खाद्य पदार्थों का स्टार रेटिंग – सोमेश केलकर

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र को ऐसे दिशानिर्देश बनाने के निर्देश दे जो यह सुनिश्चित करें कि खाद्य उत्पाद के पैकेट पर सामने की ओर ‘स्वास्थ्य रेटिंग’ के साथ-साथ ‘स्वास्थ्य चेतावनी’ अंकित हो। याचिका में यह अनुरोध भी किया गया है कि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों का उत्पादन करने वाले सभी उद्योगों के लिए ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ और ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ अनिवार्य किया जाए।

याचिका में यह भी अनुरोध है कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को निर्देश दे कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वसा, नमक और शर्करा की स्वीकार्य मात्रा सम्बंधी सिफारिशों का अध्ययन करे। इसके अलावा, FSSAI अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ और ‘हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम’ का अध्ययन करके तीन माह में प्रतिवेदन प्रस्तुत करे।

याचिका का तर्क है कि अनुच्छेद 21 स्वास्थ्य का अधिकार देता है। जबकि केंद्र और FSSAI बाज़ार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों का ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ नहीं करते हैं। उनके द्वारा ‘हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम’ भी लागू नहीं किया गया है और इससे नागरिकों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है। याचिका उपरोक्त दो निकायों की निष्क्रियता को संविधान के अनुच्छेद 21 के खुलेआम उल्लंघन समान बताती है। याचिका इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि किसी भी तरह के कुपोषण से बचने के लिए और अस्वास्थ्यकर या असंतुलित आहार के कारण होने वाले गैर-संचारी रोगों को थामने के लिए स्वास्थ्यप्रद आहार आवश्यक है। स्वास्थ्यप्रद आहार कोविड-19 जैसे संक्रामक रोगों के जोखिम को भी कम करता है। और FSSAI और केंद्र की निष्क्रियता ने इस बीमारी को बढ़ाया है। हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम या स्वास्थ्य प्रभाव आकलन की अनिवर्यता न होने के कारण उपभोक्ता को ऐसा खाद्य मिलता है जिसमें कैलोरी, वसा, शर्करा व नमक की अधिकता होती है और फाइबर जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम के साथ आगे बढ़ा जाए या नहीं? क्या वाकई इसकी आवश्यकता है? और है तो क्यों? जिन देशों में यह लागू है, क्या वे देश अपने उपभोक्ताओं को पौष्टिक विकल्पों के बारे में अधिक जागरूक कर पाए हैं? या क्या नागरिकों के स्वास्थ्य की देखभाल और चिंताओं की आड़ में कुछ और ही खेल रचा जा रहा है?

पोषण लेबलिंग

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक दस वर्षों में (2016 तक) देश में मोटापे से ग्रसित लोगों की संख्या दुगनी हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में से 67 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होंगी।

पिछले दो दशकों में आहार विविधता बदली है, जिससे असंतुलित आहार के कारण गैर-संचारी रोग बढ़े हैं। हमारे वर्तमान भोजन में कैलोरी, शर्करा, ट्रांस फैटी एसिड, संतृप्त वसा, नमक आदि की अधिकता होती है। जबकि कुछ दशक पहले हमारा भोजन प्रोटीन, फाइबर, असंतृप्त वसा और कुछ अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध होता था। भोजन में परिवर्तन के कारण देश में मोटापे की समस्या बढ़ी है। इसलिए भारत सरकार ने लगभग सभी खाद्य पदार्थों पर पोषण सम्बंधी जानकारी देना अनिवार्य किया है।

अब तक, यह जानकारी पैकेट के नीचे या पीछे की ओर एक पोषण तालिका में लिखी जाती है, जिसमें किसी खाद्य या पेय के सेवन से मिलने वाले पोषक तत्वों की लगभग मात्रा लिखी होती है। पैकेट पर एक और अनिवार्य हिस्सा है खाद्य या पेय में प्रयुक्त सामग्री की जानकारी, ताकि उपभोक्ता को पहले से यह पता हो कि जिस उत्पाद का वह सेवन कर रहा है उसमें कोई ऐसे पदार्थ तो नहीं है जिससे उसे एलर्जी है, या आस्थागत कारणों से वह उनका सेवन न करता हो – जैसे कुछ लोग प्याज़-लहसुन युक्त उत्पाद नहीं खाते।

पोषण सम्बंधी जानकारी दो तरह से दी जा सकती है;

1. लिखित तरीके से,

2. चित्र के रूप में।

वर्तमान में पोषण जानकारी लिखित तरीके से दी जाती है, जिसमें पैकेट पर एक तालिका में पोषण और प्रयुक्त सामग्री की जानकारी होती है। याचिका का सारा तर्क इसके इर्द-गिर्द है कि पोषण सम्बंधी जानकारी देने का कौन-सा तरीका बेहतर हो सकता है? यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि उपभोक्ता अनुसंधान में पाया गया है कि लिखित जानकारी पढ़ना भ्रमित कर सकता है और उपभोक्ता अक्सर सामान खरीदते समय इन जानकारियों की अनदेखी करते हैं। और यह अनदेखी लापरवाही, निरक्षरता, पोषण सम्बंधी आवश्यकताओं के प्रति उदासीनता, भाषा से अनभिज्ञता, या जागरूकता में कमी के कारण हो सकती है।

ऐसे में, यह तर्क दिया जा सकता है कि चित्रात्मक लेबल पढ़ने में आसान होते हैं जैसे कि स्टार-रेटिंग सिस्टम। स्टार रेटिंग सिस्टम एयर कंडीशनर, माइक्रोवेव ओवन और रेफ्रिजरेटर जैसे बिजली से चलने वाले उपकरणों के लिए पहले से ही उपयोग की जा रही है। यह काफी हद तक भाषा और निरक्षरता की बाधा को दूर करती है। और उपभोक्ताओं को यह जानने का एक आसान और ‘विश्वसनीय’ तरीका देती है कि वे किस गुणवत्ता की वस्तु उपयोग कर रहे हैं।

स्टार रेटिंग सिस्टम के समर्थकों का कहना है कि यह निम्नलिखित पांच मानदंडों को पूरा करेगी;

1. दृश्यता – दृश्य लेबल इस तरह बनाया जाएगा कि उस पर लोगों की नज़र जाए, और इसके लिए स्टार रेटिंग लेबल को पैकेट के सामने छापा जाएगा।

2. बोधगम्यता – लेबल ऐसा हो कि इसे समझने में उपभोक्ताओं को भाषा या साक्षरता की बाधा न आए। ऐसा करने के लिए ट्रैफिक लाइट जैसी रंग आधारित कोडिंग प्रणाली का उपयोग की जा सकता है।

3. सूचनात्मकता – लेबल को पर्याप्त और आवश्यक जानकारी देना चाहिए। लाल, पीले, हरे रंग की प्रणाली अपनाई जा सकती है – लाल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, पीला सहनीय और हरा स्वास्थप्रद।

4. पठनीयता – लेबल आसानी से पढ़ने या दिखने में आना चाहिए। वर्तमान में पैकेट के पीछे जानकारी छोटे अक्षरों में या तारांकित करके दी जाती है जो उपभोक्ताओं की नज़र से बच जाती है। इस तरह जानबूझ कर छोटे टाइप या तारांकन का उपयोग निषिद्ध होना चाहिए और उल्लंघन पर दंडित किया जाना चाहिए। स्टार का आकार इतना बड़ा होना चाहिए कि ये आसानी से दिखें।

5. वैज्ञानिक परीक्षण – लेबल का परीक्षण यह जानने के लिए किया जाना चाहिए कि क्या वह उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में निर्णय करने में मदद करता है। लेबल के लगाए जाने से पहले और लेबल व्यवस्था शुरू होने के बाद उपभोक्ता के व्यवहार का अध्ययन किया जाना चाहिए और अध्ययन के परिणामों के आधार पर उपभोक्ताओं के लिए अधिक प्रासंगिक और आकर्षक लेबल बनाने के प्रयास होने चाहिए।

खाद्य उत्पाद पर किस तरीके से पोषण जानकारी देना कारगर होगा और किस तरह से नहीं, यह तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक कि उपभोक्ता के क्रय व्यवहार का बहुत विस्तार से अध्ययन नहीं किया जाता। इसलिए, स्टार-रेटिंग सिस्टम के समर्थकों का प्रस्ताव है कि इसकी कारगरता जांचने के लिए फॉलोअप अध्ययन भी करना चाहिए। उनका सुझाव है कि FSSAI, WHO और गैर-सरकारी संगठन मिलकर भारत के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर रैंडम सर्वेक्षण कर सकते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि स्वास्थ्य स्टार रेटिंग प्रणाली प्रभावी है या नहीं। अगर नहीं है तो उपभोक्ताओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम तैयार किए जा सकते हैं।

क्या हम असफल प्रणाली ला रहे हैं?

