मानसिक थकान का रासायनिक आधार

कोई बहुत ही दिमाग खपाऊ काम करने का बाद अचानक कोई छोटी-मोटी बात ही याद नहीं रहती, जैसे नाश्ते में क्या खाया था या बाहर किस काम के लिए निकले थे। अब, एक अध्ययन बताता है कि घंटों तक कठिन दिमागी काम करने के बाद दिमाग क्यों जवाब दे जाता है – संभवत: ग्लूटामेट का विषाक्त मात्रा में निर्माण; ग्लूटामेट मस्तिष्क में प्रचुरता में पाया जाने वाला एक रासायनिक सिग्नल है।

मानसिक थकान की व्याख्या की यह पहली कोशिश नहीं है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना रहा है कि कठिन दिमागी कार्य करने में अधिक ऊर्जा खर्च होती है और ये मस्तिष्क को उसी तरह थका सकते हैं जैसे कठोर परिश्रम शरीर (मांसपेशियों) को थका देता है। कुछ वैज्ञानिक तो यह कहते हैं कि कृत्रिम मिठास वाली चीज़ें खाने-पीने की बजाय असली चीनी युक्त चीज़ें लेना दिमाग को पैना कर सकता है। लेकिन व्याख्या की कोशिश जारी है।

ऐसे ही एक प्रयास में पैरिस विश्वविद्यालय के तंत्रिका विज्ञानी एंटोनियस वाइलर और उनके साथियों ने मानसिक थकान से सम्बंधित व्यवहार – जैसे आसान और त्वरित संतुष्टि तलाशना या तैश में आकर निर्णय लेना – और ग्लूटामेट के स्तर के बीच सम्बंध पर ध्यान दिया। आम तौर पर ग्लूटामेट न्यूरॉन्स को उत्तेजित करता है। यह सीखने और स्मृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन इसकी अत्यधिक मात्रा मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को तबाह कर सकती है – इसके कारण कोशिका मृत्यु से लेकर दौरे पड़ने तक की समस्या हो सकती है।

ग्लूटामेट के स्तर पर निगरानी रखने के लिए शोधकर्ताओं ने एमआरआई तकनीक का उपयोग किया जिसके लिए दिमाग में सुई वगैरह नहीं चुभोनी पड़ती है। चूंकि मस्तिष्क का लेटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स वाला हिस्सा एकाग्रचित्त होने और योजना बनाने में मदद करता है इसलिए अध्ययन में मस्तिष्क के इसी हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया गया। देखा गया है कि जब व्यक्ति मानसिक रूप से थक जाता है तो यह हिस्सा सुस्त हो जाता है।

अध्ययन में शामिल 39 प्रतिभागियों को शोधकर्ताओं ने दो समूहों में बांटा। एक समूह को मानसिक रूप से थकाने वाले मुश्किल कार्य दिए। इस समूह को एक तो यह बताना था कि कंप्यूटर स्क्रीन पर तेज़ी से सिलसिलेवार आते अक्षर हरे रंग के थे या लाल, अपरकेस (केपिटल) थे या लोअरकेस वगैरह। दूसरा उन्हें बताना था कि स्क्रीन पर दिखाई गई संख्या तीन कदम पहले दिखाए गए अक्षर से मेल खाती है या नहीं। प्रयोग लगभग 6 घंटे चला। दूसरे समूह के प्रतिभागियों को इन्हीं कार्यों के आसान संस्करण दिए गए थे।

प्रयोग के दौरान समय बीतने के साथ शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की संज्ञानात्मक थकान को कई बार मापा। इसके लिए उन्हें ऐसे विकल्पों में से चुनने का कहा गया जिनमें संयम की ज़रूरत पड़ती है – जैसे उन्हें चुनना था कि तत्काल मिलने वाले पैसे न लेकर बाद में कहीं ज़्यादा पैसे लें। शोधकर्ताओं ने पाया कि आसान कार्य वाले समूह की तुलना में कठिन कार्य वाले समूह ने लगभग 10 प्रतिशत अधिक बार आवेगपूर्ण निर्णय किए। साथ ही साथ, उनके लेटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में ग्लूटामेट का स्तर लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गया था। ‘आसान-कार्य’ समूह में ऐसा पैटर्न दिखाई नहीं दिया। नतीजे करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि अत्यधिक दिमागी काम से मस्तिष्क में ग्लूटामेट का विषाक्त स्तर पर निर्माण होता है। लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह नींद की ताकत को रेखांकित करता है, जो अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालकर मस्तिष्क को ‘साफ’ करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में ग्लूटामेट के स्तर के आधार पर भारी थकान और अवसाद या कैंसर जैसी स्थितियों में स्वास्थ्य लाभ की निगरानी की जा सकती है।

कई शोधकर्ताओं को संदेह है कि मस्तिष्क में एकत्रित अपशिष्ट इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते होंगे। संभवत: ग्लूटामेट शरीर के अन्य कार्यों के समन्वय में भूमिका निभाता हो। लेकिन यदि ग्लूटामेट की ऐसी भूमिका की पुष्टि होती है तो औषधियों के विकास में मदद मिलने की उम्मीद है।

बहरहाल, इस अध्ययन ने मानसिक थकान और ग्लूटामेट की भूमिका को लेकर बहस गर्मा दी है। आगे के अध्ययन स्थिति को और स्पष्ट कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वास्थ्य: चुनौतियां और अवसर – प्रतिका गुप्ता

देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस अवसर पर प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिका दी लैंसेट के संपादकीय में भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के पुनर्गठन पर दी लैंसेट नागरिक आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा हुई है और विक्रम पटेल की टिप्पणी प्रकाशित की गई है। विक्रम पटेल पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया सहित कई स्वास्थ्य संस्थाओं से सम्बद्ध रहे हैं और हारवर्ड मेडिकल स्कूल के डिपार्टमेंट ऑफ ग्लोबल हेल्थ एंड सोशल मेडिसिन में प्रोफेसर हैं।

संपादकीय कहता है कि यद्यपि भारत में स्वतंत्रता के बाद शिशु मृत्यु दर जैसे कई स्वास्थ्य संकेतकों में पर्याप्त सुधार दिखा है लेकिन कई अन्य क्षेत्रों में प्रगति नाकाफी रही है। इस मामले में राज्यों और क्षेत्रों की स्थिति भी काफी अलग-अलग है। वर्तमान प्रधान मंत्री का दृष्टिकोण है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत एक बड़ी भूमिका निभाए, और वह अधिक कुशल, प्रतिस्पर्धी और लचीला बने। 2020 में राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने कहा था कि यदि देश खुद को ‘आत्मनिर्भर’ बना लेता है तो 21वीं सदी भारत की हो सकती है।

लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत को अपने नागरिकों की स्वास्थ्य और विकास सम्बंधी ज़रूरतों पर ध्यान देना होगा। करोड़ों भारतीय अब भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। सुर्खियां बटोरने वाली नीतियों के बावजूद राज्य व उसके नेतागण बड़ी संख्या में अपने नागरिकों तक नहीं पहुंच सके हैं।

कोविड-19 ने भारत की कई क्षमताओं और कमज़ोरियों को उजागर किया। कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों में भारत एक था। इतने बड़े पैमाने पर फैली महामारी का प्रबंधन करने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली बिल्कुल तैयार नहीं थी और आवश्यक सुविधाओं/उपकरणों का अभाव था। महामारी के कारण सामान्य टीकाकरण, पोषण कार्यक्रम और गैर-संचारी रोगों की निगरानी जैसी स्वास्थ्य सेवाओं में आए व्यवधान के बाद अब बहाली योजनाओं की तत्काल आवश्यकता है।

