विज्ञान अनुसंधान: 2022 से अपेक्षाएं – संकलन: ज़ुबैर सिद्दिकी

वर्ष 2021 विज्ञान जगत के लिए चुनौतियों भरा रहा है। इस दौरान मंगल मिशन, अल्ज़ाइमर की दवा, क्रिस्पर तकनीक, जलवायु सम्मेलन जैसे विषय सुर्खियों में रहे लेकिन परिदृश्य पर कोविड-19 छाया रहा। विश्वभर में जागरूकता और टीकाकरण अभियान चलाए गए। 2022 में भी कोविड-19 हावी रहेगा। अलबत्ता इसके अलावा भी कई अन्य क्षेत्र सुर्खियों में रहने की उम्मीद हैं।

कोविड-19 से संघर्ष

2022 में भी कोरोनावायरस चर्चा का प्रमुख मुद्दा बना रहेगा। शोधकर्ता ऑमिक्रॉन जैसे संस्करणों के प्रभावों को समझने और निपटने का निरंतर प्रयास करेंगे। संक्रमितों की विशाल संख्या को देखते हुए 2022 में भी इसके काफी फैलने की संभावना है। वैश्विक आबादी के एक बड़े हिस्से ने टीकों या संक्रमण से एक स्तर की प्रतिरक्षा विकसित की है, और वैज्ञानिकों की अधिक रुचि ऐसे संस्करणों की ओर है जो मानव प्रतिरक्षा को चकमा देने में सक्षम हैं। फिलहाल यह भी स्पष्ट नहीं है कि टीके नए संस्करणों के लिए मुफीद हैं भी या नहीं। वैज्ञानिक टीकों की एक नई पीढ़ी विकसित करने में जुटे हैं जो व्यापक प्रतिरक्षा दे सकें या फिर श्वसन मार्ग की श्लेष्मा झिल्ली में मज़बूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित कर सकें। 2022 में हम सार्स-कोव-2 के विरुद्ध ओरल एंटीवायरल दवाओं की भी उम्मीद कर सकते हैं।

इस वर्ष शोधकर्ताओं का प्रयास दीर्घ कोविड के रहस्यों को समझना-सुलझाना भी रहेगा जिसने संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों को काफी परेशान किया है। इसके अतिरिक्त गरीब देशों तक टीके की पहुंच सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती रहेगी।

नाभिकीय भौतिकी

मिशिगन स्टेट युनिवर्सिटी में 73 करोड़ डॉलर के फैसिलिटी फॉर रेयर आइसोटॉप बीम्स (एफआरआईबी) के शुरू होने के बाद से पहली बार अल्पजीवी परमाणु नाभिक पृथ्वी पर उत्पन्न किए जाएंगे जो आम तौर पर तारकीय विस्फोटों में उत्पन्न होते हैं। एफआरआईबी एक शक्तिशाली आयन स्रोत है जो हाइड्रोजन से लेकर युरेनियम परमाणु नाभिकों तक को निशाना बनाकर अल्पजीवी नाभिकों में बदल सकता है। उद्देश्य सैद्धांतिक रूप से संभव 80 प्रतिशत समस्थानिकों का निर्माण करना है। एफआरआईबी की मदद से भौतिक विज्ञानी नाभिक-संरचना की अपनी समझ को मज़बूत करने के अलावा, तारकीय विस्फोटों में भारी तत्वों के निर्माण की प्रक्रिया और प्रकृति में नए बलों का पता लगाने की उम्मीद करते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी

वर्ष 2022 में संभवत: चीन दुनिया के दो सबसे तेज़ और शक्तिशाली कंप्यूटरों का प्रदर्शन करेगा। खबर है कि ये कंप्यूटर प्रदर्शन के वांछित मानकों को पछाड़ चुके हैं। एक्सास्केल नामक यह सुपर कंप्यूटर प्रति सेकंड 1 महाशंख (1018) से अधिक गणनाएं करने में सक्षम है। दूसरी ओर, अमेरिका स्थित ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी में यूएस के पहले एक्सास्केल कंप्यूटर, फ्रंटियर के 2022 में शुरू होने की उम्मीद है।

एक्सास्केल कंप्यूटरों की मदद से विशाल डैटा सेट के साथ कृत्रिम बुद्धि का संयोजन काफी उपयोगी हो सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति-विशिष्ट दवाइयों, नए पदार्थों की खोज, जलवायु परिवर्तन मॉडल आदि क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन हो सकता है।

अंतरिक्ष: चंद्रमा की ओर

पचास साल पहले मनुष्य ने चंद्रमा पर पहली बार कदम रखा था। अब रोबोटिक चांद मिशन पूरे जोशो-खरोश से लौट आए हैं और एक बार फिर मानव के वहां पहुंचने की तैयारी है। चीन द्वारा भेजे गए रोवर की सफल लैंडिंग के बाद कुछ छोटे स्टार्ट-अप्स द्वारा विकसित और नासा द्वारा वित्तपोषित तीन रोबोटिक लैंडर 2022 में चांद पर भेजे जाएंगे। इस दौड़ में रूस, जापान और भारत के भी शामिल होने की संभावना है। इस परियोजना के पीछे नासा के दो उद्देश्य हैं: चांद पर पानी की उपलब्धता एवं फैलाव का अध्ययन करना और चांद की धूल भरी सतह पर पेलोड पहुंचाकर मानव अन्वेषण के लिए मार्ग तैयार करना। इस वर्ष नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम और स्पेसएक्स स्टारशिप भी प्रक्षेपित किए जाएंगे जो अंतरिक्ष यात्रियों और भारी उपकरणों को चंद्रमा या उससे आगे ले जाने में सक्षम होंगे।

प्रदूषण पर यूएन पैनल

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा फरवरी 2022 में रासायनिक प्रदूषण और कचरे से होने वाले जोखिमों का अध्ययन करने के लिए एक वैज्ञानिक सलाहकार संस्था बनाने के प्रस्ताव पर मतदान की तैयारी कर रही है। संयुक्त राष्ट्र ने पहले भी कई प्रकार के प्रदूषण (जैसे पारा और कार्बनिक रसायन) पर संधियां की हैं। नए प्रस्ताव का समर्थन करने वालों के अनुसार वर्तमान में नीति निर्माताओं को उभरती समस्याओं और शोध आवश्यकताओं की पहचान करने के लिए व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता है। इसके लिए 1800 से अधिक वैज्ञानिक पैनल के समर्थन में हस्ताक्षर कर चुके हैं।

खगोलशास्त्र: ब्लैक होल 

हाल के वर्षों में गुरुत्वाकर्षण तरंग सूचकों की मदद से तारों की साइज़ के ब्लैक होल्स की टक्करों की जानकारी प्राप्त हुई है। और अधिक जानकारी प्राप्त करने के प्रयास जारी हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि 2022 में उनके पास सूरज से कई गुना भारी ब्लैक होल्स के एक-दूसरे की ओर खिंचने से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगों को समझने हेतु पर्याप्त डैटा होगा। ऐसे जोड़ों का पता लगाने के लिए कई रेडियो दूरबीनों को पल्सर्स की ओर उन्मुख किया गया है। पल्सर वास्तव में ढह चुके तारे हैं जो नियमित रेडियो तरंगें छोड़ते हैं। तरंगों में सूक्ष्म बदलाव गुरुत्वाकर्षण तरंगों का संकेत देते हैं।

जैव विविधता समझौते को मज़बूती

यदि वर्ष 2050 तक सभी राष्ट्र मिलकर जैव विविधता संधि का नया ढांचा अपनाते हैं तो कई लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के उपायों को बढ़ावा मिल सकता है। वार्ताकारों द्वारा विकसित एक योजना के तहत 2022 में चीन में 196 देशों की एक बैठक आयोजित करने की संभावना है। इस बैठक में पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा और स्थिरता पर ज़ोर देने के साथ आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों के समतामूलक बंटवारे पर भी ध्यान दिया जाएगा। इन प्रयासों के लिए 2030 तक कम से कम 70 करोड़ डॉलर की निधि जुटाने का भी लक्ष्य है। उद्देश्यों में भूमि और समुद्र के 30 प्रतिशत हिस्से का संरक्षण, घुसपैठी प्रजातियों के प्रसार को कम करना, कीटनाशकों के उपयोग में दो-तिहाई की कमी और प्लास्टिक कचरे को खत्म करते हुए वैश्विक प्रदूषण को आधा करना और शहरवासियों के लिए “हरे और नीले” स्थानों तक पहुंच बढ़ाना शामिल है। नई तरीकों में प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण में प्रगति की निगरानी और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय निवासियों जैसे हितधारकों को शामिल करना प्रमुख है।

