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नैनोपार्टिकल से चूहे रात में देखने लगे

वैज्ञानिकों ने माउस (एक किस्म का चूहा) की आंखों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें रात में देखने की क्षमता प्रदान करने में सफलता प्राप्त की है। किया यह गया है कि इन चूहों की आंख में कुछ अतिसूक्ष्म कण (नैनोकण) जोड़े गए हैं जो अवरक्त प्रकाश को दृश्य प्रकाश में बदल देते हैं।

आंखों में प्रकाश को ग्रहण करके उसे विद्युतीय संकेतों में बदलने का काम रेटिना में उपस्थित प्रकाश ग्राही कोशिकाओं द्वारा किया जाता है। जब ये संकेत मस्तिष्क में पहुंचते हैं तो वहां इन्हें दृश्य के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। रेटिना पर विभिन्न किस्म के प्रकाश ग्राही होते हैं जो अलग-अलग रंग के प्रकाश के प्रति संवेदनशील होते हैं। मनुष्यों में तीन प्रकार के प्रकाश संवेदी रंजक पाए जाते हैं जो हमें रंगीन दृष्टि प्रदान करते हैं और एक रंजक होता है जो काले और सफेद के बीच भेद करने में मदद करता है। यह वाला रंजक खास तौर से कम प्रकाश में सक्रिय होता है। इसके विपरीत चूहों में तथा कुछ वानरों में मात्र दो रंगीन रंजक होते हैं और एक रंजक मद्धिम प्रकाश के लिए होता है।

पहले वैज्ञानिकों ने चूहों में तीसरे रंजक का जीन जोड़कर उन्हें मनुष्यों के समान दृष्टि प्रदान की थी। मगर यह पहली बार है कि किसी जंतु को अवरक्त यानी इंफ्रारेड प्रकाश को देखने में सक्षम बनाया गया है। आम तौर पर प्रकाश का अवरक्त हिस्सा गर्मी पैदा करने के लिए ज़िम्मेदार होता है।

हेफाई स्थित चीनी विज्ञान व टेक्नॉलॉजी विश्वविद्यालय के ज़्यू तिएन ने मैसाचुसेट्स मेडिकल स्कूल के गांग हान के साथ मिलकर उपरोक्त अनुसंधान किया है। हान ने कुछ समय पहले ऐसे नैनोकण विकसित किए थे जो अवरक्त प्रकाश को नीले प्रकाश में तबदील कर सकते हैं। इस सफलता से प्रेरित होकर हान और ज़्यू ने सोचा कि यदि ऐसे नैनोकण चूहों के प्रकाश ग्राहियों में जोड़ दिए जाएं तो वे रात में भी देख सकेंगे।

अगला कदम यह था कि नैनोकणों में इस तरह के परिवर्तन किए गए कि वे अवरक्त प्रकाश को नीले की बजाय हरे प्रकाश में तबदील करें। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जंतुओं के हरे प्रकाश ग्राही नीले की अपेक्षा ज़्यादा संवेदनशील होते हैं। इसके बाद इन नैनोकणों पर एक ऐसे प्रोटीन का आवरण चढ़ाया गया जो प्रकाश ग्राही कोशिकाओं की सतह पर उपस्थित एक शर्करा अणु से जुड़ जाता है। जब ये नैनोकण चूहों के रेटिना के पिछले भाग में इंजेक्ट किए गए तो ये प्रकाश ग्राही कोशिकाओं से जुड़ गए और 10 हफ्तों तक जुड़े रहे। और परिणाम आशा के अनुरूप रहे। चूहों की आंखें अवरक्त प्रकाश के प्रति वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगी जैसी वह दृश्य प्रकाश के प्रति देती है। इसके अलावा रेटिना और मस्तिष्क के दृष्टि सम्बंधी हिस्से में विद्युतीय सक्रियता देखी गई। इसके बाद इन चूहों को सामान्य दृष्टि सम्बंधी परीक्षणों से गुज़ारा गया और यह स्पष्ट हो गया कि वे अंधेरे में देख पा रहे थे।

सेल में प्रकाशित इस पर्चे के निष्कर्षों की चर्चा करते हुए ज़्यू ने कहा है कि उन्हें यकीन है कि यह मनुष्यों में कारगर होगा और यदि होता है तो सैनिकों को रात में बेहतर देखने की क्षमता प्रदान की जा सकेगी। इसके अलावा यह आंखों की कुछ खास दिक्कतों के संदर्भ में उपयोगी साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या कोई जीव नींद के बिना जीवित रह सकता है?

म अगर एक रात भी ठीक से नींद न ले सकें तो अगले दिन काम करने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। लंबे समय तक ठीक से नींद न आए तो ह्मदय रोग और स्ट्रोक से लेकर वज़न बढ़ने और मधुमेह जैसे नकारात्मक प्रभाव दिखने लगते हैं। जानवर भी ऊंघते हैं। इससे तो लगता है कि सभी जानवरों के लिए नींद का कुछ महत्व है।

सवाल यह है कि नींद की भूमिका क्या है? क्या नींद मस्तिष्क को क्षति की मरम्मत और सूचना को सहेजने का अवसर देती है? क्या यह शरीर में ऊर्जा विनियमन के लिए आवश्यक है? वैज्ञानिकों ने नींद की कई व्याख्याएं की हैं लेकिन एक सटीक उत्तर का इंतज़ार आज भी है।

