कैंसर कोशिकाओं से लड़ने की नई रणनीति

शोधकर्ता कैंसर कोशिकाओं की निशानदेही करने के तरीके ईजाद करने में लगे हैं। कैंसर के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय या शुरू करने वाली दवाइयां इसमें काफी प्रभावी हो सकती हैं, लेकिन वे उन ट्यूमर पर सबसे अच्छा काम करती हैं जिनमें सबसे अधिक उत्परिवर्तन होते हैं। इसी तथ्य के आधार पर कैंसर उपचार का एक विवादास्पद समाधान सामने आया है: कीमोथेरेपी की मदद से जानबूझकर ट्यूमर में और उत्परिवर्तन कराए जाएं और इस तरह ट्यूमर को प्रतिरक्षा प्रणाली के हमले के प्रति अधिक संवेदी बनाया जाए।

पूर्व में प्रयोगशाला अध्ययनों और छोटे स्तर पर किए गए क्लीनिकल परीक्षणों में देखा गया है कि यह रणनीति मददगार हो सकती है। लेकिन कुछ कैंसर शोधकर्ता ऐसे सोद्देश्य उत्परिवर्तन करवाने को लेकर आशंकित हैं। उनका कहना है कि जानवरों पर हुए कई अध्ययनों से पता चलता है कि ऐसा करने से फायदे के बजाय नुकसान हो सकता है।

देखा गया है कि कुछ दवाइयां (चेकपॉइंट अवरोधक) उस आणविक अवरोधक को हटा देती हैं जो टी कोशिका (एक किस्म की प्रतिरक्षा कोशिका) को ट्यूमर पर हमला करने से रोकते हैं। ये दवाइयां धूम्रपान की वजह से हुए फेफड़ों के कैंसर और मेलेनोमा (एक तरह का त्वचा कैंसर) जैसे कैंसर पर सबसे अच्छी तरह काम करती हैं। ये कैंसर पराबैंगनी  प्रकाश के प्रभाव से पैदा होने वाले उत्परिवर्तनों को संचित करते रहते हैं। इनमें से कई जेनेटिक परिवर्तन कोशिकाओं को नव-एंटीजन बनाने को उकसाते हैं (नव-एंटीजन ट्यूमर कोशिकाओं पर नए प्रोटीन चिन्ह होते हैं) जो टी कोशिकाओं को ट्यूमर कोशिका को पहचानने में मदद करते हैं।

कैंसर कोशिकाओं को अधिक नव-एंटीजन बनाने को मजबूर करने से इम्यूनोथेरेपी में मदद मिल सकती है, इस विचार की जड़ें ऐसे ट्यूमर के अध्ययन में है जिनमें डीएनए की मरम्मत करने वाले तंत्रों में गड़बड़ी होती है। देखा गया कि ये कैंसर कोशिकाएं कई उत्परिवर्तन जमा करती जाती हैं। वर्ष 2015 में जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय (अब मेमोरियल स्लोअन केटरिंग कैंसर सेंटर में हैं) के लुइस डियाज़ ने बताया था कि चेकपॉइंट औषधियां ऐसे कई ट्यूमर्स पर काफी कारगर हैं जिनमें ‘बेमेल’ डीएनए मरम्मत तंत्र में गड़बड़ी होती है।

ट्यूरिनो विश्वविद्यालय के कैंसर आनुवंशिकीविद अल्बर्टो बार्डेली और साथियों ने ट्यूमर-ग्रस्त चूहों में मरम्मत करने वाले जीन को निष्क्रिय करके देखा। नेचर (2017) में उन्होंने बताया था कि इस जीन को निष्क्रिय करने से कैंसर कोशिकाओं के डीएनए में ज़्यादा त्रुटियां होने लगीं और चेकपॉइंट अवरोधकों की प्रभाविता में वृद्धि हुई।

उसके बाद मनुष्यों पर हुए दो और परीक्षणों में इसी तरह के प्रभाव देखे गए। एक अध्ययन में आंत के कैंसर पर काम किया गया। इसमें बहुत कम उत्परिवर्तन होते हैं, और इसलिए यह चेकपॉइंट अवरोधक दवाओं के प्रति संवेदी नहीं होता। इस तरह के कैंसर से पीड़ित 33 लोगों को कीमोथेरेपी की मानक औषधि टेमोज़ोलोमाइड दी गई। यह दवा विकृत या परिवर्तित जीन की मरम्मत नहीं होने देती। पाया गया कि सिर्फ कीमोथेरेपी करने से आठ लोगों का ट्यूमर कम हो गया था, लेकिन कीमोथेरेपी के बाद अन्य सात लोगों का ट्यूमर चेकपॉइंट अवरोधक दिए जाने के बाद कम हुआ। शोधकर्ताओं ने जर्नल ऑफ क्लीनिकल ओन्कोलॉजी में बताया था कि सभी लोगों में ट्यूमर की वृद्धि औसतन 7 महीने तक रुकी रही।

एक अन्य अध्ययन में देखा गया कि 16 में से 14 रोगियों और चार अन्य रोगियों, जिनके ट्यूमर की बायोप्सी का विश्लेषण किया गया था, में टेमोज़ोलोमाइड ने उत्परिवर्तन को प्रेरित किया था।

डियाज़ की दिलचस्पी यह जानने में थी कि क्या ट्यूमर में कोई खास उत्परिवर्तन करवाने से और भी बेहतर असर होता है। खास तौर से उनकी टीम की दिलचस्पी ऐसे उत्परिवर्तन में थी जो किसी कोशिका प्रोटीन निर्माण मशीनरी द्वारा मैसेंजर आरएनए (mRNA) के पढ़ने/समझने में बदलाव कर दे। इस तरह का उत्परिवर्तन सम्बंधित प्रोटीन के कई अमीनो एसिड्स को बदल सकता है, जो उसे प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए और अधिक पराया बना देता है।

डियाज़ और उनके साथियों ने कैंसर कोशिकाओं पर टेमोज़ोलोमाइड के साथ एक अन्य कीमोथेरेपी दवा सिसप्लैटिन का परीक्षण किया और पाया कि दोनों में से एक ही दवा देने की तुलना में इन दोनों दवाओं के मिले-जुले उपयोग ने हज़ार गुना अधिक उत्परिवर्तन किए। जब इन दोनों दवाओं के संयोजन से उपचारित कैंसर कोशिकाओं को चूहों में प्रविष्ट कराया गया तो चेकपाइंट दवा देने के बाद परिणामी ट्यूमर गायब हो गया।

