आजकल ज़्यादातर दवाइयां-टीके बनाने, एचआईवी
के परीक्षण,
कोशिकाओं में संपन्न क्रियाओं व उनसे जुड़े सिद्धांत एवं कई
अन्य बीमारियों को समझने के लिए वैज्ञानिक प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं का
संवर्धन करते हैं। वैज्ञानिकों को कैंसर जैसी जटिल बीमारी को समझने तथा शोध करने
के लिए ऐसी कोशिकाओं की ज़रूरत पड़ती है, जो लगातार समरूपता के
साथ विभाजित होती रहें ताकि कृत्रिम परिस्थिति में उन कोशिकाओं की मदद से
बीमारियों की उत्पत्ति, बीमारियों की क्रियाविधि और इलाज के
विभिन्न तरीके खोजे जा सकें।
वैज्ञानिकों को समरूपी कोशिकाओं की ज़रूरत इसलिए भी पड़ती है क्योंकि उन्हें एक
तरह के प्रयोग बार-बार दोहराने पड़ते हैं और अपने नतीजों की तुलना दूसरे
वैज्ञानिकों के अवलोकनों के साथ करनी पड़ती है। परंतु 1951 तक वैज्ञानिकों के पास
ऐसा कोई कोशिका-वंश नहीं था जो वर्षों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक जैसी समरूप कोशिकाओं को
जन्म दे सके। जो कोशिका-वंश उपलब्ध भी थे या जिन्हें बनाने की कोशिश की गई थी उनकी
कोशिकाएं ज़्यादा से ज़्यादा एक-दो दिन में मर जाती थीं और उनका अध्ययन करना मुश्किल
होता था।
हेनरीटा लैक्स
फिर संयुक्त राज्य अमरीका के जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के
वैज्ञानिक जॉर्ज गे की प्रयोगशाला में अजीबो-गरीब दिखने वाले ट्यूमर का एक नमूना
आया। यह ट्यूमर कुछ हल्के बैंगनी रंग का, जेली जैसा चमकदार था। यह
नमूना इसलिए भी कुछ खास था क्योंकि इसकी कुछ कोशिकाएं लगातार विभाजित होते हुए
समरूपी कोशिकाओं को जन्म दे रहीं थीं। उन्होंने देखा कि जब कोई पुरानी कोशिका मरती
है तो उसके जैसी ही कोशिका की प्रतियां उसकी जगह ले लेती हैं। इससे हुआ यह कि उसी
कोशिका की संतानें आज तक मौजूद हैं और उनकी मदद से कई शोध कार्य भी हो रहे हैं।
डॉ. गे की एक प्रयोगशाला सहायक ने इस अमर कोशिका का नाम ‘हेला’ (HeLa) रखा।
हेला नाम हेनरीटा लैक्स नामक कैंसर पीड़ित महिला के नाम पर रखा गया था जिनके ट्यूमर
से डॉ. गे ने इस कोशिका-वंश की खोज की थी। हेनरीटा लैक्स का जन्म संयुक्त राज्य के
वर्जीनिया में हुआ था और वे तम्बाकू के खेत में काम किया करती थीं। हुआ यह कि
लैक्स जिस चिकित्सक के यहां इलाज करवा रही थीं, वे डॉ.
गे की प्रयोगशाला के लिए कैंसर के ऊतकों के नमूने इकट्ठा कर रहे थे। बरसों से डॉ.
गे और उनकी नर्स पत्नी मार्गरेट मानव कोशिकाओं को कृत्रिम रूप से प्रयोगशाला में
पनपाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बाकी वैज्ञानिकों की तरह इनके द्वारा संवर्धित
कोशिकाएं कुछ पीढ़ियों तक विभाजित होने के बाद मर जाती थीं। लैक्स की मौत गर्भाशय
ग्रीवा के कैंसर से हुई थी और उनकी मौत के कुछ ही महीनों बाद डॉ. गे की प्रयोगशाला
में उनके शरीर के ट्यूमर कोशिकाओं की मदद से इस अमर कोशिका-वंश को खोजा गया।
अब सवाल यह उठता है कि हेनरीटा लैक्स की ट्यूमर कोशिकाओं में ऐसा क्या खास है
जिससे वे मरती नहीं हैं और विभाजित होते हुए लगातार समरूपी कोशिकाओं को जन्म देती
रहती हैं?
सच कहें तो इसका उत्तर आज भी पूरी तरह पता नहीं है।
होता यह है कि सामान्य कोशिकाएं औसतन पचास बार विभाजन करने के बाद एपोप्टोसिस
नामक प्रक्रिया से खुद-ब-खुद खत्म हो जाती हैं। इसी कारण ज़्यादातर कोशिका-वंश भी
एक समय के बाद खत्म हो जाते हैं। लेकिन हेला कोशिकाओं के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि हेला कोशिकाओं में टेलोमरेज़ नामक एंज़ाइम अत्यधिक सक्रिय होता है। इससे
कोशिकाएं एपोप्टोसिस की प्रक्रिया से न गुज़रकर लगातार विभाजित होती रहती हैं।
विभाजन से हाल ही में बनी हेला कोशिकाओं का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से प्राप्त चित्र
डॉ. गे ने अमर कोशिका-वंश ‘हेला’ के कई नमूने दुनिया भर की
प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिकों के पास भेजे। जल्दी ही दुनिया में असंख्य हेला
कोशिकाएं हर हफ्ते बनने और इस्तेमाल होने लगीं।
1950 के दशक में पोलियो की महामारी बुरी तरह फैली हुई थी। जोनास साल्क ने
इन्हीं हेला कोशिकाओं का इस्तेमाल कर पोलियो के टीके का परीक्षण किया था। हेला
कोशिकाओं को कई तरह की बीमारियों, जैसे चेचक, एचआईवी और इबोला को समझने और उन पर परीक्षण करने के लिए इस्तेमाल में लिया गया
है।
ऐसा माना जाता है कि वाल्टर फ्लेमिंग ने 1882 में गुणसूत्रों की खोज की, पर लगभग 70 वर्ष बाद इन्हीं हेला कोशिकाओं की मदद से तीज़ो और लेवान ने उन
रासायनिक रंजकों को खोजा जिनसे रंजित होकर गुणसूत्र दिखने लगते हैं और फिर
उन्होंने मानव कोशिकाओं में गुणसूत्रों की सही संख्या की गिनती की। हेला कोशिकाएं
पहली कोशिकाएं थीं जिन्हें क्लोन किया गया। इन कोशिकाओं को अंतरिक्ष में भी ले
जाया गया है। टेलोमरेज़ जैसे एंज़ाइम जिसके कारण कैंसर कोशिकाएं एपोप्टोसिस से बचकर
लगातार विभाजित होती रहती हैं, उसकी खोज भी हेला कोशिकाओं की
मदद से ही की गई।
एक और गजब की बात है कि जिस गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से हेनरीटा लैक्स की मौत
हुई थी,
उसके कारक ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का भी पता
हेला कोशिकाओं की मदद से चला था और आज तो इस वायरस से बचने के लिए टीका भी उपलब्ध
है।
हेला कोशिकाओं के कारण असंख्य नई खोजें हुई हैं। वैज्ञानिकों ने हेनरीटा लैक्स
की कोशिकाओं की मदद से कई शोध किए, इलाज ढूंढे, आविष्कार किए। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसकी जानकारी उनके परिवार को
नहीं थी। दशकों बाद ही उनके परिवार को पता चला कि लैक्स की कोशिकाओं ने मानव इतिहास
पर इतना बड़ा असर डाला है। यह उपेक्षा हेला कोशिकाओं के साथ काम करने वाले
वैज्ञानिकों के ऊपर नैतिक प्रश्न भी उठाती है।
खैर कुछ भी हो, हेनरीटा लैक्स की कोशिकाओं के कारण करोड़ों लोगों के जीवन पर बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा, कई जानें बचीं और आगे भी बचती रहेंगी और इसके लिए पूरी मानवता हेनरीटा लैक्स और डॉ. जॉर्ज गे की कृतज्ञ रहेगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/d/d7/Henrietta_Lacks_%281920-1951%29.jpg https://thumbs-prod.si-cdn.com/HJgUh464TPRfMCblj7o01J3BQao=/fit-in/1072×0/https://public-media.si-cdn.com/filer/HeLa-cells-dividing-1.jpg
इम्यूनिटी यानी प्रतिरक्षा व्यवस्था पिछले दिनों काफी चर्चित रही है। विनीता बाल और सत्यजीत रथ के आलेखों की एक शृंखला वर्ष 1997 में रेज़ोनेंस में प्रकाशित हुई थी और प्रतिरक्षा के समझने में काफी मददगार है। यहां प्रस्तुत है पहला आलेख।
कई मायनों में प्रतिरक्षा तंत्र बाकी तंत्रों से अलग है। एक
खासियत तो यह है कि यह कोई ऐसा तंत्र नहीं है जो कुछ सुपरिभाषित अंगों के साथ शरीर
