Customise Consent Preferences

We use cookies to help you navigate efficiently and perform certain functions. You will find detailed information about all cookies under each consent category below.

The cookies that are categorised as "Necessary" are stored on your browser as they are essential for enabling the basic functionalities of the site. ... 

Always Active

Necessary cookies are required to enable the basic features of this site, such as providing secure log-in or adjusting your consent preferences. These cookies do not store any personally identifiable data.

No cookies to display.

Functional cookies help perform certain functionalities like sharing the content of the website on social media platforms, collecting feedback, and other third-party features.

No cookies to display.

Analytical cookies are used to understand how visitors interact with the website. These cookies help provide information on metrics such as the number of visitors, bounce rate, traffic source, etc.

No cookies to display.

Performance cookies are used to understand and analyse the key performance indexes of the website which helps in delivering a better user experience for the visitors.

No cookies to display.

Advertisement cookies are used to provide visitors with customised advertisements based on the pages you visited previously and to analyse the effectiveness of the ad campaigns.

No cookies to display.

तीन दशकों बाद ‘विज्ञान प्रसार’ अवसान के पथ पर – चक्रेश जैन

पूरे देश में संचार के प्रमुख माध्यमों और विभिन्न विधाओं के ज़रिए आम आदमी तक विज्ञान की उपलब्धियों को पहुंचाने और वैज्ञानिक जागरूकता के उद्देश्य से भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा अक्टूबर 1989 में ‘विज्ञान प्रसार’ नामक एक स्वायत्त संस्था स्थापित की गई थी। इसकी स्थापना के 33 वर्षों बाद नीति आयोग ने इसे बंद करने की सिफारिश की है।

आज़ादी के 75 सालों बाद जब विज्ञान संचार की गतिविधियों के विस्तार और सशक्तीकरण का अवसर आया है, तब इस तरह के चौंकाने वाले प्रस्ताव ने विचार मंथन और नीति आयोग तक अपनी बात पहुंचाने के लिए प्रेरित किया है।

इस संस्था ने आम आदमी, संचार माध्यमों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को जोड़ने में अद्वितीय भूमिका निभाई है। विज्ञान की लोकप्रिय किताबों से लेकर पत्रिकाओं, टेलीविज़न, रेडियो, विज्ञान क्लबों, फिल्मों, हैम रेडियो, एडुसेट उपग्रह तक के माध्यम से विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाया है। हाल के वर्षों को छोड़कर ‘विज्ञान प्रसार’ की शानदार उपलब्धियों और गतिविधियों से सराबोर अतीत की सम्यक समीक्षा और विश्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि नीति आयोग का निर्णय अनावश्यक और पूर्वाग्रहों से प्रेरित है।

दरअसल, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 1982 में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) की स्थापना एक नोडल एजेंसी के रूप में की थी। एनसीएसटीसी की स्थापना के सात वर्षों बाद 1989 में ‘विज्ञान प्रसार’ का जन्म हुआ। डीएसटी ने विज्ञान प्रसार को स्वायत्त संस्था का दर्जा प्रदान करते हुए व्यापक स्तर पर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने का कार्य सौंपा था।

एनसीएसटीसी ने अपनी स्थापना के साथ ही विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए कई नए कार्यक्रम शुरू किए। इनमें टीवी सीरियल ‘भारत की छाप’ और ‘क्यों और कैसे’ कार्यक्रम शामिल हैं। रेडियो के ज़रिए विज्ञान को श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए ‘मानव का विकास’ नामक धारावाहिक बनाया गया था। यह विश्व का सबसे लंबा विज्ञान रेडियो धारावाहिक है।

एनसीएसटीसी ने ‘भारत जन विज्ञान जत्था’ का आयोजन किया। यह अपने ढंग का अनोखा आयोजन था, जिसमें ग्रामीण लोगों को विज्ञान और वैज्ञानिकों से सीधे संपर्क में आने का मौका मिला था। एनसीएसटीसी न्यूज़लेटर शीर्षक से मासिक प्रकाशन किया गया, जिसमें एनसीएसटीसी की गतिविधियां, भेंटवार्ताएं और पाठकों की प्रतिक्रियाएं होती थीं। किताबों में कहानी माप तौल की, गाएं गाना, खेलें खेल, हॉर्नबिल सीरीज़ आदि हैं।

आरंभ में एनसीएसटीसी और विज्ञान प्रसार ने कंधे से कंधा मिलाकर कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दिया, जिनमें 1995 में ‘पूर्ण सूर्यग्रहण’ के अवसर पर जागरूकता कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम विज्ञान संचार के इतिहास में अहम और उल्लेखनीय था। इस कार्यक्रम में एनसीएसटीसी ने संकल्पना में और विज्ञान प्रसार ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेयर के विकास में योगदान किया था।

वास्तव में, एनसीएसटीसी ने अपनी स्थापना के शुरुआती दौर में जहां सरकारी ढांचे की सीमाओं के भीतर योगदान दिया, वहीं विज्ञान प्रसार ने स्वायत्त संस्थान की आज़ादी का लाभ उठाते हुए नवीन कार्यक्रम और परियोजनाएं शुरू कीं और पहली बार देश में आम लोगों के लिए विज्ञान संचार की ज़रूरत और महत्व को उजागर किया। विज्ञान प्रसार के विस्तार के बाद एनसीएसटीसी के कार्यों का दायरा देश भर की विज्ञान संस्थाओं की परियोजनाओं के वित्त पोषण, राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के सालाना आयोजन और विज्ञान संचार के राष्ट्रीय पुरस्कार तक सिमट कर रह गया है।

विज्ञान प्रसार के विज्ञान संचार कार्यक्रमों को मोटे तौर पर दस भागों में विभाजित किया जा सकता है – प्रकाशन, टेलीविज़न, रेडियो, विपनेट क्लब, खगोल विज्ञान, लिंग समानता एवं प्रौद्योगिकी संचार, हैम रेडियो, गतिविधि किट, फिल्मों के द्वारा विज्ञान और एडुसैट नेटवर्क।

विज्ञान प्रसार द्वारा प्रकाशन कार्यक्रम के अंतर्गत अभी तक लगभग 400 किताबें प्रकाशित की गई हैं। ये पुस्तकें विभिन्न शृंखलाओं के अंतर्गत हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, पंजाबी, बांग्ला आदि विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित की गई हैं।

ड्रीम 2047 विज्ञान प्रसार की लोकप्रिय मासिक विज्ञान पत्रिका है। इसका प्रकाशन अक्टूबर 1998 में आरंभ हुआ था। इस द्विभाषी पत्रिका का प्रकाशन अनवरत जारी है। विख्यात और वरिष्ठ पत्रकार एवं मुंबई से प्रकाशित फ्री प्रेस जर्नल में लंबे समय तक नियमित स्तम्भकार रहे पद्मभूषण एम. वी. कामथ ने ड्रीम 2047 के सौवें अंक में प्रकाशित आलेख में इस पत्रिका को अनूठी विज्ञान पत्रिका बताया है। ड्रीम 2047 पत्रिका का इलेक्ट्राॅनिक संस्करण विज्ञान प्रसार की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

विज्ञान प्रसार विपनेट न्यूज़ प्रकाशित कर रहा है। इस मासिक पत्र में खगोल विज्ञान, जैव विविधता, प्रकृति, जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों से सम्बंधित आलेख होते हैं। यह पत्रिका विज्ञान क्लब के सदस्यों के बीच संवाद स्थापित करने में अहम भूमिका निभाती है।

विज्ञान प्रसार द्वारा भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार, लोकप्रियकरण एवं विस्तार (स्कोप) परियोजना आरंभ करने से देश में विज्ञान संचार को एक नई दिशा मिली है। इसके तहत विभिन्न भाषाओं में वैज्ञानिक जर्नल प्रकाशित हो रहे हैं। उर्दू में तजस्सुस शीर्षक से मासिक पत्र प्रकाशित हो रहा है। तजस्सुस का अर्थ है उत्सुकता। इसी प्रकार से बांग्ला में विज्ञान कथा का प्रकाशन जारी है। तमिल में अरिवियल पलागाई मासिक पत्रिका प्रकाशित हो रही है।