शोधकर्ता अब आंत के मेटास्टेटिक ट्यूमर से पीड़ित लोगों को चेकपॉइंट दवा देने के पहले टेमोज़ोलोमाइड और सिसप्लैटिन का मिश्रण दे रहे हैं। पहले 10 रोगियों में से दो रोगियों के रक्त में ट्यूमर कोशिका द्वारा स्रावित डीएनए में अपेक्षाकृत अधिक उत्पर्वतन दिखे और ट्यूमर बढ़ना बंद हो गया। नतीजे शुरुआती हैं लेकिन परिणाम आशाजनक लगते हैं।

फिर भी, जोखिम तो हो ही सकता है: कीमोथेरेपी दवाएं रोगी की स्वस्थ कोशिकाओं में भी उत्परिवर्तन पैदा कर सकती हैं। वैसे शोधकर्ताओं का कहना है कि इस दवा से उपचारित करने के बाद चूहों में ऐसा नहीं हुआ।

कुछ शोधकर्ताओं को चिंता है कि यह तरीका उल्टा भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि विविध कोशिकाओं से बने ट्यूमर की तुलना में एकदम एक-समान या चंद हू-ब-हू कोशिकाओं (क्लोन) से बने ट्यूमर चेकपॉइंट अवरोधक दवाओं के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं। डर है कि अधिक उत्परिवर्तन ट्यूमर में नए क्लोन बनाएंगे और टी कोशिकाओं के प्रभाव को कम कर देंगे। 2019 में हुए एक अध्ययन में देखा गया था कि चूहों के मेलेनोमा ट्यूमर में अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश की मदद से उत्परिवर्तन करने पर कैंसर कोशिकाओं की विविधता में वृद्धि ने चेकपॉइंट अवरोधकों की प्रतिक्रिया में बाधा उत्पन्न की थी।

इस पर बार्डली का कहना है कि अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश से हुए उत्परिवर्तन टेमोज़ोलोमाइड से हुए उत्परिवर्तन की तुलना में प्रतिरक्षा तंत्र को कम उकसाते हैं। और शोधकर्ताओं का तर्क है कि दो औषधियों का मिश्रण देने से नव-एंटीजन की संख्या काफी अधिक होगी जो ट्यूमर की आनुवंशिक विविधता के असर को कम कर देगी।

बहरहाल, बार्डली और डियाज़ की तैयारी कैंसर औषधि निर्माण की है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत में निर्मित कोवैक्सीन के निर्यात पर रोक

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने भारत में विकसित कोवैक्सीन टीके के निर्माण को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं। मार्च में किए गए निरीक्षण में डबल्यूएचओ को भारत बायोटेक की टीका उत्पादन सुविधा में कुछ समस्याएं देखने को मिली थीं। विस्तार से कोई जानकारी तो नहीं मिली है लेकिन डबल्यूएचओ के अनुसार भारत बायोटेक कोवैक्सीन के निर्यात पर अस्थायी रोक लगाकर सुधारात्मक कार्य योजना तैयार करने को राज़ी हो गया है।

इस निर्णय के बाद यूनिसेफ के माध्यम से अन्य देशों को मिलने वाले टीकों की आपूर्ति में कमी आने की संभावना है। अन्य देशों को भी अन्य उत्पादों का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। भारत बायोटेक का कहना है कि रख-रखाव और उत्पादन सुविधाओं में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। कंपनी के प्रवक्ता के अनुसार भारत में टीके की बिक्री जारी रहेगी। कुछ वैज्ञानिकों ने भारत की दवा नियामक एजेंसी केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।  

कोवैक्सीन टीका निष्क्रिय वायरस से तैयार किया गया है। टीके के तीसरे चरण के परीक्षण से पहले ही जनवरी 2021 में सीडीएससीओ ने कोवैक्सीन को आपात उपयोग की अनुमति दी थी। इसके चलते कमज़ोर नियामक मानकों का आरोप भी लगा था। जुलाई 2021 में तीसरे चरण के परीक्षण से पता चला कि कोवैक्सीन की प्रभाविता अन्य टीकों के लगभग बराबर (77.8 प्रतिशत) थी।   

इससे पहले मार्च 2021 में ब्राज़ीलियन हेल्थ रेगुलेटरी एजेंसी ने कोवैक्सीन के निर्माण में अच्छी उत्पादन प्रथाओं (जीएमपी) यानी उत्पादन इकाई में सुरक्षा, प्रभाविता और गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नियमों के पालन में ढिलाई देखी थी। इसके चलते टीके में जीवित वायरस के होने की संभावना बढ़ जाती है। ब्राज़ील ने अस्थायी रूप से टीके का आयात निलंबित कर दिया था और जुलाई 2021 में इस सौदे को पूरी तरह खत्म कर दिया गया।         

बाद में भारत बायोटेक ने इन कमियों को दूर किया और नवंबर 2021 डबल्यूएचओ द्वारा इसे आपात उपयोग की सूची में शामिल किया गया। इस सूची का उद्देश्य कम और मध्यम आय वाले देशों को टीका उपलब्ध कराना और सदस्य देशों को टीकों का चुनाव करने में मदद करना है। अब एक बार फिर जीएमपी सम्बंधित कमियां देखने को मिली हैं। सूची में शामिल होने के बाद कंपनी ने अपनी निर्माण प्रक्रिया में बदलाव किया था और इस बात की सूचना सीडीएससीओ और डबल्यूएचओ को नहीं दी थी, जो अनिवार्य है।

एम-आरएनए टीकों के विपरीत इन टीकों को कम तापमान पर रखने की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए गरीब देशों के लिए इनका उपयोग काफी आसान है।          

उपरोक्त विसंगतियां दर्शाती है कि डब्ल्यूएचओ और सीडीसीएसओ के मानक अलग-अलग है। उक्त विसंगतियों को दूर करना ज़रूरी है। इससे टीका लेने में झिझक कम होगी और यह भारतीय उद्योग की विश्वसनीयता और लोगों के स्वास्थ्य दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड से मधुमेह के जोखिम में वृद्धि

हाल ही में दो लाख लोगों पर किए गए एक व्यापक अध्ययन से पता चला है कि सार्स-कोव-2 से संक्रमित लोगों में मधुमेह का जोखिम काफी बढ़ जाता है। दी लैंसेट डायबिटीज़ एंड एंडोक्रायनोलॉजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार मधुमेह का जोखिम कोविड-19 से संक्रमित होने के कई महीनों बाद विकसित हो सकता है।