में विशिष्ट स्थान पर स्थित हो। दूसरी खासियत यह है कि आदर्श स्थिति में यह
विश्राम की अवस्था में रहता है और तभी सक्रिय होता है जब इसे उकसाया जाए। तीसरी
खासियत यह है कि काम शुरू करने से पहले इसकी कोशिकाओं को परिपक्व होने के चरण से
गुज़रना पड़ता है। चौथा अंतर यह है कि (प्रजनन तंत्र के अलावा) यह एकमात्र ऐसा तंत्र
है जिसकी कोशिकाएं अपने डीएनए (जेनेटिक सामग्री) को पुर्नव्यवस्थित करती हैं और
कभी-कभी तो डीएनए के हिस्से गंवा भी देती हैं। यह उनके विकास और परिपक्व होने की
प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।
सवाल यह है कि प्रतिरक्षा तंत्र ऐसा विचित्र व्यवहार क्यों करता है। इस सवाल
का जवाब इस आधार पर दिया जा सकता है कि प्रतिरक्षा तंत्र के सामने किस तरह की
चुनौतियां होती हैं। तो पहला सवाल आता है कि प्रतिरक्षा तंत्र की ज़रूरत क्या है।
इसका जवाब पाने के लिए एक बहु-कोशिकीय जीव पर विचार करते हैं। ऐसे बहु-कोशिकीय
जीव को अपनी कोशिकाओं को साथ-साथ रखना होता है और कोशिकाओं के अलग-अलग समूहों से
अलग-अलग कार्य करवाने होते हैं। इस श्रम विभाजन का मतलब यह होता है कि शरीर की हर
कोशिका सारे काम नहीं कर सकती। कुछ कोशिकाएं तो इतनी विशिष्ट हो जाती हैं कि वे
शायद स्वतंत्र इकाई के रूप में जीवित भी न रह सकें। अर्थात ऐसी कोशिकाओं के कई
समूहों को जीवन की अनिवार्य चीज़ें बनी-बनाई मुहैया करवानी होंगी। इसके लिए शरीर को
सख्ती से नियंत्रित आंतरिक पर्यावरण बनाकर रखना होगा जो पोषण की दृष्टि से समृद्ध
हो।
ऐसा पर्यावरण तमाम बाहरी जीवों को आमंत्रण है कि वे आएं और दावत उड़ाएं। यदि
ऐसे मेज़बान जीव को अपनी अखंडता बनाए रखनी है तो उसे इन मुफ्तखोरों से निपटना होगा।
दरअसल,
यह भी हो सकता है कि स्वयं मेज़बान की कोशिकाएं जीव के
नियंत्रण को धता बताकर एक स्वतंत्र जीवनशैली अपना लें और इस पौष्टिक आंतरिक
पर्यावरण का बेजा फायदा उठाकर मौज-मस्ती करने लगें। इन कोशिकाओं को हम कैंसर
कोशिकाएं कहते हैं। इन शरारती कोशिकाओं से भी निपटना पड़ता है।
दूसरे शब्दों में, बहु-कोशिकीय जीवन के लिए ज़रूरी है कि तमाम
किस्म के घुसपैठियों के खिलाफ कुछ-ना-कुछ सुरक्षा व्यवस्था हो।
लेकिन प्रयोगों की बदौलत यह स्पष्ट हुआ है कि प्रतिरक्षा तंत्र का मुख्य काम
संक्रमणों से हिफाज़त करना है। यानी इसका विकास ऐसे संक्रमणों के प्रकार और प्रकृति
से निर्धारित हुआ होगा।
तो प्रतिरक्षा तंत्र की उन विशेषताओं की व्याख्या कैसे की जाए, जिनकी चर्चा हमने शुरू में की थी। सबसे पहली बात तो यह है कि घुसपैठ बाहर से
होने वाली है,
इसलिए शरीर को पता नहीं होता कि उसकी सुरक्षा में कहां सेंध
लगेगी। इसलिए प्रतिरक्षा व्यवस्था के घटक शरीर में हर जगह उपस्थित होने चाहिए ताकि
घुसपैठ को प्रवेश के बिंदु पर ही पकड़ा जा सके। इसका मतलब है कि प्रतिरक्षा तंत्र
तभी उपयोगी होगा जब वह पूरे शरीर में फैला हो। अत: यह कोई अचरज की बात नहीं है कि
यह व्यवस्था कुछ सुपरिभाषित अंगों में कैद नहीं है। अलबत्ता, यह अपने कामकाज (जैसे विकास) के लिए कतिपय अंगों का उपयोग करती है।
इसी प्रकार से, यदि प्रतिरक्षा तंत्र का प्रमुख काम
संक्रमणों से निपटने का है, तो पर्यावरण में कोई परजीवी न
हो,
तो इस तंत्र के पास कोई काम नहीं होगा। वास्तविक दुनिया में
भी इसके पास लगातार काम नहीं होगा। जब संक्रमण होगा तब उसका आव्हान किया जाएगा।
अर्थात ‘सामान्यत:’ प्रतिरक्षा तंत्र कुछ नहीं करेगा, बस
बैठकर निगरानी करता रहेगा।
प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण से कैसे निपटता है?
पहली बात है कि संक्रमण से ‘निपटने’ के दो हिस्से होने चाहिए – पहचान और
कार्रवाई। पहले घुसपैठिए को पहचानना होगा और फिर उसके बारे में कुछ करना होगा। इसे
करने का सबसे आसान तरीका यह होगा कि प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सतह पर एक विशेष
ग्राही हो जो सारे घुसपैठियों को पहचान सके और फिर कोशिका को उसके बारे में
उपयुक्त सुरक्षात्मक कार्रवाई करने को उकसा सके।
बदकिस्मती से, यदि पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया को
उपयोगी होना हो,
तो वे इतनी एकतरफा नहीं हो सकती। रोगजनक परजीवी बहुत विविध
रूपों में और अत्यधिक लचीलेपन के साथ आते हैं। इसलिए यह तो कल्पना भी नहीं की जा
सकती कि कोई एक ग्राही सारे रोगजनकों पर उपस्थित किसी ‘चिंह’ को पहचान पाएगा।
इसलिए हमें ग्राहियों का एक विशाल समूह चाहिए।
इसी प्रकार से परजीवी घुसपैठ के लिए बहुत अलग-अलग रणनीतियां अपनाते हैं।
प्रतिरक्षा तंत्र को इन विविध रणनीतियों से निपटने को भी तैयार होना चाहिए। इसलिए
पहचान होने के बाद भी कोई एक तरीका काम नहीं करेगा।
अंतत:,
इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि एक ‘चिंह’ एक ही रोगजनक
से सम्बद्ध होगा और एक विशिष्ट प्रतिक्रिया पक्के तौर पर कारगर होगी।
इसलिए लक्ष्य की पहचान और उसके बारे में उचित कार्रवाई का निर्णय, ये दो कार्य अलग-अलग करने होंगे।
अब एक-एक करके इन दिक्कतों पर विचार करते हैं।
सबसे पहली चुनौती तो यह है कि प्रतिरक्षा तंत्र को इतने सारी ग्राही पैदा करने
होंगे कि वे मिल-जुलकर सारे रोगजनकों को पहचान सकें। ऐसा कैसे किया जा सकता है?
इस संदर्भ में पहचान के दो मॉडल्स उपयोगी हो सकते हैं: क्लोनल एकरूपता और
क्लोनल विविधता पर आधारित मॉडल्स।
प्रतिरक्षा लक्ष्यों की पहचान के मॉडल्स
मॉडल्स की बात शुरू करने से पहले कुछ शब्दों को परिभाषित कर लिया जाए।
क्लोनल एकरूप का मतलब है ऐसी कोशिकाओं का समूह जो हू-ब-हू एक-दूसरे की नकल
हैं। इन सभी कोशिकाओं पर एकदम एक-जैसे ग्राही होंगे। शरीर में यही सामान्य स्थिति
होती है;
उदाहरण के लिए, लीवर की सारी कोशिकाएं
एकदम एक जैसी दिखती हैं। दूसरी ओर, क्लोनल विविध कोशिका समूह एक
ही मातृ कोशिका से पैदा हुई कोशिकाओं का समूह होता है जो सब एक ही कार्य करेंगी
लेकिन प्रत्येक पर कोई एक ग्राही अन्य से अलग होगा।
क्लोनल एकरूप ग्राही ‘विदेशी’ लक्ष्य को इस आधार पर पहचानते हैं कि उन पर कोई
‘पराया’ अणु उपस्थित होता है। यह लगभग ऐसा है जैसे हर उस व्यक्ति को विदेशी माना
जाएगा जो किसी खास रंग की टोपी पहने है जो आपके समुदाय में कोई नहीं पहनता। कहने
का मतलब यह है कि उन आणविक चिंहों को विदेशी माना जाता है जो आम तौर पर
स्तनधारियों के शरीर में नहीं बनते। एक उदाहरण लिपोपॉलीसेकराइड का है। क्लोनल
एकरूप कार्यकारी कोशिकाएं (जैसे मैक्रोफेज और पोलीमॉर्फोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट) पर
ऐसे ग्राही पाए जाते हैं। ऐसे ग्राहियों के समूह की पहचान-क्षमता अत्यंत सीमित
होगी और स्थिर होगी क्योंकि इन्हें इस तरह बनाया गया है कि ये बार-बार नज़र आने
वाले ‘चिंहों’ की पहचान कर सकें।
तो यह क्लोनल एकरूप पहचान का तरीका पर्याप्त क्यों नहीं है?