देखा जाए तो भारत का कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम सफल रहा है और साथ-साथ डिजिटल प्रौद्योगिकी और टेलीमेडिसिन का विकास भी हुआ है जिसके चलते देश के कई इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने और निगरानी करने में मदद मिली है। सरकार अब स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे को विस्तार देने पर ध्यान दे रही है।

2018 के बाद से 1,20,000 से अधिक स्वास्थ्य और वेलनेस केंद्र खोले गए हैं जो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं। साल के अंत तक 1,50,000 केंद्र और तैयार हो जाएंगे। अलबत्ता समय ही बताएगा कि क्या ये केंद्र वाकई स्वास्थ्य में सुधार कर पाएंगे। सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इन केंद्रों में स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ता मौजूद हों। 2014 से 2022 के बीच चिकित्सा में स्नातक पदों में 75 प्रतिशत और स्नातकोत्तर पदों में 93 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन यह सुनिश्चित करने में समय लगेगा कि चिकित्सा केंद्रों में पर्याप्त पेशेवर कामकाजी चिकित्सक उपलब्ध हों। प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त गैर-चिकित्सक स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को प्रशिक्षित करना भी ज़रूरी है।

भारत में लिंग-भेद अब भी स्वास्थ्य और विकास में एक बड़ी बाधा है। लड़कियों (महिलाओं) के जीवित रहने में दिक्कतें और लैंगिक भेदभाव बरकरार है। कुपोषण और एनीमिया बहुत अधिक हैं और पूरक आहार कार्यक्रमों के बावजूद स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम है और श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी में काफी गिरावट आई है। घरेलू हिंसा, बाल विवाह और स्कूल ड्रॉपआउट जैसे क्षेत्रों में जो तरक्की हुई थी वह महामारी के कारण पलट गई है।

आंकड़े बताते हैं कि बढ़ते एकल परिवार वाले समाज में खासी संख्या में बुज़ुर्ग महिलाओं – खास कर विधवा और अकेली महिलाओं – के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इन लैंगिक पूर्वाग्रहों को पलटने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत मानदंडों में व्यापक बदलाव की ज़रूरत होगी। महिलाओं की स्वायत्तता को बेहतर बनाने के लिए बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाना महत्वपूर्ण है जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पानी और स्वच्छता के साथ-साथ श्रम और रोज़गार जैसे क्षेत्र शामिल हों। लेकिन ऐसे राजनैतिक माहौल में कुछ भी नहीं बदलने वाला, जो इस अंतर को स्वीकार तक नहीं करता, इसे पाटने के लिए काम करने की बात तो छोड़ ही दें।

वर्ष 2023 के दौरान भारत शायद दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। युवा आबादी बढ़ने से जनांकिक लाभ मिला है, लेकिन अब प्रजनन दर थम रही है। नतीजतन, भारत के पास परिस्थिति से लाभ उठाने का सीमित समय है। और लाभ उठाने के लिए अपने लोगों के स्वास्थ्य और खुशहाली में निवेश की आवश्यकता होती है। मात्र राष्ट्रवादी आव्हानों से और ऐसी लुभावनी स्वास्थ्य देखभाल नीतियों से काम नहीं चलेगा जिनमें जवाबदेही का अभाव हो। सरकार को सभी नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार की रक्षा करनी होगी। सरकार को स्वास्थ्य में उपचार से रोकथाम के उपायों की ओर बढ़ना चाहिए। सिविल सोसायटी की भूमिका को अंगीकार करने की ज़रूरत है। युवाओं में निवेश करना चाहिए ताकि वे अर्थव्यवस्था और समाज में पूर्ण भागीदारी कर सकें। ज़रूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार को स्वास्थ्य के सामाजिक, राजनीतिक, वाणिज्यिक और सांस्कृतिक निर्धारकों को संबोधित करना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि जब तक प्रत्येक भारतीय – लिंग, जाति, वर्ग, धर्म या क्षेत्र से स्वतंत्र – राज्य के समर्थन से सक्षम नहीं बनता और अपनी पूरी संभावनाओं को साकार नहीं करता, तब तक वैश्विक शक्ति बनने की उम्मीद एक मरीचिका ही रहेगी। (स्रोत फीचर्स)

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मद्धिम संगीत से दर्द में राहत

र्ष 1960 में दंत चिकित्सकों के एक समूह ने एक दिलचस्प अध्ययन प्रकाशित किया था: जब उन्होंने ऑपरेशन के दौरान अपने मरीज़ों के लिए संगीत बजाया, तो मरीज़ों को दर्द का कम अहसास हुआ। कुछ मरीज़ों को तो नाइट्रस ऑक्साइड (लॉफिंग गैस) या लोकल निश्चेतक देने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी। अब चूहों पर हुए एक अध्ययन ने स्पष्ट किया है कि यह क्यों काम करता है।

दरअसल 1960 के उपरोक्त अध्ययन के बाद से कई वैज्ञानिक मोज़ार्ट से लेकर माइकल बोल्टन तक के संगीत का निश्चेतक प्रभाव जानने के लिए अध्ययन करते रहे हैं। एक अध्ययन में पाया गया था कि फाइब्रोमाएल्जिया के मरीज़ों को उनका पसंदीदा संगीत सुनते समय कम दर्द होता था।

संगीत दर्द में क्यों राहत देता है, इसे बेहतर समझने के लिए यू.एस. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल एंड क्रेनियोफेशियल रिसर्च के न्यूरोबायोलॉजिस्ट युआनयुआन लियू और उनके साथियों ने चूहों की ओर रुख किया। उन्होंने एक कमरे में कृन्तकों को दिन में 20 मिनट (कम से कम मनुष्यों के लिए) सुखद सिम्फोनिक संगीत – बाक का रेजॉइसेंस – 50 या 60 डेसिबल पर सुनाया, और पृष्ठभूमि का शोर 45 डेसिबल के आसपास था।

इन सत्रों के दौरान, शोधकर्ताओं ने चूहों के पंजे में एक दर्दनाक रसायन प्रविष्ट किया। फिर, उन्होंने अलग-अलग तीव्रता से पतला तार पंजे पर चुभाया और कृन्तकों की प्रतिक्रिया देखी। शोधकर्ताओं का मानना था कि यदि वे छटपटाते, चाटते, या अपना पंजा वापस खींचते हैं तो वे दर्द महसूस कर रहे हैं।

अध्ययन में उन्होंने पाया कि केवल धीमी आवाज़ (50 डेसिबल) पर ध्वनि ने चूहों को सुन्न कर दिया था। जब शोधकर्ताओं ने उनके सूजे हुए पंजे को तार से चुभाया, तो चूहे छटपटाए नहीं। दूसरी ओर, तेज़ आवाज़ में चूहे अधिक संवेदनशील दिखे – उन्होंने सिर्फ एक तिहाई दबाव पर ही काफी तेज़ प्रतिक्रिया दी। ठीक इसी तरह की प्रतिक्रिया संगीत की अनुपस्थिति में भी देखी गई।