मिसौरी स्थित सेंट लुइस हेल्थकेयर सिस्टम के वेटरन्स अफेयर्स (वीए) के शोधकर्ता ज़ियाद अल-अली और उनके सहयोगी यान ज़ी ने 1,80,000 से अधिक ऐसे लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड का अध्ययन किया जो कोविड-19 से पीड़ित होने के बाद कम से कम एक महीने से अधिक समय तक जीवित रहे थे। इसके बाद उन्होंने इन रिकॉर्ड्स की तुलना दो समूहों (तुलना समूहों) से की जिनमें प्रत्येक समूह में सार्स-कोव-2 से असंक्रमित लगभग 40-40 लाख लोग शामिल थे। ये वे लोग थे जिन्होंने या तो महामारी के पहले या फिर महामारी के दौरान बुज़ुर्ग स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का उपयोग किया था। इस नए विश्लेषण के अनुसार तुलना समूह के वृद्ध लोगों की तुलना में संक्रमित लोगों में एक वर्ष बाद तक मधुमेह विकसित होने की संभावना लगभग 40 प्रतिशत अधिक थी। लगभग सभी मामलों में टाइप-2 मधुमेह पाया गया जिसमें शरीर या तो इंसुलिन के प्रति संवेदी नहीं रहता या पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता।

जिन लोगों में संक्रमण हल्का था और पूर्व में मधुमेह का कोई जोखिम नहीं था उनमें भी मधुमेह विकसित होने की संभावना बढ़ गई थी लेकिन रोग की बढ़ती गंभीरता के साथ मधुमेह विकसित होने की संभावना भी अधिक होती है। अस्पताल या आईसीयू में भर्ती लोगों में तो मधुमेह का जोखिम तीन गुना अधिक पाया गया। मोटापे और टाइप-2 मधुमेह के जोखिम वाले लोगों में संक्रमण के बाद मधुमेह विकसित होने का जोखिम दुगने से अधिक हो गया।

देखा जाए तो कोविड-19 से पीड़ित लोगों की बड़ी संख्या (विश्व में 48 करोड़) के चलते मधुमेह के जोखिम में मामूली-सी वृद्धि से भी मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हो सकती है।

वैसे ज़रूरी नहीं कि ये निष्कर्ष अन्य समूहों पर भी लागू हों। जैसे, युनिवर्सिटी ऑफ वोलोन्गोंग (ऑस्ट्रेलिया) के महामारी विज्ञानी गीडियोन मेयेरोविट्ज़-काट्ज़ के अनुसार इस अध्ययन में शामिल किए गए अमरीकियों में अधिकांश वृद्ध, श्वेत पुरुष थे जिनका रक्तचाप अधिक था और वज़न भी अधिक था जिसके कारण उनमें मधुमेह का खतरा भी अधिक था।

फिलहाल यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि मधुमेह के बढ़े हुए जोखिम का कारण सार्स-कोव-2 संक्रमण ही है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 से उबरने वाले लोगों में मधुमेह में वृद्धि के अन्य कारक भी हो सकते हैं। जैसे, संभव है कि जब तक लोगों ने कोविड-19 के लिए स्वास्थ्य सेवा की मांग न की हो तब तक उनमें मधुमेह की उपस्थिति का पता ही न चला हो।

गौरतलब है कि महामारी की शुरुआत में ही शोधकर्ताओं ने युवाओं और बच्चों की रिपोर्टों के आधार पर बताया था कि अन्य वायरसों की तरह सार्स-कोव-2 भी पैंक्रियाज़ की इंसुलिन का उत्पादन करने वाली कोशिकाओं को क्षति पहुंचा सकता है। जो टाइप-1 मधुमेह का कारण बनता है। अध्ययनों में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं जो यह साबित कर सके कि सार्स-कोव-2 युवाओं और बच्चों में टाइप-1 मधुमेह में वृद्धि का कारण बन रहा है। वैसे एक प्रयोगशाला अध्ययन ने सार्स-कोव-2 द्वारा इंसुलिन उत्पादन करने वाली पैंक्रियाज़ कोशिकाओं को नष्ट करने के विचार को भी चुनौती दी है।

एक सवाल यह है कि क्या कोविड-19 से ग्रसित लोगों में एक वर्ष के बाद भी चयापचय सम्बंधी परिवर्तन बने रहेंगे। विशेषज्ञों का मत है कि मधुमेह के शुरू होने के रुझानों का और अधिक अध्ययन ज़रूरी है ताकि यह समझा जा सके कि ऐसा किन कारणों से हो रहा है। (स्रोत फीचर्स) 

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गोदने की सुई से प्रेरित टीकाकरण

रीर पर टैटू बनवाने का चलन काफी पुराना है। प्रागैतिहासिक काल में शरीर पर विभिन्न आकृतियां गुदवाना एक आम बात थी। शुरुआत में गोदना यानी टैटू बनाने के लिए धातु के औज़ारों और वनस्पति रंजकों का उपयोग किया जाता था जो काफी कष्टदायी होता था। आधुनिक तकनीक से गोदना बनाना भी आसान हो गया और गुदवाने वाले को उतना कष्ट भी नहीं होता।     

टैटू बनाने में एक कुशल कलाकार टैटू की सुई को त्वचा में प्रति सेकंड 200 बार चुभोता है। लेकिन रोचक बात यह है कि इस तकनीक में इंजेक्शन के समान स्याही को दबाव डालकर मांस में नहीं भेजा जाता बल्कि जब सुई बाहर निकाली जाती है तब वहां बने खाली स्थान में स्याही खींची जाती है। टेक्सास टेक युनिवर्सिटी के रसायन इंजीनियर इडेरा लावल की रुचि इस तकनीक को टीकाकरण में आज़माने में है।

आम तौर पर टीकाकरण के लिए उपयोग की जाने वाली खोखली सुई ऊपर से पिस्टन को दबाकर डाले गए दबाव पर निर्भर करती है। इसमें सुई मांसपेशियों तक पहुंचती है और फिर सिरिंज के पिस्टन पर दबाव बनाया जाता है जिससे तरल दवा शरीर में प्रवेश कर जाती है।

लावल का ख्याल है कि यह तकनीक हर प्रकार के टीके के लिए उपयुक्त नहीं है। जैसे, आजकल विकसित हो रहे डीएनए आधारित टीके आम तौर पर काफी गाढ़े होते हैं जिनको इंजेक्शन की सुई से दे पाना संभव नहीं होता। यह काम टैटू तकनीक से किया जा सकता है क्योंकि टैटू की सुई का विज्ञान काफी अलग है।

