Customise Consent Preferences

We use cookies to help you navigate efficiently and perform certain functions. You will find detailed information about all cookies under each consent category below.

The cookies that are categorised as "Necessary" are stored on your browser as they are essential for enabling the basic functionalities of the site. ... 

Always Active

Necessary cookies are required to enable the basic features of this site, such as providing secure log-in or adjusting your consent preferences. These cookies do not store any personally identifiable data.

No cookies to display.

Functional cookies help perform certain functionalities like sharing the content of the website on social media platforms, collecting feedback, and other third-party features.

No cookies to display.

Analytical cookies are used to understand how visitors interact with the website. These cookies help provide information on metrics such as the number of visitors, bounce rate, traffic source, etc.

No cookies to display.

Performance cookies are used to understand and analyse the key performance indexes of the website which helps in delivering a better user experience for the visitors.

No cookies to display.

Advertisement cookies are used to provide visitors with customised advertisements based on the pages you visited previously and to analyse the effectiveness of the ad campaigns.

No cookies to display.

प्राचीन शिकारी-संग्रहकर्ता कुम्हार भी थे

त्तरी युरेशिया में मिले लगभग 8000 साल पुराने टूटे और जले हुए भोजन अवशेष लगे मिट्टी के बर्तन चीनी मिट्टी के बर्तनों जैसे तो नहीं लगते लेकिन मांस और तरकारी रखने और पकाने की यह टिकाऊ तकनीक इस क्षेत्र में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के लिए एक बड़ा कदम था। और हालिया शोध बताता है कि यह तकनीक उन्होंने खुद विकसित की थी।

दरअसल वैज्ञानिक मानते आए थे कि युरोप में मिट्टी के बर्तनों का आगमन लगभग 9000 साल पहले कृषि और जानवरों के पालतूकरण के प्रसार के साथ हुआ था। उत्तरी युरोप में मिले लगभग इसी काल के बर्तनों के आधार पर माना जाता था कि यह तकनीक शिकारी-संग्रहकर्ताओं ने अपने अधिक प्रगतिशील किसान पड़ोसियों से सीखी था।

लेकिन नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित एक अध्ययन बिलकुल अलग कहानी कहता है। लगभग 20,000 साल पहले, सुदूर पूर्वी इलाकों में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के समूहों के बीच मिट्टी के बर्तन बनाने और उपयोग करने के ज्ञान का प्रसार हो चुका था। ये बर्तन तब उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले चमड़े के बर्तनों से अधिक टिकाऊ थे, और पकाने में उपयोग किए जाने वाले लकड़ी के बर्तनों की तरह आग में जलते नहीं थे। लगभग 7900 साल पहले तक यूराल पर्वत से लेकर दक्षिणी स्कैंडिनेविया तक मिट्टी के बर्तनों का उपयोग आम हो चुका था।

मिट्टी के बर्तनों का फैलाव देखने के लिए नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ऑयरलैंड के पुरातत्वविद रोवन मैकलॉफ्लिन और उनके साथियों ने बाल्टिक सागर और भूतपूर्व सोवियत संघ के युरोपीय हिस्से के 156 पुरातात्विक स्थलों से इकट्ठा किए गए मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों का विश्लेषण किया। इनमें से कई अवशेष वर्तमान रूस और यूक्रेन के संग्रहालयों में संग्रहित थे। बर्तनों में चिपके रह गए जले हुए भोजन का रेडियोकार्बन काल-निर्धारण करके शोधकर्ता इनकी समयरेखा पता कर पाए।

चिपके हुए वसा अवशेषों से पता चला कि वे या तो जुगाली करने वाले जानवरों (जैसे हिरण या मवेशियों) का मांस पकाते थे, या मछली, सूअर या सब्ज़ी-भाजी उबालते थे। इसके अलावा, बर्तनों पर की गई कलाकारी और बर्तनों के आकार की तुलना करके शोधकर्ता पता लगा सके कि मिट्टी के बर्तनों का प्रसार एक से दूसरे समुदाय में कैसे हुआ।

वैसे तो मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए कच्चा माल हर जगह उपलब्ध था, लेकिन उन्हें आकार देने और पकाने जैसा तकनीकी ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित हुआ होगा। और साथ ही खाना पकाने की नई तकनीक भी सीखी गई होगी।

सारे डैटा को एक साथ रखने पर टीम ने पाया कि उत्तरी युरेशिया के कुछ हिस्सों में मिट्टी के बर्तन तेज़ी से फैले थे। कुछ ही शताब्दियों में यह तकनीक कैस्पियन सागर से उत्तरी और पश्चिमी हिस्से में फैल गई थी।

जिस तेज़ी से इस क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन बनाने का ज्ञान फैला, उससे लगता है कि यह ज्ञान लोगों के प्रवास के साथ आगे नहीं बढ़ा बल्कि एक समूह से दूसरे समूह में हस्तांतरित हुआ। ऐसा लगता है एक जगह से दूसरी जगह तक सफर ज्ञान ने किया, लोगों ने नहीं।

यदि ऐसा है, तो ये नतीजे हाल ही में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से विपरीत हैं जो बताता है कि एनातोलिया में यह तकनीक किस तरह से फैली। हालिया जेनेटिक साक्ष्य बताते हैं कि लगभग इसी समय एनातोलिया से दक्षिणी युरोप आए किसान अपने साथ मिट्टी के बर्तन बनाने के तरीके और परंपराएं लाए थे।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पर अधिक शोध यह जानने में मदद कर सकता है कि वास्तव में यह ज्ञान कैसे फैला। जैसे यदि शिकारी-संग्रहकर्ता समाज पितृस्थानिक थे (जहां महिलाएं शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं) तो मिट्टी के बर्तन बनाना महिलाओं द्वारा किया जाने वाला कार्य हो सकता है जो विवाह सम्बंधों के माध्यम से एक गांव से दूसरे गांव तक फैला होगा।

बहरहाल, अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हम जितना समझते थे शिकारी-संग्रहकर्ता उससे कहीं अधिक नवाचारी थे। प्रागैतिहासिक जापान से बाल्टिक सागर के किनारों तक घूमने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता लोगों ने अपनी घुमंतु जीवन शैली को छोड़े बिना नई तकनीकों को गढ़ा और अपनाया था: वे किसानों का अनुसरण नहीं कर रहे थे बल्कि सर्वथा अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। इस मायने में देखा जाए तो शिकारी-संग्रहकर्ता समाज आविष्कारी समाज था।

हालांकि रूस के वैज्ञानिक इस बारे में पहले से जानते थे और इसके अधिकतर साक्ष्य रूसी भाषा में प्रकाशित हुए थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युरोप में खिंच गई अदृश्य दीवार के चलते इस जानकारी से बाकी लोग अनभिज्ञ रहे और बर्तनों का उपयोग किसानों और पशुपालकों की तकनीक माना जाता रहा। 1990 से यह अदृश्य दीवार ढहने लगी थी; पश्चिमी युरोप और रूस, यूक्रेन व बाल्टिक क्षेत्र के शोधकर्ता संयुक्त अध्ययनों में शामिल होने लगे थे। हालिया अध्ययन भी इसी सहयोग की मिसाल है। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इस दीवार को फिर ऊंचा कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adg4234/full/_20221221_on_hunter_gather_pottery_fire.jpg

प्रातिक्रिया दे