चीन: जीएम फसलों को अनुमति

चीन अनुवांशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) मकई और सोयाबीन के पहले व्यवसायिक रोपण को 2022 के अंत तक अनुमति दे सकता है। वर्तमान में, पपीता एकमात्र खाद्य जीएम पौधा है जिसको चीन में स्वीकृति दी गई है। जीएम कपास की खेती व्यापक रूप से की जाती है और जीएम चिनार भी काफी उपलब्ध है। गौरतलब है कि चीन में पिछले 10 वर्षों से जीएम मकई और सोयाबीन पर अनुसंधान चल रहे हैं लेकिन जनता के विरोध और सावधानी के चलते इसे प्रयोगशाला तक ही सीमित रखा गया है। चीन में प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों और पशु आहार के लिए बड़ी मात्रा में जीएम मकई और सोयाबीन आयात किए जाते हैं। इसके मद्देनज़र अधिकारियों ने घरेलू स्तर पर जीएम फसलों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने का आह्वान किया है। चीन अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है इसलिए जीएम चावल को अनुमति मिलने की संभावना फिलहाल कम है।

ग्लोबल वार्मिंग: मीथेन उत्सर्जन

नवंबर 2021 के जलवायु शिखर सम्मलेन में विश्व नेताओं ने 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत तक कटौती करने का संकल्प लिया है। इन संकल्पों पर कार्रवाई की निगरानी के लिए ज़रूरी उन्नत उपग्रहों को 2022 तक कक्षा में पहुंचाने का लक्ष्य है। एक गैर-मुनाफा संस्था एनवायरनमेंट डिफेंस फंड द्वारा विकसित मीथेनसैट को अक्टूबर में लॉन्च करने की उम्मीद है। यह धान व रिसती पाइपलाइन जैसे स्रोतों से उत्सर्जित मीथेन का पता लगाने की क्षमता से लैस होगा। कार्बन मैपर द्वारा विकसित दो अन्य उपग्रह न सिर्फ मीथेन बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की भी निगरानी करेंगे।

मलेरिया का टीका           

अभी भी अफ्रीका में प्रति वर्ष 5 वर्ष से कम उम्र के ढाई लाख से ज़्यादा बच्चे मलेरिया से मारे जाते हैं। उम्मीद है कि 2022 में अफ्रीका के सभी देश मलेरिया के टीके से अनमोल जीवन को बचा सकेंगे। तीन दशकों के शोध के बाद आरटीएस,एस टीके को आखिरकार पिछले वर्ष अक्टूबर में मंज़ूरी मिल गई है। वैक्सीन एलायंस ने टीके खरीदकर लोगों तक पहुंचाने के लिए 2025 तक 15.5 करोड़ डॉलर खर्च करने का निर्णय लिया है। वैसे यह टीका अपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है और गंभीर मलेरिया के कारण अस्पताल में भर्ती होने की दर को लगभग 30 प्रतिशत तक कम करता है। यह विशेष रूप से तब अधिक प्रभावी होता है जब इसे उच्च जोखिम वाले बरसात के मौसम में रोगनिरोधी रूप से दी जाने वाली मलेरिया-रोधी दवा के साथ दिया जाए।

वैसे अगले वर्ष यूएस के दो नीतिगत निर्णय भी वैज्ञानिक शोध को प्रभावित करेंगे। इनमें से एक का सम्बंध सरकारी वित्तपोषित शोध में चीन की भागीदारी से है तथा दूसरे का सम्बंध स्पष्ट रूप से समाजोपयोगी कहे जाने वाले शोध को बढ़ावा देने के लिए नई परियोजनाओं से है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रजनन करते रोबोट!

कुछ वर्ष पहले युनिवर्सिटी ऑफ वर्मान्ट, टफ्ट्स युनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकली इंस्पायर्ड इंजीनियरिंग और हारवर्ड युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अफ्रीकी नाखूनी मेंढक (ज़ेनोपस लाविस) की स्टेम कोशिकाओं से एक मिलीमीटर का रोबोट तैयार किया था। इसे ज़ेनोबॉट नाम दिया गया। प्रयोगों से पता चला कि ये छोटे-छोटे पिंड चल-फिर सकते हैं, समूहों में काम कर सकते हैं और अपने घाव स्वयं ठीक भी कर सकते हैं।

अब वैज्ञानिकों ने इन ज़ेनोबॉट में प्रजनन का एक नया रूप खोजा है जो जंतुओं या पौधों के प्रजनन से बिल्कुल अलग है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मेंढकों में प्रजनन करने का एक तरीका होता है जिसका वे सामान्य रूप से उपयोग करते हैं। लेकिन जब भ्रूण से कोशिकाओं को अलग कर दिया जाता है तब वे कोशिकाएं नए वातावरण में जीना सीख जाती हैं और प्रजनन का नया तरीका खोज लेती हैं। मूल ज़ेनोबोट मुक्त स्टेम कोशिकाओं के ढेर बना लेते हैं जो पूरा मेंढक बना सकते हैं।

दरअसल, स्टेम कोशिकाएं ऐसी अविभेदित कोशिकाएं होती हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता होती है। ज़ेनोबॉट्स बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने मेंढक के भ्रूण से जीवित स्टेम कोशिकाओं को अलग करके इनक्यूबेट किया। आम तौर पर माना जाता है कि रोबोट धातु या सिरेमिक से बने होते हैं। लेकिन वास्तव में रोबोट का मतलब यह नहीं होता कि वह किस चीज़ से बना है बल्कि रोबोट वह है जो मनुष्यों की ओर से स्वयं काम कर दे।

अध्ययन में शामिल शोधकर्ता जोश बोंगार्ड के अनुसार यह एक तरह से तो रोबोट है लेकिन यह एक जीव भी है जो मेंढक की कोशिकाओं से बना है। बोंगार्ड बताते हैं कि ज़ेनोबॉट्स शुरुआत में गोलाकार थे और लगभग 3000 कोशिकाओं से बने थे और खुद की प्रतियां बनाने में सक्षम थे। लेकिन यह प्रक्रिया कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही हुई। ज़ेनोबॉट्स वास्तव में ‘काइनेटिक रेप्लिकेशन’ का उपयोग करते हैं जो आणविक स्तर देखा गया है लेकिन पूरी कोशिका या जीव के स्तर पर पहले नहीं देखा गया।             

इसके बाद शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धि (एआई) की मदद से विविध आकारों का अध्ययन किया ताकि ऐसे ज़ेनोबॉट्स बनाए जा सकें जो अपनी प्रतिलिपि बनाने में अधिक प्रभावी हों। सुपरकंप्यूटर ने C-आकार का सुझाव दिया। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह C-आकार पेट्री डिश में छोटी-छोटी स्टेम कोशिकाओं को खोजकर उन्हें अपने मुंह के अंदर एकत्रित कर लेता था। कुछ ही दिनों में कोशिकाओं का ढेर नए ज़ेनोबॉट्स में परिवर्तित हो गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार (PNAS जर्नल) आणविक जीवविज्ञान और कृत्रिम बुद्धि के इस संयोजन का उपयोग कई कार्यों में किया जा सकता है। इसमें महासागरों से सूक्ष्म-प्लास्टिक को एकत्रित करना, जड़ तंत्रों का निरीक्षण और पुनर्जनन चिकित्सा जैसे कार्य शामिल हैं।

इस तरह स्वयं की प्रतिलिपि निर्माण का शोध चिंता का विषय हो सकता है लेकिन शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ये जीवित मशीनें प्रयोगशाला तक सीमित हैं और इन्हें आसानी से नष्ट किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गर्मी के झटके और शीत संवेदना – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन


प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है।   ऐसा न होने पर कई विकार उत्पन्न होते हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह प्रोटीन्स को सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन प्रोटीन कहते हैं।

डीएनए न्यूक्लियोटाइड्स की एक सीधी शृंखला है, जिसके कुछ हिस्सों का सटीक अनुलेखन संदेशवाहक आरएनए (mRNA) में किया जाता है। फिर आरएनए में निहित संदेश अमीनो अम्लों की एक शृंखला यानी प्रोटीन में बदले जाते हैं। प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है। और अक्सर इस आकार में ढलने के लिए प्रोटीन में तहें अपने आप नहीं बनती हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह इन्हें सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन (सहचर) प्रोटीन कहते हैं।

जीव विज्ञान में शेपरॉन

वैसे शेपरॉन का विचार विचित्र और पुरातनपंथी लग सकता है, लेकिन जैविक कार्यों में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नई प्रोटीन शृंखला को सही आकार देने के बाद शेपरॉन वहां से हट जाते हैं। या फिर नई शृंखला हटा दी जाती है। शेपरॉन के बिना नव-संश्लेषित प्रोटीन्स जल्द ही अघुलनशील उलझे गुच्छे बन जाते हैं, जो कोशिकीय प्रक्रियाओं में बाधा डालते हैं।

कई शेपरॉन ‘हीट शॉक’ प्रोटीन (या ऊष्मा-प्रघात प्रोटीन) की श्रेणी में आते हैं। जब भी किसी जीव को उच्च तापमान का झटका (हीट शॉक) लगता है तो उसके प्रोटीन अपना मूल आकार खोने लगते हैं। व्यवस्था को बहाल करने के लिए बड़ी संख्या में शेपरॉन बनते हैं।

शरीर में सामान्य कोशिकीय क्रियाओं के संचालन लिए भी शेपरॉन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन का गलत जगह या गलत तरीके से मुड़ना कई रोगों का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए तंत्रिकाओं में अल्फा-सायन्यूक्लीन प्रोटीन पाया जाता है। यह गलत तह किया गया हो तो पार्किंसन रोग होता है। अल्ज़ाइमर के रोगियों के मस्तिष्क में एमिलॉयड बीटा-पेप्टाइड के गुच्छों से बने प्लाक होते हैं। एमिलॉयड तंतुओं का यह जमाव विषैला होता है जो व्यापक पैमाने पर तंत्रिकाओं का नाश करता है – यह एक ‘तंत्रिका-विघटन’ विकार है। आंख के लेंस के प्रोटीन (क्रिस्टेलिन) के गलत ढंग से तह हो जाने के कारण मोतियाबिंद होता है। आंखों के लेंस में अल्फा-क्रिस्टेलिन नामक प्रोटीन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जो स्वयं शेपरॉन के रूप में कार्य करते हैं – मानव अल्फा क्रिस्टेलिन में एक अकेला उत्परिवर्तन कतिपय जन्मजात मोतियाबिंद के लिए ज़िम्मेदार होता है।

आणविक तापमापी

मनुष्यों में प्रमुख शेपरॉन में HSP70, HSC70 और HSP90 शामिल हैं। इन नामों में जो संख्याएं हैं वे प्रोटीन की साइज़ (किलोडाल्टन में) दर्शाती हैं। सामान्य कोशिकाओं में पाए जाने वाले प्रोटीन्स में से 1-2 प्रतिशत प्रोटीन हीट शॉक प्रोटीन होते हैं। तनाव की स्थिति में इनकी संख्या तीन गुना तक बढ़ जाती है।

HSP70 तो ऊष्मा का संपर्क होने पर बनता है जबकि HSC70 हमेशा सामान्य कोशिकाओं में काफी मात्रा में मौजूद होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि HSC70 एक आणविक तापमापी की तरह काम करता है, जिसमें ठंडे (कम तापमान) को महसूस करने की क्षमता है। यह बात कुछ पेचीदा विकारों के अध्ययन से पता चली है। ऐसे विकारों का एक उदाहरण दुर्लभ फैमिलियल कोल्ड ऑटोइन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम यानी खानदानी शीत आत्म-प्रतिरक्षा विकार (FCAS) है। इस समूह के विकारों के लक्षणों में त्वचा पर चकत्ते, जोड़ों में दर्द और बुखार शामिल हैं। ये लक्षण कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक बने रह सकते हैं। इनकी शुरुआत कम उम्र में हो जाती है, और ये ठंड के कारण या थकान जैसे तनाव के कारण शुरू होते हैं। इस विकार के भ्रामक लक्षणों के कारण इसका निदान मुश्किल होता है – पहली बार प्रकट होने के बाद पक्का निदान करने में दस-दस साल लग जाते हैं।

भारत में FCAS ग्रस्त पहला परिवार इस साल अगस्त में पहचाना गया था। बेंगलुरु स्थित एस्टर सीएमआई अस्पताल के सागर भट्टड़ और उनके सहयोगियों ने चार साल के एक लड़के, जिसे अक्सर जाड़ों में चकत्ते पड़ जाते थे, में FCAS के आनुवंशिक आधार का पता लगाया। पता चला है कि उसके दादा सहित परिवार के कई सदस्यों में यही दिक्कतें थी (इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स, अगस्त 2021)।

ठंडा महसूस करने में HSC70 की भूमिका को लेकर सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के घनश्याम स्वरूप और उनके समूह ने आत्म-प्रतिरक्षा जनित शोथ (ऑटोइन्फ्लेमेशन) की स्थिति शुरू होने की एक रूपरेखा तैयार की है (FEBS जर्नल, सितंबर 2021)।

शीत संवेदना से सम्बंधित विकार उन प्रोटीन्स में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं जो शोथ को नियंत्रित करते हैं। शरीर के सामान्य तापमान पर तो HSC70 इन उत्परिवर्तित प्रोटीनों को भी सही ढंग से तह होने के लिए तैयार कर लेता है, और इस तरह ये उत्परिवर्तित प्रोटीन भी सामान्य ढंग से कार्य करते रहते हैं। ठंड की स्थिति में, HSC70 अणु का आकार खुद थोड़ा बदल जाता है और शोथ के लिए ज़िम्मेदार उत्परिवर्तित अणुओं के साथ यह उतनी मुस्तैदी से निपट नहीं पाता। इस कारण दो घंटे के भीतर ही ठंड लगना, जोड़ों में दर्द और त्वचा पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

कैंसर कोशिकाएं अंधाधुंध तरह से विभाजित होती हैं। कैंसर की ऐसी तनावपूर्ण स्थिति को बनाए रखने में हीट शॉक प्रोटीन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कैंसर कोशिकाओं में हीट शॉक प्रोटीन की अधिकता रोग के बिगड़ने का संकेत होता है। कैंसर कोशिकाओं में ऐसे प्रोटीन्स, जो सामान्य रूप से ट्यूमर का दमन करते हैं, में उत्परिवर्तन इकट्ठे होते चले जाते हैं। इस मामले में HSP70 और HSP90 खलनायक की भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे उत्परिवर्तित प्रोटीन को तह करना जारी रखते हैं और ट्यूमर को बढ़ने का मौका देते हैं। प्रयोगशाला में, HSP90 के अवरोधकों ने कैंसर विरोधी एजेंटों के रूप में आशाजनक परिणाम दिए हैं। अलबत्ता, मनुष्यों पर उपयोग के लिए अब तक किसी भी अवरोधक को मंज़ूरी नहीं मिली है, क्योंकि प्रभावी होने के लिए इन रसायनों की जितनी अधिक मात्रा की ज़रूरत होती है वह मानव शरीर के हानिकारक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नई पैनल करेगी महामारी के स्रोत का अध्ययन

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति की जांच के लिए एक नई पैनल गठित की है। साइंटिफिक एडवायज़री ग्रुप ऑन दी ओरिजिंस ऑफ नावेल पैथोजेंस (एसएजीओ) नामक इस टीम को भविष्य के प्रकोपों और महामारियों की उत्पत्ति तथा उभरते रोगजनकों के अध्ययन के लिए सुझाव देने का भी काम सौंपा गया है।