विज्ञान प्रसार ने भारत में टेलीविज़न को लोकप्रिय माध्यम के रूप में देखते हुए इसका उपयोग वैज्ञानिक जागरूकता और प्रसार के लिए करने का निर्णय लिया। इसरो की डेवलपमेंट एंड एजुकेशनल कम्युनिकेशन युनिट (डेकू) के साथ मिलकर विज्ञान सम्बंधी कार्यक्रम बनाए, जिनका विभिन्न भारतीय भाषाओं में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल और क्षेत्रीय केंद्रों से प्रसारण किया गया। साइंस ऑन टेलीविज़न के माध्यम से टेलीविज़न पर विज्ञान कार्यक्रम लोकसभा और राज्यसभा टीवी, क्षेत्रीय दूरदर्शन केंद्रों और ज्ञान दर्शन के माध्यम से प्रसारित होते रहे हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित लगभग 2000 कार्यक्रमों को देश के लाखों दर्शकों ने पसंद किया। इस संस्था का इंटरनेट आधारित ओवर-दी-टॉप (ओटीटी) साइंस चैनल है। यह प्लेटफॉर्म 24X7 विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित ज्ञान के लिए समर्पित है।

विज्ञान प्रसार ने विभिन्न विषयों और मुद्दों पर मेगा विज्ञान रेडियो धारावाहिकों का निर्माण किया है। इनमें पृथ्वी ग्रह, खगोल विज्ञान, गणित, जैव विविधता, दैनिक जीवन में रसायन विज्ञान, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग आदि सम्मिलित हैं। 19 भाषाओं में निर्मित इन कार्यक्रमों को विभिन्न एफएम केंद्रों के साथ 117 मीडियम वेव केंद्रों से प्रसारित किया गया है।

रेडियो के ज़रिए जनजातियों और अन्य पिछड़े समुदायों में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए चल रहे कार्यक्रमों के अंतर्गत जनजातीय भाषाओं में भी कार्यक्रम तैयार किए गए हैं।

हैम रेडियो का लोकप्रियकरण विज्ञान प्रसार की प्रमुख गतिविधियों में शामिल है। हैम रेडियो संचार किसी भी आपात स्थिति के दौरान महत्वपूर्ण बैकअप के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। विज्ञान प्रसार हैम रेडियो स्टेशनों की स्थापना, ऑपरेटरों के प्रशिक्षण और रचनात्मक गतिविधियों के लिए अवसर उपलब्ध कराने के साथ ही विश्व भर के शौकिया ऑपरेटरों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए मार्गदर्शन और तकनीकी मदद प्रदान करता है। विज्ञान प्रसार स्कूली विद्यार्थियों और प्रौद्योगिकी संस्थानों में हैम रेडियो को बढ़ावा दे रहा है।

विज्ञान प्रसार का एक प्रमुख कार्यक्रम ‘नेशनल साइंस फिल्म फेस्टीवल’ भी है। इस फिल्म फेस्टीवल का उद्देश्य सिनेमा के माध्यम से विज्ञान की पहुंच का विस्तार और विज्ञान फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन देना रहा है। इसमें पूरे देश से विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत वैज्ञानिक मुद्दों और विषयों पर फिल्में आमंत्रित की जाती हैं। चयनित फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है और पुरस्कार दिए जाते हैं।

विज्ञान प्रसार ने देश के दूरदराज़ इलाकों तक पहुंचने के लिए शैक्षणिक उपग्रह ‘एडुसैट’ का उपयोग करके इंटरएक्टिव टर्मिनलों का नेटवर्क बनाया है और देश के विभिन्न हिस्सों में 50 टर्मिनल स्थापित किए हैं। इस तकनीक का उपयोग विज्ञान प्रसार विभिन्न विज्ञान लोकप्रियकरण कार्यक्रमों के प्रसारण में कर रहा है।

विज्ञान प्रसार ने बीते वर्षों में देश भर में आम लोगों के बीच कई राष्ट्रीय जागरूकता अभियान चलाए हैं। इनमें पूर्ण सूर्य ग्रहण 1999, शुक्र पारगमन 2004, विज्ञान रेल: पहियों पर विज्ञान प्रदर्शनी 2003-04, पूर्ण सूर्यग्रहण 2009 आदि सम्मिलित हैं।

विज्ञान प्रसार द्वारा देश में विज्ञान क्लब कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए 1998 में विज्ञान क्लब के देशव्यापी नेटवर्क ‘विपनेट’ की स्थापना की गई। वर्तमान में विज्ञान प्रसार का लगभग 3000 विज्ञान क्लबों का नेटवर्क है, जिसके माध्यम से विभिन्न गतिविधियां की जाती रही हैं। वास्तव में विपनेट विज्ञान प्रसार के उद्देश्यों की प्राप्ति में अहम भूमिका निभाता है। विज्ञान क्लब रोचक और ज्ञानवर्धन गतिविधियों का मंच है, जिसमें मित्रों को भी शामिल किया जा सकता है।

विपनेट देश के हर कोने में अच्छी तरह से जाना जाता है। अपनी स्थापना के दो वर्षों बाद मध्यप्रदेश का रतलाम ज़िला देश का सबसे अधिक सदस्यता (107) वाला ज़िला और उत्तरप्रदेश सबसे अधिक 350 विज्ञान क्लबों वाला राज्य बन गया था।

विज्ञान प्रसार के नेतृत्व में स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर देश के 75 स्थानों पर विज्ञान महोत्सवों का आयोजन किया गया था। इसका मुख्य विषय ‘विज्ञान सर्वत्र पूज्यते’ था। विज्ञान उत्सव के माध्यम से स्थानीय लोगों को वैज्ञानिक विरासत और प्रगति से परिचित कराया गया था। इस दौरान विज्ञान पुस्तक मेला, विज्ञान कवि सम्मेलन, विज्ञान प्रदर्शनी आदि कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।

साल 2020 में विज्ञान प्रसार ने कोरोना वायरस से फैली कोविड-19 महामारी के दौरान देश के वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं के कार्यों से सबको परिचित कराने के लिए अनूठी कोविड-19 परीक्षण प्रयोगशाला पर वृत्तचित्र का निर्माण किया।

विज्ञान प्रसार अनेक वर्षों से खगोल विज्ञान के लोकप्रियकरण में जुटा हुआ है और विद्यार्थियों, अध्यापकों और शौकिया खगोल वैज्ञानिकों के लिए दूरबीन निर्माण सम्बंधी कार्यशालाओं का आयोजन करता रहा है।

विज्ञान को आम लोगों तक ले जाने की मुहिम की एक प्रमुख कड़ी है – ‘इंडिया साइंस वायर प्रोजेक्ट’। विज्ञान प्रसार इस प्रोजेक्ट के माध्यम से देश के समाचार पत्रों और वेब पोर्टल्स को विज्ञान समाचार और फीचर नियमित रूप से उपलब्ध करा रहा है।

विज्ञान प्रसार ने देश के 17 स्थानों पर ‘गांधी एट 150 प्रोजेक्ट’ शीर्षक से डिजिटल प्रदर्शनी का आयोजन किया था।

इसने ‘शोध अभिव्यक्ति के लिए लेखन कौशल को प्रोत्साहन’ परियोजना शुरू की, जिसके तहत विज्ञान विषयों में पीएच.डी. और पोस्ट डॉक्टरेट करने वाले व्यक्तियों को फैलोशिप के दौरान अपनी रिसर्च से सम्बंधित मुद्दे पर लोकप्रिय विज्ञान लेखन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय अनुसंधान कार्यों को जन साधारण के बीच रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करना है।

विज्ञान प्रसार ने वर्ष 2018-19 में विद्यार्थी विज्ञान मंथन (वीवीएम) परीक्षा के आयोजन में योगदान किया। डिजिटल उपकरणों की सहायता से आयोजित इस परीक्षा में कक्षा 6-11 के विद्यार्थी भाग लेते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को विज्ञान के क्षेत्र में भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी विरासत से परिचित कराना है।

क्रियाकलाप और खिलौना विकास एक निरंतर चलने वाला कार्यक्रम है। विज्ञान प्रसार ने पिछले एक दशक में लगभग 10 विषयों में विषयगत किट विकसित किए हैं। इनमें जैव विविधता, खगोल विज्ञान, भूकंप, मौसम आदि सम्मिलित हैं।

बीते दशकों के दौरान विज्ञान प्रसार ने महत्वपूर्ण दिवसों के अवसर पर उत्सव समारोह आयोजित किए हैं। इनमें मेघनाद साहा की 125वीं जयंती समारोह, राष्ट्रीय गणित दिवस समारोह, रामानुजन यात्रा आदि शामिल हैं।

कुल मिलाकर नीति आयोग द्वारा विज्ञान प्रसार को बंद करने के निर्णय से भारत में विज्ञान संचार के मैदान में पूरे उत्साह, लगन और समर्पण भाव से जुटे विज्ञान संचारकों को गहरा आघात पहुंचा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://secure.brighterkashmir.com//images/news/d25b8647-0937-4490-a056-5ddf19ea794c.jpg