टैटू की स्याही-लेपित सुई त्वचा में प्रवेश करने पर वहां 2 मिलीमीटर गहरा छेद बना देती है। जब सुई त्वचा से बाहर निकलती है, तब इस छोटे छेद में निर्मित निर्वात स्याही को अंदर खींच लेता है। लावल ने इसे एक मांस-नुमा जेल में प्रयोग करके भी दर्शाया है।

कई अन्य विशेषज्ञ लावल के इस प्रयोग को काफी प्रभावी मानते हैं। डैटा पर गौर करें तो आधी स्याही 50 में से 10 टोंचनों से ही पहुंच गई थी। इष्टतम संख्या पर अध्ययन जारी है। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे छोटा कोशिकीय स्विचयार्ड बनाया

स्विचयार्ड रेलगाड़ियो को अलग-अलग ट्रेक पर डालने/मोड़ने का काम करता है ताकि गाड़ी अपने गंतव्य पर पहुंच जाए। हाल ही में साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ताओं ने स्विचयार्ड के समान प्रोटीन मोटर्स तैयार किए हैं जो शरीर में विभिन्न वांछित जगहों पर माल भेजने में भूमिका निभाएंगे। और ये डीएनए कंप्यूटर के विकास की दिशा में हमें आगे ले जाएंगे।

हमारे शरीर की कोशिकाओं में प्रोटीन मोटर्स पोषक तत्वों और अन्य सामग्रियों को नलीनुमा सूक्ष्म मार्गों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। नैनोटेक्नोलॉजी शोधकर्ता काफी समय से डीएनए से बने नलिका-मार्गों का उपयोग करके इसके कृत्रिम संस्करण तैयार करते रहे हैं। अब शोधकर्ताओं ने इस मामले में एक और कदम आगे बढ़ाया है।

उन्होंने एक ऐसी डीएनए सूक्ष्म नलिका (नैनोट्यूब) रेल बनाई है जिससे कुछ बिंदुओं से कई रास्ते (ट्रैक) निकलते हैं। प्रत्येक ट्रैक का एक विशिष्ट डीएनए पैटर्न होता है। प्रोटीन मोटर्स इन अलग-अलग पैटर्नों को पहचानने के लिए तैयार की गई हैं। इस पैटर्न को पहचान कर ये प्रोटीन मोटर्स फिर अपने माल को वांछित रास्ते पर ले जाती हैं।

डायनीन्स नामक प्रोटीन को डीएनए ट्रैक पर फिसलकर आगे बढ़ने के लिए रूपांतरित किया गया है। सभी दोराहों पर, ट्रैक के विभिन्न डीएनए पैटर्न डायनीन्स को दिशा देते हैं। शोधकर्ताओं ने इस प्रक्रिया का जो वीडियो जारी किया है उसमें – नारंगी फ्लोरेसेंट माल वाले डायनीन्स बाईं ओर वाले मार्ग पर चले जाते हैं और स्यान फ्लोरोसेंट मालवाहक डाएनीन्स दाईं ओर मुड़ जाते हैं।

नैनो-स्विचयार्ड्स वैज्ञानिकों को कोशिकाओं के अंदर की वास्तविक स्थिति का जायज़ा लेने और बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे। अंततः ये अलग-अलग ऊतकों में अलग-अलग औषधियां पहुंचाने में भी मददगार हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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धूम्रपान से सालाना सत्तर लाख जानें जाती हैं – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

भारत में करीब 12 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं। जन स्वास्थ्य के लिहाज़ से इसे कम किया जाना चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) तथा यूएस के खाद्य व औषधि प्रशासन के अनुमान के मुताबिक दुनिया की 7.9 अरब की आबादी में से 1.3 अरब लोग धूम्रपान करते हैं और इनमें से 80 प्रतिशत निम्न व मध्यम आमदनी वाले देशों के निवासी हैं। अर्थात धूम्रपान एक महामारी है जो जन स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है। साल भर में यह 80 लाख लोगों से ज़्यादा की जान लेता है। इनमें से 70 लाख लोग तो खुद तंबाकू के इस्तेमाल से मरते हैं जबकि 12 लाख अन्य लोग सेकंड-हैंड धुएं के संपर्क के कारण जान गंवाते हैं। अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन के मुताबिक लंबे समय से धूम्रपान करने वालों में टाइप-2 डायबिटीज़ की संभावना गैर-धूम्रपानियों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक ज़्यादा होती है। डॉ. स्मीलिएनिक स्टेशा के एक हालिया लेख में बताया गया है कि

1.  धूम्रपान प्रति वर्ष 70 लाख से अधिक अधिक लोगों की मृत्यु का कारण बनता है;

2.  56 लाख युवा अमरीकी धूम्रपान के कारण जान गंवा सकते हैं;

3.  सेकंड-हैंड धुआं दुनिया में 12 लाख लोगों की जान लेता है;

4.  धूम्रपान दुनिया में निर्धनीकरण का प्रमुख कारण है; और

5.  2015 में 10 में से 7 धूम्रपानियों (68 प्रतिशत) ने कहा था कि वे छोड़ना चाहते हैं।

नेचर मेडिसिन के हालिया अंक में बताया गया है कि 2003 में डब्लूएचओ द्वारा तंबाकू नियंत्रण संधि पारित किए जाने के बाद इसे 2030 के टिकाऊ विकास अजेंडा में वैश्विक विकास लक्ष्य माना गया है। यदि संधि पर हस्ताक्षर करने वाले समस्त 155 देश धूम्रपान पर प्रतिबंध, स्वास्थ्य सम्बंधी चेतावनी, विज्ञापनों पर प्रतिबंध के साथ-साथ सिगरेटों की कीमतें बढ़ाने जैसे उपाय लागू करें तो यह लक्ष्य वाकई संभव है।

भारत की स्थिति

भारत निम्न-आमदनी वाले देश की श्रेणी से उबरकर विकसित देश बन चुका है, और अनुमानत: यहां 12 करोड़ धूम्रपानी हैं (कुल 138 करोड़ में से 9 प्रतिशत)। एक समय पर भारत व पड़ोसी देशों में गांजा-भांग काफी प्रचलित थे। इनका सेवन करने के बाद व्यक्ति को नशा चढ़ता है। इसे कैनेबिस के नाम से भी जानते हैं। कैनेबिस में सक्रिय पदार्थ टेट्राहायड्रोकेनेबिऑल होता है जो मनोवैज्ञानिक असर व नशे का कारण है। आज भी होली वगैरह पर लोग भांग चढ़ाते हैं।