चित्रित या दृश्य पोषण लेबलिंग प्रणाली के लाभ अन्य देशों में इसके लागू होने के आधार पर गिनाए जा रहे हैं। स्टार रेटिंग प्रणाली के प्रस्तावकों का कहना है कि यह प्रणाली 10 से अधिक देशों में सफल है।

लेकिन वास्तविकता निराशाजनक है। दरअसल, उपरोक्त 10 देशों में से केवल दो ही देश इस प्रणाली का पालन कर रहे हैं। ये दो देश हैं ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड। बाकी देश मानक पोषण तालिका और सामग्री की लिखित जानकारी के साथ या तो ‘ट्रैफिक-लाइट’ प्रणाली या ‘हाई अलर्ट’ प्रणाली का उपयोग करते हैं। ट्रैफिक लाइट प्रणाली में पैकेट पर लाल, पीला या हरा बिंदु या तारा होता है जो यह दर्शाता है कि कोई चीज कितनी स्वास्थ्यप्रद है या अस्वास्थ्यकर है। हाई अलर्ट प्रणाली में किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक होने पर यह बात पैकेट पर मोटे अक्षरों में उसकी मात्रा के साथ लिखी जाती है।

और तो और, जिन दो देशों में इस प्रणाली का पालन किया जा रहा है वहां भी यह प्रणाली कारगर साबित नहीं हुई है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि इस तरह के लेबल किसी विशेष वस्तु के सेवन के खतरों के बारे में लोगों को सजग नहीं करते हैं।

उदाहरण के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं हैं। सिगरेट या तंबाकू उत्पादों को ही लें। सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के बॉक्स या पैकेट पर एक बड़ा वैधानिक चेतावनी चित्र होता है, फिर भी युवा सिगरेट पीने की इच्छा करते हैं और धूम्रपान करने वाले ये चेतावनी देखने के बावजूद भी सिगरेट खरीदना और पीना जारी रखते हैं। भारत सरकार का यह विचार कि पैकेट पर चेतावनी छापने से लोग सतर्क होंगे और इन उत्पादों को नहीं खरीदेंगे, यह पहले ही विफल साबित हो चुका है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्टार रेटिंग प्रणाली के लाभ तो अस्पष्ट हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि FSSAI इस प्रणाली का उपयोग कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए कर सकता है।

स्टार रेटिंग प्रणाली किसी खाद्य या पेय में उपस्थित वसा या शर्करा की सटीक मात्रा नहीं बताती। इस तरह, कोई कंपनी अपने अन्यथा हानिकारक उत्पाद में प्रोटीन, फाइबर या सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाकर (अधिक वसा, नमक और शर्करा के बावजूद) उसके लिए अच्छी रेटिंग हासिल कर लेगी।

उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय का अध्ययन बताता है कि ‘हाई अलर्ट’ प्रणाली ने उच्च कैलोरी, शर्करा, नमक, वसा आदि युक्त उत्पादों की खपत को कम किया है। इसलिए, स्वास्थ्य स्टार रेटिंग प्रणाली के बजाय हाई अलर्ट प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिए। क्योंकि हाई अलर्ट प्रणाली वास्तव में अस्वास्थकर पदार्थों की उपस्थिति के बारे में आगाह करती है और उनकी मात्रा बताती है। स्टार-रेटिंग प्रणाली में यह एक बड़ी खामी है।

ऑस्ट्रेलिया की स्टार रेटिंग प्रणाली के दुष्परिणामों पर अध्ययन किए गए हैं। इनमें पाया गया है कि ऑस्ट्रेलिया में 41 प्रतिशत खाद्य पदार्थों पर स्टार-रेटिंग होती है, और इसके बावजूद भी उपभोक्ता अपने द्वारा उपयोग किए जा रहे खाद्य में वसा, शर्करा, कैलोरी, नमक आदि की मात्रा से अनभिज्ञ हैं। हम दूसरों की गलतियों से सीख सकते हैं।

स्टार रेटिंग प्रणाली लागू करने से परिवर्तन की संभावना नहीं दिखती। यह प्रणाली लोगों को विश्वास दिलाएगी कि पोषण के बारे में चिंता की जा रही है, इसकी आड़ में निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचे जाएंगे। कंपनियों पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे अपने खरीदारों को स्वास्थ्यप्रद उत्पाद पेश करेंगी, क्योंकि उनकी रुचि तो ऐसा उत्पाद देने में है जिसकी लागत बहुत कम हो और उसे ऊंचे दामों पर बेचा जा सके।

स्टार-रेटिंग सिस्टम के अन्य नुकसान भी हैं। किस उत्पाद को कौन सी रेटिंग मिलेगी, इसका निर्धारण करने वाले बेंचमार्क में ढील या संशोधन के लिए कंपनियां सरकार को घूस भी दे सकती हैं। और यह हमारे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि हम न्यूनतम मज़दूरी को लागू करने में विफल रहे हैं, हम न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागू करने में विफल रहे हैं और हम अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे दिहाड़ी मज़दूरों के लिए बेहतर माहौल देने में असफल रहे हैं। मानकों में हेराफेरी नहीं होगी, यह सुनिश्चित करना एक चुनौती होगी।

स्टार रेटिंग प्रणाली के कारण एक और समस्या उत्पन्न होगी। यह कंपनियों द्वारा की जा रही बेइमानी को पकड़ना मुश्किल बना देगी। उदाहरण के लिए मैगी को ही लें। एमएसजी और सीसा (लेड) की अत्यधिक मात्रा के कारण मैगी की आलोचना की गई थी। पूरे भारत से लिए गए 12 में से 10 नमूनों में सीसा की मात्रा अस्वीकार्य स्तर पर निकली थी। मैगी में सीसा और एमएसजी की अत्यधिक मात्रा की शिकायत की जा सकी क्योंकि इसकी सामग्री और पोषण की मात्रा के बारे में पारदर्शिता थी। अन्यथा इस तरह के अनाचार होते रह सकते हैं और इन पर ध्यान तब जाएगा जब लोग वास्तव में बीमार होने और मरने लगेंगे।

निष्कर्ष

भोजन एक बुनियादी ज़रूरत है। और लाभ कमाना भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन कंपनियों को इस बारे में बहुत संवेदनशील होने की ज़रूरत है कि मुनाफा कमाने के लिए क्या स्वीकार्य है, और उपभोक्ता के स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर अपना लाभ बनाना अस्वीकार्य और अनैतिक है।

इसका समाधान कोई बीच का रास्ता हो सकता है, जिसमें दो या दो से अधिक प्रणालियों को लागू किया जाए। उत्पाद की एक नज़र में परख के लिए और कुछ हद तक भाषागत बाधा को पार करने के लिए अलग-अलग रंग वाले स्टार अंकित किए जाएं, और अगर किसी खाद्य पदार्थ में अत्यधिक मात्रा में वसा, शर्करा, नमक, कैलोरी है तो उसे बड़े और मोटे शब्दों में छापा जाए। इसके साथ ही पैकेट के पीछे पोषक तत्व और सामग्री तालिका भी दी जाए। यह प्रणाली लचीली होगी क्योंकि यह सभी तरह के उपभोक्ताओं को जानकारी देगी – स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता पोषण चार्ट और अवयव देखकर उत्पाद चुन सकता है, निरक्षर या उस भाषा से अनजान व्यक्ति स्टार देखकर।

अलबत्ता, यह एक बड़ी समस्या का शॉर्ट-कट समाधान है। शिक्षा में कमी, स्वस्थ रहने के लिए हमारी संस्कृति में प्रोत्साहन की कमी, उपभोक्ता जागरूकता की कमी, उपभोक्ता अधिकारों के बारे में जागरूकता की कमी और इस तरह की नीतियों पर सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने की इच्छा की कमी। ये समस्याएं लंबे समय से हमारे साथ हैं। और सरकार को अच्छी शिक्षा के माध्यम से तर्क करने वाले नागरिक बनाने में कोई रुचि नहीं है क्योंकि जो नागरिक सवाल नहीं करते हैं उन पर शासन करना आसान होता है। इन मुद्दों को संबोधित करने और सुधारने में एक लंबा समय लगेगा। जागरूक नागरिक बनाने में बहुत अधिक धन भी लगता है। लेकिन वर्तमान में हम अंतर्निहित समस्या को खत्म करने के बजाय शॉर्ट-कट सुधार तलाश रहे हैं। क्योंकि समस्या को खत्म करना न केवल कठिन और महंगा है बल्कि पहले तो हमें यह स्वीकार करने की ज़रूरत है कि हम गलत हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सार्स-कोव-2 की प्रयोगशाला-उत्पत्ति की पड़ताल

कोविड-19 वायरस के प्रयोगशाला से लीक होने की संभावना पर चर्चा जारी है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो इसे ‘चीनी वायरस’ तक कहा। दूसरी ओर, कई शोधकर्ताओं ने दी लैसेंट के माध्यम से प्रयोगशाला उत्पत्ति के सिद्धांत को खारिज कर दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के संयुक्त मिशन की रिपोर्ट में भी वायरस के प्रयोगशाला जनित होने के सिद्धांत को ‘असंभाव्य’ बताया गया था।  

फिर इस वर्ष के वसंत तक कुछ बदलाव देखने को मिले और ऐसा लगने लगा कि वायरस की प्रयोगशाला उत्पत्ति की परिकल्पना को सस्ते में खारिज कर दिया गया था। एक नोबेल पुरस्कार विजेता ने वैज्ञानिकों और मुख्यधारा के मीडिया पर ‘पर्याप्त साक्ष्य’ की अनदेखी करने का आरोप लगाया। डब्ल्यूएचओ के प्रमुख ने भी संयुक्त मिशन के निष्कर्षों पर शंका ज़ाहिर की और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने खुफिया समुदाय को वायरस के प्रयोगशाला से निकलने की संभावना का पुनर्मूल्यांकन करने का आदेश दिया। इसके साथ ही वायरोलॉजी और इवॉल्यूशनरी बायोलॉजी के जाने-माने विशेषज्ञों सहित 18 वैज्ञानिकों ने साइंस में प्रकाशित एक पत्र के माध्यम से ‘प्रयोगशाला उत्पत्ति’ का अधिक संतुलित मूल्यांकन करने का आह्वान किया। अलबत्ता, बाइडेन द्वारा गठित खुफिया समुदाय भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका और फिलहाल वायरस उत्पत्ति प्राकृतिक स्रोत से ही नज़र आ रही है।

यह तो ज़ाहिर है कि इन सवालों की छानबीन के लिए साक्ष्य हेतु चीन का सहयोग ज़रूरी है लेकिन चीन की ओर से संयुक्त मिशन के दौरान उचित सहयोग नहीं मिल सका है। चीनी अधिकारियों ने वुहान की प्रयोगशालाओं के स्वतंत्र ऑडिट से भी इन्कार किया है। बढ़ते दबाव के चलते चीन ने संयुक्त मिशन द्वारा सुझाए गए अध्ययनों पर रोक लगा दी है जिनसे अलग-अलग प्रजातियों के बीच वायरस के संचरण का पता लगाया जा सकता था। अलबत्ता, मौजूदा साक्ष्य, महामारी के शुरुआती पैटर्न, सार्स-कोव-2 की जेनेटिक बनावट और वुहान पशु बाज़ार पर हालिया शोध पत्र के आधार पर कई वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वायरस भी अन्य रोगजनकों के समान प्राकृतिक तौर पर जीवों से मनुष्यों में आया है।

युनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के इवॉल्यूशनरी जीव विज्ञानी माइकल वोरोबे इन साक्ष्यों के आधार पर प्रयोगशाला उत्पत्ति की बात से दूर हटे हैं। वोरोबे एचआईवी और 1918 के फ्लू की उत्पत्ति पर महत्वपूर्ण कार्य कर चुके हैं और उन्होंने उपरोक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। उनका तथा एक अन्य हस्ताक्षरकर्ता फ्रेड हचिन्सन कैंसर रिसर्च सेंटर के जीव विज्ञानी जेसी ब्लूम का कहना है इस बहस ने राजनैतिक तनाव बढ़ाने का काम किया है और इसके चलते चीन से जानकारी प्राप्त करना मुश्किल हो गया है।      