संस्थानों द्वारा शोध अधिकार अपने पास रखना ज़रूरी – एस. सी. लखोटिया

शोध परिणामों का समकक्ष-समीक्षित पत्रिकाओं में प्रकाशन अनिवार्य है। इनके व्यापक प्रसारण के लिए ये सभी शोधकर्ताओं और इच्छुक पाठकों को मुफ्त और सुलभता से उपलब्ध होने चाहिए। पिछले कुछ दशकों में शोध प्रकाशन तंत्र में काफी परिवर्तन आए हैं। व्यावसायिक प्रकाशकों ने व्यापक स्तर पर अकादमिक संस्थानों और विद्वत सभाओं से जर्नल प्रकाशन का काम अपने हाथों में ले लिया है। इसके साथ ही आज के डिजिटल युग ने ऑनलाइन प्रकाशन को भी बढ़ावा दिया है। इन दोनों परिवर्तनों से उम्मीद थी कि वैश्विक स्तर पर शोध परिणामों तक पहुंच आसान हो जाएगी।

इसके विपरीत तथ्य यह है कि व्यावसायिक प्रकाशकों ने अपने व्यापारिक हितों के लिए शोध प्रकाशनों को भुगतान के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। अतः लेखकों/वित्तपोषकों या पाठकों को शोध-पत्र प्रोसेसिंग फीस या ओपन एक्सेस शुल्क के रूप में भारी रकम का भुगतान करना पड़ता है। हालांकि सभी पत्रिकाएं इस तरह का शुल्क नहीं लगाती हैं, अधिकांश ‘प्रतिष्ठित’ या ‘उच्च प्रभाव’ पत्रिकाएं शोध पत्रों के प्रकाशन या प्रकाशित सामग्री को पढ़ने के लिए शुल्क की मांग करती हैं। डिजिटल-पूर्व युग में प्रकाशित सामग्री या तो पुस्तकालय/व्यक्तिगत सदस्यता से या फिर संस्थानों के बीच पत्रिकाओं के आदान-प्रदान या लेखकों द्वारा बिना किसी शुल्क के साझा की जाती थीं। वर्तमान में अकादमिक संस्थानों के बीच शोध पत्रिकाओं का आदान-प्रदान लगभग खत्म हो गया है। यहां तक कि अधिकांश लेखक कॉपीराइट अनुबंध उल्लंघन की गलत समझ के कारण अपने प्रकाशित शोध पत्रों की सॉफ्ट कॉपी तक अपने साथियों के साथ साझा करने में संकोच करते हैं।

डिजिटल ऑनलाइन सामग्री के ओपन या ‘ग्रीन’ एक्सेस का मतलब ऐसे शोध पत्रों से है जो निशुल्क हों और लगभग सभी कॉपीराइट और लाइसेंसिंग प्रतिबंधों से मुक्त हों। कई चर्चाओं और घोषणाओं के बाद भी ओपन या ‘ग्रीन’ एक्सेस की उम्मीद कम ही नज़र आती है क्योंकि हाल के दशकों में शोध उत्पादों पर व्यावसायिक प्रकाशकों की गिरफ्त काफी मज़बूत हो गई है। अधिकांश मामलों में कॉपीराइट अनुबंध में शर्त होती है कि लेखक पूर्ण कॉपीराइट अधिकार प्रकाशक को सौंपें। एकतरफा रूप से तैयार किए गए कॉपीराइट समझौतों के परिणामस्वरूप शोध उत्पाद आंशिक या पूर्ण रूप से तब तक प्रकाशक के स्वामित्व में रहते हैं जब तक लेखकों/वित्तपोषकों द्वारा भारी प्रकाशन शुल्क का भुगतान नहीं किया जाता। ऐसे में लेखक प्रतिबंधित अवधि (6-24 माह या अधिक) के दौरान ओपन या ग्रीन एक्सेस के तहत व्यक्तिगत या संस्थागत वेबसाइट पर शोध पत्र के प्रकाशित संस्करण को पोस्ट नहीं कर सकते और न ही उन्हें इसे अपने काम के लिए फिर से उपयोग करने की स्वतंत्रता होती है। और तो और, प्रकाशक को भुगतान किए बिना उन्हें अपने ही लेख को अनुवाद करने की भी अनुमति नहीं होती। दूसरी ओर, व्यावसायिक प्रकाशक लेखकों या पाठकों पर ओपन एक्सेस शुल्क लगाकर, लेखकों की अनुमति के बिना अन्य प्रकाशकों को री-पैकेजिंग/सब-लायसेंस देकर खूब मुनाफा कमा सकते हैं।

ओपन साइंस पर अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद की रिपोर्ट में इस दुष्चक्र को सटीकता से प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार ‘कॉर्पोरेट प्रकाशक नियमित रूप से प्रकाशित करने की शर्त के रूप में उन्हें कॉपीराइट सौंपने की मांग करते हैं। ऐसा करते हुए, शोधकर्ता स्वयं अपनी इच्छा से और प्रकाशक द्वारा बिना किसी खर्चे के एक सार्वजनिक सामग्री का निजीकरण करने में सहायता करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में प्रकाशकों की पहली ज़िम्मेदारी उनके शेयरधारकों के प्रति होती है, न कि विज्ञान के प्रति। कॉर्पोरेट वैज्ञानिक प्रकाशन कंपनियों का यह मॉडल घोर असंतुलित है जिसमें वैज्ञानिक अपना काम उन्हें तोहफे में दे देते हैं और फिर इसी काम को बढ़ी हुई कीमतों पर वापस खरीदते हैं – चाहे व्यक्तिगत रूप से या विश्वविद्यालयों/सरकारी संस्थाओं द्वारा भुगतान के ज़रिए।

प्रकाशकों के हाथों में तुरुप का इक्का यह है कि उन्होंने उच्च प्रभाव वाली पत्रिकाओं के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया है और फिर वे जो कुछ प्रकाशित करते हैं, उसके पाठकों की संख्या तथा उद्धरण (साइटेशन) को बढ़ावा देते हैं तथा प्रभाव गुणांक में वृद्धि करते रहते हैं। उधर विश्वविद्यालय प्रभाव गुणांक और उद्धरण संख्या का उपयोग अपनी अकादमिक उन्नति के मानदंड के रूप में करते हैं। इस तरह के परस्पर सुदृढीकरण की वजह से शोधकर्ताओं और उनके संस्थानों को लगता है कि किसी उतनी ही गुणवत्ता वाले जर्नल में कम भुगतान करके प्रकाशन करने की बजाय बेहतर होगा कि किसी विशेष पत्रिका में प्रकाशन के लिए ज़्यादा भुगतान किया जाए। यह स्थिति सीमित संसाधनों वाले शोधकर्ताओं के लिए घोर अन्याय है। यह इस सामान्य सोच के भी विपरीत है कि सार्वजनिक धन का उपयोग मुख्य रूप से अनुसंधान और उसके परिणामों के प्रसार में किया जाना चाहिए, न कि व्यावसायिकता को बढ़ावा देने के लिए।

क्रिएटिव कॉमन्स एट्रिब्यूशन लायसेंस (CC-BY) या इसी तरह के ओपन लायसेंस के लिए ज़रूरी है कि सभी बौद्धिक-संपदा अधिकार लेखकों के पास रहे और केवल गैर-एक्सक्लूसिव प्रकाशन अधिकार ही प्रकाशकों को हस्तांतरित किए जाएं। यदि वित्तपोषक ओपन एक्सेस का दाम न चुका पाएं, तो लेखकों द्वारा प्रकाशकों को लगभग सभी कॉपीराइट अधिकार प्रकाशक को सौंप दिया जाना अन्यायपूर्ण है। प्रकाशकों द्वारा भुगतान की दीवार खड़ी कर देने के कारण विश्व भर में प्रकाशित अधिकांश शोध पत्र शोधकर्ताओं और अन्य पाठकों की पहुंच से दूर हो जाते हैं। इस प्रणाली के कारण विकासशील देशों और कम संसाधन वाली संस्थाओं के शोधकर्ताओं को कई तरह से नुकसान होता है। चूंकि प्रकाशन/ओपन एक्सेस की यह कीमत आम तौर पर पत्रिका के ‘प्रभाव गुणांक’ (इम्पैक्ट फैक्टर, आईएफ) के समानुपाती होती है, कम संसाधनों वाले शोधकर्ता ऐसी पत्रिकाओं की तलाश करते हैं जो कम या फिर कोई शुल्क नहीं लेती हैं। ऐसी कम ‘प्रतिष्ठित’ पत्रिकाओं को समकक्ष शोधकर्ताओं द्वारा पूरी तरह अनदेखा किया जाता है, भले ही शोध कार्य उच्च स्तरीय हो। आईएफ के उपयोग के खिलाफ कई दलीलों और सैन फ्रांसिस्को घोषणा पत्र में इसकी निंदा के बावजूद, जर्नल के आईएफ को शोध मूल्यांकन मानदंड के रूप में उपयोग किया जाना जारी है। उच्च आईएफ पत्रिकाओं में प्रकाशन नहीं होने से लेखक और संस्थान की रैंकिंग कम होती है जिसका प्रभाव उनके भावी शोध संसाधनों पर भी पड़ता है।        