1890 के दशक में रूस की एक चिकित्सक मैरी डी मेनासीना नींद की एक गुत्थी से परेशान थीं। उनका ख्याल था कि जब हम जीवन को भरपूर जीना चाहते हैं तो क्यों अपने जीवन का एक-तिहाई भाग सोकर गुज़ार देते हैं। इस रहस्य को जानने के लिए उन्होंने जानवरों में पहला निद्रा-वंचना प्रयोग किया। मेनासीना ने पिल्लों को लगातार जगाए रखा और यह पाया कि नींद की कमी के कारण कुछ दिनों में उन पिल्लों की मृत्यु हो गई। बाद के दशकों में, अन्य जीवों जैसे कृंतकों और तिलचट्टों पर यह प्रयोग किया गया और परिणाम ऐसे ही रहे। लेकिन इन प्रयोगों में मौत का कारण और नींद से इसका सम्बंध अभी भी अज्ञात है।

नींद का अभाव जानलेवा होता है लेकिन कुछ प्राणी बहुत कम नींद लेकर भी जीवित रह सकते हैं। साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में फल मक्खियों के सोने-जागने पर नज़र रखी गई थी। इम्पीरियल कॉलेज लंदन में सिस्टम्स जीव विज्ञानी जियोर्जियो गिलेस्ट्रो के अनुसार उनके इस प्रयोग में कुछ मक्खियां शायद ही कभी सोई होंगी।

गिलेस्ट्रो और उनके सहयोगियों ने पाया कि 6 प्रतिशत मादा मक्खियां दिन में 72 मिनट से कम समय तक सोती थीं, जबकि अन्य मादाओं की औसत नींद 300 मिनट थी। एक मादा तो एक दिन में औसतन मात्र 4 मिनट सोती थी। आगे शोधकर्ताओं ने मक्खियों के सोने का समय 96 प्रतिशत कम कर दिया। लेकिन ये मक्खियां, पिल्लों की तरह असमय मृत्यु का शिकार नहीं हुर्इं। वे अन्य मक्खियों के बराबर जीवित रहीं। गिलेस्ट्रो व कई अन्य वैज्ञानिक सोचने लगे हैं कि शायद नींद उतनी ज़रूरी नहीं है, जितना पहले सोचा जाता था।

2016 के एक अध्ययन में, रैटनबोर्ग और उनके सहयोगियों ने गैलापागोस द्वीप समूह में फ्रिगेट बर्ड्स (फ्रेगेटा माइनर) के मस्तिष्क में विद्युत गतिविधि के मापन के आधार पर दिखाया था कि समुद्र पर उड़ान भरते समय पक्षियों के मस्तिष्क का एक गोलार्ध सो जाता है। और कभी-कभी एक साथ दोनों गोलार्ध भी सो जाते हैं। अध्ययन में पाया गया कि उड़ान भरने के दौरान फ्रिगेट बर्ड्स औसतन प्रति दिन केवल 42 मिनट सोए, जबकि आम तौर पर ज़मीन पर वे 12 घंटे से अधिक सोते हैं। उड़ते समय नींद अन्य पक्षी प्रजातियों के बीच भी आम बात हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों के पास इसके लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है लेकिन सामान्य स्विफ्ट (एपस एपस) बिना रुके 10 महीने तक उड़ सकती है।

कुल मिलाकर अभी तक तो यही लगता है कि बिलकुल भी न सोने वाला कोई जीव नहीं है। चाहे थोड़ी-सी ही सही, मगर जैव विकास के इतिहास में नींद का बने रहने दर्शाता है कि इसकी कुछ अहम भूमिका है और न्यूनतम नींद अनिवार्य है। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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परमाणु की एक पुरानी गुत्थी सुलझी

भौतिकी की एक गुत्थी रही है जिसे भौतिक शास्त्री 1983 से जानते हैं। यह तो जानी-मानी बात है कि परमाणु में एक केंद्रक होता है जिसके अंदर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन नामक कण होते हैं और इलेक्ट्रॉन केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हैं। गुत्थी यह रही है कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का व्यवहार केंद्रक के अंदर और बाहर बहुत अलग-अलग होता है।

यह थोड़ी विचित्र बात है क्योंकि चाहे केंद्रक के अंदर हों या बाहर प्रोटॉन और न्य़ूट्रॉन तो वही रहते हैं। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन क्वार्क्स नामक कणों से बने होते हैं और इन कणों को साथ-साथ रखने का काम स्ट्रॉन्ग बल करते हैं। अवलोकन यह है कि जैसे ही क्वार्क्स केंद्रक के अंदर पहुंचते हैं, उनकी गति बहुत धीमी पड़ जाती है। क्वार्क्स की गति का निर्धारण मुख्य रूप से स्ट्रॉन्ग बल द्वारा होता है। दूसरी ओर, केंद्रक में न्यूट्रॉन व प्रोटॉन को साथ रखने का काम करने वाला बल अत्यंत दुर्बल होता है। तीसरा कोई बल होता नहीं जो क्वार्क्स को धीमा करे, लेकिन तथ्य यही है कि केंद्रक के अंदर क्वार्क्स की गति धीमी पड़ जाती है। भौतिकी समुदाय इसे ईएमसी प्रभाव कहता है। यह नाम उस समूह के नाम पर रखा गया है जिसने इसकी खोज की थी – युरोपियन म्युऑन कोलेबोरेशन। तो सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है।

केंद्रक में उपस्थित किन्हीं भी दो कणों को बांधकर रखने वाला बल करीब 80 लाख इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर होता है। दूसरी ओर न्यूट्रॉन या प्रोटॉन के अंदर क्वार्क्स को आपस में जोड़े रखने वाला बल 10,000 लाख इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर होता है। तो ऐसा तो नहीं हो सकता कि क्वार्क्स को आपस में बांधे रखने वाले इतने सशक्त बल को केंद्रक का हल्का-सा बल प्रभावित कर दे।

