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अतिरिक्त जीन से चावल की उपज में सुधार – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

साठ के दशक की हरित क्रांति ने चावल और गेहूं जैसी फसलों की उपज में उल्लेखनीय सुधार किया। यह नव-विकसित उच्च उपज वाली किस्मों के साथ-साथ सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रचुर उपयोग का मिला-जुला परिणाम था। भारत में चावल की प्रति हैक्टर उपज में तीन गुना वृद्धि देखी गई।

अब पचास साल बाद, इस सघन तरीके के कुछ नकारात्मक प्रभाव दिखने लगे हैं – नाइट्रोजन उर्वरक और कृषि रसायन पर्यावरण के लिए खतरा पैदा करते हैं; पानी आपूर्ति अक्सर कम होती है; और कृषि भूमि अब दम तोड़ने लगी है।

दुनिया की बढ़ती आबादी के लिए अधिक खाद्यान उपजाने के लिए जंगलों और घास के मैदानों को खेतों में तबदील करना होगा। यह हमारे पारिस्थितिक तंत्रों पर भारी दबाव डालेगा।

इस उलझन से बाहर निकलने का एक संभावित तरीका चीनी कृषि विज्ञान अकादमी के फसल विज्ञान संस्थान के शाओबो वाई और उनके साथियों ने साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में सुझाया है – ‘ए ट्रांसक्रिप्शनल रेगुलेटर दैट बूस्ट्स ग्रेन यील्ड एंड शॉर्टन्स दी ग्रोथ ड्यूरेशन ऑफ राइस’ यानी अनुलेखन का एक नियंत्रक जो धान की पैदावार को बढ़ाता है और पकने की अवधि को कम करता है। इसी अंक में रिपोर्टर एरिक स्टोकस्टेड ने लिखा है, “सुपरचार्ज्ड बायोटेक चावल 40 प्रतिशत अधिक उपज देता है।”

यह रिपोर्ट बताती है कि चीनी चावल की एक किस्म में इसके अपने ही एक जीन की दूसरी प्रति जोड़ने से उपज में 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। जब इस चावल में OsDREB1C नामक जीन की दूसरी प्रति जोड़ी जाती है, तो यह प्रकाश संश्लेषण और नाइट्रोजन का बेहतर उपयोग करता है, पुष्पन तेज़ गति से होता है और ज़्यादा बड़े तथा अधिक संख्या में दाने मिलते हैं। यह उर्वरकों का अवशोषण अधिक कुशलता से करता है – जिससे अधिक प्रचुर मात्रा में अनाज पैदा होता है।

भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत ने वर्ष 2021-22 के दौरान 150 से अधिक देशों को लगभग 1.8 करोड़ मीट्रिक टन चावल निर्यात किया था, जिससे 6.11 खरब डॉलर की कमाई हुई थी। यह कुछ साल पहले की तुलना में बहुत बड़ा सुधार है। जैसा कि अरुण अधिकारी और उनके साथियों ने 2016 में एग्रीकल्चर इकॉनॉमी रिसर्च रिव्यू में बताया था, आने वाले वर्षों में बढ़ती मांग के मद्देनज़र धान उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की (बेहतर) रणनीति तलाशनी चाहिए।

वियतनाम चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है। वर्ष 2021-2022 में उसने 65 लाख टन धान का उत्पादन किया है। भारत को दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक व निर्यातक के रूप में अपनी हैसियत को बरकरार रखने और इसे बढ़ाने के लिए 1.8 करोड़ टन से अधिक उत्पादन करना होगा। इस संदर्भ में वाई और उनके साथियों का पेपर महत्वपूर्ण हो जाता है।

जीन मॉडुलेशन

पेपर में महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने धान की इस किस्म में कोई बाहरी जीन नहीं बल्कि उसी जीन को फिर से जोड़ा है। इसे जेनेटिक मॉडुलेशन की संज्ञा देना सबसे उपयुक्त होगा। यह कोई जेनेटिक संशोधन या परिवर्तन (जीएम) नहीं है। यह किसी बाह्य जीन रोपित पौधे का परिणाम नहीं है, जिसमें किसी दाता पौधे से जीन लिए जाते हैं।

भारत के लिए यह विशेष रूप से प्रासंगिक है, जिसका लक्ष्य चावल के उत्पादन और व्यापार में अपनी स्थिति को बरकरार रखना है। दी वायर में 16 जून को प्रकाशित एक लेख – (भारत में जीएम फसलों का नियमन जीन के प्रभावों पर आधारित होना चाहिए, उसके स्रोत पर नहीं) बताता है कि “भारत ने पूर्व में सभी तरह की जेनेटिक रूप से परिवर्तित फसलों के व्यावसायीकरण सम्बंधी जो नियम लागू किए थे उनमें से चंद जेनेटिक रूप से परिवर्तित फसलों को इन नियमों से छूट दी गई है।

उदाहरण के लिए, बीटी कपास में बैसिलस थुरंजिएंसिस (बीटी) नामक बैक्टीरिया से जीन सामान्य कपास में स्थानांतरित किया जाता है। भारत के कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2019 में बताया था कि उसने इस बाहरी जीन को सामान्य कपास में स्थानांतरित कर बीटी कपास का उत्पादन करने की अनुमति दे दी है। इसे भारत में बनाकर भारत और अन्य देशों में बेचा जा रहा है।

इसी तरह, बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक लेख कहता है कि भारत पशुओं के चारे के लिए 12 लाख टन जीएम सोयाबीन का आयात करेगा। अगर मंत्रालय विदेशों से जीएम सोयाबीन आयात की अनुमति दे रहा है तो क्यों न भारत में उत्पादन की अनुमति दे दी जाए?

दूसरी ओर, साइंस में प्रकाशित उपरोक्त शोधपत्र के लेखकों ने चावल में पहले से मौजूद ‘मूल’ जीन (OsDREB1C) की एक अतिरिक्त प्रति जोड़ी है, न कि बीटी कपास या बीटी सोयाबीन की तरह एक बाहरी जीन।

भारत में चावल के बेहतरीन शोधकर्ता हैं और देश भर की कई प्रयोगशालाओं में उत्कृष्ट जेनेटिक इंजीनियर भी मौजूद हैं। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के पोषण विशेषज्ञों के साथ मिलकर कृषि मंत्रालय इन शोधकर्ताओं का साथ दे तो भारत दुनिया में प्रमुख चावल निर्यातक बन सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.ade0785/abs/_20220722_on_rice_yields.jpg

विद्युत सुरक्षा: राष्ट्र स्तरीय योजना की आवश्यकता – श्रीकुमार नालूर

ज़ादी के बाद से भारत ने विद्युत क्षेत्र में काफी विकास किया है। इस दौरान बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण सुधार के साथ लगभग सभी घरों में बिजली कनेक्शन प्रदान किए गए। इसके अलावा वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन और हफ्ते के सातों दिन चौबीस घंटे बिजली आपूर्ति के वायदे भी हैं। हालांकि ये सभी प्रयास प्रसंसनीय हैं लेकिन अभी भी विद्युत क्षेत्र कई समस्याओं का सामना कर रहा है। इसमें बिजली से होने वाली दुर्घटनाएं सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समस्या है।