शोधकर्ताओं ने कर्कश संगीत (रेजॉइसेंस को अप्रिय ध्वनि में बदलकर) और मिश्रित शोर के साथ भी परीक्षण किया। साइंस पत्रिका में उन्होंने बताया है कि पृष्ठभूमि के शोर से थोड़ा तेज़ बजाने पर ये सभी ध्वनियां दर्द को दबा सकती हैं। लगता है कि ध्वनि की तीव्रता ही महत्वपूर्ण है।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने चूहों के श्रवण कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का ध्वनि प्रसंस्करण क्षेत्र) में लाल फ्लोरोसेंट रंग प्रविष्ट किया और फिर उपरोक्त अध्ययन दोहराया। उन्होंने पाया कि संवेदनाओं के प्रसंस्करण केंद्र थैलेमस के कुछ घने क्षेत्रों में अत्यधिक फ्लोरोसेंस है, जिससे लगता है कि इस क्षेत्र और श्रवण कॉर्टेक्स के बीच की कड़ियां दर्द को दबाने में भूमिका निभाती हैं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में छोटे इलेक्ट्रोड लगाए और पाया कि अपेक्षाकृत मद्धिम ध्वनियों ने श्रवण कॉर्टेक्स से निकलने वाले संकेतों को कम कर दिया था। जब श्रवण कॉर्टेक्स और थैलेमस के बीच सम्बंध को अवरुद्ध किया गया, तो चूहों को कम दर्द महसूस हुआ।

कुल मिलाकर टीम ने पाया कि मंद आवाजें श्रवण कॉर्टेक्स और थैलेमस के बीच संकेतों को बोथरा कर देती हैं, जिससे थैलेमस में दर्द प्रसंस्करण कम होता है। यह प्रभाव चूहों को संगीत सुनाना बंद करने के दो दिन बाद तक रहता है।

इस अध्ययन से कुछ सुराग तो मिले हैं लेकिन मनुष्यों पर अध्ययन की ज़रूरत है। लेकिन चूहों की तरह मानव मस्तिष्क में कुछ प्रविष्ट नहीं किया जा सकता, इसलिए संगीत बजाकर एमआरआई से उनकी थैलेमस गतिविधि पर नज़र रखना होगी।

कई लोगों को शायद लगेगा कि दर्द से राहत पाने के लिए मोज़ार्ट का संगीत सुनना चाहिए लेकिन अध्ययन से स्पष्ट है कि मंद आवाज़ में कोई भी शोर दर्द से राहत दे सकता है।

बहरहाल, मनुष्यों को राहत मिले ना मिले, लेकिन ये तरीका प्रयोगों के दौरान कृन्तकों को होने वाले दर्द को कम करने का एक सस्ता और आसान तरीका हो सकता है। चूहों पर इस तरह के प्रयोग चिकित्सा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। (स्रोत फीचर्स)

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Y गुणसूत्र खो देने के खतरे

जैसे-जैसे पुरुषों की उम्र बढ़ती है उनके न केवल बाल झड़ते हैं, मांसपेशियां कमज़ोर होने लगती हैं बल्कि उनकी कोशिकाओं से Y गुणसूत्र नदारद होने लगते हैं। विदित हो कि स्त्रियों और पुरुषों में 22 जोड़ी गुणसूत्र तो एक जैसे होते हैं लेकिन तेइसवीं जोड़ी में पुरुषों में दो गुणसूत्र अलग-अलग होते हैं (X और Y) जबकि स्त्रियों में दोनों एक जैसे (X) होते हैं।

वैज्ञानिक बताते आए हैं कि Y गुणसूत्रों का ह्रास कुछ बीमारियों और समय-पूर्व मृत्यु का जोखिम पैदा करता है, लेकिन इस बात के प्रमाण परिस्थितिजन्य थे। अब, शोधकर्ताओं ने बताया है कि जब उन्होंने नर चूहों से Y गुणसूत्र हटाए तो ऐसे चूहों की मृत्यु अपेक्षाकृत जल्दी हुई; संभवतः Y गुणसूत्र की अनुपस्थिति के चलते उनके हृदय सख्त पड़ गए थे।

मर्दानगी का पर्याय माना जाने के बावजूद Y गुणसूत्र होता पिद्दी सा है। इसमें केवल 71 जीन्स होते हैं जो X गुणसूत्र के जीन्स का दसवां हिस्सा भी नहीं है। संभवत: यही कारण है कि जब कोशिका विभाजित होती है तो कभी-कभी Y गुणसूत्र अगली संतान कोशिका में हस्तांतरित नहीं होते।

शोधकर्ताओं ने रक्त के नमूनों के विश्लेषण में पाया है कि 70 वर्ष के लगभग 40 प्रतिशत पुरुषों और 93 वर्ष के लगभग 57 प्रतिशत पुरुषों की कुछ श्वेत रक्त कोशिकाओं से Y गुणसूत्र नदारद थे। कुछ वृद्ध पुरुषों में तो 80 प्रतिशत से अधिक श्वेत रक्त कोशिकाओं में Y गुणसूत्र नदारद पाए गए हैं।

कोशिकाएं Y गुणसूत्र के बिना भी जीवित रह सकती हैं और विभाजन कर सकती हैं। लेकिन जिन पुरुषों की कुछ कोशिकाओं में Y गुणसूत्र नहीं होता उनमें हृदय रोग, कैंसर, अल्ज़ाइमर और अन्य उम्र सम्बंधी बीमारियां होने की संभावना रहती है।

तो क्या Y गुणसूत्र हटाने से स्वास्थ्य को नुकसान होता है, यह जानने के लिए वर्जिनिया विश्वविद्यालय के केनेथ वाल्श और उनके साथियों ने 38 चूहों पर अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण किया। उन्होंने जीन-संपादन तकनीक की मदद से कुछ चूहों की अस्थि मज्जा की कोशिकाओं से Y गुणसूत्र हटा दिया, फिर इन परिवर्तित कोशिकाओं को ऐसे युवा नर चूहों में प्रत्यारोपित किया जिनकी अस्थि मज्जा पहले ही हटा दी गई थी। इस बदली से चूहों से Y गुणसूत्र पूरी तरह गायब नहीं हुए, लेकिन इससे 49-81 प्रतिशत श्वेत रक्त कोशिकाएं में Y गुणसूत्र विहीन हो गईं – यह प्रतिशत लगभग कई पुरुषों में Y गुणसूत्र के ह्रास के समकक्ष है। अध्ययन में नियंत्रण समूह (कंट्रोल) के 37 चूहों में भी अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण किया गया था लेकिन उनमें Y गुणसूत्र बरकरार रखे गए थे।

शोधकर्ताओं ने लगभग 2 साल तक दोनों समूहों के चूहों की निगरानी की। इस दौरान Y गुणसूत्र की कमी वाले चूहों के मरने की अधिक संभावना देखी गई – इन चूहों में से केवल 40 प्रतिशत ही प्रत्यारोपण के बाद 600 दिनों तक जीवित रहे जबकि नियंत्रण समूह के लगभग 60 प्रतिशत जीवित रहे।

Y गुणसूत्र गंवाने वाले चूहों के हृदय भी कमज़ोर थे। लगभग 15 महीनों के बाद उनके हृदय की संकुचन शक्ति तकरीबन 20 प्रतिशत कम हो गई थी। इसके अलावा, उनमें सख्त संयोजी ऊतक बनने लगे थे, जिसे फाइब्रोसिस कहते हैं। इसके चलते हृदय सख्त हो जाता है और उसकी रक्त पंप करने की क्षमता कम हो जाती है।

