Customise Consent Preferences

We use cookies to help you navigate efficiently and perform certain functions. You will find detailed information about all cookies under each consent category below.

The cookies that are categorised as "Necessary" are stored on your browser as they are essential for enabling the basic functionalities of the site. ... 

Always Active

Necessary cookies are required to enable the basic features of this site, such as providing secure log-in or adjusting your consent preferences. These cookies do not store any personally identifiable data.

No cookies to display.

Functional cookies help perform certain functionalities like sharing the content of the website on social media platforms, collecting feedback, and other third-party features.

No cookies to display.

Analytical cookies are used to understand how visitors interact with the website. These cookies help provide information on metrics such as the number of visitors, bounce rate, traffic source, etc.

No cookies to display.

Performance cookies are used to understand and analyse the key performance indexes of the website which helps in delivering a better user experience for the visitors.

No cookies to display.

Advertisement cookies are used to provide visitors with customised advertisements based on the pages you visited previously and to analyse the effectiveness of the ad campaigns.

No cookies to display.

वैज्ञानिक साक्ष्यों की गलतबयानी – प्रतिका गुप्ता

सेहतमंद तो सभी रहना चाहते हैं। खासकर चाहते हैं कि वृद्धावस्था बिना किसी शारीरिक तकलीफ के गुज़र जाए। ऐसे में हर कोई अपने उत्पादों के ज़रिए आपको अच्छी सेहत देने की पेशकश कर रहा है। कोई अपने एनर्जी ड्रिंक से आपको चुस्त-दुरुस्त बनाने की बात कहता है तो कोई इम्यूनिटी बढ़ाने की बात करता है। फिटनेस क्लब, योगा, मेडिटेशन सेंटर ये सब आपसे दिन के कुछ वक्त कुछ अभ्यास करवा कर आपको स्वस्थ रखने की बात कहते हैं। वे आपको इस बात का पूरा यकीन दिलाते हैं कि उनके उत्पाद अपनाकर या उनके सुझाए कुछ अभ्यास कर आप तंदुरुस्त रह सकते हैं।

स्वस्थ रहने की तो बात समझ आती है लेकिन मुश्किल तब शुरू होती है जब ये सभी वैज्ञानिक तथ्यों, प्रमाणों का सहारा लेते हुए स्वयं को सत्य साबित करने की कोशिश करते हैं। अपने मतलब सिद्धि के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर या बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं या पूरा-पूरा सच बताते नहीं है। इसका एक उदाहरण भावातीत ध्यान का प्रचार-प्रसार करने वाली एक साइट द्वारा एक शोध पत्र को लेकर की गई रिपोर्टिंग (https://tmhome.com/benefits/study-tm-meditation-increase-telomerase/) में देखते हैं।

दरअसल साल 2015 में हावर्ड युनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने प्लॉस वन पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित किया था (https://journals.plos.org/plosone/article%3Fid=10.1371/journal.pone.0142689)। इस अध्ययन में वे देखना चाहते थे कि जीवन शैली में बदलाव रक्तचाप की स्थिति और टेलोमरेज़ जीन की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करते हैं ।

टेलोमरेज़ एक एंज़ाइम है जिसकी भूमिका टेलोमेयर के पुनर्निर्माण में होती है। टेलोमेयर गुणसूत्र के अंतिम छोर पर होता है और कोशिका विभाजन के समय सुनिश्चित करता है कि गुणसूत्र को किसी तरह की क्षति ना पहुंचे या उसमें कोई गड़बड़ी ना हो। हर बार कोशिका विभाजन के समय टेलोमेयर थोड़ा छोटा होता जाता है और जब टेलोमेयर बहुत छोटा हो जाता है तो कोशिका का विभाजन रुक जाता है। 