सापेक्षता का सिद्धांत कहता है कि किसी भी वस्तु के साइज़ पर उसकी गति का असर पड़ता है। यह असर कम गति से हलचल कर रही स्थूल वस्तुओं के संदर्भ में इतना कम होता है कि पता ही नहीं चलता। मगर क्वार्क्स के पैमाने पर यह काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसे सोने के केंद्रक को देखें तो उसके अंदर उपस्थिति प्रोटॉन व न्यूट्रॉन स्वतंत्र प्रोटॉन व न्यूट्रॉन की अपेक्षा 20 प्रतिशत तक छोटे होते हैं।

इस ईएमसी प्रभाव की व्याख्या के लिए भौतिक शास्त्रियों ने तमाम मॉडल विकसित किए हैं मगर आज तक कोई भी मॉडल इस विसंगति की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर सका है। अब एमआईटी के भौतिक शास्त्री ओर हेन और उनकी टीम ने इसकी एक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनका कहना है कि अधिकांश परिस्थितियों में केंद्रक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन एक दूसरे पर व्याप्त नहीं होते। किंतु कभी-कभी वे एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। शोधकर्ताओें का कहना है कि किसी भी क्षण केंद्रक के 20 प्रतिशत प्रोटॉन/न्यूट्रॉन इस अवस्था में रहते हैं। ऐसा होने पर क्वार्क्स के बीच ऊर्जा का विशाल प्रवाह होता है और यह प्रवाह उनकी संरचना और व्यवहार को बदल देता है। यही ईएमसी प्रभाव का कारण है। टीम ने कुछ प्रयोग भी किए और उनके परिणाम उपरोक्त व्याख्या के अनुरूप ही मिले हैं। कुल मिलाकर हेन की टीम का मत है कि ईएमसी प्रभाव कुछ न्यूट्रॉन/प्रोटॉन की इस विशेष अवस्था का परिणाम है। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बेकार है छुट्टियों की लंबी नींद

फ्ते भर की व्यस्त दिनचर्या के कारण लोगों को पूरी नींद नहीं मिल पाती है। नींद की कमी से डायबिटीज़ और दिल की बीमारी जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। अक्सर लोग सप्ताह के अंत में देर तक सोकर हफ्ते भर की नींद की कसर पूरी करते हैं। लेकिन क्या सेहत पर पड़े असर की भरपाई एक-दो रोज़ की भरपूर नींद लेने से हो पाती है?

करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक सिर्फ छुट्टियों में देर तक सोना या भरपूर नींद लेना, नींद की कमी के कारण सेहत पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की भरपाई नहीं करते।

युनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो बोल्डर के केनेथ राइट और उनके साथियों ने छुट्टियों में देर तक सोने वाले लोगों पर स्वास्थ्य सम्बंधी अध्ययन किया। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि रोज़ाना की नींद की कमी के कारण सेहत पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की भरपाई छुट्टियों में देर तक सोने से होती है या नहीं?

इस अध्ययन में उन्होंने युवाओं के तीन समूह बनाए। प्रत्येक समूह में 14 युवा प्रतिभागी थे। पहले समूह (समूह क) के प्रतिभागियों को हर दिन सिर्फ 5 घंटे की नींद लेनी थी। दूसरे समूह (समूह ख) में प्रतिभागियों को रोज़ तो सिर्फ 5 घंटे सोना था लेकिन उन्हें यह छूट थी कि वे छुट्टी के दिन भरपूर नींद ले सकते हैं। जबकि तीसरे समूह (समूह ग) को हर रोज़ भरपूर नींद (लगभग 9 घंटे) लेने को कहा गया। यह सिलसिला 9 दिन तक चला।

उन्होंने पाया की रोज़ाना नींद की कमी वाले समूह क के प्रतिभागियों ने भरपूर नींद वाले समूह ग की तुलना में ज़्यादा खाया, उनका वज़न भी बढ़ गया और वे इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील दिखे। इसके बाद समूह ख (जो रोज़ाना कम सोए थे मगर छुट्टी के दिन भरपूर सो सकते थे) के प्रतिभागियों के स्वास्थ्य की जांच की तो शोधकर्ताओं ने पाया इस समूह के स्वास्थ्य पर पड़े असर पहले समूह जैसे ही हैं। यानी सप्ताह की नींद की भरपाई सप्ताहांत में ज़्यादा सोकर नहीं हो पाई थी। सेहतमंद रहने के लिए रोज़ाना भरपूर नींद ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

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बढ़ता उत्सर्जन पृथ्वी को बहुत गर्म कर देगा

दि हम पेट्रोल/डीज़ल जैसे जीवाश्म र्इंधनों के उपयोग में ऐसी ही लापरवाही बरतते रहे तो शायद उत्सर्जित गैसों की वजह से क्लाउड फीडबैक प्रभाव सक्रिय हो जाएगा। परिणाम यह होगा कि धरती औद्योगिक युग शुरू होने से पहले की तुलना में पूरे 14 डिग्री सेल्सियस गर्म हो जाएगी।

इस प्रभाव के कारण ऊष्णकटिबंध के इलाकों के बड़े हिस्से मनुष्य सहित समस्त स्थिरतापी जीवों के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि अगर देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती के अपने प्रयासों को बढ़ाते हैं तो इस विषय पर अध्ययन की कोई आवश्यकता ही नहीं होगी।