देखा जाए तो प्रयोगशाला से उत्पत्ति की मूल परिकल्पना निकटता पर आधारित है – नया कोरोनावायरस एक ऐसे शहर में पाया गया जहां वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (डब्ल्यूआईवी) स्थित है। डब्ल्यूआईवी और दो अन्य छोटी प्रयोगशालाओं में काफी समय से चमगादड़ कोरोनावायरस पर अध्ययन किए जा रहे हैं। संभावना यह जताई गई है कि प्रयोगशाला के कुछ कर्मचारी दुर्घटनावश संक्रमित हुए और अन्य लोगों को भी संक्रमित किया। गौरतलब है कि प्रयोगशाला आधारित दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं है; सार्स का वैश्विक प्रकोप खत्म होने के बाद शोधकर्ता इससे 6 बार संक्रमित हुए हैं।          

ऐसा ज़रूरी नहीं कि शोधकर्ता का सार्स-कोव-2 से संक्रमण वुहान में हुआ हो। ब्रॉड इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता और उपरोक्त पत्र की हस्ताक्षरकर्ता एलीना चैन ने 2018 के एक अध्ययन का हवाला दिया है जिसमें 218 लोगों के रक्त के नमूने लिए गए थे जो शहर से 1000 किलोमीटर दूर ऐसी गुफाओं के पास रहते थे जिनमें बड़ी संख्या में चमगादड़ पाए जाते हैं। इनमें से 6 लोगों में एंटीबॉडी की उपस्थिति से कोरोनावायरस संक्रमण की संभावना दिखी थी। यह कोरोनावायरस सार्स-कोव और सार्स-कोव-2 से काफी निकटता से सम्बंधित है। चैन के अनुसार वुहान के शोधकर्ता अक्सर वहां आते-जाते थे और यह वायरस संक्रमित लोगों से उनमें प्रवेश कर गया होगा।

हालांकि, डब्ल्यूआईवी की प्रमुख चमगादड़ कोरोनावायरस वैज्ञानिक शी ज़ेंगली ने कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के समय प्रयोगशाला में किसी के बीमार होने की बात से इन्कार किया है। दूसरी ओर, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट ने 2019 की शरद ऋतु में डब्ल्यूआईवी में शोधकर्ताओं के बीमार होने की आशंका जताई थी। दी वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार एक अज्ञात यूएस इंटेलिजेंस रिपोर्ट में यह ज़ाहिर किया गया है कि नवंबर 2019 में डब्ल्यूआईवी के तीन शोधकर्ताओं ने अस्पताल में इलाज चाहा था। हालांकि रिपोर्ट में बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं है और कई लोगों का कहना है चीन के अस्पताल सभी बीमारियों का इलाज करते हैं।

टूलेन युनिवर्सिटी के वायरोलॉजिस्ट रोबेरी गैरी वुहान के कर्मचारी के संक्रमित होने और शहर में वायरस के फैलाने की घटना को असंभव मानते हैं। जैसा कि डब्ल्यूआईवी का अध्ययन बताता है कि गुफाओं के पास रहने वाले लोगों में संक्रमण आम बात है। तो सवाल यह है कि यह वायरस कुछ शोधकर्ताओं को ही क्यों निशाना बनाएगा। हो सकता है कि इस वायरस ने भी मनुष्यों में प्रवेश करने से पहले किसी अन्य जीव में प्रवेश किया हो। फिर भी यह सवाल है कि इसने सबसे पहले प्रयोगशाला के कर्मचारी को कैसे संक्रमित किया? गैरी का यह भी कहना है कि डैटा से यह भी पता चला है कि कोविड-19 के शुरुआती मामलों का सम्बंध वुहान के विभिन्न बाज़ारों से था। इससे लगता है कि वायरस ने संक्रमित जीवों और पशु व्यापारियों के माध्यम से शहर में प्रवेश किया था।

लेकिन उपरोक्त पत्र के एक हस्ताक्षरकर्ता स्टेनफोर्ड युनिवर्सिटी के डेविड रेलमन के मुताबिक कोविड-19 के शुरुआती डैटा की बहुत कमी है जिसके कारण कोई स्पष्ट चित्र नहीं उभर पा रहा है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार वायरस का लीक होना तभी संभव है जब जीवित वायरस को कल्चर किया जा रहा हो जो काफी मुश्किल काम है। शी के मुताबिक उनकी प्रयोगशाला में 2000 से अधिक चमगादड़ के विभिन्न नमूने हैं जिनमें से पिछले 15 वर्षों में केवल तीन वायरसों को अलग करके विकसित किया गया है और तीनों ही सार्स-कोव-2 से सम्बंधित नहीं हैं। कुछ लोगों ने शी पर सरकार के दबाव की बात कही है लेकिन चीन के बाहर के तमाम वैज्ञानिक शी की सत्यनिष्ठा पर पूरा भरोसा करते हैं।

महामारी के स्रोत सम्बंधी सारी अटकलें 6 व्यक्तियों पर केंद्रित है जिन्हें वर्ष 2012 में मोजियांग स्थित तांबे की खदान में चमगादड़ों का मल साफ करने के बाद गंभीर श्वसन रोग हुआ था। इनमें से तीन की तो मृत्यु हो गई थी। प्रयोगशाला से वायरस निकलने के सिद्धांत का समर्थन करने वालों का मानना है कि ये लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हुए थे। उनका मानना है कि यह वायरस या तो सार्स-कोव-2 था या बाद में इसे आनुवंशिक रूप से परिवर्तित करके सार्स-कोव-2 को तैयार किया गया है। वास्तव में जब खदान के कर्मचारी बीमार हुए थे तब शी और उनके सहयोगियों ने विभिन्न समय पर चमगादड़ों के नमूने एकत्रित किए थे। उन्होंने इन नमूनों में नौ नए प्रकार के सार्स-सम्बंधित वायरस का पता लगाया था।

शी बताती हैं कि खदान में काम करने वाले कर्मचारियों के रक्त परीक्षण में कोरोनावायरस या एंटीबॉडी के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। इस विश्लेषण में काम करने वाले आणविक जीवविज्ञानी लिन्फा वैंग के मुताबिक खदान में मिले सार्स-कोव-2 से सम्बंधित साक्ष्यों को दबाने की बात बेतुकी है क्योंकि वे तो यह सिद्ध करना चाहते थे कि यह बीमारी कोरोनावायरस के कारण हुई थी और यदि ऐसा पता चलता तो वे इसे तुरंत प्रकाशित करते। कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी वैंग का समर्थन किया है लेकिन उनका मानना है कि अधिक पारदर्शिता से मामले को सुलझाया जा सकता है।

प्रयोगशाला उत्पत्ति के सबसे इन्तहाई तर्क के अनुसार सार्स-कोव-2 डब्ल्यूआईवी में जानबूझकर तैयार किया गया है। ऐसे में न सिर्फ चीन की निंदा होगी बल्कि वायरोलॉजी के क्षेत्र को भी गंभीर नुकसान होगा। पिछले एक दशक में ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ (जीओएफ) सम्बंधी शोध के वैज्ञानिक महत्व पर तीखी चर्चा हुई है। गेन-ऑफ-फंक्शन शोध में ऐसे रोगजनकों का निर्माण किया जाता है जो मनुष्यों में अधिक संक्रामक होते हैं। कुछ जीओएफ अध्ययन भविष्य में आने वाले खतरों की पहचान करने और उनको खत्म करने में मदद करते हैं लेकिन आलोचकों का मत है कि इसके फायदे नए रोगजनकों को बनाने और निकल भागने के जोखिम की तुलना में बहुत कम हैं।

पूर्व में शी ने कोरोनावायरस को विकसित करने में कठिनाइयों के कारण कुछ शिमेरिक (मिश्रित) वायरस तैयार किए थे। डब्ल्यूआईवी में विकसित इन मिश्रित वायरसों में ऐसे चमगादड़ कोरोनावायरस की जेनेटिक सामग्री का उपयोग किया गया जिसे प्रयोगशाला में कल्चर किया जा सकता था और नए कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन जीन्स जोड़े गए थे। वैज्ञानिक इसे जीओएफ शोध नहीं मानते। शी का कहना है कि उनकी टीम द्वारा तैयार किया गया वायरस किसी भी प्रकार से मूल वायरस से अधिक खतरनाक होने की आशंका नहीं थी। अलबत्ता, प्रयोगशाला-उत्पत्ति के समर्थकों का कहना है कि हो सकता है कि सार्स-कोव-2 शी द्वारा तैयार किया गया कोई मिश्रित वायरस ही हो। वे यह भी कहते हैं कि उसी समय प्रयोगशाला में जैव सुरक्षा सम्बंधी ढील भी दी गई थी। हालांकि शी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि उन्होंने अपना काम चीनी नियमों के अनुसार किया है और किसी तरह की सुरक्षा ढील नहीं दी गई थी।

हालांकि अभी तक कोई भी ऐसा वायरस नहीं मिला है जो इसको तैयार करने की प्रारंभिक सामग्री के रूप में उपयोग किया जा सके। कुछ लोग मोजियांग खदान में मिले वायरस RaTG13 को सार्स-कोव-2 के मुख्य आधार के रूप में देखते हैं लेकिन सेल में प्रकाशित एक पेपर के अनुसार दोनों के बीच 1100 क्षार का अंतर है और ये अंतर पूरे आरएनए में बिखरे हुए हैं।

इस विषय में वायरोलॉजिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता डेविड बाल्टीमोर द्वारा सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार करने सम्बंधी साक्ष्य भी गैर-तार्किक हैं। उनका कहना था कि वायरस के स्पाइक पर एक क्लीवेज साइट होती है जहां फ्यूरिन नामक मानव एंज़ाइम प्रोटीन को तोड़ता है और सार्स-कोव-2 को कोशिकाओं को प्रवेश करने में मदद करता है। प्रयोगशाला उत्पत्ति के समर्थकों का मत है कि यह क्लीवेज साइट प्रयोगशाला में जोड़ी गई है। लेकिन यह आगे चलकर गलत साबित हुआ। गौरतलब है कि इस जीनस के कई सदस्यों में फ्यूरिन क्लीवेज साइट कुदरती रूप से मौजूद होती हैं और कई बार विकसित हुई हैं। यह बात सामने आने के बाद बाल्टीमोर ने अपना बयान वापिस ले लिया है।