उपरोक्त अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण के दौरान चूहों के हृदय की मांसपेशियों की कोशिकाओं से Y गुणसूत्र नहीं हटाए गए थे। अस्थि मज्जा में बनने वाली मैक्रोफेज नामक श्वेत रक्त कोशिकाएं हृदय में पहुंच जाती हैं। देखा गया कि हृदय में Y गुणसूत्र की कमी वाली मैक्रोफेज कोशिकाओं ने फाइब्रोसिस को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था।

कुछ ऐसा ही इंसानों में होता होगा। दल ने यू.के. बायोबैंक से 15,000 से अधिक पुरुषों के डीएनए और उनकी उत्तरजीविता की जानकारी ली। विश्लेषण में पाया कि जिन पुरुषों ने कम से कम 40 प्रतिशत श्वेत रक्त कोशिकाओं से Y गुणसूत्र गंवा दिए थे उनकी ऐसे पुरुषों की अपेक्षा रक्त परिसंचरण तंत्र तंत्र की बीमारियों से मरने की संभावना 31 प्रतिशत अधिक थी जिनकी कोशिकाओं में Y गुणसूत्र पर्याप्त रूप से मौजूद थे। मृत्यु के कारणों में हार्ट फेल सहित कई हृदय सम्बंधी तकलीफें पता चलीं।

वाल्श कहते हैं कि वैज्ञानिक लंबे समय से स्वास्थ्य पर Y गुणसूत्र के प्रभाव को नज़रअंदाज़ करते आए हैं क्योंकि इसमें बहुत कम जीन्स होते हैं लेकिन साक्ष्य बताते हैं कि इसे खोने से जीवन के कई वर्ष कम हो सकते हैं।

कुछ विशेषज्ञ चेताते हैं कि ये परिणाम इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं कि चूहों की मृत्यु फाइब्रोसिस से हुई है। Y गुणसूत्र अनुपस्थित होने पर भी फाइब्रोसिस काफी हल्का था। और तो और, ऐसे चूहों के हृदय की स्थिति इतनी भी कमज़ोर नहीं थी, और जानलेवा नहीं लगती। हो सकता है कि चूहे हृदय सम्बंधी किसी अन्य कारण से मर रहे हों। जो भी हो लेकिन Y गुणसूत्र का किसी न किसी तरह से हृदय पर प्रभाव दिखता है। (स्रोत फीचर्स)

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नए उपचारों के लिए प्रकृति का सहारा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यम, सुशील चंदानी

चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के लिए ऐसी नई-नई औषधियों की आवश्यकता होती है जिनमें वांछित जैविक गुणधर्म हों। आशावादी सोच यह है कि विभिन्न तकनीकी मोर्चों पर तीव्र प्रगति के चलते नई दवाइयों की खोज और निर्माण आसान होता जाएगा।

आणविक स्तर पर रोग प्रक्रियाओं की बढ़ती समझ ने औषधियों के संभावित लक्ष्यों की एक लंबी सूची उपलब्ध कराई है। कंप्यूटर की मदद से ‘तर्कसंगत ड्रग डिज़ाइन’, कार्बनिक रसायन शास्त्रियों द्वारा इन कंप्यूटर-जनित औषधियों को बनाया जाना, और फिर त्वरित गति से इनकी जांच – जिसमें औषधियों के परीक्षण के लिए ऑटोमेशन का उपयोग किया जाता है – ने नई खोजों में सहायता की है। फिर भी, नई दवाइयों का वास्तविक चिकित्सकीय उपयोग करने की गति अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।

प्राकृतिक उत्पाद

हमारे आसपास की प्राकृतिक दुनिया नए उपचारों का एक जांचा-परखा स्रोत रही है – पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली हमेशा से प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थी। प्राकृतिक उत्पाद ऐसे रसायन होते हैं जो मिट्टी और पानी में पनपने वाले पौधों और सूक्ष्मजीवों में पाए जाते हैं।

1946 में हुए कैंसर-रोधी दवा के पहले क्लीनिकल परीक्षण से लेकर 2019 तक के सभी स्वीकृत कैंसर-रोधी औषधीय अणुओं में से 40 प्रतिशत अणु या तो प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थ हैं, या प्राकृतिक उत्पादों से प्राप्त किए गए हैं। इसी प्रकार से, 1981-2019 के दौरान की 162 नए एंटीबायोटिक उपचारों में से आधे या तो शुद्ध प्राकृतिक उत्पाद हैं या प्रकृति-व्युत्पन्न हैं यानी कि वे प्रयोगशालाओं में डिज़ाइन किए गए हैं लेकिन प्रकृति में पाए जाने वाले अणुओं के लगभग समान हैं (न्यूमैन व क्रैग, जर्नल ऑफ नेचुरल प्रोडक्ट्स, 2020)।

मसलन एज़िथ्रोमाइसिन नामक एंटीबायोटिक। इसे पहली बार क्रोएशिया स्थित ज़ग्रेब के रसायनज्ञों द्वारा संश्लेषित किया गया था। उन्होंने बड़ी चतुराई से प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली और आम तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक एरिथ्रोमाइसिन-ए के अणु में एक अतिरिक्त नाइट्रोजन परमाणु जोड़ा था। एरिथ्रोमाइसिन के साइड प्रभावों की तुलना में इस संश्लेषित दवा के साइड प्रभाव कम थे, और आज यह चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली सबसे आम एंटीबायोटिक दवाओं में से एक है। इसके विपरीत, 1981 से 2019 के बीच अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन को नए रासायनिक पदार्थों के रूप में प्रस्तुत सभी 14 हिस्टामाइन-रोधी दवाइयां (जैसे सिट्रेज़िन) शुद्धत: संश्लेषित आविष्कार हैं।

कई शक्तिशाली प्राकृतिक उत्पाद अपने मूल स्रोत में अत्यल्प मात्रा में मौजूद होते हैं, जिसके चलते प्रयोगशाला में जांच के लिए इनकी पर्याप्त मात्रा एकत्र करना मुश्किल हो जाता है। ये दर्जनों अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ पाए जाते हैं, इसलिए वांछित अणु को ढूंढ निकालना सहज-सरल नहीं होता। इसके लिए श्रमसाध्य पृथक्करण प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। एक तरीका है कि प्रारंभिक परिणामों के आशाजनक होने के बाद वांछित अणु का अधिक मात्रा में संश्लेषण किया जाए।

पुरानी दवाओं का नया रूप

पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त दवा से एक नई संभावित दवा तैयार करने का उदाहरण हाल ही में स्क्रिप्स रिसर्च के स्टोन वू और रयान शेनवी द्वारा नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। दक्षिण प्रशांत में पापुआ न्यू गिनी द्वीप पर गलबुलिमिमा पेड़ की छाल का उपयोग लंबे समय तक दर्द और बुखार के इलाज में किया जाता था। चूंकि यह भ्रांतिजनक भी है, इसका उपयोग अनुष्ठानों में भी किया जाता है। जब इसे होमालोमेना झाड़ी की पत्तियों के साथ लिया जाता है तो यह मदहोशी पैदा करता है, एक शांत स्वप्न जैसी अवस्था को लाता है जिसके बाद सुखद नींद आती है। होमलोमेना (हिंदी में सुगंधमंत्री) भारत में पाई जाती है, और पारंपरिक रूप से कई बीमारियों में इसका उपयोग किया जाता रहा है। गलबुलिमिमा ने दशकों से औषधीय रसायनज्ञों को आकर्षित किया है। इस पेड़ के अर्क में 40 अद्वितीय अल्केलॉइड पहचाने गए हैं। अल्केलॉइड कुनैन और निकोटीन जैसे नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक हैं जो कई पौधों में पाए जाते हैं।