एसएजीओ में 26 देशों के 26 शोधकर्ताओं को शामिल किया गया है। 6 सदस्य पूर्व अंतर्राष्ट्रीय टीम का भी हिस्सा रहे हैं जिसने सार्स-कोव-2 की प्राकृतिक उत्पत्ति का समर्थन किया था। गौरतलब है कि डबल्यूएचओ ने 700 से अधिक आवेदनों में से इन सदस्यों का चयन किया है और औपचारिक घोषणा 2 सप्ताह बाद की जाएगी।

वैश्विक स्वास्थ्य की विशेषज्ञ और जॉर्जटाउन युनिवर्सिटी की वकील एलेक्ज़ेंड्रा फेलन इस टीम को एक प्रभावशाली समूह के रूप में देखती हैं लेकिन मानती हैं कि महिलाओं की भागीदारी अधिक होनी चाहिए थी। साथ ही उनका मत है कि पैनल में नैतिकता और समाज शास्त्र के विशेषज्ञों का भी अभाव है।

उत्पत्ति सम्बंधी डबल्यूएचओ का पूर्व अध्ययन राजनीति, हितों के टकराव और अपुष्ट सिद्धांतों के चलते भंवर में उलझा था। ऐसी ही दिक्कतें पिछले प्रकोपों की जांच के दौरान भी उत्पन्न हुई थीं। डबल्यूएचओ को उम्मीद है कि एक स्थायी पैनल गठित करने से कोविड-19 के स्रोत पर चल रही तनाव की स्थिति में कमी आएगी और भविष्य के रोगजनकों की जांच अधिक सलीके से हो सकेगी। संगठन का उद्देश्य इसे राजनीतिक बहस से दूर रखते हुए वैज्ञानिक बहस की ओर ले जाना है।

मोटे तौर पर एसएजीओ का ध्यान इस बात पर होगा कि खतरनाक रोगजनक जीव कब, कहां और कैसे मनुष्यों को संक्रमित करते हैं, कैसे इनके प्रसार को कम किया जा सकता है और प्रकोप का रूप लेने से रोका जा सकता है। एसएजीओ के विचारार्थ मुद्दों में वर्तमान महामारी की उत्पत्ति के बारे में उपलब्ध सबूतों का स्वतंत्र मूल्यांकन और आगे के अध्ययन के लिए सलाह देना शामिल है।       

इसके चलते तनाव की स्थिति भी बन सकती है। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन का निष्कर्ष था कि नए कोरोनावायरस की प्रयोगशाला में उत्पत्ति संभव नहीं है और इस विषय में आगे जांच न करने की भी बात कही गई थी। लेकिन डबल्यूएचओ के निदेशक टेड्रोस ने इस निष्कर्ष को “जल्दबाज़ी” बताया था। यानी पैनल को प्रयोगशाला उत्पत्ति पर विचार करना होगा। इससे टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। चीन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि भविष्य में वह ऐसी किसी जांच में सहयोग नहीं करेगा।

बहरहाल, एसएजीओ को उत्पत्ति सम्बंधी अध्ययन को वापस उचित दिशा देने का मौका है। यदि इसकी संभावना नहीं होती तो एसएजीओ की स्थापना ही क्यों की जाती। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन से जुड़े कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह काफी महत्वपूर्ण है कि एसएजीओ की स्थापना से ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले स्वतंत्र समूहों के काम में बाधा नहीं आनी चाहिए जो किसी प्रकोप के उभरने के बाद तुरंत जांच में लग जाते हैं। संभावना है कि पैनल कई अलग-अलग समूहों को भी अपने साथ शामिल कर सकती है जो अलग-अलग परिकल्पनाओं की छानबीन तथा पहली समिति द्वारा सुझाए गए अध्ययनों को आगे बढ़ा सकते हैं।  

एसएजीओ के पास कई रास्ते हैं – वुहान और उसके आसपास के बाज़ारों में बेचे जाने वाले वन्यजीवों और चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के चमगादड़ों में सार्स वायरस का अध्ययन; चीन में दिसंबर 2019 से पहले पाए गए मामलों की जांच; और वुहान और आसपास के क्षेत्रों के ब्लड बैंकों में 2019 से संग्रहित रक्त नमूनों का विश्लेषण और मौतों का विस्तृत अध्ययन।

डबल्यूएचओ की प्रथम समिति ने वुहान के ब्लड बैंकों में संग्रहित 2 लाख नमूनों की जांच का सुझाव दिया था। इनमें से कुछ नमूने तो दिसंबर 2019 के भी पहले के हैं। चीन ने वायदा किया है कि वह उन नमूनों के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को साझा करेगा लेकिन कुछ कानूनी कारणों से नमूनों की संग्रह तिथि के 2 वर्ष बाद तक जांच नहीं की जा सकती। संभावना है कि 2 वर्ष की अवधि पूरे होते ही जांच शुरू कर दी जाएगी।

एक बात तो स्पष्ट है कि एसएजीओ को काम करने के लिए राष्ट्रों, मीडिया और आम जनता का सहयोग ज़रूरी है। यह हमारे पार वायरस की उत्पत्ति को जानने का शायद आखिरी मौका हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.chula.ac.th/wp-content/uploads/2021/10/2021-10_ENG_WHO-Proposes-26-Scientists-to-study-COVID-origin.jpg

फर्ज़ी प्रकाशनों के विरुद्ध चीन की कार्यवाही

हाल ही में शोध अध्ययनों का वित्तपोषण करने वाले चीन के दो प्रमुख संस्थानों ने कदाचार की जांच करके कम से कम 23 ऐसे वैज्ञानिकों को दंडित किया है जो ‘शोधपत्र कारखानों’ का उपयोग कर रहे थे। ‘शोधपत्र कारखाने’ मतलब ऐसे व्यवसायी जो मनमाफिक नकली डैटा और फर्ज़ी पांडुलिपियां तैयार करते हैं। इन वैज्ञानिकों पर अस्थायी रूप से अनुदान आवेदन करने या अनुदान और पदोन्नति पर रोक लगाकर दंडित किया गया है। ये सभी निर्णय पिछले वर्ष सितंबर में जारी की गई नीति के तहत लिए गए हैं जिसका मुख्य उद्देश्य ‘शोधपत्र कारखानों’ और अन्य कदाचार से निपटना था।

वैसे कई शोधकर्ताओं को 2020 के पूर्व भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब कदाचार नीतियों में स्वतंत्र व्यवसायों सम्बंधित उल्लंघनों को शामिल किया गया है जो शोधकर्ताओं को लेखन या डैटा बेचते हैं। कई शोधकर्ता इस पहल को एक बड़े कदम के रूप में देखते हैं लेकिन विश्व के कई अन्य भागों में अपनाए जाने वाले मानदंडों की तुलना में ये अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। ब्रैडली युनिवर्सिटी के पुस्तकालय तथा सूचना वैज्ञानिक और चीन में शोध कदाचार के अध्ययनकर्ता ज़ियाओशियन चेन के अनुसार कई देशों में सरकारी अनुदान प्राप्त प्रकाशनों में फर्ज़ी डैटा प्रकाशित करने को अपराध माना जाता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार वैज्ञानिकों पर कार्रवाई करते हुए एक बड़ी समस्या को अभी भी अनदेखा किया जा रहा है – ‘शोधपत्र कारखानों’ पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। इस विषय में नेशनल कमीशन ऑफ दी पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (एनएचसी) और दी नेशनल नेचुरल साइंस फाउंडेशन ऑफ चाइना (एनएसएफसी) ने अब तक कम से कम 23 शोधकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाया है जो वैज्ञानिक टेक्स्ट और डैटा प्रदान करने वाली सेवाओं का रुख करते हैं या फिर इस तरह के शोधपत्र खरीदते या बेचते हैं।