प्रयोगशाला-उत्पत्ति के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि वायरस को प्रयोगशाला में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित करने की बजाय हो सकता है कि किसी वायरस को प्रयोगशाला में बार-बार संवर्धित किया गया होगा ताकि हर बार होने वाले उत्परिवर्तन इकट्ठे होते जाएं। लेकिन इसके लिए भी सार्स-कोव-2 के किसी निकट सम्बंधी से शुरुआत करनी होगी। इस तरह का कोई प्रारंभिक वायरस किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं है। दरअसल अमेरिकी खुफिया समुदाय भी सार्स-कोव-2 के मानव-निर्मित होने के सुझाव को खारिज कर चुका है। उसकी रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस वायरस को आनुवंशिक रूप से तैयार नहीं किया गया है।  

हुआनन सीफूड बाज़ार में अचानक से निमोनिया के मामलों में वृद्धि के बाद 31 दिसंबर 2019 को आधिकारिक रूप से महामारी की घोषणा की गई थी। हालांकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ने हुआनन व अन्य बाज़ारों पर काफी ध्यान दिया लेकिन अस्पष्टता बनी रही क्योंकि कई मामलों का किसी भी बाज़ार से कोई सम्बंध नहीं था।

लेकिन डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया था कि वैज्ञानिकों ने वुहान बाज़ार के फर्श, दीवारों और अन्य सतहों से कई नमूने एकत्रित किए थे जिससे पता चला था कि बाज़ार वायरसों से भरा हुआ था। वैंग बताते हैं कि पर्यावरण के नमूनों से कोरोनावायरस को अलग करना एक मुश्किल कार्य है। इसके अतिरिक्त इस रिपोर्ट में कुछ बड़ी त्रुटियां भी हैं। जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती मामलों के सम्बंध में हुआनन और अन्य बाज़ार में 2019 में जीवित स्तनधारी बेचे जाने की सत्यापित रिपोर्ट नहीं मिली है। लेकिन चाइना वेस्ट नार्मल युनिवर्सिटी के ज़ाउ-ज़ाओ-मिन और उनके साथियों ने जून में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें इस तथ्य को चुनौती दी गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार मई 2017 से नवंबर 2019 के बीच हुआनन और वुहान के तीन बाज़ारों की 17 दुकानों में 38 प्रजाति के लगभग 50,000 जीवित जीव बेचे गए थे।

गौरतलब है कि मांस की बजाय जीवित जीवों से श्वसन सम्बंधी वायरस के फैलने की अधिक संभावना होती है। इन जीवों में ऐसे जीव थे जो प्राकृतिक रूप से इस वायरस के वाहक होते हैं और प्रयोगशाला में इनको सार्स-कोव-2 से संक्रमित भी किया जा चुका है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं कि डब्ल्यूएचओ के संयुक्त मिशन में शामिल चीनी सदस्यों ने बाज़ार में जीवित स्तनधारियों के बारे में कोई जानकारी क्यों नहीं दी।   

हो सकता है कि जीवों से मनुष्यों में जाने-आने की प्रक्रिया के दौरान वायरस लगातार नए मेज़बान के अनुसार ढलता गया। यह प्रक्रिया काफी समय तक चलती रही होगी जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया और बीमारी का गंभीर रूप लेने के बाद यह उभरकर सामने आया। यह भी संभव है कि वायरस ने पहले किसी किसान को दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्र में संक्रमित किया होगा और वहां से यह वुहान बाज़ार में प्रवेश कर गया। कुछ वैज्ञानिकों ने फर उद्योग की ओर भी ध्यान दिलाया है जहां मनुष्य रैकून डॉग और लोमड़ियों के संपर्क में आते हैं।

हालांकि कुछ भी स्पष्ट रूप से कहने के लिए वैज्ञानिक मनुष्यों में कोविड के शुरुआती मामलों के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं और डब्ल्यूआईवी से चमगादड़ कोरोनावायरस का जीनोम अनुक्रम हासिल करना चाहते हैं जिसको चीन ने वेबसाइट हैक होने का कारण बताकर सितंबर 2019 में इंटरनेट से हटा लिया था। यदि यह डैटा प्राप्त हो जाता है तो काफी जानकारी प्राप्त हो सकती है। चीन की ओर से भी यह दावा किया जा रहा है कि यह वायरस फ्रोज़न फूड के माध्यम से किसी अन्य देश से चीन में आया है और जिसका इल्ज़ाम झूठे प्रचार के माध्यम से अमेरिका द्वारा चीन पर लगाया जा रहा है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार चीन हर संभव प्रयास कर रहा है जिससे यह साबित किया जा सके कि इस महामारी की शुरुआत चीन के बाहर से हुई है। इस संदर्भ में अन्य स्थानों पर किए गए अध्ययनों से काफी चुनौतीपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। पड़ोसी देशों के चमगादड़ों में कोरोनावायरस मिला है जिससे सार्स-कोव-2 के उत्पन्न होने के जैव विकास मार्ग को देखने का सुराग मिलता है। दक्षिण-एशिया के जंगली पैंगोलिन से अधिक साक्ष्य मिलने की सभावना है। बहरहाल, उत्पत्ति को लेकर कई परिकल्पनाएं हैं लेकिन फिलहाल प्राकृतिक उत्पत्ति ही सबसे संभावित व्याख्या है।  (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दीर्घ कोविड: बड़े पैमाने के अध्ययन की ज़रूरत

ई लोगों में कोविड-19 से उबरने के बाद भी कई हफ्तों या महीनों तक थकान, याददाश्त की समस्या और सिरदर्द जैसे लक्षण बने रहते हैं। ऐसा क्यों होता और इसका उपचार क्या है यह पूरी तरह पता करने के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन की ज़रूरत है। और हाल ही में यूएस के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) ने ऐसे ही एक अध्ययन के लिए लगभग 47 करोड़ डॉलर के अनुदान की घोषणा की है। इस अध्ययन में कोविड-19 के संक्रमण उपरांत प्रभावों – जिसे दीर्घ कोविड कहते हैं – के कारण पता लगाने के अलावा उपचार और रोकथाम के उपाय पता  लगाए जाएंगे। यह अध्ययन सार्स-कोव-2 के संक्रमण से नए पीड़ित और पूर्व में इसका संक्रमण झेल चुके 40,000 वयस्कों और बच्चों पर किया जाएगा।

दीर्घ कोविड को सार्स-कोव-2 के विलंबित लक्षण भी कहते हैं। इसमें दर्द, थकान, याद रखने में परेशानी, नींद की समस्या, सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ, बुखार, पुरानी खांसी, अवसाद और दुÏश्चता जैसे लक्षण हो सकते हैं जो प्रारंभिक संक्रमण के चार सप्ताह से अधिक समय तक बने रहते हैं। कभी-कभी ये लक्षण इतने गंभीर होते हैं कि व्यक्ति काम नहीं कर पाता, उसे रोज़मर्रा के काम करने में भी मुश्किल होती है।

यूएस रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों (सीडीसी) का अनुमान है कि कोविड-19 के 10 से 30 प्रतिशत रोगियों में दीर्घ कोविड विकसित होता है। यह संभवत: वायरस के शरीर में छिप कर बैठे भंडार के कारण, अनियंत्रित प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण, या संक्रमण से उपजी किसी चयापचय समस्या के कारण होता है। लेकिन वास्तव में यह होता क्यों है, इसका सटीक और स्पष्ट कारण अब तक पता नहीं है।

एनआईएच ने फरवरी में दीर्घ कोविड अनुसंधान कार्यक्रम की अपनी प्रारंभिक योजना की रूपरेखा तैयार की थी। अब इसे रिसर्चिंग कोविड टू एनहान्स रिकवरी (RECOVER) इनिशिएटिव का रूप दिया गया है जिसके लिए न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय को 47 करोड़ का अनुदान मिला है। विश्वविद्यालय 35 संस्थानों के 100 से अधिक शोधकर्ताओं को शामिल करेगा जो एक साझे प्रोटोकॉल के तहत संक्रमितों को अध्ययन में शामिल करेंगे।

अक्टूबर से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम का लक्ष्य 12 महीने में सभी 50 राज्यों की विविध आबादी से 30 से 40 हज़ार प्रतिभागियों को शामिल करना है। इसमें कुछ लोग जो दीर्घ कोविड से गुज़र रहे हैं, उन पर अध्ययन किया जाएगा लेकिन इसमें शामिल अधिकांश लोग कोविड-19 संक्रमित होंगे यानी वे लोग होंगे जो हाल ही में कोविड-19 से बीमार हुए हैं। अध्ययन में अस्पताल में भर्ती मरीजों के अलावा मामूली कोविड-19 से पीड़ित लोग भी शामिल होंगे – क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या शुरुआत में अधिक गंभीर संक्रमण दीर्घ कोविड की ओर ले जाता है?

इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड की मदद से और प्रतिभागियों को पहनने योग्य उपकरण देकर उनकी हृदय गति, नींद वगैरह की निगरानी की जाएगी। इस तरह यह अध्ययन उन लोगों के स्वास्थ्य की तुलना करेगा जो जल्दी ही ठीक हो जाते हैं और जिनके लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं। इसके आधार पर दीर्घ कोविड का जोखिम पैदा करने वाले कारकों और जैविक संकेतों का पता लगाया जाएगा। शोधकर्ता यह भी पता लगाएंगे कि क्या कोविड-19 का टीका लेने से दीर्घ कोविड के लक्षण कम होते हैं?