कॉपीराइट अधिकार को अपने पास रखने की संस्थागत अधिकार प्रतिधारण नीति अथवा राइट्स रिटेंशन पॉलिसी (आरआरपी) को अपनाने से किसी संस्थान के शोध परिणाम पढ़ने के इच्छुक पाठकों को अबाधित मुफ्त पहुंच मिलती है क्योंकि –

(1) इस नीति से स्वीकृत लेखकीय पांडुलिपि (एएएम– प्रकाशक द्वारा अतिरिक्त संपादकीय प्रक्रियाएं न की गई समकक्ष समीक्षित और स्वीकृत संस्करण) पर लेखक के पास अपने शोध पत्र को, बिना प्रकाशक की अनुमति की आवश्यकता के, पुनः उपयोग करने का अधिकार होता है।

(2) विश्वविद्यालय अपने सदस्यों के शोध पत्रों तक सभी को मुफ्त पहुंच प्रदान करता है। आरआरपी नीति के अंतर्गत सदस्यों के लिए अपने शोध पत्रों के एएएम संस्करणों की सॉफ्टकॉपी संस्था के सर्वर पर उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

विश्व के कई शैक्षणिक संस्थानों ने आरआरपी को अपनाया है। इस नीति के तहत शोध पत्रों के सार्वजनिक रूप से सुलभ संस्थागत संग्रहण की आवश्यकता होती है जहां संस्थान के सदस्यों को अपने शोध पत्रों के एएएम संस्करणों को खुले लायसेंस के तहत जमा करना होता है। लेखक अपने संस्थान को लायसेंस प्रदान करता है कि वह लेख से सम्बंधित सभी अधिकारों का उपयोग कर सके और अन्य सह-लेखकों को भी ऐसा करने के लिए अधिकृत कर सके। इस प्रक्रिया में लेखकों को कॉपीराइट का अधिकार मिल जाता है जिससे उन्हें प्रकाशन के बाद अपने स्वयं के काम को फिर से उपयोग करने की स्वतंत्रता मिलती है। आरआरपी के तहत यह आवश्यक है कि पांडुलिपि की पहली प्रस्तुति के दौरान उसके साथ एक शपथ पत्र हो जिसमें लेखक द्वारा ओपन एक्सेस की घोषणा की गई हो। यह अग्रिम रूप से संपादक और प्रकाशक को मेज़बान संस्थान/वित्तपोषक के आरआरपी के अस्तित्व की सूचना देता है। बाहरी शर्तों की बजाय संस्थागत नीतियों की प्राथमिकता  होती है। इससे भविष्य में किसी भी कानूनी समस्या से सुरक्षा मिलती है।

संस्थागत आरआरपी नीति व्यावसायिक प्रकाशकों के उस अनुचित एकाधिकार को खत्म करती है जो उन्हें शोध उत्पाद के अधिकार छीनने की अनुमति देता है। अकादमिक संस्थानों द्वारा आरआरपी अपनाने से एक डर यह बताया जाता है कि इससे संस्थान के सदस्यों के शोध के उच्च प्रभाव गुणांक पत्रिकाओं में प्रकाशन पर असर पड़ता है। इस दावे का खंडन किया जा चुका है। आरआरपी के तहत कुछ विशेष मामलों में लेखक को ओपन एक्सेस से छूट का प्रावधान रखा जा सकता है लेकिन यह छूट रिपॉज़िटरी में जमा करने से नहीं होनी चाहिए। विश्व के कई विश्वविद्यालयों के अनुभव बताते हैं कि जिन संस्थानों ने संस्थागत आरआरपी नीति को अपनाया है, वहां ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी प्रकाशक ने आरआरपी के कारण स्वीकृत पांडुलिपि को प्रकाशित करने से मना किया हो।

भारत सरकार ‘वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन’ (ओएनओएस) नीति पर विचार कर रही है ताकि भारतीय पाठकों के लिए निर्धारित प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित लेखों की पहुंच ग्रीन ओपन एक्सेस के तहत सुनिश्चित की जा सके। अगर यह नीति सफल भी हो जाती है, तब भी भारत के बाहर रहने वाले पाठकों के लिए भारत में प्रकाशित शोध लेखों का ग्रीन ओपन एक्सेस नहीं मिल पाएगा और भारतीयों की भी उन पत्रिकाओं तक पहुंच नहीं हो पाएगी जो ओएनओएस के दायरे के बाहर हैं। लेकिन यदि देश के संस्थानों द्वारा आरआरपी को अपनाया जाता है तो पूरे विश्व में देश के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित शोध उत्पाद तक मुफ्त पहुंच संभव होगी। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान एवं टेक्नॉलॉजी विभागों की ‘ओपन साइंस पॉलिसी (2014)’ के तहत डीबीटी/डीएसटी द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित अनुसंधान परियोजनाओं से जारी होने वाली अंतिम स्वीकृत पांडुलिपियों को संस्थागत रिपॉज़िटरी या इंटरऑपरेबल इंस्टीट्यूशनल ओपन एक्सेस रिपॉजि़टरी या सेंट्रल हार्वेस्टर में जमा करना अनिवार्य है। इस नीति के सख्ती से क्रियान्वयन और देश के विभिन्न शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों द्वारा आरआरपी को अपनाने से अपेक्षित ओपन साइंस के द्वार खुल जाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

इस आलेख का  मूल अंग्रेज़ी संस्करण 25 फरवरी 2023 को करंट साइंस में प्रकाशित हुआ है और इसका हिंदी अनुवाद लेखक की अनुमति के साथ यहां प्रकशित किया गया है।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.avepoint.com/blog/wp-content/uploads/2018/05/Data-Retention_Blog-Header-01.jpg

बहुमूल्य डायनासौर जीवाश्म की घर वापसी

गभग दो वर्ष लंबी बातचीत के बाद एक जीवाश्म घर लौटने को है। 11 करोड़ वर्ष पुराना यह जीवाश्म दक्षिण अमेरिका में पाए गए पंख जैसी संरचनाओं वाले पहले गैर-पक्षी डायनासौर का है और फिलहाल जर्मनी स्थित स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में है। संभवत: जून तक यह वापस ब्राज़ील आ जाएगा।

दिसंबर 2020 में जर्मनी, मेक्सिको और यू.के. के जीवाश्म-विज्ञानियों ने क्रेटेशियस रिसर्च नामक जर्नल में इस डायनासौर (उबिराजारा जुबैटस) का वर्णन किया था। तब से यह जीवाश्म ब्राज़ील और जर्मन अधिकारियों के बीच विवाद का विषय बन गया। 1990 के दशक में जीवाश्म को ब्राज़ील के अरारीप बेसिन से जर्मनी लाया गया था।    

1942 में पारित कानून के अनुसार ब्राज़ील में पाया गया हर जीवाश्म राष्ट्रीय संपत्ति है जिसे बिना अनुमति देश की सीमा से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। वैसे शोधकर्ताओं का दावा है कि ब्राज़ील के एक खनन अधिकारी से उन्हें परमिट प्राप्त हुआ था। लेकिन ब्राज़ील के सरकारी वकील राफेल रयोल के अनुसार इस परमिट में जीवाश्म को दान करने की कोई स्पष्ट अनुमति नहीं दी गई थी। संभव है कि उबिराजारा का जीवाश्म किसी बक्से में था और उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था।

क्रेटेशियस रिसर्च में प्रकाशन के बाद उपनिवेशवादी मानसिकता का हवाला देते हुए एक ऑनलाइन अभियान (#UbirajaraBelongsToBrazil) के माध्यम से नमूने की वापसी का सफर शुरू हुआ। ऐसा कई बार हुआ है जब धनी देशों के वैज्ञानिकों द्वारा निम्न और मध्यम आय वाले देशों के जीवाश्मों पर कब्ज़ा किया गया है। यह जीवाश्म किसी नई प्रजाति का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कसौटी है। ऐसे जीवाश्म को होलोटाइप कहते हैं और इनके निर्यात पर प्रतिबंध है। विवाद के चलते क्रेटेशियस रिसर्च ने इस पेपर को वापस ले लिया है।