वू और शेनवी ने जटिल ज्यामितीय संरचना वाले अल्केलॉइड GB18 के संश्लेषण करने का एक कार्यक्षम तरीका खोज निकाला है। उनकी विधि से GB18 का कुछ ग्राम में उत्पादन किया जा सकता है। छाल में इसकी उपस्थिति मात्र अंश प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है। परीक्षणों में पता चला है कि यह ओपिऑइड (अफीमी औषधि) ग्राहियों का रोधी है।

मानव शरीर में ओपिऑइड ग्राही तंत्रिका तंत्र और पाचन तंत्र में पाए जाते हैं। हमारे शरीर में एंडॉर्फिन जैसे ओपिऑइड बनते हैं, जो इन ग्राहियों से जुड़ जाते हैं और दर्द संकेतों के संचरण को कम करते हैं। एंडॉर्फिन में मॉर्फिन जैसे दर्दनाशक गुण होते हैं। एंडॉर्फिन आनंद की अनुभूति भी कराते हैं। इन दोनों बातों से समझ में आता है कि ओपिऑइड ग्राहियों को सक्रिय करने वाले पदार्थों की लत क्यों लगती है।

GB18 दर्द की अनुभूति को प्रभावित नहीं करता है लेकिन इसका संज्ञानात्मक प्रभाव पड़ता है – चूहे अपने बालों और मूंछों को संवारने जैसे व्यवहारों में कम समय व्यतीत करने लगते हैं।

ओपिऑइड ग्राहियों का अंतिम रोधी नाल्ट्रेक्सोन था जिसे 35 साल पहले खोजा गया था। भारत में यह नोडिक्ट और नलटिमा जैसे ब्रांड नामों से बिकता है और इसका उपयोग अफीमी दवाओं के साथ-साथ शराब की लत के प्रबंधन में किया जाता है। और चूंकि अफीमी औषधियों के ग्राही पाचन तंत्र में पाए जाते हैं, नाल्ट्रेक्सोन मोटे लोगों में वज़न घटाने में भी मदद करता है।

GB18 और इससे निर्मित कई संभावित अणुओं के उपयोग क्या होंगे? आगे बहुत काम किया जाना बाकी है, और कई रोमांचक चिकित्सकीय संभावनाएं नज़र आ रही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बूस्टर डोज़ का महत्व निजी नहीं, सार्वजनिक है – अरविंद सरदाना

रकार द्वारा बूस्टर डोज़ की घोषणा एक सही कदम है, परंतु इसे केवल 75 दिनों तक मुफ्त रखना समझ से परे है।

बूस्टर डोज़ की ज़रूरत क्यों

विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के टीके का असर 6 से 9 महीनों में कम हो जाता है; इसलिए सभी देश अपनी जनता को बूस्टर डोज़ लगवा रहे हैं। कई देशों ने यह काम पहले ही शुरू कर दिया था। यदि शरीर की महामारी से लड़ने की क्षमता को बरकरार रखना है तो बूस्टर की ज़रूरत होगी।

अब, चूंकि कोविड फिर से फैल रहा है, तो ज़रूरी हो जाता है कि बूस्टर डोज़ सभी को लगे। और यह काम महामारी का नया स्‍वरूप फैलने से पहले होना चाहिए। इसके अलावा, बूस्टर डोज़ केवल 75 दिन के लिए नहीं बल्कि सामान्य रूप से उपलब्ध होना चाहिए और इसका प्रचार होना चाहिए कि यह सभी को लगवाना है।

कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र बूस्टर डोज़ लगवाने गए, पर हमारे छोटे शहर में कहीं उपलब्ध नहीं था। इंदौर के एक अस्पताल में बमुश्किल मिला। यदि निजी तौर पर लोगों को बूस्टर डोज़ लगवाना पड़े, तो आप मान कर चलें कि 5 प्रतिशत से अधिक लोग इसे नहीं लगवा पाएंगे – यह खर्चीला भी है और दुर्लभ भी।

दुर्भाग्य यह है कि हम महामारी के टीके के सिद्धान्‍त को समझ नहीं रहे हैं। हम तभी सुरक्षित होंगे, जब सभी लोग सुरक्षित होंगे। महामारी के टीके द्वारा हमारा लक्ष्य है कि कम से कम 80 प्रतिशत लोगों का टीकाकरण हो जाए ताकि समाज में एक ‘कवच’ बन जाए और महामारी को फैलने का रास्ता ना मिले। इसे ‘हर्ड इम्युनिटी’ कहते हैं। अर्थात यह एक सार्वजनिक ज़रूरत है। इसे मात्र निजी सुरक्षा के उपाय के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। लोगों को निजी पहल पर निजी अस्पताल में जाकर टीका लगवाने को कहने से ऐसी धारणा बनती है कि टीका व्यक्ति की निजी सुरक्षा भर के लिए है। लोग इसे लेने की महत्ता को तभी समझेंगे जब टीका सभी के लिए मुफ्त व बिना शर्त उपलब्ध होगा। बूस्टर देने में और देरी नहीं करनी चाहिए। ‘निजी सुरक्षा’, ‘सीमित अवधि के लिए उपलब्‍ध’ जैसे संदेशों से गलत माहौल बना है। अब इसे सार्वजनिक मुहिम में बदलना चाहिए।

कुछ लोग सोचते हैं कि मुफ्त भी हो तों मैं क्यों लगवाऊं, महामारी हमारे इलाके में नहीं है। यहां सार्वजनिक संवाद की ज़रूरत है। हम तभी सुरक्षित हैं जब अधिक लोग इसे लगवाएंगे।

यह याद रखना चाहिए कि महामारी का फैलाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। नए-नए संस्करण निकलेंगे। ऐसे में, लगातार निगरानी और विज्ञान ही हमें महामारी से मुकाबला करने के रास्ते बता सकता है। दवा की अनुपस्थिति में मास्क, टीका और भीड़भाड़ से दूर रहना ही उपाय हैं। (स्रोत फीचर्स)

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व्यायाम दिमाग को जवान रख सकता है – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यम

मानव मस्तिष्क 10 वर्ष की उम्र तक वयस्क आकार में तो पहुंच जाता है; लेकिन इसकी वायरिंग और इसकी क्षमताएं जीवन भर बदलती रहती हैं।

40 की उम्र के बाद मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है। मस्तिष्क में से कम रक्त प्रवाहित होता है, और हारमोन्स तथा न्यूरोट्रांसमीटर्स के स्तर कम हो जाते हैं। वृद्धावस्था नए काम सीखने जैसे कुछ कार्यों को मंद कर देती है।

कुछ नया सीखने के लिए मस्तिष्क में नए तंत्रिका-कनेक्शन बनने ज़रूरी होते हैं; इस गुण को न्यूरोप्लास्टिसिटी (तंत्रिका-लचीलापन) कहते हैं। आपका मस्तिष्क एक नित परिवर्तनशील इकाई है जो नए अनुभवों के हिसाब से लगातार खुद को ढालता रहता है।