अध्ययन में लगभग आधे प्रतिभागी बच्चे होंगे और नवजात शिशु भी होंगे। भले ही आम तौर पर बच्चों में कोविड-19 के हल्के या कोई भी लक्षण नहीं होते हैं लेकिन यह चिंता उभरी है कि क्या उनमें विलंबित लक्षण पैदा होंगे। एक कारण यह भी है कि इस समय जितने बच्चे पीड़ित हैं, पूरी महामारी के दौरान इतने नहीं थे।

हालांकि यह अध्ययन दीर्घ कोविड के लिए नए उपचारों का परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन शोधकर्ता उन प्रोटीन या आणविक प्रक्रियाओं की पहचान करेंगे जो दीर्घ कोविड में भूमिका निभाते हैं और मौजूदा औषधियों द्वारा इन्हें अवरुद्ध करने की संभावना जांचेंगे।

हालांकि इस अध्ययन के तरीके से इस क्षेत्र की एक प्रमुख कार्यकर्ता निराश हैं क्योंकि यह प्रयास बड़े पैमाने पर उन लोगों को अध्ययन में शामिल करेगा जिनमें अब तक दीर्घ कोविड विकसित नहीं हुआ है चूंकि वे हाल ही में संक्रमित हुए हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोग टीके ले चुके हैं। दरअसल इसमें उन लाखों लोगों को शामिल किया जाना चाहिए जो वर्तमान में इससे पीड़ित हैं। सर्वाइवर कोर की संस्थापक डायना बेरेंट का कहना है कि एनआईएच का यह अध्ययन छलावा है। इससे हम किसी नतीजे तक नहीं पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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संकटकाल में एक वैज्ञानिक की दुविधा

16 जनवरी 2020 को इरेस्मस युनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के पशु रोग विशेषज्ञ थीस कुइकेन को दी लैंसेट से समीक्षा के लिए एक शोधपत्र मिला था, जिसने उन्हें दुविधा में डाल दिया।

हांगकांग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के इस शोधपत्र में बताया गया था कि चीन के शेन्ज़ेन शहर के एक परिवार के छह सदस्य वुहान गए थे, और उनमें से पांच सदस्य कोविड-19 से संक्रमित पाए गए। इनमें से कोई वुहान के सार्स-कोव-2 के शुरुआत मामलों से जुड़े हुआनन सीफूड बाज़ार नहीं गया था। इस परिवार के शेन्ज़ेन वापस लौटने के बाद परिवार का सातवां सदस्य भी इससे संक्रमित हो गया, जो वुहान गया ही नहीं था।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष स्पष्ट था: सार्स-कोव-2 मनुष्य से मनुष्य में फैल सकता था। उनके दो निष्कर्षों और थे। एक, परिवार के संक्रमित लोगों में से दो सदस्यों में कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे, यानी यह बीमारी दबे पांव आ सकती है। दूसरा, एक सदस्य में इस नई बीमारी का सबसे आम लक्षण (श्वसन सम्बंधी) नहीं था लेकिन उसे पेचिश हो रही थी। मतलब था कि यह बीमारी चिकित्सकों को चकमा दे सकती है।

इन निष्कर्षों ने कुइकेन को दुविधा में डाल दिया। कुछ लोगों को पहले ही संदेह था कि सार्स-कोव-2 मनुष्य से मनुष्य में फैल सकता है; और दो दिन पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने आशंका भी ज़ाहिर की थी। अब कुइकेन के सामने इस बात के प्रमाण मौजूद थे। उन्हें लग रहा था कि लोगों को इस बारे में जल्द से जल्द बताना चाहिए, क्योंकि वर्ष 2003 में फैले सार्स के अनुभव से कुइकेन जानते थे कि किसी घातक और तेज़ी से प्रसारित होने वाले वायरस के प्रसार को थामने के लिए शुरुआत के दिन कितने महत्वपूर्ण होते हैं। और सार्स-कोव-2 सम्बंधी इस जानकारी में देरी होने से लोगों को खतरा था।

लेकिन यदि वे इसका खुलासा करते तो उनकी वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती। दरअसल, जर्नल के समीक्षकों को किसी भी परिस्थिति में अप्रकाशित पांडुलिपियों को साझा करने या उनके निष्कर्षों का खुलासा करने की अनुमति नहीं होती है।

कुइकेन की यह दुविधा जुलाई में प्रकाशित हुई वेलकम ट्रस्ट की जेरेमी फरार और अंजना आहूजा द्वारा लिखित पुस्तक स्पाइक: दी वायरस वर्सेस दी पीपल – दी इनसाइड स्टोरी में उजागर की गई है। साइंस पत्रिका ने इस मामले पर अतिरिक्त प्रकाश डाला है।

साइंस पत्रिका से बात करते हुए फरार कहती हैं कि इस मामले ने वेलकम ट्रस्ट की इस पहल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी कि कोविड-19 के निष्कर्षों को शीघ्रातिशीघ्र साझा किया जाए। इसी के तहत दी लैंसेट और चाइनीज़ सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन सहित कई पत्रिकाओं और शोध संगठनों ने जनवरी 2020 में यह करार किया कि प्रकाशन के लिए भेजे गए कोविड-19 से सम्बंधी शोध पत्रों को वे डब्ल्यूएचओ को तुरंत उपलब्ध कराएंगे।

इसी बीच कुइकेन को दी लैंसेट के संपादक ने फोन पर बताया कि शोधकर्ता स्वयं अपने परिणामों का खुलासा करने के लिए स्वतंत्र हैं। (दी लैंसेट के अनुसार, दी लैसेंट को भेजी गई पांडुलिपियों के लेखकों को अपने अप्रकाशित शोध पत्रों को सम्बंधित चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य निकायों, वित्तदाताओं के साथ और प्रीप्रिंट सर्वर पर साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है)। तो 17 जनवरी 2020 की सुबह पत्रिका को भेजी अपनी समीक्षा में कुइकेन ने शोधकर्ताओं से एक असामान्य अनुरोध किया कि वे अपने डैटा को ‘तुरंत’ सार्वजनिक कर दें। दी लैंसेट के संपादकों ने उनके अनुरोध का समर्थन किया।

एक संपादक के मुताबिक शोधकर्ता तो अपने निष्कर्षों का खुलासा करना चाहते थे लेकिन वे चीन सरकार की अनुमति के बिना ऐसा नहीं कर सकते। दरअसल संचारी रोगों के नियंत्रण और रोकथाम पर चीन का कानून कहता है कि केवल राज्य परिषद, या अधिकृत नगरीय/प्रांतीय स्वास्थ्य अधिकारी ही संचारी रोगों के प्रकोप के बारे में जानकारी प्रकाशित कर सकते हैं। कुइकेन को बताया गया कि प्रमुख शोधकर्ता युएन क्वोक-युंग को चीन के अधिकारियों के साथ निष्कर्षों पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया गया है।

शनिवार दोपहर कुइकेन ने फरार से इस मामले पर सलाह मांगी। फरार ने तीन विकल्प सुझाए। पहला, सोमवार तक इंतजार किया जाए। दूसरा, स्वयं जानकारी का खुलासा कर दें। और तीसरा, सीधे ही डब्ल्यूएचओ को इसकी जानकारी दे दी जाए।

कुइकेन ने तीसरा विकल्प चुना। शनिवार शाम कुइकेन ने डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य आपात कार्यक्रम की तकनीकी प्रमुख मारिया वैन केरखोव से कहा कि यदि रविवार सुबह तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं होती तो वे उन्हें पांडुलिपि भेज देंगे। दी लैंसेट के संपादक से पता चला कि चीन सरकार के साथ शोधकर्ताओं की चर्चा अभी जारी है।

लेकिन रविवार सुबह कुइकेन फिर दुविधा में थे। उन्होंने सोचा कि यदि शोधकर्ताओं की अनुमति के बिना इन निष्कर्षों को दर्शाने वाले आंकड़े भर ऑनलाइन कर दिए गए तो यह बहुत अपमानजनक होगा। इसलिए उन्होंने पांडुलिपि का एक विस्तृत सारांश लिखा, और उसे रविवार सुबह वैन केरखोव को भेज दिया।

बहरहाल, सोमवार को चीन ने दी लैसेंट की पांडुलिपि का हवाला देते हुए आधिकारिक स्तर पर यह घोषणा कर दी कि यह बीमारी मनुष्य से मनुष्य में फैल सकती है। इस घोषणा ने कुइकेन को बड़ी राहत दी।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि डब्ल्यूएचओ से संपर्क करने के उनके फैसले ने चीन की घोषणा को गति दी या नहीं। केरखोव ने यह नहीं बताया कि उन्होंने या डब्ल्यूएचओ के अन्य किसी सदस्य ने चीन के सरकारी अधिकारियों या शोधकर्ताओं को इस बारे में बताया था या नहीं।

वहीं शोधकर्ता युएन के अनुसार, 18 से 20 जनवरी 2020 तक वुहान और बीजिंग में वे सरकार की विशेषज्ञ टीम से मिले, जहां इन निष्कर्षों पर चर्चा हुई। युएन का कहना है कि मुझे नहीं लगता कि कुइकेन का निर्णय बहुत प्रासंगिक था क्योंकि मैंने देखा कि चीन के स्वास्थ्य अधिकारी हमारी रिपोर्ट के प्रति सकारात्मक थे, और उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य नियंत्रण उपायों को बढ़ाने के लिए तत्काल कार्रवाई की। जिसमें 20 जनवरी, 2020 को मनुष्य से मनुष्य में संचरण की बात का खुलासा और 23 जनवरी, 2020 को वुहान को बंद करना शामिल था।

वेलकम ट्रस्ट के आह्वान के एक हफ्ते बाद यह शोधपत्र दी लैंसेट ने 24 जनवरी 2020 को ऑनलाइन प्रकाशित किया। 2016 में ज़ीका वायरस के प्रकोप के समय भी इसी तरह के कदम उठाए गए थे, लेकिन तब पत्रिकाओं द्वारा अप्रकाशित शोधपत्र साझा करने की बात नहीं हुई थी, जो कोविड-19 के समय हुई जो कि महत्वपूर्ण थी।

कुइकेन को अपने उठाए गए कदम का कोई खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा। कुइकेन उम्मीद करते हैं कि वैज्ञानिक समुदाय में उनकी दुविधा पर चर्चा की जाएगी। कुइकेन का कहना है कि वेलकम ट्रस्ट का बयान बहुत अच्छा है, लेकिन इसमें इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि आपात स्थितियों में पांडुलिपियों के समीक्षकों को ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी का क्या करना चाहिए। मैंने नियमों के बाहर जाकर कदम उठाए। दरअसल, यह नियमानुसार संभव होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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क्या कोविड का बूस्टर शॉट अनिवार्य है?