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, पैसाडेना के टैपिओ श्नाइडर और उनकी टीम ने उपोष्णकटिबंधीय महासागरों पर ऐसे बादलों के मॉडल का निर्माण किया जिन्हें स्ट्रैटोकुमुलस बादल कहते हैं। ये बादल पृथ्वी की सतह के लगभग 7 प्रतिशत भाग को ढांक कर रखते हैं और सूरज की गर्मी को वापिस अंतरिक्ष में परावर्तित करके ग्रह को ठंडा रखते हैं। उन्होंने पाया कि उनके मॉडल में जब कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर 1200 पीपीएम पर पहुंचा तो अचानक से स्ट्रैटोकुमुलस बादल बिखर गए और गायब हो गए।

यही कारण है कि यह खोज केवल उपोष्णकटिबंधीय स्ट्रैटोक्यूम्यलस पर लागू होती है, क्योंकि ये बादल असामान्य हैं। ये बादल बने रहते हैं क्योंकि इनकी ऊपरी सतह अवरक्त विकिरण का उत्सर्जन करती है और बादल को ठंडा रखती है। कार्बन डाईऑक्साइड का उच्च स्तर उत्सर्जन की इस प्रक्रिया को रोकता है। इन चमकीले सफेद बादलों के नुकसान से वैश्विक तापमान में 8 डिग्री सेल्सियस का और इज़ाफा होगा। कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर 1200 पीपीएम से अधिक होने पर धरती वैसे ही लगभग 6 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक गर्म हो जाएगी। यानी स्ट्रैटोकुमुलस बादलों की क्षति की वजह से औसत वैश्विक तापमान 14 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर इस वर्ष 410 पीपीएम पार कर जाएगा जो उद्योग-पूर्व युग में 280 पीपीएम था। यदि सभी उपलब्ध जीवाश्म र्इंधन को जलाया जाए तो कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर 4000 पीपीएम से अधिक हो सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों की मानें तो सबसे बदतर स्थिति में भी 1200 पीपीएम कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर वर्ष 2100 के बाद आएगा।

इस खोज से एक पुराने रहस्य को सुलझाने में मदद मिलेगी कि कैसे लगभग 5 करोड़ साल पहले ग्रह इतना गर्म हो गया था कि मगरमच्छ आर्कटिक में पनप गए थे। यह सही है कि उस समय कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर बहुत अधिक था, लेकिन मात्र उसके आधार पर उस अवधि की अत्यधिक गर्मी की व्याख्या नहीं की जा सकती। संभवत: उस समय स्ट्रैटोकुमुलस बादल बिखर गए थे। (स्रोत फीचर्स)

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भोजन में समुद्री घास शामिल करने की ज़रूरत – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

र्यटन वर्तमान में पूरे विश्व में लगभग 37 प्रतिशत जमीन ही कृषि भूमि है। इसका भी सिर्फ एक तिहाई हिस्सा (यानी कुल भूमि का लगभग 11 प्रतिशत) फसलें उगाने में उपयोग होता है। अगले 30 सालों में विश्व की जनसंख्या लगभग 9.7 अरब हो जाएगी और तब खेती के लिए उपलब्ध भूमि और भी कम होगी। इसलिए अब यह ज़रूरी है कि भविष्य के लिए खाद्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए जाए। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक पैदावार को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की ज़रूरत है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी पैदावार बढ़ाएं कैसे।

पौधे सूर्य की रोशनी की ऊर्जा का उपयोग अपनी चयापचय क्रियाओं और भोजन बनाने के लिए करते हैं। पौधों की यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण कहलाती है। किंतु खाद्य उत्पादन की दृष्टि से प्रकाश संश्लेषण की कार्यक्षमता बहुत कम होती है। अधिकतर फसली पौधों में यह क्षमता लगभग 5 प्रतिशत होती है। सबसे अधिक क्षमता (लगभग 8 प्रतिशत) वाली फसल गन्ना है। किंतु गन्ना खाद्य के तौर पर उपयोग में नहीं लिया जाता, सिवाय शक्कर के। काश हम गेहूं, चावल जैसे अनाजों की दक्षता बढ़ा पाते।

अर्बाना स्थित इलिनॉय युनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों का एक समूह इसी तरह की एक योजना, प्रकाश संश्लेषण की उन्नत क्षमता (RIPE), पर काम कर रहा है। इस योजना को बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन वित्तीय सहायता दे रहा है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग

वैज्ञानिकों ने पैदावार बढ़ाने के प्रयास में तम्बाकू के पौधे के तीन जीन के व्यवहार में बदलाव करके एक मॉडल पौधा तैयार किया है। इससे तम्बाकू का उत्पादन 20 प्रतिशत तक बढ़ गया है। वैज्ञानिकों की यह टीम अन्य पौधों में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से बदलाव करने की कोशिश कर रही है। ऐसा ही एक पौधा है कसावा (जिसे टेपिओका, सागो या साबुदाना के नाम से भी जानते हैं)। इस पौधे की जड़ों में भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है। यह लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में लगभग 50 करोड़ लोगों का भोजन है। भारत में आंध्र प्रदेश, केरल और असम के पहाड़ी इलाकों में इसे भोजन के रूप में खाया जाता है। तम्बाकू की तरह, इस पौधे में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से बदलाव किए गए हैं और परिणाम भी सकारात्मक मिले हैं।

उत्पादन बढ़ाने के एक अन्य प्रयास में, वैज्ञानिक पौधे में होने वाले प्रकाशीय श्वसन को कम करने की कोशिश में हैं। प्रकाशीय श्वसन में पौधों द्वारा दिन में प्रकाश क्रिया के दौरान निर्मित रासायनिक ऊर्जा और ऑक्सीजन, रात के समय चलने वाली अंधकार क्रिया के दौरान अनुपयोगी उत्पाद बनाने में खर्च हो जाती है। यदि हम प्रकाशीय श्वसन को कम करने के तरीके ढूंढ पाए तो पैदावार को बढ़ाया जा सकता है।

फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किए जा रहे अधिकतर शोध, पौधों में बाहरी जीन या जीन उत्पाद प्रवेश करवाकर पैदावार बढ़ाने से सम्बंधित है। इन तरीकों से पैदावार बढ़ाने का विरोध वे लोग कर रहे हैं जो पौधों के जीन में बदलाव या बाहरी जीन प्रवेश कराए गए अनाज या खाद्य नहीं खाना चाहते। यह काफी दुविधापूर्ण स्थिति है, जहां एक ओर वैज्ञानिकों को पौधों के जीन में परिवर्तन करके पैदावार बढ़ाने का रास्ता मिला है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सुरक्षा और खाद्यान्नों पर पेटेंट कर एकाधिकार जमाने जैसी चिंताओं के कारण समाज के कुछ लोग इन तरीकों का विरोध कर रहे हैं। इनके बीच का रास्ता खोजना होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो निरंतर बढ़ रही आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति नहीं की जा सकेगी।

समुद्री शैवाल

इस स्थिति में हमें अपनी भोजन-शैली को विस्तार देने और उसमें नई चीज़ें शामिल करने की ज़रूरत है। ज़मीनी पौधों की बजाए सूक्ष्म और बड़ी शैवाल प्रकाश संश्लेषण का बेहतर उपयोग करती हैं। विश्व स्तर पर प्रकाश संश्लेषण में शैवालों का योगदान लगभग 50 प्रतिशत है। इनमें से खास तौर से गहरे हरे, लाल और कत्थई रंग की शैवालों को  खाया जा सकता है। ये शैवाल पोषक तत्वों से लबरेज़ और कम कैलोरी वाले हैं। इन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों, फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन, कोरिया, जापान और अटलांटिक सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में खाया जाता है। इस तरह के भोजन के बारे में नेट पर दी डेफिनेटिव गाइड टू एडिबल सीवीड (foodrepublic.com) साइट पर विस्तार से जानकारी मिल सकती है।

भारत की तटरेखा लगभग 7500 कि.मी. लंबी है। जिसमें गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल तक की तटरेखा लगभग 5200 कि.मी. लंबी है और अंडमान और निकोबार की कुल तटरेखा 2300 कि.मी. है। यहां समुद्री घास की लगभग 844 प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में लगभग 63 प्रतिशत भूमि कृषि-भूमि है लेकिन भारत के इतने बड़े तटीय क्षेत्र को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अधिकतर तटीय क्षेत्रों में समुद्री घास (सीवीड) पाई जाती है। भारत में खाने योग्य सीवीड पर पिछले 40 सालों से शोध हो रहे हैं। गुजरात के भावनगर स्थित दी सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट का कार्य इस क्षेत्र में अग्रणी है। संस्थान के निदेशक डॉ. अमिताव दास बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों से यहां के 20 से अधिक वैज्ञानिक सीवीड की खाद्य संभावना पर शोध और प्रसार की दिशा में कार्य कर रहे हैं। साथ ही वैज्ञानिक सीवीड से पैदावार बढ़ाने वाले रसायन को अलग करने के प्रयास भी कर रहे हैं ताकि अन्य फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सके।

संस्थान के पूर्व प्रोफेसर और वर्तमान में इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल टेक्नॉलॉजी मुम्बई में कार्यरत सी. आर. के. रेड्डी सीवीड को भोजन के रूप में शामिल करने की वकालत करते हैं। उनके अनुसार भरपूर मात्रा में पाए जाने वाले सीवीड में अल्वा, पायरोपिया, पोरफायरा और कैपाफायकस खाने योग्य हैं।  जापान की तरह भारत में भी इन्हें बड़े पैमाने पर उगाया जाना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया के 12 जनवरी 2016 के अंक में डॉ. अरोकियाराज जॉनबॉस्को लिखते हैं कि मन्नार की खाड़ी में पाई जाने वाली 306 प्रजातियों में से 252 खाने योग्य हैं। भारत को उतने ही जोश के साथ समुद्री खेती शुरू करना चाहिए जिस जोश से वह ज़मीनी खेती कर रहा है। और तो और, समुद्री खेती में कीटनाशक, उर्वरक और सिंचाई की ज़रूरत भी नहीं होती।

सीवीड में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, सी और कई खनिज जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम, ज़िंक, सेलेनियम, आयरन होते हैं। साथ ही इनमें काफी मात्रा में वनस्पति प्रोटीन, ओमेगा 3 और 6 फैटी एसिड होते हैं। और सबसे मुख्य बात कि सीवीड वीगन (अतिशाकाहारी) हैं। इनमें मछली की बू तक नहीं है। जिन्हें सीवीड जैसे नए खाद्य भोजन में शामिल करने में झिझक है उन्हें याद दिला दें कि भारत में आलू, चाय और सोयाबीन भी बाहर से आए थे और बहुत जल्द हमारे आहार में शामिल हो गए थे।

प्रोफेसर रेड्डी का सुझाव है कि हम इसकी शुरुआत पिज़्ज़ा सीज़निंग और मसाले की तरह उपयोग से कर सकते हैं ताकि लोग इसके आदी हो जाएं। आखिर जब पूर्वी एशिया में इसे इतनी मात्रा में चाव से खाया जाता है तो दक्षिण एशिया के लोग क्यों नहीं खा सकते। (स्रोत फीचर्स)

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पुरातात्विक कब्र में मिले पैर बांधने के प्रमाण