तंबाकू

तंबाकू की बात करें, तो इसकी उत्पत्ति, औषधि के रूप में उपयोग, त्योहारों तथा नशे के लिए इसके उपयोग का विस्तृत विवरण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान (राजामुंदरी, आंध्र प्रदेश) द्वारा दिया गया है। ऐसा लगता है कि तंबाकू का पौधा दक्षिण अमेरिका में पेरुवियन/इक्वेडोरियन एंडीज़ में उगाया जाता था। इस नशीले पौधों का स्पैनिश नाम ‘टोबेको’ था।

तंबाकू का लुत्फ उठाने के लिए युरोपीय लोग जिस ‘पाइप’ का उपयोग करते थे वह शायद रेड इंडियन्स के फोर्क्ड केन से उभरा था। युरोप में तंबाकू लाने का श्रेय कोलंबस को जाता है। वहां से यह उनके उपनिवेशों (भारत व दक्षिण एशिया) में पहुंची। पुर्तगाली लोगों ने तंबाकू की खेती गुजरात के उत्तर-पश्चिमी ज़िलों में तथा ब्रिटिश हुक्मरानों ने उ.प्र., बिहार व बंगाल में शुरू करवाई थी।

इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना 1903 में हुई और उसने तंबाकू का वानस्पतिक व आनुवंशिक अध्ययन शुरू कर दिया। संक्षेप में कहें, तो तंबाकू का पौधा और उसके नशीले असर के बारे में भारतीयों को तब तक पता नहीं था, जब तक कि  पश्चिमी लोग इसे यहां लेकर नहीं आए थे।

तंबाकू में सक्रिय अणु निकोटीन होता है। इसका नाम ज़्यां निकोट के नाम पर पड़ा है, जो पुर्तगाल में फ्रांसीसी राजदूत थे। उन्होंने 1560 में तंबाकू के बीज ब्राज़ील से पेरिस भेजे थे। तंबाकू के पौधे में से निकोटीन को अलग करने का काम 1858 में जर्मनी के डब्लू. एच. पोसेल्ट तथा के. एल. रीमान ने किया था। उनका मानना था कि यह एक विष है और यदि इसे स्लो-रिलीज़ ढंग से इस्तेमाल न किया जाए तो इसकी लत लग सकती है। (यही कारण है कि फिल्टर सिगरेटों का उपयोग स्लो-रिलीज़ के लिए किया जाता है)

लुइस मेल्सेन्स ने 1843 निकोटीन का अणु सूत्र ज्ञात किया और इसकी आणविक संरचना का खुलासा 1893 में एडोल्फ पिनर और रिटर्ड वोल्फेंस्टाइन ने किया था। इसका संश्लेषण सबसे पहले 1904 में ऑगस्ट पिक्टेट और क्रेपो द्वारा किया गया था। ताज़ा अनुसंधान से पता चला है कि नियमित धूम्रपानियों को टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा भी ज़्यादा रहता है।

प्रतिबंध

भारत में करीब 12 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं। जन स्वास्थ्य की दृष्टि से यह संख्या बहुत कम करना ज़रूरी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाने की तैयारी कर रहा है। भारत डब्लूएचओ की तंबाकू नियंत्रण संधि पर 27 फरवरी 2005 को हस्ताक्षर कर चुका है।

इस संधि तथा टिकाऊ विकास लक्ष्यों के अनुरूप भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कई सार्वजनिक स्थानों व कार्यस्थलों पर धूम्रपान की मनाही कर दी है – जैसे स्वास्थ्य सेवा से जुड़े स्थान, शैक्षणिक व शासकीय स्थान तथा सार्वजनिक परिवहन। ये सारे कदम स्वागत-योग्य हैं और लोगों को सहयोग करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्रिस्पर शिशुओं की देखभाल पर नैतिक बहस

र्ष 2018 में जीव वैज्ञानिक हे जियानकुई ने दुनिया को यह घोषणा करके चौंका दिया था कि उन्होंने क्रिस्पर नामक तकनीक की मदद से मानव भ्रूण के जीनोम में फेरबदल करके शिशु उत्पन्न किए हैं। उनके इस काम की निंदा हुई थी और उन्हें कारावास की सज़ा हुई थी। सज़ा की अवधि समाप्त होने पर हे को मुक्त किया जाने वाला है और अब यह बहस छिड़ गई है कि इन शिशुओं को किस तरह की देखभाल व सुरक्षा दी जानी चाहिए।

इस बहस के मूल में मुद्दा यह है कि उक्त शिशुओं के जीनोम में फेरबदल के चलते ये अज्ञात जोखिमों से घिरे हैं। इस संदर्भ में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ सोशल साइन्सेज़ के किउ रेनज़ॉन्ग और वुहान स्थित हुआजोन्ग विज्ञान व टेक्नॉलॉजी विश्वविद्यालय के लाई रुइपेंग ने एक प्रस्ताव पेश किया है। प्रस्ताव में किउ और रुइपेंग ने कहा है इन शिशुओं को विशेष सुरक्षा की ज़रूरत है क्योंकि ये एक ‘एक जोखिमग्रस्त समूह’ में हैं। हो सकता है जीन-संपादन के कारण इनके डीएनए में हानिकारक गड़बड़ियां पैदा हो गई हों। और तो और, ये गड़बड़ियां इनकी संतानों में भी पहुंच सकती हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि इन बच्चों के डीएनए का नियमित अनुक्रमण होना चाहिए।

इसके अलावा एक सुझाव यह है कि इन शिशुओं का निर्माण करने वाले हे को बच्चों के स्वास्थ्य व देखभाल की वित्तीय, नैतिक व कानूनी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए। प्रस्ताव में सदर्न युनिवर्सिटी ऑफ साइन्स एंड टेक्नॉलॉजी तथा सरकार को भी ज़िम्मेदार बनाया गया है।

2018 में हे ने क्रिस्पर-कास 9 तकनीक की मदद से मानव भ्रूणों में सीसीआर नामक एक जीन में फेरबदल किया था। यह जीन एड्स वायरस (एचआईवी) के सह-ग्राही का कोड है। पूरी कवायद का मकसद था कि इन भ्रूणों को एड्स वायरस का प्रतिरोधी बना दिया जाए। इन भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित करने के बाद 2018 में तीन लड़कियां पैदा हुई थीं। गौरतलब है कि माता-पिता इस उपचार के पक्ष में थे क्योंकि पिता एचआईवी पॉज़िटिव थे।