हाल ही में अमेरिकी सरकार ने mRNA आधारित टीकों की दूसरी खुराक के आठ महीने बाद अधिकांश लोगों को बूस्टर शॉट देने का निर्णय लिया है। टीका सलाहकार समिति की स्वीकृति के बाद 20 सितंबर से बूस्टर शॉट देना शुरू किए जाएंगे। इसमें स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और नर्सिंग होम कर्मियों को प्राथमिकता दी जाएगी।

वैज्ञानिक समुदाय में बूस्टर शॉट देने पर काफी पहले से बहस चल रही है कि यह किन लोगों को और कब दिया जाना चाहिए। दुर्बल प्रतिरक्षा वाले लोगों में दो खुराक पर्याप्त नहीं हैं इसलिए सीडीसी ने ऐसे लोगों को बूस्टर शॉट देने का सुझाव दिया था। वर्तमान घोषणा इस्राइल, टीका निर्माताओं और अमेरिका में किए गए विभिन्न अध्ययनों से प्राप्त डैटा के आधार पर लिया गया है। इन अध्ययनों के अनुसार कोविड के विरुद्ध टीकों से मिलने वाली प्रतिरक्षा 6 माह में कम हो सकती है और डेल्टा संस्करण को रोकने में कम प्रभावी होगी।

कई विशेषज्ञ स्वस्थ लोगों को बूस्टर शॉट देने के पक्ष में नहीं हैं। जब कई देशों में लोगों को एक खुराक भी नहीं मिली है तब उच्च आय वाले देशों द्वारा बूस्टर शॉट देने को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनैतिक बताया है। लेकिन अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा पर अधिक ज़ोर दे रही है। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि बूस्टर शॉट की बजाय अधिक से अधिक लोगों के टीकाकरण पर ध्यान देना अधिक प्रभावी होगा।

इस विषय में साइंटिफिक अमेरिकन ने ला जोला इंस्टिट्यूट फॉर इम्यूनोलॉजी के वायरोलॉजिस्ट और प्रोफेसर शेन क्रोटी और बाइडेन-हैरिस ट्रांज़ीशन कोविड-19 एडवाइज़री बोर्ड की सदस्य सेलिन गाउंडर से बूस्टर शॉट के सम्बंध में कुछ सवाल किए हैं।

क्या बूस्टर शॉट आवश्यक है? और किसके लिए?

सेलिन गाउंडर: डैटा के अनुसार टीके गंभीर रूप से बीमार होने, अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु से सुरक्षा प्रदान करते हैं। यह सुरक्षा डेल्टा संस्करण के विरुद्ध भी देखने को मिली है। हालांकि, हमें डेल्टा संस्करण के विरुद्ध कम प्रतिरक्षा देखने को मिली है। यहां जिन समूहों को बूस्टर शॉट देने की बात की जा रही है वे अत्यधिक दुर्बल प्रतिरक्षा वाले लोग हैं जिनमें टीकाकरण से कम प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इनमें से सभी तो नहीं लेकिन कुछ लोगों में अतिरिक्त खुराक से प्रतिक्रिया अवश्य विकसित होगी। इसके अलावा नर्सिंग होम जैसे स्थान, जहां ब्रेकथ्रू संक्रमण का खतरा है, वहां भी अतिरिक्त खुराक देना समझदारी का निर्णय है। इससे आगे बढ़कर, आम जनता को अतिरिक्त खुराक देने के लिए कोई स्पष्ट डैटा अभी उपलब्ध नहीं है। 

शेन क्रोटी: डेल्टा संस्करण के बारे में अनिश्चितता और इसके विरुद्ध सुरक्षा को लेकर अस्पष्टता के कारण सरकार ने बूस्टर शॉट देने का निर्णय लिया होगा। निश्चित रूप से दुर्बल प्रतिरक्षा वाले लोगों को बूस्टर शॉट दिया जाना चाहिए। मई, जून और जुलाई के डैटा से पता चला है कि दुर्बल प्रतिरक्षा वाले लोगों को दो खुराक मिलने पर अच्छी प्रतिक्रिया तो नहीं मिली लेकिन तीसरी खुराक से बेहतर प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। यह स्पष्ट हुआ है कि दुर्बल प्रतिरक्षा वाले कुछ लोगों को तीसरी खुराक से फायदा हुआ है। 80 से अधिक आयु के लोगों को बूस्टर देने की बात भी उचित लगती है। लेकिन 70, 60, 50 वर्ष की आयु वर्ग के लिए निर्णय मुश्किल है।

टीकों द्वारा उत्पन्न प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी है?

क्रोटी: अभी तक ऐसा प्रतीत होता है कि टीका उच्च-गुणवत्ता वाली प्रतिरक्षा स्मृति उत्पन्न करता है। साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार मॉडर्ना टीके की दूसरी खुराक के छ: माह बाद भी एंटीबॉडीज़ में कोई कमी नहीं पाई गई। टीकाकरण के एक से छ: माह के दौरान स्मृति टी-कोशिका में भी लगभग कोई बदलाव नहीं आया। इंग्लैंड का डैटा दर्शाता है कि टीका डेल्टा संस्करण के विरुद्ध बहुत ही अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। सर्दियों में आई लहर के दौरान अस्पताल में भर्ती होने और मौतों के बीच भारी अंतर था। मेरे खयाल से अस्पताल में दाखिले और मौतों से बचाव के लिए तो बूस्टर नहीं चाहिए।

इस्राइल के डैटा के बारे में आपका क्या विचार है जो समय के साथ प्रतिरक्षा कम होना दर्शाता है?

क्रोटी: टीके की प्रभाविता कम होने के मामले में इस्राइल का डैटा काफी अच्छा है। लेकिन अभी तक इस्राइली अधिकारियों ने इसे किसी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया है। भ्रमित करने वाले कारक भी काफी अधिक हैं। सबसे पहले इस्राइल को फरवरी और मार्च में टीके की प्रभाविता को लेकर काफी समस्याएं थीं। उसके बाद उन्होंने एक पेपर प्रकशित किया जिसमें टीके को अच्छा बताया गया। अब इस्राइल को लग रहा है कि टीके की प्रभाविता में कमी आ रही है।      

गाउंडर: इस्राइल के डैटा के साथ काफी समस्याएं हैं। उनमें उम्र एवं अन्य कारकों को अलग-अलग नहीं किया गया है। इसके लिए मूल डैटा प्रदान करना होगा। इस्राइल के डैटा के आधार पर कोई निर्णय लेना मुझे उचित नहीं लगता है। इसके अलावा, प्रयोगशाला डैटा से भी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। तथाकथित न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी सुरक्षा का सबसे अच्छा मापदंड है। लेकिन यदि उन्हें छ: माह बाद मापा जाए तो यह स्पष्ट नहीं होता है। यदि आपके पास अब तक के हर संक्रमण की एंटीबॉडी होगी तो आपका रक्त वास्तव में एंटीबॉडी से पट जाएगा।

क्या टीकों का मिला-जुला उपयोग किया जा सकता है?

क्रोटी: जिन लोगों को वायरस आधारित (जैसे एस्ट्राज़ेनेका या जॉनसन एंड जॉनसन टीका) टीका मिला है उनके लिए उसी टीके की एक और खुराक की बजाय mRNA टीका लेना बेहतर है। टीकों का क्रम काफी महत्वपूर्ण है।  

गाउंडर: इसके अलावा हमें नाक से दिए जाने वाले टीकों पर भी विचार करना चाहिए। इनसे नाक और ऊपरी श्वसन मार्ग में प्रतिरक्षा विकसित की जा सकती है।

क्या तीसरी खुराक के कुछ दुष्प्रभाव होंगे? यदि हां, तो कितने गंभीर हो सकते हैं?

गाउंडर: लक्षण कमोबेश हल्का बुखार, बदनदर्द, थकान जैसे हो सकते हैं। लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं कि सभी को ऐसे लक्षण हों।

जब विश्व के अधिकांश लोगों को टीका नहीं लगा है तब टीकाकृत लोगों को बूस्टर शॉट देना कितना नैतिक है?

क्रोटी: मुझे लगता है कि यह एक झूठा विवाद है। समय के साथ टीके एक्सपायर हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में बेहतर तो यह है कि अमेरिका में जिन लोगों को टीका नहीं लगा है उनको टीकाकृत कर दिया जाए। यह विकल्प बूस्टर शॉट देने से बेहतर होगा। 

गाउंडर: यह तो स्पष्ट है कि लोगों को अतिरिक्त खुराक देने से कुछ खास परिणाम नहीं मिलने वाले हैं। बल्कि बिना टीका लगे लोगों का टीकाकरण करना सामुदायिक रूप से प्रसार को थामने के लिए अधिक प्रभावी हो सकता है।(स्रोत फीचर्स)

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क्या वाकई 20 सेकंड हाथ धोना ज़रूरी है?

टीवी पर हैंडवाश का एक विज्ञापन आता है जिसमें एक बच्चा अच्छी तरह मलकर हाथ धोते दिखता है, तो उसके दोस्त उससे पूछते हैं तेरा साबुन स्लो है क्या और फटाफट अपने हाथ उस हैंडवाश से धोकर निकल जाते हैं जो दावा करता है कि वह 10 सेकंड में कीटाणुओं का सफाया कर डालता है।

लेकिन भौतिकी का सामान्य मॉडल बताता है कि हाथों से वायरस या बैक्टीरिया से छुटकारा पाने का कोई तेज़ तरीका नहीं है। झाग बनने की द्रव गतिकी के विश्लेषण के अनुसार वायरस या बैक्टीरिया को हाथों से हटाने के लिए हाथों को धीमी गति से कम से कम 20 सेकंड तक तो धोना ही चाहिए। हाथ धोने का यह समय सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए समय के बराबर है।

हाथ धोने के सरल से काम में जटिल भौतिकी कार्य करती है। हाथ धोते समय जब हाथ आपस में रगड़ते हैं तो दोनों हाथों के बीच पानी और साबुन की एक पतली परत होती है। इसकी भौतिकी पर प्रकाश डालने के लिए पॉल हैमंड ने द्रव गतिकी के लूब्रिकेशन सिद्धांत का सहारा लिया, जो दो सतहों के बीच द्रव की पतली परत की भौतिकी का वर्णन करता है। हैमंड ने इस सिद्धांत (इसके सूत्र) का उपयोग कर एक सरल मॉडल तैयार किया जो यह अनुमान लगाता है कि हाथ से कीटाणुओं या रोगणुओं को हटाने में कितना समय लगता है। उन्होंने पाया कि हाथों से रोगाणुओं का सफाया करने के लिए कम से कम 20 सेकंड तक हाथ रगड़कर धोना ज़रूरी है।