बार-बार नज़र आने वाले लक्ष्यों को पहचान करने के तरीके में कुछ बड़े जोखिम हैं।
एक जोखिम तो यह है कि यदि रोगजनक परजीवी वह चिंह बनाना बंद कर दे या उसे इतना बदल
दे कि वह उपलब्ध ग्राहियों द्वारा पहचान के काबिल न रहे, तो
प्रतिरक्षा तंत्र ऐसे संशोधित घुसपैठियों के प्रति अंधा हो जाएगा। यानी ये
प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा की जाने वाली ‘मिथ्या नकारात्मक’ चूक साबित होंगे। दूसरी
ओर,
कई बैक्टीरिया ऐसे हैं जो स्तनधारी शरीरों में, खास तौर से आंतों में या त्वचा पर, मज़े से सहयोगी ढंग से
रहते हैं। मान लीजिए ये सबके सब लिपोपोलीसेकराइड को सतह पर दर्शाएंगे, तो प्रतिरक्षा तंत्र इन सबको पहचान कर इनसे निपटने के लिए भारी उठापटक करेगा।
यह एक बेकार की मेहनत होगी क्योंकि ये कोई नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि कभी-कभी तो विटामिन वगैरह का निर्माण करके मददगार ही होते हैं। तो ये
प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा की गई ‘मिथ्या सकारात्मक’ चूकें होंगी और प्रतिरक्षा
तंत्र अहानिकर सहजीवियों के खिलाफ जंग छेड़ता रहेगा।
यदि परजीवियों के प्रवेश की संभावना कम है तो यह उम्मीद की जा सकती है कि ऐसे
ग्राहियों से युक्त थोड़ी-सी प्रतिरक्षा कोशिकाएं ठीक-ठाक काम कर पाएंगी। यह तब और
भी ज़्यादा कारगर होगा जब मेज़बान को पहले से मालूम हो कि कौन-से परजीवी अंदर घुसने
की कोशिश करने वाले हैं।
कुछ जंतु कमोबेश एक ही जगह पर टिके रहते हैं और उनके पर्यावरण में ज़्यादा
बदलाव नहीं होते,
उन्हें कुछ ही प्रकार के घुसपैठियों से निपटना पड़ता है। कुछ
जंतु ऐसे हैं जिनके शरीर पर कठोर कवच होते हैं और परजीवियों के लिए शरीर में प्रवेश
करना आसान नहीं होता। इन दोनों प्रकार के जंतुओं के लिए अपेक्षाकृत सरल प्रतिरक्षा
व्यवस्था पर्याप्त होगी। ऐसे जंतुओं में कीटों या घोंघों जैसे जंतुओं के उदाहरण दिए
जा सकते हैं। इनके लिए घुसपैठियों की पहचान का क्लोनल एकरूप मॉडल पर्याप्त है।
दरअसल,
ऐसे अधिकांश जंतुओं में प्रतिरक्षा व्यवस्था ऐसी ही
कोशिकाओं के भरोसे रहती है जो बैक्टीरिया जैसे कणों को निगल सकती हैं।
लेकिन दूर-दूर तक आवागमन करने वाले, मुलायम और संवेदनशील
त्वचा वाले जंतुओं (जैसे स्तनधारी) को काफी विविध प्रकार के और बड़ी संख्या में
परजीवियों का सामना करना होता है। ऐसी स्थिति में क्लोनल एकरूप मॉडल की सीमाएं
इन्हें परास्त कर देंगी।
तो,
स्तनधारी जीवों की प्रतिरक्षा व्यवस्था इन समस्याओं से कैसे
निपटती है?
एक अत्यंत परिवर्तनशील लक्ष्य-पहचान तंत्र ऐसे लचीले
परजीवियों से निपटने में कामयाब रहेगा। ऐसी व्यवस्था बनाने का एकमात्र तरीका यह है
कि हरेक कोशिका को इनमें से मात्र एक ग्राही प्रदान किया जाए ताकि वह किसी एक ही
लक्ष्य की पहचान कर सके – यह लक्ष्य पहचान का क्लोनल विविधता मॉडल है।
क्लोनल विविधता मॉडल
प्रतिरक्षा तंत्र की दृष्टि से इस मॉडल के कई फायदे हैं। पहला, प्रत्येक लक्ष्य प्रतिरक्षा तंत्र की कुछ कोशिकाओं को ही सक्रिय करेगा क्योंकि
हर कोशिका पर किसी एक लक्ष्य के लिए ग्राही है। इसके चलते काफी संसाधन व ऊर्जा की
बचत होगी।
लेकिन दिक्कत यह है कि यदि लाखों कोशिकाओं में से मात्र एक ही लक्ष्य का जवाब
देगी तो इससे ज़्यादा फायदा नहीं होगा। इस कोशिका को अपने जैसी और कोशिकाओं को इस
काम में लगाना होगा। लेकिन इस काम में वह आसपास पड़ी अन्य कोशिकाओं को तैनात नहीं
कर सकती क्योंकि उनके ग्राही तो काफी अलग लक्ष्यों के लिए बने हैं। इसलिए उस
कोशिका को विभाजन करके ढेर सारी कोशिकाएं बनानी होगी जो सब उस लक्ष्य के लिए
विशिष्ट होंगी। इसके चलते कोशिकाओं की संख्यावृद्धि प्रतिरक्षा तंत्र के जवाब का
बुनियादी हिस्सा है। संख्यावृद्धि पर आधारित इस व्यवस्था का फायदा यह है कि किसी
भी समय पर इतनी सारी कोशिकाओं को तैयार अवस्था में उपस्थित नहीं रहना होता क्योंकि
संख्यावृद्धि करते-करते वे तैयार भी होती जाती हैं।
यह प्रतिरक्षा तंत्र का एक और अनोखा पहलू है कि उसकी कोशिकाओं को लक्ष्य को
पहचानने या उसके खिलाफ कार्रवाई करने से पहले परिपक्व होने के एक चरण से गुज़रना
होता है। यही गुण इस तंत्र को अतीत में हुए संपर्कों को लक्ष्य-विशिष्ट ढंग से याद
रखने की क्षमता प्रदान करता है। यानी जब प्रतिरक्षा तंत्र किसी लक्ष्य को एक बार
देख ले तो उसे पहचानने वाली कोशिकाएं अधिक संख्या में संग्रहित हो जाती हैं। इसके
चलते अगली बार वही लक्ष्य सामने आने पर प्रतिक्रिया कहीं अधिक त्वरित होती है। यह
अनुकूलन की दृष्टि से फायदे का सौदा है क्योंकि इस बात की संभावना काफी अधिक होती
है कि वही परजीवी बार-बार कोशिश करेगा।
तो,
क्लोनल एकरूप और क्लोनल विविधता मॉडल के बीच एक अंतर यह है
कि एकरूप मॉडल में प्रतिरक्षा कोशिकाओं को लगातार सक्रिय अवस्था में रहना होता है
जबकि क्लोनल विविधता मॉडल में कोशिकाएं तब तक विश्राम अवस्था में पड़ी रह सकती हैं
जब तक कि उनसे सम्बद्ध लक्ष्य उन्हें चुनौती नहीं देता।
दूसरा अंतर यह है कि सारी क्लोनल एकरूप कोशिकाएं किसी भी चलती हुई कार्रवाई
में हिस्सा लेती हैं जबकि विविधता मॉडल में मात्र वही कोशिकाएं युद्धरत होती हैं
जो उस लक्ष्य से सम्बंधित ग्राही से लैस हों। इसका एक मतलब यह है कि क्लोनल एकरूप
कोशिकाएं आम तौर पर अतीत में हुए संपर्क को याद नहीं रखतीं क्योंकि उन्हें इससे
कोई फर्क नहीं पड़ता कि लक्ष्य कौन-सा है। दूसरी ओर, क्लोनल
विविधता वाली कोशिकाएं एक बार संपर्क हो जाने के बाद विश्राम अवस्था में भी
चौकन्नी रहती हैं ताकि अगले संपर्क के समय त्वरित प्रतिक्रिया दे सकें।
क्लोनल एकरूप पहचान व्यवस्था को जन्मजात या कुदरती (innate प्रतिरक्षा कहते हैं और इसमें
प्रतिरक्षा स्मृति की कोई गुंजाइश नहीं होती। दूसरी ओर क्लोनल विविधता आधारित
प्रणाली को अनुकूली (Adaptive) या अर्जित प्रतिरक्षा कहते हैं और यह स्मरण के गुण से लैस होती है। इसी गुण
की वजह से टीके यानी वैक्सीन बनाना संभव होता है।
ज़ाहिर है, क्लोनल विविधता आधारित पहचान प्रणाली की जटिलताएं कई व्यावहारिक दिक्कतों को जन्म देती है। अगली बार इन पर चर्चा करेंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://2rdnmg1qbg403gumla1v9i2h-wpengine.netdna-ssl.com/wp-content/uploads/sites/3/2016/11/immuneSystem-1190000241-770×553-1-650×428.jpg
हाल ही में ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ऐसे
अकाउंट्स को निलंबित या बंद कर दिया है जो नियमित रूप से कोविड-19 टीकों से जुड़ी
भ्रामक जानकारी फैला रहे थे। इसी तरह की एक पहल के तहत अमेरिकी वैज्ञानिकों ने
कोविड-19 टीके के बारे में भ्रामक जानकारियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।
कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है भ्रामक खबरों के परिणामस्वरूप अमेरिका की 20
प्रतिशत से अधिक जनसंख्या टीकाकरण के विरोध में है। शोधकर्ता सोशल मीडिया पर टीके
से सम्बंधित गलत सूचनाओं को ट्रैक करने और भ्रामक सूचनाओं, राजनैतिक
बयानबाज़ी और जन नीतियों से टीकाकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का डैटा एकत्र कर रहे
हैं। इन भ्रामक सूचनाओं में षड्यंत्र सिद्धांत काफी प्रचलित है जिसके अनुसार
महामारी को समाज पर नियंत्रण या अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने के लिए बनाया-फैलाया गया
है। यहां तक कहा जा रहा है कि टीका लगवाना जोखिम से भरा और अनावश्यक है।
इस संदर्भ में वायरेलिटी प्रोजेक्ट नामक समूह ट्विटर और फेसबुक जैसे
प्लेटफार्म द्वारा टीकों से जुड़ी गलत जानकारियों से निपटने के प्रयासों में तथा जन
स्वास्थ्य एजेंसियों और सोशल-मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन करने
वालों की पहचान करने में मदद कर रहा है।
स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी की अनुसंधान प्रबंधक रिनी डीरेस्टा के अनुसार
शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के संदर्भ में भ्रामक प्रचार के चलते सार्वजनिक नुकसान की
आशंका के कारण इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, सोशल
मीडिया कंपनियां सभी मामलों में तो सच-झूठ की पहरेदार नहीं बन सकती लेकिन नुकसान
की संभावना को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन अनिवार्य है।
फरवरी में ट्विटर, फेसबुक (इंस्टाग्राम समेत) ने झूठे दावों को
हटाने के प्रयासों को विस्तार दिया है। दोनों ही कंपनियों ने घोषणा की है कि झूठी
खबरें फैलाने वाली पोस्ट और ट्वीट को हटाया जाएगा और बार-बार नीतियों का उल्लंघन
करने वालों के अकाउंट्स बंद भी कर दिए जाएंगे।
यह देखा गया है कि वेब पर गलत जानकारी अपेक्षाकृत थोड़े-से लोगों
(सुपरस्प्रेडर्स) द्वारा फैलाई जाती है। इनमें अक्सर पक्षपाती मीडिया, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल होती हैं।
गौरतलब है कि कोविड-19 के बारे में लोगों की सोच का अनुमान लगाने के लिए
बोस्टन स्थित नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी, मेसाचुसेट्स के राजनीति
वैज्ञानिक डेविड लेज़र के नेतृत्व में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में प्रति माह
25,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और साथ ही ट्विटर का उपयोग करने