मस्तिष्क की कुछ संरचनाओं में अन्य की तुलना में अधिक लचीलापन होता है और इनमें अधिक नए कनेक्शन बनते-बिगड़ते रहते हैं। वृद्धावस्था इन संरचनाओं को तुलनात्मक रूप से में अधिक प्रभावित करती है। ऐसी ही एक संरचना है हिप्पोकैम्पस। हिप्पोकैम्पस हमारे दोनों कानों के बीच स्थित होता है। यह नई और स्थायी स्मृतियां बनाने और उन्हें सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस तरह से यह सीखने और तज़ुर्बे में भूमिका निभाता है। यह आपके आसपास के परिवेश का मानसिक चित्र भी बनाता है, जिससे आप अपने घर का रास्ता जान पाते हैं।

प्रयोगों से पता चला है कि वृद्ध चूहों के मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं के बीच कनेक्शन (सायनेप्स) कम थे और भूलभुलैया में से बाहर का रास्ता खोजने में उनका प्रदर्शन भी घटिया रहा। इससे संकेत मिलता है कि उनमें स्थान-विषयक सीखने/समझ की कमी होती है।

लंदन के टैक्सी ड्राइवरों के मस्तिष्क का एमआरआई करने पर पता चला है कि उनका हिप्पोकैम्पस बड़ा था – हिप्पोकैम्पस में शहर की सड़कों का नक्शा बस जाता है, और नए अनुभव होने पर यह ‘नक्शा’ आसानी से विस्तारित होता जाता है।

हालांकि, इस मामले में मनुष्यों पर हुए अध्ययनों में दिखे व्यक्ति-दर-व्यक्ति अंतर हैरान करने वाले हैं – कुछ “सुपर वृद्ध” स्मृति परीक्षणों में नौजवानों को मात दे सकते हैं।

दिमागी चोट

मस्तिष्क की रीवायरिंग और परिवर्तन क्षमता सदमे या स्ट्रोक से होने वाली मस्तिष्क क्षति के मामलों में देखी गई है। ऐसे हादसों में मस्तिष्क की कोशिकाएं बड़ी संख्या में मर जाती हैं, जिसके कारण कुछ क्षमताएं गुम हो जाती हैं। अलबत्ता, समय के साथ, मस्तिष्क खुद को फिर से तैयार करता है और खोई हुई क्षमताएं आंशिक या पूर्ण रूप से बहाल हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को दवाओं, स्टेम सेल थेरपी और मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप से गति दी जा सकती है।

हालांकि ज़रूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो लेकिन अक्सर उम्र बढ़ने पर संज्ञान क्षमता में कमी आती है। स्मृति के साथ-साथ कार्यकारी प्रणालियां भी गड़बड़ा सकती हैं – जैसे योजना बनाने की क्षमता और एक साथ दो या दो से अधिक काम करने की क्षमता।

ये परिवर्तन मस्तिष्क के अपने तंतु फिर से जोड़ने की क्षमता में कमी, तंत्रिका-लचीलेपन में कमी, का परिणाम हैं। लेकिन व्यवहार और जीवन शैली में बदलाव करके मस्तिष्क की नया सीखने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है और इससे एक युवा मस्तिष्क की तरह कार्य करवाया जा सकता है।

मस्तिष्क को युवा बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम और अच्छा आहार उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि सीखने (नई भाषा या वाद्ययंत्र में महारत हासिल करने) की चाह रखना।

व्यायाम के लाभ

वृद्ध व्यक्तियों में व्यायाम हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसे विकारों के जोखिम को कम करता है। इस तरह के विकार मनोभ्रंश (डिमेंशिया) के जोखिम को बढ़ाते हैं। अर्थात व्यायाम मनोभ्रंश और अल्ज़ाइमर जैसे रोगों के जोखिम को भी कम करता है।

नियमित व्यायाम आपको वज़न कम करने में मदद करता है; या कम से कम वज़न बढ़ना रुक जाता है, या कम किया हुआ वज़न दोबारा नहीं बढ़ता। व्यायाम से फेफड़े, पेट, बड़ी आंत (कोलन) और ब्लैडर के कैंसर की संभावना कम हो जाती है। व्यायाम करने वाले व्यक्तियों में चिंता और अवसाद से घिरने का खतरा भी कम होता है।

वृद्धों में व्यायाम का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे गिरने का और गिरने से पहुंचने वाली चोटों का जोखिम कम हो जाता है। एन-कैथरीन रोजे और उनके साथियों के एक अध्ययन (न्यूरोसाइकोलॉजिया, 2019) के अनुसार व्यायाम आपके खड़े रहते और चलते दोनों स्थितियों में शरीर विन्यास की स्थिरता को बढ़ाता है, क्योंकि आपका मस्तिष्क संतुलन में गड़बड़ी होने पर त्वरित प्रतिक्रिया देने के लिए लगातार प्रशिक्षित होता रहता है।

सवाल है कि किस तरह का व्यायाम बेहतर है? 40-56 वर्ष के व्यक्तियों के साथ 6 महीने तक (स्ट्रेचिंग/तालबद्ध) प्रशिक्षण और एरोबिक स्थिरता प्रशिक्षण (घर पर साइकिल चलाना) के परिणामों की तुलना करने पर पाया गया कि दोनों तरह की गतिविधियों से सुस्त व्यक्तियों की स्मृति में सुधार दिखा। ये गतिविधियां बेशक हृदय-रक्तवाहिनी की हालत में भी सुधार करेंगी। अध्ययन में शामिल जिन प्रतिभागियों के हृदय-वाहिनी स्वास्थ्य में सबसे अधिक सुधार दिखा, उनकी याददाश्त में भी सबसे अच्छा सुधार दिखा। वापिस सुस्त हो जाना और फिटनेस में कमी स्मृति सम्बंधी लाभ को बेअसर कर देता है (हॉटिंग व रोडर, न्यूरोसाइंस विहेवियर रिव्यूस, 2013)।

संज्ञान प्रशिक्षण, यानी दिमागी कसरत, आपके मस्तिष्क को लचीला रहने में मदद करता है। संज्ञान प्रशिक्षण के साथ शारीरिक व्यायाम करने से वृद्धजनों की संज्ञान क्षमताओं में और भी अधिक सुधार होता है।

एक सवाल है कि कितना व्यायाम? अक्सर वृद्ध व्यक्तियों में स्वास्थ्य और संज्ञान सम्बंधी मूल्यांकन 10 मिनट की दैनिक सैर के पहले और बाद में किया जाता है; दैनिक सैर में थोड़ी जॉगिंग और थोड़ा टहलना शामिल है (जो हल्का पसीना पैदा करने के लिए पर्याप्त हो लेकिन थकाए नहीं)। 65 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सप्ताह में पांच या अधिक बार 30 मिनट तक तेज़ चाल से चलने की सलाह देता है। (स्रोत फीचर्स)

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उबकाई के इलाज का नया लक्ष्य

ममें से अधिकांश लोगों ने उबकाई या जी मिचलाने का अनुभव किया होगा। लेकिन वैज्ञानिक अब तक पूरी तरह यह समझ नहीं पाए हैं कि जी मिचलाने का जैविक आधार क्या है या इसे कैसे रोका जाए।