सितंबर 2021 में जर्मन संग्रहालय द्वारा जीवाश्म लौटाने से मना करने के बाद ब्राज़ील ने आधिकारिक अनुरोध प्रस्तुत किया जिसे ठुकरा दिया गया। अंतत: जुलाई 2022 जीवाश्म को वापस करने का फैसला लिया गया। इसे संभवत: जून में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय को सौंप दिया जाएगा।

ब्राज़ील के वैज्ञानिक समुदाय को उम्मीद है कि इस मामले के बाद जीवाश्म विज्ञान के क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू होगा। जीवाश्म का ब्राज़ील वापस आना एक महत्वपूर्ण संदेश है और इससे भविष्य में जीवाश्मों को अपने मूल देशों में वापस लाने का रास्ता खुल जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-023-01603-y/d41586-023-01603-y_25350754.jpg

सी. आर. राव को गणित का नोबेल पुरस्कार – मनीष श्रीवास्तव

भारतीय—अमेरिकी गणितज्ञ और सांख्यिकीविद सी. आर. राव (कल्यामपुडी राधाकृष्ण राव) को वर्ष 2023 के अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। इसे गणित का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। पुरस्कार के लिए उनके नाम की घोषणा करते हुए इंटरनेशनल प्राइज़ इन स्टैटिस्टिक्स फाउंडेशन द्वारा कहा गया कि “वे गणित विज्ञान की दुनिया के लेजेंड है। उन्होंने लगभग 75 वर्ष पहले अपने काम के ज़रिए सांख्यिकी के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी।” यह पुरस्कार हर दो साल में पांच प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से प्रदान किया जाता है।

आज उन्हीं राव को जुलाई माह में कनाडा के ओटावा शहर में आयोजित होने वाली विश्व सांख्यिकी कांग्रेस में पुरस्कार सहित 80 हज़ार अमेरिकी डॉलर की सम्मान राशि से सम्मानित किया जाएगा। आइए, सी. आर. राव से परिचय करें।

सी. आर. राव का जन्म कर्नाटक की हदगली नाम की जगह पर एक तेलुगु परिवार में 10 सितंबर 1920 को हुआ था। राव ने अपनी आरंभिक और उच्च शिक्षा आंध्रप्रदेश के गुदुर, नंदीगामा और विशाखापट्टनम में प्राप्त की। अध्ययन में गहरी रुचि रखने वाले राव ने गणित में एमएससी की और इसके बाद विशेष रूप से गणित की एक शाखा सांख्यिकी में एम.ए. किया। सांख्यिकी उनका प्रिय विषय रहा और इसी ने अंतत: उन्हें गणित का नोबेल सम्मान दिलाया।

भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी वे गंभीरता से अध्ययन करते रहे और इंग्लैण्ड जाकर कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी के किंग्स कॉलेज से पीएच. डी. तथा बाद में कैम्ब्रिज से ही डीएससी की उपाधि प्राप्त की। इस तरह वे अपने ज्ञान के स्तर को उच्चतर आयाम तक लेकर गए और गणित विज्ञान के क्षेत्र में बेहद सम्मान पाया।

ज्ञानार्जन करते हुए राव ने समय—समय पर विविध संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और फिर मानव विज्ञान संग्रहालय (कैम्ब्रिज) में सेवाएं दीं। इसके बाद अध्यापन करते हुए पिट्सबर्ग युनिवर्सिटी में प्रोफेसर और एबर्ली प्रोफेसर रहने के साथ ही अमेरिका के पेनसिल्वेनिया राज्य के एक एनालिसिस सेंटर के निदेशक पद पर रहकर कार्य किया। फिलहाल वे पेनसिल्वेनिया स्टेट युनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर सेवाएं दे रहे थे।

राव ने कम उम्र में ही अपने ज्ञान के उच्चतर स्तर से सभी को चकित कर दिया था। उन्होंने अध्ययन करते समय मात्र 25 वर्ष की आयु में ही महत्वपूर्ण शोध पत्र कलकत्ता मेथेमेटिकल सोसायटी के बुलेटिन में Information and accuracy attainable in the estimation of statistical parameters (सांख्यिकीय मापदंडों के अनुमान में पाने योग्य सूचना व सटीकता) प्रकाशित किया था। इस पेपर के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे स्टैटिस्टिक्स की महत्वपूर्ण पुस्तक ब्रेकथ्रूस इन स्टैटिस्टिक्स 1890—1990 में शामिल किया गया था। उनके इस शोध ने आधुनिक सांख्यिकी की स्थापना में विशेष योगदान दिया। उनकी महत्वपूर्ण खोजों ने न सिर्फ सांख्यिकी को प्रभावित किया बल्कि भू-गर्भविज्ञान, चिकित्सा, जैवमिति सहित उन सभी क्षेत्रों को लाभ पहुंचाया, जिनमें किसी न किसी तरह से सांख्यिकी का उपयोग होता है।

गणित का नोबेल सम्मान मिलने से पहले ही राव कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1968 में पद्म भूषण और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। वे शांति स्वरूप भटनागर विज्ञान और प्रौद्योगिकी पुरस्कार (1963), नेशनल मेडल ऑफ साइंस सम्मान (2002) प्राप्त करने के साथ ही रॉयल सोसायटी के फेलो (1967) भी रह चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया उन्हें 10 महान भारतीय वैज्ञानिकों में शुमार कर चुका है। आज उनकी उम्र 100 वर्ष से ज़्यादा है और आज भी वे सामाजिक जीवन में  सक्रिय हैं। अपनी ऊर्जा और विशिष्ट कार्यों के चलते वे वैश्विक प्रेरणास्रोत बन गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : http://nobelprizeseries.in/tbis/sites/default/files/projects/cr-rao.jpg

पश्चिमी घाट का पालक्कड़ (पालघाट) दर्रा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

श्चिमी घाट का एक अहम विभाजक कहा जाने वाला पालक्कड़ दर्रा लगभग 40 किलोमीटर चौड़ा है। इसके दोनों ओर समुद्र तल से 2000 मीटर तक ऊंचे, एकदम खड़ी ढलान वाले नीलगिरी और अन्नामलाई पर्वत हैं।

ऐतिहासिक रूप से पालक्कड़ दर्रा केरल राज्य में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण रहा है। यहां से कोयम्बटूर को पालक्कड़ से जोड़ने वाले सड़क और रेल मार्ग गुज़रते हैं। इसके बीच से भरतप्पुझा नदी बहती है। पश्चिमी घाट के ऊष्णकटिबंधीय वर्षावनों के विपरीत, पालक्कड़ दर्रे की वनस्पति शुष्क सदाबहार वन की श्रेणी में आती है। यह दर्रा पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली वनस्पतियों और जंतुओं का विभाजक भी है। उदाहरण के लिए, मेंढकों की कई प्रजातियां दर्रे के केवल एक तरफ पाई जाती हैं।

भूवैज्ञानिक उथल-पुथल

यह दर्रा एक भूवैज्ञानिक अपरूपण क्षेत्र है जो पूर्व-पश्चिम की ओर खुलता है। अपरूपण क्षेत्र पृथ्वी की भूपर्पटी के कमज़ोर क्षेत्र होते हैं – यही कारण है कि कोयम्बटूर क्षेत्र में कभी-कभी भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं।

माना जाता है कि पालक्कड़ दर्रे का निर्माण ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के गोंडवाना भूभाग से टूटकर अलग होने के बाद महाद्वीपीय जलमग्न तटों के बहाव की वजह से हुआ है।

भारत और मेडागास्कर तब तक एक ही भूभाग का हिस्सा थे जब तक कि बड़े पैमाने पर हुई ज्वालामुखीय गतिविधि ने दोनों को विभाजित नहीं कर दिया था; यह विभाजन वहां हुआ था जहां पालक्कड़ दर्रा है – यह दर्रा बिलकुल मेडागास्कर के पूर्वी ओर स्थित रेनोत्सरा दर्रे का दर्पण प्रतिबंब है। दर्रा कितना पहले बना था? मेडागास्कर लगभग 10 करोड़ साल पहले अलग हो गया था, और दर्रा इससे पहले बन गया था; लेकिन कितने पहले बना था इस पर अभी सोच-विचार जारी है।

यह अनुमान है कि दर्रे के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों में अंतर का एक कारण प्राचीन नदी या सुदूर अतीत में समुद्र की घुसपैठ हो सकता है।

नीलगिरी पर्वत पर पाए जाने वाले हाथियों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अन्नामलाई पर्वत और पेरियार अभयारण्यों में पाए जाने वाले हाथियों से भिन्न होते हैं।