वैसे तो चीन में लड़कियों-महिलाओं के पैर बांधकर रखने की प्रथा कम से कम 1000 साल पुरानी है और इसके विवरण ऐतिहासिक दस्तावेज़ों तथा कुछ जीवित भुक्तभोगी महिलाओं के बयानों में मिलते हैं। मगर अब शोधकर्ताओं ने एक प्राचीन कब्र के कंकालों में इस प्रथा के प्रमाण देखे हैं। इन कंकालों ने प्रथा पर नई रोशनी डाली है।

मिशिगन विश्वविद्यालय की एलिज़ाबेथ बर्जर और उनके साथियों को हाल ही में चीन के शांक्सी प्रांत में यांगुआनज़ाई स्थल की खुदाई के दौरान मिले एक कब्रिस्तान में मिले कंकालों के अध्ययन के आधार पर पैर बांधने की प्रथा को ज़्यादा गहराई में देखने का अवसर मिला है। यह कब्रिस्तान मिंग राजवंश के काल (1368-1644) का है। बर्जर का कहना है कि इन कंकालों का अवलोकन करते हुए उन्हें पैरों की विचित्र रचना का आभास हुआ। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पैलियोपैथॉलॉजी में प्रकाशित शोध पत्र में बर्जर और उनके साथियों ने बताया है कि आठ में से चार अभिजात्य महिलाओं के कंकालों पर पैर बांधने के चिंह मिले।

शोधकर्ताओं का विचार है कि पैर बांधने की प्रथा अपने शुरुआती रूप में दक्षिणी सोन्ग राजवंश (1127-1279) के समय शुरू हुई थी। शुरू-शुरू में इस प्रथा का उद्देश्य पैर को संकरा बनाना था। इसका हड्डियों पर कोई गंभीर असर नहीं होता था। पैर बांधने की ज़्यादा सख्त प्रथा मिंग राजवंश (1368-1644) के काल में शुरू हुई जिसमें पैर की मेहराब को छोटा-से-छोटा रखने का प्रयास होता था। पहले कुलीन वर्ग तक सीमित यह प्रथा धीरे-धीरे अन्य तबकों में प्रचलित हो गई।

पैरों को बांधना काफी कम उम्र में शुरू कर दिया जाता था। इसके तहत एक तंग पट्टी पैर पर बांधी जाती थी ताकि पैर एक विशेष आकार में मुड़े रहें। सत्रहवीं सदी में पैर बांधने की दो प्रथाएं प्रचलन में रहीं – दक्षिणी और उत्तरी। दक्षिणी शैली में उंगलियां सीधी रहती थीं किंतु उत्तरी शैली में अंगूठे को छोड़कर शेष सारी उंगलियों को तलवे के नीचे मोड़कर रखा जाता था। ऐसी पैर बंधी महिलाएं जीवन भर कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती थीं। इतिहासकारों और अर्थशास्त्रियों ने क्विंग राजवंश के काल में कुलीन वर्ग की महिलाओं में इस प्रथा की उत्पत्ति और इसे प्रभावित करने वाले कारकों पर कई शोध पत्र लिखे हैं। मगर इस बाबत बहुत कम कहा गया है कि स्वयं महिलाएं इस बारे में क्या सोचती थीं। वह जानना तो अब संभव नहीं है किंतु बर्जर ने अपने शोध पत्र में कहा है कि पुरातत्ववेत्ता इतना तो स्पष्ट कर ही सकते हैं कि महिलाओं पर इसके शारीरिक असर क्या होते थे। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पर्यावरण पर्यटन का बढ़ता कारोबार – डॉ. दीपक कोहली

र्यटन आज दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से है और पर्यटन उद्योग का सबसे तेज़ी से फैलता क्षेत्र पर्यावरण पर्यटन है। कोस्टा रिका और बेलिज जैसे देशों में विदेशी मुद्रा अर्जित करने का सबसे बड़ा रुाोत पर्यटन ही है जबकि ग्वाटेमाला में इसका स्थान दूसरा है। समूचे विकासशील ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र प्रबंधकों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता के बीच संतुलन कायम करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। पर्यावरण पर्यटन भी इस महत्वपूर्ण संतुलन का एक पक्ष है। सुनियोजित पर्यावरण पर्यटन से संरक्षित क्षेत्रों और उनके आसपास रहने वाले समुदायों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए जैव विविधता संरक्षण के दीर्घावधि उपायों और स्थानीय विकास के बीच समन्वय कायम करना होगा।

सामान्य शब्दों में पर्यावरण पर्यटन या इको टूरिज़्म का अर्थ है पर्यटन और प्रकृति संरक्षण का प्रबंधन इस ढंग से करना कि एक तरफ पर्यटन और पारिस्थितिकी की आवश्यकताएं पूरी हों और दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों के लिए रोज़गार – नए कौशल, आय और महिलाओं के लिए बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2002 को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण-पर्यटन वर्ष के रूप में मनाए जाने से पर्यावरण पर्यटन के विश्वव्यापी महत्व, उसके लाभों और प्रभावों को मान्यता मिली। अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण पर्यटन वर्ष ने हमें विश्व स्तर पर पर्यावरण पर्यटन की समीक्षा और भविष्य में इसका स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त साधनों और संस्थागत ढांचे को मज़बूत करने का अवसर प्रदान किया। इसका अर्थ है कि पर्यावरण पर्यटन की खामियां और नकारात्मक प्रभाव दूर करते हुए इससे अधिकतम आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ प्राप्त किए जा सकें।