इस मामले में ध्यान देने की बात यह भी है कि कई अन्य शोधकर्ता जीन-संपादित भ्रूण प्रत्यारोपण में रुचि रखते हैं। उदाहरण के लिए, मॉस्को स्थित कुलाकोव नेशनल मेडिकल रिसर्च सेंटर के डेनिस रेब्रिकोव ने क्रिस्पर की मदद से बधिरता से जुड़े एक उत्परिवर्तित जीन में संशोधन की तकनीक विकसित कर ली है। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें ऐसे माता-पिता मिल जाएंगे जो इसे आज़माना चाहेंगे। इसे देखते हुए लगता है कि उपरोक्त तीन बच्चे अंतिम नहीं होंगे।

सभी इस बात से सहमत हैं कि किउ और लाई द्वारा दी गई सिफारिशें महत्वपूर्ण हैं लेकिन कई शंकाएं भी हैं। यह सही है कि ये बच्चियां जोखिमग्रस्त हैं क्योंकि उन्हें न सिर्फ शारीरिक, बल्कि सामाजिक दिक्कतों का सामना भी करना पड़ सकता है। लेकिन लगातार निगरानी में रहना भी कई शोधकर्ताओं को उचित नहीं लगता। इस संदर्भ में प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी के प्रकरण की भी याद दिलाई जा रही है जिसे कई वर्षों तक तमाम जांच वगैरह से गुज़रना पड़ा था। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड मौतों की संख्या का नया अनुमान

क ताज़ा विश्लेषण के अनुसार विश्व भर में कोविड-19 से मरने वालों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों की तुलना में तीन गुना से भी अधिक है। दी लैंसेट में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर 2021 तक कोविड से मरने वालों की संख्या लगभग 1.8 करोड़ है। इसी अवधि में विभिन्न आधिकारिक स्रोतों ने 59 लाख मौतों की जानकारी दी है। यह अंतर अधूरी रिपोर्टिंग तथा कई देशों में डैटा संग्रह व्यवस्था की खामियों के कारण है।

कोविड-19 से होने वाली मौतों का अनुमान लगाने के लिए आईएचएमई ने ‘अतिरिक्त मृत्यु’ गणना का उपयोग किया। शोधकर्ताओं ने किसी देश या क्षेत्र में उक्त अवधि में सभी कारणों से रिपोर्ट की गई मौतों की तुलना पिछले कुछ वर्षों के रुझान के आधार पर इस अवधि में अपेक्षित मौतों से करके अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया है।

ये अतिरिक्त मौतें कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों का अच्छा आईना हैं। स्वीडन व नीदरलैंड का उदाहरण दर्शाता है कि इन अतिरिक्त मौतों का प्रत्यक्ष कारण कोविड-19 महामारी ही थी।

वैसे इन अनुमानों में अन्य कारणों से होने वाली मौतें भी शामिल हैं। रिपोर्ट में इस विषय में और अधिक शोध का सुझाव दिया गया है ताकि कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों और महामारी के कारण परोक्ष रूप से होने वाली मौतों को अलग-अलग किया जा सके। गौरतलब है कि महामारी के दौरान चिकित्सा सेवा न मिल पाने के कारण उन लोगों की भी अधिक मौतें हुई जो कोविड-19 से पीड़ित नहीं थे।     

आईएचएमई की टीम ने 74 देशों और क्षेत्रों में सभी कारणों से होने वाली मौतों का डैटा एकत्रित किया। जिन देशों से डैटा प्राप्त नहीं हो सका वहां मृत्यु दर का अनुमान लगाने के लिए एक सांख्यिकीय मॉडल का इस्तेमाल किया गया। विश्लेषण के अनुसार 1 जनवरी 2020 से 31 दिसंबर 2021 के बीच महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर 1.82 करोड़ अतिरिक्त मौतें हुई हैं। इनमें सबसे अधिक अनुमानित अतिरिक्त मृत्यु दर एंडियन लैटिन अमेरिका (512 प्रति लाख), पूर्वी युरोप (345 प्रति लाख), मध्य युरोप (316 प्रति लाख), दक्षिणी उप-सहारा अफ्रीका (309 प्रति लाख) और मध्य लैटिन अमेरिका (274 प्रति लाख) में रही। ये परिणाम विभिन्न देशों और क्षेत्रों द्वारा सार्स-कोव-2 का सामना करने के तरीकों की तुलना करने में मदद करेंगे।

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर अतिरिक्त मौतों का यह पहला अनुमान है जो समकक्ष-समीक्षा के बाद जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसी तरह का एक और अध्ययन डबल्यूएचओ द्वारा जल्द की प्रकाशित होने वाला है। 

अलबत्ता, कई शोधकर्ताओं ने आईएचएमई के अनुमानों की आलोचना की है। हिब्रू युनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के अर्थशास्त्री इस नए अध्ययन में 1.8 करोड़ अतिरिक्त मौतों के आंकड़े को तो सही मानते हैं लेकिन अलग-अलग देशों के लिए अनुमानों से असहमत हैं। अन्य विशेषज्ञों के अनुसार आईएचएमई के मॉडल में कुछ अनियमितताएं भी हैं। फिर भी यह अनुमान आंखें खोल देने वाला तो है ही। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड-19 की उत्पत्ति पर बहस जारी

हाल में जारी किए गए तीन नए अध्ययनों ने सार्स-कोव-2 की उत्पत्ति पर निर्विवादित निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। हालांकि तीनों विश्लेषण कोविड-19 की उत्पत्ति तक तो नहीं पहुंचते हैं लेकिन वायरस के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलॉजी से लीक होने के सिद्धांत को खारिज करते हैं।

इन अध्ययनों में वुहान स्थित हुआनान सीफूड बाज़ार में वायरस के विभिन्न पहलुओं की जांच की गई है, जहां संक्रमण के सबसे पहले मामले देख गए थे। दो अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार वर्ष 2019 के अंत में सार्स-कोव-2 वायरस ने संक्रमित जंतुओं से मनुष्यों में संभवतः दो बार प्रवेश किया। तीसरा अध्ययन कमोबेश चीन के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया था जो सीफूड बाज़ार के पर्यावरण और जंतुओं के नमूनों में कोरोनावायरस के शुरुआती उपस्थिति का विवरण देता है। इस अध्ययन में वायरस के किसी अन्य देश से प्रवेश करने की बात भी कही गई है।

हालांकि इन अध्ययनों की समकक्ष समीक्षा नहीं हुई है, फिर भी वैज्ञानिक, जैव-सुरक्षा विशेषज्ञ, पत्रकार और अन्य जांचकर्ता इन अध्ययनों की जांच में जुट गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये अध्ययन प्रयोगशाला उत्पत्ति की परिकल्पना को ध्वस्त करते हैं और सीफूड बाज़ार से वायरस के प्रसार की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं।