आईआईएससी बैंगलोर द्वारा किए गए एक अध्ययन में पेट पर सफेद धारी वाले शॉर्टविंग पक्षी के डीएनए अनुक्रम के विस्तृत डैटा का विश्लेषण किया गया है। शॉर्टविंग एक स्थानिक और संकटग्रस्त पक्षी है। ऊटी और बाबा बुदान के आसपास पाए जाने वाले पक्षियों को नीलगिरी ब्लू रॉबिन कहा जाता है; अन्नामलाई पर पाए जाने वाले पक्षी दिखने में थोड़े अलग होते हैं, और इन्हें व्हाइट-बेलीड ब्लू रॉबिन कहा जाता है।

दर्रे का दक्षिणी भाग

किसी भी क्षेत्र की जैव विविधता दो तरीकों से व्यक्त की जाती है। एक, प्रजातियों की प्रचुरता से। यानी किसी पारिस्थितिकी तंत्र में कितनी प्रजातियां पाई जाती हैं। और दूसरा, फाइलोजेनेटिक विविधता से। फाइलोजेनेटिक विविधता में देखा जाता है कि वहां उपस्थित प्रजातियों के बीच जैव विकास की दृष्टि से कितनी दूरी है।

हैदराबाद स्थित सीसीएमबी और अन्य संस्थानों के शोधदल द्वारा प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार पालक्कड़ दर्रे के दक्षिणी पश्चिमी घाट में ये दोनों विविधताएं प्रचुर मात्रा में हैं। मैग्नोलिया चंपका (चंपा) सहित यहां पेड़ों की 450 से अधिक प्रजातियां हैं, जो यहां लगभग 13 करोड़ वर्षों से अधिक समय से हैं।

भूमध्य रेखा से करीब होने के कारण गर्म मौसम और नम हवा के कारण दक्षिणी पश्चिमी घाट में बहुत बारिश होती है। इसलिए यह क्षेत्र जीवन के सभी रूपों के लिए एक आश्रय की तरह रहा है, भले ही बार-बार आते हिमयुगों और सूखे के चक्र ने आसपास के क्षेत्रों में जैव विविधता कम कर दी हो। देखा जाए तो पालक्कड़ दर्रे के उत्तर की ओर सालाना अधिक बारिश होती है, लेकिन दक्षिणी हिस्से में साल भर समान रूप से बारिश होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/incoming/m2uxk0/article66845803.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/KIKKM_20-3-2016_18-6-27_PALAKKADGAP_3.JPG

पहला उभयचर परागणकर्ता

मिल्क ट्री के मलाईदार फल और मकरंद से भरपूर फूल ब्राज़ील के मूल निवासी मेंढक ज़िनोहायला ट्रंकेटा (Xenohyla truncata) के प्रिय हैं। गर्म रातों में, इनके फलों को खाने और मकरंद के लिए भूरे रंग के ये मेंढक बड़ी संख्या में इन पौधों पर टूट पड़ते हैं। फूलों का मकरंद पीते हुए ये एकदम फूल के अंदर चले जाते हैं, सिर्फ इनके पिछले पैरों वाला हिस्सा बाहर से दिखाई देता है। इस दौरान चिपचिपे परागकण इनके शरीर से चिपक जाते हैं।

फूड वेब्स पत्रिका में शोधकर्ताओं ने संभावना जताई है कि इस तरह ये मेंढक जाने-अनजाने इन पौधों को परागित भी कर देते होंगे। युनिवर्सिटी ऑफ कैम्पिनास के लुईस फिलिप टोलेडो और उनके साथियों ने बताया है कि पहली बार किसी मेंढक को, या यू कहें कि किसी उभयचर को, किसी पौधे का परागण करते देखा गया है। आम तौर पर केवल कीटों और पक्षियों को ही परागणकर्ता के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले कुछ अध्ययनों में कुछ सरीसृप और स्तनधारी भी यह काम करते देखे गए हैं। और अब इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने परागणकर्ता के रूप में उभयचर की संभावना जताई है। इसकी पुष्टि के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adi5190/abs/_20230501_on_brazilian_tree_frog.jpg

ठंडक के लिए कुकुरमुत्ते

हाल ही में पता लगा है कि कुकुरमुत्ते (मशरूम) और अन्य फफूंदें अपने परिवेश के तापमान की तुलना में अधिक ठंडे बने रहते हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के अनुसार इसका कारण उनमें भरपूर मात्रा में पानी की उपस्थिति है। लगभग हमारे पसीने की तरह यह पानी धीरे-धीरे वातावरण में वाष्पित होता रहता है, और तापमान कम करता है।

मशरूम तथा अन्य फफूंदों की इस विशेषता के बारे में तब पता चला जब जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के सूक्ष्मजीव विज्ञानी रैडामेस कॉर्डेरो अपनी प्रयोगशाला के नए थर्मल कैमरे का परीक्षण कर रहे थे। यह कैमरा इन्फ्रारेड-ऊष्मा को छवि के रूप में रिकॉर्ड कर सकता है। कॉर्डेरो और उनके सहयोगी आर्टुरो कैसाडेवल ने कैमरे से यह पता लगाने का प्रयास किया कि कुछ कवक के गहरे रंग के रंजक उनकी सतह के तापमान को कैसे प्रभावित करते हैं। अध्ययन में उन्होंने लगभग 20 प्रकार के जंगली मशरूम की छवियां तैयार की जो अपने परिवेश की तुलना में काफी ठंडे थे।

प्रयोगशाला जांच में उन्होंने पाया कि ब्राउन अमेरिकन स्टार-फूटेड एमेनाइटा जैसी कुछ प्रजातियों का तापमान अपने परिवेश की तुलना में एक या दो डिग्री कम था जबकि ओइस्टर मशरूम का तापमान अपने परिवेश से लगभग छह डिग्री सेल्सियस कम था। शराब बनाने वाली खमीर सहित 19 प्रकार के फफूंदों में इसी तरह के पैटर्न दिखाई दिए। यहां तक कि ठंडे मौसम में भी इनकी कॉलोनियों का तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस कम था। एक-कोशिकीय कवकों के तापमान में इस तरह के पैटर्न काफी आश्चर्यजनक हैं। कॉलोनी के रूप में भी देखा जाए तो मशरूम की तुलना में इन कवकों का सतह-क्षेत्र प्रति आयतन बहुत कम होता है। ऐसे में सतह से गर्मी विकिरित होकर तापमान को कम करना आश्चर्यजनक है।

शीतलन क्षमता के मापन से पता चला है कि शीतलन प्रभाव कवक से वाष्पित होने वाले पानी के कारण होता है जो एक गर्म दिन में हमारे शरीर से निकलने वाले पसीने जैसा काम करता है। मशरूम के नीचे की गलफड़ेनुमा बनावट सतह क्षेत्र में वृद्धि करती हैं। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस विशेषता से मशरूम को क्या फायदा होता है।

बहरहाल इन मशरूमों की ठंडक का इस्तेमाल तो किया ही जा सकता है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने लगभग आधा-किलोग्राम बटन मशरूम को एक छोटे स्टायरोफोम पैकिंग बॉक्स में रखा। इसमें हवा के लिए दो छेद रखे। हवा खींचने के लिए एक छेद में एक कंप्यूटर एग्ज़ॉस्ट फैन लगाया और बॉक्स को एक बड़े स्टायरोफोम कंटेनर में रख दिया। पंखा चालू होने के 40 मिनट के अंदर बड़े कंटेनर का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया और आधे घंटे तक कम ही बना रहा। इस व्यवस्था से बर्फ तो नहीं जमेगा लेकिन यदि आपका पिकनिक का कोई प्रोग्राम है तो खाना ठंडा रखने के लिए मशरूम एक अच्छा विकल्प है। और तो और, बाद में आप इसे खा भी सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adi5935/abs/_20230505_on_cool_mushroom_web.jpg

हृदय रुक जाने के बाद भी मस्तिष्क में गतिविधियां

मौत के करीब से गुज़रे कई लोग बताते हैं कि उनकी नज़रों के सामने से उनका जीवन गुज़रने लगता है। जीवन के यादगार क्षण दोहराने लगते हैं और यह सब कुछ वे शरीर के बाहर से अनुभव करते हैं जैसे खुद को कहीं बाहर से देख रहे हों। हाल ही में चार मरणासन्न लोगों पर किए गए एक अध्ययन से लगता है कि इसकी व्याख्या की जा सकती है। पता चला है कि मृत्यु के दौरान दिल की धड़कन बंद होने के बाद भी दिमाग में हलचल जारी रहती है।

चिकित्सकीय रूप से मृत्यु उस स्थिति को कहा जाता है जब हृदय हमेशा के लिए धड़कना बंद कर देता है। लेकिन हालिया अध्ययनों से पता चला है कि हृदय गति रुकने के बाद भी कुछ सेकंड से लेकर घंटों तक मस्तिष्क में हलचल जारी रह सकती है। वर्ष 2013 में चूहों पर हुए एक अध्ययन में चूहों के मस्तिष्क में मरने के 30 सेकंड बाद तक चेतना के लक्षण देखे गए थे।