वाले 16 लाख लोगों की जानकारी भी एकत्रित की जा रही है।
फरवरी में लगभग 21 प्रतिशत लोगों ने टीकाकरण करवाने से इनकार किया। स्वास्थ्य कर्मियों में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत था। देखा गया कि इस फैसले के पीछे शिक्षा का स्तर एक मुख्य कारक रहा। टीम यह समझने का प्रयास कर रही है कि स्वास्थ्य सम्बंधी गलत जानकारी का सामना करने में कौन-सी चीज़ें प्रभावी हो सकती हैं। लगता है कि डॉक्टर और वैज्ञानिकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है जबकि पक्षपातपूर्ण राजनीतिक नेताओं के संदेशों पर विश्वास की संभावना कम होती है। ऐसे में डॉक्टर की सकारात्मक सलाह लोगों की पसंद को प्रभावित कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://ichef.bbci.co.uk/news/640/cpsprodpb/4132/production/_114909661_vaccine.png
अमेरिका में जे-एंड-जे टीके लगाने के बाद क्लॉटिंग के 6
मामले सामने आने के बाद यूएस सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और खाद्य व
औषधि प्रशासन ने जॉनसन एंड जॉनसन (जे-एंड-जे) द्वारा निर्मित कोविड-19 टीके के
उपयोग पर रोक लगाने की सिफारिश की है। इससे पूर्व युरोप में भी एस्ट्राज़ेनेका टीका
प्राप्त लोगों में ऐसे मामले सामने आए थे और टीकाकरण के प्रयासों को काफी नुकसान
हुआ था।
एफडीए कमिश्नर जेनेट वुडकॉक के अनुसार ये घटनाएं काफी बिरली हैं। टीकाकरण को
रोकने के पीछे का कारण वास्तव में स्वास्थ्य प्रणाली को ऐसे मामलों की पहचान करके
उपयुक्त इलाज के लिए तैयार करना है। इस बीच जे-एंड-जे ने युरोप में अपने टीके को
लंबित रखा है। युरोपियन मेडिसिंस एजेंसी (ईएमए) अमेरिका में टीकाकृत लोगों में
क्लॉटिंग के चार मामलों की जांच कर रही है। ड्यूक युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के
रुधिर रोग विशेषज्ञ गौतमी अरेपल्ली के अनुसार क्लॉटिंग के देखे गए मामले काफी
असामान्य हैं। इन मामलों में व्यक्ति के दिमाग की नसों में क्लॉटिंग और प्लेटलेट
की कमी देखी गई है। ऐसे में टीके पर अस्थायी रूप से रोक लगाना उचित ही है।
हालांकि,
छह सप्ताह पूर्व युरोप में एस्ट्राज़ेनेका टीके, वैक्सज़ेवरिया, के सम्बंध में इसी तरह की समस्या आने पर
ईएमए ने इसके उपयोग पर रोक लगाने का कोई सुझाव नहीं दिया। फिर भी कई अन्य देशों ने
कुछ समय के लिए इस पर रोक लगा दी है। कुछ देशों में वृद्ध समूह में इसका उपयोग
जारी रखा गया क्योंकि उनमें कोविड-19 का खतरा कहीं ज़्यादा है। कम प्लेटलेट के साथ
असामान्य क्लॉटिंग के मामले फाइज़र और मॉडर्ना द्वारा निर्मित संदेशवाहक आरएनए
आधारित टीकों में नहीं देखे गए हैं।
वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके दोनों ही संशोधित एडेनोवायरस पर आधारित हैं।
इसलिए शोधकर्ता इस तकनीक के दुष्प्रभावों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वैसे
एडेनोवायरस आधारित अन्य टीकों (रूस के स्पुतनिक वी और चीन के कैनसाइनो
बायोलॉजिक्स) में इस तरह के कोई मामले सामने नहीं आए हैं। वैसे इन टीकों पर उपलब्ध
डैटा कुछ सीमित है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन क्षेत्रों के नियामकों ने ऐसे
मामलों को खोजने के प्रयास किए भी हैं या नहीं। समस्या की जड़ तक पहुंचने के प्रयास
जारी हैं।
इस मामले में एफडीए से जुड़े पीटर माक्र्स इस परेशानी से सम्बंधित रोगियों के
उचित इलाज का सुझाव देते हैं। खास तौर से क्लॉटिंग की समस्या के लिए हेपरिन के
उपयोग से बचने की सलाह दी जा रही है क्योंकि टीका जनित क्लॉटिंग में हेपरिन का
उपयोग समस्या को और गंभीर बना सकता है।
अमेरिकी एजेंसियों द्वारा टीकाकरण पर रोक के कारण वैश्विक टीकाकरण की चिंताएं बढ़ गई हैं। अपेक्षाकृत आसान परिवहन और भंडारण तथा कम लागत के चलते वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। और तो और, जे-एंड-जे टीके की एक ही खुराक पर्याप्त होती है। इनके अभाव में कई देशों को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। वैसे वुडकॉक के अनुसार निलंबन थोड़े समय के लिए ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/J%26J_vaccine_1280x720.jpg?itok=hai03Jl_
कोविड महामारी के स्रोत का पता लगाने के प्रयास लगातार जारी
हैं। हाल ही में सीएनएन द्वारा प्रसारित साक्षात्कार में एक प्रमुख वैज्ञानिक
सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के पूर्व निदेशक और वायरोलॉजिस्ट रॉबर्ट रेडफील्ड ने बिना
किसी प्रमाण के दावा किया कि सार्स-कोव-2 वुहान की प्रयोगशाला से निकला है। साथ ही
उन्होंने कहा कि यह मात्र एक निजी राय है। इसके दो दिन बाद कुछ अन्य लोगों (डबल्यूएचओ
और चीन सरकार की टीम) ने वायरस के वन्यजीवों से फैलने की बात कही जिसकी शुरुआत
चमगादड़ों से हुई है। इसमें भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया गया।
गौरतलब है कि वुहान की प्रयोगशाला में किसी को भी ऐसा कोरोनावायरस नहीं मिला
है जिसे बदलकर ज़्यादा फैलने वाला बनाया गया हो और फिर उसने बदलते-बदलते
सार्स-कोव-2 जैसा रूप लेकर वहां किसी कर्मचारी को संक्रमित कर दिया हो। इसी तरह
किसी को जंगली जीवों में कोरोनावायरस के प्रमाण भी नहीं मिले हैं जो एक से दूसरे
जंतु में आगे बढ़ते-बढ़ते उत्परिवर्तित होकर सार्स-कोव-2 के समान हो गया हो और फिर
मनुष्यों में प्रवेश कर गया हो।
अभी तक ये दोनों ही विचार प्रमाण-विहीन हैं और दोनों ही संभव हैं।
फिर भी इन दोनों विचारों के सही होने की संभावना बराबर नहीं है। देखा जाए तो
प्रयोगशाला से वायरस के निकलने की कोई एक या शायद कुछ मुट्ठी भर घटनाएं हो सकती
हैं जबकि वन्यजीवों से वायरस के फैलने के अनेकों अवसर होंगे।
रेडफील्ड की अटकल है कि किसी भी वायरस के लिए इतने कम समय में जीवों से
मनुष्यों में प्रवेश करने की कुशलता हासिल करना बिना प्रयोगशाला के संभव नहीं है।
लेकिन एक बार में इतनी बड़ी छलांग बहुत बड़ी बात होगी। स्वयं रेडफील्ड ने कहा है कि
यह वायरस हमारी जानकारी में आने के कई महीनों पहले से प्रसारित हो रहा था। यानी
मनुष्यों तक पहुंचने से पहले एक लंबी अवधि रही होगी जो इस वायरस के वन्यजीवों से
फैलने का संकेत देती है।
वन्यजीवों से वायरस के फैलने का विचार इस बात पर टिका है कि चीन में करोड़ों
चमगादड़ हैं और उनका मनुष्यों समेत अन्य जीवों से खूब संपर्क होता है। अत:, वायरस के मनुष्यों में प्रवेश करने के कई मौके हो सकते हैं। मूल रूप में तो यह
वायरस मनुष्यों में खुद की प्रतिलिपि तैयार करने में अक्षम होता है। लेकिन मनुष्यों
को संक्रमित करने के पहले इसे विकसित होने के लाखों मौके मिले होंगे। गौरतलब है कि
चमगादड़ अक्सर कई जीवों जैसे पैंगोलिन, बैजर, सूअर,
एवं अन्य के संपर्क में आते हैं जिससे ये मौकापरस्त वायरस
इन प्रजातियों को आसानी से संक्रमित कर देते हैं। चमगादड़ कॉलोनियों में रहते हैं
इसलिए विभिन्न प्रकार के कोरोनावायरस के मिश्रण की संभावना होती है और उन्हें अपने
जींस को पुनर्मिश्रित करने का पूरा मौका मिलता है। यहां तक कि एक अकेले चमगादड़ में
भी विभिन्न कोरोनावायरस देखे गए हैं।
इन वायरसों को मेज़बानों के बीच छलांग लगाने के लिए कई महीनों का समय मिलता है।
इसी दौरान वे उत्परिवर्तित भी होते रहते हैं। एक बार मनुष्यों में प्रवेश करने पर
उन वायरस संस्करणों को वरीयता मिलती है जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करके अपनी
प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता रखते हैं। जल्द ही वे कोशिकाओं को इस स्तर तक
संक्रमित कर देते हैं कि लोग बीमार होने लगते हैं। तब जाकर एक नई बीमारी प्रकट
होती है। यह वही अवधि होती है जिसे रेडफील्ड ने माना है कि वायरस प्रसारित होता
रहा है।
वास्तव में हम कोरोनावायरस के विकास में यह घटनाक्रम देख भी रहे हैं। इसमें
काफी तेज़ी से उत्परिवर्तन हो रहे हैं (E484K और 501Y जैसे) जो वायरस को और अधिक संक्रामक बनाते हैं।
युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वायरोलॉजिस्ट एडम लौरिंग के अनुसार ये परिवर्तन
प्राकृतिक रूप से हो रहे हैं। जिसका कारण यह है कि वायरस को लाखों संक्रमित
व्यक्तियों में उत्परिवर्तन के लाखों अवसर मिल रहे हैं।
तो किसे सही माना जाए? रेडफील्ड की प्रयोगशाला से
रिसाव की परिकल्पना को जो मात्र एक संयोग पर निर्भर है? या फिर
वन्यजीवों से प्रसारित होने की परिकल्पना को जिसे लाखों अवसर मिल रहे हैं? हालांकि दोनों ही संभव हैं लेकिन एक की संभावना अधिक मालूम होती है। इसीलिए, अधिकांश वैज्ञानिकों को वन्यजीवों के माध्यम से इस वायरस के फैलने के आशंका
अधिक विश्वसनीय लगती है।
वायरस की उत्पत्ति का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी महामारी के शुरू होने की जानकारी मिल सकती है ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों को रोका जा सके। आज भी कई रोग पैदा करने वाले वायरस हमारे बीच मौजूद हैं जो महामारी का रूप ले सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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कई बार हम स्वयं से बातें करते हैं – या तो मन-ही-मन में या
बोलकर। कुछ लोग ऐसा नियमित रूप से करते हैं तो कई अन्य ऐसा करके काफी अच्छा महसूस
करते हैं। लेकिन क्या खुद से बात करना सामान्य है?