विकास और सफलता के लिए समस्याओं और विफलताओं को समझना आवश्यक है। यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि विद्युत सम्बंधी दुर्घटनाओं की दर में निरंतर वृद्धि के बावजूद विद्युत क्षेत्र के योजनाकारों, नियामक एजेंसियों और संचालकों ने इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। राष्ट्रीय या प्रांतीय नीतियों या कार्यक्रमों में विद्युत सुरक्षा के लिए न तो कोई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं और न ही कोई संसाधन विशिष्ट रूप से आवंटित किए गए हैं। जिन चंद मामलों में संसाधनों का आवंटन किया गया है वहां या तो इनका पूरी तरह उपयोग नहीं किया गया है या फिर इनका बहुत कम हिस्सा कर्मचारियों के प्रशिक्षण या सुरक्षा किट के लिए उपयोग किया गया है।

मौतों में वृद्धि

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से बिजली के झटके या बिजली के कारण लगी आग से मरने वालों की संख्या और मृत्यु दर में निरंतर वृद्धि हो रही है। वर्ष 1990 में ऐसी दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 2957 (0.36 मौतें प्रति लाख) थी जो 2020 में बढ़कर 15,258 (1.13 मौतें प्रति लाख) हो गई। मृत्यु दर के सम्बंध में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) द्वारा जारी आंकड़े भी ऐसी ही स्थिति दर्शाते हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में कई विकसित देशों में विद्युत-सम्बंधी दुर्घटनाओं से मृत्यु दर में काफी कमी आई है और वर्तमान मृत्यु दर प्रति लाख लोगों पर 0.03 या उससे भी कम है।

उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि विद्युत दुर्घटनाओं में मरने वालों में 90 प्रतिशत से अधिक आम लोग होते हैं। लिहाज़ा, दुर्घटनाओं को कम करने के प्रयासों में आम लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो अधिकांश विद्युत-सम्बंधी दुर्घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं लेकिन तेज़ी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए गरीब शहरी क्षेत्रों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। अधिकांश दुर्घटनाएं वितरण प्रणाली और गैर-औद्योगिक उपभोक्ताओं वाले क्षेत्रों में होती हैं। इसमें भी अधिकांश मौतें वितरण नेटवर्क (विशेष रूप से 11 केवी और लो-टेंशन प्रणालियों) और लो-टेंशन उपभोक्ता वाले क्षेत्रों में होती है। अत: इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि अधिकांश मौतें लाइव कंडक्टर के संपर्क में आने से होती हैं। इसका कारण यह हो सकता है कि लाइव कंडक्टर नीचे तक झूलते होते हैं या खुले स्विच बोर्ड कम ऊंचाई पर लगे होते हैं। दुर्घटनाओं का दूसरा प्रमुख कारण विद्युतीय फाल्ट के कारण आग लगना है जो लगभग 12 प्रतिशत दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है। इसके अलावा, डिज़ाइन एवं निर्माण में खराबी, अपर्याप्त रख-रखाव, अपर्याप्त सुरक्षा प्रणाली और सुरक्षा जागरूकता में कमी भी इसके प्रमुख कारण हैं।          

सुरक्षा की व्यवस्थाएं

सीईए ने सुरक्षा सम्बंधी नियम तैयार किए हैं और सभी बिजली संचालकों से इनका पालन करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन संचालकों द्वारा इन नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कोई ठीक-ठाक व्यवस्था नहीं है। उदाहरण के लिए वितरण कंपनियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सुरक्षा अधिकारी नियुक्त करें जो समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट करें। लेकिन इस तरह का कोई ऑडिट नहीं किया जाता है क्योंकि वितरण कंपनियों की प्राथमिकता हमेशा से राजस्व की वसूली और फाल्ट की मरम्मत करना रही है। राज्यों के विद्युत निरीक्षकों से अपेक्षा होती है कि वे कनेक्शनों को स्वीकृति देंगे तथा इलेक्ट्रीशियनों को लाइसेंस प्रदान करेंगे और दुर्घटनाओं की जांच-पड़ताल करेंगे। लेकिन उनके पास कर्मचारियों की भारी कमी रहती है। जहां तक सुरक्षा अधिकारियों का सवाल है, तो उनका ध्यान औद्योगिक सुरक्षा की ओर अधिक तथा ग्रामीण जनता की सुरक्षा की ओर कम होता है। कई ज़मीनी स्तर के संगठन भी दुर्घटना की रोकथाम की बजाय पीड़ितों को मुआवज़ा राशि दिलवाने में अधिक रुचि लेते हैं।        

विद्युत सुरक्षा जनहित के लिए एक बड़ी चुनौती है जिससे सभी हितधारकों के सहयोग से ही निपटा जा सकता है। बेहतर डैटा संग्रहण, राष्ट्र स्तरीय कार्यक्रमों में सुरक्षा के पहलुओं को शामिल करके, सुरक्षा संस्थानों के सशक्तिकरण, वितरण कंपनियों के लिए सुरक्षा नियमन के विकास, सुरक्षा सम्बंधित प्रस्तावों में जनता और पेशेवरों की भागीदारी और तकनीकी नवाचार के माध्यम से वर्तमान सुरक्षा नियामक व्यवस्था के क्रियांवयन को मज़बूत किया जा सकता है।   

वर्तमान परिस्थिति में ज़रूरत इस बात की है कि वितरण क्षेत्र में दुर्घटनाओं को कम करने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम विकसित किया जाए जिसका कार्यक्षेत्र सुपरिभाषित हो, संसाधन का पर्याप्त आवंटन हो और मज़बूत निगरानी एवं सत्यापन व्यवस्था हो। राज्यों को अधिक दुर्घटनाओं वाले जिलों को चिन्हित करके दुर्घटनाओं को कम करने के लिए कार्यक्रम तैयार करने चाहिए। इन्हीं उपायों से हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि बिजली न केवल सबको मिले, सस्ती और अच्छी गुणवत्ता वाली और सुरक्षित भी हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://us.123rf.com/450wm/lcosmo/lcosmo1505/lcosmo150500047/40380324-illustration-representing-the-person-receiving-an-electric-discharge-in-the-highvoltage-grid-due-to-.jpg?ver=6

मानसिक थकान का रासायनिक आधार

कोई बहुत ही दिमाग खपाऊ काम करने का बाद अचानक कोई छोटी-मोटी बात ही याद नहीं रहती, जैसे नाश्ते में क्या खाया था या बाहर किस काम के लिए निकले थे। अब, एक अध्ययन बताता है कि घंटों तक कठिन दिमागी काम करने के बाद दिमाग क्यों जवाब दे जाता है – संभवत: ग्लूटामेट का विषाक्त मात्रा में निर्माण; ग्लूटामेट मस्तिष्क में प्रचुरता में पाया जाने वाला एक रासायनिक सिग्नल है।

मानसिक थकान की व्याख्या की यह पहली कोशिश नहीं है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना रहा है कि कठिन दिमागी कार्य करने में अधिक ऊर्जा खर्च होती है और ये मस्तिष्क को उसी तरह थका सकते हैं जैसे कठोर परिश्रम शरीर (मांसपेशियों) को थका देता है। कुछ वैज्ञानिक तो यह कहते हैं कि कृत्रिम मिठास वाली चीज़ें खाने-पीने की बजाय असली चीनी युक्त चीज़ें लेना दिमाग को पैना कर सकता है। लेकिन व्याख्या की कोशिश जारी है।