इस संदर्भ में प्राकृतिक उत्पत्ति सिद्धांत के आलोचकों का कहना है कि सीफूड बाज़ार मात्र एक सुपरस्प्रेडर स्थल रहा होगा जहां वायरस प्रयोगशाला से किसी संक्रमित व्यक्ति के माध्यम से पहुंचा होगा। लेकिन कई शोधकर्ताओं का मानना है कि और जानकारी मिलने पर प्रयोगशाला उत्पत्ति का दावा कमज़ोर हो जाएगा। जेनेटिक सैंपलिंग डैटा के विश्लेषण से यह पता लगाया जा सकता है कि बाज़ार की किन प्रजातियों में मुख्य रूप से वायरस था।

एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में सार्स-कोव-2 के दो अलग-अलग वंशों का विवरण दिया है। जबकि दूसरे अध्ययन में शुरुआती मामलों का एक भू-स्थानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो वुहान के बाज़ार को सार्स-कोव-2 के प्रसार केंद्र के रूप में इंगित करता है। इस अध्ययन में वायरस के दोनों वंशों द्वारा बाज़ार से सम्बंधित या उसके पास रहने वाले लोगों को संक्रमित करने के संकेत मिले हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह विश्लेषण जीवित वन्यजीवों के व्यापार के माध्यम से वायरस के उद्भव के साक्ष्य प्रदान करता है।  

गौरतलब है कि पूर्व में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के जॉर्ज गाओ और 37 अन्य वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में 1 जनवरी से 2 मार्च 2020 के दौरान हुआनान सीफूड बाज़ार के पर्यावरण से लिए गए नमूनों का विस्तार से विवरण दिया था। लेकिन यह अध्ययन आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं हुआ। गाओ और उनके सहयोगियों ने बाज़ार के पर्यावरण और 188 जीवों के 1380 नमूनों का विश्लेषण किया था। ये नमूने सीवर, ज़मीन, पंख हटाने वाली मशीन और कंटेनरों से भी लिए गए। टीम को इनमें से 73 नमूनों में सार्स-कोव-2 प्राप्त हुआ। और ये सारे नमूने बाज़ार के पर्यावरण से प्राप्त हुए थे। चूंकि जिन 73 नमूनों में वायरस पाया गया, वे जंतुओं से नहीं बल्कि बाज़ार के पर्यावरण से लिए गए थे, इसलिए स्पष्ट होता है कि वायरस वहां मनुष्यों के माध्यम से पहुंचा था न कि किसी जंतु से। यानी बाज़ार सार्स-कोव-2 वायरस का एम्पलीफायर रहा, स्रोत नहीं।            

कोविड-19 की उत्पत्ति से सम्बंधित सरकारी दावों को ध्यान में रखते हुए गाओ और उनके सहयोगियों ने अपने प्रीप्रिंट में वुहान के मामले सामने आने से पहले अन्य देशों में सार्स-कोव-2 की उपस्थिति दर्शाने वाले अध्ययनों का विवरण दिया है। लेकिन उन आलोचनाओं का कोई उल्लेख नहीं किया गया जिनमें कहा गया है कि ऐसा संदूषण की वजह से हो सकता है।    

अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में कोरोनावायरस वंश के विश्लेषण ने पिछले वर्ष वायरोलॉजिस्ट रॉबर्ट गैरी द्वारा प्रस्तुत तर्क को और परिष्कृत किया है। गैरी ने दिसंबर 2019 में मनुष्यों के प्रारंभिक मामलों में वुहान बाज़ार से सार्स-कोव-2 के दो अलग-अलग रूपों की पहचान की थी जिनमें केवल दो उत्परिवर्तन का ही फर्क था। इस नए अध्ययन ने सोच में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। इसका निष्कर्ष यह है कि ए और बी नामक दोनों वंश हुआनान सीफूड बाज़ार से उत्पन्न हुए और जल्द ही आसपास के क्षेत्रों में फैल गए। नवंबर 2019 के अंत में बी संभावित रूप से जंतुओं से मनुष्यों में प्रवेश कर गया जिसका पहला मामला 10 दिसंबर को सामने आया जबकि ए इसके कुछ सप्ताह बाद सामने आया। देखा जाए तो वायरस के दो वंशों का लगभग एक साथ उद्भव प्रयोगशाला-लीक के सिद्धांत को कमज़ोर कर देता है।

अंतर्राष्ट्रीय टीम का दूसरा प्रीप्रिंट जून 2021 के चीनी नेतृत्व वाले अध्ययन पर आधारित है जिसने बाज़ार में एक विशिष्ट स्टाल पर दो वर्षों तक बेचे गए स्तनधारियों में टिक बुखार का दस्तावेज़ीकरण किया है। इस नए अध्ययन में उन स्थानों को इंगित किया गया जहां पहली बार सार्स-कोव-2 के प्रति संवेदनशील जंतुओं, जैसे रैकून, हेजहॉग, बैजर, लाल लोमड़ी और बैम्बू रैट बेचे गए और उन स्थलों से प्राप्त पर्यावरणीय नमूनों के पॉज़िटिव परिणाम सामने आए। ये सभी निष्कर्ष वायरस के वुहान बाज़ार से उत्पन्न होने के संकेत देते हैं।

कुछ अन्य विशेषज्ञ इस अध्ययन को महत्वपूर्ण तो मानते हैं लेकिन इनके निष्कर्षों से पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के जीव विज्ञानी जेसी ब्लूम के अनुसार सार्स-कोव-2 के लगभग 10 प्रतिशत मानव संक्रमण में वायरस के दो उत्परिवर्तन देखे गए हैं। इसका मतलब यह है कि दूसरा वायरस जंतुओं से दो बार मनुष्यों में नहीं आया बल्कि पहले संक्रमण के बाद उभरा हो। अलबत्ता, कंप्यूटर सिमुलेशन दर्शाता है कि एक वंश के दूसरे में उत्परिवर्तित होने की संभावना केवल 3.6 प्रतिशत है।       

हालांकि ये अध्ययन प्रयोगशाला उत्पत्ति के दावों पर सवाल उठाने के लिए कुछ हद तक तो पर्याप्त हैं लेकिन इस बहस को विराम देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)

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नए शोधों से मिले रोगों के नए समाधान – मनीष श्रीवास्तव