स्वयं से बात करने का काफी अध्ययन हुआ है। कई लोग इसे एक मानसिक स्वास्थ्य
समस्या के रूप में देखते हैं लेकिन ऐसे सेल्फ-टॉक या सेल्फ-डायरेक्टेड टॉक (स्वगत
संभाषण) को मनोवैज्ञानिक सामान्य और कुछ परिस्थितियों में फायदेमंद भी मानते हैं।
इस व्यवहार के व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत 1880 के दशक में हुई थी।
वैज्ञानिकों की विशेष दिलचस्पी यह जानने की थी कि लोग स्वयं से क्या बात करते हैं, क्यों और किस उद्देश्य से करते हैं। शोधकर्ताओं ने सेल्फ-टॉक को आंतरिक मतों
या धारणाओं की मौखिक अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है।
बच्चे अक्सर ऐसा करते हैं, और यह उनके भाषा के विकास, किसी कार्य में सक्रियता और प्रदर्शन को सुधारने का एक तरीका है। यह माता-पिता
के लिए चिंता का कारण नहीं होना चाहिए। और तो और, वयस्क
अवस्था में भी यह व्यवहार कोई समस्या नहीं है। यह फायदेमंद भी हो सकता है बशर्ते
कि कोई व्यक्ति मतिभ्रम जैसी मानसिक समस्या का अनुभव न करने लगे।
किसी कार्य के दौरान सेल्फ-टॉक से उस काम में नियंत्रण, एकाग्रता और प्रदर्शन में सुधार होता है और साथ ही समस्या-समाधान के कौशल में
भी बढ़ोतरी होती है। वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन में देखा गया कि कैसे
सेल्फ-टॉक किसी वस्तु की तलाश के कार्य को प्रभावित करता है। इस अध्ययन में पता
चला कि जब हम किसी गुम वस्तु या सुपर मार्केट में किसी विशेष उत्पाद की तलाश करते
हैं तब सेल्फ-टॉक मददगार होता है। खेलकूद में भी सेल्फ-टॉक काफी फायदेमंद साबित
होता है। सब कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है सेल्फ-टॉक किस प्रकार का है:
1. सकारात्मक: इससे व्यक्ति को सकारात्मक सोच के लिए प्रोत्साहन और शक्ति
मिलती है। इससे चिंता में कमी और एकाग्रता एवं ध्यान में सुधार हो सकता है।
2. नकारात्मक: आलोचनात्मक और हतोत्साहित करने वाला संवाद होता है।
3. तटस्थ: यह न तो सकारात्मक होता है, न
नकारात्मक। यह निर्देशात्मक होता है, न कि किसी विशेष विश्वास
या भावना को प्रोत्साहित करने के लिए।
लेकिन मुख्य सवाल है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को क्या फायदा होता है। शोधकर्ताओं
का निष्कर्ष है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को भावनाओं को नियमित और संसाधित करने में
मदद मिलती है। जैसे, क्रोध और घबराहट की स्थिति में सेल्फ-टॉक
से भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके अलावा 2014 में किए गए
अध्ययन से पता चला है कि दुश्चिंता से ग्रस्त लोगों के लिए सेल्फ-टॉक काफी
फायदेमंद होता है। तनावपूर्ण घटनाओं के बाद सेल्फ-टॉक से चिंता में भी कमी होती
है।
यदि सेल्फ-टॉक जीवन में खलल डालने लगे तो उसे कम करने के उपाय भी हैं। जैसे व्यक्ति सेल्फ-टॉक को एक डायरी में लिखने की आदत डाल ले तो इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। वैसे स्वयं की आलोचना और नकारात्मक सेल्फ-टॉक से मानसिक स्वास्थ्य के प्रभावित होने की आशंका भी होती है। कभी कभी सेल्फ-टॉक के साथ मतिभ्रम होना शीज़ोफ्रेनिया का द्योतक होता है। ऐसी परिस्थितियों में मनोचिकित्सक से परामर्श करना बेहतर होगा। कुल मिलाकर, स्वयं से बात करना एक सामान्य व्यवहार है जो किसी मानसिक समस्या का लक्षण नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
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युनीक्योर (uniQure) कंपनी ने स्पष्ट किया है कि हीमोफीलिया की जीन थेरेपी के
एक क्लीनिकल ट्रायल के दौरान एक मरीज़ में देखा गया लीवर कैंसर एडीनो-एसोसिएटेड
वायरस (एएवी) की वजह से नहीं हुआ है। गौरतलब है कि जीन थेरेपी में किसी जीन को
शरीर में पहुंचाने के लिए एएवी को वाहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
युनीक्योर कंपनी हीमोफीलिया के उपचार में जीन थेरेपी का क्लीनिकल परीक्षण कर
रही थी। इस परीक्षण के दौरान दिसंबर 2020 में एक मामला सामने आया जिसमें देखा गया
कि मरीज़ के लीवर में कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि सक्रिय हो गई। ऐसा माना गया कि यह
जीन थेरेपी में इस्तेमाल किए गए एएवी की वजह से हुआ है। लेकिन युनीक्योर द्वारा
मरीज़ की ट्यूमर कोशिकाओं का परीक्षण करने पर पाया गया गया कि एएवी के जीनोम के अंश
मरीज़ की मात्र 0.027 प्रतिशत कैंसर कोशिकाओं में बेतरतीब ढंग से मौजूद थे। यदि
एएवी ने कैंसर कोशिकाओं को उकसाया होता तो वायरल डीएनए कई सारी ट्यूमर कोशिकाओं
में दिखना चाहिए था, जैसा कि नहीं हुआ।
इसके अलावा अध्ययन में मरीज़ की ट्यूमर कोशिकाओं में कई ज्ञात कैंसर
उत्परिवर्तन भी दिखे। साथ ही मरीज़ लंबे समय से हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी के
संक्रमण से ग्रसित भी था जो लीवर कैंसर के जोखिम को बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं।
चिल्ड्रंस हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया के डेनिस सबेतीनो बताते हैं कि हीमोफीलिया
के उपचार के लिए जीन थेरेपी में उपयोग किया जाने वाला एएवी लीवर ट्यूमर के लिए
ज़िम्मेदार नहीं पाया जाना इस क्षेत्र में आगे के कार्यों के लिए सकारात्मक साबित
होगा।
युनीक्योर के साथ ही ब्लूबर्ड कंपनी ने भी अपने एक क्लीनिकल परीक्षण के दौरान सामने आए मामले को स्पष्ट किया है – सिकल सेल रोग के उपचार के लिए जीन थेरेपी में उपयोग किया जाने वाला वायरस, लेंटीवायरल वेक्टर, मरीज़ में ल्यूकेमिया का जोखिम नहीं बढ़ाता। गौरतलब है कि उपरोक्त मामलों के मद्देनज़र सिकल सेल और हीमोफीलिया, दोनों के उपचार में जीन थेरेपी के क्लीनिकल परीक्षण पर रोक लगा दी गई थी। इन नतीजों से अब दोनों कंपनियों को उम्मीद है कि अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन इन परीक्षणों पर लगी रोक को हटा लेगा। (स्रोत फीचर्स)
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कोरोनावायरस के उभरते संस्करणों को लेकर शंका जताई जा रही है
कि ये मूल वायरस से अधिक संक्रामक हो सकते हैं। लेकिन मानव-वायरस के इस खेल में
वैज्ञानिकों ने कुछ आशाजनक परिणाम देखे हैं।
कोविड से स्वस्थ हुए लोगों और टीकाकृत लोगों के खून की जांच से पता चला है कि
हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की कुछ कोशिकाओं – जो पूर्व में हुए संक्रमण को याद रखती
हैं – में बदलते वायरस के अनुसार बदलकर उनका मुकाबला करने की क्षमता विकसित हो
सकती है। इसका मतलब हुआ कि प्रतिरक्षा तंत्र नए संस्करणों से निपटने की दिशा में
विकसित हुआ है।
रॉकफेलर युनिवर्सिटी के प्रतिरक्षा विज्ञानी मिशेल नूसेनज़्वाइग के अनुसार
हमारा प्रतिरक्षा तंत्र मूलत: वायरस से आगे रहने का प्रयास कर रहा है। नूसेनज़्वाइग
का विचार है कि हमारा शरीर मूल प्रतिरक्षी कोशिकाओं के अलावा एंटीबॉडी बनाने वाली
कोशिकाओं की आरक्षित सेना भी तैयार रखता है। समय के साथ कुछ आरक्षित कोशिकाएं
उत्परिवर्तित होती हैं और ऐसी एंटीबॉडीज़ का उत्पादन करती हैं जो नए वायरल
संस्करणों की बखूबी पहचान कर लेती हैं। अभी यह देखना बाकी है कि क्या उत्परिवर्तित