ऐसे ही एक प्रयास में पैरिस विश्वविद्यालय के तंत्रिका विज्ञानी एंटोनियस वाइलर और उनके साथियों ने मानसिक थकान से सम्बंधित व्यवहार – जैसे आसान और त्वरित संतुष्टि तलाशना या तैश में आकर निर्णय लेना – और ग्लूटामेट के स्तर के बीच सम्बंध पर ध्यान दिया। आम तौर पर ग्लूटामेट न्यूरॉन्स को उत्तेजित करता है। यह सीखने और स्मृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन इसकी अत्यधिक मात्रा मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को तबाह कर सकती है – इसके कारण कोशिका मृत्यु से लेकर दौरे पड़ने तक की समस्या हो सकती है।

ग्लूटामेट के स्तर पर निगरानी रखने के लिए शोधकर्ताओं ने एमआरआई तकनीक का उपयोग किया जिसके लिए दिमाग में सुई वगैरह नहीं चुभोनी पड़ती है। चूंकि मस्तिष्क का लेटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स वाला हिस्सा एकाग्रचित्त होने और योजना बनाने में मदद करता है इसलिए अध्ययन में मस्तिष्क के इसी हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया गया। देखा गया है कि जब व्यक्ति मानसिक रूप से थक जाता है तो यह हिस्सा सुस्त हो जाता है।

अध्ययन में शामिल 39 प्रतिभागियों को शोधकर्ताओं ने दो समूहों में बांटा। एक समूह को मानसिक रूप से थकाने वाले मुश्किल कार्य दिए। इस समूह को एक तो यह बताना था कि कंप्यूटर स्क्रीन पर तेज़ी से सिलसिलेवार आते अक्षर हरे रंग के थे या लाल, अपरकेस (केपिटल) थे या लोअरकेस वगैरह। दूसरा उन्हें बताना था कि स्क्रीन पर दिखाई गई संख्या तीन कदम पहले दिखाए गए अक्षर से मेल खाती है या नहीं। प्रयोग लगभग 6 घंटे चला। दूसरे समूह के प्रतिभागियों को इन्हीं कार्यों के आसान संस्करण दिए गए थे।

प्रयोग के दौरान समय बीतने के साथ शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की संज्ञानात्मक थकान को कई बार मापा। इसके लिए उन्हें ऐसे विकल्पों में से चुनने का कहा गया जिनमें संयम की ज़रूरत पड़ती है – जैसे उन्हें चुनना था कि तत्काल मिलने वाले पैसे न लेकर बाद में कहीं ज़्यादा पैसे लें। शोधकर्ताओं ने पाया कि आसान कार्य वाले समूह की तुलना में कठिन कार्य वाले समूह ने लगभग 10 प्रतिशत अधिक बार आवेगपूर्ण निर्णय किए। साथ ही साथ, उनके लेटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में ग्लूटामेट का स्तर लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गया था। ‘आसान-कार्य’ समूह में ऐसा पैटर्न दिखाई नहीं दिया। नतीजे करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि अत्यधिक दिमागी काम से मस्तिष्क में ग्लूटामेट का विषाक्त स्तर पर निर्माण होता है। लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह नींद की ताकत को रेखांकित करता है, जो अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालकर मस्तिष्क को ‘साफ’ करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में ग्लूटामेट के स्तर के आधार पर भारी थकान और अवसाद या कैंसर जैसी स्थितियों में स्वास्थ्य लाभ की निगरानी की जा सकती है।

कई शोधकर्ताओं को संदेह है कि मस्तिष्क में एकत्रित अपशिष्ट इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते होंगे। संभवत: ग्लूटामेट शरीर के अन्य कार्यों के समन्वय में भूमिका निभाता हो। लेकिन यदि ग्लूटामेट की ऐसी भूमिका की पुष्टि होती है तो औषधियों के विकास में मदद मिलने की उम्मीद है।

बहरहाल, इस अध्ययन ने मानसिक थकान और ग्लूटामेट की भूमिका को लेकर बहस गर्मा दी है। आगे के अध्ययन स्थिति को और स्पष्ट कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या आप कभी कोविड संक्रमित हुए हैं?

कोविड-19 महामारी को ढाई वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो या तो कभी संक्रमित नहीं हुए या उनमें संक्रमण अ-लक्षणी रहा था। इसके अलावा, कई संस्करण जांच में बच निकलते हैं, और कई कारक परीक्षण की सटीकता को प्रभावित करते हैं। लिहाज़ा, महामारी वैज्ञानिकों को महामारी के सामुदायिक प्रसार की निगरानी करने में काफी समस्याएं होती हैं।   

आम तौर पर पूर्व संक्रमणों के परीक्षण के लिए एंटीबॉडीज़ की उपस्थिति की जांच की जाती है। ये एंटीबॉडी सार्स-कोव-2 वायरस के न्यूक्लियोकैप्सिड (N) प्रोटीन को लक्षित करते हैं (एंटी-N एंटीबॉडी)। वर्तमान टीके प्रतिरक्षा तंत्र को वायरस के स्पाइक (S) प्रोटीन पर हमला करने के लिए तैयार करते हैं (एंटी-S एंटीबॉडी)। यानी कुदरती एंटीबॉडी अलग होती हैं और टीकाजनित एंटीबॉडी अलग होती हैं। इनके आधार पर बताया जा सकता है कि किसी टीकाकृत व्यक्ति को संक्रमण हुआ था या नहीं। लेकिन एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एंटीबॉडी परीक्षण पूर्व में कोविड-19 से संक्रमित टीकाकृत लोगों की गणना शायद 40 प्रतिशत तक कम करता है।

ऐसे में पूर्व में हुए सार्स-कोव-2 संक्रमण का पता लगाने का कोई विश्वसनीय तरीका होना चाहिए। इस विषय में ब्रिगहैम एंड वीमन हॉस्पिटल की संक्रामक रोग विशेषज्ञ लिंडसी बेडन ने कुछ प्रमुख समस्याएं बताई हैं।

पूर्व में हुए सार्स-कोव-2 संक्रमण के बारे में जानकारी होना महत्वपूर्ण है वायरस के संक्रमण और संचरण की गंभीरता को बेहतर ढंग से परिभाषित किया जा सके।

संक्रमण के बाद वायरस के पदचिन्हों का पता लगाने के लिए एंटी-N एंटीबॉडी जैसे आणविक चिन्हों का उपयोग किया जाता है। अधिकांश टीके स्पाइक प्रोटीन पर आधारित हैं। इस स्थिति में स्पाइक प्रोटीन के विरुद्ध प्रतिरक्षा प्राकृतिक संक्रमण से भी मिल सकती है और टीकाकरण से भी। लेकिन न्यूक्लियोप्रोटीन के विरुद्ध प्रतिरक्षा केवल वायरस के संपर्क में आने से ही उत्पन्न होती है। अलबत्ता, यह बात वहां लागू नहीं होती जहां निष्क्रियकृत संपूर्ण वायरस आधारित टीकों का उपयोग किया गया है। ऐसे मामलों में कुछ एंटी-N एंटीबॉडी मौजूद होने की संभावना होती है।

पूर्व में हो चुके सार्स-कोव-2 संक्रमण का पता लगाने के लिए सीरोलॉजिकल परीक्षण के बारे में कुछ कहना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि हम सार्व-कोव-2 वायरस को पिछले ढाई साल से ही जानते हैं। अभी तक तो यह भी पता नहीं है कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कितने समय तक सक्रिय रहती है। प्रतिरक्षा सम्बंधी विभिन्न कारकों को समझना अभी भी शोध का विषय है; जैसे यह समझना कि क्या टीकाकरण कुदरती प्रतिरक्षा को बदल देता है। वैसे तो प्राकृतिक संक्रमण के मामले में सामान्यत: एंटीबॉडीज़ एक या दो वर्षों में नष्ट जाती है लेकिन कुछ अध्ययन बताते हैं कि टीकाकरण से स्थिति बदल सकती है।