चीन के शोधकर्ता अधिक शोध पत्र प्रकाशित करने के चक्कर में ‘शोधपत्र कारखानों’ से शोधपत्र या डैटा खरीदते हैं क्योंकि पदोन्नति के लिए प्रकाशन एक अनिवार्यता है। गौरतलब है कि पिछले दिनों कई वैज्ञानिक पत्रिकाओं ने बड़ी संख्या में शोध पत्र अस्वीकृत किए हैं क्योंकि ऐसे आशंका थी कि वे ‘शोधपत्र कारखानों’ से निकले है।     

नेचर पत्रिका द्वारा जनवरी 2020 से इस वर्ष मार्च तक इस तरह के लगभग 370 शोध पत्र वापस ले लिए गए हैं। इन सभी के लेखक चीनी अस्पतालों से सम्बंधित हैं। वर्तमान में यह संख्या 665 हो चुकी है। गौरतलब है कि वैज्ञानिकों को पहले भी ‘शोधपत्र कारखानों’ का उपयोग करने के लिए फटकार लगाई जा चुकी है लेकिन 2017 में एक बड़े घोटाले के सामने आने के बाद से वैज्ञानिक समुदाय के बीच चिंता और अधिक बढ़ गई है। ट्यूमर बायोलॉजी नामक जर्नल ने 107 शोध पत्रों को इस कारण से वापस ले लिया था क्योंकि कई में फर्ज़ी समकक्ष समीक्षा रिपोर्ट का उपयोग किया था या ये ‘शोधपत्र कारखानों’ में तैयार हुए थे।    

इन सभी घटनाओं के नतीजे में चीन के विज्ञान और टेक्नॉलॉजी मंत्रालय द्वारा शोध कार्यों में होने वाले उल्लंघनों और कदाचार से निपटने के लिए 2018 में कुछ नीतिगत घोषणाएं की गई थीं। पिछले वर्ष जारी की गई न्यू रिसर्च मिसकंडक्ट पॉलिसी में पहली बार स्पष्ट रूप से ‘शोधपत्र कारखानों’ का उल्लेख किया गया। इस नीति के तहत नियमों के गंभीर उल्लंघनों को सार्वजनिक करने की बात कही गई।

शोध के लिए वित्तपोषण प्रदान करने वाले संस्थानों द्वारा हालिया कार्रवाइयों से पता चलता है कि इस नीति को लागू किया जा रहा है। मार्च और जुलाई में, एनएसएफसी ने 13 कदाचार जांचों का विवरण प्रकाशित किया जिनमें से 6 मामले ‘शोधपत्र कारखानों’ से जुड़े थे। एक मामले में तो एक शोधकर्ता ने अपनी थीसिस के लिए 3700 डॉलर (लगभग 2.75 लाख रुपए) का भुगतान किया था। कुछ अन्य मामले समकक्ष समीक्षा में धोखाधड़ी, साहित्यिक-चोरी और फर्ज़ी डैटा के पाए गए। जून और सितंबर के दौरान एनएचसी द्वारा ‘शोधपत्र कारखानों’ के उपयोग सहित कदाचार के लगभग 30 मामलों की सूचना दी गई है।    

‘शोधपत्र कारखानों’ का उपयोग करने वाले शोधकर्ताओं के लिए दंड के तौर पर फटकार से लेकर सात साल तक वित्तपोषण के लिए आवेदन देने और छह वर्षों तक पदोन्नति पर प्रतिबंध लगाया गया है। हिरोशिमा युनिवर्सिटी, जापान के चीनी शोधकर्ता फूटाओ हुआंग इन सज़ाओं को काफी कमज़ोर मानते हैं और खासकर अस्पतालों के संदर्भ में चीन की शैक्षणिक मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव का सुझाव देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड वायरस का निकटतम सम्बंधी मिला

हाल ही में वैज्ञानिकों को लाओस में चमगादड़ों में तीन ऐसे वायरस मिले हैं जो किसी ज्ञात वायरस की तुलना में सार्स-कोव-2 से अधिक मेल खाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इस वायरस के जेनेटिक कोड के कुछ हिस्सों का अध्ययन करने से पता चला है कि सार्स-कोव-2 वायरस प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुआ है। साथ ही इस खोज से यह खतरा भी सामने आया है कि मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता वाले कई अन्य कोरोनावायरस मौजूद हैं।

वैसे प्रीप्रिंट सर्वर रिसर्च स्क्वेयर में प्रकाशित इस अध्ययन की समकक्ष समीक्षा फिलहाल नहीं हुई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस वायरस में पाए जाने वाले रिसेप्टर बंधन डोमेन लगभग सार्स-कोव-2 के समान होते हैं जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करने में सक्षम होते हैं। रिसेप्टर बंधन डोमेन सार्स-कोव-2 को मानव कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ACE-2 नामक ग्राही से जुड़कर उनके भीतर प्रवेश करने की अनुमति देते हैं।

पेरिस स्थित पाश्चर इंस्टीट्यूट के वायरोलॉजिस्ट मार्क एलियट और फ्रांस तथा लाओस में उनके सहयोगियों ने उत्तरी लाओस की गुफाओं से 645 चमगादड़ों की लार, मल और मूत्र के नमूने प्राप्त किए। चमगादड़ों की तीन हॉर्सशू (राइनोलोफस) प्रजातियों से प्राप्त वायरस सार्स-कोव-2 से 95 प्रतिशत तक मेल खाते हैं। इन वायरसों को BANAL-52, BANAL-103 और BANAL-236 नाम दिया गया है।   

युनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के वायरोलॉजिस्ट एडवर्ड होम्स के अनुसार जब सार्स-कोव-2 को पहली बार अनुक्रमित किया गया था तब रिसेप्टर बंधन डोमेन के बारे में हमारे पास पहले से कोई जानकारी नहीं थी। इस आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि इस वायरस को प्रयोगशाला में विकसित किया गया है। लेकिन लाओस से प्राप्त कोरोनावायरस पुष्टि करते हैं कि सार्स-कोव-2 में ये डोमन प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहे हैं। देखा जाए तो थाईलैंड, कम्बोडिया और दक्षिण चीन स्थित युनान में पाए गए सार्स-कोव-2 के निकटतम सम्बंधित वायरसों पर किए गए अध्ययन इस बात के संकेत देते हैं कि दक्षिणपूर्वी एशिया सार्स-कोव-2 सम्बंधित विविध वायरसों का हॉटस्पॉट है।

इस अध्ययन में एक कदम आगे जाते हुए एलियट और उनकी टीम ने प्रयोगों के माध्यम से यह बताया कि इन वायरसों के रिसेप्टर बंधन डोमेन मानव कोशिकाओं पर उपस्थित ACE-2 रिसेप्टर से उतनी ही कुशलता से जुड़ सकते हैं जितनी कुशलता से सार्स-कोव-2 के शुरुआती संस्करण जुड़ते थे। शोधकर्ताओं ने BANAL-236 को कोशिकाओं में कल्चर किया है जिसका उपयोग वे जीवों में वायरस के प्रभाव को समझने के लिए करेंगे।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष शोधकर्ताओं ने सार्स-कोव-2 के एक निकटतम सम्बंधी RaTG13 का भी पता लगाया था जो युनान के चमगादड़ों में पाया गया था। यह वायरस सार्स-कोव-2 से 96.1 प्रतिशत तक मेल खाता है जिससे यह कहा जा सकता है कि 40 से 70 वर्ष पूर्व इन दोनों वायरसों का एक साझा पूर्वज रहा होगा।

एलियट के अनुसार BANAL-52 वायरस सार्स-कोव-2 से 96.8 प्रतिशत तक मेल खाता है। एलियट के अनुसार खोज किए गए तीन वायरसों में अलग-अलग वर्ग हैं जो अन्य वायरसों की तुलना में सार्स-कोव-2 के कुछ भागों से अधिक मेल खाते हैं। गौरतलब है कि वायरस एक दूसरे के साथ RNA के टुकड़ों की अदला-बदली करते रहते हैं।    