सार्स-कोव-2 से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त आरक्षित कोशिकाएं और
एंटीबॉडीज़ उपलब्ध हैं या नहीं।
पिछले वर्ष अप्रैल माह के दौरान नूसेनज़्वाइग और उनके सहयोगियों को कोविड से
ठीक हुए लोगों के रक्त में पुन: संक्रमण और घटती हुई एंटीबॉडीज़ के संकेत मिले थे
जो चिंताजनक था। तो वे देखना चाहते थे वायरस के विरुद्ध प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा
जवाब देने की क्षमता कितने समय तक बनी रहती है।
इसलिए उन्होंने सार्स-कोव-2 की चपेट में आए लोगों के ठीक होने के एक महीने और
छह महीने बाद रक्त के नमूने एकत्रित किए। इस बार काफी सकारात्मक परिणाम मिले। बाद
की तारीखों में एकत्रित नमूनों में कम एंटीबॉडी पाई गई लेकिन यह अपेक्षित था
क्योंकि अब संक्रमण साफ हो चुका था। इसके अलावा कुछ लोगों में एंटीबॉडी उत्पन्न
करने वाली कोशिकाएं (स्मृति बी कोशिकाएं) समय के साथ स्थिर रही थीं या फिर बढ़ी हुई
थीं। संक्रमण के बाद ये कोशिकाएं लसिका ग्रंथियों में सुस्त पड़ी रहती हैं और इनमें
वायरस को पहचानने की क्षमता बनी रहती है। यदि कोई व्यक्ति दूसरी बार संक्रमित होता
है तो स्मृति बी कोशिकाएं सक्रिय होकर जल्द से जल्द एंटीबॉडीज़ उत्पन्न करती हैं जो
संक्रमण को रोक देती हैं।
आगे के परीक्षणों में वैज्ञानिकों ने आरक्षित बी कोशिकाओं के क्लोन तैयार किए
और उनकी एंटीबॉडी का परीक्षण किया। इस परीक्षण में सार्स-कोव-2 को नए संस्करण की
तरह तैयार किया गया था लेकिन इसमें संख्या-वृद्धि की क्षमता नहीं थी। इस वायरस के
स्पाइक प्रोटीन में कुछ उत्परिवर्तन भी किए गए थे। जब शोधकर्ताओं ने इस
उत्परिवर्तित वायरस के विरुद्ध आरक्षित कोशिकाओं का परीक्षण किया तो कुछ कोशिकाओं
द्वारा बनाई गई एंटीबॉडीज़ उत्परिवर्तित स्पाइक प्रोटीन से जाकर चिपक गर्इं। नेचर
में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एंटीबॉडीज़ समय के साथ परिवर्तित हुर्इं।
हाल ही में नूसेनज़्वाइग और उनकी टीम ने जेनेटिक रूप से परिवर्तित विभिन्न
वायरसों का 6 महीने पुरानी बी कोशिकाओं के साथ परीक्षण किया। प्रारंभिक अध्ययन से
पता चला है कि इन एंटीबॉडीज़ ने परिवर्तित संस्करणों को पहचानने और प्रतिक्रिया
देने की क्षमता दिखाई है। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं विकसित होती रहती हैं।
यह बात काफी दिलचस्प है कि जो कोशिकाएं थोड़ी अलग किस्म की एंटीबॉडी बनाती हैं
वे रोगजनकों पर हमला तो नहीं करतीं लेकिन फिर भी शरीर में बनी रहती हैं।
लेकिन क्या ये आरक्षित एंटीबॉडी पर्याप्त मात्रा में हैं और क्या वे नए वायरल
संस्करणों को बेअसर करके हमारी रक्षा करने में सक्षम हैं? फिलहाल
इस सवाल का जवाब दे पाना मुश्किल है। वैसे वाल्थम स्थित एडैजियो थेराप्यूटिक्स की
प्रतिरक्षा विज्ञानी लौरा वॉकर के साइंस इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन
के अनुसार करीब पांच महीने बाद एंटीबॉडी की वायरस को उदासीन करने की क्षमता में 10
गुना कमी देखी गई। लेकिन नूसेनज़्वाइग की टीम के समान वॉकर और उनकी टीम ने भी
स्मृति बी कोशिका की संख्या में निरंतर वृद्धि देखी।
वॉकर की टीम ने कई प्रकार की स्मृति बी कोशिकाओं के क्लोन बनाकर विभिन्न वायरस
संस्करणों के विरुद्ध उनकी एंटीबॉडी का परीक्षण किया। वॉकर के अनुसार कुछ नए
संस्करण एंटीबॉडीज़ से बच निकलने में सक्षम रहे जबकि 30 प्रतिशत एंटीबॉडीज़ नए वायरस
कणों से चिपकी रहीं। यानी बी कोशिकाओं द्वारा एंटीबॉडी उत्पादन बढ़ने से पहले ही
नया संक्रमण फैलना शुरू हो सकता है। लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी बी कोशिका इस
वायरस को कुछ हद तक रोक सकती है और गंभीर रोग से सुरक्षा प्रदान कर सकती है। लेकिन
इन एंटीबॉडी की पर्याप्तता पर अभी भी सवाल बना हुआ है। वॉकर का मानना है कि
एंटीबॉडी की कम मात्रा के बाद भी अस्पताल में दाखिले या मृत्यु जैसी संभावनाओं को
रोका जा सकता है।
वैसे गंभीर कोविड से बचाव के लिए सुरक्षा की एक और पंक्ति सहायक होती है जिसे
हम टी-कोशिका कहते हैं। ये कोशिकाएं रोगजनकों पर सीधे हमला नहीं करती हैं बल्कि एक
किस्म की टी-कोशिकाएं संक्रमित कोशिकाओं की तलाश करके उन्हें नष्ट कर देती हैं।
प्रतिरक्षा विज्ञानियों के अनुसार टी कोशिकाएं रोगजनकों की पहचान करने में सामान्य
तरीके को अपनाती हैं। ये बी कोशिकाओं की तरह स्पाइक-विशिष्ट आक्रमण के विपरीत, वायरस के कई अंशों पर हमला करती हैं जिससे अलग-अलग संस्करण के वायरस उन्हें
चकमा नहीं दे पाते हैं।
हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में प्रतिरक्षा विज्ञानियों ने सार्स-कोव-2 से
ग्रसित लोगों की टी-कोशिकाओं का परीक्षण किया। वायरस के विभिन्न संस्करणों के
खिलाफ टी-कोशिकाओं की प्रतिक्रिया कम नहीं हुई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार एक कमज़ोर
बी कोशिका प्रतिक्रिया के चलते वायरस को फैलने में मदद मिल सकती है लेकिन
टी-कोशिका वायरस को गंभीर रूप से फैलने से रोकने में सक्षम होती हैं।
आने वाले महीनों में, शोधकर्ता नव विकसित जीन अनुक्रमण उपकरणों और क्लोनिंग तकनीकों का उपयोग करके इन कोशिकाओं पर नज़र रखेंगे ताकि वायरस के विभिन्न संस्करणों और नए टीकों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया का पता लग सके। इन तकनीकों की मदद से प्रतिरक्षा विज्ञानियों को बड़ी जनसंख्या में व्यापक संक्रमण का अध्ययन और निगरानी करने की नई क्षमताएं मिलती रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.google.com/search?q=Your+Immune+System+Evolves+to+Fight+Coronavirus+Variants&source=lnms&tbm=isch&sa=X&ved=2ahUKEwj886-kwv_vAhUPeisKHTklAbQQ_AUoAXoECAEQAw&biw=1366&bih=625#imgrc=cjm9Wm6AR17nvM
भारत में लगभग सितंबर 2020 से कोविड मामलों में निरंतर गिरावट
से ऐसा माना जा रहा था कि अब महामारी का प्रभाव कम हो रहा है। लेकिन फरवरी माह के
मध्य में देशव्यापी मामलों की संख्या 11000 प्रतिदिन से बढ़कर मार्च के अंतिम
सप्ताह में 50,000 प्रतिदिन हो गई। इन बढ़ते मामलों से निपटने के लिए नए प्रतिबंधों
के साथ टीकाकरण अभियान भी चलाया जा रहा है लेकिन इसकी गति धीमी है।
एंटीबॉडी सर्वेक्षण का निष्कर्ष था कि दिल्ली और मुंबई जैसे घनी आबादी वाले
क्षेत्रों में लगभग झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त कर ली गई है। महामारी के जल्द अंत की
उम्मीद की जाने लगी थी लेकिन 700 ज़िलों में किए गए सर्वेक्षण में केवल 22 प्रतिशत
भारतीय ही वायरस के प्रभाव में आए हैं। इस दौरान कई नियंत्रण उपायों में काफी ढील
दी गई।
इस महामारी के दोबारा पनपने का कारण वायरस में उत्परिवर्तन बताया जा रहा है।
10,000 से अधिक नमूनों के जीनोम अनुक्रमण पर 736 में अधिक संक्रामक बी.1.1.7
संस्करण पाया गया है। यह संस्करण सबसे पहले यूके में पाया गया था। वर्तमान में
वैज्ञानिक अत्यधिक मामलों वाले ज़िलों में पाए गए दो उत्परिवर्तित संस्करणों का
अध्ययन कर रहे हैं – E484Q और L452L। ये दोनों उत्परिवर्तन प्रतिरक्षा प्रणाली से बच निकलने, एंटीबॉडी को चकमा देकर संक्रमण में वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार माने जा रहे हैं