वैसे किसी व्यक्ति को पूर्व में सार्स-कोव-2 संक्रमण हुआ है या नहीं, यह जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका एंटी-N एंटीबॉडी है। लेकिन यह भी पता चला है कि टीकाकृत लोगों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होती है। ऐसी स्थिति में अन्य वायरल प्रोटीन, जो टीके का हिस्सा नहीं हैं, के विरुद्ध टी-कोशिका प्रतिक्रिया पर गौर किया जा सकता है। अलबत्ता, इसमें अन्य कोरोनावायरस से क्रॉस-रिएक्शन के बारे में सावधानी रखनी होगी और ऐसे जीन्स का चयन करना होगा जो सार्स-कोव-2 के लिए विशिष्ट हों। लेकिन अभी तक इस तरीके की पुष्टि नहीं की गई है और यह शोध का काफी अच्छा विषय है।    

यानी अभी कोई यकीनी तरीका नहीं है। प्रयोगशाला की परिस्थिति में तो शायद उपरोक्त तरीका काम कर जाए लेकिन बड़ी आबादी के स्तर पर यह करना अंसभव होगा। एक समस्या यह भी है कि वायरस लगातार बदलता जा रहा है और हम उसके बारे में सीखने की अवस्था में हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मुफ्त बिजली की बड़ी कीमत – श्रीकुमार नालूर और एन्न जोसे

हालिया चुनावों में मुफ्त बिजली का मुद्दा काफी चर्चा में रहा। विभिन्न राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली की एक से बढ़कर एक योजनाओं का वादा किया। घरेलू उपयोग के लिए 300 युनिट प्रति माह मुफ्त बिजली से लेकर कृषि क्षेत्र के लिए मुफ्त बिजली और लंबित बिलों को माफ करने के वादे किए गए। यहां हम विभिन्न दलों द्वारा किए गए वादों की तुलना करने के बजाय इनसे होने वाले लाभ और हानि पर चर्चा कर रहे हैं।

कृषि क्षेत्र के लिए मुफ्त बिजली: पहले ही एक समस्या है

घरेलू उपभोक्ताओं को एक निर्धारित खपत सीमा के भीतर मुफ्त बिजली प्रदाय के मुद्दे पर जाने से पहले हम कृषि क्षेत्र में बिजली सब्सिडी पर चर्चा करेंगे। सब्सिडी के दम पर अधिकांश राज्यों में कृषि उपयोग के लिए बिजली शुल्क 1 रुपए/युनिट से भी कम है जबकि पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में यह बिलकुल मुफ्त है। हालांकि यह खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के नज़रिए से महत्वपूर्ण है लेकिन मुफ्त बिजली के कई प्रतिकूल प्रभाव भी हैं। इसके कारण बिजली और पानी का अकुशल उपयोग और वितरण कंपनियों की लापरवाही के कारण बार-बार बिजली गुल और मोटर जलने की समस्या तो होती ही है, राज्य सरकारों पर लगातार अत्यधिक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता रहता है। देश के लगभग तीन चौथाई कृषि कनेक्शन बिना मीटर के हैं जिसके चलते वितरण कंपनियां खपत के अनुमानों को अक्सर बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करती हैं ताकि सब्सिडी की मांग बढ़ा सकें और वितरण घाटे को कम करके बता सकें। गौरतलब है कि मीटरिंग करने के प्रयासों को हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है क्योंकि ऐसा मान लिया जाता है कि यह शुल्क वसूलने की दिशा में पहला कदम है। पिछले 15 वर्षों का अनुभव बताता है कि एक बार मुफ्त बिजली देने के बाद इसे देने के निर्णय को रद्द करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, और सामान्यत: अधिक से अधिक उपभोक्ताओं को शामिल करने के लिए इस सुविधा को जारी ही रखा जाता है। स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने (ऑप्ट-आउट विकल्प) की योजनाओं द्वारा सब्सिडी खत्म करने के काफी प्रयास किए गए हैं लेकिन कोई ठोस परिणाम देखने को नहीं मिले हैं। मुफ्त बिजली के प्रावधान और मीटरिंग के मुद्दे मिलकर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के कार्यान्वयन को मुश्किल बना देते हैं। इन सभी चुनौतियों के मद्देनज़र कृषि क्षेत्र में बिजली आपूर्ति एक जटिल समस्या बन गई है। इसमें शामिल सभी लोग, वे चाहे किसान हों या वितरण कंपनियां या फिर सरकारें, सभी काफी निराश हैं और उनका एक-दूसरे पर से भरोसा उठ गया है।

घरेलू उपयोग के लिए मुफ्त बिजली की समस्या

बिजली आपूर्ति की बढ़ती लागत को देखते हुए छोटे उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर बिजली प्रदान करना आवश्यक है। वर्तमान लागत लगभग 7-8 रुपए प्रति युनिट है (सालाना 6 प्रतिशत बढ़ रही है), जो कम आय वाले परिवारों के लिए वहन कर पाना संभव नहीं है। आर्थिक मंदी और महामारी ने तो स्थिति को बदतर बना दिया है। लेकिन देखा जाए तो कम आय वाले घरों में प्रकाश उपकरण, पंखे, मोबाइल चार्जिंग और टीवी जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए 50 युनिट प्रति माह की आवश्यकता होती है जो रेफ्रिजरेटर होने पर बढ़कर 100 युनिट प्रति माह तक हो जाती है। ऐसे उपभोक्ताओं के लिए कम शुल्क योजना (जैसे आपूर्ति की लागत का आधा) को उचित ठहराया जा सकता है। यदि एयर-कंडीशनर जैसे उच्च खपत वाले उपकरण हों तो मासिक खपत 200 से 300 युनिट होती है। दिल्ली और पंजाब में तो प्रति माह 200 युनिट बिजली मुफ्त में प्रदान की ही जा रही है।

गौरतलब है कि दिल्ली में मुफ्त बिजली प्रदान करने के कारण राज्य की कुल सब्सिडी बढ़कर लगभग 2820 करोड़ रुपए प्रति वर्ष हो गई है। यह राज्य सरकार के कुल खर्च का 11 प्रतिशत है। इसी तरह, पंजाब में कुछ परिवारों को मुफ्त बिजली दी जाती है व यहां कुल सब्सिडी का 18 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त बिजली के लिए निर्धारित किया गया है। तमिलनाडु की कुल सब्सिडी में से लगभग आधी आवासीय बिजली आपूर्ति के लिए निर्धारित की गई है जबकि उत्तर प्रदेश में यह लगभग 90 प्रतिशत है।

यदि मुफ्त बिजली प्राप्त करने वाले आवासीय उपभोक्ताओं की संख्या और खपत सीमा में वृद्धि होती है तो यकीनन राज्य सरकारों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। घरों में मीटरिंग और बिलिंग के मुद्दे तो पहले से ही हैं। मुफ्त बिजली के साथ ये समस्याएं और बढ़ सकती हैं क्योंकि संभावना है कि वितरण कंपनियां कम राजस्व वाले उपभोक्ताओं की समस्याओं पर कम ध्यान देंगी। छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाना और ऊर्जा दक्षता बढ़ाना अच्छे पर्यावरण अनुकूल विकल्प हो सकते हैं लेकिन उच्च आय वाले परिवारों को मुफ्त बिजली मिली तो वे इन विकल्पों का उपयोग शायद न करें। लगता है कि कृषि क्षेत्र में बिजली आपूर्ति की जानी-पहचानी त्रासदी अब यहां भी देखने को मिलेगी जिसमें अंतत: सबसे अधिक नुकसान गरीब उपभोक्ताओं और आम लोगों का ही होगा।