हाल ही में चूहों पर हुए एक अध्ययन ने इसका एक संभावित कारक दर्शाया है – मस्तिष्क की कुछ विशिष्ट कोशिकाएं, जो आंत से ‘संवाद’ करके मितली के एहसास का शमन कर देती हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय की न्यूरोसाइंटिस्ट चुचु झांग और उनके साथियों ने अपना अध्ययन ‘एरिया पोस्ट्रेमा’ पर केंद्रित किया। ‘एरिया पोस्ट्रेमा’ मस्तिष्क स्तंभ के निचले हिस्से में स्थित एक छोटी-सी संरचना होती है। मितली से इसका सम्बंध पहली बार 1950 के दशक में पता चला था। जानवरों में इस हिस्से में विद्युत उद्दीपन उल्टी करवा देता है।

दरअसल पिछले साल झांग की टीम ने एरिया पोस्ट्रेमा में दो प्रकार की विशिष्ट उद्दीपक तंत्रिकाओं की पहचान की थी जो चूहों में मितली जैसा व्यवहार जगाते हैं। कृंतक जीव उल्टी तो नहीं कर पाते हैं, लेकिन जब उन्हें इसका एहसास होता है तो वे बेचैन हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने दर्शाया था कि एरिया पोस्ट्रेमा की तंत्रिकाएं ही कोशिकाओं को उकसाकर इस व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार होती हैं।

एरिया पोस्ट्रेमा की कोशिकाओं का जेनेटिक अनुक्रमण करने पर इस हिस्से में अवरोधक तंत्रिकाओं का भी पता चला था। वैज्ञानिकों का विचार था कि ये अवरोधक उद्दीपक तंत्रिकाओं के कार्य को दबा सकते हैं और मितली के एहसास को थाम सकते हैं।

इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चूहों को ग्लूकोज़ इंसुलिनोट्रॉपिक पेप्टाइड (जीआईपी) का इंजेक्शन लगाया। यह आंत में बनने वाला हार्मोन है जो मनुष्य और अन्य जानवरों में शर्करा और वसा को खाने के बाद बनता है। पूर्व में गंधविलाव पर हुए अध्ययन में देखा गया था कि जीआईपी उल्टी को रोकता है। इस आधार पर झांग का अनुमान था कि यह मितली को भी शांत कर सकता है। उनका यह भी अनुमान था कि यह रसायन मितली-रोधक तंत्रिकाओं को सक्रिय करने में भी भूमिका निभा सकता है।

अपने अनुमान को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों को मितली-उत्प्रेरक पदार्थ युक्त सुगंधित पानी दिया। एक बार पीने के बाद चूहे इस पानी से कतराने लगे। लेकिन जब इस पानी में जीआईपी मिलाया गया तो इस पानी को उन्हीं कृंतकों ने दोबारा खुशी-खुशी पिया।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने ऐसे चूहे तैयार किए जिनके एरिया पोस्ट्रेमा में अवरोधक न्यूरॉन्स का अभाव था। जब इन चूहों पर अध्ययन दोहराया गया तो पाया गया कि मितली-उत्प्रेरक युक्त पानी में जीआईपी मिला देने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा: चूहे यह पानी पीने से कतराते रहे।

सेल पत्रिका में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि जीआईपी अवरोधक तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देता है जो एरिया पोस्ट्रेमा में उल्टी-प्रेरक तंत्रिकाओं को अवरुद्ध कर देती हैं, नतीजतन मितली का अहसास दब जाता है।

हालांकि यह अध्ययन मितली को दबाने में आंत-स्रावित जीआईपी की भूमिका पर केंद्रित था लेकिन झांग का कहना है कि शरीर में संभवतः ऐसे अन्य कारक भी होंगे जो मितली-अवरोधक तंत्रिकाओं को सक्रिय करते होंगे।

आगे शोधकर्ता जानना चाहते हैं कि आंत और एरिया पोस्ट्रेमा के बीच संवाद कैसे होता है। यह तो मालूम है कि इस क्षेत्र की तंत्रिकाएं वेगस तंत्रिका के माध्यम से आंत से जुड़ी हुई हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मस्तिष्क की कोशिकाएं वास्तव में आंत से कैसे ‘बतियाती’ हैं।

यह अध्ययन अवरोधक और उद्दीपक तंत्रिकाओं को लक्ष्य करके मितली-शामक दवाइयां विकसित करने का रास्ता खोल सकता है। मौजूदा मितली-रोधी दवाएं मुख्यत: मस्तिष्क कोशिकाओं के दो सामान्य रासायनिक ग्राहियों को लक्ष्य करती हैं, लेकिन यह अब तक बहुत स्पष्ट नहीं है कि ये कैसे काम करती हैं। और कीमोथेरेपी और मॉर्निंग सिकनेस जैसी कुछ स्थितियों में ये दवाइयां उतनी कारगर नहीं होती हैं। नई दवाइयां कैंसर रोगियों के लिए विशेष रूप से मददगार साबित हो सकती हैं, जो अक्सर मितली के कारण उपचार क्रम का पालन करने से कतराते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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तंत्रिका को शीतल कर दर्द से राहत

शकों से दर्द से राहत के लिए अफीमी दवाओं (ओपिओइड) का उपयोग किया जा रहा है। लेकिन ये दवाएं अक्सर जीर्ण दर्द पर अप्रभावी रहती हैं और इनकी लत लग सकती है। इसलिए वैज्ञानिक दर्द से राहत पाने के अन्य विकल्प तलाशने में लगे हैं।

अब, नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के जॉन रॉजर्स के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने चूहों में एक ऐसा छोटा इम्प्लांट फिट किया है जो मस्तिष्क और शरीर के अन्य हिस्सों में सूचना प्रसारित करने वाली परिधीय तंत्रिकाओं को शीतल करता है।

यह मुलायम इम्प्लांट पानी में घुलनशील और जैव-संगत सामग्री से बना है जो इसे परिधीय तंत्रिका के चारों ओर लिपटने लायक बनाता है। इसकी अनूठी संरचना की बदौलत यह बहुत ही छोटे-से हिस्से (कुछ मिलीमीटर) की तंत्रिकाओं को भी सटीकता से लक्षित और शीतल कर सकता है। वैसे तो तंत्रिकाओं को शीतल करने की अन्य तकनीकें भी मौजूद हैं लेकिन वे उतनी सटीक नहीं हैं और लक्ष्य के आसपास के मांसपेशीय ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। तंत्रिका दर्द को रोकने के लिए दिए जाने वाले फिनॉल इंजेक्शन में फिनॉल के अवांछित जगहों पर भी फैलने की संभावना रहती है।

इस नए इम्प्लांट में छोटे-छोटे चैनल होते हैं जिसके माध्यम से परफ्लोरोपेंटेन नामक शीतलन एजेंट को शरीर में पहुंचाया जा सकता है। एक अन्य चैनल में शुष्क नाइट्रोजन होती है। जब एक चेम्बर में परफ्लोरोपेंटेन शुष्क नाइट्रोजन से मिलता है, तो यह तुरंत वाष्पित हो जाता है और तंत्रिकाओं को 10 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर देता है। विचार यह है कि जैसे-जैसे तंत्रिकाएं शीतल होंगी, वैसे-वैसे उनके माध्यम से प्रसारित होने वाले विद्युत संकेतों की तीव्रता और आवृत्ति भी मंद होगी। और आखिरकार, तंत्रिकाएं दर्द के संकेत तथा अन्य सूचनाएं प्रसारित करना बंद कर देंगी। प्रत्यारोपण के 20 दिन बाद यह प्रत्यारोपण घुल जाता है, और उसके 30 दिन के अंदर किडनियां इसे उत्सर्जित कर देती हैं।