हालांकि, इस अध्ययन से महामारी के स्रोत के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हुई है लेकिन इसमें कुछ कड़ियां अभी भी अनुपस्थित हैं। जैसे कि लाओस वायरस के स्पाइक प्रोटीन पर तथाकथित फ्यूरिन क्लीवेज साइट नहीं है जो मानव कोशिकाओं में सार्स-कोव-2 या अन्य कोरोनावायरसों को प्रवेश करने में सहायता करती हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वायरस वुहान तक कैसे पहुंचे जहां कोविड-19 के पहले ज्ञात मामले की जानकारी मिली थी। क्या यह वायरस किसी मध्यवर्ती जीव के माध्यम से वहां पहुंचा था? इसका जवाब तो दक्षिण-पूर्वी एशिया में चमगादड़ों व अन्य वन्यजीवों के नमूनों के विश्लेषण से ही मिल सकता है जिस पर कई शोध समूह कार्य कर रहे हैं। प्रीप्रिंट में एक और अध्ययन प्रकाशित हुआ है जो पूर्व में चीन में किया गया था। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2016 और 2021 के बीच 13,000 से अधिक चमगादड़ों के नमूनों पर अध्ययन किया था जिनमें से सार्स-कोव-2 वायरस के किसी भी निकट सम्बंधी की जानकारी प्राप्त नहीं हुई थी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि इस वायरस के वाहक चमगादड़ों की संख्या चीन में काफी कम है। इस पर भी कई अन्य शोधकर्ताओं ने असहमति जताई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हंसाता है, सोचने को विवश करता है इग्नोबेल पुरस्कार

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पहली नज़र में हास्यास्पद लेकिन महत्वपूर्ण खोजों को पुरस्कृत करने के लिए 31वां इग्नोबेल पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। कोरोना महामारी के चलते इस वर्ष भी यह समारोह ऑनलाइन किया गया जिसमें संगीतमय बिल्लियां, औंधे गेंडे और पनडुब्बी में कॉकरोच से बचाव आकर्षण का केंद्र रहे। इस वर्ष की थीम इंजीनियरिंग थी और इग्नोबेल पुरस्कारों का वितरण फ्रांसिस अर्नाल्ड और एरिक मैसकिन सहित अन्य नोबेल विजेताओं ने किया।

कुल 10 इग्नोबेल पुरस्कारों में से जीव विज्ञान का पुरस्कार बिल्लियों की विभिन्न ध्वनियों के अध्ययनों की एक शृंखला को दिया गया है। ऐसा लगता है कि बिल्लियां इन ध्वनियों का उपयोग मनुष्यों को अपनी इच्छाओं से अवगत कराने के लिए करती हैं। लुंड युनिवर्सिटी की बिल्ली-वाणि शोधकर्ता सुज़ैन शॉट्ज़ 2011 से माइक्रोफोन को बिल्लियों के हाथ में देकर उनकी विभिन्न ध्वनियों को सुनने और उनकी म्याऊं का मतलब खोजने का प्रयास कर रही थीं।

शॉट्ज़ को यह सम्मान कई शोध पत्रों के लिए दिया गया है। इनमें वह शोध पत्र भी शामिल है जिसमें यह बताया गया है कि मनुष्य कितनी अच्छी तरह से बिल्लियों की म्याऊंसिकी को समझ पाते हैं। शॉट्ज़ बताती हैं कि जब बिल्लियों को अपने मालिकों से भोजन चाहिए होता है तो उनकी ध्वनि अंत में ऊंचे तारत्व की होती है। यदि वे चिकित्सक के पास जाने को लेकर डर रही होती हैं तब वे तारत्व को कम कर देती हैं। गौरतलब है कि तारत्व का सम्बंध आवाज़ के पतली-मोटी होने से है – अधिक तारत्व मतलब ज़्यादा पतली आवाज़। उन्होंने जब 30 लोगों के समूह को बिल्लियों की ध्वनियों के उतार-चढ़ाव सुनाए तो अधिकांश समय वे बिल्लियों की भावनाओं का अनुमान लगा पाए थे। इनमें बिल्लियों के मालिकों के अनुमान बेहतर रहे।

जीव विज्ञान के अन्य पुरस्कार ऐसे जीवों पर शोध करने के लिए दिए गए जिन्होंने आसमान की बुलंदियों को छुआ या समुद्र की गहराइयों में गोते लगाए।

ट्रांसपोर्टेशन पुरस्कार से उन शोधकर्ताओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने यह पता लगाया कि हेलीकॉप्टर से गैंडों को लाने-ले जाने की सबसे अच्छी तकनीक उनको उल्टा करके (पीठ के बल) ले जाना है। यह तकनीक संरक्षणवादियों के लिए काफी उपयोगी साबित हुई है जो चाहते हैं कि गैंडों और हाथियों जैसे बड़े जीवों को शिकारियों से सुरक्षित रखा जाए या उनकी आनुवंशिक विविधता को बनाए रखा जाए। इसमें मज़ेदार बात यह है कि शोधकर्ताओं ने पुरस्कार लेते समय यह बताया कि गैंडों पर यह तकनीक अपनाने से पहले इसे वे खुद पर आज़मा चुके थे। अलबत्ता, पुरस्कार देने वाले नोबेल विजेता रिचर्ड रॉबट्र्स ने स्पष्ट कर दिया कि यदि उन्हें कभी कहीं ले जाना पड़े तो मेहरबानी करके सीधा ही ले जाएं।

कीट विज्ञान के पुरस्कार ने मानव-पशु तनावपूर्ण सम्बंधों को उजागर किया। मनुष्यों और तिलचट्टों की लड़ाई काफी प्राचीन रही है। इस पुरस्कार के लिए समिति ने विज्ञान साहित्य के संग्रहालय में डुबकी लगाकर 1971 का एक अध्ययन A new method of cockroach control on submarines (पनडुब्बियों में तिलटट्टा नियंत्रण की एक नई विधि) खोज निकाला। पुरस्कार अमेरिकी नौसेना के सेवानिवृत्त कमोडोर जॉन मुलरीनन जूनियर को दिया गया। उन्होंने नौसेना की पनडुब्बियों में तिलचट्टों से छुटकारा पाने के लिए डाइक्लोरवॉस नामक कीटनाशक का उपयोग किया था। इससे पहले एथिलीन ऑक्साइड गैस का उपयोग किया जाता था जिसके उपयोग से कोई बीमार हो गया था। उस समय तो नौसेना को यह तकनीक काफी उपयोगी व कारगर लगी थी, हालांकि कमोडोर मुलरेनिन ने कहा कि वे नहीं जानते कि क्या आजकल भी नौसेना इसका इस्तेमाल करती है।

भौतिकी पुरस्कार एक ऐसे शोध के लिए दिया गया जिसमें यह विश्लेषण किया गया था कि भीड़ में चलते समय लोग एक दूसरे से टकराते क्यों नहीं हैं और काइनेटिक्स पुरस्कार इस अध्ययन के लिए दिया गया कि लोग कभी-कभी टकरा क्यों जाते हैं।

इकॉलॉजी पुरस्कार एक बैक्टीरिया के विश्लेषण पर दिया गया जो उपयोग की गई च्युइंग गम पर पनपता है। इसके अलावा शांति पुरस्कार इस अध्ययन पर दिया गया कि दाढ़ी कितने प्रभावी ढंग से घूंसे से चेहरे की रक्षा करती है (यह झटके को कम कर देती है)। चिकित्सा पुरस्कार ऐसे अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें यह बताया गया कि यौन चरमोत्कर्ष बंद नाक खोलने में प्रभावी हो सकता है (होता है, लेकिन असर सिर्फ एक घंटे रहता है)।

विजेताओं को एनल्स ऑफ इम्प्रॉबेबल रिसर्च के संपादक और इस समारोह के मेज़बान मार्क अब्राहम की ओर से एक नकली 10 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर का नोट भी दिया गया। ट्राफी के रूप में खुद से बनाने के लिए एक घनाकार पेपर का गियर दिया गया जिस पर दांतों की तस्वीरें बनी थीं। (स्रोत फीचर्स)