अब एक नए अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की न्यूरोलॉजिस्ट जिमो बोर्जिगिन की टीम ने कोमा या लाइफ सपोर्ट वाले चार ऐसे रोगियों के सिर पर ईईजी टोपियां लगाईं जिनके जीने की संभावनाएं काफी कम थीं।  

ये टोपियां मस्तिष्क की सतह के विद्युत संकेतों की निगरानी के लिए लगाई गई थीं। चिकित्सकों द्वारा वेंटीलेटर हटाए जाने पर दो रोगियों के दिल की धड़कन बंद होने के बाद दिमाग में गामा तरंग नामक उच्च-आवृत्ति वाले तंत्रिका पैटर्न देखे गए। एक स्वस्थ व्यक्ति में ऐसे पैटर्न तब बनते हैं जब वह कुछ सीख रहा हो, या कोई स्मृति या सपना याद कर रहा हो। कई तंत्रिका वैज्ञानिक इसे चेतना से जोड़ते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गामा तरंगें इस बात का संकेत देती हैं कि मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र एक साथ काम कर रहे थे, जैसे – हम किसी वस्तु को समझने के लिए दृष्टि, गंध और ध्वनि को एक साथ महसूस करते हैं। हालांकि यह अभी भी एक रहस्य है कि मस्तिष्क यह सब कैसे करता है लेकिन मरने वाले लोगों में गामा तरंगें देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने अंतिम क्षणों में यादगार घटनाएं याद कर रहे थे।

टीम ने मस्तिष्क के उस क्षेत्र की विद्युत गतिविधियों में वृद्धि देखी, जिसकी चेतना में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है और यह क्षेत्र सपनों, दिमागी दौरे और मतिभ्रम के दौरान सक्रिय होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार मस्तिष्क की गतिविधि में अचानक वृद्धि होना उसके जीवित रहने की कोशिश का हिस्सा है – ऑक्सीजन से वंचित होने पर मस्तिष्क इस मोड में चला जाता है। मस्तिष्क-मृत्यु से गुज़रते जीवों के अध्ययन में पाया गया है कि उनका मस्तिष्क कई संकेतक अणु छोड़ने लगता है और खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने के लिए असामान्य ब्रेनवेव पैटर्न बनाता है। ऐसा करते हुए वह चेतना के बाहरी संकेतों को बंद कर देता है।

बोर्जिगिन मरणासन्न मरीज़ों में मस्तिष्क गतिविधि का अध्ययन करने के लिए अन्य चिकित्सा केंद्रों के साथ सहयोग की उम्मीद करती हैं ताकि निष्कर्षों की पुष्टि हो सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://i.insider.com/62166e9f45889c0019d1f0a1?width=700

भूख का नियंत्रण करते सात हार्मोन

हने को तो यह बड़ी सरल-सी बात है कि हमें जब भूख लगती है तो हम खाना खा लेते हैं, और पेट भरने का एहसास होने पर खाना बंद कर देते हैं। लेकिन वास्तव में यह काफी जटिल मामला है। आपको भूख लगने और पेट भरने का एहसास दिलाने के लिए कई हार्मोन मिल-जुल कर काम करते हैं ताकि न खाने या अत्यधिक खाने के कारण शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित न हो।

यहां भूख नियमन में लिप्त सात प्रमुख हार्मोन पर बात की जा रही है। इनमें कुछ हार्मोन जेनेटिक कारकों से प्रभावित होते हैं जबकि कुछ अन्य हार्मोंन हमारी जीवन शैली, सेहत की हालत और/या शरीर के वज़न में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। कुछ हार्मोन भोजन सेवन का अल्पकालिक नियमन करते हैं ताकि हम अत्यधिक भोजन करने से बच जाएं, वहीं अन्य हार्मोन शरीर में सामान्य ऊर्जा भंडार को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक भूमिका निभाते हैं।

लेप्टिन: लेप्टिन हार्मोन हमारे शरीर के वसा ऊतकों द्वारा बनाया जाता है। वसा कोशिकाएं तृप्ति (पेट भरने) का संकेत देने के लिए पूरे शरीर में लेप्टिन स्रावित करती हैं, जिससे भूख शांत होने का एहसास होता है और भोजन सेवन रोक दिया जाता है। 1994 में लेप्टिन के बारे में पता चलने से पहले हमें यह नहीं पता था कि शरीर के वसा भंडार मस्तिष्क के साथ कैसे संवाद करते हैं।

जो लोग मोटापे का शिकार होते हैं उनमें लेप्टिन का स्तर अधिक होता है क्योंकि या तो उनके शरीर में अधिक वसा कोशिकाएं होती हैं या उनका शरीर हार्मोन के प्रति प्रतिरोधी होता है। दूसरी ओर, यदि आप भोजन में कैलोरी की मात्रा घटाते हैं और शरीर की चर्बी घटाते हैं तो शरीर में लेप्टिन का स्तर कम हो जाता है। लेप्टिन भूखे मरने और शरीर के वसा भंडार को घटने से बचाने की कोशिश करता है। एक मायने में यह वज़न को संतुलित बनाए रखने वाला हार्मोन है।

ग्रेलीन: ग्रेलीन आमाशय में बनता है, और इसे अक्सर ‘भूख का हार्मोन’ कहा जाता है। खाने से ठीक पहले ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, और भोजन करने के बाद कम हो जाता है।

यदि आप वज़न कम करने की कोशिश में कम कैलोरी लेते हैं, तो ग्रेलीन अपने सामान्य स्तर से बढ़ा रहेगा। इससे वज़न कम करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि सामान्य से अधिक समय तक भूख का एहसास बना रहेगा या बार-बार भूख लगेगी। 2017 में ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि ग्रेलीन के सामान्य से अधिक स्तर ने लोगों में खाने की लालसा बढ़ा दी थी – खासकर तले-भुने, मसालेदार या मीठे पदार्थों के लिए, और छह महीने में ही उनका वज़न काफी बढ़ गया था।

कोलेसिस्टोकायनीन (CCK): यह तृप्ति के एहसास से जुड़ा हार्मोन है। यह खाना खाने के बाद आंत में बनता है और पेट भरे होने का एहसास दिलाता है। यह आमाशय से भोजन के गुज़रने की गति को मंद करके पाचन बेहतर करता है जिससे देर तक पेट भरे होने का एहसास होता है। इसके चलते अग्न्याशय से वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का चयापचय करने वाले और अधिक द्रव और एंज़ाइम स्रावित होते हैं।

इंसुलिन: रक्तप्रवाह में शर्करा का स्तर बढ़ जाने पर अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं द्वारा इंसुलिन स्रावित किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अधिक सेवन से अधिक इंसुलिन उत्पन्न होता है जो ज़्यादा ग्लूकोज़ को ऊर्जा के लिए कोशिकाओं में भेजने का काम करता है। यह हार्मोन भी तृप्ति का एहसास कराता है।

कॉर्टिसोल: इसे तनाव हार्मोन के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि शरीर में इसका स्तर तब उच्च होता है जब आप तनाव में होते हैं। वास्तव में, कॉर्टिसोल के कई अलग-अलग कार्य होते हैं – इनमें से एक है चयापचय को नियंत्रित करना। कॉर्टिसोल का उच्च स्तर इंसुलिन के काम में बाधा डालता है और वसा भंडारण बढ़ाता है। देखा गया है कि जीर्ण तनाव की स्थिति में, कॉर्टिसोल के उच्च स्तर से भूख बढ़ जाती है खासकर मीठा, नमकीन-मसालेदार, या वसायुक्त भोजन की भूख तथा रक्त में शर्करा और इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है। न्यूरोइमेज क्लीनिकल पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि कॉर्टिसोल का अधिक स्तर भूख को उकसाता है और मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में रक्त प्रवाह को कम कर देता है जो भोजन सेवन का नियंत्रण करते हैं।

ग्लूकागोन लाइक पेप्टाइड-1 (GLP-1): GLP-1 खाना खाने के बाद आंत में मुक्त होता है। यह मस्तिष्क में रिसेप्टर्स के साथ संवाद करता है और तृप्ति का एहसास पैदा करता है। यह पाचन और आंत से भोजन गुज़रने की गति को धीमा कर देता है, जिसके कारण लंबे समय तक पेट भरे होने का एहसास होता रहता है।

