभावित हो रही हैं।
कोशिका पर ACE2 ग्राही की उपस्थिति
से पता चलता है कि कोई कोशिका सार्स-कोव-2 से संक्रमित होगी या नहीं। आरएनए
अनुक्रमण से पता चला कि मेरु-रज्जू के बाहर पाए जाने वाली कुछ तंत्रिका कोशिकाओं
पर ACE2 ग्राही उपस्थित होते हैं।
ऐसे न्यूरॉन्स के सिरे शरीर की सतहों जैसे
त्वचा और फेफड़ों सहित आंतरिक अंगों पर केंद्रित होते हैं। यहां से इनके लिए वायरस
को ग्रहण करना आसान होता है। प्राइस के अनुसार तंत्रिका संक्रमण कोविड के उग्र और
स्थायी लक्षणों में से एक है।
लेकिन टीम का कहना है कि तंत्रिका सम्बंधी
लक्षणों के लिए तंत्रिकाओं का वायरस संक्रमित होना ज़रूरी नहीं है। संक्रमित
रोगियों में काफी मात्रा में साइटोकाइन्स नामक प्रतिरक्षा प्रोटीन्स मिले हैं जो
न्यूरॉन को प्रभावित कर सकते हैं।
एक अन्य अध्ययन में पता चला कि सार्स-कोव-2
का कोशिकाओं में प्रवेश करने का कारण केवल ACE2 ग्राही नहीं बल्कि
एक अन्य प्रोटीन NRP1 भी है। चूहों पर किए गए अध्ययन से मालूम चला है कि NRP1 वायरस के स्पाइक प्रोटीन के संपर्क में आने के बाद उसे कोशिकाओं में प्रवेश
करने में मदद करता है। शायद यह एक सह-कारक के रूप में कार्य करता है।
इसके अलावा एक अन्य परिकल्पना है कि स्पाइक
प्रोटीन NRP1 को प्रभावित करके रोगियों में नोसिसेप्टर्स को शांत कर सकता है जो संक्रमण
की शुरुआत में दर्द-सम्बंधी लक्षणों को दबा देता है। यह प्रोटीन सार्स-कोव-2 से
प्रभावित व्यक्ति में संवेदनाहारी प्रभाव प्रदान करता है जिससे वायरस अधिक आसानी
से फैल सकता है।
अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि कोविड-19 तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि तंत्रिका कोशिकाएं संक्रमित होती हैं या नहीं। न्यूरॉन्स को संक्रमित किए बगैर भी यह वायरस कोशिकाओं के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/C1B1301E-E578-4B2A-A51AA95EFC2FEB72_source.jpg?w=590&h=800&BCB25E30-B06A-4E81-8FB26A29FC0AF42C
एल्सवियर की एक पत्रिका में प्रकाशित एक पेपर में यह दावा किया गया था कि कोविड-19 रोग
सार्स-कोव-2 वायरस से नहीं बल्कि चुंबकीय विसंगतियों के कारण हुआ है। यह पेपर 8
अक्टूबर को साइंस ऑफ दी टोटल एनवायरनमेंट में प्रकाशन के बाद से ही आलोचना
का केंद्र रहा है। 29 अक्टूबर को इसे वेबसाइट से हटा लिया गया है।
इस पेपर के प्रमुख लेखक और पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय
के सहायक प्रोफेसर मोसेज़ बिलिटी संक्रामक रोगों का अध्ययन करते हैं। दी
साइंटिस्ट से चर्चा करते हुए वे बताते हैं कि इस अध्ययन की शुरुआत पिछले वर्ष
हुई जब अचानक उनकी प्रयोशाला के चूहे बीमार हुए और उन्हें मारना पड़ा। बिलिटी ने
चूहों के फेफड़ों तथा गुर्दों के ऊतकों में कुछ बदलाव देखे। बदलाव उन चोटों के समान
थे जो मनुष्यों में वैपिंग (इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट से धूम्रपान) के कारण होते हैं।
मनुष्यों में वैपिंग के कारण होने वाली
क्षति और प्रायोगिक चूहों, दोनों के फेफड़ों में आयरन ऑक्साइड पाया
गया। बिलिटी के अनुसार मनुष्यों में आयरन ऑक्साइड वैपिंग के कारण जमा हुआ था जो
किसी तरह से धरती के चुंबकीय क्षेत्र से क्रिया करता है। इसी के कारण चुंबकीय
उत्प्रेरण की प्रक्रिया सक्रिय हो गई। दूसरी ओर चूहे में कमज़ोर प्रतिरक्षा के चलते
आयरन की मात्रा अनियंत्रित होने के कारण ऐसे परिणाम सामने आए।
बिलिटी के समूह ने इस वर्ष फरवरी और मार्च
में उसी तरह और चूहों को मृत पाया। उन्होंने इस घटना को अमेरिका में कोविड-19 के
बढ़ रहे मामलों के साथ जोड़कर देखा और बताया कि यह वसंत विषुव है जिसमें भू-चुंबकीय
परिवर्तन होते हैं और यही इस रोग का मुख्य कारण है। पेपर में कहा गया था कि
सार्स-कोव-2 तो वास्तव में मानव जीनोम में पहले से ही उपस्थित था जो पृथ्वी के
चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन के साथ फिर से जागृत हो गया है। कोविड-19 तो चुंबकीय
क्षेत्र द्वारा उत्प्रेरित अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण हुआ है।
कैल्टेक के भू-विज्ञानी जो किर्शविंक के
अनुसार इस पेपर में कई बुनियादी त्रुटियां है। यह सही है शक्तिशाली चुंबकीय
क्षेत्र रासायनिक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं लेकिन इसके लिए विसंगतियों का