पर्यावरण पर्यटन को अब सब रोगों की औषधि के रूप में देखा जा रहा है जिससे भारी मात्रा में पर्यटन राजस्व मिलता है और पारिस्थितिकी प्रणाली को कोई क्षति नहीं पहुंचती क्योंकि इसमें वन संसाधनों का दोहन नहीं किया जाता। एक अवधारणा के रूप में पर्यावरण पर्यटन को भारत में हाल ही में बल मिला है, लेकिन एक जीवन पद्धति के रूप में भारतीय सदियों से इस अवधारणा पर अमल कर रहे हैं। पर्यावरण पर्यटन को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। इंटरनेशनल इको टूरिज़्म सोसायटी ने 1991 में इसकी परिभाषा इस प्रकार की थी: पर्यावरण पर्यटन प्राकृतिक क्षेत्रों की वह दायित्वपूर्ण यात्रा है जिससे पर्यावरण संरक्षण होता है और स्थानीय लोगों की खुशहाली बढ़ती है।

विश्व पर्यटन संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार पर्यावरण पर्यटन के अंतर्गत अपेक्षाकृत अबाधित प्राकृतिक क्षेत्रों की ऐसी यात्रा शामिल है जिसका निर्दिष्ट लक्ष्य प्रकृति का अध्ययन और सम्मान करना तथा वनस्पति और जीव-जंतुओं के दर्शन का आऩंद लेना तथा साथ ही इन क्षेत्रों से संबद्ध सांस्कृतिक पहलुओं (अतीत और वर्तमान, दोनों) का अध्ययन करना है। वल्र्ड कंज़र्वेशन यूनियन (आईयूसीएन, 1996) के अनुसार पर्यावरण पर्यटन का अर्थ है प्राकृतिक क्षेत्रों की पर्यावरण अनुकूल यात्रा ताकि प्रकृति (साथ ही अतीत और वर्तमान की सांस्कृतिक विशेषताओं) को सराहा जा सके और उनका आनंद उठाया जा सके, जिससे संरक्षण को प्रोत्साहन मिले, पर्यटकों का असर कम पड़े और स्थानीय लोगों की सक्रिय सामाजिक-आर्थिक भागीदारी का लाभ उठाया जा सके। संक्षेप में, इसकी परिभाषाओं में तीन पहलुओं को रेखांकित किया गया है – प्रकृति, पर्यटन और स्थानीय समुदाय। सार्वजनिक पर्यटन से इसका अर्थ भिन्न है, जिसका लक्ष्य प्रकृति का दोहन है। संरक्षण, स्थिरता और जैव-विविधता पर्यावरण पर्यटन के तीन परस्पर सम्बंधित पहलू हैं। विकास के एक साधन के रूप में पर्यावरण पर्यटन जैव विविधता समझौते’ के तीन बुनियादी लक्ष्यों को हासिल करने में मदद दे सकता है:

– संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन प्रणालियां (सार्वजनिक या निजी) मज़बूत बनाकर और सुदृढ़ पारिस्थितिकी प्रणालियों का योगदान बढ़ाकर जैव-विविधता (और सांस्कृतिक विविधता) का संरक्षण।

– पर्यावरण पर्यटन और सम्बंधित व्यापार नेटवर्क में आमदनी, रोज़गार और व्यापार के अवसर पैदा करके जैव विविधता के स्थायी इस्तेमाल को प्रोत्साहन, और

– स्थानीय समुदायों और जनजातीय लोगों को पर्यावरण-पर्यटन गतिविधियों के लाभ में समान रूप से भागीदार बनाना और इसके लिए पर्यावरण पर्यटन की आयोजना और प्रबंधन में उनकी पूर्ण सहमति एवं भागीदारी प्राप्त करना।

पर्यावरण पर्यटन का सिद्धांतों, दिशा-निर्देशों और स्थिरता के मानदंडों पर आधारित होना इसे पर्यटन क्षेत्र में विशेष स्थान प्रदान करता है। पहली बार इस धारणा को परिभाषित किए जाने के बाद के वर्षों में पर्यावरण पर्यटन के अनिवार्य बुनियादी तत्वों के बारे में आम सहमति बनी है जो इस प्रकार है: भली-भांति संरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, विभिन्न सांस्कृतिक और साहसिक गतिविधियों के दौरान एक ज़िम्मेदार, कम असर डालने वाला पर्यटक व्यवहार, पुनर्भरण न हो सकने वाले संसाधनों की कम से कम खपत, स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी, जो प्रकृति, संस्कृति और परम्पराओं के बारे में पर्यटकों को प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराने में सक्षम होते हैं और अंत में स्थानीय लोगों को पर्यावरण पर्यटन प्रबंधन के अधिकार प्रदान करना ताकि वे जीविका के वैकल्पिक अवसर अपनाकर संरक्षण सुनिश्चित कर सकें तथा पर्यटक और स्थानीय समुदाय, दोनों के लिए शैक्षिक पहलू शामिल कर सकें।

पर्यावरण अनुकूल गतिविधि होने के कारण पर्यावरण पर्यटन का लक्ष्य पर्यावरण मूल्यों और शिष्टाचार को प्रोत्साहित करना तथा निर्बाध रूप में प्रकृति का संरक्षण करना है। इस तरह यह वन्य जीवों और प्रकृति को लाभ पहुंचाता है तथा स्थानीय लोगों की भागीदारी उनके लिए आर्थिक लाभ सुनिश्चित करती है जो आगे चलकर उन्हें बेहतर और आसान जीवन स्तर उपलब्ध कराती है। (स्रोत फीचर्स)

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आंतों के बैक्टीरिया बताएंगे आपकी सच्ची उम्र