ग्लूकोज़ डिपेंडेंट इंसुलिनोट्रॉपिक पॉलीपेप्टाइड (GIP): यह हार्मोन खाना खाने के बाद छोटी आंत द्वारा बनाया जाता है। यह इंसुलिन के स्तर को बढ़ाता है जो ग्लायकोजन और वसा अम्लों के निर्माण को उकसाते हैं, और वसा को टूटने को रोकते हैं। GIP की भूमिका को पूरी तरह समझना बाकी है।

ये तो हुई भूख नियंत्रण में जुड़े हार्मोन्स की भूमिकाओं की बात। इनमें गड़बड़ी भूख नियंत्रण प्रणाली को गड़बड़ा देती है, नतीजतन शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि कुछ उपचार और जीवनशैली में कुछ बदलाव मदद कर सकते हैं। इनमें से कुछ की चर्चा यहां की जा रही है।

भरपूर नींद: भूख से जुड़े कई हार्मोन के सुचारू कामकाज के लिए पर्याप्त नींद ज़रूरी है। नींद की कमी से शरीर में कॉर्टिसोल और ग्रेलीन का स्तर बढ़ा रहता है, और लेप्टिन कम हो जाता है। ओबेसिटी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि रात में नींद की कमी से पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लेप्टिन का स्तर अधिक कम हुआ था। और जो लोग मोटापे से ग्रस्त थे उनमें नींद की कमी के कारण ग्रेलीन का स्तर बढ़ा हुआ था।

नियमित व्यायाम: देखा गया है कि एरोबिक व्यायाम कुछ समय के लिए भूख को शांत कर देते हैं, ग्रेलीन का स्तर कम कर देते हैं और GLP-1 के स्तर को बढ़ा देते हैं। और सघन व्यायाम स्वस्थ लोगों में ग्रेलीन के स्तर को अधिक प्रभावी तरीके से कम करते हैं। लगता है कि नियमित व्यायाम इन हार्मोन को आपके पक्ष में करेंगे, और इंसुलिन को शरीर में बेहतर तरीके से काम करने में मदद करेंगे।

तनाव भगाना: जीवन एकदम ही तनावमुक्त हो, ऐसा होना तो ज़रा मुश्किल है। लेकिन खुद को तनावमुक्त रखने के उपाय करके आप भूख सम्बंधी हार्मोन्स को संतुलित रख सकते हैं।

अध्ययनों में पाया गया है कि अत्यधिक तनाव भूख घटाता है, लेकिन जीर्ण या लंबे समय के तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ता है। नतीजतन खाने की इच्छा बढ़ती है – खास कर उच्च कैलोरी वाली चीज़ों को खाने की।

तनाव और कॉर्टिसोल के स्तर को कम करने में सांस सम्बंधी या शारीरिक व्यायाम कारगर पाए गए हैं। बिहेवियोरल साइंसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि मानसिक शांति के लिए किए गए 12 मिनट के सत्र, सांस सम्बंधी व्यायाम सहित, से लार के कॉर्टिसोल स्तर में कमी आई।

इसके अलावा खान-पान का ध्यान रखना (जैसे प्रोसेस्ड खाद्य का कम सेवन, भोजन में साबुत अनाज, फल, सब्ज़ियां शामिल करना) फायदेमंद होगा।

बहरहाल कभी-कभी हार्मोन का संतुलन रखने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप की ज़रूरत भी पड़ती है। मोटापे और डायबिटीज़ के इलाज के लिए GLP-1 और GIP हार्मोन पर लक्षित उपचार इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई दवाएं मोटापा घटाने और रक्त शर्करा नियंत्रित करने में कारगर हैं। लेकिन इनका उपयोग चिकित्सकीय सलाह पर आहार, जीवनशैली में परिवर्तन और व्यायाम के साथ किया जाना चाहिए। आखिर आप पूरी तरह दवाओं पर निर्भर तो नहीं रह सकते – वे संपूर्ण समाधान नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://previews.123rf.com/images/maniki81/maniki811807/maniki81180700009/105789551-appetite-and-hunger-hormones-vector-diagram-illustration.jpg

एलीफैंट सील गोता लगाने के दौरान झपकी लेते हैं

भी स्तनधारी प्राणियों के लिए पर्याप्त नींद स्वास्थ्य और विकास के लिए आवश्यक है। कई जीव तो दिन में 20 घंटे तक सोते हैं। अलबत्ता, अफ्रीकी हाथी के लिए केवल दो घंटे की नींद पर्याप्त है। लेकिन अब इस थलीय प्राणि को एक समुद्री स्तनधारी ने टक्कर दी है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी एलीफैंट सील के लिए भी दो घंटे की नींद पर्याप्त है। भूमि की तुलना में ये समुद्र में बहुत कम समय के लिए सोते हैं और इस दौरान वे सैकड़ों फीट की गहराई तक पहुंच जाते हैं।

अमेरिका के पश्चिमी तट पर पाए जाने वाले एलीफैंट सील गोता लगाने में माहिर होते हैं और 2500 फीट गहरा गोता लगाकर लगभग दो घंटे तक वहां रह भी सकते हैं। इनका वज़न एक कार जितना होता है और लंबाई लगभग 13 फीट होती है। अपने भारी-भरकम शरीर को बनाए रखने के लिए ये हर साल लगभग 7 महीने समुद्र में शिकार करते हैं। इनका मुख्य आहार मछली और स्क्विड हैं।

इन गहरे समुद्रों में आम तौर पर व्हाइट शार्क और किलर व्हेल शिकारी की भूमिका में होते हैं। इनसे बचने के लिए डॉल्फिन और फर सील जैसे कई स्तनधारी समुद्री जीव एक समय में अपने आधे मस्तिष्क को आराम देते हैं और उनका आधा मस्तिष्क सक्रिय रहता है। इस तरह की निद्रा को एकल-गोलार्ध निद्रा कहा जाता है जिसमें जंतु की एक आंख खुली रहती है। इसके उलट, एलीफैंट सील बिलकुल मनुष्य के समान सोते हैं और उनका मस्तिष्क पूरी तरह आराम कर रहा होता है।

सैन डिएगो स्थित स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनोग्राफी की जेसिका कैंडल-बार ने उत्तरी एलीफैंट सील की निद्रा, शिकार और शिकार होने से बचाव के पैटर्न को समझने का प्रयास किया। कैंडल-बार और उनके सहयोगियों ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया जो सील की मस्तिष्क तरंगों, हृदय गति, गोते की गहराई और गतियों की निगरानी कर सके। उपकरण एक टोपी की तरह सील के सिर के ऊपर आसानी से फिट हो जाता है। इन उपकरणों को कई एलीफैंट सील के सिर पर लगाकर पांच दिनों तक उनकी दिनचर्या का अध्ययन किया गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि गोता लगाने के बाद वे तैरना बंद कर देते हैं और ग्लाइड करने लगते है। जैसे-जैसे वे गहराई में जाते हैं उनके मस्तिष्क की गतिविधि मंद पड़ने लगती है। जल्द ही वे गहरी नींद में सो जाते हैं और उलटे होकर एक गिरती हुई पत्ती के समान लहराते हुए समुद्र के पेंदे की ओर जाने लगते हैं। लगभग 10 मिनट लंबी नींद के बाद वे अचानक जाग जाते हैं और सतह पर वापस आ जाते हैं। इस दौरान कुछ सील 1000 फीट से भी अधिक गहराई तक चले जाते हैं और कभी-कभी तो वे समुद्र के पेंदे तक पहुंच जाते हैं।

एलीफैंट सील दिन में कई बार इस तरह के गोते लगाते हैं जिससे उन्हें लगभग दो घंटे की नींद मिलती है। सील जब भूमि पर प्रजनन करने के लिए आते हैं तो दिन में 10 घंटे से अधिक सोते हैं। इस दौरान वे कुछ खाते नहीं हैं जिससे अतिरिक्त नींद की आवश्यकता समझ आती है।

इस अध्ययन के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एलीफैंट सील अधिकतम भोजन करने के लिए समुद्र में सोने का समय तो सीमित करते ही हैं साथ ही खुद के शिकार होने के समय को भी कम करते हैं।

जीव जगत में एलीफैंट सील की नींद की अवधि में एक अनोखा लचीलापन दिखता है। लगभग 200 से अधिक दिनों के लिए दिन में दो घंटे की नींद से लेकर बाकी दिनों में 10.8 घंटे प्रतिदिन की नींद का पैटर्न किसी अन्य स्तनधारी में नहीं देखा गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक समुद्री स्तनधारी जीवों के नींद के पैटर्न के बारे में अधिक जानकारी उनके प्राकृतवास प्रबंधन को सुधारने में मदद करेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://scx2.b-cdn.net/gfx/news/hires/2023/elephant-seals-drift-o-1.jpg