लेकिन अभी स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि नए मामलों में वृद्धि इन संस्करणों के कारण
हुई है।
जलवायु की भूमिका को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार
जिस तरह युरोप और अमेरिका में लोग ठंड के मौसम में अधिकांश समय घरों में बिताते
हैं उसी तरह भारत के लोग गर्मियों में घरों के अंदर रहना पसंद करते हैं। बंद
परिवेश में वायरस अधिक तेज़ी से फैलता है।
टीकाकरण के मामले में 5 प्रतिशत से कम भारतीयों को कम से कम टीके की पहली
खुराक मिल पाई है। कोविशील्ड और कोवैक्सीन दोनों ही टीकों की दो खुराक आवश्यक है।
वर्तमान में प्रतिदिन 20 से 30 लाख टीके दिए जा रहे हैं जिसे बढ़ाने के निरंतर
प्रयास जारी हैं। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के महामारी विज्ञानी गिरिधर
बाबू के अनुसार सरकार को प्रतिदिन एक करोड़ टीके का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए
ताकि 30 करोड़ लोगों को जल्द से जल्द कवर किया जा सके।
हालांकि अधिकारियों के अनुसार टीकों की आपूर्ति कोई समस्या नहीं है लेकिन
रॉयटर के अनुसार भारत ने घरेलू मांग को पूरा करने के लिए एस्ट्राज़ेनेका टीके के
निर्यात पर रोक लगा दी है। भारत ने जनवरी से लेकर अब तक ‘टीका कूटनीति’ के तहत 80
देशों को 6 करोड़ खुराकों का निर्यात किया है। वैसे सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने
चेतावनी दी है कि अमेरिका द्वारा निर्यात पर अस्थायी रोक से टीके के लिए आवश्यक
कच्चे माल की कमी से टीका आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
देखा जाए तो टीका लगवाने वालों में मध्यम और उच्च वर्ग के लोगों की संख्या
अधिक है और निम्न वर्ग के लोगों की संख्या काफी कम है। इसका मुख्य कारण जागरूकता
में कमी और श्रमिकों द्वारा दिन भर के काम से समय न निकाल पाना हो सकता है।
हालांकि मुंबई की झुग्गी बस्तियों में टीकाकरण शिविर लगाए जा रहे हैं लेकिन
टीकाकरण के भय को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर समुदाय-आधारित कार्यक्रम चलाने की
ज़रूरत है। टीकाकरण के प्रति शंका का एक कारण कोवैक्सीन को जल्दबाज़ी में दी गई
मंज़ूरी भी है।
इसके अलावा परीक्षणों के दौरान सहमति के उल्लंघन के समाचार और अपर्याप्त
पारदर्शिता ने भी लोगों के आत्मविश्वास को डिगाया है। मार्च में 29 डॉक्टरों और
शोधकर्ताओं के एक समूह ने जनवरी में शुरू हुए टीकाकरण अभियान के बाद से 80 लोगों
के मरने की सूचना दी है। यह मान भी लिया जाए कि मौतें टीके के कारण नहीं हुई हैं
तो भी याचिकाकर्ताओं के अनुसार सरकार को इसकी जांच करके निष्कर्षों का खुलासा करना
चाहिए। भारत ने अभी तक कोविशील्ड के उपयोग को रोका नहीं है जबकि क्लॉटिंग के गंभीर
मामलों के चलते 20 युरोपीय देशों ने इसके उपयोग को रोक दिया है।
फिलहाल दूसरी लहर को रोकने के लिए कई राज्यों और शहरों में सामाजिक समारोहों
पर रोक और अस्थायी तालाबंदी लगाई गई है। इसके साथ ही परीक्षण और ट्रेसिंग की
प्रक्रिया को भी अपनाया जा रहा है। हरिद्वार में महाकुम्भ आयोजन में कई प्रतिबंध
लगाए गए हैं। देखना यह कि पालन कितना हो पाता है। यहां 30 लाख से ज़्यादा लोगों के
शामिल होने का अनुमान है।
एक बात तय है कि यह वायरस अभी भी मौजूद है और समय-समय पर नए संस्करणों के साथ हमें आश्चर्यचकित करता रहेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/mumbai_1280p.jpg?itok=sPh5mCRF
सदियों से आर्सेनिक (संखिया) का इस्तेमाल विष की तरह किया
जाता रहा है। खानपान में मिला देने पर इसके गंध-स्वाद पता नहीं चलते। पहचान की नई
विधियां आने से अब हत्याओं में इसका उपयोग तो कम हो गया है लेकिन प्राकृतिक रूप
में मौजूद आर्सेनिक अब भी मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बना हुआ है। आर्सेनिक से
लंबे समय तक संपर्क कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग जैसी
बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।
लोगों के शरीर में विषाक्त अकार्बनिक आर्सेनिक पहुंचने का प्रमुख स्रोत है
दूषित पेयजल। इसे नियंत्रित करने के काफी प्रयास किए जा रहे हैं और इस पर काफी शोध
भी चल रहे हैं। वैसे चावल व कुछ अन्य खाद्य पदार्थों में भी थोड़ी मात्रा में
आर्सेनिक पाया जाता है लेकिन मात्रा इतनी कम होती है कि इससे लोगों के स्वास्थ्य
को खतरा बहुत कम होता है। इसके अलावा सीफूड में भी अन्य रूप में आर्सेनिक पाया
जाता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए इतना घातक नहीं होता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल में आर्सेनिक का अधिकतम सुरक्षित स्तर 10 पार्ट्स
प्रति बिलियन (पीपीबी) माना है। और वर्तमान में दुनिया के लगभग 14 करोड़ लोग नियमित
रूप से इससे अधिक आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं।
वर्ष 2006 में, शोधकर्ताओं ने बताया था कि भ्रूण और नवजात
शिशुओं के शरीर में आर्सेनिक संदूषित पानी पहुंचने से आगे जाकर उनकी फेफड़ों के
कैंसर से मरने की संभावना छह गुना अधिक थी। इसे समझने के लिए जीव विज्ञानी रेबेका
फ्राय ने दक्षिणी बैंकाक के एक पूर्व खनन क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं और उनके
बच्चों पर अध्ययन कर मानव कोशिकाओं और जीन्स पर होने वाले आर्सेनिक के प्रभावों की
गहराई से पड़ताल की। इसके बाद 2008 में उनकी टीम ने भ्रूण विकास में आर्सेनिक के
प्रभाव को समझा।
वे बताती हैं कि आर्सेनिक प्रभावित लोगों की सबसे अधिक संख्या भारत के पश्चिम
बंगाल के इलाकों और बांग्लादेश में है। बांग्लादेश के लगभग 40 प्रतिशत पानी के
नमूनों में 50 पीपीबी से अधिक और 5 प्रतिशत नमूनों में 500 पीपीबी से अधिक
आर्सेनिक पाया गया है। इसी तरह यूएस में उत्तरी कैरोलिना से प्राप्त कुल नमूनों
में से 1400 में आर्सेनिक का स्तर 800 पीपीबी था। संभावना यह है कि वैज्ञानिक 100
पीपीबी से अधिक स्तर वाले अधिकांश स्थानों के बारे में तो जानते हैं क्योंकि यहां
प्रभावित लोगों में त्वचा के घाव दिखते हैं, लेकिन
इससे कम स्तर वाले आर्सेनिक दूषित कई स्थान अज्ञात हैं।
दरअसल अपरदन के माध्यम से चट्टानों में मौजूद खनिज मिट्टी में आर्सेनिक छोड़ते
रहते हैं। फिर मिट्टी से यह भूजल में चला जाता है। इस तरह की भूगर्भीय प्रक्रियाएं
भारत,
बांग्लादेश और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अधिकांश देशों
में आर्सेनिक दूषित पेयजल का मुख्य कारण हैं। मानव गतिविधियां, जैसे खनन और भूतापीय ऊष्मा उत्पादन, आर्सेनिक के पेयजल में
मिलने की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। इसका एक उदाहरण है कोयला जलने के बाद उसकी बची हुई
राख,
जिसमें आर्सेनिक व अन्य विषाक्त पदार्थ होते हैं।
शरीर में आर्सेनिक को अन्य यौगिकों में बदलने का काम मुख्यत: एक एंज़ाइम
आर्सेनाइट मिथाइलट्रांसफरेस द्वारा अधिकांशत: लिवर में किया जाता है। इसके
परिणामस्वरूप मोनोमिथाइलेटेड (MMA) और डाइमिथाइलेटेड (DMA) आर्सेनिक बनता है। अपरिवर्तित आर्सेनिक, MMA और DMA मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं। लेकिन आर्सेनिक के इन तीनों रूपों