यह देखा गया है कि तनाव, जीवन शैली और टेलोमेयर में गड़बड़ी उच्च रक्तचाप और ह्रदय रोग जैसी समस्याओं से जुड़े हैं। इसलिए शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में स्तर-1 के उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों की जीवन शैली में बदलाव कर उसके प्रभावों की जांच की। उन्होंने प्रतिभागियों को दो समूह में बांटा। एक समूह के प्रतिभागियों को 16 हफ्तों तक भावातीत ध्यान करवाया गया और इसके साथ-साथ तनाव कम करने के लिए बुनियादी स्वास्थ्य शिक्षा कोर्स कराया गया (SR)। और दूसरे समूह को विस्तृत स्वास्थ्य शिक्षा कोर्स (EHE) कराया गया जिसमें प्रतिभागियों ने खान-पान पर नियंत्रण रखा, शारीरिक व्यायाम किया और कुछ प्रेरक ऑडियो-वीडियो देखे। अध्ययन में दोनों ही समूहों, SR और EHE, के प्रतिभागियों के रक्तचाप में लगभग समान कमी दिखी और टेलोमरेज़ बनाने वाले दो जीन (hTERT और hTR) की अभिव्यक्ति में एक-समान अधिकता देखी गई थी।

लेकिन इस साइट (tmhome.com), जो कि भावातीत ध्यान के प्रचार के उद्देश्य से ध्यान पर केंद्रित सामग्री प्रकाशित करती है, ने इस शोध की रिपोर्टिंग इस तरह पेश की ताकि लगे कि ध्यान करने से लोगों को फायदा हुआ, उनका रक्तचाप कम हुआ और उनमें टेलोमरेज़ बनाने वाले जीन्स की अधिक अभिव्यक्ति देखी गई। ज़ाहिर है, साइट के संचालकों को उम्मीद थी लोग भावातीत ध्यान को अपनाएंगे।

अलबत्ता, रिपोर्टिंग में दूसरे समूह (जिसने ध्यान नहीं किया था) के लोगों को हुए समान फायदों की बात नज़रअंदाज कर दी गई, शायद जानबूझकर।

यदि शोध को ध्यानपूर्वक पढ़ें तो पाते हैं कि इस शोध में शोधकर्ता यह संभावना जताते हैं कि टेलोमरेज़ जीन की अभिव्यक्ति या तो रक्तचाप कम होने का सूचक हो सकती है या इसे कम करने का कारण। लेकिन रिपोर्टिंग में इसे भी तोड़-मरोड़ कर पेश करते हुए टेलोमरेज़ जीन की अभिव्यक्ति में वृद्धि को रक्तचाप में कमी के कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

शोधकर्ताओं की एक यह परिकल्पना भी थी कि जीवन शैली में बदलाव से टेलोमेयर की लंबाई पर प्रभाव पड़ेगा। लेकिन उन्हें टेलोमेयर की लंबाई में कोई फर्क नहीं दिखा। इसके स्पष्टीकरण में वे कहते हैं कि थोड़े समय (सिर्फ 16 हफ्ते) के बदलाव टेलोमेयर की लंबाई में फर्क देखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं; इस तरह का फर्क देखने के लिए साल भर से अधिक समय तक अध्ययन की ज़रूरत है। लेकिन इस तरह की बातों का रिपोर्टिंग में उल्लेख नहीं है। अलबत्ता, रिपोर्ट उन पूर्व में हुए इसी तरह के अध्ययनों का ज़िक्र करती है जिनमें स्वास्थ्य पर ध्यान के प्रभाव जांचे गए थे ताकि ध्यान के फायदे और भी पुख्ता मान लिए जाएं।

ऐसा नहीं था कि ध्यान से कोई प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन समस्या उसकी प्रस्तुति के अर्ध-सत्य में है जो यह यकीन दिलाने की कोशिश करती है कि स्वास्थ्य सम्बंधी फायदे सिर्फ ध्यान को अपनाकर मिल सकते हैं। यह सही है कि अध्ययन के दौरान ध्यान करने वाले लोगों को फायदा मिला लेकिन पूरा सत्य यह है कि अन्य तरह से नियंत्रण करने वाले लोगों को भी उतना ही फायदा मिला था। और दोनों समूहों के बीच टेलोमेयर जीन की अभिव्यक्ति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं देखा गया। अनुसंधान की ऐसी गलतबयानी!(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://tmhome.com/wp-content/uploads/2015/12/telomeres-telomerase-increase-meditation.jpg

प्रातिक्रिया दे