मुफ्त बिजली: एक अल्पकालिक राहत

जीवन स्तर में सुधार और उत्पादक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए अच्छी बिजली आपूर्ति और सेवा आवश्यक है। इसके लिए ज़रूरी है कि वितरण कंपनियां वित्तीय रूप से सुदृढ़ हों तथा सभी उपभोक्ताओं (विशेष रूप से छोटे और ग्रामीण) के लिए गुणवत्तापूर्ण सेवा सम्बंधी जवाबदेही के उपाय मौजूद हों। मुफ्त या कम शुल्क वाली बिजली अधिक से अधिक एक अल्पकालिक राहत है जो उन लोगों को प्रदान की जानी चाहिए जिनको इसकी सख्त ज़रूरत है। जिस सरकार को लोगों के दीर्घकालिक हितों की चिंता है उसे मुफ्त बिजली लाभार्थियों की संख्या को सीमित करने के प्रयास करने चाहिए। कुछ विचार इसमें सहायक हो सकते हैं।

आवासीय उपभोक्ताओं को बिल में प्रति माह 200 रुपए की फिक्स्ड छूट प्रदान की जानी चाहिए। बड़े उपभोक्ताओं की तुलना में छोटे उपभोक्ताओं पर इसका प्रभाव काफी महत्वपूर्ण होगा। चूंकि छूट को खपत से अलग कर दिया जाएगा, इसलिए वितरण कंपनियों को खपत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का कोई लालच नहीं रहेगा। इस तरह की छूट घरेलू उद्योगों को भी दी जा सकती है जो अधिकांश राज्यों में बड़े व्यावसायिक उपभोक्ताओं के बराबर उच्च शुल्क चुका रहे हैं। इसके साथ ही ऊर्जा कुशल पंखे या रेफ्रिजरेटर अपनाने के लिए अतिरिक्त छूट दी जा सकती है और इनकी लागत को कम करने के लिए राज्य स्तरीय थोक खरीद कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।

छोटे उपभोक्ताओं और वितरण कंपनियों के बीच आपसी अविश्वास के माहौल को बदलना होगा। इसके लिए मामलों का तुरंत समाधान और एकमुश्त निपटान होना चाहिए। यदि कोई बिल पिछले बिलों की तुलना में तीन गुना से अधिक है तो वितरण कंपनियों को शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना समाधान करना चाहिए।

दुर्भाग्य से घरों में मुफ्त बिजली जैसे वादे चुनावों पर हावी हो जाते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच गरीबों के हित में है क्योंकि इन वादों को पूरा करने से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता बिगड़ती है और बिजली क्षेत्र की वित्तीय हालत और डांवाडोल हो जाती है। इसकी कीमत अंतत: हितग्राहियों को ही चुकानी पड़ेगी। हम उम्मीद करते हैं कि आम जनता ऐसे वादों पर सवाल उठाएगी जिनको निभाना संभव नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ग्रीष्म लहर के जोखिम के प्रबंधन के पहलू – ज़ुबैर सिद्दिकी

मानव जनित जलवायु परिवर्तन ने ग्रीष्म लहर, दावानल और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं की संभावना को बढ़ाया है और इन्हें अधिक गंभीर बनाया है। इसका जन स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है लेकिन इसे कम करके आंका गया है। अधिकांश देश इन आपदाओं से निपटने के लिए अग्रिम योजना बनाने, अनुकूलन के उपाय करने और साक्ष्य-आधारित जानकारी का उपयोग करके अपने लोगों की हिफाज़त मुकम्मल करने में नाकाम रहे हैं।

इस वर्ष भारत, पाकिस्तान, यूएसए, चीन और युरोप ने घातक ग्रीष्म लहर का सामना किया जिसने न सिर्फ ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाया बल्कि आपातकालीन सेवा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इस ग्रीष्म लहर से मरने वालों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक रही। इसके अलावा कई लोगों को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ा है।

अत्यधिक गर्मी से हीटस्ट्रोक यानी लू की संभावना तो जानी-मानी है। लेकिन वास्तव में गर्मी से होने वाली कई मौतें हृदय सम्बंधी दिक्कतों के कारण भी होती हैं।

होता यह है कि त्वचा को ठंडा रखने के लिए हृदय को ज़्यादा काम करना होता है ताकि त्वचा तक ज़्यादा खून पहुंचे और ठंडक पैदा हो। लेकिन साथ ही रक्तचाप को एक सीमा में रखना होता है। इसके लिए हृदय को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है, चाहे शरीर का अंदरुनी तापमान बहुत अधिक न हो।

इसके अलावा तापमान के बढ़ने से सांस एवं गुर्दे की बीमारी, दुश्चिंता और हिंसक व्यवहार में वृद्धि होती है और साथ ही मृत शिशु जन्म, समयपूर्व प्रसव और जन्म के समय कम वज़न जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ता है। दावानल पर किए गए शोध अध्ययनों ने तो अत्यधिक गर्मी का सम्बंध बाल मृत्यु दर, श्वसन रोग और कैंसर जैसी समस्याओं में वृद्धि से दर्शाया है। इन हालिया अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि अभी तक गर्मी के करण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को काफी कम करके आंका गया है।

निम्न और मध्यम आय वाले कई देश अपर्याप्त वैश्विक सहयोग और वित्तीय क्षमता के चलते इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं। लेकिन कई अन्य देश पर्याप्त एवं स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद वैश्विक कार्यक्रमों को समर्थन देने या अनुकूलन के उपाय अपनाने में विफल रहे हैं। सरकारों द्वारा जलवायु परिवर्तन के तथ्य से इन्कार या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने और अपर्याप्त राजनैतिक इच्छाशक्ति ने जनता को वैज्ञानिक जानकारियों से मिल सकने वाले लाभों से वंचित रखा है। राजनेताओं ने भी स्वास्थ्य जोखिमों को कम करके बताया है। इसके अलावा कई नामचीन संगठनों और मीडिया घरानों ने भी गुणवत्तापूर्ण जानकारी देने की बजाय अवैज्ञानिक तथ्यों को प्रसारित किया। यह जानकारी लोगों को गर्मी से जूझने में मदद कर सकती थी।

वर्ष 2021 में दी लैंसेट में ऊष्मा-अनुकूलन से सम्बंधित लेखों की एक शृंखला प्रकाशित की गई थी। इन लेखों में गर्मी से होने वाली तकलीफ और हृदय पर पड़ने दबाव को कम करने के कई साक्ष्य-आधारित उपायों पर चर्चा की गई है। इसके लिए पानी में डुबकी लगाना, कपड़ों को भिगोना या पैरों को पानी में डालकर रखना और पंखों के उपयोग को शीतलन की प्रमुख रणनीतियों में शामिल किया गया था। वैसे ठंडा पानी पीकर भी हीटस्ट्रोक के जोखिम को कम किया जा सकता है लेकिन इससे शरीर के तापमान पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं संस्थाएं लोगों को ग्रीष्म लहर के खतरों और इससे बचाव के बारे में शिक्षित करें।