हालांकि विश्लेषण में हाथ धोने के लिए इस्तेमाल किए गए रसायन और जीव वैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में नहीं रखा गया, लेकिन यह परिणाम आगे के अध्ययनों के लिए रास्ता खोलते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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बच्चों में ‘लॉकडाउन मायोपिया’

गभग डेढ़ साल से बच्चे घर पर हैं। और तब से उनकी शिक्षा और मनोरंजन डिजिटल स्क्रीन में सिमट गए हैं। इसका मतलब है कि वे अधिक समय तक मोबाइल फोन देख रहे हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के फैलने के बाद से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टिता) के मामले बढ़े हैं। यह आंखों का ऐसा विकार है जिसमें दूर की चीज़ें देखने में कठिनाई होती है।

अग्रवाल आई हॉस्पिटल के विशेषज्ञ चिकित्सकों का कहना है कि बच्चों में ‘भेंगेपन’ के मामले भी अधिक देखे जा रहे हैं। एक निजी अस्पताल में सलाहकार नेत्र रोग विशेषज्ञ पलक मकवाना के अनुसार, ‘हमारे आंकड़े बताते हैं कि इस महामारी दौरान 5-15 वर्ष की उम्र के बच्चों में मायोपिया के मामलों में 100 प्रतिशत वृद्धि और भेंगापन के मामलों में पांच गुना वृद्धि हुई है।’

डॉ. मकवाना बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान कंप्यूटर, लैपटॉप, और मोबाइल फोन या टैबलेट के माध्यम से काम हुआ, और इस दौरान बार-बार ब्रेक भी नहीं लिए गए। शैक्षणिक व अन्य उद्देश्यों से स्क्रीन को घूरने के समय में काफी वृद्धि हुई है। आंखों पर पड़ने वाला यह तनाव भेंगेपन का कारण हो सकता है और मायोपिया को बढ़ावा देता है।

सलाहकार नेत्र रोग विशेषज्ञ टी. श्रीनिवास ने बताते हैं कि कोविड-19 महामारी की वजह से इस समस्या में तेज़ी आई है। चूंकि खुद को और परिवार को सुरक्षित रखना ही लोगों की सर्वोच्च प्राथमिकता थी इसलिए लोग नेत्र रोग विशेषज्ञों सहित अन्य चिकित्सकों से भी मुलाकात से बचते रहे। वे आगे बताते हैं, ‘बच्चों का नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास जाना नहीं हो पाने की वजह से कई बच्चे नामुनासिब पॉवर का चश्मा पहनते रहे, जिससे उनकी आंखों पर ज़ोर पड़ा। इससे उनकी नज़र और भी कमज़ोर हुई। बिना ब्रेक लिए लगातार डिजिटल स्क्रीन पर काम ने इस समस्या को और बढ़ाया। अक्सर 21 वर्ष की आयु तक नेत्रगोलक की साइज़ बदलती है। आम तौर पर बढ़ती उम्र में चश्मे का नंबर बदलता है। गलत नंबर वाले चश्मों का उपयोग और अधिक समय डिजिटल स्क्रीन पर बिताने से दृष्टि और भी कमज़ोर हो सकती है।’

मौजूदा हालात में, ऑनलाइन कक्षाओं से बचा नहीं जा सकता है। इसलिए डॉ. मकवाना का सुझाव है कि बच्चे कक्षा में शामिल होने के लिए मोबाइल फोन की बजाय लैपटॉप या डेस्कटॉप का उपयोग करें क्योंकि बड़ी स्क्रीन और आंखों के बीच की दूरी अधिक होती है। इसके अलावा, स्वस्थ और संतुलित आहार के साथ-साथ मैदानी खेल खेलने और दिन में एक से दो घंटे धूप में रहने की सलाह दी जाती है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डेल्टा संस्करण अधिक संक्रामक क्यों?

ति-संक्रामक डेल्टा संस्करण का प्रकोप बढ़ने के मद्देनज़र वैज्ञानिक इसके तेज़तर प्रसार का जैविक आधार समझने का प्रयास कर रहे हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि डेल्टा संस्करण में उपस्थित एक अमीनो अम्ल में परिवर्तन से वायरस का प्रसार तेज़तर हुआ है। यूके में किए गए अध्ययन से पता चला है कि अल्फा संस्करण की तुलना में डेल्टा संस्करण 40 प्रतिशत अधिक प्रसारशील है।

युनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास मेडिकल ब्रांच के वायरोलॉजिस्ट पी-यौंग शी के अनुसार डेल्टा संस्करण की मुख्य पहचान ही संक्रामकता है जो नई ऊंचाइयों को छू रही है। शी की टीम और अन्य समूहों ने सार्स-कोव-2 के स्पाइक प्रोटीन में एक अमीनो अम्ल में परिवर्तन की पहचान की है। यह वायरल अणु कोशिकाओं की पहचान करने और उनमें घुसपैठ करने के लिए ज़िम्मेदार है। P681R नामक यह परिवर्तनएक अमीनो अम्ल प्रोलीन को आर्जिनीन में बदल देता है, जो स्पाइक प्रोटीन की फ्यूरिन क्लीवेज साइट में होता है।

जब चीन में पहली बार सार्स-कोव-2 की पहचान की गई थी तब अमीनो अम्ल की इस छोटे खंड की उपस्थिति ने खतरे के संकेत दिए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह परिवर्तन इन्फ्लुएंज़ा जैसे वायरसों में बढ़ी हुई संक्रामकता से जुड़ा पाया गया है। लेकिन सर्बेकोवायरस कुल में पहले कभी नहीं पाया गया था। सर्बेकोवायरस वायरसों का वह समूह है जिसमें सार्स-कोव-2 सहित कोरोनावायरस शामिल हैं। यह मामूली सा खंड एक बड़े खतरे का द्योतक था।

गौरतलब है कि कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए ज़रूरी होता है कि मेज़बान कोशिका का प्रोटीन सार्स-कोव-2 प्रोटीन को दो बार काटे। सार्स-कोव-1 में दोनों बार काटने की प्रक्रिया वायरस के कोशिका से जुड़ने के बाद होती हैं। लेकिन सार्स-कोव-2 में फ्यूरिन क्लीवेज साइट होने का मतलब है कि काटने की पहली प्रक्रिया संक्रमित कोशिका से निकलने वाले नए वायरस में ही हो जाती है। ये पूर्व-सक्रिय वायरस कोशिकाओं को अधिक कुशलता से संक्रमित कर सकते हैं।

देखा जाए तो डेल्टा ऐसा पहला संस्करण नहीं है जिसमें फ्यूरिन क्लीवेज साइट को बदलने वाला उत्परिवर्तन होता है। अल्फा संस्करण में भी इसी स्थान पर एक अलग अमीनो अम्ल का परिवर्तन पाया जाता है। लेकिन डेल्टा में हुए उत्परिवर्तन का प्रभाव अधिक होता है।

शी की टीम ने यह भी पाया है कि डेल्टा संस्करण में स्पाइक प्रोटीन अल्फा संस्करण की तुलना में अधिक प्रभावी तौर से काटा जाता है। इम्पीरियल कॉलेज लंदन की वायरोलॉजिस्ट वेंडी बारक्ले और उनकी टीम को भी इसी तरह के परिणाम मिले थे। दोनों समूहों द्वारा किए गए आगे के प्रयोगों से पता चला है कि स्पाइक प्रोटीन के इतनी कुशलता से कटने के पीछे P681R परिवर्तन काफी हद तक ज़िम्मेदार है।

वर्तमान में शोधकर्ता P681R और डेल्टा की संक्रामकता के बीच सम्बंध स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। शी की टीम ने मनुष्य के श्वसन मार्ग की संवर्धित उपकला कोशिकाओं को समान संख्या में अल्फा और डेल्टा के वायरस से संक्रमित किया और पाया कि डेल्टा संस्करण ने काफी तेज़ी से अल्फा को संख्या में पीछे छोड़ दिया। यही पैटर्न हकीकत में भी दिखाई दे रहा है। जब शोधकर्ताओं ने P681R परिवर्तन को हटा दिया तो डेल्टा संस्करण को मिलने वाला लाभ खत्म हो गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस उत्परिवर्तन से एक कोशिका से दूसरी कोशिका में वायरस का प्रसार भी अधिक हुआ है।

हालांकि, इस बात के प्रमाण बढ़ रहे हैं कि P681R परिवर्तन डेल्टा का एक अहम गुण है लेकिन शोधकर्ता यह नहीं मानते कि यही एकमात्र उत्परिवर्तन है जो डेल्टा को लाभ प्रदान करता है। डेल्टा के स्पाइक प्रोटीन और अन्य प्रोटीन्स में भी कई अन्य प्रकार के महत्वपूर्ण उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार डेल्टा संस्करण के तेज़ी से बढ़ने के पीछे अन्य कारक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। डेल्टा के निकट सम्बंधी, कैपा नामक संस्करण में भी P681R सहित इसी प्रकार के उत्परिवर्तन थे लेकिन वह डेल्टा के समान विनाशकारी नहीं रहा। हारवर्ड मेडिकल स्कूल के जीव विज्ञानी बिंग चेंग के अनुसार कैपा का स्पाइक प्रोटीन काफी कम कटता है और डेल्टा की तुलना में कोशिका की झिल्ली से कम कुशलता से जुड़ता है। शोधकर्ताओं के अनुसार इस खोज से P681R की भूमिका पर काफी सवाल उठते हैं।

युगांडा के शोधकर्ताओं ने 2021 की शुरुआत में व्यापक रूप से फैले संस्करण में P681R परिवर्तन की पहचान की थी लेकिन यह डेल्टा के समान नहीं फैला जबकि इसने प्रयोगशाला अध्ययनों में वैसे गुण प्रदर्शित किए थे। वैज्ञानिकों की टीम ने महामारी की शुरुआत में वुहान में फैल रहे कोरोनावायरस में P681R परिवर्तन किया लेकिन इससे उसकी संक्रामकता में कोई वृद्धि देखने को नहीं मिली। इससे लगता है कि एक से अधिक उत्परिवर्तन की भूमिका हो सकती है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि डेल्टा में P681R की भूमिका के बावजूद फ्यूरिन क्लीवेज साइट पर परिवर्तन का महत्व रेखांकित हुआ है। और ऐसा परिवर्तऩ कई तरह से संभव है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड के स्रोत पर अभी भी अनिश्चितता