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शोध डैटा में हेर-फेर

एक एक डच सर्वेक्षण में लगभग आठ प्रतिशत वैज्ञानिकों ने यह बात मानी है कि वर्ष 2017 से 2020 के बीच उन्होंने कम से कम एक बार मिथ्या डैटा या मनगढ़ंत डैटा का उपयोग किया था। सर्वेक्षण में वैज्ञानिकों के नाम गोपनीय रखे गए थे। लगभग 10 प्रतिशत से अधिक चिकित्सा और जीव विज्ञान के शोधकर्ताओं ने भी डैटा में इस तरह के हेर-फेर की बात स्वीकार की है। मेटाआर्काइव (MetaArxiv) प्रीप्रिंट में प्रकाशित इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने अक्टूबर 2020 से दिसंबर 2020 के बीच नेदरलैंड के 22 विश्वविद्यालयों के लगभग 64,000 शोधकर्ताओं से संपर्क किया था, जिनमें से 6,813 ने उत्तर दिए थे।

वर्ष 2005 में यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा इसी मुद्दे पर एक अध्ययन किया गया था जिसमें बहुत कम वैज्ञानिकों ने माना था कि उन्होंने मिथ्या डैटा का उपयोग किया है या डैटा गढ़ा है; अध्ययन में शामिल 3,000 वैज्ञानिकों में से 0.3 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने यह बात कबूली थी।

डच सर्वेक्षण की अध्ययनकर्ता गौरी गोपालकृष्णन का कहना है कि संभावना है कि पूर्व अध्ययन में डैटा में हेर-फेर की बात स्वीकार करने वाले शोधकर्ताओं का प्रतिशत कम आंका गया हो। क्योंकि पूर्व अध्ययनों में इस मुद्दे पर सवाल घुमा-फिरा कर पूछे गए थे जबकि डच अध्ययन में सवाल सीधे-सीधे किए थे। और इसी कारण से अन्य अध्ययनों के परिणामों से डच अध्ययन के परिणाम की तुलना करने में सावधानी रखनी होगी। वैसे, वर्ष 2001 में डच अध्ययन के तरीके से ही किए गए एक अन्य अध्ययन में लगभग 4.5 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने माना था कि कम से कम एक बार उन्होंने डैटा के साथ छेड़छाड़ की है।

डच सर्वेक्षण में 51 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने 11 ‘आपत्तिजनक अनुसंधान आचरण’ (क्यूआरपी) में से कम से कम एक की बात भी स्वीकारी – जैसे शोध की अपर्याप्त योजना के साथ काम करना, या जानबूझकर पांडुलिपियों या अनुदान प्रस्तावों का निष्पक्ष आकलन न करना। आपत्तिजनक अनुसंधान आचरण को डैटा में हेर-फेर, साहित्यिक चोरी वगैरह की तुलना में कम बुरा माना जाता है।

आपत्तिजनक अनुसंधान आचरण कबूल करने वालों में पीएच.डी. छात्रों, पोस्टडॉक और जूनियर फैकल्टी के होने की संभावना ज़्यादा थी लेकिन डैटा में हेर-फेर और डैटा गढ़ने की बात स्वीकार करने का कोई उल्लेखनीय सम्बंध इस बात से नहीं दिखा कि शोधकर्ता अपने करियर के किस मुकाम पर थे। अलबत्ता, पूर्व अध्ययनों में पाया गया था कि जो शोधकर्ता अपने करियर के मध्य स्तर पर हैं उनकी तुलना में जूनियर शोधकर्ता ऐसे आचरणों में कम लिप्त होते हैं।

कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि डैटा मिथ्याकरण के इन आंकड़ों पर सावधानी से विचार किया जाना चाहिए। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में शोध दुराचार, नैतिकता और पूर्वाग्रह का अध्ययन करने वाले डेनियल फेनेली ने 2009 में एक मेटा-विश्लेषण किया था जिसमें लगभग दो प्रतिशत शोधकर्ताओं ने मिथ्या डैटा, डैटा गढ़ने या उसमें हेर-फेर करने की बात स्वीकार की थी। इसके अलावा, डच अध्ययन में यह भी स्पष्ट नहीं है कि पिछले तीन वर्ष में ऐसा करने की बात कबूलने वाले शोधकर्ताओं ने वास्तव में ऐसा कितनी बार किया, उनके कितने शोधपत्रों में परिवर्तित डैटा था और क्या उन्होंने वह काम प्रकाशित किया था। अनुसंधान दुराचार होते रहते हैं, लेकिन ये हो रहे हैं इसका पता लगाना और इन्हें साबित करना बहुत मुश्किल है। इसके अलावा अनुसंधान संस्थान भी इन मुद्दों पर पारदर्शिता नहीं दर्शाते।

गोपालकृष्णन और उनके साथियों ने इसी सर्वेक्षण के डैटा का उपयोग कर ज़िम्मेदार अनुसंधान आचरण की पड़ताल करता हुआ एक अन्य अध्ययन मेटाआर्काइव प्रीप्रिंट में प्रकाशित किया है। अध्ययन में पाया गया कि 99 प्रतिशत वैज्ञानिक आम तौर पर साहित्यिक चोरी से बचते हैं, 97 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने हितों के टकराव का खुलासा किया और 94 प्रतिशत वैज्ञानिक प्रकाशन से पहले पांडुलिपि में त्रुटियों की जांच करते हैं। लगभग 43 प्रतिशत शोधकर्ताओं ने ही कहा कि वे प्रयोग सम्बंधी प्रोटोकॉल पहले से पंजीकृत करते हैं, 47 प्रतिशत वैज्ञानिक ही मूल डैटा उपलब्ध कराते हैं, और 56 प्रतिशत वैज्ञानिक ही व्यापक शोध रिकॉर्ड रखते हैं। गोपालकृष्णन का कहना है कि डैटा में हेर-फेर जैसे अनुसंधान दुराचार पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है, लेकिन अनुसंधान में लापरवाही को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हमें एक ऐसे माहौल की ज़रूरत है जहां गलतियों को अपराध न माना जाए, आचरण ज़िम्मेदारीपूर्ण हो, और धीमी गति से लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले शोध पर अधिक ध्यान दिया जाए। (स्रोत फीचर्स)

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फलियों को सख्त खोल कैसे मिला

गुलाब से लेकर बेशरम और चावल तक के फूलदार पौधे (आवृतबीजी या एंजियोस्पर्म) पृथ्वी के सबसे विविध और सफल जीवों में से हैं। इनकी 3,50,000 से अधिक प्रजातियां सुंदर, पौष्टिक और अपने-अपने पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन डारविन के समय से ही जैव विकास के अध्येताओं के लिए यह एक गुत्थी रही है कि इनका विकास किस तरह हुआ। अब अत्याधुनिक तकनीक और मंगोलिया में मिले जीवाश्मों की मदद से शोधकर्ता इसे हल करने की दिशा में आगे बढ़े हैं।

आवृतबीजी लगभग 12.5 करोड़ वर्ष पहले विकसित हुए और पूरी पृथ्वी पर छा गए। ये बीजों के माध्यम से प्रजनन करते हैं, कुछ उसी तरह जिस तरह इनके पूर्व विकसित हुए चीड़, देवदार, गिंकगो जैसे नग्नबीजी (जिम्नोस्पर्म) करते हैं। लेकिन आवृतबीजियों में बीज निर्माण में कुछ नवाचार हुए जिससे वे फैलने में अधिक सफल हुए।

इनके फूलों के केंद्र में एक नलीदार संरचना स्त्रीकेसर होती है। स्त्रीकेसर का वर्तिकाग्र पराग ग्रहण करता और उसे अंडाशय में भेज देता है, जहां बीज विकसित होते हैं। यही अंडाशय आगे जाकर फली के रूप में परिपक्व होता है। इस तरह एंजियोस्पर्म के बीजों पर दो आवरण – आंतरिक और बाहरी आवरण – बनते हैं। बाहरी आवरण जैसे मटर के दाने का बाहरी छिलका या सेम की रंगीन सतह।