कई अध्ययनों ने अश्वेत और गरीब लोगों पर ग्रीष्म लहरों के असामान्य रूप से अधिक प्रभाव को दर्शाया है। हालात ऐसे हैं कि अत्यधिक गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोगों के पास खुद को बचाने के साधन भी नहीं हैं। विशेष रूप से, खुले आसमान के नीचे काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। उन पर उच्च तापमान और खुले में काम करने का जोखिम निरंतर बढ़ता जा रहा है। इन श्रमिकों के लिए शीतलन व्यवस्थाओं तक पहुंच भी काफी दुर्गम है। इन परिस्थितियों में श्रमिकों की आजीविका को सुरक्षित करते हुए वैधानिक परिवर्तन करने की तत्काल आवश्यकता है।

कई वैश्विक फंडर्स जलवायु से सम्बंधित शोध अध्ययनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन इन अध्ययनों के आधार पर नीतिगत एवं सार्थक परिवर्तन के लिए आवश्यक राजनैतिक संवाद का अभाव स्पष्ट है।

वर्ष 2022 में ग्रीष्म लहर और दावानल के पूर्वानुमानों के बाद भी पर्याप्त योजनाएं तैयार नहीं की गईं। 28 जुलाई के दिन एक संकल्प पारित करके संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण तक पहुंच को सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषित किया है। इस निर्णय के बाद जनता को नीति निर्माताओं से समुचित कार्रवाई की मांग करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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स्वास्थ्य: चुनौतियां और अवसर – प्रतिका गुप्ता

देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस अवसर पर प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिका दी लैंसेट के संपादकीय में भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के पुनर्गठन पर दी लैंसेट नागरिक आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा हुई है और विक्रम पटेल की टिप्पणी प्रकाशित की गई है। विक्रम पटेल पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया सहित कई स्वास्थ्य संस्थाओं से सम्बद्ध रहे हैं और हारवर्ड मेडिकल स्कूल के डिपार्टमेंट ऑफ ग्लोबल हेल्थ एंड सोशल मेडिसिन में प्रोफेसर हैं।

संपादकीय कहता है कि यद्यपि भारत में स्वतंत्रता के बाद शिशु मृत्यु दर जैसे कई स्वास्थ्य संकेतकों में पर्याप्त सुधार दिखा है लेकिन कई अन्य क्षेत्रों में प्रगति नाकाफी रही है। इस मामले में राज्यों और क्षेत्रों की स्थिति भी काफी अलग-अलग है। वर्तमान प्रधान मंत्री का दृष्टिकोण है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत एक बड़ी भूमिका निभाए, और वह अधिक कुशल, प्रतिस्पर्धी और लचीला बने। 2020 में राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने कहा था कि यदि देश खुद को ‘आत्मनिर्भर’ बना लेता है तो 21वीं सदी भारत की हो सकती है।

लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत को अपने नागरिकों की स्वास्थ्य और विकास सम्बंधी ज़रूरतों पर ध्यान देना होगा। करोड़ों भारतीय अब भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। सुर्खियां बटोरने वाली नीतियों के बावजूद राज्य व उसके नेतागण बड़ी संख्या में अपने नागरिकों तक नहीं पहुंच सके हैं।

कोविड-19 ने भारत की कई क्षमताओं और कमज़ोरियों को उजागर किया। कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों में भारत एक था। इतने बड़े पैमाने पर फैली महामारी का प्रबंधन करने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली बिल्कुल तैयार नहीं थी और आवश्यक सुविधाओं/उपकरणों का अभाव था। महामारी के कारण सामान्य टीकाकरण, पोषण कार्यक्रम और गैर-संचारी रोगों की निगरानी जैसी स्वास्थ्य सेवाओं में आए व्यवधान के बाद अब बहाली योजनाओं की तत्काल आवश्यकता है।

देखा जाए तो भारत का कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम सफल रहा है और साथ-साथ डिजिटल प्रौद्योगिकी और टेलीमेडिसिन का विकास भी हुआ है जिसके चलते देश के कई इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने और निगरानी करने में मदद मिली है। सरकार अब स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे को विस्तार देने पर ध्यान दे रही है।

2018 के बाद से 1,20,000 से अधिक स्वास्थ्य और वेलनेस केंद्र खोले गए हैं जो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं। साल के अंत तक 1,50,000 केंद्र और तैयार हो जाएंगे। अलबत्ता समय ही बताएगा कि क्या ये केंद्र वाकई स्वास्थ्य में सुधार कर पाएंगे। सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इन केंद्रों में स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ता मौजूद हों। 2014 से 2022 के बीच चिकित्सा में स्नातक पदों में 75 प्रतिशत और स्नातकोत्तर पदों में 93 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन यह सुनिश्चित करने में समय लगेगा कि चिकित्सा केंद्रों में पर्याप्त पेशेवर कामकाजी चिकित्सक उपलब्ध हों। प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त गैर-चिकित्सक स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को प्रशिक्षित करना भी ज़रूरी है।

भारत में लिंग-भेद अब भी स्वास्थ्य और विकास में एक बड़ी बाधा है। लड़कियों (महिलाओं) के जीवित रहने में दिक्कतें और लैंगिक भेदभाव बरकरार है। कुपोषण और एनीमिया बहुत अधिक हैं और पूरक आहार कार्यक्रमों के बावजूद स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम है और श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी में काफी गिरावट आई है। घरेलू हिंसा, बाल विवाह और स्कूल ड्रॉपआउट जैसे क्षेत्रों में जो तरक्की हुई थी वह महामारी के कारण पलट गई है।

आंकड़े बताते हैं कि बढ़ते एकल परिवार वाले समाज में खासी संख्या में बुज़ुर्ग महिलाओं – खास कर विधवा और अकेली महिलाओं – के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इन लैंगिक पूर्वाग्रहों को पलटने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत मानदंडों में व्यापक बदलाव की ज़रूरत होगी। महिलाओं की स्वायत्तता को बेहतर बनाने के लिए बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाना महत्वपूर्ण है जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पानी और स्वच्छता के साथ-साथ श्रम और रोज़गार जैसे क्षेत्र शामिल हों। लेकिन ऐसे राजनैतिक माहौल में कुछ भी नहीं बदलने वाला, जो इस अंतर को स्वीकार तक नहीं करता, इसे पाटने के लिए काम करने की बात तो छोड़ ही दें।

वर्ष 2023 के दौरान भारत शायद दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। युवा आबादी बढ़ने से जनांकिक लाभ मिला है, लेकिन अब प्रजनन दर थम रही है। नतीजतन, भारत के पास परिस्थिति से लाभ उठाने का सीमित समय है। और लाभ उठाने के लिए अपने लोगों के स्वास्थ्य और खुशहाली में निवेश की आवश्यकता होती है। मात्र राष्ट्रवादी आव्हानों से और ऐसी लुभावनी स्वास्थ्य देखभाल नीतियों से काम नहीं चलेगा जिनमें जवाबदेही का अभाव हो। सरकार को सभी नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार की रक्षा करनी होगी। सरकार को स्वास्थ्य में उपचार से रोकथाम के उपायों की ओर बढ़ना चाहिए। सिविल सोसायटी की भूमिका को अंगीकार करने की ज़रूरत है। युवाओं में निवेश करना चाहिए ताकि वे अर्थव्यवस्था और समाज में पूर्ण भागीदारी कर सकें। ज़रूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार को स्वास्थ्य के सामाजिक, राजनीतिक, वाणिज्यिक और सांस्कृतिक निर्धारकों को संबोधित करना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि जब तक प्रत्येक भारतीय – लिंग, जाति, वर्ग, धर्म या क्षेत्र से स्वतंत्र – राज्य के समर्थन से सक्षम नहीं बनता और अपनी पूरी संभावनाओं को साकार नहीं करता, तब तक वैश्विक शक्ति बनने की उम्मीद एक मरीचिका ही रहेगी। (स्रोत फीचर्स)