हाल ही में अमेरिकी खुफिया समुदाय ने राष्ट्रपति बाइडेन के आग्रह पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस दो-पृष्ठों की सार्वजनिक रिपोर्ट में टीम ने सभी उपलब्ध खुफिया रिपोर्टिंग और अन्य जानकारियों की जांच के बाद कुछ मुख्य परिणाम जारी किए हैं।

खुफिया समुदाय के अनुसार उसके पास सार्स-कोव-2 के स्रोत का पता लगाने के लिए पर्याप्त जानकारी ही नहीं है जिससे यह बताया जा सके कि यह जीवों से मनुष्यों में आया या फिर प्रयोगशाला से दुर्घटनावश निकला है। महत्वपूर्ण बात यह है कि खुफिया समुदाय के अंदर ही कोविड के संभावित स्रोत को लेकर सहमति नहीं है और दोनों परिकल्पनाओं के समर्थक मौजूद हैं।

फिर भी वे अपने मूल्यांकन के कुछ बिंदुओं पर एकमत हुए हैं। जैसे, दिसंबर 2019 में चीन के वुहान प्रांत में वायरस प्रकोप से पूर्व चीनी अधिकारियों को सार्स-कोव-2 की जानकारी नहीं थी। उनका अनुमान है कि सार्स-कोव-2 नवंबर 2019 के पहले ही उभरा था। एजेंसियों का यह भी मत है कि वायरस को जैविक हथियार के रूप में विकसित नहीं किया गया था।

इस दौरान बाइडेन ने चीनी सरकार से वुहान की ऐसी प्रयोगशालाओं के स्वतंत्र ऑडिट की अनुमति देने का आग्रह किया था जहां कोरोनावायरस पर अध्ययन किया जाता है। चीनी अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। खुफिया समुदाय का भी ऐसा मानना है कि कोविड-19 की उत्पत्ति के निर्णायक आकलन के लिए चीन के सहयोग की आवश्यकता होगी।

फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च सेंटर के जीव विज्ञानी जेसी ब्लूम ने खुफिया समुदाय के इन निष्कर्षों का समर्थन किया है। ब्लूम व 17 अन्य वैज्ञानिकों ने एक पत्र जारी करके वायरस उत्पत्ति की परिकल्पनाओं पर संतुलित विचार करने का आह्वान किया है।

हारवर्ड युनिवर्सिटी के जीव विज्ञानी विलियम हैनेज इस मूल्यांकन को काफी संतुलित मानते हैं और उनके अनुसार खुफिया समुदाय का निष्कर्ष प्राकृतिक उत्पत्ति की ओर अधिक झुका प्रतीत होता है। उनका यह भी कहना है कि किसी भी स्थिति में शुरुआती मनुष्यों के मामलों या वायरस-वाहक जीवों के सबूतों के बिना एक स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंच पाना काफी मुश्किल होगा।

कुछ अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार बाइडेन सरकार को इस महामारी की शुरुआत को समझने और इससे सम्बंधित सवालों का जवाब तलाशने के लिए ‘दुगने प्रयास’ की आवश्यकता होगी। हालांकि, अभी कोई ठोस जवाब तो हमारे नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में भी ऐसी ही अनिश्चितिता बनी रहेगी। वर्तमान में अमेरिकी सरकार भी समान विचारधारा वाले सहयोगियों के साथ मिलकर चीन सरकार पर दबाव बना रही है ताकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में सभी प्रासंगिक डैटा और साक्ष्यों की जांच करने की अनुमति मिल सके।(स्रोत फीचर्स)

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हल्दी के औषधि अणु – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

भारत के हर रसोईघर में पकने वाले भोजन में हल्दी किसी न किसी रूप में इस्तेमाल होती है। हमारे दैनिक भोजन में या तो कच्ची हल्दी या हल्दी पाउडर के रूप में डाली जाने वाली हल्दी में लगभग तीन प्रतिशत करक्यूमिन नामक सक्रिय घटक होता है। करक्यूमिन एक पॉलीफिनॉल डाइकिटोन है (यह स्टेरॉयड नहीं है)। शोधकर्ता बताते हैं कि हल्दी में पाइपेरीन नामक एक और घटक होता है, जो क्षारीय होता है। हमारी रसोई में उपयोग होने वाले एक अन्य मसाले, कालीमिर्च, के तीखेपन के लिए पाइपेरीन ही ज़िम्मेदार है। पाइपेरीन शरीर में करक्यूमिन का अवशोषण बढ़ाता है। यह हल्दी को उसके विभिन्न उपचारात्मक और सुरक्षात्मक गुण देता है।

हल्दी से भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम एशिया, बर्मा, इंडोनेशिया और चीन के लोग 4000 से भी अधिक सालों से परिचित हैं। यह हमारे दैनिक भोजन का महत्वपूर्ण अंग है। सदियों से इसे एक औषधि के रूप में भी जाना जाता रहा है। इसमें जीवाणु-रोधी, शोथ-रोधी और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। हर्बल औषधि विशेषज्ञ हल्दी का उपयोग गठिया, जोड़ों की जकड़न और जोड़ों के दर्द के पीड़ादायक लक्षणों के उपचार में करते थे। उनका यह भी दावा रहा है कि हल्दी गुर्दे की गंभीर क्षति को ठीक करने में मदद करती है। इनमें से  कुछ दावों को नियंत्रित क्लीनिकल परीक्षण कर जांचने की आवश्यकता है।

https://www.healthline.com पर हल्दी और उसके उत्पादों के कुछ साक्ष्य-आधारित लाभों की सूची दी गई है, जिनका उल्लेख यहां आगे किया गया है। इन लाभों के अलावा, हल्दी का सक्रिय अणु करक्यूमिन एक शक्तिशाली शोथ-रोधी और एंटी-ऑक्सीडेंट है; यह एक प्राकृतिक शोथ-रोधी है। लगातार बनी रहने वाली हल्की सूजन (शोथ) हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, और हृदय रोग और चयापचय सिंड्रोम को बढ़ावा देती है। शुक्र है कि करक्यूमिन रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार कर जाता है। (रक्त-मस्तिष्क अवरोध ऐसी कोशिकाओं की सघन परत है जो तय करती है कि रक्त में मौजूद कौन से अणु मस्तिष्क में जाएंगे और कौन से नहीं।) रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार करने की इसी क्षमता के चलते करक्यूमिन अल्ज़ाइमर के लिए ज़िम्मेदार एमीलॉइड प्लाक नामक अघुलनशील प्रोटीन गुच्छों के निर्माण को कम करता है या रोकता है। (हालांकि, इस संदर्भ में उपयुक्त जंतु मॉडल पर और मनुष्यों पर प्लेसिबो-आधारित अध्ययन की ज़रूरत है)। करक्यूमिन ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) को बढ़ावा देता है। BDNF एक ऐसा जीन है जो न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं) को बढ़ाता है। BDNF को बढ़ावा देकर करक्यूमिन स्मृति और सीखने में मदद करता है। कुछ हर्बल औषधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह कैंसर से भी बचा सकता है। कैंसर कोशिकाओं के मरने के साथ कैंसर का प्रसार कम होता है, और नई ट्यूमर कोशिकाओं का निर्माण रुक जाता है। गठिया और जोड़ों की सूजन में करक्यूमिन काफी प्रभावी पाया गया है। हर्बल औषधि चिकित्सक भी यही सुझाव देते आए हैं। यह अवसाद के इलाज में भी उपयोगी है। 60 लोगों पर 6 हफ्तों तक किए गए नियंत्रित अध्ययन में पाया गया है कि यदि अवसाद की आम दवाओं (जैसे प्रोज़ैक) को करक्यूमिन के साथ दिया जाए तो वे बेहतर असर करती हैं।

युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के गैरी स्मॉल और उनके साथियों का एक पेपर अमेरिकन जर्नल ऑफ जेरिएट्रिक साइकिएट्री में प्रकाशित हुआ है (doi: 10.1016/j.jagp.2017.10.10)। इस परीक्षण में शोधकर्ताओं ने 50 से 90 वर्ष की उम्र के 40 ऐसे वयस्कों पर अध्ययन किया जिन्हें भूलने की थोड़ी समस्या थी। उन्होंने 18 महीनों तक दिन में दो बार एक समूह को प्लेसिबो और दूसरे समूह को 90 मिलीग्राम करक्यूमिन दिया। अध्ययन की शुरुआत में और 18 महीने बाद सभी प्रतिभागियों का मानक आकलन परीक्षण किया गया, और उनके रक्त में करक्यूमिन का स्तर जांचा गया। इसके अलावा, अध्ययन के शुरू और 18 महीने बाद सभी प्रतिभागियों का पीईटी स्कैन भी किया गया ताकि उनमें अघुलनशील एमीलॉइड प्लाक का स्तर पता लगाया जा सके। अध्ययन में पाया गया कि करक्यूमिन का दैनिक सेवन ऐसे लोगों में स्मृति और एकाग्रता में सुधार कर सकता है जो मनोभ्रंश से पीड़ित न हों।

हाल ही में, मुंबई के एक समूह ने काफी रोचक अध्ययन प्रकाशित किया है, जो बताता है कि हल्दी कोविड-19 के रोगियों के उपचार में मदद करती है। शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के 40 रोगियों पर अध्ययन किया और पाया कि हल्दी रुग्णता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम कर सकती है। के. एस. पवार और उनके साथियों का यह पेपर फ्रंटियर्स इन फार्मेकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है: कोविड-19 के सहायक उपचार के रूप में पाइपेरीन और करक्यूमिन का मुख से सेवन: एक रैंडम क्लीनिकल परीक्षण। इसे नेट पर पढ़ा जा सकता है। अध्ययन महाराष्ट्र के एक 30-बेड वाले कोविड-19 स्वास्थ्य केंद्र में किया गया था। लाक्षणिक कोविड-19 के सहायक उपचार के रूप में पाइपेरीन के साथ करक्यूमिन का सेवन रुग्णता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम कर सकता है, और स्वास्थ्य तंत्र का बोझ कम कर सकता है। (वैसे बैंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जी. पद्मनाभन द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में पता चला है कि करक्यूमिन एक बढ़िया प्रतिरक्षा सहायक है)। यह वास्तव में एक उल्लेखनीय प्रगति है। इसे देश भर के केंद्रों में आज़माया जा सकता है जहां महामारी अभी भी बनी हुई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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