ई बीमारियां लाइलाज हैं तो कई की इलाज की प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसलिए दुनिया भर में वैज्ञानिक सतत रूप से शोध कार्य कर रहे हैं ताकि बीमारियों के बेहतर और सरल इलाज खोजे जा सकें। हाल के समय में एचआईवी, लकवा, तंत्रिका विकारों के इलाज में वैज्ञानिकों को नई सफलताएं प्राप्त हुई हैं। इसी के साथ स्वच्छ ऊर्जा एक अहम क्षेत्र है, जिसका विकल्प वैज्ञानिकों द्वारा खोजा गया है। आइए जानते हैं इन क्षेत्रों में कुछ हालिया उपलब्धियों के बारे में…

चलने लगे लकवाग्रस्त मरीज

स्विटज़रलैंड के लोज़ान युनिवर्सिटी हॉस्पिटल और स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी ने एक ऐसी डिवाइस बनाने में सफलता हासिल की है, जिसकी मदद से कमर के नीचे के हिस्से में लकवे का शिकार हुए तीन मरीज़ चल पाए हैं। इस ऐतिहासिक सफलता सम्बंधी रिपोर्ट जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुई है। यह प्रयोग 29 से 41 वर्ष की उम्र के तीन ऐसे लोगों पर किया गया था, जो लंबे समय से व्हील चेयर पर थे। इनमें से एक व्यक्ति मिशेल रोकंति की रीढ़ की हड्डी में इलेक्ट्रोडयुक्त डिवाइस लगाया गया। इसकी मदद से जल्द ही मिशेल ने अपने पैरों पर खड़े होना तथा बाकी दो ने तैरना तथा साइकिल चलाना तक शुरू कर दिया है।

इस तरह तीन व्यक्तियों के एपिड्यूरल स्पेस में कुल 16 इलेक्ट्रोड डिवाइस लगाए गए। ये इलेक्ट्रोड, पेट की त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित एक पेसमेकर से दिमाग को संदेश पहुंचाने के साथ शरीर के विभिन्न अंगों तक उन्हें प्रेषित करने का काम करते हैं। जब इलेक्ट्रोड की मदद से दिमाग की तंत्रिकाओं को कोई संदेश मिलता है तो शरीर की मांसपेशियां फिर से सक्रिय होकर कार्य करना शुरू कर देती हैं। इस डिवाइस को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित भी किया जा सकता है।

स्टेम सेल से एचआईवी का इलाज

हाल ही में एचआईवी के इलाज में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल हुई है। वैज्ञानिकों ने पहली बार गर्भनाल की स्टेम कोशिका से एचआईवी का सफल इलाज करने में सफलता पाई है। प्रयोग अमेरिका की एक महिला पर किया गया जिसे 2013 में एड्स रोग की पुष्टि हुई थी। इससे पहले तमाम तकनीकों से महिला का इलाज किया जा चुका था। गर्भनाल की स्टेम कोशिका से किए गए उपचार से महिला को वायरस-मुक्त करने में सफलता प्राप्त हुई है। कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी के डॉ. स्टीवन डीक्स के अनुसार गर्भनाल से स्टेम सेल प्राप्त करना आसान होता है और ये अधिक प्रभावी होती हैं। अत: यह तकनीक काफी मददगार होगी क्योंकि इस तरह के डोनर सरलता से मिल जाते हैं। पहले अस्थि मज्जा कोशिका की सहायता से इलाज किया जाता था किंतु अस्थि मज्जा दानदाता खोजना और मरीज़ के साथ मैचिंग करना मुश्किल होता था।

तंत्रिका विकार का निदान

मनुष्य में होने वाले तंत्रिका विकारों को जानने के लिए पहले जीनोम सीक्वेंसिंग ज़रूरी होता था। यह प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली होती है। हाल ही में जीनोमिक इंग्लैंड और क्वीन मैरी युनिवर्सिटी शोध टीम ने इस विकार का पता लगाने के लिए एक सरल विधि खोज निकाली है। इस शोध से जुड़े डॉ. एरियाना टुचि ने बताया है कि इस विधि से तंत्रिका विकार का पता डीएनए टेस्ट की विधि से सरलता से लगाया जा सकेगा। इस विधि में बीमारी वाले जीन की पहचान की जाती है और फिर उसका इलाज शुरू कर दिया जाता है। जीनोम सीक्वेंसिंग में तंत्रिका विकार के कारणों की पहचान मुश्किल से हो पाती थी।

कृत्रिम सूरज की रोशनी

हाल ही में ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रिएक्टर बना लिया है जो सूरज की तरह परमाणु संलयन की क्रिया को संपन्न कर सकता है। इस रिएक्टर से इतनी मात्रा में ऊर्जा निकलती है कि वैज्ञानिक इसे कृत्रिम सूर्य कह रहे हैं। वैज्ञानिक जगत में इस उपलब्धि को मील का पत्थर कहा जा रहा है। अब वैज्ञानिकों ने आशा जताई है कि भविष्य में इस मशीन के द्वारा पृथ्वी पर सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध हो सकेगी। वैज्ञानिकों का प्रयास है कि धरती पर इस तरह के कई छोटे सूरज बनाए जाएं।

कम कार्बन, स्वच्छ ऊर्जा 

यूके परमाणु ऊर्जा प्राधिकरण ने बताया है कि कल्हम सेंटर फॉर फ्यूज़न एनर्जी में जेट प्रयोगशाला है, जिसमें एक डोनट आकार की मशीन लगी हुई है। इसे टोकामैक नाम से पुकारा जाता है। इसमें कम मात्रा में ड्यूटीरियम व ट्रीशियम जैसे तत्व भरे गए हैं। इस मशीन के केंद्र को सूरज के केंद्र की तुलना में 10 गुना ज़्यादा गर्म जाता है ताकि इसमें प्लाज़्मा बन सके। प्लाज़्मा को सुपरकंडक्टर विद्युत-चुंबक की मदद से एक जगह बांधकर रखा जाता है। विद्युत-चुंबक की मदद से जब इसने घूमना शुरू किया तो इससे अपार मात्रा में ऊर्जा निकलने लगी, जो पूरी तरह सुरक्षित और स्वच्छ ऊर्जा रही। गौरतलब है कि इस ऊर्जा की मात्रा 1 किलो कोयला या 1 लीटर तेल से पैदा हुई ऊर्जा की तुलना में 40 लाख गुना ज़्यादा रही। और तो और, यह ऊर्जा बेहद कम कार्बन उत्सर्जन वाली रही, जो पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक सिद्ध होगी। (स्रोत फीचर्स)

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