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समुद्रों में परागण

भूमि पर तो परागण का काम मधुमक्खियां और पक्षी करते हैं। लेकिन समुद्र के अंदर परागण की यह महत्वपूर्ण क्रिया कौन सम्पन्न करता है? आम तौर पर समुद्र में पौधों में परागण जीवों की मदद के बगैर होता है। नर और मादा पौधे अपने शुक्राणु और अंडाणु पानी में छोड़ देते हैं और पानी की हिलोरों से अंडाणु और शुक्राणु संयोग से मिल जाते हैं।

अपवादस्वरूप, पूर्व में छोटे जलीय कृमि और क्रस्टेशियन को समुद्री घास के परागणकर्ता के रूप में पहचाना गया था। और अब एक नया परागणकर्ता मिला है: लाल शैवाल के बीच तैरने वाला लगभग 4 से.मी. लंबा क्रस्टेशियन जिसे आइसोपॉड कहते हैं। लाल शैवाल के शुक्राणु आइसोपॉड के शरीर पर चिपक जाते हैं। यह जब भोजन के लिए किसी अन्य पौधे पर जाता है तो निषेचन भी हो जाता है।

दरअसल फ्रांस की राष्ट्रीय शोध एजेंसी में मिरियम वेलेरो युरोप में लहरों के पानी से बने पोखरों में पनपने वाली लाल शैवाल ग्रेसिलेरिया ग्रैसिलिस की आनुवंशिकी का अध्ययन कर रही हैं। ग्रेसिलेरिया में मादा शैवाल अपने अंडाणु पानी में नहीं छोड़ती, बल्कि उन्हें कीप के आकार के तंतुओं के अंदर रखती है। और नर शुक्राणु किसी तरह उन तक पहुंचते हैं जबकि शुक्राणुओं में तैरने में सहायक पूंछ भी नहीं पाई जाती।

वेलेरो ने देखा कि शैवाल पर अक्सर आइसोपोड्स (इडोटिया बाल्थिका) रेंगते रहते हैं। उनका अनुमान था कि ये ही लाल शैवाल का परागण करते होंगे। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर आइसोपॉड के शरीर पर शुक्राणु चिपके भी दिखे।

अपने अनुमान की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने अपरागित मादा शैवाल लीं और इन्हें पानी से भरी टंकियों में नर शैवाल के साथ रखा। फिर कुछ टंकियों में आइसोपॉड छोड़े। पाया गया कि आइसोपॉड्स वाले लाल शैवाल प्रजनन में लगभग 20 गुना अधिक सफल रहे। ये नतीजे साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

वेलेरो का अनुमान है कि इससे दोनों को ही लाभ पहुंचता होगा। अधिकांश इडोटिया रंग में लाल शैवाल जैसे होते हैं। तो आइसोपोड्स को शिकारियों से छिपने में मदद मिलती होगी। दूसरी ओर आइसोपॉड्स शैवाल पर उगने वाले एक-कोशिकीय शैवाल को खाते हैं। देखा गया है कि आइसोपॉड्स द्वारा ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल के भक्षण से लाल शैवाल स्वच्छ रहती है और तेज़ी से वृद्धि करती है।

लेकिन सवाल है कि समुद्र में जीवों द्वारा परागण इतना दुर्लभ क्यों है? संभवत: यह पानी की भौतिकी के कारण है – पानी हवा से बहुत अधिक सघन है। ज़ाहिर है, मकरंद से जो ऊर्जा मिलेगी, वह एक फूल से दूसरे फूल तक यात्रा करने में लगने वाली ऊर्जा से अधिक नहीं होगी।

अन्य शोधकर्ता चेताते हैं कि उक्त अध्ययन सिर्फ यह बताता है कि आइसोपोड प्रयोगशाला में शैवाल को परागित कर सकते हैं; इससे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति में भी वे इसे इतनी ही कुशलता से कर पाते हैं। हो सकता है शैवाल के शुक्राणु को फैलाने में लहरें ही अधिक प्रभावी हों। (स्रोत फीचर्स)

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जीवों में तापमान नियंत्रण काफी देर से अस्तित्व में आया

नियततापी (एंडोथर्म) जीव उन्हें कहते हैं जो अपने शरीर का तापमान आंतरिक प्रक्रियाओं के द्वारा नियंत्रित करते हैं। यह स्तनधारियों, पक्षियों के अलावा कुछ विलुप्त डायनासौर की खासियत है। इस तरह तापमान का नियमन करने के लिए उन्हें अधिक ऊर्जा लगती है, लेकिन यह विशेषता उन्हें जाड़ों और रात के समय भी सक्रिय रहने में मदद करती है। इसके विपरीत, एक्सोथर्मिक (बाह्यतापीय) जीव ऐसा नहीं कर सकते; इनके शरीर का तापमान वातावरण के तापमान के अनुसार बदलता रहता है। जीवाश्म विज्ञानी इस बात से तो सहमत हैं कि प्रारंभिक कशेरुकी जीव बाह्यतापीय थे। लेकिन संशय इस बात पर है कि जीवों में तापमान नियमन की क्षमता कब विकसित हुई।

आम तौर पर देखा गया है कि नियततापी जीवों में हड्डियां तेज़ी से बढ़ती हैं और उनके शरीर पर बाल या पिच्छ (फेदर) पाए जाते हैं। इसलिए नियततापिता का निर्धारण करने के लिए जीव वैज्ञानिक इन्हीं गुणधर्मों का अध्ययन करते आए हैं। लेकिन ये गुणधर्म नियततापिता के सटीक संकेतक नहीं हैं और संभवत: इनका प्रादुर्भाव अन्य कारणों से हुआ था।

अब शोधकर्ताओं के एक दल ने इसी काम के लिए एक सर्वथा नई विधि का उपयोग किया है। यह है आंतरिक कान में पाई जाने वाली अर्धवृत्ताकार नलिकाएं (सेमीसर्कुलर कैनाल्स)। ये तीन नलिकाएं होती हैं जो जीव को अपनी स्थिति भांपने तथा संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। जीवाश्म वैज्ञानिक इनकी मदद से प्राचीन जीवों में विचरण के पैटर्न का अनुमान लगाते आए हैं।

नेशनल म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के जीवाश्म विज्ञानी रोमन डेविड के दल ने इनकी मदद से नियततापिता के निर्धारण का प्रयास किया है। जीवाश्म नमूनों के अध्ययन के दौरान डेविड का ध्यान अर्धवृत्ताकार नलिकाओं की साइज़ और संरचना में विविधता  पर पड़ा। खास तौर से उनका ध्यान इस बात पर गया कि शरीर के आकार के हिसाब से अन्य कशेरुकियों की तुलना में स्तनधारियों की अर्धवृत्ताकार नलिकाएं छोटी होती हैं। जैसे, व्हेल (एक स्तनधारी) आकार में व्हेल-शार्क (एक मछली) से बड़ी होती है लेकिन अर्धवृत्ताकार नलिकाओं के मामले में व्हेल-शार्क बाज़ी मार लेती है। दरअसल जीव जगत में सबसे बड़ी अर्धवृत्ताकार नलिकाएं व्हेल-शार्क की होती हैं।