इस डिवाइस का परीक्षण करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के पंजों में एक महीन तार (तंतु) चुभाया और इससे उपजे दर्द के प्रति उनमें प्रतिक्रिया प्रेरित करने के लिए ज़रूरी बल को नापा। फिर उन्होंने चूहों की साएटिक नसों (जो कमर से पैरों तक जाती है) को ठंडा करने के लिए उनमें यह डिवाइस लगाई और वापस तार चुभाकर देखा।

साइंस में प्रकाशित नतीजों के अनुसार जब दर्द-संकेतों को अवरुद्ध किया गया तो प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए ज़रूरी बल काफी बढ़ गया था। यह दर्शाता है कि यह उपकरण परिधीय तंत्रिका तंत्र द्वारा संचारित संकेतों को अवरुद्ध करने में सक्षम है और दर्द के अहसास कम कर देता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह प्रत्यारोपण मनुष्यों में भी इसी तरह से कारगर हो सकता है, और सर्जरी के बाद उपजे दर्द से राहत के लिए लगाया जा सकता है। हालांकि, डिवाइस अभी मनुष्यों में परीक्षण के लिए तैयार नहीं है।

कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि यह डिवाइस अनुपस्थित (फैंटम) अंग में होने वाले दर्द को खत्म नहीं कर सकता है, क्योंकि इस मामले में दर्द अंग कट जाने के बाद मस्तिष्क में हुए पुनर्गठन से जुड़ा होता है।

अन्य वैज्ञानिकों का मत है यह तो सही है कि दर्द संवेदना में परिधीय तंत्रिका तंत्र की भूमिका होती है, लेकिन यही अकेला कारक नहीं है और शायद सबसे प्रमुख भी न हो। रॉजर्स इस बात से सहमत हैं कि तंत्रिकाओं के अलावा दर्द को नियंत्रित करने वाले कई अन्य कारक भी हैं। जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव, लेकिन वे इतने महत्वपूर्ण शायद नहीं है।

टीम की योजना अब तंत्रिका शीतलन प्रणाली की बारीकियों पर काम करने की है; मसलन तंत्रिका को शीतल रखने की वह संतुलित अवधि पता करना जितनी देर में वह दर्द संकेत अवरुद्ध कर दे लेकिन ऊतकों को नुकसान न पहुंचाए। यह भी देखना होगा कि शीतलन प्रक्रिया को पलटने में कितना समय लगेगा। उपकरण को और छोटा बनाने की कोशिश भी की जाएगी। (स्रोत फीचर्स)

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लंदन के सीवेज में पोलियोवायरस मिलने से खलबली

लंदन में पोलियोवायरस के प्रमाण मिलने से यू.के. के जन स्वास्थ्य अधिकारियों के बीच खलबली मच गई है। यू.के. में पोलियो फिलहाल एक दुर्लभ बीमारी है लेकिन नागरिकों को सतर्क रहने के साथ पूर्ण टीकाकरण का सुझाव दिया गया है। अभी तक वायरस के स्रोत के बारे में तो कोई जानकारी नहीं है लेकिन संभावना है कि यह वायरस किसी ऐसे बाहरी व्यक्ति से यहां आया है जिसने हाल ही में ओरल पोलियो टीका (ओपीवी) लिया था। गौरतलब है कि ओपीवी में जीवित लेकिन कमज़ोर वायरस का उपयोग किया जाता है जिसका उपयोग अब यू.के. में नहीं किया जाता। वैसे तो अधिकांश पोलियो संक्रमण अलक्षणी होते हैं और यू.के. में इसका कोई मामला सामने नहीं आया है। लेकिन लंदन के कुछ समुदायों में टीकाकरण की दर 90 प्रतिशत से कम है जो एक चिंता का विषय है।

गौरतलब है कि पोलियो को विश्व के अधिकांश हिस्सों से खत्म किया जा चुका है लेकिन अफगानिस्तान और पकिस्तान में यह वायरस अभी भी स्थानिक है। इसके अलावा अफ्रीका, युरोप और मध्य पूर्व के 30 से अधिक देश “आउटब्रेक देशों” की श्रेणी में हैं जहां हाल ही में वायरस प्रसारित होता देखा गया है। इन देशों में वायरस का प्रसार या तो अफगानिस्तान या पकिस्तान के कुदरती वायरस से हुआ है या फिर टीके से आया है जिसने गैर-टीकाकृत लोगों में बीमारी पैदा करने की क्षमता विकसित कर ली है। 

यू.के. में इस वायरस की उपस्थिति की जानकारी बेकटन सीवेज ट्रीटमेंट वर्क्स से फरवरी और जून के दौरान लिए गए सीवेज के नमूनों में मिली। यह सीवेज प्लांट प्रतिदिन उत्तरी और पूर्वी लंदन में रहने वाले 40 लाख लोगों के अपशिष्ट जल को संसाधित करता है। आम तौर पर हर साल इस तरह के परीक्षण में वायरस मिलते रहते हैं जो कुछ ही समय में गायब भी हो जाते हैं। लेकिन इस बार कई महीनों तक इस वायरस की उपस्थिति दर्ज की गई और साथ ही इन नमूनों में वायरस के कई संस्करण भी पाए गए। इन आनुवंशिक परिवर्तनों से स्पष्ट है कि इस वायरस का विकास जारी है जिसका मतलब है कि वह कुछ लोगों में फैल रहा है।

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यू.के. में उच्च टीकाकरण की दर को देखते हुए इसके व्यापक प्रसार की संभावना काफी कम है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में वायरस प्रसार के प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं मिले हैं। फिर भी स्वास्थ्य अधिकारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बच्चों को टीके की सभी आवश्यक खुराकें मिल जाएं।

गौरतलब है कि लंदन ऐसा दूसरा स्थान है जहां इस वर्ष पोलियो वायरस का संस्करण मिला है। इससे पहले 7 मार्च को इस्राइल के एक 3-वर्षीय गैर-टीकाकृत लकवाग्रस्त बच्चे में पोलियोवायरस पाया गया था। इस वर्ष अब तक 25 सीवेज नमूनों में पोलियोवायरस संस्करण मिल चुके हैं जिनमें से अधिकांश मामले येरूसेलम से हैं। यहां से प्राप्त वायरस टीके से निकला टाइप-3 संस्करण है जो लंदन में पाए गए टाइप-2 वायरस से सम्बंधित नहीं है। लंदन और इस्राइल से मिले नतीजों से एक बात तो स्पष्ट है कि पोलियो निगरानी प्रणाली काफी सक्रिय रूप से काम कर रही है।

इन नतीजों के मद्देनज़र इस्राइल और पेलेस्टाइन नेशनल अथॉरिटी ने टीकाकरण प्रयासों को तेज़ कर दिया है। हालांकि  कोविड-19 की वजह से यह काम काफी कठिन हो गया है। महामारी के बाद कई कोविड-19 टीकाकरण अभियानों के चलते लोगों में टीकाकरण के प्रति झिझक भी बढ़ी है।

फिलहाल लंदन के अधिकारी वायरस के स्रोत का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि टीकाकरण अभियानों को अधिक सटीकता से अंजाम दिया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल सभी देशों को एक मज़बूत रोग निगरानी और टीकाकरण कवरेज सुनिश्चित करना होगा ताकि पोलियोवायरस के जोखिमों और पुन: उभरने की संभावना को कम किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)

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