तीन-चार गुना अधिक होना ज़रूरी है। इसके अलावा इस अध्ययन में बिना किसी प्रायोगिक
साक्ष्य के यह दावा किया गया है कि जेड तावीज़ के उपयोग से ऐसी विसंगतियों के
प्रभाव को कम किया जा सकता है। बिलिटी के अनुसार इसका उपयोग प्राचीन चीनी लोगों द्वारा
उस समय किया जाता था जब भू-चुंबकत्व की स्थिति आज के समान थी। किर्शविंक जेड तावीज़
के चुंबकीय गुणों के वर्णन को गलत बताते हैं। इस तावीज़ में चुंबकत्व बहुत दुर्बल
होता है जो कोई सकारात्मक परिणाम देने के लिए काफी नहीं है।
इस अध्ययन की काफी आलोचना की जा रही है। कई वैज्ञानिकों ने इस पेपर को ‘छदम विज्ञान’ की संज्ञा दी है और निरस्त करने पर ज़ोर दिया है। इस पेपर के प्रकाशन-पूर्व समीक्षकों पर भी सवाल उठाए गए हैं। पिट्सबर्ग युनिवर्सिटी के प्रवक्ता ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इन्कार किया है लेकिन बिलिटी और सह-लेखक इस गलती की पूरी ज़िम्मेदारी ले रहे हैं। बिलिटी कहते हैं कि उनका उद्देश्य जन स्वास्थ्य अधिकारियों को नीचा दिखाना नहीं बल्कि आगे चर्चा और जांच के लिए एक परिकल्पना प्रस्तुत करना है। अब वे अकेले लेखक के रूप में, तावीज़ या पारंपरिक चीनी चिकित्सा का ज़िक्र किए बगैर, इसे पुन: प्रकाशित करने की योजना बना रहे हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://i2.wp.com/retractionwatch.com/wp-content/uploads/2020/10/image-14.png?resize=768%2C358&ssl=1
हाल ही में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा ओपिओइड महामारी में
पर्ड्यू फार्मा कंपनी की भूमिका के लिए तीन अपराधिक मामलों में दोषी करार दिया गया
है। दोषी पाए जाने के बाद न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी के लैंगोन मेडिकल सेंटर ने अपने
संस्थान, इंस्टीट्यूट ऑफ ग्रेजुएट बायोमेडिकल साइंसेज़ से पर्ड्यू
फार्मा कंपनी के संस्थापक सैकलर परिवार का नाम हटाने का फैसला लिया है।
ओपियोइड महामारी में अफीमनुमा दर्द निवारक
दवाओं (जिनकी आदत पड़ जाती है) के चिकित्सा में अति में उपयोग और दुरुपयोग ने कई
समस्याओं को जन्म दिया था और इनका अधिक इस्तेमाल लाखों लोगों की मौत का कारण बना
था। अफीमी दवाओं में सबसे अधिक लिखी जाने वाली दवाएं हैं मेथाडॉन, ऑक्सीकोडोन
(जो ऑक्सीकोन्टीन नाम से बेची जाती है), और पाइड्रोकोडोन।
पर्ड्यू फार्मा कंपनी ऑक्सीकोन्टीन नामक
दर्द निवारक दवा बनाती है। पर्ड्यू फार्मा ने देश से धोखा करने और रिश्वतखोरी कानून का उल्लंघन करने के दोष में
आठ अरब डॉलर के भुगतान का समझौता किया है। अलबत्ता,
इस भुगतान से ना तो
कंपनी के अधिकारी और ना ही सैकलर परिवार आरोप से मुक्त होगा, उन
पर आपराधिक जांच जारी रहेगी।
एसोसिएटेड प्रेस को दिए गए बयान में
न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी के अधिकारियों का कहना है कि पर्ड्यू फार्मा से सैकलर
परिवार का सम्बंध और अफीमी दवाइयों के उपयोग को अधिकाधिक प्रोत्साहित करने में
पर्ड्यू फार्मा की भूमिका को देखते हुए हमें लगता है कि संस्थान के साथ उनका नाम
जोड़े रखना संस्थान के मूल्यों और उद्देश्य से मेल नहीं खाता।
सैकलर परिवार के वकील डैनियल कोनोली ने
न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी के इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि जैसे ही पर्ड्यू
कंपनी के दस्तावेज़ उजागर किए जाएंगे, स्पष्ट हो जाएगा कि कंपनी और कंपनी के
निदेशक सदस्यों, सैकलर परिवार, ने हमेशा नैतिक और कानूनी रूप से कार्य
किया है। न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी का जल्दबाज़ी में फैसला लेना निराशजनक है।
1980 में उक्त संस्थान की स्थापना के समय
से ही सैकलर परिवार के नाम पर संस्थान का नाम रखा गया था। लेकिन संस्थान ने पिछली
गर्मियों से इस परिवार से औपचारिक रूप से डोनेशन लेना बंद कर दिया है।
संस्थानों से सैकलर का नाम हटाने वालों में लूवरे और टफ्ट्स युनिवर्सिटी के बाद अब न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी भी शामिल हो गई है। विश्वविद्यालयों पर काफी समय से दबाव रहा है कि वे अपने संस्थानों से सैकलर परिवार का नाम हटाएं और उससे अतीत में प्राप्त धनराशि लौटा दें।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://miro.medium.com/max/4100/1*UwXNSD0cna-wP1HF-JZzWg.png