का स्वास्थ्य पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। अधिकतर लोगों के मूत्र में MMA की तुलना में DMA की मात्रा अधिक होती है।
आर्सेनिक के इन दोनों रूपों का अनुपात कई बातों पर निर्भर होता है। आर्सेनिक से
हाल में हुए संपर्क की पड़ताल पेशाब के नमूनों के ज़रिए हो जाती है। नाखूनों में
इनकी उपस्थिति अत्यधिक आर्सेनिक संदूषण दर्शाती है। और अंदेशा है कि मां के मूत्र
और गर्भनाल के ज़रिए भी भ्रूण का आर्सेनिक से प्रसव-पूर्व संपर्क हो सकता है।
शरीर में MMA और DMA के अनुपात पर निर्भर होता है कि आर्सेनिक मानव स्वास्थ्य
को किस तरह प्रभावित करेगा। यदि मूत्र में MMA का स्तर अधिक है तो यह विभिन्न तरह के कैंसर का खतरा बढ़ाता
है। इसमें फेफड़े,
मूत्राशय और त्वचा के कैंसर होने का खतरा सबसे अधिक होता
है। वहीं यदि मूत्र में DMA का स्तर अधिक है तो यह मधुमेह की आशंका को बढ़ाता है। इन जोखिमों की तीव्रता
क्षेत्र के पेयजल में आर्सेनिक के स्तर और व्यक्ति के शरीर में आर्सेनिक को
संसाधित करने के तरीके पर निर्भर होती है। अलग-अलग असर को देखते हुए एक बात तो तय
है कि हमें अभी इस बारे में काफी कुछ जानना है कि आर्सेनिक और उससे बने पदार्थ
विभिन्न कोशिकाओं और ऊतकों को किस तरह प्रभावित करते हैं।
चूंकि आर्सेनिक गर्भनाल को पार कर जाता है, इसलिए
भ्रूण का स्वास्थ्य भी चिंता का विषय है। कुछ अध्ययनों में देखा गया है कि
प्रसव-पूर्व और शैशव अवस्था में आर्सेनिक का संपर्क मस्तिष्क विकास को प्रभावित
करता है। मेक्सिको में किए गए अध्ययन में पाया गया कि जन्म के पूर्व आर्सेनिक से
संपर्क के चलते शिशु का वज़न कम रहता है। अन्य अध्ययनों से पता है कि जन्म के समय
कम वज़न आगे जाकर उच्च रक्तचाप, गुर्दों की बीमारी और मधुमेह
का खतरा बढ़ाता है।
वास्तव में किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य को आर्सेनिक से कितना खतरा है यह
आर्सेनिक की मात्रा और व्यक्ति की आनुवंशिकी, दोनों
पर निर्भर करता है। आर्सेनिक को परिवर्तित करने वाले एंज़ाइम का प्रमुख जीन AS3MT है। इस जीन के कई संस्करण पाए
जाते हैं,
जिनसे उत्पन्न एंज़ाइम की कुशलता अलग-अलग होती है। आर्सेनिक
का तेज़ी से रूपांतरण हो, तो मूत्र में MMA की कम और DMA की अधिक मात्रा आती है।
आर्सेनिक का प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमारे जीन किस तरह व्यवहार
करते हैं। हमारे शरीर में 2000 से अधिक प्रकार के माइक्रोआरएनए (miRNA) होते हैं। miRNA डीएनए अनुक्रमों द्वारा बने
छोटे अणु हैं जो प्रोटीन के कोड नहीं होते हैं। प्रत्येक miRNA सैकड़ों संदेशवाहक आरएनए (mRNA) अणुओं से जुड़कर प्रोटीन निर्माण को बाधित कर सकता है। और mRNA के ज़रिए जीन की अभिव्यक्ति
होती है। आर्सेनिक miRNA की
गतिविधि को संशोधित कर, जीन अभिव्यक्ति को बदल सकता है।
यह दिलचस्प है कि अतीत में हुए आर्सेनिक संपर्क का असर AS3MT जीन पर नज़र आता है। जैसे, अर्जेंटीना के एंडीज़ क्षेत्र के एक छोटे से इलाके के निवासी हज़ारों वर्षों से
अत्यधिक आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं। सामान्यत: उनमें कैंसर और असमय मृत्यु का
प्रकोप अधिक होना चाहिए। लेकिन प्राकृतिक चयन के माध्यम से ये लोग उच्च-आर्सेनिक
के साथ जीने के लिए अनुकूलित हो गए हैं।
आर्सेनिक के असर की क्रियाविधि काफी जटिल है, और यह
कोशिका के प्रकार पर निर्भर करता है। अलबत्ता, मुख्य
बात हमारे शरीर में जीन के अभिव्यक्त होने या न होने की है।
यदि यह हमारे डीएनए की मरम्मत करने वाले जीन को बंद कर देगा या ट्यूमर
कोशिकाओं की वृद्धि होने देगा तो परिणाम कैंसर के रूप में सामने आएगा। यदि यह उन
जीन्स को बाधित कर देगा जो अग्न्याशय में इंसुलिन स्रावित करवाते हैं या अन्य
कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया देने में मदद करते हैं तो परिणाम मधुमेह
के रूप में दिखेगा। इस तरह डीएनए अनुक्रम को बदले बिना जीन अभिव्यक्ति को बदलने की
क्रिया को एपिजेनेटिक्स कहते हैं।
एक एपिजेनेटिक तंत्र में miRNA की भूमिका होती है। अध्ययनों में देखा गया है कि आर्सेनिक miRNA की गतिविधि को प्रभावित कर
सकता है।
एक और एपिजेनेटिक विधि है डीएनए मिथाइलेशन। किसी विशिष्ट डीएनए अनुक्रम में
मिथाइल समूह के जुड़ने पर आर्सेनिक की भूमिका हो सकती है। जिससे जीन अभिव्यक्ति कम
हो सकती है या बाधित हो सकती है।
KCNQ1 जीन
एक दिलचस्प उदाहरण है। आम तौर पर हमारे माता-पिता दोनों से मिली जीन प्रतियां
हमारी कोशिकाओं में व्यक्त हो सकती हैं। लेकिन KCNQ1 उन चुनिंदा जीन्स में से है
जिनकी अभिव्यक्ति इस बात से तय होती है कि वह मां से आया है या पिता से। दूसरी
प्रति गर्भावस्था में ही मिथाइलेशन द्वारा बंद कर दी जाती है।
मेक्सिको में हुए अध्ययन में देखा गया कि प्रसव-पूर्व आर्सेनिक-संपर्क अधिक KCNQ1
मिथाइलेशन और निम्न जीन अभिव्यक्ति से जुड़ा है। KCNQ1 भ्रूण के विकास में
महत्वपूर्ण है। यही जीन अग्न्याशय में इंसुलिन स्रावित करने के लिए भी ज़िम्मेदार
है। यानी इस जीन की अभिव्यक्ति में कमी रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ा सकती है।
आर्सेनिक के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की दिशा में जल उपचार, पोषण और आनुवंशिक हस्तक्षेप सम्बंधी अध्ययन किए जा रहे हैं।
उत्तरी कैरोलिना के अध्ययनों में देखा गया कि नलों में कम लागत का फिल्टर
लगाकर पानी में आर्सेनिक का स्तर कम किया जा सकता है। लेकिन समस्या यह है कि यह
धीमी गति से फिल्टर करता है। अन्य शोधकर्ता यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि
कितनी गहराई के नलकूपों में आर्सेनिक की मात्रा कम होती है। इससे नलकूप खनन के लिए
नए दिशानिर्देश बनाने में मदद मिलेगी।
पोषण सम्बंधी कारकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। जैसे, 2006 में बांग्लादेश में किए गए एक परीक्षण में पता चला था कि फोलिक एसिड की
खुराक वयस्कों में आर्सेनिक विषाक्तता के असर को कम करती है। आंत का सूक्ष्मजीव
संसार भी इस विषाक्तता को कम करने में मदद कर सकता है। देखा गया है कि चूहों की
आंत में मौजूद सूक्ष्मजीव लगभग संपूर्ण आर्सेनिक को DMA में बदल देते हैं। अधिक DMA यानी कैंसर के जोखिम में कमी। यह अध्ययन भी जारी है कि
क्या पोषण की मदद से मानव आंत के सूक्ष्मजीव आर्सेनिक विषाक्तता को कम कर सकते
हैं।
जहां तक जेनेटिक हस्तक्षेप का सवाल है, तो यह
तो पता था कि चूहे बड़ी कुशलता से संपूर्ण आर्सेनिक को DMA में परिवर्तित कर लेते हैं, लेकिन
यह स्पष्ट नहीं था कि ये परिणाम मनुष्यों के संदर्भ में कितने कारगर होंगे। इस
संदर्भ में शोधकर्ताओं के एक दल ने एक नया माउस स्ट्रेन विकसित किया जिसमें AS3MT जीन का मानव संस्करण मौजूद
था। ऐसा करने पर उन्हें चूहों के मूत्र में भी मनुष्यों की तरह DMA और MMA का स्तर मिला। एक अन्य दल miRNA के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है।
उम्मीद है कि विभिन्न रणनीतियों को अपना कर दुनिया भर में आर्सेनिक की विषाक्तता को कम करने के उपाय ढूंढने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/assets/Image/2021/G-dna-methylation-alt.png