ह तो जानी-मानी बात है कि हमारी आंतों में अरबों बैक्टीरिया निवास करते हैं। दरअसल, अनुमान तो यही है कि किसी मनुष्य के शरीर में उसकी अपनी कोशिकाओं की तुलना में इन बैक्टीरिया की संख्या ज़्यादा होती है। और ये बैक्टीरिया आपकी पाचन शक्ति से लेकर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली तक को प्रभावित करते हैं। हमारे इन सूक्ष्मजीव साथियों को हमारा सूक्ष्मजीव संसार कहते हैं। लेकिन जो बात पता नहीं है, वह है कि यह सूक्ष्मजीव संसार उम्र के साथ कैसे बदलता जाता है या एक सामान्य सूक्ष्मजीव संसार किसे कहें। हाल ही में इनसिलिको मेडिसिन नामक कंपनी के शोधकर्ता एलेक्स ज़वोरोनकोव और उनके साथियों ने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है।

शोधकर्ताओं ने इसके लिए दुनिया भर के 1165 स्वस्थ व्यक्तियों के आंतों के बैक्टीरिया के नमूने लिए। इनमें से लगभग एक-तिहाई की उम्र 20 से 39 वर्ष, एक-तिहाई की 40 से 59 वर्ष और शेष की 60 से 90 वर्ष थी। इन नमूनों के आंकड़ों का विश्लेषण कंप्यूटर से मशीन लर्निंग तकनीक से किया गया। इसके लिए उन्होंने जिस एल्गोरिदम का उपयोग किया वह ठीक उस तरह काम करता है जैसे मस्तिष्क की तंत्रिकाएं काम करती हैं। उन्होंने 90 प्रतिशत नमूनों का विश्लेषण उनमें पाए गए बैक्टीरिया की 95 प्रजातियों के आधार पर किया था। इसके आधार पर कंप्यूटर ने यह सीख लिया कि उम्र के साथ इन बैक्टीरिया के अनुपात में किस तरह के परिवर्तन आते हैं।

इसके बाद ज़वोरोनकोव की टीम ने कंप्यूटर को बाकी 10 प्रतिशत लोगों के बारे में उनकी उम्र का अंदाज़ लगाने को कहा। देखा गया कि उनका एल्गोरिद्म व्यक्ति की उम्र का अंदाज़ 4 वर्ष की सीमा के अंदर सही लगा लेता है। यानी कंप्यूटर सूक्ष्मजीव संसार के आधार पर व्यक्ति की जो उम्र बताता है उसमें 2 वर्ष की कमी-बेशी हो सकती है। यह भी पता चला कि उम्र का अंदाज़ लगाने में बैक्टीरिया की 95 प्रजातियों में से 39 प्रजातियां सबसे महत्वपूर्ण हैं।

ज़वोरोनकोव की टीम को पता चला कि उम्र के साथ कुछ बैक्टीरिया का अनुपात बढ़ता है (जैसे यूबैक्टीरियम हैली, जो आंतों में चयापचय में महत्वपूर्ण माना जाता है)। दूसरी ओर कुछ बैक्टीरिया की संख्या घटती है (जैसे बैक्टीरॉइड्स वल्गेरिस, जो आंतों की एक किस्म की सूजन के लिए जवाबदेह माना जाता है)। यह भी लगता है कि भोजन, नींद की आदतें, शारीरिक व्यायाम वगैरह बैक्टीरिया की प्रजातियों की प्रचुरता में बदलाव लाते हैं।

यदि टीम के उपरोक्त निष्कर्ष की पुष्टि होती है, तो यह अन्य जैविक चिंहों के समान व्यक्ति की उम्र का एक और चिंह साबित होगा। इसके अलावा यह कई बीमारियों को समझने में भी मददगार होगा। (स्रोत फीचर्स)

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चांद पर भेजा टाइम कैप्सूल

पिछले हफ्ते मानव इतिहास और सभ्यता की जानकारी से लैस अंतरिक्ष यान चांद की ओर रवाना हो गया। मानव इतिहास और सभ्यता को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने की ओर यह एक और कदम है। 3 करोड़ पृष्ठों की इस जानकारी को एक नैनोटेक डिवाइस में सहेजा गया है। उम्मीद है कि यह यान अप्रैल तक चांद पर उतर जाएगा।

आर्क मिशन फाउंडेशन के प्रोजेक्ट का उद्देश्य है कि इतने वर्षों में इंसानों ने जो भी जानकारी जुटाई है उसे आने वाले कई अरब वर्षों तक महफूज़ रखा जाए। चूंकि कागज़ी किताबों, चित्र जैसे रिकॉर्ड का समय के साथ नष्ट हो जाने का खतरा होता है इसलिए पृथ्वी और अंतरिक्ष में कई स्थानों पर डैटा सुरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। ल्यूनर लायब्रेरी इसी प्रयास में एक और कदम है। ल्यूनर लायब्रेरी नामक यह नैनोटेक डिवाइस 25 डिस्क से मिलकर बनी है। हर डिस्क की मोटाई 40 माइक्रॉन (1 से.मी. का 10 हज़ारवां अंश) है। इन डिस्क को बनाने में निकल धातु का उपयोग किया गया है।

मानव सभ्यता का लेखागार बने इस डिवाइस में किताबों के चित्र, फोटो, चित्रण, दस्तावेज़, विकीपीडिया (अंग्रेज़ी में), किताबें, वैज्ञानिक हैंडबुक, विविध भाषाओं के बारे में जानकारी और उनके अनुवाद सहेजे गए हैं। इसके अलावा इसमें इरुााइल के इतिहास और संस्कृति से जुड़े गीत, संदेश और बच्चों द्वारा बनाए गए चित्र भी हैं।

इस डिवाइस में आसानी से लेंस की मदद से पढ़े जा सकने वाले बड़े-बड़े अक्षर भी हैं और ऐसे भी अक्षऱ और फोटो हैं जिन्हें सूक्ष्मदर्शी की मदद से ही पढ़ा जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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