एंजियोस्पर्म का विकास जिम्नोस्पर्म से हुआ है। लेकिन यह रहस्य ही रहा है कि इनमें स्त्रीकेसर और बीज की दूसरी परत कैसे विकसित हुई। पूर्व में, चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के जीवाश्म-वनस्पति विज्ञानी गोंगल शी और उनके साथियों को यूके, चीन और अंटार्कटिका से ऐसे जिम्नोस्पर्म के जीवाश्म मिले थे जिनके बीज कप जैसे आकार के बाहरी आवरण से ढंके थे। इन कप-नुमा बाहरी आवरण को उन्होंने कप्यूल नाम दिया और संभावना जताई कि इसी रचना से एंजियोस्पर्म में बीज के दूसरे बाहरी कवच के विकास की शुरुआत हुई होगी।

लेकिन वर्तमान में किसी भी जीवित पौधे में इस तरह के कप्यूल नहीं दिखते और शोधकर्ताओं को जो जीवाश्म मिले थे वे आंशिक रूप से सड़ चुके पौधों के थे, जिससे इनका पूरी तरह से विश्लेषण करना असंभव रहा।

इसके बाद 2015 में शोधकर्ताओं को मंगोलिया की जारूद बैनर नामक कोयला खदान से पत्थर में बहुत ही अच्छी तरह से संरक्षित दलदली पौधे का जीवाश्म मिला; इस जीवाश्म में भी कप्यूल थे। सूक्ष्मदर्शी से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने पत्थर को हीरे की आरी से काटा, पॉलिश किया और सतह को एसिड की मदद से तराशा ताकि जीवाश्म की छीलन तैयार की जा सके। इसके अलावा त्रि-आयामी संरचना बनाने के लिए उन्होंने कप्यूल्स का सीटी स्कैन भी किया। उन्होंने पाया कि आधुनिक एंजियोस्पर्म बीजों के बाहरी आवरण की तरह ही इस कप्यूल के ऊतक भी विकसित होते बीजों के चारों ओर लिपटे हुए थे।

कप्यूल-युक्त अन्य जीवाश्मों से इनकी तुलना करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि ये सभी पौधों के उस समूह में आते हैं जिनमें विभिन्न तरह के कप्यूल होते हैं। इन जीवाश्मों से न सिर्फ यह पता चलता है कि बीज में दूसरा आवरण कैसे आया, बल्कि यह भी पता चलता है कि स्त्रीकेसर कैसे विकसित हुए – इन कप्यूल्स में कुछ इस तरह की पत्तियां भी दिखाई दीं जो आगे जाकर स्त्रीकेसर में विकसित हुई होंगी। बहरहाल, इस तरह की और भी खोज और अध्ययन की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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ठंडक देने वाले ‘दर्पण’ वस्त्र

ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े बनाना तो आसान है लेकिन झुलसाती गर्मी में शरीर को ठंडा रखने वाले कपड़े बनाना मुश्किल है। और अब, वैज्ञानिकों ने ऐसा कपड़ा तैयार किया है जो दिखने में साधारण कपड़े जैसा लगता है लेकिन यह शरीर का तापमान लगभग पांच डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकता है।

वैसे तो हम गर्मी से राहत पाने के लिए हल्के रंग के कपड़े पहनते हैं ताकि ऊष्मा कम अवशोषित हो। इसके अलावा ऐसा कपड़ा भी तैयार किया जा चुका है जो पराबैंगनी विकिरण और निकट-अवरक्त विकिरण को भी परावर्तित कर देता है। निकट-अवरक्त विकिरण का अवशोषण किसी वस्तु को गर्म कर देता है और उसका उत्सर्जन होने पर धीरे-धीरे वस्तु ठंडी हो जाती है। लेकिन शीतलन की इस प्रक्रिया में वातावरण बाधक बन जाता है: उत्सर्जित होने के बाद निकट-अवरक्त विकिरण को अक्सर आसपास मौजूद पानी के अणु सोख लेते हैं और नतीजतन वातावरण को गर्म कर देते हैं।

शीतलन को तेज़ करने के लिए शोधकर्ताओं ने निकट-अवरक्त विकिरण की जगह मध्यम-अवरक्त विकिरण का रुख किया। मध्यम-अवरक्त विकिरण की तरंग लंबाई अधिक होती है, और मध्यम-अवरक्त विकिरण आसपास की हवा में अवशोषित होने की बजाय सीधे अंतरिक्ष में बिखर जाता है। लिहाज़ा, वस्तु व उसका परिवेश दोनों ठंडे रहते हैं। पिछले एक दशक से इस तकनीक की मदद से छतें, प्लास्टिक फिल्म, लकड़ी और अति-सफेद पेंट्स बनाए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि मानव शरीर प्राकृतिक तौर पर मध्यम-अवरक्त विकिरण का उत्सर्जन करता है। 2017 में, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऐसा कपड़ा तैयार किया था जो मानव शरीर से उत्सर्जित इस मध्यम-अवरक्त विकिरण को अवशोषित करने की बजाय उसे अपने में से गुज़रने देता है, जिससे इस कपड़े को पहनने वाले के शरीर का तापमान लगभग तीन डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाता है। लेकिन यह कपड़ा बहुत पतला – लगभग 45 माइक्रोमीटर या हल्के लिनेन के कपड़े की एक-तिहाई मोटाई का – होने पर ही काम कर सकता था। और इतना पतला होने पर संभवत: यह टिकाऊ न रहता।

टिकाऊ कपड़ा बनाने के लिए झेजियांग विश्वविद्यालय और हुआज़ोंग विज्ञान एवं टेक्नॉलॉजी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मध्यम-अवरक्त विकिरण वाला ऐसा कपड़ा बनाया जो मानव शरीर से उत्सर्जित ऊष्मा को अपने में से गुज़रने देने की बजाय पहले रासायनिक बंधनों की मदद से उसे अवशोषित करे और फिर मध्यम-अवरक्त विकिरण के रूप में उत्सर्जित कर दे। 550 माइक्रोमीटर मोटाई का यह कपड़ा पॉलीलैक्टिक एसिड और सिंथेटिक फाइबर से बना है जिसमें टाइटेनियम डाईऑक्साइड के नैनोपार्टिकल्स छितरे हुए हैं। यह कपड़ा पराबैंगनी, दृश्य प्रकाश और अवरक्त प्रकाश को परावर्तित भी करता है जो पहनने वाले को और भी ठंडा रखता है। यह कपड़ा दिखने में तो आम शर्ट जैसा है लेकिन वास्तव में यह एक दर्पण है।

इस कपड़े की कारगरता जानने के लिए शोधकर्ताओं ने एक चुस्त फिटिंग वाली बनियान बनाई जिसके आधे हिस्से को दर्पण वाले कपड़े से और बाकी आधे हिस्से को उतनी ही मोटाई के सामान्य सूती कपड़े से बनाया गया था। इस तरह तैयार बनियान को एक व्यक्ति को पहनाकर एक घंटे के लिए धूप में बैठाया गया। साइंस पत्रिका में प्रकाशित नतीजों के अनुसार सामान्य सूती कपड़े की तुलना में दर्पण वाले कपड़े के नीचे की त्वचा का तापमान लगभग पांच डिग्री सेल्सियस कम था। अवरक्त कैमरे से देखने पर यह अंतर एकदम स्पष्ट था, और वह व्यक्ति भी तापमान का यह अंतर महसूस कर पा रहा था।

वैसे, मध्यम-अवरक्त उत्सर्जन तकनीक अब तक धूप में रखी स्थिर सतहों पर ही उपयोग की गई है। इसलिए यह देखना होगा कि खड़े या चलते-फिरते व्यक्ति के मामले में यह कपड़ा शरीर को कितना ठंडा रख पाता है। ढीले-ढाले साधारण फिटिंग वाले वस्त्रों पर भी जांच करनी होगी क्योंकि ठंडक पैदा करने वाले तत्वों की क्रिया तो इस बात पर निर्भर है कि वे त्वचा से कितने सटे हुए हैं।

बहरहाल यह काम विकिरण शीतलन के क्षेत्र में तेज़ी से हो रही प्रगति दर्शाता है। इस तरह के कपड़े सूती कपड़ों जैसे ही महसूस होंगे, जो उपयोगकर्ता के लिए महत्वपूर्ण है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के कपड़े निर्माण लागत में केवल 10 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी करेंगे, इसलिए इन तक सबकी पहुंच संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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