इसके अलावा उनका ध्यान नलिकाओं के अंदर भरे तरल (एंडोलिम्फ) पर भी गया। एंडोलिम्फ का गाढ़ापन तापमान के साथ बदलता है। जैसे तेल गरम होने पर पतला और ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। डेविड का अनुमान था कि एंडोलिम्फ के गाढ़ेपन और अर्धवृत्ताकार नलिका के आकार के बीच कोई सम्बंध है, और दोनों नियततापिता का संकेत दे सकते हैं।

इस परिकल्पना को जांचने के लिए डेविड और उनकी टीम ने अल्पाका, टर्की और छिपकली समेत 277 जीवित प्रजातियों की कान की अर्धवृत्ताकार नलिकाओं का अध्ययन किया। देखा गया कि नियततापी जीवों का एंडोलिम्फ पतला था और उनकी अर्धवृत्ताकार नलिकाएं छोटी और पतली थी। दूसरी ओर, बाह्यतापीय जीवों का एंडोलिम्फ गाढ़ा था और अर्धवृत्ताकार नलिकाएं बड़ी और मोटी थी।

नियततापिता कब विकसित हुई यह जानने के लिए उन्होंने इस जानकारी को जीवाश्मित नमूनों पर लागू किया। चूंकि ये नलिकाएं नरम ऊतकों से बनी होती हैं, इसलिए अक्सर ये जीवाश्मित नहीं हो पाती; लेकिन ये जिस खोखली हड्डी के अंदर होती हैं वे जीवाश्मित हो जाती हैं। और इन खोखली हड्डियों की मदद से नलिकाओं के आकार-आकृति का अनुमान लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने 64 विलुप्त प्रजातियों की जांच की। इनमें स्तनधारी, 23 करोड़ वर्ष पूर्व के स्तनधारी-समान पूर्वज और उसके भी पूर्व के गैर-स्तनधारी पूर्वज शामिल थे।

नेचर में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ट्राएसिक काल के अंत में, लगभग 23 करोड़ वर्ष पूर्व, छोटी और पतली अर्धवृत्ताकार नलिकाओं वाले जीव अस्तित्व में आए थे, इसी समय गैर-स्तनधारी पूर्वज से स्तनधारी-समान पूर्वज विकसित हुए थे। और यह परिवर्तन अपेक्षाकृत रूप से अचानक, 10 लाख से भी कम वर्षों में, हुआ था। अर्थात यदि छोटी व पतली अर्धवृत्ताकार नलिकाओं को नियततापिता का लक्षण माना जाए तो यह सबसे पहले स्तनधारी जीवों में लगभग 23 करोड़ वर्ष नज़र आई होगी। यह पूर्व में लगाए गए अनुमान से 2 करोड़ वर्ष बाद का समय है। वैसे एक बात पर ध्यान देना ज़रूरी है – यह नहीं कहा जा रहा है कि अर्धवृत्ताकार नलिकाएं नियततापिता या तापमान नियंत्रण में कोई भूमिका निभाती हैं। आशय सिर्फ यह है कि ये पतली-छोटी नलिकाएं और नियततापिता साथ-साथ प्रकट होते हैं और छोटी नलिकाओं को नियततापी जीवों का द्योतक माना जा सकता है।

अन्य शोधकर्ताओं के मुताबिक क्रमिक विकास की बजाय ऐसे अचानक परिवर्तन की बात को साबित करने के लिए अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। बहरहाल नियततापिता के भावी अध्ययनों में अर्धवृत्ताकर नलिका का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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समुद्री ज्वालामुखी विस्फोट से पानी पहुंचा वायुमंडल में

नवरी में दक्षिणी प्रशांत महासागर में टोंगा द्वीप के नज़दीक समुद्र के नीचे स्थित टोंगा-हुंगा हाआपाई ज्वालामुखी में ज़ोरदार विस्फोट हुआ। इस विस्फोट ने दक्षिण प्रशांत क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था, दुनिया भर में सुनामी की तरंगें दौड़ गईं। यह अब तक का सबसे शक्तिशाली विस्फोट था जिसका मलबा वायुमंडल में लगभग 50 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई तक गया था।

एक नया अध्ययन बताता है कि विस्फोट से निकलने वाली राख और गैसों के साथ अरबों किलोग्राम पानी भी वायुमंडल में गया है। यह संभवतः वर्षों तक वायुमंडल में बना रहकर ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाएगा और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करेगा।

यह अध्ययन नासा के ऑरा सैटेलाइट में लगे माइक्रोवेव लिम्ब साउंडर (MLS) उपकरण की मदद से संभव हुआ है। MLS पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 100 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर मौजूद विभिन्न यौगिकों को मापता है। वैज्ञानिकों की विशेष रुचि विस्फोट से वायुमंडल में पहुंचे सल्फर डाईऑक्साइड और पानी में थी, क्योंकि ये जलवायु को प्रभावित कर सकते हैं। MLS के आंकड़ों की मदद से शोधकर्ता ज्वालामुखी का गुबार, इसमें पानी की मात्रा, और गुबार की वृद्धि को देख पाए।

जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में नासा की जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी के लुइस मिलन के दल ने बताया है कि इस गुबार ने पृथ्वी के समताप मंडल (स्ट्रेटोस्फीयर) में लगभग 146 अरब किलोग्राम पानी फेंका है। समताप मंडल समुद्र सतह से कई किलोमीटर ऊपर होता है और प्राय: शुष्क रहता है। पानी इतना था कि इससे तकरीबन 58,000 ओलंपिक स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं, और यह समताप मंडल में मौजूद संपूर्ण नमी का लगभग 10 प्रतिशत है।

शोधकर्ता बताते हैं कि अन्य ज्वालामुखी विस्फोट भी वायुमंडल में पानी फेंकते हैं, लेकिन इस विस्फोट ने अभूतपूर्व मात्रा में पानी फेंका है। यह पानी समताप मंडल में संभवत: पांच वर्ष या उससे अधिक समय तक रहेगा।

बड़े ज्वालामुखी विस्फोट अक्सर जलवायु को ठंडा करते हैं, क्योंकि इनमें निकलने वाली सल्फर डाईऑक्साइड वायुमंडल में जाकर ऐसे यौगिक बनाती है जो सूरज से आने वाली ऊष्मा को परावर्तित करते हैं। लेकिन साथ में इतनी अधिक जलवाष्प वायुमंडल में पहुंची है तो प्रभाव अलग हो सकता है। पानी एक ग्रीनहाउस गैस की तरह काम करेगा और पृथ्वी पर गर्मी बढ़ाएगा। विस्फोट से छाई सल्फर डाईऑक्साइड तो जल्दी ही समाप्त हो जाएगी, जबकि पानी 5 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक वायुमंडल में टिका रहेगा।

अन्य वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु पर विस्फोट के वास्तविक प्रभावों का आकलन करने में समय लगेगा। संभव है कि वायुमंडल में गया यह पानी अन्य रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करके ओज़ोन परत को भी नुकसान पहुंचाए, और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने वाली पवन धाराओं के प्रवाह को भी बदल दे। (स्रोत फीचर्स)

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